अध्याय 5

154वाँ उपदेश, जो अट्ठाईसवें अध्याय पर पहला है

The Covenant Unveiled · John Calvin

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154वाँ उपदेश, जो अट्ठाईसवें अध्याय पर पहला है

154वाँ उपदेश,

जो अट्ठाईसवें अध्याय पर पहला है।

1 यदि तू अपने परमेश्वर यहोवा की बात माने, और उसकी उन सब आज्ञाओं को, जो मैं आज तुझे देता हूँ, पालन करे और मानता रहे, तो तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे पृथ्वी की सब जातियों का सिरमौर ठहराएगा।

2 और यदि तू अपने परमेश्वर यहोवा की बात माने, तो ये सब आशीषें तुझ पर आएँगी और तुझे चारों ओर से घेर लेंगी।

हम पहले देख चुके हैं कि परमेश्वर ने अपने लोगों के साथ वाचा क्यों बाँधी: इसलिए कि उन्हें बाँध रखे, ताकि हर एक अपना कर्तव्य जाने और उसे निभाने के लिए और भी तैयार हो। अब वह पूर्ण अधिकार रखनेवाले न्यायी के रूप में बोलता है। जब लोग कुछ अनुचित कर बैठें, तब इससे कुछ अन्तर नहीं पड़ता कि वे अपना दोष मानते हैं या नहीं; क्योंकि परमेश्वर यहाँ अपना अटल निर्णय सुनाता है, चाहे वे उससे सहमत न हों। और यहाँ बात केवल व्यवस्था के अपराधियों को दोषी ठहराने की ही नहीं है; वह तो एक और ही विषय से आरम्भ करता है, अर्थात् अति मनोहर प्रतिज्ञाओं से, ताकि मनुष्यों के हृदयों को लुभाकर अपनी ओर खींच ले। इसलिए वह यों कहता है: यदि तुम मेरी वाणी सुनकर मेरी आज्ञाओं को मानो, और उन्हें पूरा करने में चौकस रहो, तो तुम सब प्रकार से धन्य होगे, और मेरी कृपा से हर प्रकार की भलाई और समृद्धि तुम्हें घेरे रहेगी। मैं तुम्हें पहले बता चुका हूँ कि जब परमेश्वर इस रीति से मनुष्यों को जीतने का यत्न करता है, तब वह उन पर बड़ी भलाई प्रकट करता है; क्योंकि उसके लिए इतना कहना ही बहुत था कि यह तुम्हारा कर्तव्य है; और सारी सृष्टि उसके बोलते ही थरथरा उठती। इसलिए जब वह कोई प्रतिज्ञा जोड़ देता है, तब वह अपने अधिकार का एक अंश छोड़ देता है, और उसमें स्वयं को दीन करता है, ताकि हम उसकी सेवा के लिए और भी प्रवृत्त और तत्पर हों। यदि हमने वह सब कर लिया हो जो हम कर सकते हैं, वरन् जितना हमारी सामर्थ्य में है उससे भी अधिक: तो क्या परमेश्वर हमें बदला देने को बाध्य है? निश्चय नहीं। हमें सदा उस बात की शरण लेनी चाहिए जो हमारा प्रभु यीशु लूका के सुसमाचार में कहता है, अर्थात् यह: कि यदि किसी का कोई दास हो, और वह उसे दिन भर खेत में काम करने भेजे, और जब दास सन्ध्या को घर आए, तो क्या वह कहेगा: अच्छा, अब मेरी बारी है; तुम मेज़ पर बैठो, और मैं तुम्हारे लिए भोजन तैयार करूँगा, और तुम्हें खाना-पीना दूँगा, क्योंकि तुमने मेरे लिए परिश्रम किया है, और अब मेरी बारी है कि मैं तुम्हारी सेवा करूँ? क्या स्वामी ऐसा कहेगा? नहीं, कदापि नहीं। परन्तु जब दास घर आएगा, तब स्वामी उससे कहेगा, मेज़ लगा, मेरा भोजन तैयार कर, और मुझे पीने को दे। ठीक इसी प्रकार यीशु मसीह कहता है, जब तुम वह सब कर चुके हो जो तुम्हारे लिए करना सम्भव है: तो अपने मन में यह न सोचो कि मेरा पिता परमेश्वर तुम्हारा कुछ भी देनदार है, या तुम्हारा कुछ भी उपकार उस पर है: परन्तु आगे बढ़ते रहो, और मान लो कि तुम जो कुछ भी कर सकते हो वह उसके प्रति केवल कर्तव्य ही है। और सच तो यह है कि जब परमेश्वर ने हमें बनाया है, तो ऐसा कौन है जो उसकी सेवा में अत्यधिक कर सके? तब हम देखते हैं कि परमेश्वर स्पष्ट कह सकता था: मुझे यही भाता है, और यही मेरी इच्छा है, तुम उसी मार्ग पर चलो। इसलिए जब वह हमसे कहता है कि हम धन्य होंगे और हमारा परिश्रम व्यर्थ न जाएगा, वरन् उसकी सेवा का प्रतिफल मिलेगा: तो इसमें सन्देह नहीं कि ऐसा करके वह अपने अधिकार का कुछ अंश छोड़ देता है। साथ ही हम देख सकते हैं कि वह अपने बालकों को जीतने के लिए भला और कोमल हृदय पिता बनकर दिखाता है। क्योंकि यद्यपि पिता भली-भाँति जानता है कि उसके बालक पूरी रीति से उसकी आज्ञा मानने को बँधे हैं, और वह स्वयं उनके प्रति किसी रीति से बँधा नहीं है, तो भी वह यह कहने से नहीं रुकता: देखो, मैं तुमसे प्रेम रखता हूँ, और केवल तुम्हारी भलाई चाहता हूँ: बस इतना करो कि मैं तुमसे प्रसन्न रहूँ, और मैं तुम्हें न छोड़ूँगा। पिता प्रतिज्ञा करने में उदार होगा, यह कहकर: चलो, तुम जानते हो कि जो कुछ मेरे पास है वह सब तुम्हारे ही लिए है: मैं और किसके लिए परिश्रम करता हूँ? और किस और उद्देश्य से? और यदि मैं देखूँ कि तुम भले मार्गों पर चल रहे हो, तो मैं तुमसे वैसा ही व्यवहार करूँगा। अपने अधिकार में रहते हुए भी जो पिता अपने आपको दीन करता है, वह ऐसा ही करता है। और किसलिए? इसलिए कि वह चाहता है कि उसके बालक कठोर विवशता के दबाव से नहीं, वरन् अपनी स्वतन्त्र इच्छा से उसकी सेवा करें। इसलिए हम ध्यान दें कि पवित्र शास्त्र में जितनी प्रतिज्ञाएँ हैं, वे सब मानो हमारे परमेश्वर के पितृवत् प्रेम की साक्षियाँ हैं; वह इस बात में प्रकट करता है कि उसे हमारे कल्याण और हित की चिन्ता है, कि वह कृपा करके इस प्रकार अपने आपको हमारे अनुकूल ढालता है। इसी कारण परमेश्वर की व्यवस्था हमें और भी प्रिय लगती है; क्योंकि हम देखते हैं कि उसके पालन में हम उत्तम प्रतिफल से वंचित नहीं रहते, वरन् ऐसा प्रतिफल पाते हैं जो हमारी इच्छा से कहीं बढ़कर है। क्योंकि इस आशीष शब्द के अन्तर्गत हर प्रकार की समृद्धि समाई हुई है।

