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157वाँ उपदेश, जो अट्ठाईसवें अध्याय पर पाँचवाँ है
157वाँ उपदेश
जो अट्ठाईसवें अध्याय पर पाँचवाँ है।
यदि कोई नश्वर मनुष्य हमें धमकाता, जैसे परमेश्वर अपनी व्यवस्था में हमें धमकाता है, तो निश्चय ही हम विचलित हो जाते, चाहे उसका हम पर कुछ बड़ा अधिकार न भी होता; और इसी में हमारी अभक्ति दिखाई देती है, यहाँ तक कि हम उसे ढाँपने का यत्न भी करें, तो भी वह प्रकट हो ही जाती है, क्योंकि हम मरणशील प्राणियों को जीवते परमेश्वर से अधिक सामर्थ्य दे बैठते हैं। परन्तु इसके द्वारा परमेश्वर उस आदर और आज्ञाकारिता को परखना चाहता था जो हम उसके प्रति रखते हैं; अर्थात् इसमें कि जब वह हमें अपने प्रेम का निश्चय दिलाए, तब हम पूरी रीति से उसी पर टिक जाएँ और उसी से सन्तुष्ट रहें। और इसी प्रकार दूसरी ओर, जब वह हमें अपने क्रोध का कोई निश्चित चिह्न दे, तब हम उससे थरथराएँ। इसलिए जो बात यहाँ कही गई है उस पर हम भली-भाँति ध्यान दें; अर्थात् हम ऐसे जड़-बुद्धि न हों कि परमेश्वर के क्रोध को हँसी में उड़ा दें। परन्तु आओ, उस बात की ओर लौटें जो पहले कही जा चुकी है, अर्थात् यह कि यदि हम उसकी व्यवस्था के अनुसार न चलें तो उसका हाथ अवश्य हमारे विरुद्ध होगा। यह निश्चित है कि मनुष्य स्वभाव से अपनी अभिलाषाओं को खुली छूट देंगे कि जो कुछ परमेश्वर ने उन्हें वर्जित किया है वही करें, और वे उससे लड़ने में भी नहीं हिचकिचाएँगे। यह वे मुँह से तो नहीं कहेंगे, फिर भी बात स्वयं यही प्रकट करती है। क्योंकि जब हमने अपनी ओर से उसे ललकारा है और उस पर चढ़ाई की है, तो क्या यह उचित नहीं कि वह हमारे विरुद्ध शस्त्र बाँधे? यह सच है कि जब तक हम इस वर्तमान संसार में जीते हैं, हमारे शरीर की निर्बलता ऐसी है कि हम सब बातों में परमेश्वर की व्यवस्था को पूरा नहीं कर सकते। तो भी जब मनुष्य अपनी मर्यादाओं को इतना लाँघ जाएँ कि भला और बुरा उनके लिए एक समान हो जाए, और वे अपनी अभिलाषाओं से बिलकुल न जूझें, तो वे अपने आप को परमेश्वर के खुले शत्रु ठहराते हैं। और मूसा भी इसी उद्देश्य से बोलता है। यद्यपि हम बुराई का सामना करने का यत्न करते हैं और परमेश्वर का भय हमें थामे रखता है, तो भी हम उससे ताड़ना पाने के योग्य ठहरते रहते हैं; जैसा कि हम देखते हैं कि विश्वासी भी बहुत सी विपत्तियों से बचे हुए नहीं हैं, और परमेश्वर उसकी महिमा को तुच्छ जाननेवालों की अपेक्षा उन्हें कहीं अधिक सुधारता है। क्योंकि जैसे वे उसकी सन्तान हैं, वैसे ही वह उनकी अधिक चिन्ता भी करता है, और इसीलिए उन्हें और भी गम्भीरता से ताड़ना देता है। तो भी मूसा इस स्थान पर केवल उन्हीं के विषय में बोलता है जो हठ में कठोर बने रहते हैं, और ऐसे बेलगाम हो जाते हैं कि बुराई करने में उन्हें तनिक भी विवेक नहीं चुभता। वे कभी नहीं सोचते कि स्वर्ग में कोई न्यायी है, जब तक कि वह उन्हें अपना हाथ अनुभव न करा दे। और इसलिए वह यह नहीं कहता कि परमेश्वर तुम्हें ऐसे ताड़ना देगा जैसे पिता अपने बच्चों को देता है; परन्तु यह कि परमेश्वर तुम्हें कड़ी चोट मारेगा; तुम उसका हाथ ऐसे कठोर और सजीव रूप में अनुभव करोगे कि सह न सकोगे; और वह भी एक दिन के लिए नहीं वरन् तब तक निरन्तर जब तक तुम भस्म होकर नाश न हो जाओ। इसलिए जब हम ऐसी धमकियाँ सुनते हैं, तो समझ लें कि वे उन लोगों के लिए तैयार की गई हैं जो बुराई में कठोर हो चुके हैं और किसी भय से रोके नहीं जाते कि जब अपने भीतर कोई बुरा प्रलोभन अनुभव करें तो आह भरें; परन्तु लगाम को दाँतों में दबाकर आगे बढ़ते जाते हैं और परमेश्वर का उपहास करते हैं। और इससे क्या फल निकलेगा? जो बातें हम यहाँ इससे पहले देख चुके हैं, उनके अतिरिक्त मूसा यह भी जोड़ता है कि परमेश्वर ऐसे तिरस्कार करनेवालों को नाना प्रकार की विपत्तियों से मारेगा। पहले यह कि वह उन पर शत्रु भेजेगा और उन्हें नाश करने और निगल जाने की सामर्थ्य देगा, यहाँ तक कि वे उनकी लोथों तक का पीछा करेंगे, ऐसा कि जब वे हार जाएँगे तब वह उन्हें इतना सम्मान भी न देगा कि वे गाड़े जाएँ, वरन् उन्हें कौओं और पृथ्वी के पशुओं का केवल आहार होने के लिए छोड़ देगा; और इसके अतिरिक्त उसके पास उनकी देह में उन्हें दण्ड देने के और भी अनेक उपाय हैं, अर्थात् वह उन पर नाना प्रकार के रोग भेजेगा, जैसे नासूर और दूसरे कीड़े और खुजली, जिनसे वे ऐसी दशा को पहुँचेंगे कि उनमें मानो कोई समझ ही नहीं रहेगी, वरन् वे बिलकुल बुद्धि-भ्रष्ट हो जाएँगे, यहाँ तक कि दोपहर को भी वे ऐसे टटोलेंगे जैसे अंधे अँधेरे में टटोलते हैं। और निश्चय परमेश्वर के प्रतिशोध की सबसे कठोर बात वह है जब मनुष्य ऐसे गिरा दिए जाते हैं कि उनमें उसके पास लौटने का मन ही नहीं रहता, और न वे अपने आप को सम्हालकर अपने दोष स्वीकार कर पाते, न यह जान पाते कि जब परमेश्वर का हाथ उन पर पड़ता है तब उसकी दया की शरण लेने के सिवाय कोई सहायता नहीं है; परन्तु वे होश खोए हुए मनुष्यों के समान भौंचक्के पड़े रहते हैं। इसी रीति से परमेश्वर अपने आप को उनका घोर शत्रु प्रकट करता है।
