अध्याय 13

161वाँ उपदेश, जो अट्ठाईसवें अध्याय पर नौवाँ है

The Covenant Unveiled · John Calvin

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161वाँ उपदेश, जो अट्ठाईसवें अध्याय पर नौवाँ है

161वाँ उपदेश

जो अट्ठाईसवें अध्याय पर नौवाँ है।

50 यहोवा उभारेगा, इत्यादि।

51 वही तेरे पशुओं के बच्चे और तेरी भूमि की उपज तब तक खाता रहेगा जब तक तू नष्ट न हो जाए, और वह तेरे लिए न अन्न, न दाखमधु, न तेल, न तेरे पशुओं की बढ़ती, न तेरी भेड़-बकरियों के बच्चे छोड़ेगा, जब तक वह तुझे मिटा न दे।

52 और वह तेरे सब नगरों में तुझे घेरे रहेगा, जब तक तेरे ऊँचे और दृढ़ गढ़वाले परकोटे, जिन पर तू अपने सारे देश में भरोसा रखता था, गिर न जाएँ; और वह तेरे सब नगरों में, उस सारे देश में जो तेरे परमेश्वर यहोवा ने तुझे दिया है, तुझे घेरे रहेगा।

53 और घेराव और उस संकट में जिसमें तेरा शत्रु तुझे डालेगा, तू अपनी ही कोख के फल, अर्थात् अपने बेटे-बेटियों का मांस, जिन्हें तेरे परमेश्वर यहोवा ने तुझे दिया है, खाएगा।

54 यहाँ तक कि जो पुरुष तुम में कोमल और अत्यन्त सुकुमार है, वह अपने भाई को, और अपनी गोद की पत्नी को, और अपने बचे हुए बाकी बालकों को देखकर कुढ़ेगा,

55 और अपने बालकों के मांस में से, जिसे वह आप खाता है, उनमें से किसी को कुछ न देगा, इस भय से कि कहीं अपने लिए कुछ भी न बचे; यह उस घेराव और संकट के कारण होगा जिसमें तेरा शत्रु तेरे सब नगरों में तुझे डालेगा।

56 और हाँ, जो स्त्री तुम में ऐसी कोमल और सुकुमार है कि सुकुमारता और कोमलता के कारण भूमि पर अपने पाँव का तलवा भी रखने का साहस नहीं करती, वह अपनी गोद के पति को, और अपने बेटे और बेटी को देखकर कुढ़ेगी,

57 और उस जरायु को, जो उसकी टाँगों के बीच से निकला है, और उन बच्चों को जिन्हें उसने जन्म दिया है; क्योंकि वह सब वस्तुओं के अभाव में घेराव और संकट के समय, जिसमें तेरा शत्रु तेरे नगरों में तुझे डालेगा, उन्हें चोरी-छिपे खाएगी।

58 यदि तू इस व्यवस्था के उन सब वचनों का, जो इस पुस्तक में लिखे हैं, पालन न करे और न उन पर चले, और अपने परमेश्वर यहोवा के इस तेजोमय और भयानक नाम का भय न माने।

