उपदेश 3 / 14

त्रिएकता के बाद पन्द्रहवाँ रविवार

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त्रिएकता के बाद पन्द्रहवाँ रविवार

यह उपदेश चर्च पोस्टिल (कलीसियाई उपदेश-संग्रह) के सभी संस्करणों में मिलता है, परन्तु संस्करण c. में यह कुछ भिन्न है।

इसलिए हम अतिरिक्त सामग्री को दूसरे उपदेश में जोड़ते हैं। Erl. 14, 87; W. 11, 2168; St. L. 11, 1614.

पाठ: मत्ती 6, 24-34· कोई मनुष्य दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता: क्योंकि वह या तो एक से बैर और दूसरे से प्रेम रखेगा; या एक से लगा रहेगा और दूसरे को तुच्छ जानेगा। तुम परमेश्वर और मैमन दोनों की सेवा नहीं कर सकते। इसलिए मैं तुम से कहता हूँ, अपने प्राण के लिए यह चिन्ता न करना कि हम क्या खाएँगे, या क्या पीएँगे; और न अपने शरीर के लिए कि क्या पहिनेंगे। क्या प्राण भोजन से, और शरीर वस्त्र से बढ़कर नहीं? आकाश के पक्षियों को देखो, कि वे न बोते हैं, न काटते हैं, और न खत्तों में बटोरते हैं; तौभी तुम्हारा स्वर्गीय पिता उनको खिलाता है। क्या तुम उनसे अधिक मूल्य नहीं रखते? और तुम में से कौन है जो चिन्ता करके अपनी आयु में एक हाथ भी बढ़ा सकता है? और वस्त्र के लिए तुम क्यों चिन्ता करते हो?

जंगल के सोसनों पर ध्यान करो कि वे कैसे बढ़ते हैं; वे न तो परिश्रम करते हैं, न कातते हैं: तौभी मैं तुम से कहता हूँ कि सुलैमान भी अपने सारे वैभव में उनमें से किसी एक के समान वस्त्र पहिने हुए न था। इसलिए जब परमेश्वर मैदान की घास को, जो आज है और कल भाड़ में झोंकी जाएगी, ऐसा वस्त्र पहिनाता है, तो हे अल्पविश्वासियो, क्या वह तुम्हें उससे कहीं बढ़कर न पहिनाएगा?

इसलिए तुम चिन्ता करके यह न कहना कि हम क्या खाएँगे? या क्या पीएँगे? या क्या पहिनेंगे? क्योंकि अन्यजाति इन सब वस्तुओं की खोज में रहते हैं; क्योंकि तुम्हारा स्वर्गीय

पिता जानता है कि तुम्हें इन सब वस्तुओं की आवश्यकता है। परन्तु पहले तुम उसके राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज करो, तो ये सब वस्तुएँ भी तुम्हें मिल जाएँगी। इसलिए कल के लिए चिन्ता न करो; क्योंकि कल का दिन अपनी चिन्ता आप कर लेगा।

आज के लिए आज ही का दुःख बहुत है।

परमेश्वर या मैमन। लोभ और सांसारिक वस्तुओं की चिन्ता के विरुद्ध चेतावनी, और विश्वास के लिए प्रेरणा।

त्रिएकता के बाद पन्द्रहवाँ रविवार

I. चेतावनी।

I. यह चेतावनी सामान्य रूप में।

1. मसीह यहाँ तुरन्त कैसे अपने राज्य और संसार के राज्य के बीच का भेद दिखाता है। 1.

2. जिन लोगों को सम्बोधित किया गया है उनका स्वरूप। 2.

II. यह चेतावनी विस्तार से।

A. इस चेतावनी का समय, अर्थ और समझ। 3-4f.

* लोभ और मैमन के विषय में।

1. ऐसे लोग बहुत ही थोड़े हैं जो मैमन की उपासना से मुक्त हों। 5-8.

2. जो लोग लोभ में पड़े हैं वे परमेश्वर और उसके वचन को इतना कम मूल्य क्यों और कैसे देते हैं। 9.

3. लोभ को मूर्तिपूजा क्यों कहा गया है।

4. मैमन की उपासना करना बड़ी और भयानक मूर्खता है। 10-13.

5. लोभ सब बुराइयों में सबसे बुरा है। 6. यदि मैमन से हमें हानि न उठानी हो, तो हमें उसके प्रति कैसा आचरण करना चाहिए।

B. इस चेतावनी के साथ जोड़े गए प्रेरक कारण।

1. पहला प्रेरक कारण सामान्य रूप में इस विचार से निकलता है कि मनुष्य को भोजन और वस्त्र के लिए अत्यधिक चिन्तित नहीं होना चाहिए। 20-27.

परिश्रम और चिन्ता के विषय में। a. चिन्ता वर्जित है, परन्तु परिश्रम नहीं। 21. b. परमेश्वर परिश्रम के बिना अपनी आशीष नहीं देता। 22. c. उन लोगों को उत्तर जो पवित्रशास्त्र से अपनी चिन्ता को उचित ठहराना चाहते हैं। 23-24. d. शिक्षा-सम्बन्धी और घरेलू जीवन में परिश्रम और चिन्ता। 25-26. e. मनुष्य को परिश्रम करना चाहिए और देखभाल तथा चिन्ता को … पर छोड़ देना चाहिए 2. दूसरा प्रेरक कारण इस बात पर बल देता है कि मनुष्य को अपनी दैनिक रोटी जुटाने की चिन्ता नहीं करनी चाहिए।

3. तीसरा प्रेरक कारण इस बात पर बल देता है कि मनुष्य को अपने वस्त्र जुटाने की चिन्ता नहीं करनी चाहिए a. इस प्रेरक कारण का स्वरूप। b. यह प्रेरक कारण बहुत सामर्थी है और मनुष्यों को लज्जित करता है।

* इस सुसमाचार का सारांश। 35.

इस सुसमाचार का सारांश: 1. मनुष्य परमेश्वर और मैमन दोनों की सेवा नहीं कर सकता; क्योंकि जैसा पौलुस कहता है: "परन्तु जो धनी होना चाहते हैं, वे ऐसी परीक्षा और फन्दे और बहुत सी मूर्खतापूर्ण और हानिकारक लालसाओं में फँसते हैं, जो मनुष्यों को बिगाड़ देती हैं और विनाश के समुद्र में डुबा देती हैं।" 1 तीमुथियुस 6, 9.

2. हमें परिश्रम करना चाहिए, परन्तु चिन्ता परमेश्वर पर छोड़ देनी चाहिए; जैसे किसान, जब वह सब कुछ कर चुकता है, तब भी फल और फसल की आशा परमेश्वर से ही रखता है। परन्तु इसी बात में हम सब परखे और परीक्षा में डाले जाते हैं।

3. जब परमेश्वर अपने रचे हुए प्राणियों को वस्त्र पहिनाता और खिलाता है, तो वह हमें और भी अधिक वस्त्र पहिनाएगा और खिलाएगा, जिनका वह सृष्टिकर्ता होने के साथ-साथ पिता भी है।

4. जो परमेश्वर पर भरोसा नहीं रखते, परन्तु अपनी ही बुद्धि और दूरदर्शिता पर निर्भर रहते और भरोसा करते हैं, वे मसीही नहीं, बल्कि अन्यजाति हैं।

5. हमें प्रार्थना में परमेश्वर से केवल यही माँगना चाहिए कि हम विश्वास के द्वारा उसकी सन्तान बनें, तब हमारा स्वर्गीय पिता सांसारिक आशीषें भी पर्याप्त मात्रा में हमें जोड़कर दे देगा। बच्चे अपनी चिन्ता आप नहीं करते, परन्तु उनका पिता उनकी चिन्ता करता है। यह एक बड़ी प्रतिज्ञा और निमन्त्रण है।

1. इस सुसमाचार में हम देखते हैं कि परमेश्वर मसीहियों को अन्यजातियों से कैसे अलग करता है। क्योंकि प्रभु ये शिक्षाएँ अन्यजातियों को नहीं देता, क्योंकि वे इन्हें ग्रहण नहीं कर सकते थे, परन्तु अपने मसीहियों को देता है। तौभी वह उन मसीहियों का विचार नहीं करता जो उसका वचन केवल सुनते हैं, ताकि उसे सीख लें और

उसे दोहरा सकें, जैसे भिक्षुणियाँ भजन संहिता को दोहराती हैं। इस रीति से तो शैतान भी सुसमाचार और परमेश्वर का वचन सुनता है, हाँ, वह उसे हम से कहीं अधिक अच्छी तरह जानता है, और यदि वह चाहे तो हमारे समान ही उसका प्रचार भी कर सकता है; परन्तु सुसमाचार ऐसी शिक्षा है जिसे एक जीवित सामर्थ बनना चाहिए और व्यवहार में लाया जाना चाहिए; उसे लोगों को दृढ़ करना और शान्ति देना चाहिए, और उन्हें साहसी और उत्साह से आगे बढ़नेवाला बनाना चाहिए।

2. इसलिए जो लोग सुसमाचार को केवल इसी रीति से सुनते हैं कि उसे जान लें और परमेश्वर के ज्ञान के विषय में बोल सकें, वे मसीहियों में गिने जाने के योग्य नहीं; परन्तु जो सुसमाचार की शिक्षा के अनुसार करते हैं, वे ही सच्चे मसीही हैं। परन्तु ऐसे लोग बहुत ही थोड़े पाए जाते हैं; हम सुननेवाले तो बहुत देखते हैं, परन्तु सब के सब सुसमाचार पर चलनेवाले नहीं हैं। अब हम और निकटता से जाँचना चाहते हैं कि प्रभु इस

सुसमाचार में किस प्रकार की शिक्षा देता है। पहले, वह एक सीधे-सादे, स्वाभाविक उदाहरण से आरम्भ करता है, जिससे हम सब को मानना पड़े कि यह सच है; अनुभव भी हर एक को यही सिखाता है। वह कहता है:

"कोई मनुष्य दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता: क्योंकि वह या तो एक से बैर और दूसरे से प्रेम रखेगा: या एक से लगा रहेगा और दूसरे को तुच्छ जानेगा।"

3. अब जो दो स्वामियों की सेवा करने का प्रयत्न करता है, वह ऐसी रीति से करेगा जिसे सेवा कहा ही नहीं जा सकता; क्योंकि निश्चय ही वैसा ही होगा जैसा प्रभु यहाँ कहता है। कोई सेवक को उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई काम करने के लिए विवश तो कर सकता है, और वह उसे करते हुए कुढ़ता रहे; परन्तु कोई उसे इस बात के लिए विवश नहीं कर सकता कि वह उसे आनन्द से करे और हृदय की गहराई से करे।

