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151वाँ उपदेश, जो सत्ताईसवें अध्याय पर तीसरा है
151वाँ उपदेश
जो सत्ताईसवें अध्याय पर तीसरा है।
16 श्रापित हो वह जो अपने पिता या अपनी माता को तुच्छ जाने: और सब लोग कहें, आमीन।
17 श्रापित हो वह जो अपने पड़ोसी की सीमा हटाए: और सब लोग कहें, आमीन।
18 श्रापित हो वह जो अन्धे को मार्ग से भटकाए: और सब लोग कहें, आमीन।
19 श्रापित हो वह जो परदेशी, अनाथ और विधवा का न्याय बिगाड़े: और सब लोग कहें, आमीन।
20 श्रापित हो वह जो अपने पिता की पत्नी से सोए, क्योंकि वह अपने पिता का ओढ़ना उघाड़ता है: और सब लोग कहें, आमीन।
21 श्रापित हो वह जो किसी भी पशु के साथ सोए: और सब लोग कहें, आमीन।
22 श्रापित हो वह जो अपनी बहन से, अर्थात् अपने पिता या अपनी माता की बेटी से सोए: और सब लोग कहें, आमीन।
23 श्रापित हो वह जो अपनी सास से सोए: और सब लोग कहें, आमीन।
हम पहले ही देख चुके हैं कि परमेश्वर ने ऐसा गम्भीर विधान क्यों ठहराया कि लोग एबाल पर्वत पर, जो गरिज्जीम के सामने है, इकट्ठे होकर वे श्राप सुनाएँ जो यहाँ लिखे गए हैं। क्योंकि जब परमेश्वर एक बार हम पर अपनी इच्छा प्रकट कर चुका, तब यही उचित है कि हम में से हर एक उससे सहमत हो और यह स्वीकार करे कि उसके वचन पर स्थिर रहना ही सारी धार्मिकता की कसौटी है। परमेश्वर हम से जो सबसे बड़ा आदर चाहता है, मानो उस पर हमारी मुहर लगवाते हुए, वह यह है कि हम यह घोषणा करें कि उसके कहे का न कोई विरोध हो सकता है, न कोई उत्तर दिया जा सकता है, वरन् वह सर्वथा निश्चित है और उसी पर दृढ़ रहना चाहिए। फिर, हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि परमेश्वर के वचन से मनुष्यों की सहमति की दशा ऐसी है कि यदि वे अपने जीवन में उसके विपरीत चलें, तो वे अपने ही मुँह से अपने आप को दोषी ठहराते हैं। हमारे लिए इतना कहना काफी नहीं कि परमेश्वर जो कुछ कहता है वह उचित और न्यायसंगत है; हमें अपने कामों से भी दिखाना चाहिए कि उसकी शिक्षा का हमारे बीच पूरा बल और अधिकार है। इसलिए जो अपने मुँह से ऐसा अंगीकार करता है, वह यदि अपने सिखाए हुए और अपने जाने हुए उचित मार्ग पर न चले, तो किसी और कार्यवाही के बिना वह स्वयं अपना न्यायी है। अब हम देख चुके हैं कि परमेश्वर ने मूर्तिपूजा के विषय में और इसलिए सब प्रकार के अन्धविश्वासों के विषय में कैसे कहा। मैंने तुम से कहा है कि हमारे लिए इतना ही काफी है कि यहाँ कुछ उदाहरण छुए गए हैं, जो हमें दिखाते हैं कि परमेश्वर हम से अपनी व्यवस्था का पूरा पालन चाहता है, जैसा कि अन्त में उपसंहार के रूप में बताया जाएगा। तो तुम देखते हो कि परमेश्वर ने अपनी सारी सेवा को पक्का ठहराया। अब वह दूसरी पटिया पर आता है और उस आदर और अधीनता से आरम्भ करता है जो पिता और माता का हक़ है। वह कहता है, श्रापित हो वह मनुष्य जो अपने पिता या अपनी माता को तुच्छ जाने। अब यह श्राप बहुत अर्थपूर्ण है, क्योंकि इसमें वह सब आ जाता है जो उस आदर, आज्ञाकारिता और सहायता के विरुद्ध है जो सन्तान को अपने पिता-माता के प्रति देनी चाहिए। इसलिए जो अपने पिता और माता का आदर नहीं करता, वह परमेश्वर की ओर से श्रापित है। उनके लिए जो दण्ड ठहराया गया था, वह हम पहले भली-भाँति देख चुके हैं: यहाँ तक कि यदि किसी मनुष्य के आज्ञा न माननेवाले बच्चे होते, तो उन्हें न्यायियों के सामने लाया जाता और (उसी एक की गवाही पर) पत्थरवाह करके मार डाला जाता, और इस प्रकार वह छूत दूर की जाती थी। क्योंकि यह अस्वाभाविक और श्रापित बात है कि बच्चे उनके विरुद्ध खड़े हों जिन्होंने उन्हें जन्म दिया, उनका पालन-पोषण किया, और उनके लिए इतना कष्ट और चिन्ता उठाई। हम जानते हैं कि पिता अपनी सन्तान के लिए मानो परमेश्वर के स्थान पर होता है। इसलिए यह निष्कर्ष निकलता है कि जो अपने पिता या अपनी माता के विरुद्ध इस प्रकार सिर उठाता है, वह प्रत्यक्ष परमेश्वर को तुच्छ जानता है, मानो वह सारे धर्म का निन्दक हो। यहाँ, प्रसंगवश, परमेश्वर हमें बताता है कि यद्यपि न्यायी और हाकिम अपना कर्तव्य नहीं निभाते, या जिसने अपने पिता और माता के साथ अन्याय किया है उसे सह लिया जाता है, तौभी वह इस कारण बच नहीं निकला। क्योंकि इस संसार में बहुत से अपराध दबे पड़े रहते हैं, तौभी परमेश्वर उन्हें अपने पास रख छोड़ता है, और देर-सबेर उन्हें लेखा देना ही होगा।
तो हम भली-भाँति ध्यान दें कि यहाँ उस न्याय के निष्पादन की चर्चा नहीं हो रही जो व्यवस्था के द्वारा किया जाना है, क्योंकि उसके विषय में पहले कहा जा चुका है; परन्तु परमेश्वर यह घोषणा करता है कि यद्यपि जिन्होंने अनाज्ञाकारिता के द्वारा अपराध किया है उन्हें इस संसार में दण्ड नहीं मिलता, या उनके दोष प्रकट नहीं होते, या उनकी वैसी जाँच नहीं होती जैसी उनके योग्य थी, तौभी इससे उन्हें कुछ लाभ नहीं होता, क्योंकि एक स्वर्गीय न्यायी है जो कुछ नहीं भूलता, वरन् सब कुछ अपने सामने लेखे में रखता है, और वह अन्त में अवश्य अपना काम करेगा। इसलिए हम इस शिक्षा पर भली-भाँति विचार करें; और चाहे मनुष्य हम में कोई दोष न पाएँ, और कोई हमें न सताए न कष्ट दे, तौभी हम इस पर निश्चिन्त होकर न सो जाएँ, वरन् हर एक जन उसके अनुसार जो यहाँ हमें बताया गया है अपने आप को बुलाए और यह सोचे कि हमें परमेश्वर के न्याय-सिंहासन के सामने आना होगा। इसलिए