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पहले अध्याय पर तीसरा उपदेश - इफिसियों 1:4-6
और वास्तव में यह प्रमाणित करके कि जब हम उसे अपना पिता कहकर पुकारते हैं, तब उसका पवित्र आत्मा हमें उचित रीति से चलाता है। इस प्रकार तुम देखते हो कि इस पाठ में हमें मुख्यतः क्या ध्यान देना है, जब तक कि शेष भाग आगे न आए।
अब आओ, हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने दोषों को मानते हुए गिर पड़ें, और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उनका ऐसा बोध कराए कि हम उसके भय में बढ़ते जाएँ और उसमें और भी दृढ़ होते जाएँ; और इस बीच हमारी निर्बलता को ऐसे सह ले कि हम सदा उसके अनुग्रह का आनन्द लेते रहें, जब तक कि वह हमें सब बातों का अधिकारी न ठहरा दे, उस समय जब वह हमारे पापों को दूर करके पूरी रीति से मिटा चुका होगा; हमारे प्रभु
यीशु मसीह के निमित्त। और इसलिए आओ, हम सब कहें: हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता, इत्यादि।
दूसरे उपदेश का अन्त।
पहले अध्याय पर तीसरा उपदेश 4. उसने जगत की सृष्टि से पहले हमें मसीह में चुन लिया कि हम उसके सम्मुख प्रेम में पवित्र और निर्दोष हों, 5. जिसने हमें पहले से ठहराया कि यीशु
मसीह के द्वारा हम उसके लेपालक पुत्र हों, अपनी इच्छा की सुमति के अनुसार, 6. कि उसके उस अनुग्रह की महिमा की स्तुति हो, जिसके द्वारा उसने हमें अपने प्रिय पुत्र में ग्रहणयोग्य ठहराया।
आज प्रातः मैंने तुम्हें दिखाना आरम्भ किया कि हमारे लिए यह उचित नहीं कि इस बहाने से कि परमेश्वर ने जगत की सृष्टि से पहले हमें चुन लिया है, हम स्वच्छन्दता की छूट ले लें, मानो हमें सब प्रकार की दुष्टता में पड़ जाने का अधिकार हो, क्योंकि हम नष्ट नहीं हो सकते, चूँकि परमेश्वर ने हमें अपनी सन्तान कर लिया है। क्योंकि जिन बातों को उसने जोड़ा है, उन्हें हमें अलग नहीं करना चाहिए, क्योंकि उसने हमें इसलिए चुना है कि हम पवित्र हों और शुद्ध जीवन बिताएँ। चुनाव को एक ऐसी जड़ के समान होना चाहिए जो अच्छे फल देती है; क्योंकि जब तक परमेश्वर हमें हमारे अपने स्वभाव पर छोड़े रखता है, तब तक हम सब प्रकार की दुष्टता के सिवा और कुछ नहीं कर सकते, क्योंकि मनुष्य के स्वभाव में इतना बड़ा भ्रष्टाचार और बुराई है कि जो कुछ वे सोचते या करते हैं वह सब परमेश्वर की धार्मिकता के विरुद्ध है।
इसलिए इसके सिवा और कोई मार्ग नहीं कि परमेश्वर हमें बदले। और यह परिवर्तन कहाँ से आता है, केवल उसी अनुग्रह से जिसकी हम चर्चा करते हैं, अर्थात् इस बात से कि उसने हमारे जगत में जन्म लेने से पहले हमें अपनी सन्तान होने के लिए चुन लिया। इसके साथ हमें यह भी ध्यान देना है कि परमेश्वर अपने चुने हुओं को कुछ समय के लिए ऐसे छोड़ देता है कि वे भटके हुए और बिलकुल खोए हुए-से दिखाई देते हैं, तौभी जब उसे भाता है तब उन्हें फिर अपने झुण्ड में ले आता है। और इससे वे और अधिक दीन होते हैं और
उसकी भलाई और दया सारे संसार पर और भी भली-भाँति प्रकट होती है।
यदि परमेश्वर अपने सब चुने हुओं को उनके बचपन ही से सिद्ध आचरण में चलाता, तो यह इतना स्पष्ट न दिखाई देता कि यह उसके पवित्र आत्मा के अनुग्रह से है। परन्तु जब अभागे लोग, जो कुछ समय तक ढीले-ढाले जीवन बिताते और सब प्रकार की दुष्टता में लगे रहे, पूरी रीति से बदल जाते हैं, तो यह परमेश्वर के कार्य और उसके हाथ लगाने के बिना नहीं हो सकता। इस प्रकार तुम देखते हो कि परमेश्वर जिन्हें चुन चुका है उन्हें बुलाने में विलम्ब इसलिए करता है कि वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा उनके मर्म को छुए और उन्हें अपनी आज्ञाकारिता में चलाए। क्योंकि जब हम उन्हें अचानक और मनुष्यों की साधारण आशा और धारणा से परे सुधरा हुआ देखते हैं,
तब हम समझ लेते हैं कि परमेश्वर ने उनमें अपना सामर्थ्य प्रकट किया है, जैसा मैंने पहले कहा। और फिर दूसरी ओर, हम में से हर एक अपने अनुभव से कायल है कि हम में जो कुछ भलाई है उस सबके लिए हम परमेश्वर के ऋणी हैं।
जब हम स्वभाव से किसी दुर्गुण की ओर झुके होते हैं और बाद में वह सुधर जाता है, तो हम भली-भाँति जान लेते हैं कि परमेश्वर ने हम पर दया की दृष्टि की है। तब तुम समझते हो कि हमारे पास अपने आप को दीन करने का और भी अधिक कारण है, क्योंकि जब तक उसने हमें उससे खींच न निकाला, हम विनाश के मार्ग पर थे। और हमारे लिए इस बात को भली-भाँति ध्यान में रखना आवश्यक है, क्योंकि कुछ कल्पनाशील लोग ऐसे हैं जो यह मान बैठते हैं कि परमेश्वर अपने चुने हुओं को अपने पवित्र आत्मा के द्वारा ऐसे चलाता है कि
वे पहले ही से पवित्र किए जा चुके होते हैं, उस समय से जब वे संसार में जन्म लेते हैं, अर्थात् माता के गर्भ से निकलते ही। परन्तु इसके विपरीत प्रकट होता है।
और सचमुच हम देखते हैं कि पौलुस दूसरे पाठ में विश्वासियों से कहता है: तुम में से कुछ लोभ में डूबे हुए थे, कुछ क्रूरता में लगे थे, कुछ ठट्ठा करनेवाले थे, कुछ व्यभिचारी और ढीले जीवन के थे, और कुछ पेटू और पियक्कड़ थे; और संक्षेप में, तुम सब प्रकार की अशुद्धता से भरे हुए थे। परन्तु परमेश्वर ने तुम्हें बदलकर और ऐसी मलिनता और संक्रमण से शुद्ध करके अपने लिए अलग कर लिया है। फिर वह रोमियों से कहता है कि तुम्हें उस जीवन पर लज्जित होना चाहिए जो तुम उस समय से पहले बिताते थे जब उसने तुम्हें अपनी ओर खींच लिया।
इसलिए जब इस पाठ में कहा गया है कि परमेश्वर ने अपने दासों को इसलिए चुना कि वे पवित्र जीवन में चलें, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह उन्हें उनके बचपन ही से अपने पवित्र आत्मा के द्वारा चलाने को बाध्य है। क्योंकि जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, अनुभव हमें दिखाता है कि जब तक उसके बुलाने का उचित समय न आए, तब तक वह उन्हें भटकने देता है। परन्तु तौभी हमें सदा यह स्मरण रखना चाहिए कि परमेश्वर ने हमें इसलिए चुना कि हम पवित्र जीवन बिताएँ। यदि वह हमें अब भी अभागे परित्यक्तों के समान
छोड़े रखता, तो निश्चय हम अपने भीतर के भ्रष्टाचार के अनुसार सब प्रकार की दुष्टता के सिवा और कुछ न कर पाते। इसलिए भलाई उसकी उस मुफ़्त दया से उत्पन्न होती है जो उसने हमारे जन्म से पहले, वरन् जगत की सृष्टि से पहले हम पर दिखाई। इस प्रकार तुम देखते हो कि इस विषय में हमें मुख्यतः क्या ध्यान देना है।
और इस प्रकार उन लोगों की निन्दा का खण्डन होता है जो परमेश्वर की स्तुति को कलंकित करना चाहते हैं, जो परमेश्वर के स्वतंत्र चुनाव और भलाई करने के प्रयत्न के बीच झगड़ा और मानो तलाक कराते हैं। वे कहते हैं, "हाँ, यदि परमेश्वर ने हमें चुन लिया है, तो हर एक जो चाहे सो करे, क्योंकि हम नष्ट नहीं हो सकते। हमें भला या बुरा करने की क्या चिन्ता?"
