होशे की पुस्तक पर टीका · अध्याय 13

होशे 13

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होशे 13

चौंतीसवाँ व्याख्यान

होशे 13:1

1. जब एप्रैम बोलता था, तब लोग काँपते थे; वह इस्राएल में बड़ा था; परन्तु जब वह बाल के कारण दोषी हो गया, तब वह मर गया।

1. Quam loqueretur Ephraim, tremor: extulit se ipse in Israel, et peccavit in Baal, et mortuus est.

व्याख्याकार इस पद के विषय में एकमत नहीं हैं। कुछ लोग कहते हैं कि इस्राएल में तब थरथराहट उत्पन्न हुई जब एप्रैम ने, अर्थात् यारोबाम ने, जो उसी गोत्र में उत्पन्न हुआ था, प्रजा को बछड़ों की उपासना करने के लिये उभारा। {,}רתתretat, "थरथराहट," शब्द से वे यह समझते हैं कि प्रजा इतनी चकित हो गई थी कि उसने बिना सोचे-विचारे तुरन्त अपने अधर्मी राजा की इच्छा का, वरन् उसकी सनक का, पालन किया। और यदि यह अर्थ स्वीकार किया जाए, तो "थरथराहट" शब्द की व्याख्या एक और रीति से भी की जा सकती है, अर्थात् यह, — कि प्रजा ने उस विकृत उपासना को तुरन्त ग्रहण नहीं किया, वरन् उससे डरी, जैसा कि प्रायः नई बातों के विषय में होता है, और उन बातों के विषय में भी जिनके पक्ष में कोई युक्तिसंगत बात दिखाई नहीं देती। परन्तु मेरे विचार में ये व्याख्याकार भविष्यद्वक्ता के अभिप्राय से पूर्णतः हट जाते हैं; क्योंकि इसके विपरीत वह यहाँ इस्राएल के राज्य की दोहरी दशा का वर्णन करता है, जिससे यह प्रकट हो जाए कि दस गोत्र अपने ही दोष के कारण प्रभु द्वारा त्याग दिए गए थे, और इस प्रकार उस प्रतिष्ठा से गिर पड़े थे जिस तक प्रभु ने उन्हें उठाया था।

इसलिए वह कहता है, जब एप्रैम पहले बोलता था, तो उसका शब्द भय उत्पन्न करता था, और उसने अपने आप को इस्राएल में ऊँचा किया; अर्थात्, अब्राहम के सारे वंश के बीच। परन्तु अब वह मर गया है, या गिर पड़ा है, जब से उसने बाल के कारण पाप करना आरम्भ किया। तो पहले वाक्य में भविष्यद्वक्ता उन प्रतिष्ठाओं का वर्णन करता है जिनसे परमेश्वर ने उस गोत्र पर अनुग्रह किया था। हम जानते हैं कि एप्रैम यूसुफ के पुत्रों में छोटा था। मनश्शे को न केवल श्रेष्ठता मिलनी चाहिए थी, वरन् उस घराने में उसे अकेले ही प्रभुता करनी चाहिए थी; क्योंकि प्रजा बारह गोत्रों में बँटी हुई थी। परन्तु परमेश्वर ने यूसुफ के घराने में दो प्रधान खड़े करने की इच्छा की, और छोटे को पहिलौठे से बढ़कर ठहराया। इसलिए एप्रैम को, जो संख्या और सामर्थ्य में बढ़ गया था, और अन्त में राजकीय प्रतिष्ठा भी पा चुका था, परमेश्वर के इस अनोखे अनुग्रह को मानना चाहिए था। और भविष्यद्वक्ता यहाँ उलाहना देते हुए कहता है कि एप्रैम के केवल शब्द से ही सब काँप उठते थे; अर्थात्, जब वह अधिकार से सम्पन्न हुआ; और फिर यह कि वह इस्राएल में ऊँचा किया गया। उसे तो कुछ भी न गिना जाना चाहिए था, उसे अपने भाई से, जो पहिलौठा था, छोटा होना चाहिए था, और तौभी वह सब गोत्रों से बढ़कर हो गया। अतः जब परमेश्वर ने एप्रैम के गोत्र को इतना आदर दिया था, तो उसका दोष और भी गम्भीर था कि वह बाद में मूर्तियों की ओर फिर गया; वरन् यह कि उसने अपने राज्य का आरम्भ ही अन्धविश्वास से किया, जब परमेश्वर ने यारोबाम को चुनकर राजा अभिषिक्त करना चाहा था। और निश्चय ही यह अत्यन्त असंगत बात थी कि वह, जो सब आशा से परे परमेश्वर के हाथ द्वारा सिंहासन तक उठाया गया था, अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के स्थान पर तुरन्त परमेश्वर की सारी उपासना को भ्रष्ट कर दे। 89 जान पड़ता है कि हॉर्सली ने इस वाक्य के विषय में कैल्विन का दृष्टिकोण अपनाया है। उसका अनुवाद यह है, — "जब एप्रैम बोलता था, तब भय छा जाता था।"

परन्तु भविष्यद्वक्ता दूसरे स्थान पर कहता है कि जिस समय से वे इस प्रकार सच्ची और विधिसम्मत उपासना से फिर गए, उसी समय से वे मर गए, जिससे वे समझ लें कि जब परमेश्वर का हाथ उनके विरुद्ध हुआ, जब वे विपत्ति से दबाए गए, तब उन्होंने अपनी अभक्ति का उचित प्रतिफल पाया। अब हम भविष्यद्वक्ता का स्पष्ट अर्थ समझते हैं, अर्थात् यह कि इस्राएली, और विशेष करके एप्रैम का गोत्र, जिसमें से यारोबाम उठा था, पूर्वकाल में ऐसे फले-फूले कि केवल अपने शब्द से ही उन्होंने अपने सब पड़ोसियों को वश में कर लिया, और मनुष्यों की आशा के विपरीत वे अचानक उभर आए और अब्राहम की सन्तान के बीच एक नया राज्य खड़ा कर लिया।

इसके बाद वह जोड़ता है कि जब उन्होंने बाल के कारण पाप किया, तब वे मृतक हो गए: क्योंकि परमेश्वर ने एप्रैम के गोत्र से वह सामर्थ्य छीन ली जिससे उसने पहले उसे सुशोभित किया था, यहाँ तक कि वे नष्ट होने से थोड़े ही बचे। क्योंकि यद्यपि उसका राज्य पूरी रीति से गिरा नहीं था, तौभी वह ऐसी चरम दशा तक पहुँच गया था कि भविष्यद्वक्ता उचित रूप से कह सकता था कि वे, जो अपनी पहली दशा से इतनी दूर हो गए थे, मृतक थे। परन्तु जब वह कहता है कि उन्होंने बाल के कारण पाप किया, तो उसका यह अर्थ नहीं कि यही उनकी मूर्तिपूजा का आरम्भ था; क्योंकि आरम्भ में यारोबाम ने बछड़े बनाए थे, और उसके एक उत्तराधिकारी ने बाल का निर्माण किया, और, जैसा समझा जाता है, वह अन्धविश्वास पड़ोसी सीदोनियों से उधार लिया। परन्तु परमेश्वर यहाँ उस बात का वर्णन करता है जो अधिक गम्भीर और कम क्षमा-योग्य है, — कि इस्राएलियों ने अपने आप को अन्यजातियों की मलिनता से अशुद्ध किया, यहाँ तक कि वे उन अपवित्र और अविश्वासी लोगों से कुछ भी भिन्न न रहे जिनका खरी शिक्षा से कोई परिचय न था।

इसके अतिरिक्त हमें इस स्थान पर यह सिखाया जाता है कि जब राजा किसी अधिकार से सम्पन्न होते हैं, जब वे सामर्थ्य में बलवन्त होते हैं, तो यह सब परमेश्वर की ओर से होता है; क्योंकि यदि परमेश्वर मनुष्यों पर भय न डाले, तो कोई भी दूसरे का जूआ स्वीकार न करेगा; कम से कम सब बराबरी चाहेंगे, या हर एक अपने आप को दूसरों से ऊँचा करेगा। अतः यह निश्चित है कि जब कोई बहुतों के बीच सामर्थ्य में बढ़कर होता है, तो यह परमेश्वर की गुप्त युक्ति से होता है, जो साधारण जनता को व्यवस्था में बाँधे रखता है, और उन्हें एक मनुष्य की आज्ञा का पालन करने से इन्कार नहीं करने देता। यही होशे अब सिखाता है, जब वह एप्रैम के गोत्र को इस भय के विषय में उलाहना देता है; क्योंकि यदि एप्रैम अपनी ही सामर्थ्य से भयानक हुआ होता, तो भविष्यद्वक्ता की इस डाँट के लिये कोई स्थान न होता: परन्तु क्योंकि यह परमेश्वर का विशेष दान था, इसलिए भविष्यद्वक्ता उचित रूप से कहता है कि एप्रैम का गोत्र तब तक बड़े आदर में रहा जब तक वह अन्धविश्वास में नहीं गिर पड़ा। अब हम आगे बढ़ें —

होशे 13:2

2. और अब वे पाप पर पाप बढ़ाते जाते हैं, और अपनी चाँदी से अपनी समझ के अनुसार मूरतें ढालते हैं, जो सब की सब कारीगरों की बनाई हुई हैं: उन्हीं के विषय में लोग कहते हैं, जो नरमेध करते हैं वे बछड़ों को चूमें।

2. Et nunc addunt ad peccandum (hoc est, pergunt peccare,) et fecerunt sibi conflatile ex argento suo, secundum intelligentiam suam, idola opus artificum omnis (vel, omne:) ipsis ipsi dicunt sacrificantes hominem, vitulos osculentur.

इस पद में भविष्यद्वक्ता प्रजा की दुष्टता को और बढ़ाकर दिखाता है, और कहता है कि उन्होंने केवल एक ही दिन में परमेश्वर की शुद्ध उपासना को त्यागकर अपने आप को अन्धविश्वासों में नहीं उलझाया था; वरन् वे अपनी भ्रष्टता में हठी बने रहे थे।

वह कहता है, उन्होंने अपने पाप में और जोड़ा है, और अपनी चाँदी से एक ढली हुई वस्तु बनाई है।

जब इस्राएल, जैसा हम कह चुके हैं, परमेश्वर की उपासना से हट गया, तब उन्होंने बछड़े बनाए, और उन्हें एक आकर्षक आडम्बर के साथ बनाया; परन्तु जब एक के बाद एक बहुत से अन्धविश्वास जोड़े गए, तब मानो पागलपन का ढेर लग गया, मानो इस्राएली जान-बूझकर परमेश्वर की व्यवस्था को उलट देना चाहते थे, और यह दिखाना चाहते थे कि उन्हें उस एकमात्र सच्चे परमेश्वर की कुछ भी चिन्ता नहीं, जिसके द्वारा वे छुड़ाए गए थे। यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता कहता है कि वे दुष्टता में बढ़ते गए, और पाप करने में कोई संयम न रखा; और जब तक परमेश्वर मनुष्यों को पीछे न खींचे, प्रायः ऐसा ही होता है। जैसे ही वे फिर जाते हैं, वे सिर के बल बुराई में दौड़ पड़ते हैं; क्योंकि परमेश्वर की ओर पीठ फेर लेने के बाद वे पाप करने में और भी अधिक स्वच्छन्दता लेते हैं।

इसलिए भविष्यद्वक्ता की इस डाँट पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि वह इस्राएल की हठीली दुष्टता के विरुद्ध कड़ाई से बोलता है; और कहता है कि उन्होंने अपनी चाँदी से अपने लिये एक ढली हुई वस्तु बनाई। जैसा हम ऊपर देख चुके हैं, उन्होंने परमेश्वर के दानों का दुरुपयोग किया, क्योंकि जो कुछ प्रभु ने उनके उपयोग के लिये ठहराया था उसे उन्होंने अन्धविश्वास को अर्पित कर दिया। हम जानते हैं कि परमेश्वर ने चाँदी इसलिए दी है कि मनुष्य आपस में व्यापार करें, और उसे अन्य उपयोगी कामों में भी लगाएँ। परन्तु जब वे चाँदी से अपने लिये देवता बनाते हैं, तो उनकी कृतघ्नता में आश्चर्यजनक मूढ़ता है, क्योंकि वे प्रकृति के क्रम को उलट देते हैं, और भूल जाते हैं कि चाँदी किसी और उद्देश्य से दी गई है, अर्थात्, जैसा हम कह चुके हैं, उनके उपयोग के लिये। साथ ही भविष्यद्वक्ता यह संकेत करता है कि इस्राएली और भी कम क्षमा-योग्य थे, क्योंकि जब वे धनी हुए, तब वे अपने धन पर घमण्ड करने लगे। हम जानते हैं कि तृप्ति ही उच्छृंखलता का कारण होती है, जैसा कि शीघ्र ही फिर कहा जाएगा।

परन्तु भविष्यद्वक्ता जो आगे जोड़ता है उस पर विशेष ध्यान देना चाहिए, अपनी समझ के अनुसार। यहाँ वह इस्राएलियों को कड़ी डाँट देता है, क्योंकि उन्होंने अपने सब विचारों को परमेश्वर के अधीन नहीं किया था, वरन् इसके विपरीत जो कुछ उन्हें अच्छा लगा उसी के पीछे चले। अतः यह उनकी अपनी कल्पना के अनुसार था। भविष्यद्वक्ता जिस शब्द का प्रयोग करता है वह अनुपयुक्त नहीं है, यद्यपि "समझ" शब्द, जिसे भविष्यद्वक्ता अपनाता है, इब्रानियों में अच्छे अर्थ में लिया जाता है। परन्तु यहाँ परमेश्वर की उपासना की चर्चा है, जिसके विषय में मनुष्यों की सारी चतुराई, सारी तर्कबुद्धि, सारी बुद्धि, और संक्षेप में उनकी सारी इन्द्रियाँ, स्थगित रहनी चाहिए: क्योंकि यदि इस विषय में वे अपनी ओर से कुछ भी अपनाएँ, चाहे वह कितना ही थोड़ा क्यों न हो, तो वे अनिवार्य रूप से परमेश्वर की उपासना को दूषित कर देते हैं। कैसे? क्योंकि हम जानते हैं कि आज्ञा मानना सब बलिदानों से उत्तम है।

अतः परमेश्वर की सच्ची उपासना के विषय में नियम यह है, — कि मनुष्य मूर्ख बनें, कि वे अपने आप को बुद्धिमान न समझें, वरन् केवल परमेश्वर की ओर कान लगाएँ, और जो वह आज्ञा देता है उसी के पीछे चलें। परन्तु जब मनुष्यों का ढिठाई भरा अहंकार घुस आता है, यहाँ तक कि वे उपासना की कोई नई रीति गढ़ लेते हैं, तब वे सच्चे परमेश्वर से हट जाते हैं, और निरी मूर्तियों की उपासना करते हैं। अतः भविष्यद्वक्ता यहाँ "समझ" शब्द के द्वारा हर उस बात को दोषी ठहराता है जो मनुष्यों के विचार और तर्कबुद्धि को भाती है; मानो उसने कहा हो, "परमेश्वर की उपासना के विषय में धर्म का सच्चा नियम यह है कि उसमें कुछ भी मानवीय न मिलाया जाए, कि कोई भी अपनी ओर से कुछ प्रस्तुत न करे, या वह जो उसे स्वयं अच्छा लगे।" संक्षेप में, यहाँ मनुष्यों की समझ परमेश्वर की आज्ञा के विपरीत रखी गई है; मानो भविष्यद्वक्ता ने कहा हो, "परमेश्वर की सच्ची उपासना और सब गढ़ी हुई और भ्रष्ट उपासना-रीतियों के बीच एक बड़ा अन्तर परमेश्वर के वचन का पालन है; यदि हम अपने ही विचार के अनुसार बुद्धिमान बनें, तो जो कुछ हम करते हैं वह सब भ्रष्ट है।" कैसे? क्योंकि जो कुछ मनुष्य अपनी ओर से गढ़ते हैं वह ईश्वरीय उपासना को अशुद्ध करना है। इसलिए पौलुस कुलुस्सियों 2 में मनुष्यों की सब कल्पनाओं का खण्डन इसी एक तर्क से करता है, वह कहता है, "ये मनुष्यों की परम्पराएँ हैं, यद्यपि इनमें ज्ञान का दिखावा हो।"

अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय क्या था, और उसने "समझ" शब्द क्यों जोड़ा; यह इसलिए था कि इस्राएली जान लें कि उनके बीच प्रचलित सारी उपासना विकृत और दूषित थी; क्योंकि वह परमेश्वर की आज्ञा पर आधारित नहीं थी, वरन् एक भिन्न स्रोत से, अर्थात् मनुष्यों की समझ से, निकली थी। अतः, जैसा हम पहले कह चुके हैं, यह निष्कर्ष निकलता है कि धर्म के विषय में हमें अपनी ओर से कुछ भी करने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए, वरन् परमेश्वर की उपासना में इसी एक नियम का पालन करना चाहिए — कि सीधे-सीधे उसके वचन को मानें।

