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162वाँ उपदेश, जो अट्ठाईसवें अध्याय पर दसवाँ है
162वाँ उपदेश,
जो अट्ठाईसवें अध्याय पर दसवाँ है।
59 तब यहोवा तेरी विपत्तियों को और तेरे वंश की विपत्तियों को अद्भुत करेगा, अर्थात् बड़ी और स्थायी विपत्तियाँ, तथा बुरे और स्थायी रोग।
60 और वह मिस्र की सब विपत्तियाँ, जिनके सामने आने से तू डरता था, तुझ पर ले आएगा, और वे तुझ से लिपट जाएँगी।
61 और जितने रोग और जितनी विपत्तियाँ इस व्यवस्था की पुस्तक में नहीं लिखी हैं, उन सब को भी यहोवा तुझ पर तब तक ले आएगा जब तक तू नष्ट न हो जाए।
62 और तुम जो आकाश के तारों के समान बहुत थे, तुम में से थोड़े ही रह जाएँगे, क्योंकि तू ने अपने परमेश्वर यहोवा की बात नहीं मानी।
63 और ऐसा होगा कि जैसे यहोवा तुम्हारी भलाई करने और तुम्हें बढ़ाने के कारण तुम से आनन्दित होता था, वैसे ही यहोवा तुम्हें नष्ट करने और मिटा डालने के कारण तुम से आनन्दित होगा; और जिस देश के अधिकारी होने को तू जा रहा है, उस में से तू उखाड़ दिया जाएगा।
64 और यहोवा तुझे पृथ्वी के एक छोर से दूसरे छोर तक सब जातियों में तितर-बितर करेगा। और वहाँ तू दूसरे देवताओं की उपासना करेगा, जिन्हें न तू ने और न तेरे पूर्वजों ने जाना है, अर्थात् काठ और पत्थर के देवताओं की।
मैं यहाँ पहले दिखा चुका हूँ कि जो ताड़नाएँ परमेश्वर मनुष्यों पर भेजता है, उनसे शिक्षा पाने में वे कितने धीमे हैं। क्योंकि जब तक वे परमेश्वर का हाथ नहीं पहचानते, और इस बात को समझने के लिए विवश नहीं किए जाते कि उन्हें उसी से काम पड़ा है, तब तक वे अपने आप कठोर होते जाते हैं; और इससे भी बुरा यह कि जो बात उन्हें मानो आँखों के सामने देखनी और अनुभव करनी चाहिए, अर्थात् यह कि वे अपने पापों के कारण मारे जा रहे हैं, उसे वे ढाँपने का यत्न करते हैं। इसलिए, क्योंकि मनुष्य कभी अपनी इच्छा से अपने आप को पहचानने नहीं आते, परमेश्वर को उन्हें इसके लिए विवश करना पड़ता है। इसी कारण मूसा, जो कुछ वह पहले दोहरा चुका है उसके ऊपर और उससे अधिक, यह भी जोड़ता है कि परमेश्वर अपनी व्यवस्था को तुच्छ जाननेवालों की विपत्तियों को अद्भुत करेगा। अर्थात् वे ऐसी विख्यात होंगी कि चाहे वे न चाहें, तो भी वे उनसे ऐसे डरेंगे जैसे ऐसी बातों से जो कभी न जानी गईं, न प्रचलित हुईं। क्योंकि हम देखते हैं कि जो बातें नित्य की हो जाती हैं, उन्हें तुच्छ जाना जाता है; और परमेश्वर के उपकारों के विषय में भी ऐसा ही होता है। सूर्य प्रतिदिन हमें प्रकाश देने के लिए उदय होता है; पर कौन है जो उस परिवर्तन और अदला-बदली पर ध्यान देता है जो परमेश्वर रात और दिन के बीच करता है? भजन संहिता के उन्नीसवें भजन के वचन के अनुसार, मानो परमेश्वर हमें हर भोर जगाता है,* और ऊँचे शब्द से हमें बताता है कि यह उचित ही है कि उसकी असीम भलाई, बुद्धि और सामर्थ्य पहचानी जाए। परन्तु हमारे कान सुनने के नहीं हैं। इसका कारण क्या है? यह कि सूर्य प्रतिदिन एक ही क्रम से दिखाई देता है, जिससे हम उससे कठोर हो गए हैं; और क्योंकि यह साधारण बात है, हम उसकी कुछ गिनती नहीं करते। दण्डों के विषय में भी ऐसा ही है। क्योंकि हमारा प्रभु जितना हमें अपनी ओर आने के लिए उकसाता है, हम उतना ही सुधरने से इनकार करने का हियाव बाँधते हैं। इसलिए हमारे लिए आवश्यक है कि उसकी विपत्तियाँ हमारे लिए अद्भुत हों, ताकि हम न चाहते हुए भी उनसे डर जाएँ। और फिर वह जोड़ता है कि वे बड़ी और स्थायी होंगी। मूसा जो अन्तिम शब्द काम में लाता है, उसका अर्थ सच्चा या विश्वासयोग्य है। इसके द्वारा परमेश्वर हमें समझाता है कि उसकी विपत्तियाँ बनी रहेंगी, जैसा उसने यह भी कहा कि वे उन हठीलों से लिपटी रहेंगी जो कोमलता से जीते नहीं जा सकते; ये विपत्तियाँ उनमें जड़ पकड़ेंगी; और इसी कारण वह उन्हें स्थायी कहता है। यहाँ हमें अपनी कठोरता पर विचार करना है, ताकि हम में से हर एक परमेश्वर के हाथ को देखने में और भी सचेत रहे और उसे और अच्छी रीति से समझे। क्योंकि हम स्वभाव से इतने मन्दबुद्धि हैं, हमें अपने आप को जगाना सीखना चाहिए। और हम डरें कि कहीं परमेश्वर वह पूरा न करे जो इस पाठ में घोषित है: अर्थात् जब उसके साधारण दण्ड हमें लाभ नहीं पहुँचाते, तब उसे अवश्य ही हमारे विरुद्ध ऐसी अनोखी और भयानक रीति से चलना पड़े, जो हमें डरा दे और उन सब के रोंगटे खड़े कर दे जो उसकी चर्चा भर सुनें; वरन् (जैसा भविष्यद्वक्ता यिर्मयाह कहता है) जब उसका समाचार परदेश की जातियों में पहुँचे तो मनुष्यों के कान झनझना उठें।
