उपदेश 12 / 14

त्रिएकता के बाद चौबीसवाँ रविवार

यह हिन्दी संस्करण अंग्रेज़ी मूल से पूर्ण रूप से, अनुच्छेद-दर-अनुच्छेद, कृत्रिम बुद्धि (AI) की सहायता से अनुवादित है; मानवीय समीक्षा जारी है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

त्रिएकता के बाद चौबीसवाँ रविवार।

यह उपदेश c. संस्करण में नहीं पाया जाता। Erl. 14, 331; W. 11, 2447; St. L. 11, 1834.

पाठ: मत्ती 9,18-26. जब वह उनसे ये बातें कह ही रहा था, तो देखो, एक सरदार आया और उसे प्रणाम करके कहने लगा, मेरी बेटी अभी मरी है; परन्तु चलकर अपना हाथ उस पर रख, तो वह जीवित हो जाएगी। और यीशु उठकर अपने चेलों समेत उसके पीछे हो लिया। और देखो, एक स्त्री ने, जिसे बारह वर्ष से लहू बहने का रोग था, पीछे से आकर उसके वस्त्र के आँचल को छू लिया; क्योंकि वह अपने मन में कहती थी, यदि मैं उसके वस्त्र ही को छू लूँगी, तो चंगी हो जाऊँगी। तब यीशु ने फिरकर उसे देखा और कहा, बेटी, ढाढ़स बाँध; तेरे विश्वास ने तुझे चंगा किया है। और वह स्त्री उसी घड़ी से चंगी हो गई।

और जब यीशु उस सरदार के घर में पहुँचा और बाँसुरी बजानेवालों और भीड़ को हुल्लड़ मचाते देखा, तो कहा, हट जाओ; क्योंकि लड़की मरी नहीं, पर सोती है। इस पर वे उसकी हँसी उड़ाने लगे। परन्तु जब भीड़ निकाल दी गई, तो उसने भीतर जाकर उसका हाथ पकड़ा, और लड़की जी उठी। और इस बात की चर्चा उस सारे देश में फैल गई।

सुसमाचार और मसीह, अथवा याईर की बेटी का जिलाया जाना और लहू बहने के रोगवाली स्त्री I. सुसमाचार और मसीह के विषय में 1. सुसमाचार और कुछ नहीं केवल एक 2. जो कोई उद्धार पाना चाहता है, उसे मसीह से लिपटे रहना होगा। 3.

3. मसीह की मनोहरता। 4.

4. सुसमाचार का महान लक्ष्य मसीही बनाना है। 5f.

* कोई मसीही क्यों कहलाता है, और कोई मसीही के रूप में कैसे पहचाना जा सकता है। 6-8.

क्या कर्म-धार्मिकता के शिक्षक मसीही शिक्षक हैं। 8.

5. मसीह सर्वोच्च व्यक्ति है, और वही अकेला सहायता कर सकता है और करेगा। 9-11. a. कौन मसीही है और कौन नहीं। 11. b. मसीही अपने कामों के द्वारा पहले धर्मपरायण नहीं होता, बल्कि अपने काम करने से पहले ही धर्मपरायण होता है। 12. c. मसीही किस हद तक एक-दूसरे के समान और असमान हैं। 13

6. इसका सार क्या है 7. जब मसीह को न्यायी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है तो क्या समझना चाहिए।

8. महान के दो भाग मसीह का अनुग्रह और भलाई। II. सुसमाचार और मसीह के विषय में

A. यह बात लहू बहने के रोगवाली स्त्री में कैसे चित्रित पाई जाती है, और:

1. इसमें कि जब उसने मसीह का प्रचार सुना, तो उसने पक्की आशा बाँधी कि वह उसकी सहायता करेगा।

2. इसमें कि उस स्त्री ने मसीह की सहायता के योग्य कुछ नहीं किया था और वह अपने आप को अयोग्य समझती थी।

* मसीह के अनुग्रह और भलाई के लिए सच्ची तैयारी के विषय में।

3. इसमें कि उसने अपना सब कुछ वैद्यों पर खर्च कर दिया और फिर भी कोई लाभ न पाया। 21-26.

कर्म-धार्मिकता की शिक्षाओं और शिक्षकों के विषय में; और पोप-पक्षियों के नियमों के विषय में भी। a. वे दुखी विवेक को और भी अधिक संकट में डालते हैं। 21 b. कर्म-धार्मिकता की शिक्षा अनेक धार्मिक संघों और संस्थाओं का कारण है। 23. c. कर्म-धार्मिकता के शिक्षक खतरनाक वैद्य हैं। d. पोप-पक्षियों की कर्म-धार्मिकता की शिक्षाओं और संस्थाओं को प्रोत्साहन क्यों और कैसे नहीं देना चाहिए। 25-26.

4. इसमें कि वह स्त्री कर्मों के द्वारा नहीं, बल्कि अनुग्रह के द्वारा मसीहियों की ओर फिरी। 29-30.

5. इसमें कि उस स्त्री ने मसीह से पाप-मोचन पाया। 31-32.

कर्म हमें मसीही नहीं बनाते, केवल यह प्रमाणित करते हैं कि हम मसीही हैं। 32 B. यह बात याईर की बेटी में कैसे चित्रित पाई जाती है।

1. इस चित्र का पहला भाग।

2. दूसरा भाग 35f.

* शैतान और संसार सुसमाचार को इतनी कठोरता से क्यों और कैसे सताते हैं। 36-37.

* इस व्याख्या का उपसंहार। 38.

इस सुसमाचार का सार: 1. मसीह संसार में पाप को दूर करने के लिए आया।

2. सांसारिक बुद्धि और मानवीय धार्मिकता इसके काम का उपहास करती हैं 3. इस स्त्री के विश्वास की प्रशंसा की जाती है जिसने उद्धारकर्ता के वस्त्र के आँचल को छुआ; इस विषय में वह पढ़ो जो मरकुस अपने पाँचवें अध्याय में लिखता है।

आत्मिक अर्थ: यहूदियों के इस आराधनालय के सरदार की छोटी बेटी से यहूदी धर्म समझा जाना चाहिए; उस स्त्री से अन्यजाति, और मसीह इन दोनों की सहायता करता है। मरकुस ने विशेष ध्यान देकर यह जोड़ा कि वह छोटी बेटी बारह वर्ष की थी और उस स्त्री को भी बारह वर्ष से लहू बहने का रोग था।

और यह भी कि वह लड़की स्वस्थ और बलवन्त थी और उछलती-कूदती और आनन्द मनाती फिरती थी, जबकि वह स्त्री रोगी पड़ी थी। परन्तु जब वह स्त्री चंगी हुई, तो वह लड़की लेट गई और मर गई। इसका अर्थ यह है कि यहूदी परमेश्वर और उसकी व्यवस्था में प्रसन्न रहते और आनन्द मनाते थे, जबकि अन्यजाति परमेश्वर के बिना पाप में पड़े रहे, और उन्हें यहूदियों के बीच मिलने-जुलने की अनुमति न थी, प्रेरितों के काम 10. अब जब मसीह आया और अन्यजातियों और सारे संसार की सहायता करना चाहा, तो वह लड़की, अर्थात् आराधनालय, मरने लगती है, मसीह के द्वारा दिए गए परमेश्वर के अनुग्रह को तुच्छ जानती है; परन्तु इस बीच वह स्त्री फिर स्वस्थ हो जाती है, अर्थात् अन्यजाति उस अनुग्रह को पाते हैं जिसे यहूदियों ने ठुकरा दिया; फिर भी, अन्त में मसीह उस लड़की को मरे हुओं में से जिलाता है, जिसका अर्थ है कि सब यहूदी नष्ट नहीं होते, बल्कि बहुत से सुसमाचार के प्रचार और विश्वास के द्वारा लौट आएँगे

11. इसलिए आत्मिक अर्थ का सार यह है: मसीह जाता है और यहूदियों के आराधनालय को मरे हुओं में से जिलाएगा; तब अन्यजाति जातियाँ उसके मार्ग में आ गईं

और उनके साथ मिल गईं; इस विषय में पौलुस और भविष्यद्वक्ताओं के लेखों में जहाँ-तहाँ बहुत कुछ है।

1. प्रिय मित्रो, तुम जानते हो कि सुसमाचार और कुछ नहीं, केवल एक व्यक्ति के विषय में उपदेश है जो मसीह कहलाता है। और यद्यपि जहाँ-तहाँ बहुत सी अन्य पुस्तकें लिखी गई हैं, और बहुत से भिन्न-भिन्न लोगों ने बहुत से उपदेश दिए हैं, अन्यजातियों और मसीहियों दोनों के विषय में, हाँ, परमेश्वर की माता, संत पतरस, स्वर्गदूतों और बहुत से संतों के विषय में भी; तौभी वे सुसमाचार नहीं हैं, क्योंकि केवल वही सच्चा सुसमाचार है जो मसीह को हमारे सामने रखता है, और उन अच्छी वस्तुओं की शिक्षा देता है जिनकी आशा हम उससे रख सकते हैं।

2. निःसन्देह सुसमाचार में कभी-कभी यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले, मरियम और प्रेरितों के विषय में भी कुछ होता है, परन्तु यह ठीक-ठीक सुसमाचार नहीं है, क्योंकि उनका विचार इसलिए किया जाता है कि और भी पूर्ण रूप से दिखाया जाए कि मसीह कहाँ से आया और उसका पद क्या है। इसी प्रकार लूका यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले का इतिहास आरम्भ से, उसका गर्भ में आना और जन्म, बताता है; और कुँवारी मरियम का भी, और यह सब उनके लिए नहीं, बल्कि केवल एक व्यक्ति मसीह के लिए लिखा गया है, ताकि सुसमाचार में जो कुछ लिखा है वह केवल इसी व्यक्ति मसीह से सम्बन्ध रखे। संत पौलुस की पत्रियों में संतों के विषय में कुछ नहीं लिखा, वहाँ सब कुछ केवल मसीह के विषय में है।

सुसमाचार-लेखक बताते हैं कि मसीह ने कौन-कौन से आश्चर्यकर्म और चमत्कार किए; परन्तु वे किसी ऐसे काम के विषय में नहीं लिखते जो यूहन्ना या मरियम ने किया हो; केवल वही जो मसीह ने किया, कि उसने लोगों की देह और प्राण में कैसे सहायता की, और लोग कैसे उससे लिपटे रहे।

3. क्योंकि परमेश्वर ने ठहराया है कि उसकी इच्छा यह है कि यदि सब उद्धार पाना चाहें तो वे एक ही मनुष्य मसीह से लिपटे रहें, उसी पर आशा रखें और उसी को दृढ़ता से थामे रहें। इस प्रकार वे मसीह को छोड़ और किसी को नहीं जानते, जिसे अकेले परमेश्वर ने हमारे लिए प्रायश्चित्त का ढकना ठहराकर प्रस्तुत किया है, जैसा संत पौलुस लिखता है, रोमियों

3, 25. अब तक कोई इस संत से लिपटा रहा, कोई उस से, किसी ने मरियम को पकड़ा, किसी ने संत बारबरा को, और नाना प्रकार के पंथ और धार्मिक संघ रहे हैं। परन्तु नाम को छोड़ मसीह की चिन्ता किसी ने नहीं की। हमारे बहुत से मध्यस्थ रहे हैं, जिन सब को हमने त्याग दिया और केवल मसीह को थामे रहे।

इसलिए संत पौलुस रोमियों 1, 2 में कहता है कि सुसमाचार की

प्रतिज्ञा परमेश्वर ने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा अपने पुत्र के विषय में की थी।

और वह इस बात पर इतना अधिक बल देता है कि सुसमाचार में उस एकमात्र व्यक्ति, यीशु मसीह, को छोड़ और कुछ काम नहीं आता। जो यह जानता है वह परमेश्वर का भली-भाँति धन्यवाद करे कि वह जानता है कि अपनी शान्ति, सहायता और भरोसा कहाँ रखे, और तब वह दूसरे व्यक्तियों के विषय में सब उपदेशों को तुच्छ जानेगा और फेंक देगा।

4. इसी कारण आज के सुसमाचार में प्रभु हमारे सामने इस रूप में चित्रित किया गया है कि वह लोगों के बीच घूमता-फिरता है, और अपनी मित्रता और शान्तिदायक शिक्षा के द्वारा सारे संसार को अपनी ओर खींचता है, ताकि वे मन से उससे लिपटे रहें, उसकी भलाई पर निर्भर रहें, और उससे आत्मिक और सांसारिक दोनों प्रकार के धन पाने की आशा रखें। और तुम उसे उन लोगों से जिन्हें वह चंगा करता और जिनकी सहायता करता है, कुछ लेते हुए नहीं देखते; हाँ, उसे उनसे तिरस्कार और उपहास के सिवा कुछ नहीं मिलता, जैसा हम सुनेंगे। भले काम उससे निकलते हैं, परन्तु बदले में उसे उपहास और तिरस्कार मिलता है।

5. अब यह बात सारे संसार में प्रचारित की जाती और उसके सामने रखी जाती है, ताकि वे इस मनुष्य को ठीक-ठीक पहचानना सीखें, और यह जानें कि मसीही कैसे बनें, न कि भले और निर्दोष कैसे बनें। सुसमाचार के बाहर की दूसरी शिक्षाएँ, जैसे अन्यजाति गुरुओं की पुस्तकें, इस पर बल देती हैं कि लोग उनके द्वारा भले बनें; फिर संतों की कथाएँ विशेष रूप से इस पर बल देती हैं कि लोग वैसे ही जीएँ जैसे संत जीए। भले लोग बनाना सुसमाचार का काम नहीं है, क्योंकि वह केवल मसीही बनाता है। धर्मपरायण होने की अपेक्षा मसीही होने में कहीं अधिक लगता है। कोई व्यक्ति सहज ही धर्मपरायण हो सकता है, परन्तु मसीही नहीं। मसीही अपनी धर्मपरायणता के विषय में कहने को कुछ नहीं जानता, क्योंकि वह अपने आप में कुछ भी भला या धर्मपरायण नहीं पाता। यदि उसे धर्मपरायण होना है, तो उसे एक भिन्न धर्मपरायणता ढूँढ़नी होगी, ऐसी धर्मपरायणता जो किसी दूसरे में है।

6. इसी उद्देश्य से मसीह हमारे सामने एक अक्षय सोते के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो हर समय शुद्ध भलाई और अनुग्रह से उमड़ता रहता है। और ऐसी भलाई और कृपा के बदले वह और कुछ स्वीकार नहीं करता, केवल यह कि भले लोग, जो ऐसी कृपा और अनुग्रह को मानते हैं, उसके लिए उसका धन्यवाद करें, उसकी स्तुति करें और उससे प्रेम करें, यद्यपि दूसरे इसी कारण उसे तुच्छ जानते हैं। यही वह फसल है जो वह इससे काटता है। इसलिए कोई इस कारण मसीही नहीं कहलाता कि वह बहुत कुछ करता है, बल्कि इस कारण कि वह

लूथर की कलीसियाई पोस्टिल।

मसीह से कुछ पाता है, उससे खींचता है और केवल मसीह को ही अपने को देने देता है।

यदि कोई मसीह से अब कुछ नहीं पाता, तो वह अब मसीही नहीं रहा, इसलिए मसीही नाम केवल पाने पर आधारित रहता है, न कि देने और करने पर, और वह केवल अकेले मसीह को छोड़ किसी और से कुछ नहीं पाता।

यदि तुम उस पर दृष्टि करते हो जो तुम करते हो, तो तुम मसीही नाम पहले ही खो चुके हो। यह तो सच है कि हमें भले काम करने, दूसरों की सहायता करने, उन्हें सम्मति देने और उन्हें देने हैं; परन्तु इस कारण कोई मसीही नहीं कहलाता, और न वह इस कारण मसीही है।