फिर, जब परमेश्वर इस संसार में हमें समृद्ध करता है, तो उसका उद्देश्य और कुछ नहीं, केवल यह है कि हम अपने प्रति उसके प्रेम का स्वाद चख सकें। तो भी वह नहीं चाहता कि हम मुख्यतः इसी बात पर ठहर जाएँ: वह हमें सदा आगे ले जाता है: यहाँ तक कि जब हम इस वर्तमान जीवन में उसकी भलाई का अनुभव करते हैं, और यह कि वह हमारी चिन्ता करता है, और यह कि वह हमारी सब आवश्यक वस्तुओं का प्रबन्ध करने को अपना हाथ बढ़ाता है: तब हमें इससे और भी दृढ़ता से यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि जब वह हमें इस वर्तमान संसार से उठा लेगा, तब वह हम पर अपनी भलाई का धन ऐसी रीति से उँडेलेगा जिसे हम अब समझ भी नहीं सकते। निश्चय ही इस जीवन में हमें उसकी कुछ थोड़ी-सी झलक मिलती है, परन्तु उसकी भरपूर पूर्ति स्वर्ग के राज्य में होगी। देखो, हमें यह विचार करना है कि हमारा परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाएँ इसलिए देता है कि हमें इस रीति से सिखाए कि हम स्वेच्छा से उसकी और भी भली सेवा करें।

तथापि संसार जैसा भी चले, हम ध्यान दें कि परमेश्वर जितनी प्रतिज्ञाएँ हमसे किसी शर्त पर करता है, वे हमारे किसी काम की नहीं (जैसा कल तुम्हें बताया गया था) यदि हम वहीं ठहर जाएँ। क्यों? सच है कि परमेश्वर विश्वासयोग्य है: और उसका कहना हमें धोखा देने के लिए नहीं है: पर तब भी हम अपने ऊपर दृष्टि करें। ऐसा कौन है जो अपना कर्तव्य ऐसी रीति से निभाए कि परमेश्वर से आशीष पाने की आशा कर सके? यह नहीं कहा गया: यदि तुम मेरी व्यवस्था का कुछ अंश मानोगे तो धन्य होगे: परन्तु पाठ में यह कहा गया है: यदि तुम मेरी वाणी सुनो, और मेरी सब आज्ञाओं को मानने में यत्नशील रहो, और उन सब को पूरा करो: तब मैं तुम्हें आशीष दूँगा। अब जब मैं कहता हूँ कि मनुष्य परमेश्वर की व्यवस्था को मानने में अपनी पूरी शक्ति से लगें, तो मैं उनके अपने बल या स्वाभाविक प्रेरणा की बात नहीं कह रहा। क्योंकि जो पवित्र आत्मा से नया जन्म नहीं पाए हैं, वे परमेश्वर की सेवा तक पहुँचने से इतनी दूर हैं कि कोई अच्छा विचार तक नहीं कर सकते। मनुष्य का झुकाव परमेश्वर और उसकी सारी धार्मिकता से लड़ने के सिवा और क्या है? जब तक मनुष्य अपनी ही आत्मा की अगुवाई में चलते हैं, तब तक वे परमेश्वर की सारी इच्छा के पूरे विद्रोहियों के समान उससे लड़ने के सिवा और कुछ नहीं करते। संक्षेप में, हम तो (जैसा पौलुस कहता है) भलाई करने का विचार तक करने के योग्य नहीं हैं। विचार करना तो बहुत छोटी बात है: फिर भी पौलुस हमसे वह सामर्थ्य भी छीन लेता है, और दिखाता है कि हम ऐसे बिगड़े हुए और हठीले मन के हैं कि सब बातों में परमेश्वर की आज्ञा से उलटे ही खिंचते हैं। यहाँ तक कि जब परमेश्वर ने अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें सुधार लिया है, और हमारे उस द्वेष और विद्रोह को बदल दिया है जिसकी ओर हम पूरी रीति से झुके हुए थे: तब भी यह नहीं कहा जा सकता कि हम सारी सिद्धता के साथ उसकी आज्ञा मानने तक पहुँच गए हैं: क्योंकि कोई न कोई निर्बलता सदा हमें रोकती है: ऐसे कि दौड़ने के बदले हम लँगड़ाते हैं, और अपने पैर घसीटते हैं: सीधे आगे बढ़ने के बदले हम इधर से उधर डगमगाते हैं: और प्रायः हमें ठोकर लगती और हम गिर पड़ते हैं, जैसा हर मनुष्य अपने आप में भली-भाँति पा सकता है। तब हम कैसे आशा करें कि अपने परमेश्वर से आशीष पाएँगे, जबकि हम उसकी व्यवस्था के पालन से इतनी दूर भटके हुए हैं? इसी कारण मैंने कहा कि जितनी प्रतिज्ञाएँ शर्त पर टिकी हैं, वे सर्वथा निष्फल हैं, और कभी पूरी न होंगी, यदि परमेश्वर उसी बात पर ठहरा रहे। वास्तव में यह बात कल समझाई गई थी, और पौलुस ने यह स्थान स्पष्ट रूप से उद्धृत किया था, जहाँ कहा गया है कि यदि उद्धार कर्मों से मिलता, और मीरास व्यवस्था से होती: तो प्रतिज्ञाओं की कोई पूर्ति न होती। क्योंकि हम अपनी ओर से चूक जाते हैं, और इसलिए वह वाचा, जो परमेश्वर ने हमसे बाँधी है, निष्फल हो जाती है: तो भी इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि परमेश्वर ये प्रतिज्ञाएँ ठहराकर हमारा उपहास करता है: जैसा पोप-भक्त लोग पहली ही बात पर करते हैं, अपनी सीमा से बाहर कूदकर पागलों जैसा व्यवहार करते हुए। क्योंकि जब कहा जाता है कि पवित्र शास्त्र की सब प्रतिज्ञाएँ परमेश्वर की सेंतमेंत भलाई से हमारे पापों की क्षमा के सिवा और किसी रीति से प्रभावशाली नहीं होतीं, और कि हम केवल विश्वास से धर्मी ठहरते हैं: तब वे (कहते हैं) क्या? जब यह कहा गया है कि मैं तुम्हें आशीष दूँगा, यदि तुम मेरी सेवा और आदर करो, तो ऐसा लगता है कि परमेश्वर केवल कपट करता है, और मनुष्यों के साथ खिलवाड़ करता है। किस प्रयोजन से (वह यों कहता है)? इस प्रकार पोप-भक्त लोग परमेश्वर पर झूठ का दोष लगाते हैं और उसकी निन्दा करते हैं, यदि वे उसकी की हुई प्रतिज्ञाओं के योग्य नहीं ठहर सकते। क्योंकि अन्यथा [उनका विचार है कि] यह केवल उपहास है कि मनुष्यों को विश्वास दिलाया जाए कि वह उन्हें आशीष देगा। परन्तु हम ऐसे पागलपन से बचें, और यह समझने का यत्न करें कि परमेश्वर ने मनुष्यों को अपनी प्रतिज्ञाएँ किस उद्देश्य से दी हैं: और हम देखेंगे कि वे व्यर्थ नहीं हैं। मैंने पहले कहा था कि परमेश्वर ने हमारे प्रति इतने प्रेम से स्वयं को दीन करके अपनी बड़ी भलाई दिखाई है। हम सर्वथा उसी के हैं, हम पूरी रीति से उसके हैं, तो भी उसने केवल आज्ञा देना न चाहा; परन्तु प्रतिज्ञाओं और कोमलता के साथ आज्ञा दी कि हमें जीत ले। यदि कोई इस पर उत्तर दे और कहे, इससे हमें क्या लाभ? सच तो यह है कि यदि हम वहीं ठहर जाएँ तो हमें कुछ भी लाभ नहीं: परन्तु हमें आगे बढ़ना है। जब हम उन प्रतिज्ञाओं को सुनते हैं जो परमेश्वर ने हमें दी हैं, और देखते हैं कि उसका सारा यत्न हमें प्रेम के द्वारा जीतने का है, और कि वह हमें विवशता से बलपूर्वक नहीं चलाना चाहता, तो यदि हम अपने आपको पूरी रीति से उसकी ओर न झुकाएँ, तो यह हमें कृतघ्न ठहराता है। परन्तु हम ऐसा कर नहीं सकते। क्यों? तो क्या हम निर्दोष ठहरे? नहीं। क्योंकि यह हमारी अपनी दुष्टता है जो हमें रोकती है। याकूब कहता है, हर एक मनुष्य अपने आपको दोषी ठहराएगा, क्योंकि हमें बुराई के लिए उकसानेवाली कोई वस्तु नहीं, केवल हमारे अपने शरीर की अभिलाषा है। जब दोष हमारा ही है, तब हमें और कोई दलील नहीं देनी चाहिए, और यहाँ तुम देखते हो कि हम परमेश्वर के सामने लज्जित हो गए हैं। इस प्रकार हमारे पास दुगुना दीन होने का कारण है।

