अध्याय 6 / 16

प्रथम अध्याय पर पाँचवाँ उपदेश - इफिसियों 1:13-14

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प्रथम अध्याय पर पाँचवाँ उपदेश - इफिसियों 1:13-14

हमारे भाई और संगी बन जाएँ। परमेश्वर ने उन्हें यह कार्यभार सौंपा है कि वे हमारे सब मार्गों में हमारी अगुवाई और रक्षा करें, हम पर दृष्टि रखें, और उन सब शत्रुओं का सामना करने के लिये, जो हमसे लड़ाई करते हैं, निरन्तर संघर्ष में लगे रहें, जब तक कि हम सब स्वर्ग के विश्राम में इकट्ठे न कर लिये जाएँ।

अब आइए, हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपनी भूलों को मानते हुए दण्डवत् करें, और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उनका ऐसा गहरा बोध कराए कि वह हमें सच्चे मन फिराव की ओर खींचे, और हमारे जीवन भर हम उसी में बने रहें। तौभी हम उस पर भरोसा रखना न छोड़ें और उसकी दृष्टि में साहस के साथ अपने आप को प्रस्तुत करें, क्योंकि हमारे पापों को उस लहू से धो डाला गया है जो उन्हें धोने के लिये बहाया गया।

हम अपने आप को इस सिद्धान्त के अनुसार ऐसा ढालें कि अपने जीवन भर यह मानते रहें कि जब उसने हमें इतने बड़े मूल्य पर मोल लिया है, तो हमें अपने आप को पूरी तरह उसकी सेवा में अर्पित कर देना चाहिए। जब उसने अपने आप को हमारे प्रति ऐसा भला छुड़ानेवाला दिखाया है, तो हम इस में सन्देह न करें कि वह दिन-प्रतिदिन अपनी भलाई जारी रखेगा, और जो काम उसने आरम्भ किया है उसे पूरी तरह सिद्ध करेगा, और सब आक्रमणों में हमें सामर्थ्य देगा, जब तक कि वह हमें शैतान और उसके सब सहायकों की क्रूरता से छुड़ा न ले। वह हमें इस संसार से पूरी तरह निकालकर उस सुखमय आशीष का भागी बनाए जिसके लिये वह हमें बुलाता है।

उसे यह भाता है कि यह अनुग्रह केवल हमें ही नहीं, वरन् सब लोगों और जातियों को भी प्रदान करे। आमीन।

प्रथम अध्याय पर पाँचवाँ उपदेश

13. तुम भी मसीह पर भरोसा रखते हो, सत्य के वचन को सुनकर, अर्थात् तुम्हारे उद्धार के उस शुभ समाचार को, जिस पर विश्वास करने से तुम पर भी प्रतिज्ञा के पवित्र आत्मा की छाप लगी।

14. वह हमारी मीरास का बयाना है, कि उस मोल ली हुई सम्पत्ति के छुटकारे तक उसकी महिमा की स्तुति हो।

हम पहले देख चुके हैं कि पौलुस ने कैसे घोषित किया है कि हमारे उद्धार का आधार परमेश्वर की निःशुल्क भलाई के सिवाय और कोई नहीं है, और हमें इसका कारण कहीं और नहीं खोजना चाहिए कि वह एक को क्यों चुनता और दूसरे को क्यों छोड़ देता है। क्योंकि हमें उचित है कि हम उसकी केवल इच्छा, उद्देश्य और अटल निर्णय से सन्तुष्ट रहें। और जो कोई इससे आगे जाता है, वह अपनी ही उतावली के कारण ऐसे गड्ढे में अवश्य गिरेगा, और यह अनुभव करेगा कि जो लोग परमेश्वर की महिमा और उसकी सनातन आज्ञा का पूरी दीनता और श्रद्धा के साथ आदर नहीं कर सकते, उन्हें लज्जित होना ही पड़ेगा। इसलिये जब कभी हम अपने उद्धार का कारण खोजने लगें, तो हम सीखें कि इसे पूरी तरह परमेश्वर ही को दें।

यह सच है कि परमेश्वर की सन्तान और वारिस होने के लिये हमारा हमारे प्रभु यीशु मसीह की देह का अंग होना आवश्यक है, जो विश्वास से होता है। परन्तु हम सुसमाचार पर विश्वास नहीं कर सकते जब तक परमेश्वर अपनी पवित्र

आत्मा के द्वारा हमें उसकी ओर न खींचे। अब हम देखते हैं कि वह सब मनुष्यों से एक जैसा व्यवहार नहीं करता। क्योंकि वह सारे संसार को भली-भाँति प्रकाशित कर सकता था और ऐसा कर सकता था कि कोई अविश्वासी रहे ही नहीं, परन्तु हम इसके विपरीत देखते हैं। इसलिये हम अपने आप को निश्चय दिलाएँ कि वह जिसे चाहता है उसे चुनता है। यदि कोई मनुष्य पूछे कि वह ऐसा क्यों करता है, तो यह बहुत बड़ा अहंकार होगा, और यही वह कारण है जिससे इतने घमण्डी लोग अपनी ही गर्दन तोड़ बैठते हैं, क्योंकि वे अपने मन में यह स्वीकार नहीं कर पाते

कि परमेश्वर मनुष्यों पर अपनी ही इच्छा के अनुसार शासन करता है, जैसा करने का उसे पूरा अधिकार है।

इसके अतिरिक्त, पौलुस ने इसके पहले यहूदियों और अन्यजातियों दोनों को एक ही समतल भूमि पर खड़ा किया है, और यह ऐसी बात है जिस पर और लम्बे विवेचन की आवश्यकता है। क्योंकि जब परमेश्वर ने अब्राहम की सन्तान को चुना था, तो यह सोचा जा सकता था कि उनमें कोई योग्यता थी। निश्चय ही यदि हम उस विशेष कृपा पर दृष्टि करें जो परमेश्वर ने यहूदियों पर दिखाई, तो वे संसार के और सब लोगों से अधिक सम्मान के योग्य ठहरते हैं। परन्तु यदि कोई उन्हें वैसा ही ले जैसे वे अपने आप में हैं, तो वह उन्हें सब धार्मिकता से रहित पाएगा। क्योंकि हमें सदा इसी बिन्दु पर लौटना चाहिए कि परमेश्वर किसी मनुष्य का बन्धक या ऋणी नहीं है, और यहूदियों को निःशुल्क लेपालकपन से ग्रहण करना इसलिये नहीं था कि वे और मनुष्यों से अधिक मूल्यवान थे या इसलिये कि वे अपने विषय में किसी प्रकार की डींग मार सकते थे।

इसलिये आप देखते हैं कि पौलुस स्पष्ट रूप से क्यों कहता है कि जिन्होंने बीते समय में यीशु मसीह पर विश्वास किया, वे भी औरों की तरह परमेश्वर के चुनाव के अन्तर्गत आते हैं, और औरों को यह घमण्ड करने का अवसर नहीं कि वे उनसे अधिक योग्य हैं या उन्होंने उनसे अधिक कमाया है; वरन् सबको इसी बिन्दु पर आना होगा कि यहूदियों में से हो या अन्यजातियों में से, परमेश्वर जिसे चाहता और पसन्द करता है उसे चुनता है, ताकि इस विषय में केवल उसकी दया के सिवाय और कुछ विचारणीय न रहे, और सब के मुँह बन्द हो जाएँ, और कोई यह न कह सके कि उसने अपनी ओर से कुछ लाया।