इसके बाद वह जोड़ता है, मूरतें, जो सब की सब कारीगरों का काम हैं। दूसरे स्थान पर भविष्यद्वक्ता उस स्थूलता का उपहास करता है जिसने प्रजा के मनों को मोह लिया था, क्योंकि वे परमेश्वर के स्थान पर मनुष्यों के कामों की उपासना करते थे। क्योंकि सब भविष्यद्वक्ताओं की यह रीति है कि मनुष्यों की मूढ़ता को मानो हाथ से छूने योग्य बना देने के लिये वे यह दिखाते हैं कि मूर्तियों की उपासना करना पूर्णतः तर्कहीन है; क्योंकि किसी पदार्थ की उपासना किसी भी उचित रीति से नहीं की जा सकती। जब हमारे सामने सोने या चाँदी का एक बड़ा ढेर या बड़ा अम्बार होता है, तो कोई यह कल्पना नहीं करता कि उसमें कोई ईश्वरत्व है: जब कोई वन में से होकर जाता है, तो वह परमेश्वर की महिमा पेड़ों को नहीं दे देता; और पत्थरों के विषय में भी यही कहा जा सकता है। परन्तु जब कारीगर का हाथ लगता है, तब सोने का पत्तर देवता बनने लगता है; वैसे ही पेड़ का तना भी, जब कारीगर से कोई आकार पाता है, तो परमेश्वर की महिमा धारण करता हुआ जान पड़ता है; और अन्य वस्तुओं के विषय में भी यही बात है। अब यह कल्पना करना अत्यन्त बेतुका है कि कोई कारीगर, जैसे ही उसने कुछ लकड़ी गढ़ी, या जैसे ही उसने सोना या चाँदी पिघलाई, एक देवता बना सकता है, और किसी मृत वस्तु में ईश्वरत्व डाल सकता है; और तौभी यह भली-भाँति ज्ञात है कि सब कहीं ऐसा ही समझा जाता है।

अन्धविश्वासी लोग बहाने के रूप में यह कहते हैं कि यह कारीगर के हाथ से नहीं होता, वरन् इसलिए कि वे परमेश्वर की उपस्थिति का कोई चिह्न चाहते हैं, और क्योंकि वे किसी और रीति से यह प्रकट नहीं कर सकते कि परमेश्वर क्या है, इसलिए परमेश्वर उस आकार में है। परन्तु यह बात फिर भी सत्य बनी रहती है कि कारीगर अपने कौशल से निर्जीव वस्तुओं से देवता बनाते हैं, जिन्हें कोई आदर नहीं दिया जा सकता।

जब बात ऐसी है, तो भविष्यद्वक्ता अब उचित रूप से कहता है कि इस्राएल की प्रजा जिसकी उपासना करती थी वह कारीगरों का काम था; और उसने यह इसलिए कहा कि वे जान लें कि जब उन्होंने आकाश और पृथ्वी के सृष्टिकर्ता सच्चे परमेश्वर को छोड़ दिया और हाथ की बनाई हुई मूर्तियों के आगे दण्डवत् किया, तब वे लज्जाजनक रीति से मूर्ख बन गए। 90 कुलुस्सियों 2:22, 23। — fj.

परन्तु वह जोड़ता है कि जब वे मनुष्यों का बलिदान करते हैं तब एक दूसरे से कहते हैं, वे बछड़ों को चूमें। यद्यपि इस स्थान की व्याख्या विभिन्न रीतियों से की जाती है, तौभी मैं भविष्यद्वक्ता के स्पष्ट अर्थ से ही सन्तुष्ट हूँ। वह फिर से उनका उपहास करता है कि वे एक दूसरे को बछड़े की उपासना के लिये उभारते थे: क्योंकि चूमने से वह अलंकार के द्वारा उपासना या आराधना के अंगीकार का अर्थ लेता है, जैसा पवित्रशास्त्र के अन्य भागों से स्पष्ट है। 1 राजाओं में कहा गया है, मैं ने अपने लिये सात हज़ार पुरुष बचा रखे हैं, जिन्होंने बाल के आगे घुटने नहीं टेके, और न उसे चूमा। अतः बाल को चूमना श्रद्धा का चिह्न था। और हम देखते हैं कि यह रीति अन्धविश्वासियों में बनी रही है, जैसा आज के दिन पोपवादियों के साथ है, जो अपनी मूर्तियों को चूमने की इस विशेष रीति का पालन करते हैं। परन्तु भविष्यद्वक्ता अब क्या कहता है? वह कहता है, वे बछड़ों की उपासना में एक दूसरे को प्रोत्साहित करते हैं, और साथ ही "वे मनुष्यों का बलिदान करते हैं"। निःसन्देह भविष्यद्वक्ता यहाँ उस घृणित और क्रूर रीति को दोषी ठहराता है जिसमें माता-पिता अपने बच्चों को मोलेक के लिये बलि चढ़ाते थे। माता-पिता का अपने ही बच्चों को बलि चढ़ाना प्रकृति की भावना के सर्वथा विरुद्ध था।

क्योंकि यद्यपि एक बार अब्राहम को यह आज्ञा दी गई थी, तौभी हम जानते हैं कि उसका उद्देश्य यह था कि परमेश्वर इस परख के द्वारा अपने दास की आज्ञाकारिता को जाँचना चाहता था: परन्तु अन्त में अब्राहम को वह करने नहीं दिया गया जो उसने ठाना था।

अतः वे मनुष्यों को बलि चढ़ाते थे। यदि मनुष्यों का बलिदान करना उचित होता, तो निश्चय ही ऐसी सेवा कम से कम एकमात्र सच्चे परमेश्वर को अर्पित की जानी चाहिए थी। यदि मनुष्य के निमित्त मनुष्य का बलिदान करना विधिसम्मत होता, तो भी बछड़े को प्रसन्न करने के लिये ऐसा करना निश्चय ही हास्यास्पद था; और यह विशेष रूप से विचित्र था जब माता-पिता अपने बच्चों के लोहू से मृत प्रतिमाओं को मनाने में तनिक भी नहीं हिचकते थे। अतः भविष्यद्वक्ता अब इस बेतुकेपन की ओर मानो उँगली से संकेत करता है, जिससे वह इस्राएलियों को उनके नीच आचरण पर लज्जित करने का प्रयत्न करे। वह कहता है, "तुम कैसे पशु-समान हो; क्योंकि तुम बछड़ों के लिये बलि चढ़ाते और उन्हें चूमते हो, और इससे भी बढ़कर, तुम मनुष्यों का बलिदान करते हो। क्या बछड़े में इतनी योग्यता है कि मनुष्य, जो उससे कहीं बढ़कर है, उसके आगे मार डाला जाए? क्या यह तर्क जैसी किसी भी बात से सर्वथा असंगत नहीं है?" अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय क्या था। तो जब वे मनुष्यों को बलि चढ़ाते हैं तब एक दूसरे से कहते हैं, वे बछड़ों को चूमें।

परन्तु हम इस और ऐसे ही अन्य स्थानों से यह सीखते हैं कि हमें उन बेतुकी बातों पर ध्यान देना चाहिए जिनमें अभागे मनुष्य, परमेश्वर के वचन को छोड़ने के बाद अपनी ही युक्तियों में भटककर, अपने आप को उलझा लेते हैं: क्योंकि यह वचन हमारे लिये लगाम के समान होना चाहिए, जिससे हम उनके साथ उनकी भयंकर कल्पनाओं में भटक न जाएँ; क्योंकि जब हम इन उन्मत्त बातों को देखते हैं जिनसे स्वयं प्रकृति भी घृणा करती है, तो यह स्पष्ट है कि परमेश्वर इसके द्वारा मानो अपने बढ़ाए हुए हाथ से हमें रोकता और बचाए रखता है। इसी उद्देश्य से भविष्यद्वक्ता अब दिखाता है कि इस्राएली कितने मूढ़ थे, और उनका उन्माद कितना विलक्षण था जब वे बड़ी श्रद्धा के साथ बछड़ों को चूमते थे, और मनुष्यों का बलिदान भी करते थे। वैसे ही आज के दिन पोप-तन्त्र के अधीन रहनेवालों के विषय में हमें न केवल यह तर्क अपनाना चाहिए कि जब उन्होंने उसके वचन के प्रमाण के बिना अपने लिये नई और विचित्र उपासना-रीतियाँ ढूँढ़ीं, तब वे सच्चे परमेश्वर से हट गए, वरन् हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि उनकी बचकानी बातें भी इसी कारण से उत्पन्न हुई हैं।

और हम देखते हैं कि परमेश्वर ने उन्हें कैसे निकम्मे मन के वश में छोड़ दिया है, यहाँ तक कि वे किसी भी प्रकार की बेतुकी बात को नहीं त्यागते। और, जैसा मैं कह चुका हूँ, यह विचार उन लोगों को जगाने का काम देगा जो अब तक चंगे होने योग्य हैं, जब वे समझेंगे कि वे मोहग्रस्त कर दिए गए थे; इस प्रकार चेतावनी पाकर वे सही मार्ग पर लौट आएँ। और इसलिए कि हम स्वयं परमेश्वर का धन्यवाद करें, और उस मलिनता से, जिसमें हम कुछ समय तक उलझे हुए थे, और भी अधिक घृणा करें, और यह स्मरण रखें कि इससे बढ़कर डरने योग्य कोई बात नहीं कि प्रभु हमारी लगाम ढीली छोड़ दे, सब मूर्तिपूजकों पर उसके प्रतिशोध का यही उदाहरण हमारे सामने प्रकट किया गया है; क्योंकि जैसे ही वे परमेश्वर की शुद्ध उपासना से हट गए, उन्होंने, जैसा हम बता चुके हैं, अपने आप को अत्यन्त लज्जाजनक मूढ़ता के हवाले कर दिया। अब हम आगे बढ़ें — 91 "मनुष्यों का बलिदान करनेवाले बछड़ों को चूमें।" — हॉर्सली। 92 1 राजाओं 19:18। — fj.

होशे 13:3

3. इस कारण वे भोर के मेघ, और तड़के सूख जानेवाली ओस के समान होंगे, और उस भूसी के समान जो खलिहान पर से आँधी से उड़ जाती है, और चिमनी से निकलते हुए धुएँ के समान होंगे।

3. Propterea erunt quasi nubes matutina, quasi ros mane exoriens, transiens quasi palea quae ex area projicitur, et quasi fumus e fumario, (Nam {}ארבהaccipitur hoc sensu: significat quidem fenestram, sed est vaporarium camini.)

भविष्यद्वक्ता यहाँ इस्राएल की दशा दिखाने के लिये चार उपमाओं का प्रयोग करता है। चाहे वे कुछ समय तक कितने ही फले-फूले हों, और सुखी समझे गए हों, तौभी उनकी दशा मुरझानेवाली और क्षणभंगुर होगी। वह कहता है, वे भोर के मेघ के समान होंगे: चाहे वे कितना ही ऊँचा घमण्ड करें, तौभी प्रभु उनकी जो कुछ भी सामर्थ्य हो उसे झाड़ देगा। दूसरे, वे उस ओस के समान होंगे जो भोर को उठती है — जिसमें कुछ भी ठोस नहीं होता। तीसरे, वे उस भूसी के समान होंगे जो खलिहान पर से आँधी द्वारा उड़ा दी जाती है। और अन्त में, वह कहता है, वे धुएँ के समान होंगे; क्योंकि जैसे धुआँ घना अन्धकार उत्पन्न करता है, और चिमनी से निकलने के बाद बिखरकर लुप्त हो जाता है, वैसे ही ये घमण्डी लोग, चाहे उन्होंने अपनी कितनी ही प्रशंसा की हो, स्थायी दशा में बने न रहेंगे।

इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि इस्राएली मृतकों के इतने समान नहीं थे कि उनमें कुछ सामर्थ्य शेष न रही हो: क्योंकि अन्यथा परमेश्वर का यह धमकी देना व्यर्थ होता कि वे मेघ, और ओस, और भूसी, और धुएँ के समान कर दिए जाएँगे: परन्तु वे पहले ही बहुत कुछ नष्ट हो चुके थे। और परमेश्वर यहाँ उन पर पूर्ण विनाश की घोषणा करता है, जिससे वे यह न सोचें कि वे अन्तिम दण्ड पहले ही भुगत चुके हैं, और यह न समझें कि वे फिर से नया बल प्राप्त कर सकते हैं: क्योंकि घमण्डी मनुष्य व्यर्थ भरोसा रखते हैं, जिसके द्वारा वे परमेश्वर के न्याय को अपने से दूर हटा देते हैं। अतः इसलिए कि वे ऐसे प्रलोभनों से अपने आप को धोखा न दें, भविष्यद्वक्ता यहाँ घोषणा करता है कि उनकी दशा मुरझानेवाली होगी, ऐसी जो शीघ्र ही विनाश को पहुँचेगी। आगे लिखा है —

होशे 13:4-5

4. मैं तो मिस्र देश ही से तेरा परमेश्वर यहोवा हूँ; तू मुझे छोड़ किसी को परमेश्वर करके न जानना; क्योंकि मेरे सिवा कोई तेरा उद्धारकर्ता नहीं।

4. Et ego Jehova Deus tuus e terra Aegypti, et Deum extra me non cognosces, et

Servator nemo praeter me.

5. मैं ने उस समय तुझ पर मन लगाया जब तू जंगल में, वरन् अत्यन्त सूखे देश में था।

5. Ego cognovi te in leserto, in terra siccitatum (hoc est, in terra arida.)

भविष्यद्वक्ता अब उस वाक्य को दोहराता है जिस पर हम पिछले अध्याय में ध्यान दे चुके हैं, ताकि प्रजा के पाप को और बढ़ाकर दिखाए। क्योंकि यदि उन्होंने कभी खरी शिक्षा न जानी होती, यदि वे कभी व्यवस्था में पाले-पोसे न गए होते, तो उनके दोष को हल्का करने का कुछ बहाना होता; क्योंकि वे यह कहकर अपने आप को निर्दोष ठहरा सकते थे कि उन्होंने सच्चा धर्म कभी नहीं जाना था, इसलिए वे मनुष्यों की साधारण रीति के अनुसार भटक गए थे; परन्तु जब उन्हें बचपन से ही खरी शिक्षा दी गई थी, जब परमेश्वर ने उन्हें मानो अपनी ही गोद में पाला था, जब उन्होंने अपने आरम्भिक वर्षों से ही सीख लिया था कि परमेश्वर की शुद्ध उपासना करना क्या है, तो जब वे इस प्रकार अन्यजातियों के अन्धविश्वासों की ओर फिर गए, तब उनके लिये क्या बहाना हो सकता था? अतः हम इस शिकायत का आशय देखते हैं, जब परमेश्वर कहता है कि वह मिस्र देश ही से इस्राएल का परमेश्वर रहा था।

अतः वह कहता है, मैं यहोवा तुम्हारा परमेश्वर हूँ। अपने आप को यहोवा कहकर वह उनके सब गढ़े हुए देवताओं की ओर संकेत करता है; मानो उसने कहा हो, "निःसन्देह मैं न्याय से, और अपने ही अधिकार से तुम्हारा परमेश्वर हूँ; क्योंकि मैं स्वयंभू हूँ — मैं जगत का सृष्टिकर्ता हूँ, कोई मेरी सामर्थ्य छीन नहीं सकता: परन्तु इन देवताओं को अपना ईश्वरत्व कहाँ से मिला, सिवाय मनुष्यों के पागलपन के?" वह आगे कहता है, हे इस्राएल, मैं तेरा परमेश्वर हूँ; अर्थात्, "मिस्र देश ही से, तेरे जन्म ही से, मैं ने अपने आप को तुझ पर प्रकट किया है। जब मैं ने तुझे मिस्र से छुड़ाया, तब मैं तुझे मानो गर्भ से जीवन के उजियाले में निकाल लाया; क्योंकि मिस्र तेरे लिये कब्र के समान था। जब मैं ने तेरी ओर अपना हाथ बढ़ाया, तब तू जीने लगा, और किसी प्रकार की एक प्रजा बनने लगा।"

और अब उस बात पर भी ध्यान देना चाहिए जो मैं पहले कह चुका हूँ, कि प्रजा इस शर्त पर छुड़ाई गई थी कि वह अपने आप को पूरी रीति से परमेश्वर को समर्पित कर दे। जैसे आज के दिन हम मसीह के हैं, और हम में से किसी को अपनी इच्छा के अनुसार नहीं जीना चाहिए, क्योंकि मसीह इसी लिये मरा और फिर जी उठा कि वह जीवितों और मृतकों दोनों का प्रभु हो: वैसे ही उस समय भी इस्राएली परमेश्वर द्वारा इसलिए छुड़ाए गए थे कि वे अपने आप को पूरी रीति से उसे अर्पित कर दें। और जब परमेश्वर इसी अधिकार से इस्राएल की प्रजा पर शासन करता था, तो जब प्रजा ने जान-बूझकर अपने आप को अन्यजातियों के अन्धविश्वासों के हवाले कर दिया, तब उनका यह धर्मत्याग कितना लज्जाजनक और अक्षम्य था?