7. इसलिए यदि तुम इस शब्द को उसके सच्चे अर्थ में देखना चाहते हो, तो तुम्हें मसीही को इस बात से पहचानना होगा कि वह केवल मसीह से कुछ पाता है, और मसीह को अपने भीतर रखता है; क्योंकि इस शब्द का ठीक-ठीक अर्थ यही है। जैसे कोई व्यक्ति अपने गोरे रंग के कारण "गोरा" कहलाता है, अपने साँवले रंग के कारण काला, अपने डील-डौल के कारण बड़ा। वैसे ही कोई मसीह के कारण "मसीही" कहलाता है, जो उसमें वास करता है और जिससे वह अपनी आशिषें पाता है। अतः यदि कोई मसीह के कारण मसीही कहलाता है, तो वह निश्चय ही अपने कामों के कारण मसीही नहीं कहलाता। इससे यह भी निकलता है कि कोई अपने भले कामों के कारण मसीही नहीं कहलाता। यदि यह सच है, जैसा कि निःसन्देह है, तो यह अवश्य निकलता है कि हमारे धार्मिक संघ और पंथ मसीही नाम के अन्तर्गत नहीं आते, और वे मसीही उत्पन्न नहीं करते।

8. इसलिए वे धोखेबाज़ हैं, जो कलीसिया में प्रचार करते या शिक्षा देते हैं, और आज्ञाओं, कामों और विधियों में लगे रहते हैं, जिनसे कुछ सिद्ध नहीं होता। यद्यपि वे मसीही होने का ढोंग करते हैं, तौभी वे इसी नाम की आड़ में अपनी आज्ञाओं और कामों से हम पर बोझ डालने और हमें सताने का यत्न करते हैं। अपने कामों के कारण मैं भले ही उपवास करनेवाला, प्रार्थना करनेवाला या तीर्थयात्री कहलाऊँ, परन्तु मसीही नहीं। यदि तुम अपने सब कामों को एक साथ बुन लो, और उनमें दूसरों के सब काम भी जोड़ दो, तौभी तुम्हारे पास मसीह न होगा, और इन बातों से तुम मसीही नहीं कहला सकते। मसीह व्यवस्था और मनुष्यों की आज्ञाओं से कुछ भिन्न और ऊँचा है। वह परमेश्वर का पुत्र है, जो केवल देने को तैयार है, न कि [लेने] को।

यदि मैं इतना बुद्धिमान हूँ कि जो वह देता है उसे ले लूँ, तो वह मेरा है, और यदि वह मेरा है तो मैं उचित रूप से मसीही कहलाता हूँ। इस प्रकार तुम्हारे पास यह भेद है कि मसीही क्या है और मसीह क्या है।

9. अब यह सुसमाचार हमें सिखाता है कि मसीह सबसे बड़ा और सर्वोच्च व्यक्ति है, जो सारे संसार में प्रसिद्ध है, लोगों को डराने के लिए नहीं, बल्कि सब सांसारिक और स्वर्गीय वरदान उण्डेलने के लिए, ताकि सब मनुष्य उस पर निर्भर रहें और उस पर भरोसा रखें, और जिस वस्तु की उन्हें आवश्यकता है वह निरन्तर केवल उसी से पाते रहें। यदि पाप मेरे विवेक को डराता है और व्यवस्था के प्रचारक आकर अपने कामों से मेरी सहायता करना चाहते हैं, तो उनसे कुछ न होगा। यहाँ केवल मसीह ही सहायता कर सकता है और कोई नहीं। हाँ, दूसरे तो इसे और भी बिगाड़ देते हैं, चाहे वे पतरस या पौलुस हों, या स्वयं परमेश्वर की माता मरियम ही क्यों न हो।

केवल मसीह ही यह कर सकता है, क्योंकि वह परमेश्वर की ओर से इसी उद्देश्य से ठहराया गया है कि वह वह शुभ समाचार भेजे जिसमें यह प्रचार किया जाता है कि मेरे पाप सेंतमेंत कैसे क्षमा किए जाएँगे, मेरी ओर से किसी काम या पुण्य के बिना, केवल और सीधे-सीधे इस मसीह पर विश्वास के द्वारा शुद्ध अनुग्रह से। अब यदि मैं जो प्रचार किया जाता है उसे ग्रहण करूँ, तो मुझे यह शान्ति मिलती है कि मेरे पाप परमेश्वर के सामने और संसार के सामने क्षमा किए गए हैं। यदि मैं मन से इसे दृढ़ता से थामे रहूँ, तो मैं मसीही हूँ, और इसके लिए मैं

मसीह के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ, जो हर समय मुझे अपना पवित्र आत्मा और अनुग्रह देता है, ताकि पाप न यहाँ और न न्याय के दिन मेरी हानि कर सके।

10. यदि मैं मृत्यु से डरता हूँ और मरना नहीं चाहता, तो मैं इस मसीह में शान्ति और औषधि पाता हूँ, जिससे मैं मृत्यु की कुछ भी चिन्ता नहीं करता। यदि मैं परमेश्वर के क्रोध से भयभीत हूँ, तो यहाँ मेरे लिए एक मध्यस्थ है। बहुत से लोग जंगल में भाग जाते हैं या मोटे बालों के वस्त्र पहन लेते हैं, और सोचते हैं कि वे परमेश्वर को विवश करेंगे कि वह उन पर क्रोध न करे; परन्तु इससे कुछ न होगा; जिसके पास यह मसीह नहीं, उस पर परमेश्वर का क्रोध सदा बना रहता है, क्योंकि ऐसा ही ठहराया गया है। यूहन्ना 3, 36.

11. इसलिए जो कोई ऐसा आनन्दित विवेक चाहता है जो न पाप से, न मृत्यु से, न नरक से, न परमेश्वर के क्रोध से डरे, वह इस मध्यस्थ, मसीह, को ठुकराने का साहस न करे। क्योंकि वह अनुग्रह से उमड़नेवाला सोता है, जो सांसारिक और अनन्त जीवन देता है।

केवल अपना हृदय खोल और उसे आगे बढ़ा, तो तुम सब कुछ पाओगे। वह उमड़ता और बहता है, और देने, बहने और उमड़ने के सिवा और कुछ कर ही नहीं सकता, यदि तुम केवल इसका विश्वास कर सको। तुम इस योग्य ठीक ही हो कि लोग तुम्हें मसीही कहें, जब तुम उसके कारण मसीही कहलाते हो जो तुम मसीह से पाते हो; यदि नहीं, और तुम उसे इतना कुछ देना चाहते हो, तो तुम मसीही नहीं हो। यही वह धनी, बहुमूल्य वचन है जिसकी संत पौलुस इतनी अधिक प्रशंसा करता है, और कभी पर्याप्त प्रशंसा नहीं कर पाता, कि वह इतने अनुग्रह से हमें अपना पुत्र देता है, कि जो कोई उसे ग्रहण करे उन सब पर अपना अनुग्रह उण्डेले।

रोमियों 3, 24 और 8, 32; गलातियों 3, 25.

12. इससे आगे यह निकलता है कि जब कोई मसीही भले काम करता है और अपने पड़ोसी से प्रेम दिखाता है, तो वह इसके द्वारा मसीही या धर्मपरायण नहीं बनता, बल्कि ऐसा करने से पहले ही उसका मसीही और धर्मपरायण होना आवश्यक है। वह भले काम तो करता है, परन्तु उसके भले काम उसे मसीही नहीं बनाते। पेड़ अच्छा फल लाता या देता है, परन्तु फल पेड़ को अच्छा नहीं बनाता। इसी प्रकार यहाँ भी कोई अपने कामों के द्वारा नहीं, बल्कि मसीह के द्वारा मसीही बनता है।

13. इससे तुम समझते हो कि मसीही किस प्रकार के लोग हैं, और उनका राज्य क्या है, अर्थात् यह कि वे एक भीड़ हैं जो मसीह से लिपटी रहती है, और उसके साथ एक ही आत्मा और वही वरदान रखती है। और इसके द्वारा सब मसीही बराबर हैं, और किसी के पास दूसरे से अधिक मसीह नहीं है;

संत पतरस क्रूस पर के डाकू से बढ़कर नहीं है; परमेश्वर की माता मरियम उस पापिनी, मरियम मगदलीनी, से बढ़कर नहीं है।

बाहरी कार्यों और कामों में, निःसन्देह, उनके बीच अन्तर है, क्योंकि कुँवारी मरियम को मरियम मगदलीनी से बड़ा काम करना था, संत पतरस को क्रूस पर के डाकू से बड़ा काम। जब हम कामों के अनुसार गिनते हैं तो ऐसा ही है; परन्तु अपने कामों के बल पर हम मसीही नहीं हैं। कुँवारी मरियम अपने इस बड़े काम के कारण मसीही नहीं है कि उसने अपनी देह में मसीह को, ऐसे बहुमूल्य और अवर्णनीय धन को, धारण किया, जैसा स्वयं मसीह ने उस स्त्री से कहा, लूका 11, 27-28, जिसने लोगों के बीच ऊँचे शब्द से प्रभु से पुकारकर कहा: "धन्य है वह गर्भ जिसने तुझे धारण किया, और वे स्तन जो तू ने चूसे।" "हाँ, धन्य वे हैं," उसने कहा, "जो परमेश्वर का वचन सुनते और उसे मानते हैं।"

यहाँ तुम देखते हो कि वह विश्वासियों को अपनी माता से ऊँचा ठहराता है। क्योंकि

मसीही इसलिए मसीही कहलाते हैं कि वे मसीह पर विश्वास करते हैं।

कुँवारी और माता दो बहुत सुन्दर नाम हैं, परन्तु विश्वासियों या मसीहियों के नाम की तुलना में वे कुछ भी नहीं।

फिर, संत पौलुस इतना अभिमानी है कि गलातियों को लिखी अपनी पत्री, 2, 6, में वह बड़े और ऊँचे प्रेरितों के पद को ऐसी प्रतिष्ठा देता है जो परमेश्वर के सामने बहुत थोड़ी है, सिवाय इसके कि वह आशिष लाए और दूसरों के काम आए।

14. इसलिए मसीह पर विश्वास के द्वारा हम सब बराबर हैं।

यद्यपि संत पतरस का विश्वास मुझसे दृढ़ है, तौभी वह मसीह पर वही विश्वास है। क्योंकि उसका पिता अपने पुत्र मसीह को मिली-जुली भीड़ के सामने प्रस्तुत करता है, और जो कोई उसे ग्रहण करता है, वह पूरा मसीह पाता है, चाहे निर्बलता में या बल में, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। इस सुसमाचार की वह स्त्री जो बहुत समय से रोगी थी, मसीह को वैसे ही पकड़ लेती है जैसे उसकी माता कुँवारी मरियम ने पकड़ा था। इसलिए मसीहियों में एक ही आत्मा है, एक दूसरे के समान ही कुलीन है, संत पतरस को मुझे अपना भाई कहना पड़ता है, और मैं भी उसे अपना भाई कह सकता हूँ।

हाँ, मसीह हमें अपने पास ग्रहण करता है और हमें अपने भाई मानता है, जैसा उसने अपने पुनरुत्थान के बाद मरियम मगदलीनी से कहा: "मेरे भाइयों के पास जाकर उनसे कह दे, कि मैं अपने पिता और तुम्हारे पिता, और अपने परमेश्वर और तुम्हारे परमेश्वर के पास ऊपर जाता हूँ।"

यूहन्ना 20,17. और संत पौलुस मसीह को बहुत भाइयों में पहिलौठा कहता है, रोमियों 8, 29. इस विषय में वह कुरिन्थियों को लिखी अपनी पहली पत्री, 8, 9-12, में बहुत सुन्दर रीति से बोलता है, जहाँ वह निर्बल भाइयों के विषय में यों कहता है:

"परन्तु चौकस रहो, ऐसा न हो कि तुम्हारी यह स्वतन्त्रता कहीं निर्बलों के लिए ठोकर का कारण हो जाए। क्योंकि यदि कोई तुझ ज्ञानी को मूरत के मन्दिर में भोजन करते देखे, तो क्या उसका विवेक, यदि वह निर्बल है, मूरतों के आगे बलि की हुई वस्तुएँ खाने का हियाव न करेगा? इस रीति से तेरे ज्ञान के कारण वह निर्बल नाश होता है, वह भाई जिसके लिए मसीह मरा। और इस प्रकार भाइयों के विरुद्ध पाप करने से, और उनके निर्बल विवेक को चोट पहुँचाने से, तुम मसीह के विरुद्ध पाप करते हो।"

15. इस सम्पूर्ण सुसमाचार का सार यह है कि हम मसीह को ठीक-ठीक पहचानना सीखें, और न केवल यह कि हमारे पास कोरा नाम हो, बल्कि यह जानें कि हमें सब कुछ उसी से मिलता है। यदि हम मसीही हैं तो हमारे पास सब कुछ है, और परमेश्वर हमारा पिता है, और हम स्वर्ग और पृथ्वी की सब वस्तुओं के स्वामी हैं; यह

हमारा कोई काम पूरा नहीं कर सकता, चाहे वह कितना ही बड़ा और महँगा क्यों न हो। अब तुम देखते हो कि जो पोप के प्रभुत्व के अधीन जीते हैं, वे मसीही नाम से कितनी दूर हैं। सुसमाचार केवल एक व्यक्ति, मसीह, का प्रचार करता है; न तो

मरियम का, पोप या किसी काम का तो और भी नहीं, चाहे वह कितना ही महँगा क्यों न हो। उसे केवल मसीह को प्रस्तुत करना है और किसी को नहीं, जिसे पिता परमेश्वर ने हमारे बीच भेजा है, केवल इसलिए कि हम सब कुछ उसी से खींचें, और उसके अनुग्रह और भलाई की बाट जोहें।

16. अब जब वे तुम्हें मसीह का प्रचार एक न्यायी के रूप में करते हैं, कि वह न्याय के दिन कैसे प्रकट होगा, और तुम्हें कैसे बहुत से भले काम करने चाहिए कि वह तुम्हें उनका प्रतिफल दे, और तुम इसे मान लेते हो, तो वह सचमुच तुम्हारे लिए न्यायी होगा, उद्धारकर्ता नहीं। और यदि वह तुम्हारे सामने इस प्रकार प्रस्तुत किया जाए जैसे लोग उसकी माता का चित्र बनाया करते हैं कि वह उसे अपने स्तन दिखा रही है, तो यह वास्तव में शैतान का प्रचार करना है, मसीह का नहीं, जो केवल देता है परन्तु कुछ नहीं लेता। यह तो सच है कि जब तुमने उससे पा लिया है, तो भले काम बिना दबाव या माँग के अपने आप ही पीछे आएँगे; और यह आज के सुसमाचार में हमारे सामने बहुत सुन्दर रीति से दिखाया गया है।

17. क्योंकि यहाँ, तुम देखते हो, मसीह लोगों को सुसमाचार सुनाता है। अब प्रचार करना कोई तुच्छ काम नहीं है, क्योंकि यहाँ वह हमारी बड़ी सेवा करता है, कि वह हमारा शिक्षक बनता है और हमें सिखाता है कि हम उसकी पहचान तक कैसे पहुँच सकते हैं। यह उसके बड़े अनुग्रह और कृपा का एक भाग है।