हमें वह बात स्मरण रखनी चाहिए जो कल कही गई थी, और वह भी जिसकी चर्चा मूसा आगे भी करता है; अर्थात् यदि मनुष्य हमारे प्रति कठोर और निर्दय हों, तो परमेश्वर ही उन्हें इसके लिए उभारता है, क्योंकि उसने हमें अपने विरुद्ध हठीला पाया है। इसलिए जब कभी मनुष्य हमारे साथ वैसी कोमलता से व्यवहार न करें जैसी हम चाहते हैं, तो हम देखें कि क्या हमने परमेश्वर को उत्तर दिया है, और क्या जो कुछ उसने हमें आज्ञा दी है उसे हमने नम्रता से ग्रहण किया है; क्योंकि यदि हम में से कोई अपने को ऐसा पाए कि उसने परमेश्वर के विरुद्ध युद्ध छेड़ा और अपने को उसके सामने खड़ा किया है, तो यदि परमेश्वर मनुष्यों की ओर से उसे वैसा ही बदला दे, तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। परन्तु इस शिक्षा पर हमें कभी प्रतीति न होगी, जब तक हम यह न समझें कि परमेश्वर मनुष्यों के मन अपने हाथ में रखता है, कि चाहे वे कितने ही कठोर हों, उन्हें कोमल कर दे; और इसके विपरीत उन्हें कठोर भी कर दे, चाहे वे पहले हमारे प्रति कितनी ही भलाई की इच्छा क्यों न रखते रहे हों। इसलिए जब तक हम परमेश्वर के भय में न चलें, तब तक मनुष्यों के प्रेम पर भरोसा न रखें। क्योंकि उसी के वश में है कि उनके मन को ऐसा पलट दे कि वे हमारे प्रति बैर रखने लगें और तुच्छ से भी तुच्छ कारण से हमसे बिलकुल अलग हो जाएँ, यहाँ तक कि संसार देखे कि जो हमारी सहायता के लिए सबसे अधिक तत्पर थे वही हमारे सबसे बड़े विरोधी हो गए हैं। और दूसरी ओर हम यह भी समझें कि हमारा प्रभु सब बैर को भली-भाँति शान्त कर सकता है; हाँ, चाहे वे सिंह के समान उग्र हों, तौभी वह उन्हें हमारे प्रति कोमल और मित्रवत् बना देगा। मिस्रियों के समान गर्वी और निर्दय जाति कभी न हुई; और विशेषकर वे इस्राएलियों के प्रति कितने द्वेषी थे? ऐसा प्रतीत होता था कि इस दीन जाति को कभी दया न मिलेगी। तौभी परमेश्वर ने ऐसा कार्य किया कि मिस्रियों ने उन्हें अपने सब कोष दे दिए, और उनके घरों में जो कुछ उत्तम था वह सब; न चाँदी बचाई गई न सोना। और यह कैसे हुआ? इससे पहले उन्होंने यहूदियों को दासत्व में रखा था, उन्हें हद से बढ़कर सताया था; वे उनके मुँह से रोटी छीन लेते, वरन् उन सब का गला काट डालते। कुछ ही समय पहले उन्होंने उनके बच्चों को माताओं के गर्भ से निकलते ही मार डाला, इस उद्देश्य से कि उनका सारा वंश नष्ट कर दें; फिर यह अचानक कोमलता कहाँ से आई कि हर एक अपने घर की सबसे बहुमूल्य वस्तुएँ उनके पास ले आया? यह परमेश्वर था जिसने उनके मन फेर दिए। और इसी प्रकार, इसके विपरीत, कहा गया है कि जब लोग कनान देश में प्रवेश करने को थे तब उसने राजाओं के मन कठोर कर दिए; जहाँ उन्हें निकल जाने दिया जाना चाहिए था, वहाँ बहुत से लाभ उठानेवाले उनका सामना करने लगे। यह कहाँ से हुआ? इसी से कि उन्होंने अपने परमेश्वर का विरोध किया था। इसलिए हम सीखें (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) कि अपने आप को परमेश्वर की आज्ञाकारिता में इस प्रकार रखें कि मनुष्य भी अपनी ओर से हमारे प्रति मित्रवत् रहें। क्योंकि कोई ऐसा बड़ा या ऐसा सामर्थी नहीं जिसके विरुद्ध कोई न कोई विपत्ति न उठ खड़ी हो, जब वह परमेश्वर से झगड़ने में अकड़ दिखाना चाहे। और हमने देखा है कि जो अपनी ही महानता में मतवाले हो गए हैं, उन्हें अन्त में दण्ड मिलना ही है, और वह भी किसी अधिकारी या इस संसार में प्रतिष्ठित लोगों के हाथ से नहीं, वरन् नीच और दुष्टों के हाथ से; ऐसे लोग उनके मुँह पर थूकेंगे। और ऐसे उदाहरण राजाओं और सबसे ऊँची पदवी के लोगों में भी देखे जाते हैं। क्योंकि जब वे परमेश्वर से शासित होने के लिए अपने को नहीं सौंपते, तब उसे उनके विरुद्ध शासक उभारने पड़ते हैं, कि जो उसके आज्ञाकारी नहीं होना चाहते उन्हें लज्जित करे। तौभी, जब मनुष्य अपने को वश में आने योग्य नहीं दिखाते, तब हमें समझना चाहिए कि परमेश्वर गुप्त रीति से उस बात को चला रहा है, और वह यह इसलिए करता है कि हमें नम्र करे। इसलिए हम सृजी हुई वस्तुओं के विषय में अपने आप को धोखा न दें, यह कहकर कि यह कैसा भाग्य है? सच है, हम ऐसा कह सकते हैं, परन्तु हमें एक पग और आगे जाना चाहिए; और यह समझना चाहिए कि यह परमेश्वर के निर्देश के बिना नहीं होता। और तब हमें उपाय की ओर लौटना चाहिए, अर्थात् परमेश्वर के वचन और हाथ के नीचे दीन होना, और यह विचार करना कि यदि उसे भाए, तो वह उन मनुष्यों के मन को, जो हमारे प्रति इतने द्वेषी थे, पलट सकता है और उन्हें हमारे मित्र बना सकता है। और यह अत्यन्त आवश्यक बात है। क्योंकि जब हमें उन लोगों से काम पड़ता है जो कठोर और हठीले हैं, तो हम तुरन्त हियाव छोड़ देते हैं, और यदि हमसे हो सके तो सब झंझटों से अपने को मुक्त कर लेना चाहेंगे, और पहली ही चोट में उनसे छूट जाना चाहेंगे। परन्तु हमें तो परमेश्वर की ओर लौटना चाहिए, यह मानते हुए कि ये बातें उसी के हाथ से आती हैं। और इसलिए, जब मनुष्य हमारे प्रति ऐसे विश्वासघाती और निर्दय दिखाई दें, हमारे साथ उपहास और अपमान का व्यवहार करें, यहाँ तक कि उनके हाथ से हमें तनिक भी न्याय या युक्ति न मिल सके, वरन् हम देखें कि उनकी सारी खोज यही है कि हमारे गलों पर पाँव रखें, और उनमें ऐसी पशुओं की-सी निर्लज्जता हो (जैसा यहाँ कहा गया है) कि उनसे जो कुछ कहा जाए उस पर उन्हें कोई लज्जा न आए, वरन् वे लगाम को दाँतों में दबाकर जंगली पशुओं का-सा व्यवहार करें, कि उनमें न कृपा हो न भलाई; जब हम ऐसी बर्बर पशुता देखें, तब हम अपने परमेश्वर की शरण लेना सीखें, और यह मानें कि हम उसके हाथ से ऐसे वश में किए जाने के योग्य हैं। फिर ऐसे क्रोध को शान्त करने और उन्हें ठण्डा करने का जो इतने उग्र और उतावले हैं, एकमात्र उपाय यह है कि हम अपने परमेश्वर को पुकारें, और उससे प्रार्थना करें कि वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा उनके अन्तःकरण को छूए जो इतने निर्दय हैं और हमारी भलाई करने को नहीं झुकते, क्योंकि हमने अपने आप को अपने परमेश्वर के विरुद्ध खड़ा किया है। यही वह बात है जिसकी हमें इस पाठ में चेतावनी दी गई है।

अब मूसा उस बात को दोहराता है जिसकी चर्चा पहले हो चुकी है; अर्थात् यह कि परमेश्वर दूर देश से हमारे विरुद्ध शत्रुओं को लाएगा, और वे उकाबों की नाईं उड़ेंगे, इसलिए कि हम यह न सोचें कि परमेश्वर को बहुत पहले से कोई तैयारी करनी पड़ती है। जैसे कोई मनुष्य हमें धमकाए, तो हम देखते हैं कि उसके हाथ में तलवार है या नहीं, और जो उसने कहा है उसे पूरा करने को वह तैयार है या नहीं। परन्तु परमेश्वर केवल सीटी बजाए (जैसा वह अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा प्रायः कहता है), तो तुरन्त उसके योद्धा तैयार हैं; उसे न सेना इकट्ठी करनी पड़ती है, न नाम लिखने पड़ते हैं, न ढोल बजाना पड़ता है; इन सब की उसे आवश्यकता नहीं; केवल उसकी सीटी पर (क्योंकि वह यही उपमा काम में लाता है) सारी पृथ्वी हिल उठती है। इसलिए हम यह न देखें कि बातें तैयार हैं या नहीं, और न यह कि हमें कोई हानि या क्षति पहुँची है। हम यह न देखें कि इसके लिए कोई सांसारिक साधन जुटाया गया है या नहीं; परन्तु यह समझें कि इससे पहले कि हम कल्पना भी कर सकें कि हम पर क्या बुराई आ सकती है, हम तुरन्त उलट दिए जाएँगे। और क्यों? क्योंकि यह परमेश्वर है जो बोलता है, जो मनुष्यों को पक्षियों की नाईं पृथ्वी के एक छोर से दूसरे छोर तक उड़ाता है। न समुद्र है न पर्वत जो हमें उस बात के अनुभव से बचा सके जिस पर हमने कभी विश्वास न किया था। तौभी परमेश्वर ने बातों को ऐसा ठहराया है, वरन् अन्यजातियों में भी प्रायः अविश्वसनीय शीघ्रता देखी जाती है, जब परमेश्वर संसार के बहुत बड़े भाग को ताड़ना देना चाहता है: यहाँ तक कि कोई एक मनुष्य थोड़े से लोगों के साथ उठ खड़ा हुआ है, कि असंख्य भीड़ को दण्ड दे जो उसके विरुद्ध खड़ी हुई थी; और यह केवल एक बार नहीं, वरन् दो-तीन बार लगातार, नगरों और गढ़ों को ले लेने के साथ, जो ऐसे सुसज्जित और स्वाभाविक स्थिति से भी इतने दृढ़ दिखाई देते थे कि उनके निकट पहुँचा नहीं जा सकता था, तौभी वे ऐसे लूट लिए गए मानो परमेश्वर संसार के बड़े भाग को नया कर देना चाहता हो। यह भी देखा गया है कि जिस जाति का कोई नाम और मान न था, वह उठ खड़ी हुई और सबसे सामर्थियों को थरथरा दिया। ऐसा करने में परमेश्वर उस बात के उदाहरण देता है जो यहाँ लिखी है: अर्थात् यह कि वह निश्चय ही हमारे शत्रुओं को अचानक ला सकता है, और वे ऐसी फुर्ती करेंगे मानो डाक से भी अधिक तेजी से हम पर चढ़ आए हों: और जब हम समझते हैं कि एक महीने, एक वर्ष या अपने जीवन भर के लिए सन्धि के कारण हमें कुछ विश्राम मिलेगा, तब हम किसी भोर को, जब हमें उसका ध्यान भी न होगा, अचानक आ दबोचे जाएँगे। इसलिए हम समझें कि जैसे ही परमेश्वर बोलता है, हमें उस अनन्त सामर्थ्य पर दृष्टि रखनी चाहिए (जो उसमें है, और जो मनुष्य की समझ से परे है), और उसके वचन ही से थरथराना और उसके आगे झुक जाना चाहिए: यह भली-भाँति जानते हुए कि यदि हम दिन पर दिन टालते रहें, तो हम से आगे निकल लिया जाएगा, और तब बहुत देर हो चुकी होगी। इसलिए हम समय रहते अपने आप को दीन करने और जब उसे अप्रसन्न किया हो तब क्षमा माँगने की सुधि रखें।