अब जो कुछ मूसा यहाँ शत्रुओं के विषय में कहता है, उससे हम फिर देखते हैं कि परमेश्वर मनुष्यों के हृदयों को अपने हाथ में कैसे थामे रखता है; ऐसा कि यदि हम शान्ति में हों और अचानक हमारे विरुद्ध युद्ध छिड़ जाए और हम न जानें कि क्यों (जैसा मैं पहले दिखा चुका हूँ), तो इसका कारण यह है कि परमेश्वर हम पर क्रोधित है; और क्योंकि हमने उसे खिझाया है, इसलिए उसे भी हमसे लड़ना ही होगा। उसके पास सैनिकों की कमी नहीं। ज्यों ही वह कोई संकेत करता है (जैसा भविष्यद्वक्ता कहता है) सारी पृथ्वी हिल उठती है; चाहे थोड़ी ही देर पहले किसी ने हिलने का विचार तक न किया हो। इसलिए हम समझ लें कि जब संसार में युद्ध की तैयारियाँ होती हैं, तब परमेश्वर अपने क्रोध के चिह्न दिखाता है। यह निश्चित है (जैसा हम पहले कह चुके हैं) कि चाहे हम परमेश्वर की सच्चाई से सेवा करें और उसकी सुरक्षा में रहें, तो भी हमारे शत्रु होने से नहीं रुकेंगे। क्योंकि इसी रीति से वह हमें अभ्यास कराना चाहता है; और यही कलीसिया की दशा है, जैसी वह सदा से रही है। परन्तु इससे यह भलाई होती है कि परमेश्वर हमारे शत्रुओं के विरुद्ध हमें स्थिर रखेगा। जब वे हमारे विरुद्ध अद्भुत युक्तियाँ रच चुकेंगे, तो भी अपना उद्देश्य पूरा न कर पाएँगे। वे निराश होंगे। और चाहे वे सिंहों के समान उग्र हों और हताशा के क्रोध से भरे हों, तो भी परमेश्वर अन्त में उन्हें वश में कर लेगा; चाहे वे हमें निगल जाने के संकल्प में डटे रहें, तो भी उन्हें ऐसा करने की सामर्थ्य न होगी; परन्तु (जैसा पहले कहा गया) यदि वे हमारे विरुद्ध एक मार्ग से आएँगे, तो सात मार्गों से भागेंगे। पर अब इसके विपरीत यह कहा गया है कि चाहे हम अपने शत्रुओं से बल में बढ़कर हों, और उन पर कितनी ही अच्छी व्यूह-रचना से चढ़ाई करें, ऐसा कि जीत हमारी ओर पहले से ही मिली हुई लगे (जैसा हम देखते हैं कि दुष्ट लोग घमण्ड और ढिठाई से कैसे भभक उठते हैं), तो भी जब हम समझें कि हमने लक्ष्य पा लिया है, तब परमेश्वर हमें ऐसा भय छुआ देगा कि हमें पता न चलेगा कि किधर भागकर पर्याप्त शीघ्र निकलें, वरन् हम में से हर एक की बुद्धि चकरा जाएगी। इससे हम समझ लें कि जब परमेश्वर हमें ताड़ना देने के लिए युद्ध उठाता है, तब चाहे हम कितने ही भली-भाँति सज्जित हों, और सामना करने के सब साधन हमारे पास हों, तो भी यदि परमेश्वर हमारे विरुद्ध है तो हमारा नाश अवश्य होगा। क्योंकि जय मनुष्यों के बल और पराक्रम से नहीं, वरन् परमेश्वर की सामर्थ्य से मिलती है, जो इसी कारण सेनाओं का यहोवा कहलाता है। और हमारे लिए परमेश्वर से मेल रखने के सिवाय और कोई सहायता नहीं, ताकि वह हमें अपने पंखों के नीचे सेए; जैसा कि वह स्वयं यही उपमा देता है कि वह अपने चूज़ों के प्रति मुर्गी का सा काम करेगा। क्योंकि तब हम सुरक्षित रहेंगे चाहे सारा संसार हमारे विनाश का षड्यन्त्र रचे। और चाहे हमारे शत्रु कितने ही पराक्रमी और बलवन्त हों, और अपनी दुष्टता में हमें पूरी रीति से नाश करने पर तुले हों, तो भी इतना ही बहुत है कि परमेश्वर हमारा रखवाला ठहरे, और चाहे हमें मनुष्यों से कोई सहायता न मिले, तो भी उसी की सामर्थ्य हमारे लिए पर्याप्त गढ़ है। परन्तु यदि हम उसे अप्रसन्न करते ही चले जाएँ, और वह देखे कि जब उसने हमें अपने पास लौटा लाने के लिए छोड़ रखा, तब भी हमें उसके विरोधी बने रहना और अपने बलवे में डटे रहना ही भाता है, तो उसके बहुत सह लेने के बाद उसे हमें इस दशा को पहुँचाना ही होगा कि हम अपने शत्रुओं के हाथ से भस्म हों। और चाहे दूसरे लोग हमारे ही समान दुष्ट दिखाई दें, और परमेश्वर उन्हें हम से अधिक सफल न करे, तो भी यह हमें धोखा न दे। क्योंकि परमेश्वर कभी-कभी उन दुष्टों को जय देगा जो हम से अच्छे नहीं, वरन् सम्भव है कि और बुरे हों; तो भी वह उन्हीं के हाथों हमें नाश करने से न चूकेगा, और उनकी भी हमारी तरह बारी आएगी। परन्तु इस बीच हमें यह न सोचना चाहिए कि यह धमकी व्यर्थ दी गई है। इसलिए हम अपनी तुलना दूसरों से करके यह न कहें कि अरे, क्या वे भी हमारी ही तरह अपराधी नहीं? और क्या परमेश्वर के पास उन्हें दण्ड देने का उचित कारण नहीं? हाँ है; परन्तु वह उचित समय और ऋतु को जानता है, और उन्हें अपनी इच्छा के अनुसार काम में ला सकता है; परन्तु हम उसकी चोटें सहने के लिए अपने आप को तैयार करें, यदि हम उसकी धमकियों की ओर से कान बन्द कर लें और जब वह हमें जगाना चाहे तब सोते रहें। क्योंकि यदि हम उसकी धमकियों का विश्वास न करें, तो हमें प्रत्यक्ष अनुभव से जानना पड़ेगा कि जो उन्हें कहता है उसके पास उन्हें पूरा करने की सामर्थ्य है, और वह ऐसा नहीं बोलता जैसा कहावत है कि छोटे बच्चों को डराने के लिए बोलता हो। यह निश्चित है कि परमेश्वर न्याय करने से पहले बहुधा धमकाएगा। परन्तु इसमें हम उसकी उस दीर्घ सहनशीलता पर विचार करें जो वह हमारे लिए ठहरा रहता है। और यदि हम उसका दुरुपयोग करें, तो वह परमेश्वर के क्रोध को हमारे विरुद्ध ढेर करना और दूना करना ही होगा; यहाँ तक कि हमारे लिए यही भला होता कि वह हमें पहले ही दिन जड़ से उखाड़ देता, बजाय इसके कि इतने समय तक हमें सहता रहे। ठट्ठा करनेवाले कहें कि मोहलत सोने के बराबर है। परन्तु ऐसी कोई