अध्याय 11

159वाँ उपदेश, जो अट्ठाईसवें अध्याय पर सातवाँ है

The Covenant Unveiled · John Calvin

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159वाँ उपदेश, जो अट्ठाईसवें अध्याय पर सातवाँ है

159वाँ उपदेश,

जो अट्ठाईसवें अध्याय पर सातवाँ है।

36 यहोवा तुझे और तेरे ठहराए हुए राजा को ऐसी जाति के पास ले जाएगा जिसे न तू जानता है और न तेरे पूर्वज; और वहाँ तू काठ और पत्थर के दूसरे देवताओं की उपासना करेगा।

37 और जिन जातियों के बीच यहोवा तुझे पहुँचाएगा उन सब में तू विस्मय का कारण, उपहास का पात्र और कहावत ठहरेगा।

38 तू खेत में बीज तो बहुत बोएगा, परन्तु उपज थोड़ी ही बटोरेगा, क्योंकि टिड्डियाँ उसे खा जाएँगी।

39 तू दाख की बारी लगाएगा और उसकी सेवा-टहल करेगा, परन्तु न तो उसका दाखमधु पीने पाएगा, और न उसका कोई फल बटोरने पाएगा, क्योंकि कीड़े उसे खा जाएँगे।

40 तेरी सारी सीमाओं में जैतून के वृक्ष तो होंगे, परन्तु तू उनके तेल से अपना अभिषेक न करने पाएगा, क्योंकि तेरे सब जैतून झड़ जाएँगे।

41 तू बेटे-बेटियाँ तो जनेगा, परन्तु वे तेरे न रहेंगे, क्योंकि वे बन्धुआई में चले जाएँगे।

42 कीड़े तेरे सब वृक्षों और तेरी भूमि की उपज को नष्ट कर डालेंगे।

43 जो परदेशी तेरे बीच रहता है, वह तुझ से बहुत ऊँचा होता जाएगा, और तू बहुत नीचे गिरता जाएगा।

44 वह तुझे उधार देगा, परन्तु तू उसे उधार न दे सकेगा; वह सिर होगा, और तू पूँछ ठहरेगा।

45 और ये सब शाप तुझ पर आएँगे, और तेरा पीछा करेंगे, और तुझे आ पकड़ेंगे, जब तक तू पूरी रीति से नष्ट न हो जाए; क्योंकि तूने अपने परमेश्वर यहोवा की बात नहीं मानी, और उसकी उन आज्ञाओं और विधियों का पालन नहीं किया जो उसने तुझे दी थीं।

हम जानते हैं कि जब इस्राएल के लोगों ने अपने लिए राजा चुना, तो वे किस भावना से प्रेरित थे; अर्थात् अभिमान से, क्योंकि वे अपने पड़ोसियों से छोटे नहीं रहना चाहते थे। इसके अतिरिक्त उन्होंने सोचा कि अपने ऊपर एक ऐसा सिर पाकर, जिसके हाथ में सारा अधिकार हो, वे पूरी तरह सुरक्षित हो जाएँगे। और इस प्रकार तुम देखते हो कि इब्राहीम की सन्तान अपनी स्वतंत्रता से सन्तुष्ट न रह सकी, वरन् राजा की अभिलाषा करने लगी। क्योंकि उन्होंने मिस्रियों, सूरियों, मोआबियों, वरन् सोरवासियों और ऐसी ही अन्य जातियों के राजा देखे, इसलिए वे अपने मन में यह मान बैठे कि यदि हमारा भी कोई सिर हो, तो हमारा सब कुछ भला होगा। अब जिस प्रकार अभिमान और महत्वाकांक्षा ही इस्राएल में राजा चुनने का कारण बनी, उसी प्रकार इसी कारण वे कठोर मन के हो गए, और यह समझने लगे कि ऐसी रक्षा पाकर हम सब संकटों से बाहर हैं; इसी के कारण हम देखते हैं कि उन्होंने इस बहाने से भविष्यद्वक्ताओं को तुच्छ जाना कि वे अपने को भली-भाँति सुरक्षित समझते थे।

परमेश्वर के आत्मा ने इसे पहले से देखकर (यद्यपि यह अभी हुआ नहीं था) इस पाठ में कहा कि जो राजा वे ठहराएँगे वह परदेश में बन्दी बनाकर ले जाया जाएगा; मानो परमेश्वर कह रहा हो कि वे अपने बचाव के लिए बहाने तो ढूँढ़ सकते हैं, परन्तु उसके हाथ के सामने वे उनके किसी काम न आएँगे। यही वह बात है जिसकी चर्चा हमने कल की थी; अर्थात् जब परमेश्वर हमारा विरोधी हो, तब हमें यह न समझना चाहिए कि हम सृजी हुई वस्तुओं के सहारे उसके विरुद्ध अपने को स्थिर रख सकेंगे, क्योंकि हम जानते हैं कि वह उन्हें निश्चय ही हमारे विनाश के लिए काम में लाएगा। इसलिए हम में से कोई अपने आप को धोखा न दे, और न उस वस्तु को अपनी रक्षा बनाए जो धुएँ और झूठ के सिवा कुछ नहीं। यह सच है कि इस्राएल के लोगों ने जो पहला राजा चुना, अर्थात् राजा शाऊल, वह बन्धुआई में नहीं ले जाया गया; यद्यपि वह युद्ध में मारा गया; परन्तु दाऊद के उत्तराधिकारियों के साथ क्रूर और अत्यन्त अपमानजनक व्यवहार किया गया, यद्यपि परमेश्वर ने ही उन्हें ठहराया था, वरन् वे हमारे प्रभु यीशु मसीह के प्रतिरूप और मूर्ति थे। और यह भयानक बात है कि जिस राज्य को परमेश्वर ने अपने लिए समर्पित किया था (जैसा अभिषेक से प्रगट होता है) वह ऐसी निन्दा के सामने खोल दिया जाए। तुम देखते हो कि दाऊद के उत्तराधिकारी, जिन्हें यह प्रतिज्ञा मिली थी कि उनका सिंहासन सदा बना रहेगा, और जो इसी बीच हमारे प्रभु यीशु मसीह के प्रतिरूप थे, उनके साथ ऐसा व्यवहार किया गया कि वे बेड़ियों में बाँधकर बन्दी बनाए गए, अपराधियों की नाईं उन पर अभियोग लगाया गया, उनकी आँखें निकाल ली गईं, उनके बच्चों का गला उन्हीं के सामने काटा गया, वे गहरे अन्धकूप में डाले गए, कि वहाँ सड़ें या कीड़ों से खाए जाकर मर जाएँ; और जैसा तुम देखते हो, यह बहुत ही विचित्र बात है। परन्तु लोगों की हठीली प्रकृति के कारण परमेश्वर का दण्ड अनिवार्य रूप से इतनी दूर तक पहुँचना ही था, क्योंकि उसका कोई और उपाय न था। और परमेश्वर ने जितना अधिक उन्हें सहा और धीरज से उनकी बाट जोही उतना ही अधिक वे सब प्रकार की दुर्दशा की चरम सीमा तक पहुँचाए जाने के योग्य ठहरे, क्योंकि उन्होंने इतनी बड़ी भलाई को तुच्छ जाना, और उसके विरुद्ध इतने हठीले और कठोर मन के बने। अब इससे हम एक उत्तम चेतावनी ले सकते हैं, अर्थात् यह कि (जैसा कल बताया गया था) यद्यपि संसार की दृष्टि में हम किसी संकट में नहीं दिखाई देते, तो भी हमें परमेश्वर का अनुग्रह पाने का यत्न करना चाहिए; क्योंकि यदि वह हमारे पक्ष में न हो, और हम उसकी रक्षा में न हों, तो वे सब सहारे जो हम सृजी हुई वस्तुओं से पाने की आशा रखते हैं शापित हैं; क्योंकि वे हमें उलटा गिराने का काम करते हैं। इसलिए हम चौकस रहें कि हम राजकुमारों की महानता पर, या किसी और रक्षा पर भरोसा न रखें; क्योंकि हम देखते हैं कि वे उन लोगों को अन्धा करने के साधन मात्र हैं जो अन्यथा परमेश्वर की ओर फिरकर उससे क्षमा पा सकते थे; और अन्त में वह उन्हें पूरी रीति से गिरा देगा। इसलिए हम और अधिक समझदार बनें, और चाहे संसार की दृष्टि में हम कितने ही सुरक्षित दिखाई दें, फिर भी यह हमारे लिए सदा परमेश्वर के भय में चलने में बाधा न बने, यह जानते हुए कि जो अनुग्रह हम संसार में पा सकते हैं वह कुछ भी नहीं है; और यदि परमेश्वर उस पर फूँक मात्र दे, तो वह सब एक पल में उड़ जाता है। इस पाठ में हमें यही बात ध्यान में रखनी है।