वह कहता है, मुझे छोड़ तुझे किसी को परमेश्वर करके नहीं जानना चाहिए। ये शब्द भविष्यद्वक्ता ने पहले प्रयुक्त नहीं किए थे। अतः यह वाक्य अधिक पूर्ण है, क्योंकि यह उसकी कही हुई बात के आशय को और स्पष्टता से समझाता है, कि परमेश्वर ने इस्राएल को मिस्र से निकालकर अपने लिये मोल लिया था, अर्थात् यह कि इस्राएल को इसी एक छुड़ानेवाले से सन्तुष्ट रहना चाहिए था, और अपने लिये दूसरे देवता नहीं ढूँढ़ने चाहिए थे। अतः, मुझे छोड़ तू किसी को परमेश्वर करके न जानना। क्योंकि यदि यह एक परमेश्वर अपनी प्रजा को छुड़ाने के लिये पर्याप्त था, तो अब प्रजा का क्या अभिप्राय है, जब वह भटकती है, और इधर-उधर सहायता ढूँढ़ती है? क्योंकि उन्हें वह जीवन, जो उन्होंने उससे पाया था और जिसका वे अब आनन्द ले रहे हैं, परमेश्वर को लौटाना चाहिए था, और यह मानना चाहिए था कि वे उसकी रक्षा में पर्याप्त रूप से सुरक्षित हैं। अब हम देखते हैं कि यह क्यों जोड़ा गया, मुझे छोड़ तू किसी को परमेश्वर करके न जानना।

इसकी पुष्टि करनेवाला एक कारण आगे आता है: वह कहता है, क्योंकि मेरे सिवा कोई उद्धारकर्ता नहीं। संयोजक {,}וvau को यहाँ कारणवाचक समझना चाहिए, क्योंकि कोई नहीं, इत्यादि, या, निश्चय ही मेरे सिवा कोई उद्धारकर्ता नहीं। और यह एक उल्लेखनीय स्थल है; क्योंकि इससे हम सीखते हैं कि परमेश्वर की उपासना शब्दों में नहीं, वरन् विश्वास, और आशा, और प्रार्थना में है। आज के पोपवादी समझते हैं कि वे परमेश्वर की उपासना को अपवित्र नहीं करते, यद्यपि वे प्रतिमाओं की शरण लेते हैं, यद्यपि वे मृत मनुष्यों से प्रार्थना करते हैं, यद्यपि वे अपनी आशाओं की पूर्ति के लिये इधर-उधर ताकते हैं। कैसे? क्योंकि वे सदा एकमात्र सच्चे परमेश्वर को बनाए रखते हैं, अर्थात् वे परमेश्वर का नाम क्रिस्टोफ़र या एन्टनी को नहीं देते। पोपवादी अपने आप को सब दोष से मुक्त समझते हैं, क्योंकि परमेश्वर अपना नाम बनाए रखता है। परन्तु हम देखते हैं कि प्रभु इस विषय को कितनी भिन्न दृष्टि से देखता है। वह कहता है, "मैं ही एकमात्र सच्चा परमेश्वर हूँ।" यह कैसे? "क्योंकि मैं ही एकमात्र उद्धारकर्ता हूँ: अपने लिये कोई दूसरा परमेश्वर न गढ़, क्योंकि तुझे कोई ऐसा न मिलेगा जो तेरा उद्धार करे।" अतः परमेश्वर उस आदर को विशेष मूल्य देता है जो आशा और प्रार्थना के द्वारा उसे दिया जाना चाहिए; अर्थात्, जब हमारा प्राण केवल उसी पर टिका रहता है, और जब हम किसी और से नहीं, केवल उसी से उद्धार ढूँढ़ते और उसकी आशा रखते हैं। अतः हम देखते हैं कि इस स्थल में निहित शिक्षा कितनी उपयोगी है, जिसमें भविष्यद्वक्ता स्पष्ट दिखाता है कि इस्राएलियों ने अपने लिये दूसरा देवता गढ़कर बेतुका और लज्जाजनक काम किया, क्योंकि एक सच्चे परमेश्वर को छोड़ कोई उद्धारकर्ता नहीं मिल सकता।

इसके बाद वह जोड़ता है, मैं ने जंगल में, सूखे देश में तुझे जाना। परमेश्वर यहाँ इस सत्य की पुष्टि करता है कि इस्राएलियों ने अपने मन दूसरे देवताओं की ओर लगाकर अत्यन्त बेतुका काम किया था, क्योंकि उसने स्वयं उन्हें जाना था। यहाँ जिस ज्ञान का उल्लेख है वह दोहरा है, मनुष्यों का और परमेश्वर का। परमेश्वर घोषणा करता है कि जब प्रजा जंगल में थी तब उसने उसकी चिन्ता की; और वह अपनी पितृवत् देखभाल को "ज्ञान" शब्द से व्यक्त करता है: मैं ने तुझे जाना; अर्थात्, "उस समय मैं ने तुझे अपने लिये एक प्रजा चुन लिया, और अपने आप को तुझ पर आत्मीयता से प्रकट किया, मानो तू मेरा घनिष्ठ मित्र हो। परन्तु तब यह भी आवश्यक था कि तू भी मुझे जाने।" यह मनुष्यों का ज्ञान है। अब जब मनुष्य परमेश्वर द्वारा जाने गए हैं, तो वे अपनी सारी शक्तियाँ क्यों नहीं लगाते, कि वे उसी पर स्थिर बने रहें? क्योंकि जब वे उन्हें दूसरी वस्तुओं की ओर मोड़ते हैं, तो वे जहाँ तक उनसे हो सके, परमेश्वर के इस उपकार को बुझा देते हैं। पौलुस भी गलातियों से इसी प्रकार कहता है, 'तुम ने परमेश्वर को पहचान लिया, वरन् परमेश्वर ने तुम को पहचाना,' (गलातियों 4:9।)

पहले उपवाक्य में वह दिखाता है कि सुसमाचार का उजियाला उन्हें दिए जाने के बाद विभिन्न युक्तियों की ओर फिरकर उन्होंने बड़ी दुष्टता की थी: परन्तु अगले उपवाक्य में, जब वह कहता है, 'वरन् परमेश्वर ने तुम को पहचाना,' तब वह उनके पाप को और बढ़ा देता है; मानो उसने कहा हो, "परमेश्वर ने अपनी सेंतमेंत भलाई से तुम से पहल की है। अतः जब परमेश्वर ने इस प्रकार पहले तुम्हें जाना है, और पहले तुम पर अपना अनुग्रह किया है, तो बदले में उसे जानने का यत्न न करने में अब तुम्हारी कृतघ्नता कितनी बड़ी और कितनी लज्जाजनक है?" अब हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने क्यों जोड़ा कि इस्राएली जंगल में, सूखे देश में परमेश्वर द्वारा जाने गए थे।

और जंगल का स्पष्ट उल्लेख किया गया है: क्योंकि उस समय यह आवश्यक था कि प्रजा का पालन प्रभु द्वारा आश्चर्यकर्म से हो; क्योंकि यदि परमेश्वर स्वर्ग से मन्ना न बरसाता, और पीने के लिये जल भी न देता, तो प्रजा अवश्य ही दुर्दशा से नाश हो जाती। अतः जब परमेश्वर ने प्रकृति के साधारण क्रम के विपरीत इस प्रकार प्रजा को सम्भाला, यहाँ तक कि उसकी पितृवत् देखभाल के बिना जीवन की कोई आशा न हो सकती थी, तो भविष्यद्वक्ता अब उचित रूप से जोड़ता है, जंगल में, सूखे देश में; अर्थात्, उस सूखे निर्जन स्थान में, जहाँ अन्न का एक दाना भी नहीं उगता था, यहाँ तक कि प्रजा तब तक जीवित न रह सकती थी जब तक परमेश्वर मानो अपने ही हाथ से उन्हें भोजन देकर उनके मुँह में न डालता। अब हम देखते हैं कि यहाँ प्रजा की चरम अभक्ति स्पष्ट रूप से सिद्ध की गई है; क्योंकि परमेश्वर की व्यवस्था में शिक्षा पाकर, और इतने उपकारों से प्रोत्साहित होकर भी, वे अपवित्र अन्धविश्वासों के पीछे भटक गए। और साथ ही भविष्यद्वक्ता जोड़ता है —

होशे 13:6

6. परन्तु जब इस्राएली चराए जाते थे और वे तृप्त हो गए, तब तृप्त होने पर उनका मन घमण्ड से भर गया; इस कारण वे मुझ को भूल गए।

6. Juxta 93 pascua sua et satiati sunt, saturati sunt, et elevatum est cor ipsorum; propterea obliti sunt mei.

भविष्यद्वक्ता यहाँ दिखाता है कि प्रजा हर प्रकार से अवश थी। उसने सचमुच इस विषय पर अन्य स्थानों में भी विचार किया है; परन्तु यह दोहराना व्यर्थ नहीं है।

यह कहने के बाद कि प्रजा कृतघ्न थी, क्योंकि वह अपने छुड़ानेवाले की सेवा में बनी न रही, जिसने जंगल में उसके साथ इतनी दया और उदारता का व्यवहार किया था, जहाँ वे भूख और अभाव से अवश्य नाश हो जाते यदि प्रभु उनकी बड़ी आवश्यकता में असाधारण रीति से उनकी सहायता न करता, अब वह जोड़ता है, "प्रभु तुम्हें अन्य साधनों से भी आकर्षित करता, यदि तुम्हारा स्वभाव पूरी रीति से जंगली और बर्बर न होता: परन्तु इससे यह प्रकट है कि तुम सर्वथा आज्ञा न माननेवाले हो; क्योंकि जंगल से निकाले जाने के बाद तुम उपजाऊ चराइयों में आए।" क्योंकि इस्राएल देश की तुलना यहाँ हरी-भरी और उपजाऊ चराइयों से की गई है; मानो उसने कहा हो, "परमेश्वर ने तुम्हें ऐसे निज भाग में रखा है जहाँ तुम भरपेट खा सको, जैसे कोई चरवाहा अपनी भेड़ों को किसी विशेष उपजाऊ स्थान पर ले जाता है।" तब क्या हुआ? वे अपनी चराइयों में आए, और तृप्त हो गए; वे तृप्त हो गए, और उनका मन ऊँचा हो गया, और वे मुझे भूल गए।

अतः जब इस्राएलियों ने, प्रभु द्वारा जंगल में भूख के समय खिलाए जाने के बाद, अपने छुटकारे की स्मृति को बुझा दिया, और जब उन्होंने अपनी तृप्ति में परमेश्वर को त्याग दिया, और उसका जूआ उतार फेंका, और उग्र घोड़ों के समान उसके विरुद्ध लात मारी, तो यह प्रकट हो गया कि उनका स्वभाव ऐसा अवश था कि वे किसी भी रीति से आज्ञाकारिता या अधीनता में नहीं लाए जा सकते थे। शेष हम कल तक के लिये स्थगित करेंगे।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जैसे तू प्रतिदिन अपने शब्द के द्वारा हमें इतनी कृपा से बुलाता है कि हम नम्रता और शान्ति से अपने आप को तेरे शासन के अधीन कर दें, और जबकि तू ने हमें शैतान के भय से, और उस अत्याचार से जिसने हमें दयनीय भय में रखा था, छुड़ाकर आदर के ऊँचे पद तक उठाया है, और हमें लेपालकपन और आशा का आत्मा भी प्रदान किया है, — हाँ, यह वरदान दे कि हम इन उपकारों को स्मरण रखते हुए सदा अपने आप को तेरे अधीन करें, और केवल इसी उद्देश्य से अपना शब्द ऊँचा करने की इच्छा रखें कि सारा जगत तेरे अधीन हो जाए, और जो अब तेरे विरुद्ध भड़कते हुए दिखाई देते हैं वे भी अन्त में, हमारे समान, तेरी आज्ञाकारिता में लाए जाएँ, जिससे तेरा पुत्र मसीह सब का प्रभु हो, ताकि केवल तू ही महान ठहरे, और हम तेरे अधीन किए जाएँ, और अन्त में ऊपर उठाए जाकर उस महिमा के सहभागी हों जो हमारे प्रभु मसीह के द्वारा हमारे लिये प्राप्त की गई है। आमीन।

पैंतीसवाँ व्याख्यान

कल के व्याख्यान में हमने देखा कि इस्राएली दोषी ठहराए गए थे, क्योंकि जब वे उपजाऊ चराइयों में खिलाए गए तब वे उत्तेजित घोड़ों के समान हो गए; और प्रायः ऐसा ही होता है। और स्वयं मूसा ने भी अपने गीत में यह पहले से कहा था, 'मेरा चुना हुआ मोटा होकर मेरे विरुद्ध लात मारने लगा,' (व्यवस्थाविवरण 32:15।) 93 बहुत सी हस्तलिपियों में "चराइयों" शब्द से पहले {,{בbeth है, ,{}כcaph के स्थान पर। परन्तु इस पद के पहले दो शब्दों को पिछले पद के साथ जोड़ना, जैसा बिशप हॉर्सली करता है, निश्चय ही ठीक नहीं है; क्योंकि इससे यहाँ स्पष्ट रूप से संकेतित दो भिन्न समय आपस में गड्डमड्ड हो जाते हैं। यद्यपि कैल्विन इस में, जैसे कुछ अन्य उदाहरणों में भी, व्याकरणिक रचना का निर्णय नहीं करता, तौभी वह स्थल का वास्तविक अर्थ प्रस्तुत करता है। परमेश्वर कहता है कि उसने इस्राएल की प्रजा को जाना, जंगल में भी और "उनकी चराइयों में" भी; अर्थात्, कनान के उपजाऊ देश में; और फिर वह उस प्रभाव का वर्णन करता है जो उनकी चराइयों ने उन पर डाला। {}כ के स्थान पर {}ב रखने के पक्ष में यह बात है कि पिछले पद में "जंगल" और "सूखे देश" से पहले पहला ही अक्षर प्रयुक्त हुआ है। इस पद के आरम्भ में "जानना" क्रिया समझ लेनी चाहिए। दोनों पद, 5 और 6, इस प्रकार अनूदित किए जा सकते हैं: — 5. मैं ने तुझे जंगल में जाना, सूखे देश में; 6. उनकी चराइयों में भी, जब वे तृप्त हुए; वे तृप्त हुए, और उनका मन ऊँचा हो गया; इस कारण वे मुझे भूल गए। "तू" से "वे" में पुरुष का परिवर्तन इस पूरी पुस्तक में सामान्य है। — सं.

भविष्यद्वक्ता ने जो कहा था वह अब पूरा हो गया था; तृप्ति ने इस्राएल की प्रजा में उग्रता उत्पन्न कर दी थी। वह कहता है, अपनी चराइयों के अनुसार वे भर गए; वे तृप्त हो गए, और उनका मन फूल उठा। यहेजकेल सदोम के विषय में भी यही घोषित करता है: जब उनका पेट भली भाँति भर गया, तब वे घमण्डी हो गए (यहेजकेल 16:49)। परन्तु वहाँ भविष्यद्वक्ता मनुष्यों के प्रति उनकी क्रूरता की चर्चा करता है; क्योंकि वह कहता है कि सदोमी, जब सब आशीषों से भरपूर थे, तब क्रूरता से भरे हुए थे, यहाँ तक कि वे कंगालों को तिरस्कार से तुच्छ जानते थे। परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ इस्राएल की प्रजा में इससे भी बुरी बात को दोषी ठहराता है, क्योंकि उनका मन परमेश्वर के विरुद्ध घमण्ड से फूल उठा था।

और अन्त में उनके परमेश्वर को भूल जाने का उल्लेख किया गया है। यह असम्भव है कि जब मनुष्य हठीले आत्म-भरोसे से अन्धे हो जाते हैं, तब वे परमेश्वर का सारा भय और धर्म की सारी चिन्ता को उतार न फेंकें। और यह स्थल हमें सिखाता है कि हमें अपनी बहुतायत का उपयोग संयम और मितव्ययिता से करना चाहिए, और सबसे पहले हमें चौकस रहना चाहिए कि कहीं परमेश्वर की उदारता हम में उसकी विस्मृति न ले आए। क्योंकि यह अत्यन्त बड़ी विकृति है कि जितनी अधिक बहुतायत से परमेश्वर अपने दान हम पर उण्डेलता है, उतने ही अधिक हमारे हृदय संकुचित हो जाएँ, और उसके उपकार हमारी आँखों को ढाँकनेवाले परदों के समान बन जाएँ। अतः हमें यह यत्न करना चाहिए कि इसके विपरीत परमेश्वर के उपकार हमारे मनों में उसके स्मरण को नया करें: और फिर, जैसा मैंने कहा है, संयम और मितव्ययिता भी उसके साथ जुड़ी रहें। अब हम आगे बढ़ें —

होशे 13:7-8

7. इस कारण मैं उनके लिये सिंह सा बनूँगा; मैं चीते के समान मार्ग में उनकी ताक में रहूँगा:

7. Et ero illis tanquam leo, tanquam pardus in via Assur (vel, aspiciam, vel, insidiabor, ut alii vertunt.)

8. मैं बच्चे छीनी हुई रीछनी के समान उनसे मिलूँगा, और उनके हृदय की झिल्ली को फाड़ डालूँगा, और वहाँ सिंह के समान उनको खा डालूँगा: वनपशु उनको फाड़ डालेगा।

8. Occurram illis tanquam ursus orbatus (suis parvulis scilicet;) et disrumpam clausuram cordis eorum; vorabo eos quasi leo; 94 bestia agri scindet (vel, lacerabit) ipsos.