वह निस्सन्देह तब तक काम करता है जब तक उसका स्वामी उपस्थित रहता है, परन्तु जब वह अनुपस्थित होता है, तो वह अपने काम से भाग खड़ा होता है और कुछ भी ठीक से नहीं करता। इसलिए प्रभु चाहता है कि हमारी सेवा प्रेम से और आनन्द से की जाए, और जहाँ वह ऐसे नहीं की जाती, वहाँ वह उसके लिए कोई सेवा नहीं है: क्योंकि मनुष्य भी प्रसन्न नहीं होते जब कोई उनके लिए कुछ अनिच्छा से करता है। यह स्वाभाविक है, और हम प्रतिदिन अनुभव करते हैं कि ऐसा ही है। अब, यदि मनुष्यों के बीच यह बात है कि कोई दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता, तो परमेश्वर की सेवा में यह कितना अधिक सत्य है कि हमारी सेवा बाँटी नहीं जा सकती; परन्तु वह केवल परमेश्वर ही के लिए, स्वेच्छा से और हृदय से की जानी चाहिए; इसलिए प्रभु आगे कहता है:

"तुम परमेश्वर और मैमन दोनों की सेवा नहीं कर सकते।"

4. परमेश्वर हमें अपने सिवा कोई और प्रभु रखने नहीं दे सकता। वह जलन रखनेवाला परमेश्वर है, जैसा वह कहता है, और यह सह नहीं सकता कि हम उसकी और उसके शत्रु की भी सेवा करें। वह कहता है, केवल मेरी, अन्यथा बिलकुल नहीं। अब देखो, मसीह यहाँ कितनी सुन्दरता से यह उदाहरण प्रस्तुत करता है: वह कहता है, "कोई मनुष्य दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता; क्योंकि वह या तो एक से बैर और दूसरे से प्रेम रखेगा; या एक से लगा रहेगा और दूसरे को तुच्छ जानेगा। तुम

परमेश्वर और मैमन दोनों की सेवा नहीं कर सकते।" मानो वह कहता है: जैसा यहाँ मनुष्य के अपने साथियों के साथ सम्बन्धों में होता है, वैसा ही परमेश्वर के सामने भी है।

5. हम बहुत ही थोड़े लोग ऐसे पाते हैं जो सुसमाचार के विरुद्ध पाप नहीं करते।

प्रभु एक कठोर न्याय सुनाता है, और यह सुनना भयानक है कि वह हमारे विषय में ऐसा कहे, और तौभी कोई इसे मानेगा नहीं, हाँ, कोई यह कहा जाना भी सहन नहीं करेगा कि हम परमेश्वर से बैर रखते और उसे तुच्छ जानते

हैं और कि हम उसके शत्रु हैं। कोई भी ऐसा नहीं है जिससे पूछा जाए कि क्या वह परमेश्वर से प्रेम रखता है और उससे लगा रहता है, तो वह यह उत्तर न दे, हाँ, मैं परमेश्वर से प्रेम रखता हूँ।

परन्तु देखो कि पाठ किस बात पर समाप्त होता है, कि हम सब परमेश्वर से बैर रखते और उसे तुच्छ जानते हैं, और मैमन से प्रेम रखते और उससे लगे रहते हैं। परन्तु परमेश्वर हमें अपने समय तक ऐसा करने देता है; वह समय की प्रतीक्षा करता है, और किसी दिन, इससे पहले कि हम मुड़ भी सकें, वह पूरे बल से हमारे बीच में प्रहार करेगा। यह असम्भव है कि जो सोने और पार्थिव सम्पत्ति से प्रेम रखता और उनसे लगा रहता है, वह परमेश्वर से बैर न रखे। क्योंकि परमेश्वर यहाँ इन दोनों को एक-दूसरे के शत्रु के रूप में आमने-सामने रखता है, और निष्कर्ष निकालता है: यदि तुम इन दोनों में से एक से प्रेम रखते और उससे लगे रहते हो, तो तुम्हें दूसरे से बैर रखना और उसे तुच्छ जानना ही पड़ेगा।

इसलिए, कोई यहाँ पृथ्वी पर कितने ही सुन्दर और शिष्ट ढंग से क्यों न जीए और धन से लगा रहे, यह अन्यथा हो ही नहीं सकता कि वह परमेश्वर से बैर रखे; और दूसरी ओर, जो कोई सोने और सांसारिक सम्पत्ति से नहीं लगा रहता, वह परमेश्वर से प्रेम रखता है। यह निश्चय ही सत्य है।

6. परन्तु वे कौन हैं जो परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, और सोने और सांसारिक सम्पत्ति से नहीं लगे रहते? सारे संसार पर, और मसीहियों पर भी, अच्छी तरह दृष्टि डालो, और देखो कि क्या वे सोने और धन को तुच्छ जानते हैं। सुसमाचार सुनना और उसके अनुसार जीना परिश्रम माँगता है। परमेश्वर की स्तुति हो, हमारे पास सुसमाचार है; इसे कोई नकार नहीं सकता, परन्तु हम उसके साथ क्या करते हैं? हमें केवल उसे सीखने और जानने की चिन्ता है, और इससे अधिक कुछ नहीं; हम सोचते हैं कि उसे जान लेना ही पर्याप्त है, और इसकी परवाह नहीं करते

कि हम कभी उसके अनुसार जीएँगे भी या नहीं। परन्तु दूसरी ओर, जब कोई खिड़की में या कमरे में एक-दो डॉलर, हाँ, एक दस सेंट का सिक्का भी पड़ा छोड़ देता है, तो वह बहुत व्याकुल होता है; तब वह चिन्ता करता और डरता है कि कहीं पैसा चोरी न हो जाए; परन्तु वही मनुष्य पूरे वर्ष भर सुसमाचार के बिना रह सकता है। और ऐसे लोग फिर भी चाहते हैं कि उन्हें [मसीही] समझा जाए। 7. यहाँ हम देखते हैं कि हम क्या और कौन हैं। यदि हम मसीही होते, तो हम धन को तुच्छ जानते और सुसमाचार की चिन्ता करते, कि किसी दिन हम उसमें जीएँ और अपने कामों से उसे प्रमाणित करें। ऐसे मसीही हम थोड़े ही देखते हैं; इसलिए हमें यह न्याय-वचन सुनना ही पड़ेगा कि हम परमेश्वर को तुच्छ जाननेवाले हैं और धन और सांसारिक सम्पत्ति के कारण परमेश्वर से बैर रखते हैं।

हाय! यह कैसी अच्छी प्रशंसा है! हमें अपने अन्तरतम प्राण में अपने आप पर लज्जित होना चाहिए; हमारे लिए कोई आशा नहीं! अब हम कैसी अच्छी दशा में हैं! मेरी समझ में इसका अर्थ यह है कि हमारे नाम मिटा दिए गए हैं। हम कैसी बिगड़ी हुई सन्तान हैं!

8. अब संसार अपने मोटे, बाहरी पापों में अपने अविश्वास को छिपा नहीं सकता, क्योंकि मैं देखता हूँ कि वह मसीह से अधिक एक डॉलर से प्रेम रखता है; सब प्रेरितों से भी अधिक, चाहे वे स्वयं उपस्थित होकर उसे प्रचार करें। मैं प्रतिदिन सुसमाचार सुन सकता हूँ, परन्तु वह हर दिन मुझे लाभ नहीं पहुँचाता; ऐसा भी हो सकता है,

कि यदि मैंने उसे पूरे वर्ष भर सुना हो, तो पवित्र आत्मा मुझे केवल एक घड़ी के लिए दिया गया हो। अब जब मैंने उस घड़ी का आनन्द लिया, तो मैंने केवल पाँच सौ डॉलर ही नहीं, बल्कि सारे संसार का धन पा लिया; क्योंकि जब मेरे पास सुसमाचार है तो मेरे पास क्या नहीं है? मैंने परमेश्वर को पाया, जिसने चाँदी और सोना और पृथ्वी पर का सब कुछ बनाया; क्योंकि मैंने वह आत्मा पाया जिसके द्वारा मैं जानता हूँ कि वह मुझे सदा तक सुरक्षित रखेगा; यह इससे कहीं बढ़कर है कि मेरे पास पैसों से भरा गिरजाघर होता। अब जाँचो और देखो कि क्या हमारा हृदय एक धूर्त, दुष्टता और अविश्वास से भरा हुआ नहीं है। यदि मैं सच्चा मसीही होता, तो मैं कहता: जिस घड़ी सुसमाचार ग्रहण किया जाता है, उस घड़ी मेरे पास एक लाख डॉलर, और उससे भी कहीं अधिक आ जाता है। क्योंकि यदि यह खज़ाना मेरे पास है, तो स्वर्ग और पृथ्वी पर जो कुछ है वह सब मेरे पास है। परन्तु मनुष्य को केवल इसी खज़ाने की सेवा करनी चाहिए, क्योंकि कोई मनुष्य परमेश्वर और मैमन दोनों की सेवा नहीं कर सकता। या तो तुम्हें परमेश्वर से प्रेम और पैसे से बैर रखना होगा;

या तुम्हें परमेश्वर से बैर और पैसे से प्रेम रखना होगा; यही, और इससे अधिक कुछ नहीं।

9. गुरु यहाँ इब्रानी भाषा का प्रयोग करता है, जिसका हम नहीं करते।

"मैमन" का अर्थ है माल या धन, और ऐसा माल जिसकी मनुष्य को आवश्यकता नहीं, परन्तु जिसे वह खज़ाने के रूप में रखता है; और यह वह सोना और सम्पत्ति है जिसे मनुष्य पूँजी और भण्डार की सामग्री के रूप में जमा करता है।

मसीही ऐसा नहीं करते, वे कोई खज़ाने नहीं बटोरते; परन्तु वे परमेश्वर से अपनी दैनिक रोटी माँगते हैं। परन्तु दूसरे लोग इससे सन्तुष्ट नहीं होते, वे एक बड़ा भण्डार बटोरते हैं जिस पर वे निर्भर रह सकें, ताकि यदि हमारा परमेश्वर आज या कल मर जाए, तो उन्हें कोई बचाव का मार्ग मालूम रहे। इसलिए सन्त

पौलुस इफिसियों 5, 5 और कुलुस्सियों 3, 5 में कहता है कि धन और लोभ इस संसार का ईश्वर हैं और मूर्तिपूजा हैं; इसी से मसीह यहाँ सहमत है और इसे मैमन की सेवा करना कहता है।

10. अब, ऐसा क्यों है कि सुसमाचार और सन्त पौलुस दूसरे पापों को नहीं, बल्कि विशेष रूप से लोभ को मूर्तिपूजा कहते हैं; जबकि अशुद्धता, व्यभिचार, कामवासना, नीच लालसाएँ, अपवित्रता और दूसरे दुर्गुण परमेश्वर के अधिक विरोधी हैं? यह हमारी बड़ी लज्जा के लिए किया गया है, क्योंकि सोना हमारा ईश्वर है, जिसकी हम सेवा करते हैं, इस रीति से कि हम उस पर भरोसा और निर्भरता रखते हैं, और वह न तो हमें सम्भाल सकता है न बचा सकता है, हाँ, वह न खड़ा हो सकता है न चल सकता है, न सुनता है न देखता है, उसमें न बल है न सामर्थ, उसके पास न शान्ति है न सहायता। क्योंकि यदि किसी के पास सारे संसार का धन भी हो, तो वह मृत्यु के सामने एक क्षण के लिए भी सुरक्षित न होगा।