अब स्पष्ट रूप से कहा गया है कि राजा और प्रजा दोनों पराए देवताओं की, वरन् पत्थर और काठ के देवताओं की, अर्थात् पुतलों और मूरतों की उपासना करेंगे। इसमें सन्देह नहीं कि परमेश्वर ने इन शब्दों से यह प्रगट करना चाहा कि यहूदियों पर कैसा भयंकर दण्ड आनेवाला था। क्योंकि यद्यपि वह भोजन जो परमेश्वर हमें देता है, और उसके पितृवत् प्रेम और भलाई के वे सब प्रमाण जो इस क्षणभंगुर जीवन से सम्बन्ध रखते हैं, अत्यन्त मूल्यवान समझे जाने चाहिए; तो भी सबसे विशेष लाभ जो हमें इस संसार में जीते हुए मिलता है वह यह है कि हमारे यहाँ धर्म सुव्यवस्थित हो, उसकी उपासना हमारे बीच शुद्ध रहे, हम उसे पुकार सकें, और हमें यह अधिकार हो कि उसे अपना परमेश्वर कह सकें, और हम अन्धविश्वास और मूर्तिपूजा से बहकाए और अशुद्ध न किए जाएँ। मैं कहता हूँ कि यही वह प्रधान उत्तम वस्तु है जिसकी विश्वासियों को लालसा करनी चाहिए; और यदि हम उसे सब प्रकार की धन-सम्पत्ति और सुख-विलास से, और अपने सब आराम और सुविधाओं से बढ़कर न मानें, तो हम निरे ठूँठ और पशु ही हैं। अब इसके विपरीत, वह विपत्ति जो हमारे लिए सबसे अधिक भयानक होनी चाहिए, और वह घोर विपदा जो हम पर पड़ सकती है, यह है कि हम परमेश्वर की उपासना से वंचित कर दिए जाएँ, और हमारा मुँह बन्द कर दिया जाए कि हम उसे पुकार न सकें; और केवल इतना ही नहीं, वरन् अत्याचार के द्वारा हमें मूरतों का आदर करने, और उनकी घृणित बातों से अपने को अशुद्ध करने, और उस वस्तु को बिगाड़ने के लिए विवश किया जाए जिसे परमेश्वर ने हमारे बीच अपने नाम की महिमा के लिए ठहराया है। जब बातें इस प्रकार उलट-पुलट हो जाएँ, तब हम समझ लें कि परमेश्वर हमारे पास से चला गया, और अपने आप को हमारा प्राणघातक शत्रु प्रगट करता है, और हमें पूरी रीति से त्याग और ठुकरा चुका है, और नहीं चाहता कि इसके बाद हमें अपनी उपस्थिति या अपने अनुग्रह का कोई चिह्न या आभास तक मिले। इसलिए जब मूसा इस पाठ में कहता है कि यहूदी पराए देवताओं की उपासना करेंगे, तब उसका अभिप्राय उन्हें पहले से भी अधिक भयानक रीति से डराना है। मानो वह कहता हो: जब तुम भूखे होगे और तुम्हारे पास खाने को रोटी और पीने को जल न होगा, जब तुम्हारे शत्रु तुम्हारी सारी सम्पत्ति लूट लेंगे और तुम्हारी सारी वस्तुओं को उजाड़ देंगे, जब तुम दुःख और शोक में घुलते जाओगे और तुम्हारी सहायता का कोई उपाय न होगा, तो निश्चय ये तुम्हारे लिए अत्यन्त कठिन बातें होंगी, विशेषकर जब तुम अपने शत्रुओं से कोई दया न पा सकोगे, जो तुम्हारे विरुद्ध जंगली पशुओं के समान होंगे; परन्तु फिर भी यह सब उस दूसरे शाप की तुलना में कुछ भी नहीं है, कि जहाँ तुम्हें जीवते परमेश्वर का आदर करना, और यह मान लेना चाहिए था कि उसने तुम्हें अपनी प्रजा होने के लिए चुना है (जो अपार आशीष है), वहाँ इन बातों के स्थान पर, मैं कहता हूँ, तुम मूरतों की उपासना करोगे, और अन्यजातियों के अन्धविश्वासों में उलझे रहोगे, और न तुम्हारी कोई प्रार्थना रहेगी, न भजन, न बलिदान, वरन् तुम तितर-बितर और उजड़े हुए होगे।