तथापि, जब पौलुस यहूदियों और अन्यजातियों के बीच यह तुलना आरम्भ करता है, तो वह कहता है कि यदि कोई इस पर दृष्टि करे कि परमेश्वर ने यहूदियों को अपनी विशेष निज सम्पत्ति के रूप में ग्रहण किया, तो वे एक पवित्र वंश थे, और उसने उन्हें अपनी व्यवस्था और प्रतिज्ञाएँ दी थीं, जिनके कारण वे उन सब बाकी लोगों से जिन्हें उसने छोड़ दिया और झटक दिया था, कहीं उत्कृष्ट और ऊँचे पद पर थे। परन्तु यदि हम

परमेश्वर की ओर दृष्टि करें, तो मनुष्य की सारी महिमा को अवश्य ही धूल में मिलना होगा। पौलुस उस स्थान पर केवल हमारे पापों की क्षमा और विश्वास के द्वारा परमेश्वर के अनुग्रह को अपनाने की बात करता है, और वह दिखाता है कि इन बातों का कारण परमेश्वर की हम पर तरस खाने के सिवाय और कुछ नहीं ठहराया जा सकता।

साथ ही, हम गलातियों की पत्री में पहले देख चुके हैं कि कैसे

पौलुस ने पतरस से कहा, "हम तो जन्म से यहूदी हैं।" क्योंकि यह एक सामान्य धारणा थी कि यहूदी एक पवित्र वंश हैं, क्योंकि वे अब्राहम के वंश से उत्पन्न हुए हैं, तो ठीक है (वह कहता है), चाहे बात जैसी भी हो, हमारे पास उद्धार की कोई और शरण या निश्चयता नहीं सिवाय इसके कि हम यीशु मसीह पर विश्वास करें, क्योंकि वह भली-भाँति जानता था कि मनुष्य अपने आप में पूरी तरह नष्ट और खोए हुए हैं, और अपने साथ परमेश्वर के क्रोध और श्राप के सिवाय और कुछ नहीं लाते।

इसलिए जैसा उन पदों में, वैसे ही पौलुस ने दिखाया है कि यदि मनुष्य यह सोचते हैं कि उनमें कोई योग्यता या पात्रता है, तो वे अपने आप को धोखा देते हैं। अब इसी सिद्धान्त की और भी दृढ़ पुष्टि के लिए, और सब विवाद को दूर करने तथा सब प्रत्युत्तरों को निरुत्तर करने के लिए, वह हमें इस स्रोत तक ले जाता है: अर्थात् परमेश्वर जिसे चाहता है उसे केवल विश्वास ही नहीं देता, वरन् उसने जगत की सृष्टि से पहले हमें चुन भी लिया है और ठहरा भी लिया है।

तो तुम देखते हो कि जिस बात पर हमें ध्यान देना है, वह वस्तुतः यह है कि छोटे से बड़े तक सब मनुष्य परमेश्वर के ऋणी हैं, और कोई ऐसा पवित्र या उत्तम नहीं जो अपने आप को मनुष्यों की इस सामान्य दशा से अलग कर सके।

अब इसी पर पौलुस परमेश्वर की भलाई की महिमा करता है, कि इफिसियों को उन लोगों के साथ इकट्ठा करके एक कर दिया गया जो पहले से परमेश्वर की प्रजा और उसकी कलीसिया के घराने के गिने और माने जाते थे। इफिसियों के सुसमाचार पर विश्वास करने से पहले उन दोनों के बीच बड़ा भेद था, जैसा कि दूसरे अध्याय में विस्तार से बताया जाएगा। परन्तु इतना होने पर भी विश्वास करनेवाले यहूदी,

जो पहले ही हमारे प्रभु यीशु मसीह की ओर फिर चुके थे, स्वर्ग के स्वर्गदूतों के भाइयों के समान थे, क्योंकि वे उस सिर के अंग थे जो दोनों के लिए एक ही था; जबकि इसी बीच इफिसी बेचारे अभागे थे, जो उद्धार की सब आशा से बाहर थे, परमेश्वर के बैरी थे, और हर प्रकार के शाप में डूबे हुए थे। देखो,

परमेश्वर ने उस भेद को दूर कर दिया और दोनों को एक ही पाँति में खड़ा कर दिया।

इसलिए परमेश्वर की भलाई और भी अधिक प्रकट हुई, क्योंकि उसने उन लोगों को, जो नरक की तलहटी में डूबे हुए थे, इस प्रकार वापस बटोरा कि उन्हें अपनी ही सन्तानों के साथ बराबर कर दे और उन्हें अपने स्वर्गीय राज्य का संगी वारिस बना दे।

इसी कारण पौलुस, उनके विषय में कहने के बाद जो पहले से यीशु मसीह पर विश्वास कर चुके थे, हमें स्पष्ट बताता है कि परमेश्वर ने अपनी कलीसिया को इस प्रकार इकट्ठा और स्थापित किया है कि भली-भाँति प्रकट हो जाए कि जो सबसे बड़े हैं वे भी पूरी रीति से उसी पर निर्भर हैं और उसकी एकमात्र दया के सिवाय उनके पास टिकने को और कुछ नहीं; और जो किसी प्रकार से त्यागे हुए, वरन् घृणित ठहराए गए थे, उनके पास उसकी महिमा करने का कारण है, क्योंकि उसने उन्हें उस दुर्दशा से छुड़ाया जिसमें वे पड़े थे।

इसके साथ ही पौलुस दिखाता है कि जो बात उसने पहले कही थी, वह परमेश्वर के अनुग्रह के प्रभावों द्वारा हम पर प्रमाणित होती है। क्योंकि (जैसा मैंने पहले कहा है) हमारा चुनाव एक गुप्त बात है, वरन् मनुष्य की समझ से परे है।

जब मनुष्य जहाँ तक सम्भव है इसकी जाँच-पड़ताल कर चुके, तब भी यदि वे परमेश्वर की उस अनन्त ठहरावट में प्रवेश करने का मन रखें, तो अवश्य ही अपनी ही कल्पनाओं में भटक जाएँगे। इसलिए हमारे लिए उचित नहीं कि पवित्रशास्त्र जहाँ तक हमारी अगुवाई करता और मार्ग दिखाता है, उससे आगे खोजें। तो तुम देखते हो कि परमेश्वर का हमें चुनना उसी में छिपा हुआ है, पर तौभी वह उन अनुग्रह के वरदानों के द्वारा, जो वह हमें देता है, हमें उसका प्रमाण देता है; जैसे विश्वास, जो पवित्र आत्मा का वरदान है।

इसे एक बात के रूप में ध्यान में रखो।

अब यदि यह उस वरदान जैसा ही होता जब वह अपना सूर्य भले और बुरे दोनों पर चमकाता है, या जब वह पृथ्वी से सब मनुष्यों के लिए बिना भेद के