पहले तो इसलिए कि हम ऐसे ओछे हैं कि परमेश्वर की भलाई हमें उसके निकट आने और अपने आपको उसकी अगुवाई में रखने के लिए नहीं उभारती: और दूसरे इसलिए कि हम अपने भीतर के पाप की गहराई की खोज इस रीति से नहीं करते: हाय, जब मेरे भीतर प्रतिदिन असंख्य विचार, इतनी अभिलाषाएँ और उमंगें, इतनी वासनाएँ उठती हैं, जो सब की सब मुझे उस भलाई से दूर हटाने का काम करती हैं जिसके लिए परमेश्वर मुझे बुलाता है: जिसके कारण मैं सब बातों में परमेश्वर को अप्रसन्न करने से नहीं रुकता, यहाँ तक कि मुझमें से पूर्ण बुराई, सारे अपराध, और सारे अधर्म के सिवा और कुछ नहीं निकाला जा सकता: हाय, मेरी दशा क्या है? जब मनुष्य यह देखते हैं, तो उन्हें अवश्य ही दुगुनी लज्जा का अनुभव होता है। और जब वे अपने आपको भली-भाँति परख लेते हैं, [तो उन्हें अवश्य यह सोचने पर विवश होना पड़ता है,] भला, परमेश्वर ने उद्धार पाने के लिए मेरे सामने वे सब साधन रख दिए हैं जिनकी मैं इच्छा कर सकता हूँ, यदि मैं पूरी रीति से भ्रष्ट और हठी न होता। और अब मैं अज्ञानता का बहाना नहीं कर सकता, क्योंकि व्यवस्था मुझे दी गई है, और मुझे मार्ग दिखाया गया है कि मुझे अपने आपको कैसे चलाना और अपना जीवन कैसे बिताना चाहिए। और इसलिए कि मैं उसके लिए और भी इच्छुक होऊँ; मेरा परमेश्वर कोमलता से मुझे उसकी ओर लाता है, यह प्रतिज्ञा करके कि उसकी सेवा के लिए मुझे प्रतिफल मिलेगा। क्या ऐसा है? तब क्या करना चाहिए? इस दशा में मुझे और कोई विरोध नहीं करना चाहिए, और न परमेश्वर के विरुद्ध और कोई दलील देते रहना चाहिए: क्योंकि मैं पहले ही बहुत अधिक दोषी हूँ। जब मनुष्य अपने आपको इस प्रकार दोषी ठहरा पाते हैं, तब वे विवश होकर अपना उद्धार अपने से बाहर खोजते हैं, और इस दूसरे उपाय की शरण लेते हैं; हे प्रभु, यदि बात ऐसी होती कि तेरी सेवा करने से मुझे उद्धार मिलता, तो तूने मुझे अपनी व्यवस्था दी है, और उसके साथ अपनी प्रतिज्ञाएँ भी जोड़ी हैं; तथापि ये बातें मेरे किसी काम की नहीं: इसलिए मुझे अपने आपको त्यागना होगा, यह मानते हुए कि जब तक मुझे कोई और उत्तम सहायता न मिले, तब तक जीवन की सारी आशा से मैं पूर्णतः वंचित हूँ। देखो, मैं कहता हूँ, इस प्रकार हम अपने प्रभु यीशु मसीह तक पहुँचाए जाते हैं, और उस अनुग्रह को ग्रहण करने के लिए प्रेरित किए जाते हैं जो उसमें हमें दिया जाता है, ताकि अपने पापों की क्षमा पाकर हम निश्चित हों कि हम परमेश्वर से आशीष पाएँगे। जब एक बार हमने यह कृपा पा ली कि परमेश्वर हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमसे मेल रखता है; तब वह हमारे अपूर्ण कामों को ऐसे ग्रहण करता है मानो हमने सारी व्यवस्था पूरी कर दी हो। यद्यपि विश्वासी जो भलाई करते हैं वह परमेश्वर के ग्रहण करने के योग्य नहीं: तो भी वह उसे भली मानकर ग्रहण करता है। और किसलिए? क्योंकि वह अपनी ही भलाई से उनके सारे दोष मिटा देता है। इसलिए जब हम भला करने का परिश्रम करते हैं, चाहे अपनी प्रकृति की अत्यन्त दुर्बलता के कारण सिद्धता तक पहुँचना हमारे वश में नहीं: तो भी परमेश्वर हमारी सेवा को ऐसे ग्रहण करेगा मानो उसे उसमें कहने को कुछ न हो: और इस प्रकार हम यहाँ बताई गई आशीषों के भागी बनाए जाते हैं। कैसे? हमने सब पूरा नहीं किया: यह सच है: पर परमेश्वर उसे अपने लेखे में ऐसे गिन लेता है मानो सब पूरा हो गया, क्योंकि हम यीशु मसीह के लहू से शुद्ध किए गए हैं। और जैसे हम शुद्ध किए जाते हैं, वैसे ही हमारे कर्म भी, और जब वे परमेश्वर के सामने आते हैं, तो वह उन्हें ऐसे ग्रहण करता है मानो वे सर्वथा भले, धर्मी और सिद्ध हों। इसलिए यहाँ हम देखते हैं कि प्रतिज्ञाएँ व्यर्थ नहीं दी गईं, वरन् विश्वासियों में उनका प्रभाव होता है: पहली ही बार में नहीं, परन्तु जब हम क्रमशः और परिस्थितियों के साथ उस तक पहुँचते हैं, तब हम उनके प्रभाव और बल का अनुभव करेंगे। जहाँ तक अविश्वासियों का सम्बन्ध है, प्रतिज्ञाएँ उनके किसी काम की नहीं; केवल इसलिए कि अन्तिम दिन परमेश्वर के सामने वे और भी निरुत्तर ठहरें। क्योंकि वे क्या दलील दे सकेंगे, जब परमेश्वर ने ऐसी आत्मीयता से स्वयं को उनके सामने प्रस्तुत किया है, और उनके सारे जीवन का आनन्द लेने के सिवा और कुछ नहीं माँगा: कि वे उसकी आज्ञा मानें: फिर भी वे कठोर मन बने रहें? क्या तुम नहीं देखते कि