11. जब मृत्यु की घड़ी आती है और सम्राट को मरने के लिए बुलाया जाता है, तब उसके बड़े खज़ाने और धन उसके किस काम आते हैं? वे एक लज्जाजनक, घृणित, शक्तिहीन ईश्वर हैं, जो एक घाव भी चंगा नहीं कर सकता, हाँ, वह अपने आप को भी सम्भाल और अपनी रखवाली नहीं कर सकता; वहाँ वह सन्दूक में पड़ा रहता है और अपने भक्तों को प्रतीक्षा करवाता है, हाँ, मनुष्य को एक असहाय, शक्तिहीन, निर्बल वस्तु के समान उसकी चौकसी करनी पड़ती है। जिस स्वामी के पास यह ईश्वर है, उसे दिन-रात चौकसी करनी पड़ती है कि कहीं चोर उसे चुरा न ले जाएँ; यह असहाय ईश्वर किसी की सहायता नहीं कर सकता। तुम्हें इस निर्जीव ईश्वर को तुच्छ जानना चाहिए, जो तनिक भी सहायता नहीं कर सकता, और फिर भी इतना नखरेबाज़ और कीमती है; वह अपने भक्तों से बड़े ठाठ से प्रतीक्षा करवाता है और मज़बूत सन्दूकों और गढ़ों से अपनी रक्षा करता है; उसके स्वामी को हर घड़ी प्रतीक्षा और चिन्ता में रहना पड़ता है कि कहीं वह आग से नष्ट न हो जाए या किसी और प्रकार से उस पर

कोई विपत्ति न आ पड़े। यदि यह खज़ाना या ईश्वर वस्त्रों में हो, तो मनुष्य को छोटे से छोटे कीड़ों से, कपड़े के कीड़े से, सावधान और चौकस रहना पड़ता है, कि कहीं वे उसे नष्ट न कर दें या खा न जाएँ।

12. हमारे कमरों की दीवारों को घृणा से हम पर थूकना चाहिए, कि हम उस ईश्वर पर, जिसे कीड़ा खाता और काई बिगाड़ती है, उस परमेश्वर से अधिक भरोसा रखते हैं जो सब वस्तुओं को रचता और देता है, हाँ, जो स्वर्ग और पृथ्वी को और जो कुछ उनमें है, अपने हाथ में थामे हुए है। क्या यह संसार की ओर से मूर्खता की बात नहीं कि वह सच्चे परमेश्वर से मुँह मोड़कर नीच और तुच्छ मैमन पर भरोसा करे, उस दरिद्र, अभागे ईश्वर पर, जो जंग से भी अपनी रक्षा नहीं कर सकता? हाय, संसार की ओर से यह कैसी लज्जाजनक बात है! परमेश्वर सोने और सांसारिक सम्पत्ति पर अनेक प्रकार के शत्रु भेजता है, ताकि हम अपने अविश्वास और अधर्मी स्वभाव को देखें और मानें, कि हम इस प्रकार एक शक्तिहीन और नाशवान ईश्वर पर भरोसा रखते हैं, हम जो इतनी सरलता से तुरन्त सच्चे, सामर्थी और बलवन्त

परमेश्वर के पास जा सकते और उससे लगे रह सकते थे, जो हमें सब कुछ देता है, पैसा, माल, फल और जो कुछ हमें चाहिए; तौभी हम ऐसे मूर्ख हैं कि उसके दानों में से ईश्वर बना लेते हैं।

धिक्कार है तुझ पर, हे शापित अविश्वास।

13. दूसरे पाप हमें थोड़ा सा सुख देते हैं, हमें उनसे कुछ आनन्द मिलता है, जैसे खाने-पीने में; अपवित्रता में मनुष्य को थोड़ी देर के लिए सुख मिलता है; इसी प्रकार क्रोध भी अपनी लालसा को तृप्त करता है, और दूसरे दुर्गुण उससे भी अधिक। केवल इसी दुर्गुण में मनुष्य को निरन्तर दासत्व में रहना पड़ता है, खदेड़ा और सताया जाता है, और इसमें किसी को कोई भी सुख या आनन्द नहीं मिलता।

वहाँ पैसा ढेर पर पड़ा रहता है और तुम्हें आज्ञा देता है कि उसकी सेवा करो; इसके बजाय कि वह किसी को अपने में से एक अंगुश्ताना भर दाखमधु भी लेने दे, उस पर जंग लग जाता है और उसे खा जाता है, और तौभी वह उसे छूने का साहस नहीं करता, कहीं ऐसा न हो कि वह अपने ईश्वर को क्रोधित कर दे। और जब उसके सेवक बहुत समय तक अपने ईश्वर की रक्षा कर चुकते हैं, तब उनके पास किसी दरिद्र भिखारी से अधिक कुछ नहीं होता। मेरे पास कुछ नहीं है, तौभी मैं उतने ही मन से खाता-पीता हूँ जितना कोई भी जिसके पास मैमन का बड़ा भण्डार हो।

जब वह मरता है, तो वह अपने साथ ठीक उतना ही ले जाता है जितना मैं।

और यह निश्चय ही सच है कि ये लोग कभी उतने अच्छे और उतने समृद्ध ढंग से नहीं जीते जितना प्रायः दरिद्र लोग जीते हैं। इसका ऐसा प्रबन्ध कौन करता है? परमेश्वर, प्रभु, ऐसा करता है। यहाँ कुछ लोगों के शरीर में कोई ऐसा रोग है कि उन्हें भूख ही नहीं लगती; वहाँ

दूसरे भीतर से अस्वस्थ हैं और जो कुछ खाते हैं उसका कभी स्वाद नहीं ले पाते; यहाँ उनका पेट बिगड़ा हुआ है; वहाँ उनके फेफड़े और कलेजा रोगी हैं; यहाँ यह, और वहाँ वह बीमारी है; यहाँ वे एक स्थान पर निर्बल और पीड़ित हैं, वहाँ दूसरे पर, और उन्हें कभी एक भी सुखद घड़ी नहीं मिलती कि जो कुछ वे खाते या पीते हैं उसका स्वाद ले सकें।

14. यही दशा उन लोगों की है जो इस ईश्वर, मैमन, की सेवा करते हैं।

सच्चा परमेश्वर तो फिर भी किसी काम का है, वह लोगों की सेवा करता है, परन्तु मैमन ऐसा नहीं करता, वह चुपचाप पड़ा रहता है और दूसरों से अपनी सेवा करवाता है। और इसी कारण नया नियम लोभ को मूर्तिपूजा कहता है, क्योंकि वह इस प्रकार अपनी सेवा करवाना चाहता है। परन्तु प्रेम करना और आनन्द न उठा पाना तो शैतान को भी खिजा दे। इसका अनुभव अब वे सब करते हैं जो मैमन ईश्वर से प्रेम रखते और उसकी सेवा करते हैं।

जिसे अब भी लज्जा का कोई बोध नहीं होता और जिसका मुँह लाल नहीं होता, उसका चेहरा निर्लज्ज है।

15. तो अब "सेवा करना" शब्द के साथ यही बात है। क्योंकि पैसा और सम्पत्ति रखना वर्जित नहीं है, क्योंकि हम उनके बिना काम नहीं चला सकते। अब्राहम, लूत, दाऊद, सुलैमान और दूसरों के पास बड़ी सम्पत्ति और बहुत सोना था, और आज के दिन भी बहुत से धनवान लोग हैं जो अपने धन के रहते हुए भी भक्त हैं। परन्तु सम्पत्ति रखना एक बात है और उसकी सेवा करना दूसरी; मैमन रखना एक बात है, और उसमें से ईश्वर बना लेना दूसरी। अय्यूब भी धनवान था, उसके पास बड़ी सम्पत्ति थी और वह पूर्व में रहनेवाले सब लोगों से अधिक सामर्थी था, जैसा हम अय्यूब की पुस्तक के पहले भाग में पढ़ते हैं: तौभी वह अय्यूब 31, 24-25 में कहता है: "यदि मैंने सोने को अपनी आशा बनाया होता, और कुन्दन से कहा होता, तू मेरा भरोसा है; यदि मैं इस कारण आनन्दित हुआ होता कि मेरा धन बहुत था, और मेरे हाथ ने बहुत कुछ कमा लिया था?"

16. सब का सार यह है कि परमेश्वर की इच्छा है कि हम सोने और धन की सेवा न करें, और अपने प्राण के लिए अत्यधिक चिन्तित न हों; परन्तु परिश्रम करें और अपनी चिन्ता उसे सौंप दें। जिसके पास धन है, वह धन का स्वामी है। जो उसकी सेवा करता है, वह उसका दास है और वह धन उसका नहीं होता, बल्कि धन उसका स्वामी होता है; क्योंकि जब वह चाहे तब उसका उपयोग करने का साहस नहीं करता, और उससे दूसरों की सेवा नहीं कर सकता; हाँ, उसमें इतना साहस भी नहीं कि उसे छू सके। परन्तु यदि वह अपने धन का स्वामी है, तो धन उसकी सेवा करता है, और वह धन की सेवा नहीं करता; तब वह

उसका उपयोग करने का साहस करता है, जैसे अब्राहम, दाऊद, अय्यूब और दूसरे धनवान लोग, और वह अपनी चिन्ता केवल परमेश्वर पर डालता है, जैसा सन्त पौलुस 1 कुरिन्थियों 7, 32 में सिखाता है। इसलिए वह अपने धन से दरिद्रों की सहायता करता है और उन्हें देता है जिनके पास कुछ नहीं। जब वह किसी मनुष्य को बिना कोट के देखता है, तो वह अपने पैसे से कहता है: निकलो, श्रीमान डॉलरो, वहाँ एक दरिद्र, नंगा मनुष्य है जिसके पास कोट नहीं, तुम्हें उसके काम आना होगा! वहाँ एक रोगी पड़ा है, जिसके पास दवा नहीं। निकलो, ठाकुर आन्नेबर्गर और योआखिम्सटालर, तुम्हें जल्दी करके उसकी सहायता करनी होगी! जो लोग अपने धन के साथ ऐसा करते हैं, वे उसके स्वामी हैं; और सब सच्चे मसीही निश्चय ही ऐसा करते हैं।

परन्तु जो लोग पैसों के ढेर जमा करते हैं, और अपने ढेर को छोटा करने के बजाय सदा उसे बड़ा करने की युक्तियाँ सोचते रहते हैं, वे मैमन के सेवक और दास हैं।

17. मैमन का स्वामी वह है जो उसे पकड़कर उन लोगों के लिए उपयोग करता है जिन्हें उसकी आवश्यकता है, और परमेश्वर को राज्य करने देता है, जो लूका 6, 38 में कहता है: दो, तो तुम्हें दिया जाएगा; यदि तुम्हारे पास और कुछ नहीं, तो निश्चय ही मैं तो तुम्हारे पास अब भी हूँ, और मेरे पास अब भी पर्याप्त है, हाँ, जितना मैंने दे दिया है उससे अधिक, और जितना कभी दिया जा सकता है उससे भी अधिक मेरे पास है। हम यहाँ-वहाँ बहुत से भक्त दरिद्र लोगों को केवल इसी उद्देश्य से देखते हैं कि धनवान अपने धन से उनकी सहायता और सेवा करें। यदि तुम ऐसा नहीं करते, तो तुम्हारे पास यह पक्का प्रमाण है कि तुम परमेश्वर से बैर रखते हो। जिसे वह न्याय-वाक्य भयभीत नहीं करता, जो वह न्याय के दिन सुनेगा, उसे कोई भी बात हिला नहीं सकती। क्योंकि तब वह परमेश्वर से सुनेगा: देख, तूने मुझ से बैर रखा और उससे प्रेम रखा जो जंग और कीड़े से अपनी रक्षा भी नहीं कर सकता था। हाय, तब तुम कितनी दृढ़ता से खड़े रहोगे!

