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होशे 1
पहला व्याख्यान
होशे 1:1
1. यहूदा के राजाओं — ऊज्जिय्याह, योताम, आहाज और हिजकिय्याह — के दिनों में, और योआश के पुत्र इस्राएल के राजा यारोबाम के दिनों में, यहोवा का वचन बेरी के पुत्र होशे के पास पहुँचा।
1. Sermo Jehovae— qui fuit ad Hoseam filium Beri— diebus Uzia— Jotham— Achaz— Ezechiae— regum Jehuda— et diebus Jarobeam filii Joas regis Israel.
यह पहला पद उस समय को दिखाता है जिसमें होशे ने भविष्यद्वाणी की। वह यहूदा के चार राजाओं के नाम लेता है — ऊज्जिय्याह, योताम, आहाज और हिजकिय्याह। ऊज्जिय्याह ने, जो अजर्याह भी कहलाता है, बावन वर्ष राज्य किया; परन्तु कोढ़ से मारे जाने के पश्चात् वह मनुष्यों की संगति में न रहा, और उसने अपनी राजकीय प्रतिष्ठा त्याग दी। उसका पुत्र योताम उसका उत्तराधिकारी हुआ। योताम के वर्ष लगभग सोलह थे, और लगभग उतने ही हिजकिय्याह के पिता राजा आहाज के थे; और राजा हिजकिय्याह के ही राज्यकाल में होशे की मृत्यु हुई। अब यदि हम यह जानना चाहें कि उसने कितने समय तक अपना शिक्षा देने का पद निभाया, तो हमें उस पर ध्यान देना होगा जो पवित्र इतिहास कहता है — कि ऊज्जिय्याह योआश के पुत्र यारोबाम के सत्ताईसवें वर्ष में राज्य करने लगा। यदि हम यह मान लें कि होशे ने यारोबाम के राज्यकाल में, कुछ वर्षों को छोड़कर, शिक्षक के रूप में अपना कर्तव्य निभाया — अर्थात् उन सोलह वर्षों में जो ऊज्जिय्याह के राज्य के आरम्भ से यारोबाम की मृत्यु तक बीते — तो उसने ऊज्जिय्याह के राज्यकाल में छत्तीस वर्ष भविष्यद्वाणी की होगी। तौभी इसमें कोई सन्देह नहीं कि उसने यारोबाम के राज्य के अन्त से कुछ वर्ष पहले ही अपना पद निभाना आरम्भ कर दिया था।
अतः यहाँ कम से कम चालीस वर्ष प्रतीत होते हैं। योताम अपने पिता का उत्तराधिकारी हुआ और उसने सोलह वर्ष राज्य किया; और यद्यपि यह एक सम्भव अनुमान है कि उसके राज्य का आरम्भ उस समय से गिना जाए जब उसने शासन अपने हाथ में लिया, जब उसका पिता कोढ़ से मारा जाकर मनुष्यों की संगति से निकाल दिया गया था, तौभी यह सम्भव है कि उसके पिता की मृत्यु तक का शेष समय हमारी गणना में आना चाहिए। फिर भी जब हम कुछ वर्षों को मान लेते हैं, तो यह निश्चित है कि आहाज के राज्य करने से पहले होशे पैंतालीस वर्ष से अधिक भविष्यद्वाणी कर चुका था। अब उन सोलह वर्षों को जोड़ दो जिनमें आहाज ने राज्य किया, तो संख्या इकसठ हो जाएगी। फिर वे वर्ष शेष रहते हैं जिनमें उसने हिजकिय्याह के राज्यकाल में भविष्यद्वाणी की। अतः इसके सिवा और कुछ हो ही नहीं सकता कि उसने साठ वर्ष से अधिक अपने पद का निर्वाह किया, और सम्भवतः वह सत्तरवें वर्ष के पार भी बना रहा।
इससे प्रकट होता है कि पवित्र आत्मा ने उसे कितने बड़े और कितने अजेय साहस और धीरज से सम्पन्न किया था। परन्तु जब परमेश्वर बीस या तीस वर्ष तक हमारी सेवा लेता है, तो हम इसे बहुत थका देनेवाला समझते हैं, विशेषकर जब हमें दुष्ट मनुष्यों से संघर्ष करना पड़ता है, और ऐसे लोगों से जो स्वेच्छा से जूआ नहीं उठाते, वरन् हठपूर्वक हमारा विरोध करते हैं; तब हम तुरन्त मुक्त किए जाने की लालसा करते हैं, और उन सैनिकों के समान हो जाना चाहते हैं जिन्होंने अपनी सेवा की अवधि पूरी कर ली हो। अतः जब हम देखते हैं कि यह भविष्यद्वक्ता इतने लम्बे समय तक स्थिर बना रहा, तो वह हमारे लिए धीरज का आदर्श ठहरे, ताकि हम निराश न हों, चाहे प्रभु हमें तुरन्त हमारे भार से मुक्त न भी करे।
उन चार राजाओं के विषय में, जिनके वह नाम लेता है, इतना ही पर्याप्त है। उसने निश्चय ही (जैसा मैंने अभी दिखाया) राजा ऊज्जिय्याह अर्थात् अजर्याह के अधीन लगभग चालीस वर्ष, और फिर राजा आहाज के अधीन कुछ वर्ष भविष्यद्वाणी की होगी (योताम के राज्य को, जो उसके पिता के राज्य के साथ-साथ चला, अभी छोड़ देते हैं), और वह हिजकिय्याह के समय तक बना रहा: परन्तु उसने विशेष रूप से योआश के पुत्र यारोबाम का उल्लेख क्यों किया है, जबकि वह उसके अधीन थोड़े ही समय तक भविष्यद्वाणी कर सका होगा? उसका पुत्र जकर्याह उसका उत्तराधिकारी हुआ; उसके पश्चात् शल्लूम का षड्यन्त्र उठा, जो शीघ्र ही नष्ट हो गया; फिर राज्य बड़ी उथल-पुथल में फँस गया; और अन्त में अश्शूरी, शल्मनेसेर के द्वारा, दस गोत्रों को बन्दी बनाकर ले गया, जो मादियों के बीच तितर-बितर हो गए। जब स्थिति ऐसी थी, तो भविष्यद्वक्ता यहाँ इस्राएल के केवल एक ही राजा का उल्लेख क्यों करता है? यह अनोखा प्रतीत होता है; क्योंकि वह उस राज्य के अन्त तक और अपनी मृत्यु तक अपना शिक्षा देने का पद निभाता रहा। परन्तु इसका उत्तर सहज ही दिया जा सकता है: वह स्पष्ट रूप से यह व्यक्त करना चाहता था कि उसने उस समय शिक्षा देना आरम्भ किया जब राज्य अखण्ड था; क्योंकि यदि उसने यारोबाम की मृत्यु के पश्चात् भविष्यद्वाणी की होती, तो ऐसा लग सकता था कि वह उस समय की परिस्थितियों को देखकर किसी बड़ी विपत्ति का अनुमान लगा रहा है: तब वह भविष्यद्वाणी न होती, या कम से कम उसकी विश्वसनीयता बहुत घट जाती। लोग कहते, "वाह! अब वह उस बात की भविष्यवाणी करता है जो सबकी आँखों के सामने प्रत्यक्ष है।" क्योंकि जकर्याह थोड़े ही समय तक फला-फूला; और ऊपर जिस षड्यन्त्र का संकेत किया गया वह निकट आते विनाश का निश्चित पूर्व-लक्षण था, और राज्य शीघ्र ही छिन्न-भिन्न हो गया। इसलिए भविष्यद्वक्ता यहाँ स्पष्ट शब्दों में साक्षी देता है कि उसने लोगों को आनेवाले पलटे की चेतावनी उस समय भी दे दी थी जब इस्राएल का राज्य धन और शक्ति में फल-फूल रहा था, जब यारोबाम अपनी विजयों का आनन्द मना रहा था, और जब समृद्धि ने सारे देश को मतवाला कर रखा था।
तो यही कारण था कि भविष्यद्वक्ता ने केवल इसी एक राजा का उल्लेख किया; क्योंकि उसके अधीन इस्राएल का राज्य बलवन्त हो गया था, और अनेक गढ़ों और बड़ी सेना से दृढ़ किया गया था, और बड़े धन से भी भरपूर था। वास्तव में पवित्र इतिहास हमें बताता है कि परमेश्वर ने यारोबाम के द्वारा, यद्यपि वह स्वयं अयोग्य था, इस्राएल के राज्य को छुड़ाया था, और उसने बहुत से नगर और देश का अति विस्तृत भाग फिर से प्राप्त कर लिया था। अतः जब उसने राज्य को बढ़ा लिया था, जब वह अपने सब पड़ोसियों के लिए भयानक हो गया था, जब उसने बड़ा धन बटोर लिया था, और जब लोग चैन और विलास में जीवन बिता रहे थे, तब भविष्यद्वक्ता ने जो घोषित किया वह अविश्वसनीय प्रतीत होता था। उसने कहा, "तुम प्रभु की प्रजा नहीं हो; तुम व्यभिचार की सन्तान हो, तुम्हारा जन्म व्यभिचार से हुआ है।" ऐसी डाँट निश्चय ही समयोचित नहीं जान पड़ती थी। फिर उसने कहा, "राज्य तुमसे छीन लिया जाएगा, विनाश तुम्हारे निकट है।" "क्या, हमारे? और हमारे राजा ने तो अभी-अभी इतनी विजयें पाई हैं, और दूसरे राजाओं पर आतंक छा दिया है!" यहूदा का राज्य, जो प्रतिद्वन्द्वी था, उस समय लगभग टूट चुका था, इसलिए कोई ऐसा न था जो ऐसी घटना की आशंका करने का साहस करता।
अतः अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता यहाँ स्पष्ट रूप से क्यों कहता है कि उसने यारोबाम के अधीन भविष्यद्वाणी की थी। उसने निश्चय ही उसकी मृत्यु के पश्चात् भी भविष्यद्वाणी की, और इस्राएल के राज्य के विनाश के बाद भी अपने पद का निर्वाह करता रहा; परन्तु उसने उस समय शिक्षा देना आरम्भ किया जब वह उन दुष्टों के लिए उपहास का पात्र था, जो परमेश्वर के विरुद्ध अपने आप को ऊँचा उठाते थे, और जब तक वह उन्हें छोड़ता और सहता रहा तब तक उसकी धमकियों को ढिठाई से तुच्छ जानते रहे; और ऐसा सदा होता है, जैसा सब युगों का निरन्तर अनुभव प्रमाणित करता है। इससे हम और भी स्पष्ट रूप से देखते हैं कि परमेश्वर ने भविष्यद्वक्ता को आत्मा की कैसी सामर्थ्य से सम्पन्न किया था, जिसने इतने शक्तिशाली राजा के विरुद्ध उठने और उसकी दुष्टता को डाँटने का, और उसकी प्रजा को भी उसी न्याय के लिए बुलाने का साहस किया। अतः जब भविष्यद्वक्ता ने ऐसे समय में इतनी निर्भीकता से आचरण किया, जब इस्राएली अपनी बड़ी सफलता के कारण न केवल मतिमन्द हो गए थे, वरन् पूर्णतः उन्मत्त भी थे, तो यह निश्चय ही किसी आश्चर्यकर्म से कम न था; और इससे उसका अधिकार स्थापित करने में बहुत सहायता मिलनी चाहिए। अब हम पहले पद में दिए गए शीर्षक का उद्देश्य देखते हैं। आगे लिखा है — होशे 1:2
2. होशे के द्वारा यहोवा के वचन का आरम्भ। और यहोवा ने होशे से कहा, जा, व्यभिचार की एक स्त्री को और व्यभिचार की सन्तान को अपने लिए ले; क्योंकि यह देश यहोवा के पीछे चलना छोड़कर बड़ा व्यभिचार कर रहा है।
2. Principiam quo loquutus est Jehova per Hoseam, (alii vertunt, cum Hosea; ad verbum est, in Hosea; est liters beth.) Dixit Jehova ad Hoseam, Vade, sume tibi uxorem scortationum et filios scortationem, quia scortando scortabitur terra, (hoc est, scortata est,) ne sequatur Jehovam..