फल उपजाता है, तो इसकी भी गिनती परमेश्वर के वरदानों और उपकारों में होनी चाहिए। परन्तु विश्वास एक विशेष वरदान है, जो सब मनुष्यों को सामान्य रूप से नहीं दिया जाता, परन्तु परमेश्वर उसे एक रत्न के समान उन्हीं के लिए रख छोड़ता है जिनसे वह प्रसन्न है। और इसका कारण क्या है? हम सब आदम की सन्तान हैं, और हम सब एक ही साँचे के हैं। फिर वह एक दल को क्यों ज्योति देता है और दूसरे को उनके अन्धेपन में छोड़ देता है? उसके अपने चुनाव के सिवाय और कोई कारण नहीं। इसलिए यद्यपि हम न बुद्धि से न तर्क से समझ सकते हैं कि कैसे

परमेश्वर ने जगत की सृष्टि से पहले हमें चुन लिया, तौभी हम इसे इसलिए जानते हैं कि उसने यह हम पर प्रकट किया है, और अनुभव आप ही इसकी भली-भाँति गवाही देता है, क्योंकि हम विश्वास के द्वारा ज्योति पा चुके हैं। इसका क्या कारण है कि मैं सुसमाचार को ग्रहण करता और उससे लगा रहता हूँ, और इसी बीच दूसरे अपनी पशु-सी जड़ता में पड़े रहते हैं, वरन् उद्धार के सिद्धान्त के विरुद्ध द्वेषपूर्ण बैर रखते हैं?

यदि मैं यह कल्पना करूँ कि यह मेरी अपनी भली प्रवृत्ति से हुआ, तो मैं परमेश्वर का विश्वासघाती ठहरता हूँ। क्योंकि हमें सदा उसी बात की ओर लौटना चाहिए जो हम पहले देख चुके हैं, और कहना चाहिए, "तुझे औरों से उत्तम किसने ठहराया है?"

तब पौलुस इस वचन में मनुष्य के सारे घमण्ड को गिरा देता है, ताकि कोई अपने आप को बड़ा न ठहराए और न यह दावा करे कि उसके पास अपना कुछ है। वह कहता है कि हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि हममें अपनी कोई योग्यता है, परन्तु यह कि उसका एक-एक अंश परमेश्वर की ओर से है। इसलिए इस पद में पौलुस अनुभव के द्वारा दिखाता है कि इफिसी कैसे परमेश्वर के चुने हुए थे, और उनके लिए आवश्यक था कि वे अपना सारा विश्वास इसी पर, अर्थात् परमेश्वर की सेंतमेंत की भलाई पर, आधारित रखें। और इसके प्रमाण में (वह कहता है) तुमने सुसमाचार का सिद्धान्त सुना और उस पर विश्वास किया। परन्तु यह कैसे हुआ? वह दिखाता है कि अवश्य ही वे पवित्र आत्मा के द्वारा पक्के किए गए थे। अब यदि वे पक्के किए गए, तो अनिवार्य था कि पवित्र आत्मा ने पहले से कार्य किया हो। इसलिए परमेश्वर की अनन्त ठहरावट की इतनी गहरी भूल-भुलैया में घुसना व्यर्थ है। क्योंकि वह मानो अपनी उँगली से हमें दिखाता है कि उसने हमें कैसे चुना है, कम से कम यदि हम उसके साथ व्यवहार में

कृतघ्नता न करें, वरन् उस भलाई को जो उसने हमारे साथ की है पहचानें, और अपने भीतर पूरी रीति से निश्चय और दृढ़ संकल्प रखें कि इसका और कोई कारण नहीं, सिवाय इसके कि उसने सारी अनन्तता से पहले हम पर अपनी छाप लगा दी थी, अर्थात् उसने हमें अपनी सन्तान होने के लिए अपने ही लिए रख छोड़ा था।

अब हम पौलुस का अभिप्राय देखते हैं: इसलिए आओ, जब प्रश्न यह हो कि सब कुछ को परमेश्वर की एकमात्र निरी दया का ठहराएँ, तब लम्बी-चौड़ी बातें करना छोड़ना सीखें। क्योंकि हमारा विश्वास ही इसे भली-भाँति प्रकट कर देता है; क्योंकि (जैसा मैंने पहले कहा) यह हमारी अपनी जन्मजात बुद्धि से नहीं आता, परन्तु ऊपर से आया हुआ वरदान है, और ऐसा वरदान है जिसे परमेश्वर बिना अपवाद के सब मनुष्यों को नहीं देता, परन्तु केवल उन्हीं को जिन्हें वह चाहता है।

इसके अतिरिक्त, यहाँ बहुत से शब्द ऐसे हैं जो विचारने के योग्य हैं। एक ओर पौलुस पवित्र आत्मा के अनुग्रह की महिमा करना चाहता है, यह दिखाकर कि हमारे प्रभु यीशु में हमारा कोई भाग या अंश नहीं हो सकता

मसीह में, और उन सब लाभों में से किसी में भी जो उसने हमारे लिये मोल लिए हैं, जब तक परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें हमारे उद्धार का अधिकारी न बना दे।

इसलिये यह तो एक बात हुई। फिर भी पौलुस उस अनमोल लाभ को दिखाने से नहीं चूकता जो हमें सुसमाचार के द्वारा मिलता है, क्योंकि वह उसे सत्य का वचन और उद्धार का शुभ संदेश कहता है।

सबसे पहले उसका अभिप्राय यह था कि हमें निश्चय दिलाए, ताकि हमारे पास ऐसा अचूक आधार हो कि हम बिना सन्देह और विवेक की किसी कचोट के परमेश्वर को पुकार सकें।

क्योंकि जब तक हम इस सन्देह में हैं कि परमेश्वर हमसे प्रेम रखता है या घृणा, तब तक हमारे लिये उससे सच्चे मन से प्रार्थना करना असम्भव है। और इस प्रकार तुम देखते हो कि हमारा उद्धार कैसे पूरी तरह नष्ट हो जाता है, जैसा भविष्यद्वक्ता योएल ने कहा है। पवित्रशास्त्र में यह एक सामान्य सिद्धान्त है कि हम प्रार्थना और विनती के साथ परमेश्वर की शरण में भागे बिना उद्धार नहीं पा सकते। परन्तु यदि हमारे पास उक्त निश्चयता न हो तो हम उससे वंचित रह जाएँगे, जैसा कि हम तीसरे अध्याय में और विस्तार से देखेंगे।

इसलिये यह हमारे लिये बहुत हितकर है कि हमें पूरा निश्चय हो कि परमेश्वर हमारा पिता है और वह हमें अपनी सन्तान जानकर ग्रहण करता है। और यह निश्चय हमें कैसे मिलेगा, यदि सुसमाचार का सिद्धान्त सब बातों में ऐसा निश्चित न हो कि उसे प्रश्न का विषय बनाना हमारे लिये उचित ही न हो? इसी कारण पौलुस कहता है कि यह सत्य का वचन है।

निःसन्देह और भी सत्य हैं, क्योंकि जब परमेश्वर हमें चेतावनी देता है तब वह न तो परिहास में और न व्यर्थ में देता है; उसकी चेतावनियाँ और उसकी प्रतिज्ञाएँ दोनों ही निश्चित और अटल रूप से पूरी होती हैं। फिर भी, क्योंकि यहाँ प्रसंग हमारे भीतर के सब अविश्वास को दूर करने का था, जिसकी ओर हम बहुत अधिक झुके रहते हैं, इसलिये पौलुस ने सुसमाचार को सत्य का सिद्धान्त कहा, मानो वह कहे, "मेरे मित्रो, परमेश्वर अपनी इच्छा के विषय में तुम्हारे लिये विश्वासयोग्य गवाह है, क्योंकि सुसमाचार तो ऐसा है मानो उसने अपना हृदय तुम्हारे सामने खोलकर रख दिया हो; इसलिये उसी पर अपने आप को स्थिर करो।" इसके अतिरिक्त वह कहता है कि हमारा उद्धार सुसमाचार में समाया हुआ है, और यह इसलिये कि हम उससे प्रेम रखें और उसका आदर करें। क्या हम इतने निर्बुद्धि, बल्कि पूरी तरह पागल होंगे कि अपने ही कल्याण को तुच्छ जानें?

