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प्रथम अध्याय पर आठवाँ उपदेश - इफिसियों 1:19-23
यीशु मसीह ने व्यर्थ ही यह नहीं किया, वरन् उसके ऐसा करने का उद्देश्य यह था कि हम में से हर एक अपने विश्वास के परिमाण के अनुसार अभी से उन भलाइयों का अधिकारी हो जाए जो विशेष रूप से उसकी हैं, जब तक कि वह हमें पूरी तरह भर न दे; और यह तब होगा जब वह हमें पूरी रीति से अपने साथ जोड़ लेगा।
परन्तु अब आओ, हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने पापों को मानते हुए दण्डवत् करें, और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उनका ऐसा बोध कराए कि हम उनसे दूर हो जाएँ, और अपने जीवन को उसकी आज्ञाओं के अनुसार आज्ञाकारिता में चलाएँ, ताकि हम अपने कामों से दिखा सकें कि उसने हमें इतने बड़े मोल से व्यर्थ नहीं मोल लिया, वरन् हम अपनी सब शारीरिक अभिलाषाओं को त्याग दें और अपने आप को पूरी रीति से उसकी सेवा में सौंप दें जिसने एक बार हमें अपनी मीरास के लिये ग्रहण कर लिया है। इसलिये आओ, हम सब कहें: हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, हमारे स्वर्गीय पिता। आमीन।
प्रथम अध्याय पर आठवाँ उपदेश।
19. और यह भी जानो कि हम विश्वास करनेवालों के लिये उसकी सामर्थ्य की अत्यन्त महान् महानता क्या है, उसकी शक्ति के प्रभाव के कार्य के अनुसार, 20. जो उसने मसीह में प्रकट किया, जब उसने उसे मरे हुओं में से जिलाया, और स्वर्गीय स्थानों में अपनी दाहिनी ओर बैठाया, 21. सब प्रकार की प्रधानता, और अधिकार, और सामर्थ्य, और प्रभुता के, और हर एक नाम के ऊपर जो न केवल इस लोक में, वरन् आनेवाले लोक में भी लिया जाता है।
22. और सब कुछ उसके पाँवों तले कर दिया, और उसे सब वस्तुओं पर कलीसिया का सिर नियुक्त किया,
23. जो उसकी देह है, और उसी की परिपूर्णता है जो सब में सब कुछ पूर्ण करता है।
मैंने आज सवेरे आप से कहना आरम्भ किया था कि परमेश्वर ने हम पर भली-भाँति प्रकट कर दिया है कि यदि हमारे पास उसका एकमात्र पुत्र यीशु मसीह है, तो हमारे पास सब भली वस्तुओं की पूर्ण सिद्धता है, ताकि यदि हम उस पर दृष्टि डालें, तो हम वह सब देख सकते हैं जिसकी कामना की जा सकती है। इसलिये, यद्यपि हम में बहुत सी बातें निन्दनीय हैं, और अपने भीतर हमें दुर्बलता के सिवाय कुछ नहीं मिलता, तौभी हमारे पास झुकने के लिये एक निश्चित और ठोस आधार होगा, क्योंकि हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें अपने पास बुलाता है और हमें बताता है कि जो कुछ उसने अपने पिता परमेश्वर से पाया है, वह हमारे साथ साझा है। और यद्यपि हम अभी उनका पूरा आनन्द नहीं ले रहे, तौभी हम उनसे निराश नहीं हो सकते।
संक्षेप में, मैंने आप से यह भी कहा था कि हमारा प्रभु यीशु मसीह अपने पिता परमेश्वर की दाहिनी ओर इसलिये बैठाया गया है कि हमें निश्चय हो कि सब कुछ उसके हाथ के नीचे है, कि वह सारे जगत पर शासन करता है, कि सब भली वस्तुएँ उसी की ओर से हैं, और कि वह सब प्रकार की बाधाओं को विफल करने में समर्थ है। यहाँ तक कि यदि हम उसकी सुरक्षा में हैं, तो हम शैतान और अपने सब शत्रुओं को ललकार सकते हैं।
और अब, ताकि हम केवल यीशु मसीह में अधिक सन्तुष्ट रहना सीखें, और यहाँ-वहाँ भटकते न फिरें जैसा कि हमारी आदत है, सन्त पौलुस स्पष्ट रूप से जोड़ता है कि वह सब प्रधानता, प्रभुता, अधिकार और सामर्थ्य के ऊपर बैठाया गया। निःसन्देह उसका आशय स्वर्गदूतों से है; तौभी उसने यह कहने का ढंग इसलिये अपनाया कि हम और भी दृढ़ता से हमारे प्रभु यीशु मसीह से लगे रहें, ताकि कोई कल्पना हमें उससे फेर न दे। मानो वह कहता है कि यद्यपि परमेश्वर ने अपनी महिमा, प्रतिष्ठा और सामर्थ्य का कुछ अंश स्वर्गदूतों को भी दिया है, तौभी जो कुछ उसने यीशु मसीह को दिया है, उसमें इससे किसी प्रकार की कमी नहीं आती।
इसलिये, हम उसी में वह सब पाएँगे जो आवश्यक है, अतः हमें
उसे यहाँ-वहाँ ढूँढ़ने की आवश्यकता नहीं, और न ही उसके साथ किसी और को सहभागी ठहराना उचित है। सब श्रेष्ठता, और जो कुछ भी सबसे उत्तम और उत्कृष्ट सोचा या गढ़ा जा सकता है, वह वहीं है—हमारे
प्रभु यीशु मसीह में। केवल उसी की खोज करनी चाहिए, जैसा कि पौलुस स्वयं भी कुलुस्सियों के पहले अध्याय में कहता है।
क्योंकि ऐसा नहीं कि संसार ने हाल ही में हमारे प्रभु यीशु मसीह से मुड़ जाने का अवसर ढूँढ़ा हो, स्वर्ग के स्वर्गदूतों की शरण लेने के बहाने। हम देखते हैं कि परमेश्वर की रचनाएँ सदा किसी न किसी अन्धविश्वास की ओर खिंच जाती हैं, और मनुष्य उनकी मूर्तियाँ बना लेते हैं, क्योंकि परमेश्वर अपनी सर्वसत्ता स्वर्गदूतों के द्वारा चलाता है, और वे मानो उसके हाथ, उसके कर्मचारी और उसके साधन हैं। इसी कारण मनुष्य समझते हैं कि उन्होंने बड़ा काम किया है यदि उन्होंने अपने आप को सन्त
मीकाईल, या सन्त गब्रिएल, या न जाने किस और के हाथ सौंप दिया। क्योंकि, जैसा कि मैंने कहा, यह कोई नई गढ़ी हुई बुराई नहीं है। शैतान, जो झूठ का पिता और जन्मदाता है, सब समयों में मनुष्यों को ऐसी कल्पनाओं में उलझाए रहा है, और मसीही लोगों ने भी इस विषय में अन्यजातियों के कामों का अनुकरण किया है। क्योंकि अन्यजाति सदा स्वर्गदूतों को अर्ध-देवता समझते रहे, और उन्हें अपना मध्यस्थ बनाना चाहते रहे जिनके द्वारा वे परमेश्वर तक पहुँचें, क्योंकि वे अपने आप में योग्य नहीं थे। और आज के दिन पोप के अनुयायी भी इसी रीति से बोलते हैं।