हम ऐसी चाल चलना सीखें कि जब हम वहाँ पहुँचें तो वह हमें ग्रहण करे, और हमें उस श्राप का भय न रहे जो यहाँ सुनाया गया है। ऐसा नहीं कि हम में से कोई व्यवस्था को पूरा कर सकता है (जैसा मैं पहले और विस्तार से बता चुका हूँ), परन्तु हमारा कर्तव्य है कि उसी की ओर बढ़ें और उसके लिए यत्न करें। क्योंकि यद्यपि हम परमेश्वर के सामने पूरी तरह शुद्ध नहीं, वरन् इसके विपरीत यहाँ बताए गए बहुत से दोषों के दोषी हैं, तौभी वह उन्हें हमारे सिर नहीं मढ़ता, यदि हम उनसे अप्रसन्न रहें और अपने आप को उन्हें सौंप न दें, न लगाम ढीली छोड़ें। इसलिए हम अपने आप को रोकना और खेद करना सीखें, क्योंकि हम उतने सिद्ध नहीं जितना होना चाहिए था। परन्तु साथ ही (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ), हम अपने प्रभु परमेश्वर को प्रसन्न करने और उसकी आज्ञा मानने के लिए अपने आप को खींचें; और अपने विवेक में ऐसी साक्षी रखें कि हम निःसंकोच और खुले मुँह से कह सकें, श्रापित हो वह जिसने उद्धार की शिक्षा का उस रीति से पालन नहीं किया जैसी वह हमें दिखाई गई है। हर मनुष्य पर अपने पिता और माता के आदर का जो ऋण है, उस पर लम्बी चर्चा करना अभी आवश्यक नहीं, क्योंकि व्यवस्था की व्याख्या पहले हो चुकी है। अभी इतना जान लेना काफी है कि इस पाठ में परमेश्वर यह घोषणा करता है कि सब प्रकार की अनाज्ञाकारिता, चाहे वह पिता-माता के विरुद्ध हो या उन सब अधिकारियों के विरुद्ध जिन्हें उसने इस संसार में अधिकार दिया है, उसकी दृष्टि में असहनीय है। क्योंकि वह नहीं चाहता कि हम यहाँ पशुओं के समान अव्यवस्था में जीएँ, वरन् चाहता है कि हमारे बीच व्यवस्था और शासन बना रहे। और यह तब तक नहीं हो सकता जब तक हम उनका भय न मानें जो मनुष्यों के सामान्य शासन के लिए कोई पद धारण करते हैं। इसलिए जो कोई परमेश्वर की व्यवस्था को तोड़ता है, वह अपने आप को श्रापित समझे, जैसा कि सन्त पौलुस भी हमें बताता है कि ऐसा करने में हम प्राणियों या मनुष्यों का नहीं, वरन् स्वयं परमेश्वर का विरोध करते हैं, जब हम उस अधिकार को उलटने चलते हैं जिसे उसने ठहराया और हमें सौंपा है। इसे एक बात के रूप में ध्यान में रखो।
अब इसके बाद यह जोड़ा गया है, "श्रापित हो वह जो अपने पड़ोसी की सीमा [मेड़, या सीमा-चिह्न] हटाए।" हमें सदा वह बात याद रखनी चाहिए जो मैं तुम से पहले कह चुका हूँ; अर्थात् यह कि यहाँ एक ही प्रकार के नीचे परमेश्वर सब कुछ समेट लेता है। और मैंने साथ ही यह समझाया था कि यदि मनुष्यों की भूमि की सीमाएँ निश्चित न रखी जाएँ, तो कोई अपनी सम्पत्ति का स्वामी न रहेगा, वरन् सब कुछ लूट और विनाश में चला जाएगा। और निश्चय ही खरे बाट और माप रखना, वैध सिक्का बनाए रखना, और सीमाओं तथा मेड़ों को अपरिवर्तित रखना, ऐसी बातें हैं जिन्हें सदा विशेष संरक्षण मिला है। क्योंकि यदि सिक्का वैध न हो, तो मनुष्य आपस में क्रय-विक्रय या कोई भी व्यापार कैसे कर सकेंगे? फिर, यदि बाट और माप में मिलावट की जाए, तो हम किस दशा में पड़ेंगे? न्याय किस काम आएगा? संसार की सब व्यवस्थाएँ किस उद्देश्य की सेवा करेंगी? सीमाओं, मेड़ों और सीमा-चिह्नों के विषय में भी यही कहना चाहिए। इसलिए इस वचन के द्वारा परमेश्वर ने यह दिखाना चाहा कि हमें एक-दूसरे से व्यवहार में न्याय और खरापन बनाए रखना चाहिए। यह सच है कि ऐसे अपराधों को दण्ड देने के लिए व्यवस्थाएँ बनाई गई हैं; यहाँ तक कि यदि कोई अपने पड़ोसी की सीमा खिसकाता या हटाता है, तो वह उसे ठीक जगह पर फिर रख देने और अपने किए हुए नुकसान की भरपाई करने से छूट नहीं जाएगा, वरन् घोर अपराध के समान उसे सबके सामने दण्ड भी मिलेगा। बाटों में मिलावट करने और झूठे माप रखने के विषय में भी ऐसा ही किया जाना चाहिए। जहाँ तक सिक्कों की जालसाजी का सम्बन्ध है, यदि किसी ने उसे चलाया है, तो इतना काफी नहीं कि जो उसने अन्याय से लिया है उसे लौटा दे, वरन् उसे इसके लिए मरना भी होगा, और यह ठीक भी है। क्योंकि नहीं तो (जैसा मैंने कहा) सारी व्यवस्थाएँ मिट जातीं। और हमारे लिए जंगली पशु होना उस जीवन से अच्छा होता जो उन साधनों के बिना बीते जिन्हें परमेश्वर ने ठहराया है और जिन्हें प्रकृति ने भी हमें सिखाया है। परन्तु मान लो कि कोई मनुष्य अपने पड़ोसी को ठगता है, चाहे झूठे माप से या किसी और दुष्ट युक्ति से, और वह दूसरे की हानि से अपना लाभ ढूँढ़ता है, और हाकिम को इसकी कोई खबर नहीं, जिससे वह बिना दण्ड के निकल जाता है: तौभी यहाँ हमें दिखाया गया है कि अन्त में उसे स्वर्गीय न्यायी के सामने अवश्य लेखा देना होगा। यदि किसी कंगाल को उसके अधिकार से वंचित किया जाए या अधिकार, हिंसा या किसी और रीति से दबाया जाए, और वह इस पर एक शब्द भी कहने का साहस न करे, और इस संसार में अपना मुकद्दमा पेश करनेवाला कोई वकील न पाए, तौभी परमेश्वर उसका जमानती है; और जो लोग सोचते हैं कि जैसे-तैसे धनी होने में उनका बड़ा लाभ है, वे अन्त में पाएँगे कि उनके लिए रोटी का एक टुकड़ा खाना कहीं अच्छा होता, बजाय इसके कि पेट भरने को चाहे जितना मिलता, और इस बीच यहाँ लिखे हुए श्राप को सहना पड़ता। क्योंकि परमेश्वर को मनुष्य की सहायता की आवश्यकता नहीं। मान लो कि सब मनुष्य यहाँ बुराई करें और सब कुछ गड़बड़ और अव्यवस्थित हो जाए: तौभी यह वचन भूमि पर न गिरेगा कि जो अपने पड़ोसी की सीमा उखाड़ता है वह