मूसा स्पष्ट कहता है कि जो परमेश्वर के आज्ञा न माननेवाले हैं, वे घेरे जाएँगे और अपनी शहरपनाहों के भीतर बन्द कर दिए जाएँगे, जब तक उनके वे सब गढ़, जिन पर उन्होंने भरोसा रखा, गिरा न दिए जाएँ। यहाँ हम देखते हैं कि परमेश्वर उस झूठे और शापित अहंकार को कैसे डाँटता है जिससे मनुष्य अपने आप को धोखा देते हैं, यह सोचकर कि हम उसके विरुद्ध भली-भाँति सुरक्षित हैं। यह ऐसा पवित्र वस्तु का अपहरण है जिससे परमेश्वर का आदर उससे छीना जाता है, जब हम सृजी हुई वस्तुओं को यह श्रेय देते हैं कि वे हमें थाम सकती हैं। यह निश्चित है कि परमेश्वर साधनों से काम लेता है, और हमें भी उन्हें अपने काम में लाना चाहिए: परन्तु साथ ही उन पर अपना भरोसा जमाना परमेश्वर की महिमा को लूटना है। क्योंकि वह चाहता है कि हम सब कुछ उसी से पाया हुआ मानें, और उनके लिए उसकी वन्दना करें। इसलिए सृजी हुई वस्तुओं पर भरोसा रखना और उन पर अपना आधार बनाना असह्य अहंकार है: और फिर भी संसार में इससे अधिक सामान्य कोई दोष नहीं। हम कह तो भली-भाँति सकते हैं कि यह उचित नहीं और हमें ऐसा न करना चाहिए: परन्तु इस बीच हर एक यही करता है। अब हम अपने आप को स्मरण दिलाएँ, क्योंकि परमेश्वर को अपने आदर से अधिक प्रिय या जिसका वह अधिक मूल्य करे, कुछ नहीं। और हमारे लिए यह भी पर्याप्त नहीं कि हम उसके लिए परमेश्वर की पदवी और नाम छोड़ दें: परन्तु वह वैसा ही जाना भी जाए जैसा वह है, अर्थात् सारा सामर्थ्य उसी में है, वही सब प्रकार के अनुग्रह और भलाई का सोता है: हमें बनाए रखना और सुरक्षित रखना उसी का विशेष कार्य है: हमारा जीवन और उससे सम्बन्ध रखनेवाली सब वस्तुएँ उसी के हाथ में हैं। जब हम इस पर भली-भाँति विचार कर लें, तब अपनी बुद्धि को इस प्रकार सम्भालने का प्रबन्ध करें कि हम सृजी हुई वस्तुओं पर आधारित न हों। निश्चय ही बुराई दुगुनी है जब हम सृजी हुई वस्तुओं की ओट परमेश्वर के विरुद्ध लेते हैं, और इस प्रकार जब वह धमकाता है तब हठीले हो जाते हैं, और जब वह अपने क्रोध के चिह्न प्रगट करता है तब भी अड़े रहते हैं: हम विचार करें कि तब अपराध कहीं अधिक गम्भीर है। परन्तु यह बहुत ही सामान्य है। क्योंकि जब तक हमें संसार की दृष्टि से कोई संकट आता नहीं दीखता, क्या हम अपने पापों में नहीं बने रहते? और क्या हम हठ में नहीं ठहरे रहते? परमेश्वर बोलता है: पर हम उसकी परवाह नहीं करते। जब तक मनुष्य हम पर कृपा रखें, और इस प्रकार हमारे पास अपने को दृढ़ करने के साधन हों, तब तक हम समझते हैं कि परमेश्वर का हाथ हम तक नहीं पहुँच सकता। और इसलिए हमारा प्रभु उन सब के हठ को जो उसके आज्ञा न माननेवाले हैं, अकारण नहीं डाँटता: अर्थात् यह कि वे अपने गढ़ों, अपनी ऊँची शहरपनाहों, अपने शस्त्रागारों और ऐसी ही वस्तुओं पर भरोसा रखते हैं। अब जब हम इन बातों के वश में हैं, तो हमारे लिए यही भला होता कि हमारे पास न बाड़ा होता, न और कुछ, बजाय इसके कि हम दीवारों और गढ़ों से भली-भाँति सुरक्षित हों। क्योंकि वे तो केवल हमारी आँखें अन्धी करने के काम आते हैं, कि हम अपने परमेश्वर का कुछ भी आदर न करें; वरन् शैतान से मोहित होकर उन वस्तुओं पर भरोसा रखें जो हमारे लज्जित होने का कारण होंगी। चाहे जैसी भी स्थिति हो, हम इस सामान्य नियम को सोच-समझकर थामे रहें; अर्थात् परमेश्वर ही सदा हमारा गढ़ हो: जैसा हम देखते हैं कि वह अपने भविष्यद्वक्ता यशायाह के द्वारा प्रतिज्ञा करता है, 12वें अध्याय में भी, और 55वें से अन्त तक भी: क्योंकि वह सब इसी बात की ओर ले जाता है। और यह पवित्र शास्त्र में ऐसी सामान्य शिक्षा है कि हम मुश्किल से कोई पन्ना पलट सकते हैं कि कोई ऐसा पाठ न दीख जाए जिसमें परमेश्वर हमें बताता है कि वह हमारा परकोटा, हमारी दीवारें, हमारी खाइयाँ, वरन् दुहरी खाइयाँ, हमारे गुम्मट, और हमारी रक्षा के लिए जो कुछ और आवश्यक हो, वही होगा। और क्यों? क्योंकि (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) हमारे मन तुरन्त व्यर्थता की ओर फिसल जाते हैं, ऐसा कि परमेश्वर हमें अपनी ओर रोक नहीं पाता; और यह मान लेने को कि हम अपना सारा भरोसा उसी पर रखेंगे। तो हमें क्या करना चाहिए? सबसे पहले, यदि हम मनुष्य की सहायता से वंचित हों, तो समझें कि यदि हम उसकी ओर लौटें तो अकेला परमेश्वर ही पर्याप्त है, [और कहें:] हे प्रभु, यह निश्चित है कि हम लूट के लिए ठहराए गए हैं, हमारे पास अपने को बचाने का कुछ नहीं, क्योंकि सारा संसार हमें छोड़ चुका है: परन्तु यह पर्याप्त है कि तू हमारा सहायक है। उसकी शरण में जाना हमें इसी रीति से सीखना चाहिए।

