अध्याय 4

152वाँ उपदेश, जो सत्ताईसवें अध्याय पर चौथा है

The Covenant Unveiled · John Calvin

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152वाँ उपदेश, जो सत्ताईसवें अध्याय पर चौथा है

152वाँ उपदेश,

जो सत्ताईसवें अध्याय पर चौथा है।

24 श्रापित हो वह जो छिपकर अपने पड़ोसी को मारे: और सब लोग कहें, आमीन।

25 श्रापित हो वह जो निर्दोष के प्राण को मारने के लिए घूस ले: और सब लोग कहें, आमीन।

26 श्रापित हो वह जो इस व्यवस्था के सब वचनों को उन पर चलकर स्थिर नहीं करता: और सब लोग कहें, आमीन।

इस पद से हम समझते हैं कि जो बात पहले कही जा चुकी है वह अत्यन्त सत्य है; अर्थात् यह कि परमेश्वर प्राचीन काल के लोगों को यह सिखाना चाहता था कि मनुष्यों के सामने अपना कर्तव्य निभा लेना, या यहीं दोष और दण्ड से बच निकलना उनके लिए पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें और ऊँचे देखना चाहिए और यह विचार करना चाहिए कि स्वर्ग में एक न्याय-आसन है, जिसके सामने हमें एक दिन उत्तर देना और अपना लेखा देना होगा। यही वह स्थान है जिस पर हमें ध्यान लगाना चाहिए, यदि हम अपना कर्तव्य पूरा करना चाहते हैं। क्योंकि हम भली मुद्रा बनाकर मनुष्यों को भली-भाँति धोखा दे सकते हैं, और फिर हम अपना जीवन ऐसा भी ढाल सकते हैं कि बाहरी कर्मों के विषय में कोई हम में दोष न पाए; तौभी इस बीच यदि हमारे हृदय बुरी अभिलाषाओं से भरे हों, यदि भय में रखा जाना हमें खलता हो, यदि हम परमेश्वर के विरुद्ध दाँत पीसते हों: तो वह कैसी आज्ञाकारिता है? इसलिए आओ, हम ध्यान दें कि इस पद में जब यह कहा गया है: श्रापित हो वह जो छिपकर अपने पड़ोसी को मारे: तो परमेश्वर केवल उन दोषों को ही दोषी नहीं ठहराता जो मनुष्यों के सामने प्रकट हो जाते हैं, वरन् उन अपराधों को भी जो छिपे रहते हैं। इसलिए यदि कोई मनुष्य ऐसा जीवन बिताए कि संसार उसे दोषी न ठहरा सके, वरन् उसकी प्रशंसा और सराहना हो, तो उसे इस पर निश्चिन्त होकर सो नहीं जाना चाहिए, परन्तु अपने हृदय को जाँचना और भली-भाँति विचारना चाहिए कि भीतर कहीं कोई छिपा हुआ कोना या पिछला अँधेरा स्थान तो नहीं। क्योंकि यदि विचार बुरे हैं, तो चाहे मनुष्य उन्हें न देखें, तौभी परमेश्वर सदा न्यायी का कार्य करेगा। और यदि हमारा अपना हृदय हमें दोषी ठहराता है (जैसा सन्त यूहन्ना कहता है), तो परमेश्वर उसे कहीं अधिक स्पष्ट देखता है।

इसलिए यह पद हमें नम्र करने के लिए भली-भाँति काम आता है। और सच तो यह है कि हमें सन्त यूहन्ना का वह दूसरा वचन भी स्मरण रखना चाहिए जहाँ कहा गया है कि जो कोई अपने पड़ोसी से गुप्त रूप से बैर रखता है, चाहे वह अपने बैर को ऐसा ढाँपे कि वह दिखाई न दे, वरन् प्रेम का दिखावा करे: वह मनुष्य परमेश्वर के सामने दोषी ठहराए जाने से नहीं चूकता। इस प्रकार तुम देखते हो कि वास्तव में हमें क्या स्मरण रखना है। हम मनुष्यों की बातों में अपना सिर न खपाएँ। यदि इस संसार में किसी मनुष्य की अच्छी चर्चा भी होती हो, तौभी वह इससे अपने आप को बहलाए नहीं, परन्तु अपने आप को परमेश्वर के सामने बुलाए और विचार करे कि कहीं वह अपने हृदय में दोषी तो नहीं है। मनुष्य यहाँ अपनी-अपनी राय और कल्पनाएँ न लाएँ; क्योंकि ऐसी सब बातें ठुकरा दी जाएँगी, वे किसी काम की न होंगी। इसलिए आओ, हम परमेश्वर के सामने निष्कपट हृदय से चलें। क्योंकि हम जानते हैं कि वह बाहरी रूप को नहीं देखता, जैसा शमूएल की पहली पुस्तक में कहा गया है, परन्तु वह हृदय और सच्चाई चाहता है, जैसा यिर्मयाह के पाँचवें अध्याय में कहा गया है। और जो कुछ यहाँ हत्याओं और झगड़ों के विषय में कहा गया है, उसी को हमें अन्य सब अपराधों तक भी बढ़ाना चाहिए। क्योंकि यदि परमेश्वर उनसे भी लेखा लेता है जिन्होंने अपने पड़ोसियों पर कोई अत्याचार किया है, चाहे वह संसार को ज्ञात न हो, तो क्या हम सोचते हैं कि लूटपाट, और विश्वासघात, और छल, और गाली-गलौज, और निन्दा, और ऐसी ही बातें अनकही रहकर बीत जाएँगी? इसलिए आओ, हम यह सीखें कि यदि हम अपने हृदयों में ऐसे दोषों को पालते रहें जो मनुष्यों पर प्रकट नहीं हैं, तो हम किसी भी रीति से परमेश्वर के हाथ से बच नहीं सकते और न उसके बदले से निकल सकते हैं। और इस शिक्षा से हम और अधिक लाभ उठा सकें, इसलिए जब हम परमेश्वर का वचन सुनने आएँ, तब हम में से हर एक अपने हृदय में अपने आप को ठीक-ठीक जाँचे। क्योंकि हमारा भीतर से ताड़ना पाना आवश्यक है, जैसा सन्त पौलुस 1 कुरिन्थियों की पत्री के चौदहवें अध्याय में इसके विषय में कहता है। हर एक मनुष्य, मैं कहता हूँ, अपने विचारों और भावनाओं को तल तक खोजे। साथ ही, परमेश्वर के वचन का यह विशेष कार्य है कि वह एक तीखी तलवार हो और हमारे विचारों को हमारी सब भावनाओं और रुचियों से अलग-अलग कर दे, और हड्डियों के गूदे तक भी घुस जाए, और कुछ भी बिना खोले न छोड़े। जब ऐसा है, तो आओ, हम परमेश्वर के न्याय से पहले ही स्वयं को सँभालें और उस समय की प्रतीक्षा न करें जब वह हम पर उस निर्दोष लहू के कारण श्राप दे और हमें धिक्कारे जो हमारे विरुद्ध चिल्लाता है; परन्तु हम में से हर एक पाप करते ही अपने आप को दोषी ठहराए, और अपने हृदय में खेदित हो, और परमेश्वर से उसकी अपार भलाई और दया के कारण विनती करे कि वह हमें उस श्राप से छुड़ाए जो उन सब पर सुनाया गया है जिन्होंने गुप्त में ऐसा बुरा आचरण किया और मनुष्यों के सामने उसके दोषी न ठहराए गए।

