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155वाँ उपदेश, जो अट्ठाईसवें अध्याय पर तीसरा है
155वाँ उपदेश
जो अट्ठाईसवें अध्याय पर तीसरा है।
9 "यदि तू अपने परमेश्वर यहोवा की आज्ञाओं को माने और उसके मार्गों पर चले, तो यहोवा अपनी शपथ के अनुसार तुझे अपनी पवित्र प्रजा करके स्थापित करेगा।
10 और पृथ्वी की सारी जातियाँ यह देखकर कि तू यहोवा के नाम से कहलाता है, तुझ से डर जाएँगी।
11 और जिस देश को तुझे देने की शपथ यहोवा ने तेरे पुरखाओं से खाई थी, उसमें यहोवा तेरे गर्भ के फल, तेरे पशुओं के बच्चों और तेरी भूमि की उपज में तुझे बहुतायत से समृद्ध करेगा।
12 यहोवा अपना उत्तम भण्डार, अर्थात् आकाश, तेरे लिये खोल देगा, कि तेरी भूमि पर समय पर वर्षा बरसाए, और तेरे सब कामों को आशीष दे; और तू बहुत सी जातियों को उधार देगा, परन्तु किसी से उधार न लेगा।
13 और यहोवा तुझे सिर ठहराएगा, पूँछ नहीं; और तू केवल ऊँचा ही रहेगा, नीचा कभी न होगा; यदि तू अपने परमेश्वर यहोवा की उन आज्ञाओं को, जिन्हें मैं आज तुझे मानने और पूरी करने को सुनाता हूँ, सुनकर मानेगा।
14 और जिन बातों की आज्ञा मैं आज तुम्हें देता हूँ, उनमें से किसी से तुम दाहिने या बाएँ मुड़कर पराए देवताओं के पीछे चलकर उनकी सेवा न करना।"
मूसा, उस विषय को आगे बढ़ाते हुए जो कल निपटाया गया था, यह दिखाता है कि परमेश्वर हमें किस शर्त पर चुनता है जब वह हमें अपनी कलीसिया का जन ठहराता है: अर्थात् यह कि हम मनुष्यजाति के सामान्य शाप से अलग किए जाएँ और दूर ठहराए जाएँ। यह सच है कि परमेश्वर की भलाई जगत के सब मनुष्यों पर फैली हुई है; हम देखते हैं कि सब उसकी उदारता से पाले और सँभाले जाते हैं। परन्तु साथ ही हम यह भी देखते हैं कि मनुष्य कितने कष्टों के अधीन हैं। इसी कारण हमारा अलग किया जाना आवश्यक है, और यह भी कि परमेश्वर हम पर दृष्टि रखे और हम से विशेष प्रेम रखे, जैसे अपने ही बच्चों से रखता है: क्योंकि इसके बिना हमारा सारा जीवन अव्यवस्थित है, जैसा कि दिखाई देता है कि अभागे अविश्वासी लोगों पर परमेश्वर चाहे कितनी ही आशीषें क्यों न बरसाए, फिर भी वे उनसे लाभ नहीं उठा सकते, परन्तु सदा संदेह में पड़े रहते हैं; और यह अकारण नहीं है। जब उन्हें परमेश्वर के प्रेम का निश्चय ही नहीं, तो वे अपनी आशा किस पर टिकाएँ? वे उसे अपना पिता कैसे मानें? इसलिए यह एक ऐसा वचन है जो भली भाँति ध्यान देने योग्य है, जहाँ मूसा कहता है कि परमेश्वर ने हमें जगत की अन्य सब जातियों से अलग किया है। यह निश्चित है कि "पवित्रता" शब्द का आशय यह है कि हम में परमेश्वर का स्वरूप चमके, और हम सद्गुणी चाल-चलन में शुद्ध मन से उसकी सेवा करें; परन्तु फिर भी वह इससे आगे बढ़ता है, जैसा कि इस पाठ में करता है; अर्थात् यह कि परमेश्वर अपनी प्रजा को एक निश्चित चिह्न देगा जिससे प्रकट हो कि वे सब अन्य लोगों से बढ़कर विशेषाधिकार पाए हुए हैं। इसलिए, इस वर्तमान जीवन में मनुष्य की दशा को देखते हुए, आओ हम सदा इसी प्रतिज्ञा की शरण लेना सीखें, कि परमेश्वर ने हमें केवल आदम की सब सन्तानों के सामान्य क्रम के अनुसार नहीं रचा, परन्तु उसने हमें अपने निज भाग के लिये भी चुन लिया है। और हम इसमें तनिक भी सन्देह न करें कि वह हम पर दृष्टि रखता है और हमें यह अनुभव कराएगा कि हम उसके घराने के हैं, और वह हमारी सहायता के लिये हमारे निकट है: इस बात में हम भली भाँति दृढ़ हो जाएँ।
फिर मूसा आगे कहता है, "और लोग देखेंगे कि तेरे परमेश्वर यहोवा का नाम तेरे ऊपर पुकारा जाता है, और वे तुझ से डर जाएँगे।" यह निश्चित है कि मूर्तिपूजक परमेश्वर के नाम पर बहुत डींग मार सकते हैं, और हम देखते हैं कि वे उसका बहाना कैसे बनाते हैं, यहाँ तक कि उसी के विरुद्ध लड़ते हुए भी, जब वे सारी शिक्षा को ठुकरा देते हैं। क्योंकि वे जंगली पशुओं के समान उग्र होते हुए भी चाहते हैं कि कलीसिया में गिने जाएँ। परन्तु मूसा यहाँ "पुकारा जाना" शब्द को नाम धरे जाने या कहलाए जाने के अर्थ में लेता है; और वह भी सच्चाई से; उसका अर्थ यह है कि वे लोग सचमुच और वास्तव में परमेश्वर के नाम से कहलाते थे, या उसकी प्रजा कहे जाते थे। यदि हम अपने परमेश्वर के भय में चलें और अपने जीवन को उसके बुलावे के अनुसार ढालें, तो तब प्रकट होगा कि वह व्यर्थ ही अपने आप को हमारा परमेश्वर नहीं कहता, और हमें अपनी प्रजा होने का दावा नहीं करता। अब यह निश्चित है कि यह शब्द मानकर चलता है कि हम परमेश्वर की शरण में उसकी सुरक्षा के अधीन होकर जाते हैं। क्योंकि कहा जाता है कि मनुष्य पर किसी राजा का नाम पुकारा जाता है या वह उसके नाम से कहलाता है, जब वह उसकी प्रजा बन जाता है और उसकी रक्षा में रहता है। उसी प्रकार कहा जाता है कि विश्वासियों पर परमेश्वर का नाम पुकारा जाता है, क्योंकि वे अंगीकार करते हैं कि वे उसके हैं, और