मोहलत इतनी लम्बी नहीं जिसे हम, यदि सम्भव होता, सौ मृत्युओं के मोल न छुड़ाते, जब हम अपने परमेश्वर के सामने इतने हठीले और उसके वचन के प्रति इतने आज्ञा-न-माननेवाले रहे हैं कि उसके अपने क्रोध का कोई चिह्न देने को भी हमने केवल हँसी की बात बना डाला है। इसलिए हम विचार करें कि जब तक परमेश्वर हमें बचाए रखता है, तब तक वह हमें अपने पास लौट आने का अवकाश देता है; और यदि हमारे शत्रुओं ने हमें छोड़ रखा है, तो यह हम पर दिखाई गई उसी की कृपा है, कि हम उसके क्रोध को पहले ही टाल लें। परन्तु यदि हम तब न सुनें जब वह बोलता है, और उसकी चेतावनियाँ ग्रहण न करें, तो हमें उसकी इन धमकियों पर कान लगाना ही पड़ेगा जो यहाँ सुनाई गई हैं, और उसे हमें किसी दूसरी पाठशाला में भेजना ही पड़ेगा। यह हमारे परमेश्वर की अद्भुत भलाई है कि जब हम उसे ऐसे उकसा चुके हैं जैसा हम देखते हैं, तो भी वह हमें सहता है, और यह सब हमें अपने पास लौटा लाने के लिए है, भारी प्रहारों से हमें विवश करके नहीं, वरन् प्रेमपूर्ण रीति से हमें लुभाकर, हमें दया से ग्रहण करने को तैयार रहकर, मानो वह ऐसा न्यायी न हो जो हमें सताए और दोषी ठहराए। परन्तु क्या? जब हम यह सब तुच्छ जान चुके, तो अन्त में (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) यही होना है कि हमारा प्रभु हमारे लिए और स्वामी खड़े करेगा, कि दुष्ट लोग हमारे विरुद्ध उठें, और कसाइयों की भाँति हमें मार डालकर हमारा संहार करना चाहें, और वास्तव में परमेश्वर के प्रतिशोध के निष्पादक हों, जिसकी चेतावनी हमें बहुत पहले से दी गई थी और हमने उसे हँसी का खेल बना लिया, और अपने पापों और दुष्टता में बने रहे। यही कारण है कि मैंने कहा कि जब तक परमेश्वर हमसे बोलता है, और हम अपने आप को दोषी ठहराते और अपने पाप मानते हैं, और अपने परमेश्वर से मेल-मिलाप चाहते हैं कि इस संसार में शान्ति से जीएँ; तो यद्यपि परमेश्वर की इच्छा यह हो कि हमारे शत्रु हों और हम युद्धों में लगे रहें, तो भी वह हमें अपनी रक्षा में रखे रहता है और हम उसकी सामर्थ्य और भलाई से सम्भाले और बचाए जाते हैं।
अब जो मूसा यह जोड़ता है कि लोथों को कौए और जंगली पशु खाएँगे और उन्हें हाँकनेवाला कोई न होगा, यह व्यर्थ धमकी प्रतीत होती है, क्योंकि कुछ अन्तर नहीं पड़ता कि ऐसा हो या न हो। यदि मनुष्य मरने पर गाड़ा जाए, तो इससे उसे क्या लाभ या हानि है? इसलिए पहली दृष्टि में लगता है कि इस पर कुछ बड़ा ध्यान नहीं देना चाहिए। परन्तु परमेश्वर यह दिखाना चाहता था कि वह अपना क्रोध मरे हुओं की देह में भी अनुभव कराएगा। और सचमुच गाड़ा जाना एक अधिकार है जो परमेश्वर ने मनुष्य जाति को पुनरुत्थान की प्रतिज्ञा के रूप में दिया है। हम यह न समझें कि मृतकों को गाड़ने की रीति किसी मूर्खतापूर्ण अन्धविश्वास से चली है, या मनुष्यों ने इसे गढ़ा है। यह सच है कि अन्यजातियों ने भी इसे बरता, और यह उनके विरुद्ध साक्षी था; और अन्तिम दिन उस रीति के बरतने के कारण वे दोषी ठहराए जाएँगे, जो उन्हें अन्तिम पुनरुत्थान की बाट जोहना सिखाती, और उसका विचार न करना उनके लिए निरुत्तर करनेवाला है। क्योंकि हमारा गाड़ा जाना हमारे लिए एक सजीव दर्पण या चित्र होना चाहिए जो हमें दिखाए कि हम इस रीति से सड़ाहट में जाने के लिए नहीं रचे गए, मानो कोई और जीवन न हो, और हम एक नई दशा में फिर से न बहाल किए जाएँ। और यह सदा इस बात की और बड़ी घोषणा के काम आता है कि मनुष्य जाति केवल कुछ समय के लिए नाश होती है, और उनकी देह नई की जाएगी। अब क्योंकि गाड़ा जाना पुनरुत्थान का स्मारक है जैसा मैंने पहले कहा, इसलिए गाड़ा जाना मनुष्यों को विशेषाधिकार के रूप में दिया गया है; और इसी कारण उसमें एक शोभनीय मर्यादा बरती जाती है, मानो हम जो बचे रहते हैं आँखों के देखने से मानो सिखाए जाते हैं कि दूसरे जीवन की निरन्तर बाट जोहें। क्योंकि मरा हुआ भी अपनी देह में एक चिह्न रखता है कि वह मानो सुरक्षित रखा गया है, उस दिन तक जब परमेश्वर मरे हुओं को फिर जिला उठाएगा। अब इसके विपरीत, जहाँ यह कहा गया है कि मनुष्य गाड़े न जाएँगे, वरन् पशुओं और पक्षियों से खाए जाएँगे, तो यह ऐसा ही है मानो परमेश्वर उन्हें उस साझे लाभ से वंचित करना चाहता था जो उसने सारी मनुष्य जाति को दिया था, और मानो उसने खुले रूप से दिखाया कि वे जीते जी और मरकर भी उसके श्रापित थे। और इसी कारण कहा गया है, तू गधे के समान गाड़ा जाएगा; यह बात भविष्यद्वक्ता ने एक राजा से कही थी, अर्थात् यहूदा के राजा से। परन्तु क्योंकि उसने सुधरना न चाहा, और परमेश्वर ने उसे यह आदर दिया था कि वह अपने जीवनकाल में यीशु मसीह का प्रतिरूप धारण करे, तो भी उसने उसका दुरुपयोग किया और अपने आप को सब प्रकार की अभक्ति के वश कर दिया; तू गधे के समान गाड़ा जाएगा (भविष्यद्वक्ता कहता है)। इससे हमें चिताया जाता है कि परमेश्वर जो भी ताड़नाएँ हमारे पास भेजता है, उन सब पर, यहाँ तक कि सबसे छोटी पर भी, बहुत ध्यान दें, ताकि हम सदा भय के लिए जागृत रहें। क्योंकि क्या कारण है कि हम परमेश्वर की इतनी सारी ताड़नाओं को उनसे लाभ उठाए बिना टाल जाते हैं? इसलिए कि हम जान-बूझकर आँखें