अध्याय 15 / 16

चौदहवाँ उपदेश, दूसरे अध्याय पर छठा — इफिसियों 2:16-19

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चौदहवाँ उपदेश, दूसरे अध्याय पर छठा — इफिसियों 2:16-19

जिन्हें वे परमेश्वर की सेवा कहते हैं, वे मात्र दिखावटी खिलौने हैं। सचमुच, वे हमारे प्रभु यीशु मसीह के विशिष्ट कार्य को बिगाड़ने के अतिरिक्त और किस काम आते हैं?

बेचारे अज्ञानी प्राण उनमें जकड़े रहते हैं और अपना सारा ध्यान उन्हीं पर लगाए रहते हैं। जब मैं अज्ञानी प्राणों की बात करता हूँ, तो मेरा आशय उनमें से सबसे योग्य लोगों से है, उनसे भी जो अपने आप को सबसे बड़ी सामर्थ्य वाला समझते हैं, क्योंकि वे सब अभागे पशुओं के समान उलझे हुए हैं।

इसलिए आइए, हम सुसमाचार की सरलता को थामे रहना और वहाँ हमारे प्रभु यीशु मसीह को देखना सीखें, क्योंकि वह भी हमसे अपनेपन से बात करता है, ताकि हम उसके द्वारा आगे बढ़ें, निडर होकर परमेश्वर को अपना पिता कहें, और उसकी शरण में भागें, और इसमें तनिक भी संदेह न करें कि जब कभी हम सच्चाई से उसे पुकारेंगे, वह हमारे निकट होगा।

अब आइए, हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने अपराधों को स्वीकार करते हुए दण्डवत् करें, और प्रार्थना करें कि वह हमें उनका अनुभव और अधिक कराए, जिससे हम सच्चे मन फिराव के द्वारा उन्हें त्याग दें, निरन्तर सीधे मार्ग पर चलें और अपने आप को पवित्र आचरण के लिए समर्पित करें। और चूँकि हम इतने निर्बल हैं कि हममें सदैव बहुत से दोष बने रहेंगे, इसलिए वह कृपा करके हमें तब तक थामे रखे जब तक वह हमें इस संसार से उठा न ले और अपने उस आधार के अनुसार, जो उसने हममें डाला है, हमें पूरी रीति से अपनी ही छवि के समान न गढ़ ले।

और इसलिए आइए, हम सब कहें: हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता, इत्यादि।

चौदहवाँ उपदेश, जो दूसरे अध्याय पर छठा है

16 यीशु मसीह ने हम दोनों को एक देह में मिलाकर परमेश्वर से मेल कराया, कि दोनों को क्रूस के द्वारा परमेश्वर से जोड़ दे, और इस प्रकार बैर को मार डाले।

17 और उसने आकर तुम्हें, जो दूर थे, और उन्हें भी, जो निकट थे, मेल-मिलाप का सुसमाचार सुनाया।

18 क्योंकि उसी के द्वारा हम दोनों की एक ही आत्मा में पिता तक पहुँच होती है।

19 इसलिए अब तुम अनजाने और परदेशी नहीं रहे, परन्तु पवित्र लोगों के संगी स्वदेशी और परमेश्वर के घराने के हो गए।

हमने आज प्रातःकाल देखा कि पौलुस ने उन लोगों से, जिनके लिए कभी उद्धार की कोई आशा न थी, यह कहा है कि वे परमेश्वर के और भी अधिक ऋणी हैं, क्योंकि उसने उन्हें अपनी सन्तानों की गिनती में बुलाया, यह देखते हुए कि यह कोई साधारण या सामान्य बात न थी, और न ऐसी बात जिसकी अपेक्षा की जाती थी। दूसरी ओर, उसने सब घमण्ड को भी चूर कर दिया, ताकि यहूदी अपने मन में यह न सोचें कि लेपालकपन का विशेषाधिकार उनकी अपनी कमाई हुई वस्तु है, और न इस पर इतराएँ, चाहे

परमेश्वर ने उन्हें शेष सारे संसार से बढ़कर क्यों न चुना हो।

और अब, उसी विषय को आगे बढ़ाते हुए, वह कहता है कि हम दोनों ओर के लोग यीशु मसीह की मृत्यु के द्वारा मेल-मिलाप पा चुके हैं, और ऐसा करके उसने हमें एक देह में जोड़ दिया है, और अपने क्रूस के द्वारा सब बैर को मार डाला है। इससे वह बात और अच्छी तरह प्रकट होती है जिसे हम पहले ही देख चुके हैं। उसने कहा था कि हमें अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के पास आना होगा, क्योंकि उसके बिना हम सब दूर हैं, यहूदी भी और अन्यजाति भी, क्योंकि हम सब पापी हैं, और परमेश्वर तब तक हमारा बैरी है जब तक उसका क्रोध हमारी ओर से शान्त न हो जाए।

अब पौलुस दिखाता है कि यह इसलिए हुआ कि उसने हमारे पापों को अपने क्रूस पर उठा लिया। क्योंकि उसी की आज्ञाकारिता के द्वारा हमारे सब अधर्म दूर किए जाते हैं, और उसी के बलिदान के द्वारा हमारे पाप धुल जाते हैं।

संक्षेप में, यदि हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग न होता, तो हम अब भी उस दोषपत्र में बँधे होते जिसकी चर्चा कुलुस्सियों के दूसरे अध्याय में है। क्योंकि यदि हिसाब का समय आए, तो कौन परमेश्वर के सामने अपना बचाव करने के लिए मुँह खोलने का साहस करेगा, या उस दण्ड से बच निकलने की आशा रखेगा जिसके हम सब योग्य ठहरे हैं? क्योंकि यदि हम एक भी बात कहने का प्रयत्न करें, तो हज़ारों बातें हमारा मुँह बन्द करने को खड़ी होंगी, यहाँ तक कि हमें व्याकुल होकर चुप खड़े रहना पड़ेगा, जब तक हम उस उपाय तक न पहुँचें, अर्थात् यह कि यीशु

मसीह ने अपनी मृत्यु के द्वारा हमारे सब ऋणों की ऐसी पूरी भरपाई कर दी है कि हम दोषमुक्त और छुड़ाए हुए हैं।

तो यही वह बात है जिसकी चर्चा पौलुस अब करता है, ताकि हम जानें कि जिस पहुँच की वह बात करता है वह किस प्रकार की है। क्योंकि हमारी जैसी दशा में, अपने बल पर परमेश्वर की उपस्थिति में घुस जाना बहुत बड़ी ढिठाई होती। परन्तु जब हमें बताया जाता है कि परमेश्वर हमारे पापों और अपराधों का दोष हम पर नहीं लगाएगा, क्योंकि यीशु मसीह ने अपनी मृत्यु से उन सबको दूर कर दिया है, तब सिर ऊँचा करके परमेश्वर के पास जाना कोई दुस्साहस नहीं है, बल्कि हमारे पास अच्छी नींव और ऐसा साहस है जो परमेश्वर को भाता है।

इसलिए जब कभी हमें प्रार्थना करने का, या किसी परीक्षा से लड़ने का अवसर हो, तो आइए, हम यह जानना सीखें कि हमें धीरज के लिए प्रोत्साहन और अनन्त जीवन के निश्चय की आवश्यकता है, और हमें पूरी तरह परमेश्वर के पुत्र की मृत्यु और दुःखभोग की शरण में आना है, यह जानते हुए कि जब तक हम उसके लहू में डुबोए न जाएँ, और उसके पवित्र आत्मा के कार्य से धोए न जाएँ, तब तक हम सदैव घृणित बने रहेंगे, और परमेश्वर न्यायपूर्वक हमें झटक देगा, और हमारा पिता होने के बजाय सदा हमारा न्यायी बना रहेगा।

और यह जान लेना ही पर्याप्त नहीं कि यीशु मसीह ने हमारे लिए प्रायश्चित कर दिया है, और हमारे उद्धार के लिए जो कुछ आवश्यक था वह सब उसकी मृत्यु और दुःखभोग के द्वारा पूरी रीति से सम्पन्न हो चुका है: परन्तु हमें

उसका लाभ उसी रीति से ग्रहण भी करना होगा जिस रीति से वह हमें दिया जाता है। क्योंकि यहूदियों, तुर्कों और उन जैसे अन्य लोगों को इससे क्या लाभ कि परमेश्वर के पुत्र ने वह दण्ड अपने ऊपर ले लिया जो हम पर आना था?