श्रापित होगा, वरन् परमेश्वर को अपना काम अवश्य करना होगा। यह सच है कि वह चाहता है कि वे तलवार का उपयोग करें जिनके हाथ में उसने उसे दिया है, और उसने ठहराया है कि वे ऐसा करें; और यदि वे ऐसा करने में ढीले और मन्द हों, तो वह उन्हें दिखाएगा कि उसने उन्हें अपराधों और दोषों को दण्ड देने के लिए व्यर्थ नहीं ठहराया था। तौभी नश्वर मनुष्य उसे हानि नहीं पहुँचा सकते। जब कोई सांसारिक न्यायी अपना कर्तव्य नहीं निभाता, तो इससे यह नहीं निकलता कि परमेश्वर की सामर्थ्य घट गई, या उसके पास अपना काम पूरा करने के योग्य साधन नहीं रहे, या वह निठल्ला है। क्योंकि वह सांसारिक राजाओं के समान नहीं, जो अपने अधिकारियों पर भरोसा रखते हैं और जब काम बिगड़ता है तो अन्धे बन जाने में सन्तुष्ट रहते हैं। वे कहते हैं, "जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है, मैं समझता हूँ कि सब कुछ ठीक चल रहा है, और क्योंकि मेरे पास मेरे अधिकारी हैं, मेरी इच्छा है कि वे वैसे ही विश्वासयोग्य रहकर काम करें जैसे मैंने उन्हें आज्ञा दी है।" राजा समझता है कि उसका आदेश दे देना ही उसके लिए काफी है; परन्तु परमेश्वर उन पर भी दृष्टि रखता है और उन पर भी अधिकार चलाता है। और यद्यपि अपराधी और उल्लंघन करनेवाले मनुष्यों के हाथों से बच निकलते हैं, तौभी अन्त में वे उसके हाथों दण्ड पाएँगे। इसलिए हमारी चिन्ता यह न हो कि कहीं हम पकड़े न जाएँ, या मनुष्य हमें कोई छल करते हुए न धर लें, वरन् हम इस वचन को स्मरण रखें, "श्रापित हो वह जो अपने पड़ोसी की सीमा उखाड़े।" सम्भव है मनुष्य उसे बिलकुल न देखें, परन्तु परमेश्वर तो देखता है, और हम उसकी आँखों से उतना नहीं बच सकते जितना उसके हाथ से नहीं बच सकते। इसलिए हम सब कपट और छल-व्यवहार से बचे रहें, और निश्चय जानें कि हमारा प्रभु हम पर चौकसी रखता है, वरन् इस रीति से कि वह न तो कंगालों को फँसने देगा, न सीधे-सादों पर अत्याचार होने या उन्हें निगल लिए जाने देगा, और न यह होने देगा कि ये बातें बिना दण्ड के रह जाएँ, वरन् अन्त में वह दिखाएगा कि वह जो अपने आप को जगत का न्यायी कहता है, वह निराधार नहीं।
अब आगे कहा गया है, "श्रापित हो वह जो अन्धे को उसके मार्ग से भटकाए या उसके मार्ग में ठोकर खिलाए।" यहाँ एक और निर्दयता है, जो प्रकृति के भी विरुद्ध है। क्योंकि जितनी अधिक किसी मनुष्य की आवश्यकता है, उतना ही अधिक दूसरों को उस पर तरस खाना और उसकी सहायता करनी चाहिए। एक कंगाल अन्धा है, लोग देखते हैं कि वह गिरने ही वाला है, और उसे गिरने से नहीं रोकते। जो इसमें आनन्द लेते हैं वे अवश्य ही पूरी तरह दुष्ट और भ्रष्ट मन के होंगे, यहाँ तक कि उनमें सामान्य दया की एक बूँद भी नहीं। संक्षेप में, वे अवश्य ही हर प्रकार की निर्दयता और बुराई के प्रेमी होंगे। क्योंकि अन्यजाति भी इस बात से बहुत घृणा करते थे; यहाँ तक कि कुछ स्थानों में ऐसे काम का उतना ही कठोर दण्ड दिया जाता था जितना हत्या, चोरी या ऐसे ही दूसरे अपराधों का। तौभी, सामान्यतः मनुष्यों ने उसके लिए कोई व्यवस्था नहीं बनाई। और इसका कारण यह बताया गया कि हर मनुष्य को अपने विषय में काफी समझदार होना चाहिए; इसलिए यह कहना अनावश्यक था कि "यदि कोई अन्धे को देखे, तो उसे उसके मार्ग पर लगा दे।" तथापि (जैसा मैंने पहले बताया है) हमें ध्यान देना चाहिए कि परमेश्वर अपनी बात और शिक्षा को और आगे तक बढ़ाता है। और वास्तव में उसका अर्थ यह कहना है, "श्रापित हो वह जो अपने पड़ोसी को अच्छी सम्मति के अभाव में भटकने दे।" क्योंकि जैसे अन्धा मनुष्य, यदि उसे उसके मार्ग में न चलाया और न दिखाया जाए, वस्तुओं से टकराता, ठोकर खाता और भटकता है, वैसे ही जब हमें सम्मति और अच्छी सलाह की कमी होती है, तो निश्चय ही यदि हमारी सहायता न की जाए तो हमारी वही दशा होती है जो अन्धों की होती है। वरन् यद्यपि किसी की आँखें हों, तौभी यदि वह किसी अनजाने और पराए देश में हो और अपने मार्ग से बिलकुल भटक जाए, और इधर-उधर भटकता फिरे, और लोग उसे अकेला छोड़ दें: तो यह वैसा ही है जैसे उन्होंने किसी अन्धे को उसके मार्ग से भटकाया हो; और अन्यजातियों ने भी स्वयं इसका ऐसा ही अर्थ लगाया। हमारा काम बहानों की खोज करना और यह कहना नहीं है, "ऐसा क्यों?" परमेश्वर तो केवल अन्धों के विषय में कहता है। हाँ, परन्तु जिनके पास न व्यवस्था थी न सुसमाचार, वे भी ऐसा कहना भली-भाँति जानते थे, और उन्होंने हमें हमारा पाठ दिखा दिया है; अर्थात् जो कोई किसी यात्री को मार्ग से भटका देखकर उसे मार्ग नहीं बताता, वह निरा राक्षस और घृणित प्राणी है: और वह भी जो अपने दीपक की ज्योति देने में कंजूसी करता है। मैं एक कंगाल को देखता हूँ जिसका दीपक बुझ गया है, और वह मेरे पास उसे फिर जलाने आता है। ऐसा करने में मेरा कुछ नहीं लगता, फिर भी मैं उससे कहता हूँ, "मुझ से तुझे कुछ न मिलेगा": और क्या ऐसे लोग पृथ्वी पर जीवित रहने के योग्य हैं? यह कैसा व्यवहार होगा? क्या ऐसे लोग लज्जित किए जाने के योग्य नहीं? परन्तु (जैसा मैंने पहले कहा) यह स्थान सांसारिक न्यायियों द्वारा दिए जानेवाले दण्ड की चर्चा नहीं करता। परमेश्वर हमें बताता है कि यद्यपि ऐसा व्यवहार सह लिया जाए और उस पर केवल हँसी उड़ाई जाए, तौभी उसे उसके सामने लेखा देना होगा। अब जब ऐसा है, तो हर कोई अपने आप को देखे। और पहले हम इससे सावधान रहें कि जब हमारे