वे दुगुने लज्जित कैसे हैं? इसलिए व्यवस्था की प्रतिज्ञाएँ और चेतावनियाँ सदा भली और धर्ममय हैं, और वे निष्फल न होंगी, यदि मनुष्य उन्हें वैसा ग्रहण करना जाने जैसा उचित है। परन्तु यह उस विवेचन से और भली-भाँति समझ में आएगा जो मैं इस पर विस्तार से करूँगा। अब हम उन शब्दों की व्याख्या करें जो मूसा काम में लाता है। यदि तू अपने परमेश्वर यहोवा की वाणी सुने, और उन सब आज्ञाओं को पूरा करने में चौकस रहे जो मैं आज तुझे देता हूँ: तो ये सब आशीषें तुझ पर आएँगी और तुझे चारों ओर से घेर लेंगी। पहली बात के विषय में मूसा वही दिखाता है जो हम पहले देख चुके, अर्थात् यह कि भली रीति से जीने का आरम्भ परमेश्वर की सुनना है। क्योंकि मनुष्यों को अपने ऊपर आप शासन नहीं करना है, यह कहते हुए कि मैं अपनी ही रुचि के अनुसार अपने आपको चलाऊँगा: हमें ऐसी स्वतन्त्रता नहीं लेनी चाहिए: क्योंकि जो अपने ऊपर बहुत अधिक लेता है, वह अन्त में परमेश्वर द्वारा ठुकरा दिया जाएगा, क्योंकि उसने उसे वह आज्ञाकारिता न दी जो वह नींव है जिस पर हमें निर्माण करना चाहिए। इसलिए हम ध्यान दें कि जितने लोग अपनी ही मूर्खतापूर्ण भक्तियों के पीछे चलते हैं (जैसा वे उन्हें कहते हैं), वे परमेश्वर को अप्रिय हैं। क्योंकि भविष्यद्वक्ता यशायाह का यह पाठ यहाँ लागू होना चाहिए। तुम से ये बातें किसने चाही हैं? इसलिए हम मानें कि जब परमेश्वर हमें अपनी इच्छा प्रकट करता है तो यह अमूल्य उपकार है, और कि पोप-भक्तों की दशा शापित है। क्योंकि जब वे भला करना चाहते हैं, तो उन्हें नहीं सूझता कि किधर मुड़ें, परन्तु हर एक अपनी ही कल्पना के पीछे चलता है, यह कहते हुए कि मुझे आशा है कि सब भला होगा, क्योंकि मेरा अभिप्राय भला है: और फिर प्रचलित रीति इसे मान्य ठहराती है, और हमारी पवित्र माता कलीसिया इसकी आज्ञा देती है: परन्तु इस बीच परमेश्वर की व्यवस्था भुला दी जाती है। इससे हम सीख सकते हैं कि मनुष्य के जीवन में उलझन के सिवा कुछ नहीं, जिसमें बिना क्रम के मिलावट के सिवा और कुछ नहीं है, जब तक कि वे परमेश्वर से सिखाए न जाएँ, जैसा हम आगे देखेंगे। मार्ग यही है, इसी पर चलो। कहा गया है कि हमें चौकस रहना चाहिए। यह शब्द मूसा पहले एक बार रख चुका है, और यहाँ फिर से दोहराया गया है तो बिना कारण नहीं। क्योंकि इससे हमें चेतावनी मिलती है कि यदि मनुष्य परमेश्वर की आज्ञा मानने में बहुत सावधान न हों, और उसके लिए अपने आपको विवश न करें, और अपना सारा अध्ययन सच्चे मन से उसी में न लगा दें, तो वे व्यवस्था के पालन तक कभी न पहुँचेंगे। और हम स्वयं देखते हैं कि हममें कितनी निर्बलता है, वरन् तब भी जब परमेश्वर हमें चला रहा है, और यद्यपि हम उसके पवित्र आत्मा से सुधारे गए हैं। क्योंकि अविश्वासियों के विषय में तो वे अपनी जान-बूझकर की हठ में ऐसे बह जाते और ऐसे उग्र हैं कि मनुष्य समझे कि वे परमेश्वर के विरुद्ध पागल हो जाएँगे। वरन् यद्यपि हम पवित्र आत्मा के द्वारा चलाए जाते हैं; तो भी हम ऐसे दुर्बल हैं कि देखकर तरस आता है। परमेश्वर बड़ी सिद्धता की माँग करता है, जब वह चाहता है कि हम अपने सारे मन से उससे प्रेम करें, इस संसार की सारी व्यर्थताओं और अपनी सारी शारीरिक अभिलाषाओं से दूर रहें; और (संक्षेप में) अपने आपको त्याग दें, और पूरी रीति से बदल जाएँ। यह बात बहुत ऊँची और कठिन है। अब विचार करें कि शैतान हमें परमेश्वर की सेवा से फेरने के लिए क्या-क्या उपाय रचता और काम में लाता है: कितने प्रकार की परीक्षाएँ हैं? वे अनगिनत हैं। फिर शैतान हमारे विरुद्ध जो आक्रमण तैयार करता है वे कितने भीषण हैं? जब हम इन सब पर विचार कर चुके हों; तब हम भली-भाँति यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि परमेश्वर का यह कहना बिना कारण नहीं कि हमें चौकस रहना चाहिए, कि हम में से हर एक अपने आपको दृढ़ करे, और अपनी सारी शक्ति एकत्र करे; और यह न सोचे कि अपने परमेश्वर की सेवा के लिए लापरवाही से निकल पड़े। क्योंकि जब हम समझते हैं कि एक पग आगे बढ़ेंगे, तब हम सौ पग पीछे चले जाएँगे, यदि हम बहुत दृढ़ और साहसी न हों, अपने आपको भय में रखते हुए और अपने पर लगाम लगाते हुए, और अपनी बुद्धि को ऐसी रीति से समेटते हुए कि हम अपना मन पूरी रीति से उसी में लगाएँ, और जैसा तुम कहोगे) उसमें यात्रा करते हुए साँस लेने को हाँफें।