वे तो दुगुने दोषी ठहरेंगे, क्योंकि अपनी कृतघ्नता के कारण वे अपने आप को उस लाभ से वंचित कर लेते हैं जिसके वे भागी हो सकते थे, यदि वे सुसमाचार की प्रतिज्ञाओं को विश्वास से ग्रहण कर लेते। परन्तु यहूदी एक ओर हमारे प्रभु

यीशु मसीह की निन्दा करते हैं, तुर्क दूसरी ओर उसका उपहास करते हैं और उसे रात का भूत मात्र गिनते हैं। और पोप के अनुयायी जी-जान से उसकी सामर्थ्य को बिगाड़ने और उसके अनुग्रहों का अधिकांश भाग उससे छीन लेने में लगे हैं। इसलिए ये लोग पाएँगे कि परमेश्वर के पुत्र ने जो मृत्यु सही, वह उनके श्राप को बढ़ाने और

परमेश्वर के क्रोध को उनके विरुद्ध और भी अधिक भड़काने के काम आती है। हाँ, और जिन्होंने कभी सुसमाचार सुना ही नहीं, वे भी इस भण्डार से पूरी रीति से बाहर रखे गए हैं।

और इसी कारण पौलुस यह भी जोड़ता है कि यीशु मसीह ने उन्हें जो निकट थे और उन्हें भी जो दूर थे शान्ति का सुसमाचार सुनाया। इससे वह यह दिखाता है कि जब सुसमाचार का प्रचार होता है, तब हमें प्रतिदिन उस उद्धार का अधिकारी बनाया जाता है जो हमारे प्रभु ने हमारे लिये मोल लिया था

यीशु मसीह के द्वारा, कम से कम तब, जब हम सच्चे विश्वास के द्वारा उसे थामे रहें, ऐसा विश्वास जिसने हमारे हृदयों में जीवित जड़ पकड़ ली हो ताकि वह भले फल लाए। इसलिये दो बातें आवश्यक हैं। एक यह कि हम जानें कि हमारे उद्धार का सार और तत्त्व यीशु मसीह में है, और दूसरी यह कि वही बात हमें सुसमाचार के द्वारा बताई जाती है।

ताकि हम इस सिद्धान्त के विषय में और भी निश्चित हो सकें, पौलुस यह नहीं कहता कि मसीह ने अपने प्रेरितों को भेजा, या हमारे पास ऐसा सन्देश लाने के लिये बहुत से लोगों को खड़ा किया, परन्तु यह कि मसीह स्वयं सब मनुष्यों को शान्ति का समाचार सुनाने आया। अब यह निश्चित है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने अपने पुनरुत्थान के बाद प्रचार का कार्य केवल अपने चेलों के बीच ही किया, ताकि वे पहले से तैयार हो जाएँ कि

जो सिद्धान्त उन्हें सौंपा गया था उसका सब जगह प्रचार करें। परन्तु पौलुस

कहता है कि उसने उन्हें प्रचार किया जो कभी परमेश्वर से दूर थे।

उसने यह स्वयं अपने शरीर में उपस्थित होकर नहीं किया। तब यह निश्चित है कि पौलुस सुसमाचार के उस प्रचार की बात कर रहा है जो परमेश्वर और हमारे प्रभु यीशु मसीह के ठहराए हुए सेवकों के द्वारा किया गया।

फिर भी वह कहता है कि प्रचार करनेवाला स्वयं मसीह था, इसीलिये कि हम सुसमाचार का और अधिक आदर करें, और उसे परमेश्वर का ठहराया हुआ सत्य मानें, और हम में से हर एक बिना किसी विरोध या उत्तर-प्रत्युत्तर के उसके आगे समर्पित हो जाए। क्योंकि यदि हमें इसमें कोई सन्देह है, तो यह न सोचें कि यीशु मसीह से हमें कुछ भी लाभ होगा। इसलिये हमें इस बात का पूरा निश्चय करना चाहिए, और जैसा हमने पहले अध्याय में देखा, परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे हृदयों में मुहर लगनी चाहिए, जो इसी कारण उस जीवन की बयाना कहलाता है जिसकी हम आशा रखते हैं, और वही चिह्न, हस्ताक्षर या मुहर है जो परमेश्वर हम में लगाता है, ताकि हमारा विश्वास पूरे निश्चय में स्थिर हो। तब हम देखते हैं कि इस पद में पौलुस का उद्देश्य क्या था, जब वह कहता है कि यीशु मसीह, मरे हुओं में से जी उठकर और अपने पिता परमेश्वर से मिली हुई आज्ञा को पूरा करके, हमारा छुड़ानेवाला था, और साथ ही वही सन्देश हमारे पास लानेवाला भी, एक बार और सदा के लिये नहीं, परन्तु निरन्तर प्रचार के द्वारा, यहाँ तक कि वह अन्त तक अपना मुँह खुला रखेगा, कि हमें गवाही दे कि हम उसमें निश्चय ही वह सब पाएँगे जो स्वर्गीय जीवन तक पहुँचाने के लिये हम चाह सकते हैं।

तो क्या हम निरे ठूँठ न ठहरेंगे, यदि इन बातों को सुनकर हमारे हृदय गहराई तक न छुए जाएँ? यह सच है कि परमेश्वर का पुत्र एक स्थान से दूसरे स्थान को नहीं भटकता, न वह यहाँ हमारे बीच दिखाई देनेवाले रूप में रहता है, और इसकी आवश्यकता भी नहीं। फिर भी, जो सिद्धान्त हम उसके नाम से प्रचार करते हैं, उसका अधिकार वैसा ही होना चाहिए मानो वह स्वयं हमसे आमने-सामने बोल रहा हो। और इसी कारण वह यह भी कहता है, "जो तुम्हारी सुनता है, वह मेरी सुनता है, और

जो तुम्हें ग्रहण करता है, वह मुझे ग्रहण करता है," और वैसे ही, "जो तुम्हें तुच्छ जानता है, वह मुझे तुच्छ जानता है।" और फिर, इसी रीति से मेरा पिता परमेश्वर आदर पाता है, अर्थात् तुम्हारे सुसमाचार पर विश्वास करने से। और इसके विपरीत, जब उन बातों पर सन्देह किया जाता है जो वहाँ इतनी भली रीति से प्रमाणित हैं, तो उसका बड़ा अपमान और निरादर होता है। पोप और उसके पादरी-वर्ग की सारी भीड़ अपने अत्याचार को बनाए रखने के लिये इसी बात का सहारा लेती है। परन्तु हमारे प्रभु