भविष्यद्वक्ता यहाँ दिखाता है कि आरम्भ में उसे कौन-सा भार सौंपा गया था, अर्थात् इस्राएलियों के विरुद्ध खुला युद्ध घोषित करना, और मानो परमेश्वर के प्रतिनिधि के रूप में अत्यन्त क्रुद्ध होना, और विनाश की घोषणा करना। वह कोमल बातों से आरम्भ नहीं करता, न वह लोगों को नम्रता से मन फिराने का उपदेश देता है, न अपनी शिक्षा की कठोरता को कम करने के लिए घुमाव-फिराव का मार्ग अपनाता है। वह दिखाता है कि उसने ऐसी किसी बात का प्रयोग नहीं किया, वरन् कहता है कि वह युद्ध की घोषणा करने के लिए दूतों या सन्देशवाहकों के समान भेजा गया था। अतः होशे के द्वारा प्रभु ने जो कहा उसका आरम्भ यह था: "ये लोग व्यभिचारी वंश हैं, सब के सब मानो एक वेश्या से जन्मे हैं, इस्राएल का राज्य सबसे घिनौना वेश्यालय है; और अब मैं उन्हें त्यागता और अस्वीकार करता हूँ, मैं अब उन्हें अपनी सन्तान नहीं मानता।" यह कोई साधारण प्रचण्डता न थी। इससे हम देखते हैं कि आरम्भ शब्द अकारण नहीं, वरन् सोच-समझकर रखा गया है, ताकि हम जानें कि भविष्यद्वक्ता ने जैसे ही शिक्षा देने का पद ग्रहण किया, वह प्रचण्ड और कठोर था, और मानो इस्राएल के राज्य के विरुद्ध गरज उठा।
अब यदि यह पूछा जाए कि परमेश्वर इतना अधिक अप्रसन्न क्यों था? उसने पहले उन अभागे मनुष्यों को अपनी ओर फिर से क्यों नहीं बुलाया, जबकि सामान्य रीति यह प्रतीत होती है कि भविष्यद्वक्ता दयालु और पितृतुल्य वचनों के द्वारा उन लोगों को सही बुद्धि में लौटाने का प्रयत्न करता था जो परमेश्वर की शुद्ध आराधना से हट गए थे — तो फिर परमेश्वर ने यह साधारण मार्ग क्यों नहीं अपनाया? परन्तु इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि लोगों के रोग असाध्य थे। निस्सन्देह भविष्यद्वक्ता यहाँ स्पष्ट संकेत करता है कि वह परमेश्वर की ओर से उस समय भेजा गया जब स्थिति लगभग सुधार से परे थी। हम जानते ही हैं कि परमेश्वर मनुष्यों के साथ इतनी कठोरता से व्यवहार करने का अभ्यस्त नहीं है, जब तक कि वह अन्य सब उपाय आज़मा न चुका हो; और यह निस्सन्देह पवित्रशास्त्र के वृत्तान्तों से सहज ही सीखा जा सकता है। दस गोत्रों ने दाऊद के घराने से बलवा करने के तुरन्त बाद परमेश्वर की आराधना त्यागकर मूर्तिपूजा और अभक्तिपूर्ण अन्धविश्वासों को अपना लिया। उन्हें अपने मन में इस ईश्वरीय वाणी का स्मरण बनाए रखना चाहिए था: 'यहोवा ने सिय्योन पर्वत को चुना है, जहाँ वह चाहता है कि उसकी आराधना की जाए; उसने कहा, यह युग-युग के लिए मेरा विश्रामस्थान है; यहीं मैं वास करूँगा, क्योंकि मैंने इसे चुना है' (भजन संहिता 132:13,14)। और हम जानते हैं कि यह भविष्यद्वाणी एक या दस बार नहीं, वरन् सौ बार दोहराई गई थी, ताकि वह मनुष्यों के हृदयों में और भी दृढ़ता से जम जाए। अतः जब उन्हें यह सत्य अपने हृदयों पर पूरी रीति से अंकित रखना चाहिए था कि प्रभु सिय्योन पर्वत को छोड़ और कहीं अपनी आराधना नहीं चाहता, तो एक नया मन्दिर खड़ा करना और बछड़े बनाना उनकी भयंकर मूर्खता थी। अतः लोगों का इतनी शीघ्रता से परमेश्वर से फिर जाना अत्यन्त हठीले पागलपन का उदाहरण था। परन्तु, जैसा मैंने कहा, वे अभक्ति की चरम सीमा तक पहुँच चुके थे। जब परमेश्वर ने येहू के द्वारा ऐसे बड़े पापों का दण्ड दिया, तब लोगों को परमेश्वर की शुद्ध आराधना की ओर लौट आना चाहिए था, और देश में कुछ सुधार हुआ भी; परन्तु वे सदा अपने स्वभाव की ओर लौट गए, वरन् परिणाम ने सिद्ध कर दिया कि उन्होंने केवल थोड़े समय के लिए कपट किया था; वे एक शैतानी हठ से ऐसे अन्धे हो गए थे कि अपने अन्धविश्वासों में सदा बने रहे। अतः यह आश्चर्य की बात नहीं कि प्रभु ने होशे के द्वारा यह आरम्भ किया: "तुम सब व्यभिचार से जन्मे हो, तुम्हारा राज्य सबसे घिनौना वेश्यालय है; तुम मेरी प्रजा नहीं हो, तुम प्रिय नहीं हो।" तो फिर कौन यह स्वीकार न करेगा कि परमेश्वर ने इन लोगों के विरुद्ध ऐसी भयानक रीति से गरजकर उनके साथ न्यायपूर्वक, और सर्वोत्तम कारण से, व्यवहार किया? लोगों का हठ ऐसा अदम्य था कि उसे किसी और रीति से जीता नहीं जा सकता था। अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने यह अभिव्यक्ति क्यों प्रयोग की, बोलने का वह आरम्भ जो परमेश्वर ने किया।
फिर आगे आता है, होशे में। उसने पहले पद में कहा था, यहोवा का वचन जो होशे के पास पहुँचा; अब वह कहता है, {,}נהושעbeusho, होशे में; और वह आगे जोड़ता है, परमेश्वर ने बात की और होशे से कहा, पहले पद में प्रयुक्त सम्बन्ध-सूचक शब्द को दोहराते हुए। प्रभु का वचन होशे के पास पहुँचा, ऐसा केवल इसलिए नहीं कहा गया कि परमेश्वर ने भविष्यद्वक्ता को सम्बोधित किया, वरन् इसलिए कि उसने उसे निश्चित आज्ञाएँ देकर भेजा; क्योंकि इसी अर्थ में कहा जाता है कि परमेश्वर का वचन भविष्यद्वक्ताओं के पास पहुँचा। परमेश्वर अपना वचन बिना भेद के उन दूसरों को भी सम्बोधित करता है जिन्हें वह अपने वचन के द्वारा सिखाना चाहता है; परन्तु वह अपने भविष्यद्वक्ताओं से एक विशेष रीति से बात करता और उन्हें सम्बोधित करता है, क्योंकि वह उन्हें अपने वचन के सेवक और प्रचारक बनाता है, और मानो उनके मुँह में वह डाल देता है जो वे बाद में लोगों के सामने प्रकट करते हैं। इसी प्रकार मसीह कहता है कि परमेश्वर का वचन राजाओं के पास पहुँचा, क्योंकि वह उन्हें मानवजाति पर शासन करने के लिए ठहराता और नियुक्त करता है। वह कहता है, "यदि उसने उन्हें ईश्वर कहा, जिनके पास परमेश्वर का वचन पहुँचा;" और हम जानते हैं कि वह भजन विशेषकर राजाओं को ध्यान में रखकर लिखा गया था। अब हम समझते हैं कि पहले पद का यह वाक्य क्या समाहित करता है। परमेश्वर का वचन होशे के पास पहुँचा; क्योंकि प्रभु ने भविष्यद्वक्ता को केवल साधारण रीति से सम्बोधित नहीं किया, वरन् उसे निर्देशों से सुसज्जित किया, ताकि वह बाद में लोगों को मानो स्वयं परमेश्वर के प्रतिनिधि के रूप में सिखाए।
अब दूसरे पद में जोड़ा गया है, बोलने का आरम्भ, जैसा प्रभु ने होशे के द्वारा किया। जो इसका अनुवाद "होशे के साथ" करते हैं, वे भविष्यद्वक्ता के अभिप्राय की नीरस व्याख्या करते प्रतीत होते हैं। मैं जानता हूँ कि अक्षर {,}בbeth का पवित्रशास्त्र में प्रायः यह अर्थ होता है; परन्तु भविष्यद्वक्ता इस स्थान पर निस्सन्देह अपने आप को पवित्र आत्मा के साधन के रूप में प्रस्तुत करता है। अतः परमेश्वर ने होशे में, या होशे के द्वारा, बात की; क्योंकि उसने अपनी बुद्धि से कुछ भी उत्पन्न नहीं किया, वरन् परमेश्वर ने उसके द्वारा बात की; यह कहने की एक ऐसी रीति है जिससे हमारा बार-बार सामना होगा। वास्तव में परमेश्वर के सेवकों का सम्पूर्ण अधिकार इसी पर निर्भर है कि वे अपने आप को खुली छूट न दें, वरन् जो कुछ प्रभु ने उन्हें आज्ञा दी है उसे, अपनी ओर से कुछ भी जोड़े बिना, मानो हाथों-हाथ विश्वासयोग्यता से सौंप दें। अतः परमेश्वर ने होशे में बात की। इसके बाद आता है, प्रभु ने होशे से कहा। अब यह बात, जो तीसरी बार कही गई है, अर्थात् तीन बार दोहराई गई है, भिन्न-भिन्न रूपों में उसी आदेश के सिवा और कुछ नहीं है। उसने पहले सामान्य रूप से कहा, "प्रभु का वचन जो होशे के पास पहुँचा;" अब वह कहता है, प्रभु ने इस प्रकार बात की, और वह स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है कि वह वचन क्या था जिसका उल्लेख उसने पहले पद में किया था।
वह कहता है, जा, व्यभिचार की एक स्त्री और व्यभिचार की सन्तान को अपने लिए ले; और कारण जोड़ा गया है, क्योंकि व्यभिचार करते-करते, या छिनाला करते-करते, देश व्यभिचारी हो गया है। निस्सन्देह वह यहाँ उन दुर्गुणों की बात करता है जिन्हें प्रभु ने अकथनीय सहनशीलता से बहुत समय तक सहा था। अतः व्यभिचार करते-करते देश व्यभिचारी हो गया है, कि वह यहोवा के पीछे न चले।
यहाँ व्याख्याकार बहुत परिश्रम करते हैं, क्योंकि यह अत्यन्त अनोखा प्रतीत होता है कि भविष्यद्वक्ता एक वेश्या को पत्नी बनाए। कुछ कहते हैं कि यह एक असाधारण घटना थी। निश्चय ही एक शिक्षक में ऐसी छूट सहन नहीं की जा सकती थी। हम देखते हैं कि पौलुस एक अध्यक्ष से क्या अपेक्षा करता है, और निस्सन्देह प्राचीन काल में भविष्यद्वक्ताओं से भी यही अपेक्षा की जाती थी, कि उनके परिवार पवित्र हों और हर कलंक और निन्दा से मुक्त हों। अतः यदि भविष्यद्वक्ता किसी वेश्यालय में जाकर एक वेश्या को अपने लिए ले आता, तो वह सबके उपहास का पात्र बन जाता; क्योंकि वह यहाँ केवल एक अपवित्र स्त्री की नहीं, वरन् व्यभिचार की स्त्री की बात करता है, जिसका अर्थ है एक सामान्य वेश्या; क्योंकि व्यभिचार की स्त्री वह कहलाती है जिसने लम्बे समय से अपने आप को व्यभिचार का अभ्यस्त बना लिया हो, जिसने सबकी इच्छा पूरी करने के लिए अपने आप को सबके सामने प्रस्तुत किया हो, जिसने अपने आप को एक या दो बार नहीं, न थोड़े पुरुषों को, वरन् सबको बेच दिया हो। यह कि भविष्यद्वक्ता ने ऐसा किया, अत्यन्त असम्भाव्य प्रतीत होता है। परन्तु कुछ लोग उत्तर देते हैं, जैसा मैंने कहा, कि इसे सामान्य नियम नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि यह परमेश्वर की एक असाधारण आज्ञा थी। तौभी यह तर्कसंगत नहीं प्रतीत होता कि प्रभु इस प्रकार अकारण अपने भविष्यद्वक्ता को तुच्छ बना दे; क्योंकि ऐसा अपमान अपने ऊपर लाने के बाद, जब वह सार्वजनिक रूप से लोगों के सामने आता, तो वह स्वीकार किए जाने की आशा कैसे कर सकता था? यदि उसने ऐसी स्त्री से विवाह किया होता जैसी यहाँ वर्णित है, तो भविष्यद्वक्ता का पद ग्रहण करने के बजाय उसे जीवन भर छिपे रहना चाहिए था। अतः उनका मत सम्भाव्य नहीं है जो सोचते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने ऐसी पत्नी ली थी जैसी यहाँ वर्णित है।
3 इस विषय पर बहुत मतभेद रहा है। यह कि यह एक वास्तविक घटना थी, बहुत-से लोगों का मत रहा है। पूल बासिल, अगस्तीन, जेरोम और थियोडोरेट को इस विचार के माननेवालों के रूप में उद्धृत करता है। बिशप हॉर्सले उनसे सहमत है; परन्तु वह यह बुद्धिमानी की टिप्पणी करता है, "वास्तव में भविष्यद्वाणी की व्याख्या के लिए यह प्रश्न बहुत कम महत्त्व का है, क्योंकि वह कार्य समान रूप से प्रतीकात्मक था, चाहे वह वास्तविक हो या केवल दर्शन में; और प्रतीक का अर्थ, चाहे वह कार्य वास्तव में किया गया हो या दर्शन में, एक ही रहेगा।" हेनरी इस मत की ओर झुकता प्रतीत होता है कि यह एक दृष्टान्त था; और स्कॉट इस मत की ओर कि यह एक वास्तविक घटना थी। दृष्टान्त की धारणा में सबसे कम कठिनाई है, और यह शिक्षा देने की उस रीति के अनुरूप है जो पुराने और नए नियम दोनों में प्रायः अपनाई गई है। — सं.
फिर एक और कारण, जिसका कोई समाधान नहीं, उनके विरुद्ध जाता है; क्योंकि भविष्यद्वक्ता को केवल व्यभिचार की एक स्त्री ही नहीं, वरन् व्यभिचार की सन्तान भी, जो वेश्यागमन से उत्पन्न हुई हो, लेने की आज्ञा दी गई है। अतः यह ऐसा ही है मानो उसने स्वयं व्यभिचार किया हो। क्योंकि यदि हम कहें कि उसने ऐसी स्त्री से विवाह किया जिसने पहले कुछ अशोभनीय और अपवित्र आचरण किया था (जैसा जेरोम भविष्यद्वक्ता को निर्दोष ठहराने के लिए विस्तार से तर्क करता है), तो यह बहाना निःसार है; क्योंकि वह केवल पत्नी की नहीं, वरन् सन्तान की भी बात करता है, इस कारण कि परमेश्वर चाहता था कि सारी सन्तान व्यभिचार की हो, और वैध विवाह में ऐसा नहीं हो सकता था। इसलिए लगभग सभी इब्रानी विद्वान इस मत पर सहमत हैं कि भविष्यद्वक्ता ने वास्तव में पत्नी से विवाह नहीं किया, वरन् उसे दर्शन में ऐसा करने की आज्ञा दी गई थी। और तीसरे अध्याय (होशे 3:1) में हम लगभग यही बात वर्णित देखेंगे; और तौभी जो वहाँ बताया गया है वह वास्तव में किया नहीं जा सकता था, क्योंकि भविष्यद्वक्ता को एक ऐसी स्त्री से विवाह करने की आज्ञा दी गई है जिसने अपनी वैवाहिक विश्वासयोग्यता भंग की थी, और उसे मोल लेने के बाद कुछ समय तक घर में रखने की। हम जानते हैं कि ऐसा नहीं किया गया। अतः इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यह लोगों के सामने प्रस्तुत किया गया एक चित्रण था।
कुछ लोग आपत्ति करते हैं और कहते हैं कि भविष्यद्वक्ता द्वारा दिए गए इस पूरे खण्ड को किसी दर्शन का वर्णन नहीं समझा जा सकता। क्यों नहीं? वे कहते हैं, क्योंकि दर्शन तो केवल उसी को दिया गया था, और परमेश्वर का ध्यान भविष्यद्वक्ता की अपेक्षा सारी प्रजा पर था। परन्तु यह हो सकता है, और यही सम्भाव्य है, कि भविष्यद्वक्ता को कोई दर्शन नहीं दिखाया गया, वरन् परमेश्वर ने केवल उसे यह आज्ञा दी कि जो भार उसे सौंपा गया था उसकी घोषणा करे। अतः जब भविष्यद्वक्ता ने शिक्षा देना आरम्भ किया, तो उसने कुछ इस प्रकार आरम्भ किया: "प्रभु मुझे यहाँ मानो एक रंगमंच पर खड़ा करता है, ताकि मैं तुम्हें बताऊँ कि मैंने एक स्त्री से विवाह किया है, एक ऐसी स्त्री से जो परस्त्रीगमन और व्यभिचार की अभ्यस्त है, और कि मैंने उससे सन्तान उत्पन्न की है।" सारी प्रजा जानती थी कि उसने ऐसा कुछ नहीं किया था; परन्तु भविष्यद्वक्ता ने इस प्रकार इसलिए कहा कि उनकी आँखों के सामने एक सजीव चित्रण रखे। अतः दर्शन ऐसा था — एक आलंकारिक प्रदर्शन; यह नहीं कि भविष्यद्वक्ता ने यह बात दर्शन के द्वारा जानी, वरन् प्रभु ने उसे यह दृष्टान्त (यदि ऐसा कहें) या यह उपमा सुनाने की आज्ञा दी थी, ताकि लोग मानो एक जीवित चित्र में अपनी नीचता और विश्वासघात को देख सकें। संक्षेप में, यह एक ऐसा प्रदर्शन है जिसमें बात केवल शब्दों में ही प्रस्तुत नहीं की जाती, वरन् मानो दृश्य रूप में उनकी आँखों के सामने भी रख दी जाती है। कारण जोड़ा गया है, क्योंकि व्यभिचार करते-करते देश व्यभिचारी हो गया है।
4 यह निष्कर्ष नहीं निकलता; क्योंकि, जैसा बिशप हॉर्सले ठीक ही कहता है, "व्यभिचार की सन्तान" वे थे जो पहले से उत्पन्न हो चुके थे। भविष्यद्वक्ता को एक ऐसी स्त्री को, जो वेश्या थी, उसकी अवैध सन्तान समेत लेना था। इस खण्ड का स्पष्ट सन्देश यही है। — सं.
