अध्याय 2

150वाँ उपदेश, जो सत्ताईसवें अध्याय पर दूसरा है

The Covenant Unveiled · John Calvin

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150वाँ उपदेश, जो सत्ताईसवें अध्याय पर दूसरा है

150वाँ उपदेश,

जो सत्ताईसवें अध्याय पर दूसरा है।

11 उसी दिन मूसा ने लोगों को आज्ञा दी, कि

12 जब तुम यरदन पार हो जाओ, तब लोगों को आशीर्वाद देने के लिये ये गिरिज्जीम पर्वत पर खड़े हों: शिमोन, और लेवी, और यहूदा, और इस्साकार, और यूसुफ, और बिन्यामीन।

13 और शाप देने के लिये ये एबाल पर्वत पर खड़े हों: रूबेन, गाद, और आशेर, और जबूलून, दान, और नप्ताली।

14 और लेवीय लोग इस्राएल के सब पुरुषों से ऊँचे शब्द में कहें:

15 श्रापित हो वह मनुष्य जो कोई खुदी हुई या ढली हुई मूरत, जो यहोवा के सामने घृणित वस्तु और कारीगर के हाथ की बनाई हुई है, बनाकर गुप्त स्थान में रखे: और सब लोग उत्तर देकर कहें: आमीन।

कल हमने देखा कि परमेश्वर की यह इच्छा थी कि इस्राएल के लोगों पर जो अनुग्रह उसने किया, उसे पहले गम्भीर बलिदान के द्वारा और फिर खड़े किए गए एक स्मारक के द्वारा पहचाना जाए, ताकि यह जाना जाए कि यह देश मनुष्य के हाथ से या मनुष्य के किसी बल से मोल नहीं लिया गया, परन्तु परमेश्वर की ओर से उस जाति को निज भाग के रूप में दिया गया। परन्तु अब हमारे सामने एक और आज्ञा है, जिसके द्वारा परमेश्वर ने लोगों को दूसरी रीति से अपने साथ बाँधना चाहा। निश्चय ही वह यह पहले कर चुका था; परन्तु मनुष्य जड़ पकड़ने में इतने कठोर हैं, और उन्हें आज्ञाकारिता में थामे रखने के लिये बहुत सी बेड़ियों और रस्सियों से भी पर्याप्त रीति से नहीं बाँधा जा सकता; इसलिये परमेश्वर ने बिना कारण नहीं यह और जोड़ा जो यहाँ लिखा है, कि वे और अच्छी रीति से आज्ञाकारिता में बने रहें। हम पहले ही विचार कर चुके हैं कि जब परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था दी, तो वह एक पारस्परिक वाचा थी; और जैसे उसने इस्राएलियों से अपने आप को बाँधा कि वह उनका परमेश्वर होगा, वैसे ही इस्राएल के लोगों ने भी अपने आप को बाँधा कि वे उसकी प्रजा होंगे। परन्तु यहाँ एक और पुष्टि जोड़ी गई है, कि उस पहले बन्धन को और अच्छी रीति से स्थिर किया जाए; और वह यह है कि परमेश्वर ने ठहराया कि जब वे यरदन पार हो जाएँ, तब लोग अपने आप को दो भागों में बाँटें, और छः गोत्र गिरिज्जीम पर्वत पर रहें, और दूसरे छः गोत्र ठीक उनके सामने एबाल पहाड़ी पर खड़े हों, इस रीति से कि वाचा का सन्दूक और याजक बीच में खड़े हों, और जो गिरिज्जीम की ओर थे वे आशीर्वाद दें और जो एबाल की ओर थे वे शाप दें। अब यह शाप और आशीर्वाद उस बात की ओर संकेत करता है जो हम आगे देखेंगे, और जिसका इस अध्याय में शीघ्र ही स्पर्श होगा। क्योंकि परमेश्वर ने अपने लोगों को और अच्छी रीति से प्रोत्साहित करने के लिये केवल अपनी इच्छा उन पर प्रकट नहीं की, और यह नहीं कहा, कि तुम इस रीति से चलना; परन्तु साथ ही तुरन्त यह भी जोड़ा कि तुम मेरी सेवा व्यर्थ न करोगे, तुम्हारा परिश्रम निष्फल न जाएगा: क्योंकि मैं तुम्हें समृद्ध करूँगा, यह तुम्हारे ही कल्याण के लिये है कि मैं तुम्हें अपने अधीन चाहता हूँ, मैं इससे कोई लाभ या फायदा नहीं ढूँढ़ता, परन्तु यह तुम्हारे ही भले और हित के लिये है कि तुम मेरी आज्ञाओं को मानते हुए मुझसे लिपटे रहो। देखो, परमेश्वर ने कैसी आशीषें दीं, इस मनसा से कि लोग उसकी सेवा स्वेच्छा से करें और बल या विवशता से नहीं। फिर, क्योंकि मनुष्य ऐसे हठीले हैं कि बड़ी कठिनाई से ही झुकते हैं, और दूसरी ओर उनकी अभिलाषाएँ उन्हें इतने उतावलेपन से खींच ले जाती हैं कि वे शीघ्र भूल जाते हैं कि परमेश्वर की सेवा करना क्या होता है, और छूटे हुए जंगली घोड़ों की तरह उत्पात मचाते हैं; इसलिये यहाँ धमकियाँ जोड़ी गई हैं: चौकस रहो कि मुझे अप्रसन्न न करो, क्योंकि जो मेरी व्यवस्था को तुच्छ जानते हैं उनके लिये दण्ड तैयार है। सो देखो कि शाप क्या हैं, जिन्हें हम 28वें अध्याय में और पूरी रीति से देखेंगे, परन्तु मूसा यहाँ उन्हें मानो उदाहरण के रूप में छूता है। अब यह पर्याप्त होता कि परमेश्वर केवल इतना कह देता, कि जो कोई मेरी व्यवस्था को मानकर मेरी सेवा करे, वह आशीष पाएगा, और मैं उसके सारे जीवन को उसके लिये समृद्ध करूँगा। जब परमेश्वर ने एक बार प्रतिज्ञा कर दी कि जो उसकी सेवा करते हैं उन्हें वह प्रतिफल देगा, तो हमारे लिये यही भली-भाँति पर्याप्त होना चाहिए। मनुष्यों को अपनी ओर से कुछ कहने की क्या आवश्यकता? वैसे ही, जब परमेश्वर उन पर जो उसकी व्यवस्था का उल्लंघन करते हैं दण्ड की आज्ञा सुनाता है, तो चूँकि उस न्यायी ने स्वयं कह दिया है, किसी को उत्तर नहीं देना चाहिए। तब हमें उसकी कही हुई बात की पुष्टि करने की क्या आवश्यकता है, मानो उसका वचन अपने आप में पर्याप्त बल और अधिकार नहीं रखता? यह सच है कि परमेश्वर इस योग्य है कि उसकी सुनी जाए, और जो वह कहता है वह अटल आज्ञा के समान है: तौभी वह चाहता है कि मनुष्य बाहरी गवाही के द्वारा उस बात को स्वीकार करें जिसका पालन करने की वह हमसे इच्छा रखता है, वह चाहता है कि हम उस अनुग्रह को मानें जो हमें दिया जा रहा है, और यह प्रकट करें कि हम विश्वास से निश्चित हैं कि जब हम उसके वचन के अनुसार जीने का यत्न करेंगे तब वह हमें समृद्धि की प्रतिज्ञा देकर धोखा न देगा। इसलिये परमेश्वर चाहता है कि हम उसके साथ ऐसे सहमत हों कि हम भी नम्रता और भय के साथ मान लें कि उन सब को दण्ड देने का उसके पास बड़ा कारण है जो उसकी धार्मिकता और आज्ञाओं को तुच्छ जानते और उलट देते हैं। और जब वह उन्हें धमकी देता है, तो हम यह न समझें कि वह व्यर्थ है, परन्तु यह कि अन्त में वे उस दण्ड के निष्पादन का अनुभव करेंगे। इसलिये इस विषय में परमेश्वर चाहता है कि हम आमीन कहें, चाहे उन प्रतिज्ञाओं पर जो वह उनसे करता है जो उसकी व्यवस्था का पालन करते हैं, चाहे उन धमकियों पर जो वह उन सब के विरुद्ध सुनाता है जो विद्रोही हैं और उसे तुच्छ जानते हैं। सो अब हमने इस स्थान को समझने की अच्छी भूमिका बाँध ली है। जहाँ तक आशीषों और शापों की बात है, उनके विषय में हम अगले अध्याय में और पूरी रीति से बात करेंगे: और भला होगा कि हम उन्हें वहीं विचारने के लिये रख छोड़ें, क्योंकि वह स्थान उनके लिये अधिक उपयुक्त है। इतना एक शब्द में जान लेना पर्याप्त है कि जब परमेश्वर उन्हें अपना अनुग्रह देता है जो उसकी आज्ञा मानते हैं, तो वह इसलिये कि वे उसकी सेवा विवशता से नहीं, परन्तु स्वतन्त्र और भली इच्छा से करें: यह जानते हुए कि यह उन्हीं के भले और कल्याण के लिये है; और फिर दूसरी ओर, जो अपने स्वभाव से अपनी विषय-वासनाओं के वश में हैं, और बुराई से जीने की उच्छृंखल स्वतन्त्रता अपने ऊपर ले लेते हैं, उन्हें भय के द्वारा रोके रखना आवश्यक है, क्योंकि वे देखते हैं कि वे परमेश्वर के हाथ से बच न निकलेंगे, परन्तु अन्त में उन्हें हिसाब देना होगा। सो देखो कि जब तक हम इस विषय को और विस्तार से न उठाएँ, तब तक एक शब्द में हमें क्या स्मरण रखना है।