यीशु मसीह का आशय हमें उस सन्देश का निश्चय दिलाना था जो हमारे पापों की क्षमा के विषय में है, जिसकी ध्वनि हमारे कानों में निरन्तर गूँजती रहती है।

क्योंकि हम सदा बड़बड़ाहट और सन्देह में पड़े रहेंगे, यदि हमें पूरा विश्वास और निश्चय नहीं कि सुसमाचार में जो कुछ है वह यीशु मसीह से है, जो स्वयं अचूक सत्य है। क्योंकि यदि हम मनुष्यों की ओर देखें, तो सदा डगमगाते और सन्देह में रहेंगे। और इसका प्रमाण यह है कि वे अपनी उपज से हमारे सामने घोर व्यर्थता और झूठ के सिवा और क्या ला सकते हैं? इसलिये, यद्यपि हमारा प्रभु यीशु मसीह अब भी अपनी स्वर्गीय महिमा में है, और हम शरीर में उससे दूर हैं, और हमें यह कहना भी अनोखा लगता है कि वह हम में वास करता है, और जहाँ कहीं दो या तीन उसके नाम से इकट्ठे होते हैं, वह उनके बीच में है, फिर भी हमें इस बात का पूरा निश्चय होना चाहिए: कि जब सुसमाचार का शुद्ध सिद्धान्त प्रचार किया जाता है, तो यह ठीक वैसा ही है मानो वह स्वयं हमसे बोल रहा हो, और यहाँ हमारे बीच परिचित रीति से उपस्थित हो।

संक्षेप में, हमारा विश्वास उसी पर लक्ष्य साधे, मानो वही उसका निशाना हो, और हमें उसी पर टिके रहना चाहिए। और जब उसके पिता परमेश्वर ने उसे विश्वासयोग्य गवाह होने के लिये भेजा है, तो जो कुछ उसके नाम से हमें सच्चाई से बताया जाए, उसे हमें बिना किसी विरोध के ग्रहण करना चाहिए।

इसके अतिरिक्त, जैसे यहाँ हमारे पास वह है जिससे हम विश्वास की सच्ची दृढ़ता में बलवन्त हों, और शैतान के सब आक्रमणों और धमकियों के विरुद्ध हथियारबन्द हों, वैसे ही यह हमारे लिये बड़ी लज्जा की बात है कि जब हम बहरे बने रहें

सुसमाचार सुनने में, या उसे ऐसी वस्तु की तरह छोड़ दें जो हवा में लटकी हो, मानो वह केवल कहानी हो या किसी काम की न हो। फिर भी आजकल अधिकतर लोग या तो सुसमाचार को तुच्छ जानते हैं, या इतने मूढ़ हैं कि उसकी चर्चा तुच्छ बात की तरह करते हैं, या उसका उपहास करते हैं।

कुछ लोग, जिन्होंने उपदेश सुने हैं, या किसी व्याख्यान में सीखा है, या और किसी रीति से, शायद कहेंगे, "हो सकता है यह सच हो, और जहाँ तक मेरी बात है, मैं इसे नहीं नहीं कहूँगा; परन्तु मैं न तो पढ़ा-लिखा हूँ न धर्मशास्त्री, मेरे लिये सब बराबर है, मैं इसे अपने सामान्य ढर्रे पर ही चलने दूँगा।"

कुछ और कहेंगे, "छि, मैं तो अपने बाप-दादों के विश्वास पर ही बना रहूँगा, क्योंकि बदलना बहुत जोखिम की बात है।" फिर कुछ ऐसा कहते हैं,

"ऐसा कैसे? यह तो नया सिद्धान्त है जो हमने पहले कभी नहीं सुना।" और दूसरे, ऐसी तिरस्कार भरी बातों से सन्तुष्ट न होकर, घोर क्रूरता भी जोड़ देते हैं, और खुलेआम उसके विरुद्ध लड़ते हैं, यहाँ तक कि वे परमेश्वर को उसके सिंहासन से खींच उतारने तक की इच्छा अपने मन में पाते हैं, और इसी से वे निर्दोष लहू बहाने लगते हैं, अपनी पूरी शक्ति से यत्न करते हैं कि सुसमाचार की स्मृति ही मिटा दें।

परन्तु इस बीच हम यह समझ लें कि जब कभी हमारे उद्धार का संदेश हमारे सामने रखा जाए, तब यदि हम उसकी उपेक्षा करें, तो हम न केवल उस भलाई को ठुकराने के दोषी ठहरेंगे जो हमारे पास एक नश्वर प्राणी के द्वारा पहुँचाई गई, वरन् परमेश्वर के पुत्र के लिए भी द्वार बन्द कर देंगे, जब वह हमारे उद्धार के लिये हमें ढूँढ़ने आया। इसलिये अपनी आलस्य को जगाने के लिये, और उस शापित हठ को सुधारने के लिये जो सुसमाचार के प्रति हमारे पूर्ण और आज्ञाकारी समर्पण में बाधा बन सकता है, हम यह ध्यान दें कि सुसमाचार का प्रचार कोई संयोगवश होने वाली बात नहीं है, और न मनुष्य अपने आप आते हैं, जैसा कि पौलुस ने भी रोमियों को कहा है: परन्तु परमेश्वर स्वयं हमारे पास आता है, और हमारा प्रभु यीशु मसीह अब भी चरवाहे का कर्तव्य निभाता है, और हमें अपनी ही आवाज़ से अपने पास बुलाता है, क्योंकि वह हमें भटकी हुई भेड़ों के समान देखता है। और चाहे हम इधर-उधर बिखरे हुए हों, तौभी उसकी इच्छा यही है कि हमें फिर इकट्ठा करके अपने झुण्ड का बनाए।

यदि यह बात हमारे हृदयों में भली भाँति अंकित हो जाए, तो निश्चय ही हम न केवल सुसमाचार के सिद्धान्त को पूरी नम्रता से ग्रहण करने के लिये अधिक तैयार होंगे, वरन् ऐसी धुन और गम्भीरता से भी भर उठेंगे कि सारा संसार हमारे लिये कुछ भी न रह जाए। संक्षेप में, परमेश्वर का वचन हमारे लिये मधु के समान मीठा, और सारे सोने-चाँदी से अधिक बहुमूल्य होगा, क्योंकि परमेश्वर का पुत्र अपने पिता परमेश्वर की महिमा में होते हुए भी हमें अपनी आवाज़ सुनाता है, और वह भी ऐसे नहीं जैसे कोई दूर से बोलता हो, या ऐसी ध्वनि से जो हवा में विलीन हो जाती है, या इस प्रकार कि जो कुछ वह कहता है उसका हमारे पास कोई निश्चित प्रमाण न हो: परन्तु ऐसे जैसे कोई स्वयं आकर हमें प्रचार करता है। क्योंकि जो कुछ उसके अधिकार से, और उस आज्ञा के अनुसार किया जाता है जो उसने अपने प्रेरितों को सौंपी, उसे उसके कारण ग्रहण करना हमें उचित है, जैसा कि मैं पहले कह चुका हूँ।

फिर, पौलुस का यहाँ अभिप्राय यह है कि हम सुसमाचार को पूरी आज्ञाकारिता से ग्रहण करने के लिये उभारे जाएँ, न केवल हमारे

प्रभु यीशु मसीह के व्यक्तित्व की महानता के कारण, वरन् उन बातों के कारण भी जो स्वयं सुसमाचार में निहित हैं: क्योंकि वह शान्ति का संदेश है, वह कहता है। आओ, विचार करें कि उससे युद्ध रखना क्या है जिसने हमें बनाया और गढ़ा। यदि इस संसार में हमारा कोई शत्रु हो, चाहे वह एक निर्बल मनुष्य ही क्यों न हो और उसकी कोई बड़ी साख भी न हो, तौभी हम डरेंगे कि कहीं वह हमारे विरुद्ध कोई चाल या बैर न चले, या बल से बदला न ले। संक्षेप में, जब तक इस संसार में हमारा कोई शत्रु रहे, हम सदा बेचैन रहेंगे। तब क्या हम अत्यन्त मूढ़ न ठहरेंगे, यदि हम तब सो जाएँ जब परमेश्वर स्वयं को हमारे विरुद्ध दिखाता है, और हम से बदला लेने को सज्जित है?