परन्तु फिर भी वह कहता है कि यह सब परमेश्वर की केवल दया से और उसके अनन्त चुनाव से होता है, जो हमारी दृष्टि में दूर और हमारे लिये अज्ञात है, परन्तु हमें उसका ज्ञान सुसमाचार के द्वारा मिलता है, जो उसका साधन और माध्यम है। क्योंकि इसका क्या प्रयोजन होता कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने जगत को परमेश्वर पिता से मिलाने के लिये अपने आप को बलिदान किया, यदि हम विश्वास के द्वारा उसमें सहभागी न बनाए जाते? और विश्वास कोई ऐसी धारणा नहीं जो मनुष्य अपने मन में गढ़ ले, परन्तु यह दृढ़ प्रतीति है कि परमेश्वर न झूठ बोल सकता है और न हमें धोखा दे सकता है, और यह कि यदि हम उसकी बाट जोहते रहें तो इसका भय नहीं करना चाहिए कि हमारी आशा अच्छे अन्त तक न पहुँचेगी।

सो संक्षेप में, पौलुस का अभिप्राय यह दिखाना था कि यदि हम सुसमाचार के सिद्धान्त से लाभ उठाना जान लें, तो हम फिर और नहीं

बड़बड़ाते और व्याकुल रहेंगे, वरन खुले मुँह से परमेश्वर को पुकार सकेंगे, और अपने आप को सब बातों में उसका ऐसा ऋणी और उससे बँधा हुआ मानेंगे कि हमें इसका भय न रहे कि वह हमें अपनी सन्तान स्वीकार नहीं करता, या हम उसके हाथ से ग्रहण नहीं किए गए, या वह हमारी उन सब प्रार्थनाओं में हमारी नहीं सुनता जो हम उससे करते हैं।

पहली बात के विषय में इतना ही। इसलिये पौलुस की चितौनी के अनुसार,

आओ हम सुसमाचार के सिद्धान्त पर इस प्रकार विश्राम करना सीखें कि वह हमारे लिये वैसा ही हो मानो परमेश्वर ने अपने आप को प्रत्यक्ष हम पर प्रकट किया हो और स्वर्ग हमारे लिये खुल गए हों। और हम सदा स्मरण रखें कि हमारे प्रभु

यीशु मसीह के अपने ही मुख से यह घोषणा की गई है कि जब कभी सुसमाचार के प्रचार से पाप क्षमा किए जाते हैं, तो वह उसी क्षण स्वर्ग में स्थिर कर दिया जाता है।

इस प्रकार तुम देखते हो कि हमें कैसी निश्चयता होनी चाहिए, कि हम फिर इस विषय में सन्देह न करें कि परमेश्वर हमारी सुनेगा या नहीं। परन्तु जैसे सुसमाचार हमें विश्वास करना सिखाता है, वैसे ही पौलुस भी हमें दिखाता है कि हमें उसे एक अतुल्य निधि समझना चाहिए, क्योंकि वह परमेश्वर की सामर्थ्य है जो हर एक विश्वास करनेवाले के उद्धार के लिये है, जैसा कि वह रोमियों की पत्री के पहले अध्याय में उसके विषय में कहता है।

सो जब हम अपने आप में खोए हुए और नष्ट हैं, और हमें परमेश्वर की ओर लौटा लाने का सुसमाचार को छोड़ और कोई साधन नहीं है, तो आओ हम उस निधि को बहुमूल्य जानें और उससे लाभ उठाने में सावधान रहें।

और ऐसा करते हुए हम स्वयं शैतान को और उसकी उन सब परीक्षाओं को जो वह हमारे विरुद्ध रचता है, निडर होकर तुच्छ जानें, क्योंकि परमेश्वर हमें बुलाता है और उसने हमारे प्रति अपने पितृवत प्रेम और भली इच्छा का हमें पर्याप्त प्रमाण दे दिया है।

परन्तु आओ हम दूसरे भाग पर आएँ, जिसकी चर्चा मैंने संक्षेप में की थी। क्योंकि पौलुस दिखाता है कि इसके अतिरिक्त कि परमेश्वर ने कृपा करके हमें सुसमाचार सुनाया, यह भी आवश्यक है कि वह अपने पवित्र

आत्मा के द्वारा और विशेष अनुग्रह से कार्य करे। निःसन्देह हम बहुतों को पाएँगे जो

सहर्ष मान लेंगे कि परमेश्वर ने हमें अपना सुसमाचार भेजने में अपनी केवल निःशुल्क भलाई को छोड़ और किसी कारण से प्रेरित होकर कार्य नहीं किया। परन्तु वे यह कल्पना करते हैं कि कुछ लोग उसे ग्रहण करते हैं और कुछ नहीं करते, इसका कारण यह है कि उनकी अपनी स्वतंत्र इच्छा निर्णायक भूमिका निभाती है, और इस प्रकार परमेश्वर के अनुग्रह की महिमा घट जाती है।

क्योंकि परमेश्वर हमारे सामने अपना अनुग्रह ऐसे नहीं रखता जैसे कोई मनुष्य छोटे बच्चों के सामने सेब रख दे कि जो सबसे अच्छा दौड़ सके वही आकर उसे ले ले। यदि परमेश्वर उसे इस प्रकार फेंक देता, तो निश्चय है कि हमारे उद्धार का बड़ा भाग हमारे ही बल और युक्ति से होता, और उसकी प्रशंसा हमारे ही सिर पड़ती।

अब पौलुस यह दिखाने के बाद कि परमेश्वर ने हमें अपने स्वर्गीय राज्य की मीरास के लिये बुलाया है और प्रतिदिन बुलाता है, और यह कि ऐसा करना उसकी केवल निःशुल्क भलाई से होता है, आगे यह भी जोड़ता है कि हमारे लिये उसके पवित्र आत्मा से स्पर्श किया जाना आवश्यक है। निश्चय ही वह पवित्र आत्मा के अनुग्रह का केवल एक ही भाग बताता है, और यह इसलिये कि दूसरा भाग वह पहले बता चुका था। क्योंकि इस वर्णन में उसने अपने विषय की कोई बात नहीं छोड़ी, परन्तु उसने परमेश्वर की निःशुल्क भलाई से आरम्भ किया, जिससे हम सब भरे हुए हैं, और दिखाया कि विश्वास उसी निःशुल्क चुनाव के सोते से फूटता है।