अब जब हम मूसा का स्वाभाविक अर्थ समझ गए, तो यह जान लें कि उन सब आशीषों में से जो हम इस वर्तमान जीवन में भोगते हैं, इसे सब से ऊपर रखना चाहिए; अर्थात् अपने परमेश्वर की उपासना करने की, अपने विश्वास को अंगीकार करने की, और यह प्रगट करने की स्वतंत्रता पाना कि हम उसकी प्रजा हैं, उसकी कलीसिया और उसके झुण्ड के हैं। सच है कि यह बात कम ही जानी जाती है; तो भी हमें इसकी चेतावनी व्यर्थ नहीं दी जाती। इसलिए जब परमेश्वर की यह इच्छा हुई है कि वह अपनी कलीसिया को हमारे बीच स्थापित करे, और हमारे पास उसका वचन और उसके संस्कार हों, जिनके द्वारा वह प्रगट करता है कि वह हमारे बीच वास करता है; तो हम ऐसी आशीष को वैसा ही ग्रहण करें जैसा वह योग्य है। यह हमारे दोहरे काम आएगी। पहले तो, जब प्रतिदिन हमें सुनाई जानेवाली शिक्षा से हमारा भला होता है, तब ऐसा धन केवल हमारी अपनी कृतघ्नता से ही नष्ट होता है; जैसा कि हम देखते हैं कि बहुत से लोग सोचते हैं कि उपदेशों में उपस्थित हो जाना ही बहुत है, और उन्हें लगता है कि परमेश्वर को उसका हक मिल गया, क्योंकि उन्होंने कोई रीति पूरी कर ली है। परन्तु इसी बीच जीवन का बीज बिना कोई फल लाए नष्ट हो जाता है। इसलिए जिससे हम उस आशीष को जो परमेश्वर हम पर देता है इस उपयोग में लगाएँ: जब हमें उसकी शिक्षा सुनने और उसमें प्रशिक्षित होने की स्वतंत्रता है, और अपने विश्वास को दृढ़ करने के लिए संस्कार हमारे पास हैं, और हम यह प्रगट कर सकते हैं कि जिसकी हम उपासना करते हैं वह जीवता परमेश्वर है और वही हम पर शासन करता है: तो, मैं कहता हूँ, यही बात हमारे लिए लाभदायक हो; और वह होगी, यदि हम यह मानें कि हमारा प्रभु हमें इससे बड़ी कोई आशीष नहीं दे सकता। और इसी बीच यदि और वस्तुओं की हमें घटी हो तो हम धीरज से सह लेंगे: जैसे जहाँ बहुतों को अपनी सुख-सुविधाओं की घटी है, वे इस संसार के उन सन्तानों से जो सुख-विलास भोगते और अपने सांसारिक आनन्दों में लोट-पोट होकर आनन्द मनाते हैं, कुढ़ें नहीं; यदि परमेश्वर की सन्तानों के पास वह नहीं है, तो वे जान लें कि वे ऐसी वस्तु का आनन्द ले रहे हैं जो दुगुना, वरन् सौ गुना बदला देती है: अर्थात् यह कि वे परमेश्वर की उपासना कर सकते हैं। क्योंकि इससे क्या लाभ कि ये अभागे लोग जो पोप-मत में रहते हैं अपने घोंसलों में ऊँघते रहें, और इसी बीच परमेश्वर के राज्य से निकाले जाएँ, और स्वयं यीशु मसीह और उसका वचन उस देश से निकाला जाए जिसमें वे रहते हैं? इससे क्या लाभ कि उनके घरों में उनकी सेवा की जाती है, और इसी बीच उन्हें परमेश्वर की सेवा करने नहीं दिया जाता? इससे क्या लाभ कि उनके पास खाने-पीने को इतना है कि वे अघा जाएँ, और इसी बीच आत्मिक भोजन के अभाव से भूखों मरें? इससे क्या लाभ कि वे मान और प्रतिष्ठा में हों, और इसी बीच उन विश्वासघात के कामों से अपने को अशुद्ध करने के लिए विवश किए जाएँ जिनसे परमेश्वर तुच्छ जाना जाता है, और उसका आदर छीनकर मूरतों को दे दिया जाता है, और वे उसके दोषी ठहरते हैं? हाय! क्या यह शापित दशा नहीं है? इसलिए हम धीरज से सहें, चाहे संसार की दृष्टि में हम तुच्छ गिने जाएँ, और छोटे और निकम्मे समझे जाएँ, और हमें न चैन मिले, न वह जो हमारा शरीर चाहता है: क्योंकि परमेश्वर हमें यह विशेष स्वतंत्रता देता है कि हम शुद्ध रीति से उसकी आराधना और सेवा कर सकें, और मूरतों की इस शापित दासता से छुड़ाए जाएँ; हम सन्तुष्ट रहें, और इस वरदान को वैसा ही मूल्यवान जानें जैसा वह योग्य है, कि हम उन पर कुढ़ें नहीं जो इस संसार की वस्तुओं का आनन्द ले रहे हैं, और इसी बीच परमेश्वर के उस अनुग्रह से वंचित हैं जो हमारे बीच बना है।