यदि हम भली भाँति विचार करें कि परमेश्वर से युद्ध रखना क्या है (जैसा कि वास्तव में हमारे पाप उसे अप्रसन्न करने से नहीं चूकते), तो हम इसके विपरीत यह पाएँगे कि उसके साथ शान्ति और प्रायश्चित का होना कितनी बड़ी भलाई है। अब चूँकि यह हमें सुसमाचार के द्वारा मिलता है, जिसके द्वारा हम

यीशु मसीह ने अपनी मृत्यु के द्वारा स्वयं को बलिदान करके जो प्रायश्चित किया, उसके अधिकारी बनें: यह ऐसी बात है जो हमें इस रीति से प्रज्वलित कर दे कि हम सुसमाचार को उत्साहपूर्ण लगन से गले लगाएँ और अपना सम्पूर्ण मन उसी को सौंप दें।

इसलिए, अपने भीतर की शीतलता और आलस्य को देखते हुए, हम इस वचन पर और भी अधिक ध्यान करें और इसे अपने जीवन में लागू करें: पहला, यह जानना कि परमेश्वर का पुत्र हमें सिखाने और हमारा शिक्षक बनने से इनकार नहीं करता, बशर्ते हम उसके शिष्य बनकर सन्तुष्ट रहें; और दूसरा, कि हमें ऐसा सिद्धान्त मिलेगा जो संसार के सब सुखों, मान-सम्मान और धन-सम्पत्ति से कहीं अधिक चाहने योग्य है: अर्थात् यह कि हम परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप में रहें, और अपने प्रति उसकी कृपा के विषय में निश्चित होकर हम उसके पास जा सकें, उसके निकट पहुँच सकें, और उसके हाथ से उसके बच्चों के रूप में ग्रहण किए जाएँ। हमें इस बात पर अवश्य ध्यान देना चाहिए: क्योंकि पौलुस यह दिखाना चाहता था कि सच्चा मेल-मिलाप कौन-सा है, इसलिए कि बहुत-से लोग अपने को सुखी समझते हैं, फिर भी उनका परमेश्वर के साथ कोई मेल-मिलाप नहीं है।

क्योंकि कुछ लोग शैतानी आत्म-अभिमान से फूले हुए हैं, जैसे पोप-तन्त्र के अधीन साधु और भिक्षु, जो अपने मन में यह मनवा लेते हैं कि उन्होंने परमेश्वर के हाथ से इतना कुछ कमा लिया है कि उनमें कोई दोष पाया ही नहीं जा सकता। जो लोग इस प्रकार अपने ही गुणों और भले कामों पर अपनी नींव रखते हैं, वे समझते हैं कि परमेश्वर उनका ऋणी है, और वे निश्चिन्त होकर सो सकते हैं, क्योंकि शैतान उन्हें उस मूर्खतापूर्ण आत्म-भरोसे से मदहोश कर देता है जो उन्होंने बना लिया है: और यह इसलिए कि वे परमेश्वर को लक्ष्य नहीं बनाते, वरन् अपने ही सिर में एक मूरत गढ़ ली है। और सच कहें तो वे कौन-सी वस्तुएँ हैं जिनसे वे परमेश्वर को सन्तुष्ट करना चाहते हैं? केवल चमक-दमक की चीज़ें और निकम्मे खिलौने, मानो वे उनसे नन्हे बच्चों को बहलाना चाहते हों। पोप के अनुयायियों को पवित्र जल के छींटे लेने होते हैं, उन्हें सब पर क्रूस का चिह्न बनाना होता है, उन्हें इस सप्ताह और उस सप्ताह उपवास रखना होता है, उन्हें तीर्थयात्रा पर मारे-मारे फिरना होता है, उन्हें अमुक दिन माँस खाने से परहेज़ करना होता है, उन्हें इतनी बार पैटर नोस्टर बड़बड़ाना होता है, उन्हें स्थापित करना होता है

अमुक सन्त के सामने एक मोमबत्ती जलानी होती है, उन्हें इतनी मिस्साएँ सुननी होती हैं, उन्हें इतनी बार मेआ कुल्पा कहना होता है।

संक्षेप में, जब कोई इन सब को एक ढेर में बटोर ले, तो निश्चय ही वे सारी मलिनता की खुरचन और कूड़ा-करकट मात्र हैं। फिर भी उनके विचार में परमेश्वर इनसे भली-भाँति सन्तुष्ट हो जाता है, मानो वह कोई मूरत हो, या जैसा मैंने पहले कहा, कोई नन्हा बच्चा। इसलिए हम देखते हैं कि उन सब कपटियों में से, जो घमण्ड से इतने फूले हुए हैं, किसी को भी परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप नहीं मिल सकता। परन्तु क्योंकि वे ऐसे घुमावदार रास्ते अपनाते हैं और परमेश्वर की ओर सीधे नहीं, वरन् तिरछी दृष्टि से देखते हैं, और यद्यपि वे परमेश्वर के निकट आने का दिखावा करते हैं, तथापि उनका अपने आप को उसके सामने अर्पित करना सरल और सच्चे हृदय की खराई के साथ नहीं होता: वे अपनी ही मूर्खतापूर्ण चापलूसियों से अपने आप को धोखा देते हैं।

फिर इन ठट्ठा करनेवालों का एक ऐसा समूह भी है, जो अपने उद्धार की बात सुनकर केवल सिर हिला देते हैं, और कहते हैं, यदि हम एक बार अच्छी तरह आह भर लें तो बस है; परन्तु इस बीच आनन्द मनाना न छोड़ें, क्योंकि अपने जीवन का सारा समय ऐसी उदासी में बिताना भी भला क्या बात हुई? उससे हमें कुछ लाभ न होगा, इसलिए आओ हम मौज-मस्ती करनेवाले बनें। इस पर वे उड़ाऊपन में पड़ जाते हैं, कोई एक रीति से, कोई दूसरी रीति से। उनके पास विनाश के हज़ार मार्ग हैं, और वे सब जहाँ तक हो सके परमेश्वर के विरुद्ध एक हो जाते हैं। इसलिए, क्योंकि ऐसे लोग सदा बहुत रहे हैं, हाँ, बहुत ही अधिक, जो अपने विवेक को सुला देते हैं: सन्त

पौलुस इस स्थान पर (जैसा कि रोमियों के पाँचवें अध्याय में भी) सच्ची शान्ति का वर्णन करता है: वह यह है कि जब हम परमेश्वर के पास आएँ और उसके तेज के सामने खड़े हों, तब हमें निश्चय हो कि वह हम पर तरस खाएगा, और हमारे पापों का दोष हम पर नहीं लगाएगा, परन्तु हमें अपनी सन्तान के रूप में ग्रहण करेगा।