हमारा उद्धार परमेश्वर के केवल अनुग्रह पर आधारित है, हमारे अपने किसी गुण पर नहीं; इसलिए इसका उत्तर सहज है: यदि परमेश्वर का चुनाव न होता, तो हम में जितने विचार और अभिलाषाएँ हैं, उतने ही सब प्रकार की धार्मिकता के विरुद्ध विद्रोह होते। क्योंकि हम सब के सब बुराई की ओर ही झुके हैं; और केवल झुके ही नहीं, वरन मानो उससे उबल रहे हैं। और हम उन्मत्त उत्सुकता से उसकी ओर दौड़ते हैं, क्योंकि जिन्हें परमेश्वर का पवित्र आत्मा नहीं सुधारता, उन सब पर शैतान का अधिकार रहता है। इसलिए हमें यही निष्कर्ष निकालना चाहिए कि भलाई करने में हमारा लग जाना इस कारण है कि परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें उस ओर चलाता और ले जाता है, और यह सब उसके चुनाव के कारण है।
इसलिए, जैसा मैंने पहले कहा, जिन बातों को परमेश्वर ने जोड़ा है उन्हें हमें अलग नहीं करना चाहिए; क्योंकि हम इसलिए नहीं चुने गए कि जो चाहें सो करने की छूट पाएँ, वरन इसलिए कि अपने कामों से दिखाएँ कि परमेश्वर ने हमें अपनी सन्तान होने के लिए लेपालक लिया है और अपनी देखरेख में ले लिया है, और अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हम में वास करना और हमें धार्मिकता की सब सिद्धता में अपने साथ जोड़ना चाहता है। साथ ही यह भी ध्यान रहे कि यद्यपि परमेश्वर ने हमें सुधारा है, और हमें भले मार्ग में लगाया है, और हमें यह अनुभव कराया है कि उसने अपने वचन के अधीन करने और सब बातों में आज्ञाकारी होकर अपनी सेवा करवाने के लिए हम में पहले ही काम आरम्भ कर दिया है, तौभी इससे यह नहीं निकलता कि
हम पहले ही दिन पूरी तरह सुधर जाते हैं। नहीं, अपने सारे जीवन भर भी नहीं। पौलुस यह नहीं कहता कि परमेश्वर अपने चुने हुओं और विश्वासियों को सिद्धता की पूर्ण अवस्था तक पहुँचा देता है, परन्तु यह कहता है कि वह उन्हें उस ओर खींचता है; इसलिए हम मृत्यु तक केवल उस ओर के मार्ग में ही हैं।
इसलिए जब तक हम इस संसार में जीवित हैं, हम सीखें कि अधिक से अधिक उन्नति करें और आगे बढ़ते जाएँ, और अपने को निश्चय दिलाएँ कि अभी सदा कुछ मार्ग शेष है। जो किसी सिद्धता की कल्पना करते हैं, वे या तो कपट और घमण्ड के मानो वश में हैं, या उनमें परमेश्वर का कोई भाव और भय ही नहीं, और वे उसके मुँह पर ही उसका उपहास करते हैं। क्योंकि जो अपने आप को जाँचता है, वह सदा अपने में दोषों का ऐसा भण्डार पाएगा कि यदि उन पर भली-भाँति विचार करे तो लज्जित होगा। इसलिए जो कहते हैं कि इस नश्वर देह में रहते हुए हम किसी सिद्धता तक पहुँच सकते हैं, वे यही दिखाते हैं कि या तो वे शैतानी घमण्ड से पूरी तरह अन्धे हो गए हैं, या वे अन्यजातियों के समान लोग हैं जिनमें न धर्म है न भक्ति।
जहाँ तक हमारा सम्बन्ध है, हम ध्यान दें, जैसा मैंने पहले संकेत किया, कि परमेश्वर ने हमें इसलिए चुना है कि हम निर्दोष हों; तौभी हम तब तक वैसे नहीं हो सकते जब तक हम अपनी सब निर्बलताओं से पूरी तरह छूट न जाएँ और पाप के इस बन्दीगृह से निकल न जाएँ, जिसमें हम अभी जकड़े हुए हैं।
और इसलिए जब हम अपने में कोई दोष अनुभव करें, तो उनसे साहसपूर्वक लड़ें, और यह सोचकर हताश न हों कि हम परमेश्वर की सन्तान नहीं हैं क्योंकि हम अभी उसके सामने निष्कलंक नहीं हैं। परन्तु हमारे पाप, जो हमें दोषी ठहराते हैं, सदा हमारी आँखों के सामने रहें। फिर भी, चाहे हम अपने में कितने ही दुःख पाएँ जो हमें मार्ग से हटाना चाहते हों, तब भी हम आगे बढ़ते रहें, यह निश्चय करके कि जब तक हम यहाँ पृथ्वी पर जीवित हैं, हमारा मार्ग कभी समाप्त नहीं होता। हमें सदा आगे ही बढ़ना है, और हम अपने विश्राम-स्थान तक कभी नहीं पहुँच सकते।
इस प्रकार विश्वासियों को, सिद्ध न होने पर भी, अपने को दृढ़ और सुदृढ़ करना चाहिए। और यही बात हमें उस बोझ के नीचे कराहने और आहें भरने के लिए भी प्रेरित करे जिसे हम अनुभव करते हैं; क्योंकि विश्वासियों की सिद्धता और
परमेश्वर की सन्तानों की सिद्धता यह है कि वे अपनी निर्बलता को स्वीकार करें और प्रार्थना करें, न केवल इसलिए कि उनके सब बुरे कामों का सुधार हो, वरन इसलिए भी कि वह अपनी अपार भलाई से उन्हें सह ले, और कठोरता और कड़ाई से उनका लेखा न ले। तो देखो, जिसकी शरण हमें सहायता के लिए लेनी है वह परमेश्वर की दया है, जिससे वह हमारे सब पापों को ढाँपता और सहता है, क्योंकि हम अब तक उस लक्ष्य तक नहीं पहुँचे जिसकी ओर वह हमें बुलाता है, अर्थात् पवित्र और निर्दोष जीवन। परन्तु संसार हमारे साथ जैसा भी चले, हम आगे बढ़ते रहें, और भली-भाँति चौकस रहें कि सीधे मार्ग से बाहर पग न रखें।