18. इसलिए अर्थ यह है कि हमें कुछ सम्पत्ति तो रखनी ही होगी, परन्तु अपने हृदय से उससे लगे नहीं रहना है; जैसा भजन संहिता 62, 10 कहता है:

"यदि धन बढ़े, तो उस पर मन न लगाना।"

हमें परिश्रम करना है; परन्तु अपने जीवन-निर्वाह के विषय में चिन्तित नहीं होना है। यही बात गुरु यहाँ हमारे सुसमाचार में सीधे और स्पष्ट शब्दों में कहता है, जब वह इस प्रकार निष्कर्ष निकालता है:

"अपने प्राण के लिए यह चिन्ता न करना कि क्या खाएँगे, या क्या पीएँगे: और न अपने शरीर के लिए कि क्या पहिनेंगे।"

19. और अब वह समापन के लिए एक युक्तिसंगत और स्वाभाविक कथन का प्रयोग करता है, कि उन्हें अपने प्राण के पोषण के लिए चिन्तित नहीं होना है; क्योंकि बुद्धि को यह निष्कर्ष निकालना

और मानना ही पड़ेगा कि बात वैसी ही है जैसी मसीह कहता है, जब वह यह प्रश्न पूछकर अपने प्रवचन का आधार और कारण बताता है:

"क्या प्राण भोजन से, और शरीर वस्त्र से बढ़कर नहीं?"

20. मानो वह कहना चाहता है: तुम बात को ठीक उलट देते हो; भोजन को तुम्हारे प्राण की सेवा करनी चाहिए, न कि तुम्हारे प्राण को भोजन की। यही बात वस्त्र के विषय में भी सत्य है; वस्त्र को शरीर की सेवा करनी चाहिए, [न कि] शरीर वस्त्र की सेवा करे [अंग्रेज़ी में यहाँ मुद्रण-भूल है: "thus the body serves the clothing"]। संसार ऐसा अन्धा है कि वह इसे देख नहीं सकता।

21. अब हमें यहाँ प्रभु के वचनों को बहुत आदर देना चाहिए। वह कहता है, "चिन्ता न करो;" वह यह नहीं कहता, परिश्रम न करो। चिन्ता वर्जित है, परन्तु परिश्रम नहीं; हाँ, हमें आज्ञा दी गई है और हम पर यह कर्तव्य ठहराया गया है कि हम तब तक परिश्रम करें जब तक हमारे मुँह से पसीना न बहने लगे। परमेश्वर को यह अच्छा नहीं लगता कि मनुष्य आलस्य में इधर-उधर घूमता फिरे; इसलिए वह उत्पत्ति 3,19 में आदम से कहता है: "अपने माथे के पसीने की रोटी तू खाया करेगा, जब तक तू भूमि में न मिल जाए; क्योंकि तू उसी में से निकाला गया है।" और जैसा भजन संहिता 104, 22-23 कहता है: "सूर्य उदय होता है, मनुष्य अपने काम पर और संध्या तक अपने परिश्रम पर निकलता है।" हमें चिन्तित नहीं होना है, यह वर्जित है; क्योंकि हमारा परमेश्वर धनी है, जो हमें भोजन और वस्त्र देने की प्रतिज्ञा करता है; क्योंकि हमारे चिन्तित होने और प्रार्थना आरम्भ करने से पहले ही वह जानता है कि हमें किस बात की घटी है।

22. तो फिर वह हमारे परिश्रम के बिना ही हमें वह क्यों नहीं दे देता जिसकी हमें आवश्यकता है? क्योंकि उसे यही भाता है; वह हमें परिश्रम करने को कहता है और फिर वह देता है; हमारे काम के कारण नहीं, परन्तु कृपा और अनुग्रह से। यह हम अपनी आँखों के सामने देखते हैं; क्योंकि यद्यपि हम हर वर्ष खेत में परिश्रम करते हैं, तौभी परमेश्वर एक वर्ष दूसरे वर्ष से अधिक देता है। इसलिए जब हम इस चिन्ता में पड़े रहते हैं कि सोना और धन कैसे बटोरें, तो हम मूर्ख हैं, हाँ, हम परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध काम करते हैं, क्योंकि परमेश्वर सेंतमेंत और भरपूरी से प्रतिज्ञा करता है कि वह हमें सब कुछ देगा और हमारी हर घटी को बहुतायत से पूरा करेगा।

23. परन्तु कोई कह सकता है: क्या सन्त पौलुस हमें परिश्रमी होने को नहीं कहता, जैसे रोमियों 12, 8 में: "जो अगुवाई करे, वह उत्साह से करे," और उसके तुरन्त बाद पद 11 आता है, "प्रयत्न करने में आलसी न हो?" इसी प्रकार फिलिप्पियों 2,

20 में वह तीमुथियुस के विषय में कहता है: "क्योंकि मेरे पास ऐसे स्वभाव का कोई नहीं,

जो सच्चे मन से तुम्हारी दशा की चिन्ता करे।" और पौलुस स्वयं 2 कुरिन्थियों 11, 28 में घमण्ड करता है कि सब कलीसियाओं की चिन्ता उस पर दबाव डालती है। यहाँ तुम देखते हो कि फिर भी हमें किस प्रकार चिन्तित होना है। उत्तर: हमारा जीवन और मसीही चरित्र दो भागों से मिलकर बना है, विश्वास और प्रेम से। पहला हमें परमेश्वर की ओर निर्देशित करता है, दूसरा हमारे पड़ोसी की ओर। पहला, अर्थात् विश्वास, दिखाई नहीं देता, उसे केवल परमेश्वर देखता है; दूसरा दिखाई देता है, और वह प्रेम है, जिसे हमें अपने पड़ोसी के प्रति प्रकट करना है। अब जो चिन्ता प्रेम से उत्पन्न होती है उसकी आज्ञा दी गई है, परन्तु जो चिन्ता विश्वास के साथ लगी है वह वर्जित है। यदि मैं विश्वास करता हूँ कि मेरा एक परमेश्वर है, तो मैं अपनी भलाई के विषय में चिन्तित नहीं हो सकता; क्योंकि यदि मैं जानता हूँ कि परमेश्वर मेरी ऐसी चिन्ता करता है जैसी पिता अपनी सन्तान की, तो मैं क्यों डरूँ? मुझे चिन्तित होने की क्या आवश्यकता, मैं बस इतना कहता हूँ:

यदि तू मेरा पिता है, तो मैं जानता हूँ कि मुझ पर कोई विपत्ति नहीं पड़ेगी, जैसा भजन संहिता 16, 8 कहता है: "मैंने यहोवा को निरन्तर अपने सम्मुख रखा है: इसलिए कि वह मेरे दाहिने हाथ रहता है, मैं कभी न डगमगाऊँगा।" इस प्रकार सब कुछ उसके हाथ में है; इसलिए मुझे किसी बात की घटी न होगी, वह मेरी चिन्ता करेगा। यदि मैं आगे दौड़ पड़ूँ और अपनी चिन्ता आप करने का प्रयत्न करूँ, तो वह सदा विश्वास के विरुद्ध है; इसलिए परमेश्वर इस प्रकार की चिन्ता को वर्जित करता है। परन्तु उसे यह भाता है कि प्रेम की चिन्तापूर्ण देखभाल बनी रहे, ताकि हम दूसरों की सहायता करें, और अपनी सम्पत्ति और वरदान उनके साथ बाँटें। यदि मैं शासक हूँ, तो मुझे अपनी प्रजा की चिन्ता करनी है; यदि मैं घर का स्वामी हूँ, तो मुझे अपने परिवार के सदस्यों की देखभाल करनी है, इत्यादि, जैसा जिस किसी ने परमेश्वर से अपने वरदान पाए हैं। परमेश्वर सब की चिन्ता करता है, और उसकी चिन्ता वह है जो विश्वास से सम्बन्ध रखती है। हमें भी एक-दूसरे में रुचि रखनी है, और यह प्रेम की चिन्ता है, अर्थात् जब मुझे कुछ दिया जाता है, तो मैं परिश्रमी रहूँ कि दूसरे भी उसे पाएँ।

24. यहाँ हमें सावधान रहना चाहिए, कि कहीं हम शब्दों को जैसे वे लिखे हैं वैसे ही सीधे-सीधे समझने के बजाय उन पर कोई मनगढ़न्त व्याख्या न चढ़ा दें: अपने प्राण के लिए चिन्ता न करो। परमेश्वर कहता है: परिश्रम करो, और यदि तुम कुछ भी पूरा न कर पाओ, तो जो आवश्यक है वह मैं दूँगा; यदि वह देता है, तो देखो कि तुम उसे ठीक से बाँटो। पाने के लिए चिन्तित न हो, परन्तु इस बात का ध्यान रखो कि जो परमेश्वर ने तुम्हें दिया है उसमें से तुम्हारे घर के लोग और दूसरे भी पाएँ, और कि तुम्हारे घर के लोग परिश्रम करें और मसीही शिक्षा पाएँ।

25. यदि मैं प्रचारक हूँ, तो मेरी चिन्ता यह न हो कि जो मुझे प्रचार करना है वह मुझे कहाँ से मिलेगा; क्योंकि यदि मेरे पास कुछ नहीं, तो मैं कुछ नहीं दे सकता। मसीह लूका 21, 15 में कहता है: "मैं तुम्हें ऐसा मुँह और बुद्धि दूँगा, जिसका सामना तुम्हारे सब विरोधी न कर सकेंगे और न उसका खण्डन कर सकेंगे।" परन्तु यदि वह मेरे पास है, तो मुझे इस बात के लिए चिन्तित होना चाहिए कि दूसरे उसे मुझ से पाएँ, और कि मैं उसे अच्छे से अच्छे रूप में उन तक पहुँचाने का प्रयत्न करूँ, अज्ञानियों को सिखाऊँ, जो उसे जानते हैं उन्हें चिताऊँ और रोकूँ, सताए हुए विवेकों को ठीक से शान्ति दूँ, लापरवाह और ऊँघनेवालों को जगाऊँ और उन्हें सावधान करूँ, इत्यादि, जैसा सन्त पौलुस ने किया (1 तीमुथियुस 4; 2 तीमुथियुस 3, तीतुस

3) और अपने शिष्यों तीमुथियुस और तीतुस को भी ऐसा करने की आज्ञा दी। मेरी चिन्ता यह होनी चाहिए कि दूसरे मुझ से कुछ कैसे पाएँ; परन्तु मुझे तो अध्ययन करना और परमेश्वर से प्रार्थना करनी है। अध्ययन करना मेरा परिश्रम है, यही वह काम है जो वह मुझ से करवाना चाहता है, और जब उसे भाएगा तब वह देगा। ऐसा भी हो सकता है कि मैं बहुत समय तक, एक वर्ष या उससे अधिक, अध्ययन करता रहूँ और वह कुछ न दे, और जब उसे भाता है, तब जब तक उसे अच्छा लगता है वह देता रहता है।