इसलिए यदि हम इस आत्मिक शान्ति का आनन्द लेना चाहते हैं, जो संसार की सारी वस्तुओं से बढ़कर है, तो आओ हम अपने ही विरुद्ध युद्ध करना सीखें। और वह कैसे? पहले यह जानना कि हम दोषी ठहरे हुए और खोए हुए हैं, और कि

हमारे लिए सुधार की कोई आशा नहीं, जिससे हम विनाश के गड्ढे से फिर निकल सकें, जब तक कि हमारे प्रभु

यीशु मसीह के द्वारा हमारा उद्धार न हो। जब हम अपने पुण्य पर किए जानेवाले हर अनुचित भरोसे से रहित हो जाएँ, और जान लें कि हम खाली और बिलकुल नंगे हैं, तब आओ हम कंगाल भिखारियों की नाई परमेश्वर के पास लौट आएँ: सच्ची शान्ति पाने के लिए यही आवश्यक है।

और इस बीच यह भी न सोचें कि जड़ बन जाने से हमें कुछ मिलेगा; क्योंकि तब तो हम इस संसार में सो ही जाएँगे: परन्तु यह समझें कि जब हमारे लिए कोई निश्चित समय ठहराया नहीं गया, तो हमारा कर्तव्य है कि हम सुबह-शाम अपने आपको परमेश्वर के सामने बुलाएँ, अपने पापों की भली-भाँति जाँच करें, और उन पर दुःखी और लज्जित हों। जब हम अपने ही दोषों के विरुद्ध इस प्रकार युद्ध करना सीख लें, और कपट और बनावट के बिना उसे पूरे मन से निभाएँ: तब हम उस शान्ति के राजमार्ग पर होते हैं जिसकी घोषणा और प्रचार हमारे

प्रभु यीशु मसीह प्रतिदिन सुसमाचार के द्वारा हमारे सामने करता है।

और यही कारण है कि सन्त पौलुस स्पष्ट कहता है कि उसी के द्वारा हमारी पहुँच पिता तक है। मानो वह कहता है कि कोई अविश्वासी, कोई अन्यजातियों जैसे संसारी लोग, कोई परमेश्वर का उपहास करनेवाले, कोई मूढ़ जन जो अपने अनन्त उद्धार की चिन्ता नहीं करते, किसी भी रीति से यह नहीं चख सकते कि वह शान्ति, जो हमें सुसमाचार से मिलती है, कितनी मूल्यवान है, और न यह समझ सकते हैं कि वह कितनी बहुमूल्य और प्रिय है। और क्यों? क्योंकि वे अपने मुँह पर बहुत से परदे डाल लेते हैं, ताकि परमेश्वर के न्याय के सामने वे लज्जित न हों और अपने पापों के भय से अछूते रहें। संक्षेप में, वे जानबूझकर अपने आपको मतवाला बना लेते हैं, कि उनका विवेक सुन्न हो जाए, और वे अपनी सारी समझ खो बैठते हैं, मानो वे पशु हों।

परन्तु जब हम यह विचार करते हैं कि हमारा सारा कल्याण इसी में है कि हम अपनी सारी शरण परमेश्वर में ले सकें, और कि उसके पास हमारा पहुँचना निश्चित

भी है, हाँ, और कि वहाँ तक निःसंकोच जाने का मार्ग हमारे लिए खुला है: तब निश्चय ही हम और सब बातें भूल जाएँगे, और अपने प्रभु यीशु मसीह के सहभागी होने की और उसकी देह में एक हो जाने की लालसा करेंगे, कि परमेश्वर हमें ग्रहण करे, और हम अपनी आवश्यकता में पूरे भरोसे के साथ उसे पुकारें, और उस प्रेम पर स्थिर हो जाएँ जो वह हम से रखता है, और इसमें सन्देह न करें कि जो कुछ सुसमाचार में हमें दिया जाता है, वह ऐसा ही है मानो परमेश्वर हमारे बीच अपना हृदय खोलकर बोल रहा हो।

अब सन्त पौलुस, सुसमाचार के प्रचार की चर्चा करके, जानबूझकर जोड़ता है, "एक आत्मा में।" वह पहले कह चुका था कि हम सब अपने प्रभु यीशु मसीह के शरीर में एक साथ जुड़े हुए हैं, अर्थात् इसलिए कि उसने हमारा स्वभाव अपने ऊपर लिया, और इस प्रकार उस श्राप को मिटा दिया और दूर कर दिया जो आदम में था। तथापि परमेश्वर के पुत्र की देह में यह कार्य पूरा हो जाना पर्याप्त न होता यदि सुसमाचार उसके लिए साधन न होता। इसलिए तीसरी बात के रूप में सन्त पौलुस जोड़ता है कि हमें सब को एक ही आत्मा में सहभागी होना है।

क्योंकि यद्यपि सुसमाचार का प्रचार होता है, फिर भी बहुत से हठीले लोग हैं, और दूसरे इस संसार में ऐसे उलझे हैं कि वे स्वर्गीय जीवन के विषय में उतना भी नहीं सोचते जितना कुत्ते और सूअर सोचते हैं। फिर कुछ ऐसे हैं जो अपने कपट में इतने खोखले हो गए हैं कि यद्यपि परमेश्वर हम सब को बुलाता है और अपने पुत्र में मीठे ढंग से हमें अपनी ओर खींचता है, तो भी परमेश्वर के पास आनेवालों की गिनती बहुत थोड़ी है। इसी कारण सन्त पौलुस कहता है कि हमारे पास परमेश्वर की आत्मा होनी चाहिए। क्योंकि निश्चय है कि स्वभाव से हम चंचल हैं, और हम में से हर एक की न केवल अपनी-अपनी राय होती है, बल्कि हम घड़ी-घड़ी बदलते भी रहते हैं। इस कारण हम एकमत होने से इतने दूर हैं कि हम में से कोई भी सुबह से रात तक अपनी राय पर स्थिर नहीं रहता, जब तक कि परमेश्वर उसका संचालन न करे।

इसलिए जब हम सुसमाचार का प्रचार सुनते हैं, तब हमारे लिए आवश्यक है कि परमेश्वर की आत्मा हमारी अगुवाई और संचालन करे, ताकि हम अपने प्रभु यीशु मसीह को पूरी तरह ग्रहण करें, और उसके द्वारा पिता तक हमारी पहुँच हो। अब,

इसलिए, हमें पहले यह स्मरण रखना चाहिए कि जब हमारा प्रभु यीशु मसीह अपने सेवकों के द्वारा हमें समझाता है (जैसा कि सन्त पौलुस कुरिन्थियों की दूसरी पत्री में भी कहता है), तब हमें उसके पास आने के लिए भली-भाँति तैयार होना चाहिए, हाँ, उसकी ओर दौड़ना चाहिए, यहाँ तक कि मनुष्य की सारी सामर्थ्य से बढ़कर अपने आपको विवश करके भी। क्योंकि जब हम अपने से जो बन पड़े वह सब कर चुकें, तब भी उस तक हमारी पहुँच न होगी, परन्तु हमारा सारा प्रयत्न आगे बढ़ने के बदले पीछे हटना ही ठहरेगा, जब तक कि उसकी आत्मा हमारी अगुवाई न करे। इसलिए हमारे लिए और भी आवश्यक है कि हम परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह अपनी पवित्र आत्मा से हमें छुए, और उसके द्वारा अपने पास आने का मार्ग हमारे लिए बनाए, जैसा रोमियों के आठवें अध्याय में कहा गया है, और जैसा हमने गलातियों में भी वैसे ही देखा है।