जब तक वह यहाँ पृथ्वी पर है वह सिखाना नहीं छोड़ता, ताकि हम उसे अपने उद्धारकर्ता और छुड़ानेवाले के रूप में ग्रहण करें; इसके बाद वह अपने भले कामों के साथ हमारे पीछे आता है, जिन्हें वह हर जगह हर एक पर उसकी आवश्यकता के अनुसार प्रकट करता है। सुसमाचार में तुम्हें ऐसा कोई नहीं मिलता जिसने कभी प्रभु से कुछ माँगा हो और उसकी सहायता से इनकार किया गया हो और वह न दी गई हो। जितने भी उसके पास आए, अन्धे, बहरे, लँगड़े, लकवे के मारे और जलोदर के रोगी, उसने सब को ग्रहण किया और जैसा वे चाहते थे सब की सहायता की, और उन्हें सब रोगों से चंगा किया, जैसा लूका 6, 19 कहता है: "और सब लोग उसे छूना चाहते थे; क्योंकि उसमें से सामर्थ्य निकलकर सब को चंगा करती थी।"

भाग II.—सुसमाचार और मसीह के विषय में विस्तार से।

18. वह इस स्त्री के साथ भी ऐसा ही करता है। वह स्त्री

उसे प्रचार करते सुनती है, और समझ जाती है कि वह एक भला, कोमल हृदय का मनुष्य है, जो सारे संसार के प्रति मित्रतापूर्ण दिखाई देता है; तब वह भी उससे लिपटने लगी और यह सोचने का साहस करने लगी कि क्योंकि वह किसी को अपने पास से नहीं निकालता, इसलिए उसका भी स्वागत है कि वह उसकी मित्रता और भलाई का आनन्द ले।

इसलिए वह सब प्रेरितों को छोड़ देती है, और अपने हृदय का भरोसा और विश्वास केवल प्रभु पर डालती है, और अपने मन में कहती है:

"यदि मैं उसके वस्त्र ही को छू लूँगी, तो चंगी हो जाऊँगी।"

19. जरा देखो तो उस स्त्री का कैसा हृदय था। उसका विश्वास और भरोसा सचमुच उत्तम और बड़ा है। उसने अपने हृदय में इसके सिवा और कुछ नहीं सोचा कि यदि वह केवल अपने हाथ से उसके वस्त्र को छू ले तो वह निश्चय उसकी सहायता करेगा, और फिर भी वह इतनी ढीठ नहीं कि खुलकर उसके पास जाए। वह अपने आप को उससे बात करने या उसकी ओर देखने के भी अयोग्य समझती है; क्योंकि वह जानती है कि वह किसी वस्तु के योग्य न थी, और उसने प्रभु के लिए कभी कुछ नहीं किया। इसलिए वह ऐसी युक्ति करती है कि पीछे से उसके पास आए, उसके पाँवों पर गिर पड़ती है और केवल उसके वस्त्र के आँचल को छूती है। यहाँ कोरे संकोच और अयोग्यता के सिवा और कुछ नहीं है। किसने यह योग्यता कमाई थी कि प्रभु इन लोगों को सुसमाचार सुनाए जाने दे! यहाँ न कोई तैयारी है, न कोई काम; फिर भी वह बेचारी स्त्री वहाँ है और प्रभु से बड़ी-बड़ी बातें पाने की आशा रखती है, कि वह उसे उसके रोग से छुड़ाएगा। उसे लगभग लगातार बारह वर्ष से लहू बहने का रोग था।

ऐसी दशा में वह कुछ कैसे कमा सकती थी, या अपने रोग के कारण वह किसी वस्तु के योग्य कैसे हो सकती थी! निःसन्देह वह योग्य थी, परन्तु केवल पाने के, देने के नहीं; क्योंकि उस समय वह छोटी से छोटी वस्तु भी देने के योग्य न थी।

20. और मसीह के अनुग्रह और भलाई के लिए सच्ची तैयारी यही है कि मैं उसकी अपनी आवश्यकता को अनुभव करूँ। और तब यह सुन्दर रीति से मेल खाता है कि दोनों आपस में मिलते हैं, धनी और कंगाल, मसीह और पापी। फिर भी लोगों को यह मनवाना कि वे कंगाल हैं और उन्हें अनुग्रह की आवश्यकता है, एक बड़ी कला है।

यह कठिन बात है, और शैतान इसे होने नहीं देता, बल्कि लोगों को सदा उनके भले कामों की ओर मोड़ देता है, ताकि वे किसी भी दशा में यह विचार ग्रहण न करें कि उन्हें मसीह के अनुग्रह और दया की आवश्यकता है।

21. पाठ कहता है कि उस अभागी स्त्री को बारह वर्ष से लहू बहने का रोग था, और उसे ठीक करने के लिए उसने अपनी सारी जीविका वैद्यों पर खर्च कर दी थी। और वह इसके लिए जितना अधिक खर्च करती गई, उतनी ही अधिक बिगड़ती गई। लूका और मरकुस दोनों विशेष रूप से इसका उल्लेख करते हैं, और इसके द्वारा दिखाते हैं कि व्यवस्था और कामों का जितना अधिक प्रचार होता है, हमारे बीच दशा उतनी ही बिगड़ती है, और हमें इससे एक के बाद एक हानि और चोट के सिवा कुछ नहीं मिलता। हमारे भले कामों से विवेक कभी शान्त नहीं हो सकता। जब एक पाप विवेक से निकाला जाता है, तो दूसरा शीघ्र ही भीतर आ जाता है, हाँ, औषधि और काम प्रायः वहाँ पाप बना देते हैं जहाँ अन्यथा कोई पाप नहीं होता, जब तक हम मसीह के पास न आएँ; जैसे यहाँ यह स्त्री जो इतने समय से रोगी थी और कभी सहायता न पाती, यदि वह मसीह के पास कभी न आती, जिससे उसने बिना किसी भी काम के अपना स्वास्थ्य पाया; वह उसे कुछ नहीं देती, और केवल उससे पाती है, और उसे देने देती है।

22. ऐसा ही उन सब उपदेशों के साथ होता है जो मसीह का प्रचार नहीं करते, और यहाँ यह संकेत किया गया है कि हमें निरन्तर वचन का उपयोग करना चाहिए, और बिना रुके सदा वचन में अपने आप को अभ्यस्त करना चाहिए, क्योंकि ऐसे मनुष्य हमें हर समय मिलते हैं जिनके विवेक इसी प्रकार व्याकुल और दुखी हैं। क्योंकि यह स्त्री उन सब बेचारे विवेकों का चिह्न है जिन्हें लहू बहने का रोग है, अर्थात् जो अपने पापों को अनुभव करते हैं। और लहू का बहना निरन्तर होता रहता है और रुक नहीं सकता। क्योंकि मांस और लहू वही करते हैं जो वे चाहते हैं, और कुछ नहीं।

अब जब यह अनुभूति प्रबल हो जाती है, तो वे अभागे लोग काम में लग जाते हैं और अपनी सहायता आप करना चाहते हैं; तब कोई यह करता है, कोई वह, और अब तक किसी से कुछ सिद्ध नहीं हुआ।

23. इसी से अनेक धार्मिक संघ और संस्थाएँ उत्पन्न हुई हैं, क्योंकि मनुष्यों ने इतने अधिक काम गढ़ लिए कि उन सब के नाम भी कठिनाई से गिनाए जा सकते हैं। इस सब का कारण क्या था? पाप से सताए हुए विवेक के सिवा और कुछ नहीं, जिसने हमें ऐसा परिश्रम कराया और ऐसा सताया कि हमने सोचा कि इसके द्वारा हम अपने प्राणों को छुड़ा लेंगे और सब पापों से मुक्त हो जाएँगे। परन्तु मसीह उसमें न था, क्योंकि हम केवल देना चाहते थे, पाना नहीं। इसलिए हमारी दशा सदा बिगड़ती ही गई, जैसे इस स्त्री की, जिसे सब वैद्यों ने चंगा करने का यत्न किया, परन्तु उसे कभी कोई ऐसा न मिला जो उसकी सहायता कर सके। इसी प्रकार हमने भी सब वैद्यों का विश्वास किया; यदि कोई ऐसा आया जिसने कोई

छोटा-सा काम सिद्ध किया था, तो हमने उसका स्वागत किया। प्रिय प्रभु, हम चंगे होने को उत्सुक थे, आनन्दित विवेक पाने को उत्सुक थे, और पाप से मुक्त होने को उत्सुक थे।

24. वैद्य व्यवस्था के प्रचारक और मसीहियों पर प्रभुता करनेवाले हैं। यदि कोई पाप से मुक्त होने को बहुत उत्सुक था, तो उन्होंने उसके साथ क्या किया? उन्होंने उसे ऐसी औषधि दी जिससे वह केवल और निर्बल और रोगी हो गया। यह हमने देखा है और कुछ अंश में बहुत कुछ अनुभव भी किया है कि कैसे, हमारी बड़ी और वास्तविक हानि के लिए, लोगों ने अपने ही कामों के द्वारा भले बनने का, और इस प्रकार अपने आप को पाप से छुड़ाने का यत्न किया। परन्तु इससे कुछ लाभ न हुआ, हम पाप और मृत्यु के कारण केवल अधिक से अधिक निराश होते गए, यहाँ तक कि पृथ्वी पर याजकों, भिक्षुओं, भिक्षुणियों, और अपने भले कामों के साथ घूमनेवालों से अधिक निराश लोग कहीं नहीं मिलते थे। यदि किसी को फोड़ा हो जाता, तो दवा बेचनेवालों को काम करना पड़ता, दवा-दारू होती, ऐसी आवाजाही और दौड़-धूप होती मानो प्राण तुरन्त निकल जाएगा; इस प्रकार वे डरे हुए और निराश थे। और अन्तिम न्याय से कोई इतना तीव्र भय नहीं रखता जितना ठीक यही आत्मिक लोग। यह वे सुन्दर रीति से दिखाते भी हैं, जब वे कामों का ऐसा विवेचन करते हैं कि सदा एक काम में दूसरा जोड़ते जाते हैं, और किसी एक काम पर कभी स्थिर भरोसा नहीं रखते; और वे जितना अधिक करते हैं उतना ही बिगड़ते जाते हैं, उतने ही अधिक निराश और अविश्वासी होते जाते हैं, और उनकी दशा ठीक इस स्त्री जैसी है।

25. यह बहुत ही सुन्दर दृष्टान्त है, और हमारे लाभ के लिए भली-भाँति उपयुक्त है। हमने इस उद्देश्य के लिए न केवल अपना सांसारिक धन खर्च किया है, बल्कि उपवास से, शरीर-ताड़ना से, और दूसरे असहनीय बोझों से अपने प्राणों को भी जोखिम में डाला है, यहाँ तक कि कुछ इस पर पागल हो जाते हैं, और अपना सारा स्वाभाविक बल खो देते हैं और अन्त में ऊपर से अपने प्राण भी खो देते हैं। मैं भी इन्हीं में से एक रहा हूँ और बहुत से दूसरों से अधिक गहराई तक इस दवाख़ाने में फँसा रहा हूँ। मैं इतनी जल्दी इस बात तक नहीं पहुँच सका कि पोप की व्यवस्था को हवा में उड़ा दूँ। मेरे लिए शुक्रवार को मांस खाना, और यह निष्कर्ष निकालना कि पोप की व्यवस्था और नियम कुछ भी नहीं, एक कड़वा और कठिन काम था। परमेश्वर हमारी सहायता करे, ऐसा करने का साहस करने से पहले मेरे लिए यह कितना कठिन था! इसलिए मनुष्य को अपने विवेक में इससे मुक्त हो जाना चाहिए, और पोप की परम्पराओं को तुच्छ जानना चाहिए,

जिसे करने के लिए उसके पास विश्वास में सचमुच एक दृढ़, पक्की नींव होनी चाहिए; यदि यह उसके पास नहीं, तो वह जोखिम उठाने से पहले कई बार सोचेगा।

26. और जैसा इस स्त्री के साथ हुआ, जिसने अपनी सारी जीविका वैद्यों पर खर्च कर दी, और फिर भी चंगी न हुई, हाँ, और भी बिगड़ गई, वैसा ही हमारे साथ है। यहाँ हमारे सब काम, चिन्ताएँ और परिश्रम व्यर्थ हैं। यहाँ हमारी सारी मानवीय आज्ञाकारिता और हमारे सब धार्मिक संघ धूल में मिल जाते हैं, और उस मार्ग में जो कुछ हमने खर्च किया वह पूरी तरह व्यर्थ गया। अब हम देखते हैं कि पोप और बिशपों की व्यवस्थाएँ और परम्पराएँ, जिनके सामने हम काँपते और डरते थे, कुछ भी नहीं हैं।

इस सब से हमें उतनी ही सहायता मिली जितनी इस बेचारी स्त्री को मिली, जिसने अपनी सारी सम्पत्ति और धन खर्च कर दिया, हाँ, और इसके लिए अपने प्राण भी जोखिम में डाल दिए।

ओह, इस स्त्री को कैसी-कैसी औषधियाँ और उपचार काम में लाने पड़े!

उनसे वह प्रायः कितनी परखी गई, कितनी निर्बल और रोगी हो गई!

हाँ, यदि वह चंगी हो सकती, तो वह सारा दवाख़ाना निगल जाती। परन्तु सब व्यर्थ गया, उसे बारह लम्बे वर्षों तक अपना रोग सहना पड़ा।

27. परन्तु अन्त में उस बेचारी स्त्री की सहायता कैसे हुई? ज्यों ही वह उस मनुष्य के पास आई जो मसीह कहलाता है और अपनी आशा और शान्ति उस पर रखी, वह चंगी हो गई। परन्तु इस मनुष्य की ओर उसे किसने भेजा? निःसन्देह वैद्यों ने तो नहीं।

क्योंकि जब हमारे पास्टर मसीह का प्रचार करते हैं, तो पोप के मामले और उसकी सब परम्पराएँ उलट जाती हैं। तो फिर उसे किसने बताया?

उसने यह किसी ऐसे से सुना जो स्वयं भी चंगा हुआ था, और वह भी वैद्यों के द्वारा नहीं। उसने निःसन्देह उसे बताया कि एक है जो यीशु कहलाता है, जो मित्रतापूर्ण, अनुग्रहकारी मनुष्य है, हर एक की सहायता करता है, और किसी को अपनी उपस्थिति से बिना सहायता पाए जाने नहीं देता, और कि वह परमेश्वर की ओर से इसी उद्देश्य से भेजा गया है कि हर एक की सहायता करे। और बहुतों ने, जिन्होंने उससे सहायता पाई थी, उसे बताया था। इस प्रकार वे उसे भी उसके पास ले आए। जब उस स्त्री ने ये बातें सुनीं, तो उसने वैद्यों को छोड़ दिया और मसीह के पास गई।

28. और आज भी ऐसा ही होता है। मसीह का प्रचार नहीं किया जाता, केवल कोरे मानवीय कामों का: यह करो, और वह करो। और इसके बावजूद मसीह का ज्ञान लोगों के बीच प्रवेश करता है, कि हमें उससे क्या आशा रखनी है, और कि वही अकेला हमारे कामों और पुण्य के बिना सब कुछ करे। जब हम

यह आवाज़ सुनते हैं तो हम उसके पीछे हो लेते हैं, और उसके वचन को मानते हैं, और वैद्यों को सदा के लिए छोड़ देते हैं, और व्यवस्था या कामों के प्रचारकों की फिर चिन्ता नहीं करते, न उनकी आज्ञाओं और परम्पराओं के विषय में पूछते हैं, बल्कि अपने हृदय की सारी लालसा के साथ इस मनुष्य के पास जाते हैं जो मसीह कहलाता है, और कहते हैं: हाँ, सचमुच, इसी मनुष्य से हमें यह बिना किसी पुण्य के पाना है, हाँ, मैंने कैसी मूर्खता की कि इसके लिए इतना कुछ दाँव पर लगाया!