भविष्यद्वक्ता फिर से इस्राएलियों पर परमेश्वर के पलटे की घोषणा करता है; और क्योंकि वे अपनी ही चापलूसियों के कारण जड़ हो गए थे, जैसा हम पहले भी बार-बार देख चुके हैं, इसलिए वह यहाँ परमेश्वर के भयानक न्याय का वर्णन करता है, कि हठीलों के मन में भय उत्पन्न करे, जिससे वे अन्ततः यह समझें कि उनका काम परमेश्वर से है, और उसकी सामर्थ्य से डरने लगें। और जैसा हम कह चुके हैं, जब भविष्यद्वक्ता कपटियों को जगाना चाहते थे, तब यह अत्यन्त आवश्यक था; क्योंकि आत्म-भरोसा उन्हें ऐसा मतवाला कर देता है कि वे परमेश्वर की सारी धमकियों को तुच्छ जानने में तनिक भी नहीं हिचकते: और यही कारण है कि वह ये तीन उपमाएँ अपनाता है। पहले वह परमेश्वर की तुलना सिंह से करता है, फिर चीते से, और फिर रीछ से। वह कहता है, मैं सिंह सा, चीते सा, और फिर रीछ सा बनूँगा। 94 कुछ लोग इसका अनुवाद "सिंहनी" करते हैं, परन्तु इस स्थल के साथ यह अधिक मेल खाता है कि इसका अनुवाद "सिंह" किया जाए, जिसका अर्थ, जैसा इसके नाम {,{לביאlabia से समझा जाता है, एक क्रूर बूढ़ा सिंह है। पिछले पद में जो शब्द है वह ,{}שחל shechel है, जिसका अर्थ एक भयंकर सिंह है। इस प्रकार प्रभु अपनी तुलना सिंह-जाति की सबसे अधिक फाड़-खानेवाली और सबसे भयंकर जाति से करता है। इब्रियों के पास सिंहों के लिए और भी नाम हैं, जो उनके विशेष स्वभाव और उनकी आयु को सूचित करते हैं। ,{}כפירcaphir जवान सिंह है; ,{}אריהarie पूरा बढ़ा हुआ और अहेरी सिंह; ,{}שחףshichets मध्य आयु का भयंकर सिंह; और ,{}לישlice बूढ़ा सिंह। यहाँ उल्लिखित दोनों के विषय में, स्थल के अर्थ के अनुसार, एक क्रमिक वृद्धि है। पहला, पद 7 में, मध्य आयु का साहसी और उग्र सिंह है; परन्तु दूसरा, पद 8 में, उससे भी अधिक आयु का है, परन्तु अपना बल बनाए हुए, और उससे भी अधिक उग्र और फाड़-खानेवाला है। — सं.

हम जानते हैं कि परमेश्वर अपने स्वभाव में दयालु और कृपालु है; जब वह कहता है कि वह सिंह के समान होगा, तो वह मानो एक दूसरा रूप धारण करता है; परन्तु यह मनुष्यों की दुष्टता के कारण किया जाता है, जैसा भजन संहिता 18 में कहा गया है, 'दयावन्त के साथ तू अपने को दयावन्त दिखाता; और टेढ़े के साथ तू तिरछा बनता है।'

क्योंकि यद्यपि परमेश्वर अपने भविष्यद्वक्ता के द्वारा कड़ाई और कठोरता से बोलता है, तौभी वह उस बात को प्रकट करता है जिसे हमें स्मरण रखना चाहिए, अर्थात् यह कि वह इस प्रकार इसलिए बोलता है क्योंकि हम उसे अपने स्वभाव के अनुसार, अर्थात् कोमलता और कृपा से, हमारे साथ व्यवहार करने नहीं देते; और जब वह हमें हठीले और अवश देखता है, तब वह हमारे साथ (यों कहें) वैसी ही हठधर्मिता से विवाद करता है; इसलिए नहीं कि टेढ़ापन वास्तव में परमेश्वर का गुण है, वरन् वह यह उपमा मनुष्यों से उधार लेता है, और इस कारण कि जब वह मनुष्यों से अप्रसन्न हो, तब वे अपने आप की चापलूसी करते न रहें। इसलिए मैं सिंह सा, मार्ग में चीते सा बनूँगा।

जहाँ तक "अश्शूर" शब्द का सम्बन्ध है, व्याख्याकार इसे विभिन्न रीतियों से लेते हैं। कुछ इसका अनुवाद अश्शूर देश करते हैं, यद्यपि यहाँ यह कामेत्स के साथ लिखा गया है: परन्तु इब्री इसे किसी स्थान या देश का नाम नहीं, वरन् एक जातिवाचक शब्द मानते हैं। फिर कुछ इसका अनुवाद यों करते हैं, "मैं उन पर दृष्टि रखूँगा," और इसे {,}שורshur से निकालते हैं, और {}אaleph को भविष्यत् काल का सूचक मानते हैं।

दूसरे इसे {,}אשרasher से निकालते हैं, और चाहते हैं कि यह पुआल रूप में हो: और यहाँ वे फिर आपस में मतभेद रखते हैं। कुछ इसका अनुवाद करते हैं, "मैं उनके लिए घात लगाऊँगा:" और दूसरे समझते हैं कि यह शोआर है, "मैं चीते के समान घात लगानेवाला बनूँगा।" परन्तु स्थल के अर्थ की दृष्टि से इस भिन्नता का बहुत थोड़ा महत्त्व है; क्योंकि हम भविष्यद्वक्ता के उद्देश्य की दिशा को देखते हैं। वह यहाँ कपटियों से उनका व्यर्थ भरोसा छीन लेना चाहता है, और उन्हें परमेश्वर के उस पलटे की आशंका से भयभीत करना चाहता है जो सिर पर आ पहुँचा था। इसलिए वह कहता है कि यद्यपि परमेश्वर ने अब तक उन्हें छोड़ रखा था, वरन् एक प्रकार से कृपापूर्वक उनका पालन-पोषण किया था, तौभी क्योंकि वे उसके कोप को भड़काते रहे, इसलिए उनकी दशा शीघ्र ही बहुत भिन्न हो जाएगी; क्योंकि वह सिंह के समान उन पर चढ़ आएगा; अर्थात् वह अत्यन्त प्रचण्डता से उन पर झपटेगा; वह चीते के समान भी होगा: और हम जानते हैं कि चीता अत्यन्त क्रूर पशु है: और अन्त में, वह उसकी तुलना बच्चे छीनी हुई रीछनी से, या बच्चे छीने हुए रीछ से करता है।

परन्तु इसके बाद वह जोड़ता है, मैं उनके हृदय के घेरे को फाड़ूँगा, या चीर डालूँगा। जो लोग हृदय के घेरे से उनकी हठीली कठोरता समझते हैं, वे भविष्यद्वक्ता के शब्दों पर आवश्यकता से अधिक बारीकी करते जान पड़ते हैं। हम जानते तो हैं कि भविष्यद्वक्ता कभी-कभी इस प्रकार की बोली का प्रयोग करते हैं; क्योंकि वे उस हृदय को कठोर हृदय, या चर्बी से ढँका हुआ हृदय कहते हैं, जो कोमल नहीं होता और खरी शिक्षा को स्वेच्छा से ग्रहण नहीं करता। परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ रीछ की क्रूरता की ओर ही अधिक संकेत करता है, जब वह कहता है, मैं हृदय की झिल्ली को फाड़ूँगा या टुकड़े-टुकड़े करूँगा, और सिंह के समान तुम्हें खा डालूँगा।

क्योंकि मृत्यु का सबसे क्रूर प्रकार वह है, जब सिंह अपने पंजों और दाँतों से सीधे हृदय पर ही वार करता है और मनुष्य की अन्तड़ियों को फाड़ डालता है। इसलिए भविष्यद्वक्ता मृत्यु के इसी अत्यन्त क्रूर प्रकार का चित्रण करना चाहता था। वह कहता है, "इसलिए मैं हृदयावरण को, अर्थात् हृदय के घेरे को, चीर डालूँगा।" साथ ही मैं यह नहीं कहता कि भविष्यद्वक्ता अपनी उपमा को बनाए रखते हुए प्रजा की कठोरता की ओर संकेत नहीं करता।

और मैदान का पशु उनको फाड़ डालेगा। अब वह बिना उपमा के बोलता है; क्योंकि परमेश्वर का अर्थ यह है कि सब वनपशु उसका न्याय पूरा करने के लिए उसके सेवक होंगे। मानो वह कहता है, "तब मैं मैदान के सब पशुओं को उन्हें फाड़ने और चीरने के लिए भेजूँगा, यहाँ तक कि उनमें से कुछ भी सुरक्षित न बचेगा।" अब हम इस स्थल का आशय देखते हैं, और यह भी कि इसे किस उपयोग में लाना चाहिए। यदि हम स्वभाव से ऐसे आलसी, वरन् लापरवाह हैं, और जब परमेश्वर हमें नहीं उकसाता तब हम अपने ही भ्रमों में मग्न रहते हैं, तो हमें उन लाक्षणिक चित्रणों पर ध्यान देना चाहिए जो हमारी सुस्ती को झाड़ देने और हमें यह दिखाने के लिए हैं कि परमेश्वर का न्याय कितना भयानक है। इसी उद्देश्य से अनन्त आग और कभी न मरनेवाले कीड़े के विषय में वे रूपक भी दिए गए हैं। क्योंकि परमेश्वर ने मनुष्यों की भावनाओं को ऐसा जड़ देखकर पवित्रशास्त्र में वे बातें प्रयुक्त की हैं जो उनकी सुस्ती को सुधार सकें। अतः जब कभी परमेश्वर ऐसा रूप धारण करता है जो उसका अपना नहीं है, तो हम जान लें कि यह हमारे ही दोष के कारण है; क्योंकि हम उसे अपने स्वभाव के अनुसार हमारे साथ व्यवहार करने नहीं देते, इसलिए कि हम अवश हैं। आइए हम आगे बढ़ें —

होशे 13:9-11

9. हे इस्राएल, तू ने अपने आप को नाश किया है; परन्तु तेरी सहायता मुझ ही में है।

9. Perdidit te Israel; quia in me auxilium tuum. 95

10 मैं तेरा राजा रहूँगा: तेरे सब नगरों में और कौन है जो तुझे बचाए? और तेरे न्यायी कहाँ हैं, जिनके विषय में तू ने कहा था, मुझे राजा और हाकिम दे?

10 Ero: Rex tuus ubi, ut servet te in cunctis urbibus tuis, et judices tui, de quibus dixisti, Da mihi regem et principes?

11 मैं ने अपने क्रोध में तुझे राजा दिया, और अपनी जलजलाहट में उसे हटा लिया।

11 Dabo tibi (hoc est), Dedi tibi regem in ira mea, et sustuli in furore meo.

पहले तो परमेश्वर इस्राएलियों को इस बात के लिए धिक्कारता है कि उन्होंने अपने टेढ़ेपन में उस सब को ठुकरा दिया जो उनकी रक्षा के लिए दिया गया था: परन्तु वह और आगे बढ़कर कहता है कि वे आशा से परे हो चुके थे, और यह कि एक छिपा हुआ कारण था जिसने परमेश्वर को उनकी सहायता करने और अत्यन्त संकट में पड़े होने पर उन्हें सहारा पहुँचाने से रोक रखा था।

वह कहता है, हे इस्राएल, उसने तुझे नाश किया है। कुछ लोग मानते हैं कि यहाँ "बछड़ा" शब्द अध्याहृत है, "बछड़े ने तुझे नाश किया है:" परन्तु यह खींचतान है। दूसरे समझते हैं कि यहाँ पुरुष का परिवर्तन है: और मैं इसी मत को अपनाने की ओर झुकता हूँ, क्योंकि हम जानते हैं कि बोलने की यह रीति बहुत प्रचलित है: तुझे नाश किया है इस्राएल ने; तू अपने ही विनाश का कारण है, अर्थात् "इस्राएल ने अपने आप को नाश किया है।" अतः यद्यपि यहाँ अन्य पुरुष की क्रिया है, और उसके बाद मध्यम पुरुष का एक प्रत्यय-सर्वनाम जोड़ा गया है, तौभी हम इस स्थल का अनुवाद यों कर सकते हैं, "इस्राएल ने अपने आप को नाश किया है।" फिर भी, जब मैं प्रत्येक बात को और भी पूर्णता से तौलता हूँ, तो मुझे लगता है कि यदि इस स्थल को अनिश्चित रूप में लिया जाए तो इसकी व्याख्या अधिक अच्छी और उपयुक्त होगी: "हे इस्राएल, किसी वस्तु ने तुझे नाश किया है:" मानो वह कहता हो, "अब पूछ-ताछ कर कि किसने तुझे नाश किया है।"

95 बिशप हॉर्सली का इस पद का अनुवाद, जो रिवेट का भी था, यह है — "हे इस्राएल, यही तेरा विनाश है कि तेरी सहायता करना मुझ पर (ही निर्भर) है।" वह एक टिप्पणी में जोड़ता है — "केवल परमेश्वर को अपनी रक्षा के लिए पाना तेरा महान विशेषाधिकार है, वही तेरे विनाश का अवसर बन जाता है। अपने क्रोध में मैंने अपनी विशेष सहायता हटा ली; और क्योंकि मेरे द्वारा त्यागे जाने पर तेरा कोई दूसरा सहायक नहीं है, इसलिए तेरा सर्वनाश अवश्य होगा।" इस स्थल में, पहले वाक्यांश के विषय में, हमारा अनुवाद कैल्विन द्वारा दिए गए अनुवाद से अधिक उत्तम जान पड़ता है। क्रिया अन्य पुरुष में नहीं, वरन् मध्यम पुरुष में है। इसका अन्तिम मूल अक्षर {,{תtau है, और यही अक्षर मध्यम पुरुष का लक्षण है, और यहाँ यह दोहराया नहीं गया; इसका एक और उदाहरण हमें यहेजकेल 28:17 में मिलता है, {` }חכמתך{. }שהת'तू ने अपनी बुद्धि को बिगाड़ दिया है,' या 'नष्ट कर दिया है।' दूसरे वाक्यांश के विषय में हमारे अनुवाद की, और कैल्विन के अनुवाद की भी, शुद्धता पर सन्देह करने का कारण है। शब्दशः यह है, "यद्यपि मुझ में तेरी सहायता के लिए," जिसका अर्थ यह जान पड़ता है, "यद्यपि तेरी सहायता करना मेरे सामर्थ्य में था।" परन्तु यदि पद का पहला शब्द संज्ञा के रूप में लिया जाए, जैसा अनेक समीक्षक लेते हैं, तो पहला वाक्यांश पिछले पदों से सम्बन्धित माना जा सकता है। तब अर्थ यह होगा कि इस्राएल का विनाश ऐसा होगा, यद्यपि उसी समय उसके लिए परमेश्वर में सहायता थी, यदि वह उसे खोजता: — हे इस्राएल, ऐसा है तेरा विनाश! यद्यपि मुझ में तेरे लिए सहायता थी। फिर अगला पद आता है, — मैं वही रहूँगा: तेरा राजा, वह कहाँ है? इत्यादि। {}אהי को ,{}איה में बदलने का आधार बहुत थोड़ा है, केवल एक हस्तलिपि, और दूसरी संदिग्ध: और इसकी कोई आवश्यकता नहीं, वरन् इससे अर्थ बिगड़ ही जाता है। जिनेवा बाइबल में इसका अनुवाद है, 'मैं हूँ।' इब्रानी में भविष्यत् काल प्रायः भविष्य के साथ-साथ वर्तमान को भी समाविष्ट करता है। इसका पूरा अर्थ देने के लिए इसका अनुवाद यों करना चाहिए, 'मैं हूँ और रहूँगा,' अर्थात् तेरी सहायता; क्योंकि वह पहले कह चुका था कि उनके लिए उसमें सहायता थी। — सं.