पड़ोसी किसी संकट में हों, तब हम भी तरस खाकर करुणा से द्रवित हों और उनकी सहायता करें। इसलिए जब भी किसी को हमारी सहायता की आवश्यकता हो, तो हम तत्पर और तैयार रहें कि अपना हाथ बढ़ाकर उसे दें। और विशेषकर यदि हमारा प्रभु हम पर यह अनुग्रह करे कि हम बिना अपने आप को कष्ट दिए या बिना खर्च के अपने पड़ोसी के काम आ सकें: तो हम समझें कि वह हमें बड़ा आदर देता है। क्योंकि जो कोई अभावग्रस्त की सहायता करता है, वह परमेश्वर का सेवक है। इस प्रकार परमेश्वर हमें अपनी सेवा में लगाता है, और साथ ही हम से प्रतिज्ञा करता है कि हमारा परिश्रम व्यर्थ न जाएगा; तो क्या हमें इसके लिए और अधिक उभारा नहीं जाना चाहिए? इसलिए इसे एक विशेष बात जानकर ध्यान में रखो कि जिनका कोई सहायक नहीं, वे यहाँ परमेश्वर की ओर से हमें सौंपे गए हैं। और इसके अतिरिक्त हम यह भी जान लें कि यदि हम अन्धों को मार्ग दिखाने के लिए बाध्य हैं, कि वे ठोकर न खाएँ या मार्ग से न भटकें, तो हमें किसी को सम्मति देने में और भी अधिक तत्पर और तैयार रहना चाहिए, जब हम देखें कि उसे सलाह की आवश्यकता है और हमारी सलाह के अभाव में वह किसी संकट में पड़ने ही वाला है। परन्तु उद्धार के मार्ग को तो और भी अधिक संरक्षण मिलना चाहिए: यहाँ तक कि यदि हम किसी मनुष्य को भूल करते और विनाश की ओर जाते देखें, तो हम उसे चेतावनी देने में संकोच न करें, यह कहते हुए, "हे अभागे, तू कहाँ जा रहा है? तू क्या करेगा? क्या तू जान-बूझकर इस प्रकार नाश होना चाहता है?" और विशेषकर जब वह अज्ञानता से ऐसा कर रहा हो: यदि तब हम इस विषय में अपनी जीभ को रोक रखें, कि वह उस बेचारे अज्ञानी प्राण के लिए उद्धार का साधन न बने, जो सीखना चाहता है: तो निश्चय ऐसी लापरवाही बिना दण्ड के न रहेगी, और परमेश्वर के सामने भुलाई न जाएगी। यद्यपि न व्यवस्था न न्याय उसके विरुद्ध कार्यवाही करे; तौभी यह श्राप उस पर पक्का ठहरेगा। संक्षेप में, हम ध्यान दें कि हमारे प्रभु का इस धमकी से यह अभिप्राय था कि हमें उन सब की सहायता करने में, जिन्हें हमारी आवश्यकता है, दया और करुणा के लिए प्रेरित करे: और विशेषकर तब अपने आप को लगाने के लिए, जब हम बेचारे अज्ञानियों को सम्मति से रहित देखें, और हम स्वयं उन्हें फिर सीधे मार्ग पर लौटा लाने के योग्य हों। इस बिन्दु के विषय में इतना ही।
अब तुरन्त निर्दयता के विषय में आता है: "श्रापित हो वह जो परदेशी, विधवा और अनाथ का न्याय बिगाड़े।" यह सच है कि हमें अपनी पूरी सामर्थ्य से हर मनुष्य के अधिकार की रक्षा करनी चाहिए। तौभी हमारा प्रभु इस स्थान पर, जैसे पहले, विधवाओं, अनाथों और परदेशियों की चर्चा करता है, क्योंकि वे बहुत से अन्यायों और अत्याचारों के सामने खुले पड़े हैं, और कोई उनके बचाव में खड़ा नहीं होता; वरन् उनकी चिन्ता बहुत ही कम लोगों को होती है, क्योंकि वे कोई बदला नहीं चुका सकते। किसी परदेशी को देखो, देखो कि वह कैसे लूटा जाएगा, कैसे सताया जाएगा, कैसे उस पर अन्याय होगा, वरन् खुलेआम; फिर भी उसे अनदेखा कर दिया जाएगा। और क्यों? क्योंकि हर कोई अपने पड़ोसी के प्रति मित्रभाव रखेगा; और जहाँ तक उस मनुष्य का सम्बन्ध है, वह उसी देश का नहीं, उसी नगर का नहीं, वह हमारा नहीं। इस प्रकार तुम देखते हो कि वह कंगाल कैसे बेसहारा छोड़ दिया जाता है। विधवाओं और अनाथ बच्चों की भी यही दशा है। क्योंकि अनाथ बच्चे से कोई यह आशा नहीं रखता कि वह आज या कल यह जाने कि उसके लिए क्या किया गया। कभी वह पालने में पड़ा रहता है, और नहीं जानता कि कौन उसकी भलाई करता है और कौन बुराई, क्योंकि उसमें समझ नहीं है: वह उस उपकार का बदला नहीं चुका सकता जो उसके साथ किया जाए: और इसलिए हर कोई उसे अकेला छोड़ देता है। विधवाओं की भी यही दशा है, विशेषकर जब वे कंगाल हों और संसार की दृष्टि में उनका कोई बड़ा मान न हो: तब हर कोई उनसे कतराता है; और इस प्रकार वे मानो लूट के लिए छोड़ दी जाती हैं। अब क्योंकि ये बातें प्रायः होती रहती हैं, परमेश्वर जान-बूझकर ऐसे लोगों को अपनी रक्षा में ले लेता है, यह कहकर कि यदि कोई परदेशी, विधवा और अनाथ के अधिकार को बिगाड़े या रोके, तो वह इसका बदला लेगा: यहाँ तक कि यद्यपि संसार के सामने इसकी कोई गिनती न हो, वरन् ऐसे अत्याचार करनेवाले उलटे पसन्द किए जाएँ; तौभी वह उन्हें अपने सामने बुलाएगा, और दिखाएगा कि उसे उनकी चिन्ता थी जिन्हें उसने अपनी रक्षा में ले रखा था। और इस प्रकार एक ही प्रकार के नीचे परमेश्वर ने संक्षेप में यह दिखाना चाहा कि यदि हम उन्हें रौंदें जिनकी कोई साख नहीं, जो अपना बचाव करने का कोई साधन नहीं रखते, और संसार की दृष्टि से जिनका कोई सहारा नहीं, तो उसका दण्ड देना वह अपने ही लिए सुरक्षित रखता है। इस पाठ से हमें यही बात ग्रहण करनी है।