परमेश्वर तेरा भला करे, मेरे प्रिय पोप! परमेश्वर तुम्हारा भला करे, मेरे प्रिय बिशपो, भिक्षुओ और याजको, मुझे फिर कभी तुम्हारी औषधि की आवश्यकता न होगी, तुम्हारे काम और पुण्य की, तुम्हारी आज्ञाओं और परम्पराओं की, तुमने इन बातों से मुझे बहुत समय तक यातना दी है।

मुझे एक ऐसा मिल गया है जो मुझे सब कुछ सेंतमेंत देता है, जो मुझे बीते समय में तुमसे ढेरों रुपये देकर ख़रीदना पड़ता था। वह इसे मुझे बिना काम या पुण्य के देता है, जबकि पहले मुझे इसके लिए अपनी देह, बल, स्वास्थ्य और प्राण जोखिम में डालने पड़ते थे। शुभ रात्रि और विदा! मैं फिर कभी तुम्हारे पास न आऊँगा।

29. इस प्रकार कोई मसीही बनता है, पोप के आज्ञप्ति-संग्रह (डिक्रीटल्स) से नहीं, या कामों और मानवीय परम्पराओं के द्वारा नहीं, बल्कि मसीह के अनुग्रह और कृपा के द्वारा। अब जिस किसी का विवेक व्याकुल और संकट में है, जो पाप से डरता है और मृत्यु से भयभीत है, या अन्यथा अपने आप में कोई भलाई अनुभव नहीं करता, वह यहाँ इस मनुष्य के पास आए और अपना कष्ट उससे मान ले, उसे पुकारे, और वह निश्चय ही सहायता करेगा। "अपने मन की बातें खोलकर उसके सामने उण्डेलो; परमेश्वर हमारा शरणस्थान है," भजन संहिता 62. 8; 50,15, और उससे कहो: देख, यहाँ एक खाली पात्र है जिसे भरे जाने की आवश्यकता है।

हे प्रभु, इसे भर दे! मैं विश्वास में निर्बल हूँ, मुझे दृढ़ कर; मैं प्रेम में ठण्डा हूँ, मुझे गरमा और प्रज्वलित कर, कि मेरा प्रेम मेरे पड़ोसी की ओर बह निकले। मेरा विश्वास पक्का और दृढ़ नहीं, कभी-कभी मैं सन्देह करता हूँ, और पूरी रीति से परमेश्वर पर भरोसा नहीं कर पाता! हाय, प्रभु, मेरी सहायता कर, मुझमें मेरा विश्वास और भरोसा बढ़ा। मैंने अपनी सारी सम्पत्ति का ख़ज़ाना तुझमें बन्द कर रखा है। मैं कंगाल हूँ, तू धनी है, और कंगालों पर दया करता है, मैं पापी हूँ, और तू धर्मी है। मुझमें पाप की नदी है; तुझमें सारी परिपूर्णता और धार्मिकता है।

30. यदि तुम एक बार यह सीख लो, तो पोप की व्यवस्थाएँ तुझे बन्दी नहीं बना सकतीं। उसकी व्यवस्थाओं और आज्ञाओं से तुम्हें कुछ नहीं मिलता, बल्कि इस स्त्री के समान तुम अपना सब कुछ खर्च कर देते हो,

अपनी देह और धन, और अन्त में ऊपर से अपना प्राण भी। और तब तुम कहोगे: मैं उसे चाहता हूँ जिससे मैं कुछ पा सकूँ, न कि उसे जिसे मुझे देना पड़े।

31. दूसरे सुसमाचार इस स्त्री के विषय में यों लिखते हैं: "जब वह चंगी हो गई तो यीशु ने जान लिया कि उसमें से सामर्थ्य निकली है, और लोगों की ओर फिरकर पूछा: "किसने मुझे छुआ? तब चेलों ने उत्तर दिया: "हे स्वामी, भीड़ तुझे दबाती और कुचलती है; ' परन्तु प्रभु इससे सन्तुष्ट न हुआ, और उत्तर दिया: "किसी ने मुझे छुआ है; क्योंकि मैंने जान लिया कि मुझमें से सामर्थ्य निकली है,"

मरकुस 5, 25; लूका 8, 46; मैं जानता हूँ कि किसी ने मुझसे कुछ पाया है। प्रभु ने यह सब इसलिए किया कि इस स्त्री का विश्वास उसे ग्रहणयोग्य था, जिसे वह सब लोगों पर प्रकट करना चाहता था। क्योंकि वह इससे बढ़कर और कुछ नहीं चाहता कि मनुष्य उस पर भरोसा और विश्वास रखे। यह उस सरदार के लिए भी किया गया, कि इस आश्चर्यकर्म और घटना के द्वारा उसका विश्वास दृढ़ हो। इसलिए मरकुस यों लिखता है: जब उस स्त्री ने देखा कि प्रभु यह जान गया है, तो वह डर गई और काँपने लगी और आकर प्रभु के पाँवों पर गिर पड़ी और जो कुछ उसके द्वारा उसके साथ हुआ था सब सच-सच उसे बता दिया। तब प्रभु काम में लगता है और उसे पाप-मोचन देता है और उससे कहता है: "बेटी, तेरे विश्वास ने तुझे चंगा किया है; कुशल से जा, और अपने इस रोग से बची रह।"

32. क्या ये मित्रतापूर्ण वचन नहीं हैं? इस स्त्री ने कैसा आनन्द अनुभव किया होगा, जब उसने दूसरे को अपने ऊपर कृपा करने दी? यही आनन्द और शान्ति वे सब पाते हैं जो सहायता के लिए इस मनुष्य की ओर देखते हैं। अब जहाँ यह आनन्द है, वहाँ उसके काम तुरन्त पीछे आने ही चाहिए, जो इस आनन्द को प्रमाणित करते हैं। इसी प्रकार इस स्त्री में शान्ति और आनन्द का प्रकट होना आवश्यक था। क्योंकि ज्यों ही उसने प्रभु से वह भला काम पाया, उसने सब लोगों के सामने उसे मान लिया, और यह बताए जाने से नहीं लजाई कि उसने उससे कुछ पाया, और फिर भी उसके बदले में कुछ नहीं दिया। परन्तु यही काम और धन्यवाद परमेश्वर हमसे चाहता है, अर्थात् यह कि हम सब मनुष्यों के सामने उसकी कृपा, अनुग्रह और भले कामों को मानें और उनका प्रचार करें, ताकि दूसरे भी आएँ और उसके उपकार पाएँ जैसे इस स्त्री ने पाए। इस प्रकार मेरा मसीही जीवन मुझे प्रेरित करता है कि मैं दूसरों का भला करूँ, जैसे परमेश्वर ने मसीह के द्वारा मेरा भला किया है, केवल इसलिए कि इस प्रकार मसीह जाना जाए; परन्तु इसके द्वारा मैं मसीही नहीं बनता। जैसे

यह स्त्री अपने ज्ञान के द्वारा चंगी नहीं होती, क्योंकि वह अपने सब काम और ज्ञान से पहले ही चंगी थी। परन्तु चंगी होने के बाद वह मसीह को मान लेती है, और उसकी स्तुति करती है, केवल दूसरों की भलाई के लिए, और जाकर एक के बाद एक भले काम करती है। इसी प्रकार हम भी, यदि हम केवल मसीही हैं, इसलिए जीते हैं कि जहाँ कहीं हम कर सकें एक दूसरों की सेवा करे। अतः जैसे यह स्त्री अपने सब काम करने से पहले चंगी हुई, वैसे ही हम मसीहियों को भी कोई भला काम कर सकने से पहले चंगा होना आवश्यक है।

सरदार की बेटी के विषय में।

34. जैसे सुसमाचार इस स्त्री में चित्रित है, वैसे ही वह सरदार की बेटी में भी हमारे सामने चित्रित है। आराधनालय के इस सरदार को, जिसे मरकुस याईर कहता है, प्रभु पर दृढ़ विश्वास और भरोसा था कि वह उसकी मरी हुई बेटी को जीवित कर देगा। क्योंकि यदि उसके हृदय का उसके प्रति ऐसा भाव न होता, तो वह उसके पास न आता, और उससे ऐसी बात न माँगता जो स्वभाव से असम्भव थी।

इसलिए इसमें वह अपना विश्वास दिखाता है। जब प्रभु ने उसमें विश्वास देखा, तो वह उसकी इच्छा पूरी किए बिना न रह सका, और तुरन्त उठकर उसके साथ चल दिया। उसकी यात्रा के बीच इस स्त्री का वृत्तान्त घटता है, जो बारह वर्ष से रोगी थी, जैसा हमने सुना है।

35. और जब यीशु सरदार के घर में पहुँचा, और बाँसुरी बजानेवालों और भीड़ को हुल्लड़ मचाते देखा, जो मूसा की व्यवस्था के अनुसार वहाँ थे, और सींग और तुरहियाँ फूँकते थे, जैसे हमारे देश में लोगों को इकट्ठा करने के लिए घण्टियाँ बजाई जाती हैं; तो उसने लोगों और बाँसुरी बजानेवालों को हट जाने की आज्ञा दी और कहा: "लड़की मरी नहीं, पर सोती है।" और वे उसकी हँसी उड़ाने लगे।

इसका अर्थ यह है कि जब वचन का प्रचार इस प्रकार होता है कि मसीह ही वह मनुष्य है जो सहायता करता है और हमारे काम यह नहीं करेंगे, तो संसार इससे बच नहीं सकता, उसे हँसना और तिरस्कार करना, और ठोकर खाना ही है (1 कुरिन्थियों 1, 23), क्योंकि संसार को यह स्वीकार नहीं कि मसीह हमारी सहायता करे।

जैसा यहाँ लोग करते हैं, जिन्होंने निःसन्देह कहा: हाय, यह तो बड़ा उस्ताद या डॉक्टर है, यह क्या सहायता करेगा? क्योंकि यह नहीं जानता कि सोना या कब्र में जाना क्या है।

36. संसार में सुसमाचार की ख्याति एक मूर्खतापूर्ण उपदेश की होनी ही है, तुच्छ और तिरस्कृत; क्योंकि शैतान यह सुन नहीं सकता कि इस प्रचार का संसार में आदर हो, क्योंकि इससे उसके राज्य को कोई लाभ नहीं होता, यह वह निःसन्देह अनुभव करता है, और इसलिए वह सारी धूर्तता से इस पर आक्रमण करता है, ताकि इसे रोके और अपने अनुयायियों के बीच इसे निकम्मा ठहराए, जिनके हृदयों को उसने पूरी तरह अन्धा कर दिया और वश में कर लिया है, ताकि सुसमाचार का प्रकाश उन पर न चमके, जैसा संत पौलुस 2 कुरिन्थियों 4, 4 में कहता है। क्योंकि यह असम्भव है कि मसीह का प्रचार कुछ फल न लाए। उसका प्रचार व्यर्थ न होगा, यशायाह 55, 11; चाहे उसे ग्रहण करनेवाले थोड़े ही हों, इससे कुछ फ़र्क नहीं पड़ता।

37. क्योंकि शैतान अनुभव करता है कि यह उसकी हानि है, और कि वचन का प्रचार उसके राज्य के विरुद्ध है, इसलिए उसे चैन नहीं, वह इसे सताता है, तुच्छ जानता है और चारों ओर से इस पर आक्रमण करता है, जैसे वह इस समय सारे संसार में क्रोध से भड़कता और तूफ़ान मचाता है। क्योंकि मसीह का प्रचार उस सब को उलट देता है जो शैतान और संसार को भाता है, और जिसे संसार सबसे पवित्र और बहुमूल्य समझता है। क्योंकि संसार अपने लिए एक ऐसे ईश्वर का चित्र बनाता है जो हमारे भले कामों को स्वीकार करता है, और मिस्सा, रात्रि-जागरण, धार्मिक दान-न्यासों, जपमालाओं, टोपियों, मुण्डे सिरों, सन की रस्सियों से प्रसन्न होता है, और मूर्खों के और जो भी काम हों जिनमें पोप लगा रहता है।

अब जब कोई आकर सुसमाचार लाता है, और पोप की इस बकवास के विरुद्ध प्रचार करता है, जैसा उसे करना ही पड़ता है, और कहता है: यह कुछ नहीं, यह धोखा है, यह मसीह और पवित्रशास्त्र के विरुद्ध है; तो उसे विधर्मी और निकम्मा आदमी, लोगों को भटकानेवाला कहलाना सहना पड़ता है, और तब वे बड़ी शान से कहते हैं: क्या तू सारे संसार पर शासन करना चाहता है? क्या तू समझता है कि तू ही सबसे बुद्धिमान है? हमारे पुरखे भी मूर्ख न थे। बहुत से पवित्र, धर्मपरायण लोगों ने ये काम किए हैं और इनका प्रचार किया है, क्या तू पहले-पहल सब कुछ नष्ट करने आया है? ऐसा नहीं होना चाहिए! तब क्रोध और तूफ़ान का समय आरम्भ होता है, सताव और मृत्यु के साथ, और शैतान दावा करेगा कि वह सही है, चाहे जो हो।

38. आज के सुसमाचार पर अभी के लिए इतना पर्याप्त है।

भली-भाँति ध्यान दो कि तुम सुसमाचारों से यह सीखो कि सब कुछ उस एक व्यक्ति में पाया जाता है जो मसीह कहलाता है। और यह भी स्मरण रखो कि मसीही अपना नाम केवल

त्रिएकता के बाद चौबीसवाँ रविवार।

मसीह से पाता है। यह मैं व्यर्थ नहीं कहता, क्योंकि मैं जानता हूँ कि परीक्षा में और जीवन के संग्राम में इसे थामे रखने में क्या लगता है।

आओ, हम अनुग्रह के लिए परमेश्वर को पुकारें, कि हम इसे गम्भीरता से लें, और अपने हृदयों से इसे पकड़ लें।

त्रिएकता के बाद चौबीसवाँ रविवार।

दूसरा उपदेश।—मत्ती 9, 18-26.

यह उपदेश संस्करण c में पिछले उपदेश के स्थान पर दिया गया है।

इसका एक भाग, §§ 33-39, छोटी पुस्तक "Etliche Trostschriften etc." (कुछ सान्त्वना-लेख आदि) में है। शीर्षक: "आराधनालय के सरदार की बेटी का मरे हुओं में से जिलाया जाना, मत्ती 9." Erl. 14. 349; W. 11, 2468; St. L.. 11, 1850.

विश्वास के दो उदाहरण, और मसीह का * इस सुसमाचार का सार।

* मसीह का ज्ञान।

1. इस ज्ञान का स्वरूप।

2. मसीहियों के पास यह ज्ञान है और इसके द्वारा वे परमेश्वर की सन्तान बनते हैं। 5.

3. इस ज्ञान से क्यों और कैसे प्रेम किया और इसकी स्तुति की जानी चाहिए। 6.

4. केवल यही ज्ञान सान्त्वना देता और उद्धार लाता है। 7.

A. विश्वास का पहला उदाहरण हम आराधनालय के सरदार में पाते हैं।

1. इस सरदार के विश्वास का पहला गुण और लक्षण।

2. इसका दूसरा गुण और लक्षण। 10.

II. विश्वास का दूसरा उदाहरण, जो हमें लहू बहने के रोगवाली स्त्री में मिलता है।

1. इस स्त्री के विश्वास में विशेष रूप से दो उत्कृष्ट बातें कैसे हैं। a. पहली उत्कृष्ट बात। 11 * सच्चे विश्वास और सच्ची ईश्वरीय सेवा का स्वरूप। b. दूसरी उत्कृष्ट बात। 16

2. यह विश्वास किस प्रकार मसीह को भाता है चाहता है कि यह प्रकट किया जाए। 20.

मसीह इस विश्वास की पुष्टि करता है। 21.

4. यह विश्वास किस उद्देश्य से हमारे काम आए। 22f.

मसीहियों और भले लोगों के बीच के अन्तर के विषय में।

जो विश्वास के बिना हैं, उनकी आराधना में दो दोष हैं। a. पहला दोष। 24. b. दूसरा दोष। 25.