वहाँ वे उसके पंखों के नीचे सब प्रकार से सुरक्षित हैं। और यह तब तक नहीं हो सकता जब तक हम परमेश्वर को न पुकारें और अपनी सब आवश्यकताओं में उसकी शरण न लें। परन्तु यह साहस कहाँ से आता है, कि हम इस बात पर घमण्ड करें: कि हम सब से बढ़कर परमेश्वर के हैं? क्योंकि हम जानते हैं कि स्वभाव से मनुष्यों की दशा एक सी है। तो फिर उन लोगों की अपेक्षा हमें क्यों प्रधानता दी गई जो उसी वंश से उत्पन्न हैं? यह परमेश्वर के चुनाव से होता है: इसका आरम्भ हम से नहीं हो सकता। क्योंकि ऐसा कौन है जो अपने आप को ऊँचा उठाकर परमेश्वर के उतना निकट आ जाए जितना दूसरे आते हैं? कोई मनुष्य अपने साथ कौन सी योग्यता ला सकता है? कोई नहीं। तब परमेश्वर को अपनी ही निरी भलाई से हमें चुनना होगा: और जब वह अपने आप को हमारा परमेश्वर प्रकट कर चुका है, तब हम भी अपनी ओर से पूरे भरोसे के साथ और बिना सन्देह के निडर होकर उसका नाम ले सकते हैं। अब हम देख चुके कि इस वाक्य का सार क्या है। और मूसा यह प्रकट करना चाहता है कि परमेश्वर जिन्हें अपने बच्चों के रूप में गोद लेता है, उन्हें कैसी श्रेष्ठता देता है: अर्थात् यह कि यद्यपि वे अन्य मनुष्यों के बीच मिले हुए हैं और अनेक कष्टों से घिरे हुए हैं, तौभी वे उसके हाथ और सुरक्षा में रहकर बचाए जाते हैं, इसी कारण कि वह उन्हें अपने घराने का जन मानकर थामे रहता और उनका दावा करता है: और इसका कोई और कारण नहीं, केवल उसकी अपनी ही प्रसन्नता है। इसलिए जब हम देखें कि शैतान हमारे विरुद्ध अपनी पूरी सामर्थ्य से सब कुछ कर रहा है, तब आओ हम साहस के साथ उसे ललकारें, और अपने आप को इस जगत के सब खतरों से निश्चिन्त जानें, क्योंकि परमेश्वर ने हम पर ऐसा अनुग्रह किया है कि हमें भाग्य के भरोसे नहीं छोड़ा, जैसा अविश्वासी कल्पना करते हैं। और क्यों? क्योंकि हम उसके लिये एक पवित्र प्रजा हैं। और यह श्रेष्ठता हम कहाँ से लाएँगे? हमारे पास यह इसलिए है कि उसने हमें साक्षी दी है कि वह हमारा परमेश्वर है। यदि हमने उसकी ओर से यह वचन न पाया होता, तो हम सदा असमंजस में रहते, इस और उस पर प्रश्न उठाते हुए हम सदा सन्देह करते रहते, और हमारा जीवन मानो एक धागे से लटका रहता; जैसा कि हम इसी अध्याय में देखेंगे। परन्तु जब परमेश्वर ने हम पर अपना पितृवत् प्रेम प्रकट किया है, और उसने अपना मुँह खोलकर हमें समझाना चाहा है कि उसने हमें अपने निकट आने की सहज पहुँच दी है: जब (मैं कहता हूँ) हमें ऐसा निश्चय प्राप्त है: तो आओ हम उसे पुकारें (अर्थात्) हम इस पर गर्व करने में सन्देह न करें: कि वह हमारा उद्धारकर्ता है: और कि जब हम उसके हैं तो हम नाश नहीं हो सकते। तौभी चौकस रहें कि हम परमेश्वर का नाम झूठे रूप से न पुकारें, जैसा वे सब करते हैं जो उसका दुरुपयोग करते हैं और इस बीच उसका उपहास करते और उसकी महिमा को तुच्छ जानते हैं। यदि हम परमेश्वर के नाम का दावा करते हैं, तो इसलिए करें कि हम उसकी प्रतिज्ञाओं पर आधारित हैं और उन्हें विश्वास के द्वारा ग्रहण कर चुके हैं: और तब हम उसे पुकारें, वही हमारा शरणस्थान हो, और हम व्यर्थ की डींग मारने में न लगें जैसे वे लोग जो समझते हैं कि उनके लिये केवल मसीही कहलाना ही बहुत है। नहीं, बल्कि आओ हम अपने परमेश्वर के बुलावे का अनुसरण करें: जैसा मूसा यहाँ दिखाता है; कहता है: "यदि तू अपने परमेश्वर की आज्ञाओं को मानेगा, जैसा मैंने आज तेरे सामने रखा है।" क्योंकि यह उचित ही है कि जब परमेश्वर ने अपने आप को हमारे प्रति ऐसा बाँध लिया है, तो हम भी अपनी ओर से उसके निर्देश के अधीन अपने को सौंप दें। और हम केवल मुँह से अंगीकार न करें कि हम उसकी प्रजा हैं, वरन् अपने सारे जीवन को उसके अनुसार ढालकर यह प्रकट भी करें, और उसकी आज्ञाओं का पालन करके यह प्रमाणित करें कि जो अनुग्रह उसने हमें दिया, उसे हमने ग्रहण किया है: क्योंकि उसका सच्चा प्रमाण यही है।
अब वह आगे कहता है, "कि और लोग देखेंगे कि परमेश्वर का नाम हम पर पुकारा जाता है, और वे हम से डरेंगे।" हमारे लिये यह पर्याप्त नहीं कि परमेश्वर हमें प्रतिज्ञा देता है कि हमें अनुभव कराएगा कि हम उसकी रखवाली में हैं: परन्तु वह कहता है कि अन्यजाति के लोग भी, जो हमारे प्राणघातक शत्रु हैं और उसकी महिमा को तुच्छ जाननेवाले हैं, इसे जानने पर विवश किए जाएँगे। अब यह निश्चित है कि अविश्वासी परमेश्वर की भुजा को उस रीति से नहीं जानते जैसी हमें जाननी चाहिए: वे उससे बहुत दूर रह जाते हैं। क्योंकि देखते हुए भी वे कुछ नहीं देखते: तो फिर यह कैसे सम्भव है कि वे समझें कि परमेश्वर ने हमें आशीष दी है, कि हम उसके अनुग्रह से जीते हैं, और कि हम उसके खर्च पर पाले जाते हैं? क्योंकि वे मन्दबुद्धि हैं और यह नहीं सोचते कि कोई वस्तु परमेश्वर के हाथ से उन्हें मिलती है। हम भली भाँति देखते हैं कि अविश्वासी कैसे खिलाए और पहनाए