अतः अब हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता के शब्दों को किस प्रकार समझा जाना चाहिए; क्योंकि जब वह जनता के सामने गया तो उसने एक पात्र का रूप धारण किया, और उसी रूप में उसने लोगों से कहा कि परमेश्वर ने उसे एक वेश्या को अपनी पत्नी बनाने और उससे व्यभिचार की सन्तान उत्पन्न करने की आज्ञा दी है। इस कारण उसकी सेवकाई तुच्छ नहीं ठहरी, क्योंकि सब जानते थे कि वह सदा सदाचार और संयम से जीवन बिताता आया था; सब जानते थे कि उसका घराना हर निन्दा से मुक्त था; परन्तु यहाँ उसने अपने धारण किए हुए रूप में मानो लोगों की नीचता का एक जीवित प्रतिबिम्ब प्रस्तुत किया। यही अर्थ है, और मुझे इस व्याख्या में कुछ भी खींचतान नहीं दिखाई देती; और साथ ही हम इस वाक्यांश का अर्थ भी देखते हैं, व्यभिचार करते-करते देश व्यभिचारी हो गया है। होशे यह बात एक शब्द में कह सकता था, परन्तु उसे बहरों को सम्बोधित करना था; और हम जानते हैं कि जो अपने अन्धविश्वासों में आनन्द मनाते हैं उनका पागलपन कितना बड़ा और कितना मूढ़ होता है — वे कोई भी डाँट सहन नहीं कर सकते। अतः भविष्यद्वक्ता की बात पर ध्यान न दिया जाता, यदि वह उनकी आँखों के सामने मानो एक दर्पण में वह प्रदर्शित न करता जो वह उन्हें समझाना चाहता था; मानो वह कहता हो, "यदि तुम में से कोई अपने आप को इतना भी नहीं जान सकता कि अपनी सार्वजनिक नीचता को स्वीकार करे, यदि तुम सब परमेश्वर के विरुद्ध ऐसे हठीले हो, तो कम से कम अब मेरे धारण किए हुए रूप के द्वारा जान लो कि तुम सब व्यभिचारी हो, और एक घिनौने वेश्यालय से तुम्हारी उत्पत्ति हुई है; क्योंकि परमेश्वर तुम्हारे विषय में ऐसा ही घोषित करता है; और जब तुम ऐसी घोषणा को ग्रहण करने को तैयार नहीं हो, तो अब यह मेरे धारण किए हुए रूप में तुम्हारे सामने रखी जाती है।"
कि वह यहोवा के पीछे न चले, शब्दशः, यहोवा के पीछे से, {,}מאחרי meachri। यहाँ हम देखते हैं कि परमेश्वर की प्रजा की आत्मिक पवित्रता क्या है, और व्यभिचार करना शब्द का अभिप्राय भी क्या है। अतः परमेश्वर की प्रजा की आत्मिक पवित्रता प्रभु के पीछे चलना है; और इस पीछे चलने का अर्थ इसके सिवा और क्या है कि हम अपने आप को उसके वचन से शासित होने दें, और स्वेच्छा से उसकी आज्ञा मानें, और जिस किसी काम के लिए वह हमें बुलाए उसके लिए तत्पर और तैयार रहें? अतः जब प्रभु अपनी शिक्षा के साथ हमारे आगे-आगे चलता और मार्ग दिखाता है, और हम सीखने योग्य और आज्ञाकारी बनते हैं, और उसकी ओर ताकते हैं, और न दाहिनी ओर मुड़ते हैं न बाईं ओर, वरन् अपने सारे जीवन को विश्वास की आज्ञाकारिता के अधीन कर देते हैं — यही वास्तव में प्रभु के पीछे चलना है; और यह परमेश्वर की प्रजा की आत्मिक पवित्रता की अत्यन्त सुन्दर परिभाषा है।
और इसके विपरीत से हम यह भी सीख सकते हैं कि व्यभिचारी हो जाना क्या है; हम ऐसा तब करते हैं जब हम प्रभु के वचन से हट जाते हैं, जब हम झूठी शिक्षाओं पर कान लगाते हैं, जब हम अपने आप को अन्धविश्वासों के हवाले कर देते हैं; संक्षेप में, जब हम अपनी ही युक्तियों के पीछे भटकते हैं, और अपने विचारों को प्रभु के वचन के अधिकार के अधीन नहीं रखते। परन्तु व्यभिचार करना शब्द के विषय में अध्याय 2 में और अधिक कहा जाएगा; अभी मैं केवल संक्षेप में यह छूना चाहता था कि जब भविष्यद्वक्ता इस्राएलियों को इस बात के लिए डाँटता है कि वे सब व्यभिचारी हो गए हैं, तो उसका अभिप्राय क्या है। अब आगे — प्रार्थना हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जैसे तू ने एक बार हमें लेपालक बनाया है, और हमें निरन्तर अपनी ओर बुलाकर अपनी इस कृपा को दृढ़ करता रहता है, और हमें केवल कठोरता से ताड़ना ही नहीं देता, वरन् कोमलता और पितृ-स्नेह से अपनी ओर आमन्त्रित भी करता है, और साथ ही हमें मन फिराने का उपदेश देता है — हाँ, यह वरदान दे कि हम ऐसे कठोर न हो जाएँ कि तेरी भलाई का विरोध करें, न तेरी इस अविश्वसनीय सहनशीलता का दुरुपयोग करें, वरन् आज्ञाकारिता में अपने आप को तेरे अधीन कर दें; कि जब कभी तू हमें कठोरता से ताड़ना दे, तब हम विश्वास की सच्ची अधीनता के साथ तेरी ताड़नाओं को सहें, और अन्त तक अदम्य और हठीले न बने रहें, वरन् तेरी ओर, जो जीवन और उद्धार का एकमात्र सोता है, लौट आएँ; कि जैसे तू ने एक बार हम में भला काम आरम्भ किया है, वैसे ही तू उसे हमारे प्रभु के दिन तक पूरा करे। आमीन।
दूसरा व्याख्यान होशे 1:3, 4 3. सो उसने जाकर दिबलैम की बेटी गोमेर को ब्याह लिया; और वह उससे गर्भवती हुई और उसके एक पुत्र उत्पन्न हुआ।
3. Et profectus est et accepit Gomer, filiam Diablaim: et concepit et peperit ei filium.
4. तब यहोवा ने उससे कहा, उसका नाम यिज्रैल रख; क्योंकि थोड़े ही काल में मैं येहू के घराने से यिज्रैल के रक्त का पलटा लूँगा, और इस्राएल के घराने के राज्य का अन्त कर दूँगा।
4. Et dixit Jehova ad eum, Voca nomen Jizreel, quia adhuc pauxillum, et visitabo sanguines Jizreel super domum Jehu, et cessare faciam (hoc est, abolebo) regnum domus Israel.
हमने कल के व्याख्यान में कहा था कि परमेश्वर ने अपने भविष्यद्वक्ता को व्यभिचार की एक स्त्री लेने की आज्ञा दी, परन्तु वास्तव में ऐसा किया नहीं गया; क्योंकि भविष्यद्वक्ता को सबकी दृष्टि में तुच्छ बनाने के सिवा इसका और क्या परिणाम हो सकता था? और इस प्रकार उसका अधिकार शून्य हो जाता। परन्तु परमेश्वर ऐसे चित्रण के द्वारा इस्राएलियों को केवल यह दिखाना चाहता था कि वे अकारण अपनी बड़ाई करते थे; क्योंकि उनमें प्रशंसा के योग्य कुछ भी न था, वरन् वे हर प्रकार से निन्दनीय थे। अतः कहा गया है, होशे ने जाकर दिबलैम की बेटी गोमेर को अपने लिए ले लिया। {,}גמרGomer का इब्रानी में अर्थ है चूक जाना, मिट जाना; और कभी-कभी सकर्मक रूप में इसका अर्थ है भस्म करना; और इसलिए गोमेर का अर्थ है क्षय। परन्तु दिबलैम अंजीरों के पिण्ड हैं, अर्थात् सूखे अंजीर जिन्हें दबाकर पिण्ड बना दिया गया हो। यूनानी उन्हें {παλαθας} कहते हैं। कब्बालावादी यहाँ कहते हैं कि होशे की पत्नी इस नाम से इसलिए पुकारी गई क्योंकि जो व्यभिचार में बहुत लिप्त रहते हैं वे अन्त में मृत्यु और सड़ाहट में जा पड़ते हैं। इस प्रकार क्षय अंजीरों की बेटी है, क्योंकि अंजीरों से वे वासनाओं की मिठास समझते हैं। परन्तु यह कहना अधिक सरल होगा कि यह चित्रण लोगों के सामने प्रस्तुत किया गया, कि भविष्यद्वक्ता ने उनके सामने पत्नी के स्थान पर क्षय को, अर्थात् अंजीरों की बेटी को, रखा; अर्थात् उसने उनके सामने अंजीरों के पिण्ड या {παλαθας} रखे, जो गोमेर का प्रतिनिधित्व करते थे, जिसका अर्थ है क्षय; और उसने गणितज्ञों की-सी रीति अपनाई, जब वे अपनी आकृतियों का वर्णन करते हैं — "यदि यह इतना है, तो वह इतना है।" अतः हम इस खण्ड को इस प्रकार समझ सकते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने यहाँ अंजीरों के सड़े हुए पिण्डों को अपनी पत्नी का नाम दिया; जिससे वह क्षय या सड़ाहट थी, जो ऐसे पिण्डों में बदले हुए अंजीरों से उत्पन्न हुई। क्योंकि मैं अब भी उसी मत पर दृढ़ हूँ जो मैंने कल व्यक्त किया था, कि भविष्यद्वक्ता अपने लिए पत्नी लेने को किसी वेश्यालय में नहीं गया: क्योंकि अन्यथा उसने वैध सन्तान नहीं, वरन् जारज सन्तान उत्पन्न की होती; क्योंकि, जैसा कल कहा गया था, पत्नी और सन्तान की स्थिति एक ही थी।
अतः अब हम इस पद का सच्चा अर्थ यह समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने किसी वेश्या से विवाह नहीं किया, वरन् उसने केवल लोगों की आँखों के सामने उसे ऐसे प्रस्तुत किया मानो वह सड़ाहट हो, जो अंजीरों के सड़े हुए पिण्डों से उत्पन्न हुई हो।
अब आगे आता है, स्त्री गर्भवती हुई — वह काल्पनिक स्त्री, वह पत्नी जो चित्रित और प्रदर्शित की गई। वह कहता है, वह गर्भवती हुई और उसने एक पुत्र जना: तब यहोवा ने उससे कहा, उसका नाम यिज्रैल रख। बहुत-से लोग {,}יזרעאלIzroal का अनुवाद "तितर-बितर होना" करते हैं, और कसदी भावानुवादक का अनुसरण करते हैं। वे यह भी सोचते हैं कि इस द्व्यर्थक शब्द में कोई संकेत निहित है; क्योंकि {,}זרעzaro का अर्थ बीज है, इसलिए वे मानते हैं कि भविष्यद्वक्ता परोक्ष रूप से लोगों के व्यर्थ घमण्ड पर कटाक्ष करता है; क्योंकि वे अपने आप को चुना हुआ बीज कहते थे, इसलिए कि उन्हें प्रभु ने रोपा था; इसी से यिज्रैल नाम आया। परन्तु इन व्याख्याकारों के अनुसार भविष्यद्वक्ता यहाँ इस मूर्खता को तिरस्कार के योग्य ठहराता है; मानो वह कहता हो, "तुम इस्राएल हो; परन्तु दूसरे अर्थ में तुम बिखराव हो: क्योंकि जैसे बीज विभिन्न दिशाओं में फेंका जाता है, वैसे ही प्रभु तुम्हें तितर-बितर करेगा, और इस प्रकार तुम्हें नष्ट करके दूर फेंक देगा। तुम सोचते हो कि तुम इस देश में रोपे गए हो, और तुम्हें ऐसी स्थिरता मिली है जिससे तुम कभी हिलाए या उखाड़े नहीं जा सकते; परन्तु प्रभु अपने ही हाथ से तुम्हें पकड़कर संसार के दूरतम प्रदेशों में फेंक देगा।" यही अर्थ बहुत-से व्याख्याकार देते हैं; और मैं इससे इनकार नहीं करता कि भविष्यद्वक्ता बोने और बीज शब्दों की ओर संकेत करता है; इससे मेरी असहमति नहीं है: केवल मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि भविष्यद्वक्ता और आगे देखता है, और संकेत करता है कि वे पूर्णतः भ्रष्ट हो चुके थे, अब्राहम की सच्ची और वास्तविक सन्तान नहीं रहे थे।
जैसा हम देखते हैं, यिज्रैल और इस्राएल नामों में बड़ी समानता है। इस्राएल नाम कितना आदरणीय है, यह उसकी व्युत्पत्ति से प्रकट है; और हम यह भी जानते हैं कि यह नाम ऊपर से पवित्र पिता याकूब को दिया गया था। अतः इस नाम के देनेवाले परमेश्वर ने अपने ही अधिकार से यह ठहराया कि जो इस्राएली कहलाते हैं वे दूसरों से श्रेष्ठ हों: और फिर हमें वह कारण स्मरण रखना चाहिए जिससे याकूब इस्राएल कहलाया; क्योंकि उसने परमेश्वर से मल्लयुद्ध किया था, और उस संघर्ष में प्रबल हुआ था (उत्पत्ति 32:28)। इसलिए अब्राहम का वंश इस बात पर घमण्ड करता था कि वे इस्राएली हैं। और भविष्यद्वक्ता यशायाह भी इस अहंकार पर कटाक्ष करता है, जब वह कहता है, 'हे तुम जो इस्राएल के नाम से कहलाते हो, आओ' (यशायाह 48:1); मानो वह कहता हो, "तुम इस्राएली तो हो, परन्तु केवल नाम के; क्योंकि उसकी वास्तविकता तुम में विद्यमान नहीं है।"
अब हम अपने होशे की ओर लौटें। वह कहता है, उसका नाम यिज्रैल रख; मानो वह कहता हो, "वे अपने आप को इस्राएली कहते हैं; परन्तु मैं शब्द में थोड़ा-सा परिवर्तन करके दिखाऊँगा कि वे पतित और खोटे हैं, क्योंकि वे इस्राएली नहीं, वरन् यिज्रैली हैं।" और ऐसा प्रतीत होता है कि अहाब के समय में यिज्रैल ही राज्य की राजधानी था, और वहीं येहू ने वह बड़ा संहार भी किया था जिसका वर्णन 2 राजा 10 में है। अब हम भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय समझते हैं, कि सारा राज्य अपने आदि-मूल से पतित हो चुका था, और अब उसे अब्राहम का वंश गिना नहीं जा सकता था; क्योंकि प्रजा अपने ही विश्वासघात के कारण उस आदर से गिर गई थी और अपना पहला नाम खो बैठी थी। इसलिए परमेश्वर तिरस्कार के भाव से उन्हें इस्राएली नहीं, वरन् यिज्रैली कहता है।
इसके बाद एक कारण आता है जो इस विचार की पुष्टि करता है: क्योंकि थोड़े ही काल में मैं येहू के घराने को यिज्रैल के रक्तपात का दण्ड दूँगा। यहाँ व्याख्याकार कम परिश्रम नहीं करते, क्योंकि यह विचित्र लगता है कि परमेश्वर येहू के किए हुए उस संहार का दण्ड दे, जिसे उसने स्वयं स्वीकार किया था; वरन् येहू ने कुछ भी बिना सोचे-समझे नहीं किया, परन्तु वह जानता था कि उसे वह पलटा लेने की आज्ञा मिली है। इसलिए वह परमेश्वर का वैध सेवक था; तो जो काम परमेश्वर ने आज्ञा देकर करवाया, वह अब उसके दोष में क्यों गिना जाता है? इस तर्क ने कुछ व्याख्याकारों को विवश किया कि वे यहाँ "रक्त" को सामान्य रूप से दुष्ट कर्मों के अर्थ में लें: 'मैं येहू के घराने से यिज्रैल के पापों का पलटा लूँगा।' कुछ कहते हैं, "मैं नाबोत के वध का पलटा लूँगा;" परन्तु यह सर्वथा असंगत है, और इस स्थल से मेल भी नहीं खा सकता, क्योंकि "येहू के घराने पर" स्पष्ट रूप से कहा गया है; और परमेश्वर ने उस वध का दण्ड येहू के घराने को नहीं, वरन् अहाब के घराने को दिया था। परन्तु जो इस प्रकार उलझन में पड़ते हैं, वे इस पर विचार नहीं करते कि भविष्यद्वक्ता की दृष्टि किस बात पर है। क्योंकि जब परमेश्वर ने चाहा कि येहू अपनी खींची हुई तलवार से अहाब के सारे घराने का नाश करे, तब उसका यही उद्देश्य था कि येहू शुद्ध आराधना को पुनः स्थापित करे और देश को सब अशुद्धताओं से शुद्ध करे। इसलिए येहू परमेश्वर के आत्मा द्वारा उभारा गया था, कि वह परमेश्वर की शुद्ध आराधना को फिर से स्थापित करे। धर्म का रक्षक होकर उसने कैसा आचरण किया? वह अपनी लूट से सन्तुष्ट हो गया। राज्य को अपने लिए हथिया लेने के बाद उसने मूर्तिपूजा और हर एक घृणित काम को दृढ़ कर दिया। तब उसने अपना परिश्रम परमेश्वर के लिए नहीं लगाया। इसलिए वह संहार येहू की ओर से तो डकैती था; परमेश्वर की ओर से वह न्यायपूर्ण पलटा था। इस स्थल की व्याख्या के विषय में यह विचार हमें सन्तुष्ट करने के लिए पर्याप्त होना चाहिए; और मैं वही प्रस्तुत करता हूँ जो पवित्रशास्त्र में लिखा है। क्योंकि जब येहू परमेश्वर के लिए जलन से जलता हुआ दिखाई दिया, उसके बाद उसने शीघ्र ही प्रमाणित कर दिया कि उसके हृदय में कुछ भी सच्चा नहीं था; क्योंकि उसने उन सब अन्धविश्वासों को अपना लिया जो पहले इस्राएल के राज्य में प्रचलित थे। संक्षेप में, येहू के अधीन हुआ सुधार इंग्लैण्ड के राजा हेनरी के अधीन हुए सुधार के समान था; जिसने जब देखा कि वह किसी छल-वेश के बिना रोमी मसीह-विरोधी का जूआ अन्य किसी रीति से उतार नहीं सकता, तब कुछ समय के लिए बड़े उत्साह का दिखावा किया; परन्तु बाद में वह सब भक्तों पर क्रूरता से टूट पड़ा, और उसने रोमी महायाजक के अत्याचार को दुगना कर दिया (duplicavit — दुगना किया): और येहू भी ऐसा ही था।
5 हॉर्सली ने इस शब्द की जो व्याख्या दी है, वह न तो प्रसंग से और न उस कारण से तनिक भी मेल खाती है जो बाद में इसके लिए दिया गया है। वह शब्द की कल्पित व्युत्पत्ति के अनुसार इसका अर्थ "परमेश्वर का बीज" अर्थात् परमेश्वर के दास करता है: परन्तु होशे के पहले पुत्र का नाम यिज्रैल इसलिए रखा गया था, जैसा कि स्पष्ट रूप से कहा गया है, कि यिज्रैल नगर में, या यिज्रैल की तराई में, कुछ घटित होनेवाला था। और यह कहना कि चूँकि अध्याय 2 पद 22 में यह शब्द अपने व्युत्पत्तिगत अर्थ में लिया गया है, इसलिए यहाँ भी उसी अर्थ में लिया जाना चाहिए, कोई ठोस कारण नहीं है। जब किसी शब्द के, जैसा कि यहाँ है, दो अर्थ होते हैं, तब हमारा मार्गदर्शक प्रसंग ही होना चाहिए, न कि किसी दूसरे अध्याय में उसका अर्थ। — सं.