अब, ठीक उन्हीं घृणित बातों की नींव पृथ्वी पर सन्त पौलुस के समय में भी पड़ने लगी थी। और इसी कारण वह दिखाता है कि यीशु मसीह के बराबर किसी को ठहराना उचित नहीं। चाहे स्वर्गदूतों की बड़ाई की जाए, और उन्हें गुण, सामर्थ्य, प्रभुता और अधिकार कहा जाए, और मनुष्य उन्हें जो और पदवियाँ चाहें दे दें, तौभी उन्हें सिर के सामने झुकना और उससे छोटा होना होगा, और सर्वोच्च प्रतिष्ठा परमेश्वर के पुत्र के लिये सुरक्षित रखनी होगी, क्योंकि हर एक घुटना उसके सामने झुकेगा, न केवल सांसारिक प्राणियों का, वरन् स्वर्गीय प्राणियों का भी।
तब हम देखते हैं कि सन्त पौलुस ने स्वर्गदूतों को प्रकट करने के लिये यहाँ इतने शब्द एक साथ जो रखे हैं, उसका कारण यह है कि हम
हमारे प्रभु यीशु मसीह से और अच्छी रीति से लगे रहें, और पूरी तरह उसी पर टिके रहें, यहाँ-वहाँ भटके बिना, इस बहाने से कि स्वर्गदूतों के पास उत्कृष्ट और श्रेष्ठ वरदान हैं। और इस प्रकार हम इस विचार-धारा से देखते और निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि पोप-तन्त्र की सारी मूर्खता, जो परमेश्वर के सामने संरक्षकों, पक्षधरों और मध्यस्थों की कल्पना करती है, उसका एक-एक अंश किसी और कारण से नहीं, केवल हमारे प्रभु यीशु
मसीह, और उन बातों के विषय में जो परमेश्वर पिता ने उसे सौंपी हैं। क्योंकि जब तक हम यह न जानें कि वह किस उद्देश्य से आया है, तब तक हम उस पर भरोसा रखने का मन नहीं रखते। परन्तु पोप के अनुयायियों ने एक ओर तो अपने आप को हमारे प्रभु यीशु मसीह से अलग कल्पित कर लिया, यह न जानते हुए कि वह हमारा भाई बन गया है, ताकि हम निःसंकोच उसके पास जाएँ। दूसरी ओर, उन्होंने पवित्रशास्त्र में उसे सौंपे गए उसके पद को उससे छीन लिया, और उसे केवल एक निर्जीव वस्तु बना दिया।
इसलिए हमें इन वचनों को और भी अच्छी रीति से ध्यान में रखना चाहिए: कि हम सब एक किए गए हैं, और स्वर्ग के स्वर्गदूतों के साथ, और व्यवस्था के अधीन जीनेवाले पवित्र पूर्वजों के साथ एक ही देह में इकट्ठे किए गए हैं, और कि हम तथा सब भविष्यद्वक्ता, प्रेरित और शहीद, एक मन होकर अपने साझे सिर की महिमा करें,
यीशु मसीह की, और उसी की शरण लें। उसे ऊँचे पर स्थापित करना है कि हर मनुष्य उसे देखे, और हमें जानबूझकर अपनी आँखों पर पट्टी नहीं बाँधनी चाहिए, वरन् हर बाधा को दूर करना चाहिए, ताकि उसकी महिमा किसी रीति से धुँधली न हो। इसलिए शैतान यीशु मसीह के पास आने से हमें रोकने के लिए हमारे मार्ग में जो भी बाधाएँ डालेगा, उन सब पर जय पाने का सही उपाय यह विचार करना है कि समस्त जगत में, न ऊपर न नीचे, कोई भी पद या प्रतिष्ठा ऐसी नहीं जो उसके सामने झुकाई न गई हो, ताकि हम सब एक मन होकर उससे जुड़ें। इस प्रकार तुम देखते हो कि इस वचन से हमें वास्तव में क्या सीखना है।
यह सच है कि इन वचनों से हमें यह भी समझ आता है कि परमेश्वर अपने स्वर्गदूतों में अपनी इच्छा के अनुसार पद बाँटता है, जिससे किसी को
दूसरे से बड़ा कार्यभार मिला है। फिर भी यह हमारे सामर्थ्य में नहीं कि हम जानें कि उनके विषय में बात कैसी है। हम अपने विश्वास के परिमाण के अनुसार जितना जान सकें उतने से सन्तुष्ट रहें, और केवल परमेश्वर के वचन पर कान लगाएँ, और पूरी गम्भीरता से उसी से सीखें, अपनी मूर्खतापूर्ण जिज्ञासा को खुली छूट न दें, जैसा बहुत से लोग करते हैं, जिन्हें हम स्वर्गदूतों के विषय में बारीकी से बहस करते देखते हैं, मानो उनमें से हर एक परमेश्वर के घर का मार्शल हो, जो हर स्वर्गदूत को उसके पद के अनुसार बैठाएगा। क्योंकि परमेश्वर के भेदों के विषय में इस प्रकार बकवाद करने से बढ़कर शैतानी ढिठाई और कुछ नहीं, उससे आगे जितना परमेश्वर ने अपने वचन के द्वारा हमें उनका भागी बनाया है। इसलिए हम इसी में सन्तुष्ट रहें कि स्वर्गदूत
(चाहे वे कितने ही उच्च क्यों न हों) यीशु मसीह के द्वारा हमारे कल्याण के सेवक ठहराए गए हैं। और जब कभी हम उनसे परिचय (अर्थात् उनकी सहायता) चाहें, तो हम वैसा न करें जैसा पोप के अनुयायी करते हैं, जो उनके लिए अलग प्रार्थनाएँ करते हैं।
हम यीशु मसीह की शरण में जाएँ, क्योंकि इसी रीति से उनके और हमारे बीच सब कुछ साझा हो जाएगा। जब हम कलीसिया के विषय में बोलते हुए कहते हैं, 'मैं पवित्र लोगों की सहभागिता पर विश्वास करता हूँ,' तो निश्चय ही स्वर्गदूत उसमें सम्मिलित हैं, क्योंकि परमेश्वर उन्हें हमारी सेवा में लगाता है। और वह ऐसा क्यों करता है? इसलिए नहीं कि हम इसके योग्य हैं, वरन् इसलिए कि उसने हम सब को यीशु मसीह के अधीन इकट्ठा किया है।
इसलिए यही हमारे और स्वर्गदूतों के बीच मेल और भाईचारे का बन्धन है।
अब इस पर पौलुस आगे कहता है कि यीशु मसीह ने एक ऐसा नाम पाया है, अर्थात् ऐसी प्रभुता, जो स्वर्ग और पृथ्वी दोनों में हर एक नाम से ऊपर है। यहाँ पौलुस हमें संक्षेप में दिखाता है कि हमारी सारी बुद्धि इसी में है कि हम उन भलाइयों को जानें जो परमेश्वर के पुत्र के द्वारा हमें मिली हैं, और जो हमारे पास केवल उसी में हैं, जब तक हमारा विश्वास पूरी रीति से उसी पर टिका रहे। जैसा प्रेरितों के काम में कहा गया है, स्वर्ग के नीचे और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया जिसके द्वारा हमारा उद्धार हो। क्योंकि, जैसा मैंने आज प्रातः तुमसे कहा, चूँकि परमेश्वर अगम्य है और ऐसी ज्योति में वास करता है जिसके पास हम पहुँच नहीं सकते, जैसा पौलुस उसे कहता है, इसलिए यीशु मसीह