और इसी प्रकार जब इस संसार की वस्तुएँ हमें छोड़ दें, तब हमें अवसर लेकर अपने आप को पूरी रीति से उसके हाथ में सौंप देना चाहिए। और साथ ही, यद्यपि हमारे पास शहरपनाहें, तोपखाना, धन और शस्त्र-सामग्री, और जो कुछ हम चाह सकते हैं, वरन् जनबल और सब कुछ हो, तौभी हम समझें कि इस बीच हमें उन्हें ऐसे काम में लाना चाहिए कि हमारा प्रभु सदा हमारा भरोसा बना रहे, और हम उसे सदा यह आदर दें कि हमारी रक्षा करना उसी का कार्य है, और इसी पर हम आगे और कुछ न टटोलें। यह निश्चित है कि जो वस्तुएँ वह हमारे हाथों में देता है उनसे हम अपना काम निकाल सकते हैं: परन्तु इस बीच हमारे हृदय और मन सारे संसार से ऊपर उठे रहें, और वही अकेला हमारा लंगर हो। तीसरे, जो सहायताएँ वह हमें देता है उनके बल पर हमें डींग न मारनी चाहिए: क्योंकि (जैसा कहते हैं) झाड़ी की एक बर्छी भी हमें यह मनवा देने को बहुत है कि हम अजेय हैं। हम क्या कहते हैं? क्या यह सम्भव है कि वे हमारे विरुद्ध प्रबल हों? यह सब कुछ नहीं: जैसा कहते हैं, प्याज़ के छिलके के बराबर भी नहीं: तौभी हम अपनी बुद्धि पर बल देकर उसे मूल्य और महिमा दिलाना चाहते हैं। नहीं, इसके विपरीत, हम अपनी दुर्बलता और निर्बलता को स्वीकार करें, ताकि परमेश्वर की ओर लौटें, और कोई बात हमें अपने आप को पूरी रीति से उसके और उसकी सुरक्षा के हाथ में सौंपने से न रोके: हम ऐसे व्यर्थ भरोसे से अपने आप को धोखा न दें, जैसा यहूदियों को अपनी ऊँची शहरपनाहों पर था। अब इसके साथ ही वह यह भी दिखाता है कि अपने बल और बचाव के लिए हम जो कुछ भी सोच सकते हैं, वह उसके सामर्थ्य के विरुद्ध कुछ नहीं कर सकता: वरन् हम घेरे ही में रहेंगे, जब तक पूरी रीति से उजड़ न जाएँ। हाँ, इस पाठ से हम यह भी समझ सकते हैं कि हमारे लिए यह कहीं अच्छा होता कि हम पहले ही अपने शत्रुओं के हाथ में सौंप दिए जाते, बजाय इसके कि हमारे पास सामना करने के साधन हों, जिनके कारण हम ऐसे सूखते जाएँ कि सीधी-सादी मृत्यु [तुरन्त] न मर सकें: क्योंकि जो बेचारे लोग खेतों में बाहर होते हैं, वे पहले ही लूट लिए जाते हैं, और इस प्रकार उनका काम तमाम हो जाता है। निश्चय ही उनके गले कटते और सब कुछ जलता देखना दयनीय दशा है: तौभी इस प्रकार वे अपने दुःखों से छूट जाते हैं, ऐसा कि वे उनमें घुल-घुलकर नहीं मरते। परन्तु जो दृढ़ नगरों में हैं, उन्हें लम्बा घेराव सहना पड़ता है, उन्हें टुकड़े-टुकड़े घुलना और क्षीण होना पड़ता है, एक-दो महीने नहीं, वरन् तब तक जब तक वे और टिक न सकें: और यह ऐसा है मानो वे सौ मृत्युएँ भोगें। इस प्रकार हमारा प्रभु उन से बदला लेता है जो समझते हैं कि जब परमेश्वर उन्हें पहले ही जड़ से नहीं उखाड़ता तो वे बच गए। नहीं, वह कहता है, सोचो कि इन फलों में से कौन सा अच्छा निपटता है; वह जो पूरे पकने पर बाज़ार में लाया और तुरन्त खा लिया जाता है, या वह जो कुछ समय रखा रहता है और अन्त में सड़ जाता है? तो तुम्हारे लिए यह भला होता कि तुम्हारे शत्रु पहले ही तुम्हें जीत लेते और हरा देते। इसलिए हम भली-भाँति विचार करें कि जब हमारे पास संसार की ओर से अपनी रक्षा के साधन हों, जहाँ उनसे हमें लाभ होना चाहिए, तो यदि हम उन पर भरोसा रखें तो वह हमारी दुगुनी लज्जा का कारण होगा: क्योंकि हमें बहुत समय तक बोझ के नीचे कराहना और धीरे-धीरे क्षीण होना पड़ेगा। क्योंकि जब हम आज्ञा न मानें और सुधारे जाना न चाहें, तब हमारा प्रभु हमें तब तक नहीं छोड़ेगा जब तक हमें पूरी रीति से मिटा न दे, जैसा वह यहाँ इतनी बार दिखाता है। और फिर भी यह उससे और अच्छी रीति से प्रकट होता है जो मूसा आगे जोड़ता है। वह कहता है कि जो पुरुष तुम में कोमल और सुकुमार है, वह अपने भाई से और उस पत्नी से जो उसकी गोद में सोती है कुढ़ेगा, क्योंकि वह अपने बालकों को अकेले खाने से रोका नहीं जा सकता। जो स्त्री इतनी सुकुमार है कि भूमि को अपने पाँव से छूने का भी साहस नहीं करती (क्योंकि मूसा के शब्द यही हैं), वह अपने ही बालकों को नष्ट करने और बिगाड़ने के यत्न में होगी; वरन् वे उसकी कोख से जन्म लेते ही वह उन्हें निगल जाने की इच्छा करेगी; और यदि उसने उन्हें कुछ बड़ा कर लिया हो, तो भी वह उन्हें कुछ और न बख्शेगी। ये भयानक बातें हैं: क्योंकि केवल यह नहीं कहा गया कि तुम घेरे जाओगे, और बहुत समय तक अकाल में पड़े रहोगे, ऐसा कि तुम्हें घोड़े, चूहे, मूस, जूतों के फीते खाने पड़ें; वरन् पक्षियों की बीट भी (जैसा देखा गया है) और ये सब वस्तुएँ तुम्हारा भोजन होंगी।* न यह कहा गया कि पुरुष और स्त्रियाँ खाए जाएँगे: परन्तु यह कि हर एक अपने ही बालकों को खाएगा। जब परमेश्वर इस रीति से बोलता है, तो क्या यह हमारे रोंगटे खड़े कर देने को पर्याप्त नहीं? हाँ, निश्चय; और फिर भी मूसा ने यहाँ ऐसा कुछ नहीं कहा जो पूरा होते देखा न गया हो। किसी को यह कहना नहीं सोहता कि यह विश्वास के योग्य नहीं, यह स्वभाव के विरुद्ध है, मनुष्य संकट में भी अपने मुँह से रोटी निकालकर अपने बालकों को दे देगा, वह उनकी सहायता करने को मर जाएगा, ऐसा कि हम देखते हैं कि हाजिरा अपने बालक की मृत्यु देख न सकी,* वरन् उसे अकेला छोड़ गई और अपनी ही मृत्यु चाहने लगी। परन्तु हमें इन बातों के उदाहरण देने की आवश्यकता नहीं: क्योंकि साधारण स्नेह ही भली-भाँति बताता है कि हर एक मनुष्य अपने बालकों को खाने से मरना अच्छा समझेगा: तौभी ऐसी क्रूरता यहूदियों में देखी गई। जिन्हें परमेश्वर की व्यवस्था की शिक्षा मिली थी, और जिनमें अन्यजातियों और अविश्वासियों से कहीं अधिक मनुष्यता और करुणा होनी चाहिए थी, वे भी सब प्रकार की भलाई भूल गए, और इस पागलपन से परास्त हो गए। उचित था कि यह अन्धापन,* जिसकी चर्चा भविष्यद्वक्ताओं ने की थी, और जिसे हम यहाँ मूसा के द्वारा भी पहले कहा हुआ देखते हैं, उन पर तब पूरा हो, और वे अपनी बुद्धि खो बैठें: क्योंकि जब परमेश्वर मनुष्यों से सब विवेक और सीधाई ले लेता है, तब वह उन्हें एक प्रकार के पागलपन के वश में छोड़ देता है। इसलिए उनमें ऐसा उन्माद अवश्य होना था जब वे अपने ही बालकों को खाने लगे।