जब हम हेनरी के किए हुए काम पर भली-भाँति विचार करते हैं, तो अपने राज्य को सबसे कठोर अत्याचार से छुड़ाना सचमुच एक वीरोचित पराक्रम था; तौभी, जहाँ तक स्वयं उसकी बात है, वह निश्चय ही रोमी मसीह-विरोधी के अन्य सब अधीन सेवकों से भी बुरा था; क्योंकि जो लोग उस दासता में बने रहते हैं, वे कम से कम किसी न किसी प्रकार का धर्म तो बनाए रखते हैं; परन्तु उसे मनुष्यों के सामने कोई लज्जा नहीं रोकती थी, और उसने अपने आप को परमेश्वर के प्रति हर प्रकार के भय से सर्वथा शून्य प्रमाणित किया। वह एक राक्षस था (homo belluinus — पशु-सरीखा मनुष्य), और येहू भी ऐसा ही था।
अतः जब भविष्यद्वक्ता कहता है, मैं येहू के घराने से यिज्रैल के रक्तपात का पलटा लूँगा, तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं। क्यों? क्योंकि उसके लिए यह सर्वोच्च आदर था कि परमेश्वर ने उसका राजा होने के लिए अभिषेक किया, कि वह जो नीच कुल का था, प्रभु द्वारा राजा चुना गया। इसलिए उसे परमेश्वर की शुद्ध आराधना को पुनः स्थापित करने और सब अन्धविश्वासों का नाश करने में अपनी सारी शक्ति लगा देनी चाहिए थी। यह उसने नहीं किया; उलटे, उसने उन्हें दृढ़ किया। इसलिए वह एक लुटेरा था, और जहाँ तक स्वयं उसकी बात है, वह परमेश्वर का सेवक नहीं था।
तो सम्पूर्ण का अभिप्राय यह है: "तुम इस्राएली नहीं हो (यहाँ केवल एक अक्षर के उच्चारण में ही अन्तर है), वरन् यिज्रैली हो;" जिसका अर्थ है, "तुम याकूब के वंशज नहीं, वरन् यिज्रैली हो;" अर्थात्, "तुम एक पतित प्रजा हो, और राजा अहाब से तुममें कुछ भी भिन्नता नहीं। वह शापित था, और उसके अधीन राज्य शापित हो गया। क्या तुम बदल गए हो? क्या कोई सुधार हुआ है? इसलिए जब तुम अपनी दुष्टता में हठी बने हुए हो, तब यद्यपि तुम घमण्ड से याकूब के नाम का दावा करते हो, तौभी तुम ऐसे आदर के योग्य नहीं हो। इसलिए मैं तुम्हें यिज्रैली कहता हूँ।"
और इसका कारण जोड़ा गया है, क्योंकि थोड़े ही काल में मैं येहू के घराने को उस रक्तपात का दण्ड दूँगा। परमेश्वर अब दिखाता है कि प्रजा सब महिमा से रहित थी। परन्तु वे सोचते थे कि जब से अहाब का घराना नष्ट किया गया, तब से सब पापों का स्मरण गाड़ दिया गया है। प्रभु कहता है, "क्यों? मैं इन रक्तपातों का पलटा लूँगा।" हम जानते हैं कि कपटियों की यह रीति है कि एक पाप का दण्ड देने के बाद वे सोचते हैं कि अब उनके लिए सब कुछ उचित है, और चाहते हैं कि इसी रीति से परमेश्वर के सामने उनका लेखा चुक जाए। एक चोर हत्या का दण्ड देगा, परन्तु स्वयं बहुत-सी हत्याएँ करेगा। वह अपने आप को छुड़ाया हुआ समझता है, क्योंकि एक मनुष्य को दण्ड देकर उसने परमेश्वर को मूल्य चुका दिया है; परन्तु वह दूसरों को, जो उसके सहभागी रहे हैं, छोड़ देता है, और स्वयं बहुत-सी अन्यायपूर्ण हत्याएँ करने में नहीं हिचकता। अतः जब कपटी इस प्रकार परमेश्वर का उपहास करते हैं, तो भविष्यद्वक्ता अब उचित रूप से ऐसी मूढ़ता को झाड़ देता है, और कहता है, मैं इन रक्तपातों का पलटा लूँगा। "क्या तुम समझते हो कि अहाब के घराने का नाश करना और उसे जड़ से उखाड़ना येहू का प्रशंसनीय काम था? मैंने तो उसे करने की आज्ञा दी थी, परन्तु उसने अपने को सौंपे गए पलटे को किसी दूसरे ही उद्देश्य की ओर मोड़ दिया।" कैसे? क्योंकि वह एक लुटेरा बन गया; क्योंकि उसने अहाब के पापों का दण्ड नहीं दिया, इसलिए कि वह स्वयं जीवन के अन्त तक वैसा ही करता रहा, और अपनी सन्तान में भी वैसा ही करता रहा, क्योंकि राज्य में यारोबाम उससे चौथी पीढ़ी में था। "इसलिए जब येहू ने देश की दशा नहीं बदली, और तुम सदा अपनी दुष्टता में हठी बने रहे, तो मैं इन रक्तपातों का पलटा लूँगा।"
यह एक उल्लेखनीय स्थल है; क्योंकि यह दिखाता है कि यह पर्याप्त नहीं, वरन् इसका कुछ भी मूल्य नहीं, कि कोई मनुष्य लोगों के सामने आदरपूर्ण आचरण करे, जब तक कि उसका हृदय भी खरा और निष्कपट न हो। इसलिए जो दूसरों के बुरे कामों का दण्ड देता है, उसे स्वयं भी उनसे दूर रहना चाहिए, और जो न्याय वह दूसरों के लिए नापता है वही अपने लिए भी नापना चाहिए; क्योंकि जो अपने लिए पाप करने की छूट ले लेता है और फिर भी दूसरों को दण्ड देता है, वह अपने ही विरुद्ध परमेश्वर के क्रोध को भड़काता है।
अतः अब हम इस वाक्य का सच्चा अर्थ समझते हैं, मैं यिज्रैल के रक्तपात का पलटा लूँगा, अर्थात् यह कि वह यिज्रैल की तराई में किए गए रक्तपात का पलटा येहू के घराने से लेगा। आगे जोड़ा गया है, और मैं इस्राएल के घराने के राज्य का अन्त कर दूँगा। इस्राएल का घराना वह उसे कहता है जो दाऊद के कुल से अलग हो गया था, मानो वह कहता हो, "यह एक अलग किया हुआ घराना है।" परमेश्वर ने तो सारी प्रजा को एक साथ जोड़ा था, और वे एक देह हो गए थे। यारोबाम के अधीन वह फाड़ डाली गई। यह परमेश्वर का भयानक न्याय था; क्योंकि यह ऐसा ही था मानो प्रजा, एक फटी हुई देह के समान, दो भागों में काट दी गई हो। तौभी परमेश्वर ने अब तक इन दोनों भागों को ऐसे सुरक्षित रखा था मानो वे एक ही देह हों, और यदि एक नीच धर्मत्याग न हुआ होता, तो वह दोनों प्रजाओं का छुड़ानेवाला बन जाता। और जब इस्राएली, मानो, सड़ गए, यहाँ तक कि अब वे उसकी चुनी हुई प्रजा का कोई भाग न रहे, तब हमारा भविष्यद्वक्ता तिरस्कार और निन्दा के भाव से उचित ही उन्हें इस्राएल का घराना कहता है। आगे लिखा है — होशे 1:5
5. और उस समय मैं यिज्रैल की तराई में इस्राएल के धनुष को तोड़ डालूँगा।
5. Et erit in die illa et conteram arcum (vel— confringum) Israel in valle Jizreel.
यह पद जान-बूझकर जोड़ा गया था; क्योंकि इस्राएली अपनी वर्तमान समृद्धि से ऐसे फूले हुए थे कि वे सुनाए गए न्याय पर हँसते थे। वे तो जानते थे कि वे हथियारों, मनुष्यों और धन से भली-भाँति सम्पन्न हैं; संक्षेप में, वे अपने आप को हर प्रकार से अजेय समझते थे। इसलिए भविष्यद्वक्ता घोषणा करता है कि यह सब कुछ परमेश्वर को उन्हें दण्ड देने से रोक नहीं सकता। वह कहता है, "तुम घमण्ड से फूले हुए हो; तुम अपने पराक्रम को परमेश्वर के विरुद्ध खड़ा करते हो, अपने आप को हथियारों और सामर्थ्य में बलवन्त समझते हो; और क्योंकि तुम योद्धा हो, तुम सोचते हो कि परमेश्वर कुछ नहीं कर सकता; तौभी तुम्हारे धनुष उसके हाथ को तुम्हारा नाश करने से रोक नहीं सकते।" परन्तु जब वह कहता है, मैं धनुष को तोड़ डालूँगा, तो वह अंश के द्वारा सम्पूर्ण का उल्लेख करता है; क्योंकि एक प्रकार के अन्तर्गत वह हर प्रकार के हथियार को सम्मिलित करता है। परन्तु भविष्यद्वक्ता की दृष्टि किस बात पर थी, इसके विषय में हम देखते हैं कि उसका एकमात्र उद्देश्य उनके झूठे भरोसे को ढा देना था; क्योंकि इस्राएली सोचते थे कि वे उस विनाश के वश में नहीं पड़ेंगे जिसकी भविष्यद्वाणी होशे ने की थी; क्योंकि वे अपनी ही सामर्थ्य से चौंधियाए हुए थे, और जब तक वे चारों ओर से इतनी भली-भाँति सुरक्षित थे, अपने आप को हर संकट की पहुँच से परे समझते थे। इसलिए भविष्यद्वक्ता कहता है कि परमेश्वर के सामने उनके सब गढ़ कुछ भी न ठहरेंगे; क्योंकि उस दिन, जब पलटा लेने का पका हुआ समय आ पहुँचेगा, प्रभु उनके सब धनुषों को तोड़ डालेगा, उनके सब हथियारों के टुकड़े-टुकड़े कर देगा, और उनकी सामर्थ्य को शून्य कर देगा।
यहाँ हमें चेतावनी दी गई है कि हम सदा सावधान रहें, कहीं ऐसा न हो कि जब परमेश्वर हमें धमकाता है तब कोई बात हमें जड़ता की दशा में ले जाए। चाहे हमारे पास बल हो, चाहे भाग्य (यदि ऐसा कहा जा सके) हम पर मुस्कराता हो, चाहे, एक शब्द में, सारा संसार हमारी सुरक्षा के लिए एक हो जाए, तौभी जब परमेश्वर घोषणा करता है कि वह हमारा विरोधी है और हम पर क्रोधित है, तब अपने आप को धन्य समझने का कोई कारण नहीं। क्यों? क्योंकि जैसे वह जब चाहे हमें निहत्थे होने पर भी सुरक्षित रख सकता है, वैसे ही वह हमसे हमारे सब हथियार छीन सकता है और हमारी सामर्थ्य को शून्य कर सकता है। इसलिए जब कभी परमेश्वर अपनी धमकी से हमें भयभीत करे, तब यह पद हमारे मन में आए; और यह हमें यही सिखाता है कि वह उन सब रक्षा-साधनों को छीन सकता है जिन पर हम व्यर्थ भरोसा रखते हैं।
अब, क्योंकि यिज्रैल राज्य की राजधानी था, इसलिए भविष्यद्वक्ता उस स्थान का स्पष्ट उल्लेख करता है, मैं यिज्रैल की तराई में इस्राएल के धनुष के टुकड़े-टुकड़े कर दूँगा; अर्थात्, प्रभु देखता है कि शोमरोन में, यिज्रैल में, कैसा गढ़ है; परन्तु वह वहीं, देश के ठीक मध्य में, तुम्हारा अन्त कर देगा। तुम सोचते हो कि वहाँ तुम्हारे लिए एक सुरक्षित स्थान और एक दृढ़ ठिकाना है; परन्तु प्रभु यिज्रैल की तराई में ही तुम्हें शून्य कर देगा। आगे लिखा है — होशे 1:6
6. वह स्त्री फिर गर्भवती हुई और उसके एक बेटी उत्पन्न हुई। तब परमेश्वर ने उससे कहा, उसका नाम लोरुहामा रख; क्योंकि मैं इस्राएल के घराने पर फिर कभी दया न करूँगा; वरन् मैं उन्हें पूरी रीति से उठा ले जाऊँगा।
6. Et concepit adhuc (concepit rursum) et peperit filiam: et dixit ei— Voca nomen ejus Loruchama— (hoc est— non adepta misericordiam— vel— non dilecta: sic enim Graeci verterunt— et Paulus sequutus est illam receptam versionem capite— ad Rom.) quia non adjiciam amplius ut misericordia persequar (vel— ut diligam) domum Israel— quia tollendo tollam eos.