मूँद लेते हैं, और जब तक पूरी बलपूर्वक आवश्यकता हमें विवश न करे, हम अपने आप को यही बहलाकर सन्तुष्ट रहते हैं कि हमें ताड़ना देनेवाला परमेश्वर नहीं है; और (जैसा हम आगे देखेंगे) हम ऐसी जड़ता में पड़ जाते हैं कि सब कुछ भाग्य के सिर मढ़ देते हैं। इसलिए हमें चेताया जाता है कि परमेश्वर की भेजी हुई सब ताड़नाओं को, चाहे हम पर हों चाहे हमारे पड़ोसियों पर, ध्यान से देखें, कि उनसे चेतावनी पाएँ। गाड़ा न जाना एक छोटी सी बात प्रतीत होती है; परन्तु तो भी परमेश्वर चाहता है कि इसे ध्यान में रखा जाए और समझा जाए कि यह उसका हाथ है, और वह अपने अपराधियों के विरुद्ध अपने आप को न्यायी प्रकट करता है। जब परमेश्वर अपने न्याय इतनी छोटी बातों में भी प्रकट करना चाहता है, तो हम और अधिक बुद्धि और विवेक से काम लें। जब-जब परमेश्वर हमें (जैसा कहते हैं) केवल एक चुटकी देता है, तब-तब हम उसका ध्यान करने को प्रेरित हों, और तब तक न ठहरे रहें कि वह तलवार खींचे या धनुष चढ़ाकर हमें प्राणघातक घाव से बेधे; वरन् सब प्रकार से उसके हाथ के नीचे दीन बनें। फिर यहाँ हमें अनन्त जीवन की एक साक्षी मिलती है। यह सच है कि यह बात व्यवस्था में उतनी स्पष्टता से नहीं बताई गई थी जितनी हमारे लिए सुसमाचार में बताई गई है, न यह कि हम स्वर्गीय महिमा के लिए फिर जी उठेंगे, न यह कि मरने के बाद हम परमेश्वर के साथ जीएँगे। परन्तु इतने पर भी, प्राचीन पूर्वजों ने पशुओं का सा जीवन नहीं बिताया, न परमेश्वर ने उन्हें ऐसे अज्ञान में छोड़ा कि उनका विश्वास इसी वर्तमान संसार और इसी क्षणभंगुर जीवन में बन्द रह जाए। क्योंकि यहाँ हमें साक्षी मिलती है कि जब हम इस जीवन की दौड़ पूरी कर चुकेंगे, तब भी सब मनुष्यों के लिए इससे बड़ा न्याय तैयार रखा है। और यदि परमेश्वर यहाँ हमें सहता रहे, और हम व्यवस्था में बताए गए सब श्रापों से अन्त तक बचे रहें, तो भी हमें इससे बड़े लेखे में आना है। क्योंकि परमेश्वर का मनुष्यों को गाड़े जाने से वंचित करने की बात कहना व्यर्थ होता, यदि (जैसा मैंने अभी कहा) उसका इसमें कोई और आशय न होता। इसलिए हम इस शिक्षा का ऐसा उपयोग करें कि उस जीवन की ओर दृष्टि रखने को प्रेरित हों जो अभी हमसे छिपा है और जिसकी हम विश्वास से बाट जोहते हैं; और यह न समझें कि जब परमेश्वर हमें इस संसार में दण्ड नहीं देता, तब इससे हमारा बड़ा हित होगा। क्योंकि हमारे लिए इससे कहीं अच्छा है कि हम यहाँ नीचे ठहरे रहें और सदा दुःखों में रहें, बजाय इसके कि हम आराम और सुख भोगें और इस बीच परमेश्वर केवल इसी की बाट जोहे कि जब वह हमें इस संसार से उठा ले तब हम पर गरज पड़े। इस प्रकार तुम देखते हो कि मूसा का यह पाठ हमारे किस काम का है, जहाँ वह कहता है कि पक्षी और पशु हमारी लोथों को खाएँगे और कोई उन्हें न हाँकेगा।
अब यदि परमेश्वर उन देहों पर जिन में कोई संवेदना नहीं, अपने क्रोध के ऐसे चिह्न देता है, तो उन प्राणों का क्या होगा जिनमें बुराई का मूल निवास और शैतान का राज्य है? क्योंकि हमारे हाथ, पाँव, आँखें और कान अपनी ही प्रेरणा से अपराध नहीं करते, वरन् हमारे दुष्ट विचारों और भावनाओं के निर्देश और उकसावे से करते हैं। और ये सब बातें किस से या कहाँ से उत्पन्न होती हैं, सिवाय हमारे प्राणों से? इसलिए जब देहें, जो केवल साधन थीं, परमेश्वर के क्रोध का अनुभव करती हैं और जैसा हम देखते हैं उसका उत्तर देती हैं, तो हम यह न मानें कि प्राण छूट जाते हैं। इसलिए हम सदा इस क्षणभंगुर जीवन से ऊँचे की ओर दृष्टि रखें कि हम जागृत हों, और ऐसी आज्ञाकारिता में चलें कि जब हम पाप और शैतान से लड़ चुके, और इस संसार में धीरज और नाना क्लेशों में अभ्यास पा चुके, और परमेश्वर की सेवा पूरे यत्न से करने में अपनी ओर से जो हो सका कर चुके, तब हमारे प्राण विश्राम के लिए उठा लिए जाएँ, और हमारा प्रभु भी इसी प्रकार हमारी मृत देहों पर वही कृपा दिखाए। तो भी, अपनी देहों के गाड़े जाने का यह अनुग्रह और धन्यता विश्वासियों को सदा नहीं मिलती, जबकि ऐसा होता है कि बहुत से दुष्ट बड़े सम्मान से गाड़े जाते हैं; पर इससे उन्हें कुछ नहीं, न उनकी दशा तनिक भी सुधरती है। हम देखते हैं कि भजन संहिता में उनके विषय में क्या कहा गया है जिन्होंने विश्वासयोग्यता से परमेश्वर की सेवा की: अर्थात् यह कि उनकी देहें पक्षियों और पशुओं के आहार के लिए डाल दी गईं; और फिर भी वे परमेश्वर की सन्तान थे। और यद्यपि यह दुष्टों पर परमेश्वर के क्रोध की साक्षी है, तो भी बहुधा ऐसा हो सकता है कि हमारा प्रभु अपने ही लोगों पर वही रीति की ताड़नाएँ काम में लाए; और तो भी उससे उनकी कुछ हानि न होगी।