… की प्रार्थना का स्वरूप c. विश्वास के पहले उदाहरण के विषय में विस्तार से, कि उसकी परख कैसे होती है और फिर वह कैसे दृढ़ किया जाता है 1. पहली परीक्षा और सान्त्वना। a. परीक्षा। 27. b. सान्त्वना। 28.

2. दूसरी परीक्षा और सान्त्वना। c. परीक्षा। 29-30. b. सान्त्वना। 31f.

A. सबसे ऊँची बुद्धि इसी पुकार में निहित है। 31.

B. यदि हमें इस पुकार को ग्रहण करना है, तो विश्वास आवश्यक है। 32-34.

हर मनुष्य का जीवन … में है C. हमें इस पुकार का मूल्य मनुष्य के विचारों के अनुसार नहीं, परन्तु … के विचारों के अनुसार आँकना है D. यह पुकार किस प्रकार हमारी सान्त्वना के लिए दी गई है। 36-39.

E. यह पुकार विश्वास के लिए है और हँसी या मूर्खता की बात नहीं है,

परन्तु यह बड़ी बुद्धि है। 38.

मसीहियों की कब्रों को सराय और परमेश्वर का खेत क्यों कहा जाता था। 39.

उनके विषय में जो व्यवस्था के अधीन जीते हैं और उनके विषय में जो व्यवस्था के बिना जीते हैं।

मनुष्यों के इन दो वर्गों का स्वरूप। 40-41.

संकट के समय और मृत्यु के समय दोनों की सहायता किस प्रकार होती है।

जहाँ पापों की क्षमा है, वहाँ भले काम अवश्य होने चाहिए।

I. विश्वास के दो उदाहरण।

1. यह वृत्तान्त दूसरे सुसमाचार-लेखकों, मरकुस और लूका, द्वारा अधिक पूर्णता और विश्वासयोग्यता से प्रस्तुत किया गया है, और यह एक समृद्ध और सुन्दर सुसमाचार है, अपनी शिक्षा और सान्त्वना दोनों में; क्योंकि यह आत्मिक बुद्धि और समझ में परमेश्वर की इच्छा का सही ज्ञान सिखाता है, (जैसा कि आज की पत्री में देखा जा सकता है) और क्रूस के नीचे तथा दुःख के बीच सान्त्वना और बल देता है। आइए, इसकी कुछ शिक्षाओं पर ध्यान दें।

2. पहले, प्रभु यहाँ लोगों से घिरा हुआ, एक दयालु और मिलनसार मनुष्य के रूप में दिखाया गया है, जैसा कि संत पौलुस तीतुस 3, 4 में कहता है, कि उसके द्वारा परमेश्वर का अनुग्रह और प्रेम प्रगट हुआ है, जिसके द्वारा वह दिखाता है कि वह सब मनुष्यों की सहायता और सेवा करने को इच्छुक और तैयार है, और उनकी सहायता भी करता है जो सच्चे विश्वास से उससे सहायता खोजते हैं।

3. परन्तु वे ऐसे लोग हैं जो दुर्दशा, क्लेश, शोक और संकट में हैं। वह उनके साथ रहना चाहता है और अपने आप को उनके द्वारा पाए जाने देता है; क्योंकि ऐसों के बीच ही उसका वचन और उसका कार्य प्रभावशाली हो सकता है। परन्तु शरीर में निश्चिन्त, बलवन्त, धनी और सम्पन्न लोगों के बीच उसका वचन और उसके आश्चर्यकर्म व्यर्थ और खोए हुए हैं, क्योंकि वे उसके अनुग्रह और उपकारों को ग्रहण करने के योग्य नहीं, क्योंकि वे पहले से ही तृप्त और अघाए हुए हैं, और दूसरी वस्तुओं में या अपने आप में ही सान्त्वना और सुख खोजते हैं। मसीह का अनुग्रह और उसके उपकार पाने के लिए मनुष्यों को यह जान लेना चाहिए कि किसी भी सृष्ट वस्तु में उनके लिए न सान्त्वना है और न सहायता, और कि उन्हें क्लेश और शोक के सिवा और कुछ अनुभव नहीं होता; और यह सत्य है, जैसा कि कलीसिया लूका 1,53 में गाती है:

"उसने भूखों को अच्छी वस्तुओं से तृप्त किया, और धनवानों को छूछे हाथ निकाल दिया।"

4. इससे तुम देखते हो कि परमेश्वर हमारे प्रति कितने अनुग्रह और पितृ-भाव से अपने आप को प्रगट करता है, क्योंकि वह अपने प्रिय पुत्र के द्वारा हमारे इतने निकट आता है और कंगालों और दुखियों को खोजता है,

ताकि वह उन सब पर अपना अनुग्रह उण्डेले जो उसे ग्रहण करना चाहते हैं; क्योंकि उसने अपने पुत्र को हमारे पास भेजा, कि वह हमारे साथ रहे और हमारे बीच डेरा करे, जैसा कि संत यूहन्ना 1, 14 में कहता है, और अपने ही मांस और लहू के समान हमारी चिन्ता करे। उसने वही कंगाली और दुर्दशा अपने ऊपर ले ली, ताकि वह हमें हमारी दुर्दशा से, अर्थात् पाप और मृत्यु से, छुड़ाए। इसलिए वह यह भी चाहता है कि हम विश्वास के द्वारा उससे ऐसी ही सहायता खोजें और उसकी आशा रखें, जैसा कि वह यूहन्ना 6, 40 में कहता है: "क्योंकि मेरे

पिता की इच्छा यह है, कि जो कोई पुत्र को देखे और उस पर विश्वास करे, वह अनन्त जीवन पाए।"

5. यही वह ज्ञान है जिसकी मसीहियों को आवश्यकता है और जिसके द्वारा ही वे मसीही और परमेश्वर की सन्तान बनते हैं, जैसा कि यशायाह 53, 11 कहता है: "अपने ज्ञान के द्वारा मेरा धर्मी दास बहुतों को धर्मी ठहराएगा," और यूहन्ना 1,12: "जितनों ने उसके नाम पर विश्वास किया, उसने उन्हें परमेश्वर की सन्तान होने का अधिकार दिया।" क्योंकि और जो कुछ भी सिखाया, किया या समझा जा सकता है, वह चाहे कितना ही बड़ा, सुन्दर, प्रशंसनीय, मूल्यवान या पवित्र क्यों न दिखाई दे, लोगों को मसीही नहीं बना सकता, अर्थात् ऐसे व्यक्ति जिन्होंने पापों की क्षमा और अनुग्रहकारी परमेश्वर को पा लिया है, जब तक कि वे उस उद्धारकर्ता को, परमेश्वर के पुत्र को, न जानें और विश्वास से न पकड़ें, जो संसार में इसलिए आया कि अपना लहू बहाकर हमारे पापों को दूर करे और हमारा परमेश्वर से मेल कराए।

6. सुसमाचार की इस शिक्षा और ज्ञान को सारे संसार को सँजोकर रखना और सराहना चाहिए, क्योंकि केवल यही यह सच्ची और आनन्दमय सान्त्वना प्रचार करता है, कि परमेश्वर ने कंगाल, अयोग्य और दुखी पापियों पर दया की है, और उनके पापों को उनके लेखे में गिनना नहीं चाहता, परन्तु शुद्ध अनुग्रह से उन्हें क्षमा करता है। पृथ्वी पर कोई दूसरी शिक्षा या उपदेश उद्धार नहीं दे सकता या यही बात नहीं दे सकता, जैसा कि सारे संसार को, यहूदियों, अन्यजातियों और तुर्कों को, मानना पड़ेगा।

7. इसलिए कोई भी मनुष्य अपने आप उस स्थिति तक नहीं पहुँच सकता, जहाँ वह परमेश्वर के सामने भयानक अविश्वास और दोषी ठहराए हुए विवेक से मुक्त हो, सच्चे हृदय से परमेश्वर को पुकार सके, और निश्चय से जाने कि परमेश्वर उसकी सुनेगा, सिवाय केवल मसीह के इस ज्ञान के द्वारा, जिसे परमेश्वर ने स्वयं अपना मध्यस्थ ठहराया है और खुले रूप से गवाही दी है कि वह उन सब पर अनुग्रह करेगा, उनकी सुनेगा और उन्हें आशीष देगा जो

मसीह के द्वारा उसे पुकारते हैं। इसलिए केवल वे ही मसीही हैं जो परमेश्वर की सच्ची सेवा करते हैं और इस आनन्दमय निश्चय में अपने आप को सान्त्वना दे सकते हैं, कि सच्चा परमेश्वर उनका परमेश्वर है और वह उनके साथ रहेगा और उनकी सहायता करेगा; जब कि बाकी सब, जो मसीह को नहीं जानते, सचमुच परमेश्वर-रहित हैं और न सच्चे हृदय से उसे पुकार सकते हैं, न सान्त्वना पा सकते हैं, परन्तु उन्हें परमेश्वर के सामने अनन्त और भयानक सन्देह और विनाश में नष्ट होना पड़ेगा।

8. यह सुसमाचार मसीह की सहायता के, और उस विश्वास के, जो मसीह से लिपटा रहता है और उसमें सान्त्वना पाता है और उससे सहायता प्राप्त करता है, दो सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत करता है। पहला, आराधनालय के सरदार का वह सुन्दर विश्वास है, जो उसे उसके संकट में मसीह के पास ले आता है, उस समय जब उसकी बेटी मरने पर थी और जब वह केवल इतना ही कह सकता था कि उसके घर लौटने से पहले वह मर जाएगी; क्योंकि वह कहता है:

"मेरी बेटी अभी मरी है," और जब सब मनुष्यों ने आशा छोड़ दी थी और सोचा था कि उसके लिए कोई सहायता नहीं मिल सकती। फिर भी उसने निराशा नहीं की, परन्तु जब उसके घर के बाकी लोग निराश थे, रो रहे थे और विलाप कर रहे थे, और इसके सिवा और कुछ नहीं सोच सकते थे कि शव को कैसे सँवारें और बाँसुरी बजानेवालों और औरों के लिए उसे कैसे तैयार करें, तब वह इस दृढ़ भरोसे के साथ मसीह के पास गया कि यदि वह उसे अपनी बेटी के पास ले आए, तो वह फिर जीवित हो जाएगी। उसने विश्वास किया कि मसीह वही है जो न केवल तब तक स्वास्थ्य लौटाने और बनाए रखने में सहायता कर सकता है जब तक शरीर और प्राण एक साथ हैं, परन्तु मृत्यु के द्वारा शरीर और प्राण के अलग हो जाने के बाद भी जीवन लौटा सकता है। उस समय यह निश्चय ही विश्वास का एक अद्भुत उदाहरण था, क्योंकि ऐसा कुछ पहले न कभी सुना गया था और न देखा गया था, सिवाय कदाचित् विधवा के पुत्र को जिलाने के आश्चर्यकर्म के, लूका 7, 11 आदि, यदि वह पहले हो चुका था और उसका समाचार उसके कानों तक पहुँच गया था। और यह भी विश्वास का कोई कम बड़ा चिह्न न था [अंग्रेज़ी में यहाँ छापे की भूल से "greater" (बड़ा) छपा है] कि वह बिना किसी सन्देह के अपने मन में यह निष्कर्ष निकाल सका कि मसीह उसकी बेटी को फिर जीवित कर देगा; क्योंकि यदि वह सन्देह करता और तर्क के मानवीय विचारों के पीछे चलता, तो वह निश्चय ही मसीह के पास न जाता, परन्तु सोचता कि उसने बहुत देर कर दी है; या कि यद्यपि मसीह ने किसी और को फिर जीवित किया था, तो इसका यह अर्थ नहीं निकलता कि उसकी बेटी भी फिर जीवित की जाए, क्योंकि माता-पिताओं के इतने बेटे-बेटियाँ प्रतिदिन मर रहे थे, जिनमें से कोई भी फिर जीवित नहीं किया जा रहा था।

9. यही सही प्रकार के विश्वास का गुण है, जिसकी प्रशंसा थोड़ी ही देर बाद उस स्त्री में भी की गई जिसे लहू बहने का रोग था, अर्थात् यह कि वह दृढ़ता से मसीह से लिपटा रहता है, उससे सुने हुए वचन को पकड़ता और दृढ़ता से थामे रहता है, और न उस बात की खोज करता है न उस पर दृष्टि करता है जो मानवीय बुद्धि सुझाए, न इस पर कि दूसरे लोग क्या विश्वास करते या करते हैं; परन्तु तुरन्त, उन समाचारों के आधार पर जो

मसीह के विषय में फैले थे, यह निष्कर्ष निकालता है कि वही है जो संकट के समय सहायता कर सकता है; जिसने औरों की सहायता की है और इसलिए अब भी सहायता करेगा। ऐसा हृदय और ऐसा विश्वास सचमुच मसीह को पा लेता है और अपने विश्वास के अनुसार पाता है।

10. दूसरे, मसीह के व्यक्तित्व के विषय में उसका विश्वास ऐसा था (जो सचमुच एक बड़ा आत्मिक ज्ञान था) कि उसने उसे ठीक ही परमेश्वर का भेजा हुआ सच्चा मसीहा माना; वैसा नहीं जैसा यहूदियों की बड़ी भीड़, विशेषकर शास्त्री, सोचते थे कि वह बड़े ठाट-बाट और प्रदर्शन के साथ एक महान और पराक्रमी प्रभु और राजा के रूप में खुले रूप से लोगों के सामने आएगा, कि हर कोई उसे परमेश्वर की ओर से अपने पास भेजा हुआ मानेगा और ग्रहण करेगा, और इसके अतिरिक्त वे आशा करते थे कि वह उन्हें रोमी

सम्राट के विदेशी शासन के अधीन शारीरिक दासत्व से छुड़ाएगा और उन्हें संसार के पराक्रमी शासक बना देगा। इसके विपरीत, ऐसे स्वप्नों और यहूदी धारणाओं के विरोध में, उसने उसे सच्चा प्रभु और मसीहा माना, यद्यपि उसके अपने लोगों, यहूदियों ने, उसे ऐसा नहीं माना और न ग्रहण किया; वह जो परमेश्वर की ओर से भेजा गया था, सांसारिक सत्ता, सम्पत्ति, सम्मान और स्वतन्त्रता देने के लिए नहीं, परन्तु उन बातों और आवश्यकताओं में सहायता करने के लिए जहाँ कोई मनुष्य सहायता नहीं कर सकता, अर्थात् हमें मृत्यु के संकट और शैतान की शक्ति से छुड़ाने के लिए, हाँ, मृत्यु को जीवन में बदलने और जीवन देने के लिए। उसे केवल एक मनुष्य नहीं समझना चाहिए, परन्तु वही समझना चाहिए जिसके पास सचमुच अपने में सब सृष्ट वस्तुओं पर ईश्वरीय और अनन्त सामर्थ्य और अधिकार है, क्योंकि वह विश्वास करता है कि जीवन और मृत्यु पर सामर्थ्य उसके हाथों में है, अर्थात् कि वह सचमुच परमेश्वर का पुत्र है, जैसा कि पवित्रशास्त्र घोषित करता है।

11. विश्वास का दूसरा उदाहरण भी कम प्रशंसा के योग्य नहीं है,

अर्थात् उस कंगाल स्त्री का, जिसे बारह वर्ष से लहू बहने का रोग था, जिसके कारण उसने अपने शरीर में दुःख उठाया और उसका सारा बल जाता रहा, और इसी कारण वह बहुत समय से मानवीय सहायता और सान्त्वना पाने की आशा छोड़ चुकी थी। वह मसीह के पास आई, क्योंकि उसने उसके विषय में सुना था, और इस निश्चित और निस्सन्देह भरोसे के साथ उसके पास आ सकी कि वह उसके बड़े संकट में उसकी सहायता कर सकता है, और इस हार्दिक निश्चय के साथ कि वह इतना भला और अनुग्रहकारी है कि उसकी सहायता करेगा और उसे बिना सहायता के लौटने न देगा। इस बात में वह इतनी निश्चित और भरोसा रखनेवाली थी कि उसका हृदय चिन्ता और शोक से मुक्त था, यद्यपि उसके पास सन्देह करने का कारण था। उसे केवल इसी विचार की चिन्ता थी कि वह मसीह तक कैसे पहुँच सकेगी, और वह सोचती और विचार करती रही: "आह! यदि मैं केवल उसके वस्त्र के आँचल को छू लूँ।"