भविष्यद्वक्ता इस पद में दिखाता है कि इस्राएल के राज्य में दशा बिगड़ती ही चली गई थी, कि वे किसी सीमा में रहे बिना पाप करते थे, कि वे सिर के बल अभक्ति की चरम सीमाओं में जा गिरे थे। वह हमें पहले ही, उन्हें यिज्रैली कहकर, बता चुका है कि वे आरम्भ से ही ठुकराए हुए और पतित थे; मानो वह कहता हो, "तुम्हारे मूल में कुछ भी सराहनीय नहीं; तुम अपने आप को बहुत श्रेष्ठ समझते हो, क्योंकि तुम पवित्र याकूब से अपना वंश निकालते हो; परन्तु तुम खोटी सन्तान हो, एक वेश्या से जन्मे हुए: वेश्यालय अब्राहम का घराना नहीं, और न अब्राहम का घराना वेश्यालय है। इसलिए तुम व्यभिचार की उपज हो।" परन्तु अब वह और आगे बढ़कर कहता है कि जैसे-जैसे समय बीतता गया, वे सदा और बुरी दशा में गिरते गए; क्योंकि यह शब्द, लोरुहामा, यिज्रैल से भी अधिक लज्जाजनक नाम है: और प्रभु यहाँ अपना पलटा और भी खुलकर सुनाता है, जब वह कहता है, मैं फिर इस्राएल के घराने का दया के साथ पीछा न करूँगा। {,}רחםrechem का अर्थ है तरस खाना, और प्रेम करना भी: परन्तु यह दूसरा अर्थ पहले से ही निकला है; क्योंकि {,}רחםrechem का अर्थ केवल प्रेम करना नहीं, वरन् सेंतमेंत अनुग्रह दिखाना है। इसलिए बेटी को लो-रुहामा कहकर परमेश्वर संकेत करता है कि अब उसका अनुग्रह प्रजा से उठा लिया गया था। हम तो जानते हैं कि प्रजा सेंतमेंत चुनी गई थी; क्योंकि यदि लेपालकपन का कारण पूछा जाए, तो कहना होगा कि वह केवल परमेश्वर की दया और भलाई ही थी। तो अब परमेश्वर प्रजा को त्यागते हुए कहता है, "तुम उस बेटी के समान हो जिसे उसका पिता निकाल देता और अस्वीकार कर देता है, क्योंकि वह उसे अपने अनुग्रह के योग्य नहीं समझता।" अब हम भविष्यद्वक्ता का उद्देश्य समझते हैं; क्योंकि यह दिखाने के बाद कि इस्राएली आरम्भ से ही खोटे थे, और अब्राहम की सच्ची सन्तान नहीं थे, वह अब यह जोड़ता है कि समय बीतने पर वे इतने भ्रष्ट हो गए थे कि परमेश्वर अब उन्हें पूरी रीति से अस्वीकार कर देगा, और आगे उन्हें अपना घराना न समझेगा। इसलिए वह यह कहकर, 'इस बेटी का नाम लो-रुहामा रख,' उन पर पहले से भी अधिक गम्भीर दोष लगाता है; क्योंकि वह यिज्रैल के बाद उत्पन्न हुई थी। यहाँ वह क्रम से प्रजा की दशा का वर्णन करता है, कि वह निरन्तर पतित होती गई। यद्यपि वे आरम्भ में भी भ्रष्ट थे, तौभी अब, कुछ समय बीतने के बाद, वे परमेश्वर के अनुग्रह के सर्वथा अयोग्य हो गए थे।
वह कहता है, मैं फिर इस्राएल के घराने का अनुग्रह के साथ पीछा न करूँगा। परमेश्वर यहाँ दिखाता है कि उसने इस प्रजा के प्रति कैसी निरन्तर सहनशीलता दिखाई थी। वह कहता है, मैं फिर ऐसा न करूँगा; मानो प्रभु ने कहा हो, "मैं क्रोध के पहले ही उबाल में तुमसे पलटा लेने को नहीं निकल पड़ता, जैसा कि क्रोधी मनुष्य करते हैं, जो कोई अपमान होते ही तलवार उठा लेते हैं; मैं इतनी शीघ्रता से क्रोध से नहीं भड़कता। इसलिए मैंने अब तक तुम्हें सहा है; परन्तु अब तुम्हारा हठ असहनीय है; इसलिए मैं तुम्हें और न सहूँगा।" जैसा हम देखते हैं, भविष्यद्वक्ता स्पष्ट संकेत करता है कि इस्राएलियों ने बहुत समय तक प्रभु की दया का दुरुपयोग किया था, जब वह उन्हें छोड़ता रहा, यहाँ तक कि अब पलटा लेने का पका हुआ समय आ गया था; क्योंकि प्रभु ने बहुत वर्षों तक उन पर अपना अनुग्रह दिखाया था, यद्यपि उन्होंने किसी भी समय अपने ही विनाश को खोजना नहीं छोड़ा। इससे हम सीखते हैं, जैसा कि कल कहा गया था, कि भविष्यद्वक्ता की प्रचण्डता उतावली नहीं थी: क्योंकि परमेश्वर पहले ही इस्राएलियों को पर्याप्त से अधिक चेतावनियाँ दे चुका था; उसने उनके बहुत-से पाप क्षमा भी किए थे; उसने तब तक उन्हें सहा था जब तक कि परिस्थिति ने यह प्रमाणित न कर दिया कि वे सर्वथा असाध्य थे। अतः जब परमेश्वर की सहनशीलता का उन पर कोई प्रभाव न पड़ा, तो इस अन्तिम उपचार तक आना आवश्यक था, कि प्रभु, मानो खींची हुई तलवार लिए, पलटा लेने के लिए न्यायी के रूप में प्रकट हो।
इसके बाद वह कहता है, {,}כי{ }נשוא{ }אשא{ }להםki neshua asha lem. इस वाक्य की व्याख्या अनेक प्रकार से की जाती है। कुछ लोग सोचते हैं कि यह क्रिया अन्त में {,}הhe वाले मूल {,}נשהnesche से निकली है; जिसका अर्थ है "भूल जाना", मानो कहा गया हो, "भूलते हुए, मैं उन्हें भूल जाऊँगा;" और यह अर्थ अनुपयुक्त नहीं। कसदी व्याख्याकार इस अर्थ से सर्वथा हट जाता है, क्योंकि वह इस उपवाक्य का अनुवाद करता है, "छोड़ते हुए, मैं उन्हें छोड़ दूँगा।" इसका कोई कारण नहीं; क्योंकि परमेश्वर, जैसा कि प्रसंग स्पष्ट दिखाता है, अभी उन्हें क्षमा की प्रतिज्ञा नहीं करता; इसलिए यह अर्थ टिक नहीं सकता। जो इस प्रकार अनुवाद करते हैं, "मैं उन पर ले आऊँगा," अर्थात् शत्रु को, वे भविष्यद्वक्ता के उद्देश्य के अधिक निकट आते हैं; क्योंकि {,}נשאnesha का अर्थ है लेना, और बीच में ले आना भी। परन्तु मैं उनका मत अपनाना अधिक उचित समझता हूँ जो मानते हैं कि {,}להםlem यहाँ {,}אותםautem के स्थान पर रखा गया है; क्योंकि सहायक अक्षर {,}לlamed का अर्थ प्रायः वही होता है जो {,}אתat अव्यय का, जो कर्म-कारक के पहले लगाया जाता है। तब शब्दशः अनुवाद यह है, "क्योंकि, उठा ले जाते हुए, मैं उन्हें उठा ले जाऊँगा:" और इब्रानी लोग प्रायः बोलने की इस रीति का प्रयोग करते हैं, और अर्थ अधिक स्पष्ट है, "उठा ले जाते हुए, मैं उन्हें उठा ले जाऊँगा।" कुछ लोग इस स्थल का अनुवाद करते हैं, "मैं उन्हें जला दूँगा;" परन्तु यह व्याख्या कुछ कठोर है। मैं "लेना" अर्थ से सन्तुष्ट हूँ, परन्तु मैं उसे उठा ले जाने के अर्थ में समझता हूँ। तब यह है, "उठा ले जाते हुए, मैं उन्हें उठा ले जाऊँगा।"
और यही बात अगला पद पुष्ट करता है; क्योंकि जब भविष्यद्वक्ता यहूदा के घराने की चर्चा करता है, तब प्रभु कहता है, "मैं दया के साथ यहूदा के घराने का पीछा करूँगा, और उनका उद्धार करूँगा।" भविष्यद्वक्ता "उद्धार करना" और "उठा ले जाना" को एक दूसरे के विरोध में रखता है।
अतः हम प्रसंग से सीख सकते हैं कि इन शब्दों से उसका क्या अभिप्राय था, और वह यह है कि इस्राएल अब तक प्रभु की दया से ही स्थिर रहा था; मानो वह कहता हो, "ऐसा कैसे हुआ कि तुम अब तक जीवित बने हुए हो? क्या तुम समझते हो कि तुम अपने ही पराक्रम से सुरक्षित हो? नहीं, मेरी दया ने अब तक तुम्हारी रक्षा की है। इसलिए अब, जब मैं तुमसे अपना अनुग्रह हटा लूँगा, तब तुम्हारा विनाश अनिवार्य होगा; तुम्हें अवश्य नाश होना और शून्य हो जाना पड़ेगा: क्योंकि जैसे मैंने अब तक तुम्हारी रक्षा की है, वैसे ही मैं तुम्हें पूरी रीति से उखाड़कर नष्ट कर दूँगा।" इस स्थल से आगे एक लाभदायक शिक्षा भी प्राप्त की जा सकती है, और वह यह है कि कपटी अपने आप को धोखा देते हैं जब वे परमेश्वर के वर्तमान अनुग्रह पर घमण्ड करते हैं, और साथ ही बिना किसी भय के उसके विरुद्ध फूलते हैं; क्योंकि जैसे परमेश्वर कुछ समय तक उन्हें छोड़ता और सहता है, वैसे ही वह न्यायपूर्वक उन्हें नष्ट करके शून्य कर सकता है। परन्तु अगला पद भी इसके साथ जोड़ना चाहिए।
होशे 1:7
7. परन्तु यहूदा के घराने पर मैं दया करूँगा, और उनका उद्धार उनके परमेश्वर यहोवा के द्वारा करूँगा; उनका उद्धार मैं धनुष वा तलवार वा युद्ध वा घोड़ों वा सवारों के द्वारा न करूँगा।
7 Et domum Jehudah misericordia prosequar, (vel, favore; vel, diligam: diximus enim jam de hoc verbo,) et servabo eos in Jehova Deo ipsorum, et non servabo eos in arcu, neque in gladio, neque in prelio, neque in equis, neque in equitibus
यह पद पर्याप्त रूप से प्रमाणित करता है जो मैंने कल कहा था, कि भविष्यद्वक्ता विशेष रूप से इस्राएल के राज्य के लिए नियुक्त किया गया था; क्योंकि यहाँ वह यहूदियों के विषय में अनुकूल रीति से बोलता प्रतीत होता है, जिन्हें, जैसा हम जानते हैं, उनके अपने शिक्षकों ने कठोरता से और उचित ही डाँटा था। क्योंकि यशायाह क्या कहता है, जब वह इस्राएल के राज्य में उस समय फैली हुई भयानक भ्रष्टताओं की चर्चा कर चुकता है? वह कहता है, 'यहूदा के घराने में आओ, वे तो कम से कम अब तक शुद्ध बने हुए हैं: वहाँ,' वह कहता है, 'सब मेजें वमन से भरी हैं; वे मतवाले हैं; वहाँ परमेश्वर का तिरस्कार और सब प्रकार की अभक्ति भी राज्य करती है' (यशायाह 28:8)। इसलिए हम देखते हैं कि यहूदी, जिनके विषय में भविष्यद्वक्ता ने इतने आदर से बात की है, कोई सद्गुणी प्रजा नहीं थे। क्योंकि यद्यपि यरूशलेम में परमेश्वर की बाहरी आराधना बनी रही, और मन्दिर, कम से कम उज्जिय्याह और योताम के अधीन, और राजा हिजकिय्याह के अधीन भी, हर अन्धविश्वास से मुक्त था; तौभी, जैसा हम जानते हैं, प्रजा का आचरण बहुत भ्रष्ट था। लोभ, क्रूरता, और हर प्रकार का छल वहाँ राज्य करता था, और गन्दी अभिलाषाएँ भी। इसलिए उस प्रजा का आचरण इस्राएलियों के आचरण से कुछ भी अच्छा नहीं था। तो फिर भविष्यद्वक्ता उन्हें इतना बड़ा आदर क्यों देता है कि उन्हें परमेश्वर के पलटे से मुक्त ठहराता है? क्योंकि उसकी दृष्टि उस प्रजा पर थी जिसके लिए वह भविष्यद्वक्ता नियुक्त किया गया था। इसलिए वह एक तुलना प्रस्तुत करता है। वह यहूदियों के विषय में हस्तक्षेप नहीं करता, क्योंकि वह जानता था कि उनके पास विश्वासयोग्य पासबान थे जो उनके पापों के लिए उन्हें डाँटते थे; परन्तु वह अपने ही श्रोताओं के बीच बना रहा। परन्तु यह तुलना विशेष रूप से इस्राएल की प्रजा के हृदयों को छूने के काम आई; क्योंकि, जैसा हम जानते हैं, भविष्यद्वक्ता ने यह उल्लेख विशेषकर इसी उद्देश्य से किया, कि मनगढ़न्त आराधना को दोषी ठहराए। अब वह यरूशलेम की आराधना को उन सब अन्धविश्वासों के विरोध में रखता है जिन्हें यारोबाम ने पहले चलाया, जिन्हें अहाब ने बढ़ाया, और जिनका उनकी सारी सन्तान ने अनुसरण किया। इसलिए वह कहता है, "मैं यहूदा के घराने पर अनुग्रह दिखाऊँगा।"
6 यद्यपि न्यूकम और दूसरे लोग इस अर्थ में कैल्विन से सहमत हैं, तौभी मैं अब भी विश्वास करता हूँ कि सच्चा अनुवाद वही है जो हमारे अनुवाद के हाशिये में सारतः दिया गया है। यहाँ प्रयुक्त क्रिया, जब उसके बाद {{ל आता है, उठा ले जाने का नहीं, वरन् क्षमा करने, माफ़ करने का अर्थ देती है; और अव्यय {}כי का अनुवाद कभी-कभी "कि", "जिससे कि", ut किया जाता है। तब दोनों पंक्तियों का अनुवाद इस प्रकार हो सकता है: — "मैं इस्राएल के घराने पर फिर दया न दिखाऊँगा, कि क्षमा करते हुए मैं उन्हें क्षमा करूँ।" इस स्थल का मुख्य आशय फिर भी वही है जो कैल्विन ने उसे दिया है। बिशप हॉर्सली का अनुवाद मेरे प्रस्तुत किए हुए अर्थ का समर्थन करता है: वह अन्तिम पंक्ति का अनुवाद इस प्रकार करता है: — "यहाँ तक कि उन्हें निरन्तर क्षमा करता रहूँ।"
भविष्यद्वक्ता के मन को और अच्छी तरह समझने के लिए, जो हमने कल कहा था उसे दोहराना उचित होगा: — यहूदा का राज्य उस समय दयनीय रूप से उजाड़ा जा चुका था। इस्राएल के राज्य में दस गोत्र थे, यहूदा के राज्य में केवल डेढ़, और वह भी बहुत-से संहारों से घट गया था; हाँ, इस्राएलियों ने प्रभु के मन्दिर को लूट लिया था, और वहाँ जितना सोना-चाँदी पाया, सब ले गए थे। इसलिए यहूदी बहुत ही हीन दशा में पहुँचा दिए गए थे, वे बुदबुदाने का भी साहस कठिनाई से कर पाते थे; परन्तु इस्राएली, जैसा हमारा भविष्यद्वक्ता आगे हमें बताएगा, भली-भाँति खिलाए-पिलाए पशुओं के समान थे। अतः जब वे यहूदियों को तुच्छ जानते थे, जो संसार की दृष्टि में घृणित प्रतीत होते थे, तो भविष्यद्वक्ता इस व्यर्थ भरोसे को ढा देता है, और कहता है, मैं दया के साथ यहूदा के घराने का पीछा करूँगा। "यहूदा का घराना अब लगभग कुछ भी नहीं प्रतीत होता, क्योंकि वे गिनती में थोड़े हैं, न वे बहुत बलवन्त हैं, और न उनके बीच तुम्हारे समान धन की बहुतायत है; परन्तु मेरा अनुग्रह उन्हीं के साथ वास करेगा, और मैं उसे तुमसे उठा लूँगा।"
इसके बाद लिखा है, और मैं उनके परमेश्वर यहोवा के द्वारा उनका उद्धार करूँगा। यहाँ उद्धार को उस विनाश के विरोध में रखा गया है जिसका उल्लेख भविष्यद्वक्ता ने पिछले पद में किया था। परन्तु होशे दिखाता है कि उद्धार न तो हथियारों पर, न इस संसार के किसी, जैसा कहा जाता है, मध्यवर्ती साधन पर तनिक भी निर्भर है; वरन् उसकी नींव केवल परमेश्वर के अनुग्रह पर है। वह कहता है, मैं उनका उद्धार करूँगा — क्यों? क्योंकि मैं उन पर अपना अनुग्रह दिखाऊँगा। इस सम्बन्ध पर ध्यानपूर्वक विचार करना चाहिए। जहाँ प्रभु का अनुग्रह है, वहीं जीवन है। 'तू हमारा परमेश्वर है, इसलिए हम कभी नाश न होंगे,' जैसा कि हबक्कूक के पहले अध्याय में लिखा है। इसलिए भविष्यद्वक्ता यहाँ उद्धार को परमेश्वर के सेंतमेंत अनुग्रह से जोड़ता है; क्योंकि हम तभी तक सुरक्षित रह सकते हैं जब तक परमेश्वर हम पर कृपालु है। दूसरी ओर, उसने घोषणा की है कि जैसे ही परमेश्वर इस्राएलियों से अपना अनुग्रह हटा लेगा, वैसे ही उनका सब कुछ समाप्त हो जाएगा।
7 Mediis-media अर्थात् साधन। हम medium का प्रयोग करते हैं, परन्तु media का नहीं; और तौभी हमारे पास इसके स्थान पर कोई शब्द नहीं है। "मध्यवर्ती साधन" (Intervenients) सम्भवतः अंग्रेज़ी पाठक के लिए सबसे बोधगम्य शब्द है। — सं.