यदि "प्रेम" शब्द मनुष्यों के विषय में कहा गया है, तो पौलुस का अभिप्राय मसीहियों की सच्ची धार्मिकता से था, अर्थात् विश्वासयोग्यता और सच्चाई से व्यवहार करना। क्योंकि हम जानते हैं कि कपटी लोग रीतियों और दिखावे से, जैसा लोग कहते हैं, परमेश्वर को सन्तुष्ट करना चाहते हैं; और इस बीच उनमें से कुछ छीना-झपटी में लगे रहते हैं, कुछ डाह, द्वेष, क्रूरता और विश्वासघात से भरे होते हैं। कुछ पियक्कड़ होते हैं, और कुछ लम्पट और लुच्चे जीवन जीनेवाले, जो सब प्रकार की दुष्टता को खुली छूट देते हैं।
तौभी इस सब पर वे समझते हैं कि यदि वे कुछ भाव-भंगिमाएँ बना लें और कुछ रीतियाँ निभाकर पवित्रता का कुछ दिखावा कर लें, तो सब कुशल है। ऐसी सब बातों को काट देने के लिए पौलुस कहता है कि यदि हम चाहते हैं कि हमारा जीवन परमेश्वर को ग्रहणयोग्य हो, तो हमें प्रेम में चलना चाहिए, जो सिद्धता का बन्धन और व्यवस्था की पूर्ति है। इस प्रकार तुम देखते हो कि इस प्रसंग में हमें क्या ध्यान में रखना है।
इसके अतिरिक्त, हम ध्यान दें कि इस स्थान पर पौलुस ने हमें यह स्वीकार करने की शिक्षा दी कि हम में जो कुछ गुण और भलाई है, उस सब के लिए हम परमेश्वर के ऋणी हैं। जैसे, यदि हम में कोई भला उत्साह है, यदि हम अपने ही दोषों से लड़ते हैं, या परमेश्वर की आज्ञाकारिता में चलते हैं, तो यह कहाँ से आता है? इसी सोते से, कि उसने ऐसा ठहराया, अर्थात् उसने हमें पहले से चुन लिया। तब हम विचार करें कि इसका धन्यवाद
उसी का है, और हम उसे उसके अधिकार से वंचित न करें। क्योंकि यद्यपि हम स्वर्गदूतों के समान सिद्ध जीवन बिताएँ, तौभी यदि हम ऐसी मूर्खता करें कि सोचें कि यह हमारी अपनी स्वतंत्र इच्छा और अपनी ही प्रेरणा से होता है, तो हम सब से मुख्य बात चूक जाते हैं। क्योंकि हमारे भले कर्म परमेश्वर की महिमा करने के सिवा और किस काम के हैं? और यदि हम उन्हें अपने ही से उत्पन्न मानें, तो हम देखते हैं कि ऐसा करने से वे बिगड़ जाते हैं और दोषों में बदल जाते हैं, यहाँ तक कि वे घोर मिथ्या-अभिमान के सिवा और कुछ नहीं रह जाते।
तो तुम देखते हो कि इस वाक्य में पौलुस का लक्ष्य यह है कि हमें सदा परमेश्वर के स्वतंत्र चुनाव की ओर लौटा लाए, ताकि हम जानें कि सब भलाई उसी पर निर्भर है। उसने तुरन्त यह भी जोड़ा कि हम यीशु मसीह के द्वारा अपनी इच्छा की सुमति के अनुसार उसी में लेपालकपन के लिए पहले से ठहराए गए। जब वह कहता है कि परमेश्वर ने हमें लेपालकपन के लिए पहले से ठहराया, तो यह दिखाने के लिए है कि यदि हम
परमेश्वर की सन्तान होना स्वभाव से नहीं, वरन् केवल उसी के अनुग्रह से होता है।
अब उसका यह अनुग्रह केवल इस कारण से नहीं है कि परमेश्वर ने हम में कुछ पहले से देख लिया था, जैसा कि मैंने आज सवेरे संकेत किया था, परन्तु इसलिये कि उसने हमें पहले ही ठहरा लिया था और ऐसे लेपालकपन के लिये नियुक्त कर दिया था, यहाँ तक कि इसका कारण उसके अपने भीतर के सिवाय और कहीं ढूँढ़ा नहीं जा सकता। और इसी कारण पौलुस तुरन्त यह भी जोड़ता है कि उसने यह अपने आप में और अपनी ही इच्छा के भले अभिप्राय के अनुसार किया।
उसने वही बात फिर दोहराई जो मैंने आज प्रातःकाल कही थी, अर्थात् यह कि सब कुछ यीशु मसीह में किया गया। इसलिये तुम देखते हो कि इस वाक्य में हमें जो बात ध्यान में रखनी है वह यह है कि हमें परमेश्वर की सन्तान बनानेवाला और कोई कारण नहीं, केवल अपने आप में उसका हमें चुन लेना है, क्योंकि जन्म या विरासत से हमें ऐसा कोई विशेषाधिकार प्राप्त नहीं। और जैसा यूहन्ना के पहले अध्याय में कहा गया है, यह शरीर और लहू से भी नहीं होता, क्योंकि जो कुछ हमारे अपने भीतर ढूँढ़ा जा सकता है, वह सब पूरी तरह से निकाल दिया और मिटा दिया गया है। और यह हमें यह दिखाने के लिये है कि यदि मनुष्य अपनी पहली दशा में छोड़ दिए जाएँ, तो उनका परमेश्वर से कोई सम्बन्ध नहीं रहता, वरन् वे उसके राज्य से पूरी तरह कट जाते हैं। यह सच है कि
हमारा आदि पिता आदम परमेश्वर के स्वरूप के अनुसार सृजा गया था, और अपनी पहली दशा में वह उत्तम था। परन्तु पाप के प्रवेश करने के बाद हम सब पूरी तरह नष्ट हो गए, क्योंकि स्वयं आदम की भी अपनी कोई स्थिर दशा न थी, और जो स्वतंत्र इच्छा उसे दी गई थी, वह उसके लिये इसके सिवाय और किसी काम न आई कि वह और भी अधिक निरुत्तर ठहरे, क्योंकि वह जान-बूझकर और अपनी ही दुष्टता से गिरा। परन्तु इससे हम देखते हैं कि उसमें कैसी स्थिरता थी, क्योंकि वह बनते ही अपने पतन में हमें भी अपने साथ खींच ले गया।
तब भी, और अब भी, हम सब क्रोध की सन्तान होकर जन्म लेते हैं और परमेश्वर की ओर से शापित हैं। और इसलिये जब तक हम अपनी पहली दशा और स्थिति में बने रहते हैं, हम में अनन्त मृत्यु के सिवाय और कुछ नहीं है। इसलिये परमेश्वर को हमें अपने पास घर बुला लेना होगा। क्या हम ऐसा विशेषाधिकार मोल ले सकते हैं?
