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यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
इस छोटी-सी पुस्तक में मैंने कुछ ऐसे विचार और दृष्टान्त लिखे हैं जो मेरे मनन का परिणाम हैं। मैं न तो दार्शनिक हूँ और न धर्मविज्ञानी, बल्कि प्रभु का एक दीन सेवक हूँ, जिसका आनन्द परमेश्वर के प्रेम पर और उसकी सृष्टि के महान आश्चर्यों पर मनन करना है। मनन और प्रार्थना में अपनी भीतरी इन्द्रियों के द्वारा वास्तविकता के विषय में जो कुछ मैं जानता और अनुभव करता हूँ, उस सब का वर्णन करना असम्भव है। शब्द उन सब गहरे सत्यों को व्यक्त नहीं कर सकते जिन्हें प्राण उन गम्भीर क्षणों में अनुभव करता है। ऐसे सत्य, बिना बोले भी, ग्रहणशील मनों द्वारा तुरन्त और सरलता से समझ लिए जाते हैं। वास्तव में शब्द सच्ची समझ की अपेक्षा ग़लतफ़हमी की ओर अधिक ले जा सकते हैं।
मैं फिर कहता हूँ, मैं अपनी सब गहरी भावनाओं और विचारों को व्यक्त करने में असमर्थ हूँ, परन्तु मैं कम से कम उनमें से कुछ को जितना अच्छा हो सके लिखने का प्रयत्न करूँगा। यदि इस प्रयत्न से पाठकों को थोड़ी भी सहायता मिले, तो मैं आगे अपने दूसरे विचारों और अनुभवों को भी समझाने का प्रयत्न करूँगा, जिन्हें अभी मैं विभिन्न कारणों से जनता के सामने रखने में संकोच करता हूँ।
इस पुस्तक का उर्दू से अंग्रेज़ी में अनुवाद करने में मुझे डॉ. ए. जे. अप्पासामी, एम.ए. (हार्वर्ड) और डी.फ़िल. (ऑक्सन.), से जो बड़ी सहायता मिली है, उसे मैं यहाँ स्वीकार करना चाहता हूँ। बिशप्स कॉलेज, कलकत्ता, के रेवरेंड आर. डब्ल्यू. पेली का भी मैं आभारी हूँ, जिन्होंने पाण्डुलिपि पढ़ी और बहुत-से मूल्यवान सुधार सुझाए।
सुन्दर सिंह।
सुबाथू, शिमला की पहाड़ियाँ,
सितम्बर 1923।