अब अधिकार को बिगाड़ना या रोकना और कुछ नहीं, वरन् अन्याय से और बिना कारण दुर्बलों और निर्बलों को, और उन्हें जिनका कोई सहारा देनेवाला और रक्षक नहीं, दबाना है। सच तो यह है कि पवित्रशास्त्र में यह बोलने का ढंग रखा गया है, जो उसी के समान है जिसे हम कहने के आदी हैं, किसी अच्छे मुकद्दमे को चौपट करना; परन्तु सामान्य रूप में इसका अर्थ है, किसी मनुष्य को उसके अधिकार से वंचित करना। तो अब, जब मैं किसी मनुष्य को लूटता हूँ, जब मैं उसकी वस्तुएँ अपने लिए समेट लेता हूँ, जब मैं उसे उसकी सम्पत्ति से नंगा कर देता हूँ, जब मैं उसे उसके सब कुछ से जो उसके पास कभी रहा हो निकाल बाहर करता हूँ, जब मैं उस पर हावी होता हूँ, और जितना मुझे शोभा देता है उससे अधिक अपने ऊपर ले लेता हूँ: तब मैं उसके अधिकार को बिगाड़ता हूँ। और इस प्रकार हम देखते हैं (जैसा मैंने पहले कहा) कि इस पाठ में परमेश्वर दिखाता है कि वह उन सब अत्याचारों का न्यायी होगा जो उन पर किए जाते हैं जिनके पास अपना बदला लेने का कोई साधन नहीं, और जो मनुष्यों की ओर से त्यागे और भुलाए गए हैं। परन्तु यदि हम सुबुद्धि से काम लें, तो निश्चय हम परमेश्वर को अपना विरोधी पक्ष बनाने से सारे संसार को मिलाकर भी अधिक डरेंगे। और वास्तव में इसमें हम दिखाते हैं कि हम परमेश्वर के वचन पर थोड़ा ही विश्वास करते हैं: यहाँ तक कि यदि किसी मनुष्य का बड़ा कुटुम्ब हो और बहुत मित्र हों, यदि कोई धनवान हो या संसार का बड़ा कृपापात्र हो: तो हम उसे छूने का साहस नहीं करते; और यद्यपि उसने हमें सताया हो, तौभी हम चुपचाप उसे पी जाएँगे, और किसी भी प्रकार सावधान रहेंगे कि उसे क्रोध न दिलाएँ। इस प्रकार मनुष्य उन सब की सहन करेंगे जिनके पास संसार की दृष्टि में अपना सहारा देने के साधन हैं; जबकि इस बीच जो बेसहारा हैं वे लूटे और खाए जाएँगे। तौभी परमेश्वर उनका रक्षक है, और कहता है कि ऐसे लोगों को दबाने में हम उसके विरुद्ध युद्ध करते हैं, और इसलिए उसे भी उन्हें बचाने के लिए जिन्हें उसने अपनी रक्षा में लिया है अपना हाथ उठाना पड़ेगा। परन्तु मनुष्य इसकी चिन्ता नहीं करते: और क्या इससे हम अपना अविश्वास प्रकट नहीं करते? क्योंकि यदि हमें सच्चा और जीवित अनुभव होता कि परमेश्वर यहाँ ठट्ठा नहीं करता, जब वह हमें बताता है कि उसका श्राप उन पर पड़ेगा जिन्होंने दुर्बलों और बिना रक्षकों के लोगों के साथ ऐसा बुरा व्यवहार किया हो: तो निश्चय है कि जब भी हमें किसी ऐसे कंगाल प्राणी की बुराई करने का प्रलोभन होता जिसका संसार में कोई सहारा, साख या अधिकार नहीं, तो हम काँप उठते। मैं देखता हूँ कि इस मनुष्य के न कुटुम्बी हैं न मित्र; मैं देखता हूँ कि कोई इसकी परवाह नहीं करता; मैं देखता हूँ कि यह असुरक्षित है: अब यदि मैं इसके विरुद्ध अपने आप को ऊँचा करूँ, या इसे सताऊँ; तो परमेश्वर मेरे विरुद्ध खड़ा होता है, वह उस कंगाल पर अपनी छाप लगाता है, और मुझ से कहता है कि यदि मैं ऐसे मनुष्य को छेड़ूँगा, तो वह मुकद्दमा अपने हाथ में ले लेगा, और मैंने उसकी अपनी महिमा पर आरोप लगाया होगा। यदि हम इस पर विचार करें, तो निश्चय है कि हम इस संसार के सब अनुग्रहों और अप्रसन्नताओं की अपेक्षा उसके भय से कहीं अधिक रोके और थामे जाएँगे। तौभी हम ठीक उलटा देखते हैं, हम इस विषय में बड़े मोटी बुद्धि के हैं। इसलिए हम अपने आप को पहले से अधिक चौकस रखने का ध्यान करें। और क्योंकि हम उनके विरुद्ध कुछ करने का साहस नहीं करते जो सब प्रकार की रक्षा से सुसज्जित हैं और इस संसार में अपने आप को थामने के साधन रखते हैं, तो हम उनके साथ तो और भी कम कोई अत्याचार या अन्याय करें जिन्हें परमेश्वर मानो अपने पंखों के नीचे सेता है, और जिनका वह अपने आप को रक्षक घोषित करता है: और हम यह भी भली-भाँति विचार करें कि यद्यपि संसार हम से एक शब्द न कहे, वरन् उलटा इसके लिए हमें सराहे, तौभी परमेश्वर का प्रतिशोध हम पर दुगुना पड़ेगा, विशेषकर जब ऐसी तुच्छ दृष्टि के कारण हमने बुराई करने की अधिक छूट ले ली हो। क्योंकि यह निश्चय है कि जो निर्दयता उन कंगालों पर की जाती है जिनका कोई सहारा नहीं, वह परमेश्वर का प्रत्यक्ष तिरस्कार और उसका पूरा उपहास है, मानो वह उस प्रतिशोध को पूरा करने में असमर्थ हो जिसकी उसने धमकी दी है। अब जब परमेश्वर को इतना हल्का समझा जाता है, तो क्या हम सोचते हैं कि वह इसे सह लेगा? तुम यहाँ पहले देखते हो कि इस प्रकार का अत्याचार प्रकृति के भी विरुद्ध है। क्योंकि यदि हम अपनी दुष्ट अभिलाषाओं से पहले ही ग्रस्त न होते, तो निश्चय हम में से हर एक यह मान लेता कि किसी कंगाल और दुर्बल प्राणी को चोट पहुँचाना या निगल जाना, उस धनवान को हानि पहुँचाने से कहीं बुरा है जिसके बड़े सम्बन्धी हैं और जिसके पास बचाव और अपना बदला लेने की सामर्थ्य है। सब मनुष्य यह मानेंगे। इसलिए यह उन बड़े से बड़े और अत्यन्त घोर दोषों में से एक है जो मनुष्यों के बीच हो सकते हैं। फिर यह परमेश्वर का उपहास है; जो शैतानी दुष्टता है जब हम परमेश्वर के इस वचन से नहीं हिलते, "ये लोग मेरे हाथ में हैं, मैं इनकी रक्षा करूँगा, और जो कोई इनके विरुद्ध अपने आप को ऊँचा करे, उसे अवश्य मुझे अपना विरोधी पक्ष बनाना होगा।" यदि हम इसकी कुछ चिन्ता न करें, मानो परमेश्वर ने कभी यह कहा ही नहीं: तो क्या यह इसका चिह्न नहीं कि हम बहुत कठोर मन के हैं? और इसलिए (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) हम अपने आप को अधिक विचारशील और उसके प्रति अधिक आदर रखनेवाला बनाना सीखें: और जब हम ऐसे लोगों के बीच रहें जो संसार की दृष्टि में तुच्छ हैं, जिनका कोई सम्बन्ध नहीं, कोई मित्र नहीं, कोई सहायक नहीं: तो सावधान रहें कि उनके साथ ऐसा व्यवहार करें कि हमारे मन में सदा यह रहे कि वे परमेश्वर की सन्तान हैं, और स्वर्गीय न्यायी उन पर किए गए अन्यायों को नहीं भूलेगा, विशेषकर जब उसने यहाँ हमें बता दिया है कि जिन्होंने दुर्बलों के प्रति ऐसी निर्दयता की है वे उसके श्राप से न बचेंगे।