इसलिए हम डरें कि कहीं परमेश्वर उस रीति से काम न करे, जब वह हम में ऐसा हठ देखता है कि वह हमें नपी-तुली और सहने योग्य ताड़नाओं से जीत नहीं सकता। और साथ ही "स्थायी विपत्तियों" के इस शब्द से भी चेतावनी लें कि जब परमेश्वर हमें उद्धार के मार्ग पर लौटाने के लिए हमारे पीछे लगा रहा, और हम फिर भी उससे भागते रहे, तब विपत्तियाँ भी हम पर और हमारी सारी सन्तान पर अन्त तक बनी रहनी चाहिए, यहाँ तक कि जब हम समझें कि इनका अन्त दिखाई देता है, तब भी हमने आरम्भ ही नहीं किया होगा। इसलिए जब विपत्ति कुछ समय तक रहे, तब हम यह न समझें कि हम बच निकलेंगे; क्योंकि जैसे-जैसे हम अपनी दुष्टता में आगे बढ़ते जाएँगे, वैसे-वैसे परमेश्वर को भी अपनी कठोरता में आगे बढ़ना और उसे अधिकाधिक बढ़ाना पड़ेगा, जैसा वह हमें बिगड़ते-बिगड़ते देखता है। तब हम वैसा न करें जैसा अधिकतर लोगों को करते देखते हैं, जो चिल्लाते और झुँझलाते हुए कहते हैं: इसका अन्त कब होगा? यह कैसे हुआ कि परमेश्वर को मुझ पर दया नहीं आती कि मुझे मेरे दुःखों से छुड़ाए? परन्तु इस बीच क्या उनके मन में परमेश्वर से मेल करने का कोई विचार होता है? क्या वे अपने दोष मानते और उन पर शोक करते हैं? नहीं, वरन् वे तो उसे ललकारने पर उतारू हैं। वे अपने क्लेशों की बात तो करते और शिकायतें भी करते हैं, परन्तु इस बीच कोई भी बुराई की जड़ को नहीं देखता कि उसे सुधारे। इसलिए जब हम अपने परमेश्वर के विरुद्ध हठीले रहे हों, तब यह हमें अनोखा न लगे कि वह इतनी कठोरता से हमारा पीछा करे; परन्तु हम मान लें कि यह हमारे लिए हितकर है। साथ ही हम यह न भूलें जो यहाँ लिखा है: अर्थात् परमेश्वर पापियों को धमकाता है, इसलिए कि उन्हें फिर लौटा लाए, चाहे वे ऐसे लोग रहे हों जो खो चुके हैं और जिनके सुधरने की आशा जाती रही है। क्योंकि परमेश्वर उनसे नहीं बोलता जिन्होंने केवल एक ही अपराध किया, या दो-तीन अपराध किए, या जिन्होंने बुरा करके भी अपने आप को पूरी रीति से दुष्टता के वश में नहीं कर दिया; वरन् वह ऐसे अपराधियों से बोलता है जिन्होंने बहुत समय तक उसके विरुद्ध युद्ध किया, उसके वचन को तुच्छ जाना, उसकी सब चेतावनियों के प्रति बहरे रहे और उनका उपहास ही किया। फिर भी वह उन्हें धमकाना नहीं छोड़ता। और किस अभिप्राय से? इसी से कि अपनी मनोहर भलाई से उन्हें जीत ले। इसलिए चाहे हम कुछ समय भटके रहे हों, तो भी बिलकुल न लौटने से देर से लौटना अच्छा है; और इस प्रकार जो कुछ मूसा के द्वारा यहाँ हमें दिखाया गया है उससे हमारा भला होगा। अब आगे वह कहता है कि परमेश्वर मिस्र की विपत्तियों को यहूदियों पर लौटा देगा। हम जानते हैं कि परमेश्वर ने मिस्रियों को ऐसा दुःख दिया कि वे उसकी अपनी प्रजा के लिए भय का कारण बन गए, यहाँ तक कि यहूदी स्वयं उस पर चकित हुए, यद्यपि वे उस बुराई से बचे रहे। जब मिस्री अत्यन्त पीसे गए, तब यहूदियों ने समझा कि परमेश्वर उन्हें बचा रहा है और उन्हें अपनी रक्षा में रखे हुए है, क्योंकि वह उनके शत्रुओं को मारता था और इस बीच उन्हें शान्ति और विश्राम में रखता था। और यह हम मुख्यतः मिस्र के सब पहलौठों के मारे जाने में देखते हैं; क्योंकि परमेश्वर ने आज्ञा दी थी कि घरों के चौखटों पर फसह के मेम्ने के लहू का चिह्न लगाया जाए। वहाँ परमेश्वर ने यहूदियों को विशेष साक्षी दी कि वह उन्हें बचा रखेगा; और उस समय उसने अपना क्रोध और पलटा उनके शत्रुओं पर फेरा। परन्तु अब वह यहाँ इसके बिलकुल विपरीत कहता है कि परमेश्वर उन्हीं विपत्तियों को लौटा लाएगा। क्योंकि मूसा जो शब्द काम में लाता है उसका अर्थ मानो यह है कि तेरे पूर्वजों ने देखा कि परमेश्वर ने अपना क्रोध मिस्रियों पर कैसे फेरा, परन्तु अब वे तुझ पर लौट आनी चाहिए, क्योंकि तू उसका आदर और उसकी सेवा करने की कुछ गिनती नहीं करता, जिसने तुझ से इतना प्रेम रखा और जिसका तू इतना ऋणी है। इस वचन से हमें चेतावनी मिलती है कि जब परमेश्वर कुछ समय हमें सहता रहा, और उस प्रेम के कारण जो वह हम से रखता है, हमारे शत्रुओं को दण्ड दिया और हमें थामे रखने के लिए उनके विरुद्ध अपने आप को प्रतिपक्षी दिखाया, तब हम इस कारण अपने आप को भुलावे में न डालें, वरन् उसके भय में चलने में और भी तत्पर हों। क्योंकि जब हम ऐसे अनुग्रह को न पहचानें, वरन् उसका बिलकुल उलटा दुरुपयोग करें, तब यह उचित ही है कि हमारा प्रभु उन बातों को हम पर लौटा लाए जो उसने हमारे शत्रुओं पर भेजी थीं, कि इससे हमें दिखाए कि वह हमें अपनी रक्षा और सुरक्षा में रखे हुए था। कहा गया है कि परमेश्वर की प्रजा सब दुष्टों और अविश्वासियों को भस्म करने के लिए सुलगाई हुई आग के समान होगी। और परमेश्वर यह बात वास्तव में दिखाएगा भी। परन्तु यदि हम अपने पापों और अपराधों से उसके क्रोध को भड़काएँगे ही, तो जो आग अविश्वासियों पर पड़नी थी वह लौटकर हम पर ही गिरेगी, और हम उसी में नष्ट हो जाएँगे। इसलिए हम इस वचन पर भली-भाँति विचार करें, और जो मिस्र देश के विषय में सुनाया गया है वह हमारे लिए दर्पण और शिक्षा ठहरे, कि हम आज उसे अपने ही काम में लाएँ; जैसा ये सब बातें हमारे लिए लिखी गई हैं। मैं कहता हूँ कि हम ध्यान दें कि हमारे प्रभु ने प्राचीन काल में यहूदियों के लिए क्या किया, और समझें कि उससे उसने साक्षी दी कि वह अपनी कलीसिया से कैसा प्रेम रखता है। परन्तु साथ ही हम चेतावनी लें कि अपने आप को उसके ऐसे आज्ञाकारी बनाएँ कि वह हमारी भलाई करता रहे, और यह वाचा उसके और हमारे बीच दृढ़ हो,* अर्थात् मैं तेरे मित्रों का मित्र और तेरे शत्रुओं का शत्रु होऊँगा। यह निश्चय है कि यह प्रतिज्ञा