इसे मोल लेने के लिये सोना या चाँदी कहाँ है? वे कौन से गुण हैं जिनके द्वारा हमें परमेश्वर को इतने बड़े और उत्कृष्ट विशेषाधिकार का बदला चुकाना चाहिए? निश्चय ही, जैसा इसी वाक्य पर पहले कहा जा चुका है, यह न हमारे शरीर से आता है, न लहू से, अर्थात् यह उस किसी बात से नहीं आता जो हम इस संसार में पा सकते हैं, परन्तु केवल परमेश्वर के लेपालक बना लेने से आता है।
क्योंकि जो शब्द पौलुस काम में लाता है, उसका अर्थ सन्तान ठहराना है। जैसे जब कोई मनुष्य किसी बालक को गोद लेता है, तो उसे अपना उत्तराधिकारी चुन लेता है, और जो कुछ सम्पत्ति उसके पास है वह सब बाद में उसी अधिकार के अन्तर्गत चली जाती है, वैसे ही हम स्वर्गीय जीवन के उत्तराधिकारी हैं क्योंकि परमेश्वर ने हमें अपनी सन्तान होने के लिये लेपालक बनाया और चुन लिया है।
परन्तु पौलुस परमेश्वर के अनुग्रह की इतनी ही बड़ाई करके सन्तुष्ट नहीं होता। वह इसके अतिरिक्त यह भी कहता है कि परमेश्वर ने हमें पूर्वनियत भी किया था और यह बात पहले ही ठहरा दी थी। तब हम देखते हैं कि पौलुस उन सब बातों को एकत्र करता है जो हमारी उन मूर्खतापूर्ण कल्पनाओं को गिरा दें जो हम इस विषय में कर सकते हैं कि हम परमेश्वर के लिये कुछ ला सकते हैं, या अपने आप को उसके निकट पहुँचाकर उसके योग्य बना सकते हैं। इसलिये ऐसी सब बातें एक ओर रख देनी चाहिए। यही कारण है कि वह फिर दोहराता है,
"यीशु मसीह के द्वारा।" यदि यह पूछा जाए कि हम क्यों और कैसे
परमेश्वर की सन्तान होने के लिये पूर्वनियत किए गए, तो इसलिये कि उसने हमें मसीह में देखना स्वीकार किया। क्योंकि, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, वह मानो वह पंजी है जिसमें हम इसलिये लिखे गए हैं कि जीवन और उद्धार की विरासत को पाएँ।
यद्यपि परमेश्वर हमारी दुर्दशा पर तरस खाता है, तथापि यदि यीशु मसीह उसके सामने न आता तो हम सदा उसकी दृष्टि में घृणित ही ठहरते, क्योंकि हम सब जो आदम के वंश से हैं एक ही साँचे और बनावट के हैं, और हम में कोई दूसरे से अच्छा नहीं। अब, तब, एक प्रकार के लोग त्याग दिए गए हैं।
और ऐसा क्यों? इसलिये कि परमेश्वर उन्हें उन्हीं के अपने आप में देखकर उनसे अप्रसन्न होता है, परन्तु वह हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह में चुनता है और वहाँ हमें ऐसे दर्पण में देखता है जो उसे भाता है। इसलिये तुम देखते हो कि अन्तर कहाँ से आता है। तथापि, इस बात को और अच्छी रीति से प्रकट करने के लिये पौलुस कहता है कि परमेश्वर का हमें चुनना अपने आप में था। अर्थात् परमेश्वर ने हम सब को अपने ही में भला जाना।
परन्तु यहाँ पौलुस वह बात प्रकट करना चाहता है जो परमेश्वर के सब साधारण कामों में दिखाई नहीं देती: कि हमें चुनने के लिये उसे और किसी कारण ने नहीं, केवल उसकी अपनी इच्छा ने प्रेरित किया। इसलिये पौलुस सब प्रकार के विचार को दूर कर देता है जब वह कहता है कि परमेश्वर ने हमें अपने आप में चुना। यदि उसने हम में कोई योग्यता या पात्रता, कोई प्रवृत्ति या तत्परता, कोई भलाई या गुण, या संक्षेप में, एक बूँद भी ऐसी कोई वस्तु पाई होती जो उसे भाती और जिसे वह स्वीकार करता, तो उसने हमें अपने आप में न चुना होता। हमारा भी उसके साथ कुछ साझा ठहरता। इसलिये जब पौलुस देखता है कि हमारे उद्धार की सब बातें परमेश्वर के अभिप्राय में हैं और कहता है कि हमारा चुनाव भी वहीं बन्द है, तो यह ऐसा ही है मानो वह कहे कि मनुष्य बड़ी भारी भूल करते हैं जब वे अपने आप को कुछ मूल्यवान मानने लगते हैं, या यह समझते हैं कि वे ऐसे अनुग्रह को पाने के लिये अपने आप को तैयार करने में सहायक हुए हैं। इसलिये यदि हम यह जानना चाहते हैं कि हमारा उद्धार किस नींव पर टिका है, और उसका मूल सोता और प्रधान तथा
एकमात्र कारण क्या है, तो हमें ऊपर उठाए जाना होगा। इसलिये तुम देखते हो कि इस कथन का क्या अर्थ है कि परमेश्वर ने यह अपने आप में किया।
परन्तु पौलुस आगे और जोड़ता है, अपनी ही इच्छा के भले अभिप्राय के अनुसार। यदि वह केवल इच्छा शब्द ही लिख देता, तो वह पर्याप्त था। इसी प्रकार, जैसा हम पहले देख चुके हैं और पिछले रविवार को बताया गया था, पौलुस परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चुना गया था।
ऐसा क्यों? इसलिये कि वह न ऐसे विशेषाधिकार के योग्य था, न पात्र, परन्तु परमेश्वर को यही भाया कि उसे चुने। इसलिये पौलुस यह घमण्ड नहीं करता कि उसने प्रेरिताई प्राप्त कर ली, वरन् पूरी नम्रता से उसे परमेश्वर का सेंतमेंत दिया हुआ दान मानता है। इस प्रकार तुम देखते हो कि इच्छा शब्द का क्या अर्थ है, और यह केवल किसी एक स्थान में नहीं, वरन् सारे पवित्रशास्त्र में है। इसलिये जब कभी परमेश्वर की इच्छा का उल्लेख होता है, तो यह दिखाने के लिये होता है कि मनुष्य अपनी ओर से कुछ नहीं ला सकते।
तथापि, पौलुस यहाँ एक अतिरिक्त वचन जोड़ता है और कहता है, "अपनी इच्छा के भले अभिप्राय के अनुसार।" मानो वह यह कह रहा हो कि जब परमेश्वर की इच्छा ही हमारे उद्धार का कारण है, तो हमें इधर-उधर भटककर उसके अन्य कारण और साधन नहीं खोजने चाहिए। और यह इसलिए भी कि मनुष्य ऐसे कृतघ्न और द्वेषी हैं कि वे सदा परमेश्वर की महिमा को धुंधला कर देना चाहते हैं, और अपने मूर्खतापूर्ण अहंकार में इतने फूले हुए हैं कि जो उनका नहीं है वह भी निरन्तर अपने लिए माँगते रहते हैं।
वे परमेश्वर की महिमा को धुंधला करना चाहते हैं और अपने झूठे अहंकार में इतने फूले हैं कि वे निरन्तर अपने लिए उससे अधिक दावा करते हैं जितना उनका अधिकार है।