जाते हैं; वे सूर्य के प्रकाश का आनन्द लेते हैं, हाँ, और उनके पास धन-सम्पत्ति की भी बहुतायत होती है। परन्तु परमेश्वर की आराधना और उसकी खोज के विषय में उनके बीच कोई समाचार तक नहीं। और यदि अपने परमेश्वर के उपकारों को तुच्छ जानने के अतिरिक्त उन्हें यह समझ भी नहीं कि वे उन्हें कहाँ से मिलते हैं: तो वे कैसे जानेंगे कि परमेश्वर का नाम हम पर पुकारा जाता है? उनका इसे जानना मन के किसी निश्चय या उस सच्ची समझ से नहीं जैसी हमें होनी चाहिए: परन्तु मूसा कहता है कि यह उन्हें उनके मुँह पर प्रमाणित कर दिया जाएगा: जैसे, उदाहरण के लिये, हम देखते हैं कि दुष्ट लोग विश्वासियों को फलता-फूलता देखकर और यह देखकर कि परमेश्वर उन्हें सँभाले और बचाए रखता है, दाँत पीसते हैं। और यह कहाँ से होता है? सचमुच वे इस पर चकित हो जाएँगे: और वे यह सोचे बिना नहीं रह सकेंगे कि परमेश्वर विरोधी पक्ष पर कृपालु है: इसलिए नहीं कि वे इस पर स्थिर होते हैं या अपने हृदय में ठीक रीति से इसका निश्चय करते हैं: परन्तु इसलिए कि वे अपने भीतर घबरा जाते हैं।
वह कहता है कि वे जान लेंगे कि परमेश्वर का नाम हम पर [या पुकारा] धरा जाता है: और यह उन्हें भयभीत कर देगा। क्योंकि यद्यपि वे परमेश्वर का भय नहीं मानते, तौभी वह उन्हें गुप्त रीति से लगाम लगाए रखता है, यहाँ तक कि जब वे उसके लोगों के विरुद्ध कुछ करना चाहते हैं, तो कर नहीं सकते, क्योंकि वे अपना साहस टूटा हुआ पाते हैं। यह आश्चर्य की बात है कि परमेश्वर कभी-कभी दुष्टों को यहाँ तक ढील दे देता है कि वे हम पर अपने क्रोध का झाग उगल दें: वे जो कर सकते हैं सोचते हैं, और अपनी द्वेष-भावना पूरी करते हैं। परन्तु जब वे ऐसा एक बार कर चुकते हैं: तब प्रकट होगा कि वे उसके अधीन हैं, और उसका सामना नहीं कर सकते। और इसका कारण क्या है? यदि परमेश्वर अविश्वासियों को उनकी अपनी मनमानी करने देता, तो निश्चय है कि जगत तीन दिन भी न टिकता, वरन् वे सब कुछ अपने सामने रौंद डालते। इसलिए आवश्यक है कि वह उन्हें किसी गुप्त लगाम से रोके रखे और उनकी उद्दण्डता को पूरी छूट न दे। और यह हम अपनी आँखों के सामने देखते हैं। यह कहाँ से हुआ कि पिछले इन बीस-तीस वर्षों में हमें एक लाख बार निगल नहीं लिया गया? केवल परमेश्वर की रक्षा से, जो दिखाई देनेवाले चिह्नों में नहीं, परन्तु इसमें है कि वह दुष्टों को, उनकी सारी दुष्टता के होते हुए भी, मानो बन्दीगृह में गुप्त रीति से थामे रखता है। इसी कारण जब वे कुछ युक्ति निकालते हैं, तो वह पानी की नाईं बह जाती है, उनके सब विचार लोप हो जाते हैं, और वे मानो टूटी हुई बाँहों के साथ पड़े रहते हैं, और यद्यपि बड़े-बड़े काम हाथ में लेते हैं, तौभी अपना उद्देश्य पूरा नहीं कर पाते। इस प्रकार तुम देखते हो कि मूसा का क्या आशय था जब उसने कहा कि दुष्ट (क्योंकि वे हमारे शत्रु हैं) जान लेंगे कि परमेश्वर का नाम हम पर पुकारा जाता है, और इससे भयभीत हो जाएँगे। इससे हम देखते हैं कि परमेश्वर की शरण लेने के समान कोई गढ़ या रक्षा नहीं। जब तक वह हमें बचाने का भार अपने ऊपर लिए है, आओ हम साहस से भरोसा रखें कि हम सुरक्षित खड़े हैं, हाँ, चाहे दुष्ट हमारे विरुद्ध षड्यन्त्र रचें, और घात लगाए और ताक में बैठे रहें: तौभी हम मानो एक अजेय गढ़ में होंगे, बस हम अपने परमेश्वर का नाम पुकार सकें, और अपने भीतर पूर्ण निश्चय रखें कि वह हमें अपनी प्रजा मानता है, जिसके लिये हमारे पास पक्का प्रमाण है, बशर्ते हम अपना वह विश्वास भंग न करें जो हमने अपनी ओर से उससे ठहराया है। परन्तु हमें परमेश्वर की रक्षा को दुष्टों से भिन्न रीति से अनुभव करना चाहिए; अर्थात् उसका वचन सुनकर, हमें उस अनुग्रह को ग्रहण करना चाहिए जो हमारे सामने रखा गया है, और पूरी तरह उसी पर टिक जाना चाहिए। उसी रीति से हमें निश्चय होना चाहिए कि परमेश्वर का नाम हम पर पुकारा जाता है।
अब मूसा फिर दोहराता है जो उसने गर्भ के फल, पशुओं और भूमि के विषय में कहा था। सचमुच यह पर्याप्त होता कि एक ही बार प्रतिज्ञा कर दी जाती कि सब शारीरिक आशीषें परमेश्वर की ओर से आती हैं। परन्तु एक ओर हम मनुष्यों में अविश्वास देखते हैं, कि जब परमेश्वर उनसे बात करता है, तब भी वे तर्क और प्रत्युत्तर करना नहीं छोड़ते: "हाँ, पर क्या हम इसके विषय में निश्चित हो सकते हैं?" और इसलिए हमें भली भाँति निश्चय दिलाने के लिये परमेश्वर उस बात को पक्का करता है जो उसने कही थी। फिर, हम अपनी कृतघ्नता भी ऐसी देखते हैं कि जो कुछ परमेश्वर ने हमारे लिये किया है, उसे हम भाग्य के और अपनी कुशलता और परिश्रम के नाम लिख देते हैं। इसलिए वह हमें अपनी ओर बुलाता है और दिखाता है कि यह वही है जो करता है: और दूसरी ओर, वह चाहता है कि हम समझें कि यदि हम सब बातों में सफल होना चाहते हैं, तो हमें उसकी सुननी और उसकी आज्ञा माननी होगी। क्योंकि