इसके अतिरिक्त, जो हमने कहा उसे भली-भाँति ध्यान में रखें, अर्थात् यह कि परमेश्वर ने स्वयं कह देना ही पर्याप्त न समझा; परन्तु वह चाहता है कि हम भी मानो एक ही स्वर में उसके साथ मिल जाएँ। और यह उस विश्वास को प्रकट करना है जो हमें उसके वचन पर है, जो इन दो बातों में निहित है: एक तो यह कि हम उसकी प्रतिज्ञाओं को ग्रहण करें और पूरी रीति से उन्हीं पर टिके रहें: और दूसरे यह कि जितनी बार वह हमें अपने क्रोध का कोई चिह्न दे, हम काँप उठें, ऐसा न हो कि हम जड़, या ऊँघते, या इतने कठोर हो जाएँ कि हमारे क्रोध को अनुभव करने से पहले उसे हम पर भारी प्रहार करना पड़े: परन्तु हम उसकी आज्ञा मानने का यत्न करके उसे पहले ही रोक लें, और जहाँ तक हो सके उसके दण्ड से बचें। अब इस स्थान में आशीषें सशर्त हैं, अर्थात् धन्य है वह जो परमेश्वर की व्यवस्था का पालन करता है, जो उसकी सेवा को शुद्धता से निभाता है, जो अन्धविश्वासों और मूर्तिपूजा में नहीं पड़ता, जो उसके पवित्र नाम का दुरुपयोग नहीं करता, जो विश्राम के दिन और अन्य सब विधियों का पालन करता है, जो अपने पिता और माता का आदर करता है। यह आशीष (मैं कहता हूँ) शर्त के साथ जुड़ी है, कि यदि हम परमेश्वर की सेवा करें, तो वह हम पर उदारता दिखाएगा, और हमारा समय व्यर्थ न जाएगा: परन्तु फिर भी ये सब आशीषें इस पर टिकी हैं कि परमेश्वर ने अपनी मुफ़्त भलाई से इस जाति को चुन लिया था: ताकि वे इसी बात पर न ठहर जाएँ कि धन्य है वह जो परमेश्वर की सेवा करता है। पर ऐसा कौन है? क्योंकि कोई भी इस कर्तव्य को पूरा नहीं करता (जैसा हम पहले बता चुके हैं) और इस अध्याय के अन्त में और आगे देखेंगे। सो जब हम सब पापी हैं, वरन् विश्वासी भी, इस हद तक कि जब वे सीधे चलने का यत्न करते हैं तब भी बहुत सी चूकें करते हैं; तो तब हमारा क्या होगा? निश्चित है कि यदि हमारे पास अपनी ही धार्मिकता के सिवा टेकने को कुछ और न होता, तो हम सब उद्धार की आशा से वंचित हो जाते। परन्तु (जैसा मैंने तुम्हें बताया) जिन प्रतिज्ञाओं में शर्त है वे इस पर टिकी हैं कि परमेश्वर ने हमें अपनी प्रजा के रूप में ग्रहण कर लिया है, और चाहता है कि हम उसे अपना पिता मानें। अब यह बात उसकी दया के सिवा और किसी पर आधारित नहीं। सो हमें भली-भाँति आश्वस्त होना चाहिए कि परमेश्वर हम पर तरस खाएगा, चाहे हम अभागे पापी हों और तरस के योग्य न हों: वह हमें धर्मी जानकर ग्रहण करेगा और अपनाएगा, चाहे हम इस योग्य हों कि वह हमें ठुकरा दे। और यद्यपि हम पूरी हताशा के सिवा और किसी बात की आशा नहीं कर सकते, तौभी हम उद्धार के निज भाग के विषय में निश्चित रहेंगे क्योंकि हम उसके बच्चे हैं। इस बात के विषय में हमें भली-भाँति आश्वस्त होना चाहिए। और दूसरे, यह शेष रहता है कि जब परमेश्वर ने हमें चुनकर अपनी सेवा के लिये अलग कर लिया है, तो हम हर प्रकार की दुष्टता की छूट न लें, परन्तु उसकी आज्ञा मानने का यत्न करें। इस कारण हमें उसकी प्रतिज्ञाओं से जागृत किया जाना और उसकी सेवा के लिये उभारा जाना चाहिए। सो देखो कि सशर्त प्रतिज्ञाएँ हमारे लिये कैसे व्यर्थ न होंगी: अर्थात् जब वे परमेश्वर की उस मुफ़्त दी हुई भलाई की ओर संकेत करें, जिससे वह हमें ग्रहण करता है यद्यपि हम ग्रहण किए जाने के योग्य नहीं: और दूसरे वह हमारे दोषों को हमारे ऊपर नहीं गिनता: परन्तु यद्यपि हममें बहुत से दाग और भ्रष्टताएँ हैं, तौभी वह उन्हें ढाँप लेता है और उनका हिसाब नहीं माँगता। और इस प्रकार हम अब देखते हैं कि परमेश्वर ने किस रीति से इस्राएल के लोगों को ढाढ़स बँधाया। क्योंकि यदि वह उनके साथ यों आरम्भ करता और कहता: मेरी सेवा करो और तुम्हारे परिश्रम का अच्छा प्रतिफल मिलेगा, तो यदि परमेश्वर हमसे केवल यही सीधा वचन कहता, हाय, हम क्या करते? क्योंकि जब हम उसकी सेवा करने की सोचते, तो उस सिद्धता से बहुत दूर होते जिसकी वह हमें आज्ञा देता है: जो सबसे अच्छा दौड़ते वे भी बीच रास्ते ही में होते, जबकि उन्हें अपनी यात्रा के अन्त तक पहुँच चुका होना चाहिए था। इसलिये हम सब के सब किसी भी भले साहस के बजाय निरुत्साहित हो जाते। परन्तु हमें इन दोनों बातों को साथ जोड़ना चाहिए, अर्थात् यह कि वह हमें किसी बात में धोखा न देगा, और दूसरे यह कि वह हमें अपनी सेवा से बाँधता है, और प्रकट करता है कि वह हमारी निर्बलताओं में हमें सहेगा, और हमारे साथ कठोरता से व्यवहार करके जैसा हम योग्य हैं वैसा चुकता न करेगा, परन्तु पिता की सी भलाई का व्यवहार करेगा। अब इस पर हम उसकी सेवा करने के लिये ढाढ़स पा सकते हैं, जब हम कह सकें, हे प्रभु, निश्चय यह सच है कि मैं तेरे प्रति अपने कर्तव्य का सौवाँ भाग भी पूरा नहीं करता, परन्तु संसार जैसा भी चले, तू मुझे ग्रहण करने से न चूकेगा क्योंकि तू यह नहीं देखता कि मैं क्या करता हूँ, परन्तु मुझसे ऐसे प्रसन्न रहता है जैसे अपने ही बच्चे से। सो देखो कि परमेश्वर कैसे हमें क्षमा करता है, और उस सेवा में जो हम उसे अर्पित करते हैं हमारी भूलों और अपूर्णताओं का ध्यान नहीं करता। इसलिये हम कपट से नहीं, परन्तु निष्कपट भली इच्छा से उसकी सेवा करते हैं, वह हमारे सब कामों को पसन्द करता है, और उनका हमें प्रतिफल देता है। जब हम यह सुनते हैं, तो आओ हम अपना परिश्रम लगाएँ, आओ हम (जैसा कहते हैं) मुँह में लगाम ले लें और आगे बढ़ें; और यद्यपि हमारे शरीर के दोष हमें रोकें, तौभी हम अपने आप को और आगे बढ़ने के लिये विवश करें। और क्यों? क्योंकि हमारा परिश्रम व्यर्थ न जाएगा। सो देखो कि परमेश्वर का अभिप्राय क्या है; जिससे हम उसकी अनमोल भलाई को समझते हैं, कि वह अपनी ही इच्छा से अपनी प्रतिज्ञाएँ हमारे सामने यों रखता है, जबकि वह हमारा कुछ भी देनदार नहीं है, जैसा हम पहले देख चुके हैं: परन्तु उसकी इच्छा है कि जिस किसी उपाय से हो सके हमें अपनी ओर जीत ले। अब वह इस बात को फिर दोहराता है, और यह हमारे आलस्य और लापरवाही के कारण किया गया है। इसी कारण वह यह सहायता जोड़ता है, और सब हमारे ही लाभ के लिये, क्योंकि इससे उसे क्या लाभ? क्या हमारी सेवा से उसे कुछ मिलेगा? हम उसे जितना चाहें ललकारें, उसका क्या बिगड़ेगा? परन्तु वह हमें हमारे ही कल्याण के लिये अपना बनाना चाहता है।