और फिर, जब हम चारों ओर घातों से ऐसे लदे हैं, और शीघ्र ही ऐसे अचानक पकड़े जा सकते हैं कि हमें पता चलने से पहले ही हम शैतान के फन्दों में गिर जाएँ: तो हम चौकस और जागते रहें। यही वह बात है जिसकी हमें चेतावनी दी गई है। और परमेश्वर करे कि हम यह पाठ भली-भाँति ग्रहण कर लें। तब, जबकि अब हम अपनी सारी शक्ति और सारा प्रयत्न केवल निरर्थक ही नहीं, वरन् सर्वथा हानिकारक बातों में लगाते हैं, जिनका और कोई उद्देश्य नहीं सिवा इसके कि हमें धोखा देकर नाश में डालें: तब हम में से हर एक परमेश्वर की आज्ञाकारिता में चलने और अपने आपको पूरी रीति से उसके प्रति समर्पित करने में जागरूक रहेगा। और जब हमें इसकी चेतावनी दी जा चुकी है, तो कोई बहाना नहीं। तो क्या हम अपने परमेश्वर की आज्ञा मानेंगे, और दिखाएँगे कि हमारा मन बिना कपट के ऐसा ही झुका हुआ है? हम में से हर एक उस ओर झुके जो उसे आज्ञा में दिया गया है: अर्थात् चौकस, जागरूक और सचेत रहने की ओर।