सब मनुष्य, यहाँ तक कि जगत के सबसे दुष्ट भी, अपने शरीर की सन्तान, पशुओं की वृद्धि और बड़ी आमदनी चाहते हैं। परन्तु क्या? इस बीच हम सब भलाई के कर्ता परमेश्वर को तुच्छ जानते हैं, और ऐसा प्रतीत होता है मानो हम जानबूझकर उसके हाथ को अपने से दूर धकेलने का यत्न करते हैं: यह वैसा ही है जैसे मैं किसी मनुष्य से भीख माँगूँ और वह मेरे कान पर थप्पड़ मार दे: या जैसे वह मेरी सहायता को आए और मैं उसके मुँह पर थूक दूँ: हम अपने परमेश्वर के साथ ऐसा ही व्यवहार करते हैं। इसलिए परमेश्वर, हम में ऐसी द्वेष-भावना देखकर, और यह देखकर कि हम पहली बार में सिखाए नहीं जा सकते, वरन् जो वह कहता है उससे अपने कान बन्द कर लेते हैं, वही बातें फिर दोहराता है जो वह पहले हम से कह चुका था। इसके द्वारा वह हमें चेतावनी देता है कि यदि हमें किसी वस्तु की घटी हो, तो उसका दोष हम अपने ही पाप पर रखें, उस पर नहीं। क्यों? क्योंकि वह अपनी ओर से हमें हमारे शरीर की सन्तान में भी, भूमि की उपज में भी, और पशुओं में भी आशीष देने को तैयार है, और हमारे लिये पर्याप्त उदार और धनी है, और जो आशीषें उसके अधिकार में हैं, उनमें वह हमारे प्रति तंगदिल न होगा। इसलिए जब वह अपने उपकार रोक लेता है और हमें उतने भरपूर नहीं देता जितने हम चाहते हैं, तो आओ हम मान लें कि दोष हम में है।
फिर, यह एक उल्लेखनीय कथन है जब वह कहता है, "कि परमेश्वर अपना उत्तम भण्डार, अर्थात् आकाश, खोल देगा, कि हमें वर्षा दे, जिससे भूमि अन्न उपजाए।" यहाँ मूसा प्रकृति का वह क्रम सामने रखता है जिसे हम अपनी आँखों से देखते हैं, कि हम और भली भाँति समझें कि परमेश्वर कैसे हमारा पिता और पालनकर्ता है: और कि यद्यपि जिस भोजन से हम पलते हैं वह भूमि से इकट्ठा किया जाता है: तौभी सब वस्तुएँ केवल परमेश्वर ही भेजता है। कैसे? भूमि को तो स्वभाव दिया गया है कि फल उपजाए; परन्तु यदि वह सूखी ही रहे, तो क्या होगा? हम देखते हैं कि जब तक वर्षा और ओस दोनों न पड़ें, भूमि फट जाती है, मानो चिल्लाकर कह रही हो कि मैं प्यासी हूँ, और नमी के अभाव में सूख जाती है। और इसी कारण दाऊद, परमेश्वर के अनुग्रह की अपनी तीव्र अभिलाषा प्रकट करने के लिये यह उपमा काम में लाता है, और कहता है: "हे प्रभु, मैं तेरे लिये सूखी भूमि के समान हूँ।" हम अपनी आँखों के सामने देखते हैं कि नमी के अभाव में भूमि कैसे बंजर हो जाती और झुलस जाती है, और अन्त में उसमें न बल रहता है न सार। यदि परमेश्वर को यही भाता, तो क्या वह भूमि को ऐसा गुण नहीं दे सकता था कि उसमें स्वयं ही पर्याप्त सार हो? क्योंकि जैसा हम उत्पत्ति में पढ़ते हैं, आरम्भ में ऐसी वर्षा नहीं होती थी जैसी इन दिनों होती है: परन्तु परमेश्वर ने कोई भाप उठवाई कि भूमि को सींचे: और क्या वह अब भी वैसा ही नहीं कर सकता, या यह नहीं कि भूमि में नीचे से कोई निश्चित नमी उठे? और सचमुच, वर्षा कहाँ से आती है? यदि तुम दार्शनिकों से पूछो, तो वे कहेंगे कि वर्षा उन भापों से होती है जो भूमि से उठती हैं, और वायु में खींची जाकर फिर भूमि पर बरसाई जाती हैं। तो दार्शनिकों के मत के अनुसार भापें ऊपर उठती हैं: परन्तु अब ऐसा क्यों है कि परमेश्वर आकाश से वर्षा तब तक नहीं दिला सकता जब तक वह पहले भूमि से न निकले: या भूमि अपनी वह नमी रोके नहीं रख सकती जो उसमें है, कि उसमें सदा अपना ही बल और सार बना रहे? इन भापों के उठने का कारण क्या है, कि जब भूमि उन्हें छोड़ चुकती है, तो वे वायु में मानो मशकों में टँगी रहती हैं: जैसा भजन में कहा गया है? इस सब का कारण क्या है? यह इसलिए है कि वह हमें ऐसा मन्दबुद्धि और स्थूल देखता है कि यद्यपि वह मानो उँगली से दिखा देता है कि सब भलाई हम उसी के हाथ से पाते हैं; तौभी उसका आशय है कि हम इसे और प्रत्यक्ष रीति से पहचानें। और इसी कारण वह यह भी कहता है, "कि वह आकाश की सुनेगा, और आकाश भूमि की सुनेगा, और भूमि अन्न की, और उन सब बीजों की जो उसे सौंपे गए हैं।" जब किसान अपना अनाज भली भाँति बोता है, तो मानो उसे बन्दीगृह में डाल देता है: और वह मानो भूमि की दया पर होता है। तब भूमि को अन्न को गर्भ में धारण करना, उसे पोसना, उसे उगाना, और इसी प्रकार उसे सार भी देना होता है। परन्तु क्या भूमि अन्न की सुनती है? वह बहरी है: अर्थात् जब तक दूसरों से उसकी सुनी न जाए, उसमें उसे बढ़ाने की कोई शक्ति नहीं। और यह कैसे? भूमि, जैसा मैं कह चुका, आकाश की ओर ताकती है, और एक प्रकार से अपना मुँह खोलती है, भीषण गर्मी में फट जाती है, और जैसा चाहिए वैसा सींची नहीं जाती। तब आकाश को भूमि को उत्तर देना पड़ता है। आकाश? वह क्या कर सकता है? क्या आकाश जल दे सकता है? उसके पास कुछ नहीं, जब तक परमेश्वर अपनी गुप्त सामर्थ्य से उसे उसकी ओर न खींचे। वास्तव में हम आगे देखेंगे कि परमेश्वर कैसे पीतल का आकाश देने की धमकी देता है: तब आवश्यक है कि परमेश्वर आकाश की सुने, और हम वहीं जाएँ। इसलिए जब-जब वर्षा होती है, हमें समझना चाहिए कि परमेश्वर अपने भण्डार खोलता है, जो अन्यथा बन्द रहते हैं। परमेश्वर (जैसा मैं कह चुका) बिना वर्षा या ओस के भी भूमि से फल उपजा सकता था: परन्तु वह ऐसे साधन काम में लाता है जो वह हमारी मन्दता के लिये उचित जानता है: और वह यह इसलिए करता है कि हमारे पास कोई बहाना न रहे: कि यदि हम उसके प्रति कृतघ्न हों और ऐसे प्रत्यक्ष विषय से अपनी आँखें मूँद लें: तो अन्तिम दिन हम उतने ही अधिक दोषी ठहरें, और उस बात को जानने से इनकार करने की जिसे हमें भली भाँति जानना चाहिए था, अपनी हठ का लेखा देना हमारे लिये निश्चित हो। इस प्रकार तुम देखते हो कि हमें क्या स्मरण रखना है।
इसी कारण संत पौलुस उस अज्ञान के विषय में बोलते हुए, जो सुसमाचार के प्रचार से पहले पुराने जगत में था, कहता है कि सब जातियाँ पशुओं के समान भटक गईं। और इसका कारण क्या था? क्योंकि वह शिक्षा अभी नहीं सिखाई गई थी, जो हमें उद्धार का मार्ग दिखाने वाली सच्ची ज्योति है, जैसा हम तीसवें अध्याय में देखेंगे। तौभी वह आगे कहता है कि परमेश्वर ने फिर भी अपने आप को बिना साक्षी के न छोड़ा। और उसका यह वाक्यांश कहना "उसने अपने आप को बिना साक्षी के न छोड़ा" मानो यह कहना है: क्यों? क्योंकि उसने भूमि पर ठीक समय और ऋतु में वर्षा भेजी; उसने अच्छा मौसम भी भेजा। ये परमेश्वर के साक्षी हैं, जो घोषणा करते हैं कि जैसे उसने जगत को रचा, वैसे ही वह उसे थामे और बनाए रखता है: ये वे साक्षी हैं जो ऊँचे और स्पष्ट स्वर में कहते हैं कि जो भी भोजन वह हमें देता है, उसके लिये हमें परमेश्वर की ओर ताकना चाहिए। और इसी कारण मैंने कहा था कि हमें इस वचन पर भली भाँति ध्यान देना चाहिए: कि परमेश्वर अपने भण्डार खोलेगा। क्योंकि यद्यपि हम देखते हैं कि परमेश्वर ने इस जगत में कितनी बड़ी सम्पत्ति रखी है, कैसे-कैसे प्रकार के पशु, कौन सी जड़ी-बूटियाँ, कौन से वृक्ष, और अन्य सब वस्तुओं की कितनी संख्या: तौभी ये सब वस्तुएँ नाश हो जातीं, यदि परमेश्वर प्रतिदिन स्वर्ग से वे वस्तुएँ न भेजता जो इस जीवन की रक्षा के लिये आवश्यक हैं। क्या हम उद्धारकर्ता की ज्योति के बिना तीन दिन भी रह सकते थे? यदि परमेश्वर हर बीज को प्राकृतिक गुण न देता, तो वह क्या होता? हम शीघ्र नाश हो जाते। और यदि और कोई बात न होती सिवाय उसके जो मैंने अभी भूमि के विषय में कही, तो वह शीघ्र सूख जाती, जब तक परमेश्वर उसका उपाय न करता। ये ही वे उत्तम भण्डार हैं जो परमेश्वर हमें देता है। और जब उसकी इच्छा होती है कि हमारे प्रति अपने आप को पिता प्रकट करे, तो वह आकाश को हमारे सामने फैला देता है, कि हम उसे वहाँ देखें। और यह ऐसा है मानो परमेश्वर हमारी ठुड्डी उठाकर कहे: "बेचारे प्राणियो, जब तुम भोजन चाहते हो, तो तुम देखते हो कि तुमने भूमि में पर्याप्त अनाज डाला या नहीं। सचमुच, यह वह बात है जिस पर तुम्हें ध्यान देना है: परन्तु सब से पहले तुम्हें ऊपर जाना और अपनी आँखें मेरी ओर उठानी चाहिए, और स्वयं प्रकृति भी तुम्हें ऐसा करने पर विवश करती है। क्योंकि तुम जानते हो कि बिना वर्षा के भूमि फल नहीं दे सकती। इसलिए जो बातें मैं तुम्हें दिन-प्रतिदिन दिखाता हूँ और जिनके विषय में अनुभव से तुम कायल किए जाते हो, उन्हें न भूलो। यही वह उत्तम भण्डार है जिसकी चर्चा मूसा करता है: और वह स्पष्ट रूप से जोड़ता है, आकाश। किस कारण? क्योंकि यदि वह कहता, परमेश्वर अपनी उदारता ऊपर से भी और नीचे से भी प्रकट करेगा; तो निश्चय यह हमें सन्तुष्ट कर देना चाहिए था: परन्तु फिर भी हमारी दुर्बलता के कारण हम देखते हैं कि परमेश्वर को बात और स्पष्ट रूप से कहनी पड़ती है: जैसे वह यह भी दिखाता है कि हमें उसी के पास आना है, और आकाश की ओर आँखें उठानी हैं क्योंकि वह हमें वहीं बुलाता है, और उसने ऐसा क्रम ठहराया है कि वह चाहता है कि हम अपने आप को बंजर और भूख के मारे लोगों के समान समझें, जब तक वह अपनी भलाई हम पर ऊपर से उण्डेल न दे।
अब इस उत्तम भण्डार की चर्चा करके वह कहता है: "वह ठीक समय पर वर्षा देगा, और तेरे हाथों के काम [या परिश्रम] को आशीष देगा।" ठीक ऋतु की चर्चा करके वह हमें दिखाता है कि परमेश्वर का हमें ठीक समय पर वर्षा देना एक विशेष चिन्ता से होता है। क्योंकि कभी-कभी वर्षा बहुत हानिकारक होती है, जैसा हम अपनी आँखों के सामने देखते हैं। इससे हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि यदि परमेश्वर में वर्षा को रोकने की सामर्थ्य और कौशल न होता, तो भूमि की उपज और मनुष्यों की देह भी सड़ जातीं। वर्षा अपने आप क्या करती है? वह केवल सड़न उत्पन्न करती है। दूसरी ओर हम देखते हैं कि वर्षा ऋतु पर ताज़ा कर देती है और भूमि को बल देती है, जिससे हम देखते हैं कि हमें भोजन देना परमेश्वर