यह सच है कि जब ऐसी बात हो, तब हमें सदा दीन बनना चाहिए, और समझना चाहिए कि ऐसी बातें मानो आदम के पाप की, और हम में पाई जानेवाली भ्रष्टता की, और उन अपराधों की भी छाप हैं जो हमने किए हैं; और फिर भी इतने पर हमारा प्रभु इस बीच इस बुराई को भलाई में बदल देता है, जब वह विश्वासियों को गाड़े जाने से वंचित होने देता है। हम देखते हैं कि दुष्ट धनवान और लाज़र के विषय में क्या कहा गया है। कहा गया है कि धनवान मरा और गाड़ा गया; देखो, संसारी ठाठ-बाट अधर्मी पर कैसे लुटाया जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि उसका प्राण स्वर्गलोक में ग्रहण किया जाना चाहिए था, जब उसकी देह बड़े ठाठ से ले जाई गई और बड़ी रीतियों से उसका सत्कार हुआ। और लाज़र का क्या? वह भी मरा। परन्तु उसके गाड़े जाने का क्या उल्लेख है? कुछ भी नहीं। इसके द्वारा हमारा प्रभु यीशु हमें समझाता है (क्योंकि वही यह कहता है) कि हमें इन दिखाई देनेवाली बातों पर पूरी रीति से नहीं टिके रहना चाहिए। तो भी यह धमकी (चाहे जैसी भी बात हो) व्यर्थ नहीं है। तो क्या करना चाहिए? हम सामान्य रूप से यह निष्कर्ष निकालें (जैसा हम कह चुके हैं) कि गाड़ा जाना हमें स्वर्गीय जीवन की आशा और उस पुनरुत्थान की ओर ले चलने के काम आता है जिसकी हमें आशा रखनी है। उस विषय में इतना ही।
जब हम अपने से पहले मरे हुओं को गाड़ें, तब यह सदा हमें प्रेरित और उत्तेजित करे कि समझें कि हम केवल इसी संसार में जीने के लिए नहीं रचे गए, वरन् हमारे लिए एक और उत्तम जीवन तैयार किया गया है। और फिर, जब हम देखें कि हमारा प्रभु किसी को गाड़े जाने से वंचित करता है, तब समझें कि वह उसमें अपना क्रोध प्रकट करता है।
तो भी कभी-कभी मनुष्य के लिए यह अच्छा है कि पशुओं और पक्षियों से खाया जाए, और अपनी आत्मा को बचाने के लिए परमेश्वर से इस रीति से अपनी देह में ताड़ना पाए, और उसे सामयिक दण्ड मिले, बजाय इसके कि वह सदा के लिए नाश हो जाए। कभी-कभी दुष्ट मनुष्य का फाँसी पर लटकाया जाना उसके बिछौने पर मरने से अच्छा है। क्योंकि हम कितनों को देखते हैं जो परमेश्वर के विरुद्ध दाँत पीसते हैं, जब वह धीरज से उनकी बाट जोहता रहा, और उनके मन फिराव के लिए अपने क्रोध के इतने स्पष्ट और प्रत्यक्ष चिह्न उन्हें दे चुका; तो भी वे उसका उपहास करते हैं और अपने बलवे में हठीले बने रहते हैं? जब कोई अभागा कुकर्मी मनुष्यों से दोषी ठहराया जाता है, तब वह इससे लज्जित और मन में टूट जाता है, और अपने पाप मानकर उन पर विलाप करता है। तब यह दण्ड, जो वह अपनी देह में सहता है, यद्यपि वह उसी का निष्पादन है जो यहाँ मूसा के द्वारा कहा गया, तो भी उसके उद्धार के काम आता है; इसलिए हम ये बातें सँजोकर ले चलें। फिर जब विश्वासी, यहाँ तक कि स्वयं शहीद भी, जलाए जाते हैं और उनकी देहें भस्म होकर राख हो जाती हैं, ऐसा कि उन्हें वह भी नहीं मिलता जो सारी मनुष्य जाति के लिए साझा है, तब हम समझें कि परमेश्वर उसे उनके कल्याण में बदल देता है, और उससे उनकी महिमा दूनी हो जाती है। कैसे? यह निश्चित है कि यह परमेश्वर की धमकी है, जैसे सब रोग भी हैं। परन्तु जब हमारा प्रभु इस प्रकार बचाता है, तो उसका आशय यह है कि ये वे सामान्य साधन हैं जिन्हें वह हमारे पापों को सुधारने के लिए काम में लाता है; तो भी वह उन्हें जिन्होंने उसे अप्रसन्न नहीं किया, या कम से कम जिनका वह कठोरता से पीछा करना नहीं चाहता, अपने ही हाथ से इस रीति से ताड़ना देने से नहीं चूकता। संक्षेप में यही वह बात है जो हमें इस पाठ के विषय में स्मरण रखनी है।
अब हम उस बात पर आएँ जो मूसा आगे कहता है। वह कहता है कि परमेश्वर अपनी व्यवस्था के तिरस्कार करनेवालों को बहुत से रोगों से मारेगा। इससे पहले वह ज्वर और जलन के रोग और पीलिया और ऐसे ही दूसरे रोगों की चर्चा कर चुका है; अब वह खुजली और नासूर और दूसरे कीड़ों और खाज की बात करता है। जहाँ बवासीर का भी उल्लेख है, जैसा कुछ लोग उनकी व्याख्या करते हैं; ये सब पूर्वोक्त बातें व्यवस्था के अपराधियों को दण्ड देने के लिए परमेश्वर के शस्त्र हैं। संक्षेप में, वे उसके योद्धा हैं जो हम से लड़ने को तैयार हैं, जब वह देखता है कि हम उसके विरुद्ध घास का सा हियाव बाँधते हैं। और सचमुच जब हम अपनी अभिलाषाओं का पक्ष लेकर उसकी धार्मिकता का उल्लंघन करते हैं, और उस व्यवस्था को तोड़ते हैं जो उसने हमारे बीच ठहराई है, और जब वह देखता है कि हमारी अभिलाषाएँ, जो चोर और डाकू हैं, इतनी बेलगाम हैं, तो वह अपने लोगों और प्रतिनिधियों को शस्त्र-सज्जित करता है, अर्थात् वे रोग जिनकी यहाँ चर्चा है, और दूसरी जातियों के भी। इसलिए हम सीखें कि हम अपनी देह में जो भी रोग भोगते हैं, वे सब परमेश्वर के सन्देश हैं कि हम उसका क्रोध अनुभव करें, क्योंकि हमने उसे अप्रसन्न किया है; परन्तु विशेष करके असाधारण रोग, जब परमेश्वर हम पर ऐसी बीमारियाँ भेजता है जो मनुष्यों में सामान्य नहीं, और जिनकी चिकित्सा का उपाय वे कठिनता से ही पाते हैं, या बातों की विचित्रता के कारण वह बिलकुल असम्भव ठहरता है; तब परमेश्वर चाहता है कि हम उसके क्रोध को दुगुना अनुभव करें, और हमें दिखाए कि हमने उसे बहुत ही अधिक उकसाया है। परन्तु हम इसे बहुत हलके में लेते हैं। क्योंकि इसके विपरीत सामान्य रोगों के विषय में उनका नित्य होना हमें यह सोचने पर लगाता है कि वे परमेश्वर की ओर से नहीं आते। वे कहते हैं: यह देखो, एक मनुष्य को ज्वर है; और एक दूसरे को जुकाम और उपदंश है, या ऐसा ही कोई और रोग। अच्छा, ये ऐसी बातें हैं जिनमें हम कठोर हो गए हैं। कैसे? रीति के कारण। और क्या परमेश्वर इस बीच अपने अधिकार का स्वत्व खो दे? यदि वह हमें