अब मूसा आगे कहता है, श्रापित हो वह जो अपने पिता की पत्नी से सोए, श्रापित हो वह जो पशु से, अपनी बहन से, या अपनी सास से सोए। यह स्थान व्यभिचार की सब कुख्यात किस्मों की, वरन् उनमें भी सबसे घृणित किस्मों की चर्चा करता है; चाहे वह सगोत्र-गमन हो, या पशुगमन, या ऐसी ही और अशुद्धताएँ। और परमेश्वर का इन किस्मों को चुनना निराधार नहीं; यह इसलिए कि जब हम किसी भी प्रकार के व्यभिचार की ओर जाने लगें, तो हम अधिक भय और त्रास से छू जाएँ। परमेश्वर एक ही शब्द में सीधे कह सकता था, श्रापित हो वह जो कोई भी व्यभिचार करे: और सचमुच इस पाठ का लक्ष्य वही है। तौभी वह इतने से सन्तुष्ट नहीं हुआ, वरन् (जैसा मैंने कहा) उसने वे उदाहरण चुने जो सबसे अधिक घोर हैं। और क्यों? इसलिए कि हम और गहराई तक छू जाएँ। क्योंकि हम देखते हैं कि जो बातें परमेश्वर हमें बताता है उन्हें सुनने में हम कितने ढीले हैं। हमारे पास उसका वचन है; पर इससे क्या? वह बीत जाता है। हम यह कहने से नहीं चूकेंगे कि हमें उसकी व्यवस्था तोड़ने से अपने आप को बचाना चाहिए। परन्तु यदि दोषों की चर्चा केवल एक-दो शब्दों में हो, तो क्या उन्हें वैसा समझा जाएगा जैसा समझा जाना चाहिए, अर्थात् परमेश्वर के सामने ऐसे अपराध जो अनन्त मृत्यु के योग्य हैं? हम देखते हैं कि हर कोई अपने आप को कैसे छूट दे देता है, यहाँ तक कि छिपकर चोरी करनेवाला चुराने में कोई विवेक-दंश नहीं मानता, जब तक कि छोटा चोर होते-होते वह डाकू न बन जाए; और तब (उसकी समझ में) उसने पहले जो कुछ किया वह कुछ भी नहीं, जब तक कि वह हत्यारा और लोगों का गला काटनेवाला न बन जाए। इस प्रकार मनुष्य चोरी की श्रेणियों में आगे बढ़ते हैं: और व्यभिचार में भी वे ऐसा ही करते हैं। क्योंकि वे उसे कुछ नहीं के बराबर समझते हैं, जब तक कि वे बड़ी से बड़ी अति में न गिर जाएँ। तो क्योंकि हम सुस्त हो गए हैं, यहाँ तक कि जब परमेश्वर पाप को दोषी ठहराता है और हमें उससे पीछे खींचना चाहता है, तब हम वैसे भय से नहीं छुए जाते जैसा आवश्यक था: इसलिए अनिवार्य है कि वह हमारे सामने सबसे घृणित उदाहरण रखे, ऐसे कि (हमारे न चाहने पर भी) उनके नाम सुनते ही हमारे सिर के बाल खड़े हो जाएँ; ताकि कोई मूर्खतापूर्ण चापलूसी से अपने आप को न बहकाए, वरन् हर एक सावधान रहे कि अपने आप को परमेश्वर की आज्ञाकारिता में रखे। तो यहाँ हम दो बातें देखते हैं: एक यह कि परमेश्वर ने सब प्रकार की अशुद्धता और सब प्रकार के व्यभिचार को दोषी ठहराया है: और दूसरी यह कि हम देखते हैं कि उसने जान-बूझकर सबसे घिनौनी बातें चुनी हैं, जैसे सगोत्र-गमन, और प्रकृति के विरुद्ध अशुद्धता, अर्थात् पशुओं तक से सम्बन्ध। और ऐसा क्यों है? इसलिए कि मनुष्यों को अपने आप को और अच्छी तरह सोचने का अवसर मिले, और वे वैसा न करें जैसा प्रायः करने के आदी हैं, अर्थात् सुनना और उसकी ओर कान लगाना और कहना, यह सब बहुत सच है; और फिर भी उसकी कुछ चिन्ता न करना, वरन् ऐसे चकित लोगों की नाईं चलना, मानो किसी ने उनके सिर पर मुँगरी मार दी हो। पहली बात के विषय में इतना ही।
और हम देखते हैं कि परमेश्वर सगोत्र-गमन पर कितना बल देता है, जब वह कहता है, श्रापित हो वह जो अपनी सास से, अपने पिता की पत्नी से, या अपने पिता की या अपनी माता की बेटी से, या अपनी बहू से, और ऐसी ही अन्य श्रेणियों से सोए। और क्यों? इसमें हम देखते हैं कि इस विषय में मनुष्य सब युगों में कैसे मर्यादा लाँघते आए हैं। क्योंकि परमेश्वर मनुष्यों के रोगों के अनुसार उपचार लगाना भली-भाँति जानता है। इसलिए वह इन बातों पर जो इतना बल देता है, वह व्यर्थ नहीं। और क्यों? क्योंकि उसने देखा कि मनुष्यों को छोटी रस्सी में रखने की आवश्यकता थी; और यदि वह दृढ़ता से उनके विरुद्ध खड़ा न होता और उनके मार्गों में रोक न डालता, मानो यह कहते हुए कि वहीं रुक जाओ, और उच्छृंखल बछेड़ों की नाईं न खेलो, तो इस प्रकार की दुष्टताओं का राज्य हो जाता; यदि उसने पहले से ऐसा प्रबन्ध न किया होता कि मनुष्य ऐसे दोषों में न दौड़ पड़ें: तो निश्चय सब कुछ गड़बड़ा गया होता। और यदि यह दुष्टता उन दिनों में थी; तो निश्चय आज हम भी इससे मुक्त नहीं। और इसलिए हम समझें कि इस विषय में हमारे प्रभु ने जितनी गम्भीरता दिखाई है, उतना ही अधिक वह हमें चिताता है कि हम इन बातों के ध्यान में लगे रहें, ऐसे कि हम दिन-रात, भोर और साँझ उन पर विचार करें, ताकि हम ऐसी पवित्रता और संयम से चलें कि हमारा जीवन ऐसे पशु-समान पापों में न फूट पड़े; वरन् हम परमेश्वर के लिए समर्पित रहें कि शुद्धता से उसकी सेवा करें। यही (मैं कहता हूँ) वह बात है जो हमें इस स्थान से ग्रहण करनी है। और हम अपने आप को चापलूसी न दें: क्योंकि परमेश्वर भली-भाँति जानता है कि हमारे लिए क्या उचित है; नहीं तो वह यहाँ ऐसी लज्जाजनक बातों की चर्चा न करता, जिनका नाम लेने में भी हमें लज्जा आए। तो फिर क्या? क्या परमेश्वर ने इसका ध्यान नहीं रखा? हाँ, रखा; परन्तु वह जानता था कि मनुष्य का हृदय भयानक अन्धकूप है, और हमें मानो बल से रोका जाना चाहिए, नहीं तो वह कभी हम पर वश नहीं पा सकेगा। तो अब यह हमें और अधिक उभारे कि हम अपने आप की निकटता से देखभाल करें, कि हम किसी भी ओर मर्यादा न लाँघें, वरन् जैसा मैंने पहले कहा, पूरी शुद्धता के साथ अपने आप को परमेश्वर की सेवा के लिए समर्पित करने में जागरूक रहें।