का भण्डार है। और यह क्यों? क्योंकि परमेश्वर जानता है कि हमारे लिये भला है, इसलिए वह वर्षा बरसाता है। इसलिए जब हम बेमौसम वर्षा देखें, तो आओ हम ध्यान दें कि परमेश्वर हमें कैसे दिखाता है कि हमारे लिये अत्यन्त आवश्यक है कि वह हम पर दृष्टि रखे, और कि वर्षा की एक बूँद भी उसकी आज्ञा के बिना न गिरे; उसी के अनुसार जो हम पहले सुन चुके हैं, अर्थात् कि वह जल को ऊपर मानो मशकों में थामे रखता है। बादल भयानक मशक हैं। परन्तु भविष्यद्वक्ता चाहता है कि हम विचार करें कि वर्षा का वहाँ बन्द रखा जाना एक अद्भुत सामर्थ्य से ही होता होगा, नहीं तो हम तुरन्त डूब जाते: कम से कम वह हमें सड़ाने के ही काम आती, जैसा मैं कह चुका। और यहाँ प्रसंगवश हमें चेतावनी दी जाती है, जैसा आगे कहा जाएगा, कि हम अपने पापों और अपराधों पर विचार करें: और यह सोचें कि जब परमेश्वर हमें असाधारण वर्षा देता है, तो वे हमारे अपराधों के दण्ड हैं। फिर, जब वर्षा ठीक समय पर आती है, तो आओ हम मानें कि एक बूँद भी परमेश्वर की ठहराई हुई बात के बिना नहीं गिरती, और अपने आप को निश्चय दिलाएँ कि वह हमारे लिये आवश्यक है। इसी कारण मूसा ने उस वचन को स्पष्ट रूप से जोड़ा।
तब वह कहता है कि परमेश्वर हमारे हाथों के परिश्रम को आशीष देगा: कि हम समझें (जैसा उसने अन्य पाठ में दिखाया है) कि हमारा अपना श्रम और परिश्रम हमें नहीं खिलाता, जैसा हमने आठवें अध्याय में देखा, जहाँ वह यों कहता है: "जब तू उस देश में पहुँचे जो परमेश्वर तुझे देता है, तब स्मरण रखना कि चालीस वर्ष तक तू उस मन्ना से पाला गया जो स्वर्ग से गिरा, इसलिए कि तू यह न कहे: मेरे ही परिश्रम से मुझे मिलता है।" इसलिए आओ हम इन पाठों से सीखें कि जब हमने परिश्रम किया है और भूमि जोतने में अपना श्रम लगाया है, और जो कुछ आवश्यक दिखाई देता है उस सब का ध्यान रखा गया है: तौभी हमें अपनी आँखें ऊपर उठानी चाहिए, और अपनी ही धारणा में अड़े रहकर यह न कहना चाहिए, "मैंने यह किया है, यह मेरा ही श्रम और युक्ति है," वरन् मानना चाहिए कि बढ़ाना परमेश्वर का काम है, और कि उसके बिना हमारा सारा श्रम व्यर्थ है: जैसे हम अपने हाथ-पाँव तोड़ भी लें, तौभी आगे बढ़ने के बदले हम पीछे ही हटते जाएँ। जो बात परमेश्वर हमें दिखाना चाहता था उसका सार यह है कि हमें पूरी दीनता से परिश्रम करना चाहिए, और जब हम में से हर एक अपनी जीविका के लिये परिश्रम कर चुका हो, तो समझें कि सफलता देना हमारे वश में नहीं, परन्तु परमेश्वर को ही उसे पूरी तरह चलाना और उसका अच्छा परिणाम देना है: केवल भूमि की उपज में ही नहीं, वरन् अन्य सब बातों में सामान्य रूप से। इसलिए जब कोई मनुष्य किसी भी प्रकार के काम में लगे, तो वह अहंकार के साथ उसमें न लगे; परन्तु परमेश्वर को पुकारे कि वह उसकी सहायता करे, और कहे, "हे प्रभु, तेरी इच्छा है कि मैं परिश्रम करूँ: अच्छा, मैं उसमें लगता हूँ; परन्तु मैं जानता हूँ कि जब तक तू मेरी अगुवाई न करे और मुझे अच्छी सफलता न दे, मैं सफल न होऊँगा: अपने निरे अनुग्रह और भलाई से मेरे परिश्रम को सफल कर।" यही बात है जिसकी चेतावनी हमें इस पाठ में दी जाती है। इसलिए हम यह न समझें कि मनुष्य की चिन्ता और कुशलता, या उसका श्रम और यत्न भूमि को उपजाऊ कर सकता है: परन्तु परमेश्वर की आशीष ही सब पर राज्य करती है। तौभी यह हमें हमारे कर्तव्य का स्मरण दिलाता है, अर्थात् यह कि परमेश्वर हमारी ऐसी सहायता करेगा कि हम निठल्ले न रहें, क्योंकि हम लकड़ी के कुन्दे नहीं बनाए गए: मनुष्यों को (मैं कहता हूँ) अपने आप को लगाना चाहिए जब परमेश्वर उनसे अपनी आशीष की प्रतिज्ञा करता है। क्योंकि ये दो बातें साथ चलती हैं, अर्थात् यह कि प्रभु तुझे आशीष देगा, और फिर भी यह कि वह चाहता है कि तू परिश्रम भी करे। यह निश्चित है कि परमेश्वर हमें खिला सकता है, चाहे हमारी बाँहें टूटी हों, वह हमें बिना किसी चिन्ता के, और बिना अपने घराने के पालन-पोषण की सुध लिए, जिला सकता था: परमेश्वर (मैं कहता हूँ) हमें मुफ़्त में भोजन दे सकता था: परन्तु उसकी इच्छा है कि हमें चिन्ता और परिश्रम में लगाए, और कि हर मनुष्य अपने व्यवसाय के अनुसार उस काम में लगे जो उसे अपने लिये उचित दिखाई दे। मैं कहता हूँ कि परमेश्वर का अपनी आशीषों को परिश्रम के साथ जोड़ना यह दिखाने के लिये है कि वह नहीं चाहता कि हम आलसी बनें, कि हर कोई हाथ पर हाथ धरे बैठा रहे, और न भूमि जोतने में लगे न किसी अन्य धन्धे में, और लगाम अपने दाँतों में दबा ले: परन्तु यह कि हम परमेश्वर को यह आदर दें, कि कहें, "हे प्रभु, यद्यपि हमने जो हो सका वह किया, तौभी वह कुछ नहीं, जब तक तेरी कृपामय भलाई उसे न चलाए।" परन्तु यह बात बुरी रीति से व्यवहार में लाई जाती है। क्योंकि हम देखते हैं कि मनुष्य परमेश्वर के अनुग्रह को इस बहाने से धुँधला करने पर तुले रहते हैं कि वे आप कुछ करते हैं: क्योंकि वे अपने आप को ऐसा ही भरमाते हैं।