और अब, दूसरे भाग के लिये, वह यह जोड़ता है कि परमेश्वर का हमें अपने पवित्र आत्मा के द्वारा ज्योति देना, कि जब हम अन्धे थे तब उसने अपना अनुग्रह हमारे हृदयों में अंकित किया, और उन्हें झुकाकर अपनी आज्ञाकारिता के योग्य बनाया, हमारे लिये पर्याप्त नहीं है। इसके अतिरिक्त, यह भी आवश्यक है कि वह हमें दृढ़ करने और हमारे विश्वास को सामर्थ्य देने के लिये तत्पर हो, और हमें ऐसी अजेय स्थिरता दे कि हम अन्त तक थामे रहें।

इसलिये तुम देखते हो कि पौलुस हमें जिस बात तक ले आता है वह यह है कि पवित्र आत्मा के हाथ से विश्वास पाने के अतिरिक्त, और उसके अनुग्रह के द्वारा हमें ज्योति दिये जाने के अतिरिक्त, जिसकी चर्चा मैं पहले कर चुका हूँ, वह हमें इस रीति से स्थिर भी करता है कि हम गिर न जाएँ।

इसे भली-भाँति समझने के लिये हमें पहले वह स्मरण करना होगा जिसका विस्तार से वर्णन हो चुका है: अर्थात् जब तक परमेश्वर हमें हमारी अपनी दशा और दुर्गति में छोड़े रखता है, तब तक हम अन्धकार में भटकते हुए अन्धे अभागे हैं। और हमें जो कुछ प्रचार किया या कहा जाता है, उसके सामने हम अपनी पशु-जैसी मूढ़ता में ठूँठों के समान रहते हैं। क्योंकि शारीरिक मनुष्य परमेश्वर की या अपने उद्धार की किसी बात को कभी नहीं समझेगा।

इसलिये तुम देखते हो कि जब तक परमेश्वर हम पर तरस खाकर हमें ज्योति और समझ की आत्मा नहीं देता, तब तक हम स्वर्गीय ज्योति से किस प्रकार पूर्णतः वंचित और बहिष्कृत हैं। पहली बात के रूप में इसे चिह्नित कर लो। फिर भी, चूँकि इस बात पर पहले चर्चा हो चुकी है, इसलिये इतना ही पर्याप्त है कि मैं तुम्हें इसका स्मरण दिला दूँ।

अब एक और बात है, वह यह कि जब हम एक बार विश्वास के द्वारा परमेश्वर के अनुग्रह को ग्रहण कर लेते हैं, ताकि हम जान लें कि हमारा प्रभु यीशु

मसीह वही है जिसमें हमें वह सब कुछ मिलता है जो हमें पूर्ण रूप से सुखी करने के लिये आवश्यक है, तो उसमें दृढ़ किया जाना हमारे बहुत काम आता है। क्यों?

आओ हम ध्यान दें कि मनुष्य कितने डाँवाडोल हैं। जो परमेश्वर के पीछे चलने के लिये सबसे अधिक तैयार है, वह भी शीघ्र गिर जाएगा, क्योंकि हम इतने निर्बल हैं कि यदि परमेश्वर हमें सामर्थी हाथ से थामे न रहे तो शैतान घड़ी भर में हर क्षण हमें गिरा देगा। इसी कारण कहा गया है कि जब परमेश्वर हमें चुन लेता है और हमें हमारे

प्रभु यीशु मसीह को दे देता है, तब हमें बनाए रखने में वह अपना सामर्थ्य प्रकट करता है। क्योंकि यदि वह हमारे लिये न लड़े, तो हाय, हमारा क्या होगा? हम तुरन्त लज्जित और परास्त हो जाएँगे, और हम एक-दो बार नहीं, वरन् असंख्य बार गिरेंगे, जैसा मैं पहले कह चुका। जैसे ही हम उद्धार के मार्ग में आते, अपनी ही निर्बलता, चंचलता और अस्थिरता के कारण तुरन्त उससे निकाल दिये जाते, यदि हमें रोक न रखा जाता और परमेश्वर हममें कार्य न करता, ताकि हम अपने पवित्र

आत्मा के द्वारा शैतान और संसार के सब आक्रमणों पर जयवन्त हो सकें।

इस प्रकार, विश्वास के विषय में परमेश्वर का आत्मा हममें दोहरा कार्य करता है। क्योंकि वह हमें ज्योति देता है ताकि हम उन बातों को समझ सकें जो अन्यथा हमसे छिपी रहतीं, और परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को पूर्ण आज्ञाकारिता के साथ ग्रहण करें।

यह पहला कार्य है। दूसरा यह है कि वही आत्मा हममें बना रहता है और हमें स्थिरता देता है ताकि हम अपनी यात्रा के बीच में डगमगा न जाएँ। यही वह विषय है

जिसे पौलुस अब सम्बोधित करता है। मानो वह कहता हो, "मेरे मित्रो, तुम परमेश्वर के अनुग्रह को जान चुके हो, और तुमने उसका अनुभव किया है, कि उसने तुम्हें अपने सुसमाचार की आज्ञाकारिता की ओर खींचा है। क्योंकि यदि वह तुम पर दयालु न होता तो तुम कभी उसके पास न आते। परन्तु फिर भी अपने आपको निश्चय दिलाओ कि वह अपने अनुग्रह को दुगुना करता है, क्योंकि वह तुम्हें उसी में स्थिर रहने की सामर्थ्य देता है। क्योंकि यदि तुम केवल दो-तीन दिन, या दो-तीन वर्ष, वरन् इससे भी अधिक टिके रहे, तो अवश्य है कि परमेश्वर ने इसमें तुम्हारी सहायता की, नहीं तो तुम सदा डाँवाडोल दशा में रहते, वरन् ऐसे बेचारे अभागों के समान जो बुद्धि के अन्त पर पहुँच गए हों, बिना किसी निश्चय के, सिवाय इसके कि परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है कि वह तुम्हारी चिन्ता करेगा, और जब तक तुम अपनी यात्रा के अन्त तक न पहुँच जाओ और अपनी दौड़ पूरी न कर लो, तब तक निरन्तर तुम्हारी अगुवाई करेगा।"

इसलिये, यही कारण है कि वह यहाँ कहता है कि वे पवित्र आत्मा के द्वारा मुहरबन्द किये गए या चिह्नित किये गए। अब हमारे लिये उचित है कि पौलुस जिस उपमा का प्रयोग करता है उस पर भली-भाँति ध्यान दें। क्योंकि हम जानते हैं कि दस्तावेज़ मुहरों से प्रामाणिक बनाए जाते हैं, और यह सब युगों में होता आया है। यह सच है कि मनुष्य उन्हें उस रीति से नहीं लगाते थे जैसे आजकल लगाते हैं।

परन्तु फिर भी, अपने हाथों से हस्ताक्षर करने के स्थान पर वे अपनी मुहर या अँगूठी दे देते थे, और वसीयतनामों, अन्य दस्तावेज़ों, और सब सौदों और वाचाओं को प्रकाशित करने की यही रीति थी।