अब्राहम को दी गई थी; तौभी इसलिए कि हम भी इसका आनन्द उठाएँ। अब यदि हम परमेश्वर को अपना मित्र बने रहने नहीं देंगे, वरन् उसके विरुद्ध युद्ध ही करेंगे, और जो विश्वास और सन्धि हमारे बीच बाँधी गई है उसे तोड़ देंगे, तो जिसने पहले हमारे शत्रुओं का सामना किया था, उसे अब हम पर टूट पड़ना और हमें अपनी असीम सामर्थ्य का अनुभव कराना पड़ेगा, जब तक हम बिलकुल घबरा न जाएँ और मिट न जाएँ। इसलिए जब तक हमारा प्रभु हमें बचाए रखता है, हम उसकी भलाई को पहचानें, और उसके क्रोध को न भड़काएँ कि वह हमें मारकर अपनी सामर्थ्य का अनुभव कराए। और फिर जब हम देखें कि जहाँ अविश्वासियों पर उसके हाथ से मार पड़नी चाहिए थी, वहाँ पहली चोटें हम पर पड़ती हैं, तब हम मान लें कि ऐसा होना उचित है, क्योंकि हमने उस शान्ति को तोड़ा है जो उसने हम से बाँधी थी। इस कारण संसार की चाल कैसी भी हो, हम निराश न हों, वरन् उसी से लिपटे रहें। फिर यह भी कि हम उसके चरम सीमा तक बढ़ने की प्रतीक्षा न करें। और यदि हम इतने बुद्धिमान न हों कि आरम्भ में ही यह विवेक रखें, तो कम से कम उन चेतावनियों से लाभ उठाएँ जो इस स्थान में दी गई हैं। इसी रीति से हमें इस पाठ को काम में लाना चाहिए।
अब मूसा स्पष्ट कहता है कि यहूदी मिस्रियों की विपत्तियों से डरते थे, और उनके पास और भी अधिक डरने का उचित कारण था, क्योंकि उन्हें अपने शत्रुओं पर पड़ते देखकर वे उस समय चकित हुए थे, और इसलिए उचित ही था कि वे परमेश्वर की भलाई की बड़ाई करें; परन्तु बात जैसी भी रही हो, जो विपत्तियाँ परमेश्वर ने मिस्रियों पर भेजीं वे इतनी बड़ी और इतनी भयानक थीं कि यहूदी उनसे अवश्य चकित हुए, यद्यपि वे आप उनसे बचे हुए थे, क्योंकि उन्होंने प्रकृति में ऐसा उलटफेर देखा। अब यदि वे परमेश्वर के क्रोध से तब भी डरते थे जब वह उनके शत्रुओं पर था, और उसमें उसके प्रेम और भलाई की साक्षी पाते थे, तो जब परमेश्वर उनके अपने सिरों पर टूट पड़े, और उन्हें वे ही विपत्तियाँ भोगनी पड़ें जो मिस्रियों पर आई थीं, तब उन्हें क्या करना चाहिए? क्या वे दुगुने घबरा न जाएँ? हाँ; और इसलिए हम देखते हैं कि यह धमकी अनावश्यक नहीं है, वरन् उन्हें जगाने के काम की है, जैसा हम पहले कह चुके हैं, और जैसा अनुभव दिखाता है कि हम बहुत बहरे हैं, वरन् मानो संज्ञाहीन हैं, जब परमेश्वर हमें चेताता है; और उसे हम पर मानो हथौड़े से प्रहार करना पड़ता है, नहीं तो हम कभी न समझें कि वह क्या कहता है। देखो, इसी कारण यह वचन स्पष्ट रूप से लिखा गया है। अब जब हम देखें कि परमेश्वर दुष्टों को दण्ड देता है, तो हम सीखें कि उसके पलटे का ऐसा भय मानें कि उस समय तक न रुकें जब वह हमें उन लोगों के बीच लपेट ले जिन्हें हम अपने से पहले दण्ड पाते देख चुके हैं। पौलुस का यही अभिप्राय था जब उसने कहा, "कोई तुम्हें व्यर्थ बातों से धोखा न दे; क्योंकि इन्हीं बातों के कारण परमेश्वर का क्रोध आज्ञा न माननेवालों पर भड़कता है।" इससे पौलुस विश्वासियों को दिखाता है कि वे परमेश्वर के हाथ से केवल तभी न डरें जब उसे अपने विरुद्ध उठा हुआ देखें और वह उनके अपने शरीरों को छूए; वरन् वे उस अवसर से भी अपने सुधार का लाभ उठाएँ जब परमेश्वर उन पर इतना कृपालु हो कि उनकी आँखों के सामने निकम्मों और विद्रोहियों को दण्ड दे। इसलिए जब परमेश्वर दुष्टों को दण्ड देता है तो हम भयभीत हों, और पहले से ही उसे अपना न्यायी मानने का सचेत रहें; और यह भी कि हम इसके योग्य थे कि उनके समान ही कठोरता से हम से व्यवहार किया जाए, यदि वह अपनी भलाई से हमें सहता न रहता। यह बात हमारे मर्म को छुए, ताकि हम मन फिराव तक पहुँचें। इस प्रकार मूसा के इस वचन को हमें और आगे अभ्यास में लाना चाहिए।
अब वह जोड़ता है कि परमेश्वर (इस सब के ऊपर और इसके अतिरिक्त, जो उसने बताया है) यहूदियों पर और भी विपत्तियाँ और क्लेश भेजेगा। सच है कि मूसा पहले ही अनेक प्रकार की विपत्तियाँ गिन चुका था, और उसने यह कहना पर्याप्त न समझा कि परमेश्वर तुझे अमुक-अमुक रीति से ताड़ना देगा; वरन् उसने उसे दुहराया, क्योंकि उसने देखा कि मनुष्य इतने स्थूल और भारी हैं कि पहली बार में उतने प्रभावित नहीं होते जितना चाहिए। परन्तु यहाँ हमारे प्रभु का अभिप्राय यह प्रकट करना है कि उसके पास पलटा लेने के ऐसे उपाय हैं जो समझ से परे और शब्दों में कही जा सकनेवाली बातों से कहीं अधिक हैं; यहाँ तक कि यदि कोई उनकी सूची बनाए और उनके दस लाख भिन्न-भिन्न प्रकार गिना भी दे, तो भी वह उन सब को समेट न सकेगा; क्योंकि परमेश्वर के पास और भी गुप्त उपाय हैं, जो मनुष्यों को अज्ञात हैं, जिनसे वह उन्हें दण्ड दे जो अब भी उसके विरुद्ध बैर में सुलगते रहते हैं। और यह वैसा ही है जैसा हम बत्तीसवें अध्याय में उस गम्भीर गीत में देखेंगे जो मूसा वहाँ रचता है। "ये बातें मेरे भण्डार में रखी हैं (प्रभु कहता है), ऐसा कि मेरी सब पेटियाँ भयानक विपत्तियों से भरी हैं," ऐसी जिनकी कल्पना या समझ मनुष्यों को कभी न हुई। इस पाठ में भी यही कहा गया है।