तब वह अचानक एक ही घड़ी में बहुतायत से और उमड़ता हुआ देता है।

26. घर का स्वामी भी ऐसा ही करता है, वह केवल उसी पर ध्यान देता है जिसकी उसे आज्ञा दी गई है, और यह प्रबन्ध हमारे प्रभु परमेश्वर पर छोड़ देता है कि वह कैसे देगा। जब वह देता है, तब मनुष्य को यह चिन्ता होती है कि उसे अपने परिवार में कैसे बाँटे, और वह ध्यान रखता है कि उन्हें शरीर और आत्मा के विषय में कोई घटी न हो। प्रभु का यही अभिप्राय है जब वह कहता है कि हमें अपने भोजन और वस्त्र के लिए चिन्तित नहीं होना है; परन्तु वह निश्चय ही हम से परिश्रम चाहता है। क्योंकि यदि तू भूमि न जोते और काम न करे, तो तुझे बहुत समय तक चूल्हे के पीछे बैठे रहना पड़ेगा जब तक कि तुझे कुछ दिया जाए। यह सच है कि परमेश्वर तेरे काम के बिना भी सरलता से तेरा पालन कर सकता है, वह सरलता से भुना और उबला हुआ अनाज और दाखमधु तेरी मेज़ पर उगा सकता था; परन्तु वह ऐसा नहीं करता, उसकी इच्छा है कि तू परिश्रम करे और ऐसा करने में अपनी बुद्धि का प्रयोग करे।

27. इसी प्रकार प्रचार और हमारे सब कामकाज के साथ भी है।

परमेश्वर हमें ऊन देता है, जिसे वह भेड़ पर उगाता है; परन्तु वह तुरन्त कपड़ा नहीं होती, हमें परिश्रम करके उसका कपड़ा बनाना पड़ता है; जब वह कपड़ा बन जाती है, तो वह तुरन्त कोट नहीं बन जाता, दर्ज़ी को पहले कपड़े पर काम करना पड़ता है तब वह कोट बनता है; और परमेश्वर सब वस्तुओं के साथ ऐसा ही करता है, वह हमारी चिन्ता करता है, परन्तु हमें कठिन परिश्रम और काम करना पड़ता है। इसके बहुत से उदाहरण हमारी आँखों के सामने हैं, और परमेश्वर यहाँ विशेष रूप से दो उदाहरण बताता है जिनसे सचमुच हमें लज्जा से लाल हो जाना चाहिए, अर्थात् पक्षियों और मैदान के सोसनों के उदाहरण। पक्षियों की ओर संकेत करते हुए वह कहता है:

"आकाश के पक्षियों को देखो, कि वे न बोते हैं, न काटते हैं, और न खत्तों में बटोरते हैं; तौभी तुम्हारा स्वर्गीय पिता उनको खिलाता है।"

28. मानो प्रभु कहना चाहता है: तुमने आज तक कोई ऐसा पक्षी नहीं देखा जिसके पास हँसिया हो, जिससे उसने फसल काटी हो और खत्तों में बटोरी हो; हाँ, पक्षी हमारे समान परिश्रम नहीं करते; और फिर भी उनका पालन होता है। परन्तु इससे प्रभु यह नहीं सिखाता कि हमें आलसी रहना है; बल्कि वह इस उदाहरण से हमारी सारी चिन्ता हम से दूर करने का प्रयत्न करता है। क्योंकि पक्षी हमारे समान किसान का काम नहीं कर सकता; तौभी वह परिश्रम से मुक्त नहीं है, बल्कि वह वह काम करता है जिसके लिए वह रचा गया, अर्थात् वह अपने बच्चे उत्पन्न करता है, उन्हें खिलाता है, और ऐसा करने के सौभाग्य के लिए हमारे प्रभु परमेश्वर के लिए एक छोटा सा गीत गाता है। यदि परमेश्वर ने उस पर अधिक परिश्रम डाला होता, तो वह अधिक करता। भोर को तड़के वह उठता है, एक टहनी पर बैठता है और एक गीत गाता है जो उसने सीखा है, जबकि वह नहीं जानता कि उसे अपना भोजन कहाँ से मिलेगा, और तौभी वह इस बात की चिन्ता नहीं करता कि उसका सवेरे का भोजन कहाँ से आएगा। बाद में, जब उसे भूख लगती है, तो वह उड़ जाता है और अनाज का एक दाना ढूँढ़ता है, जहाँ परमेश्वर ने उसके लिए एक दाना रख छोड़ा है, जिसके विषय में उसने गाते समय कभी सोचा भी न था, जबकि उसके पास अपने भोजन के लिए चिन्तित होने का पर्याप्त कारण था। हाय, अब तुम पर धिक्कार है, कि छोटे पक्षी तुम से अधिक भक्त और विश्वासी हैं; वे प्रसन्न रहते हैं और आनन्द से गाते हैं और नहीं जानते कि उनके पास खाने को कुछ है या नहीं।

29. यह दृष्टान्त हमारी बड़ी और जलती हुई लज्जा के लिए निरन्तर सिखाया जाता है, कि हम पक्षियों जितना भी नहीं कर सकते। एक मसीही को एक छोटे से पक्षी के सामने लज्जित होना चाहिए, जो एक ऐसी कला जानता है जो उसने कभी किसी शिक्षक से नहीं सीखी। जब वर्ष के वसन्त में, जबकि पक्षी सबसे सुन्दर गाते हैं, तुम किसी एक से कहो: तू इतने आनन्द से कैसे गा सकता है, तेरे खत्ते में तो अभी तक कोई अनाज नहीं? तो वह इस प्रकार तुम्हारा उपहास करेगा। यह एक सामर्थी उदाहरण है और सचमुच हमें ठेस पहुँचानी चाहिए और हमें उभारना चाहिए कि हम जितना करते हैं उससे अधिक परमेश्वर पर भरोसा रखें। इसलिए वह एक बेधनेवाले वचन से समाप्त करता है, और पूछता है:

"क्या तुम उनसे अधिक मूल्य नहीं रखते?"

त्रिएकता के बाद पन्द्रहवाँ रविवार

30. क्या यह बड़ी लज्जा की बात नहीं कि प्रभु पक्षियों को हमारे शिक्षक बनाकर हमारे सामने प्रस्तुत करता है, कि हम पहले उनसे सीखें? धिक्कार है तुझ पर, हे घृणित, कुख्यात अविश्वास! पक्षी वही करते हैं जो उनसे अपेक्षित है; परन्तु हम नहीं। उत्पत्ति 1, 28 में हमें आज्ञा मिली है कि हम परमेश्वर के सब प्राणियों पर प्रभुता करें; और यहाँ पक्षी हमें बुद्धि सिखाने में हमारे स्वामी हैं। अधर्मी अविश्वास दूर हो! परमेश्वर हमें मूर्ख ठहराता है और पक्षियों को हमारे सामने रखता है, कि वे हमारे शिक्षक हों और हम पर शासन करें, इस रीति से कि वे केवल यह दिखा दें कि हम कैसे मैमन की सेवा करते हैं और सच्चे और विश्वासयोग्य परमेश्वर को त्याग देते हैं। अब मैदान के फूलों का दूसरा उदाहरण आता है, जिसके द्वारा प्रभु हमें प्रोत्साहित करता है कि हम अपने वस्त्र की चिन्ता न करें; और वह इस प्रकार है:

"और तुम में से कौन है जो चिन्ता करके अपनी आयु में एक हाथ भी बढ़ा सकता है? और वस्त्र के लिए तुम क्यों चिन्ता करते हो? जंगल के सोसनों पर ध्यान करो कि वे कैसे बढ़ते हैं: वे न तो परिश्रम करते हैं, न कातते हैं: तौभी मैं तुम से कहता हूँ कि

सुलैमान भी अपने सारे वैभव में उनमें से किसी एक के समान वस्त्र पहिने हुए न था। इसलिए जब परमेश्वर मैदान की घास को, जो आज है और कल भाड़ में झोंकी जाएगी, ऐसा वस्त्र पहिनाता है, तो हे अल्पविश्वासियो, क्या वह तुम्हें उससे कहीं बढ़कर न पहिनाएगा?"

31. मानो वह कहना चाहता है: तुम्हारा प्राण तुम्हारा नहीं, न तुम्हारा शरीर, तुम उसे एक हाथ भी लम्बा या छोटा नहीं कर सकते; इसलिए इस बात की भी चिन्ता न करो कि तुम अपने आप को कैसे वस्त्र पहिनाओगे। मैदान के फूलों को देखो कि वे कैसे सजे और पहिनाए गए हैं, और वे इसके लिए कुछ भी नहीं करते; वे न कातते हैं न काम करते हैं, तौभी वे सुन्दर वस्त्र पहिने हुए हैं।

32. इस दृष्टान्त से भी प्रभु यह नहीं चाहता कि हम सिलाई और काम करना छोड़ दें, बल्कि हमें परिश्रम करना, कातना और सीना चाहिए, और अत्यधिक चिन्तित और व्याकुल नहीं होना चाहिए। जो दुःख हमारे पास है वह हमारा कठिन परिश्रम है; यदि हम उसके ऊपर चिन्ता भी करेंगे, तो हम मूर्खों के समान करते हैं; क्योंकि यही पर्याप्त है कि हर दिन का अपना दुःख है।

मुझे ऐसा लगता है कि यह आज्ञा दिया गया तिरस्कार है, कि फूल वहाँ खड़े होकर हमें लज्जा से लाल कर दें और हमारे शिक्षक बन जाएँ। धन्यवाद, फूलो, तुम, जिन्हें गायें चर जाएँगी! परमेश्वर ने तुम्हें बहुत ऊँचा उठाया है, कि तुम हमारे स्वामी और शिक्षक बनो। धिक्कार है, कि यह पृथ्वी हमें ढोती है! क्या यह हमारे लिए सम्मान की बात है? मैं नहीं जानता। हमें यहाँ

मानना पड़ेगा कि सबसे तुच्छ फूल, जिसे पशु पैरों तले रौंदते हैं, हमारा शिक्षक बन जाए; क्या हम अच्छे लोग नहीं? मैं तो ऐसा ही सोचता हूँ। अब मसीह इसके साथ सबसे धनी और सबसे सामर्थी राजा, सुलैमान, को रखता है, जो बैंजनी और सोने में सबसे बहुमूल्य रीति से वस्त्र पहिने रहता था, जिसका वैभव फूलों के वैभव से तुलना के योग्य न था, 1 राजाओं

10. क्या यह आश्चर्य की बात नहीं कि मैदान के फूलों का श्रृंगार सब बहुमूल्य रत्नों, सोने और चाँदी से अधिक मूल्यवान समझा जाए?