और इसके साथ ही वह हमें यह भी दिखाता है कि उसकी व्यवस्था का वैसा पालन करने के लिये, जैसा अपेक्षित है, कैसा मन चाहिए, अर्थात् यदि हम स्वेच्छा से आएँ और अपने आप को उसके हवाले करें, और अपना सारा सुख और आनन्द उसकी सेवा में रखें, और इस वचन को व्यवहार में लाएँ, कि जहाँ हमारा धन है, वहीं हमारा मन भी लगा रहेगा। देखो, आशीषों के पहले विषय के सम्बन्ध में हमें क्या ध्यान देना है। तो वास्तव में हमें क्या करना है? यद्यपि आजकल हमारे पास वह विधि नहीं है जिसका उल्लेख इस स्थान में है, तौभी उसका सार हमारे बीच प्रभावी रहना चाहिए, और वह यह है कि परमेश्वर की सेवा करने में हमारी दृष्टि सदा उसकी प्रतिज्ञाओं पर रहे। देखो, हमारा परमेश्वर हमें अपनी ओर बुलाता और लुभाता है। और कैसे? वह एक ही शब्द में हमें आज्ञा दे सकता था, और कह सकता था: तुम पर सब कुछ मेरा ही ऋण है, इसलिये देखो कि तुम अपना कर्तव्य निभाओ: परन्तु वह हमें सहता है, और हमारे प्रति पिता की सी भलाई प्रकट करता है, जब कहता है, हे मेरे बच्चो, मैं नहीं चाहता कि तुम्हारी सेवा बिना प्रतिफल के रहे। सच है कि मैं तुम्हारा कुछ भी देनदार नहीं, तौभी मैं अपनी आवश्यकता से बढ़कर ऐसा उदार हूँगा, कि यदि तुम मेरी सेवा करो, तो तुम्हारा जीवन सुखी होगा, तुम सब बातों में समृद्ध होगे। और इसके अतिरिक्त, अनन्त जीवन के विषय में हमारे लिये सर्वोच्च आशीष है।