इस सम्बन्ध में पौलुस कहता है कि हमारे हृदयों में मुहर लगाई जानी चाहिए।

यह सच है कि ठीक-ठीक बोलें तो उसे कहना चाहिए था कि सुसमाचार पर मुहर लगाई गई। फिर भी, यह दिखाने के लिये कि दोष हमीं से आता और हमीं से उपजता है, और कि सुसमाचार अपने आप में पर्याप्त अधिकार का सिद्धान्त है, उसने हमें यह दिखाना चाहा कि परमेश्वर का अपने सत्य पर मुहर लगाना हमारे कठोर-हृदयपन और अस्थिरता के कारण है, क्योंकि हम

हर हवा से डोलनेवाले कांपते सरकण्डों के समान हिलाए जाते हैं, जब तक वह हमें दृढ़ न कर दे। परन्तु चाहे जैसी भी स्थिति हो, हम ध्यान दें कि पवित्र आत्मा मानो वह मुहर है जिससे वह अपने सत्य को हमारे लिये पक्का और

प्रमाणित करता है।

अब मैं तुम्हें पहले ही बता चुका हूँ कि हमें इसकी कितनी अधिक आवश्यकता है।

क्योंकि यद्यपि हम मानते हैं कि परमेश्वर का वचन इस योग्य है कि बिना विरोध या उत्तर के स्वीकार किया जाए, तो भी हम उस पर सन्देह करना नहीं छोड़ते, और यह हम अनुभव से भली-भाँति पाते हैं। क्योंकि जब कभी कोई कष्ट या संकट आता है, हम मानो घबरा जाते हैं, जबकि यदि हमें परमेश्वर की भलाई का पूरा निश्चय उस रीति से होता जैसा वह हमें दिलाता है, तो निश्चय है कि हम ऐसे किसी भय में न होते। इसलिये वे सब परीक्षाएँ जो हमें हिलाती हैं यह भली-भाँति दिखाती हैं कि हम सुसमाचार में उतनी उन्नति नहीं करते जितनी हमें करनी चाहिए। और इसलिये परमेश्वर को अपनी ओर से अपने पवित्र आत्मा के द्वारा उसे प्रमाणित करना पड़ता है, और उसे हमारे हृदयों में ऐसे पक्के रूप से अंकित करना पड़ता है कि हम दृढ़ रहें, और वही दृढ़ता उस सबसे गिराई न जा सके जो शैतान उसे उलटने के लिये कर सकता या रच सकता है।

परन्तु जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, यदि हम निरन्तर अपनी निर्बलता को जाँचते रहें, तो इस बात को और भी भली भाँति समझेंगे। क्योंकि संसार के सब तर्क ले लो, तौभी हमें वह पूरी और सिद्ध निश्चयता कभी न मिलेगी जो आवश्यक है, कि परमेश्वर हम पर दया करेगा और इस संसार के सब संकटों के बीच हमारी रक्षा करेगा। क्योंकि हम यहाँ मानो समुद्र में हैं; हवाएँ और आँधियाँ हर क्षण हम पर टूटती हैं, और हम सदा निगल लिये जाने के खतरे में हैं। तब हम शैतान को तुच्छ कैसे जानें, जब हम कवच, शस्त्र और सहायता के अन्य सब साधनों से रहित दीन भेड़ों के समान हैं? हम जीवन और मृत्यु दोनों में आनन्दित कैसे रहें, जब हम जानते हैं कि यदि हम भली भाँति और प्रामाणिक रीति से मुहरबन्द न होते, तो शैतान हमारे विरुद्ध कुछ भी कर सकता था?

इसलिए इस पाठ में हमें चेतावनी दी जाती है कि हम सब अहंकार और घमण्ड को त्याग दें, ताकि केवल परमेश्वर की स्तुति और महिमा हो; और साथ ही पौलुस के शब्दों से हम यह भी समझ सकते हैं कि हमारे पास ऐसा कवच और शस्त्र है जिससे हम भली भाँति सामना करके लड़ सकते हैं; और यद्यपि हमारा शत्रु बलवन्त और हठीला है, तौभी यदि हम इस बात का लाभ उठाएँ जो यहाँ कही गई है, अर्थात् कि परमेश्वर का आत्मा हम में सत्य पर और सुसमाचार की प्रतिज्ञाओं की निश्चयता पर मुहर लगाता है, तो वह हम पर कभी जयवन्त न होगा।

और पौलुस एक और उपमा जोड़ता है, कि परमेश्वर का आत्मा बयाने के समान है। हमें यह अनोखा न लगे कि पौलुस ने इस सिद्धान्त को इतने बल से पक्का किया, क्योंकि शैतान ने जगत के आरम्भ से कभी न छोड़ा कि मनुष्यों को उनकी अपनी बुद्धि और सद्गुण की किसी मूर्खतापूर्ण धारणा से निरन्तर फुलाता रहे। आदम के पतन का कारण यह था कि उसने अपने आप को उस ऊँचाई से भी ऊपर उठाना चाहा जो उसके लिये उचित थी, और परमेश्वर से अधिक बुद्धिमान होना चाहा, जिसकी परमेश्वर ने उसे अनुमति न दी।

ठीक वैसी ही दशा हमारी है, और शैतान अब भी अपनी वही चुनौती आगे बढ़ा रहा है। क्योंकि देखो, उसने उसी छल से मनुष्य जाति को गिराया, और उसका सारा प्रयत्न अब भी यही है कि हम यह मान लें कि हम यह और वह करने में समर्थ हैं। इसलिए पौलुस के लिये यह आवश्यक था कि मनुष्यों को उनकी अपनी स्वतंत्र इच्छा और अपने सद्गुण की उस झूठी और शापित धारणा से छुड़ाए, और उन्हें दिखाए कि वे सब कुछ के लिये पवित्र आत्मा के ऋणी हैं। इसे एक बात के रूप में स्मरण रखो।

दूसरे, हम इतने स्थूल और सांसारिक हैं कि हमें सिद्धान्त चबाकर दिया जाना चाहिए, और परमेश्वर के अनुग्रह के वरदान, जो अदृश्य हैं, उनके विषय में हम उससे अधिक कुछ नहीं समझ सकते जितना हम अपनी आँखों से देखते और अपने हाथों से छूते हैं। इसलिए यह आवश्यक था कि पौलुस उपमाओं के द्वारा बताए कि परमेश्वर का पवित्र आत्मा ही है जो हमें सुसमाचार का और उसमें निहित सब आशीषों का अधिकारी बनाता है, और अन्त तक हमें उनमें थामे रखता है।

अब हम जानते हैं कि सौदे बयाना देने से पक्के किए जाते हैं, जिसे लोग साधारणतः 'परमेश्वर का पैसा' कहते हैं। भूमि, घर, मीरास या वस्तुएँ मोल लेने में, यद्यपि मनुष्य का केवल वचन ही पर्याप्त होना चाहिए, तौभी लोग ऐसे बुरे स्वभाव के हैं कि यदि वे उस सौदे में अपनी कोई हानि देखें तो अपनी बात से मुकर जाने में लज्जित नहीं होते। इसलिए बयाना देने की यह रीति जोड़ी गई, और मानो पूरा दाम चुका दिया गया हो, इस प्रकार सौदा ऐसा पक्का हो जाता है कि फिर लौटाया नहीं जा सकता। तब पौलुस का यहाँ यह अर्थ है कि परमेश्वर का आत्मा हमारे उद्धार की पूरी गारण्टी देने का काम करता है।