तब उसने दृढ़ता और भरोसे के साथ अपने मन में निष्कर्ष निकाला, "मैं चंगी हो जाऊँगी।" परन्तु वह नहीं जानती थी कि उस तक कैसे पहुँचे, क्योंकि उसने देखा कि भीड़ बहुत बड़ी थी और वह, एक कंगाल, रोगी स्त्री, लोगों की ऐसी भीड़ को भली-भाँति चीरकर नहीं जा सकती थी। इसके अतिरिक्त, व्यवस्था उसे लोगों के बीच आने की अनुमति नहीं देती थी; फिर भी उसके विश्वास और उसकी लालसा ने उसे विवश किया कि वह पीछे न हटे, परन्तु भीड़ में से धक्का देकर आगे बढ़े, जब तक कि वह उसके पीछे न आ गई और उसके वस्त्र को न छू लिया।

12. यहाँ देखो, उसके विश्वास ने किस प्रकार दो बाधाओं पर विजय पाई।

पहली, उसका विश्वास इतना दृढ़ था कि उसने विश्वास किया कि यदि वह केवल उसके वस्त्र को छू ले, तो उसे सहायता मिल सकती है। उसने यह आवश्यक नहीं समझा कि उसके पास आकर बहुत से शब्दों में अपना दुखड़ा सुनाए और प्रार्थना करे कि वह उस पर दया करे और उसकी सहायता करे, और न दूसरों ने उसके लिए प्रार्थना की; परन्तु उसने केवल उस तक पहुँचने और उसे छूने का यत्न किया, क्योंकि उसने सोचा कि यदि वह केवल इतना कर सके, तो उसे सहायता मिल जाएगी। उसने न उसकी सामर्थ्य पर सन्देह किया, न सहायता करने की उसकी इच्छा पर। इसलिए उसने उसकी सहायता पाने के लिए इससे अधिक कुछ करना आवश्यक नहीं समझा कि उसके ऊपरी वस्त्र के केवल आँचल को छू ले।

इसलिए उसने यह आवश्यक नहीं समझा कि वह उसके सामने आए कि वह उसे छुए; हाँ, उसने अपने आप को इस योग्य भी नहीं समझा कि वह उससे बात करे; न उसका हृदय भरोसे से इतना भरा था कि, इसके बावजूद, उसमें उसकी उपस्थिति में आने का साहस न रहा हो, और इसलिए न तो वह उसके द्वारा देखी गई और न सुनी गई। परन्तु वह केवल इतने से सन्तुष्ट थी

कि भीड़ से छिपकर और बिना किसी के ध्यान में आए उसके पीछे आ जाए, और जिस सहायता को पाने की वह आशा करती थी, उसके विषय में उसने कोई सन्देह नहीं किया।

और उसके विश्वास ने उसे धोखा नहीं दिया, क्योंकि जैसे ही उसने उसके वस्त्र के आँचल को छुआ, लहू का सोता बन्द हो गया।

13. अब, यह कि एक कंगाल, सीधी-सादी स्त्री यह देख और जान सकी कि इस मनुष्य की सहायता और सामर्थ्य ऐसी थी कि उससे विस्तार से बात करना आवश्यक न था, परन्तु वह गुप्त में देख सकता था, चाहे वह खुले रूप से यह प्रगट न भी करे कि वह हमारी आवश्यकताओं के विषय में कुछ जानता है या हमारी सहायता करना चाहता है, यह अवश्य ही आत्मा के एक बड़े और असाधारण प्रकाश और विश्वास के ज्ञान का फल रहा होगा। इसी के अनुसार, उसके विश्वास ने उसमें ऐसा निश्चय उत्पन्न किया कि सारा सन्देह दूर हो गया, और उसने जान लिया कि यदि वह केवल सबसे तुच्छ साधन से भी उस तक पहुँच सके, तो उसे सहायता मिल जाएगी। यह सचमुच एक दृढ़ विश्वास है कि इस मनुष्य के पास ईश्वरीय, सर्वशक्तिमान सामर्थ्य और अधिकार अवश्य है, कि वह हृदय के गुप्त विचारों और इच्छाओं को देख और समझ सकता है, यद्यपि एक शब्द भी नहीं बोला जाता; और कि वह अपना कार्य और अपनी सहायता प्रमाणित कर सकता है, यद्यपि वह बाहरी रूप से उन शब्दों के सिवा कुछ न देखती है न अनुभव करती है जो हमने उसे कहते सुना, जिन्होंने उसके हृदय में विश्वास उत्पन्न किया।

14. उसने इस वचन के सिवा और कुछ नहीं चाहा, और न उसके वस्त्र को केवल छूने से अधिक कुछ माँगा, जिसे उसने मनचाही सहायता पाने के लिए एक बाहरी साधन और चिह्न के रूप में काम में लिया।

इसी प्रकार, हमें अपने जीवन में और विश्वास के राज्य में बाहरी वचन और संस्कारों से अधिक किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं, जिनमें वह अपने आप को मानो अपने वस्त्र के द्वारा छुए और पकड़े जाने देता है।

15. इसलिए तुम देख सकते हो कि वह विश्वास जो मसीह के व्यक्तित्व से लिपटा रहता है, क्या है और क्या करता है, अर्थात् वह एक ऐसा हृदय है जो उसे प्रभु और उद्धारकर्ता, परमेश्वर का पुत्र मानता है, जिसके द्वारा

परमेश्वर अपने आप को प्रगट करता है और हमें अपना अनुग्रह देता है, और हमें यह निश्चय दिलाता है कि उसके द्वारा और उसके निमित्त वह हमारी सुनेगा और हमारी सहायता करेगा। यही परमेश्वर की सच्ची आत्मिक और हार्दिक आराधना है, जहाँ हृदय का सम्बन्ध मसीह से होता है और वह उसके नाम से प्रार्थना करता है, चाहे ऊँचे स्वर से एक भी शब्द न बोला जाए, और उसे वह आदर देता है जो उसका हक है, उसे सच्चा उद्धारकर्ता मानता है, जो हृदय की गुप्त इच्छाओं को सुन और जान सकता है और

अपनी सामर्थ्य और सहायता प्रगट कर सकता है, यद्यपि वह हमारे विचारों के अनुसार अपने आप को बाहरी रूप से छुए जाने या अपने पास आने नहीं देता।

16. उसके विश्वास का दूसरा उत्कृष्ट कार्य यह है, कि वह अपनी अयोग्यता की भावना पर विजय पा सकती है और अपने हृदय पर से उस भारी पत्थर को लुढ़का सकती है, जो उसे इतना भारी दबाए हुए था, और फिर भी उसे इतना संकोची बना देता है कि वह दूसरे लोगों के समान खुले रूप से मसीह के पास आने का साहस नहीं करती। व्यवस्था ने उस पर यह निर्णय सुनाया था कि एक अशुद्ध स्त्री होने के कारण उसे दूसरे लोगों के साथ मेल-जोल रखने की अनुमति नहीं थी।

क्योंकि लैव्यव्यवस्था 15, 19 में हम पढ़ते हैं कि उसके समान स्त्री जब तक उसका लहू बहता रहे, अशुद्ध मानी जाए; और कि जो कुछ वह पहने हो या उसके पास हो, वह अशुद्ध होगा; और कि जो कोई उसे छुए या जिस किसी वस्तु को वह छुए, वह अशुद्ध होगा। यह उसके लिए कोई छोटा संकट न था, न केवल उसके रोग और शारीरिक अशुद्धता के कारण, परन्तु विशेष करके इसलिए कि उसने इसमें परमेश्वर का वह दण्ड पहचाना और अनुभव किया, जो सब लोगों के सामने उस पर डाला गया था, और जिसने उसे परमेश्वर के लोगों की मण्डली से अलग कर दिया था। यह पूरे बारह लम्बे वर्षों तक चलता रहा, जिस समय में उसने बहुत से वैद्यों के पास सब प्रकार के उपचार आज़माए और फिर भी किसी से उसे लाभ न हुआ, परन्तु वह निरन्तर और भी बिगड़ती गई, यहाँ तक कि उसे यह निष्कर्ष निकालने पर विवश होना पड़ा कि परमेश्वर ने उसके पापों के कारण उसे विशेष कठोरता से दण्ड दिया है और उसकी सहायता नहीं करेगा।

अब वह मानवीय सहायता से निराश होने पर विवश थी और सोचती थी कि उसे अपने रोग और दण्ड से ही मरना पड़ेगा।

17. इसलिए जो कुछ वह मसीह में खोज रही थी, उस पर अपना विश्वास बनाए रखना उसके लिए बिना संघर्ष और युद्ध के न था; क्योंकि वह यह सोचे बिना न रह सकती थी: देखो, मैं एक अशुद्ध स्त्री हूँ, परमेश्वर की दण्ड पाई हुई, और हर कोई मुझे जानता है।

यदि मैं इस प्रभु के सामने जाऊँ, तो हर कोई, और स्वयं वह भी, उसकी उपस्थिति में आने के मेरे दुस्साहस और ढिठाई को बस दोषी ठहरा सकता है, और दया के बदले मुझे परमेश्वर से और अधिक क्रोध और कठोर दण्ड मिल सकता है, और मुझे यह मानने पर विवश होना पड़े कि यदि वह अपने क्रोध में मुझे अपने पास से निकाल दे, तो मेरे साथ ठीक ही हुआ। यह परीक्षा और संघर्ष इससे भी प्रगट होता है कि, जैसा कि पाठ कहता है, पकड़ी जाने के बाद वह डर गई और काँपने लगी, यद्यपि उसे मनचाही सहायता मिल चुकी थी; और फिर भी वह इस भय से भरी थी कि कहीं वह उससे कठोरता से न बोले और उसे न डाँटे, क्योंकि वह उसके पास आने से नहीं डरी थी और छिपकर मनचाही सहायता चुरा ली थी।

18. परन्तु उसके विश्वास ने, जिसने मसीह के भले और अनुग्रहकारी हृदय को स्पष्ट रूप से उसके सामने रखा, इन सब बाधाओं को तोड़ दिया; इसके अतिरिक्त, उसके बड़े संकट ने, हाँ, उसकी निराशा ने भी, उसे परमेश्वर के सामने ढीठ बनने पर विवश किया, और व्यवस्था के निषेध और निर्णय की परवाह न करते हुए, उसकी अपनी लज्जा ने उसे यह निष्कर्ष निकालने को उकसाया: इस उद्धारकर्ता को पकड़ना ही होगा, चाहे व्यवस्था, उसका अपना हृदय और सारा संसार, हाँ, चाहे वह स्वयं भी कुछ भी कहे। यहाँ वह मनुष्य है जो सहायता कर सकता है और जो एक भला, अनुग्रहकारी और विश्वासयोग्य उद्धारकर्ता भी है।

दूसरी ओर, मैं एक कंगाल, दुखी स्त्री हूँ, जिसे उसकी सहायता की आवश्यकता है। वह मेरे कारण निश्चय ही वैसा होने से अलग न हो जाएगा जैसा वह है, और न अपने अनुग्रह और अपनी सहायता को मेरे लिए विफल होने देगा।

उसकी इच्छा मुझमें पूरी हो; मेरे लिए यह अच्छा होगा कि मैं लज्जा से ढक जाऊँ, बजाय उस हानि के जो मुझे तब होगी यदि मैं उस सहायता को खोजने से चूक जाऊँ जो मैं उससे पा सकती हूँ।

उसने अपना मन इस विचार पर लगा लिया कि यदि वह केवल इस मनुष्य को छू ले, तो उसका संकट दूर हो जाएगा और मनचाही सहायता मिल जाएगी; और बाद में वह मूसा और व्यवस्था से बात कर लेगी, ताकि वह उसके द्वारा दोषी न ठहराई जाए, इत्यादि।

19. देखो, यह एक सुन्दर विश्वास है, जो अपनी अयोग्यता को पहचानता है और फिर भी इस कारण अपने आप को मसीह पर भरोसा रखने से, या उसके अनुग्रह और उसकी सहायता पर सन्देह न करने से, रुकने नहीं देता, परन्तु व्यवस्था को और हर उस बात को तोड़कर निकल जाता है जो उसे डराकर उससे दूर करती है; हाँ, यदि सारा संसार भी उसे रोकने और विफल करने का यत्न करे, तौभी वह इस मनुष्य को छोड़ने की बात नहीं सोचता, जब तक कि उसे पकड़ न ले।

इसलिए वह सब बाधाओं को चीरकर आगे बढ़ता है और जो कुछ वह मसीह में खोजता है उसे पा लेता है, और मसीह के बोलना आरम्भ करने से पहले ही तुरन्त उसकी सामर्थ्य और उसके कार्य का अनुभव करता है।

क्योंकि वह मसीह के पास व्यर्थ नहीं जा सकता, जैसा कि स्वयं मसीह गवाही देता है, जब वह कहता है: "तेरे विश्वास ने तुझे चंगा किया है।"

20. इसके अतिरिक्त, ऐसा विश्वास मसीह को इतना भाता है कि वह

नहीं चाहता कि वह उसमें छिपा रहे और उसके द्वारा प्रभावी हुई सामर्थ्य और कार्य गुप्त बना रहे, परन्तु जो कुछ उसके हृदय में है वह सब के सामने प्रगट किया जाए, ताकि उसके विश्वास की सारे संसार के सामने प्रशंसा हो और वह उसमें दृढ़ किया जाए।

इसलिए उसने मुड़कर और चारों ओर देखकर पूछा और जानना चाहा कि किसने उसे छुआ; क्योंकि उसने अनुभव किया कि उसमें से सामर्थ्य निकली है। जब उसने देखा कि उसका पता चलना ही है, तो वह डर गई और काँपने लगी; क्योंकि जो हृदय उस बड़े और पूर्ण भरोसे से भरा हो जो उसे उस पर था, और फिर भी नम्रता और अपनी अयोग्यता के ज्ञान से भी भरा हो, उसे अपने आप को दोषी मानना ही पड़ता है, क्योंकि वह मूसा के विरुद्ध गई थी और क्योंकि उसने जाना कि वह उचित रूप से उस पर क्रोधित हो सकता है, क्योंकि वह इतनी साहसी और ढीठ हो सकी कि भीड़ को चीरकर उसके पास पहुँची। और इसलिए कार्य के बीच ही, जब वह पहले ही चंगी हो चुकी थी और उसका हृदय आनन्द से भर गया था, उसके विश्वास को भय और आतंक से संघर्ष करना पड़ा, और फिर भी केवल इसलिए कि वह मसीह में और भी अधिक सान्त्वना और आनन्द का भोग करे। क्योंकि मसीह नहीं चाहता कि विश्वास हृदय में छिपा रहे, परन्तु चाहता है कि उसका खुले रूप से अंगीकार किया जाए, ताकि उसके द्वारा परमेश्वर की महिमा की स्तुति हो और दूसरे भी विश्वास करने को उत्साहित हों।