परन्तु वह कहता है, उनके परमेश्वर यहोवा के द्वारा। यहाँ झूठे देवताओं और यहोवा के बीच, जो यहूदा के घराने का परमेश्वर था, एक विरोधाभास समझना चाहिए। यह ऐसा ही है मानो भविष्यद्वक्ता ने कहा हो, "तुम परमेश्वर का नाम तो मानते हो, परन्तु तुम परमेश्वर की नहीं, शैतान की उपासना करते हो: क्योंकि यहोवा से, उस परमेश्वर से जो आकाश और पृथ्वी का सृष्टिकर्ता और रचनेवाला है, तुम्हारा कोई सम्बन्ध नहीं; क्योंकि वह अपने ही मन्दिर में वास करता है; उसने दाऊद से अपनी सच्चाई की प्रतिज्ञा की, जब उसने उसे आज्ञा दी कि वह सिय्योन पर्वत पर उसके लिए मन्दिर बनाए; वह वहाँ करूबों के बीच वास करता है, जैसा कि भविष्यद्वक्ता निरन्तर घोषित करते हैं: परन्तु सच्चा परमेश्वर तुमसे निर्वासित हो गया है।" इससे हम देखते हैं कि वह यहाँ उस सारी आराधना को कैसे दोषी ठहराता है जिसे इस्राएली उस समय इतना ऊँचा मानते थे। उसने ऐसा क्यों किया? क्योंकि वह परमेश्वर को ग्रहणयोग्य नहीं थी।
और यह स्थल ध्यान देने योग्य है, क्योंकि हम देखते हैं कि इस विषय में मनुष्य कितने मूढ़ हैं। जब एक बार उन्हें यह निश्चय हो जाता है कि वे परमेश्वर की आराधना करते हैं, तब शैतान का कोई मोहजाल उन्हें ऐसा जकड़ लेता है कि वे अपनी सब मूर्खताओं से प्रसन्न होने लगते हैं, जैसा कि हम आज के दिन पोप के अनुयायियों में देखते हैं, जो केवल पागल ही नहीं, वरन् दुगने उन्मत्त हैं। यदि कोई उन्हें डाँटे और कहे कि वे सच्चे परमेश्वर की आराधना नहीं करते, तो वे तुरन्त भड़क उठते हैं — "क्या! क्या परमेश्वर हमारी आराधना ग्रहण नहीं करता?" परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ एक ही शब्द से दिखाता है कि यहोवा किसी स्थान में नहीं है, सिवाय वहाँ के जहाँ उसके वचन के नियम के अनुसार उसकी उचित आराधना की जाती है। वह कहता है, मैं उनका उद्धार करूँगा — कैसे? उनके परमेश्वर यहोवा के द्वारा; और स्वयं परमेश्वर बोल रहा है: वह कह सकता था, "मैं स्वयं अपने द्वारा उनका उद्धार करूँगा;" परन्तु उसने अकारण बोलने की यह घुमावदार रीति नहीं अपनाई; यह इस्राएलियों को दिखाने के लिए था कि उनके पास यह सोचने का कोई कारण नहीं था कि परमेश्वर उन पर कृपालु होगा। क्यों? क्योंकि परमेश्वर ने सिय्योन पर्वत पर और यरूशलेम में अपने लिए निवास-स्थान चुना था। इसके बाद एक और पूर्ण घोषणा आती है, मैं उनका उद्धार न धनुष से, न तलवार से, न युद्ध से, न घोड़ों से, न सवारों से करूँगा। परन्तु इस उपवाक्य की व्याख्या, परमेश्वर के अनुग्रह से, मैं कल करूँगा।
प्रार्थना हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, ऐसा अनुग्रह कर कि जैसे हम अपने आरम्भ से ही खोए हुए थे, जब तुझे यह भाया कि तू हमारी ओर अपना हाथ बढ़ाए, और अपने पुत्र के निमित्त हमें उद्धार में फिर से ले आए; और जैसे हम प्रतिदिन भी सिर के बल अपने ही विनाश की ओर दौड़ते रहते हैं, — हाय, ऐसा अनुग्रह कर कि हम बार-बार पाप करके अन्त में तेरी अप्रसन्नता को इतना न भड़काएँ कि तू हमसे वह दया हटा ले जो तूने अब तक हम पर दिखाई है, और जिसके द्वारा तूने हमें लेपालक बनाया है: वरन् अपने आत्मा के द्वारा हमारे हृदय की दुष्टता का नाश कर, और हमें स्वस्थ मन फिर दे, कि हम सच्चे और निष्कपट हृदय से सदा तुझसे लिपटे रहें, ताकि तेरी रक्षा से दृढ़ किए जाकर हम सब प्रकार के संकटों के बीच भी सुरक्षित बने रहें, जब तक कि अन्त में तू हमें उस धन्य विश्राम में न इकट्ठा कर ले, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा स्वर्ग में हमारे लिए तैयार किया गया है। आमीन।
तीसरा व्याख्यान हमें पहले इस उपवाक्य की व्याख्या करनी है, मैं यहूदा के घराने का उद्धार न धनुष से, न तलवार से, न युद्ध से, न घोड़ों से, न सवारों से करूँगा। जिस बात को भविष्यद्वक्ता ने पहले छुआ था, वह यहाँ और स्पष्ट रूप से व्यक्त की गई है, और वह यह है कि परमेश्वर को पराई सहायता की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि वह अपनी ही सामर्थ्य से सन्तुष्ट है। परन्तु होशे अपनी तुलना को आगे बढ़ाता है; क्योंकि इस्राएल की प्रजा, शारीरिक सामर्थ्य की बहुतायत रखने के कारण, अपने आप को, जैसा कहा जाता है, तीरों की पहुँच से परे समझती थी: परन्तु यहूदा का राज्य सब संकटों के सामने खुला था, क्योंकि वह सेनाओं और हथियारों में सामर्थी नहीं था। भविष्यद्वक्ता इस मूर्खता को तिरस्कार के योग्य ठहराता है, और कहता है कि सुरक्षा केवल परमेश्वर पर निर्भर है, कि मनुष्य व्यर्थ ही अपने पराक्रम पर भरोसा रखते हैं, और कि दरिद्र और असहाय लोगों के पास अपनी सुरक्षा के विषय में निराश होने का कोई कारण नहीं, क्योंकि विश्वासियों की रक्षा के लिए अकेला परमेश्वर ही भरपूर पर्याप्त है। तो अभिप्राय यह है कि यद्यपि यहूदा के राज्य की असहाय दशा सबके तिरस्कार का विषय थी, तौभी यह इस बात में बाधा न होती कि वह परमेश्वर के अनुग्रह से सुरक्षित रखा जाए, चाहे उसे मनुष्यों से कोई सहायता न मिले। और हम इस स्थल से यह सीखें कि प्रभु हमारी रक्षा इस रीति से नहीं करता कि वह कभी किसी स्वाभाविक साधन का प्रयोग ही न करे; और आगे यह भी, कि जब वह उनका सहारा नहीं लेता, तब भी वह हमारी सुरक्षा के लिए भरपूर पर्याप्त है। इसलिए हमें अपनी सुरक्षा का श्रेय प्रभु को इस रीति से देना चाहिए कि हम यह न सोचें कि कोई भी वस्तु स्वयं हमारे द्वारा, या स्वर्गदूतों के द्वारा, या मनुष्यों के द्वारा हम तक पहुँचती है। अब हम आगे बढ़ें — होशे 1:8-9
8. जब उसने लोरुहामा का दूध छुड़ाया, तब वह गर्भवती हुई और उसके एक पुत्र उत्पन्न हुआ। 8. Et ablactavit Lo-ruchama, et concepit et peperit filiam. 9. तब परमेश्वर ने कहा, उसका नाम लोअम्मी रख; क्योंकि तुम मेरी प्रजा नहीं हो, और न मैं तुम्हारा परमेश्वर रहूँगा।
9. Et dixit, Voca nomen ejus, Non populus meus, (Lo-ammi:) quia vos non populus meus, et ego non ero vobis (hoc est, non ero vester.)
भविष्यद्वक्ता यहाँ जिस दूध छुड़ाने का उल्लेख करता है, उसे कुछ लोग रूपक के अर्थ में समझते हैं; मानो वह कहता हो कि वह प्रजा कुछ समय के लिए भविष्यद्वाणियों से, याजकपद से और अन्य आत्मिक वरदानों से वंचित कर दी जाएगी; परन्तु यह व्याख्या नीरस है। मुझे इसमें कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता यहाँ उस प्रजा के प्रति परमेश्वर की सहनशीलता को प्रकट करता है। अतः प्रभु ने इस्राएलियों को पूर्णतः त्याग देने से पहले धीरज के साथ उनके पश्चाताप की बाट जोही, यदि सचमुच उसकी कोई आशा थी; परन्तु जब उसने उन्हें सदा अपने ही समान पाया, तब अन्त में वह अन्तिम दण्ड की ओर बढ़ा। इसी कारण होशे कहता है कि वह बेटी, जो दूसरी सन्तान थी, दूध छुड़ाई गई; मानो वह कहता हो कि इस्राएल की प्रजा एकाएक नहीं त्यागी गई, क्योंकि परमेश्वर ने बड़ी सहनशीलता से उन्हें सहा, और इस प्रकार भारी न्याय को टाले रखा, जब तक कि उनकी दुष्टता को असाध्य पाकर उसने अन्त में वह आरम्भ न किया जो आगे आता है: तीसरी सन्तान का नाम लोअम्मी रख।
कारण जोड़ा गया है: क्योंकि तुम मेरी प्रजा नहीं हो, और मैं आगे को तुम्हारा परमेश्वर न रहूँगा। जैसा मैं कह चुका हूँ, यह उनका अन्तिम परित्याग है। पहले वे यिज्रैली कहलाए थे, फिर बेटी के नाम के द्वारा परमेश्वर ने साक्षी दी कि वह उनसे विमुख हो गया है; परन्तु अब तीसरा नाम और भी अधिक कष्टदायक है, तुम मेरी प्रजा नहीं हो; क्योंकि यहाँ परमेश्वर मानो उस वाचा को ही रद्द कर देता है जो उसने पवित्र पितरों से बाँधी थी, ताकि उस प्रजा को अन्य जातियों पर कोई श्रेष्ठता न रहे। इस प्रकार इस्राएली ऐसी दशा में पहुँचा दिए गए जिसमें वे अपवित्र अन्यजातियों से कुछ भी भिन्न न रहे; और यों परमेश्वर ने उन्हें सम्पूर्ण रीति से उत्तराधिकार से वंचित कर दिया। निःसन्देह भविष्यद्वक्ता का स्वागत अच्छा नहीं हुआ, जब उसने उन लोगों को परमेश्वर की प्रजा होने से इनकार किया जो शरीर के अनुसार अब्राहम के वंश से थे, जो सदा ऐसे ही गिने जाते रहे थे, और जो घमण्ड के साथ अपने चुनाव पर निरन्तर डींग मारते रहते थे।
परन्तु आइए, हम यहाँ से यह सीखें कि वे लोग भयंकर भूल करते हैं जो इसलिए अपने दोषों के प्रति अन्धे बने रहते हैं कि परमेश्वर उन्हें छोड़ देता और उन पर कृपा करता है। क्योंकि हमें सदा वह स्मरण रखना चाहिए जो मैं पहले कह चुका हूँ, कि उस समय इस्राएल का राज्य समृद्ध था; तौभी भविष्यद्वक्ता उन लोगों को, जो बल, सामर्थ्य और धन में फल-फूल रहे थे, परमेश्वर की प्रजा मानने से इनकार करता है। अतः कपटियों के लिए समृद्धि में अपने आप को धन्य समझने का कोई कारण नहीं; वरन् इसके विपरीत, उन्हें परमेश्वर के न्याय पर ध्यान देना चाहिए। परन्तु यद्यपि ये लोग, जैसा हम देखते हैं, लापरवाही से परमेश्वर को तुच्छ जानते हैं, तौभी यह खण्ड हमें स्मरण दिलाता है कि हम सावधानी से चौकस रहें, कहीं ऐसा न हो कि हम परमेश्वर के वर्तमान उपकारों का दुरुपयोग करें। आगे लिखा है — होशे 1:10
10 तौभी इस्राएलियों की गिनती समुद्र की बालू की सी हो जाएगी, जिसका मापना-गिनना अनहोना है; और जिस स्थान में उनसे यह कहा जाता था, “तुम मेरी प्रजा नहीं हो,” उसी स्थान में उनसे यह कहा जाएगा, “तुम जीवित परमेश्वर के पुत्र हो।”
10. Et erit numerus filiorum Israel tanquam arena maris, quae non mensuratur et non numeratur, (non mensurabitur nec numeratur, ad verbum sed significant haec verba actum continuum, et est indefinita etiam locutio;) et erit in loco ubi dicetur, (hoc est, ubi dictum fuerit eis,) Non populus meus vos; et dicetur (hoc est, illic dicetur) Filii Dei vivi.