इसलिए यदि वे परमेश्वर की इच्छा के विषय में पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं, तो वे जान लें कि यह उसकी इच्छा के भले अभिप्राय से है, अर्थात् एक स्वतन्त्र रूप से झुकी हुई इच्छा से, जो अपने सिवा किसी अन्य बात पर निर्भर नहीं करती, और न इधर-उधर कुछ देखती है, परन्तु हमें स्वतन्त्रता से इसलिए चुनती है कि उसे ऐसा करना अच्छा लगा और उसने ऐसा ही चाहा।
अब हम देखते हैं कि जो लोग यह खोजते हैं कि परमेश्वर ने हमें क्यों चुना, वे यदि उनके वश में होता तो उसकी अनन्त ठहरावट को उलट देते। क्योंकि ये दोनों बातें एक-दूसरे से अलग नहीं की जा सकतीं। यदि परमेश्वर ने
हमें चुना है, जैसा कि यहाँ दिखाया गया है, तो कोई भी बात हमारी योग्यता पर, या आगे हमारे मन में आनेवाले किसी विचार पर निर्भर नहीं हो सकती। परन्तु परमेश्वर ने यह अपनी ही स्वतन्त्र रूप से झुकी हुई इच्छा के अनुसार किया, और उसे इसके लिए प्रेरित करनेवाला उसके अपने भले अभिप्राय के सिवा कोई और कारण नहीं मिला। यदि किसी को यह बात अजीब लगती है, तो इसलिए कि वे परमेश्वर के बराबर ठहराए जाना चाहते हैं। और यहीं उनकी शैतानी ढिठाई प्रकट होती है, कि वे परमेश्वर को स्वतन्त्रता से राज्य करने नहीं देते, कि जो कुछ उसे भला लगे वह बिना विरोध के भला, न्यायसंगत और उचित माना जाए। परन्तु ऐसे लोग चाहे जितना कुत्तों की तरह भौंकें, तो भी यह निर्णायक वाक्य अटल है, जिसे कोई रद्द नहीं कर सकता, जो पवित्र आत्मा ने यहाँ पौलुस के मुँह से कहा है, अर्थात् यह कि हमारे चुनाव का कारण परमेश्वर के भले अभिप्राय से आगे खोजना हमारा काम नहीं।
अर्थात् उसकी अपनी स्वतन्त्र रूप से झुकी हुई इच्छा से बढ़कर नहीं, जिससे उसने हमें चुना, यद्यपि हम किसी और बात में योग्य नहीं थे, सिवा इसके कि उसने ऐसा ही चाहा और यही उसे अच्छा लगा।
और इस प्रकार तुम देखते हो कि पौलुस के इन शब्दों से हमें वास्तव में क्या निष्कर्ष निकालना है।
अब वह तुरन्त कहता है कि यह "उसके अनुग्रह की महिमा की स्तुति के लिए" है। यहाँ उसने वह अन्तिम उद्देश्य दिखाया जिसे परमेश्वर ने हमें चुनने में ध्यान में रखा, अर्थात् यह कि उसके अनुग्रह की स्तुति हो, और वह भी साधारण और सामान्य रीति से नहीं, परन्तु एक विशेष महिमा के साथ।
क्योंकि उसने इन दोनों बातों को इसलिए एक साथ जोड़ा है कि हम चकित हो जाएँ जब देखें कि परमेश्वर ने हमें नरक की तह से निकालकर अपने राज्य का द्वार हमारे लिए खोला, और हमें उद्धार की मीरास के लिए बुलाया। यहाँ हम फिर वही बात देखते हैं जो मैंने आज सुबह कही थी, अर्थात् यह कि जो लोग परमेश्वर की पूर्वनियति को दूर करना चाहते हैं या उसकी चर्चा सुनना भी नहीं चाहते, वे इसी से प्रकट करते हैं कि वे परमेश्वर की स्तुति के प्राणघातक शत्रु हैं। उनके विचार में वह बिखरकर लुप्त हो जाती है। परन्तु इसका सक्षम न्यायी कौन है?
क्या वे अपने आप को परमेश्वर से अधिक बुद्धिमान समझते हैं, जिसने उनके दावे के बिलकुल विपरीत बात कही है? ओह, वे कहते हैं, यह तो बहुत से मनुष्यों के मुँह परमेश्वर की निन्दा करने के लिए खोल देने का अगला मार्ग होगा।
निश्चय ही दुष्टों के विषय में यह निश्चित है कि वे सदा निन्दा करने का कारण पाएँगे, और उन्हें ऐसा करने से रोका नहीं जा सकता। तो भी परमेश्वर के पास अपने आप को निर्दोष ठहराने के लिए बहुत कुछ है, और जो उसे और उसकी धार्मिकता को तुच्छ जानते हैं वे लज्जित किए जाएँगे। परन्तु बात चाहे जैसी हो, यहाँ यह कहना निराधार नहीं कि परमेश्वर की सच्ची महिमा तब होती है और उसकी स्तुति तब बढ़ती है जब हम मानते हैं कि उसने जिसे चाहा उसे स्वतन्त्रता से चुना, और मनुष्यों के बीच भेद का और कोई कारण नहीं सिवा उसकी इच्छा के, ताकि जिन्हें उसने त्यागा वे इसलिए नाश हों कि वे उसके योग्य हैं, और जिन्हें वह उद्धार के लिए बुलाता है वे इसका कारण उस स्वतन्त्र रूप से दिए गए लेपालकपन के सिवा कहीं और न खोजें।
इसके अतिरिक्त, इन दो शब्दों के द्वारा पौलुस हमें परमेश्वर की स्तुति करने में और अधिक उत्साह और लगन के लिए भी जगाना चाहता था। क्योंकि हमारे लिए यह पर्याप्त नहीं कि हम ठंडे मन से मान लें कि हमारा उद्धार परमेश्वर की केवल भली इच्छा से उत्पन्न हुआ है, परन्तु हमें मानो भीतर से प्रज्वलित होना चाहिए, और अपने आप को पूरी तरह उसकी स्तुति के लिए समर्पित कर देना चाहिए, मानो हम उसी से ब्याहे गए हों। जैसा पतरस दिखाता है, क्योंकि हम मृत्यु के अन्धकार से निकाले गए हैं, इसलिए यह उचित ही है कि हम परमेश्वर की अनगिनत स्तुतियों का वर्णन करते रहें।
और इससे वह यह दिखाना चाहता है कि जब विश्वासी परमेश्वर की भलाई की स्तुति करने में अपनी पूरी शक्ति लगा चुके होंगे, तब भी वे उसे कभी पूरा नहीं कर पाएँगे, क्योंकि वह अथाह है। इसलिए भली भाँति ध्यान दो कि हमें क्या स्मरण रखना है, और उसकी इस भलाई या अनुग्रह के विषय में, जिसकी वह बात करता है, हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि मनुष्य परमेश्वर को उसकी योग्य महिमा तब तक कभी नहीं देंगे जब तक वे पूरी तरह दीन न हो जाएँ, ताकि उनमें घमण्ड करने के लिए कुछ भी शेष न रहे। मान लो कि परमेश्वर के चुनाव का विचार कभी किया ही न गया होता;
तो क्या वह स्तुति के योग्य न रहता? नहीं, तब भी उसकी स्तुति का कुछ भाग तो रहता, क्योंकि यदि मनुष्य इतना ही कहें कि परमेश्वर अपना सूर्य हम पर उदय करता है, तो यही उसकी स्तुति करने के लिए पर्याप्त कारण होगा। और जब हम आँखें खोलकर ऊपर और नीचे उन अद्भुत कामों को देखते हैं जो वह हमें दिखाता है, तो वह भी हमें जीवन भर उसकी स्तुति में लगे रहने की बड़ी प्रेरणा है। इसके अतिरिक्त, जब उसका सुसमाचार हमें सुनाया जाता है, तब भी हमारे पास उसकी स्तुति करने का कारण है, चाहे उसके चुनाव का कोई उल्लेख बिलकुल न किया गया हो।