और इसलिए हम दो बातें स्मरण रखें, अर्थात् जब हम परमेश्वर के कामों से उसकी सामर्थ्य का अनुभव कर चुके हों, या उसकी उन धमकियों को पढ़ें जो उसने अपनी व्यवस्था के उल्लंघन करनेवालों के विरुद्ध दी हैं, और उनका व्यवहार और कार्यान्वयन देखें, तो हम चकित होकर कहें, "यह क्या बात है? प्रभु को क्रोध दिलाना कैसी बात है! क्योंकि यदि वह एक ओर हमें छोड़ दे, तो दूसरी ओर हम पर चढ़ाई कर सकता है; और जब हम सौ क्लेशों से छूट जाएँ, तब उसके पास हमारे लिए तीन सौ और तैयार हैं; और जब हम उन सब से भी बच निकलें, तो भी हमने कुछ नहीं पाया।" इसलिए हम इन बातों पर विचार करें। अब देखें कि पवित्र शास्त्र में कितनी धमकियाँ हैं, परमेश्वर ने अपनी महिमा को तुच्छ जाननेवालों, और उन सब के विरुद्ध जो उसके वचन को तुच्छ जानते और हलका समझते हैं, कितने प्रकार की मृत्युओं की घोषणा की है; उन्हें सुनाना हमें थका देगा। और इतिहासों को पढ़ते हुए हम वे उदाहरण देखते हैं जो परमेश्वर ने हमें अपने क्रोध के दिए हैं; और वे एक ही प्रकार के नहीं हैं; यदि हम उनके दसवें भाग का भी विचार करें तो हमारी बुद्धि चकरा जाए। और यदि हम उन सब को लक्ष्य करने और लिख रखने पर मन लगाएँ, तो यह कैसा काम होगा! इसलिए पहला काम जो हमें करना है वह यह है कि उन सब धमकियों को स्मरण करने में परिश्रमी हों, जिनसे परमेश्वर हमारी बुरी लालसाओं को वश में करना और हमें बेलगाम होने से रोकना चाहता है; और साथ ही जो बातें हमारे सामने रखी गई हैं उनकी तुलना करें कि परमेश्वर ने व्यर्थ नहीं धमकाया, वरन् जो कुछ उसने कहा है उसे पूरा किया है। इस पर हम विचार करें। और इसके अतिरिक्त हम यह समझें कि पवित्र शास्त्र में जो उपाय दिए गए हैं, उनके अलावा भी परमेश्वर के पास मनुष्यों को दण्ड देने के बहुत से और उपाय हैं; और हम देखते हैं कि वह प्रतिदिन नए-नए उपाय निकालता है। यदि हमारे आँखें होतीं, या यों कहें कि हम उन्हें खोलना चाहते, तो हम भली-भाँति देख सकते कि परमेश्वर प्रतिदिन अपने क्रोध के नए-नए रूप भेजता है; और यह उसी अभिप्राय से है जिसकी चर्चा मैं पहले कर चुका, अर्थात् अपनी विपत्तियों को अद्भुत बनाना, कि मनुष्य उन पर विचार करने के लिए विवश हों, क्योंकि वे देखते हैं कि परमेश्वर प्रकृति के साधारण क्रम के अनुसार काम नहीं करता, वरन् ऐसी रीति से जो पहले कभी जानी नहीं गई। जब हम में से हर एक उन सब शिक्षाओं का भली-भाँति अध्ययन कर ले जो पवित्र शास्त्र में हमें सुनाई गई हैं, और वहाँ बताए गए उदाहरणों और दण्डों से अपना लाभ उठा ले, तो हम यह निष्कर्ष निकालें कि परमेश्वर के पास अब भी जितने बताए गए हैं उनसे बहुत अधिक उपाय हैं, जिन पर मनुष्यों ने कभी विचार नहीं किया। और यह बात उसने उसी समय से प्रकट की है जब से व्यवस्था लिखी गई; और वह अब भी ऐसा ही करता रहता है, कि हम से हर प्रकार का बहाना छीन लिया जाए। यदि कोई उन रोगों को देखे जो आज संसार में हैं, तो वह देखेगा कि बहुत से ऐसे हैं जो मूसा की व्यवस्था में, या हमारे पूर्वजों के दिनों में, बताए नहीं गए थे। व्यभिचार को हाल में उत्पन्न हुए रोगों से कैसे दण्ड मिला है! सौ वर्ष पहले उपदंश को कौन जानता था? यह एक भयानक विपत्ति है जो परमेश्वर ने संसार पर भेजी है। और यह मानो ऐसा है कि उसने अपनी भुजा स्वर्ग से बढ़ाकर कहा हो, "नहीं, वे अब मुझे अपना न्यायी नहीं जानते; जिन विपत्तियों को मनुष्य पहले जानते और सहते थे, उन सब के विरुद्ध वे अपने मन कठोर करते हैं, उन्हें कुछ नहीं गिनते; परन्तु अब मैं उन्हें समझा दूँगा कि मेरे सन्दूकों और मेरे भण्डारों में और भी छड़ियाँ हैं जो उनकी समझ से परे हैं।" परमेश्वर यह दिखाता है; और हम देखते हैं कि इस शिक्षा से लाभ उठाने का इससे उत्तम उपाय कोई नहीं कि हम उन छड़ियों और दण्डों से डरें जो व्यवस्था की पुस्तक में नहीं लिखे हैं; नहीं तो हमें यह समझना उचित है कि संसार की चाल कैसी भी हो, परमेश्वर अब भी हमारा न्यायी है।
अब वह जोड़ता है कि चाहे वे संख्या में आकाश के तारों के समान हों, तो भी परमेश्वर उन्हें ऐसा उजाड़ देगा कि उनमें से मुट्ठी भर ही रह जाएँ। यहाँ हमें वह स्मरण करना है जो पहले कहा गया था। क्योंकि जब परमेश्वर आकाश के तारों की यह उपमा काम में लाता है, तब उसकी दृष्टि उस प्रतिज्ञा पर है जो उसने अपने दास अब्राहम से की थी: अर्थात् यह कि उसका वंश संख्या में आकाश के तारों के समान होगा। परमेश्वर ने ऐसा ही कहा था। परन्तु अब, इसलिए कि यहूदी यह समझने का साहस न करें कि परमेश्वर सदा उन्हें बढ़ाने के लिए बँधा है, वह कहता है, "नहीं, चाहे जो हो, मैं तुम्हें भस्म कर दूँगा, और तुम मुट्ठी भर लोग ही रह जाओगे।" पहली दृष्टि में यहाँ विरोध प्रतीत होता है। क्योंकि जब परमेश्वर ने अपने दास अब्राहम से इतने बड़े वंश की प्रतिज्ञा की, तब वह मनुष्यों की योग्यता पर आधारित नहीं थी। और क्यों? क्योंकि जब प्रतिज्ञा परमेश्वर की सेंतमेंत भलाई पर निर्भर है, तो क्या उसका पूरा होना आवश्यक नहीं, चाहे मनुष्य दुष्ट ही क्यों न हों? हाँ, निश्चय। परन्तु हमें यह विचारना है