अब वह आगे कहता है: उन सब आज्ञाओं को मानना जो मैं आज तुम्हारे सामने रखता हूँ, या जो मैं तुम्हारे लिए ठहराता हूँ। यद्यपि इसका बोलनेवाला मूसा है: तो भी वह आज्ञा देने और मनुष्यों को अधीन करने का अधिकार और सामर्थ्य अपनी किसी गढ़ी हुई बात के लिए नहीं लेता, मानो कहे कि इसलिए इसे बिना विरोध के मान लेना चाहिए: परन्तु परमेश्वर के लिए लेता है, क्योंकि परमेश्वर उसके मुँह से बोलता है, और इसलिए कि वह स्वयं उस शिक्षा को जो उसे सौंपी गई थी विश्वासयोग्यता से पहुँचाता है। इसलिए वह ऐसी ऊँची भाषा में बोलता है, यहाँ तक कि कहता है कि वे उसकी विधियों को मानें। किसी नश्वर मनुष्य के वश में नहीं कि वह लोगों के विवेक को बाँधे। फिर भी यही वह बात है जिसने कलीसिया को सर्वथा बिगाड़ दिया; क्योंकि मनुष्यों ने मनुष्यों के प्राणों के आत्मिक शासन के लिए व्यवस्थाएँ और विधियाँ बनाने में परमेश्वर का पद हड़प लिया। और यह परमेश्वर के विरुद्ध घोर राजद्रोह है। क्योंकि सृजा हुआ प्राणी अपने लिए वह बात हड़प लेता है जो केवल परमेश्वर की है, जिसे भविष्यद्वक्ता यशायाह व्यवस्था देनेवाला* कहता है, और इसी प्रकार याकूब भी,* ताकि हम उसकी सुनना सीखें, और पूरी रीति से उसके वचन पर निर्भर रहें। इसलिए हम भली-भाँति ध्यान दें कि मनुष्यों के लिए मनुष्यों के प्राणों पर व्यवस्थाएँ थोपना उचित नहीं। परन्तु जब मूसा कहता है, मैं तुम्हारे लिए ठहराता हूँ, तो वह यह मानकर चलता है कि उसने अपनी ओर से कुछ आगे नहीं रखा, न अपने मन से कोई व्यवस्था गढ़ी, न उसमें जो परमेश्वर ने उसे सौंपा था कुछ जोड़ा: परन्तु क्योंकि उसने अपना कार्य विश्वासयोग्यता से किया, इसलिए वह भली-भाँति कह सकता था, मैं तुम्हारे लिए ठहराता हूँ। जैसे जब हम परमेश्वर का शुद्ध वचन सुनाते हैं, तब वही वचन सर्वोच्च आज्ञा है। अब इसका अर्थ यह नहीं कि हम मनुष्यों के प्राणों पर कोई प्रभुता या सर्वाधिकार हड़प लें। परन्तु यह कि परमेश्वर की सेवा करते हुए हम उसके नाम से और उसके स्थान पर आज्ञा दें। इस प्रकार हम यहाँ देखते हैं कि मूसा का आशय क्या था। और सच तो यह है कि क्या यह हमारे वश में है कि हम मनुष्यों से अनन्त जीवन की प्रतिज्ञा करें? या उन पर परमेश्वर के दण्ड की घोषणा करें? तो भी हम यह करते ही हैं। हाँ, निश्चय, पर उतनी ही दूर तक जितनी परमेश्वर का वचन हमारे मुँह में डाला गया है, और जितना हमारे पास उसकी साक्षी है, कि हम उसके साक्षी और उसके अग्रदूत हैं: उसके साक्षी (मेरा अर्थ है) कि विश्वासियों को उस अनुग्रह और उद्धार का निश्चय दिलाएँ जिसकी प्रतिज्ञा उनसे की गई है; और उसके अग्रदूत कि सब अविश्वासी और विद्रोही लोगों के विरुद्ध उसका दण्ड सुनाएँ और प्रकाशित करें। इसलिए संक्षेप में, परमेश्वर ने अपने वचन की महिमा प्रकट करनी चाही, जब उसने मूसा को इस रीति से बोलने के लिए ठहराया। और यह इसलिए कि जब हमें परमेश्वर का वचन सुनाया जाए तो हम उसे और भी अधिक दीनता और श्रद्धा के साथ ग्रहण करें: व्यक्ति का मुँह न देखें, मानो यह सोचें कि वह तो बस एक मनुष्य है जो बोलता है, वह हमारे ही समान है, जैसे हम हैं वैसा ही वह भी है: परन्तु ऐसे मानो हम अपने मन में यह सोचें, इस मनुष्य के मुँह से परमेश्वर बोलता है: इसलिए हम उसकी उपस्थिति में थरथराएँ, झुकें, और जो वह कहता है उसे ग्रहण करें: और जब वह हमें अपने सामने बुलाता है, तो यह हमें ऐसी आज्ञाकारिता में लाए कि हम उसे दण्डवत् करें: और इस प्रकार दिखाएँ कि जो कुछ उसकी महिमा से निकलता है उसे हम ग्रहण करते हैं। इस पाठ के विषय में हमें जो स्मरण रखना है उसका सार यही है।