अतः परमेश्वर यहाँ इस्राएल को कर्ता के रूप में नाम लेकर नहीं बताता, न वह किसी को उनके सर्वनाश का कर्ता ठहराता है; तौभी वह दिखाता है कि इस्राएल नष्ट हो चुका था, और यह कि उनके विनाश का कारण उसमें नहीं, वरन् किसी और में खोजना था। यही अर्थ है।

फिर यह है, हे इस्राएल, किसी वस्तु ने तुझे नाश किया है; क्योंकि मुझ में तेरी सहायता थी। परमेश्वर दिखाता और प्रमाणित करता है कि इस्राएल, जो अब तक सुरक्षित रखा गया था, अब अपने ही दोष से नष्ट हुआ है; क्योंकि परमेश्वर ने एक बार उस प्रजा को अपनाया था, और इसी उद्देश्य से कि वह उन पर अपना अनुग्रह दिखाता रहे। अतः यदि प्रजा की दुष्टता और कृतघ्नता बाधा न डालती, तो परमेश्वर निःसन्देह सदा अपने समान ही बना रहता, और उस प्रजा के प्रति उसकी भलाई एक निरन्तर और एकरूप धारा में बहती रहती।

दूसरे वाक्यांश में उसका यही अर्थ है, जब वह कहता है, मुझ में तेरी सहायता थी; जिसके द्वारा वह मानो यह कहता है, "यह कैसे हुआ, और इसका क्या कारण है, कि मैं अब अपनी सामान्य रीति के अनुसार तेरी सहायता नहीं करता? तू ने अब तक तो मुझे अपना छुड़ानेवाला पाया है: यद्यपि तू बार-बार बड़े और भारी संकटों से जूझता रहा, तौभी मैंने तुझे कभी नहीं छोड़ा; तू ने सदा मुझ से तत्पर सहायता पाई है। अब यह कैसे हुआ कि मैंने तुझे दूर फेंक दिया है, कि तू व्यर्थ ही पुकारता है, और कोई तेरी सहायता को नहीं आता? यह कैसे हुआ कि तू इस प्रकार त्याग दिया गया है, और मेरे हाथ से कोई भी राहत नहीं पाता, जैसी तू पाया करता था? और निःसन्देह मैं तुझे कभी न छोड़ता, यदि तू मुझे अवसर देता; परन्तु तू मेरे विरुद्ध द्वार बन्द कर देता है, और अपनी दुष्टता से मेरे अनुग्रह को ठुकरा देता है, यहाँ तक कि वह तुझ तक पहुँच नहीं सकता। तो इसका परिणाम यह है कि तू अब अपने ही दोष से नष्ट हुआ है:" अतः किसी वस्तु ने तुझे नाश किया है। वह यहाँ अनिश्चित रूप से बोलता है; परन्तु यह अधूरी छोड़ी हुई अभिव्यक्ति और भी अधिक बलवती है, जब वह दिखाता है कि इस्राएल अकारण ही चकित हुआ था, और उसने अकारण ही परमेश्वर से वाद-विवाद भी किया था। "अतः परमेश्वर से झगड़ने का कोई आधार नहीं, मानो उसने तेरी आशा को निष्फल कर दिया हो, और तेरी अभिलाषाओं और तेरी पुकार को तुच्छ जाना हो; परमेश्वर तो अपने आप से सुसंगत है, क्योंकि वह परिवर्तनशील नहीं है;" मानो वह कहता हो, "उनका विनाश किसी और कारण से है, और उन्हें जान लेना चाहिए कि कोई बाधा है जिसके कारण परमेश्वर उनकी सहायता के लिए अपना हाथ नहीं बढ़ाता, जैसा वह अब तक प्रायः करता आया है।"

अब हम भविष्यद्वक्ता का आशय समझते हैं: पहले वह यह लिखता है कि परमेश्वर अब तक प्रजा के लिए क्या रहा था; और फिर वह यह मानकर चलता है कि वह बदलता नहीं, वरन् उसकी भलाई एकरूप और कभी न थकनेवाली है। परन्तु क्योंकि उसने अब तक अपनी प्रजा की सहायता की थी, इसलिए वह निष्कर्ष निकालता है कि इस्राएल किसी और कारण से नष्ट हुआ, क्योंकि परमेश्वर ने उसे कोई सहायता नहीं पहुँचाई; क्योंकि यदि इस्राएल ने परमेश्वर की भलाई को बीच में न रोका होता, तो वह निश्चय ही पहले के समान बहती रहती। अतः यह प्रकट है कि उसका प्रवाह प्रजा की दुष्टता से रुक गया; क्योंकि उन्होंने मानो उसके मार्ग में एक रुकावट खड़ी कर दी।

और यह स्थल हमें सिखाता है कि मनुष्य अपनी विपत्तियों में व्यर्थ ही परमेश्वर के विरुद्ध चिल्लाते हैं: क्योंकि यदि वे अपने को दिए गए अनुग्रह को ठुकराते न हों, तो वह सदा उनकी सहायता करने को तत्पर रहता। अतः जब कभी परमेश्वर हमारी आवश्यकता में हमारी सहायता नहीं करता, और हमें अपने क्लेशों में मुरझाने, और मानो घुल-घुलकर क्षीण होने देता है, तो निःसन्देह यह इसलिए होता है कि हम उसके अनुग्रह को ग्रहण करने को तैयार नहीं, वरन् इसके विपरीत उसके मार्ग को रोकते हैं; जैसा यशायाह के द्वारा कहा गया है, "प्रभु का हाथ ऐसा छोटा नहीं हो गया कि उद्धार न कर सके, न मेरा कान ऐसा भारी हो गया है कि सुन न सके। वह कहता है, तुम्हारे पापों ने तुम्हारे और मेरे बीच एक मेड़ खड़ी कर दी है" (यशायाह 59:1, 2)।

यहाँ भविष्यद्वक्ता के शब्दों का भी यही उद्देश्य है, जब वह कहता है कि जब प्रभु हमें तुरन्त नहीं छुड़ाता, तब हमें पूछ-ताछ करनी चाहिए कि हमारे विनाश का कारण क्या है: क्योंकि जैसे उसने एक बार हमें अपनी भलाई का स्वाद चखाया है, वैसे ही वह अन्त तक ऐसा ही करता रहेगा; क्योंकि वह अपनी करुणा में थकता नहीं, और न उसकी उदारता कभी चुक सकती है। अतः दोष हमारा ही है। इससे हम देखते हैं कि यह स्थल कितना उल्लेखनीय है, और इसमें कैसी उपयोगी शिक्षा है।

इसके बाद वह यह कहकर उसी बात की और भी पूर्ण पुष्टि करता है, मैं रहूँगा; और फिर वह कहता है, तेरा राजा, वह कहाँ है? "मैं रहूँगा" कहकर परमेश्वर उस बात को दोहराता है जो वह पहले घोषित कर चुका था, कि वह सदा एक-सा रहेगा; क्योंकि जैसा याकूब कहता है, 'उसमें अदल-बदल की छाया तक नहीं होती' (याकूब 1:17)।

इसलिए 'मैं रहूँगा;' अर्थात्, "यद्यपि इस्राएली मेरी निन्दा करते हैं कि मैं अपनी करुणा की सामान्य रीति पर नहीं चलता, तौभी यह सर्वथा झूठ है; क्योंकि मैं सदा एक-सा बना रहता हूँ, और मनुष्यों पर करुणा दिखाने को सदा तत्पर हूँ; क्योंकि, जैसा मैंने अन्यत्र घोषित किया है, मैं अपने हाथों के कार्यों को नहीं त्यागता (भजन संहिता 138:8)। अतः जब मैं इस प्रकार मनुष्यों पर अपना अनुग्रह बनाए रखता हूँ, तो अवश्य है कि मेरे अनुग्रह का मार्ग उनकी दुष्टता से बन्द हो गया हो। इसलिए वे अपने आप को जाँचें, जब वे पुकारते हैं और मैं उत्तर नहीं देता। जब वे अपनी विपत्तियों में मानो घुल-घुलकर क्षीण होते हैं, और कोई राहत नहीं पाते, तो वे इसे अपना ही दोष मानें; क्योंकि मैं अपने आप को वैसा ही दिखाता जैसा मैं सदा रहा हूँ, और वे मुझे अपना छुड़ानेवाला पाते, यदि उनमें कोई परिवर्तन न हुआ होता।" अब हम नौवें पद में भविष्यद्वक्ता का अर्थ समझते हैं, और उसके बाद आनेवाले पद में {,}אהיaei, "मैं रहूँगा," इस अभिव्यक्ति का भी।

फिर वह कहता है, तेरा राजा कहाँ है? परमेश्वर फिर से इस्राएलियों को इस बात के लिए धिक्कारता है कि उन्होंने अपना भरोसा अपने राजा और दूसरे पार्थिव सहारों पर रखा था, जिनके द्वारा वे अपने आप को भली भाँति सुरक्षित समझते थे। वह कहता है, तेरा राजा कहाँ है? वह इस्राएलियों का उपहास करता है; क्योंकि वे देखते थे कि उनका राजा अब सहायता करने की सारी सामर्थ्य से रहित हो गया था, और उनके सब हाकिम बुद्धि से भी और सब दूसरे साधनों से भी शून्य थे। अतः जब मनुष्यों से कोई रक्षा न थी, तो भविष्यद्वक्ता अब दिखाता है कि इस्राएल का भरोसा व्यर्थ ही था, जब वे अपने आप को अपने राजा की छाया में सुरक्षित समझते थे, जब वे अपने आप को तब तक निश्चिन्त मानते थे जब तक बुद्धिमान मनुष्य उन पर शासन करते थे। वह कहता है, ये सब बातें व्यर्थ हैं। परन्तु हमें सदा वह बात स्मरण रखनी चाहिए जो उसने पहले कही थी, मैं रहूँगा; क्योंकि यदि यह ढाल खड़ी न की गई होती, तो कपटी सदा उत्तर में यही कहते, "अब परमेश्वर कहाँ है? उसका अभिप्राय क्या है? वह विलम्ब क्यों करता है?"

इसलिए परमेश्वर ने पहले यह बताया कि वह उनकी सहायता करने को तत्पर था, परन्तु उन्होंने अपनी दुष्टता से मार्ग बन्द कर दिया था।

परन्तु वह आगे उनका इस बात के लिए उपहास करता है कि उन्होंने व्यर्थ ही अपनी आशा और अपनी सहायता अपने राजा और हाकिमों पर रखी थी। वह कहता है, तेरा राजा कहाँ है, कि तेरे सब नगरों में तुझे बचाए? भविष्यद्वक्ता अकारण ही नगरों का उल्लेख नहीं करता, क्योंकि इस्राएली सारी धमकियों को तुच्छ जानते थे, जब तक उनके नगर हर ओर से अजेय और शत्रुओं को बाहर रखने के लिए दृढ़ थे। इसलिए जब परमेश्वर अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा उन्हें धमकाता था, तब वे जो कुछ उनसे कहा जाता था उसे कहानियाँ समझते थे, और यों अपना बचाव करते थे, "शत्रु हम पर कैसे आक्रमण कर सकते हैं? चाहे सौ युद्ध निकट आ पहुँचें, तौभी क्या हमारे पास ऐसे नगर नहीं जो शत्रुओं के आक्रमणों का सामना कर सकें? इसलिए हम निश्चिन्त बसे रहेंगे, और अपने सुखों का आनन्द लेंगे, चाहे परमेश्वर आकाश और पृथ्वी को हिला दे।" अतः क्योंकि वे इस झूठे भरोसे से ऐसे मतवाले हो गए थे, इसलिए भविष्यद्वक्ता अब कहता है, "मैं जानता हूँ कि तुम बड़े-बड़े और बहुत से नगर रखने में बढ़-चढ़कर हो; परन्तु क्योंकि तुम उन्हें अपनी रक्षा समझते हो, इसलिए परमेश्वर दिखाएगा कि यह आशा व्यर्थ और धोखा देनेवाली है। तो तेरा राजा कहाँ है, कि तेरे नगरों में तुझे बचाए? और चाहे तेरा राजा सेना और गढ़ों से भली भाँति सुसज्जित हो, तौभी जब परमेश्वर एक बार तेरे विरुद्ध उठ खड़ा होगा, तब वह तेरे किसी काम न आएगा।"

परन्तु वह आगे जोड़ता है, और तेरे न्यायी, जिनके विषय में तू ने कहा था, मुझे राजा और हाकिम दे? यहाँ भविष्यद्वक्ता और ऊँचे चढ़ता है; क्योंकि वह दिखाता है कि इस्राएल की प्रजा ने केवल इसी बात में पाप नहीं किया था कि उन्होंने अपनी आशा अपने राजा और दूसरे सहारों पर रखी थी; वरन् इसमें भी कि उन्होंने अपने लिए ऐसा राजा चुन लिया था जिसे परमेश्वर ने स्वीकार नहीं किया था। क्योंकि हम जानते हैं कि दाऊद का अभिषेक इसी उद्देश्य से किया गया था कि वह प्रजा की सारी देह को एक साथ जोड़े; और परमेश्वर की इच्छा थी कि उसकी कलीसिया और उसकी चुनी हुई प्रजा एक ही सिर के अधीन रहे, कि वे सुरक्षित रहें। अतः जब दस गोत्रों ने अपने लिए एक नया राजा चाहा, तो यह एक अधर्मी अलगाव था। ऐसा क्यों?

क्योंकि दाऊद के राज्य से फिर जाना मानो परमेश्वर का इन्कार करना था। क्योंकि यदि शमूएल से यह कहा गया, 'उन्होंने तुझ को नहीं, परन्तु मुझी को निकम्मा जाना है, कि मैं उनका राजा न रहूँ' (1 शमूएल 8:7), तो यह दाऊद के विषय में निश्चय ही और भी पूर्ण रूप से सत्य ठहरा। अब हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता का क्या अर्थ था: प्रजा के उस झूठे भरोसे के विरुद्ध, कि वे अपने राजा की सामर्थ्य से सुरक्षित हैं, कड़ी बातें कहने के बाद, वह अब जोड़ता है, "मैं एक और स्रोत तक बढ़ूँगा: क्योंकि तू ने तब पाप करना आरम्भ नहीं किया जब तू ने परमेश्वर की महिमा राजा को दे दी, वरन् तब जब तू ने अपना निज राज्य चाहा, और उस राज्य से सन्तुष्ट न रहा जिसे उसने दाऊद के व्यक्तित्व में स्थापित किया था।"

अतः भविष्यद्वक्ता अब प्रजा पर धर्मत्याग का दोष लगाता है, जब उन्होंने एक नया राजा, अर्थात् यारोबाम, चुन लिया। क्योंकि यद्यपि यह परमेश्वर के निश्चित अभिप्राय के अनुसार हुआ, जैसा हम अन्यत्र कह चुके हैं, तौभी इससे प्रजा का दोष कुछ भी हल्का नहीं हुआ; क्योंकि जहाँ तक उनसे हो सका, उन्होंने परमेश्वर को त्याग दिया। जैसे पाँव, यदि देह से काट दिया जाए, तो न केवल एक अंग-भंग और निकम्मा अंग होता है, वरन् तुरन्त सड़ने लगता है; वैसा ही इस्राएल था, जो फटी और अंग-भंग हुई देह के आधे भाग के समान था; और यदि वे आश्चर्यकर्म द्वारा सुरक्षित न रखे जाते, तो अवश्य सड़ गए होते। परन्तु साथ ही परमेश्वर यहाँ उस धर्मत्याग को उचित रूप से दोषी ठहराता है, कि इस्राएल ने नया राजा चाहकर कलीसिया की पवित्र एकता को तोड़ डाला और एक अधर्मी अलगाव ले आया।

ये वे हाकिम हैं, जिनके विषय में तू ने कहा था, मुझे राजा और हाकिम दे। मैं ने अपने क्रोध में तुझे दिया, और अपनी जलजलाहट में हटा लिया; अर्थात् "यह शापित आरम्भ था, और इसका अन्त भी शापित होगा; क्योंकि यारोबाम का चुनाव वैध नहीं था; वरन् एक अधर्मी हठ के कारण प्रजा ने तब मुझ से बलवा किया, जब वे दाऊद के घराने से फिर गए।" अतः ऐसे अशुभ आरम्भ से कोई सफलता नहीं निकल सकती थी। क्योंकि शुभ लक्षण केवल तभी होता है, जब हम परमेश्वर की आज्ञा मानते हैं, जब उसका आत्मा हमारी युक्तियों का अगुवा होता है, जब हम उसके मुख से पूछते हैं, और जब हम उससे प्रार्थना करके आरम्भ करते हैं। परन्तु जब हम परमेश्वर के वचन को तुच्छ जानते हैं, और अपनी ही मनमानी को खुली छूट देते हैं, और जो कुछ हमें भाता है उसी को ठान लेते हैं, तो यह हो ही नहीं सकता कि उसका परिणाम दुःखद और विनाशकारी न हो। इसलिए परमेश्वर कहता है कि उसने अपने क्रोध में उन्हें राजा दिया; मानो वह कहता हो, "तुम समझते हो कि तुमने बड़ा उत्तम काम किया, जब यारोबाम सिंहासन पर बैठाया गया कि वह प्रतिष्ठित हो: क्योंकि यहूदा का राज्य उस समय इस्राएल के राज्य से बहुत छोटा था, जो न केवल सामर्थ्य में, वरन् अपनी प्रजा की संख्या में भी बढ़कर था। तुम समझते हो कि तुम उस समय सुखी थे, क्योंकि यारोबाम तुम पर राज्य करता था: परन्तु वह तुम्हें परमेश्वर के क्रोध और कोप में दिया गया था," भविष्यद्वक्ता कहता है।

"परमेश्वर ने यारोबाम का अभिषेक करने की आज्ञा दी थी।" सच है, ऐसा ही था: परन्तु परमेश्वर कहता है, यह मैंने अपने क्रोध में किया; और अब मैं अपनी जलजलाहट में हटा लूँगा; अर्थात् "मैं तुम से वह राज्य छीन लूँगा, जिसे मैं तुम्हारे अन्धेपन का कारण देखता हूँ। क्योंकि यदि वह राज्य ज्यों का त्यों बना रहे, तो मैं कुछ भी न रहूँगा, और मेरे वचन के अधिकार का तुम्हारे बीच कोई मूल्य न होगा।

अतः आवश्यक है कि यह राज्य पूरी रीति से उलट दिया जाए; क्योंकि जैसे ही तुमने नया राजा खोजा, तुम दुःखी होने लगे।"

अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता का क्या अर्थ है। साथ ही हम इस स्थल से यह सीखते हैं कि परमेश्वर अपने न्याय इस रीति से पूरे करता है कि जो कुछ बुराई है, वह मनुष्यों के ही मत्थे मढ़ी जानी चाहिए। क्योंकि हम निश्चय मानते हैं कि यारोबाम का राज्य पर बैठाया जाना उतावली और अन्याय का काम था; क्योंकि इससे वह स्वर्गीय आज्ञा भंग हुई जो दाऊद पर प्रकट की गई थी, "तू मेरा पुत्र है, आज मैं ही ने तुझे जन्माया। मुझ से माँग, और मैं जाति जाति के लोगों को तेरी सम्पत्ति होने के लिये दूँगा," इत्यादि (भजन संहिता 2:7, 8)।