कि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं को सदा हमारे ढंग से, या हमारी शारीरिक समझ के अनुसार पूरा नहीं करता; उसके पास हमारे लिए अविश्वसनीय उपाय हैं, जिन्हें हम तब तक नहीं समझते जब तक वे फल में प्रकट न हों। जब वह अपनी कलीसिया को बढ़ाने की प्रतिज्ञा करता है, अर्थात् उसे समृद्ध करने की, तब यदि वह देखता है कि उसकी आड़ में कपटी लोग बुराई करने की छूट लेते हैं, तो वह अपना हाथ खींच लेता है। इसलिए हम भली-भाँति विचारें कि क्योंकि यहूदी मूर्खतापूर्ण घमण्ड से फूल गए थे, और समझते थे कि परमेश्वर के लिए उन्हें घटाना असम्भव है, क्योंकि उसने उन्हें बढ़ाने का वचन दिया था; क्योंकि, मैं कहता हूँ, उन्होंने परमेश्वर की भलाई का दुरुपयोग किया और अपने कपट से उसकी प्रतिज्ञा को झूठा ठहराया, इसलिए उसने उन्हें भस्म किया और थोड़ी संख्या में पहुँचा दिया। तौभी उस थोड़ी संख्या से फिर एक बड़ी सन्तान उत्पन्न हुई, वरन् ऐसी बड़ी कि मनुष्य उसकी सच्चाई और दया को और भी भली-भाँति पहचान सकें, चाहे दूसरी रीति से। इसलिए वह अपने भविष्यद्वक्ता यशायाह के द्वारा दसवें अध्याय में कहता है: "चाहे तुम समुद्र की बालू के समान हो; (क्योंकि वह उन्हें सदा अब्राहम से की गई प्रतिज्ञा की ओर लौटाता रहा,) चाहे तुम्हारा वंश (जैसा मैंने कहा) समुद्र की बालू के समान हो; तौभी केवल एक छोटा सा बचा हुआ भाग ही उद्धार पाएगा। परन्तु जब तुम बिलकुल भस्म हो जाओगे, तौभी वह छोटा सा बचा हुआ भाग सारी पृथ्वी पर बिखर जाएगा, मानो किसी छोटे सोते से बड़ी नदी, या बड़ी झील फूट निकले, जिससे बहुत से देश सींचे जाएँ। ऐसा ही होगा।" अब हम देखते हैं कि यद्यपि परमेश्वर उन कपटियों को दण्ड देता है जो उसकी प्रतिज्ञाओं का दुरुपयोग करते हैं, तौभी वह अपने वचनों को पूरा करने में चूकता नहीं, चाहे किसी असाधारण उपाय से; जैसा हमने उसे पोपतन्त्र में देखा है, और जैसा अब भी देखा जा सकता है। क्योंकि पोप के अनुयायियों ने सारे संसार को अन्धविश्वास, मूर्तिपूजा और हर प्रकार की बुराई से भर दिया है; वरन् वे घमण्ड में अपने मन कठोर करते हैं और खुले मुँह से परमेश्वर का उपहास करते हैं। वे कहते हैं, "अब क्या? क्या हम कलीसिया नहीं? क्या यह नहीं कहा गया कि यीशु मसीह जगत के अन्त तक हमारे साथ रहेगा?" क्या वह अपनी कलीसिया को त्याग सकता है? तौभी वे निरन्तर, जहाँ तक उनसे हो सके, उसे क्रूस पर चढ़ाते हैं; वे उसके मुँह पर थूकते हैं और संसार भर की निन्दा उस पर लगाते हैं; वे उसे अपने बीच मानो बन्दी या बँधुआ दास बना देते हैं; और वे नहीं सोचते कि जो ऐसा भयानक विनाश सारे संसार में हो रहा है, वह परमेश्वर के उस न्यायपूर्ण पलटे से है जो सुसमाचार के विरुद्ध विद्रोह करनेवालों के निर्लज्ज कपट के कारण है; तौभी परमेश्वर ने अपने लोगों को बचाने में चूक नहीं की, मानो भूमि के नीचे। और हमारे दिनों में उसने अपनी कलीसिया को ऐसा उठाया है मानो सड़ी हुई लोथों की हड्डियाँ फिर मांस और बल पा जाएँ। क्योंकि हम अपने अविश्वास के कारण क्या थे? देखो, यह कैसा अद्भुत पुनरुत्थान है जो परमेश्वर ने इस विषय में किया है। इसलिए भली-भाँति ध्यान दो कि जब हमारा प्रभु अपनी कलीसिया को थामे रखने और बचाए रखने की प्रतिज्ञा करता है, तब वह उनके लिए बिलकुल नहीं जो उसके नाम का झूठा दुरुपयोग करते हैं, और न उनके लिए जो इस बहाने से उसे तुच्छ जानने लगते हैं कि वह कोमल और दयालु है। क्योंकि वे उस अनुग्रह से सदा निराश रहेंगे जो परमेश्वर ने अपने लोगों के लिए इस प्रकार रख छोड़ा है; क्योंकि वे अपनी ही दुष्टता और कृतघ्नता से उससे वंचित हो जाते हैं। तौभी बात जैसी भी हो, परमेश्वर सदा विश्वासयोग्य है, और मनुष्यों की दुष्टता से लड़ते हुए अपनी सच्चाई को स्थान देने के लिए समझ से परे उपाय निकाल लेगा। इस पाठ के विषय में हमें यही स्मरण रखना है, जहाँ वह कहता है कि यहूदियों को, चाहे वे आकाश के तारों के समान हों, वह उजाड़ देगा।
और वास्तव में यही बात कलीसिया के सिर यीशु मसीह में भी प्रकट हुई। इसलिए हमें यह अनोखा न लगे कि देह के अंग उसी के समान ढाले जाएँ। जब परमेश्वर पिता ने यीशु मसीह को उद्धारकर्ता होने के लिए भेजा, तब वह कहाँ से आया? भविष्यद्वक्ता यशायाह कहता है कि वह एक ठूँठ से फूटेगा, मानो किसी वृक्ष को काट डाला गया हो और भूमि के भीतर केवल कुन्दा रह गया हो, ऐसा कि मनुष्य उस पर पाँव रख सकें। यह नहीं कहा गया कि वह दाऊद के घराने से निकलेगा, वरन् यिशै के घराने से, जो गाय-बैलों का चरवाहा और तुच्छ जाना जानेवाला मनुष्य था। मैं कहता हूँ, वही दाऊद का पिता था, जो कुछ गिनती का मनुष्य नहीं था। यद्यपि दाऊद ऐसा उत्कृष्ट राजा था कि परमेश्वर ने उसे चुनकर आकाश तक बड़ा किया; तौभी भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि जब यीशु मसीह जगत में आएगा, तो वह उस राजकीय प्रताप के किसी आडम्बर के साथ नहीं आएगा जो दाऊद में था, वरन् यिशै के घराने से निकलेगा, मानो किसी पशु-झुण्ड में से निकले। और तब भी वह वृक्ष से नहीं, वरन् कटे हुए ठूँठ से निकलेगा। और किस रीति से?