और इसके अतिरिक्त हम समझें कि व्यभिचार अपने आप में परमेश्वर के सामने ऐसी घृणित वस्तु है कि यद्यपि मनुष्य उसके दण्ड की कुछ बड़ी गिनती नहीं करते, तौभी इससे हमारा सौदा अच्छा नहीं बैठेगा, कम से कम तब जब हम स्वर्गीय सिंहासन के सामने आएँगे। क्योंकि यह छोटी बात नहीं कि परमेश्वर सब व्यभिचारियों और लम्पटों को अपने राज्य से निकाल देता है, जैसा कि सन्त पौलुस की कुरिन्थियों को पहली पत्री में (जैसा हमने कुछ ही समय पहले देखा), और इब्रानियों की पत्री में भी कहा गया है। सार रूप में हमें यही बात ध्यान में रखनी है: अर्थात् परमेश्वर नहीं चाहता कि मनुष्य पशुओं के समान एक साथ रहकर शारीरिक अभिलाषाओं में हद से बढ़ जाएँ; वरन् हर एक विवाह में पवित्रता से जीए, और इस विषय में शुद्धता का ऐसा ध्यान रखे कि दामाद का अपनी सौतेली माता के साथ, या पिता का अपनी ही बेटी या अपनी बहू के साथ सम्बन्ध करने से, या भाई का अपनी ही बहन से विवाह करने से, प्रकृति भुला न दी जाए, वरन् वे श्रेणियाँ बनी रहें। क्योंकि ऐसी व्यवस्था के बिना क्या होता? हम बैलों और गधों से किस बात में भिन्न होते? तो तुम देखते हो कि पहली बात पर हमें क्या ग्रहण करना है, कि हमारे प्रभु ने यहाँ सब प्रकार के अशुद्ध व्यवहार को दोषी ठहराया है, और नहीं चाहता कि मनुष्य इन बातों में व्यवस्थारहित जैसा व्यवहार करें, वरन् अपने आप को उसके लिए समर्पित करें, और विचार करें कि उनकी देह पवित्र आत्मा के मन्दिर और हमारे प्रभु यीशु मसीह के अंग हैं; और इसलिए उन्हें अपनी बुरी अभिलाषाओं को दबाना चाहिए। इसे एक बात के रूप में ध्यान में रखो।
दूसरी बात यह (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) कि परमेश्वर ने यहाँ हमारी आँखों के सामने ऐसे उदाहरण रखे हैं जो हमें डराने चाहिए, क्योंकि वह उनकी चर्चा करता है जो प्रकृति के विरुद्ध अपनी ही माताओं, सौतेली माताओं या बहनों के साथ सम्बन्ध करते हैं। वह उनकी चर्चा विशेष रूप से इसलिए करता है कि एक से हम दूसरे तक पहुँचें, जैसा हम देखते हैं कि वह अपनी सारी व्यवस्था में करता है। और इसकी व्याख्या पहले और विस्तार से की जा चुकी है। जब वह घृणा को दोषी ठहराना चाहता है, तो हत्या की चर्चा करता है। और क्यों? यदि कोई हमें बताए कि किसी को अपने भाई से घृणा नहीं करनी चाहिए, तो हम आसानी से मान लेते हैं कि यह पाप है; परन्तु तौभी हम ऐसा करने में विवेक-दंश नहीं मानते। परन्तु जब परमेश्वर कहता है कि जो अपने भाई से घृणा करता है वह हत्यारा है: तब हम और अधिक चकित और संयमित होते हैं। इसी प्रकार इस पाठ में, क्योंकि उपहास करनेवाले व्यभिचार पर केवल ठट्ठा करते हैं, वे अपने आप को यह भी समझाते हैं कि परमेश्वर को इसके लिए उनसे लेखा नहीं लेना चाहिए। और यह दोष न आज का है न कल का: हम देखते हैं कि यह सब युगों में रहा है, जैसा कि मूसा यहाँ बताता है। और इसलिए परमेश्वर व्यभिचार की सबसे घृणित किस्मों के नाम लेता है, ताकि हम इस पर से यह निष्कर्ष निकालें कि यदि हम पवित्रता से न जिएँ, तो हम एक बुराई से दूसरी में गिरते जाएँगे, जब तक ऐसी अथाह खाई में न जा पड़ें जिसके विषय में सोचना भी भयानक हो। इस पाठ पर हमें यही बात स्मरण रखनी है। परन्तु हमें इस चेतावनी से लाभ उठाना चाहिए, क्योंकि हम में कितनी जड़ता है। हम अपने आप को बहुत तेज़ बुद्धि और समझने में कुशल समझते हैं: फिर भी हम परमेश्वर की शिक्षा में कुछ नहीं समझते; हम इतने मोटी बुद्धि के हैं कि उसे हमारे लिए बातें पहले से चबानी पड़ती हैं, नहीं तो हम उनसे प्रभावित ही न होते। संक्षेप में, हम में छोटे बच्चों से भी कम बुद्धि और समझ है। मनुष्य जितनी चाहें अपनी प्रशंसा कर लें, और इस धारणा पर घमण्ड कर लें कि वे बड़े योग्य हैं: तौभी वे ऐसे मोटी बुद्धि के हैं कि यदि हमारा प्रभु बातें हमारे लिए मोटे रूप में न चबाता, तो हम निरे पशु ही ठहरते। और इसका कारण क्या है? निश्चय यह कि हम अपनी शारीरिक अभिलाषाओं से पहले ही ग्रस्त हैं, और कहावत के अनुसार उससे बहरा कोई नहीं जो सुनना ही न चाहे। यह देखकर हम अपने आप को और अच्छी तरह सोचें, और जब मनुष्य बातें हमारे लिए मोटे ढंग से चबाएँ, तो यह न समझें कि वे हमारे साथ अन्याय करते हैं, जैसा कुछ लोग करते हैं, जो इतने नाज़ुक हैं कि यदि कोई उनसे रूखी शैली में बोले, तो कहते हैं, "ओह, यह सब तो मैं एक-दो शब्दों में समझ गया था; इसका अर्थ तो यह हुआ कि मैं कोई छोटा बच्चा हूँ।" संक्षेप में, वे थक जाते हैं यदि कोई उनके सामने बड़ी तीक्ष्णता की सामग्री न लाए: क्योंकि वे मूर्खता से अपनी कल्पना में समझ बैठते हैं कि पहली ही चोट में वे वह सब जान लेते हैं जो आवश्यक है। परन्तु देखो, परमेश्वर यहाँ दूसरी शैली और भाषा में बोलता है। वह ऐसा क्यों करता है? वह देखता है कि आवश्यकता है। तो हम अपनी समझ के अनुसार सिखाए जाना स्वीकार करें; और क्योंकि हम मन्द हैं, यदि हमारा प्रभु हमें जगाए, तो हम नम्रता से उसे ग्रहण करें, और उससे अपना भला करना सीखें। और इस प्रकार तुम देखते हो कि इन सब पाठों पर हमें क्या ग्रहण करना है।