को मानो उसके और हमारे बीच आना पड़ा, ताकि हम निडर होकर उसके पास जा सकें और जानें कि वह हमसे न दूर है न अलग है। इसलिए हम यह ध्यान दें कि यहाँ एक नाम का उल्लेख इसलिए है कि परमेश्वर अपने एकलौते
पुत्र के व्यक्तित्व में जाना जाना चाहता है। साथ ही यह भी कहा गया है कि अनेक ईश्वरत्व नहीं हैं। जहाँ तक सार या सत्ता का सम्बन्ध है, हमारा केवल एक ही परमेश्वर है। फिर भी यीशु मसीह में हमारे पास पिता का जीवित और स्पष्ट स्वरूप है, ताकि हम वहाँ वह सब पा लें जो हमारे उद्धार के लिए उचित और आवश्यक है।
कहा गया है कि हमें एकमात्र परमेश्वर को जानने पर घमण्ड करना चाहिए, परन्तु यह हमारे प्रभु यीशु मसीह के व्यक्तित्व में पूरा होता है, क्योंकि जब मनुष्य परमेश्वर को ढूँढ़ने निकलते हैं, तो जब तक यीशु मसीह उनका मार्ग और अगुवा न हो, वे एक भयानक भूलभुलैया में जा पड़ते हैं। इस प्रकार अब हम देखते हैं कि पौलुस का लक्ष्य क्या था।
यह भी जोड़ा गया है कि यह केवल इस संसार के लिए नहीं वरन् आनेवाले संसार के लिए भी है, जिसका अर्थ यह है कि यीशु मसीह का जो ज्ञान हमें है वह स्वर्गीय जीवन के लिए हमारे निमित्त पर्याप्त होगा। अब पहली दृष्टि में ऐसा लग सकता है कि इस पाठ और कुरिन्थियों की पहली पत्री के पन्द्रहवें अध्याय में जो कहा गया है, उनमें कुछ विरोध है। क्योंकि वहाँ वह कहता है कि अन्तिम दिन, जब जगत का न्याय होगा, हमारा प्रभु यीशु मसीह राज्य अपने पिता परमेश्वर को सौंप देगा, जिससे उसने उसे पाया है। और यहाँ वह कहता है कि मसीह आनेवाले संसार के लिए भी सब अधिकार में स्थापित है। परन्तु ये दोनों बातें भली-भाँति मेल खाती हैं। क्योंकि जब वह कहता है कि यीशु मसीह का नाम हर एक नाम से ऊपर है, और वह अपने पिता परमेश्वर का स्वरूप है, तो यह हमारी मोटी बुद्धि और दुर्बलता के कारण है।
और जब उसे परमेश्वर का प्रतिनिधि कहा जाता है, तो यह इसलिए कि हम तब तक चैन नहीं पा सकते जब तक यह न जानें कि परमेश्वर ने हमारी आवश्यकता के समय हमारी सहायता के लिए अपना हाथ बढ़ाया है, और यह बात हम यीशु मसीह में और भी अच्छी रीति से देखते हैं,
क्योंकि वह हमारे निकट आ गया है और हमारा भाई बन गया है।
इसलिए परमेश्वर यीशु मसीह के द्वारा इस रीति से राज्य नहीं करता कि वह अपना पद छोड़ दे और स्वयं स्वर्ग में निष्क्रिय बैठा रहे। ऐसा सोचना मूर्खतापूर्ण कल्पना होगी। और सचमुच, हम देखते हैं कि हमारा प्रभु यीशु
मसीह यूहन्ना के पन्द्रहवें अध्याय में इसका वर्णन करता है: वह कहता है, "मेरा पिता और मैं सदा अपना हाथ काम में लगाए रखते हैं।" वहाँ वह यह दिखाता है कि उसे जगत का शासक ठहराए जाने का यह प्रयोजन नहीं था कि इस बीच पिता स्वर्ग में निष्क्रिय बैठा रहे; परन्तु यह बात हमारे विषय में कही गई है, ताकि हम इस बात में सन्देह न करें कि जब हम विश्वास के साथ परमेश्वर को खोजते हैं, तब वह निरन्तर हमारे निकट रहता है।
अन्तिम दिन में, और न्याय के बाद, हमारी आँखें नई होंगी, जैसा यूहन्ना कहता है। और क्योंकि हम परमेश्वर के समान होंगे और उसकी महिमा में रूपान्तरित हो जाएँगे, इसलिए हम उसे वैसा ही देखेंगे जैसा वह है; यह हम अभी नहीं कर सकते, क्योंकि हमारी समझ बहुत मन्द है। इसलिए हमारे लिए अभी इतना ही बहुत है कि हम उसे दर्पण में धुंधला-सा देखें, जैसा पौलुस कहता है,
और उसे अंशमात्र जानें। तब तुम देखते हो कि हमारे प्रभु यीशु मसीह का राज्य परमेश्वर अपने पिता को सौंप देना इसलिए है कि हम परमेश्वर की उस महिमा और उस सत्ता को देखें जो अभी हमारी समझ से परे है। क्योंकि हमारा स्वभाव बदल दिया जाएगा, और हम स्वर्गीय महिमा में नए सिरे से गढ़े जाएँगे, और उस सारी भ्रष्टता से पूरी तरह छूट जाएँगे जिससे हम अभी चारों ओर घिरे हुए हैं।
फिर भी इसका यह अर्थ नहीं कि यीशु मसीह को नीचा किया जाएगा, क्योंकि तब वह अपनी सिद्धता में कहीं अधिक उत्तम होगा; जैसा कुलुस्सियों के तीसरे अध्याय में कहा गया है कि हमारा जीवन मसीह के साथ परमेश्वर में छिपा हुआ है, और जब मसीह प्रगट होगा तब हमारा जीवन भी प्रगट किया जाएगा। संक्षेप में, जब हम उस परम आनन्द में पहुँचेंगे जो हमारे लिए मोल लिया गया है, तब हमें वह वस्तु मिलेगी जो अभी केवल आशा में है, और यीशु मसीह सब कुछ अपने में समेट लेगा, ताकि तब हम उसकी महिमा के भागी हों, हर एक मनुष्य
अपनी-अपनी श्रेणी और मात्रा के अनुसार। इस प्रकार तुम देखते हो कि ये दोनों वचन बहुत भली रीति से मेल खाते हैं, अर्थात् परमेश्वर ने मसीह को वह नाम दिया है जो सब नामों में श्रेष्ठ है, और यह भी कि वह राज्य परमेश्वर पिता को सौंप देगा। और क्यों? क्योंकि तब हम उसकी स्वर्गीय महिमा को देखेंगे, जिसकी कल्पना हम अभी नहीं कर सकते क्योंकि हम शारीरिक हैं।
हम यह भी जान लेंगे कि यद्यपि यीशु मसीह हमारे सामने नश्वर मनुष्य के रूप में प्रगट हुआ, तथापि अपने मानव स्वभाव में वह ऐसा महिमामय किया गया कि वास्तव में वह परमेश्वर है, अपने पिता के साथ एक ही सत्ता का। यह बात,