और यह शैतानी अहंकार केवल हमारी देह के भरण-पोषण की बातों में ही नहीं, वरन् हमारी आत्माओं के उद्धार के विषय में भी है। स्वतन्त्र इच्छा की नींव किस पर रखी गई है? इसी पर, कि परमेश्वर मनुष्यों से माँगता है कि वे भलाई करने का यत्न और परिश्रम करें, परीक्षाओं का सामना करें, ऐसी उत्कट धुन रखें कि अपने आप को पूरी तरह उसे सौंप दें, और अपने आप को त्याग दें। क्योंकि परमेश्वर ये सब बातें माँगता है, इसलिए प्रतीत होता है कि हम उन्हें कर सकते हैं। हाँ, परन्तु हम यह नहीं सोचते कि परमेश्वर अपनी सारी आज्ञाओं के साथ यह भी कहता है कि वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा कार्य करता है, यहाँ तक कि उसे अपनी व्यवस्था हमारे हृदयों में लिखनी और हमारे मनों में खोदनी पड़ती है, और हमें उसी चाल चलाना पड़ता है जैसी वह आज्ञा देता है। हाँ, यह सच है, पर इसके साथ हमें भी अपना यत्न करना चाहिए। और वह यत्न कहाँ से आता है? ये अभागे नहीं समझते कि हमें आगे बढ़ाने और उभारने वाला परमेश्वर ही है, और कि जितना यत्न मनुष्य करते हैं, वह इसी में है कि वे पवित्र आत्मा के साधन हों। अब जब कि कर्म के इस बहाने के नीचे हम और कुछ नहीं, केवल परमेश्वर के अनुग्रह को धुँधला करना चाहते हैं, तो हमें इस शिक्षा पर और भी अधिक परिश्रम से ध्यान देना चाहिए, जिसके द्वारा परमेश्वर हमें उभारता है और चाहता है कि हम कार्य करें, और साथ ही दिखाता है कि जब तक वह हमें अच्छी सफलता न दे, हम कुछ लाभ नहीं पा सकते। निश्चय हाथ के काम में और उस में जो विश्वासी भली रीति से जीने का यत्न करते हुए करते हैं, बड़ा भेद है। क्योंकि (जैसा मैं कह चुका) मनुष्य स्वभाव से परिश्रम करने के लिये रचे गए हैं: परन्तु हम ऐसे दुष्ट और हठीले हैं कि परमेश्वर की आज्ञा मानने के बदले हम परमेश्वर को अप्रसन्न करने के सिवाय किसी काम के नहीं, जब तक वह हमें सुधारकर नई सृष्टि न बना दे। इसलिए परमेश्वर केवल तभी हमारे परिश्रम को आशीष नहीं देता जब हम अपने पवित्र आत्मा के अनुग्रह से उसकी सेवा का यत्न करते हैं: परन्तु हम उसी की सामर्थ्य से परिश्रम भी करते हैं, जैसे वह हमारी अगुवाई और संचालन करता है। इस पाठ के विषय में जो हमें स्मरण रखना है, उसका सार यही है।
अब यह भी कहा गया है, कि परमेश्वर उन्हें, अर्थात् उन्हें जो उसकी सेवा का यत्न करते हैं, सिर ठहराएगा, पूँछ नहीं: वह उन्हें ऊपर रखेगा, नीचे नहीं। यह मानो सारी समृद्धि का शिखर है। अब निश्चय यह अधिक उचित था (जैसा कल इसकी चर्चा हुई) कि व्यवस्था के अधीन प्राचीन पिताओं को क्षणिक जीवन के विषय में हम से अधिक प्रतिज्ञाएँ मिलें। क्योंकि उन्हें स्वर्गीय जीवन का वैसा प्रकाशन नहीं मिला था जैसा सुसमाचार में हमें दिया गया है। इसलिए परमेश्वर की इच्छा हुई कि उन्हें उसी रीति से छोटे बच्चों के समान खींचे। क्योंकि शिशु में इतनी समझ नहीं कि अपने पिता की भलाई को समझे: इसलिए उसे प्रोत्साहित करने के लिये वह उससे कहेगा; "मैं तुझे एक सुन्दर टोपी दूँगा, और तेरे लिये एक चमकीला नया कोट मोल लूँगा": यह बच्चे की समझ के अनुकूल है, और क्योंकि उसका हृदय कोमल है, इसलिए उससे ऐसी बातें कही जाती हैं: तौभी पिता का आशय उसे और आगे ले जाना है। परमेश्वर ने भी प्राचीन पिताओं के साथ ऐसा ही किया: उसने उन उपकारों को सामने रखा जिनका वे इस जगत में आनन्द लेंगे: आशय यह था कि उन्हें वहाँ से एक ऊँची आशा की ओर खींचे, अर्थात् स्वर्गीय निज भाग की आशा की ओर। और इस प्रकार यहूदी तब सिर के समान किए गए जब उनके बीच राज्य फल-फूल रहा था, जब वे अपने शत्रुओं पर जयवन्त होते थे, और जब परमेश्वर ने अपने आप को उनके लिये लड़ता हुआ दिखाया। जैसे आज हमें न राज्यों की आशा रखनी है न रियासतों की जैसी उनके पास थीं; न हमारे पास उसी प्रकार दाऊद का सांसारिक राज्य है: हमारे लिये यही पर्याप्त है कि यीशु मसीह हमें दिया गया है, और हम उसके साथ राज्य करते हैं, और वह हमारा राजा होकर अपनी अगुवाई में हमें फलता-फूलता करता है: मैं कहता हूँ, हमारे लिये यही पर्याप्त होना चाहिए कि हम अपने सिर के अधीन, जो परमेश्वर का पुत्र है, राजकीय याजकों का समाज हैं। तौभी हमारे प्रभु ने सब विश्वासियों से प्रतिज्ञा की है कि यदि वे उसकी आज्ञाकारिता में चलें, तो वे मनुष्यों के अत्याचार से कुचले न जाएँगे, वरन् स्वतन्त्रता में बनाए रखे जाएँगे, जो ऐसी आशीष है जिसकी इस जगत में किसी भी आशीष के समान लालसा करनी चाहिए। इसलिए यह जानकर कि यह परमेश्वर का विशेष दान है, जैसा यहाँ दिखाया गया है, आओ हम उसकी सेवा करना सीखें और अपने ऊपर सारा अधिकार उसी को दें: कि उसके हम पर शासन करने से हम मनुष्यों की दासता से छुड़ाए जाएँ। हम इसी अध्याय में आगे देखेंगे कि वह उन्हें कैसी धमकी देता