क्योंकि इस संसार में जो कुछ हम चाह या आशा कर सकते हैं, वह उस उद्धार की तुलना में कुछ भी नहीं जिसकी हम विश्वास के द्वारा आशा करते हैं; और उन सब आशीषों की तुलना में जो परमेश्वर आने वाले जीवन के विषय में हमसे प्रतिज्ञा करता और हमें देता है। इसलिये यह सब हमें परमेश्वर के अधीन होने के लिये और अधिक तत्पर और सुव्यवस्थित बनाए। क्योंकि क्या? जब हमारा प्रभु अपनी आज्ञा मानने में हमारे कल्याण के सिवा और कुछ नहीं चाहता, और ऐसा करने पर हमें प्रतिफल देता है; तब यदि हम अपने परमेश्वर की सेवा करने के लिये अपने आप को विवश न करें तो क्या हम अत्यन्त अभागे नहीं? सो देखो कि पवित्र शास्त्र में जितनी प्रतिज्ञाएँ हैं उन सब की पुष्टि हमें अपनी भली सम्मति से कैसे करनी चाहिए; कि जबकि और लोग सोचते हैं कि भलाई करना समय खोना है, हमारे मन में सदा यह अंकित रहे कि परमेश्वर से लिपटे रहने से उत्तम कुछ नहीं। अन्यजाति के लोग अपनी अभिलाषाओं के पीछे चलने में अपने आप को बहुत सुखी समझते हैं। जब व्यभिचारी और लोभी लोग चारों ओर से बटोर लेते हैं, तो समझते हैं कि सब कुछ भली रीति से कमाया, और अपने कामों पर इतराते हैं। यदि व्यभिचारी, जो अपनी शारीरिक अभिलाषाओं में पशु-समान हैं, अपने सुख भोग सकें, तो उनमें लोटते हैं, उनसे मतवाले हो जाते हैं, पूरी रीति से उनसे मोहित हो जाते हैं। यदि कोई घमण्डी मनुष्य किसी पद पर हो, और मनुष्यों के बीच किसी अधिकार तक चढ़ा दिया जाए; तो वह समझता है कि ऊँचे पद पर होने से बढ़कर और कोई आनन्द या सुख नहीं। परमेश्वर को तुच्छ जानने वाले सब लोग इसी स्थिति में हैं। और इस बीच बेचारे विश्वासियों का उपहास उड़ाया जाता है: वे दीन जन हैं, वे तुच्छ गिने जाते हैं, वे पंख लटकाए रहते हैं, वे इस संसार में कुछ नहीं करते, केवल टपकते और घुलते जाते हैं। ये अभागे जन (कुछ लोग कहते हैं) ऐसे अनजाने कारण से इतना परिश्रम करने में बुद्धिमानी से काम नहीं ले रहे; क्योंकि उन्हें अपने सब परिश्रम से क्या लाभ? इसलिये ऐसा प्रतीत होता है कि जो परमेश्वर की सेवा करना चाहते हैं वे बहुत ठगे हुए हैं, और दुष्ट लोग ही सारा राज्य चलाते हैं। परन्तु हमें इसके विपरीत इस विषय में भली-भाँति दृढ़ निश्चय करना चाहिए, जैसा यशायाह भविष्यद्वक्ता में कहा गया है, तुम कहो, धर्मियों के लिये अब भी फल है, क्योंकि वे अपने परिश्रम का फल खाएँगे। यशायाह भविष्यद्वक्ता चाहता है कि हम इस परीक्षा से लड़ें। इस हद तक कि यद्यपि संसार भक्तों की हँसी उड़ाए, और दुष्ट उन पर विजय के गीत गाएँ: तौभी विश्वासी चकित न हों; परन्तु अपने मन में निश्चय करके कहें: नहीं, नहीं: धर्मी मनुष्य अपना परिश्रम न खोएगा; जब वह पूरी रीति से परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर भरोसा रखता है तो अपनी आशा में धोखा न खाएगा। तब इस स्थान से हमें यह सीखना है कि जितनी बार हम शास्त्र में प्रतिज्ञाएँ पढ़ें जहाँ कहा गया है: धन्य है वह मनुष्य जो यहोवा का भय मानता है, जो उसके वचन की आज्ञाकारिता में चलेंगे वे धन्य होंगे; धन्य है वह जो अपने पड़ोसियों के साथ सीधाई और खराई से चलता है: परन्तु विशेषकर वे जो संसार को त्यागते हैं क्योंकि स्वर्ग में उनका निज भाग उत्तम है: जितनी बार (मैं कहता हूँ) हम ये बातें पढ़ें, हमें अपने विश्वास में दृढ़ होना और भले साहस के साथ उत्तर देना है, आमीन, हे प्रभु, ऐसा ही है: जो तूने कहा उसके विरुद्ध हम कुछ उत्तर नहीं देते, इस स्थान में हम तेरी प्रतिज्ञाओं को ग्रहण करते हैं, और निश्चय उन पर भरोसा रखते हैं। सो देखो, प्रत्येक मनुष्य को परमेश्वर की सेवा करने के लिये अपने आप को क्यों विवश करना चाहिए, इसी कारण कि वह हमारे साथ इतनी कोमलता से व्यवहार करता है, और हमें उतनी कड़ाई से आज्ञा नहीं देता जितनी वह दे सकता था, जबकि हम पर उसका पूरा अधिकार है, परन्तु हमारी कच्चाई के अनुसार अपने आप को ढालता है ताकि हमें जीते और हमसे आनन्दित हो। और सबसे बढ़कर आओ हम इस सामान्य प्रतिज्ञा को स्मरण रखें, जब परमेश्वर हमें अपने बच्चों के रूप में अपनी ओर बुलाता है, जब वह हम पर दया करता और हमें सहता है, और हमारे साथ कठोरता की किसी भी हद तक नहीं जाता, परन्तु यद्यपि हमारे कामों में बहुत सी भूलें हैं, तौभी वे उसे उन्हें ग्रहण करने से नहीं रोकतीं, यहाँ तक कि यदि हम अपराध करें तो उसके हाथ से सदा क्षमा पाते हैं, और जब हम भटक जाते हैं, तो वह हमें मार्ग पर ले आता है, और इन सब बातों में से कुछ भी हम पर नहीं गिना जाता। सो देखो, पहले विषय के सम्बन्ध में हमें क्या स्मरण रखना है।