अब यहाँ यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि यह क्यों कहा गया है: जब तुम मेरी सब आज्ञाओं का पालन कर चुके हो: क्योंकि जब तक हम इस नश्वर शरीर को पहने हुए हैं, तब तक व्यवस्था को पूरा करना हमारे लिए असम्भव है। जैसा मैंने पहले कहा, हम सदा दोषों और अपूर्णताओं से भरे रहेंगे। तब तो ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर का व्यवस्था की ऐसी पूर्ति माँगना निरर्थक है, जबकि यह असम्भव है। परन्तु यहाँ हमें वह स्मरण रखना चाहिए जो पहले कहा जा चुका है: अर्थात् यह कि परमेश्वर अपनी व्यवस्था में हमारे बल, सामर्थ्य या योग्यता को नहीं देखता, वरन् हमारे कर्तव्य को, और इस बात को कि हमारा जीवन किस रीति से चलाया जाना चाहिए। और हमारे लिए यही पर्याप्त होना चाहिए, क्योंकि हम कहते हैं कि मनुष्य परमेश्वर की सिद्ध आज्ञाकारिता तक कभी नहीं पहुँचेगा, वरन् हम अपने मार्ग के अन्त से सदा दूर रहते हैं: इसका कारण हमारी भ्रष्ट प्रकृति है, जो मूल पाप से ऐसी संक्रमित है कि जब हम परमेश्वर का विचार करते हैं, तब अनेक बुरी कल्पनाएँ हमें व्याकुल करती हैं: और जब हमारे मन में कोई भली प्रेरणा उठती है, तो हम तुरन्त उससे पीछे खींच लिए जाते हैं, और हमें सर्वथा उलटी ओर खिंचने के लिए और किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं। परन्तु अब इसी बीच, क्या उसे करने की असम्भवता हमें परमेश्वर की उस सेवा से छुड़ा देती है जो हमें उसके प्रति करनी है? नहीं। क्योंकि बुराई हमारी ही ओर से है। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि परमेश्वर अपनी व्यवस्था में मनुष्य की सामर्थ्य या असामर्थ्य का कुछ विचार न करे, वरन् उस कर्तव्य का जो हम पर उसका है, या कि वह अपना उचित अधिकार माँगे: क्योंकि ऐसा कौन है जो उसे यह देने से इनकार कर सके? उसे अपनी प्रकृति नहीं बदलनी है। यदि हम हठीले हैं, तो उसका हमारे दागों और मलिनता में हाथ डालने से क्या सम्बन्ध? परन्तु वह ऐसी धार्मिकता सामने रखता है जिसके विरुद्ध हम उत्तर नहीं दे सकते। और अपनी व्यवस्था में वह ऐसी धार्मिकता नहीं ठहराता जैसी स्वयं उसमें है, वह अपनी धार्मिकता की ओर नहीं देखता, परन्तु उस धार्मिकता की ओर जो उसके सृजे हुए प्राणियों में होनी चाहिए, अर्थात् ऐसी जैसी उसके स्वर्गदूतों में है। यदि हम अपनी खराई में बने रहते, और पाप के द्वारा बिगड़ और भ्रष्ट न हुए होते, तो परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था में हमसे जो कुछ माँगा है वह सब हम पूरा कर सकते। यह निश्चित है। अब हम देखते हैं कि परमेश्वर का हमसे अपनी सारी व्यवस्था का पालन चाहना बिना कारण नहीं। फिर भी हम उसे पूरा नहीं कर सकते। यह सच है: परन्तु चूक उस पाप से उत्पन्न होती है जो हम में बसा है, जैसा मैंने पहले दिखाया है।

अब इसके साथ ही हमें यह भी ध्यान देना है कि जब परमेश्वर किसी से कुछ प्रतिज्ञा नहीं करता सिवा उनके जिन्होंने सारी व्यवस्था मानी है, तो यह सोचना कि हम यह या वह करके कुछ कमा या पा सकते हैं, अत्यन्त मूर्खता है: हमें पहले सारी व्यवस्था का पालन करना होगा, जो असम्भव है। और जहाँ पोप-भक्त अपने पुण्यों की बकवास करते हैं, यह मानकर कि वे स्वर्ग का राज्य मोल ले सकते हैं; वे समझते हैं कि जब वे अपनी दृष्टि में कोई भलाई कर लेते हैं, तब परमेश्वर उनका ऋणी हो जाता है, वे कहते हैं, अहा, मैं श्रद्धा से मास में गया था। यह निश्चित है कि ऐसा करके वे परमेश्वर के क्रोध को भड़काते हैं: क्योंकि हम जानते हैं कि यह शैतानी घृणित काम है। फिर वे कहते हैं, मैंने अमुक सन्त की, जो मेरा संरक्षक है, सेवा की है, मैंने अमुक चैपल बनवाया है: और वे अपने आपको समझाते हैं कि ऐसा करके वे स्वर्ग कमाते हैं। सच तो यह है कि ये सब बातें परमेश्वर को चिढ़ाना ही हैं: ये शैतानी अन्धविश्वास हैं, जिनसे परमेश्वर की सेवा बिलकुल विकृत हो जाती है। परन्तु मान लो कि पोप-भक्तों का ऐसी तुच्छ वस्तुओं से इस प्रकार खिलवाड़ करना उचित था: तो क्या इससे परमेश्वर उनके प्रति और अधिक बँध गया होता? उन्हें पहले यह सोचना चाहिए कि वह लेख किस नोटरी के सामने पास हुआ। क्योंकि यह हमारा काम नहीं कि उस पर लगाम कसें, या उसे खूँटे से बाँधें, या अपनी कल्पनाओं के अधीन करें। वह तो उसकी अपनी इच्छा से निकलना चाहिए। अब तब वह क्या कहता है? जब तुम मेरी सब आज्ञाओं का पालन कर चुके हो, तब ये आशीषें तुम पर आएँगी। हम में से हर एक देखे कि उसने परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन कैसे किया है। पोप-भक्त जितनी चाहें डींग मारें, क्या वे कह सकते हैं कि उन्होंने उनका सौवाँ अंश भी पूरा किया है? यदि उन्होंने परमेश्वर की एक आज्ञा का पालन किया है, तो उसके बदले उन्होंने उसके विरुद्ध सौ पाप किए हैं: और यदि एक ही दोष हो, चाहे कितना ही छोटा क्यों न हो, तो वे सब में दोषी हैं, जैसा याकूब कहता है: जो कोई केवल एक ही बात में चूक जाता है, वह सारी व्यवस्था को तोड़नेवाला ठहरता है। तब जब वे अपराधी हैं, तो जितनी आशीषें परमेश्वर ने रखी हैं, वे सब उनसे छीन ली और दूर कर दी गई हैं, यहाँ तक कि वे भी जो केवल इस वर्तमान क्षणिक जीवन से सम्बन्ध रखती हैं: तब वे स्वर्ग का राज्य जीतने में (जैसा वे कल्पना करते हैं) कितने कम समर्थ हैं, जबकि वे अपने मुँह में डालने को रोटी का एक टुकड़ा भी कमाने के योग्य नहीं। इस प्रकार वे सब से बाहर कर दिए गए हैं। और क्यों? क्योंकि परमेश्वर ने किसी से कुछ प्रतिज्ञा नहीं की सिवा उनके जो उसकी सारी व्यवस्था का पालन करते हैं। तो हम क्या करें? हमें परमेश्वर को दूसरी रीति से बोलते सुनना होगा: अर्थात् हमें उसकी वह बात सुननी होगी जिसमें वह सेंतमेंत की प्रतिज्ञाएँ हमारे प्रभु यीशु मसीह में हमें देता है। पवित्र शास्त्र में परमेश्वर दुहरी बोली बोलता है: और जब मैं दुहरी बोली कहता हूँ, तो मेरा अर्थ यह नहीं कि वह अपनी ओर से दोहरा है, या अपने ही विरुद्ध है, या उसकी एक बात दूसरी बात की विरोधी है: क्योंकि परमेश्वर सदा एक सा रहता है, और (जैसा मैंने पहले कहा है) वह बदलता नहीं: उसके मुँह से निकली सब बातें बिना किसी विरोध के आपस में भली-भाँति मेल खाती हैं। तथापि जहाँ तक उसकी व्यवस्था का सम्बन्ध है, वहाँ वह न्यायी के रूप में बोला है, पिता के रूप में नहीं। अपनी व्यवस्था में वह न्यायी के रूप में बोलता है, यह कहते हुए: जो जैसा उसे चाहिए वैसा जीता है, वह धोखा न खाएगा, वह अपना परिश्रम न खोएगा: क्योंकि जब तुम मेरी सेवा कर चुके होगे, तो मैं तुम्हें समृद्ध करूँगा। परमेश्वर न्यायी के रूप में इसी प्रकार बोलता है। और जब हम यह वचन ग्रहण कर लेते हैं, तो देखो, बात जैसी भी हो, हम लज्जित हो जाते हैं। और किसलिए? इसलिए कि जो अनुग्रह हमें दिया जाता है उसे पाने की सामर्थ्य होने के बदले, हम परमेश्वर के क्रोध को अपने विरुद्ध भड़काने से नहीं रुकते; और इसलिए हम सब दोषी ठहरे हैं। तब क्या किया जाए? परमेश्वर अब पिता के रूप में आकर कहता है: अच्छा, मैं अपनी इस कठोरता को छोड़ने पर सन्तुष्ट हूँ, जो मैं अपनी व्यवस्था के द्वारा तुम पर चला सकता था; तथापि यह कुछ बहुत बड़ी बात भी नहीं: क्योंकि मैं तुम्हारे इतना निकट आ गया कि वह प्रतिज्ञा करूँ जो तुम्हारा प्राप्य नहीं: मैं मानो तुम्हें मनोहर उपायों से लुभाना चाहता था: परन्तु तुम्हारे हठ के कारण मैंने इससे कुछ न पाया। तो उपाय क्या है? अब मैं तुम्हें बताने आता हूँ कि यदि तुम मेरे पुत्र पर विश्वास करो, तो मैं तुम्हारे सब ऋण क्षमा कर दूँगा। यदि तुम उसे अपना चरवाहा करके ग्रहण करो, कि वह तुम्हें शान्ति से चलाए, तो तुम पाओगे कि मैं तुम्हें कोमलता और मित्रता के व्यवहार के सिवा और किसी रीति से जीतना नहीं चाहता, मानो मैं कहूँ, मेरे पास आओ, और मैं तुम्हारे सब पाप क्षमा कर दूँगा, और तुम्हें अपनी कृपा में ग्रहण करूँगा। और यद्यपि तुम दुखी प्राणी हो, जो पूर्ण दण्ड के योग्य हो: तो भी मैं तुम्हारे सब अपराधों को पूरी रीति से भूल जाऊँगा और गाड़ दूँगा: जब मैं ऐसा कर चुका होऊँगा, तो मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि अपने पवित्र आत्मा के द्वारा तुम्हें नया जन्म दूँगा: और यह अनुग्रह तुम्हें मेरे एकलौते पुत्र के द्वारा दिया जाएगा, यदि तुम उसके पास आने का परिश्रम करो। और इस पर यद्यपि तुम्हें अनेक परीक्षाओं से जूझना पड़े, और पहली ही मुठभेड़ में तुम उन पर पूरी जय न पाओ, वरन् तब भी अनेक दागों और दोषों से घिरे रहो: तो भी मैं इन सब बातों में से किसी को तुम्हारे सिर पर न लगाऊँगा; मैं तुम्हारे पाप क्षमा करता हूँ: और जो भलाई तुम करोगे, वह मेरी कृपा से मुझे ग्रहण योग्य होगी, यद्यपि वह उसके योग्य नहीं। देखो, यह दूसरी बोली है जो परमेश्वर पवित्र शास्त्र में हमसे बोलता है।

