अध्याय 13 · स्वतंत्र इच्छा

अध्याय 13: स्वतंत्र इच्छा

साधु सुन्दर सिंह · वास्तविकता और धर्म, 1924

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    यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

    1. हम में भले और बुरे के बीच भेद पहचानने की, और दोनों में से किसी एक को चुनने की क्षमता है। इसका अर्थ है कि हम अपने अस्तित्व की सीमाओं के अनुसार कार्य करने के लिए स्वतंत्र हैं। नहीं तो भले और बुरे के बीच भेद करने की हमारी शक्ति का कोई अर्थ न होता। स्वाद की इन्द्रिय हमें बताती है कि क्या कड़वा है और क्या मीठा। यदि हम जो चाहें वह खाने के लिए स्वतंत्र न होते, तो स्वाद की इस इन्द्रिय का कोई अर्थ न होता। हम इसलिए स्वतंत्र नहीं कि हम अन्यथा कार्य कर सकते थे, बल्कि केवल इसलिए कि हम कार्य करते हैं।

    उदाहरण के लिए, यदि मुझमें सौ पाउण्ड उठाने की शक्ति है, तो मैं उसका पूरा या कुछ भाग उठाने के लिए स्वतंत्र हूँ। और यदि कोई बोझ सौ पाउण्ड से अधिक है, तो वह मेरी शक्ति से परे है और मेरे उत्तरदायित्व से भी परे; तब मैं वह बोझ उठाने की विवशता से मुक्त हूँ, क्योंकि जिसने वह बोझ मुझ पर रखा है, वह मुझसे उससे अधिक की माँग नहीं करेगा जितना मैं कर सकता हूँ। इसलिए दोनों स्थितियों में स्वतंत्रता है। और यदि मैं कोई ऐसा काम नहीं करता जो मेरी शक्ति की सीमाओं के भीतर है, तो मुझे अपनी कमी और उदासीनता के लिए दुःख उठाना पड़ेगा, क्योंकि मैंने उस शक्ति का दुरुपयोग किया है जो मुझे दी गई है।

    2. अपराधी को दण्ड देकर बुराई और अपराध मिटाए नहीं जा सकते। यदि ऐसा हो सकता, तो सब बन्दीगृह बन्द करने पड़ते। कुकर्मियों को दिए गए कठोर दण्ड के होते हुए भी हमें कोई परिवर्तन दिखाई नहीं देता। और न ही पृथ्वी पर से बुराई को तब तक हटाना सम्भव है जब तक हर मनुष्य अपनी स्वतंत्र इच्छा से अपनी क्षमता की पूरी सीमा तक उसे मिटाने का संकल्प न करे। दूसरों की ज़बरदस्ती से कोई प्रभाव नहीं होता। परमेश्वर हत्यारे का हाथ नहीं पकड़ता या झूठे के होंठ बन्द नहीं करता, क्योंकि वह मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा में हस्तक्षेप नहीं करता। यदि परमेश्वर ऐसा करता, तो मनुष्य एक यन्त्र के समान होता; और न वह सत्य की सराहना करता और उसके अनुसार कार्य करने में आनन्द पाता; क्योंकि आनन्द केवल स्वतंत्र इच्छा के कार्य का ही परिणाम हो सकता है।

    3. संसार, जो एक प्रकार से परमेश्वर से विद्रोही है, मसीह के पीछे चलने वालों को दास बना लेता है। जब परमेश्वर के अनुग्रह से वे संसार की शक्ति के बन्धन और नियन्त्रण से मुक्त होकर स्वर्गीय स्थानों में प्रवेश करते हैं, तब संसार स्वयं उनका दास बन जाता है, क्योंकि संसार पहचान लेता है कि उनका सम्बन्ध उस जीवित सामर्थ्य से हो गया है जिसने उसे रचा है। तब जय पाने के बदले वह स्वयं पराजित होता है। जो लोग अपनी स्वतंत्र इच्छा से प्रेम के साथ उसकी सेवा करते हैं, उन्हें परमेश्वर सदा के लिए पूर्ण स्वतंत्रता देता है।

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