इससे हमें विशेष रूप से चेतावनी मिलती है कि जो अन्त की बारी के लिए रखे गए हैं, वे उन से किसी अच्छी दशा में नहीं हैं जिन्हें परमेश्वर ने बहुत पहले ताड़ना दी। और यह लाभदायक चेतावनी है। क्योंकि जैसे ही परमेश्वर कुछ को मारता है और औरों को छोड़ देता है, तो हम कहते हैं: इन्हें भी क्यों नहीं? क्या इन्होंने उतना ही नहीं कमाया? हम में इतना धीरज नहीं कि परमेश्वर को अपने न्याय उसी क्रम से पूरे करने दें जैसा उसे स्वयं भला लगे: परन्तु हम अनुमान करते हैं कि जिन पर वह दृष्टि रखता है और जिन्हें वह थोड़े समय के लिए छोड़ देता है, उन्हें हम से अधिक छूट मिली है। पर बात इसके उलट है: क्योंकि उनके लिए यह अच्छा होता कि वे ऐसे रख छोड़े जाने से पहले ही दण्ड पाते। इसलिए हम उन से डाह न करें कि परमेश्वर उन्हें कुछ समय के लिए छोड़ देता है, मानो वे सब विपत्तियों से छूट गए हों, परन्तु हम इसकी बाट जोहें कि परमेश्वर उन्हें अपनी बारी पर घेर लाए: क्योंकि उनके लिए तो यह कहीं अच्छा होता कि उनका काम तुरन्त तमाम हो जाता। और इसके साथ हम में से हर एक अपनी सुधि ले। हम उस धीरज पर, जो परमेश्वर हमारे प्रति रखता है, भरोसा करके अपने आप को धोखा न दें। निश्चय जब परमेश्वर ने धीरज धरा और हमें सहा, तो इससे हमें उसकी शरण में जाने की और अच्छी प्रवृत्ति होनी चाहिए, और यह आशा रखनी चाहिए कि वह दयालु पाया जाएगा, हमारे दोषों और अपराधों को क्षमा करेगा। परन्तु हमें इस पर सो नहीं जाना चाहिए, कि उससे खेलें और कहें: अहा, उसने हमारी बाट जोही है, आगे भी वह वैसा ही करेगा; जैसा हम दुष्टों को करते देखते हैं, जो इस पर केवल सिर हिला देते हैं: जब वे देखते हैं कि परमेश्वर ने उन्हें बख्शा है, तब वे समझते हैं कि वे छूट गए। हम इससे सावधान रहें। क्योंकि हम देखते हैं कि वह कहता है कि जब हम भली-भाँति सज्जित हों, और हमारे पास मानो अजेय गढ़ हों, तब सब हमारे सिर पर आ पड़ेगा, और हमें उतना ही अधिक कठोर दण्ड मिलेगा। इस पाठ के विषय में हमें इतना ही स्मरण रखना है।

अब हम आगे यह भी ध्यान दें कि जब हम अपने परमेश्वर को भूल जाएँ, तो हमें प्रकृति के सारे क्रम को भी भूल जाना पड़ेगा, और वह हमारी बुद्धि अवश्य हर लेगा: क्योंकि वही है जिस पर सारा पितृत्व निर्भर है, वही उसका सोता है। यदि परमेश्वर का प्रभुत्व न होता, तो हम न जानते कि माता-पिता का अपने बालकों के प्रति क्या कर्तव्य है, और बालकों का अपने माता-पिता और बड़ों के प्रति कितना आदर है। यदि हम सब कुछ उसी के सुपुर्द न करें, तो वह हमें मूढ़ बना देगा, ऐसा कि हम समझेंगे ही नहीं कि हमारे बालकों के प्रति यह पितृ-स्नेह क्या अर्थ रखता है। एक बात के विषय में इतना ही।