इसके अतिरिक्त, यहाँ यह चेतावनी भी है कि जब परमेश्वर ने हमें इस स्वतंत्रता का अधिकार और भोग दिया है, तो हमें भली-भाँति चौकस रहना चाहिए कि हम अपनी ही दुष्टता के कारण इससे वंचित न किए जाएँ: क्योंकि यहूदियों को जो यह धमकी दी गई थी, वह हमारे लिए भी है। इसलिए हम समझ लें कि जब हमें सुसमाचार सुनाया जाता है, यदि वह हम पर प्रभाव न डाले, तो जब हम उसकी आज्ञा मानने से इनकार कर चुके होंगे तब परमेश्वर को हमें दूसरे शिक्षकों के हाथ में सौंपना ही पड़ेगा। और सचमुच हमें यह न सोचना चाहिए कि पोप-मत में जो भयंकर गड़बड़ी है वह किसी और कारण से आई है, सिवाय इसके कि जिन्हें सुसमाचार की शुद्ध शिक्षा सिखाई गई थी वे परमेश्वर के विरुद्ध बलवा करनेवाले निकले, और उन्होंने उसका जूआ उठाने के लिए अपनी गर्दनें नहीं झुकाईं; और इसलिए परमेश्वर इसके सिवा और कुछ कर ही न सकता था कि उन्हें ऐसे अत्याचार के हाथ सौंप दे जैसा हम देखते हैं। और सचमुच संत पौलुस ने उन्हें यह बात पहले ही बता दी थी: "यह उचित ही है (वह कहता है) कि संसार, जब वह सत्य की प्रतीति नहीं करता, झूठ को माने: और जो जीवते परमेश्वर के अधीन होना नहीं चाहते वे सृजी हुई वस्तु के, अर्थात् उन मूरतों के आज्ञाकारी हों जो कुछ भी नहीं हैं।" इसलिए जब हम अपनी आँखों के सामने ये उदाहरण देखते हैं, और यहाँ धमकी को अब भी सुनते हैं: तो आओ हम सीखें कि जब तक परमेश्वर हमें अपनी पाठशाला में रखता है, तब तक उसके भय और श्रद्धा में ऐसे चलें कि जो कल्याण हम अब भोग रहे हैं उससे हम वंचित न किए जाएँ; वरन् परमेश्वर उसे और बढ़ाए और उसे फलवन्त करे। इसके अतिरिक्त, हम यह भी ध्यान रखें कि जो मूरतों की उपासना करते हैं, वे इस कारण निर्दोष न ठहरेंगे, चाहे वह परमेश्वर की ओर से दण्ड ही क्यों न हो। हम जानते हैं कि एक पाप का दण्ड दूसरे पाप के द्वारा दिया जाता है, जैसा पवित्रशास्त्र के अनेक पाठों में कहा गया है: और जैसा रोमियों की पत्री के पहले अध्याय में विशेष रूप से प्रमाणित होता है, "कि जिन्होंने अपने आप को पूरी रीति से शुद्ध जीवन में लगाकर परमेश्वर की सेवा नहीं की, वे छोड़ दिए जाएँगे और सब प्रकार की लज्जाजनक अभिलाषाओं के हवाले कर दिए जाएँगे, और भले-बुरे में भेद करने की समझ उनमें पशुओं से अधिक न रहेगी, वरन् वे सब प्रकार की अपकीर्ति में जा पड़ेंगे।" इससे संत पौलुस बहुत भली-भाँति प्रगट करता है कि जब परमेश्वर हमें अपनी अधर्मता की गहराई में डूबने के लिए छोड़ देता है, तो इसलिए कि हम उसके सामने और अधिक दोषी ठहरें। इसलिए जो मूरतों की उपासना करते हैं, चाहे वे इसके लिए विवश किए जाते हों, और आहें भरते हों और स्वतंत्र होना चाहते हों: तो भी वे परमेश्वर को अप्रसन्न करने से नहीं रुकते: और इसी से उन्हें और अच्छी रीति से समझना चाहिए कि उनके पाप कितने घिनौने हैं, क्योंकि उनके कारण उन्हें ऐसी ताड़ना मिलनी पड़ती है। कैसे? जहाँ मुझे अपने परमेश्वर की महिमा करनी चाहिए, वहाँ मुझे उसे अप्रसन्न करना पड़ता है; वह मुझे त्याग देने को विवश होता है, क्योंकि मैं उसकी सेवा के योग्य नहीं, और उसे मुझसे वह स्वतंत्रता और साधन छीनना पड़ता है कि मैं अपने आप को पूरी रीति से उसकी आज्ञाकारिता में समर्पित करूँ। इसलिए वे सब जो पोप-मत की बन्धुआई में हैं और अन्धविश्वासियों के बीच मिले हुए हैं, समझ लें कि परमेश्वर का दण्ड उन पर ठहरा हुआ है, और मूरतों की उपासना करने के कारण वे अधिक से अधिक दोषी ठहरेंगे। उनके लिए यह उत्तर देना कि हम यह अपनी इच्छा से नहीं करते, हम चाहते हैं कि परमेश्वर की यही इच्छा हो कि सच्चा और शुद्ध धर्म सब जगह फैले, एक निर्बल उत्तर है: क्योंकि इतने पर भी हमारा प्रभु उन्हें दण्ड से मुक्त नहीं करता। और वही योग्य न्यायी है। इसलिए हम उसके वचन पर टिके रहें: और बहाने न ढूँढ़ें, वरन् जो ऐसी दशा को सह रहे हैं वे समझ लें कि परमेश्वर की ओर फिरने का समय अब है, नहीं तो कभी नहीं, क्योंकि वे उसमें प्रायः डूब ही चुके हैं, और उनके विरुद्ध उसके क्रोध का यह चिह्न है कि वह उनसे दूर चला गया है; इसलिए वे इस पर विचार करें, और इससे हृदय तक छिद जाएँ: जैसा कि इस पाठ में परमेश्वर का अभिप्राय है, और जैसा हम पहले छू चुके हैं।

अब मूसा कहता है कि यह प्रजा उन जातियों के बीच, जिनमें वह तितर-बितर की जाएगी, विस्मय का कारण, और उदाहरण, और कहावत, और उपहास का पात्र ठहरेगी। यहाँ हमारा प्रभु दिखाता है कि जैसे इस्राएल की प्रजा में उसकी भलाई पहचानी जानी थी, और हर एक मनुष्य को इब्राहीम के वंश में आनन्द करना था, वैसे ही यही प्रजा घृणित और तिरस्कृत ठहरेगी। प्रतिज्ञा यह थी: "तेरे वंश के द्वारा सारी जातियाँ आशीष पाएँगी।" सच तो यह है कि हमें अपने प्रभु यीशु मसीह के पास आना होगा, जो इब्राहीम के वंश की सच्ची कड़ी है; नहीं तो इस आशीष का कोई स्थान नहीं, न कोई आधार जिस पर यह खड़ी रहे। तो भी जो इब्राहीम की सन्तान में से उत्पन्न हुए, वे परमेश्वर की ओर से आशीष पाते, ताकि वे एक ऐसा उदाहरण होते कि अनुग्रह चाहनेवाला हर एक यह कह सकता: हे परमेश्वर, मुझ पर दया कर, जैसे तूने इब्राहीम की सन्तान पर की है, जिन्हें तूने चुना और गोद लिया है। प्रतिज्ञा ऐसी थी। अब उसके विरुद्ध जो धमकी दी गई वह यह है, कि जब परमेश्वर उस प्रजा पर जिसे उसने चुना था इतनी कठोरता से प्रहार करे, तो लोग चकित हों और अपने मन में यह सोचें: क्या यह सम्भव है कि जिन्हें परमेश्वर ने चुना था वे अब त्यागे जाएँ, और सताए जाएँ और सब प्रकार की निन्दा के साथ पाँवों तले रौंदे जाएँ? और इस पर लोग कहें: हे परमेश्वर, मुझे बचा कि मैं इस प्रजा की सी दशा में न पड़ूँ; अथवा जब वे शाप देना चाहें तो यह कहें: परमेश्वर तुझसे वैसा ही करे जैसा उसने इन नीच यहूदियों से किया है। इस स्थान के विषय में इतना ही समझना चाहिए।

अब हम ध्यान दें कि जब पवित्र आत्मा ने मूसा के मुख से इस प्रकार कहा, तो उसका अभिप्राय यह नहीं था कि यह शिक्षा केवल दो हज़ार वर्ष या उसके लगभग के लिए काम आए, जितने समय तक व्यवस्था हमारे प्रभु यीशु मसीह के आगमन तक रही: वरन् यह कि हम आज के दिन इसे अपने ही उपयोग में लाएँ: कि जब परमेश्वर हमारे निकट आ गया है, तो हमें शैतान के होते हुए भी उसके भय में चलना चाहिए, ताकि उसकी भलाई हम में चमके, और यह दिखाई दे कि वह हम पर बनी हुई है: और इसके विपरीत जब हम कृतघ्न हों, और हमारा परमेश्वर मानो हम से ठट्ठों में उड़ाया जाए, तब हमें यह सोचना चाहिए: हम भले ही पीछे हट जाएँ, परन्तु अपने सब उपायों से हमें कुछ हाथ न लगेगा: क्योंकि अन्त में हमें लज्जित होना ही पड़ेगा। सचमुच हम देखते हैं कि कहा गया है कि परमेश्वर का नाम अविश्वासियों के बीच निन्दित होगा, क्योंकि जो पहले विश्वासी गिने जाते थे वे ऐसे गिरा दिए जाते हैं कि ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर ने अपनी प्रतिज्ञा झूठी कर दी और उन्हें धोखा दिया; परमेश्वर का दण्ड यहाँ तक पहुँचना ही था। अब जब ऐसा है, तो आओ हम अपने प्रभु के अधीन होना सीखें जब वह हमें कोमलता से अपनी ओर खींचता है, और अपनी आज्ञाकारिता में हमें ऐसा थामे रखें कि हम सब दुष्टों के लिए कहावत और उपहास का पात्र न बनें, जो परमेश्वर की निन्दा करने और हमारा ठट्ठा करने के सिवा और कुछ नहीं चाहते। मैं कहता हूँ, हम इस पर भली-भाँति ध्यान दें।