मैं कहता हूँ, तब पूरी रीति से जानी जाएगी, जबकि अभी हमें उसकी केवल एक हल्की-सी छाया मिली है।
इसके अतिरिक्त, आओ हम यह सीखें कि जब यीशु मसीह को उसके पिता परमेश्वर ने ऊँचा उठाया, तो इसलिए कि उसकी यह उन्नति हमारे अनन्त उद्धार के काम आए। और इसी कारण यशायाह के नौवें अध्याय में वह आनेवाले युग का पिता कहलाता है, ताकि हम जानें कि वह न केवल इस क्षणिक जीवन के लिए हमें दिया गया है, परन्तु उस पर आधारित विश्वास का सार स्वर्ग में है।
और वहाँ हम उस बात का फल अनुभव करेंगे जो अभी छिपी है, और जिसका स्वाद हम अभी अंशमात्र ही लेते हैं, और हम उन सब भली वस्तुओं के पूरे अधिकारी हो जाएँगे जो उसे पहले ही दी जा चुकी हैं। इसलिए तुम देखते हो कि पौलुस ने आनेवाले युग का उल्लेख जान-बूझकर क्यों किया है।
वह तुरन्त आगे कहता है कि परमेश्वर ने सब कुछ उसके पाँवों तले कर दिया और उसे सब वस्तुओं के ऊपर कलीसिया का सिर ठहराया। यहाँ सारे जगत के अधीन किए जाने की बात यह दिखाने के लिए है कि हमें जिस वस्तु की भी आवश्यकता हो, यदि हम अपने प्रभु यीशु मसीह की शरण ले सकें, तो वह हमारी सहायता करने में समर्थ है, क्योंकि उसके पास इसके साधन हैं। हाँ, और हमें भली रीति से ध्यान देना चाहिए कि आठवें भजन में कहा गया है कि परमेश्वर सब वस्तुओं की, यहाँ तक कि भेड़ों, आकाश के पक्षियों और समुद्र की मछलियों तक की चिन्ता करता है। संक्षेप में, सब सृजे हुए प्राणी उसके पाँवों तले कर दिए गए हैं। और किस उद्देश्य से? पवित्र आत्मा का अभिप्राय था कि छोटे बच्चों की नाईं हमें इसके द्वारा खींचे, और यह दिखाए कि वे
आत्मिक आशीषें (जिन्हें हमें सबसे अधिक मूल्यवान समझना चाहिए) हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमें दी जाती हैं।
तब उसका कथन यह है कि हम रोटी का एक कौर भी न खाएँ, सिवाय इस कारण कि हम यीशु मसीह के अंग हैं। क्योंकि मानो वह हमें धीरे-धीरे और ऊपर ले जाना चाहता है, क्योंकि सब कुछ हमारे प्रभु यीशु मसीह को दिया गया है, इस शर्त के साथ कि यदि हम सचमुच उसकी देह के अंग हैं, तो जो कुछ उसका है वह सब हमारा है, और यदि हम अपने आप को उससे अलग न करें, तो वह आगे हमें कहीं अधिक ऊँची और उत्तम वस्तुओं का भागी बनाएगा: अर्थात् हम परमेश्वर की सन्तान कहलाएँगे और वैसे ही गिने जाएँगे, और उसके पवित्र आत्मा के मन्दिर बनेंगे। और यह कैसी बात है?
यह कैसी बात है कि हम स्वतन्त्रता से उसके पास आएँ और उसे अपना पिता जानकर साहस के साथ पुकारें? यह कैसी बात है कि आदम के पाप से जिन वरदानों से हम वंचित हो गए थे, उनसे फिर धनी किए जाएँ? यह कैसी बात है कि शैतान के अत्याचार और पाप की दासता में रहने के बदले हमें स्वर्गदूतों की संगति में गिना जाए? हम ये इतनी ऊँची और श्रेष्ठ वस्तुएँ कैसे पा सकते हैं, जबकि हम रोटी के एक टुकड़े पर भी चोरी के बिना अपना दावा नहीं कर सकते, सिवाय इसके कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के अंग हैं?
अब हम देखते हैं कि पौलुस का यह कहने में क्या उद्देश्य था कि सब कुछ हमारे प्रभु यीशु मसीह के अधीन किया गया है। इसलिए आओ, अब हम परमेश्वर को उसके एकलौते पुत्र, हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम से धन्यवाद देना सीखें, जिसे उसने न केवल हमारी देहों को खिलाने-पिलाने के लिए भेजा, परन्तु इसलिए भी कि वह हमारी आत्माओं का भोजन हो, कि वे सदा जीवित रहें। और इस प्रकार आओ हम इस बात को मानने की आदत डालें कि हमारे
प्रभु यीशु मसीह के पास हमारी सब आवश्यकताओं में सहायता करने के साधन हैं। फिर यदि शैतान हम पर ऐसा प्रचण्ड आक्रमण करे कि हमें पूरी तरह हार जाने का भय हो, तो हम समझ लें कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के पास उसके विरुद्ध हमारी रक्षा के लिए एक अजेय गढ़ है, और ऐसी सेनाएँ हैं जिनसे वह हमें सब लड़ाइयों में अजेय बना देता है। इसलिए जब हम
निर्बल हैं, तो आइए हम उसकी सामर्थ्य की शरण लें। जब हमें किसी अनुग्रह की घटी हो, तो हम उससे माँगें कि वह हमें वही दे जो वह आवश्यक समझता है। जब हमारे शत्रु पागल पशुओं के समान उत्पात मचाएँ और ऐसा लगे कि हम मानो गहरी खाइयों में पूरी तरह निगल लिए जाएँगे, तब आइए हम अपने प्रभु यीशु मसीह से बिनती करें कि वह हमें अपनी सुरक्षा में थामे रखे, और शैतान तथा उसके सब सहायकों को मानो जंजीरों में बाँधे रखे, ताकि वह हमें उनसे हारने न दे। तो आप देखते हैं कि सब कुछ हमारे प्रभु यीशु मसीह के अधीन किया गया, उसके अपने उपयोग के लिए नहीं (क्योंकि उसे उनकी क्या आवश्यकता थी?) परन्तु हमारे लिए, ताकि वह हमें वह सब दे जो वह जानता है कि
हमारे लाभ के लिए है, और हम भी यह सीखें कि सब कुछ उसी के हाथ से माँगें, और जब वह देखे कि हमारे शत्रु हम पर प्रबल हो रहे हैं, तो वह उन्हें दबा दे, जैसा कि वह भली-भाँति कर सकता है।