और किस ढंग से? वह कहता है, एक छोटी कोंपल के रूप में। अब जब परमेश्वर ने कलीसिया के सिर के साथ ऐसा किया, तो हमें समझना चाहिए कि सारी देह भी ऐसी ही होगी; परन्तु इससे कपटी लोग उसके भागी नहीं ठहरते जो परमेश्वर अपने चुने हुओं के लिए रखता है, जिन्हें उसने चुना है, और जो सचमुच अपने आप को उसकी सन्तान दिखाते हैं और अपने पिता के समान उसकी आज्ञा मानते हैं; जो केवल पूरे भरोसे के साथ ही नहीं आते, वरन् सच्चे प्रेम से उसका आदर करने के लिए खिंचे भी आते हैं। और जब हम देखते हैं कि परमेश्वर आज संसार में भयानक विनाश भेज रहा है, तो हम समझें कि वह वही कर रहा है जो यहाँ घोषित है; तौभी हम इसमें सन्देह न करें कि वह सदा अपनी कलीसिया को बचाए रखता है; हम सन्देह न करें कि जितनी बार हम उसकी शरण लें, वह हमें थामे रखता है, इस वचन के अनुसार कि जो कोई प्रभु का नाम लेगा वह उद्धार पाएगा, चाहे वे बड़े से बड़े संकटों के बीच क्यों न हों। चाहे आकाश और पृथ्वी आपस में टकरा जाएँ, तौभी हम निश्चित हैं कि परमेश्वर का नाम लेने से हम बचाए जाएँगे। परन्तु हम चौकस रहें कि हम उसके नाम का दुरुपयोग करके उसे बनावटी आड़ न बनाएँ; क्योंकि वह हमें भली-भाँति उजाड़ सकता है। और यदि हम घमण्ड करें कि हम उसकी कलीसिया के हैं, तो जब वह हमें काट डाले, तब वह झट अपने लिए एक नई प्रजा उठा सकता है; और उन्हें ऐसा बढ़ा सकता है कि उसकी सच्चाई मिटने न पाए, और हम फिर भी नष्ट हो जाएँ।
मूसा के यों कहने के बाद वह जोड़ता है कि जैसे परमेश्वर यहूदियों की भलाई करने से प्रसन्न होता था, वैसे ही वह उन्हें सताने से प्रसन्न होगा, जब तक कि वह उन्हें भस्म न कर दे और जड़ से उखाड़ न डाले। यहाँ मूसा सबसे पहले यह दिखाता है कि परमेश्वर उन लोगों के प्रति कैसा भाव रखता है जिन्हें उसने अपने लिए चुना है और जिन्हें वह अपनी भेड़-बकरियाँ बनाना चाहता है। यह निश्चय है कि परमेश्वर किसी मानवीय भावना के अधीन नहीं है; तौभी वह अपनी भलाई या हमारे प्रति अपने प्रेम को पर्याप्त रूप से प्रकट नहीं कर सकता, सिवाय इसके कि वह मानो नश्वर मनुष्य का रूप धारण करे, और कहे कि वह हमारी भलाई करने से प्रसन्न होगा। इसलिए हम समझें कि परमेश्वर हमें इतना प्रिय रखता है जैसे कोई पिता अपने बच्चों की भलाई करके आनन्दित और मग्न होता है। जब वह उन्हें अपने मन के अनुसार, अपना आदर करते और अपनी आज्ञा मानते देखता है, तब उन्हें खिलाना और पहनाना उसके लिए सुख है, और उन्हें उनकी सुन्दर दशा में देखकर उसे भला लगता है; क्योंकि यही पिता का सच्चा सुख है। परमेश्वर अपने आप को नश्वर मनुष्यों के समान ठहराता है, और कहता है कि वह हमारी भलाई करने में प्रसन्न होगा। और इसलिए हम अपने परमेश्वर की अनमोल भलाई की जितनी बड़ाई करें, कम है, क्योंकि वह इतना झुक आता है कि हमें बताता है कि उसका सारा आनन्द इसी में है कि हम उसके उपकारों का आनन्द लें, और हमारे साथ ऐसा व्यवहार करे कि हमारे पास उसकी स्तुति करने का कारण हो, और अन्त में हमारी सब अभिलाषाओं को पूरा करे। परन्तु क्या हो? हम इसे सह नहीं सकते: हम उसे समझ नहीं सकते, क्योंकि हम उस पर विचार करने के योग्य नहीं।
हम देखते हैं कि परमेश्वर (जैसा आप कहें) हमारे प्रति रूठा हुआ है; हम देखते हैं कि वह केवल अपनी आशिषें हम से नहीं छीनता, वरन् हम पर क्रोधित भी है; और संक्षेप में हम उसमें हर प्रकार की कठोरता के सिवाय कुछ नहीं देखते। और इसका कारण क्या है? निश्चय यह कि हम उसकी भलाई के लिए द्वार बन्द कर देते हैं, और उसे (जैसा आप कहें) अपने स्वाभाविक स्वभाव के अनुसार काम नहीं करने देते। देखो, यह वह बात है जो हमें अपने दोषों को और भी भली-भाँति पहचानने की ओर ले जाए, और जब वह हमारी इच्छा के अनुसार हम से व्यवहार न करे तब हम परमेश्वर पर किसी अत्यधिक क्रूरता का दोष न लगाएँ। क्योंकि यह निश्चय है कि वह हमारी भलाई करने से प्रसन्न होगा; परन्तु दूसरी ओर हम यह भी विचारें कि उसे उसी प्रकार हमारी बुराई करने से भी प्रसन्न होना पड़ता है। और ऐसा क्यों? निश्चय इसलिए कि वह धर्मी है। सच है, यदि हम परमेश्वर को अपने प्रति अपनी ही प्रवृत्ति के अनुसार काम करने देते, तो वह हम पर असीम उपकार करता, और हम इस संसार में रहते हुए मानो स्वर्गलोक में होते; परन्तु हमारे पापों के कारण हमें यहाँ दुखी परदेशियों की नाईं जीना पड़ता है, हमें अनेक दुःखों में सूखना पड़ता है, हमें निरन्तर भय और सन्देह में रहना पड़ता है, और हमें बड़े अशान्ति में कराहना पड़ता है; ऐसा ही होना चाहिए। और किसलिए? क्योंकि परमेश्वर धर्मी है।