क्योंकि वहाँ पौलुस परमेश्वर की सन्तानों और निकम्मे ठहराए गए लोगों के बीच भेद करता है। वह कहता है, "हमें लेपालकपन की आत्मा मिली है, जिससे हम 'हे अब्बा, हे पिता' कहकर पुकारते हैं।" वह कहता है कि हम अपने आप से उसे नहीं जान सकते, क्योंकि हम में दुर्बलता के सिवा और कुछ नहीं है, और परमेश्वर को अपना पिता कहना हमारी ओर से बड़ी ढिठाई होती। परन्तु जब परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा के द्वारा अपने सुसमाचार के सत्य को हम में मुहर लगाकर प्रमाणित कर देता है, और भीतर से हमें ज्योति देता है, तब हम जान लेते हैं कि वही बोल रहा है, और अपनी भलाई और दया के विषय में भी हमें निश्चय दिला चुका है; तब हम निःसंकोच और खुले मुँह से पुकार सकते हैं कि वह हमारा पिता है। इस प्रकार तुम देखते हो कि सार रूप में हमें क्या स्मरण रखना है: यह कि जब हमें सुसमाचार सुनाया जाए, तब हम में से कोई अपनी ही बुद्धि पर भरोसा न करे, वरन् अपने भीतर की मोटी बुद्धि और दुर्बलता को देखते हुए हम अपने आप को परमेश्वर की आत्मा के चलाए चलने दें, जो वह मुख्य कुंजी है जिससे स्वर्ग-लोक का द्वार हमारे लिए खोला जाता है।

और इसी कारण यह भी कहा गया है कि हमें अपने प्रभु यीशु मसीह के लहू से छिड़काया जाना है, जैसा कि पतरस अपनी पहली

पत्री में कहता है। इसी कारण इब्रानियों की पत्री में प्रेरित कहता है कि यीशु मसीह ने आत्मा के द्वारा अपने आप को अर्पित किया, अर्थात् उसका वह बलिदान जिससे उसने हमारे लिए धार्मिकता मोल ली, हमारे लिए फिर भी

व्यर्थ ही रहता यदि पवित्र आत्मा अपनी सामर्थ्य से उसमें कार्य न करता। और पौलुस, जो बात पहले कही जा चुकी है उसी को आगे बढ़ाते हुए, यह भी जोड़ता है कि जो दूर थे और जो निकट थे, दोनों ने यही सन्देश सुना, और वही आज हमारे सामने भी रखा गया है, ताकि हम उसमें और भी दृढ़ किए जाएँ। और जैसा मैं कह चुका हूँ, निकटवालों से उसका अर्थ यहूदी हैं, जिनकी परमेश्वर से पहले ही कुछ घनिष्ठता थी, क्योंकि उसने उन्हें अपनी व्यवस्था देकर अपना परिचय दिया था, और उनसे कहा था कि वह उनके वंश को अपनाकर उसका रक्षक होगा।

फिर भी यह उन्हें अपने साथ पूरी रीति से जोड़ने के लिए पर्याप्त न था, जब तक वह उनके पापों को क्षमा न कर दे; और यह यीशु मसीह के द्वारा हुआ।

क्योंकि व्यवस्था उन्हें त्रास और मन की पीड़ा के सिवा कुछ नहीं दे सकती थी, वह उन्हें सब ओर से शापित ठहराती और नरक की तह तक डुबो देती, जैसा कि पौलुस रोमियों के तीसरे अध्याय में, और विशेषकर कुरिन्थियों की दूसरी पत्री के तीसरे अध्याय में कहता है। इसलिए आवश्यक था कि सुसमाचार उसके साथ जोड़ा जाए। अब यह निश्चित है कि दाऊद और अन्य पवित्र भविष्यद्वक्ताओं को, और उसी प्रकार पुराने नियम के अधीन जीनेवाले सब राजाओं और विश्वासियों को सुसमाचार वैसा प्रकट रूप में नहीं मिला था जैसा हमें मिला है, तौभी सार रूप में परमेश्वर ने उन पर यह प्रकट किया था कि वह अपनी ही सेंतमेंत की भलाई से उस छुड़ानेवाले के कारण, जिस पर वे भरोसा रखते थे, उन्हें दया के साथ ग्रहण करता है। यदि व्यवस्था को सुसमाचार से अलग कर दिया जाए, तो जो उस पर टिके रहते हैं उन्हें उससे कुछ लाभ तो होता ही नहीं, वरन् वह उन्हें गिराने, उन पर गरजने और यह दिखाने का ही काम करती है कि परमेश्वर की

महिमा कितनी भयानक है।

इसलिए शान्ति तो सुसमाचार में ही है, और इसी कारण यहूदियों के लिए आवश्यक था कि वे उस सिद्धान्त के सहभागी हों। और हम जो अन्यजातियों में से आए हैं, हमें चाहिए (जैसा मैंने आज सवेरे कहा) कि उस दोहरे ऋण को और भी भली-भाँति स्वीकार करें जिसमें हम

परमेश्वर के प्रति बँधे हैं, कि उसने हमें, जो असमय जन्मे हुए के समान थे, अपनी निज प्रजा के संगी बनाने की कृपा की, और उन लोगों की संगति में रखा जिन्हें उसने पहले से चुनकर अपनाया था; यहाँ तक कि भविष्यद्वक्ताओं के वे लेख अब पूरे हो गए हैं जिनमें लिखा है, "हे अन्यजातियो और जाति-जाति के लोगो, तुम

परमेश्वर की उसकी अपनी प्रजा के संग महिमा करो;" इसके द्वारा पवित्र आत्मा ने पहले से यह दर्शाया था कि ऐसा सुरीला गान होगा कि सब मनुष्य, अन्यजाति और यहूदी दोनों, परमेश्वर की स्तुति गाएँगे, जब वे एक साथ जोड़ दिए जाएँगे और उस बिखराव में से इकट्ठे किए जाएँगे जिसमें हम सब हैं, जैसा कि पहले कहा जा चुका है और जैसा हम पहले देख चुके हैं।

तो हम देखते हैं कि पौलुस का लक्ष्य क्या था, जब उसने कहा कि सुसमाचार सब मनुष्यों को सुनाया गया, उन्हें भी जो दूर थे और उन्हें भी जो निकट थे। और रोमियों के दसवें अध्याय में वह इसी की चर्चा करता है। क्योंकि वहाँ वह दिखाता है कि यदि हम यह न जानते कि सुसमाचार का प्रचार परमेश्वर के अधिकार और उसकी अटल आज्ञा से होता है, तो हम अपने विश्वास में सदा डगमगाते रहते और कभी स्थिर न होते। वह कहता है, "मनुष्यों का काम नहीं कि वे अपने आप आगे बढ़ें, जब तक परमेश्वर उन्हें न भेजे।" और परमेश्वर ने संसार को सब समयों में सिखाना आरम्भ किया है, चाहे प्रचार या लेख के द्वारा नहीं, तो भी स्वयं संसार को देखने मात्र के द्वारा। इसलिए वह कहता है, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि परमेश्वर ने इस समय सब जातियों पर अपना अनुग्रह बढ़ाने की कृपा की, और उन्हें यह जानने दिया कि वह उनका पिता होना चाहता है।