33. परन्तु हम ऐसे अन्धे हैं कि हम नहीं देखते कि परमेश्वर इसके द्वारा क्या ठहराता है और उसका क्या अभिप्राय है। फूल वहाँ खड़ा है कि हम उसे देखें, वह हमें चोट पहुँचाकर कहता है: यदि तेरे पास सारे संसार का श्रृंगार भी होता, तौभी तू मेरे बराबर न होता, जो यहाँ खड़ा हूँ और इस बात की तनिक भी चिन्ता नहीं करता कि यह श्रृंगार मुझे कहाँ से मिलता है। मैं इसकी चिन्ता अपने आप को नहीं देता, यहाँ मैं अकेला खड़ा हूँ और कुछ नहीं करता, और यद्यपि तू सुन्दरता से सजा है, तौभी तू रोगी है और शक्तिहीन मैमन की सेवा करता है; परन्तु मैं ताज़ा और सुन्दर हूँ और सच्चे और धर्मी परमेश्वर की सेवा करता हूँ।

देखो, अविश्वास कैसी घृणित, दुष्ट वस्तु है!

34. पक्षियों और सोसनों के ये दो सुन्दर और सामर्थी उदाहरण हैं। पक्षी हमें हमारे दैनिक भोजन के विषय में शिक्षा देते हैं; फूल हमारे वस्त्र के विषय में। और सारे नए

नियम में हमारी लज्जा कहीं भी ऐसी प्रकट और सामने नहीं रखी गई, जैसी ठीक इसी सुसमाचार में। परन्तु इसे समझनेवाले थोड़े ही हैं। इन उदाहरणों और दृष्टान्तों से प्रभु अब निष्कर्ष निकालता और कहता है:

"इसलिए तुम चिन्ता करके यह न कहना कि हम क्या खाएँगे? या क्या पीएँगे? या क्या पहिनेंगे?

क्योंकि अन्यजाति इन सब वस्तुओं की खोज में रहते हैं; क्योंकि तुम्हारा स्वर्गीय पिता जानता है कि तुम्हें इन सब वस्तुओं की आवश्यकता है। परन्तु पहले तुम उसके राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज करो, तो ये सब वस्तुएँ भी तुम्हें मिल जाएँगी। इसलिए कल के लिए चिन्ता न करो; क्योंकि कल का दिन अपनी चिन्ता आप कर लेगा। आज के लिए आज ही का दुःख बहुत है।"

35. अब इस सुसमाचार का सार यह है: मसीहियों को इस बात की चिन्ता नहीं करनी चाहिए कि वे क्या खाएँगे; परमेश्वर उनके अपनी आवश्यकता के विषय में सोचने से पहले ही उनका प्रबन्ध कर देता है; परन्तु उन्हें परिश्रम करना है,

यही उन्हें आज्ञा दी गई है। परन्तु परमेश्वर का राज्य और उसकी धार्मिकता क्या हैं, इस पर चर्चा करने में बहुत अधिक समय लगेगा; यदि तुम ध्यान देते रहे हो, तो तुमने उनके विषय में प्रायः सुना है। आज के सुसमाचार पर अब इतना ही पर्याप्त है।

परमेश्वर हमें अनुग्रह दे कि किसी दिन हम इसे व्यवहार में भी लाएँ! सुसमाचार केवल हमारे कानों में और हमारी जीभों पर ही न रहे, परन्तु हमारे हृदयों में आए और नए सिरे से प्रेम के कामों में फूट निकले!

36. (हम यहाँ सेंट लुइस वाल्ख संस्करण के अनुच्छेदों का अनुसरण करते हैं, जिसमें पुराने वाल्ख संस्करण के 36 के स्थान पर 35 है।)

त्रिएकता के बाद पन्द्रहवाँ रविवार

दूसरा उपदेश। मत्ती 6, 24-34.

निम्नलिखित उपदेश संस्करण c. में मिलता है। Erl. 14, 103;.

मसीहियों को … की वस्तुओं के लिए चिन्तित नहीं होना चाहिए *लोभ और चिन्ता अविश्वास के फल हैं। 1.

I. यह चेतावनी सामान्य रूप में।

1. मसीह अपने राज्य और संसार के राज्य के बीच कैसे भेद करता है। 2.

2. जिन लोगों को सम्बोधित किया गया है उनका स्वरूप। 3.

II. यह चेतावनी विस्तार से। 4- पिछले उपदेश के अनुच्छेद 4- 36 के समान।

III. विश्वास के लिए प्रेरणा।

1. मसीह यह प्रेरणा किन लोगों को देता है। 37.

2. इसका आधार और कारण 3. स्वयं प्रेरणा।

A. सामान्य रूप में। 39-40.

1. इस प्रेरणा का पहला भाग। 40.

2. दूसरा भाग 41-42.

3. तीसरा भाग। 43.

4. चौथा भाग 44-46.

5. पाँचवाँ भाग 47-48.

1. यह सुसमाचार उस लम्बे उपदेश का एक भाग है जो मसीह ने पहाड़ पर अपने शिष्यों को दिया, जिसमें दूसरी बातों के साथ-साथ उसने अपने शिष्यों को विशेष रूप से लोभ और दैनिक रोटी की चिन्ता के कुख्यात दुर्गुण के विरुद्ध चिताया और समझाया, जो हमारे अविश्वास का स्वाभाविक फल और प्रमाण है। यह मसीही जगत में बड़ी हानि करता है जब यह सेवकाई के पद पर नियुक्त लोगों को अपने वश में कर लेता है, जिन्हें परमेश्वर के वचन और विश्वास को ठीक से सिखाने, और संसार की भूल और पाप को ताड़ना देने के सिवा किसी और बात में व्यस्त नहीं होना चाहिए; या जब यह उन्हें अपने वश में कर लेता है जिन्हें सब लोगों के सामने परमेश्वर के वचनों का अंगीकार करना चाहिए और परमेश्वर के लिए हर एक की सेवा करने को तैयार रहना चाहिए, चाहे इस कारण उन्हें अपना धन, सम्मान, शरीर और प्राण भी खोना पड़े।

2. मसीह यहाँ यह भी सिखाना चाहता है कि वह अपने राज्य को नागरिक जीवन और शासन से किस प्रकार अलग रखना चाहता है, कि वह पृथ्वी पर अपने मसीही जगत का ऐसा शासन नहीं करेगा कि वह एक ऐसी सरकार के रूप में सोचा और स्थापित किया जाए जिसमें मसीहियों को सबसे पहले भरपूरी से

सांसारिक माल, धन और सामर्थ दिए जाएँ, और जिन्हें किसी घटी या संकट से डरने की आवश्यकता न हो; परन्तु वह उन्हें आत्मिक खज़ाने और वह सब देना चाहता है जिसकी उनके प्राणों को आवश्यकता है, ताकि उनके पास उसका वचन, उसके अनुग्रह की शान्ति, और पाप और मृत्यु के विरुद्ध अनन्त जीवन के लिए पवित्र आत्मा की सामर्थ और बल हो। इसके अतिरिक्त, इस जीवन के लिए जिन सांसारिक वस्तुओं की और वर्तमान आवश्यकताओं के लिए जिन ज़रूरी वस्तुओं की उन्हें आवश्यकता है, उनकी आशा भी उन्हें उसी से रखनी है, और यदि वे इसे अपनी आँखों के सामने न देखें और भविष्य के लिए तैयार न रखें, और घटी और आवश्यकता से परखे जाएँ, तो उन्हें भयभीत नहीं होना है। इसके विपरीत, उन्हें जानना चाहिए कि उनका परमेश्वर और पिता उनकी चिन्ता करेगा और निश्चय ही उन्हें सब कुछ देगा, यदि वे दृढ़ विश्वास के साथ केवल इसी की चिन्ता और खोज करें कि वे उसके वचन में और उसके राज्य में कैसे विश्वासयोग्य बने रहें, और वहाँ उसकी सेवा करें।

3. इसलिए मसीह इस उपदेश में एक भेद करता है, जिसके द्वारा वह अपने मसीहियों को अन्यजातियों और अविश्वासियों से अलग करता है। क्योंकि वह यह शिक्षा अन्यजातियों को नहीं देता, क्योंकि वे इसे ग्रहण नहीं करते, परन्तु उन्हें देता है जो पहले से मसीही हैं।

परन्तु वह उन मसीहियों का विचार नहीं करता जो उसका वचन केवल सुनते हैं और उसे दोहरा सकते हैं, जैसे भिक्षुणियाँ भजन संहिता को दोहराती हैं। इस रीति से तो शैतान भी सुसमाचार और परमेश्वर का वचन सुनता है, हाँ, वह उसे हम से अधिक अच्छी तरह जानता है, और यदि वह चाहे तो हमारे ही समान अच्छी तरह उसका प्रचार कर सकता है। परन्तु सुसमाचार ऐसी शिक्षा है जिसे एक जीवित सामर्थ होना और व्यवहार में लाया जाना है; उसे लोगों को दृढ़ करना और शान्ति देना चाहिए और हमें साहसी और उत्साह से आगे बढ़नेवाला बनाना चाहिए।

इसलिए जो लोग सुसमाचार को केवल इस प्रकार सुनते हैं कि उसे जान लें और उसके विषय में बोल सकें, वे मसीहियों में नहीं गिने जाने चाहिए; परन्तु जो विश्वास करते और सुसमाचार की शिक्षा के अनुसार करते हैं, वे धर्मी हैं।

"कोई मनुष्य दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता: क्योंकि वह या तो एक से बैर और दूसरे से प्रेम रखेगा: या एक से लगा रहेगा और दूसरे को तुच्छ जानेगा:"

4. अब जो दो स्वामियों की सेवा करने का प्रयत्न करता है, वह ऐसी रीति से करेगा जिसे सेवा कहा ही नहीं जा सकता; क्योंकि निश्चय ही वैसा ही होगा जैसा प्रभु यहाँ कहता है। कोई सेवक को उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई काम करने के लिए विवश तो कर सकता है, और वह कुढ़ता रहे

उसे करते हुए; परन्तु कोई उसे इस बात के लिए विवश नहीं कर सकता कि वह उसे आनन्द से करे और हृदय की गहराई से करे। वह निस्सन्देह तब तक काम करता है जब तक उसका स्वामी उपस्थित रहता है, परन्तु जब वह अनुपस्थित होता है, तो वह अपने काम से भाग खड़ा होता है और कुछ भी ठीक से नहीं करता। इसलिए प्रभु चाहता है कि हमारी सेवा प्रेम से और आनन्द से की जाए, और जहाँ वह ऐसे नहीं की जाती, वहाँ वह उसके लिए कोई सेवा नहीं है: क्योंकि मनुष्य भी प्रसन्न नहीं होते जब कोई उनके लिए कुछ अनिच्छा से करता है। यह स्वाभाविक है, और हम प्रतिदिन अनुभव करते हैं कि ऐसा ही है। अब, यदि मनुष्यों के बीच यह बात है कि कोई दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता, तो परमेश्वर की सेवा में यह कितना अधिक सत्य है कि हमारी सेवा बाँटी नहीं जा सकती; परन्तु वह केवल परमेश्वर ही के लिए, स्वेच्छा से और हृदय से की जानी चाहिए; इसलिए प्रभु आगे कहता है:

"तुम परमेश्वर और मैमन दोनों की सेवा नहीं कर सकते।"