आगे लिखा है: “श्रापित हो वह जो अपने पड़ोसी पर कोई अन्याय करने के लिए, और विशेषकर निर्दोष लहू के प्राण को मारने के लिए घूस ले।” क्योंकि मूसा शब्द-शब्द यही कहता है। तौभी “प्राण” शब्द का अर्थ जीवन है। और क्योंकि लहू ही जीवन का उचित निवास है, इसलिए कहा गया है “निर्दोष लहू का प्राण।” निश्चय ही, यदि कोई मनुष्य दोषी भी हो, तौभी उसके प्राण का मोल-भाव करना उचित नहीं है। परन्तु मैं तुम्हें पहले ही बता चुका हूँ कि परमेश्वर ने हमारे सामने सबसे घृणित अपराधों को रखा है, इस उद्देश्य से कि हम और अच्छी रीति से जाग उठें, क्योंकि जब वह साधारण दोषों की चर्चा करता है तब हम पर्याप्त रूप से प्रभावित नहीं होते। क्योंकि वे बातें खिसक जाती हैं, और हम अपने आप को यह समझाते रहते हैं कि उनकी क्षमा पाना कोई कठिन बात नहीं। अब, क्योंकि मनुष्यों में इतनी ढिलाई है, इसलिए इस स्थान पर परमेश्वर ने उन अपराधों को चुना है जिनसे हमें स्वभाव से ही घृणा करनी चाहिए। क्योंकि यदि एक निर्दोष जन के प्राण का मोल-भाव हो, तो यह भयानक बात है; हर मनुष्य कहेगा कि ऐसा दुष्ट षड्यन्त्र सहा नहीं जाना चाहिए। इस प्रकार अब हम परमेश्वर का अभिप्राय देखते हैं। परन्तु यद्यपि यह बात खुले मुँह से पर्याप्त रूप से दोषी ठहराई जाती है, तौभी मनुष्य इसे बहुत अधिक व्यवहार में लाने से नहीं रुकते। और इसके प्रमाण के लिए उन चालों को देखो जो निरन्तर गरीबों और सीधे-सादे लोगों को दबाने के लिए चली जाती हैं। यह सच है कि उनके गले काटे जाने का खतरा उन्हें सदा नहीं रहता, परन्तु तौभी उन्हें हानि पहुँचाने के कारण, चाहे उनके शरीरों में हो या उनकी सम्पत्ति में, मनुष्य परमेश्वर के सामने अब भी हत्या के दोषी हैं। और निर्दोष के अधिकार को निष्फल करने के लिए चोर-रास्ते ढूँढ़ना और उनके विरुद्ध, जो शान्ति और मेल से रहना चाहते हैं, युक्तियाँ रचना तो बहुत ही सामान्य बात है; और इसलिए यह व्यवस्था आवश्यकता से अधिक नहीं है। यह सच है (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) कि पहली ही दृष्टि में हम भली-भाँति कह सकते हैं कि हमारे इतने बड़े और इतने अतिशय हठ में बने रहने का कोई कारण नहीं है; हर मनुष्य तुरन्त कहेगा कि यह स्वभाव के विरुद्ध है; परन्तु तौभी सामान्य चलन और रीति इसके बिलकुल उलटी है। इसलिए जो शिक्षा यहाँ रखी गई है उस पर भली-भाँति ध्यान दें; अर्थात् यह कि परमेश्वर इतने बड़े अपराध को बिना दण्ड के नहीं रहने दे सकता, जैसे अधिकार को निष्फल कर देना, जिससे वह पक्ष जिसने कोई अपराध नहीं किया सब अधिकार और तर्क के विरुद्ध दबाया जाए। और सच तो यह है कि परमेश्वर यहाँ उन न्यायियों के विषय में भी कहता है जो किसी गरीब को दबाने के लिए बिक गए, और उनके विषय में भी जिन्होंने अपने आप को मनुष्यों की हत्या करने, उन्हें पीटने या मारने के लिए भाड़े पर बेच दिया या लगा दिया; जैसे ये बाँके गुण्डे करते हैं, जो लोगों को पीटने या उनसे झगड़ने के काम पर लगाए जाने की खोज में रहते हैं: इन सब प्रकार के अपराधियों को परमेश्वर ने इस पद में पूर्णतः दोषी ठहराया है। और एक विशेष बात के नीचे वह सब को सामान्य रूप से समेट लेता है, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ। इसलिए वास्तव में जो बात हमें ग्रहण करनी है वह यह है कि लोभ हमें किसी भी मनुष्य को हानि पहुँचाने की ओर न ले जाए। अब हम देखते हैं कि यह शिक्षा बहुत दूर तक फैली हुई है। क्योंकि इतने छल, अत्याचार, अनर्थ और अन्याय किए जाने का कारण अपने लाभ की खोज के सिवा और क्या है? मैं किसी अधिकारी मनुष्य को प्रसन्न करना चाहता हूँ क्योंकि मुझे लगता है कि वह मुझे बदले में लौटा सकता है; और इस पर मैं उसके लिए किसी को दबाने और किसी को सताने लगता हूँ। और फिर इतना ही पर्याप्त नहीं होता; जब तक मैं और प्रकार के व्यवहार न करूँ, और बात असीम और हद से बाहर बढ़ती जाती है। इसलिए इतना ही अधिक हमारे लिए आवश्यक है कि हम इस शिक्षा पर भली-भाँति ध्यान दें जहाँ कहा गया है: “श्रापित हो वह जो मनुष्यों पर अन्याय करने के लिए प्रतिफल लेता है।”

और इसी के अनुरूप वह है जो पन्द्रहवें भजन में कहा गया है: अर्थात् यदि हम परमेश्वर के घराने के लोग होना और उसकी कलीसिया में निवास करना चाहते हैं, तो हमें निर्दोष को हानि पहुँचाने के लिए प्रतिफल लेने से सावधान रहना चाहिए। यदि परमेश्वर उन सब को अपने राज्य से और विश्वासियों की संगति से निकाल देता है, जो अपने लोभ के कारण अपने आप को बिकाऊ और भाड़े का बनाकर इस प्रकार बुरा आचरण करने चले हैं, तो उनके लिए पूर्ण श्राप के सिवा और क्या बचता है? क्योंकि जब परमेश्वर एक बार हमें अस्वीकार कर दे और हमें अपना कोई जानकर और न माने, तो हमारा श्रापित होना अनिवार्य है। हमारा सारा सुख किस में है? भजन में कहा गया है, “धन्य हैं वे लोग जिनका परमेश्वर सनातन है।” तब हमारे सुखी होने का मार्ग यह है कि परमेश्वर हमें अपने झुण्ड में ले ले; और यदि वह हमें निकाल दे, तो सब बुराई हमारे सिर पर आ पड़ेगी। जब ऐसा है, तो आओ, हम अपने आप को रोकना और भी अधिक सीखें, और हम में से हर एक उस पर सन्तुष्ट रहे जो उसके पास है, और हम अवैध उपायों से अपने आप को बढ़ाने की खोज न करें; ऐसा न हो कि जो लाभ हमने अपने लिए जकड़ लिया है वह उन गरीबों के लिए डण्डों के समान, या कहना चाहिए कि कटार के घावों के समान हो जाए, जिन्हें हमने इस प्रकार टेढ़े-सीधे उपायों से अपने लिए बटोरकर घायल किया होगा। इसलिए, आओ, हम अपने हृदयों और अपने हाथों दोनों को सब हानि और कुव्यवहार से शुद्ध रखना सीखें, यदि हम परमेश्वर से आशीष पाना और विश्वासियों की गिनती में गिने जाना चाहते हैं। इस प्रकार, तुम देखते हो, वास्तव में इस वाक्य का अभिप्राय क्या है।