किस उद्देश्य से? तुम्हारी मीरास के लिये (वह कहता है) छुटकारे के दिन तक। यह सच है कि हम परमेश्वर के वारिस हैं, इसी में कि हम उसकी सन्तान हैं। परन्तु हमें यह ध्यान देना चाहिए कि रोमियों के आठवें अध्याय में कहा गया है, कि हमारा उद्धार आशा में बन्द है। इसलिए हम उसे अभी न देख सकते हैं, न उसका भोग कर सकते हैं; कुलुस्सियों के तीसरे अध्याय के अनुसार, जहाँ कहा गया है कि हम उन मरे हुओं के समान हैं जो इस संसार से चले गए हैं, और हमारा जीवन मसीह के साथ परमेश्वर में छिपा हुआ है। इसलिए यद्यपि हम परमेश्वर की सन्तान हैं, तौभी अभी उसका पूरा भोग हमें नहीं मिला। और यह उसी के अनुरूप है जो यूहन्ना अपनी प्रामाणिक पत्री में कहता है। हम जानते हैं (वह कहता है), जिससे वह दिखाता है कि हमारा विश्वास सन्देहयुक्त नहीं है।

परन्तु फिर भी वह जोड़ता है कि वह अभी देखा नहीं गया (अर्थात् अभी प्रगट नहीं हुआ), परन्तु हमें उस दिन की बाट जोहनी है जब हम परमेश्वर के समान होंगे, और तब हमें उस वस्तु को सिद्ध रीति से देखने की ज्योति मिलेगी, जिस पर हम अभी केवल विश्वास करते हैं। फिर, हम देख चुके हैं कि पौलुस ने कुरिन्थियों के दूसरे अध्याय में कहा, कि जब तक हम इस पृथ्वी की यात्रा में हैं, हम (एक प्रकार से) परमेश्वर से दूर हैं। क्योंकि क्यों? हम चलते हैं (वह कहता है) केवल आशा में, और वस्तु को ऐसे नहीं देखते मानो वह उपस्थित हो, परन्तु विश्वास से उसे देखते हैं। संक्षेप में, यद्यपि हम मृत्यु से पार होकर जीवन में आ गए हैं (जैसा यूहन्ना के पाँचवें अध्याय में कहा गया है), तौभी हम एक

असंख्य मृत्युओं से लड़ते हैं, क्योंकि हम उनसे घिरे हुए हैं। और पौलुस

इस पाठ में दोनों बातों को भली भाँति मिलाता है। क्योंकि एक ओर वह कहता है कि हम अभी अपने छुटकारे और मीरास तक नहीं पहुँचे, तौभी वह दिखाता है कि हम उसके विषय में निश्चित हैं, और कि केवल हमारी अपनी कृतघ्नता ही हमें परमेश्वर की पूरी महिमा करने से, और पूर्ण निश्चयता के साथ यह कहने से रोकती है कि हमें स्वर्गीय जीवन में पहुँचने में कोई सन्देह नहीं, क्योंकि पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे पास उसका बयाना है, और हम अपने प्रभु यीशु मसीह से ऐसे जुड़े हैं कि जो कुछ उसका है वह सब हमारा है और विश्वास के द्वारा हमारे साथ साझा किया गया है।

इसलिए आओ, हम भली भाँति ध्यान दें कि पौलुस के इन शब्दों में क्या निहित है।

पौलुस। वह कहता है कि पवित्र आत्मा हमारा बयाना है। जब ऐसा है, तो हमें अपने छुटकारे का निश्चय अवश्य होना चाहिए, जिसका अधिकार हमें अन्तिम दिन पूरी रीति से मिलेगा; और यह बात स्वयं भी पर्याप्त रूप से प्रकट करती है। क्योंकि हम तो पृथ्वी के तुच्छ कीड़े ही हैं, हम सड़न और भ्रष्टता से घिरे हुए हैं, हम इतने दुःखों से घेरे हुए हैं कि देखकर तरस आता है; संसार हम पर और हमारी सीधाई पर ताने कसता और ठट्ठा करता है; हमें भूख और प्यास सहनी पड़ती है; प्रायः ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर ने हमें त्याग दिया है और मानो हमें काट डाला है, वरन वह संसार के सबसे तुच्छ जीवों के समान भी हम पर तरस खाना नहीं चाहता। देखो, बाहरी रूप में हम किस दशा में हैं। इसलिए इतनी उलझनों और मन की पीड़ाओं के बीच अपने आपको सँभालने के लिए हमारे पास कोई उपाय होना हमारे लिए बड़े काम की बात है। यही कारण है कि पौलुस जान-बूझकर कहता है कि पवित्र आत्मा हमारा बयाना है। इसलिए चाहे संसार को खुली छूट हो कि वह हमें, जैसा कहते हैं, अपने पैरों तले रौंद डाले; चाहे हमारा प्रभु हमें अनेक परीक्षाओं में लगाए रखे; चाहे वह हमें इस रीति से दीन करे कि हम वध होनेवाली भेड़ों के समान ठहरें और मृत्यु निरन्तर हमारे दाँतों के बीच रहे; तौभी हम अच्छे उपाय से वंचित नहीं हैं।

क्योंकि इसलिए कि पवित्र आत्मा हमारे हृदयों में राज्य करता है, हमारे पास सब परीक्षाओं के बीच भी घमण्ड करने का कारण है, जैसा रोमियों के आठवें अध्याय में कहा गया है कि जब हमें एक बार निश्चय हो जाता है कि परमेश्वर हमें अपनी सन्तान गिनता है, तो हम न केवल उसे पुकार सकते हैं, वरन यद्यपि हम पीड़ित और सताए जाते हैं, तौभी हम सदा इस बात का पूरा और अटल निश्चय रखना नहीं छोड़ते कि वही हमारा पिता है, जो हमें स्वर्ग की महिमा तक पहुँचाएगा; क्योंकि यह भी हमारी आशा के परखे जाने का एक साधन है।

इसके अतिरिक्त हमें चेतावनी भी दी जाती है कि हम धीरज से चलें, और कि जब परमेश्वर ने हमें अपना पवित्र आत्मा बयाने के रूप में दिया है, तो हमें वैसा उतावला और अधीर नहीं होना चाहिए जैसे हम प्रायः होते हैं। क्योंकि यदि परमेश्वर हमारे साथ कठोरता से व्यवहार करे, तो हम तुरन्त कुड़कुड़ाने लगते हैं और कुछ भी सहना नहीं चाहते; क्योंकि हम देखते हैं कि हम स्वभाव से कितने कोमल और नाजुक हैं। परन्तु हमें धीरज से सहना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर यह नहीं चाहता कि हम, जैसा कहते हैं, एक ही छलाँग में उसके राज्य में पहुँच जाएँ, वरन वह चाहता है कि हम इस संसार में काँटों और झाड़ियों के बीच से होकर निकलें, ताकि हमें पार होने में बहुत परिश्रम करना पड़े और हम बड़े संकट में रहें।