मैं कहता हूँ कि हमारी दृष्टि से तो यह पर्याप्त है, परन्तु तब उसे उसकी मुख्य स्तुति से वंचित किया जाएगा, और हम उसे उसके योग्य भाग का केवल एक टुकड़ा देंगे। और ऐसा क्यों? क्योंकि विश्वासी यह सोचने लगेंगे कि उनका विश्वास उनकी अपनी स्वयं-प्रेरित और स्वतन्त्र रूप से झुकी हुई इच्छा से उत्पन्न हुआ है।
मैंने आज सुबह तुमसे कहा था कि विश्वास चुनाव का फल है, क्योंकि हममें और अविश्वासियों में और कोई भेद नहीं सिवा इसके कि परमेश्वर ने अपना हाथ बढ़ाकर हमें एक गुप्त रीति से अपनी ओर खींच लिया, ऐसे समय जब हमने उसकी ओर पीठ फेर रखी थी और उसके लिए अजनबी थे।
संक्षेप में, पौलुस यहाँ व्यर्थ ही नहीं कहता कि परमेश्वर की स्तुति की महिमा जैसी होनी चाहिए वैसी तब तक कभी न होगी जब तक हम स्वीकार न करें
कि उसका चुनाव ही उन सब आशीषों का कारण है जो वह हमें देता है। और यदि उसने अपनी असीम दया से हमें अनादिकाल से जानबूझकर लेपालक न किया होता, तो उस स्तुति का एक अंश, जो केवल उसी का है, हमारे हिस्से में आ जाता।
और इस प्रकार परमेश्वर के अधिकार में से उतना घट जाता और कम हो जाता। निश्चय ही हम भली-भाँति देखते हैं कि यहाँ कहा गया है कि मनुष्य को पूरी तरह दीन किया जाना चाहिए, ताकि परमेश्वर को उसका अधिकार मिले और कोई मनुष्य उसका सहभागी न ठहरे। परन्तु सब मनुष्यों को मानना ही होगा कि वही हमारे उद्धार का आरम्भ करनेवाला भी है और पूरा करनेवाला भी।
साथ ही, हमें भली-भाँति ध्यान देना चाहिए कि पौलुस यह भी जोड़ता है कि उसने अपने ही अनुग्रह से हमें अपने प्रिय पुत्र में ग्रहण किया है। इससे और भी स्पष्ट हो जाता है कि हमारा उद्धार परमेश्वर के केवल चुनाव और उसकी मुफ़्त दी हुई भलाई पर क्यों टिका है, क्योंकि मनुष्य अपना मूर्खतापूर्ण अहंकार तब तक कभी न छोड़ेंगे जब तक वे इस प्रकार परास्त न हो जाएँ कि उनके पास उत्तर में कहने को एक शब्द भी न रहे। इसलिए पौलुस हमें ऐसे विवेक तक लाने के लिए बताता है कि हम अपने आप में दोषी ठहरे और नष्ट हुए हैं। अब जब ऐसा वज्र हमारे सिरों पर गिरता है, तो हमारे लिए और अड़े रहने का कोई स्थान नहीं। यदि मनुष्य इतने मूर्ख हों कि परमेश्वर के एकमात्र अनुग्रह के सिवा कुछ न कुछ अपने लिए बचाकर रखने की खोज में चरखियाँ घुमाते फिरें, तो उन्हें इससे अधिक कुछ नहीं चाहिए जो उन्हें इससे फेर दे, अर्थात् यह कि जब तक हम यीशु मसीह में न थे तब तक हम परमेश्वर की कृपा में न थे, क्योंकि हम अपने आप में पूरी तरह दोषी और शापित हैं। यह बात पहले ही पर्याप्त रीति से बताई जा चुकी है, यदि हम इससे भर न उठे हों, क्योंकि यह ऐसी बात है जो अत्यन्त आवश्यक है और हमारे सामने अत्यन्त स्पष्ट होनी चाहिए। और सचमुच इस विषय में अनुभव भी हमें सिखाए। और निश्चय ही, यदि कपट हमें बहुत अन्धा न कर देता, तो हम भली-भाँति समझ लेते कि हम में दुष्टता के सिवा कुछ नहीं है, और परमेश्वर का क्रोध हमें ऐसे भय से मारता कि हम अपनी सूझ-बूझ खो बैठते। परन्तु परमेश्वर को बलपूर्वक हमें आज्ञाकारिता में लाना पड़ता है, नहीं तो हमारे मन में यह बात आती ही नहीं कि सारी स्तुति उसी को सौंप दें।
इसलिए हम भली-भाँति ध्यान दें कि इस कथन का क्या अर्थ है जहाँ कहा गया है कि हम यीशु मसीह में कृपा-पात्र बनाए गए क्योंकि वह प्रिय पुत्र है। और यीशु मसीह परमेश्वर का प्रिय पुत्र क्यों कहलाता है, जैसा कि मत्ती के 17वें अध्याय में और अन्य स्थानों में उसे कहा गया है, और जैसा भविष्यद्वक्ता यशायाह में भी दिखाया गया है? इससे हमें यह दिखाया जाता है कि जब तक हम अपनी स्वाभाविक दशा में बने रहते हैं, परमेश्वर न्यायपूर्वक हमसे घृणा करता और हमें तुच्छ जानता है। क्योंकि यदि वह उपाधि यीशु मसीह की ही विशेष न होती, तो यह कहना व्यर्थ होता, "यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं प्रसन्न हूँ।" परन्तु यदि वह यीशु मसीह की ही विशेष है, तो फिर
कोई अन्य सृष्टि उसका दावा नहीं कर सकती। यहाँ तक कि यद्यपि परमेश्वर अपने स्वर्गदूतों से प्रेम करता है, तथापि वे यीशु मसीह के द्वारा ही उसके पूर्ण प्रिय ठहर सकते हैं। और जहाँ तक हमारा सम्बन्ध है, वहाँ तो कहीं अधिक बड़ा विचार है। क्योंकि जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, हम शिर से कटे हुए हैं, और यीशु मसीह वह मध्यस्थ या प्रवक्ता है जो स्वर्गदूतों का परमेश्वर से मेल कराता है। यहाँ तक कि यदि वे उसके द्वारा थामे न जाते, तो उनमें कोई स्थिरता, कोई दृढ़ता न होती। और इसके अतिरिक्त उनकी धार्मिकता भी सिद्ध न होती, परन्तु वे उसी में धन्य और चुने गए हैं। यह तो एक बात हुई।
जहाँ तक हमारा सम्बन्ध है, चूँकि हम पाप के कारण परमेश्वर से दूर हो गए हैं, इसलिए उसे हमें अपने शत्रु मानना और हमारा विरोधी होना ही पड़ेगा। इसलिए मनुष्यों में यीशु मसीह ही एकमात्र प्रिय है। और हम सब बाकी लोगों को परमेश्वर पूरी तरह नापसन्द करता और अस्वीकार करता है। वरन् इतना कि वह कहता है कि उसे मनुष्य के बनाने का पछतावा हुआ। इस कथन का अर्थ यह है कि हम गधों, कुत्तों और अन्य पशुओं में गिने जाने के भी योग्य नहीं हैं, क्योंकि वे परमेश्वर की सृष्टि में उसी दशा में बने रहते हैं जिसमें उसने उन्हें बनाया था, परन्तु हम इतने दुष्ट और बिगड़े हुए हैं कि हम मिटाए जाने के योग्य हैं और इस योग्य कि हमारी स्मृति परमेश्वर के सामने शापित और घृणित हो।