फिर, जब पौलुस यहाँ कहता है कि वह कलीसिया में (या कलीसिया के ऊपर) सब बातों में सिर ठहराया गया, तो यह उसके तर्क की वही कड़ी है जो हमें पूरी तरह यीशु मसीह की ओर लाती है। मानो वह कहता हो, "यह सच है कि परमेश्वर के अनुग्रह के दान चारों ओर बाँटे जाते हैं, और स्वर्गदूत तथा नश्वर मनुष्य भी हमारे लिए उनके सेवक हो सकते हैं; फिर भी, चाहे जैसी भी स्थिति हो, हमें सदा स्रोत की ओर ही लौटना चाहिए।" सारे शरीर में फैली हुई नसें हर अंग को बल दे सकती हैं, क्योंकि वे मानो लहू की नालियाँ हैं। तथापि जीवन का सोता सदा मस्तिष्क ही रहना चाहिए।
यह भली-भाँति दिखाई देता है कि वृक्ष में रस सब ओर फैलता है। तो भी, यद्यपि जड़ ऊपर चढ़कर हर डाली और पत्ते को पोषण नहीं देती, सारा पोषण जड़ से ही आता है। यदि कोई कहे कि सारा वृक्ष किसी एक डाली से जीवित रखा जाता है, तो बिलकुल उलटा दिखाई देता है। यह सच है कि कोई बड़ी शाखा अपने आसपास की डालियों और टहनियों को पोषण दे सकती है, परन्तु उचित नहीं कि इससे जड़ की हानि हो। उसी प्रकार मनुष्य के शरीर के अंग सिर की हानि न करें, चाहे हर अंग अपना कर्तव्य निभाता हो।
यहाँ पौलुस कहता है कि हमारा प्रभु यीशु मसीह कलीसिया को सब बातों से ऊपर उसका सिर होने के लिए दिया गया, मानो वह कहता हो, "हम सबको उसी की शरण में जाना चाहिए।" इस बात में न पौलुस के पास, और न
पतरस के पास, न कुँवारी मरियम के पास, न मीकाएल के पास अपना कुछ है। क्योंकि वे सब अभावग्रस्त और भूखे हैं, केवल उतना छोड़कर जितना यीशु मसीह उन्हें भर देता है। इसलिए उन सब को, छोटे हों या बड़े, उसकी परिपूर्णता से लेने को विवश होना पड़ता है। और यही कारण है कि कुलुस्सियों के पहले अध्याय के जिस पाठ का मैंने हवाला दिया, उसी में
पौलुस कहता है कि परमेश्वर पिता को यह अच्छा लगा कि सारी परिपूर्णता उसी में वास करे। क्योंकि सिर की पदवी केवल क्षणभंगुर सम्मान की उपाधि नहीं है, वरन् वह हमारे प्रभु यीशु मसीह की सामर्थ्य को और भी अच्छी रीति से प्रकट करती है।
इसलिए जैसे स्वाभाविक सिर को सारे शरीर के ऊपर केवल श्रेष्ठता और प्रधानता ही नहीं मिलती, वरन् वह सारे शरीर को पोषण भी देता है और मनुष्य को जीवित रखता है, वैसा ही हमारे प्रभु
यीशु मसीह और हमारे बीच है, क्योंकि यदि हम उस पर निर्भर न रहें तो सब कुछ नष्ट हो जाएगा। यद्यपि ऐसा प्रतीत हो कि हमने परमेश्वर के हाथ से पहले ही बहुत उत्तम दान पा लिए हैं, तो भी यदि हम हमारे प्रभु यीशु
मसीह के साथ एकता में बने न रहें, तो सब कुछ हवा और धुआँ ही है।
इसके साथ यह भी ध्यान देना उचित है कि जब मसीह सिर कहलाता है, तो यह योग्य है कि और सब उसकी आज्ञा मानें, और हम उसके सिद्धान्त के आगे झुकें, ताकि वह सब कुछ पर शासन करे जैसे सिर मनुष्य के शेष सारे शरीर पर शासन करता है। क्योंकि पाँव चलते हैं, और हाथ हिलते हैं, और संक्षेप में कोई ऐसा अंग नहीं जो वह सब करने को तत्पर और उत्सुक न हो जो सिर ठहराए। कलीसिया में भी यही होना चाहिए: यीशु मसीह को शासन करना चाहिए, और सब मनुष्यों को चुपचाप उसकी आज्ञा माननी चाहिए।
।
और इसलिए इस पाठ में हमें पहले यह ध्यान देना है कि हमारा उद्धार यीशु मसीह पर इतना निर्भर है कि न कोई स्वर्गदूत और न कोई मनुष्य, चाहे वह कितना ही पवित्र क्यों न हो, ऐसा है जिसे अपने में जिन बातों की घटी है
उन्हें उसके हाथ से पाने की आवश्यकता न हो। इसलिए जब हमें किसी ऐसी वस्तु की आवश्यकता हो जो इस वर्तमान जीवन के लिए या स्वर्गीय जीवन के लिए, हमारे शरीरों के लिए या हमारी आत्माओं के लिए अनिवार्य हो, तब न पतरस के पास दौड़ना है, न पौलुस के पास, परन्तु हमें सीधे अपने
प्रभु यीशु मसीह के पास जाना है। इसे एक बिन्दु के रूप में ध्यान में रखिए।
दूसरे, हम यह भी सीखें कि अपने आप को अपने प्रभु यीशु मसीह के हाथ से शासित होने और उसके प्रति श्रद्धा में रहने दें, ताकि हम अपने आप को उसकी देह के सच्चे अंग प्रमाणित करें। वह हमारा सिर नहीं हो सकता यदि वह हमारा चरवाहा भी न हो और हम पर सारा अधिकार न रखता हो।
जैसा मैंने आपको बताया कि शैतान ने स्वर्गदूतों के बहाने से परमेश्वर के एकलौते पुत्र की महिमा को मिटाने का परिश्रम किया है, वैसे ही दूसरी ओर उसने हमारे मार्ग में रुकावट बनने के लिए संसार में हमारे पास एक मूरत भेज दी है, ताकि यीशु मसीह हमसे अलग कर दिया जाए। क्योंकि पोप यह निन्दा उगलने में लज्जित नहीं होता कि यदि वह स्वयं कलीसिया पर राज्य न करे और उस पर सार्वभौमिक अधिकार न रखे, तो कलीसिया बिना सिर की देह मात्र होगी, ताकि हर कोई उसी की ओर देखे और उसका आसन सारे संसार के ऊपर हो। और यह तो मानो यह कहना है कि यीशु मसीह के लिए यहाँ अब कुछ करने को नहीं रहा, उसे स्वर्ग से ही सन्तुष्ट रहना चाहिए और अपने स्थान पर अपने उत्तराधिकारी को शासन करने देना चाहिए। परन्तु इसी में हम देखते हैं कि वह कैसे अपनी ही सीमा लाँघ जाता है, और परमेश्वर के पुत्र की सारी सर्वसत्ता को मिटाने का प्रयत्न करता है।
इसलिए यह हमारे लिए बहुत हितकर है कि हम इस पाठ को भली-भाँति मन में रखें, जहाँ पौलुस कहता है कि यीशु मसीह सब बातों से ऊपर कलीसिया का सिर ठहराया गया है। यह सच है कि पोप यह दावा करेगा कि वह केवल अधीनस्थ सिर है और यीशु मसीह को उसके स्थान से हटाया नहीं गया है। परन्तु आइए हम उस बात पर फिर दृष्टि डालें जिसे मैं पहले छू चुका हूँ:
यीशु मसीह काल्पनिक उपाधि से सन्तुष्ट नहीं होगा, वरन् अपनी सामर्थ्य को अपने ही लिए सुरक्षित रखेगा, जो उसी की है। क्योंकि सिर के लिए केवल सबसे ऊपर स्थापित होना ही आवश्यक नहीं, वरन् यह भी कि सब मनुष्य सब कुछ उसी से पाएँ। हम सबको यह समझना उचित है कि वही हमारी वास्तविक जड़ है।
जीवन — वह सोता जिससे हमें जल भर लेना चाहिए, यद्यपि वह अपने आत्मिक वरदान और भलाइयाँ हमारे बीच जिन नालियों या नहरों से चाहे भेजता है। इस प्रकार तुम देखते हो कि हमें आगे संक्षेप में और क्या स्मरण रखना है।
यह विषय कुलुस्सियों की पुस्तक के पहले अध्याय में और विस्तार से रखा गया है। क्योंकि पौलुस वहाँ दिखाता है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह को जगत के आरम्भ से ही सिर ठहराया गया था, क्योंकि सब कुछ उसी में सृजा गया, और केवल इसलिए नहीं कि
वह आज हमारा छुड़ानेवाला है। क्योंकि यदि आदम उस विनाश में न गिरा होता जिसमें वह हमें भी अपने साथ खींच ले गया, तब भी परमेश्वर का पुत्र सदा सारी सृष्टि में पहिलौठा रहता। इसलिए नहीं कि वह स्वयं एक सृजा हुआ प्राणी है, वरन् इसलिए कि वही नींव है, जैसा कि पौलुस इसका कारण भी जोड़ देता है, कि उसी में स्वर्गदूत सृजे गए, और उसी में उनकी स्थिति और ठहराव है। तो तुम देखते हो कि परमेश्वर के पुत्र की सर्वोच्चता ऊपर और नीचे दोनों में बनी रहती, चाहे हम अपने पिता
आदम के साथ ऐसी गड़बड़ी में न भी गिरते जिसमें अब हम हैं।
परन्तु अब हमारे प्रभु यीशु मसीह को एक और रीति से हमारा सिर होना है, अर्थात् हमें परमेश्वर अपने पिता से मेल कराने और हमें फिर उसी की ओर इकट्ठा करने के लिए, जिससे हम पाप के कारण दूर हो गए थे, यहाँ तक कि जब तक यीशु मसीह के द्वारा, पापों की क्षमा से, हम फिर अनुग्रह में न लाए गए, तब तक वह हमारा घोर शत्रु था। और इसके अतिरिक्त, पौलुस उसी पाठ में घोषित करता है कि यीशु मसीह कलीसिया का सिर ठहराया गया, ताकि सारी परिपूर्णता उसी में हो। इस प्रकार हम देखते हैं कि हमें स्वर्गदूतों से, प्राचीन पूर्वजों से और भविष्यद्वक्ताओं से कैसे जुड़ना चाहिए, इस शर्त के साथ कि हमारे
प्रभु यीशु मसीह फिर भी न केवल पहिला और प्रधान बना रहे, वरन् सब कुछ उसी की ओर संदर्भित हो, और हम ऐसी रीति से परस्पर सहभागी हों कि हम में से हर एक अपना स्थान बनाए रखे और हम सब एक ही देह के अंग हों, और उसके और सिर न हों
केवल एक ही हो। क्योंकि यदि हम यीशु मसीह के साथ किसी और को जोड़ें, तो यह उससे वह चीज़ छीन लेना है जो परमेश्वर उसके पिता ने उसी एक को दी है। आओ हम इसी में सन्तुष्ट रहें कि वह हमें अपनी सब भलाइयों में सहभागी बनाता है, इस शर्त पर कि हम मानें कि सब कुछ उसी से आता है और सब कुछ उसी में ढूँढ़ें।
पैंतालीसवें भजन में भली-भाँति दिखाया गया है कि हम सब यीशु मसीह के संगी हैं और जो भली वस्तुएँ उसे दी गईं उन सबका कुछ अंश हमें मिलता है। फिर भी यह नहीं कहना चाहिए कि वह हमारा बराबरी का संगी है, और उसे उसके प्रेरितों से अलग पहचाना नहीं जा सकता, जैसा कि पोप के अनुयायी अपनी मूर्खतापूर्ण कहावत में बकते हैं। परन्तु यह इसलिए है कि हम जानें कि जिन भली वस्तुओं की हम इच्छा कर सकते हैं उनमें से कोई भी हमसे दूर नहीं, वरन् वे सब हमें उसी के द्वारा दी जाती हैं, और वह इतना उदार है कि हमारे हाथ से और कुछ नहीं चाहता सिवाय इसके कि हम वे वस्तुएँ ग्रहण करें जो हमारे ही कल्याण के लिए हैं। जैसा कि वह स्वयं कहता है, "हे सब प्यासे लोगो, पानी के पास आओ, और जिनके पास रुपया न हो, तुम भी आओ, बिना रुपये और बिना दाम के पानी, दाखमधु और दूध ले लो और जी भर पियो।" वहाँ हमारा प्रभु दिखाता है कि हमें उसी की शरण में जाना है, और यदि हम उसकी ओर देखें तो उसकी महिमा हमसे बहुत ऊँची और बहुत दूर है। इसलिए यीशु मसीह ही हमारा साधन होना चाहिए, और क्योंकि वह हमारे पास उतर आया है, आओ हम भी उसके पास जाएँ। जैसा कि यूहन्ना के सातवें अध्याय में लिखा है,
"यदि कोई प्यासा हो तो मेरे पास आए, और जो मेरा दिया हुआ जल पिएगा, उसके पेट में से जीवन के जल की नदियाँ बह निकलेंगी।" यदि मनुष्य विश्वासयोग्यता से यीशु मसीह में वह ढूँढ़ें जिसकी उन्हें आवश्यकता है, तो वह हमें न केवल उतना देगा जितना हम में से हर एक को अपने लिए पर्याप्त हो, वरन् इतना भी कि हम अपने पड़ोसियों को भी दे सकें और उनकी घटी में उनकी सहायता कर सकें।
अब निष्कर्ष के रूप में पौलुस जोड़ता है कि कलीसिया उसकी देह है, और उसकी परिपूर्णता है जो सब में सब कुछ पूरा करता है। कलीसिया को
यीशु मसीह की देह कहकर वह उस बात को दोहराता है जिसे मैं पहले छू चुका हूँ: कि जिन वस्तुओं की हमें आवश्यकता है उन्हें पाने के लिए हमें लम्बे चक्कर या कठिन यात्राएँ करने की आवश्यकता नहीं। क्योंकि जब हम परमेश्वर के पुत्र से मिले और जुड़े हुए हैं, तो और क्या चाहिए? हमें इस सिद्धान्त को मानना चाहिए कि हमारे पास न जीवन है, न आनन्द, न कोई भली वस्तु, केवल अकेले परमेश्वर में। यह स्थापित होने पर, आओ देखें कि हम किस साधन से उस तक पहुँच सकते हैं, और वह है हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा।