अब उपसंहार के लिए कहा गया है: “श्रापित हो वह जो इस व्यवस्था के वचनों को उन पर चलकर स्थिर नहीं करता।” यहाँ हम उस बात को और भी अच्छी रीति से देखते हैं जो अब तक बताई जा चुकी है: अर्थात् यह कि परमेश्वर अपनी सारी व्यवस्था को सामान्य रूप से प्रमाणित करना चाहता था, उसके किसी एक भाग को भी अलग किए बिना, यद्यपि उसने उसके कुछ ही विशेष उदाहरण रखे हैं। तब वह बात, जिसकी ओर वह गम्भीर विधि ले जाती है जो परमेश्वर ने एबाल पर्वत पर और उसी प्रकार उसके सामने गरीज़ीम पर्वत पर करवाई, यह है कि लोग जानें कि यह व्यवस्था सब सिद्धता का नियम है, और परमेश्वर, जो इसका रचनेवाला है, उसके साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता; वरन् इसे पूरे आदर के साथ ग्रहण करना चाहिए, हाँ, और हर मनुष्य को अपने मुँह से यह घोषणा करनी चाहिए कि परमेश्वर की आज्ञा मानना ही उचित है; और उसकी इच्छा का उल्लंघन करनेवाले सब लोग अपनी सफाई में कोई उत्तर दिए बिना अपने आप को दोषी ठहराएँ; और जब तक वे परमेश्वर की सेवा के लिए आज्ञाकारिता से अपने आप को न सौंपें, तब तक वे अपने आप को स्वेच्छा से मृत्यु के और सब बुराई के योग्य मानें। इसी कारण यह कहा गया है: “श्रापित हो वह जो इस व्यवस्था के वचनों को स्थिर नहीं करता।” वह यहाँ किसी एक या दो आज्ञाओं की, या उनके किसी अंश की बात नहीं करता, परन्तु सारी व्यवस्था की और उसके हर भाग और खण्ड की, बिना किसी अपवाद के। और सच तो यह है कि हमें विचार करना चाहिए कि सन्त याकूब कैसे कहता है कि जिसने चोरी करने से मना किया है उसने व्यभिचार करने से भी मना किया है; और जिसने हत्या से मना किया है उसने झूठी गवाही से भी मना किया है। इसलिए हमें परमेश्वर की धार्मिकता को टुकड़े-टुकड़े नहीं करना चाहिए। जिस किसी प्रकार से भी हम अपराध करें, निश्चय ही हम परमेश्वर की व्यवस्था को तोड़ते और उसकी महिमा को तुच्छ जानते हैं। परन्तु वह चाहता है कि उसकी व्यवस्था में वह सब बातों में पूरी रीति से माना जाए, अंश में नहीं, जैसा मैं तुम्हें पहले बता चुका हूँ। जब ऐसा है, तो आओ, हम ध्यान दें कि परमेश्वर ने अपनी आज्ञाओं को एक साथ गूँथ दिया है, यह दिखाने के लिए कि उन्हें अलग-अलग करना मनुष्य का काम नहीं है, जैसा हम बहुतों को करते देखते हैं, जो परमेश्वर से यह सौदा करना चाहते हैं कि वे किसी एक पाप से दूर रहेंगे और अपने आप को यह समझाते हैं कि जब वे यह कह सकें, “अच्छा, फिर भी मैंने सब बातों में अपराध तो नहीं किया; सच है, मैं अमुक पाप के कारण दोषी हूँ, परन्तु और सब में मैंने परमेश्वर की आज्ञा मानी है,” तब वे छूट गए। चोर घमण्ड करेगा कि वह व्यभिचारी नहीं है; हत्यारा कहेगा कि वह शपथ खानेवाला नहीं है; व्यभिचारलोलुप भी इसी प्रकार अपनी सफाई देगा कि वह और बातों में अपनी सीमा नहीं लाँघता, जैसे कि वह क्रूर या ऐसा ही कुछ नहीं है। परन्तु क्या? जैसा मैंने पहले कहा, परमेश्वर नहीं चाहता कि उसकी व्यवस्था को इस रीति से टुकड़ों और कौरों में काटा जाए; यह वह धार्मिकता है जो दस आज्ञाओं से बनी है, जो एक ही बन्धन में गूँथी हुई हैं। इसलिए परमेश्वर की बात सुननी चाहिए, पहले वचन में भी और अन्तिम में भी, और चौथे में भी और दूसरे में भी। जब ऐसा है, तो स्मरण रखें कि यहाँ कैसे कहा गया है कि परमेश्वर चाहता है कि हम उन वचनों को स्थिर करें जो उसकी व्यवस्था में हैं, ताकि मनुष्य के लिए किसी एक अंश से अपने आप को छुड़ा लेना पर्याप्त न हो; परमेश्वर इससे सन्तुष्ट नहीं होगा, और न वह ऐसी सेवा को मोल के रूप में लेगा, परन्तु वह चाहता है कि मनुष्य अपने आप को पूरी रीति से उसे दे दें। और किस शर्त पर? हे प्रभु, क्योंकि तेरी इच्छा तेरी व्यवस्था में समाई है, इसलिए हमारा जीवन उसके अनुरूप हो। क्योंकि उन्हें अलग-अलग करना हमारा काम नहीं है; हमें ऐसी कोई स्वतंत्रता नहीं है। साथ ही (जैसा मैं पहले बता चुका हूँ) यह सोचना बहुत ही स्थूल मूर्खता है कि हम परमेश्वर को यह जता सकते हैं कि हमारी उसका आदर करने की भली इच्छा है, और इस बीच किसी न किसी बात में उसका तिरस्कार करते रहें।

और यहाँ कहा गया है, “वचनों को उन पर चलकर स्थिर करना।” यहाँ मूसा दिखाता है कि जो शिक्षा हमें परमेश्वर के नाम से दी जाती है उसे हम किस प्रकार ग्रहण करते हैं। वह इसमें नहीं कि हम उस पर कान लगाएँ, या अपने मुँह से मान लें कि वह सच्ची और न्यायसंगत है; यह पर्याप्त नहीं है। क्योंकि यदि हमारा जीवन उसके विपरीत हो तो सब कुछ कपट ही है; और यह सन्त पौलुस के इस वचन के अनुसार होगा कि जब हम अपने मुँह से मानते हैं कि हम परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तो हम अपने जीवन से उसका इन्कार करते हैं। इसलिए भली-भाँति ध्यान दें कि हमारे विश्वास और आज्ञाकारिता की सच्ची परख यह है कि हमारा जीवन उसके अनुरूप हो, और अपने कामों से यह दिखाएँ कि हमें व्यर्थ शिक्षा नहीं दी गई। यही वह बात है जो हमें इस कथन पर ध्यान देनी है जहाँ मूसा कहता है कि हमें इस व्यवस्था के वचनों को उन पर चलकर स्थिर करना है; हाँ, निश्चय, उन पर चलकर, केवल यह घोषणा करके नहीं कि वे भले और न्यायसंगत हैं (क्योंकि यह तो छोटी बात होती), परन्तु परमेश्वर की सेवा करने में अपने आप को खींचकर, अपना सारा प्रयत्न उसी ओर लगाकर, और अपने सब कामों को उसकी इच्छा के अनुसार ढालकर। यही भली पुष्टि है: परमेश्वर को धर्मी घोषित करने और यह प्रकट करने का यही मार्ग है कि उसने हमें एक भला, निश्चित और अचूक नियम दिया है, जैसा कि हमें मानना चाहिए। अब हम वास्तव में इस वाक्य का सार देखते हैं; जिससे हमें समझना चाहिए कि परमेश्वर ने हमें टुकड़ों में आज्ञाकारिता का आदेश नहीं दिया, परन्तु चाहता है कि हम उसकी व्यवस्था को बिना अपवाद के सब बातों में पूरी सीमा तक ग्रहण करें। हम यह भी देखते हैं कि हमारे लिए यह कह देना पर्याप्त नहीं कि परमेश्वर ने कोई ऐसी बात आज्ञा नहीं दी जो धर्मसंगत न हो, परन्तु हमें अपने जीवन को उसकी सब आज्ञाओं के अनुसार ढालकर उसमें अपनी सहमति और अनुमति भी प्रकट करनी चाहिए।