परन्तु यारोबाम को राजा किसने ठहराया? स्वयं प्रभु ने। यह कैसे हो सकता था कि परमेश्वर ने यारोबाम को सिंहासन पर बैठाया, और फिर भी अपनी आज्ञा से दाऊद को न केवल अब्राहम की सन्तान पर, वरन् आनेवाले मसीह के सम्बन्ध में अन्यजातियों पर भी ठहराया? यहाँ परमेश्वर अपने आप से असंगत जान पड़ता है। कदापि नहीं; क्योंकि जब उसने दाऊद को अपनी चुनी हुई प्रजा पर ठहराया, तो वह एक वैध नियुक्ति थी: परन्तु जब उसने यारोबाम को सिंहासन पर बैठाया, तो वह एक विलक्षण न्याय था; इसलिए परमेश्वर में कोई असंगति नहीं है। साथ ही प्रजा ने, जिसने अपने मतों से यारोबाम को अपनाया और उसे अपना राजा बनाया, अधर्म और टेढ़ेपन से काम किया। "तौभी ऐसा जान पड़ता है कि परमेश्वर ने अपने विधान से सारी बात का संचालन किया।" सच है; क्योंकि प्रजा के नए राजा के विषय में कुछ भी जानने से पहले ही परमेश्वर ने उसे चुनना निश्चित कर लिया था, और यह भी ठान लिया था कि इस रीति से सुलैमान के धर्मत्याग और कृतघ्नता का दण्ड दे। ये सब बातें सत्य हैं, अर्थात् यह कि परमेश्वर ने अपनी गुप्त युक्ति से सारे काम का संचालन किया था, और फिर भी प्रजा के पाप में उसका कोई भाग न था।

इस प्रकार हम बुद्धिमानी से परमेश्वर के गुप्त न्यायों पर विस्मय करना सीखें, और उन अपवित्र कुतर्कियों का अनुकरण न करें जो बड़ा कोलाहल मचाते हैं, क्योंकि वे यह नहीं समझ पाते कि परमेश्वर किस प्रकार दुष्ट मनुष्यों को काम में लाता है, और किस प्रकार जो कुछ मनुष्य दुष्टता और मूर्खता से करते हैं उसे वह सर्वोत्तम उद्देश्य की ओर ले जाता है। क्योंकि वे इसे नहीं समझते, इसलिए वे यह निष्कर्ष निकालते हैं कि यदि प्रभु सब वस्तुओं पर शासन करता है, तो वही पाप का कर्ता होगा। परन्तु पवित्रशास्त्र, जैसा हम देखते हैं, जब परमेश्वर के क्रोध और कोप की चर्चा करता है, तब साथ ही हमारे सामने उसके सब न्यायों में उसकी धार्मिकता को प्रस्तुत करता है, और परमेश्वर और मनुष्यों के बीच भेद करता है, जैसे कि यह अन्तर बड़ा है; क्योंकि परमेश्वर मनुष्यों की टेढ़ी युक्तियों को उनके अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए नहीं मोड़ता — वह धर्मी न्यायी है। और तौभी उसका अभिप्राय सदा हम पर प्रकट नहीं होता: फिर भी हमारा कर्तव्य है कि हम श्रद्धा और नम्र किए हुए मन से उन भेदों पर विस्मय करें और उनकी आराधना करें जो हमारी समझ से परे हैं। आगे लिखा है —

होशे 13:12-13

12. एप्रैम का अधर्म बँधा हुआ है; उसका पाप छिपा रखा गया है।

12. Obsignatum est peccatum Ephraim (vel, obsignata est iniquitas Ephraim;) reconditum peccatum ejus.

13. उस पर जच्चा की सी पीड़ाएँ आएँगी: वह निर्बुद्धि पुत्र है; क्योंकि उसे बच्चों के जन्म लेने के स्थान में देर तक नहीं ठहरना चाहिए था।

13. Dolores parturientis venient ei; ipse filius insipiens (non sapiens,) quia tempore non staret in ruptura filiorum (ad verbum.)

वह पहले कहता है कि एप्रैम का अधर्म मुहरबन्द है, और उसका पाप छिपा रखा गया है; इन शब्दों से उसका अर्थ यह है कि जब परमेश्वर अपना पलटा रोके रखता है, तब कपटी व्यर्थ ही अपने आप की चापलूसी करते हैं; क्योंकि यद्यपि वह कुछ समय तक आँख मूँद ले, तौभी वह सोता नहीं; और न यह विश्वास करना चाहिए कि वह अन्धा है, वरन् वह मनुष्यों के पापों पर मुहर लगाता है, और उन्हें तब तक बन्द रखता है जब तक उन्हें प्रकट करने का उचित समय न आए। यही मुख्य बात है; परन्तु भविष्यद्वक्ता ने इससे कुछ अधिक भी व्यक्त किया है। क्योंकि जैसे यिर्मयाह कहता है, 'यहूदा का पाप लोहे की टाँकी और हीरे की नोक से लिखा हुआ है' (यिर्मयाह 17:1); वैसे ही अब होशे भी कहता है कि एप्रैम का अधर्म मुहरबन्द किया गया था। क्योंकि लेख, जब इधर-उधर फैलते हैं, तो नष्ट हो सकते हैं: परन्तु जो रख छोड़ा जाता है और मुहर के नीचे रखा जाता है, वह सदा बना रहता है। अतः होशे का अब यह अर्थ है कि जब उन्हें विराम दिया गया, तब प्रजा व्यर्थ ही अपने आप की चापलूसी करती रही; क्योंकि प्रभु ने उनके पापों को अपनी मुहर के नीचे रख छोड़ा था; मानो वह कहता हो, "परमेश्वर तुम्हारे अधर्म को नहीं भूलता: परन्तु क्योंकि वह तुम्हें केवल कुछ समय के लिए छोड़ रहा है, इसलिए तत्काल दण्ड भोगना कहीं अच्छा होता, क्योंकि इस प्रकार तुम्हारे पाप का स्मरण मिट जाता; परन्तु अब वह तुम्हारे सब अधर्मों को मानो मुहर के नीचे सावधानी से रखे हुए है, और तुम्हारे पाप भण्डार में संचित किए हुए हैं।"

अब हम देखते हैं कि इस पद में भविष्यद्वक्ता का अर्थ यह है कि इस्राएली अपने पापों में इतने आगे बढ़ गए थे कि अब किसी क्षमा या छुटकारे की आशा नहीं की जा सकती थी। "अतः परमेश्वर तुम पर कभी अनुग्रहकारी न होगा, क्योंकि तुम्हारा पाप मुहरबन्द है।" और यह वचन उन सब पर लागू होता है जो परमेश्वर के सामने अपना भेष बदलते हैं, जब वह उनके साथ कठोरता से व्यवहार नहीं करता, वरन् इसके विपरीत कृपापूर्वक उन्हें सम्भालता और उनको सहता है।

अतः जब उन्होंने इस प्रकार उसकी सहनशीलता को व्यर्थ कर दिया, तो यह आवश्यक था कि उन पर यह आ पड़े, कि वह उनके अधर्म पर मुहर लगाए, और उनके पापों को बाँधकर रखे।

इसके बाद वह कहता है कि इस घमण्डी और बलवा करनेवाली प्रजा पर जच्चा की सी पीड़ाएँ आ पड़ेंगी। वह उसी विषय को आगे बढ़ाता है, परन्तु एक दूसरे रूपक के द्वारा; क्योंकि जच्चा की पीड़ाओं के द्वारा वह उस अचानक विनाश की ओर संकेत करता है जो निश्चिन्त मनुष्यों पर आ पड़ता है। और पवित्रशास्त्र में बोलने की यह रीति सामान्य है। तो इन मनुष्यों पर जच्चा की सी पीड़ाएँ आएँगी; अर्थात्, "क्योंकि वे अपने लिये निरन्तर शान्ति की आशा बाँधते हैं, और किसी भी धमकी से नहीं जागते, और क्योंकि वे घमण्ड से मेरे हाथ और मेरे वचन दोनों को तुच्छ जानते हैं, इसलिये अचानक विनाश उन्हें कुचल डालेगा।" पद के आरम्भ के विषय में, अर्थात् उन पर जच्चा की सी पीड़ाएँ आएँगी, इतना ही पर्याप्त है।

फिर वह आगे कहता है, वह निर्बुद्धि पुत्र है, अर्थात् वह पूरी रीति से मूर्ख है। यहाँ परमेश्वर इस्राएल की प्रजा के अत्यन्त पागलपन की निन्दा करता है, मानो उसने कहा हो, "यदि इस प्रजा में खरी समझ का कोई कण भी शेष रहता, तो वे कम से कम उस न्याय को तो पहचानते जो उनके सिर पर मँडरा रहा है; और तब उपाय की कुछ आशा होती: परन्तु यह प्रजा अब पूरी रीति से मतवाली हो गई है।" और यही बात उनकी मूर्खता को प्रमाणित करती है, क्योंकि, वह कहता है, उन्हें बच्चों के निकलने के स्थान पर ठहरना नहीं चाहिए था। तौभी कुछ व्याख्याकार इस वाक्यांश की व्याख्या इस प्रकार करते हैं, "समय आएगा, वे बच्चों के निकलने के स्थान पर न ठहरेंगे।" परन्तु इन शब्दों का अभिप्राय तो इसके विपरीत है; क्योंकि भविष्यद्वक्ता का अर्थ यह है कि जब जन्म का समय आया, तब यह प्रजा निकलने के स्थान पर रुक जाएगी; और यदि वे ठीक और खरी बुद्धि से सम्पन्न होते, तो ऐसा न करते।

यह ध्यान देना चाहिए कि भविष्यद्वक्ता जन्म के समय की ओर संकेत करता है; क्योंकि वह पहले कह चुका था कि इस्राएल की प्रजा पर जच्चा की सी पीड़ाएँ आएँगी; अब वह घोषणा करता है कि ये पीड़ाएँ प्राणघातक होंगी। यद्यपि स्त्री प्रसव-पीड़ा में हो और जनने में बड़े संकट में पड़ी हो, तौभी वह क्षण भर में छूट जाती है, और जैसा मसीह कहता है, उसी पीड़ा से आनन्द और हर्ष उत्पन्न होता है, (यूहन्ना 16:21।) परन्तु भविष्यद्वक्ता कहता है कि यह जनना बहुत भिन्न होगा; क्योंकि यह गर्भपात होगा, और बच्चा गर्भ ही में सड़ने के लिये रुका रहेगा। यदि कोई स्त्री जनने के ठीक समय पर जोर लगाना रोक दे और अपनी शक्ति में सिकुड़ जाए, तो वह बच्चे को और अपने आप को एक साथ नाश कर डालती है; क्योंकि वह परिश्रम के बिना जन नहीं सकती। अतः जब स्त्री का बचाव उसके परिश्रम पर निर्भर है, तो भविष्यद्वक्ता अब कहता है कि इस्राएल की प्रजा के साथ इसका उलटा होगा। वह कहता है, वे जच्चा स्त्री के समान हैं; परन्तु साथ ही वे मूर्खता से अन्धे हो गए हैं, क्योंकि वे बच्चे को गर्भ में रोके रखते हैं और कोई जोर नहीं लगाते: इसलिये यह प्रसव अन्त में उनके लिये प्राणघातक ही होगा। क्यों? क्योंकि वे बच्चे को जनने के लिये कोई जोर नहीं लगाते।

इन रूपकात्मक चित्रणों के द्वारा भविष्यद्वक्ता निस्सन्देह प्रजा की हठीली कठोरता की ओर संकेत करता है; क्योंकि जब उन्हें विलाप करना और परमेश्वर के बलवन्त हाथ के नीचे अपने आप को दीन करना चाहिए था, तब हम जानते हैं कि उन्होंने कितनी टेढ़ाई से अपने आप को हर दण्ड के विरुद्ध कठोर कर लिया। अतः जब यह प्रजा इस प्रकार मानो लगाम को चबाती रही, और साथ ही अपने मन को कठोर करती रही, कुछ तो अपने उग्र स्वभाव से, कुछ जड़ता से, और कुछ निराशा से, तो कोई आश्चर्य नहीं कि भविष्यद्वक्ता ने कहा कि वे निर्बुद्धि और पागल प्रजा थे, क्योंकि वे बच्चों के निकलने के स्थान पर ठहर गए; अर्थात् उन्होंने अपनी विपत्तियों के मनचाहे अन्त को पाने के लिये कोई जोर नहीं लगाया। क्योंकि जब प्रभु हमें दुःख देता है, और हम जनते हैं, तो यह जनना ही हमारा छुटकारा है। अब, छुटकारा कैसे हो सकता है जब तक हम अपने पापों के कारण अपने आप से घृणा न करें, जब तक हम अपने मनों को परमेश्वर की ओर न उठाएँ, और इस प्रकार परमेश्वर के अनुग्रह के लिये मार्ग न खोलें? परन्तु जब हम अपनी उग्रता और जड़ता के कारण हठपूर्वक परमेश्वर का विरोध करते हैं, तो यह वैसा ही है मानो कोई हर एक मार्ग को बन्द कर दे। अतः अब हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता द्वारा प्रयुक्त यह रूपक कितना उपयुक्त है, जब वह कहता है कि प्रजा पागल थी; क्योंकि जब जनने का समय आया, तब वे निकलने के स्थान पर ठहर गए; अर्थात् गर्भ के द्वार पर, क्योंकि भविष्यद्वक्ता इस शब्द से यही अभिप्राय रखता है। अतः जब वे ठीक द्वार पर ही ठहर गए, और मानो हर प्रयास को रोक लिया, और सब परिश्रम छोड़ दिया, तो उनका नाश होना अवश्य था। अब हम देखते हैं कि मनुष्यों का हठ क्या उत्पन्न करता है, जब वे अपने आप को कठोर कर लेते हैं, जब वे इस प्रकार मानो अपने हृदय, मन और अपनी सारी शक्तियों को संकरी सीमाओं में सिकोड़ लेते हैं। क्योंकि जब प्रसव-पीड़ा में पड़ी स्त्री सब प्रयास रोक लेती है, तो वह जान-बूझकर अपने लिये मृत्यु ढूँढ़ती है: वैसा ही वे भी करते हैं जो सब दण्डों के विरुद्ध अपने आप को कठोर करते हैं, और विशेष करके तब जब जन्म का समय आ पहुँचा हो; और "निकलने का स्थान" शब्द इसी की ओर संकेत करता है: क्योंकि जब प्रभु हमें केवल एक बार ही नहीं मारता, वरन् हम पर लगातार बहुत सी मारें लगाता रहता है, यहाँ तक कि हमें या तो मन फिराना होगा या सदा के लिये नाश होना होगा, तब जनने का पका हुआ समय होता है; क्योंकि तब परमेश्वर हमें अन्तिम सीमा तक ले आता है, और हमारे लिये इसके सिवा और कुछ शेष नहीं रहता कि या तो हम उसके बलवन्त हाथ के नीचे अपने आप को दीन करें या नाश हो जाएँ। अतः भविष्यद्वक्ता उस दशा को, जिसमें वे हठीले मनुष्य बने रहते हैं जो परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानते, "निकलने का स्थान" कहता है। इन पदों के साथ आगे के दो पदों को भी जोड़ना आवश्यक है: यह मैं कल करूँगा।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अनुग्रह कर कि जैसे तू ने अपना एकलौता पुत्र हम पर शासन करने के लिये हमें दिया है, और अपनी सुइच्छा से उसे हमारे ऊपर राजा ठहराकर अभिषिक्त किया है, कि हम शैतान और सारे संसार के सब यत्नों के विरुद्ध उसके हाथ के नीचे सदा सुरक्षित और निश्चिन्त रहें, — तो हाय, अनुग्रह कर कि हम अपने आप को उसके अधिकार के अधीन चलाए जाने दें, और ऐसा आचरण करें कि वह हमारे कल्याण के लिये सदा चौकसी करता रहे: और जैसे तू ने हमें उसे सौंप दिया है कि वह हमारे उद्धार का रखवाला हो, वैसे ही हमें न तो भटकने दे और न गिरने दे, वरन् हमें सदा उसकी सेवा में बनाए रख, जब तक कि हम अन्त में उस धन्य और अनन्त राज्य में एकत्र न किए जाएँ, जो तेरे एकलौते पुत्र के लहू के द्वारा हमारे लिये प्राप्त किया गया है। आमीन।

छत्तीसवाँ व्याख्यान

होशे 13:14

14. मैं उन्हें कब्र के वश से छुड़ा लूँगा; मैं उन्हें मृत्यु से छुटकारा दूँगा: हे मृत्यु, मैं तेरी महामारी बनूँगा; हे कब्र, मैं तेरा विनाश बनूँगा: पछतावा मेरी आँखों से छिपा रहेगा।

14. E manu sepulchri redimam eos, a morte redimam (est quidem aliud verbum, sed utrumque significat redimere:) ero perditio tua, 96 mors: ero excisio tua (vel, interitus tuus) sepulchrum (vel, inferne:) consolatio (vel, poenitentia) abscondita est ab oculis meis.