अब जैसे एक ओर यहूदियों के लिए यह जानना आवश्यक था कि यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर से मेल-मिलाप करने की उन्हें कितनी बड़ी आवश्यकता है, और अपने जन्मसिद्ध अधिकार, या अपने खतने, या व्यवस्था की इन सब छायाओं पर भरोसा करके धोखा न खाएँ, वरन् उस एकमात्र उपाय की शरण लें जिसकी मैंने चर्चा की है, अर्थात् यह कि परमेश्वर उस सनातन बलिदान के कारण जो यीशु मसीह ने चढ़ाया उन्हें दया के साथ ग्रहण करता है: वैसे ही हम भी अपनी ओर से परमेश्वर की भलाई की बड़ाई करना सीखें,

क्योंकि उसने हमें अपने

घराने और कलीसिया का सदस्य बनाने की कृपा की है, यद्यपि हम पहले उससे कटे हुए और निकाले हुए थे। इसलिए हम अपने विषय में सावधान रहें, कि यह उपकार हमारे हाथ से जाता न रहे, और हम अपनी ही कृतघ्नता के कारण इससे वंचित न हो जाएँ।

क्योंकि हमारे पास क्या बहाना रहेगा, यदि जब परमेश्वर अपने एकलौते पुत्र के द्वारा हमें स्वर्ग में बुलाता है, और यीशु मसीह हमसे कहता है कि जब-जब हमें बताया जाता है कि परमेश्वर उसके कारण हम पर दयालु होगा, तब-तब वही स्वयं हमें ढूँढ़ने आता है: तो भी हम उसकी ओर तेज़ी से न दौड़ें, उत्साह से तपते हुए और सावधानी में सच्चे होकर, यह दिखाने के लिए कि हम जानते हैं कि हमारा सारा कल्याण, आनन्द, सुख और महिमा हमारे

परमेश्वर? और यह उसकी निःशुल्क भलाई के बिना हो ही नहीं सकता। फिर, जब हम इस मेल-मिलाप को ग्रहण करने से इन्कार करें, तो हमें डरना चाहिए कि यीशु मसीह अपनी वाणी बदल देगा; क्योंकि यह निश्चित है कि सुसमाचार उन सब के लिए सदा दण्ड की प्रतिज्ञा करता है जो अपने आप को परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप नहीं बनाते।

और पवित्रशास्त्र का बाँधने की बात कहना, खोलने की बात के साथ, व्यर्थ नहीं है; क्योंकि हमारे प्रभु यीशु मसीह हमें यह दिखाना चाहता था कि सुसमाचार का स्वभाव और कर्तव्य ही यही है कि हमें उस बन्धन और कारागार से निकाल ले जहाँ हम जकड़े हुए हैं, जब तक कि वह हमें स्वतंत्र न कर दे; और यह उसका अपना ही कार्य भी है, जैसा वह स्वयं पवित्र

यूहन्ना के आठवें अध्याय में कहता है, जहाँ वह यही बात प्रकट करता है। फिर भी वह यह भी जोड़ता है कि जो उसे अपना छुड़ानेवाला नहीं मानते, और न अपने आप को उसके द्वारा स्वतंत्र होने देते हैं, उनके लिए बन्धन भी तैयार हैं। और यूहन्ना में उसके कहने का यही अर्थ है, जब वह कहता है, "जिनके पाप तुम क्षमा करो वे उनके लिए क्षमा किए गए हैं, और जिनके तुम रखो वे रखे गए हैं।" तब वह दिखाता है कि जब हम सुसमाचार का प्रचार करें, तो सबसे पहले हमें मेल-मिलाप का सन्देश सुनाना चाहिए, जिसकी चर्चा कुरिन्थियों की पहली पत्री में, मेरे पहले बताए हुए स्थान पर, की गई है।

इस प्रकार तुम देखते हो कि हमें निरन्तर यही दिखाना है कि परमेश्वर ने हम पर इतनी कृपा की कि अपने पुत्र के

व्यक्तित्व में हमारे साथ मेल कर लिया, हाँ, और हमें अपने पास ग्रहण किया, कि हम हमारी सारी मलिनता से धोए और शुद्ध किए जाएँ और उसके सामने धर्मी करके स्वीकार किए जाएँ। देखो, अभागी आत्माएँ कैसे बन्धन-मुक्त की जाती हैं, देखो, बेचारे बन्दी कैसे कारागार से निकाले जाते हैं, देखो, जो कभी मृत्यु के अन्धकार में डूबे थे वे कैसे फिर जीवन के प्रकाश में लाए जाते हैं।

परन्तु दूसरी ओर हमें पापों को रखने का भी अधिकार दिया गया है, अर्थात् परमेश्वर के वचन को तुच्छ जाननेवालों को परमेश्वर के भयंकर क्रोध की धमकी देकर, और उनसे यह कहकर कि जब वे अपने कान झटक चुके हैं और समझते हैं कि बच निकले, तब भी जो उपदेश उन्होंने सुना है वह उन्हें बाँधने के लिए रस्सियों और बेड़ियों के समान होगा। इसी के अनुसार, पौलुस दूसरे स्थान पर स्पष्ट कहता है कि जो हमारे सिद्धान्त का विरोध करते हैं उन सब के लिए हमारे पास दण्ड तैयार है। हाँ, चाहे वे संसार में सबसे ऊँचे ही क्यों न हों, फिर भी यदि वे परमेश्वर के विरुद्ध अपने रोएँ खड़े करें और उसे तुच्छ जानें, तो जो दण्ड उन्हें सुनाया गया है उससे वे बच नहीं पाएँगे, कम से कम तब, जब विश्वासी अपनी आज्ञाकारिता पूरी कर चुके हों।

और सचमुच जब कोई शत्रु किसी जाति को ललकारता है, तो वे भय से काँपने लगते हैं कि यदि उचित शर्तें ठुकराई गईं तो उन पर दया नहीं होगी; तो फिर तब क्या किया जाएगा जब परमेश्वर आता है, और न केवल यह चाहता है कि हम अपने आप को उसके अधीन कर दें, बल्कि स्वयं को भी हमें अर्पित करता है, और चाहता है कि हम यीशु मसीह में उसे और उसकी सारी सम्पत्ति को पाएँ? यदि हम ऐसे अनुग्रह को ठुकरा दें, जब वह हम पर ऐसी कृपा करता है, तो हमारा क्या होगा? क्या ऐसे नीच अहंकार और तिरस्कार पर भयंकर दण्ड नहीं पड़ेगा, जब लोग उसे ग्रहण करना भी उचित नहीं समझते, उसी को जो न केवल उनके उद्धार का प्रबन्ध करता है, बल्कि उन्हें रचा भी है, और जिसके द्वारा वे सम्भाले जाते हैं?