अब सान्त्वना आती है, परन्तु बिना मिश्रण के नहीं। ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर यहाँ उन आपत्तियों का उत्तर देता है जिन्हें, जैसा हम जानते हैं, कपटी लोग सदा तैयार रखते थे, जब कभी भविष्यद्वक्ता उनके विनाश की घोषणा करते थे; क्योंकि यदि परमेश्वर उन्हें न बचाता तो वे उस पर अविश्वासयोग्य होने का दोष लगाते थे। कलीसिया की उपाधि अपने ऊपर ओढ़कर वे यह निष्कर्ष निकालते थे कि उनका नाश होना असम्भव है, क्योंकि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं में झूठा नहीं ठहरेगा। “क्यों! परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है कि उसकी कलीसिया सदा बनी रहेगी: हम उसकी कलीसिया हैं; अतः हम सुरक्षित हैं, क्योंकि परमेश्वर अपना इनकार नहीं कर सकता।” जिसे उन्होंने निश्चित मान लिया था उसमें वे धोखा खा रहे थे; क्योंकि यद्यपि वे कलीसिया की उपाधि हड़पे हुए थे, तौभी वे परमेश्वर से विमुख थे। हम देखते हैं कि पोपवादी आज भी इसी घमण्ड से फूले हुए हैं। अपनी सारी भूलों पर परदा डालने के लिए वे हमारे विरुद्ध यह ढाल खड़ी करते हैं: “मसीह ने प्रतिज्ञा की है कि वह जगत के अन्त तक अपने लोगों के साथ रहेगा। क्या दूल्हा अपनी कलीसिया को त्याग सकता है? क्या परमेश्वर का पुत्र, जो पिता का अनन्त सत्य है, अपनी विश्वासयोग्यता में चूक सकता है?” पोपवादी मसीह की विश्वासयोग्यता का बड़े ठाट से गुणगान करते हैं, ताकि उसे अपने साथ बाँध लें; परन्तु साथ ही वे यह नहीं सोचते कि वे स्वयं वाचा तोड़नेवाले हैं; वे यह नहीं सोचते कि वे प्रत्यक्ष रूप से परमेश्वर के शत्रु हैं; वे यह नहीं सोचते कि उन्होंने स्वयं को उससे त्याग-पत्र देकर अलग कर लिया है।
इसलिए भविष्यद्वक्ता, यह देखकर कि उसका पाला ऐसे घमण्डी मनुष्यों से पड़ा है जो परमेश्वर के न्याय पर दोष लगाने के अभ्यस्त थे, कहता है, इस्राएलियों की गिनती समुद्र की बालू की सी होगी; अर्थात्, “जब प्रभु तुम्हें काट डालेगा, तब भी यह प्रतिज्ञा, जो अब्राहम को दी गई थी, अटल बनी रहेगी: ‘आकाश के तारों की ओर देख, और यदि तू गिन सके तो समुद्र की बालू को गिन; तेरा वंश ऐसा ही होगा’” (उत्पत्ति 15:5)।
हम निश्चय जानते हैं कि जब कभी भविष्यद्वक्ताओं ने प्रजा को कड़ी डाँट दी और विनाश की घोषणा की, तब सदा उनके सामने यह आपत्ति रखी गई: “क्या! क्या यह हो सकता है कि प्रभु हमें नाश करे? तब इस प्रतिज्ञा का क्या होगा, ‘तेरा वंश आकाश के तारों और समुद्र की बालू के समान होगा’?” इसलिए भविष्यद्वक्ता यहाँ उस व्यर्थ भरोसे को रोकता है जिसके सहारे कपटी लोग हर एक धमकी के विरुद्ध अपने आप को सँभाले रहते थे: “यद्यपि परमेश्वर तुम्हें काट डाले, तौभी वह उस प्रतिज्ञा के प्रति सच्चा और विश्वासयोग्य बना रहेगा कि अब्राहम का वंश समुद्र की बालू के समान अनगिनत होगा।”
मैं निश्चय मानता हूँ कि भविष्यद्वक्ता ने यहाँ विश्वासियों को उद्धार की आशा दी; क्योंकि यह निश्चित है कि इस्राएल के राज्य में कुछ लोग बचे हुए थे। यद्यपि सारी देह फिर गई थी, तौभी परमेश्वर ने, जैसा एलिय्याह से कहा गया था, अपने लिए कुछ वंश बचा रखा था। इसलिए भविष्यद्वक्ता नहीं चाहता था कि जो विश्वासी उस खोई हुई प्रजा के बीच बचे थे, वे उद्धार की आशा के बिना छोड़ दिए जाएँ; परन्तु साथ ही उसका ध्यान कपटियों पर भी था, जैसा हम कह चुके हैं। अब हम भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय देखते हैं; क्योंकि वह सिखाता है कि जिस पलटे की उसने चर्चा की है वह होगा, तौभी परमेश्वर अपने वचन को नहीं भूलेगा; वह सिखाता है कि प्रजा का ऐसा परित्याग होगा, तौभी परमेश्वर का चुनाव दृढ़ और अपरिवर्तनीय बना रहेगा; संक्षेप में, वह सिखाता है कि वह लेपालकपन, जिसके द्वारा परमेश्वर ने अब्राहम की सन्तान को अपनी प्रजा होने के लिए चुना था, व्यर्थ नहीं होगा। सम्पूर्ण का यही आशय है। अतः इस्राएलियों की गिनती समुद्र की बालू की सी होगी, जो न मापी जा सकती है और न गिनी जा सकती है।
इसके बाद वह जोड़ता है, और जिस स्थान में उनसे कहा गया था (शब्दशः, कहा जाएगा), तुम मेरी प्रजा नहीं हो; वहीं कहा जाएगा, तुम जीवित परमेश्वर के पुत्र हो। यह प्रश्न उठाया गया है कि क्या यह भविष्यद्वाणी उन लोगों के वंशजों से सम्बन्ध रखती है जो तितर-बितर कर दिए गए थे। यह तो सचमुच विचित्र होगा; क्योंकि उनके निर्वासन को इतना लम्बा समय बीत चुका है, और वे हताश और टूटे हुए आज भी पहाड़ों और अन्य निर्जन स्थानों में बसे हैं; कम से कम उनमें से बहुत से आर्मीनिया के पहाड़ों में हैं, कुछ मादै और कसदिया में हैं; संक्षेप में, सारे पूर्व देश में फैले हैं। और क्योंकि इस प्रजा की कोई पुनर्स्थापना नहीं हुई, यह निश्चित है कि यह भविष्यद्वाणी शरीर के अनुसार वंश तक सीमित नहीं की जानी चाहिए। क्योंकि यहूदियों के लिए एक नियत समय था, जब प्रभु ने उन्हें उनके देश में लौटा लाने की ठानी थी; और सत्तर वर्ष के अन्त में कुस्रू ने उन्हें स्वतन्त्र रूप से लौटने की अनुमति दी। अतः होशे यहाँ इस्राएल के राज्य की नहीं, वरन् उस कलीसिया की चर्चा करता है जो एक वापसी के द्वारा पुनर्स्थापित होनेवाली थी, और जो यहूदियों और अन्यजातियों दोनों से मिलकर बनी है। इसी प्रकार पौलुस, जो इस खण्ड का उपयुक्त व्याख्याता है, हमें स्मरण दिलाता है: ‘जिन्हें उसने न केवल यहूदियों में से वरन् अन्यजातियों में से भी बुलाया; जैसा वह होशे की पुस्तक में भी कहता है, जो मेरी प्रजा न थी, उन्हें मैं अपनी प्रजा कहूँगा; और जो प्रिया न थी, उसे प्रिया कहूँगा; और ऐसा होगा कि जिस जगह में उनसे यह कहा गया था कि तुम मेरी प्रजा नहीं हो, उसी जगह वे जीवित परमेश्वर की सन्तान कहलाएँगे’ (रोमियों 9:24 इत्यादि)।
पौलुस इस खण्ड को, और वह भी ठीक ही, विश्वासियों की सारी देह पर लागू करता है, जो बिना किसी भेदभाव के यहूदियों और अन्यजातियों दोनों में से इकट्ठी की गई है: क्योंकि अन्यथा, जैसा हम कह चुके हैं, भविष्यद्वाणी की यथार्थता और सच्चाई प्रकट न होती; और यह दृष्टिकोण भविष्यद्वक्ता के उस अभिप्राय से भी सबसे अधिक मेल खाता है जिसे मैंने अभी समझाया है। क्योंकि जब कपटी लोग मानो परमेश्वर के सामर्थ्य को अपने साथ बाँध लेते हैं, तो भविष्यद्वक्ता कहता है कि परमेश्वर, यदि चाहे, तो क्षण भर में एक नई कलीसिया खड़ी कर सकता है, जो गिनती में समुद्र की बालू से भी बढ़कर होगी। यह कैसे? परमेश्वर अपने लिए एक कलीसिया सृजेगा। किससे? पत्थरों से, शून्य से: क्योंकि, जैसा पौलुस अन्यत्र कहता है, ‘वह जो बातें हैं ही नहीं, उनका नाम ऐसा लेता है कि मानो वे हैं’ (रोमियों 4:17)।
साथ ही, जैसा कहा जा चुका है, परमेश्वर ने अपनी भलाई के द्वारा उस प्रजा की दुष्टता से संघर्ष किया; क्योंकि यद्यपि उन्होंने उसके अनुग्रह को ठुकरा दिया, हाँ, उसे हठपूर्वक अपने से दूर धकेल दिया, तौभी ऐसी टेढ़ाई ने प्रभु को अपने लिए एक बचे हुए भाग को सुरक्षित रखने से नहीं रोका।
अब यह खण्ड सिखाता है कि वे लोग अपनी धारणाओं में अत्यन्त विकृत हैं जो अपनी ही भावनाओं के आधार पर कलीसिया की दशा का निर्णय करते हैं, और जब उसका बाहरी रूप उनकी राय से मेल नहीं खाता तो परमेश्वर पर अविश्वासयोग्य होने का दोष लगाते हैं। पोपवादी ऐसा ही सोचते हैं; क्योंकि जब तक वे बड़े ठाट-बाट का वैभव न देखें, वे यह निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि जगत में कोई कलीसिया बची ही नहीं। परन्तु परमेश्वर कभी तो कलीसिया को इतना घटा देता है कि वह मानो लगभग शून्य हो गई जान पड़ती है; और कभी, उसे मानो मृत्यु में से उठाकर, सारी आशा से परे बढ़ाता और गुणित करता है। यशायाह 10:22 में यशायाह कहता है, चाहे इस्राएलियों की गिनती समुद्र की बालू के बराबर भी हो, तौभी उनमें से केवल बचा हुआ भाग ही उद्धार पाएगा।
वहाँ भविष्यद्वक्ता जान-बूझकर उन कपटियों को उपहास का पात्र बनाता है जो झूठे रूप से उस भविष्यद्वाणी की दुहाई देते थे, ‘आकाश के तारों और समुद्र की बालू की ओर देख, यदि तू उन्हें गिन सके; तेरा वंश ऐसा ही होगा।’ अतः जब यशायाह ने देखा कि कपटी लोग उस भविष्यद्वाणी पर भरोसा करके उसके विरुद्ध ऐसी टेढ़ाई से उठ रहे हैं, तब उसने कहा, “हो, ऐसा ही हो, कि तुम आकाश के तारों और समुद्र की बालू के समान हो; तौभी केवल बचा हुआ भाग ही उद्धार पाएगा;” जिसका अर्थ है, “प्रभु अन्त में तुम्हें काट गिराएगा, और तुम्हें इतनी छोटी गिनती में घटा देगा कि तुम अत्यन्त थोड़े रह जाओगे।” अब, दूसरी ओर, होशे कहता है कि जब इस्राएली बहुत थोड़ी गिनती में घट जाएँगे, यहाँ तक कि उजाड़ और सूनेपन के सिवा कुछ दिखाई न देगा, तब प्रभु सारी मानवीय कल्पनाओं से परे कलीसिया को पुनर्स्थापित करेगा, और प्रमाणित करेगा कि उसने अब्राहम से व्यर्थ प्रतिज्ञा नहीं की थी कि उसका वंश समुद्र की बालू के समान होगा। अतः जब प्रभु अद्भुत रीति से अपनी कलीसिया की रक्षा करता और इस जगत में उसे सुरक्षित रखता है, यहाँ तक कि कभी तो वह उसे गाड़ता हुआ सा जान पड़ता है और फिर उसे मृत्यु में से उठाता है; कभी उसके बाहरी रूप के विषय में उसे काट गिराता है और फिर बाद में उसे नया करता है; तो हमें चौकस रहना चाहिए कि जो कुछ प्रभु अपनी कलीसिया की रक्षा के विषय में घोषित करता है, उसे हम अपने ही निर्णय और शारीरिक तर्क के अनुसार न नापें। क्योंकि उसकी सुरक्षा प्रायः मनुष्यों की आँखों से छिपी रहती है। बात चाहे जैसी भी हो, परमेश्वर यहाँ अपने आप को न तो मानवीय साधनों से और न प्रकृति के क्रम से बाँधता है, वरन् उसका अभिप्राय यह है कि वह अपने अविश्वसनीय सामर्थ्य से उन सब बातों को पार कर जाए जिनकी मनुष्यों के मन कल्पना कर सकते हैं।
अतः इस खण्ड, इस्राएलियों की गिनती समुद्र की बालू की सी होगी, की व्याख्या इस प्रकार की जानी चाहिए: परमेश्वर अपनी कलीसिया को चारों ओर से, अन्यजातियों में से भी और यहूदियों में से भी, इकट्ठा करेगा, जब सारा जगत यह समझेगा कि वह मिट चुकी है।
और जिस स्थान में कहा गया था, तुम मेरी प्रजा नहीं हो; वहीं कहा जाएगा, तुम जीवित परमेश्वर के पुत्र हो। भविष्यद्वक्ता इन शब्दों में एक तुलना के द्वारा परमेश्वर के अनुग्रह की महिमा बढ़ाता है; मानो वह कहता हो, “जब परमेश्वर अपनी कलीसिया को फिर से पुनर्स्थापित करेगा, तब उसकी दशा पहले से अधिक उत्तम होगी।” यह कैसे? वह कहता है, “वे न केवल परमेश्वर की प्रजा होंगे, वरन् जीवित परमेश्वर के पुत्र भी होंगे;” जिसका अर्थ है कि परमेश्वर उन लोगों पर, जिन्हें वह इस प्रकार एकाएक एक देह में इकट्ठा करेगा, अपने आप को और भी घनिष्ठता से पिता के रूप में प्रकट करेगा। मैं निश्चय स्वीकार करता हूँ कि व्यवस्था के अधीन प्राचीन लोग भी इस उपाधि से सम्मानित थे; परन्तु हमें इस वर्तमान खण्ड पर ध्यान देना चाहिए; क्योंकि भविष्यद्वक्ता दोनों वाक्यांशों को एक-दूसरे के विपरीत रखता है: और जिस स्थान में कहा गया था, तुम मेरी प्रजा नहीं हो; वहीं कहा जाएगा, तुम जीवित परमेश्वर के पुत्र हो। वह यह कह सकता था, “और जिस स्थान में कहा गया था, तुम मेरी प्रजा नहीं हो; वहीं कहा जाएगा, तुम मेरी प्रजा हो:” परन्तु वह और ऊँचा चढ़ता है; परमेश्वर अपनी नई प्रजा को अधिक आदर देगा, क्योंकि लेपालकपन की इस उपाधि के द्वारा वह उन पर अपना अनुग्रह और भी स्पष्टता से प्रकट करेगा: और यह सब पर समान रूप से लागू होता है, अन्यजातियों पर भी और इस्राएलियों पर भी। हमें इसे, जैसा सामान्यतः किया जाता है, केवल अन्यजातियों पर ही लागू नहीं करना चाहिए: क्योंकि होशे यहाँ केवल उस कलीसिया की चर्चा नहीं करता जिसे परमेश्वर ने अन्यजातियों में से अपने लिए प्राप्त किया, वरन् परमेश्वर के सारे इस्राएल की, जिसका एक भाग अब्राहम का वंश है। अतः आइए, हम जानें कि परमेश्वर यहाँ अपना अनुग्रह सामान्य रूप से, इस्राएलियों और अन्यजातियों दोनों को, प्रदान करता है, और साक्षी देता है कि इस प्रजा को न्यायपूर्वक त्याग देने के बाद वह सब पर यह प्रकट करेगा कि वह अपनी वाचा को नहीं भूला था, क्योंकि वह अपने लिए एक कहीं अधिक बड़ी कलीसिया प्राप्त करेगा — किनमें से? जैसा कहा जा चुका है, अब्राहम की सन्तान में से भी और परदेशियों में से भी।
और क्रिया ‘कहा जाएगा’ में एक महत्त्वपूर्ण अर्थ निहित है: जिस स्थान में कहा गया था, तुम मेरी प्रजा नहीं हो, वहीं कहा जाएगा, — भविष्यद्वक्ता का आशय यह है कि हमारा उद्धार तब तक प्रकट नहीं होता जब तक प्रभु हमें अपनी सद्भावना की साक्षी देना आरम्भ न करे। इसलिए हमारे उद्धार का आरम्भ परमेश्वर की बुलाहट है, जब वह घोषित करता है कि वह हम पर अनुग्रहकारी है: उसके वचन के बिना हम पर कोई आशा नहीं चमकती। होशे यह कह सकता था, ‘जिस स्थान में कहा गया था, तुम मेरी प्रजा नहीं हो, वहीं वे परमेश्वर के पुत्र होने लगेंगे:’ परन्तु वह इससे अधिक व्यक्त करता है, ‘जिस स्थान में कहा गया था, तुम मेरी प्रजा नहीं हो, वहीं कहा जाएगा, तुम जीवित परमेश्वर के पुत्र हो।’
जहाँ तक पहले वाक्यांश की बात है, उसे उन धमकियों से जोड़ा जाना चाहिए जिनकी व्याख्या हो चुकी है; और इसी प्रकार उस प्रजा की ढिठाई को भी रोका गया, जो लापरवाही से सब भविष्यद्वक्ताओं को तुच्छ जानती थी: “क्या! परमेश्वर ने अपने आप को हमसे बाँध लिया है: हम अब्राहम के वंश हैं; अतः हम एक पवित्र और चुनी हुई जाति हैं।” परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ एक शिक्षक के रूप में अपने लिए अधिकार का दावा करता है: “मैं परमेश्वर के पलटे का दूत हूँ, और गम्भीरता से तुम्हारे परित्याग की घोषणा करता हूँ: अतः तुम्हारे लिए अब अपने हृदय कठोर करने और अपने कान बन्द करने का कोई कारण नहीं; क्योंकि अब अन्त में उस पलटे का क्रियान्वयन होगा जिसकी मैं अब तुमसे घोषणा करता हूँ।” इस प्रकार भविष्यद्वक्ता यहाँ घोषित करता है कि जो हमने पहले देखा वह उसने बिना सोचे-समझे नहीं कहा था, कि वह कोई खोखला हौआ नहीं था, वरन् उसने प्रभु के नाम से कहा था; जैसा पौलुस भी कहता है, ‘जो कोई मसीह के विरुद्ध अपने आप को ऊँचा उठाते हैं, उन सब से पलटा लेने को हम तैयार हैं’ (2 कुरिन्थियों 10:6)।
और हम यह भी देखते हैं कि यहेजकेल से क्या कहा गया था, ‘जा और यरूशलेम को घेर ले; अपना मुँह उसकी ओर कर, और वहाँ तब तक खड़ा रह जब तक तू उस पर धावा न कर ले, जब तक तू उसे उलट न दे।’ निश्चय ही भविष्यद्वक्ता के पास कोई सेना नहीं थी कि वह यरूशलेम पर आक्रमण कर सके: परन्तु वहाँ परमेश्वर का आशय यह है कि उसके वचन में सब दुष्टों का नाश करने के लिए पर्याप्त सामर्थ्य है। इसी प्रकार होशे भी यहाँ यही बात सूचित करता है: “जब केवल वचन के द्वारा इस्राएली त्याग दिए जाएँगे, तब कहा जाएगा, तुम जीवित परमेश्वर के पुत्र हो।” अतः आइए, हम जानें कि जब हम परमेश्वर को अपने से बात करते सुनते हैं, तब वह निश्चित उद्धार के साथ हम पर उदय होता है। आगे लिखा है — होशे 1:11
11. तब यहूदी और इस्राएली दोनों इकट्ठे होंगे, और अपना एक प्रधान ठहराकर देश से चले आएँगे; क्योंकि यिज्रैल का दिन महान होगा।
11. Et congregabuntur filii Jehudah et filii Israel simul— et ponent sibi caput unum— et ascendent e terra; quia magnus dies Jizreel.