इसके अतिरिक्त, अब हमें यह देखना आवश्यक है कि यदि यह श्राप हम पर पड़े तो हमारी क्या दशा होगी। निश्चय ही, यहाँ सब मनुष्य श्रापित ठहराए गए हैं। और इस श्राप का अर्थ ठीक वैसा ही है मानो यह कहा गया हो कि सब दण्ड के योग्य हैं, सब नाश हुए, सब त्यागे हुए हैं। संसार में जितने भी सबसे धर्मी जन हुए हैं उन्हें ले लो, और इस वाक्य के अनुसार वे निकाल फेंके जाने के योग्य हैं। न अब्राहम, न कोई पितृ-पुरुष, न दाऊद, न सारे भविष्यद्वक्ता इस दण्ड-आज्ञा से बच सकते हैं। परमेश्वर अपने भविष्यद्वक्ता के द्वारा अय्यूब, दानिय्येल और शमूएल को सबसे धर्मी और एक प्रकार से निर्दोष घोषित करता है; तौभी उन्हें भी इसी श्राप में लपेटा जाना अनिवार्य है। और दाऊद के विषय में, वह अपने मुँह से इसे मानता है, यह कहते हुए: “हे प्रभु, अपने दास का लेखा न ले, क्योंकि कोई प्राणी तेरे सामने धर्मी नहीं ठहर सकता।” वहाँ दाऊद केवल साधारण लोगों की बात नहीं करता; वह अपने आप को भी गिनती में रखता है। यह सच है कि अन्य स्थानों में वह भली-भाँति बताता है कि उसकी सारी खोज परमेश्वर की सेवा करना थी और उसकी इच्छा उसी ओर लगी थी; तौभी उसने माना कि वह अपने आप को निर्दोष ठहराने से, या जैसी सिद्धता अपेक्षित थी उसे पाने से बहुत दूर रहा। यदि उसने अपने आप को और मनुष्यों के समान दोषी ठहराया, तो अब हम क्या करें? परन्तु यहाँ एक भयानक वाक्य है, और ऐसा कि हमारे सिर के बाल खड़े कर दे: “श्रापित हो वह जो इस व्यवस्था के सब वचनों पर नहीं चलता।” और यह कौन कहता है? परमेश्वर। तब यह ऐसा निश्चित निर्णय है जिसकी कोई अपील नहीं हो सकती। क्योंकि वह चाहता है कि सब मनुष्य मानें कि यह ऐसा ही है; हाँ, वह चाहता है कि हर मनुष्य इसे अपने ही मुँह से माने। तब हमारे करने को क्या बचा? उद्धार की आशा कहाँ है? इससे हम देखते हैं कि यदि हमारे पास केवल व्यवस्था की दस आज्ञाएँ ही होतीं, तो हम पूरी रीति से नष्ट और विनष्ट हो जाते, और हमारे लिए उसकी दया की शरण लेना आवश्यक है, जो उसके न्याय से बढ़कर है, जैसा सन्त याकूब कहता है। इसलिए परमेश्वर की भलाई को हमारे प्रति प्रभावी होना चाहिए, ताकि हमें उस घबराहट से छुड़ाए जिसमें हम सब पड़ जाते यदि वह वाक्य खड़ा रहता और उससे बढ़कर कोई अनुग्रह न होता। और सच तो यह है कि सन्त पौलुस गलातियों के तीसरे अध्याय में इसी पद से प्रमाणित करता है कि हम अपने कर्मों से धर्मी नहीं बन सकते, परन्तु हमारा केवल विश्वास से धर्मी बनाया जाना आवश्यक है; अर्थात् परमेश्वर के निरे अनुग्रह से, क्योंकि यदि परमेश्वर हम से लेखा ले तो हम सब दोषी ठहरते हैं। क्यों? “श्रापित हो वह जो व्यवस्था के सब वचनों पर नहीं चलता।” यदि कोई मनुष्य उत्तर दे, “हाँ, परन्तु यदि कोई मनुष्य उन पर चले, तो वह उससे धर्मी क्यों न बने? और उसे परमेश्वर के हाथ से अपनी योग्यता के अनुसार अपनी मज़दूरी क्यों न मिले?” सन्त पौलुस मानकर चलता है कि आज तक कोई ऐसा मनुष्य नहीं मिला, और न कोई मिल ही सकता है, जो व्यवस्था के सब वचनों और उस सब पर चले जिसकी आज्ञा परमेश्वर ने कभी दी है। सच है, यह एक प्रचलित कथन रहा है कि परमेश्वर की व्यवस्था असम्भव नहीं है। और आज के दिन जब पोप के अनुयायी हमारे विरुद्ध तर्क करते हैं, तब वे इसे अपनी स्वतंत्र इच्छा को सिद्ध करने के लिए अकाट्य तर्क समझते हैं। “परमेश्वर ने हमें अपने सारे मन से उससे प्रेम करने की आज्ञा क्यों दी होती यदि हम ऐसा करने में समर्थ नहीं? यह तो बहुत ही विरोधी बात होती कि परमेश्वर मनुष्यों से उनकी सामर्थ्य से अधिक माँगे: वरन् ऐसा करने में वह अन्यायी और निर्दयी ठहरेगा।” इस रीति से पोप के अनुयायी तर्क करते हैं। परन्तु सन्त पौलुस इसके विपरीत कहता है, “श्रापित हो वह जो सब आज्ञाओं पर नहीं चलता।” और वह (जैसा मैंने पहले कहा) मानकर चलता है कि कोई मनुष्य उन पर नहीं चलता, और ऐसा कोई मनुष्य मिलना असम्भव है। इस पर वह अपना निष्कर्ष निकालता है, “तब सारी मानवजाति नष्ट हुई, यदि वे कर्मों की जाँच में पड़ें, जिससे मनुष्यों को उनके कर्मों के अनुसार दण्ड मिलना चाहिए: परमेश्वर को उन्हें अवश्य त्याग देना और पूरी रीति से दण्ड देना होगा।” और इस प्रकार हमें इस पद में एक उत्तम शिक्षा मिलती है। क्योंकि यह ठीक वैसा ही है मानो परमेश्वर ने आदम की सारी सन्तान को एक ही मुग्दर के प्रहार से गिरा दिया हो, हाँ, और उन पर गरज पड़ा हो कि उन्हें घबराहट की ऐसी कालकोठरी में डाल दे जहाँ वे समझ लें कि अपने आप में वे सब दोषी और नष्ट हैं। परन्तु हम वहीं नहीं ठहरते। क्योंकि जब परमेश्वर एक बार हमें नम्र कर चुका, तब वह हमें दण्ड-आज्ञा से छुटकारे के उचित साधन देता है, जैसा आगे और स्पष्ट दिखाया जाएगा। परन्तु उससे पहले कि हम इतना आगे बढ़ें, आओ, देखें कि पोप के अनुयायी किस प्रकार अपने आप को धोखा देते हैं। वे भली-भाँति देखते हैं कि कोई मनुष्य परमेश्वर की व्यवस्था को पूरा नहीं करता; और यद्यपि वे वे कल्पित तर्क गढ़ते हैं जिनकी मैंने चर्चा की, यह कहते हुए कि परमेश्वर ऐसी कोई आज्ञा नहीं देता जो मनुष्यों की सामर्थ्य में न हो, तौभी वे अपने ही अनुभव से दोषी ठहरते हैं कि सब मनुष्य पापी हैं, सब मनुष्यों ने बुराई की है (जैसा पवित्रशास्त्र भी हमें बताता है), कि पृथ्वी पर कोई मनुष्य जीवित नहीं (जैसा सुलैमान कहता है) जो पाप न करता हो, और सब मनुष्यों को परमेश्वर के अनुग्रह की आवश्यकता है। तब पोप के अनुयायी, यद्यपि वे यह भली-भाँति देखते हैं, तौभी झगड़ते ही रहते हैं, यह कहकर कि यह उस समय की बात है जब तक हम परमेश्वर के आत्मा के द्वारा फिर से नया जन्म न पाएँ। तौभी यदि उन पर दबाव डाला जाए, तो उन्हें दूसरी बात में अवश्य मानना पड़ेगा कि सबसे पवित्र लोग भी अब तक अपूर्ण हैं, और उन में कुछ दुर्बलता है। और यदि वे न भी मानें, तौभी पवित्रशास्त्र इसे दिखाता है, और हर मनुष्य अपने आप में इसे अनुभव करता है। अब पोप के अनुयायी कर्मों की धार्मिकता का इतना समर्थन क्यों करते हैं, और अपने आप को यह क्यों समझाते हैं कि हम प्रतिफल पाने के भली-भाँति योग्य हैं, और कि हम स्वर्ग के राज्य को मोल लेते या कमाते हैं? ऐसा कैसे होता है कि वे इतने मूढ़ और पशुवत् हैं? इसलिए कि वे कल्पना करते हैं कि यद्यपि हम व्यवस्था को पूरा नहीं करते, तौभी हम पुण्य कमाने या योग्य ठहरने से नहीं चूकते; और इसे वे अंश की धार्मिकता कहते हैं। वे कहते हैं कि सब मनुष्य सचमुच बुराई करते हैं; यह सच है: और इस विषय में वे परमेश्वर के सामने दोषी हैं, और कठोरता के अनुसार दण्ड पाने के भली-भाँति योग्य हैं। तौभी जब उनके पास अंश की धार्मिकता होती है, अर्थात् जब वे व्यवस्था को आंशिक रूप से मानते हैं: तो उनका वह करना ग्रहण किए जाने और लेखे और गिनती में रखे जाने के योग्य है। और इसी बात पर वे इतना घमण्ड करते हैं। इस रीति से तब मनुष्यों में पुण्य होते हैं, चाहे वे सारी व्यवस्था को पूरा न करें। यह एक बात हुई।