5. परमेश्वर हमें अपने सिवा कोई और प्रभु रखने नहीं दे सकता। वह जलन रखनेवाला परमेश्वर है, जैसा वह कहता है, और यह सह नहीं सकता कि हम उसकी और उसके शत्रु की भी सेवा करें। हम बहुत ही थोड़े लोग ऐसे पाते हैं जो सुसमाचार के विरुद्ध पाप नहीं करते। प्रभु एक कठोर न्याय सुनाता है, और यह सुनना भयानक है कि वह हमारे विषय में ऐसा कहे; और तौभी कोई इसे मानेगा नहीं, हाँ, कोई यह कहा जाना भी सहन नहीं करेगा कि हम परमेश्वर से बैर रखते और उसे तुच्छ जानते हैं, और कि हम उसके शत्रु हैं। कोई भी ऐसा नहीं है जिससे पूछा जाए कि क्या वह परमेश्वर से प्रेम रखता है और उससे लगा रहता है, तो वह यह उत्तर न दे: क्या तू मुझे ऐसा हताश दुष्ट समझता है कि मैं परमेश्वर का शत्रु होऊँ? परन्तु देखो कि पाठ यहाँ किस बात पर समाप्त होता है, कि हम सब परमेश्वर से बैर रखते और उसे तुच्छ जानते

हैं, और मैमन से प्रेम रखते और उससे लगे रहते हैं। क्योंकि यह असम्भव है कि जो सोने और धन से प्रेम रखता और उनसे लगा रहता है, वह परमेश्वर से बैर न रखे। मसीह यहाँ इन दोनों को एक-दूसरे के विरोध में और शत्रुओं के रूप में रखता है, और कहता है: यदि तुम इन दोनों में से एक से प्रेम रखते और उससे लगे रहते हो, तो तुम्हें दूसरे से बैर रखना और उसे तुच्छ जानना ही पड़ेगा। कोई मनुष्य यहाँ पृथ्वी पर कितना ही अच्छा जीवन क्यों न जीए, यदि वह धन से चिपका रहता है तो यह अन्यथा हो ही नहीं सकता कि वह परमेश्वर से बैर रखे। और जो कोई सोने और सांसारिक धन पर भरोसा नहीं रखता, वह परमेश्वर से प्रेम रखता है। यह निश्चित है।

अनुच्छेद 6-36, दोनों सहित, पिछले उपदेश के अनुच्छेद 6-36 के समान हैं, जैसा कि सावधानी से जाँचने पर प्रकट होगा। अनुच्छेदों का विभाजन थोड़ा भिन्न है, परन्तु विषय-वस्तु वही है, और उसे यहाँ दोहराना आवश्यक नहीं, बल्कि भ्रम उत्पन्न करनेवाला होगा।

"इसलिए तुम चिन्ता करके यह न कहना कि हम क्या खाएँगे? या,

क्या पीएँगे? या क्या पहिनेंगे?

क्योंकि अन्यजाति इन सब वस्तुओं की खोज में रहते हैं; क्योंकि तुम्हारा स्वर्गीय पिता जानता है कि तुम्हें इन सब वस्तुओं की आवश्यकता है।"

37. जैसा मैंने आरम्भ में कहा, मसीह ने यह उपदेश अपने मसीहियों को दिया, विशेष रूप से उन्हें जो सेवकाई के पद पर थे, या उन्हें जिनके पास या तो कुछ नहीं था, या जो बाकी संसार के समान अपने लिए कभी धन और मैमन कमा और बटोर नहीं सकते थे; ताकि वे जानें कि वे किस स्रोत से अपना और अपने परिवारों का भरण-पोषण कर सकते हैं। हाँ, वे इस संकट में जीने को विवश हैं कि परमेश्वर ने उन्हें जो थोड़ा सा पार्थिव माल दिया है वह भी उनसे लूट लिया जाए, और इस प्रकार बिना किसी सन्देह के वे पूरी तरह उसी सहायता पर जीने को विवश हैं जो परमेश्वर उन्हें भेजता है और जिसकी वे उससे आशा रखते हैं, क्योंकि संसार उन्हें कुछ नहीं देता।

38. यह सचमुच मांस और लहू के लिए कष्टदायक है, और उनके लिए बहुत भारी है, हाँ, कोई भी इसे सह या कर नहीं सकता, जब तक कि वह विश्वासी मसीही न हो। क्योंकि संसार का स्वभाव ऐसा है कि वह भविष्य के लिए सांसारिक बातों में तनिक भी जोखिम नहीं उठाएगा; परन्तु उसे उनके विषय में निश्चिन्त होना चाहिए, पहले से प्रबन्ध करना चाहिए, और जो कुछ उसे चाहिए, जैसे भोजन, शान्ति, सुरक्षा और बीमा, उसे भण्डार में और उपयोग के लिए तैयार रखना चाहिए, ताकि वह जी सके और उसे न परमेश्वर पर निर्भर रहना पड़े न लोगों पर; परन्तु क्योंकि यह स्पष्ट है कि संसार किसी को उसके विश्वास और भक्ति के कारण धनी नहीं करता, इसलिए वे सोचते हैं कि उन्हें भी दूसरों के समान करना और जीना चाहिए, ताकि फिर भी उनके पास भी कुछ हो।

39. इसके विरुद्ध वह इसके द्वारा अपने मसीहियों को शान्ति और बल देता है, और फिर दोहराता है: इसलिए वे चिन्ता न करें, न सन्देह करें, न ऐसे अविश्वास में छटपटाएँ, यह कहते हुए: हाय, हमारा क्या होगा? हमें कौन कुछ देगा? इस संसार में हम मसीहियों को भोजन, सुरक्षा, शान्ति कहाँ से मिलेगी? परन्तु उन्हें जानना चाहिए कि उनका स्वर्गीय

पिता इसका प्रबन्ध करता है, और यह उन्हें देगा भी, वह जो इसी कारण उनका पिता कहलाता है (अविश्वासियों का नहीं, यद्यपि वह सारे संसार को खिलाता और सब कुछ देता है), ताकि यह दिखाए कि वह अपनी सन्तान को भी नहीं छोड़ेगा। वह उन्हें सारी सृष्टि में परमेश्वर के ऊँचे काम की ओर ले जाता है,

ताकि वे देखें कि वह जिन सब वस्तुओं को रचता है, हर एक को व्यवस्थित और नियमित करने के बाद, उन सब का कैसे पालन और भरण-पोषण करता है,—आकाश के सब पक्षियों का भी, जो, जैसा तुम जानते हो, अपने भोजन के लिए नहीं कुढ़ते और न पहले से जानते हैं कि उसे कहाँ से लेंगे। हाँ, विशेष रूप से छोटे फूलों को भी वह ऐसा सजाता और सँवारता है कि ऐसी सुन्दरता और सजावट कहीं और अधिक उचित रीति से दी जा सकती थी; क्योंकि क्या यह बिलकुल व्यर्थ नहीं लगता, जबकि वे शायद केवल एक दिन के लिए खिलते हैं? तो क्या उसे अपने मसीहियों के विषय में और भी अधिक सोचना और चिन्ता नहीं करनी चाहिए, कि जब तक उन्हें पृथ्वी पर जीना है तब तक वे कैसे खिलाए और पहिनाए जाएँ, और कहाँ वे निवास करें और रहें?

40. यही वह उन्हें विश्वास करने के लिए चिताता है; और इसे उन पर अत्यन्त दृढ़ता से अंकित करने के लिए, बहुत से नहीं परन्तु गम्भीर शब्दों से, वह दैनिक जीवन के और अपने प्राणियों के बीच परमेश्वर के काम के उदाहरण उनके सामने रखने के बाद अचानक रुक जाता है; और इन शब्दों से समाप्त करता है: हे अल्पविश्वासियो, क्या वह तुम्हारे लिए ऐसा कहीं बढ़कर न करेगा? वह कहना चाहता है:

अच्छा, यदि तुम मसीही हो और जानते हो कि स्वर्ग में तुम्हारा एक पिता है, तो तुम्हें अपने आप पर लज्जित होना चाहिए कि मुझे इस विषय में इतना प्रचार करना पड़े! हाँ, तुम्हें लज्जित होना चाहिए, और ऐसी बातें अपने विषय में कहे जाने नहीं देनी चाहिए। परन्तु क्या मुझे यह नहीं कहना पड़ता कि तुम ऐसे छोटे हो और तुम्हारा विश्वास इतना थोड़ा है, और कि तुम जीवते परमेश्वर पर, जो तुम्हें अपना वचन और प्रतिज्ञा देता है और जिसने तुम्हें अपनी सन्तान होने के लिए चुना है, इतना कम बिना सन्देह और चिन्ता के भरोसा रखते हो—कि वह तुम्हारे शरीर और प्राण का पालन और भरण-पोषण करेगा? तब तुम केवल परमेश्वर के सामने ही नहीं, बल्कि उसके सब प्राणियों के सामने भी बिना लज्जा और अपमान के कैसे खड़े रहोगे, यदि तुम्हारे विषय में यह कहा जाए, और तुम स्वयं अपने ही अंगीकार से यह गवाही दो कि तुम, जिनके पास परमेश्वर का वचन और अनुग्रह इतनी भरपूरी से है, अपने अभागे कीड़ों के थैले और बदबूदार पेट की चिन्ता के विषय में उस पर इतना कम भरोसा रखते हो?

41. वह यह कहकर उनसे और भी अधिक कठोरता से बोलता है:

"अन्यजाति इन सब वस्तुओं की खोज में रहते हैं" इत्यादि। यह निश्चय ही एक मसीही को रोकना चाहिए, जब वह यह खुला और भयानक निर्णय सुनाया जाता सुनता है कि जो लोग चिन्ता करते और मैमन के पीछे लालायित रहते हैं वे अन्यजाति हैं, अर्थात् ऐसे लोग जिनका वास्तव में

कोई परमेश्वर नहीं; जो परमेश्वर के स्थान पर मैमन की सेवा करते हैं, जिसमें केवल परमेश्वर का नाम है और झूठ और व्यर्थता के सिवा कुछ नहीं; जो इसलिए परमेश्वर से पूरी तरह कटे हुए हैं, सारे ईश्वरीय ज्ञान, शान्ति, अनुग्रह और आनन्द से वंचित हैं। ये और कोई नहीं, बल्कि सबसे दयनीय, सबसे अभागे, दोषी ठहराए गए लोग हैं, जिनके लिए कभी किसी उद्धार या शान्ति की आशा नहीं।

42. यहाँ तुम संसार का चित्र देखते हो, कि वह किस प्रकार की वस्तु है, अर्थात् वह बड़ी, शक्तिशाली भीड़—बहुत थोड़े से मसीहियों को छोड़कर—जो बड़े होते ही परमेश्वर से पूरी तरह मुँह मोड़ लेते हैं और झूठ के ईश्वर मैमन की सेवा करते हैं।