21. इसलिए, जब यह स्त्री भय और संकट में थी, कि कहीं सब के सामने उसका अपमान न हो और व्यवस्था के अनुसार वह दोषी न ठहराई जाए, हाँ, कि कहीं उसे स्वयं खुला अंगीकार करने पर विवश न होना पड़े, तब मसीह ने उसके विश्वास की पुष्टि करना आरम्भ किया, यह कहने के लिए कि उसने मूसा और व्यवस्था की, अर्थात् उसकी अयोग्यता पर सुनाए गए निर्णय की, उपेक्षा करके अच्छा किया; और अब वह खुले रूप से वैसी ही उपेक्षा दिखाता है, उसे बिना आरोप और बिना दोष ठहराए रखना चाहता है, हाँ, उसके विश्वास को इतना ऊँचा मानता है कि जिस सामर्थ्य और प्रभाव ने उसकी सहायता की, उसका श्रेय केवल उसी को देता है, मानो उसने स्वयं इस विषय में कुछ भी न किया हो। इसी प्रकार वह और अवसरों पर भी कहा करता था, जैसे उस सरदार से, मत्ती 8, 13, "जैसा तू ने विश्वास किया, वैसा ही तेरे लिए हो," और फिर उस कनानी स्त्री से, मत्ती 15, 28,

"जैसा तू चाहती है, तेरे लिए वैसा ही हो।"

22. हमें इस स्त्री से विश्वास की सामर्थ्य को पहचानना, और अपनी परीक्षाओं और संघर्षों में सहायता के लिए पुकारना सीखना चाहिए। क्योंकि, जैसा मैं पहले ही कह चुका हूँ, ऐसे ही विश्वास के द्वारा हम मसीही बनते हैं, और हमारे और पृथ्वी के सब दूसरे लोगों, तुर्कों, अन्यजातियों और यहूदियों के बीच अन्तर दिखाई देता है। क्योंकि हमें जानना चाहिए कि एक भला मनुष्य होना, बहुत से और बड़े काम करना, एक भला, आदरणीय और सद्गुणी जीवन जीना एक बात है, परन्तु मसीही होना बिलकुल दूसरी बात है। क्योंकि जो कुछ हमारे जीवन और काम से सम्बन्ध रखता है, उसमें हमें अक्सर मनुष्यों के सामने, यहाँ तक कि यहूदियों और तुर्कों से भी, बड़ी प्रशंसा और आदर मिलता है, जैसे बहुत से महान और उत्कृष्ट पुरुषों की अन्यजातीय इतिहासों में उनकी खराई और सद्गुण के लिए बहुत प्रशंसा की गई है। फिर, यहूदियों में भी बहुत से ऐसे हुए हैं, जैसे गमलीएल, अपने मन-परिवर्तन से पहले पौलुस,

नीकुदेमुस और दूसरे (जैसे यह कंगाल स्त्री), जिन्होंने पूरे उत्साह से व्यवस्था के अनुसार जीवन बिताया, यहाँ तक कि संसार के सामने अपने बाहरी जीवन में उन्होंने बहुत से सच्चे मसीहियों को भी पीछे छोड़ दिया।

23. परन्तु यहाँ भी मसीहियों और दूसरों के बीच आकाश और पृथ्वी जितना बड़ा अन्तर देखना चाहिए। मसीही वह है जिसके हृदय में एक भिन्न प्रकार की ज्योति है, अर्थात् विश्वास, जो परमेश्वर को सचमुच जानता और पकड़ता है और सचमुच उसकी आराधना करता है। परमेश्वर के वचन के द्वारा वह अपनी अयोग्यता को जानता और पहचानता है और परमेश्वर का सच्चा भय पाता है; और फिर अपने विश्वास में सान्त्वना पाता है, विश्वास और भरोसा करता है कि उसने परमेश्वर के पुत्र मसीह में पापों की क्षमा और छुटकारा पा लिया है, और उसके निमित्त वह परमेश्वर को ग्रहणयोग्य है और अनन्त जीवन के लिए चुना गया है; और अपने हर संकट में, जब वह अपनी निर्बलता अनुभव करता है, या परीक्षा में पड़ता है, तब परमेश्वर में शरण ले सकता है, उससे विनती कर सकता है और उसकी सहायता की आशा रख सकता है; और वह जानता है कि उसकी सुनी जाएगी।

24. मसीही के सिवा और किसी मनुष्य के पास यह विश्वास और यह निश्चय नहीं है, चाहे वह यहूदी हो, तुर्क हो, पोप-पक्षी हो, या उसे जो कुछ भी कहा जाए, चाहे उसका जीवन कितना ही धर्मपरायण और भला क्यों न हो, या वह इस बात पर कितना ही घमण्ड क्यों न करे कि वह

परमेश्वर की आराधना और सेवा करता है और अनन्त जीवन की आशा रखता है; क्योंकि ऐसे लोगों की सेवा, आराधना और जीवन में अब भी दो बड़ी बातों की कमी है, जो उन्हें परमेश्वर को ग्रहणयोग्य होने से रोकती हैं: पहली, उनके पास सच्चा परमेश्वर नहीं है, अर्थात् वे उसे उस रूप में नहीं जानते जिसमें उसने अपने आप को प्रगट किया है और जिसमें वह जाना जाना चाहता है, अर्थात् हमारे प्रभु यीशु मसीह, अपने पुत्र, के पिता के रूप में। इसलिए वे अन्धे

होकर चलते हैं और परमेश्वर को खो देते हैं, क्योंकि वे उसे अपनी ही धारणाओं के अनुसार और मसीह से अलग होकर खोजते हैं, और सच्चे ईश्वरीय अस्तित्व के ज्ञान से वंचित रहते हैं।

25. दूसरे, उनमें परमेश्वर की इच्छा के सच्चे और निश्चित ज्ञान की सम्भावना का अभाव है, क्योंकि उनके पास सुसमाचार नहीं है। इसलिए वे निश्चित नहीं हो सकते कि परमेश्वर अवश्य उनकी सुनेगा, और उन्हें सदा इस सन्देह में रहना पड़ता है कि परमेश्वर उनकी सुनेगा और उनकी चिन्ता करेगा या नहीं। इसलिए उनकी विनतियाँ और प्रार्थनाएँ केवल व्यर्थ और निकम्मे विचारों और बकवाद से बढ़कर और कुछ नहीं हो सकतीं, जिनके द्वारा हृदय परमेश्वर में कोई सान्त्वना नहीं पाता, और न उससे कुछ आशा रखता है, परन्तु उलटे उससे भागता है, और इसलिए वे सचमुच परमेश्वर-रहित हैं, और परमेश्वर का नाम व्यर्थ लेते हैं।

26. परन्तु मसीही की प्रार्थना इसमें है कि वह सच्चे परमेश्वर से, अर्थात् हमारे प्रभु यीशु मसीह के पिता से, प्रार्थना करता है, जिसने अपने वचन के द्वारा मनुष्यों पर अपने आप को प्रगट किया है; और इसके अतिरिक्त उसके पास सब सन्देह के विरुद्ध यह निश्चित भरोसा और निश्चय है कि परमेश्वर अपने प्रिय पुत्र मसीह के निमित्त उस पर अनुग्रह करेगा और उसकी प्रार्थना सुनेगा।

27. यह उस स्त्री का सुन्दर उदाहरण है। अब हम आराधनालय के सरदार की बेटी की ओर मुड़ते हैं। परन्तु यहाँ भी विश्वास को संघर्ष करना और दृढ़ किया जाना पड़ता है; क्योंकि यद्यपि, जैसा हम सुन चुके हैं, उसका विश्वास उत्तम था, फिर भी यदि वह दृढ़ न किया गया होता, तो कठिनाई से ही बना रह सकता था।

क्योंकि, जब मसीह अभी उस स्त्री से बात कर ही रहा था, मरकुस 5, 35-36 और लूका 8,49 कहते हैं कि एक सन्देश लाया गया, कि उस मनुष्य की बेटी मर गई है, और उससे निवेदन किया गया कि वह गुरु को कष्ट न दे। इसका अर्थ था कि अब सब कुछ व्यर्थ है, क्योंकि उन्होंने बहुत देर कर दी थी; इसलिए उसे यह बात छोड़ देनी चाहिए और केवल यही सोचना चाहिए कि अपनी बच्ची को कैसे गाड़े।

28. सरदार के विश्वास पर यह अवश्य ही एक कड़ी चोट रही होगी।

परन्तु यह बात कि वह स्त्री अभी-अभी चंगी हुई थी, अवश्य ही उसके विश्वास को डगमगाने से रोकती रही होगी, और सचमुच अपनी बेटी के विषय में सन्देहों का सामना करने के लिए उसे दृढ़ करती रही होगी। और स्वयं मसीह इस ठोकर के विरुद्ध उसे सान्त्वना देने और दृढ़ करने के लिए उपस्थित है, यह दिखाने के लिए कि वह

नहीं चाहता कि ऐसे निर्बल विश्वास को भी किसी प्रकार की हानि पहुँचे, परन्तु वह स्थिर और दृढ़ किया जाए; और इसी को ध्यान में रखकर वह यह कहकर सब लोगों को चिताता और उत्साहित करता है:

"सन्देह मत कर, केवल विश्वास कर, इत्यादि।" यह उसने इसलिए कहा कि देखा जाए कि जो विश्वास उससे लिपटा रहता है उससे वह कितना अधिक प्रसन्न है, और कि वह उसे पराजित होने से बचाने को तैयार है; जैसे उसने प्रेरितों से, और विशेष करके पतरस से, जो इतनी सहजता से गिर पड़ा, कहा: "मैं ने तेरे लिए विनती की, कि तेरा विश्वास जाता न रहे।"

29. अब जब मसीह घर पहुँचा, तो इस मनुष्य के विश्वास को एक और चोट सहनी पड़ी; क्योंकि वहाँ उन्होंने कोलाहल, रोने और विलाप, और तुरहियों के बजने के सिवा और कुछ न देखा और न सुना (जिन्हें वे अपने प्रियजनों की मृत्यु पर बजाते थे, जैसे हम घण्टियाँ बजाते हैं)। यह सब उसके हृदय में पुकारता है कि मृत्यु के सिवा और कुछ शेष न रहा, और उसके विश्वास के पास निराशा के विरुद्ध पकड़ने को कुछ न था, सिवाय उस वचन के जो मसीह ने कोलाहल और विलाप के विरुद्ध कहा: "लड़की मरी नहीं, परन्तु सोती है," जिसके कारण उसका उपहास हुआ और मूर्ख समझकर उस पर हँसी उड़ाई गई; क्योंकि सब ने देखा और जाना था कि वह कुँवारी मर चुकी है, और उसमें न साँस है और न जीवन की कोई चिंगारी। वे यह सोचे बिना न रह सके: देखो, हमारा स्वामी या सरदार अवश्य पागल या मूर्ख होगा जो इस मूर्ख को यहाँ ले आया, जो हमें यह विश्वास दिलाने का यत्न करता है कि कुँवारी मरी नहीं, जब कि हर कोई स्पष्ट देख सकता है कि वह मृत्यु में अकड़ी पड़ी है, एक मरी हुई लाश, जो भूमि के नीचे रखे जाने को तैयार है।

30. वे आराधनालय में एकत्र होते थे, जैसे किसी सार्वजनिक सभा-स्थान में, जैसे हम अपने गिरजाघरों में करते हैं, जहाँ सब्त के दिन परमेश्वर का वचन सिखाया जाता था, क्योंकि सारे देश में यरूशलेम को छोड़ और कहीं न कोई गिरजाघर था न मन्दिर। और आराधनालय का यह सरदार उनके बीच वही स्थान रखता था जो हमारे पास्टर रखते हैं, और दूसरे सहायकों या पाठकों का स्थान रखते थे, जो मूसा को पढ़कर सुनाते या प्रचार करते, बच्चों का खतना करते और जवानों को शिक्षा देते, और रोगियों और शोकितों के पास उन्हें सान्त्वना देने जाते थे। इन्हें आराधनालय में एक साथ रहना पड़ता था, और इन्होंने मसीह के इस कार्य के विषय में, अपने उपहास और ठट्ठे भरी हँसी के द्वारा भी, गवाही दी, अर्थात् कि वह कुँवारी निश्चय ही मर चुकी थी और

मृतकों में से जिलाई गई। इसलिए सरदार को, मसीह के कार्य का अनुभव करने से पहले, इस ठोकर और उपहास के सामने विवश होना पड़ा कि वह मसीह के एक वचन से लिपटा रहे और उसके साथ मूर्ख समझा जाए, और अपनी मूर्खता में यह आत्मिक बुद्धि सीखे कि मसीह के लिए मृत्यु मृत्यु नहीं, केवल एक नींद है।

भाग II. मृतकों में से मसीह की पुकार।

31. आइए, हम इससे मसीह और इस सरदार और शिक्षक के साथ मूर्ख बनना सीखें, ताकि हम इन शब्दों को समझ सकें। यद्यपि इस मनुष्य के शब्द संसार के द्वारा तुच्छ जाने जाएँ और मूर्खता समझे जाएँ, फिर भी वे बहुत अनमोल हैं, क्योंकि उनमें निश्चय ही आकाश और पृथ्वी की सबसे ऊँची बुद्धि छिपी है। क्योंकि यह वचन, एक सामान्य कथन के रूप में, तुम्हें सिखाता है कि मसीह में तुम्हारी मृत्यु केवल एक नींद से बढ़कर कुछ नहीं, ताकि तुम मृत्यु और कब्र के भयानक दृश्य और डरावने मुखौटे (larva) के आर-पार और उससे परे देख सको, हाँ, मृत्यु के उसी सत्य को समझ सको, यदि तुम केवल इन शब्दों को विश्वास से सुनो और उन्हें मसीह में सत्य मानकर ग्रहण करो।

32. यहाँ हमें बैल की आँखों से, या मनुष्य की आँखों से भी, कोई काम नहीं, परन्तु उन आँखों से काम है जिनसे मसीह देखता है, और उन कानों से जिनसे मसीह सुनता है, हाँ, ऐसे मन और हृदय से जैसा स्वयं मसीह का है। एक सूअर, जब किसी मनुष्य की लाश को अपने सामने पड़ी देखता है, तो केवल यही निष्कर्ष निकाल सकता है कि यह भी किसी और मरी हुई देह के समान एक मुर्दा है, जिसे पक्षी या पशु खा जाते हैं, या जो सड़ जाता है।

इसी प्रकार विश्वास-रहित मनुष्य भी इससे अधिक न देखता है न समझता है, और इस बात में वह पशु से अलग नहीं पहचाना जा सकता, सिवाय इसके कि वह अपना सिर सीधा ऊपर रखकर चलता है, जब कि पशु का सिर भूमि की ओर झुका रहता है; क्योंकि उसके विचार केवल वहीं तक पहुँच सकते हैं जहाँ तक इस जीवन का सम्बन्ध है। इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि मन ऐसी तथाकथित बुद्धि का दिखावा करे: "किसी मनुष्य के विषय में यह कैसे कहा जा सकता है कि वह सोता है, जब उसमें न साँस रही न जीवन, वह भूमि के नीचे गाड़ दिया गया है और सड़ रहा है?" दूसरी ओर, जो कोई परमेश्वर के राज्य, सामर्थ्य और कार्य को पहचानना और समझना सीखना चाहता है, उसे

अपने मन और समझ को बन्द करना होगा, अपनी आँखों को शुद्ध करना, अपने कानों को साफ़ करना होगा, और देखना और सुनना होगा कि इस विषय में मसीह क्या कहता है, और इस जीवन से परे उसकी दृष्टि में यह कैसा है, जहाँ हमारी समझ, मन और विचार नहीं पहुँच सकते।