इसलिए हम इस सिद्धान्त को भली-भाँति ध्यान में रखना सीखें जिसमें मेल-मिलाप की चर्चा है, ताकि हम परमेश्वर को फिर और क्रोधित न करें, और अपनी रोटी को

विष, और अपने भोजन को प्राणघातक विष न बना डालें, परन्तु उस अनुग्रह से सचमुच जिलाए जाएँ जो परमेश्वर हमें प्रतिदिन देता है।

और इसी कारण पौलुस यह निष्कर्ष निकालता है कि जो परमेश्वर के आत्मा द्वारा इतना प्रभावित हुए हैं कि सुसमाचार को सरलता और सच्चाई से मानते हैं, वे अब परदेशी नहीं, वरन् पवित्र लोगों के संगी नागरिक और परमेश्वर के घराने के लोग हैं। इसका उद्देश्य अब भी वही है जो मैं पहले बता चुका हूँ: अर्थात् यह कि परमेश्वर के नाम की महिमा वैसी की जाए जैसी उसके योग्य है, और हम उसके पास हल्के मन से न जाएँ जैसा हम करने के आदी हैं। क्योंकि हम एक ही शब्द कहकर अपना कर्तव्य पूरा समझ लेते हैं, यह कहकर कि यीशु मसीह हमारा छुड़ानेवाला है। परन्तु हम सदा स्मरण करें कि हम क्या थे, और किस दशा में थे, जब तक कि

यीशु मसीह ने हमें मृत्यु के कालकोठरियों से बाहर नहीं निकाला।

क्योंकि "परदेशी" शब्द का वही अर्थ है जो हम पहले देख चुके हैं: अर्थात् यह कि सुसमाचार के प्रचार से पहले अन्यजातियाँ उद्धार की आशा से रहित थीं, परमेश्वर की कृपा से कटी हुई, प्रतिज्ञाओं के बिना, संसार में परमेश्वर के बिना। यद्यपि वे यहाँ जीवित रहीं, यद्यपि उन भली वस्तुओं से जो परमेश्वर ने उन्हें दीं उनका पालन-पोषण हुआ, यद्यपि वे सूर्य के प्रकाश का आनन्द लेती रहीं, फिर भी वे परमेश्वर के बिना थीं। और सब अविश्वासियों की भी यही दशा है।

इसलिए पौलुस, यह बताते हुए कि हमारा छुटकारा क्या था जब यीशु मसीह हमें ढूँढ़ने आया और हमें परमेश्वर तक पहुँचाने के लिए अपना हाथ बढ़ाया, अपने

पिता तक, इसलिए है कि हम अपने उद्धार की सारी स्तुति उसी को देना सीखें। इस पर वह कहता है कि हम स्वर्ग के नागरिक हैं, स्वर्ग के स्वर्गदूतों के संगी हैं, और पवित्र राजाओं और भविष्यद्वक्ताओं के साथी हैं। जब भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों की, या किसी पवित्र जन और शहीद की चर्चा होती है, तो हम उन्हें आदर की दृष्टि से देखते हैं, और ठीक ही करते हैं; परन्तु इसी बीच हम यह ध्यान नहीं देते कि पवित्र आत्मा उन्हें हमारे सामने क्यों रखता है। पोप के अनुयायी उन्हें मूर्तियाँ बना डालते हैं,

और (अपनी समझ से) उन्होंने पौलुस और पतरस का भली-भाँति सम्मान कर लिया है जब उन्हें परमेश्वर के पंखों से सजा दिया है।

परन्तु इसके विपरीत, यहाँ कहा गया है कि जब परमेश्वर उस अनुग्रह को प्रकट करता है जो उसने उन्हें दिया, तो इसलिए कि हम उस उपकार पर विचार करें जो वह हम पर करता है, कि वह हमें उनकी टोली में गिनता है।

इसी के अनुसार, प्रेरित इब्रानियों के बारहवें अध्याय में कहता है कि वे हमारे लिए गवाहों के एक बड़े और घने बादल के समान हों, कि हम उनके उदाहरण का और अधिक आनन्द से अनुसरण करें, और उस मार्ग पर चलते जाएँ जो वे हमें दिखाते हैं। फिर, जब परमेश्वर ने हमें उस अनमोल भलाई का बोध करा दिया है जो वह हमारे साथ करता है, कि हमें भविष्यद्वक्ताओं, प्रेरितों, शहीदों और सब विश्वासियों के साथ मिला दिया, तो आओ हम और आगे बढ़कर यह भी विचार करें कि उसने हमें स्वर्ग के स्वर्गदूतों के संगी नागरिक बनाया है।

इस संसार की नागरिकता, या स्वतंत्र निवासी होने का अधिकार, या नगर-सदस्यता के लिए मनुष्य बड़ा परिश्रम करता है, तौभी वे इसी जीवन की उपलब्धियाँ हैं। और हमारा यह जीवन है ही क्या? एक क्षणभंगुर छाया, जो देखते-देखते मिट जाती है। देखो, परमेश्वर हमें इसके लिए बुलाता है कि हम उसकी कलीसिया में केवल परदेशियों की नाईं न रहें, वरन् इसका भी निश्चय पाएँ कि वह हमें अपनी सन्तान करके ग्रहण और स्वीकार करता है, ताकि हम सच्चे भरोसे के साथ, और मानो एक ही मुख से, निडर होकर उसे अपना पिता कहकर पुकारें, और सब पवित्र लोगों के साथ एक ही सुर और एक ही लय में चलें।

इसलिए इस प्रसंग में हमें यही बात स्मरण रखनी है; इब्रानियों की पत्री के अन्त में प्रेरित ने भी यही क्रम अपनाया है, जब वह कहता है कि हम अब उस व्यवस्था के अधीन नहीं हैं जो हमें डराने के सिवाय और कुछ नहीं कर सकती थी, क्योंकि वहाँ गर्जन और बिजलियों के सिवाय कुछ सुनाई नहीं देता था, जो परमेश्वर के क्रोध के भयानक चिह्न थे। परन्तु हम, वह कहता है, सिय्योन पर्वत के पास आए हैं, जहाँ हम अपने पिता परमेश्वर का मधुर शब्द सुनते हैं, जो हमें अपनी पवित्र आत्माओं, अपने स्वर्गदूतों और अपने विश्वासियों की आत्माओं के साथ मिलाता है, ताकि

हम अब उनकी मण्डली के हैं, और परमेश्वर से मानो एक ही मुख से बात कर सकते हैं, क्योंकि हमारा सिर एक ही है।

वास्तव में यही वह बात है जिसे हमें मन में रखना है। और यद्यपि हम अभी इसका पूरा आनन्द नहीं उठाते, तौभी हमें निश्चय है कि विश्वास के द्वारा हम इस वर्तमान जीवन में संसार के परदेशियों की नाईं चल सकते हैं, और परमेश्वर हमें अपनी सन्तान और वारिस कहकर अपनाने से नहीं चूकेगा।

यद्यपि हम यहाँ अब भी अनेक दोषों और अपूर्णताओं में लिपटे हुए हैं, तौभी स्वर्गलोक के सब पवित्र लोग हमें अपने भाई मानते हैं, और हमारे प्रभु यीशु मसीह के कारण हमें गले लगाते हैं।

अब आओ, हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने दोषों को मानते हुए दण्डवत् करें, और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उनका ऐसा बोध कराए कि हम उनसे अधिक से अधिक घृणा करें, और दूसरी ओर अपना सारा मन उस असीम अनुग्रह पर ध्यान करने में लगाएँ जो वह हम पर करता है, जब वह हमें अपने पास बुलाता है, ताकि हम न तो इतने द्वेषी हों, न इतने मूर्ख और अन्धे कि जब वह बोलता है तो न सुनें, वरन् विश्वास के द्वारा उस सिद्धान्त के आज्ञाकारी बनें जो वह हमारे सामने रखता है, जिसमें हमारा सारा कल्याण और उद्धार है। वही सिद्धान्त हमें संसार की सब दुष्ट अभिलाषाओं से, और उन सब हठीली भावनाओं से खींच ले जो हमें धकेलकर उससे दूर कर देती हैं, ताकि हम उसके भय और प्रेम में अधिक से अधिक बढ़ते जाएँ, और उसके स्वरूप में ढलते जाएँ, जब तक हम उसकी उस स्वर्गीय महिमा तक न पहुँचें जिसके लिए वह हमें बुलाता है।

वह प्रसन्न होकर यह अनुग्रह केवल हमें ही नहीं, वरन् सब लोगों को प्रदान करे। आमीन।

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