ताड़ना देने में अपने आप को हमारे प्रति न्यायी प्रकट करता ही रहे, तो क्या यह उसे भूल जाने और उसके हाथ का कुछ ध्यान न रखने का कारण है? परन्तु जैसी भी बात हो, हमारी जड़ता ऐसी ही है। मैं चाहता हूँ कि इसके उदाहरण इतने प्रसिद्ध न होते जितने हैं। परन्तु हर एक अपने आप को देखे और जाँचे कि क्या रोगों की सामान्यता हमें परमेश्वर की ओर पीठ करने और उसके न्यायों का और अपने पापों का कम ध्यान रखने पर नहीं लगाती, ऐसा कि हम में से कोई अपने आप में दोष नहीं पाता। सामान्य और नित्य के रोगों के विषय में इतना ही। और जहाँ तक असाधारण रोगों की बात है, हम देखते हैं कि मनुष्य उनसे भी कैसे कठोर हो जाते हैं। मैं तुमसे पूछता हूँ, क्या हमने नहीं देखा कि परमेश्वर ने इन पचास वर्षों के भीतर व्यभिचार के विरुद्ध नए रोग उत्पन्न किए हैं? ये उपदंश और ये सब दूसरे घिनौने रोग, जिन्हें इस समय गिनाया नहीं जा सकता, कहाँ से आए? ये सब बातें परमेश्वर के सिवाय और किस से आईं, जो ऐसा प्रतिशोध प्रकट करता है जैसा पहले कभी नहीं जाना गया था? संसार इस पर चकित हुआ, और कुछ समय तक मनुष्य इससे बहुत डरे; परन्तु इस सारे समय में उन्होंने परमेश्वर के हाथ का कुछ विचार नहीं किया। और आज यह इतनी साधारण बात हो गई है कि परमेश्वर के तिरस्कार करनेवाले, मेरा अर्थ कामुक और वेश्यागामी लोग हैं, जो सब प्रकार की लम्पटता में अपने आप को सौंप देते हैं, इस पर केवल कमर मटकाते हैं। यद्यपि परमेश्वर उन्हें इस प्रकार के कोढ़ से मारे (क्योंकि वह सचमुच एक प्रकार का कोढ़ है), ऐसा कि वे उसकी खुजली और दूसरी गन्दगियों से खाए जाएँ, तो भी वे अपना धन्धा करना नहीं छोड़ते और उसका उपहास करते रहते हैं; और सचमुच यह बहुत विचित्र बात प्रतीत होती है कि परमेश्वर का ऐसा दण्ड ठट्ठे में बदल दिया जाए। जब वे परमेश्वर के हाथ से यों दण्ड पाते हैं, तब आजकल वे अपनी बदचलनी का कैसा मज़ाक उड़ाते हैं! ऐसा कैसे होता है कि वे स्वयं मानो परमेश्वर को चिढ़ाने के लिए उसका मज़ाक और ठट्ठा करते हैं, और जबकि वह उन्हें टाट और राख में दीन होने के लिए बुलाता है, वे उसकी ओर जीभ निकालकर चिढ़ाते हैं, और अपने कामों से लज्जित होना तो दूर, मानो उसे चिढ़ाने के लिए अपनी ही गन्दगी और दुर्दशा का खेल बनाते हैं? तब हम देखते हैं कि मनुष्य कैसे हठीले हैं, क्योंकि वे परमेश्वर की पाठशाला में इससे अच्छा लाभ नहीं उठा सकते। मेरा अर्थ उसकी शिक्षा की पाठशाला से नहीं, जहाँ वह उनसे बोलता है, वरन् उस पाठशाला से है जब वह भारी चोटों से मारता है, और युद्ध और संकट उठाता है, जो मनुष्यों को भय के मारे होश खो देने पर लाने चाहिएँ; परन्तु तो भी इस बीच यह व्यर्थ नहीं लिखा गया। इसलिए हम और अच्छी रीति से सचेत हों; और जब परमेश्वर हमारे पास कोई विचित्र रोग भेजे, तब हम समझें कि हमारे पाप बढ़ गए हैं और इसलिए परमेश्वर पहले से भी अधिक क्रोधित होना ही होगा। इसलिए यही हमें पश्चाताप की ओर ले जाए, और हम अपने अधर्म को दुगुना न करें; क्योंकि अन्त में हम अनुभव से वह बात पाएँगे जो हमने अभी देखी; अर्थात् यह कि जब बुराई हमसे चिपक जाएगी, हाँ हमारी मज्जा और हड्डियों तक, जब तक हम पूरी रीति से भस्म न हो जाएँ। इसके अतिरिक्त परमेश्वर के पास हमें दण्ड देने के और प्रकार के साधन भी हैं, और जब वह देखता है कि सामान्य साधन कारगर नहीं होते, तब उसके पास अपने भण्डारों में रखी हुई और छड़ियाँ हैं; जैसा गीत में कहा गया है। हाँ और हम देखेंगे कि उसके विरुद्ध अन्धाधुन्ध चलना क्या होता है: अर्थात् अन्त में वह ऐसे लोगों को टेढ़े नाप से आड़ा-तिरछा आ पकड़ेगा, जो इस रीति से अनजान मूर्ख बनते हैं, और जब वह उन्हें किसी न किसी रीति से दण्ड दे चुका हो तब भी ठट्ठा ही करते और कान हिलाते रहते हैं। इसलिए हम तब तक न ठहरें कि परमेश्वर हमारे प्रति ऐसी चरम कठोरता बरते; वरन् जो यहाँ बताया गया है उससे पहले ही चेताए जाकर इसे देखें, और विचार करें कि वह हमारे पास जितने प्रकार के रोग भेजता है, उतने ही साक्षी भेजता है कि हमने उसके विरुद्ध पाप किया है; कि हम इस पर विचार करें और पूरी दीनता से उसकी ओर फिर लौटें।
मैंने अभी कहा था कि सबसे बढ़कर बात यह है जो मूसा अन्त में जोड़ता है: अर्थात् यह कि परमेश्वर हमें विस्मय से मारेगा, और हम ठीक दोपहर को अंधे के समान अँधेरे में टटोलेंगे, और हमारा हृदय चकरा जाएगा। अब तक हमने देखा है कि परमेश्वर मनुष्यों पर अनोखी कृपा दिखाता है, जब वह उन्हें उनकी देह में पीड़ित करता है और उनके मन शान्त रहते हैं कि वे धीरज रखें। क्योंकि वे अपने पाप अनुभव करते और उन पर विलाप करते हैं, और ताड़ना देनेवाले को पुकारना नहीं छोड़ते। और सचमुच कभी-कभी देखा जाता है कि परमेश्वर का अनुग्रह ऐसे लोगों पर उससे कहीं अधिक प्रकट होता है जितना यदि उन पर ऐसे बड़े क्लेश न होते। उदाहरण के लिए: यदि परमेश्वर किसी मनुष्य को बचाए रखे और वह परमेश्वर की सेवा करे, तो हम देखते हैं कि परमेश्वर उसे आशीष देता है। जब हम किसी में खरा और पवित्र जीवन देखते हैं, तो कहेंगे, यह मनुष्य परमेश्वर की सेवा करता है, और परमेश्वर भी उस पर अनुग्रह प्रकट करता है। फिर