अब चलो हम डींग मारें और अपने आप को बड़ा बनाने के उपाय ढूँढ़ें, क्योंकि हम देखते हैं कि पवित्र आत्मा उन सबसे असहमत है जो अपने आप को कुछ मूल्यवान समझते हैं। इसलिए आइए हम विचार करें कि यदि हम परमेश्वर के शत्रु हैं, तो हमारी दशा उससे भी बुरी है जैसे कि हम कभी सृजे ही न गए होते। इस पर पौलुस हमें बताता है कि परमेश्वर ने हमें अपने प्रिय पुत्र में ग्रहण किया है। तो फिर, जब हमारे प्रभु यीशु मसीह को परमेश्वर पिता ने प्रिय पुत्र के रूप में ग्रहण किया है, केवल अपने ही व्यक्तित्व के कारण नहीं, वरन् उस प्रेम के कारण भी जो उसकी देह के सब अंगों तक पहुँचाया जाता है, तो इसी रीति से हम फिर घर बुलाए गए हैं, और परमेश्वर हमें अपनी सन्तान जानकर गले लगाता है, जबकि पहले हम उसके शत्रु थे और उसके द्वारा पूरी तरह घृणित थे।
परन्तु संसार चाहे कैसा भी चले, हमें सदा उस चुनाव की ओर लौटना ही होगा जिसकी चर्चा हम पहले कर चुके हैं। क्योंकि वह अनुग्रह जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हम तक पहुँचाया जाता है, वह भी उसी स्रोत से निकलता है। इसलिए, उस विषय को जारी रखते हुए जिसे मैं पहले छू चुका हूँ, वह हमें दिखाता है कि यीशु मसीह में प्रिय ठहरना हमारे लिए कितना आवश्यक है। क्योंकि यदि यह हमारे मुँह पर सिद्ध न किया जाता, तो हम कभी निष्कपट भाव से न मानते कि हम सब बातों के लिए परमेश्वर के ऋणी हैं, क्योंकि हम सदा किसी न किसी रीति से अपने आप को आगे बढ़ाने में लगे रहते हैं, और हम में से हर एक कुछ न कुछ अपने लिए बचा रखना चाहता है, चाहे वह एक पिन की नोक के बराबर ही क्यों न हो। परन्तु इसके विपरीत पौलुस हमें बताता है कि परमेश्वर को हमें हम से बाहर रहकर ही प्रेम करना पड़ता है, और यदि वह हमें चाहता है, तो वह हमारे अपने कारण से नहीं हो सकता। और क्यों?
क्योंकि हम पाप के बन्दी और दास हैं, शैतान के जूए और अत्याचार के नीचे दबे हुए हैं। अन्त में, जब तक हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमारा छुटकारा न हो जाए, हम मृत्यु की दासता में बन्द हैं।
अब हम देखते हैं कि इस शिक्षा का सार यह है कि मनुष्यों को चेतावनी दी जाती है कि वे अपने आप से निकलें और अपना उद्धार केवल परमेश्वर की भलाई में खोजें, और उस उपाय को थामे रहें जो यहाँ हमें बताया गया है, अर्थात् हमारे प्रभु यीशु मसीह की शरण में जाना। फिर भी दो बुरी अति हैं जिनसे हमें सावधान रहना चाहिए। पहली यह कि जब हम अपने प्रभु यीशु मसीह के पास आते हैं, तो हमें यह कल्पना नहीं करनी चाहिए कि हम में कोई ऐसी योग्यता है जो हमें उसके लाभों का भागी बनाए। और इस दोष का सुधार कैसे हो? परमेश्वर के स्वतंत्र चुनाव की ओर ले जाए जाने से ही। क्योंकि मनुष्य जो अपनी स्वतंत्र इच्छा पर इतना भरोसा करते हैं, और जिस आधार पर वे अपने पुण्य और योग्यता के विषय में अपनी धारणा खड़ी करते हैं, उसका कारण यही है कि वे नहीं जानते कि वे किसी और दृष्टि से कुछ भी नहीं हैं, केवल इस कारण कि परमेश्वर ने अपनी ही निरी स्वतंत्र भलाई से उन्हें ग्रहण किया है, क्योंकि उसने अपने अनन्त संकल्प में उन्हें पहले ही चुन लिया है।
इसलिए हम अपने उद्धार का आरम्भ परमेश्वर को किसी भी रीति से तब तक नहीं दे सकते जब तक हम वह स्वीकार न करें जो यहाँ हमें दिखाया गया है, अर्थात् यह कि जब उसने हमें गोद लिया उस समय हम पूरी तरह दण्ड के योग्य और शापित थे, और उसके हमें गोद लेने का मूल कारण यही है कि उसने जगत की सृष्टि से भी पहले हमें पूर्वनियत किया था। इसे एक बात के रूप में ध्यान में रखो। दूसरी बुरी अति, जिससे हमें वैसे ही सावधान रहना चाहिए, तर्क-वितर्क है। बहुत से कल्पनाशील लोग कहेंगे,
"जहाँ तक मेरी बात है, मैं कभी न जान पाऊँगा कि परमेश्वर ने मुझे चुना है या नहीं, इसलिए मुझे अपने विनाश में ही पड़े रहकर सन्तोष करना होगा।" हाँ, परन्तु यह इसलिए है कि वह यीशु मसीह के पास नहीं आता। हम कैसे जानें कि परमेश्वर ने जगत की सृष्टि से पहले हमें चुना है? यीशु मसीह पर विश्वास करने से। मैं पहले कह चुका हूँ कि विश्वास हमारे चुनाव से उत्पन्न होता है और उसका फल है, जिससे प्रकट होता है कि हमारी जड़ भीतर छिपी है। जो विश्वास करता है, उससे उसे निश्चय हो जाता है कि परमेश्वर ने उसमें कार्य किया है। विश्वास मानो वह प्रतिलिपि है जो परमेश्वर ने हमारे गोद लिए जाने के मूल अभिलेख में से हमें दी है।
परमेश्वर का अपना अनन्त संकल्प या निर्णय है, और उसे वह सदा अपने ही पास एक मुख्य मूल अभिलेख के रूप में रखता है, जबकि विश्वास के द्वारा वह हमें उसकी एक प्रतिलिपि देता है। मैं यहाँ मनुष्यों की रीति से बोल रहा हूँ, क्योंकि हम जानते हैं कि परमेश्वर हमें दर्ज करने के लिए न कागज़ काम में लाता है न चर्मपत्र।
और जैसा मैं तुम्हें पहले बता चुका हूँ, ठीक-ठीक कहें तो जिस पंजी में हमारा नाम लिखा गया है वह हमारा प्रभु यीशु मसीह है। तथापि परमेश्वर हमारे चुनाव का ज्ञान अपने ही पास रखता है, जैसे कोई राजा मूल अभिलेख अपने पास रखता है, परन्तु उसने हमें उसकी प्रतिलिपियाँ दी हैं, जो पर्याप्त प्रामाणिक हैं, क्योंकि वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे हृदयों में यह अंकित करता है कि हम उसकी सन्तान हैं।
तो तुम देखते हो कि हमारे प्रभु यीशु मसीह में जो विश्वास हमें है, वही हमारे चुनाव की निश्चयता देने के लिए पर्याप्त है। तब हम और क्या खोजें? मैंने अभी तुमसे कहा कि यीशु मसीह वह दर्पण है जिसमें परमेश्वर हमें तब देखता है जब वह हम से प्रसन्न होना चाहता है।
वैसे ही हमारी ओर से, वह वह दर्पण है जिस पर हमें अपनी आँखें और दृष्टि टिकानी चाहिए जब हम अपने चुनाव का ज्ञान पाना चाहते हैं।
क्योंकि जो कोई यीशु मसीह पर विश्वास करता है वह परमेश्वर की सन्तान है, और इसलिए उसका वारिस भी, जैसा मैं पहले बता चुका हूँ। तब यह निकलता है कि यदि हम में विश्वास है, तो हम गोद भी लिए गए हैं। क्योंकि परमेश्वर हमें विश्वास क्यों देता है?