फिर जहाँ मूसा कहता है कि परमेश्वर अपनी प्रजा को इस प्रकार तितर-बितर करेगा: वह भी इसी बात की पुष्टि करता है, ताकि यहूदी यह न समझें कि वे किसी आँधी से, मानो संयोग से उड़ाए गए; वरन् यह जानें कि उन पर परमेश्वर का हाथ है: और क्योंकि इस धमकी का उन पर कोई प्रभाव न पड़ा, इसलिए जो कुछ उन पर बीता है वह हमारे काम आना चाहिए। क्योंकि जिस दण्ड की चर्चा हम यहाँ परमेश्वर के मुख से सुनते हैं, उसी को हम अपनी आँखों के सामने पूरा होते देखते हैं। क्या यह भयानक बात नहीं कि आज सारे संसार में यहूदी घृणित ठहरे हैं? तो भी वे वही प्रजा थे जिन्हें परमेश्वर ने अपने लिए पवित्र ठहराया था, वे उसका निज भाग थे, वे राजकीय याजकों का समाज थे, जैसा निर्गमन में उन्हें कहा गया है, और वे धन्य वंश थे, फिर भी इतने पर वे सब मनुष्यों से त्यागे गए हैं, यहाँ तक कि लोग उन्हें देखकर मानो काँप उठते हैं, जैसे वे मनुष्य जाति से काट डाले जाने के योग्य हों। यदि कोई कहे, हाँ, यह तो विश्वासियों के साथ भी बहुत हो सकता है, और पवित्र कुलपतियों पर भी ऐसा ही बीता; सचमुच बीता, परन्तु दूसरी रीति से। क्योंकि विश्वासी भले ही डराए जाएँ, जैसा यशायाह भविष्यद्वक्ता में कहा गया है कि लोग उन पर उँगली उठाएँगे और उनसे दूर भागेंगे: और यह इसलिए कि परमेश्वर को जाना नहीं जाता, और उसके अनुग्रह को तुच्छ जाना जाता है। परन्तु जब हम आज के यहूदियों की बात करते हैं, तो भली-भाँति दिखाई देता है कि परमेश्वर उनके विरुद्ध है: क्योंकि वे सड़े हुए अंगों के समान हैं, और उनका शरीर टुकड़े-टुकड़े किया गया है, और उस आशीष का जो परमेश्वर ने उन्हें दी थी कोई चिह्न तक नहीं बचा। इसलिए जब हम ऐसा दर्पण देखें, तब उससे अपना लाभ उठाना सीखें, और उनका उदाहरण इस शिक्षा पर मुहर लगाने और इसे पक्का करने के काम आए, कि हम परमेश्वर की परीक्षा न करें, और तब तक कठोर मन के बने न रहें जब तक उसे हमें संसार की और सब जातियों के साथ निन्दा में लपेटना न पड़े। इसके बाद मूसा उस बात की ओर लौटता है जिसे उसने पहले छुआ था: अर्थात् यह कि प्रजा अपनी भूमि और अपनी सम्पत्ति को जोतने के बाद भी अपने अंगूरों का दाखमधु न पीएगी, न अपनी फसल का अन्न खाएगी, न अपने वृक्षों के फल भोगेगी। यह पहले कहा जा चुका है: परन्तु यहाँ एक विशेष अन्तर ध्यान देने योग्य है। क्योंकि पहले परमेश्वर ने दिखाया था कि जब यहूदी अन्न और दाखमधु के लिए परिश्रम कर चुके होंगे, तब शत्रु आकर सब कुछ ले जाएँगे, और वह सब लूट का माल बन जाएगा: परन्तु अब वह कहता है कि किसी मनुष्य के बल के बिना, और युद्ध के किसी उपद्रव के बिना भी, वे भूखे रहेंगे और उन सब वस्तुओं से वंचित होंगे जिनसे उनका भला हो सकता। क्यों? क्योंकि कीड़े, पशु, इल्लियाँ, टिड्डियाँ और अन्य सब वस्तुएँ भूमि की उपज को खा जाएँगी। देखो, परमेश्वर अभागों के विरुद्ध कैसी-कैसी सेनाएँ उठाता है। फिर दूसरी ओर, झुलसाने और जलानेवाली आँधी आएगी, जिससे सब कुछ नष्ट होकर ही रहेगा: चाहे मनुष्य यहूदियों को छुएँ भी नहीं, उन्हें चैन से रहने दें, तो भी वे जान लेंगे कि परमेश्वर के पास उन्हें दण्ड देने के और उपाय हैं, और वह सदा अनगिनत रीतियों से सशस्त्र है। परमेश्वर यही प्रगट करना चाहता था। इसलिए हम इस पाठ से चेतावनी लें, कि जब हम एक विपत्ति से बच निकलें, तब परमेश्वर हमारे लिए कोई दूसरी निकाल लेगा: और यदि हम बाईं ओर हट जाएँ, तो भी वह हमारे विरुद्ध सशस्त्र है, और हम तीन डग भी न चल पाएँगे कि वह हमारा मार्ग रोक लेगा। देखो, जब मनुष्य छिपने के स्थान ढूँढ़ते हैं तो उन्हें क्या हाथ लगता है; जैसा हम देखते हैं कि यशायाह भविष्यद्वक्ता उन पर कैसा ठट्ठा करता है जो समझते हैं कि अपनी चतुराई से वे परमेश्वर के हाथ से बच निकलेंगे। जी भरकर स्वप्न देखते रहो, स्वप्न देखते रहो (वह कहता है), तो भी शाप सदा तुम्हें आ पकड़ेगा। और इसी प्रकार, यद्यपि हमारे कोई शत्रु न हों जो हमें सताएँ, और हमारे विरुद्ध उठकर हमारी सम्पत्ति लूटें: तो भी हम जान लें कि परमेश्वर के पास और उपाय हैं, जिन्हें हम नहीं जानते, जिनसे वह उस वस्तु को हम से छीन सकता है जो उसने हमारे हाथ में दी है, और यह सोचकर हम चकित रह जाएँगे कि हमारे पास तृप्त होने को तो है, फिर भी रोटी हमारे मुँह से छीन ली जाएगी: और जब हम पीना चाहेंगे तब प्यासे रहेंगे। और यह कहाँ से होता है? इसी से कि हमारा प्रभु ही है जो भूमि में बोए हुए अन्न को बढ़ाता है: वही अंगूर देता है; वही हमारे भोजन के लिए सब वस्तुओं को फलवन्त करता है। इस पाठ से हमें सब से पहले यह शिक्षा मिलती है कि जब हम खेत जोतें, बोएँ और काटें, तब सदा परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह भूमि को आशीष दे, कि हम उसके अनुग्रह से पोषित हों; और हम इसे निश्चय जानें कि हमें खिलाना उसी का विशेष काम है, जैसे पिता अपने छोटे बच्चों को खिलाता है। इस विषय में इतना ही। क्योंकि इस पर मैं पहले विस्तार से कह चुका हूँ, इसलिए अब एक ही शब्द में इसे छू देना पर्याप्त है।