मुझे सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता यहाँ उसी विषय को आगे बढ़ाता है, अर्थात् यह कि इस्राएली परमेश्वर द्वारा उन्हें दी गई दया को सह न सके, यद्यपि यहाँ वह अधिक विस्तार से बोलता है। परमेश्वर छुटकारे की प्रतिज्ञा करता हुआ जान पड़ता है, परन्तु वह ऐसा शर्त के साथ करता है: इसलिये मेरी समझ में वे भूल करते हैं जो इन शब्दों को उसी अर्थ में लेते हैं जैसे तब होता है जब परमेश्वर डाँटने और धमकाने के पश्चात् अपनी शिक्षा की कठोरता को कोमल कर देता है, और अपना अनुग्रह प्रस्तुत करके शान्ति जोड़ देता है। परन्तु इस स्थल का अभिप्राय भिन्न है; क्योंकि परमेश्वर, जैसा हम कह चुके हैं, यहाँ केवल उद्धार की प्रतिज्ञा नहीं करता, वरन् यह दिखाता है कि वह बचाने को सचमुच तैयार है, परन्तु प्रजा की दुष्टता, जैसा कहा जा चुका है, मार्ग में बाधा थी। तौभी आइए, हम शब्दों की और अधिक ध्यान से जाँच करें।

96 "बहुत सी हस्तलिपियाँ और कुछ संस्करण {;{דברך पढ़ते हैं; और {}דבר का इब्रानी में अर्थ है नाश करना, वश में करना।" — न्यूकम। यह स्थल उस निरर्थक प्रकार की आलोचना का एक उदाहरण प्रस्तुत करता है, जिसके द्वारा पुराने नियम के वाक्यों और नये नियम में उनके तथाकथित उद्धरणों के बीच शाब्दिक मेल बैठाने का प्रयत्न किया गया है। प्रेरितों ने शब्दों की अपेक्षा अर्थ का अधिक ध्यान रखा। हॉर्सली ने दो शब्दों, ,{}דבר विनाश या नाश, और ,{}קטב उच्छेद या जड़ से उखाड़ना, पर एक लम्बी टिप्पणी लिखी है; और वह पहले का अनुवाद "महामारी" और दूसरे का "जलानेवाली मरी" करता है। कि ये दोनों शब्द इस प्रकार प्रयुक्त होते हैं, यह वह सन्तोषजनक रीति से प्रमाणित करता है। परन्तु जब वे मृत्यु और कब्र पर लागू किए जाते हैं, तब स्वाभाविक रूप से वे केवल अपना प्रधान भाव ही बनाए रख सकते हैं, अर्थात् किसी नाश करनेवाली, जड़ से उखाड़नेवाली और उजाड़नेवाली वस्तु का। सब भाषाओं में शब्दों के प्राथमिक और गौण अर्थ होते हैं: और अनुवाद में प्राथमिक अर्थ को बनाए रखना प्रायः अनुचित होगा। इस विषय में कैल्विन ने बिशप की अपेक्षा अधिक विवेक दिखाया है।

वह कहता है, कब्र के हाथ से। हाथ से उसका अभिप्राय निस्सन्देह सामर्थ्य है: क्योंकि जेरोम केवल व्यर्थ बातें करता है जब वह यहाँ कामों की चर्चा करता है, और कहता है कि कब्र के काम हमारे पाप हैं। परन्तु यह भविष्यद्वक्ता के अभिप्राय से बहुत दूर है। पवित्रशास्त्र में यह सचमुच एक सामान्य रूपक है कि हाथ सामर्थ्य या अधिकार के लिये रखा जाता है।

तो वाक्य यह है, मैं उन्हें कब्र के वश से छुड़ा लूँगा, मैं उन्हें मृत्यु से छुड़ा लूँगा; अर्थात्, यदि वे विरोध न करें, तो मैं स्वेच्छा से उनका छुड़ानेवाला बनूँगा। इसलिये कुछ लोगों ने इस स्थल का अनुवाद संभावनार्थ में किया है, "मैं उन्हें कब्र के हाथ से छुड़ा लेता, मैं उन्हें मृत्यु से बचा लेता।" परन्तु काल बदलने की कोई आवश्यकता नहीं, यद्यपि, जैसा मैं कह चुका हूँ, जो ऐसा करते हैं वे भविष्यद्वक्ता के अभिप्राय को सच्चाई से प्रस्तुत करते हैं। परन्तु कहीं कोई यह न कहे कि यह शब्दों से बहुत दूर है, भविष्यद्वक्ता का पाठ भविष्यत् काल को बनाए रखते हुए भी भली-भाँति समझा जा सकता है। तो मैं उन्हें छुड़ा लूँगा, जहाँ तक यह मुझ पर निर्भर है; क्योंकि यहाँ एक शर्त जोड़ी जानी चाहिए, मानो परमेश्वर आगे आकर घोषणा करता है कि वह छुड़ानेवाले का पद पूरा करने के लिये उपस्थित है। तो फिर मार्ग में क्या बाधा है? प्रजा की कठोरता ही; क्योंकि वे प्रभु की ओर फिरने की अपेक्षा सौ बार नाश हो जाना अधिक पसन्द करते, जैसा हम अभी देखेंगे।

इसके बाद वह आगे कहता है, हे मृत्यु, मैं तेरा विनाश बनूँगा; हे कब्र, मैं तेरा उच्छेद बनूँगा।

इन शब्दों के द्वारा भविष्यद्वक्ता परमेश्वर के सामर्थ्य को और अधिक स्पष्टता से प्रस्तुत करता है, और उसकी महिमामय रीति से बड़ाई करता है, ऐसा न हो कि मनुष्य यह सोचें कि जब शरीर के विचार के अनुसार कोई आशा दिखाई नहीं देती, तब उसके लिये बचाने का कोई मार्ग खुला नहीं है। इसलिये भविष्यद्वक्ता कहता है, "यद्यपि मनुष्य अब मरे हुए हैं, तौभी परमेश्वर को उन्हें जिलाने से रोकनेवाली कोई बात नहीं। कैसे? क्योंकि वह मृत्यु का विनाश और कब्र का उच्छेद है;" अर्थात्, "चाहे मृत्यु सब मनुष्यों को निगल जाए, चाहे कब्र उन्हें खा जाए, तौभी परमेश्वर मृत्यु और कब्र दोनों से बढ़कर है, क्योंकि वह मृत्यु को मार सकता है, क्योंकि वह कब्र को मिटा सकता है।" अब हम भविष्यद्वक्ता का वास्तविक अर्थ समझ गए हैं।

और इस स्थल से हम यह सीख सकते हैं कि जब मनुष्य नाश होते हैं, तब भी परमेश्वर अपने समान ही बना रहता है, और न तो उसका वह सामर्थ्य, जिसके द्वारा वह संसार को बचाने में समर्थ है, बुझ जाता है, और न उसका अभिप्राय ऐसा बदल जाता है कि वह सहायता करने को सदा तैयार न रहे; वरन् मनुष्यों का हठ ही उस अनुग्रह को ठुकराता है जो तैयार किया गया है, और जिसे परमेश्वर स्वेच्छा से और उदारता से प्रस्तुत करता है। यह एक बात है। दूसरी बात हम यह सीख सकते हैं कि परमेश्वर के सामर्थ्य को हमारे नाप से नहीं नापना चाहिए: चाहे हम सौ बार खो गए हों, तौभी परमेश्वर को उद्धारकर्ता ही माना जाए। अतः यदि कभी निराशा हमें ऐसा गिरा दे कि हम परमेश्वर की किसी भी प्रतिज्ञा को थाम न सकें, तो यह स्थल हमारे मन में आए, जो कहता है कि परमेश्वर मृत्यु का उच्छेद और कब्र का विनाश है। "परन्तु मृत्यु हमारे निकट है, तो अब हम और क्या आशा रख सकते हैं?" यह तो यह कहना है कि परमेश्वर मृत्यु से बढ़कर नहीं है: परन्तु जब मृत्यु मनुष्यों पर इतना अधिकार जताती है, तो परमेश्वर का स्वयं मृत्यु पर कितना अधिक अधिकार है? अतः आइए, हम निश्चय जानें कि परमेश्वर मृत्यु का विनाश है, जिसका अर्थ यह है कि मृत्यु अब नाश नहीं कर सकती; अर्थात्, मृत्यु उस सामर्थ्य से वंचित कर दी गई है जिसके द्वारा मनुष्य स्वभाव से नाश होते हैं; और यद्यपि हम कब्र में पड़े रहें, तौभी परमेश्वर स्वयं कब्र का उच्छेद है। यहाँ जो सिखाया गया है उसका प्रयोग यही है। परन्तु कोई यह अनुवाद देता है, "मैं मृत्यु के लिये तेरा विनाश बनूँगा," मानो यह प्रजा से कहा गया हो: यह सारे स्थल का एक बेतुका विकृतीकरण है, और हमें एक अत्यन्त उपयोगी शिक्षा से वंचित कर देता है।

परन्तु बहुत से व्याख्याकारों ने, यह सोचकर कि पौलुस ने इस स्थल को उद्धृत किया है, यहाँ जो कहा गया है उसकी व्याख्या मसीह के विषय में की है, और बहुत सी बातों में भूल की है। पहले तो उन्होंने कहा है कि परमेश्वर यहाँ बिना किसी शर्त के छुटकारे की प्रतिज्ञा करता है; परन्तु हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय बहुत भिन्न था। फिर उन्होंने यह मान लिया है कि यह मसीह के व्यक्तित्व में कहा गया है, "मैं उन्हें कब्र के हाथ से छुड़ा लूँगा।" साथ ही उन्होंने अत्यधिक बारीकी से यह सोचा है कि कब्र या अधोलोक उन यातनाओं के लिये रखा गया है जो तिरस्कृत लोगों पर लाई जाती हैं, या स्वयं उस स्थान के लिये जहाँ वे यातना पाते हैं। परन्तु भविष्यद्वक्ता एक ही बात को भिन्न शब्दों में दोहराता है, और इब्रानी शैली की यह विशेषता भली-भाँति ज्ञात है। अतः यहाँ कब्र मृत्यु से भिन्न नहीं है; यद्यपि जेरोम परिश्रम करता है और यह विवाद करता है कि कब्र का अर्थ मृत्यु से पूरी रीति से भिन्न कुछ है: परन्तु जो कुछ वह कहता है वह सब तुच्छ है। अतः इन शब्दों के विषय में वे धोखा खा गए हैं। और फिर भविष्यद्वक्ता के इन शब्दों में, "हे अधोलोक, (या कब्र,) मैं तेरा उच्छेद बनूँगा," उन्होंने "चारा" शब्द घुसा दिया है, और रूपकात्मक रीति से इसकी व्याख्या मसीह के विषय में की है, कि वह काँटे के समान था: क्योंकि जैसे कोई कीड़ा, जब काँटे में लगाया जाता है और मछली उसे निगल लेती है, तो उसके लिये मृत्यु बन जाता है; वैसे ही मसीह भी, जैसा वे कहते हैं, जब कब्र को सौंपा गया, तो एक घातक चारा बन गया; क्योंकि जैसे मछलियाँ काँटे से पकड़ी जाती हैं, वैसे ही मृत्यु मसीह की मृत्यु के चारे से पकड़ी गई।

और इन व्यर्थ बारीकियों को बड़ी वाहवाही के साथ ग्रहण किया गया है: इसी कारण सारे पोपतन्त्र में यह बात बिना किसी सन्देह के एक ईश्वरीय सत्य के रूप में मानी जाती है कि मसीह मृत्यु का चारा था। तौभी कोई भविष्यद्वक्ता के शब्दों की बारीकी से जाँच करे, तो वह देखेगा कि उन्होंने अज्ञानता से और लज्जाजनक रीति से भविष्यद्वक्ता की गवाही का दुरुपयोग किया है। और हमें विशेष करके इस बात की चौकसी करनी चाहिए कि पवित्रशास्त्र का अर्थ सच्चा और निश्चित बना रहे।

परन्तु आइए, देखें कि पौलुस के इस स्थल को उद्धृत करने के विषय में जो कहा जाता है, उसका क्या उत्तर दिया जाए।

इसका समाधान कठिन नहीं है। प्रेरित सदा ऐसे स्थलों को प्रकट रूप से प्रस्तुत नहीं करते जो अपने सम्पूर्ण प्रसंग में उस विषय पर लागू होते हों जिसकी वे चर्चा करते हैं; वरन् कभी वे केवल एक शब्द की ओर संकेत करते हैं, कभी वे समानता के रूप में किसी स्थल को किसी विषय पर लागू करते हैं, और कभी वे स्थलों को गवाहियों के रूप में आगे लाते हैं। जब प्रेरित पवित्रशास्त्र की गवाहियों का प्रयोग करते हैं, तब खरे और वास्तविक सत्य को खोजना चाहिए; परन्तु जब वे केवल एक शब्द की ओर संकेत करते हैं, तब किसी चिन्तापूर्ण छानबीन का कोई अवसर नहीं; और जब वे समानता के रूप में पवित्रशास्त्र का कोई स्थल उद्धृत करते हैं, तब यह खोजना कि सब भाग कैसे मेल खाते हैं, अत्यधिक सूक्ष्म चिन्ता है। परन्तु यह बिलकुल स्पष्ट है कि पौलुस ने 1 कुरिन्थियों 15 में भविष्यद्वक्ता की गवाही को उस शिक्षा की पुष्टि करने के उद्देश्य से उद्धृत नहीं किया है जिसके विषय में वह बोलता है। तो फिर क्या? क्योंकि शरीर का पुनरुत्थान एक ऐसा सत्य था जिस पर विश्वास करना अत्यन्त कठिन था, वरन् जो प्रकृति के विचार के पूरी रीति से विपरीत था, इसलिये पौलुस कहता है कि यह कोई आश्चर्य की बात नहीं, क्योंकि मसीह हमें जिलाने के लिये आएगा। कैसे? क्योंकि मृत्यु का विनाश और कब्र का नाश होना परमेश्वर का विशेष अधिकार है; मानो उसने कहा हो, "चाहे मनुष्य हज़ार बार सड़ जाएँ, तौभी परमेश्वर वह सामर्थ्य बनाए रखेगा जिसकी घोषणा उसने तब की जब उसने कहा कि वह मृत्यु का विनाश और कब्र का नाश बनेगा।" अतः आइए, हम यह जान लें कि यद्यपि प्रकृति का विचार इस सत्य को ठुकराता है, तौभी परमेश्वर उस अगम्य सामर्थ्य से सम्पन्न है जिसके द्वारा वह हमें सड़ने की दशा से जिला सकता है; वरन्, क्योंकि उसने संसार को शून्य से रचा, इसलिये वह हमें कब्र से भी उठाएगा, क्योंकि वह मृत्यु की मृत्यु, कब्र की कब्र, विनाश का विनाश, और नाश का नाश है: और पौलुस का सीधा-सा उद्देश्य यह है कि इन प्रभावशाली शब्दों के द्वारा परमेश्वर के उस अविश्वसनीय सामर्थ्य की बड़ाई करे जो मनुष्य की समझ की पहुँच से परे है। 97 "प्रेरित का विजयपूर्ण उद्गार, 'हे मृत्यु,' इत्यादि, सचमुच होशे के इस पाठ की ओर एक संकेत है, एक अप्रत्यक्ष संकेत, परन्तु उसका उद्धरण नहीं।" — बिशप हॉर्सली।

अब यदि कोई इसी उद्देश्य से भजन संहिता का यह स्थल उद्धृत करे, "मृत्यु से निकलने के मार्ग प्रभु ही के हैं," (भजन संहिता 68:20,) तो क्या यह खोजना आवश्यक होगा कि दाऊद ने यह किस अर्थ में कहा, या वह किस समय के विषय में बोलता है? कदापि नहीं; परन्तु यहाँ परमेश्वर के उस अपरिवर्तनीय अधिकार और सामर्थ्य की चर्चा है जिससे वह कभी वंचित नहीं किया जा सकता; वैसे ही इस स्थल में भी हम देखते हैं कि वह होशे के द्वारा क्या घोषणा करता है, और वह क्या करता, यदि प्रजा की कृतघ्नता में बाधा न होती; क्योंकि वह कहता है, हे कब्र, मैं तेरा विनाश बनूँगा; हे मृत्यु, मैं तेरी मृत्यु बनूँगा। और क्योंकि परमेश्वर ने यह प्रतिज्ञा की है, आइए, हम निश्चय जानें कि अन्त में हम इसे अपने विषय में सत्य पाएँगे। अतः अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता का वास्तविक अर्थ पौलुस द्वारा चर्चित विषय से कैसे मेल खाता है।

अब आगे यह आता है, शान्ति, या, पछतावा मेरी आँख से छिपा है; क्योंकि {,}נחםnuchem, दोनों का अर्थ रखता है। {,}נחםnuchem, का अर्थ है पछताना, और इसका अर्थ है शान्ति पाना। यदि "शान्ति" शब्द स्वीकार किया जाए, तो अर्थ यह होगा, "किसी के लिये आश्चर्य करने का कोई कारण नहीं कि मैं इतनी कठोरता से बोलता हूँ, और अपनी प्रजा के विरुद्ध गरजने के सिवा और कुछ नहीं करता; क्योंकि अब उनके बीच शान्ति का कोई स्थान नहीं; इसलिये शान्ति मेरी आँखों से छिपी है।" और ऐसा इसलिये था कि प्रजा की असुधार्य दुष्टता परमेश्वर को अपनी कठोरता को कोमलता में बदलने न देती थी, कि वह क्षमा और उद्धार की कोई आशा दे। तो इसी अर्थ में कहा गया है कि शान्ति उसकी आँखों से छिपी थी। परन्तु यदि "पछतावा" शब्द अधिक स्वीकार्य हो, तो यह ठीक वही बात दिखाएगा, — कि उस प्रजा को नाश करना पूरी रीति से ठान लिया गया था। "अतः तुम्हारे पास यह आशा रखने का कोई कारण नहीं कि समय बीतने पर मैं नरम हो सकूँगा; क्योंकि पछतावा मेरी आँखों से छिपा है। यह बात अटल रहेगी, तुम मिटा दिए जाओगे; क्योंकि तुम सब आशा से परे हो।" अतः हम देखते हैं कि दोनों शब्द एक ही बात की ओर संकेत करते हैं, कि परमेश्वर इस अभागी और तिरस्कृत प्रजा से उद्धार की हर आशा छीन लेता है।

अब आगे यह आता है —

होशे 13:15

15. चाहे वह अपने भाइयों के बीच फूले-फले, तौभी पुरवाई आएगी, यहोवा की वायु जंगल की ओर से उठेगी, और उसका कुण्ड सूख जाएगा, और उसका सोता निर्जल हो जाएगा: वह सब मनभावने पात्रों का भण्डार लूट लेगा।

15. Quia ipse inter fratres fructum faciet (vel, augescet; vel, Quanvis ipse inter fratres suos augescat: alii putant {}אחיםpositum esse pro {,}אחויםinter germina: sed nimis coacta est interpretatio. Legamus igitur simpliciter ut verba sonant, Ipse inter fratres augescet;) veniet ventus orientalis, ventus Jehovae a deserto ascendens, et arefaciet venam ejus, et siccabitur fons ejus: ipse diripiet thesaurum omnis vasis desiderabilis.