अब जहाँ यहाँ अपने पड़ोसी को छिपकर मारने की चर्चा है: यह सब प्रकार की घृणा और वैर के विरुद्ध कहा गया है, और उपसंहार का काम देता है। यहाँ कोई पूछ सकता है कि यह कैसे होता है कि परमेश्वर यहाँ उन्हें श्राप देता है जिनका अपराध ऐसी बातों में है जिनका उसकी व्यवस्था में उल्लेख नहीं: क्योंकि मैंने तुम से पहले कहा है कि किसी मनुष्य के लिए उन बातों का पालन कर लेना काफी है जो दस आज्ञाओं में हैं; और यह भी कि हमारे जीवन की पूरी सिद्धता वहीं बताई गई है। परन्तु वहाँ अन्धों के विषय में कोई उल्लेख नहीं। तो फिर यह कैसे होता है कि परमेश्वर यहाँ उस बात के विरुद्ध प्रतिशोध की घोषणा करता है जो उसकी व्यवस्था में वर्जित नहीं? सचमुच इसमें हम देखते हैं (जैसा पहले समझाया जा चुका है) कि हमारा प्रभु अपनी व्यवस्था में वह सब माँगता है जो प्रेम से सम्बन्ध रखता है; जैसे, कि हम एक-दूसरे की सहायता करें, और हमारे बीच ऐसा सामान्य सम्बन्ध हो कि हर कोई अपने पड़ोसी की सहायता में अपने आप को लगा दे। जो कुछ इसके विपरीत है, वह परमेश्वर की व्यवस्था द्वारा वर्जित और दोषी ठहराया गया है। और इसलिए अब यहाँ कहा गया है; श्रापित हो वह जो अपने पड़ोसी को छिपकर मारे। इस वचन के नीचे हमारे प्रभु ने वे सब बुरे व्यवहार समेट लिए हैं जो हम अपने पड़ोसी के साथ कर सकते हैं: यहाँ तक कि यदि हम उसे चुटकी भर भी मारें, तो वह उसके सामने एक प्रकार की हत्या है। और हम देखते हैं कि जो मनुष्य अपने भाई पर केवल दाँत पीसता है, वह नरक की आग का दोषी ठहराया गया है: तो उसका क्या होगा जिसने मुट्ठी उठाई हो? निश्चय, किसी मनुष्य के विरुद्ध अपने पड़ोसी के बारे में जीभ हिलाना भी ऐसा पाप है जो भारी दण्ड के योग्य है। यदि हम केवल उपहास या तिरस्कार में घुरघुराएँ भी, तो वह वर्जित है। तो यदि हम उन पर किसी भी रीति से अत्याचार करने चलें, तो हम पर कितना अधिक दोष आएगा? इसलिए हम ध्यान दें कि यहाँ एक विशेष बात के नीचे परमेश्वर सामान्य रूप से वह सब अत्याचार, हिंसा और दुराचार समेट लेता है जो हम अपने पड़ोसियों के प्रति कर सकते हैं। और वह विशेष रूप से कहता है; गुप्त में, या छिपकर, ताकि हमें निरन्तर उस बात का स्मरण दिलाया जाता रहे जो मैं तुम से पहले कह चुका हूँ; अर्थात् यह कि इस विषय में बात मनुष्यों को लेखा देने पर नहीं टिकी है। मान लो कि हमने सब आज्ञाओं को तोड़कर अपराध किया है, फिर भी कोई हम पर इसका दोष नहीं लगाता, वरन् अधिकार स्वयं हमारे कामों को स्वीकार करता है, और जब हम पर इसका अभियोग लगाया जाता है तो हम छूट जाते हैं, या कोई हमारे किए हुए कुव्यवहारों की शिकायत करने का साहस नहीं करता: मान लो कि ऐसा ही है: तौभी परमेश्वर और ही बात कहता है; कि यदि हमने छिपकर अपने पड़ोसी की कोई हानि की है, तो उसका लहू प्रतिशोध के लिए हमारे विरुद्ध चिल्लाएगा, तब भी जब हम समझते हैं कि हम बच निकले।
और हम देखते हैं कि हाबिल के विषय में क्या कहा गया है: यद्यपि किसी ने कैन के विरुद्ध सूचना नहीं दी, न उसके विरुद्ध कोई कार्यवाही चली; तौभी मारे गए मनुष्य का लहू बोला। परमेश्वर यह नहीं कहता, "मैंने सुना है," परन्तु यह, "तेरे भाई का लहू भूमि में से मेरी ओर तेरे विरुद्ध चिल्लाता है।" तो यहाँ हम देखते हैं कि परमेश्वर हमें मनुष्य के हाथ से सहे जानेवाले किसी दण्ड की धमकी नहीं देता: वरन् हमें बताता है कि हमें उसके सामने और उसकी उपस्थिति में चलना है। और यद्यपि हम किसी सांसारिक न्याय से नहीं डरते; तौभी हमें अपने आप को छोटी लगाम में रखने से नहीं रुकना चाहिए, क्योंकि वह अपना काम करता है, और जिस प्रतिशोध की उसने यहाँ चर्चा की है वह उन सब पर अवश्य पूरा होगा जो पक्षपात के कारण बच निकले, या जिन्होंने अपने अपराध ढाँप लिए, वरन् इतनी चतुराई से अपराध किया कि कोई उसकी जानकारी तक न पहुँच सका। जब ऐसा है, तो हम देखें कि हम अपने विवेक में प्रवेश करें, और परमेश्वर की व्यवस्था वहाँ लिखी हुई रखें, ऐसे कि हमारी दृष्टि मनुष्यों पर न रहे, मानो कहें कि "मुझ पर कोई दोष नहीं लगाया गया या मुझे नहीं डाँटा गया": वरन् यह विचार करें कि हमारा परमेश्वर हम पर चौकसी रखता है, और उसके वचन का काम वैसा ही समझें जैसा इब्रानियों की पत्री में लिखा है; अर्थात् जब वह हमें सुनाया जाता है; तब सब कुछ परखा जाना चाहिए, और वह हमारे हृदयों के गुप्त से गुप्त विचारों तक पैठ जाता है। अब यदि परमेश्वर के वचन में ऐसी सामर्थ्य है: तो हम निश्चय जानें कि उसमें वह काम इससे कहीं अधिक है जो उसे सौंपा गया है। इसलिए हम इस रीति से संयमित रहें, और जब हम अपने हृदय से परमेश्वर की सेवा कर चुके हों, तो हमारा जीवन उसके अनुकूल हो, ताकि जब हम अपने प्रभु यीशु मसीह के सामने आएँ, तो हम दिखा सकें कि हमारा सच्चा मन उसकी सेवा करने का था, न कि नश्वर मनुष्यों को प्रसन्न करने का।
अब आओ, हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने दोषों को मानते हुए गिर पड़ें, और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उनके लिए सच्चा पश्चाताप दे; और इसके अतिरिक्त हमें तब तक सहता रहे जब तक वह हमें हमारे सब पापों और सब कलंकों से पूरी तरह शुद्ध न कर दे; और जो कुछ हम सुनते हैं उससे हमें ऐसा लाभ उठाने दे कि हम अधिकाधिक अपने आप का इनकार करना और अपनी बुरी अभिलाषाओं को दबाना सीखें, जब तक वह हमें फिर उस धार्मिकता की शुद्धता से न पहना दे जिसके लिए वह हमें बुलाता है। और इस प्रकार हम सब कहें; हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता, इत्यादि।
सोमवार, 9 मार्च, 1556 को।