परन्तु साथ ही हमें यह ध्यान देना है कि जिन मनुष्यों ने अपने ही बालकों को ऐसे खा डाला, वे इतने मूढ़ नहीं थे कि भयंकर मर्मपीड़ा से बेचैन न होते, और ऐसे उन्मत्त भय से न सताए जाते कि जो वे करते थे उससे घृणा भी करने लगते। यह सच है कि वे बलपूर्वक खींच लिए गए थे और उनमें विवेक न था; तौभी उनके भीतर कुछ गुप्त चुभन और कचोट थी, और परमेश्वर ने उन्हें मानो यातना-यन्त्र पर कसे रखा, मानो वह उनसे कहता हो, "अरे अभागे, तू क्या करेगा? तेरे लिए यह भला होता कि तू समय से पहले जन्मा होता, और पृथ्वी तुझे सौ बार निगल गई होती, बजाय इसके कि तू ऐसा भयानक काम करे: परन्तु आवश्यकता को तुझ पर अवश्य प्रबल होना है।" इसलिए हम ध्यान दें कि जब हम परमेश्वर के हाथ से नम्र न किए जाएँ, तब हमें ऐसे उन्माद में पड़ना होगा जो हम पर प्रबल हो जाएगा, और हमसे बिना किसी और जल्लाद की सहायता के अपने आप को पीड़ित कराएगा, ऐसा कि हम में से हर एक अपने ऊपर परमेश्वर का वह बदला पूरा करेगा जिसे वह पहले तुच्छ जानता और ठट्ठों में उड़ाता था। मैंने कहा है कि यहाँ ऐसी कोई बात नहीं कही गई जो वास्तव में होते देखी न गई हो: अर्थात् यह कि पिताओं ने अपने ही बालकों को खाया, और वैसे ही माताओं ने। परन्तु जैसे यहूदियों ने परमेश्वर को अत्यन्त अधिक क्रोध दिलाया था, वैसे ही वे अधर्म की परिपूर्णता को पहुँचे, और इसलिए परमेश्वर का उनके प्रति अपना क्रोध इतनी उग्रता से प्रगट करना अवश्य था, जैसा तब देखा गया जब वे अपने शत्रुओं से घेरे गए; क्योंकि तब उन्होंने कबूतरों की बीट खाई, और उसे सोने के तौल पर मोल लिया; हाँ, तुम देखोगे कि उन्होंने एक दूसरे को खाकर प्रकृति के विरुद्ध काम किए। परन्तु जब उन्होंने परमेश्वर के पुत्र को एक बार ठुकरा दिया, और उद्धारकर्ता को छोड़कर, जिस पर परमेश्वर की भलाई के विषय में उनसे की गई सब प्रतिज्ञाएँ आधारित थीं, अपने आप को उद्धार की आशा से पूरी रीति से काट लिया; तब यह अवश्य था कि वे बातें और भी अधिक पूरी हों। क्योंकि यदि तुम उन्हीं की जाति के लोगों के इतिहास पढ़ो, जो उस घटना के प्रत्यक्षदर्शी थे; तो तुम्हें लगेगा कि तुम स्वप्न या कथाएँ सुन रहे हो; तौभी वे बातें तब प्रसिद्ध थीं और सच लिखी गई थीं, और परमेश्वर का अभिप्राय मानो मंच खड़े करने का था, कि देखा जाए कि अपनी प्रजा को उस रीति से उसकी धमकी व्यर्थ नहीं थी, जैसा हम देखते हैं, और कि सब मनुष्य उससे शिक्षा लें। क्योंकि वे भयानक बातें हैं, और ऐसी जो हमारे रोंगटे खड़े कर दें, जब यह कहा जाता है कि पति पत्नी को धोखा देगा और उन दोनों की देह से जन्मे बालकों को चुरा ले जाएगा, और पत्नी भी वैसे ही कोई गुप्त स्थान ढूँढ़ेगी जहाँ अपने बालक का गला काटे, मानो कहती हो, "यह मैं अपने लिए बन्द करके रखूँगी"; और पति और पत्नियाँ दोनों ऐसे पागल हो जाएँगे कि कहें, "मैं अपना ही बालक खाऊँगी।" जब ये सब बातें पूरी हो चुकीं; और हमारे प्रभु ने ऐसा बदला लिया है: तो हम समझें कि इन बातों को आज के दिन बिना काँपे नहीं पढ़ना चाहिए, मानो परमेश्वर अपना पहले से कहा हुआ बदला हमारे सामने रंगे हुए चित्र-पट में रख रहा हो। इसके अतिरिक्त, हम यह समझें कि जब परमेश्वर ने यहूदियों के विरुद्ध ऐसी आज्ञा सुनाई, तो वह पहले ही दिन पूरी नहीं की गई। क्योंकि उसने इतने लम्बे धीरज से उनकी बाट जोही कि ऐसा प्रतीत होता था कि उन पर कोई बुराई न पड़ेगी। परन्तु जब फोड़ा फूट गया, तब वह सड़न जो पहले छिपी थी प्रगट हुई और रोग और भी घातक हो गया। और यह भी ध्यान दें कि यदि परमेश्वर हमें सहे, और फिर नाना रीति से हमारी ताड़ना करे, और इतना कठोर न मारे कि चरम सीमा तक पहुँचे: तो हम यह न समझें कि हम उसके हाथ से बच निकले, परन्तु हमें उसकी ओर लौटना चाहिए, और तब तक रुके न रहें जब तक वह हमारी आज्ञा-उल्लंघन को सुधार के अयोग्य न देख ले, और इस प्रकार अपनी धमकियों की चरम सीमा तक पहुँचने को विवश न हो। इस पाठ के विषय में हमें इतना ही स्मरण रखना है।