जब वह हमें ऐसे मार्ग से ले चलना चाहता है, और तौभी हमें ऐसा उत्तम उपाय देता है जो हमारे लिए पर्याप्त होना चाहिए, अर्थात् वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें अजेय दृढ़ता में स्थिर करता है, तो आओ हम तब तक लड़ने को तैयार रहें जब तक जय का समय पूरी रीति से न आ जाए। यह सच है कि हमारा विश्वास अभी से प्रबल होता जाता है, परन्तु हम अभी उसका फल नहीं पाते, न उसका पूरा आनन्द लेते हैं। इसलिए हमें अपने मन में ठान लेना चाहिए कि हम निरन्तर आहें भरें और कराहें, और तौभी आनन्द भी करें। क्योंकि अपने हृदय में आनन्दित होना, और पौलुस के साथ यह पुकारना, "हाय, मैं अभागा मनुष्य! मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा," ये दोनों बातें आपस में बहुत अच्छी तरह मेल खा सकती हैं।

इसलिए हम में से हर एक शोक करे और मन में खेदित हो, क्योंकि हम अब भी अपनी दुष्ट अभिलाषाओं और अपने भीतर के अनेक दोषों के वश में बहुत हैं। और तौभी हम यह कहना न छोड़ें कि हम परमेश्वर का धन्यवाद करते हैं, और इस बात से सन्तुष्ट रहें कि उसने हमें ऐसा भाग दिया है जो हमारे लिए पर्याप्त होना चाहिए, और उसके समय की प्रतीक्षा करें जब तक वह उस काम को, जो उसने आरम्भ किया है, पूरा और सिद्ध न करे; क्योंकि उसका पवित्र आत्मा हमारे भीतर वास करता है, और यह प्रतिज्ञा भी है कि हम अन्त तक उससे कभी रहित न होंगे। देखो, इस प्रकार हमें यहाँ ढाढ़स बाँधने और ऐसी दृढ़ता से चलने को उभारा जाता है कि संसार के सारे दुःख हमें उससे रोक न सकें, जब तक हम अपनी दौड़ के अन्त तक न पहुँचें।

और यही कारण है कि पौलुस जान-बूझकर छुटकारे की बात कहता है। यह सच है कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा छुड़ाए गए हैं, और वह हमें हमारे छुटकारे या छुड़ौती के लिए दिया गया है, जैसा दूसरे पाठ में कहा गया है। तौभी हमें अभी उसका पूरा प्रभाव और पूर्ण उपभोग प्राप्त नहीं हुआ। तब छुटकारा दोहरा है: एक वह जो हमारे प्रभु यीशु मसीह की देह में पूरा हो चुका, और दूसरा वह जिसकी हम बाट जोहते हैं और जो उसके पुनः आगमन पर हम पर प्रकट होगा। इसी के अनुसार पौलुस रोमियों के आठवें अध्याय में कहता है कि यद्यपि हम कराहते हैं और पीड़ा में दबे हुए हैं, तौभी हमें इससे घबराना नहीं चाहिए, न इसे अनोखा समझना चाहिए, क्योंकि (वह कहता है) सारी सृष्टि हमारा साथ देती है और प्रसव-पीड़ा में पड़ी स्त्री के समान है। क्योंकि हम देखते हैं कि आदम के पाप के कारण सारा संसार भ्रष्टता के अधीन है।

इसलिए जब ऐसा है, तो आओ हम अपनी कराहों में न डगमगाएँ, वरन अपनी भावनाओं को इस प्रकार नापें कि इसी में सन्तुष्ट रहें कि हमारा छुटकारा हमारे प्रभु यीशु मसीह की देह में मोल लिया जा चुका है, और इस पर भरोसा रखें कि वह उसी काम को हम में और हमारी देहों में भी पूरा करेगा जो उसने अपनी देह में हमारे लिए सम्पन्न किया है। इसलिए पौलुस जो कहना चाहता था वह यह है कि परमेश्वर का आत्मा हमारा बयाना है

उस समय तक जब तक हम इस क्षणभंगुर जीवन से उठाए जाने और सब दुःखों से, विशेषकर पाप की दासता से, जो सबसे भारी बोझ है, छुड़ाए जाने की बाट जोहते हैं। इसलिए जब तक हम इन सब बातों से छुड़ाए न जाएँ, हमें इसी पर टिके रहना चाहिए कि परमेश्वर का आत्मा हम में वास करता है।

और मोल लेने के छुटकारे के विषय में, इसे मोल लिया हुआ छुटकारा समझा जा सकता है; क्योंकि यह बोलचाल की बहुत सामान्य रीति है: जैसे जब कहा जाता है, प्रतिज्ञा का आत्मा, तो अर्थ है वह आत्मा जो सब प्रतिज्ञाओं की निश्चयता और ज़मानत देता है; परमेश्वर के भय का आत्मा, क्योंकि वही हमें उसकी धार्मिकता के प्रति आज्ञाकारी बनाता है।

इसी प्रकार जब वह मोल लेकर छुड़ाने के छुटकारे की चर्चा करता है, तो यह भली भाँति कहा जा सकता है कि यह वही छुटकारा है जो हमारे लिये मोल लिया गया, ताकि यह दिखाया जाए कि यदि हम अपने भीतर उसका प्रभाव अनुभव करें, और उन बातों के विषय में निःसन्देह हों जो यीशु मसीह ने हमारे लिये की हैं, तो हमें यह अविश्वास नहीं करना चाहिए कि उसने व्यर्थ ही दुःख उठाया। क्योंकि निश्चय ही उसका दुःख उठाना हमारे लिये किसी काम का न होता, यदि वह हम तक न पहुँचता, कि हमारे लाभ के लिये ठहरे और हम उसका आनन्द ले सकें।

इसलिये यही वह बात है जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के व्यक्तित्व में मोल ली गई है। फिर भी इस बीच, जहाँ तक हमारा सम्बन्ध है, वह हमें थोड़े में ही रोके रखता है, इसलिये कि हम अपनी ही कृतघ्नता के कारण उस लाभ को ठुकरा न दें जो परमेश्वर हमें देता है, अर्थात् अपने क्लेशों में आनन्दित होना, क्योंकि हम जानते हैं कि हमारा उद्धार निश्चित है; और न परमेश्वर के विरुद्ध कुड़कुड़ाएँ और न उसकी निन्दा करें, परन्तु शान्ति से चलते रहें, जब तक कि हम इस बन्दीगृह से, जिसमें हम हैं, छुड़ाए न जाएँ, और जब तक कि हमारे प्रभु यीशु मसीह में इकट्ठे किए जाने के द्वारा हम पूरी रीति से स्वतंत्र न कर दिए जाएँ

यीशु मसीह में।

अब आओ, हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने दोषों को मानते हुए गिर पड़ें, और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उन्हें और अधिक अनुभव कराए, यहाँ तक कि हम उनसे पूरी तरह घृणा करने लगें

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