उसी को वे महान, हाँ, एकमात्र ईश्वर मानते हैं, क्योंकि उसके पीछे चलनेवाली भीड़ इतनी बड़ी है; तौभी वह कुछ नहीं, केवल एक शक्तिहीन नाम है। इसलिए एक मसीही को संसार के ऐसे अन्धेपन और दुर्दशा के विषय में सोचकर सचमुच भयभीत और स्तब्ध हो जाना चाहिए; उसे आहों और आँसुओं के साथ प्रयत्न और परिश्रम करना चाहिए कि वह ऐसे लज्जाजनक कामों से दूर रहे, और जितना दौड़ सके उतना उससे दूर भागे, मानो आग में से, हाँ, नरक के बीच में से।

43. तीसरे, हमें अत्यन्त प्रेमपूर्ण और शान्तिदायक रीति से विश्वास करने के लिए लुभाने के लिए वह फिर कहता है: "तुम्हारा स्वर्गीय पिता जानता है कि तुम्हें इन सब वस्तुओं की आवश्यकता है।"

क्या वह तुम्हारा पिता नहीं, और केवल तुम्हारा ही पिता—न पक्षियों का, न हंसों या बत्तखों का, न अधर्मी अन्यजातियों का पिता! तो उस पर ऐसा भरोसा रखो कि वह ऐसा प्रेमी है कि पिता के समान तुम्हारी चिन्ता करेगा और न तुम्हें भूलेगा न छोड़ेगा; हाँ, कि वह बहुत पहले से जानता है कि उसे तुम्हें क्या देना चाहिए, और इससे पहले कि तुम स्वयं इसके विषय में सोचो या अपनी घटी अनुभव करो, उसने इसका प्रबन्ध कर रखा है। क्योंकि उसके सिवा और किसने पहले से जाना या सोचा कि तुम क्या होगे या तुम्हें किस बात की आवश्यकता होगी, इससे पहले कि तुम इस संसार में जन्मे? इसलिए उसका इतना आदर तो करो कि विश्वास करो कि वह ऐसी बातों को देखता और जानता है, और उन्हें जानते हुए तुम्हारे साथ पिता के समान व्यवहार करेगा।

"परन्तु पहले तुम उसके राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज करो, तो ये सब वस्तुएँ भी तुम्हें मिल जाएँगी।" 44. यह इस उपदेश का मुख्य वचन है, और वह सही नियम और रीति बताता है कि हमें किस प्रकार आगे बढ़ना है, ताकि हम ईश्वरीय या अनन्त दान को भी, और इस जीवन के लिए जिसकी हमें आवश्यकता है उसे भी, प्राप्त करें। यदि तुम ठीक और भली रीति से उस बात की चिन्ता करना चाहते हो जिसकी चिन्ता करना

तुम्हें उचित है, तो यह तुम्हारी पहली, हाँ, सचमुच तुम्हारी एकमात्र चिन्ता हो, कि तुम परमेश्वर के वचन के अनुसार अपना कर्तव्य करने का, उसके राज्य में उसकी सेवा करने का प्रयत्न करो जैसा उसका वचन तुम्हें सिखाता है—क्योंकि इसी में इस राज्य की धार्मिकता है—और इसे इस सांसारिक जीवन से सम्बन्धित सब बातों से अधिक मूल्यवान समझो।

यदि तुम ऐसा करते हो, तो तुमने भली रीति से किया और प्रबन्ध किया है, और तुम्हें अपने ऊपर और कोई बोझ उठाने या अपने हृदय में कोई चिन्ता पालने की आवश्यकता नहीं; सचमुच, तुम्हारे लिए अपने पेट की आवश्यकताओं जैसी इतनी छोटी बात की चिन्ता करना, और इस कारण अपने आप को दुःखी करना, बहुत ही तुच्छ बात होनी चाहिए।

बल्कि परमेश्वर के सम्मान के लिए, और इसके अतिरिक्त अपने ही उपयोग और लाभ के लिए, यह करो कि तुम उस महान और अनन्त भलाई के लिए प्रयत्न करो; जिसे यदि तुम पा लो और थामे रहो, तो बाकी अपनी चिन्ता निश्चय ही आप कर लेगा। और तुम परमेश्वर से उसे पाने का इससे अच्छा कोई मार्ग नहीं पा सकते, कि तुम पहले उससे बड़ी बातों की खोज करो और उन्हें माँगो।

45. क्योंकि उसे यही भाता है कि हम उससे बड़ी बातें माँगें, और कि वह बड़ी और बहुत सी बातें दे सके।

और इस कारण कि वह आनन्द से बड़ी बातें देता है, वह छोटी बातों में भी कंजूसी नहीं करेगा, बल्कि उन्हें ऊपर से सौदे में घाते के तौर पर डाल देगा। परमेश्वर ने बहुत से भक्त लोगों को निरन्तर इसका अनुभव कराया है, जिन्होंने इस नियम और उपदेश का पालन करते हुए परमेश्वर के राज्य के निर्माण में सहायता करने का प्रयत्न किया, कलीसिया की सेवा की, परमेश्वर के वचन को आगे बढ़ाया, और उसके लिए अपनी सम्पत्ति में से दिया। तब उसने बदले में उन्हें माल, सम्मान, इत्यादि से भरपूर आशीष दी। इसका प्रमाण न केवल पवित्रशास्त्र के पुराने उदाहरण देते हैं, बल्कि हमारे कुछ भक्त राजाओं और शासकों का इतिहास भी देता है, जिन्होंने पहले पल्लियों और प्रचार-मंचों के लिए, पवित्र सेवकाई के भरण-पोषण के लिए और पाठशालाओं के लिए बहुतायत से दिया, और इससे वे दरिद्र नहीं हुए, बल्कि परमेश्वर ने उन्हें कहीं अधिक भरपूर आशीष और सम्पत्ति दी, यहाँ तक कि उन्होंने अच्छी शान्ति में, विजय और सौभाग्य के साथ राज्य किया।

46. यह वह अब भी आनन्द से करता, यदि संसार अपनी ही भलाई के लिए उस भली मनसा से दी गई सलाह का पालन कर पाता या करना चाहता जो वह यहाँ देता है, और अविश्वास, लालच और मसीही-विरोधी युक्तियों के साथ उसके वचन के विरुद्ध भड़कता न रहता, अपनी ही

हानि और विनाश के लिए। इसलिए उसे इस वचन को उसके साथ उलट देना और उलटा प्रमाणित करना पड़ता है; कि जो परमेश्वर के राज्य और उसकी धार्मिकता के लिए प्रयत्न नहीं करेगा, बल्कि उसे तुच्छ जानता है और परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध अपनी ही बुद्धि और षड्यन्त्रों के द्वारा अपना प्रबन्ध करने की सोचता है, वह अनन्त और सांसारिक दोनों से वंचित किया जाएगा, और या तो सांसारिक को पाएगा ही नहीं, या कम से कम उससे सन्तुष्ट और सुखी नहीं होगा।

"इसलिए कल के लिए चिन्ता न करो; क्योंकि कल का दिन अपनी चिन्ता आप कर लेगा। आज के लिए आज ही का दुःख बहुत है।"

47. संसार सदा भविष्य के विषय में चिन्तित रहता है, और इसके द्वारा अपने भाग्य को सुनिश्चित करने और इतना कुछ कर लेने की सोचता है कि वह संकट से दूर हो जाए, अपनी रक्षा और अपना भरण-पोषण कर सके। वे इसकी व्यर्थता नहीं देखते, और यह नहीं देखते कि उनकी योजनाएँ बिगड़ जाती हैं; कि यह सच है, और अनुभव गवाही देता है, जैसा मसीह यहाँ कहता है, कि हर दिन अपनी विपत्ति और दुःख लेकर आता है। इस प्रकार ऐसा होता है कि अपनी ऐसी युक्तियों और चतुराई से, जिनके द्वारा वे अपने आप को सुरक्षित करने और आनेवाले सब संकटों को पहले से रोकने की सोचते हैं, संसार केवल और अधिक कष्ट और हानि उत्पन्न करता है। क्योंकि जब भी वे देखते हैं कि बातें वैसी नहीं हो रहीं जैसी उन्होंने आशा की थी, या कोई दुर्घटना हो जाती है, तब वे निराश होने लगते हैं, एक उपाय और दूसरे उपाय की सोचते हैं, और कल्पना करते हैं कि उन्हें, जहाँ कहीं और जैसे भी हो सके, सहायता, सुरक्षा और बचाव ढूँढ़ना ही होगा; इस प्रकार वे अपने लिए जोड़-तोड़ करते हैं और सब प्रकार की विचित्र धूर्तता और चालबाज़ियों से बात सुधारने की सोचते हैं, जिनकी ओर अविश्वास उन्हें परमेश्वर और अपने विवेक के विरुद्ध हाँकता है, ताकि जो उनके मन में है उसे इसी प्रकार पूरा करें, यद्यपि वे देखते हैं कि परमेश्वर ऐसी बातों को सफल नहीं करता। इसी से इतनी विपत्ति, दुर्दशा, हत्या, युद्ध, और इस दुष्ट संसार की सारी शरारत और कुकर्म उत्पन्न होते हैं। हर एक अपने कामकाज को परमेश्वर के बिना पूरा करना चाहता है, जो कोई उसे रोके उसे दबाना और उसका गला घोंटना चाहता है, और अपनी इच्छा छोड़ने के बजाय सब कुछ उलट-पुलट करके एक ढेर पर फेंक देना अधिक पसन्द करता है। इससे सब कामकाज और शासनों में सब अच्छी बातें नष्ट हो जाती हैं और बुराई के सिवा कुछ नहीं बढ़ता; जैसा सारा इतिहास और दैनिक अनुभव आवश्यकता से कहीं अधिक दिखाते हैं।

48. इसके विरुद्ध मसीह अपने विश्वासियों को सावधान करना चाहता है, कि

वे न डगमगाएँ और न अपने कामकाज को उस पर दाँव पर लगाएँ जो अनिश्चित है, व्यर्थ में भविष्य की चिन्ता करते हुए, परन्तु हर समय और प्रतिदिन वही करें जो उचित है; कि वे इस बात की चिन्ता न करें कि बातें कैसे निकलेंगी, और न आनेवाली और अनिश्चित भली या बुरी बातों से अपने आप को डिगने दें; बल्कि चिन्ता परमेश्वर को सौंप दें, और फिर जो कुछ उन पर आए उसे भले भाव से ग्रहण करें और विश्वास और धीरज से उस पर जय पाएँ। क्योंकि पृथ्वी पर यह अन्यथा हो ही नहीं सकता कि हर एक को प्रतिदिन अपने पद, स्थिति और बुलाहट में ऐसी बातों का सामना करना पड़े जिनका वह आनन्द से स्वागत नहीं करता, जो उसे बहुत कष्ट और परिश्रम देती हैं। इसीलिए मसीह भी इस जीवन को दैनिक दुःख या विपत्ति कहता है, अर्थात् सब प्रकार की विपत्ति, विरोध, बाधा; ताकि हम इसे जानें और इसके लिए तैयार रहें, कि इनमें से किसी से भी डरकर भलाई करना न छोड़ें, और न संसार के पीछे लालायित होकर उसके अधर्मी और बुरे कामों में भागी बनें,—और इस प्रकार अपने आप को और दूसरों को विनाश और दण्ड में ले जाएँ।

[मुद्रित पृष्ठ-चिह्न — अनुवाद में छोड़ा गया]

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