अब अन्त में मूसा कहता है: "यदि तू इस व्यवस्था के सब वचनों का पालन करने को न माने, और इस भयानक और तेजोमय नाम का, अर्थात् अपने परमेश्वर यहोवा का, भय न माने।" निश्चय पहली दृष्टि में ऐसा लगता है कि मूसा मनुष्यों से मर्यादा से बाहर वह माँगता है जो उनके सामर्थ्य में नहीं: क्योंकि कौन है जो परमेश्वर की सारी व्यवस्था पूरी कर सके? और फिर, यद्यपि मनुष्य कुछ निश्चित बातों में चूक जाए, तो क्या परमेश्वर ऐसी कठोरता बरते? मैं तुम से पहले कह चुका हूँ कि वह यह बात उन से कहता है जो पूरी रीति से बुराई के वश में हैं, और जो परमेश्वर का तिरस्कार करनेवाले हैं कि जिस किसी रीति से हो उसकी व्यवस्था तोड़ें। तो फिर वह ऐसी सिद्धता क्यों माँगता है? पहले हम यह देखें कि परमेश्वर नहीं चाहता कि उसकी व्यवस्था टुकड़े-टुकड़े और बोटी-बोटी की जाए: क्योंकि उसमें वह अपनी धार्मिकता हमारे सामने रखता है। इसलिए मनुष्य इस विषय में अपनी इच्छा से मोल-भाव न करें, मानो कोई कहे, "मैं परमेश्वर के आदर के लिए व्यभिचार से बचूँगा, पर चोरी करूँगा: मैं हत्या से बचूँगा, पर निन्दक बनूँगा।" नहीं, परन्तु जब कि जिसने चोरी करने से मना किया उसी ने हत्या करने से भी मना किया; और जिसने व्यभिचार से मना किया उसी ने निन्दा करने से भी मना किया: तो हम सब बातों और सब प्रकार से उसकी आज्ञा मानना सीखें, अपनी इन्द्रियों को रोकें, और अपनी अभिलाषाओं पर लगाम लगाएँ, और संक्षेप में, इस बात पर आ जाएँ कि अपने आप को पूरी रीति से अपने परमेश्वर की सेवा में सौंप दें। हमें ऐसा ही करना चाहिए: और मूसा का ध्यान भी इसी ओर है। क्योंकि यदि हम किसी एक बात में भी चूकें, तो परमेश्वर की ओर से शापित हैं, और यहाँ उल्लिखित कठोरता के योग्य हैं। तौभी वह अपनी दया से हमें सहना नहीं छोड़ता: हाँ, वह यहाँ कही गई इतनी बड़ी कठोरता कभी न बरतेगा, सिवाय उन के जो पूरे हठ से उसके विरुद्ध खड़े होते हैं। तौभी यह अकारण नहीं कि मूसा यहाँ यहूदियों को व्यवस्था के सिद्ध पालन की ओर उभारता है। वैद्य जब कोई पथ्य बताता है, तो रोगी की भूख को खुली छूट नहीं देता कि वह कुछ भी, चाहे कितना ही थोड़ा, अनुचित करे: परन्तु कहता है, "मैं चाहता हूँ कि तू ऐसा-ऐसा करे।" अब यदि रोगी तनिक इधर-उधर हो जाए, तो ठीक है, वह अभी असाध्य नहीं, वैद्य फिर भी उसकी सुधि लेगा। परन्तु यदि वह सब कुछ अस्त-व्यस्त कर दे (जैसा कहते हैं), और सब पथ्य त्याग दे, और पागलपन करे; तो उसे अपनी करनी का फल मिलेगा। इसी प्रकार हमारा प्रभु भी चाहता है कि हम सब बातों में उसकी आज्ञा में रहें: और यह उचित भी है। तौभी निर्बलता इतनी बड़ी है (मैं उन में भी कहता हूँ जो पवित्र आत्मा के चलाए चलते हैं, और उसकी आज्ञा मानने का यत्न करते हैं) कि वे बहुत बातों में चूकते हैं: तौभी चाहे जैसी स्थिति हो, पाप उन पर प्रबल नहीं होता, वे जानबूझकर व्यवस्था तोड़ने का यत्न नहीं करते; परन्तु वे आगे बढ़ते और चलते रहते हैं: और यद्यपि वे लँगड़ाते हुए चलते हैं, तौभी परमेश्वर की ओर बढ़ते रहते हैं। इनके विषय में तो उन्हें सहा जाता है। यह सच है कि परमेश्वर उन्हें ताड़ना देगा: और कैसे? उन्हें क्षमा करते हुए ही: उसके इस कथन के अनुसार, "यदि तेरे लड़के मेरी आज्ञाएँ तोड़ें, तो मैं उनके अधर्म का दण्ड दूँगा; परन्तु वह मनुष्यों की छड़ी से होगा, चरम सीमा तक नहीं: मैं उनसे शत्रुओं का-सा व्यवहार न करूँगा, मैं उन से अपनी दया न हटाऊँगा, यद्यपि मैं उन्हें ताड़ना दूँगा।" इस विषय में परमेश्वर ऐसा ही करता है। परन्तु यदि हमारे हृदय पूरी रीति से कठोर हो जाएँ: तो वह हमसे लड़ेगा, और बिना बख्शे हमें नष्ट करेगा: और यद्यपि वह हमें सहे, तौभी सब कुछ हमारी लज्जा का कारण बनेगा। इस पाठ के विषय में हमें यह एक बात स्मरण रखनी है।

और यह भी ध्यान देने योग्य बात है, जहाँ मूसा लोहे के जूए की चर्चा करता है। क्योंकि वह कहता है, "यहोवा सब अविश्वासियों की गर्दन पर लोहे का जूआ तब तक रखेगा जब तक वे पूरी रीति से नष्ट न हो जाएँ।" और यह इसलिए कि हम सीखें कि जो ताड़नाएँ हम सुनते हैं उन्हें ग्रहण करें, और उन पर लात न मारें। क्योंकि हम देखते हैं कि हनन्याह पर क्या बीती, जब उसने यिर्मयाह की धमकियों को ठट्ठों में उड़ाया, और उसके गले पर जो जूआ था, जो काठ और रस्सियों का जूआ था, उसे तोड़ने आया। भविष्यद्वक्ता वह जूआ इसलिए पहने था कि लोगों को यह विचार करने को उभारे कि वे सब बन्दी बनेंगे, और इस प्रकार भविष्यद्वक्ता की देह में अपनी ही दशा देखें। अब इस दुष्ट ने, जिस पर शैतान सवार था, (परमेश्वर के वचन को तुच्छ ठहराने के लिए) यिर्मयाह के बन्धन तोड़ने आकर कहा, इसी प्रकार परमेश्वर नबूकदनेस्सर का जूआ तोड़ेगा: और यद्यपि वह तुम्हें घेरे, और तुम्हें परदेश में बन्दी बनाकर ले जाने के लिए जो कुछ वह कर सकता है करे: तौभी तुम अपने परमेश्वर के अनुग्रह से बचे रहोगे। परमेश्वर ने धमकी दी, और इस मनुष्य ने उसकी सब धमकियों का उपहास किया: और इसके साथ लोगों को भरमाने के लिए परमेश्वर के नाम की छाया ली। तो फिर, ऐसे विद्रोह से उसने क्या पाया? भविष्यद्वक्ता से कहा गया: "लोहे का जूआ ले: क्योंकि जहाँ बन्धन कोमल और सहने योग्य होना था, वहाँ अब वह ऐसा कठोर होगा कि वे और सह न सकेंगे।" देखो वह उन सब के साथ कैसा व्यवहार करता है जो परमेश्वर के विरुद्ध अपने हृदय कठोर करते हैं, और उसके हाथ से नम्र किए जाना नहीं सहते। तो हम इस लोहे के जूए से डरें। सबसे पहले, हम जानते हैं कि परमेश्वर का जूआ उन सब के लिए मनभावना है जो अपनी इच्छा से अपने आप को उसके अधीन करते हैं, और अपने प्रभु यीशु मसीह के हाथ से शासित होना सहते हैं। हमारे पास परमेश्वर के पुत्र की गवाही है, "मेरा जूआ सहज और मेरा बोझ हलका है। मेरे पास आओ, और मुझ से सीखो, क्योंकि मैं नम्र और मन में दीन हूँ।" जब हमारा प्रभु यीशु घोषणा करता है कि जो सीखने और मानने को तैयार हैं वे पाएँगे कि उसके जूए में न बोझ है, न भार, न कोई पीड़ा जो उन्हें कुचले: तो यह हमें उभारे कि हम अपनी गर्दनें उसके नीचे झुकाएँ, और परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह हमें उसके नीचे रखे, और जब हमने उसे अप्रसन्न किया हो तब हमें ताड़ना देने दें।