हम एक और को देखते हैं जो भारी रोगों से ग्रस्त है, हर एक उस पर तरस और करुणा खाता है; वह निरन्तर घुलता जाता है, और उसे प्रचण्ड पीड़ाएँ हैं, वह नाना व्याधियों से सताया गया है, और जो उपचार उसे दिए जाते हैं वे ही इतने कष्टदायक हैं कि उनसे अधिक नहीं हो सकते; तो भी यह मनुष्य अपने आप को शान्त रखना नहीं छोड़ता, अपने पाप मानता और परमेश्वर से क्षमा माँगता है; हम ऐसा धीरज देखते हैं जो हमें परमेश्वर की महिमा करने को प्रेरित करता है; और वह व्यक्ति प्रार्थनाओं और विनती में लगा रहता है। जब मनुष्य इस प्रकार मारा जाता है, और परमेश्वर उसके हृदय को भय में थामे रखता है, ऐसा कि वह उसके हाथ के नीचे आज्ञाकारी बना रहता है; तब हम उन ताड़नाओं के बीच परमेश्वर का बड़ा अनुग्रह देखते हैं। परन्तु जब हम अपने रोग में बुद्धिहीन हो जाएँ, और पागलों की सी हरकतें करें, और लगाम चबाते खड़े रहें और न जानें किधर मुड़ें; और इस सारे समय में कभी सहायता के लिए परमेश्वर की ओर भागने का कोई चिह्न न दिखाएँ, तो यही सारे दुःख की पूरी नाप है।
इसलिए यह बिना कारण नहीं कि मूसा, उन रोगों और पीड़ाओं की चर्चा करके जो परमेश्वर मनुष्यों की देह पर भेजता है, और उन असाधारण ताड़नाओं की भी जो मनुष्यों को उनकी इच्छा के विरुद्ध अपने पाप अनुभव कराने को विवश करती हैं, यहाँ जोड़ता है: परमेश्वर तुझे अन्धेपन से मारेगा, हाँ वह तुझे ऐसा मारेगा कि तेरी बुद्धि चकरा जाएगी: तू दोपहर को ऐसे टटोलेगा जैसे अँधेरे में; तेरे हृदय में फिर कोई समझ या संवेदना न रहेगी: वरन् तू बिलकुल जड़ हो जाएगा। और यहाँ हमें फिर चिताया जाता है कि जो ताड़नाएँ हमारे मन पर आती हैं, वे हमारे लिए उन सब से अधिक भयंकर होनी चाहिएँ जो हम अपनी देह में सह सकते हैं। यह सच है कि हमारा स्वभाव हमें ठीक उलटी ओर खींचता है; क्योंकि हम अपनी देह में ऐसे कोमल और नाज़ुक हैं कि ज्यों ही कोई पीड़ा अनुभव करें, तुरन्त चिल्ला उठते और अपना धीरज खो देते हैं; और इसमें हम अपनी पशुता का एक अंश देखते हैं। क्योंकि यदि हम में स्थिर बुद्धि की एक बूँद भी होती, तो हम उन ताड़नाओं से जो परमेश्वर हमारे प्राणों के लिए ठहराता है, उन सब से जो हम कभी अपनी देह में सह सकते हैं, सौ गुणा अधिक डरते। वह मनुष्य किस दशा में है जब परमेश्वर उसे त्याग देता है, ऐसा कि वह उसे और नहीं ढूँढ़ता, वरन् सब उपायों से उसकी उपस्थिति से अपने आप को छिपाने का यत्न करता है? निश्चय जब हम उस दशा को पहुँचें, तो यदि हम परमेश्वर को उसके सिंहासन से खींच सकते, तो हम खुशी से ऐसा करते। जो परमेश्वर के पास आने से बचने के लिए ऐसी छिपने की जगहें ढूँढ़ता है, वह उसकी महिमा को छीनने का जो यत्न हो सके करता है, और ऐसे न्यायी के सामने उपस्थित होने से घबराता है।
और सचमुच, चाहे मनुष्य को इस जड़ता से अधिक कोई हानि न हो, ऐसा कि वह अपनी ही दुर्दशा अनुभव न करे; तो क्या यह इसका चिह्न नहीं कि परमेश्वर ने उसे पहले ही निकम्मे मन के वश में कर दिया है? हाँ: क्योंकि तिरस्कृत होने का इससे अधिक स्पष्ट चिह्न कोई नहीं कि मनुष्य में विवेक की कोई कचोट या संकोच न रहे। फिर जब मनुष्य भयभीत और होश-हवास खो बैठे, ऐसा कि वह न जाने कि किधर मुड़े, और परमेश्वर का कोई स्वाद या अनुभव न रखे, न अपने पापों पर विलाप करने, या उनकी क्षमा माँगने और उन से पश्चाताप करने की कोई समझ रखे; वरन् दाँत पीसे और खच्चर की तरह लगाम चबाए: क्या यह भयानक बात नहीं? जब हम ऐसा दर्पण देखते हैं, तो हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं, और स्वभाव भी हमें इसके लिए विवश करता है। और तो भी, यदि हम उस पर विचार न करें कि हम श्रद्धा से खड़े रहें और भय और दीनता में चलें, तो क्या यह परमेश्वर की परीक्षा करना नहीं? इसलिए हम सीखें कि अपने आप को ऐसा कठोर न करें कि परमेश्वर को इस कठोरता का सहारा लेना पड़े जिसकी वह यहाँ अपने लोगों को धमकी देता है: अर्थात् कि वह उन्हें अँधेरे में अंधों की तरह टटोलवाएगा, और उनमें न समझ रहेगी न विवेक: कि वह उन्हें ऐसे भय में डालेगा कि वे न जानेंगे कि वे जीवित प्राणी हैं या नहीं: न यह पहचानेंगे कि कोई परमेश्वर है जो उन्हें दया से ग्रहण करेगा, और कि उसका नाम लेकर पुकारने में वे सफल होंगे या नहीं। हम तब तक न ठहरें कि ऐसी बुराई हम पर आ पड़े। क्योंकि वह गहरा गड्ढा है जिससे बहुत ही थोड़े निकल सकते हैं। सचमुच परमेश्वर कभी-कभी अपने लोगों को इस दशा तक पहुँचा देता है कि वे न जानेंगे कि वे कहाँ हैं, और वे ऐसे अति भयभीत और इससे इतने घबराए हुए होंगे कि वे जड़ और मन्द हो जाएँगे: यह भली-भाँति देखा गया है। परन्तु वह उन्हें नीचा करने के बाद फिर उठा लेता है। तो भी, क्योंकि यह उदाहरण बहुत विरल है, हम अपने परमेश्वर की परीक्षा न करें; परन्तु जब वह हमें हमारी देह में पीड़ित करे, तब हम समझें कि वह हम पर बहुत दया करता है, और अपने क्रोध की कठोरता को घटाता है, और हम इतने अधीर न हों जितने हम आदी रहे हैं। चाहे पीड़ा हमारे लिए कठिन और कड़वी हो, तो भी हम मानें: हाय: परन्तु तो भी परमेश्वर ने मेरे प्राण को नहीं छुआ। यह सदा हमारे स्मरण में रहे, कि हम अपने परमेश्वर की इस भलाई को पहचानकर कि वह हमें सहता है, उसकी ओर लौट आएँ; और सन्देह न करें कि जब हम सच्चाई से उसे ढूँढ़ें तब वह हम पर तरस खाने को तैयार है। यह उस एक बात के रूप में गिना जाए जो हमें इस पाठ में स्मरण रखनी है, जहाँ उस जड़ता का उल्लेख हुआ है।