फिर, उनकी एक और शैतानी कल्पना है; वह यह कि जब वे बुराई कर चुके हों, तब वे अपने ही प्रायश्चित्तों से परमेश्वर को मना सकते हैं, और अपना छुटकारा आप दे सकते हैं, जिससे वे बिना दण्ड के निकल जाएँ, कम से कम अपनी समझ में। वे एक ही शब्द में भली-भाँति मान लेंगे कि हम खतरे में हैं; परन्तु इससे यह नहीं निकलता कि हमारे पास उसे टालने का कोई उपाय नहीं, और परमेश्वर से बदले में, जो कुछ हम उसके पास लाएँ, उसे ग्रहण करवाने का कोई साधन नहीं। इसी पर उन्होंने अपनी सब भली भक्तियाँ खड़ी की हैं, जैसा वे उन्हें कहते हैं, जैसे तीर्थयात्राएँ, मिस्साएँ और बरसी के स्मरण-विधान, और अपनी स्वेच्छा की सब भक्तियों के साथ, जैसे उनके उपवास और भिन्न-भिन्न अन्य बातें; यहाँ तक कि उनकी पाप-स्वीकृति भी उनके प्रायश्चित्त के कामों में गिनी जाती है। फिर कुछ पैटरनॉस्टरों की बड़बड़ाहट, किसी गुड़िया के सामने बकवास, किसी मिस्सा का गायन, कुछ मोमबत्तियों का जलाना, और ऐसी ही अन्य बातें, ये सब ऐसी क्षतिपूर्तियाँ हैं कि परमेश्वर उनमें कोई दोष नहीं पा सकता; तौभी, क्योंकि वे अपने आप को उन बातों से लदा हुआ देखते हैं, वे छोटी-छोटी युक्तियों का एक समूह गढ़ते हैं जिनसे वे परमेश्वर के साथ खेलें। और इसीलिए उन्होंने क्षम्य पापों का आविष्कार किया है; यहाँ तक कि यदि कोई मनुष्य बुरी अभिलाषाओं में परीक्षा में पड़े, तौभी उसने परमेश्वर के विरुद्ध अपराध नहीं किया, जब तक वह उसे पूरा करने के लिए इच्छुक और पूरी रीति से सहमत न हो जाए। यदि कोई मनुष्य अपने भीतर परीक्षा में पड़े, यदि कोई मनुष्य बुराई करने को उकसाया जाए; यह सब पोप के अनुयायी कहते हैं कि प्राणघातक पाप नहीं है; यह केवल क्षम्य पाप है, और पवित्र जल की एक छींट उसे पूरी तरह धो डालने के लिए पर्याप्त है। परन्तु इसके विपरीत, हम जानते हैं कि कहा गया है: “हे इस्राएल, तेरा परमेश्वर तुझ से इसके सिवा और क्या चाहता है कि तू अपने सारे मन से उससे प्रेम करे?” यहाँ तुम देखते हो कि व्यवस्था की धार्मिकता यह है कि मनुष्य परमेश्वर से अपने सारे मन से प्रेम करे। परन्तु जिसने अपराध किया है वह श्रापित है। और हम सब अपराध करते हैं; तो क्या हम सब मृत्यु के खतरे में नहीं हैं? ऐसा कोई मनुष्य नहीं जिस पर परमेश्वर यह श्राप न सुनाए। अब जब मनुष्यों ने बुरा सोचा हो, यहाँ तक कि वे दुष्टता करने को उकसाए गए हों: तो यह पाप नहीं है (पोप के अनुयायी कहते हैं), वे इतने पर भी धर्मी ही रहते हैं। देखो, पोप के अनुयायी कैसे पूरी तरह परमेश्वर का उपहास करते हैं, क्योंकि वे समझते हैं कि किसी मूर्खतापूर्ण रीति से, या “Mea culpa” कह देने से, वे अपने पापों से छूट जाते हैं, और उन्हें कुछ भी न समझने योग्य वस्तु की तरह गिनते हैं। ये वे बचने के बिल हैं जिनसे वे परमेश्वर का, मानो किसी छोटे शिशु का, उपहास करते हैं; और यह भयानक बात है। फिर भी यह उनके सब विद्यालयों में व्यवहार में लाई जाती है। तौभी हमें इस रीति से काम नहीं करना चाहिए; परन्तु हमें स्मरण करना चाहिए कि प्रेरित कैसे कहता है: “जीवते परमेश्वर के हाथों में पड़ना भयानक बात है।” इसलिए इस विषय में हमें उन बन्धनों और जूए को नहीं तोड़ना चाहिए जो उसने हमारी गर्दनों पर रखे हैं: हमें जंगली पशु नहीं बनना चाहिए: हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि हम उसकी सेवा करने का भला दिखावा करके उसे धोखा दे सकते हैं, जबकि इस बीच सचमुच उसकी सेवा करने की कोई भली इच्छा हमारे भीतर नहीं। क्योंकि अन्त में वह दिखा देगा कि उसका बदला उन सब पर पड़ेगा जिन्होंने उसके सामने कपटियों और दोहरे मनवाले ढोंगियों के समान जीवन बिताया। तब क्या करना चाहिए? हमें अंश की धार्मिकता के इस मुलम्मे को साफ-साफ ठुकरा देना चाहिए, जो पोप के अनुयायियों ने गढ़ा है: क्योंकि यह शैतान की युक्ति है, और वे स्वयं भी भली-भाँति मानेंगे कि हम अपने कर्मों में किसी भीतरी योग्यता से पुण्य नहीं कमा सकते। वे कहते हैं कि हमारे कर्मों की सारी योग्यता केवल इसी से आती है कि परमेश्वर हम से परिचित है; यहाँ तक कि जब मनुष्य वह सब कर चुके जो सम्भव है, तौभी जब उनके कर्म परमेश्वर के सामने आएँगे तब उनमें कोई न कोई दोष पाया ही जाएगा। ऐसा नहीं कि सब पोप-अनुयायी इसी मत के हैं, हज़ार में एक से अधिक ऐसा नहीं सोचता: परन्तु पोप-मत में इससे कहीं अधिक सूक्ष्म और चतुर शिक्षा भी है; वह यह कि कर्म अपने आप में योग्य नहीं हैं, परन्तु व्यवस्था की प्रतिज्ञा के कारण योग्य हैं। परन्तु यह प्रतिज्ञा कैसी है? आओ, उस बात पर आएँ। देखो, परमेश्वर अपने आप को सब मनुष्यों के सामने प्रस्तुत करता है, और कहता है कि जो कोई व्यवस्था को पूरा करेगा वह आशीषित होगा; और इसके विपरीत कि वे श्रापित होंगे जो उससे हट जाएँ। इस प्रकार तुम देखते हो कि सिद्ध धार्मिकता व्यवस्था का पूरा करना है। परन्तु जैसा मैं तुम्हें पहले बता चुका हूँ, कोई मनुष्य उसे पूरा नहीं करता; और इसलिए परमेश्वर हमारे प्रति अपनी प्रतिज्ञा से मुक्त है। क्योंकि हम अपनी ओर से शर्त में चूक जाते हैं; वह अपनी ओर से हमारा कुछ ऋणी नहीं। सन्त पौलुस भी इसी रीति से इसके विषय में कहता है: “यदि धार्मिकता व्यवस्था के कामों से हो, तो प्रतिज्ञा व्यर्थ ठहरी।” सन्त पौलुस उस स्थान पर बात की जड़ को छूता है। क्यों? कौन परमेश्वर की व्यवस्था को पूरा करता है कि वह कह सके, मैंने अपने कर्मों में सिद्ध धार्मिकता प्राप्त कर ली है?