इसी कारण कि उसने जगत की सृष्टि से पहले हमें चुना। इसलिए यह एक अटल क्रम है: क्योंकि विश्वासी जन प्राप्त करते हैं
परमेश्वर का अनुग्रह और उसकी दया को अपनाते हैं, यीशु मसीह को अपना सिर मानकर, इस अभिप्राय से कि उसी के द्वारा उद्धार पाएँ, तो वे निश्चय से जानते हैं कि परमेश्वर ने उन्हें गोद लिया है। यह सच है कि चुनाव अपने आप में गुप्त है, और ऐसा गहरा और छिपा हुआ निर्णय है कि उसका आदर करना हमारे लिए उचित है। तथापि परमेश्वर उसे हम पर उतना प्रकट करता है जितना आवश्यक है और जितना वह जानता है कि हमारे लाभ और कल्याण के लिए है, और ऐसा वह तब करता है जब वह अपने सुसमाचार की प्रतीति से हमें प्रकाशित करता है। इसी से तुम देखते हो कि पौलुस ने परमेश्वर के अनन्त चुनाव की बात कहने के बाद यीशु मसीह को उस के रूप में सामने रखा जिसकी शरण हमें जाना चाहिए, ताकि हमें निश्चय हो कि परमेश्वर हम से प्रेम करता है और हमें अपनी सन्तान के रूप में ग्रहण करता है, और इसलिए कि उसने हमें गोद लिया था इससे पहले कि हम उसे जानते, हाँ, और जगत के बनने से पहले।
फिर इस वाक्य से हमें यह समझना चाहिए कि पूर्वनियति का सिद्धान्त हमें भटकानेवाले तर्क-वितर्कों में ले जाने के लिए नहीं, परन्तु हम में से सारे घमण्ड को, और अपनी योग्यता और पात्रता के विषय में जो मूर्खतापूर्ण धारणा हम सदा बनाए रखते हैं उसे, चूर करने के लिए है, और यह दिखाने के लिए कि परमेश्वर को हम पर ऐसा स्वतंत्र अधिकार, विशेषाधिकार और सर्वोच्च प्रभुत्व है कि वह जिसे चाहे ठुकरा दे और जिसे चाहे चुन ले। इस रीति से हम उसकी महिमा करने और साथ ही यह मानने के लिए प्रेरित होते हैं कि हमारा उसके द्वारा चुना जाना यीशु मसीह में है, ताकि हम उसके सुसमाचार के विश्वास में दृढ़ बने रहें। क्योंकि यदि हम उसके अंग हैं और उसे अपना सिर मानते हैं, उस
वाचा और पवित्र एकता के अनुसार जो उसके और हमारे बीच है, तो जब तक हम उसके सुसमाचार पर विश्वास करते हैं, हम कभी तोड़े नहीं जा सकते। हमें अपने उद्धार की निश्चयता पाने के लिए उसी की शरण में जाना चाहिए, क्योंकि हम अनुभव से देखते और अनुभव करते हैं कि परमेश्वर ने हमें गोद लिया है और चुना है, और वह अभी हमें बुलाता है और हमसे कहता है कि जो निश्चयता उसने हमें दी है और प्रतिदिन अपने सुसमाचार के द्वारा देता है, अर्थात् कि वह हमारा पिता होगा, विशेषकर जब वह उसे अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे हृदयों में अंकित करता है, वह कोई धोखे की बात नहीं है। क्योंकि सुसमाचार का प्रचार सब मनुष्यों में, यहाँ तक कि त्यागे हुओं में भी, भली-भाँति किया जा सकता है, परन्तु इतने पर भी परमेश्वर उन पर इतना अनुग्रहकारी नहीं कि उनके मर्म को छुए। इसलिए जब परमेश्वर का हमें गोद लेना हमारे हृदयों में अंकित हो जाता है, तब वह आगे प्रकट किया जाएगा। हमारे पास एक अच्छी और अविनाशी प्रतिभूति है कि परमेश्वर अन्त तक हमारी अगुवाई करेगा, और क्योंकि उसने हमें उद्धार के मार्ग में ले चलना आरम्भ किया है, वह हमें उस सिद्धता तक पहुँचाएगा जिसके लिए वह हमें बुलाता है।
इसलिए, क्योंकि उसके बिना हम एक दिन भी स्थिर नहीं रह सकते। परन्तु अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने गिरकर दण्डवत् करें।
परमेश्वर के सामने अपने दोषों को मानते हुए, और उससे प्रार्थना करते हुए कि वह हमें उन्हें और अधिक देखने की समझ दे, ताकि उनसे पूरी तरह लज्जित होकर हम अपने पापों से, और अपने सारे जीवन से उसकी निकम्मेपन और नीचता समेत, घृणा करें, और उसी की ओर फिरें जो अकेला इसका उपचार करने में समर्थ है, और उससे इधर-उधर न भटकें, जैसे वह हमारे प्रभु यीशु मसीह में अपने आप को हम पर प्रकट करता है। आइए हम सीधे उसी की ओर चलते रहें, यह मानते हुए कि जैसे हम उसमें चुने गए हैं, वैसे ही उसी के निमित्त हम थामे और सुरक्षित भी रखे जाते हैं, और वह हम में अपनी सामर्थ्य को और अधिक प्रकट करता रहेगा, जब तक हम अपनी दौड़ पूरी करके उस स्वर्गीय उत्तराधिकार तक न पहुँच जाएँ जिसकी ओर हम जा रहे हैं।
उससे विनती करते हुए कि यद्यपि हम अभी उससे बहुत दूर हैं, तथापि वह कृपा करके हमें ऐसा दृढ़ और अजेय बल दे कि हम निरन्तर टिके रहें, ताकि हम संसार का पूरी तरह त्याग कर दें, और अपने आप में पूरी तरह मिट जाने पर परमेश्वर के स्वरूप में नए किए जाएँ, कि वही स्वरूप हम में पूर्ण रूप से चमके, जब तक हम उस महिमामय
अमरता के भागी न बना दिए जाएँ, जिसे उसने हमारे लिए बड़ी कीमत देकर मोल लिया है। वह प्रसन्न होकर यह अनुग्रह केवल हमें ही नहीं, वरन सब लोगों और जातियों को भी प्रदान करे, इत्यादि।
तीसरे खण्ड की समाप्ति