इसलिए हम ध्यान दें कि जब हम अपने परमेश्वर की वाणी सुनते हैं, और जानते हैं कि हम पर उसका क्या ऋण है, और उन प्रतिज्ञाओं को सुन चुके हैं जो उसने अपनी व्यवस्था में हमसे की हैं: तो हमें अवश्य वहीं लज्जित और दोषी ठहरे हुए रुक जाना होगा, क्योंकि हमारी कृतघ्नता के कारण उन बातों में से कोई भी हमारे काम नहीं आ सकती; इसलिए हमें उस सेंतमेंत की दया की शरण लेनी होगी जो हमारे प्रभु यीशु मसीह में हमें दी जाती है, और परमेश्वर की सुननी होगी जब वह हमसे बोलता है, जो वह व्यवस्था में, भविष्यद्वक्ताओं में, और सुसमाचार में करता है, यह कहते हुए, मैं अपनी ही निरी भलाई से तुम्हारा उद्धारकर्ता बन गया हूँ: और तुम्हें अपना उद्धार अपने से बाहर कहीं और खोजना चाहिए। क्योंकि जिस छुड़ानेवाले की परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की, वह सदा मन में रखा गया, कि मनुष्य उसी पर भरोसा करें। और इसी कारण व्यवस्था के समय में बलिदान ठहराए गए थे। क्योंकि यद्यपि मसीह अभी संसार पर खुले रूप से प्रकट नहीं हुआ था: तो भी यहूदी समझते थे कि उनके उद्धार की सारी आशा उस बलिदान के द्वारा परमेश्वर से मेल-मिलाप पर निर्भर है जो चढ़ाया जाना था। वे मन्दिर में पशु लाते थे: क्या वह उनके प्राणों की अशुद्धता को शुद्ध करने के लिए था? नहीं: क्योंकि भ्रष्ट लहू क्या कर सकता है, दुर्गन्धयुक्त चर्बी क्या करेगी, क्या वे वस्तुएँ प्राण को उसके अधर्म से शुद्ध कर सकती हैं? नहीं, कदापि नहीं। परन्तु उन प्रतीकों के नीचे यहूदी देखते थे कि वे परमेश्वर के शाप से कैसे छुड़ाए जाएँगे, और उसकी कृपा में कैसे लिये जाएँगे, और कि उनका सारा जीवन उसे ग्रहण योग्य होगा। और अब सुसमाचार में हमारे पास इसकी और भी निश्चित साक्षी है, क्योंकि वहाँ हम वही वस्तु हमारे लिए पूरी रीति से पूर्ण हुई देखते हैं: अर्थात् यह कि यद्यपि हमने परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन नहीं किया, तो भी यीशु मसीह ने उनका पालन किया है। और वह किसलिए? क्या इसलिए कि वह उसके अधीन था? नहीं। परन्तु वह व्यवस्था के अधीन हुआ: हाँ, परन्तु वह हमारे लिए था। इसलिए हम अपने प्रभु यीशु मसीह की शरण लें, और परमेश्वर को ऐसी भाषा में बोलते सुनें जिसमें वह केवल यही नहीं कहता कि ये वे बातें हैं जिनकी मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, और यदि तुम इन्हें करो तो समृद्ध और धन्य होगे; परन्तु यह भी कहता है, देखो, मैं तुम्हारा पिता हूँ, मेरे पास आओ, परन्तु मेरे एकलौते पुत्र के नाम से आओ, जिसे मैंने तुम्हारा मध्यस्थ ठहराया है: और मानो कि तुम में भ्रष्टता के सिवा और कुछ नहीं: और अपनी सामर्थ्य पर, और अपनी स्वतन्त्र इच्छा पर भरोसा न रखो: परन्तु व्यर्थ घमण्ड की सब मूर्खतापूर्ण कल्पनाएँ त्यागकर, दीनता से मेरे आत्मा के अनुग्रह को खोजने आओ: तब तुम निश्चित रहोगे कि मैं सदा अपनी भलाई से तुम्हें थामे रहूँगा, और दिन-प्रतिदिन अपने भय में तुम्हें दृढ़ करूँगा, और अपने मार्गों पर चलाऊँगा, यहाँ तक कि मैं तुम्हारे कामों के दोष तुम्हारे सिर न लगाऊँगा, वे तुम्हारे प्रति मेरी आशीष में बाधा न होंगे: इसलिए नहीं कि तुम अपने अपराध न मानो, और मेरे सामने सदा यह स्वीकार न करो कि तुम दोषी हो; परन्तु इसलिए कि तुम्हारे पाप तुम्हारे सिर न लगाए जाएँगे, यद्यपि इसका कारण हो कि वे लेखे में लाए जाएँ और मेरे द्वारा उनका पश्चाताप कराया जाए। देखो, यह परमेश्वर की दूसरी वाणी है, जिसे हमें सुनना है, यदि हम यहाँ दी गई आशीषों के भागी होना चाहते हैं। परन्तु इसी बीच निष्कर्ष के रूप में हमें यह ध्यान देना है कि यद्यपि विश्वासी परमेश्वर के शाप से छूट गए हैं, और वह उनके साथ कठोरता का व्यवहार न करेगा, वरन् उन्हें थामेगा और उन आशीषों का आनन्द लेने देगा जिनकी उसने अपनी व्यवस्था में प्रतिज्ञा की है, मानो उन्होंने उसे पूरी रीति से पूरा किया हो: तो भी वे उसकी छड़ियों की अनेक मार सहने से नहीं बचते, और हमारा प्रभु उन्हें निरन्तर ताड़ना देता है, किसी को एक रीति से और किसी को दूसरी रीति से परखता है, ऐसे कि सब मारे जाते हैं। और परमेश्वर हम पर जो ताड़नाएँ भेजता है, वे सब की सब शाप ही हैं, मेरा अर्थ है बाहरी रूप में। यदि हम रोगी हों, यदि भूखे या प्यासे हों, यदि इस वर्तमान संसार में सताए जाएँ, यदि व्याकुल और ज़ुल्म के मारे हों: ये सब परमेश्वर के शाप हैं। हमारे शत्रु हमारा उपहास करते हैं, हम निन्दा, दरिद्रता, कष्ट और अनेक वेदनाओं में हैं: कोई अपने घर में अपनी पत्नी से, कोई अपने बच्चों से, और कोई अपने पड़ोसी से दुख पाता है: अन्ततः विश्वासी अनेक रीतियों से परमेश्वर की आशीषों से वंचित किए जाते हैं। यह निश्चित है। तो भी इससे यह बाधा नहीं पड़ती कि हम उसके द्वारा सदा आशीषित हैं, क्योंकि हमें उसकी भलाई का निरन्तर स्वाद मिलता है, जो हमें उसकी ओर खींचने के लिए है। इसलिए हम भली-भाँति ध्यान दें कि जब वह अपनी आशीषें रोक लेता है, और जैसी हम चाहते हैं वैसी नहीं देता, तो यह हमारे लाभ के लिए है: क्योंकि वह देखता है कि हमें अपने पास आने के लिए कुछ जगाए जाने की आवश्यकता है। और क्योंकि हम में से हर एक अपने पापों में सो जाता है: इसलिए परमेश्वर को हमें जगाना और अनुभव कराना पड़ता है कि जैसे ही हम उसकी सेवा से हटते हैं, वह भी वैसे ही हमसे दूर हो जाएगा, और उसका अनुग्रह हमसे उठा लिया जाएगा, और हम उससे वंचित रह जाएँगे: तथापि इतना पूर्णतः नहीं कि परमेश्वर की आशीष सदा बढ़कर न रहे, कि हम उसमें आनन्द करें, और उसे दयालु जानें, और उसकी पितृवत् भलाई की बाट जोहें, जो उस समय और भी भरपूरी से प्रकट होगी जब वह हमें यहाँ से फिर अपने पास ले लेगा। इस प्रकार तुम देखते हो कि हम परमेश्वर की उन आशीषों के स्वामी और भोगी कैसे हो सकते हैं जो उसकी व्यवस्था में हमारे लिए रखी गई हैं, यहाँ तक कि यद्यपि हमारा प्रभु उन्हें अनेक क्लेशों और अनेक ताड़नाओं से बीच-बीच में मिलाता है, मानो उसने हमें शाप दिया हो: तो भी उसका ऐसा करना केवल इसलिए है कि हमें दिन-प्रतिदिन पश्चाताप के लिए उकसाए, और इस वर्तमान संसार में सो जाने से रोके: जैसा हम भली-भाँति जानते हैं कि हमारे सुख हमें मतवाला और परमेश्वर की ओर से बेसुध कर देते हैं, जब तक वह हमें कोंचकर और एड़ लगाकर आगे बढ़ने को विवश न करे। इस प्रकार तुम देखते हो कि जो बातें पहली दृष्टि में विरोधी जान पड़ती थीं, वे भली-भाँति मेल खाती हैं। और इसी कारण मूसा कहता है कि ये आशीषें हम पर उतरेंगी और हमें चारों ओर से घेर लेंगी, मानो उसने कहा हो कि हमें परमेश्वर की कृपा का सदा निश्चय रहेगा, वरन् इतना निश्चय कि वह कभी हमसे न छूटेगी, यदि हम उसकी सेवा करें। क्योंकि घेर लेना, या हम पर उतरना, यह सूचित करता है कि परमेश्वर का अनुग्रह अस्थिर नहीं, मानो वह संयोग से गिरता हो, और हम उसे समय पर पकड़ न पाएँ। नहीं (वह कहता है) तुम उससे घिर जाओगे। इसलिए हम अपने परमेश्वर की भलाई का निश्चय रखें, और यह कि वह हमसे कभी न छूटेगी, यदि हम अपनी ओर से उसके पास आएँ। परन्तु हम भली-भाँति ध्यान दें कि हम वहाँ कभी नहीं पहुँच सकते जब तक वह हमें अपनी ओर न खींचे। और यह कि जब हम इतनी निर्बलताओं और दोषों के अधीन हैं, तब वह हमें सहकर दिखाता है कि हमें अपने पापों की क्षमा के लिए, उस मेल-मिलाप के द्वारा जो उसने हमारे प्रभु यीशु मसीह में किया है, उसकी सेंतमेंत की भलाई की शरण लेनी है: और यह कि भला करने का यत्न करते हुए हम अनुभव करेंगे कि परमेश्वर की भलाई हमारे प्रति सेंतमेंत रहना नहीं छोड़ती, और उस पर हमारा कुछ भी ऋण नहीं होता।

अब हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने पापों को मानते हुए गिर पड़ें, और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उनका और भी भली-भाँति अनुभव कराए जैसा हमने अब तक किया है, ताकि कुचले जाकर, वरन् मानो निराशा में डूबकर, हम अपने प्रभु यीशु मसीह के विश्वास की ओर खिंच जाएँ; और यह जानते हुए कि हम सब भलाई से सर्वथा रिक्त और नंगे हैं, हम उससे विनती करें कि वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें नया करे, जब तक कि हम पूरी रीति से बदल न जाएँ, और हम उसके अनुग्रहों में और भी बढ़ते जाएँ, ताकि हमें साक्षी मिले कि परमेश्वर हमारी सुधि लेता है, और हमारे निकट है, वरन् हम में बसता है: और हम उसके लेपालकपन में ऐसे दृढ़ किए जाएँ कि हम सदा स्वर्गीय मीरास की बाट जोहें, और इस संसार में उसकी आज्ञाकारिता में चलते हुए थकें नहीं: कि वह केवल हमें ही नहीं, वरन् पृथ्वी के सब लोगों और जातियों को भी यह अनुग्रह देने की कृपा करे, इत्यादि।

बुधवार, 11 मार्च, 1556 को।

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