निश्चय, प्रेरित के कथनानुसार, वे चोटें हमें भारी लगेंगी, और जब तक परमेश्वर हमें मारता है तब तक हम ताड़नाओं को कभी सुखद न पाएँगे। हम छोटे बालकों के समान हैं जब उन्हें ताड़ना दी जाती है; हमें वह कष्टदायक लगती है, क्योंकि हमारा स्वभाव उसके विरुद्ध है। परन्तु हमें भाए या न भाए, परमेश्वर वही पितृवत् उपाय काम में लाएगा, और थोड़ा-थोड़ा करके हमें अपनी ओर लौटना सिखाएगा। परन्तु यदि हम उसके धीरज की अन्तिम सीमा तक परीक्षा करें, तो उसे लोहे की छड़ी से हमारे सिर तोड़ने पड़ेंगे, जैसा भजन में कहा गया है: "हमें वह लोहा सहना पड़ेगा, जो हमें लौटा लाने के लिए नहीं, वरन् हमें टुकड़े-टुकड़े करने और पूरी रीति से नाश करने के काम आएगा।" और यह उचित भी है। क्योंकि हम सुनते हैं कि यहाँ क्या कहा गया है: "यदि तू अपने परमेश्वर यहोवा के तेजोमय और भयानक नाम का भय न माने।" भली शिक्षा का तिरस्कार और अनादर, और पाप करने का जो साहस हम करते हैं, वह इसके सिवा और कहाँ से आता है कि हम सब चेतावनियों के प्रति बहरे हैं? निश्चय यदि हम अच्छे मन से और अच्छे भाव से अपने आप को अपने परमेश्वर का आज्ञाकारी बना सकते, और उसी बात पर निरन्तर बने रहते: तो हम इन धमकियों को सुनते ही यह विचार करते: "हाय, क्या हमने परमेश्वर के हाथ से भारी शाप नहीं कमाया, जब हमने उसके विरुद्ध ऐसा संघर्ष किया?" तब हम देखते हैं कि जितने कुकर्म और आज्ञा-उल्लंघन होते हैं, वे अज्ञानता और परमेश्वर के तिरस्कार से उत्पन्न होते हैं, क्योंकि हमने उसकी महिमा का आदर नहीं किया। निश्चय इस प्रकार का हठ सदा सीधे जानबूझकर और पहले से ठाने हुए द्वेष से नहीं होता: तौभी हम में ऐसी मूढ़ता है कि हम परमेश्वर को वह आदर नहीं देते जो उचित है, न वह आज्ञाकारिता जिससे हमें उसके वचन के अधीन होने का यत्न करना चाहिए। और क्योंकि हम ऐसे मन्दबुद्धि हैं कि जब हमें परमेश्वर के अधीन होने को पुकारा जाता है तब हमें कोई बात जगा नहीं सकती: इसलिए मूसा स्पष्ट कहता है, "यह भयानक नाम, यह तेजोमय नाम, अर्थात् अनादि, तेरा परमेश्वर।" जहाँ वह कहता है, अनादि या सनातन: वह शब्द सारी महिमा और प्रताप को सूचित करता है; और इसलिए हमें विस्मय से अभिभूत कर देना चाहिए: हाँ, सच है; क्योंकि हमें परमेश्वर का यह नाम केवल ठण्डे मन से बरतने को नहीं मिला कि कहें, "परमेश्वर, परमेश्वर," जैसा वे करते हैं जिनके होठों पर वह निरन्तर रहता है, और फिर उसे ऐसे उड़ जाने देते हैं मानो वह कुछ भी नहीं: परन्तु हमें दोनों को इस प्रकार जोड़ना है, "परमेश्वर, वही जिसने हमें बनाया; वही जो सब कुछ अपने हाथ में रखता है, वही जिसका आदर स्वर्गदूत करते हैं, वही जिसकी महिमा अनन्त है, वही जिसे स्वर्ग की सारी प्रधानताएँ सह नहीं सकतीं, जिसके दर्शन पर सब प्रकार के प्राणियों को अपनी आँखें नीची करनी पड़ती हैं, वही जो केवल एक वचन से सारी पृथ्वी को कँपा सकता है, वही जो अपनी एक फूँक से पहाड़ों को हटा सकता है, वही जो सब प्रकार के प्राणियों को अस्तित्व देता है, अन्ततः वही जो सब कुछ को थामता और चलाता है, और सब कुछ भली-भाँति, धार्मिकता और बुद्धि से ठहराता है: वही है जो हम से बोलता है।" और इस प्रकार तुम देखते हो कि हम मूसा के शब्दों को कैसे काम में लाते हैं, जहाँ वह कहता है, "अनादि तेरा परमेश्वर, वही अब तुझ से बोलता है।" इसलिए हम उसे ऐसी रीति से बोलते सुनें कि उसकी महिमा हमारी सारी बुद्धि पर अधिकार कर ले, और इसके द्वारा हम उसके सामने ऐसे दीन हों कि जब हम उसकी आराधना कर चुकें, तब उसके हाथ के नीचे ऐसे बने रहें कि अपने आप को उसके शासन में रहने दें, उस नियम पर चलने के लिए जो उसने हमें दिया है।

अब हम अपने परमेश्वर के न्याय-सिंहासन के सामने गिरें, उन अनगिनत दोषों को मानते हुए जिनके हम दोषी हैं, यदि वह हमारे विरुद्ध न्यायी का काम करना चाहे: और इसके साथ हम उससे प्रार्थना करें कि वह हमारे प्रभु यीशु मसीह के निमित्त हमारा पिता होना न छोड़े: और यह कि हम बहुत अपराधों के दोषी हैं, इसलिए हम प्रतिदिन अपने पापों से कटते जाने दें, ऐसा कि कोई बात हमें उसके पास आने से न रोके, कि हम अपने आप को उसके ऐसे हाथ में सौंपें कि अपनी सब दुष्ट अभिलाषाओं को और अधिक त्यागते जाएँ, जब तक हम उनसे पूरी रीति से छूट न जाएँ और उसकी स्वर्गीय धार्मिकता से ढाँपे न जाएँ। और इसलिए हम सब कहें, सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता, इत्यादि।

शुक्रवार, 27 मार्च, 1556 को।

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