परमेश्वर फिर से उस बात की पुष्टि करता है जो कही जा चुकी थी, कि इस्राएल व्यर्थ ही अपनी शक्ति और अपने गढ़ों पर भरोसा रखता था, और कि अपने उन पापों के कारण, जिनके पीछे वे बिना किसी सीमा या रोक के चलते रहे, निश्चित विनाश उनके निकट था। परन्तु भविष्यद्वक्ता इन शब्दों से आरम्भ करता है, वह भाइयों के बीच बढ़ेगा। मुझे सन्देह नहीं कि वह (जैसा अन्य व्याख्याकारों ने भी ध्यान दिया है,) एप्रैम के गोत्र की उस आशीष की ओर संकेत करता है, जिसका उल्लेख उत्पत्ति 48 में है; क्योंकि हम जानते हैं कि यद्यपि एप्रैम छोटा था, तौभी याकूब ने उसे पहले स्थान पर रखा, यहाँ तक कि वह आदर में अपने भाई से, जो पहिलौठा था, बढ़कर ठहराया गया: और फिर, हम जानते हैं कि जो भविष्यद्वाणी याकूब ने उस समय की, वह सचमुच पूरी हुई; क्योंकि एप्रैम का गोत्र गिनती में और अन्य बातों में भी, केवल यहूदा के गोत्र को छोड़, बाकी सब से बढ़कर था। स्पष्ट है कि एप्रैम ने सारी प्रजा के बीच बड़ी प्रतिष्ठा प्राप्त कर ली थी। परन्तु जब उसे यह सब परमेश्वर की सेंतमेंत भलाई का फल मानना चाहिए था, तब वह घमण्ड से फूल गया। भविष्यद्वक्ता अब इसी कृतघ्नता को डाँटता है; वह कहता है, वह अपने भाइयों के बीच बढ़ेगा: परन्तु यह बढ़ती कहाँ से थी?

इतनी बड़ी प्रतिष्ठा कहाँ से थी, सिवा इसके कि वह मनश्शे से, जो स्वभाव के अधिकार से पहला था, बढ़कर ठहराया गया? अब इस अभागी प्रजा के लिये परमेश्वर के इतने बड़े उपकार को भूल जाना ही पर्याप्त न था, वरन् साथ ही उन्होंने अपने धन का दुरुपयोग घमण्ड को पालने में किया, और परमेश्वर की अवहेलना में अपने आप को कठोर कर लिया। क्योंकि उनके बलवे में इतना बड़ा दुस्साहस कहाँ से आया, इतनी बड़ी जड़ता और इतना बड़ा पागलपन कहाँ से आया कि वे परमेश्वर के न्याय को तुच्छ जानें, सिवा इसके — कि वे अपने भाइयों के बीच बढ़ गए थे?

तो यद्यपि वह अपने भाइयों के बीच बढ़ता है, तौभी पुरवाई आएगी, यहोवा की वायु, जो उसके कुण्ड को सुखा देगी, और उसका सोता सूख जाएगा। यहाँ परमेश्वर वही घोषणा करता है जिसका उल्लेख पहले हो चुका था, कि जो कुछ उसने इस्राएल की प्रजा को सेंतमेंत दिया था, उसे छीन लेना उसके वश में था, जैसे वह जब चाहे सोतों को सुखा सकता है। और वह एक अत्यन्त उपयुक्त उपमा का प्रयोग करता है।

वह कहता है, जैसे पुरवाई सुखाती और झुलसाती है, और यदि वह देर तक चलती रहे, तो सोते सूख जाएँगे; वैसे ही, वह कहता है, मैं एप्रैम के सब कुण्डों को सुखा दूँगा। चाहे वह यह सोचे या न सोचे कि उसमें उन सोतों से भी अधिक बल है जिनका स्रोत अक्षय होता है, यह निश्चित है कि जब कभी मुझे भाता है, सोते सूख जाते हैं। अतः मैं एप्रैम के कुण्डों और सोतों को सुखा दूँगा: यद्यपि वह सोचता है कि वह किसी गहरे सोते से पानी खींचता है, तौभी जब वह वायु उठेगी, तब वह उसका सारा बल और सारी तरी सुखा देगी।

अब हम समझ गए हैं कि भविष्यद्वक्ता का क्या अभिप्राय है।

अब शब्दों के विषय में, कुछ लोग {,}קדיםkodim, का अनुवाद अनुचित रीति से दक्षिणी वायु करते हैं; क्योंकि इसका अर्थ पुरवाई है: और फिर कुछ अन्य लोग यहोवा की वायु की व्याख्या भूल से एक प्रचण्ड वायु के अर्थ में करते हैं। मैं सचमुच मानता हूँ कि जो असाधारण होता है उसे प्रायः ईश्वरीय कहा जाता है; परन्तु इस स्थान में भविष्यद्वक्ता यह व्यक्त करना चाहता था कि परमेश्वर के पास वायुएँ सदा तैयार रहती हैं, जिनके द्वारा वह मनुष्यों में जो भी बल हो या दिखाई दे, उसे सुखा सकता है। इसलिये यहोवा का नाम प्राकृतिक कारणों या साधनों के विरोध में रखा गया है। अतः एप्रैम के कुण्डों को सुखानेवाली वायु कोई संयोगवश चलनेवाली वायु न होगी, वरन् परमेश्वर की युक्ति और निश्चित अभिप्राय से उठाई गई वायु होगी; मानो उसने कहा हो, "यह वायु परमेश्वर का कोड़ा होगी।"

अतः यहाँ हमें यह सिखाया जाता है कि जब परमेश्वर कुछ समय के लिये हमें आशीष देता है, तब हमें चौकस रहना चाहिए कि हम उसके उपकार का दुरुपयोग न करें और झूठा भरोसा न पालें, जैसा हम देखते हैं कि एप्रैम ने किया था: क्योंकि वह अपने भाइयों के बीच फूला-फला, और फिर उसने अपना सिर ऊँचा किया; और इस प्रकार उसने अपने घमण्ड और अहंकार के द्वारा परमेश्वर के उपकार को मिटा दिया। अतः समृद्धि के समय हमें सदा डरते रहना चाहिए, कहीं ऐसा ही कुछ हमारे साथ न हो। तो परमेश्वर जितनी अधिक कृपा से हमारे साथ व्यवहार करता है, उतनी ही अधिक निरन्तरता से हमें उससे प्रार्थना करने के लिये जागृत होना चाहिए, कि वह अपने काम को अन्त तक पहुँचाने की कृपा करे, ऐसा न हो कि जब परमेश्वर हम पर कृपालु है, तब हम अपने सुख-भोगों में ऊँघते रहें। यह बात पहले तो हमें स्मरण रखनी चाहिए। फिर हमें भविष्यद्वक्ता की इस चेतावनी पर भी ध्यान देना चाहिए कि परमेश्वर अचानक, और मानो क्षण भर में, मनुष्यों की समृद्धि को उलट सकता है, कि इस संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं जो उसी क्षण बदल न जाए जब कभी परमेश्वर अपना अनुग्रह हम से हटा ले। अतः यह तुलना प्रायः हमारे मन में आनी चाहिए; जब वायुमण्डल शान्त होता है, जब ऋतु स्थिर होती है, तब क्षण भर में एक वायु उठेगी, जो पृथ्वी को सुखा देगी, जो सोतों को भी सूखा कर देगी; और फिर भी सोतों का बल सदा बना रहनेवाला जान पड़ता है; तो हम पर क्या कुछ नहीं आ सकता? क्या प्रभु किसी भी क्षण हमें सूखा नहीं कर सकता, जब हमारे भीतर बल का कोई स्रोत ही नहीं? वह सचमुच इस स्थान में वह बात कह सकता था जो हम यशायाह के 40वें अध्याय में पाते हैं, कि मनुष्य उस फूल के समान है जो शीघ्र मुरझा जाता है; परन्तु वह कुछ और अधिक गहरी बात व्यक्त करना चाहता था; क्योंकि यह प्रजा, अपनी ही शक्ति में गहराई से जमी हुई, सोचती थी कि उन्हें अक्षय सोतों से जल मिलता है, और कि उनका बल सुखाया नहीं जा सकता: इसलिये वह कहता है, "यद्यपि तेरे पास सोते और कुण्ड हैं, तौभी परमेश्वर तुझे सुखा देगा; क्योंकि वह ऐसी वायु ढूँढ़ निकालेगा जिसमें, जैसा अनुभव प्रमाणित करता है, कुण्डों और सोतों को सुखाने का सामर्थ्य है।"

परन्तु आगे यह आता है, वह हर मनभावने पात्र का भण्डार लूट लेगी। यह वायु पर अनुचित रीति से लागू किया गया जान पड़ सकता है; तौभी भविष्यद्वक्ता का अर्थ पर्याप्त रूप से स्पष्ट है, अर्थात् यह कि जब प्रभु अपनी वायु को उठाएगा, तब एप्रैम के गोत्र में कुछ भी अछूता न रहेगा। मानो वह कहता है, "तुम्हारे भण्डार चाहे कितने ही छिपे हुए हों, तौभी यह वायु भीतरी से भीतरी कोठरियों में घुस जाएगी, यहाँ तक कि कुछ भी उसकी प्रचण्डता से सुरक्षित न रहेगा।" संक्षेप में, भविष्यद्वक्ता का अर्थ यह है कि परमेश्वर के पलटे का बल इतना प्रचण्ड होगा कि एप्रैम अपने किसी भी गढ़ में सुरक्षित न रह सकेगा; क्योंकि परमेश्वर की वायु पृथ्वी के भीतरी से भीतरी सोतों तक घुस जाएगी। यही अर्थ है। आगे यह आता है —

होशे 13:16

16. शोमरोन उजाड़ हो जाएगा; क्योंकि उसने अपने परमेश्वर से बलवा किया है: वे तलवार से गिरेंगे: उनके बच्चे पटक दिए जाएँगे, और उनकी गर्भवती स्त्रियाँ चीर डाली जाएँगी।

16. Desolabitur Samaria, quia exacerbavit Deum suum: in gladio cadent; parvuli eorum allidentur, gravidae eorum scindentur.

यह प्रवचन का उपसंहार है: अतः इस पद को पिछले अध्याय से अलग करना अनुचित रहा है; क्योंकि भविष्यद्वक्ता यहाँ किसी नये विषय में प्रवेश नहीं करता, वरन् केवल उसी बात की पुष्टि करता है जो उसने शोमरोन और सारे राज्य के अन्तिम विनाश के विषय में कही थी। तो शोमरोन उजाड़ किया जाएगा; मानो उसने कहा हो, "मैं तुम्हारे विरुद्ध बार-बार वह घोषणा कर चुका हूँ जिस पर तुम विश्वास नहीं करते, कि विनाश निकट आ पहुँचा है; अब इसका निश्चय कर लो; परन्तु यदि तुम विश्वास न भी करो, तौभी परमेश्वर वह पूरा करेगा जो उसने ठान लिया है, और जो वह अब मेरे मुँह से घोषित करता है।" साथ ही वह इसका कारण जोड़ता है, क्योंकि उन्होंने अपने परमेश्वर को क्रोध दिलाया है। कि वे यह शिकायत न करें कि उनके साथ कठोरता से व्यवहार किया गया, वह कहता है कि उन्होंने केवल वही दण्ड भोगा जिसके वे योग्य थे। वह उस विनाश का प्रकार भी बताता है जो होनेवाला था, वे तलवार से गिरेंगे, उनके बच्चे पटक दिए जाएँगे, और उनकी गर्भवती स्त्रियाँ चीर डाली जाएँगी, कि बच्चा गर्भ से निकाला जाए। यह कहकर कि शोमरोन के नागरिक, और सारे देश के निवासी, तलवार से गिरेंगे, वह निस्सन्देह यह संकेत करता है कि परमेश्वर इस प्रकार के दण्ड का प्रयोग करेगा, अर्थात् ऐसे शत्रुओं को बुलवाकर जो उन्हें विनाश के लिये सौंप देंगे।

98 यशायाह 40:6-8। — fj. 99 मूल में चौदहवाँ अध्याय इसी पद से आरम्भ होता है; परन्तु हमारे अपने अनुवाद का विभाजन बनाए रखना उत्तम समझा गया है।

अतः अब हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता के शब्दों में क्या सम्मिलित है। पहले वह दिखाता है कि शोमरोन और इस्राएल के सारे राज्य का अन्त हो चुका था; क्योंकि परमेश्वर उन्हें किसी भी रीति से मन फिराव तक न ला सका, इसलिये अब वह ऐसे निराशाजनक हठ का पलटा लेगा। इसके बाद वह दिखाता है कि परमेश्वर यह न्याय से करेगा, क्योंकि उसे क्रोध दिलाया गया था; और अन्त में, वह दिखाता है कि उनका दण्ड किस प्रकार का होगा। कि वे यह न सोचें कि अश्शूरी संयोग से आएँगे, भविष्यद्वक्ता कहता है कि यह सेना, जो शोमरोन के देश पर चढ़ाई करके उसे नाश करनेवाली थी, मानो परमेश्वर के हाथ से चलाई जाएगी; क्योंकि यद्यपि अश्शूरी अपनी सीमाएँ बढ़ाना चाहते थे, और अपने ही लोभ और लालसा से प्रेरित थे, तौभी परमेश्वर अपने न्याय को पूरा करने के लिये उन्हें साधनों के रूप में प्रयोग करेगा; और कि वे जानें कि वह पलटा कितना भयानक होगा, वह दो प्रकार की विपत्तियों का वर्णन करता है, — कि उनके बच्चे पटक दिए जाएँगे, और कि उनकी स्त्रियाँ चीर डाली जाएँगी, और उनकी सन्तान उनके गर्भ से निकाली जाएगी। इसकी चर्चा करना भी भयानक है; और ऐसा कभी नहीं होता, सिवा तब के जब शत्रु अत्यन्त क्रोधित और अत्यधिक भड़के हुए हों। अतः अब हम भविष्यद्वक्ता का अर्थ समझ गए हैं।

परन्तु यदि कोई आपत्ति करे और कहे कि शिशु, और वे बच्चे जो अभी अपनी माताओं के गर्भ में छिपे हैं, ऐसे भारी दण्ड के योग्य नहीं, क्योंकि उन्होंने अब तक ऐसा कुछ कमाया नहीं; तो इसका उत्तर यह दिया जा सकता है कि सारी मानवजाति परमेश्वर के सामने दोषी है, यहाँ तक कि शिशु भी, यद्यपि अभी उजियाले में नहीं आए, तौभी दोष के अधीन होने के कारण उसमें सम्मिलित हैं; इसलिये परमेश्वर पर क्रूरता का दोष नहीं लगाया जा सकता, यद्यपि वह उनके प्रति अपने अधिकार का प्रयोग करे। और फिर, हम सुनते हैं कि वह बहुत से स्थानों में क्या घोषणा करता है, कि वह पितरों के पापों का दण्ड उनकी सन्तान पर डालेगा। जब ऐसा है, तो आइए, हम परमेश्वर के इन भयानक न्यायों में सन्तुष्ट रहना सीखें, यद्यपि वे हमारी भावनाओं के बहुत विरुद्ध हों; क्योंकि हम जानते हैं कि हमें परमेश्वर से विवाद नहीं करना चाहिए, और ऐसा करना अत्यन्त ढिठाई होगी; वरन् यह अधर्मपूर्ण दुस्साहस होगा। अतः यद्यपि इस दण्ड का कारण हमें दिखाई न दे, तौभी हमें परमेश्वर के इस न्याय को श्रद्धा के साथ देखना चाहिए। इसके अतिरिक्त हम इस प्रकार तर्क कर सकते हैं — यदि शिशु, यहाँ तक कि वे भी जो अभी माता के गर्भ में छिपे हैं, न छोड़े जाएँ, तो वयस्कों का क्या होगा? उन बूढ़ों का क्या होगा जो अपने सारे जीवन भर परमेश्वर के पलटे को भड़काते रहे हैं? निस्सन्देह प्रभु का अभिप्राय इन शब्दों के द्वारा अपने वचन के उन अधर्मी तुच्छ जाननेवालों को भयभीत करना था, जिनसे उसका काम पड़ा था। वह कहता है, "तुम्हारे ऊपर कितना बड़ा न्याय लटक रहा है, और कितना भयंकर! क्योंकि तुम्हारे शिशु भी छोड़े न जाएँगे: क्योंकि मैं तुम्हें भी उसी न्याय में लपेट लूँगा, जब वे अपनी माताओं के गर्भ से निकाले जाने के पश्चात् पत्थरों पर पटके जाएँगे। जब उन पर ऐसा भयानक दण्ड डाला जाएगा, तो तुम्हारे साथ क्या किया जाएगा? क्योंकि विपत्ति का कारण तो तुम ही में है।" अब हमने इस पद की व्याख्या कर दी है। इसके बाद एक उपदेश आता है।

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