33. इस वचन में तुम सुनते हो कि मसीह कहता है कि उसके लिए किसी मनुष्य का मरना मृत्यु नहीं, परन्तु एक नींद है; हाँ, उसकी दृष्टि में उनमें से कोई भी, जो हमारे समय से पहले जीवित रहे और मर गए, मरा हुआ नहीं है, परन्तु सब के सब जीवित हैं, उनके समान जिन्हें हम अपने सामने खड़े देखते हैं; क्योंकि उसने ठान लिया है कि सब जीवित रहेंगे, हाँ, उनका जीवन उसके हाथों में है। क्योंकि तुम्हें यहाँ मसीह के विचारों और कार्यों में, और संसार के दृष्टिकोणों, विचारों और समझ में स्पष्ट अन्तर करना चाहिए, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, ताकि तुम मृत और सड़ती हुई देह के विषय में अन्धे और पशु-समान विचार और धारणा में न पड़े रहो, परन्तु यह पहचानो कि यह सब सृष्ट वस्तुओं का प्रभु है, चाहे वे हमारे लिए मरी हुई हों या जीवित, और कि सारा जीवन उसी से आता है और उसी में और उसी के द्वारा बना रहता है, यहाँ तक कि यदि वह जीवन को बनाए न रखे तो कोई एक क्षण भी जीवित न रह सके।

34. जीवन के नियमित दैनिक पालन के अतिरिक्त, उसे जीवन को हमारी इच्छा और सहायता के बिना तब भी बनाए रखना पड़ता है जब हम सोते हैं, एक ऐसी दशा जिसमें मनुष्य का अपने मन और जीवन पर कोई वश नहीं होता, और वह नहीं जानता कि वह कैसे सो जाता है और फिर कैसे जागता है।

इसलिए मसीह के लिए यह कठिन नहीं कि उस घड़ी में जब शरीर और प्राण अलग होते हैं, वह मनुष्य के प्राण और आत्मा को अपने हाथ में थामे रहे, चाहे हम स्वयं कुछ भी अनुभव न करें और न देखें, हाँ, चाहे शरीर पूरी तरह नष्ट ही क्यों न हो जाए। क्योंकि, जैसे वह जीवन की साँस और आत्मा को शरीर से अलग सुरक्षित रख सकता है, वैसे ही वह शरीर को धूल और राख में से फिर एक साथ ला सकता है। यह उसने इस और ऐसे ही दूसरे उदाहरणों में प्रमाणित किया है, जब उसने एक ही वचन से उन्हें फिर जीवित किया जो सचमुच मर चुके थे और जिनके शरीर और प्राण अलग हो चुके थे। इसलिए हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि जो मर चुके हैं उनका जीवन उसके हाथ में है; क्योंकि यदि यह सामर्थ्य उसकी न होती, तो वह जीवन लौटा न सकता।

35. दूसरे, तुम्हें यह हिसाब नहीं लगाना चाहिए कि जीवन और मृत्यु एक दूसरे से कितनी दूर हैं, या जब तक शरीर कब्र में गलता रहता है तब तक कितने वर्ष बीत जाते हैं, और कैसे एक के बाद दूसरा

मरता है, परन्तु इस समय और इस घड़ी से परे की दशाओं के विषय में मसीह के विचार को समझने का यत्न करो।

क्योंकि वह समय को दसों, सैकड़ों या हज़ारों वर्षों में नहीं गिनता, और न वर्षों को एक के बाद एक, एक को पहले और दूसरे को बाद में, नापता है, जैसा हमें इस जीवन में करना पड़ता है; परन्तु वह सब कुछ एक ही क्षण में समझ लेता है, सारी मानव जाति और सारे समय का आदि, मध्य और अन्त।

और जिसे हम समय के अनुसार, मानो एक लम्बे खिंचे हुए नापने के डण्डे से, देखते और नापते हैं, वह सब वह मानो एक ही दृष्टि में देख लेता है, और इस प्रकार अन्तिम मनुष्य की, और पहले मनुष्य की भी, मृत्यु और जीवन दोनों उसके लिए समय के केवल एक क्षण के समान हैं।

36. इस प्रकार हमें अपनी मृत्यु को सही प्रकाश में देखना सीखना चाहिए, ताकि हमें उसके कारण घबराना न पड़े, जैसे अविश्वास घबराता है; क्योंकि मसीह में यह सचमुच मृत्यु नहीं, परन्तु एक उत्तम, मधुर और थोड़ी सी नींद है, जो हमें आँसुओं की इस घाटी से, पाप से और वास्तविक मृत्यु के भय और उसकी पराकाष्ठा से और इस जीवन के सब दुर्भाग्यों से छुटकारा दिलाती है, और हम सुरक्षित और निश्चिन्त रहेंगे, एक छोटे से क्षण के लिए मधुरता और कोमलता से विश्राम करेंगे, मानो किसी गद्दीदार आसन पर, उस समय तक जब वह हमें अपनी सब प्रिय सन्तानों के साथ अपनी अनन्त महिमा और आनन्द के लिए पुकारेगा और जगाएगा। क्योंकि जब हम इसे नींद कहते हैं, तो हम जानते हैं कि हम उसमें पड़े न रहेंगे, परन्तु फिर जगाए जाएँगे और जीवित रहेंगे, और कि जितने समय तक हम सोएँगे, वह इससे अधिक लम्बा न लगेगा मानो हम अभी-अभी सो गए हों। इसलिए हम अपने आप को डाँटेंगे कि हम मृत्यु की घड़ी में ऐसी नींद पर चकित या भयभीत हुए, और अचानक कब्र में से और सड़न में से जीवित निकल आएँगे, और पूरी तरह स्वस्थ, ताज़ा, एक शुद्ध, निर्मल, महिमामय जीवन के साथ बादलों में अपने प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह से मिलेंगे।

37. इसलिए हमें अपने आप को, शरीर, प्राण और जीवन को, पूरे भरोसे और आनन्द के साथ अपने सच्चे उद्धारकर्ता और छुड़ानेवाले को सौंपना और समर्पित करना चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे हमें अपनी शारीरिक नींद और विश्राम में अपना जीवन निश्चिन्त होकर उसे सौंपना पड़ता है, इस निश्चय के साथ कि हम उसे खोएँगे नहीं, परन्तु वह उसके हाथ में सचमुच और सावधानी से सुरक्षित रखा जाएगा, बनाए रखा जाएगा और फिर लौटाया जाएगा। यहाँ तुम देखते हो, जैसा वह वास्तव में दिखाता है, कि उसके लिए मनुष्यों को मृतकों में से जगाना और उन्हें फिर जीवित करना कितना सहज है, जैसे वह उस कुँवारी के पास आया, उसका हाथ पकड़ा, जैसे कोई और किसी को नींद से जगाने के लिए करे, और एक वचन से पुकारा, "हे लड़की, उठ!" और वह कुँवारी अचानक उठ बैठी, मानो उसे नींद से जगाया गया हो। हम यहाँ न नींद देखते हैं न मृत्यु, परन्तु जागृति और ताज़गी, ठीक जैसे लाज़र अपनी कब्र में से निकल आया।

38. देखो, मसीह का यह वचन विश्वास के लिए हँसी और मूर्खता की बात नहीं है (जैसा कि दूसरों के लिए है, बुद्धिमानों और व्यवस्था के अनुसार संतों के बीच, जो फिर भी मृत्यु के भय और आतंक में पड़े रहते हैं, उन्हें मृत्यु और कामों के विषय में अपने विचारों से काम रहता है), परन्तु एक बड़ी बुद्धि है, जिसके द्वारा मृत्यु और मृत्यु के सब चित्र निगल लिए जाते हैं, और उनके स्थान पर सच्ची सान्त्वना, आनन्द और जीवन प्राप्त होता है।

मसीह के इस वचन के पीछे कार्य और अनुभव निश्चय ही आता है, और उसके वचन पर विश्वास विफल नहीं हो सकता।

इसे एक उत्कृष्ट कृति और कीमियागरी या किसी विद्या का एक अद्भुत कार्य माना जाए, जो सचमुच ताँबे और सीसे को सोने में नहीं बदलती, परन्तु मृत्यु को नींद में, तुम्हारी कब्र को एक कोमल गद्दीदार आसन में, हाबिल की मृत्यु से लेकर अन्तिम दिन तक के समय को एक छोटी सी घड़ी में बदल देती है, एक ऐसा कार्य जो किसी सृष्ट प्राणी के पास नहीं है और न कोई उसका यत्न कर सकता है, सिवाय मसीह पर विश्वास के द्वारा। यदि तुम इस पर विश्वास कर सको, अर्थात् मसीह के वचन को सत्य रहने दो और झूठ न समझो, तो तुमने मृत्यु पर और मृत्यु के डंक पर पहले ही विजय पा ली है, और उनके स्थान पर मधुर विश्राम पा लिया है।

39. पवित्रशास्त्र सब जगह ऐसी सान्त्वना देता है, जो संतों की मृत्यु के विषय में ऐसे बोलता है मानो वे सो गए और अपने पितरों में जा मिले, अर्थात् उन्होंने मसीह में इसी विश्वास और सान्त्वना के द्वारा मृत्यु पर विजय पा ली थी, और उन संतों के साथ जो मृत्यु में उनसे पहले जा चुके थे, पुनरुत्थान की बाट जोहते रहे।

इसलिए आरम्भिक मसीहियों ने (निस्सन्देह प्रेरितों या उनके चेलों से सीखकर) यह रीति अपनाई कि वे अपने मृतकों को आदर के साथ दफ़नाते थे और जहाँ कहीं सम्भव होता उन्हें अलग स्थानों में गाड़ते थे, जिन्हें वे गाड़ने के स्थान या कब्रिस्तान नहीं, परन्तु coemeteria, अर्थात् शयन-कक्ष, dormitoria, अर्थात् निद्रा-गृह, कहते थे; ये नाम हमारे समय तक प्रचलित रहे हैं; और हम जर्मन लोग प्राचीन काल से ऐसे गाड़ने के स्थानों को परमेश्वर के खेत कहते हैं, जैसा कि संत पौलुस 1

कुरिन्थियों 15, 44 में कहता है: "स्वाभाविक देह बोई जाती है;" क्योंकि जिन्हें हम अब गिरजाघर के आँगन (कब्रिस्तान) कहते हैं,

वे आरम्भ में गाड़ने के स्थान नहीं थे।

यही इस सुसमाचार-पाठ की शिक्षा और सान्त्वना है।

40. इसके अतिरिक्त, यहाँ हमें मानो एक चित्र में, लहू बहने के रोगवाली स्त्री में और उस कुँवारी में भी, यह दिखाया गया है कि मसीह के ज्ञान के बिना व्यवस्था के द्वारा विवेक पर शासन करने का यत्न करने का क्या परिणाम होता है। लोगों के दो वर्ग हैं: एक वर्ग में रोगी, कंगाल, डरपोक विवेक हैं, जो अपने गुप्त संकट और पापों को, और व्यवस्था के न्याय और शाप को भी, अनुभव करते हैं, अर्थात् यह कि वे परमेश्वर के क्रोध के अधीन हैं, उससे छुटकारा पाने की सच्चे मन से लालसा करते हैं, बहुत से वैद्यों से सहायता और सम्मति खोजते हैं, अपनी सारी सम्पत्ति, शरीर और जीवन खर्च कर देते हैं, और फिर भी उन्हें कोई सहायता नहीं मिलती, न सुधार न सान्त्वना, परन्तु वे निरन्तर बिगड़ते जाते हैं; यहाँ तक कि अन्त में वे निराश होकर हार मान लेते हैं और अपने आप को मृत्यु के हवाले कर देते हैं; अन्त में मसीह अपने सुसमाचार के साथ उनके पास आता है। बहुत से भले मन के लोगों ने अब तक पोप-तन्त्र के अधीन यही अनुभव किया है, जिन्होंने धर्मपरायण बनने का सच्चे मन से यत्न किया, जैसा उन्हें निर्देश दिया और सिखाया गया वैसा सब कुछ किया, और फिर भी उससे केवल भयभीत और डरपोक विवेक ही पाए, और मृत्यु तथा न्याय के दिन के भय और आतंक के कारण वे अपना जीवन समाप्त कर देना चाहते थे। मसीह के ज्ञान के बिना, सारी शिक्षा का, अपनी सबसे अच्छी दशा में भी, यही परिणाम होता है।

41. दूसरा वर्ग, सरदार की बेटी के समान, वे लोग हैं जो व्यवस्था के बिना हैं, चाहे वे यहूदी हों या अन्यजाति, अर्थात् जो स्वतन्त्र हैं और निश्चिन्त जीते हैं, व्यवस्था के आतंक को अनुभव नहीं करते, सोचते हैं कि वे सम्पन्न और सुरक्षित हैं, जब तक कि वे अचानक मार गिराए नहीं जाते और मर नहीं जाते, जैसा कि संत पौलुस अपने विषय में रोमियों 7,11 में कहता है कि वह व्यवस्था के बिना जीवित था, परन्तु बाद में व्यवस्था के द्वारा पाप जी उठा और उसने उसे मार डाला।

42. क्योंकि वह स्त्री और वह बेटी दोनों अपने संकट से और मृत्यु से छुड़ाई गईं, इसलिए उस सम्मति या सहायता के सिवा और कोई नहीं जो मसीह को स्वीकार करती है और सुसमाचार की सचमुच सान्त्वना देनेवाली, जीवित वाणी को सुनती है, जिसमें पाप और मृत्यु को मिटाने की, और विवेक को अनन्त सान्त्वना, आनन्द और जीवन देने की सामर्थ्य है, जहाँ कहीं ये सच्चे विश्वास से ग्रहण किए जाते हैं। और यहाँ यह शिक्षा स्पष्ट रूप से प्रस्तुत की गई है, कि हम अपने किसी पुण्य के बिना,

सेंत-मेंत, केवल विश्वास के द्वारा, धर्मी ठहराए जाते और उद्धार पाते हैं, और इस प्रकार पाप और मृत्यु से छुड़ाए जाते हैं।

वह कंगाल स्त्री अपनी बड़ी अयोग्यता के सिवा मसीह के पास और कुछ नहीं लाई, यहाँ तक कि उसे उस पर लज्जित होना पड़ा, हाँ, जब उसे अपने आप को प्रगट करने पर विवश किया गया तो वह भय और आतंक से भर गई। सरदार की बेटी में तो व्यक्तिगत पुण्य या योग्यता इससे भी बहुत कम थी, क्योंकि वह वहाँ मृत्यु में पड़ी थी और पूरी तरह जीवन और कर्म से रहित थी। एक शब्द में, हमें यह अंगीकार करना चाहिए कि अपने आप में हमारे पास कुछ नहीं है, और न हम ऐसा जीवन जी सकते हैं या ऐसा कुछ कर सकते हैं जो उसे प्रसन्न करे या हमें अनुग्रह और जीवन दिलाए, जब तक कि उसका शुद्ध अनुग्रह हम पर न किया जाए।

43. परन्तु जब हम पापों की क्षमा, सान्त्वना और जीवन पा चुके, तो आइए, हम भले कामों को सिखाना और करना आरम्भ करें।

ठीक जैसे उस स्त्री ने, चंगी होने के बाद, और उस कुँवारी ने, फिर जीवित किए जाने के बाद, भले और जीवित काम किए। इसी प्रकार हमारे पास भी मसीह में परमेश्वर की इच्छा के अनुसार जीने की सामर्थ्य है, और हम जानते हैं कि मसीह में आरम्भ किया गया हमारा जीवन और हमारे काम उसे ग्रहणयोग्य हैं।

यहाँ और जो कुछ कहा जा सकता है, कि मसीह अपनी कलीसिया में अपने कार्य और आश्चर्यकर्म किस प्रकार करता है, जिनमें विश्वास के फल दिखाई देते हैं, यद्यपि गुप्त और अस्पष्ट रूप से, जैसे उस स्त्री और उस कुँवारी के इन दोनों उदाहरणों में, यहाँ तक कि संसार को उन्हें देखने न दिया गया, वह हमारी वर्तमान चर्चा को बहुत लम्बा कर देगा।

[मुद्रित पृष्ठ-चिह्न — अनुवाद में छोड़ा गया]

↑