ऐसा कोई मनुष्य नहीं मिलता। तब, वह कहता है, प्रतिज्ञाओं में कोई निश्चयता नहीं रही: और इसलिए, यदि हम अपने कर्मों पर ही नींव डालना चाहें तो हम सब दोषी ठहरते हैं। वह इस रीति से रोमियों और गलातियों दोनों को इसके विषय में कहता है। और इसलिए ध्यान दें कि परमेश्वर इस वाक्य से हम सब को दोषी ठहराता है, जहाँ वह कहता है, “श्रापित हो वह जो उन सब बातों पर नहीं चलता जो मेरी व्यवस्था की पुस्तक में लिखी हैं।” रहा वह तुच्छ कूड़ा जिसे पोप के अनुयायी प्रायश्चित्त कहते हैं, वह केवल उपहास है। क्योंकि परमेश्वर आज्ञाकारिता से सेवा चाहता है। इसके अतिरिक्त हमारे पापों की क्षमा सेंत-मेंत दी जाती है, जैसा पवित्रशास्त्र दिखाता है। और जितने प्रायश्चित्त (जैसा वे उन्हें कहते हैं) मनुष्यों ने गढ़े हैं, वे किसी काम के नहीं, और परमेश्वर उनमें से किसी को ग्रहण नहीं करता। जब हम अपनी ही बुद्धि में अपनी रुचियाँ पैदा करने लगते हैं, तब वह उसका एक-एक अंश ठुकरा देता है। इसलिए आओ, हम अपने प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह को थामे रहें, यह जानते हुए कि हम उसके लहू से धोए और शुद्ध किए गए हैं: और यही एक मात्र उपाय है जो परमेश्वर ने हमारे सामने रखा है।

इस प्रकार हमें दो बातों पर ध्यान देना है: एक यह कि यदि हमारा न्याय परमेश्वर की व्यवस्था से किया जाए, तो हम सब को, यहाँ तक कि संसार के सबसे पवित्र सन्तों को भी, दोषी ठहराने के लिए इस पूर्वोक्त वाक्य के सिवा और कुछ आवश्यक न होता। क्योंकि किसी ने परमेश्वर की व्यवस्था को पूरा नहीं किया; और इसलिए हम सब दोषी ठहरे हैं। क्योंकि यदि वे पवित्र पुरखे, जिनमें इस संसार में स्वर्गदूतों के समान पवित्रता थी, तौभी परमेश्वर के सामने दोषी थे: तो हमारा क्या होगा? अब हम अपनी और उनकी तुलना करें। हम अब्राहम की पवित्रता, दाऊद की शुद्धता, अय्यूब की खराई, और दानिय्येल की सिद्धता से कितनी दूर हैं? जब ये दोषी ठहराए जा सकते हैं, तो हम क्या होंगे? और इसलिए आओ, हम अपने सींग समेटना सीखें, और हम में से हर एक अपना मुँह बन्द रखे, जैसा सन्त पौलुस कहता है जब वह हमें विश्वास की धार्मिकता और परमेश्वर की दया की ओर ले आता है। तब जो बात हमें स्मरण रखनी है वह यह है कि परमेश्वर ने हमें सब धार्मिकता से रहित कर दिया है, इस उद्देश्य से कि हमें सब अहंकार और घमण्ड से मुक्त करे, और हम उसके साथ लेखा करने और उसे अपने साथ बाँध लेने का दावा और न करें, वरन् स्वेच्छा से अपने आप को दोषी ठहराएँ। यह एक बात के लिए पर्याप्त हो। अब इस पर हमें उस उपाय पर विचार करना है जो परमेश्वर ने छोड़ा है: वह यह कि तौभी हम अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा धर्मी हों। क्योंकि उसने हमें उस श्राप से छुड़ाया जो हमारे लिए ठहरा था: और इसी कारण वह वृक्ष पर टाँगा गया, जैसा सन्त पौलुस कहता है। हम पहले इक्कीसवें अध्याय में देख चुके हैं कि जितने वृक्ष पर टाँगे गए वे सब श्रापित थे। अब जब परमेश्वर ने वह व्यवस्था बनाई, तो क्या वह नहीं जानता था कि अपने ही एकलौते पुत्र के विषय में, जो वृक्ष पर टाँगा जाने को था, उसने पहले क्या ठहराया है? निश्चय वह एक अटल आज्ञा थी, जो जगत की सृष्टि से भी पहले ठहरी थी। जब ऐसा है, तो हम अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा श्राप से छुड़ाए गए हैं; और अब हमें इस वाक्य का मेल उस दूसरे वाक्य से बैठाना चाहिए जो हमने इक्कीसवें अध्याय में देखा। जहाँ यहाँ कहा गया है, “श्रापित हो वह जो इन वचनों पर नहीं चलता:” तुम भली-भाँति देखते हो कि उन पर न चलने के कारण हम घबराए हुए हैं और न्याय के अनुसार लगभग दोषी ठहरे हुए हैं। परन्तु इसके साथ ही हमें अपने प्रभु यीशु मसीह को भी ग्रहण करना चाहिए, जो हमारे लिए श्रापित हुआ। और यदि यह श्राप व्यर्थ न हो, तो अब हमारा छूट जाना अनिवार्य है। यह कैसी बात होती कि परमेश्वर का पुत्र बिना कारण श्रापित हो; और फिर भी हमारे लिए उससे कोई फल न निकले? कि वह जो सब आशीष का सोता है, श्रापित हो; और हम न जानें कि किस लिए, बल्कि वह निष्फल हो? अब जब यीशु मसीह ने अपनी ही देह में जो श्राप सहा वह व्यर्थ और निष्प्रयोजन नहीं है: तो जान लें कि उसी साधन से हम परमेश्वर के सामने छुड़ाए गए हैं। और इस प्रकार तुम देखते हो कि हमें उन दोनों पदों का मेल किस प्रकार बैठाना चाहिए।