इस प्रकार तुम देखते हो कि यहाँ यह क्यों कहा गया है कि सारी परिपूर्णता उसी में बसती है, और यह उसी का कर्तव्य है कि हमें परमेश्वर से जोड़े और उस बिखराव से हमें वापस खींच लाए जिसमें हम अपने आप को पाते हैं। इसलिए हम इधर-उधर भटककर उस वस्तु का कोई भी अंश, जो केवल यीशु मसीह के लिए सुरक्षित है, सन्त पतरस या सन्त पौलुस को नहीं दे सकते, बिना परमेश्वर को उसके हक़ से वंचित किए। यह सच है कि हम इसे स्वीकार न करें, परन्तु हमारा ढोंग परमेश्वर के सामने हमें निर्दोष नहीं ठहराएगा। हम बहुत बहाने बना सकते हैं, परन्तु यह मानकर कि हमें अपना सारा कल्याण परमेश्वर के हाथ से ढूँढ़ना चाहिए, हम अपने आप को दोषी ठहराते हैं।
अच्छा, यदि हम कहें कि हम परमेश्वर की उपस्थिति में प्रवेश करने के योग्य नहीं, तो यह सच है, और यदि हम पूछें कि बिना पंखों के हम कैसे उड़ सकते हैं, तो यह भी सच है। यदि हम कहें कि तब हमें सन्त पतरस या सन्त पौलुस की शरण लेनी चाहिए, तो हम अपनी ही ओर से बोलते हैं। क्योंकि परमेश्वर ठीक इसके विपरीत कहता है। वह कहता है, "मैं तुम्हें अपने एकलौते पुत्र के पास भेजता हूँ, क्योंकि उसी में तुम्हें वह सब मिलेगा जिसकी तुम्हें आवश्यकता है। डरो मत कि तुम्हें किसी वस्तु की घटी होगी, यदि तुम एक बार उस अनुग्रह से भर जाओ जो मैंने उसमें रखा है और जो उसी में बना रहता है।" इसी कारण भविष्यद्वक्ता यशायाह जानबूझकर दाखमधु, जल और दूध की बात करता है, मानो कहता हो कि यीशु मसीह में हमारे पास जीवन की सारी परिपूर्णता है।
जो लोग सन्त पतरस और सन्त पौलुस के पास भटकते फिरते हैं और संरक्षक और मध्यस्थ ढूँढ़ते हैं, वे यीशु मसीह के साथ अन्याय करते हैं, क्योंकि वे बाँटते हैं
जो दान पूरी रीति से उसी को दिया जाना चाहिए, उसे ही नहीं, वरन् हम परमेश्वर की महिमा को भी लूटते हैं। क्योंकि जब उसकी यह इच्छा है कि सारी परिपूर्णता यीशु मसीह में वास करे, तो यह निश्चित है कि जब हम उन सीमाओं के भीतर नहीं रहते जो उसने ठहराई हैं, अर्थात् उस जन के अधीन नहीं होते जिसे उसने हमारी सब आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये हमें दिया है, तब हम खुल्लमखुल्ला उसकी अवहेलना करते हैं।
फिर भी, जो बात वह आगे जोड़ता है, वह हमारे लिये और भी बड़ी और अधिक सान्त्वना की बात होनी चाहिए, जब वह कहता है कि कलीसिया उसकी परिपूर्णता है जो सब कुछ को पूरा करता है। इस "परिपूर्णता" शब्द से उसका अर्थ यह है कि हमारे प्रभु
यीशु मसीह, और उसका पिता परमेश्वर भी, जब तक हम उससे जुड़े हुए न हों, अपने आप को अधूरा समझते हैं। और यह परमेश्वर की अपार भलाई का प्रमाण है, जो आश्चर्य की सीमा से परे है। सबसे पहले, परमेश्वर को दूसरों से कुछ उधार लेने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वह स्वयं में सिद्ध है; संसार को रचने से पहले भी उसे किसी बात की घटी न थी। जब
उसने उसे रचा, तो क्या अपने किसी लाभ या हित के लिये रचा? नहीं, केवल इसलिये कि हम उसकी भलाई, सामर्थ्य, बुद्धि और धार्मिकता को जानें और उसके गवाह बनें। उसने हमें यहाँ मानो एक रंगमंच पर बैठाया है कि हम उसकी सब सृष्टि में उसकी महिमा को देखें। फिर भी वह हमारे बिना भली-भाँति रह सकता था।
परन्तु मान लीजिए कि परमेश्वर अपने आप को सिद्ध करने के लिये दूसरों से उधार लेता, और वह नश्वर मनुष्यों के समान होता, जिनमें से कोई भी संगति के बिना नहीं रह सकता।
मान लीजिए कि परमेश्वर ऐसा ही होता, तो हम क्या हैं? हमसे जुड़कर उसकी क्या भलाई हो सकती है? यह तो ऐसा होगा मानो सूर्य को किसी दलदल के साथ मिला दिया जाए। क्योंकि हमारे पास संक्रमण और मलिनता के सिवा और क्या है? हम आदम के पाप से ऐसे बिगड़े हुए हैं कि उसके विषय में सोचना भी भयानक है। तब हम परमेश्वर में ऐसी कोई सिद्धता कैसे ला सकते हैं? यद्यपि हममें दुर्बलता के सिवा कुछ नहीं, यद्यपि हम हठीले और दुष्ट हैं, यद्यपि हममें सब प्रकार की मलिनता के सिवा कुछ नहीं, और यद्यपि हम उसकी दृष्टि में घृणित हैं, तौभी उसकी यह इच्छा है कि हम उससे जुड़े रहें, और इस शर्त पर भी कि इस प्रकार उसके और हमारे मिलने से वह हममें सिद्ध किया जाए।
जैसे कोई पिता कहे, "जब मैं अपने बच्चे को अपने घर में नहीं देखता तो मुझे अपना घर सूना लगता है।" किसान कहेगा, "जब मेरी पत्नी मेरे साथ नहीं होती तो मुझे लगता है कि मैं आधा ही मनुष्य हूँ।"
इसी रीति से परमेश्वर यह प्रकट करता है कि जब तक वह हमें अपने पास इकट्ठा करके अपने साथ एक न कर ले, तब तक वह अपने आप को पूर्ण और सिद्ध नहीं समझता। वह हममें अपना सारा आनन्द पाता है और चाहता है कि उसकी महिमा हममें चमके, ताकि उसकी किरणें चारों ओर फैलें। यद्यपि सारी महिमा उसी में है, तौभी वह चाहता है कि यह दिखाई दे कि उसमें हमारा भी अंश और भाग है। इस प्रकार तुम देखते हो कि पौलुस ने कलीसिया को परमेश्वर और यीशु मसीह की परिपूर्णता कहकर वास्तव में क्या कहना चाहा।
तो फिर, क्या हम परमेश्वर के सामने निर्दोष ठहर सकते हैं जब हम कहते हैं कि हम उसके पास नहीं आ सकते, जबकि हम अपने प्रभु यीशु
मसीह में उसकी देह हैं? यदि हमारा कोई पाँव रोगी होकर न जाने कहाँ भागा फिरे और कहे, "मैं कहीं और उपचार ढूँढ़ने जाता हूँ," और ऐसा करने के लिये देह से काट डाला जाए; यदि (मैं कहता हूँ) देह के अंगों में कुछ समझ और विवेक होता और वे इस प्रकार बोल सकते, तो क्या यह पागलपन न होता कि पाँव कहे कि वह देह से अलग होना चाहता है ताकि जो उसे चाहिए उसे कहीं और ढूँढ़े?