अब दूसरे विषय के सम्बन्ध में, यह भी ध्यान दें कि परमेश्वर की धमकियाँ हमारे लिये बहुत आवश्यक हैं। क्योंकि हम देखते हैं कि हम सब में कितना घमण्ड और विद्रोह है: यहाँ तक कि यद्यपि हम जान-बूझकर विद्रोही नहीं कि अपने परमेश्वर को तुच्छ जानें और उसका जूआ उतार फेंकें: तौभी हम ऐसे धुँधली आँखों वाले हैं कि उसका विचार नहीं करते, संसार के फुसलावे हमें ऐसी रीति से भरमाते हैं कि परमेश्वर जो कोई चेतावनी हमें देता है उसे ग्रहण करने की हम परवाह ही नहीं करते। यदि वह हमें कोमलता से बुलाए तो हमसे कुछ नहीं पाता: और इसलिये उसे धमकियों का प्रयोग करना पड़ता है। इससे हम देखते हैं कि वह ऐसी कोई बात नहीं छोड़ता जो हमें भय में रखकर अपनी आज्ञाकारिता में थामे रखने के योग्य हो। एक ओर तो वह हमसे कोमल और प्रेमभरी रीति से बोलता है, (जैसा मैंने तुम्हें बताया) और कहता है, हे मेरे बच्चो, मेरे पास आओ: सच है कि मैं तुम्हारा कुछ भी देनदार नहीं, तौभी मैं अपने आप को तुमसे बाँधूँगा: मैं तुमसे प्रतिज्ञा करता हूँ कि यदि तुम मेरी सेवा करो, तो वह तुम्हारे लाभ के लिये होगी। इस प्रकार हमारा प्रभु हमसे बोलता है, उस पिता के समान जो अपने बच्चे को मनाता है कि वह उसके कहे में चले और खुले मन के प्रेम से उसकी सेवा में लग जाए। तौभी परमेश्वर जब देखता है कि यह हमें उभारने के लिये पर्याप्त नहीं, तो धमकियों का प्रयोग करता है, और कहता है: चौकस रहो, यदि तुम समझते हो कि मेरे वचन को त्याग दोगे और फिर भी दण्ड से बचे रहोगे, तो तुम अपने आप को धोखा देते हो। मुझे इसका तुमसे हिसाब लेना होगा, मैं अपने बच्चों को अपना यों उपहास नहीं करने दूँगा: मुझे उनका न्यायी होना है: और जब तुम मेरे धीरज का दुरुपयोग कर चुके, तब किसी क्षमा की आशा न रखना: मुझे तुम्हारा दण्ड दुगुना करना होगा, और मेरा प्रतिशोध तुम पर और भी भयंकर रीति से पड़ेगा। इसलिये जब परमेश्वर यह बताता है कि हमारे पाप अक्षम्य हैं, और फिर भी हम उन्हीं में बने रहते हैं, और अपने आप को उसके अधीन करने की कुछ परवाह नहीं करते, विशेषकर जब वह हर प्रकार से हमारी ओर झुकता है, इस मनसा से कि हम उसकी आज्ञाकारिता में बने रहें, और नष्ट न हों: जब हम देखते हैं कि उसे हमारे उद्धार की ऐसी चिन्ता है; तो क्या यह अनिवार्य नहीं कि हम अत्यन्त हठीले, वरन् निरे पशु हैं, यदि उस पिता की सी चिन्ता से जो वह हमारे प्रति दिखाता है हम और अच्छे होने के लिये प्रेरित न हों? हाँ: और इसलिये परमेश्वर की उस भलाई और कोमलता से उभारे जाकर, जिसकी चर्चा मैं अभी कर रहा था, आओ हम उसकी धमकियों से भी अपने आप को जागृत करें। जब हम देखें कि हमारा शरीर बहुत उच्छृंखल है, और हमें बुराई की ओर खींचता है, तो आओ हम कहें, हाय: क्या हम जंगली पशुओं की तरह उसका जूआ उतार फेंकेंगे? परमेश्वर ने क्या ठहराया है? इसलिये जब हम अपने परमेश्वर की धमकियाँ सुनें तो काँप उठें। क्योंकि यदि पृथ्वी के राजा का क्रोध मृत्यु का दूत है (जैसा सुलैमान कहता है,*) तो जब परमेश्वर का क्रोध हमारे विरुद्ध सुनाया जाए, तब हमें उसके विषय में क्या सोचना चाहिए? सो आओ हम भय के द्वारा अपने आप को वश में करना सीखें। जब शैतान की परीक्षाएँ हम पर प्रबल होना चाहें, और हमारे पाप हमें धोखा देने के लिये चारा बनें: तब हमारे मन में यह कहना आए, क्या? क्या मैं किसी ऐसे सुख के बहाने, जो शीघ्र ही मिट जाएगा, जाकर अपने परमेश्वर का क्रोध भड़काऊँ, और यों सदा के लिये नष्ट हो जाऊँ? उसी रीति से (मैं कहता हूँ) हमें परमेश्वर की धमकियों को अपनी स्मृति में लाना चाहिए; और फिर उसके उत्तर में आमीन कहना चाहिए, और कहना चाहिए, हाँ प्रभु, ऐसा ही है, यह बच्चों का खेल नहीं। जब तू दुष्टों पर दण्ड की आज्ञा सुनाता है; तो तू उसे पूरा करने को तैयार है: और जब तू एक बार अपने मुँह से वचन कह चुका, तो वह वैसा ही है मानो हम उस आग को पहले ही सुलगी हुई देखते हैं जो हमें भस्म करने को है। उसी रीति से (मैं कहता हूँ) हमें उन सब धमकियों को ग्रहण करना चाहिए जो परमेश्वर हमारे विरुद्ध सुनाता है। क्योंकि व्यवस्था का पालन सीखने का सबसे उत्तम उपाय यही है, मेरा अर्थ है जहाँ तक हमारी निर्बलता सह सके। क्योंकि (जैसा मैंने तुम्हें बताया) जब तक हम अपने इस शरीर में बन्द हैं, तब तक हमारे लिये वास्तव में सिद्धता तक पहुँचना सम्भव नहीं: तौभी हम अपने आप को परमेश्वर के लिये समर्पित कर सकते हैं, और उसके भय में थामे रखे जा सकते हैं, यदि एक ओर उसकी प्रतिज्ञाएँ हम में प्रभावी हों, और दूसरी ओर हम उसकी धमकियों पर कान लगाएँ।

परन्तु अब आओ हम उस क्रम पर आएँ जो इस स्थान में रखा गया है। मूसा ने लेवी गोत्र के याजकों समेत लोगों को आज्ञा दी, कि छः गोत्र एबाल की पहाड़ी पर खड़े हों, और छः गिरिज्जीम की पहाड़ी पर। और फिर वह कहता है, "मेरी विधियों और आज्ञाओं को जो मैं आज तुम्हें देता हूँ मानो, क्योंकि तुम अपने परमेश्वर की प्रजा बनाए गए हो।" इसकी व्याख्या पहले हो चुकी है: परन्तु उसके विषय में जो कहा गया उसे सदा स्मरण रखना भला है; अर्थात् यह कि परमेश्वर अपने याजकों के मुख से ऐसे बोलता है मानो वह वहाँ अपने ही व्यक्तित्व में प्रत्यक्ष हो। और यह इसलिये कि उसके वचन अधिक आदर के साथ ग्रहण किए जाएँ। क्योंकि जब हम केवल हमारे जैसे नश्वर मनुष्यों को ही देखते हैं: तो हमारी यह धारणा होती है कि जो कुछ उनसे निकले उसे ठुकरा देना ठीक है; और यदि उसकी कुछ गिनती न हो, तो हम समझते हैं कि बात बड़ी नहीं। और इस प्रकार हम देखते हैं कि परमेश्वर के वचन को प्रायः तुच्छ समझा जाता है। क्योंकि जब हम अपने ही जैसे प्राणियों के सिवा किसी को बोलते नहीं देखते, तो हम समझते हैं कि वे जो कुछ सुनाते हैं वह शब्दों की ध्वनि मात्र है। परन्तु परमेश्वर चाहता है कि उसके वचन की महिमा जानी जाए: और यद्यपि मनुष्य उसे लाते हैं, और उसके दूत हैं, तौभी वह नहीं चाहता कि उसकी योग्यता घटाई जाए, कि मनुष्य उस पर कान न दें: परन्तु वह चाहता है कि हर एक मनुष्य उसके आगे झुके और वह जूआ ग्रहण करे जो वह उन पर रखता है।