इसके अतिरिक्त, हम यह भी जानते हैं कि वह व्यवस्था के अधीन हुआ, इसलिए कि सब प्रकार की आज्ञाकारिता को पूरी रीति से पूरा करे, मानो हमारे स्थान पर। और जो धार्मिकता उसने अपने आप में प्राप्त की, वह आज के दिन हमारे लिए ग्रहण की जाती है, मानो हम में से हर एक ने अपने आप को परमेश्वर के सामने निर्दोष ठहरा लिया हो। तब हमारे श्रापित होने से छूटने का मार्ग यह है: जब हम लज्जित हो चुके और मानो निराशा में डूब चुके, तब हम फिर से साहस बाँधें, अपने उद्धार का निश्चय रखने के लिए, और अपने परमेश्वर की महिमा के सामने अपने आप को इस पक्के भरोसे के साथ प्रस्तुत करें कि वह हमें अपनी सन्तान के रूप में ग्रहण करेगा, और हम से प्रसन्न भी होगा: और इसके अतिरिक्त कि क्योंकि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने व्यवस्था को पूरा किया, और उसके किसी एक अंश या बिन्दु में भी नहीं चूका: अब हम फिर से उसकी धार्मिकता से ढाँपे गए हैं, और वह हमारे लिए हमारी अपनी के समान ग्रहण की जाती है। इसलिए आओ, हम साहस के साथ परमेश्वर के सामने जाएँ, और उसे अपना पिता कहकर पुकारें: हाँ, निश्चय, इस प्रकार कि हम अपनी शुद्धता अपने ही कामों में न रखें, और न यह कल्पना करें कि परमेश्वर हमारा कुछ ऋणी है, और न अपनी कोई योग्यता या पुण्य लाने का दावा करें: परन्तु पूरी रीति से रिक्त होकर हम परमेश्वर को पुकारें कि वह कृपा करे, न केवल हम में जो अंश में घटता है उसे हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा भर दे: परन्तु हमें वह धार्मिकता दे जिससे हम पूर्णतः रहित और वंचित हैं। और आगे यह भी ध्यान दें कि जब हम इस प्रकार अनुग्रह में ग्रहण कर लिए जाएँगे; तब हमारे काम भी ग्रहण किए जाएँगे। तब हमारे लिए परमेश्वर की ऐसी सेवा करने का मार्ग, जो उसे भाए, यह है कि विश्वास से धर्मी ठहरकर, अर्थात् अपने पापों की क्षमा पाकर, हाँ और उसे इसलिए पाकर कि हमें प्रतिदिन, हाँ अपने जीवन भर, उसकी आवश्यकता है: और हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु, दुःखभोग और उसके चढ़ाए गए बलिदान के द्वारा परमेश्वर के अपनी निःशुल्क भलाई से हमारे साथ किए गए मेल-मिलाप की शरण लेकर: हम ऐसा कर चुकने पर तब परमेश्वर की सेवा के भी इच्छुक हों; क्योंकि तब हम भला करेंगे, और तब वह उस सेवा को ग्रहण करेगा जो हम उसे देते हैं; जबकि इसके बिना यीशु मसीह में हमारा कोई विश्वास नहीं हो सकता। परन्तु जब हम परमेश्वर की सेवा का प्रयत्न करते हैं; यद्यपि कुछ बात बिगड़ी रहे, और हमारी भावनाएँ हमें कभी इस ओर कभी उस ओर मोड़ें: तौभी हमारा परमेश्वर हमारे जीवन को ग्रहण करने से नहीं रुकता। और क्यों? क्योंकि हमारे पाप हमारे लेखे में नहीं गिने जाते। यह सच है कि पूरी कठोरता में यह वचन, “श्रापित हो वह जो इन सब वचनों पर नहीं चलता,” अपने बल में बना रहेगा: परन्तु देखो, यीशु मसीह हमारा जमानती है, और तुरन्त हमारी ओर से चुका देता है, हमें हमारे श्रापित होने से छुड़ाता है, और अपने पिता परमेश्वर को सन्तुष्टि देता है। क्योंकि हम जानते हैं कि उसकी मृत्यु और दुःखभोग हमारे उद्धार का मूल्य और छुड़ौती करके ग्रहण किए जाते हैं, ताकि उस साधन से हम परमेश्वर से मेल करें। तब तुम देखते हो कि एक ओर हमें अपने श्राप को अनुभव करना आवश्यक है, ताकि हम परमेश्वर के न्यायों से डरें: और दूसरी ओर हमें साहस बाँधना है, इसमें सन्देह न करते हुए कि क्योंकि हमारा प्रभु यीशु मसीह हमारी ओर से उत्तर देता है, हम उसके कारण ग्रहण किए जाएँगे, और परमेश्वर हमें हमारे कामों समेत ग्रहण करेगा, चाहे वे उतने उत्तम न हों जितने होने चाहिए, परन्तु उनमें कुछ धब्बे और दोष हों, जिससे वे दोषी ठहराए जाने और पूरी तरह ठुकराए जाने के योग्य हों। संक्षेप में, विश्वासी लोग परमेश्वर के अनुग्रह से धर्मी ठहराए जाकर इसके साथ यह लाभ और अधिकार भी पाते हैं कि परमेश्वर उनके कामों को ग्रहण करता है, और उन पर वह श्राप नहीं लगाता जिसके वे योग्य थे। इस रीति से तब हमें इस पद को व्यवहार में लाना चाहिए।