इसी आनन्द की बात इस पाठ में कही गई है। इसी के अनुसार कहा गया है कि परमेश्वर तब मगन और प्रसन्न होगा जब वह दुष्टों को दण्ड दे चुका होगा और उनके विरुद्ध अपनी महिमा को स्थिर रख चुका होगा, क्योंकि उन्होंने उसे तुच्छ जाना और उसे कुछ न गिना। तौभी यह भी सच है कि वह अपने भविष्यद्वक्ता यशायाह के द्वारा कहता है कि वह यह अनिच्छा से करता है। वह कहता है, हाय, क्या मुझे अपने शत्रुओं से पलटा लेना ही पड़ेगा? परमेश्वर वहाँ मानो शोक और पीड़ा में "हाय" पुकारता है। वह कहता है, मुझे अपने शत्रुओं से पलटा लेकर शान्ति पानी पड़ेगी। जिन्हें वह अपने शत्रु कहता है, वे वे सन्तान हैं जिन्हें उसने गोद लिया था और जो अपने आप को उसकी प्रजा कहकर घमण्ड करते थे। और वह उनमें कैसे शान्ति पाता है? उन्हें त्यागकर और निकालकर। परन्तु इस बीच वह दिखाता है कि जब उसे मनुष्यों को ऐसे भारी प्रहारों से गिराना पड़ता है, तो यह उसकी इच्छा के विरुद्ध है, चाहे वह और कुछ कर नहीं सकता। तौभी वास्तव में परमेश्वर बिना किसी बड़े बल प्रयोग के मनुष्यों के मन को वश में कर सकता है; क्योंकि (जैसा हम कह चुके हैं) वह हमारी भावनाओं के अधीन नहीं है। परन्तु इससे हमें यह विचारना है कि उसका अभिप्राय यह प्रकट करना है कि हमारी न सुधरनेवाली दुष्टता ही इसका कारण है कि उसे यहाँ कही गई रीति से हमारा पीछा करना पड़ता है, और हमारी हानि करने में उसे प्रसन्न होना पड़ता है; जिसमें प्रकृति का क्रम किसी प्रकार बिलकुल उलट-पलट जाता है; परन्तु यह सब हमारे ही दोष से है, और इसके लिए हम ही दोषी हैं, और हमें इसका कोई और कारण ढूँढ़ना उचित नहीं, सिवाय अपने पाप के, जिसने उसके पलटे को चरम सीमा तक भड़का दिया है। इस वाक्य के विषय में इतना ही।
अब निष्कर्ष के रूप में कहा गया है कि परमेश्वर इस प्रजा को उस देश में से उखाड़ देगा जिसमें उसने उन्हें रोपा था, और उन्हें जगत की सब जातियों में तितर-बितर कर देगा। और वहाँ यह अभागी प्रजा (जो पहले स्वतन्त्रता के देश में थी, जहाँ परमेश्वर ने उन्हें इसलिए बसाया था कि उसकी सेवा और शुद्ध धर्म वहाँ निवास करे) पराए देवताओं की, अर्थात् काठ और पत्थर की मूरतों की सेवा करेगी। पहले हम देखते हैं कि यद्यपि कनान देश इस्राएल की प्रजा को मीरास में दिया गया था, तौभी जब उन्होंने उन पर दिखाए गए अनुग्रह का दुरुपयोग किया तो वे निकाले और देश-निकाला दिए जाने से न बचे। परमेश्वर ने उन्हें वहाँ ऐसे रोपा था मानो अपने ही हाथ से बैठाया हो। उसने कहा, देखो, यह मेरा और तुम्हारा विश्रामस्थान है: उसका अभिप्राय स्वयं उनके बीच निवास करने का था, और इसी पर उसने वहाँ उन्हें विश्राम देने की प्रतिज्ञा की, यहाँ तक कि यद्यपि और सब जातियाँ यहाँ-वहाँ हटाई और हिलाई जाएँ, तौभी अब्राहम की सन्तान उस देश की मीरास का भोग करती रहे। तौभी इससे परमेश्वर उन्हें फिर निकालने और हवा से उड़ाकर बिखेरने से न रुका, क्योंकि उन्होंने उस देश को अशुद्ध किया था, जो उसके नाम के लिए पवित्र रखा जाना चाहिए था।
अब जब ऐसा है, तो हमें यह अनोखा न लगे कि परमेश्वर आज संसार में अनेक परिवर्तन भेजता है; क्योंकि उसने किसी जाति को ऐसा विशेषाधिकार नहीं दिया कि उनसे कहे, तुम इस देश में बसोगे, जैसे कनान देश अब्राहम के वंश को दिया गया था। परन्तु हम देखते हैं कि परमेश्वर कितना अप्रसन्न है, हम देखते हैं कि मनुष्यों के कुकर्म जितने घोर हो सकते हैं उतने हैं। अब यदि परमेश्वर मनुष्यों को हटाता है, तो हम समझें कि यह उनके पापों के कारण है। फिर हम उस अनन्त विश्राम की ओर लौटें जिसकी ओर प्रेरित हमें इब्रानियों की पत्री में ले जाता है। कनान देश के विश्राम की चर्चा करके वह कहता है कि हमें एक और ऊँचे विश्राम की ओर दृष्टि रखनी चाहिए। क्योंकि परमेश्वर की सन्तान प्रायः इस संसार में बटोहियों के समान हैं, जैसा सन्त पौलुस उन्हें कहता है, और अपने आप को भी उनकी गिनती में रखता है; परन्तु हम सदा अपनी यात्रा और प्रयत्न उस मीरास की ओर लगाएँ जिसकी प्रतिज्ञा हमें स्वर्ग में दी गई है; क्योंकि हम उस मीरास से निराश न होंगे, यदि हम उस बुलाहट में बने रहें जिसमें परमेश्वर ने हमें बुलाया है। तौभी कहा गया है कि जो अपने आप को दुष्टता के वश में कर देते हैं वे जीवन की पुस्तक से मिटा दिए जाएँगे। यह इसलिए नहीं कि परमेश्वर के चुने हुए कभी नष्ट होंगे; परन्तु यह उन लोगों के विषय में कहा गया है जो समझते हैं कि उनके लिए परमेश्वर की सन्तान का नाम धरना, बपतिस्मा