इसलिये परमेश्वर इस स्थान में मूसा और याजकों के द्वारा बोलता है: परन्तु ऐसी भाषा और बोली में कि वह चाहता है कि लोग अपने मन को और ऊपर उठाएँ, और जानें कि यद्यपि उन्हें मनुष्य के साधन और सेवकाई से शिक्षा मिलती है, तौभी उन्हें मानना चाहिए कि परमेश्वर ही उस वचन का रचयिता है जो मनुष्य उन्हें सुनाते हैं, और उन्हें उसे ऐसे ग्रहण करना चाहिए मानो स्वयं परमेश्वर की ओर से हो, और चुप रहकर उसे सुनना चाहिए, और उसके विरुद्ध कोई उत्तर या विरोध न करना चाहिए: क्योंकि ऐसा तिरस्कार किसी नश्वर प्राणी का नहीं किया जाता, परन्तु उससे स्वयं परमेश्वर तुच्छ ठहरता है। और इसलिये आओ हम उन सब स्थानों को भली-भाँति ध्यान में रखें जिनके द्वारा परमेश्वर अपने वचन को प्रामाणिक ठहराता है, ताकि हम उसी से बँधे रहना और उसी से चलाए जाना सीखें: कि जितनी बार मनुष्य हमसे परमेश्वर के नाम में बोलें, हम में से हर एक अपना सिर झुकाए। और इसके अतिरिक्त हम वह क्रम भी देखते हैं जो परमेश्वर ने अपनी कलीसिया में ठहराया है: वह चाहता है कि सारा संसार आमीन कहे: क्योंकि हम सब को शिक्षा में सहभागी होना चाहिए। यह केवल बड़े लोगों के लिये सुरक्षित नहीं रखी जानी चाहिए, परन्तु छोटे से छोटे को भी उसके द्वारा शिक्षा मिलनी चाहिए, कि उनका निर्माण और भला हो। परन्तु बात जैसी भी हो; बोलने के लिये सदा याजक रहे, जो लोगों को सिखाने के लिये ठहराए गए थे, जैसा मलाकी भविष्यद्वक्ता में कहा गया है; "व्यवस्था याजक के मुँह में होगी, और वह जीवते परमेश्वर का दूत होगा, और वे उसके होंठों से ज्ञान ढूँढ़ेंगे।" तब हम देखते हैं कि परमेश्वर ने सब समयों में कुछ को लोगों को सिखाने और अपना वचन दूर-दूर पहुँचाने के काम पर ठहराया। और इसलिये आजकल भी हमें ऐसे क्रम की आवश्यकता है, और हम जानते हैं कि इस विषय में सन्त पौलुस क्या कहता है, रोमियों के 12वें अध्याय में भी, और कुरिन्थियों की पहली पत्री के 12वें में भी, और इफिसियों के चौथे में भी। और सारे पवित्र शास्त्र में हमें यह भी प्रमाणित होता है कि परमेश्वर चाहता है कि कुछ व्यवस्थाएँ स्थापित हों, और कुछ मनुष्य ठहराए जाएँ जो उसका वचन दूर-दूर पहुँचाएँ, और उसकी कलीसिया में शिक्षक हों, ताकि उसके नाम से लोगों को शिक्षा दें। इससे हम निष्कर्ष निकालते हैं कि जब परमेश्वर ने ऐसा क्रम ठहराया है; तो वे सब जो कलीसिया की सारी देह के साथ इस सामान्य क्रम से शिक्षा पाना नहीं सह सकते, चाहे खुलकर कहें कि वे मसीही हैं: परन्तु वे कलीसिया में घोड़ों के समान पवित्र बनकर आते हैं, अपने आप को यह समझाते हुए कि उनके लिये एक शब्द में यह मान लेना ही पर्याप्त है कि सुसमाचार परमेश्वर का वचन है। परन्तु इसके विपरीत हम यहाँ देखते हैं कि यदि हम कलीसिया की देह के अंग होना चाहते हैं, और चाहते हैं कि परमेश्वर हमें अपने बच्चे गिने, तो हमें परमेश्वर का वचन वैसे ही सुनना चाहिए जैसा मनुष्यों की सेवकाई के द्वारा हमें दिया जाता है। परन्तु क्योंकि इस विषय पर पहले विस्तार से बात हो चुकी है, इसलिये मैं अब इसे केवल मार्ग-चलते मानो छूता भर हूँ।

फिर, यह बात भी है: आज तू परमेश्वर की प्रजा बनाया गया है, यदि तू उसकी आज्ञाओं को माने। इसलिये जैसे हमारा प्रभु हमें अपने घर में ग्रहण करता है, वैसे ही हमें भी अपने आप को पूरी रीति से उसे सौंप देना चाहिए, यह जानते हुए कि इसी लिये उसने हमें संसार के शेष लोगों में से अलग किया है, और चाहता है कि हम उसके अपने हों, और मानो उसका निज भाग हों। यह सच है कि सब मनुष्य उसकी सेवा करने के लिये बँधे हैं: तौभी जब वह हमें अपनी ओर बुलाता है, और अपने आप को हमारा पिता दिखाता है, तो क्या वह हमें दोहरे बन्धन से अपने साथ नहीं बाँधता? हाँ, निश्चय। तब यदि हम अपने आप को उसकी इच्छा के हवाले करने के लिये प्रेरित न हों, कि वह हमें चलाए और हमारे सारे जीवन पर प्रभुता करे, तो क्या हम सारी समझ और विवेक से रहित, और पूरी तरह मोहित नहीं? तब आओ हम इन शब्दों को भली-भाँति तौलें: आज तू अपने परमेश्वर यहोवा की प्रजा बनाया गया है, इसलिये उसकी आज्ञाओं को मान। हम परमेश्वर की प्रजा कैसे बनाए गए हैं, सिवाय इसके कि हम उसकी कलीसिया हैं, और हमें उसके संस्कारों का उपयोग मिलता है, और यह वैसा ही है मानो वह हमारे बीच प्रकट हो? क्योंकि हमें यह आशा नहीं करनी चाहिए कि परमेश्वर अपने ही व्यक्तित्व में स्वर्ग से उतर आए, या अपने स्वर्गदूतों को हमारे पास भेजे। परन्तु वह सच्चा चिह्न जिससे वह जाना जाना चाहता है कि हमारे बीच है, हमारे सामने उसके वचन का शुद्धता से प्रचार है: क्योंकि निःसन्देह तब वह हमारे बीच में प्रभुता करता है। इसलिये यह बात हमें लाभ पहुँचाए कि हम जानें कि हमारा प्रभु हमें अपने पास ग्रहण करता है और चाहता है कि हम उसके अपने घराने के हों। जब ऐसा है, तो आओ हम अपने सारे जीवन में उसकी आज्ञा मानने और उसकी आज्ञाओं को पूरा करने का परिश्रम करें: हम अभागे अविश्वासियों की तरह पशुओं के समान न भटकें, क्योंकि उन्होंने कभी जाना ही नहीं कि परमेश्वर के घराने का होना क्या है।