परन्तु मैंने तुम्हें बताया है कि एक ओर हमें परमेश्वर के सामने अपने श्राप को देखकर शोक करना और डरना चाहिए: और दूसरी ओर उस अनुग्रह पर भरोसा रखना चाहिए जो यीशु मसीह हमें देता है। क्योंकि यदि हम इसलिए अपने आप को सहला लें कि परमेश्वर हमारे पाप क्षमा करता है; तो यह कैसा व्यवहार होगा? हम फिर उसी बँटवारे में पड़ जाएँगे जो मनुष्य तब करना चाहते हैं जब वे समझते हैं कि वे परमेश्वर के प्रति अंश में अपना कर्तव्य निभा चुके हैं। तब हमारे लिए आवश्यक है कि हम अपने सब पापों पर खेदित हों: और यदि हम अपने में कोई दोष देखें, तो उसे राज्य न करने दें। यह सच है कि हम घट जाते हैं, मैं नहीं कहता कि किसी एक अंश में ही, परन्तु सब में। व्यवस्था का कोई एक बिन्दु भी नहीं जिसमें हम न चूकते हों। जो अपने आप को लोभ से निर्मल और संसारी वस्तुओं का तिरस्कार करनेवाला समझता है: निश्चय उसके हृदय में कोई और भावना है जो उसे अब भी संसार में रोके रखती है। जो अपनी देह में पवित्र और खरा है, उसमें भी कुछ व्यर्थताएँ हैं जो उसे बहा ले जाएँगी। जो अपने हृदय में कोई बैर या कड़वाहट नहीं पालता, वह सब बुरी भावनाओं से इतना सर्वथा शुद्ध नहीं कि वैसा सिद्ध जीवन बिताए जैसा उसे बिताना चाहिए। संक्षेप में, हम केवल एक या दो बातों में नहीं, परन्तु सब में दोषी पाए जाएँगे: यहाँ तक कि व्यवस्था का कोई अंश या खण्ड नहीं जिसमें परमेश्वर हमें दोषी न ठहरा सके। और इसलिए (जैसा मैंने कहा) जब हम अपने में ऐसी अपूर्णता देखते हैं, तो हमें अपनी ही धारणाओं पर नहीं टिकना चाहिए, परन्तु परमेश्वर के सामने शोक करना चाहिए: और शोक कर चुकने पर हमें अपने आप को उसे सौंपने का प्रयत्न करना चाहिए, उससे प्रार्थना करते हुए कि वह हम में अपने पवित्र आत्मा की सामर्थ्य और अनुग्रह बढ़ाए, ताकि हम अपने पापों के विरुद्ध ऐसी वीरता से लड़ें कि उन्हें दबाएँ, जीतें और उन पर प्रबल हों, और जब हम उनसे पूरी तरह छूट जाएँ तब एक बार उन पर जयजयकार करें। इस प्रकार तुम देखते हो कि हमें इस विषय में कैसे आगे बढ़ना चाहिए।

और यह बात विश्वासियों को आनन्दित करे कि यद्यपि वे अपनी अपूर्णताओं को देखते हैं, तौभी उन्हें इस कारण परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को आनन्द के साथ ग्रहण करने से रुकना नहीं चाहिए, अपने आप को निश्चय दिलाते हुए कि वे उनसे निराश न होंगे। और क्यों? क्योंकि उन्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह में सब भली वस्तुओं का भोग प्राप्त है, जिसके द्वारा और जिसके साधन से उनके लिए ठहरा हुआ श्राप मिटा दिया गया है। तब तुम देखते हो कि एक ओर विश्वासियों के लिए पूरी रीति से दीन हो जाना आवश्यक है: और फिर दूसरी ओर वे हमारे प्रभु यीशु मसीह में फिर उठाए जाते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि जो कुछ उनके अपने में नहीं है, वह उन्हें मिलेगा यदि वे उसे वहाँ ढूँढ़ें जहाँ परमेश्वर उन्हें भेजता है। और इसलिए आओ, हम पोप-राज्य में राज्य करनेवाली शैतान की कल्पनाओं से अब और अपने आप को धोखा न दें, जो यह चाहती हैं कि हम अपनी योग्यताएँ परमेश्वर के सामने चढ़ाएँ और उसके साथ ऐसा सौदा करें मानो हमने उसकी व्यवस्था पूरी कर दी हो: परन्तु अपने आप को निश्चय दिलाएँ कि हमारी ओर से व्यवस्था में बाँधी गई सब वाचाएँ पूरी तरह व्यर्थ हैं; और वे सब प्रतिज्ञाएँ जिनमें भलाई करने और पवित्र चाल-चलन की कोई शर्त है, हमारे लिए निष्फल ठहरेंगी और कभी पूरी न होंगी; जब तक हम इस निःशुल्क प्रतिज्ञा की शरण न लें, “जो कोई विश्वास करे कि यीशु मसीह हमारे पापों के लिए मरा, और कि परमेश्वर ने अपनी सामर्थ्य से उसे हमें धर्मी ठहराने के लिए फिर जिलाया, और इसे अपने हृदय से विश्वास करे और अपने मुँह से मान ले; वह उद्धार पाएगा।” और इसी की ओर सन्त पौलुस हमें रोमियों के दसवें अध्याय में लौटा लाता है, जो ठीक वही व्याख्या है जो हमें इस पद की समझ देगी। व्यवस्था की धार्मिकता हमें दिखाती है कि हम सब श्रापित हैं, और जब तक हम वहीं रहें, हमें बचाने का कोई मार्ग नहीं है। तब हम क्या करें कि हमारी परमेश्वर तक पहुँच हो? हम हृदय से धार्मिकता के लिए विश्वास करें और मुँह से उद्धार के लिए अंगीकार करें: कि हम अपना सारा भरोसा उस पर रखें जिसने हमें अपने पिता परमेश्वर के सामने निर्दोष ठहराया है; और उस धर्ममय आज्ञाकारिता को ग्रहण करें जो उसने परमेश्वर को दी, और उसी प्रकार उस श्राप को सह लेने को भी, जो हमारे लिए ठहरा था, इस उद्देश्य से कि हमें उससे छुड़ाए।

अब आओ, हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने पापों को मानते हुए गिर पड़ें, उससे प्रार्थना करते हुए कि वह हमें उनका उससे अच्छा बोध कराए जैसा अब तक हुआ है, ताकि हम उस सच्चे पश्चाताप से अधिकाधिक प्रभावित हों जो हमारी सब शारीरिक भावनाओं को मार डालता है: और हमें इस संसार के सुखों से खींच ले, और हमें अपने आप को पूरी रीति से उसकी व्यवस्था के प्रति देने की सच्ची अभिलाषा में उठाए, जिससे हम प्रतिदिन उसमें उन्नति करें, यह जानते हुए कि सब विश्वासी लोगों की सच्ची सिद्धता यह जानना है कि वे सिद्धता से कितनी दूर हैं; ताकि सब के मुँह बन्द हो जाएँ, और परमेश्वर को छोड़ कोई धर्मी न माना जाए; और जब मसीह की धार्मिकता एक बार हम पर चमके, तब हम उससे वंचित न किए जाएँ, अपने आप को निश्चय दिलाते हुए कि उसी में हमारी सारी सिद्धता है। वह यह अनुग्रह न केवल हमें, वरन् पृथ्वी के सब लोगों और जातियों को भी देने की कृपा करे, इत्यादि।

मंगलवार, 10 मार्च, 1556 को।

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