अब आगे हम ध्यान दें कि जब परमेश्वर यहाँ टिड्डियों, कीड़ों, इल्लियों और अन्य पशुओं की चर्चा करता है, और उनसे होनेवाले झुलसाने और जलाने की बात कहता है, तब वह दिखाता है कि जब वह मनुष्यों की भलाई करना नहीं चाहता तब उसके पास एक विचित्र ही प्रकार के योद्धा हैं: और यह भी मनुष्यों का अभिमान गिराने के काम आता है। क्योंकि यदि हम शत्रुओं से लूटे जाएँ: तो (लोग कहेंगे) बहुत अच्छा, यह तो बल और खुले बलात्कार से हुआ। जैसे जब युद्ध होता है, तब सारा देश लुट जाता है, सबसे धनी लोग भिखारी हो जाते हैं: और यह सब युद्ध के सिर मढ़ा जाता है, इसके लिए मनुष्य को दोष नहीं दिया जाता। परन्तु जब यह और दुर्घटनाओं से होता है, कि मनुष्य नहीं जानते कि उनकी सम्पत्ति किस उपाय से नष्ट हो रही है, चाहे वे उसे अपनी आँखों के सामने गलते हुए देखते हों, एक वर्ष ओलों से, दूसरे वर्ष पाले से, और कभी एक रीति से और कभी दूसरी रीति से, यहाँ तक कि उनके हाथों में सब वस्तुएँ घुल जाती हैं; तो इस रीति से परमेश्वर मनुष्यों पर और भी प्रगट कर देता है कि वह उन्हें पूरी रीति से मिटा देना चाहता है। और सचमुच यदि हम उस चाल पर ध्यान दें जो उसने मिस्रियों के साथ चली, तो हम इसे और भी अच्छी रीति से समझ पाएँगे। क्योंकि हम परमेश्वर के न्यायदण्डों को दूसरे मनुष्यों में अपने से अच्छा पहचानते हैं। यदि परमेश्वर ने मिस्रियों के विरुद्ध जूँओं और कीड़ों के स्थान पर कोई बड़ी सेना उठाई होती: तो वे अपने अभिमान और घमण्ड में बने रहते: और चाहे वे सौ बार पराजित होते, तो भी वे हठीले ही बने रहते। जब वे जूँओं से सताए गए, और मिस्र में ऐसे सिपाही थे; तब उन्हें लज्जित होना चाहिए था। इसलिए हम भली-भाँति ध्यान दें कि परमेश्वर ऐसी ताड़नाएँ भेजकर जैसी यहाँ बताई गई हैं मनुष्यों को चेताता है कि वे अपनी निर्बलता पर विचार करें। यदि हेरोदेस आकाश से बिजली गिरने से मारा जाता; तो यह उस निन्दा के लिए उतना उचित दण्ड न होता जो उसने इस बात को सहकर की कि वह देवता कहलाए, मनुष्य नहीं, जितना यह कि परमेश्वर ने उसे कीड़ों से खवाकर गलवा दिया, जब तक वह अत्यन्त सड़ न गया, यहाँ तक कि उस रोग के कारण उसे यह कहना पड़ा (जैसा उसके समय में जीनेवाला और उसका परिचित गवाही देता है:*) देखो, यह कैसा भला परमेश्वर है, जो ऐसा सड़ा हुआ है कि उसे यह अनुभव करना पड़ता है कि परमेश्वर का हाथ उसके अभिमान के कारण उसे सता रहा है। इसलिए हम भली-भाँति ध्यान दें कि परमेश्वर ने यहूदियों को धमकी देने के बाद कि वह उन पर शत्रु भेजेगा, जो बलपूर्वक और शस्त्रों के बल से देश को सब प्रकार के भोजन से लूट लेंगे: अब वह इसके अतिरिक्त यह भी कहता है कि यद्यपि मनुष्य के हाथ से उन्हें कोई कष्ट या सताव न हो, और उनकी सम्पत्ति और भूमि के विरुद्ध मनुष्य की ओर से कुछ भी प्रयत्न न किया जाए; तो भी वे अपने परिश्रम से, और अपनी भूमि को भली-भाँति जोतने से, कुछ लाभ न उठाएँगे। और क्यों? क्योंकि कीड़े सब कुछ उजाड़ देंगे। और वह फिर स्पष्ट कहता है, तू बहुत बोएगा और कुछ न बटोरेगा, जिससे वह दिखाता है कि जब मनुष्य पहले से कितनी ही अच्छी तैयारी कर ले, और निस्सन्देह यह समझे कि सब कुछ वैसा ही होगा जैसा वे चाहते हैं, तो भी उससे उनका कुछ भला न होगा। और यह इसलिए है कि जब हम अच्छी सम्भावनाएँ देखें तब हम सो न जाएँ, जैसा कि हम प्रायः परमेश्वर को तुच्छ जानने के आदी हैं: मानो कोई कहे कि यदि बीज बोने का समय अच्छा हो तो हम संकट से पार हैं, और परमेश्वर को पृथ्वी की वस्तुओं से और कुछ लेना-देना नहीं रहा; या यदि हमने फसल काटकर अन्न अपने खत्तों में रख लिया हो, तो इससे हम और भी घमण्डी हो जाएँ, क्योंकि हमें आगे किसी संकट की सम्भावना दिखाई नहीं देती। परन्तु इसके स्थान पर हमें सदा परमेश्वर की ओर दृष्टि रखनी चाहिए, और कहना चाहिए, हे प्रभु, देख, भूमि वर्षा की बाट ऐसे जोहती है मानो प्यासी हो, और जब तू उसे देता है तो वह इसलिए कि वह हमारे पोषण के लिए भोजन उपजाए। फिर, आकाश से ऐसी आँधियाँ भी आ सकती हैं जो हमारा सब कुछ बहा ले जाएँ, और एक ही युद्ध हमारे पास जो कुछ है उसे छीन लेने के लिए बहुत है। इस प्रकार, हे प्रभु, सब कुछ तेरे हाथ में है, और हमें तेरी दया पर निर्भर रहना है, और जीवन भर तेरी रखवाली में रहना है; नहीं तो हम नाश हो जाएँगे, और हमारे पास जितनी भी तैयारियाँ हैं उनसे हमें कुछ भी लाभ न होगा। इसलिए हमें परिश्रम से परमेश्वर को पुकारना और उसके भय में चलना चाहिए, क्योंकि वह इतना अनुग्रहकारी है कि हमारा पालक-पिता बनता है, और हमारे लिए इतना झुकना स्वीकार करता है। इसलिए मूसा ने इस पाठ में भली-भाँति प्रगट किया है कि हमें उन सुन्दर सम्भावनाओं और अच्छी तैयारियों से, जो हमारे पास हो सकती हैं, धोखा न खाना चाहिए। जैसे, जब हम देखें कि अन्न भूमि पर अच्छा खड़ा है, तब हमें इतना फूल न जाना चाहिए मानो सब कुछ जीत लिया हो, यहाँ तक कि तब भी नहीं जब अन्न बटोर लिया गया हो। क्योंकि तब भी परमेश्वर को पुकारा जाना चाहिए, जैसा हमारा कर्तव्य है कि प्रतिदिन उससे विनती करें, कि हे प्रभु, हमारी दिन भर की रोटी आज हमें दे, कि वह दिन-प्रतिदिन हमें खिलाए। क्योंकि चाहे आज हमारे पास कितना ही हो, तो भी कल हम भूखे मर सकते हैं। क्योंकि जब परमेश्वर को भाए, तब वह न केवल खेतों में अन्न और दाखमधु को नष्ट कर सकता है; वरन् जब वे हमारे अन्नभण्डारों और तहखानों में हों तब भी उन्हें निकम्मा कर सकता है। वरन् हम उसकी धमकियाँ सुनते हैं, जो वह कहता है, तुम अन्न को चक्की तक नाप-नापकर, और रोटी को तन्दूर तक तौल-तौलकर ले जाओगे, तो भी तुम खाली और भूखे ही रहोगे; जब तुम चाहे कितना ही खा लोगे, तो भी भोजन में कोई सामर्थ्य न रहेगी, और तुम उससे तृप्त न होगे। जब हमारा प्रभु हमें बताता है कि हमें भूखा रखने के उसके पास इतने उपाय हैं, तो हम कठोर मन के न बनें: वरन् यह हमें जगाए, कि हम पूरी रीति से उस पर निर्भर रहें, और उसके भय में चलें, और उसकी सन्तान बनें, यदि हम चाहते हैं कि वह हमारे प्रति पिता का काम करता रहे। जो बातें हमें स्मरण रखनी हैं उनका सार यही है। यहाँ मूसा फिर उन धमकियों को दोहराता है जिनकी चर्चा वह पहले कर चुका था, और कहता है: कि यहूदी और उनका वंश बन्धुआई में ले जाया जाएगा। निश्चय मनुष्यों पर इससे अधिक कड़वी बात और कोई नहीं आ सकती कि वे अपने बच्चों को बलपूर्वक छीने जाते, शत्रुओं से खाए और निगले जाते, और उनके साथ क्रूरता का व्यवहार होते देखें: वे इससे तो उन्हें सौ बार गाड़ देना अच्छा समझते। अब हम थोड़े ही शब्दों में यह ध्यान रखें कि परमेश्वर इस पाठ में यह प्रगट करना चाहता था कि यद्यपि वह हम पर कितना ही उदार रहा हो, और अपनी आशीषों से हमें भर दिया हो, ऐसा कि हम चारों ओर से घिरे और सुरक्षित हों: तो भी वह उन सब को हम से फिर छीन सकता है, और वह विपत्ति हमारे लिए उस से कहीं अधिक भारी होगी जो तब होती यदि हम कभी जानते ही नहीं कि उसकी भलाई का क्या अर्थ है। इसलिए परमेश्वर जितनी अधिक उदारता से हम पर अपनी आशीषें, वरन् वे आशीषें भी जो इस क्षणभंगुर जीवन से सम्बन्ध रखती हैं, उण्डेलता है, हम उतना ही अधिक अपने आप को उसका आदर और उसकी सेवा करने के लिए प्रेरित होने दें। क्योंकि वह अपनी ओर से हमारी भलाई करने से नहीं थकेगा, जब तक हम पीठ न फेरें और उसे छोड़ न दें। परन्तु क्योंकि वह हमें इतनी कोमलता से खींचता है, यदि हम उसके पास आने को तैयार हों; तो हम निश्चय जानें कि उसका हाथ सदा बढ़ा रहेगा कि जो वरदान और आशीषें हमने उससे पाई हैं उन्हें और बढ़ाए।