परन्तु अब आओ हम उस वर्णन पर आएँ जो मूसा शापों का करता है: वह सबसे पहले कहता है, श्रापित हो वह जो कोई मूरत या ढली हुई प्रतिमा, या खुदी हुई प्रतिमा बनाए: यह सब परमेश्वर के लिये घृणित है: और श्रापित है वह जो उसे किसी गुप्त स्थान में रखे। और सब लोग कहें आमीन। आओ हम ध्यान दें कि मूसा इस स्थान में सब शापों को एक-एक करके नहीं बताता, परन्तु कुछ उदाहरण रखता है, यह दिखाने के लिये कि वे सब जो परमेश्वर की व्यवस्था से हट जाते हैं, जान-बूझकर पूरे विनाश और सर्वनाश में दौड़ पड़ने के सिवा और कुछ नहीं ढूँढ़ते। इन सब का सार इसलिये यह है कि यदि हम समृद्ध होना चाहें, तो हमें परमेश्वर के निकट आना चाहिए, क्योंकि वही सारे सुख और समृद्धि का सोता है। जबकि दूसरी ओर, वे सब जो उससे दूर हो जाते हैं पूरे विनाश में जा गिरते हैं: परन्तु वे सब जो परमेश्वर का जूआ उतार फेंकते हैं, अर्थात् जो उसकी व्यवस्था और उसके वचन का पालन करने के लिये अपने आप को समर्पित नहीं करते, वे सब उससे दूर हो जाते हैं, और अपनी शक्ति भर अपने आप को उसकी उपस्थिति से निर्वासित करते हैं। और इसलिये यह वैसा ही है मानो उन्होंने अपने आप को नरक की तह में फेंक दिया, और इस वर्तमान जीवन में परमेश्वर के प्रतिशोध को अपने विरुद्ध भड़काने, और यों अपना ही सन्ताप ढूँढ़ने के सिवा और कुछ न चाहा। देखो, हमें क्या स्मरण रखना है। अब परमेश्वर अपनी ही सेवा से आरम्भ करता है: और बिना कारण नहीं: क्योंकि (जैसा हम पहले बता चुके हैं,) व्यवस्था दो पट्टियों में बाँटी गई है: यह दिखाने के लिये कि मनुष्यों को सबसे पहले अपना ऐसा व्यवहार रखना चाहिए कि परमेश्वर का आदर हो: और यह पहला और मुख्य कर्तव्य है जो हमें निभाना चाहिए, क्योंकि हम उसकी सृष्टि हैं, और उसने हमें अपनी महिमा के लिये रचा है: आओ हम उसी लक्ष्य की ओर बढ़ें, और हमारा जीवन उसी से जुड़ा हो, क्योंकि पहली पट्टी हमें इतने संक्षेप में बताती है कि हमें अपने परमेश्वर के प्रति कैसा व्यवहार रखना चाहिए। यही कारण है कि परमेश्वर अब इन शापों में कहता है; श्रापित हो वह जो कोई मूरत बनाए। परन्तु मैं तुम्हें बता चुका हूँ कि मूसा केवल कुछ प्रकार ही गिनाता है, और यह इसलिये कि सम्पूर्ण को एक अंश में समेट ले, जैसे हम उसके उदाहरण देख चुके हैं। सार यह है कि जब कहा गया: श्रापित हो वह जो कोई मूरत बनाए, तो यह वैसा ही है मानो मूसा ने सामान्य रूप से उन पर शाप सुनाया जो परमेश्वर की सेवा और आराधना को बिगाड़ते और भ्रष्ट करते हैं, मानो वह कहता: तुम जानते हो कि हमारा परमेश्वर हमसे किस रीति और किस प्रकार से आराधित होना चाहता है; जो कोई किसी भी प्रकार की मूर्तिपूजा गढ़े, जो कोई किसी भी प्रकार का अन्धविश्वास रचे, वह मूरतें बनाता है। और यह जीवते परमेश्वर की सेवा करना नहीं, परन्तु अपनी ही कल्पनाओं और मनगढ़न्तों के पीछे चलना है: और इसलिये वे सब श्रापित हैं। तो देखो कि इस स्थान की व्याख्या हमें कैसे करनी चाहिए। और मूसा का अभिप्राय था कि इस स्थान में हमारे सामने ऐसी बात रखे जिसमें हम परमेश्वर की आराधना का असह्य बिगाड़ सबसे स्पष्ट रीति से देख सकें। क्योंकि जब परमेश्वर को किसी चित्र में, या किसी पुतले में, या लकड़ी या पत्थर के किसी और टुकड़े में ऐसा विकृत किया जाता है कि मनुष्य वहाँ उसकी प्रतिमा दिखाएँ और कहें, यह उसका रूप है: तो यह बहुत ही स्थूल और अत्याचार भरा व्यवहार है। सच है, मनुष्य ऐसा नहीं सोचते; जैसा हम पोपवाद में देखते हैं, कि वे कहते हैं, देखो, वह परमेश्वर है, और उसका स्मारक। और क्या वे ऐसे पशु-समान नहीं कि वे समझते हैं कि स्वर्ग में कोई ईश्वरीय महिमा नहीं, जब तक वह वहाँ मूरत के रूप में दिखाई न जाए? परन्तु जिन्हें परमेश्वर का कुछ भी स्वाद है, और जिन्होंने उसके वचन का एक अक्षर भी सुना है, जहाँ कहा गया है कि परमेश्वर अविनाशी और अनन्त आत्मा है, जीवन का सोता: वे जानते हैं कि उसके साथ बहुत बड़ा अन्याय होता है, कि उसे किसी मरी हुई वस्तु और नाशमान सृष्टि के द्वारा दर्शाया जाए, और उसका नाम किसी पुतले को दिया जाए मानो वह केवल कोई प्राणी हो, और हमसे भी तुच्छ। इसलिये जिन्हें इस शिक्षा का थोड़ा सा भी स्वाद है, वे मूरत खड़ी करने से, और उसके पास जाकर परमेश्वर की सेवा करने की कल्पना से, और इससे कि कोई किसी मरी हुई वस्तु से प्रार्थना करे, या उससे जो न भला कर सकती है न बुरा, कल्याण की आशा रखे, घृणा करते हैं। इसलिये यदि यह भली-भाँति देखा जाए, तो हम पाएँगे कि मूसा का अभिप्राय इस स्थान में मूर्तिपूजा को और घृणित ठहराना था, उस नियम के अनुसार जो हम पहले समझा चुके हैं। तौभी इस स्थान में हमें दो बातें ध्यान देनी हैं: एक यह कि परमेश्वर अपनी अनन्त महिमा को पत्थर, लकड़ी, चित्र, या संसार की किसी और सृष्टि में दर्शाया जाना नहीं सह सकता। तब जब बात परमेश्वर की आराधना की हो, तो हमें क्या करना चाहिए? हमें अपने मन को संसार से ऊपर उठाना चाहिए, और जानना चाहिए कि हम यहीं नीचे अटके न रहें, न उसके लिये कोई मूरत या पुतला बनाएँ: क्योंकि वह इसे सह नहीं सकता। यह एक बात ध्यान देने की है। दूसरे, हमें यह भी ध्यान देना है कि परमेश्वर हमारी अपनी रीति से सेवा या आराधना नहीं चाहता, परन्तु चाहता है कि हम उसके वचन के अनुसार चलें, उसमें कुछ जोड़े या उससे कुछ घटाए बिना, यहाँ तक कि वे सब आविष्कार जो मनुष्यों ने गढ़े हैं वैसे ही हैं मानो उन्होंने उतनी ही मूरतें खड़ी की हों। सच है, वे अपने आप को विश्वास दिला लेते हैं कि जो वे करते हैं उससे परमेश्वर प्रसन्न होगा: परन्तु यह उनका निरा अनुमान है, क्योंकि वे उस पर दृष्टि नहीं रखते जो उसे भाता है। इसलिये वे अपनी ही कल्पनाओं की सेवा करते हैं, और उस जीवते परमेश्वर की नहीं, जिसने उन्हें ऐसा नियम दिया है जिसका पालन वह चाहता है। और इसलिये एक शब्द में परमेश्वर की सब आराधनाएँ (जैसा वे उन्हें कहते हैं) जिनमें मनुष्य अपनी कल्पनाओं के अनुसार इतने भक्त हैं, और जिनके लिये उनके पास परमेश्वर के वचन का कोई प्रमाण नहीं, कि कह सकें: यह उसने मुझे आज्ञा दी है: वे उनकी अपनी गढ़ी हुई मूरतों के सिवा कुछ नहीं। यह भली-भाँति ध्यान में रखा जाए।