अब मूसा स्पष्ट कहता है कि परमेश्वर की व्यवस्था के उल्लंघन करनेवाले दोपहर को टटोलेंगे। मानो वह कहे: यद्यपि परमेश्वर उन्हें आनन्द करने के बहुत अवसर देता है, तो भी वे ऐसे भयभीत होंगे कि किसी अनुग्रह को पकड़ न सकेंगे, वरन् अंधे अभागों के समान रहेंगे। जब बात ऐसी है, तो हम आगे ध्यान दें कि यद्यपि परमेश्वर हमारे दुःखों को घटाता और हमें शान्ति देता है, तो भी यह हमारे किसी काम का नहीं, यदि वह हमें अपनी भलाई समझने की बुद्धि न दे। और हमें समझना चाहिए कि जब हम उसके पवित्र आत्मा से रहित हैं, तब परमेश्वर जो भलाई हमें देता है उसका आनन्द उठाने में हम समर्थ नहीं हैं। और यह उस धमकी का एक निष्पादन है जिसका यहाँ उल्लेख है। यह सच है कि हमें सदा इसी बात पर लौटना चाहिए कि हमारा प्रभु पापियों का पूरा विनाश नहीं चाहता; परन्तु इसलिए कि ऐसी दुर्दशाएँ बहुधा हो जाती हैं, हम तब तक न ठहरें कि वे हमारे सिरों पर आ पड़ें; वरन् उपाय ढूँढ़ें, कि परमेश्वर को हमसे अपने आप को हटा लेने का अवसर न मिले। जैसी भी बात हो, सबसे पहले हम यह ध्यान दें कि परमेश्वर यह शिक्षा उन्हीं को देता है जो उसके वचन में सिखाए गए हैं, जैसा हम कह चुके हैं। यह निश्चित है कि वह संसार का न्यायी है; तो भी हम अधिक कड़ी रीति से ताड़ना पाने के योग्य हैं, जब हम उसके मुँह से सिखाए गए हैं और उसकी इच्छा को ठुकरा चुके हैं, और यहाँ तक भ्रष्ट हो गए हैं कि उसके वचन को ठट्ठा ही बना डालते हैं: और जब वह हमें अपने लोग बनाए रखना चाहता था, तब हमने उसे तुच्छ जाना। इसलिए यह बहुत उचित है कि हम कड़ा दण्ड पाएँ, और इसलिए हम विचार करें कि जब परमेश्वर हमें यह कृपा दिखाता है कि पवित्र शास्त्र की शुद्ध शिक्षा हमारे पास हो, तो यह हमारे सब बहाने छीन लेती है, और हमें इतना और अधिक भय में चलने को जगाती भी है।
परन्तु इसके साथ ही हम आगे यह भी ध्यान दें कि परमेश्वर हमारे प्रति केवल धमकियाँ ही नहीं बरतता, वरन् प्रतिदिन हमें समझाता और अपनी ओर लुभाता भी है, कि हमें अपने साथ मिलाए: यह दिखाते हुए कि अपनी ओर से वह मेल करने को तैयार है, यदि हम अपने पापों को दोषी ठहराएँ और उसकी दया की ओर लौट आएँ। सुसमाचार, जो हम प्रतिदिन सुनते हैं, और क्या है सिवाय मेल-मिलाप के सन्देश के, जैसा सन्त पौलुस उसे 2 कुरिन्थियों में कहता है?* जब परमेश्वर हमारे पास एक दूत भेजता है कि हमें शान्ति का समाचार दे और दिखाए कि वह हमारे सब अपराधों को मिटाने को तैयार है, तो हम सचेत रहें कि उद्धार के इस समय को काम में लाएँ, कि जो अनुग्रह हमें दिया जाता है उसे उचित समय पर ग्रहण करें, जैसा भविष्यद्वक्ता यशायाह हमें बताता है, और जैसा सन्त पौलुस उसी साक्षी को लेकर कहता है।* फिर जब हम अति कठोर हो चुके हों, और परमेश्वर धीरज से हमारी बाट जोहता रहा हो, और हम फिर भी अपने पापों में बने रहें: तो हम यह न सोचें कि उसने अन्त में अपना पद छोड़ दिया है या भुला दिया है। हमें ऐसी कृतघ्नता का लेखा देना ही होगा। जब हम उस उद्धार को त्याग देते हैं जिसके लिए उसने हमें बुलाया, और उसे हद से बढ़कर तुच्छ जानते हैं, तो ऐसे जान-बूझकर किए गए हठ का हिसाब देना अनिवार्य है। तब हम भय में खड़े रहें: और जब-जब हम परमेश्वर के उस अनुग्रह की चर्चा सुनें जो हमें अपने प्रभु यीशु मसीह में दिया जाता है, तब हमारे हृदय उसे ग्रहण करने की ओर झुकें: और हम परमेश्वर को भीतर आने का मार्ग दें। और जब हम उसके पास जाएँ, तो अपने पापों पर विलाप करते हुए और अपने आप को दोषी ठहराते हुए जाएँ, केवल मुँह के शब्द से नहीं, वरन् हृदय के ऐसे शोक से भी जो प्रमाणित करे कि बुराई हमें अप्रिय है। और जब हम इस प्रकार अपने आप से अप्रसन्न हों, तब तक न ठहरें कि हमारा प्रभु उन धमकियों को पूरा करे जो वह यहाँ प्रस्तुत करता है, वरन् उन्हें अपने लाभ में बदल लें। और जब हम सुसमाचार की प्रतिज्ञाएँ सुनें, तब धमकियों को भी स्मरण रखें: कि हम और भी अधिक उत्तेजित हों, और हर एक उस भलाई को ग्रहण करने में शीघ्रता करे जो हमें भोगने और अपनाने के लिए दी जाती है, जब तक कि दोष हमारा अपना न हो।
अब आओ, हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने पापों को स्वीकार करते हुए दण्डवत् करें: उससे विनती करें कि वह हमें उन्हें और भी अच्छी रीति से अनुभव कराए, जब तक कि हम अपने आप में पूरी तरह चूर न हो जाएँ, और उस उपाय को ढूँढ़ें जिसके लिए वह हमें बुलाता है: अर्थात् यह कि उसके पवित्र आत्मा से चलाए जाकर हम सब पवित्रता और धार्मिकता में और अधिक बढ़ें और उन्नति करें, और अपने सारे जीवन में उसकी महिमा करने का ऐसा यत्न करें; कि अन्त में उसी अनन्त महिमा को पहुँचें जिसके लिए वह हमें बुलाता है। और इसलिए हम सब कहें: सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता, इत्यादि।
सोमवार, 23 मार्च, 1556 को।