अन्त में वह उस विषय की ओर लौटता है जो हमने पहले देखा था। ये सब शाप तुझ पर आएँगे, वे तुझे आ पकड़ेंगे, और तू उनके द्वारा चारों ओर से पकड़ा और घेरा जाएगा, जब तक परमेश्वर तुझे पूरी रीति से नष्ट न कर दे: इसलिए कि तूने उसकी बात नहीं सुनी, कि उसकी विधियों और आज्ञाओं का पालन करे, जो उसने तुझे दी हैं। मैं तुम्हें पहले बता चुका हूँ कि मूसा ने यहूदियों को बार-बार दिखाया है कि उन पर कोई बुराई या विपत्ति परमेश्वर के हाथ के बिना नहीं आई। परन्तु हमें उसका कारण भी जानना चाहिए। यह सच है कि कभी-कभी परमेश्वर हम पर विपत्ति डालता है, और हम उसका कारण नहीं देख पाते: क्योंकि वह हमारे पापों के कारण नहीं करता, इसलिए नहीं कि वह नहीं कर सकता, वरन् इसलिए कि वह हम पर दया करता है। तो भी यह सदा ध्यान में रखना चाहिए कि जब हम पर कोई क्लेश आए, तब हम अपने पापों का विचार करें, और उनकी जाँच में लगें कि परमेश्वर के सामने अपने आप को दोषी ठहराएँ: वरन् हमें इतनी देर भी न करनी चाहिए: परन्तु संसार भर में जितनी विपत्तियाँ हम देखते हैं उन सब से अपना लाभ उठाएँ, यह जानते हुए कि परमेश्वर ऐसे उपायों से मनुष्यों के पापों को दण्ड देता है: और इस पर ऐसे पापों से अपने आप को रोकें। इसलिए जिस विषय की ओर मूसा अब लौटता है वह यह है, कि यह दिखा चुकने के बाद कि प्रभु ही है जो हम से सब प्रकार की आशीषें हटा लेता है, वही हमारी सम्पत्ति और भूमि की उपज को शापित करता है, वही कीड़े, आँधियाँ और तूफ़ान भेजकर सब कुछ नष्ट करता है: वही हमारे शत्रुओं को बल देता है: वह बताता है कि यह सब किस लिए होता है: अर्थात् इसलिए कि हमने उसके विरुद्ध बलवा किया, इसलिए कि हमने उसकी व्यवस्था को तुच्छ जाना। यही वह सच्चा कारण है कि दण्ड की ये विपत्तियाँ हमारा इस प्रकार पीछा करती हैं। अब आओ हम उस शिक्षा को स्मरण रखें जो ऊपर पर्याप्त रूप से बताई जा चुकी है: अर्थात् यह कि जब परमेश्वर हमें क्लेश दे, तब हम उत्तर देने या मुकद्दमा लड़ने से अपने मुँह बन्द रखें: क्योंकि उससे झगड़ा करके हमें कुछ हाथ न लगेगा। वरन् हमें अपने आप को दोषी ठहराना चाहिए, यह मानते हुए कि वह न्याय करता है। चाहे उसकी इच्छा हमारे धीरज को परखने और हमें चरम सीमा तक जाँचने की हो; तो भी हमें उसके सामने अपने आप को दोषी मानकर समर्पित करना चाहिए, और समझना चाहिए कि हमारे पाप इसी योग्य हैं कि उसके हाथ से हमारे साथ ऐसा कठोर व्यवहार हो। यही वह बात है जिससे वे सब निन्दाएँ, बड़बड़ाहटें और शिकायतें थम जानी चाहिए जो प्रतिदिन संसार में सुनाई देती हैं। जब कोई विपत्ति या और कोई क्लेश आता है, तो इसलिए कि हम उन पापों का विचार करें जो हमने किए हैं। यह एक बात ध्यान में रखो। और जहाँ उन आज्ञाओं और विधियों की चर्चा की गई है जो परमेश्वर ने ठहराई हैं, वह हम से विशेष और जान-बूझकर सम्बन्ध रखती है। क्योंकि यद्यपि पोप-मतवादियों के पास व्यवस्था है, तो भी वह उनमें गड़ी हुई है: यहूदियों की आँखों पर (जैसा संत पौलुस कहता है) परदा पड़ा है, इसलिए वे कुछ नहीं समझते। तुर्क अपनी ही अज्ञानता में चलते हैं, वैसे ही शेष सब अन्यजाति भी। अब हमारा प्रभु हमें प्रकाश देता है, और हमें मार्ग दिखाता है। इसलिए जब हम सिखाए जाने के अनुसार नहीं चलते, तो हम में और भी नीच बलवा है, और हम इस योग्य भी ठहरते हैं कि परमेश्वर हम पर और अधिक कठोरता करे, और दण्ड की वे विपत्तियाँ हम पर उण्डेले जो यहाँ बताई गई हैं। इसलिए यहाँ परमेश्वर की ठहराई हुई आज्ञाओं और विधियों के विषय में जो कहा गया है उससे हम अपना लाभ उठाएँ। और जब ऐसा है कि वह प्रतिदिन हम से बोलता है, और अपनी इच्छा हमें इतनी सरलता से बताता है: तो हम में से हर एक आज्ञाकारिता से उसके अधीन हो। और जहाँ मूसा आगे कहता है कि ये शाप हम पर आ पकड़ेंगे, और हम उनसे चारों ओर से घिर जाएँगे, जब तक वे हमें नष्ट न कर दें: यह हमारे लिए चेतावनी है कि हम परमेश्वर के विरुद्ध हठी न बनें: क्योंकि हम बहाने ढूँढ़ तो सकते हैं: परन्तु उनसे हमें कुछ हाथ न लगेगा, (जैसा पहले कहा जा चुका है) क्योंकि हमारे लिए अन्त सदा अभागा ही होगा। इसलिए हम उस शिकायत को स्मरण करें जो परमेश्वर अपने भविष्यद्वक्ता यशायाह के द्वारा करता है।* वह उस पाठ में कहता है (जैसा हमने कल सुना) कि जिन्होंने बलवा किया है उन सब पर सिर की चोटी से पाँव के तलवे तक परमेश्वर को कठोर प्रहार करना ही पड़ेगा। और अपने भविष्यद्वक्ता यशायाह के द्वारा इस प्रकार कहकर, वह कहता है: मैं और क्या करूँ? मैं अपनी सन्तान को ताड़ना देने से नहीं रुका: यहाँ तक कि सिर की चोटी से पाँव के तलवे तक मैंने उन्हें ऐसा मारा है कि कोई स्थान साबुत या भला-चंगा नहीं रहा, फिर भी वे कठोर मन के ही बने हैं। हाय, मैं क्या करूँ? मुझे उन्हें कुचलना और चकनाचूर कर देना पड़ेगा। इसलिए हम अपने परमेश्वर के विरुद्ध ऐसे हठीले और अड़ियल बने रहने से डरें, और यहाँ सुनाए गए दण्ड-निर्णय को पहले से ही टाल दें। और जैसे ही परमेश्वर हमें ताड़ना देने लगे, हम उसकी ओर लौटने के लिए तत्पर हो जाएँ, वरन् हम इतनी देर भी न करें, परन्तु उसके वचन से चेताए जाकर अपने पापों पर विलाप करने और उनके लिए शोकित होने लगें, और इसके अतिरिक्त अपने प्रभु यीशु मसीह के नाम से उनकी क्षमा माँगें।

अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने पापों को मानते हुए गिर पड़ें: उससे विनती करें कि वह हमें इस मरणहार जीवन में ऐसा अन्धा न होने दे कि हम यह न जानें कि जितने कष्ट और दुर्दशाएँ हम भोगते हैं, वे सब हमें दी गई चेतावनियाँ हैं, कि हम अपने आप पर और अपने जीवन पर विचार करें: और हमें मन फिराने के लिए भी उभारें। और इसलिए यदि हम उसके हाथ से ताड़ना पाएँ, तो वह हमें उसके पवित्र नाम की निन्दा करने, या अधीर होने के लिए प्रेरित न करे: वरन् हमें वश में लाए, ताकि हम उसकी सब ताड़नाओं से लाभ उठाएँ, और उसकी ओर फिर लौट आएँ। और जब हम देखते हैं कि आज का अभागा संसार ऐसी दुर्दशा और कष्टों से, जो भयानक हैं, भरा है, और उन पापों के कारण जो उसमें राज्य करते हैं परमेश्वर का क्रोध भी देखते हैं: तो यह हमें भय में रखने का साधन हो, और हम परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह हम पर ऐसी कठोरता न करे: वरन् हम उसकी दया की शरण में अपने प्रभु यीशु मसीह के नाम से भागकर सच्चे पश्चाताप से छुए जाएँ: और उसमें अधिक से अधिक बढ़ें और फलवन्त हों, जब तक कि अपनी सब अपूर्णताओं और पापों से छुड़ाए जाकर हम अपने परमेश्वर से उसकी उस धार्मिकता का वस्त्र न पहन लें जिसके लिए हम प्रतिदिन बुलाए जाते हैं। कि वह यह अनुग्रह न केवल हमें, वरन् पृथ्वी के सब लोगों और जातियों को भी देने की कृपा करे, इत्यादि।

बुधवार, 25 मार्च, 1556 को।

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