अब आओ विचार करें कि परमेश्वर कैसे कहता है, "श्रापित है वह जो मूरतें गढ़ता है।" यह सच है कि पोपवादी जब वेदी-वेदी भटकने, अपनी प्रतिमाओं के सामने अपनी प्रार्थनाएँ बुदबुदाने, उन्हें मोम की मोमबत्तियों से सजाने, और अपनी अन्य बकवासें करने का परिश्रम करते हैं: यदि कोई उनसे कहे कि परमेश्वर को उनके ये सब काम नहीं भाते, तो उन्हें यह सुनकर चिढ़ होती है, और वे स्वयं परमेश्वर को कोसने लगते हैं। परन्तु फिर भी, जबकि वे समझते हैं कि वे बीसियों स्वर्ग जीत रहे हैं, उनका उठाया हुआ हर पग अपने आप को नरक के गड्ढे में डालना है। और क्यों? वे कैसे ही सुन्दर उत्तर क्यों न दें; तौभी न्यायी उन पर यही दण्ड सुनाता है; "श्रापित हैं वे सब जो मूरतें बनाते हैं।" वे जाकर अपनी मज़दूरी शैतान के हाथ से लें: हमारे प्रभु ने वह दण्ड पहले ही सुना दिया है जो यहाँ लिखा है, अर्थात् श्रापित हैं सब मूर्तिपूजक। यदि कोई कहे कि भली मनसा से कोई काम करना और यह कहना कि मैं समझता हूँ यह भला है, मुझे विश्वास है यह ठीक किया गया, ऐसी कोई बड़ी हानि नहीं: तौभी परमेश्वर उसकी एक-एक बात से घृणा करता है, क्योंकि यह एक नया परमेश्वर गढ़ना है, जब मनुष्य परमेश्वर की आराधना की शुद्ध सादगी से फिरकर यह या वह रचने लगते हैं। यद्यपि वे समझते हैं कि भला कर रहे हैं, तौभी वे श्रापित हैं। और क्यों? क्योंकि परमेश्वर उनके काम को नापसन्द और दोषी ठहराता है। और नश्वर प्राणी का काम नहीं कि अपने लिये यह या वह प्रतिज्ञा कर ले, परन्तु प्रतिज्ञा परमेश्वर को करनी है, और हमें आमीन कहना है। और वैसे ही जब वह धमकी देता है, तो हमें लज्जित होना चाहिए, और उसके आगे हर एक मुँह बन्द हो जाना चाहिए: उसकी सुनी जानी चाहिए, और हमें उसकी धमकियों को ग्रहण करके उनकी पुष्टि करनी चाहिए, जैसा मैंने तुम्हें बताया। और यहाँ गुप्त स्थान का उल्लेख जान-बूझकर किया गया है, यह दिखाने के लिये कि यद्यपि मनुष्य संसार के सामने दोषी न ठहराया जाए, तौभी वह परमेश्वर के सामने दोषी होना नहीं छोड़ता, और वह स्वर्गीय न्यायी उसे भली-भाँति ढूँढ़ निकालेगा। इसलिये हम अपने आप को धोखा न दें, और यह न सोचें कि जब मनुष्य हमें नहीं डाँटते, और हमारे किए हुए बुरे काम का हमें दोषी नहीं ठहराते, तब हम बच निकलेंगे और दण्ड से बचे रहेंगे। क्योंकि हम बच निकलने की गुंजाइशें भले ही ढूँढ़ें, परन्तु परमेश्वर हमें ढूँढ़ निकालेगा, क्योंकि वह कहता है: "श्रापित है वह जो मूरत बनाकर गुप्त स्थान में रखे।" और फिर वह कहता है, "यह यहोवा के लिये घृणित है," यह दिखाने के लिये कि मनुष्य अपनी ही सम्मति, या संसार के निर्णय पर टिककर अपने आप को धोखा न दें: यही पर्याप्त है कि परमेश्वर कहता है, ऐसी बात मुझे अप्रिय है। यद्यपि संसार हमसे प्रसन्न हो, तौभी उससे हमें कुछ लाभ नहीं। इसलिये आओ हम चौकस रहें कि अपने आप को परमेश्वर की इच्छा के अनुसार ऐसा ढालें कि यह संसार हमें बहा न ले जाए, और हम अपनी या दूसरों की अभिलाषाओं की सेवा न करें, परन्तु सदा अपने आप को अपने स्वर्गीय न्यायी के अधीन रखें। तो देखो कि हमें क्या स्मरण रखना है। क्योंकि जब परमेश्वर की सेवा करनी हो, तो हमें यह नहीं देखना चाहिए कि यहाँ नीचे हमारे कामों के कोई गवाह हैं या नहीं; क्योंकि यद्यपि हम सारे संसार को धोखा दे सकें, तौभी परमेश्वर हमें देखता है, और हम उसकी दृष्टि से बच नहीं सकते। इसलिये हमारे छिपने के स्थान कैसे ही हों, आओ हम जानें कि हमारा दण्ड हाथ ही पर है। और इस पर आओ हम अपने जीवन को ऐसा चलाएँ कि परमेश्वर की सेवा और आदर हो, केवल हमारे पैरों, हाथों और आँखों से नहीं, परन्तु हमारे मन की सेवा से भी, अर्थात् हमारी सब भावनाओं और सब विचारों के उसे सौंप दिए जाने से। और (अन्त में) हमें सिखाया जाता है कि परमेश्वर की सेवा बिना कारण आत्मिक नहीं कहलाती: जिससे हम समझ सकें कि हमारे लिये यह पर्याप्त नहीं कि मनुष्यों के सामने घुटने टेककर और ऐसी ही अन्य विधियों के द्वारा उसका आदर करें, या मनुष्यों की दृष्टि में मूरतों की सेवा से दूर रहें; परन्तु गुप्त में भी, जब हर एक अपने एकान्त स्थानों में चला जाए: तब भी हमें उसे अपना परमेश्वर स्वीकार करना है, और हमारी सब भावनाएँ उसकी आज्ञाकारिता के अधीन रखी जानी चाहिए, और हमारे पास वह शुद्धता होनी चाहिए जिसकी चर्चा सन्त पौलुस करता है, अर्थात् विश्वास की आज्ञाकारिता, जिसके द्वारा हम में से हर एक अपने आप को पूरी रीति से परमेश्वर के लिये समर्पित और पवित्र करे।

अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने दोषों को मानते हुए घुटने टेकें, उससे प्रार्थना करते हुए कि हम सच्चे पश्चाताप से और अधिक द्रवित हों, कि अपने आप से अप्रसन्न हों, ताकि उसकी प्रतिज्ञाओं और उसकी धमकियों दोनों पर मन लगाने में अपना सारा अध्ययन लगाकर हम उसका जूआ उतार फेंकने में ऐसे उतावले न हों, परन्तु सदा ऐसे उपायों से रोके जाएँ जो हमारे लिये उचित और उपयुक्त हैं: और कि हम उसकी स्वेच्छा से सेवा करें, इस मनसा से कि जैसे उसने अपनी मुफ़्त भलाई से हमें अपनी ओर बुलाया है, वैसे ही वह अपनी पवित्र आत्मा से हमें चलाए और संचालित करे, कि हम अपने आप को उसके हवाले कर दें, और नम्रता और भय के साथ उसकी सेवा करें, उसकी प्रतिज्ञाओं को ग्रहण करते हुए, और उसकी धमकियों पर काँपते हुए: और इस बीच वह हमें अनुभव कराए कि यदि हम उसकी सेवा में लगे रहें, तो वह हमें समृद्ध करेगा, और हम परम सुखी होंगे, और विशेषकर इसलिये कि उसने स्वर्ग के राज्य का निज भाग हमारे सामने रखा है, जिसे उसने अपने एकलौते पुत्र के व्यक्तित्व में हमारे लिये मोल लिया है। वह प्रसन्न होकर यह अनुग्रह न केवल हमें, परन्तु पृथ्वी के सब लोगों और जातियों को भी प्रदान करे, इत्यादि।

बुधवार, 4 मार्च, 1556 को।

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