है जो उसका भय न मानेंगे और उसकी भयानकता से न काँपेंगे, जैसा भजन में कहा गया है; "परमेश्वर को उन सब पर, जो उसका भय नहीं मानते और उसकी स्वेच्छा से प्रजा नहीं बनते, मनुष्यों का भय डालना ही पड़ेगा।" इसलिए ध्यान दें कि यदि हम अपने ऊपर परमेश्वर के राज्य करने को मान लें, तो वह हमें ऐसी रीति से बनाए रखेगा कि मनुष्य हम पर अत्याचार न कर सकेंगे। और यदि कभी दुष्टों को छूट मिले और वे मानो हमारे गले पर पाँव रखते दिखाई दें; तो हम समझें कि परमेश्वर हमें इसलिए नीचा करता है कि हमने उसे अप्रसन्न किया है, और कि जो स्तुति उसकी है वह हमने उसे नहीं दी; और कि वह हमारे कर्मों के अनुसार हमें ताड़ना देता है। परन्तु फिर भी हमें सदा इस बात पर लौटना चाहिए कि यदि हम परमेश्वर को न त्यागें, तो वह हमें ऐसी रीति से ग्रहण करेगा कि वह हमारे लिये मानो एक सेना होगा, और हमें सिर ऊँचा करके चलने के योग्य करेगा: जैसा तीसरे भजन में कहा गया है। इसलिए यह आशीष केवल व्यवस्था के अधीन रहनेवाले पिताओं के लिये नहीं थी, वरन् जगत के अन्त तक बनी रहती है, और हम समझेंगे कि यह व्यर्थ नहीं, यदि हम भी उसी का अनुसरण करें जो यहाँ आगे जोड़ा गया है: "जो आज्ञाएँ मैं आज तेरे सामने रखता हूँ उन्हें मान," मूसा कहता है, "कि तू दाहिने या बाएँ न मुड़े, पराए देवताओं को ढूँढ़ने और उनकी उपासना करने न जाए।" हम देखते हैं कि परमेश्वर सदा हमें अपने वचन की आज्ञाकारिता का स्मरण कराता है: और यह इसलिए कि हम पाखण्ड में उसकी सेवा न करें, जिसकी ओर हम बहुत झुके हुए हैं। इसलिए आओ हम यह पाठ स्मरण रखें, कि अपने परमेश्वर की सच्ची आराधना करने के लिये हमें सदा उसकी वाणी सुनने से और जो वह हमें आज्ञा देता है उस पर कान लगाने से आरम्भ करना चाहिए; क्योंकि यदि हर कोई अपनी ही राह जाए, तो हम भटकेंगे, हम चाहे दौड़ें, पर सही मार्ग से तनिक भी निकट न होंगे, वरन् उससे और दूर निकल जाएँगे। और परमेश्वर चाहता है कि न केवल सब मनुष्य उसकी सुनें, वरन् बिना किसी अपवाद के उसकी आज्ञा भी मानें, हाँ, उसके वचन में बिना कुछ जोड़े और बिना कुछ घटाए। और यह स्पष्ट रूप से इसलिए कहा गया है: क्योंकि मनुष्य इतना साहस करते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने की अपनी नई रीतियाँ निकालते हैं, और वह करते हैं जिसे वे भला समझते हैं। इसके विपरीत हम समझें कि जब परमेश्वर एक बार दिखा चुका कि वह हम से क्या करवाना चाहता है, तो हमें सीधे-सीधे वहीं ठहरे रहना चाहिए, उसमें कुछ जोड़ने या किसी भी रीति से घटाने का दुस्साहस न करें। परन्तु सब से बढ़कर वह चाहता है कि हम उसे अपना परमेश्वर स्वीकार करें। क्योंकि जो कारण मनुष्यों को भटकाता है और इतने अन्धविश्वासों और मूर्तिपूजाओं में बिल्कुल लोप कर देता है, वह यह है कि वे नहीं जानते कि उन्हें किस परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए। इसलिए जब हम में यह कहने की समझ हो, कि "यह वही परमेश्वर है जिसने अपने आप को अब्राहम पर प्रकट किया, वही परमेश्वर जिसने मूसा के द्वारा अपने आप को प्रकट किया, वही परमेश्वर जिसने अन्त में अपने इकलौते पुत्र की देह में पूरी रीति से अपने आप को प्रकट किया, और वही हमारा परमेश्वर है," तब हमने सुसमाचार में, व्यवस्था में और भविष्यद्वक्ताओं में बहुत उन्नति की है। जैसा यशायाह भविष्यद्वक्ता में भी कहा गया है, जहाँ वह हमारे प्रभु यीशु मसीह के प्रकट होने की चर्चा करता है: "देखो, यही वह है; देखो, यही हमारा परमेश्वर है।" तब आओ हम दृढ़ विश्वास रखें, कि हम भटकनेवाले न हों; हम छोटे बच्चों के समान न हों, न डगमगानेवाले नरकटों के समान जो हर ओर झुक जाते हैं; परन्तु हमारा विश्वास हमारे प्रभु यीशु मसीह में जड़ पकड़कर भली भाँति स्थिर हो।
अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने पापों को मानकर गिरें, और उससे विनती करें कि वह हमें सच्चे पश्चाताप के साथ ऐसा सिखाए कि हम उन पर विलाप करें, और अपनी भ्रष्टता पर हृदय से खेदित हों, कि वह हमें उससे और अधिक अलग करे, और उसमें हमें सुधारे। और क्योंकि हम न केवल निर्बल हैं वरन् सर्वथा हठीले भी हैं: उसे भाए कि हमें अपने पास फिर लौटा लाए, और अपनी सामर्थ्य से हमारी निर्बलता को सँभाले, कि हम उन सब बाधाओं पर जयवन्त हों जो हमें उससे फेरती हैं; और कि हम पूर्ण दृढ़ता के साथ उस लक्ष्य की ओर बढ़ते जाएँ जिसके लिये वह हमें बुलाता है, जब तक हम धार्मिकता की सिद्धता तक न पहुँचें। और इस बीच उसे भाए कि हमें ऐसी रीति से थामे रखे, कि यदि हम चूक भी जाएँ, तौभी वह हमें अपने बच्चे मानना न छोड़े, और हमें और अधिक समझाए कि वह हमें हमारे उद्धार के भरोसे में दृढ़ करता है। उसे भाए कि यह अनुग्रह केवल हमें ही नहीं, वरन् पृथ्वी के सब लोगों और जातियों को भी दे, इत्यादि।
शुक्रवार, 13 मार्च, 1556 को।