भविष्यद्वक्ता यहाँ विशेष रूप से अब्राहम की सन्तान की चर्चा करता है; क्योंकि यद्यपि परमेश्वर उन्हें अन्य जातियों से अधिक महत्त्व न देता, तौभी वह चाहता था कि यह उसकी वाचा के कारण माना जाए कि वे आदर में दूसरों से बढ़कर थे; और हम जानते हैं कि पहिलौठे का अधिकार सर्वत्र उन्हीं को दिया गया है। अतः जैसे अब्राहम की सन्तान, मसीह के आगमन के बाद भी, कलीसिया में पहिलौठे थे, वैसे ही परमेश्वर यहाँ विशेष रूप से उन्हीं को सम्बोधित करता है, इस्राएली और यहूदी एक साथ देश से चढ़ आएँगे, और वे इकट्ठे होंगे, और अपने लिए एक प्रधान ठहराएँगे। पिछले पद में होशे ने कलीसिया के सार्वभौमिक एकत्रीकरण की चर्चा की थी; परन्तु अब वह अपना सम्बोधन अब्राहम के स्वाभाविक वंश तक सीमित करता है। क्यों? क्योंकि परमेश्वर ने पुनर्स्थापना का आरम्भ उसी प्रजा से किया, जब उसने उन दीन निर्वासितों की ओर अपना हाथ बढ़ाया कि उन्हें बेबीलोन की बँधुआई से उनके अपने देश में लौटा लाए। अतः जब यह एकत्रीकरण का आरम्भ था, तो भविष्यद्वक्ता बिना कारण नहीं यहाँ अपना सम्बोधन उनकी ओर मोड़ता है, और इस प्रकार उन्हें ऊँचे आदर में रखता है; इसलिए नहीं कि वे योग्य थे, न इसलिए कि वे किसी पुण्य के बल पर इस प्रतिष्ठा का दावा कर सकते थे; वरन् इसलिए कि परमेश्वर अपनी वाचा को व्यर्थ नहीं करना चाहता था, और इसलिए कि उसने उन्हें चुना था कि वे पहिलौठे हों, जैसा पहले कहा जा चुका है, और जैसा वे अन्यत्र भी कहलाते हैं, ‘एप्रैम मेरा जेठा है’ (यिर्मयाह 31:9)। अब हम भविष्यद्वक्ता के क्रम और विन्यास को समझते हैं, जिस पर ध्यानपूर्वक विचार करना चाहिए, और यह इसलिए और भी आवश्यक है कि व्याख्याकार इन सब बातों को गड्डमड्ड कर देते हैं और कोई भेद नहीं करते, जबकि भविष्यद्वक्ता ने यहाँ इस्राएलियों और यहूदियों को किसी निश्चित उद्देश्य के बिना अन्यजातियों के साथ नहीं मिलाया है।
अब आइए, हम भविष्यद्वक्ता के शब्दों पर विचार करें। वह कहता है, इस्राएली और यहूदी एक साथ इकट्ठे होंगे। निःसन्देह भविष्यद्वक्ता की दृष्टि उस बिखराव पर है जो तब तक दो सौ से अधिक वर्षों से चला आ रहा था, जब से यारोबाम दस गोत्रों को अलग ले गया था। क्योंकि तब देह फटकर टुकड़े-टुकड़े हो गई थी, इसलिए भविष्यद्वक्ता कहता है, यहूदी और इस्राएली एक साथ इकट्ठे किए जाएँगे। और वह जान-बूझकर ऐसा कहता है, ताकि इस्राएली अपने ही सामर्थ्य पर अपने आप को धन्य न समझें; क्योंकि वे सिर के बिना एक अंग-भंग देह थे; क्योंकि इस्राएल का राजा, ठीक-ठीक कहें तो, वैध नहीं था। प्रभु ने निश्चय यारोबाम का अभिषेक किया था; और बाद में, मैं मानता हूँ, येहू का भी अभिषेक हुआ था; परन्तु यह न्याय को पूरा करने के लिए किया गया था। क्योंकि जब प्रभु ने सचमुच प्रजा को आशीष देनी चाही, तब उसने दाऊद को उन पर शासन करने के लिए चुना; और फिर उसने अब्राहम की सारी सन्तान पर शासन का अधिकार दाऊद के वंशजों को सौंप दिया। अतः इस्राएल की प्रजा पर कोई वैध सिर नहीं था। और भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय यह कहकर इस बात को स्पष्ट रूप से व्यक्त करना था, यहूदी और इस्राएली एक साथ इकट्ठे किए जाएँगे; जिसका अर्थ यह है, “तुम अब निश्चिन्त हो, क्योंकि भाग्य तुम पर मुस्करा रहा है; क्योंकि तुम धन और सब अच्छी वस्तुओं से भरपूर हो; क्योंकि तुम अपने पड़ोसियों के लिए भयानक हो; क्योंकि तुम्हारे पास भली-भाँति गढ़वाले नगर हैं; परन्तु तुम्हारी सुरक्षा किसी और बात पर निर्भर है, अर्थात् इस पर कि तुम एक सिर के अधीन एक देह हो। क्योंकि जब तक परमेश्वर तुम पर शासन न करे, तुम्हें दुखी ही रहना होगा; और यह होने का एकमात्र मार्ग यह है कि तुम दाऊद के शासन के अधीन हो। अतः तुम्हारा अलगाव यह प्रमाणित करता है कि तुम्हारी दशा शापित है; तुम्हारा सांसारिक सुख, जिस पर तुम अपने आप को धन्य समझते हो, परमेश्वर के सम्मुख दुर्भाग्य है।” इस प्रकार भविष्यद्वक्ता ने इस्राएल की प्रजा को स्मरण दिलाया कि परमेश्वर अन्त में उन्हें उनकी पहली एकता में लौटाकर उन पर कृपा करेगा। अतः सम्पूर्ण का आशय यह है कि अब्राहम की सन्तान तब अन्त में धन्य होगी, जब वे फिर से एक देह में मिल जाएँगे, और जब एक सिर उन पर शासन करेगा। तब वे एक साथ इकट्ठे होंगे, और एक प्रधान ठहराएँगे। भविष्यद्वक्ता यहाँ यह भी दिखाता है कि जिस एकत्रीकरण का वह उल्लेख करता है वह किस प्रकार का होगा, अर्थात् यह कि वे एक राजा के शासन के अधीन इकट्ठे किए जाएँगे। क्योंकि जब कभी परमेश्वर प्रजा की पुनर्स्थापना की चर्चा करता है, तब वह सदा विश्वासियों का ध्यान दाऊद की ओर खींचता है: ‘दाऊद राज्य करेगा, एक ही चरवाहा होगा।’ अतः उनके बीच एक राजा और एक सिर होगा। अब हम भविष्यद्वक्ता के अभिप्राय को समझते हैं।
परन्तु यह खण्ड स्पष्ट रूप से सिखाता है कि मनुष्यों की एकता परमेश्वर के सम्मुख किसी गिनती में नहीं, जब तक कि वह एक सिर से उत्पन्न न हो। इसके अतिरिक्त, यह भली-भाँति ज्ञात है कि परमेश्वर ने मसीह के आगमन तक दाऊद को अपनी प्राचीन प्रजा पर नियुक्त किया था। अब, अतः, प्रभु की कलीसिया तभी ठीक रीति से गठित होती है जब सच्चा दाऊद उस पर शासन करता है; अर्थात्, जब सब एक मन होकर मसीह की आज्ञा मानते हैं और उसके आदेश के अधीन होते हैं (pendebunt ab ejus nutu, उसके संकेत पर निर्भर रहेंगे): और मसीह अपनी कलीसिया में किस प्रकार शासन करना चाहता है, यह हम जानते हैं; क्योंकि उसके राज्य का राजदण्ड सुसमाचार है। इसलिए जब मसीह को विश्वास की आज्ञाकारिता के द्वारा आदर दिया जाता है, तब सब कुछ सुरक्षित है; और यही कलीसिया की वह धन्य दशा है जिसकी भविष्यद्वक्ता अब चर्चा करता है। यह सचमुच विचित्र प्रतीत होता है कि जो बात परमेश्वर की निजी है, अर्थात् राजा नियुक्त करना, वह मनुष्यों पर डाल दी जाए। परन्तु भविष्यद्वक्ता ने इस अभिव्यक्ति के द्वारा विश्वास की आज्ञाकारिता का वर्णन किया है; क्योंकि इतना पर्याप्त नहीं कि मसीह राजा के रूप में दिया जाए और मनुष्यों पर नियुक्त किया जाए, जब तक कि वे भी उसे अपने राजा के रूप में ग्रहण न करें और श्रद्धा के साथ उसे स्वीकार न करें। अब हम सीखते हैं कि जब हम सुसमाचार पर विश्वास करते हैं, तब हम मानो स्वेच्छा से सहमति देकर मसीह को अपना राजा चुनते हैं।
इसके बाद वह जोड़ता है, वे देश से चढ़ आएँगे। वह पद के आरम्भ से अधिक व्यक्त करता है; क्योंकि वह कहता है कि परमेश्वर उन्हें निर्वासन से उनके अपने देश में लौटा लाएगा। इस प्रकार वह उस बात की प्रतिज्ञा करता है जो अत्यन्त आवश्यक थी, कि निर्वासन परमेश्वर के लिए अपनी कलीसिया को नया करने में कोई बाधा न होगा; क्योंकि प्रजा का अपने देश से दूर हटा दिया जाना, और फलस्वरूप अन्यजातियों के बीच बिखरे रहने के समय अपनी प्रतिज्ञात मीरास से वंचित रहना, उसका विनाश था। अतः प्रभु इस कठिनाई को दूर करता है, और स्पष्ट रूप से घोषित करता है कि यद्यपि वे कुछ समय के लिए मानो पूर्णतः नष्ट हो जाएँगे, तौभी वे फिर अपने देश में आएँगे। अतः वे चढ़ आएँगे (यह यहूदिया के सम्बन्ध में कहा गया है, क्योंकि वह कसदिया से ऊँचा है), अतः वे कसदिया से और उन अन्य स्थानों से चढ़ आएँगे जिनमें वे तितर-बितर कर दिए गए थे। अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता का यह कहने में क्या आशय है, इस्राएली और यहूदी एक साथ इकट्ठे होंगे, अर्थात् एक देह में; और आगे, वे अपने लिए एक प्रधान ठहराएँगे। यही एकत्रीकरण की रीति है; और यह भी जोड़ना चाहिए कि कलीसिया तब परमेश्वर की आज्ञा मानती है जब सब, पहले से लेकर अन्तिम तक, एक सिर के प्रति सहमत होते हैं: क्योंकि विवश किया जाना पर्याप्त नहीं, जब तक कि सब स्वेच्छा से अपने आप को मसीह को अर्पित न करें; जैसा भजन संहिता 110 में कहा गया है, ‘जिस दिन राजा अपने लोगों को बुलाएगा, उस दिन उसकी प्रजा स्वेच्छा से अपने आप को अर्पित करेगी।’ अतः भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय विश्वास की उस आज्ञाकारिता को व्यक्त करना था जो विश्वासी मसीह के प्रति करेंगे, जब प्रभु उन्हें पुनर्स्थापित करेगा।
वह कहता है, और वे देश से चढ़ आएँगे; क्योंकि यिज्रैल का दिन महान होगा। यह पूछा जा सकता है कि वह यहाँ यिज्रैल के दिन को महान क्यों कहता है; क्योंकि यह भविष्यद्वाणी के विपरीत प्रतीत होता है? इस खण्ड की व्याख्या दो प्रकार से की जा सकती है। कुछ लोग कहते हैं, यिज्रैल का दिन महान होगा, क्योंकि परमेश्वर उस प्रजा को बोएगा जिसे उसने पहले तितर-बितर किया था। इस प्रकार वे समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता, जैसा पहले एक स्थान पर, यिज्रैल शब्द की ओर संकेत करता है। परन्तु मुझे इसका अर्थ कुछ और प्रतीत होता है। मैं इस वाक्यांश को अन्तिम बात तक, या प्रतिज्ञा तक, सीमित नहीं करता, वरन् इसे उस संहार पर लागू करता हूँ जिसका उल्लेख पहले हो चुका है; क्योंकि ये बातें एक-दूसरे से मेल खाती हैं। वे देश से चढ़ आएँगे; क्योंकि यिज्रैल का दिन महान होगा। इस्राएली अभी तक अपने घोंसलों में विश्राम कर रहे थे, और सोचते थे कि वे किसी भी प्रकार से उखाड़े नहीं जा सकते; इसके अतिरिक्त, यहूदा का राज्य उस समय किसी निकट विनाश से नहीं डरता था। अतः भविष्यद्वक्ता यहाँ सूचित करता है कि किसी उल्लेखनीय और असाधारण उपाय की आवश्यकता होगी; क्योंकि यिज्रैल के दिन में कठोर और भयानक संहार होगा। अब हम भविष्यद्वक्ता का वास्तविक अर्थ समझते हैं, वे देश से चढ़ आएँगे; क्योंकि यिज्रैल का दिन महान होगा।
वे निश्चय अन्यथा आपत्ति करके कह सकते थे, “तू हमसे इस चढ़ आने के विषय में क्यों भविष्यद्वाणी करता है? यह चढ़ आना क्या है? क्या हम उस मीरास में शान्ति से विश्राम नहीं कर रहे जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर ने पहले हमारे पितरों से की थी? तो फिर इस चढ़ आने से तेरा क्या तात्पर्य है?” भविष्यद्वक्ता यहाँ उन्हें झकझोरता है, और स्मरण दिलाता है कि उनके पास अपनी वर्तमान शान्त दशा पर, तलछट पर स्थिर दाखमधु के समान, भरोसा करने का कोई कारण नहीं; और यही उपमा एक अन्य स्थान पर भी प्रयुक्त हुई है (यिर्मयाह 48:11)। भविष्यद्वक्ता यहाँ घोषित करता है कि अत्यन्त भयानक संहार होगा, जो परमेश्वर की असाधारण दया की माँग करेगा; क्योंकि वह अद्भुत रीति से प्रजा को पुनर्स्थापित करेगा, और उन्हें कब्रों में से मुरदों के समान बाहर निकालेगा: क्योंकि तब यिज्रैल का दिन महान होगा; अर्थात्, “क्योंकि जो विपत्ति प्रभु तुम पर लाएगा वह भारी और भयानक होगी, इसलिए मैं तुमसे इस लौटने और चढ़ आने की प्रतिज्ञा व्यर्थ नहीं करता।” भविष्यद्वक्ता का वास्तविक अर्थ यही प्रतीत होता है।
प्रार्थना। हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, ऐसा अनुग्रह कर कि जैसे हम न केवल बेबीलोन के निर्वासन से छुड़ाए गए हैं, वरन् स्वयं अधोलोक में से भी निकल आए हैं; क्योंकि जब हम क्रोध की सन्तान थे, तब तूने सेंत-मेंत हमें लेपालक बनाया, और जब हम परदेशी थे, तब तूने अपनी असीम भलाई से हमारे लिए अपने राज्य का द्वार खोल दिया, कि हम पुत्र के द्वारा तेरे वारिस बनाए जाएँ; वैसे ही ऐसा अनुग्रह कर कि हम तेरे सम्मुख चौकसी से चलें, और अपने आप को सम्पूर्ण रीति से तेरे और तेरे मसीह के अधीन कर दें, और उसके अंग होने का ढोंग न करें, वरन् सचमुच अपने आप को उसकी देह प्रमाणित करें, और उसके आत्मा के द्वारा ऐसे संचालित हों, कि तू अन्त में हमें अपने स्वर्गीय राज्य में एकत्र कर ले, जिसमें तू उसी मसीह, हमारे प्रभु के द्वारा, हमें प्रतिदिन बुलाता है। आमीन।
8 यदि इसका अनुवाद ‘यद्यपि’ किया जाए, जैसा कुछ लोग करते हैं, तो अर्थ और भी स्पष्ट हो जाएगा; अर्थात्, वे देश से चढ़ आएँगे, यिज्रैल के संहार की महानता के होते हुए भी, जब वे बन्दी बनाकर ले जाए जाएँगे। — सं.