ठीक इसी रीति से, जब पोप के अनुयायी और अन्य मूर्तिपूजक यह कहते हैं कि उन्हें सन्तों के द्वारा अपना काम निकालना चाहिए और परमेश्वर तक पहुँचने के लिये उन्हें अनेक मध्यस्थ और साधन चाहिए, तो यह ऐसा है मानो वे कहें, "यीशु मसीह कुछ नहीं, और न हमारी उस तक कोई पहुँच या प्रवेश है।" क्या अंग सिर से अलग किए गए हैं? सच तो यह है कि पौलुस ने यहाँ उन सब पर कृतघ्नता और निष्ठुरता का दोष लगाया और उन्हें दोषी ठहराया है जो परमेश्वर के पास आने की अयोग्यता के बहाने नये साधन गढ़ते हैं, अपने आप को यीशु मसीह से अलग करते हैं, और उसकी सामर्थ्य को टुकड़े-टुकड़े करके घटाते हैं। पौलुस उन्हें इसलिये दोषी ठहराता है कि वे
उस लाभ और सुअवसर को ग्रहण नहीं करते जो उन्हें दिया गया है, कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने झुककर उन्हें अपनी देह के समान अपने साथ एक कर लिया है। अब तो आओ, हम अपने
प्रभु यीशु मसीह के साथ ऐसी घनिष्ठता रखना सीखें कि जब-जब हमें अपनी भूलों और आवश्यकताओं का बोध हो, तब-तब हम उसी की शरण लें।
इसके अतिरिक्त, इस बात का ध्यान रखते हुए कि इससे उसकी महिमा का अनादर न हो,
पौलुस यह जोड़ता है कि वह सब में सब कुछ पूरा करना नहीं छोड़ता। एक ओर, हम देखते हैं कि जब मनुष्यों को परमेश्वर के वरदान मिलते हैं, तो वे उसके स्थान पर अपने आप को ठूँसने लगते हैं और चाहते हैं कि उसके बदले उनका आदर किया जाए। हम भी इसी प्रकार का व्यवहार करते हैं, और अपने आप को धोखा देते हैं कि जो वरदान परमेश्वर ने हमें सेंतमेंत दिए हैं, वे मानो कोई पुरस्कार या लूट का माल हैं जिन पर घमण्ड करें और अपने आप को उचित से अधिक बढ़ाएँ। दूसरी ओर, जब हम यीशु मसीह के विषय में सुनते हैं कि वह हमारे लिये कैसे दीन हुआ, कैसे मृत्यु के बन्दीगृह में उतरा, और कैसे सब प्रकार की निन्दा सहने को झुक गया, तो हमें लगता है कि हम उसे तुच्छ जान सकते हैं।
इसलिये पौलुस, हमारे अहंकार को नम्र करने और यह दिखाने के लिये कि यीशु मसीह इस प्रकार दीन नहीं हुआ कि उसकी महिमा घट गई, कहता है कि तौभी वह सब में सब कुछ करता है। इसलिये आओ, हम अपने प्रभु यीशु
मसीह की ओर से मिली आशीष, अनुग्रह और भलाइयों को ग्रहण करना सीखें। साथ ही, हम यह स्वीकार करें कि हम न केवल शून्य से बनाए गए हैं, और हमारा जीवन केवल क्षणभंगुर और लुप्त होती छाया है, वरन् जो भी गुण और श्रेष्ठता हम अपने में समझते हैं वह हरे फूल के समान है, जो परमेश्वर के फूँकते ही मुरझा जाता है।
इसलिये आओ, हम धनी न बन बैठें जब हम निर्धन हैं; हम अपनी स्वतंत्र इच्छा पर घमण्ड न करें; हम अपने पुण्य पर, या पोप-तन्त्र में शैतान के गढ़े हुए किसी भी छल-प्रपंच पर भरोसा न रखें। इसके बदले, हम उस सोते से जल भरें जो कभी नहीं सूखता, ताकि जब-जब हम प्यासे हों, हमें अपनी प्यास बुझाने के लिये जो चाहिए वह मिल जाए।
अन्त में, दो साधन हैं जिनके द्वारा परमेश्वर सब वस्तुओं में सब कुछ करता है। जैसे उसने स्वयं जगत की सृष्टि की, वैसे ही सब कुछ का मार्गदर्शन और संचालन भी उसी के हाथ से होना अवश्य है। यदि पूछा जाए कि प्रतिदिन सूर्य को कौन उदय और अस्त कराता है, सारी प्रकृति की व्यवस्था का मार्गदर्शन कौन करता है, दिनों, महीनों और वर्षों को कौन नियत करता है, और दिन-रात की अदला-बदली कौन कराता है: तो यह परमेश्वर ही है जो सब वस्तुओं में सब कुछ करता है। यही बात उन सब अन्य बातों के विषय में भी कहनी चाहिए जो हम सारे जगत के सार्वभौम शासन में देखते हैं। इसलिए हमें यह कल्पना नहीं करनी चाहिए कि परमेश्वर केवल एक क्षण के लिए सृष्टिकर्ता था, परन्तु यह कि वह अपनी रची हुई वस्तुओं को निरन्तर थामे रहता है।
तथापि, पौलुस यहाँ उन आत्मिक भलाइयों की बात करता है जो मानो परमेश्वर की सन्तानों का विशेष निज भाग हैं। परमेश्वर हम में सब कुछ करता है: न केवल प्रकृति की सामान्य व्यवस्था के द्वारा, परन्तु सुसमाचार के विश्वास से हमें प्रकाशित करके, हमें पवित्र करके, हमारे शरीर के दोषों और बुरी अभिलाषाओं से हमें शुद्ध करके, हमें संसार से खींचकर, और संक्षेप में, हमारे कल्याण और उद्धार के लिए आवश्यक सब कुछ हमें देकर। इस प्रकार तुम देखते हो कि वह सब वस्तुओं में सब कुछ कैसे करता है। मानो पौलुस ने एक ही वचन में यह घोषणा कर दी हो कि विश्वासी कुछ भी नहीं हैं, अपने आप से कुछ भी नहीं कर सकते, और उनके पास अपना कुछ भी नहीं है। वह यहाँ सूर्य, चन्द्रमा, खेत के वृक्षों या किसी अन्य फल की बात नहीं करता, न पशुओं की, न आदम की सन्तान के रूप में मनुष्यों की, परन्तु उनकी जिन्हें
परमेश्वर ने अपने पवित्र आत्मा के द्वारा फिर से जन्म दिया है। इसलिए जो कुछ उद्धार से सम्बन्ध रखता है या स्वर्गीय जीवन का है, वह केवल उसी के हाथ से मिल सकता है जिसमें सब कुछ है और जो सब वस्तुओं में सब कुछ करता है, जैसा कि यहाँ उसके विषय में कहा गया है।
इसलिए आओ, हम अपने आप को खाली करना सीखें, सच्ची और यथार्थ नम्रता के साथ अपने आप को परमेश्वर के सम्मुख बलिदान के रूप में अर्पित करें, और उसे उसकी योग्य स्तुति दें, ताकि हम में से कोई भी अपनी कृतघ्नता के कारण अपने आप को उससे अलग न करे, परन्तु हम सब यह मानकर उसका आदर करें कि हमारे पास जो कुछ है वह सब उसी से है, कि हम अपने प्रभु के द्वारा उसके साथ जुड़े हुए हैं