पाना, प्रभु-भोज में सम्मिलित होना और ऐसी ही बातें करना काफी है, और आगे कुछ ध्यान नहीं देते। परन्तु हमारा प्रभु हमें बताता है कि यद्यपि कुछ समय तक ऐसा दिखाई देता है कि वे उसके दफ्तर में लिखे और दर्ज हैं, क्योंकि वे विश्वासियों की मण्डली में गिने जाते हैं, तौभी वे मिटाए जाने से न चूकेंगे। इसलिए हम चौकस रहें, और जब तक परमेश्वर हमें इस संसार में रखना चाहे, हम उसकी आज्ञाकारिता में ऐसे चलें कि उसका हाथ सदा हमें बचाने और थामे रखने के लिए बढ़ा रहे: हम उससे ऐसे लिपटे रहें कि हमें उसका आदर और सेवा करने की स्वतन्त्रता मिलती रहे। क्योंकि यह भयंकर उजाड़ है जिसकी चर्चा मूसा यहाँ करता है, अर्थात् कलीसिया की देह में न रहना, और धर्म का रूप या आकार भी न रहना: और यह आज सारे संसार में देखा जाता है। इसलिए हम ध्यान दें कि इस क्षणभंगुर जीवन में परमेश्वर हमें जो सबसे बड़े उपकार दे सकता है, उनमें से एक यह है कि हमें कोई छोटा सा कोना दे जहाँ हम उसके नाम से इकट्ठे हों, उसे पुकारें और अपने आप को उसकी प्रजा घोषित करें। यह हमारे बीच अन्न-जल या किसी भी और वस्तु से अधिक मूल्यवान ठहरनी चाहिए। फिर भी बहुत थोड़े इस पर विचार करते हैं। तौभी हमें मानना ही होगा कि चाहे हमारे पास भरपूर भोजन हो, और इस बीच हम परमेश्वर को भूल जाएँ, तो हमारी दशा दयनीय है। और यदि हम इस पर विचार नहीं करते, तो हम अपनी ही पशुता प्रकट करते हैं; क्योंकि परमेश्वर हमें बताता है कि यह उपकार, जिसकी यहाँ चर्चा है, बाकी सब से कहीं बड़ा है, अर्थात् यह कि हम शुद्धता से उसकी आराधना कर सकें, और उस सिर के अधीन इकट्ठे हों जिसे उसने हमारे लिए ठहराया है, अर्थात् हमारा प्रभु यीशु मसीह। और इसलिए जब तक हमें परमेश्वर का वचन सुनने, उसका नाम पुकारने और उसके सुसमाचार के अनुसार चलने का यह विशेषाधिकार मिला है, तो हम उस पर कान लगाएँ, ऐसा न हो कि परमेश्वर हमें वैसे ही बिखेर और तितर-बितर कर दे जैसे उसने यहूदियों को बिखेरा है। और विशेषकर हम इस धमकी से डरते रहें, अर्थात् ऐसे पशु बना दिए जाने से कि फिर मूरतों का आदर करें, जैसा हम देखते हैं दूसरों का हाल हुआ है, जो परमेश्वर के पलटे का हमारे लिए अच्छा उदाहरण हैं, जिसका हमने भी अपना भाग भोगा है। क्योंकि हम मूर्तिपूजा के अधीन बँधुआ दास रहे हैं, और पोपतन्त्र की घृणित बातों के गुलाम; और वह हमारे पापों के और हमारे पूर्वजों के पापों के कारण था। जब हम पहले ही प्रहार भोग चुके हैं, वरन् दूसरों के लिए दर्पण के समान रहे हैं, तो क्या अब हम ऐसे पशुवत् हों कि अपने परमेश्वर को इस प्रकार क्रोध दिलाएँ कि उसे मानो विवश होकर हमें उस अनुग्रह से वंचित करना पड़े जो उसने हमें दिया है? इसलिए जब तक हमारा प्रभु हमें स्थान देता है कि हम मानो उसके हाथ के नीचे छिपें, जब तक वह हमें चलाता और राह दिखाता है, और जब तक हम एक देह में जुड़े हैं, तब तक हम सुसमाचार के इस उपकार और धन का उपयोग करें: कि वह हमारे बीच एक मन से बड़ा माना जाए, केवल मुँह से नहीं, वरन् विशेष करके हमारे जीवन से: जिससे कि जब हम अपने आप को उसका आदर करने में लगाएँ, तब वह अपनी ओर से हमारी भलाई करता रहे: और यह धमकी हमारे सिरों पर पूरी न हो, अर्थात् यहाँ-वहाँ तितर-बितर किए जाना, और फिर मूरतों और अन्य मृत और संज्ञाहीन वस्तुओं की पूजा करने को विवश किया जाना।
अब आओ, हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने पापों को मानते हुए गिर पड़ें; उससे विनती करें कि वह हमें ऐसा मन फिराव दे कि अपने पापों से लज्जित होकर हम पूरी रीति से अपने आप को उसके हाथों में सौंपने का यत्न करें, और उससे क्षमा पाकर यह भी अनुभव करें कि उसने हमें सुधारा है, और हम उसके अनुग्रह में हैं, कि अपने आप को पूर्णतः उसकी पवित्र इच्छा को सौंप दें। और यद्यपि हम में सदा बहुत कुछ सुधारने को रहता है, और हमारी अभिलाषाएँ और भावनाएँ हमें उससे जो वह हमें आज्ञा देता है बिलकुल दूर खींचती हैं, तौभी हम उनसे संघर्ष करना न छोड़ें, और अपने आप को पूरी रीति से उसे सौंपते रहें, और इसके लिए अपने आप को और अधिक विवश करें, यह जानते हुए कि यही हमारा परम कल्याण है: और यद्यपि वह हमें सुधारने में कभी-कभी कठोरता के कुछ चिह्न दिखाता है, तौभी हम उससे लाभ उठाना सीखें, कि अपने पापों को सुधारें, ताकि हम उस सिद्धता तक पहुँचाए जाएँ जिसके लिए वह हमें प्रतिदिन बुलाता है। कि वह यह अनुग्रह न केवल हमें, वरन् पृथ्वी के सब लोगों और जातियों को भी देने की कृपा करे, इत्यादि।
शनिवार, 28 मार्च, 1556 को।
