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तेरहवाँ उपदेश, दूसरे अध्याय पर पाँचवाँ — इफिसियों 2:13-15
पूरी तरह परमेश्वर का हो जाएँ, क्योंकि उसे यह भी भाया है कि वह स्वयं को भी हमें दे दे।
और अब आइए हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सम्मुख अपने दोषों को मानते हुए गिर पड़ें, और उससे प्रार्थना करें कि वह हम में से हर एक को न केवल उन दुर्गुणों का बोध कराए जिनसे हम कलंकित हैं, वरन् उनका भी जिनसे उसने हमें शुद्ध करने की कृपा की है; और विशेष करके यह कि हम अपने मूल पर आएँ, और यह विचार करें कि अपनी माताओं के गर्भ ही से हम पाप के सिवा कुछ नहीं लाते, और उसे अधिकाधिक बढ़ाने से रुकते नहीं; ताकि जब हम यह जान लें, तो उस ज्ञान के लिए जो उसने हमें दिया है उसके पवित्र नाम को धन्य कहें, और उसके पास लौट आने को ऐसे प्रेरित हों कि हम सीधे मार्ग पर बने रहें, और अपने प्रभु यीशु मसीह से तनिक भी न भटकें, क्योंकि उसके बिना हमें अवश्य ही स्वर्ग के राज्य से निकाल दिया जाएगा और उससे पूरी तरह बाहर कर दिया जाएगा। इसलिए आइए हम उसी मार्ग को थामे रहें, और अपने इस भले परमेश्वर को निरन्तर पुकारते रहें, कि वह हमें अनुभव से यह जानने की कृपा करे कि हमें अपने पास बुलाना व्यर्थ नहीं है; ताकि अपनी प्रार्थनाओं का ऐसा फल पाकर हम उसकी शरण में भागने के लिए और भी अधिक साहस पाएँ, और उसके हाथ से पाई सब भलाइयों के लिए उसका धन्यवाद करें। वह यह अनुग्रह न केवल हमें वरन् सब लोगों को भी देने की कृपा करे। आमीन।
तेरहवाँ उपदेश, जो दूसरे अध्याय पर पाँचवाँ है।
13 पर अब तुम जो पहले दूर थे, मसीह यीशु में मसीह के लहू के द्वारा निकट किए गए हो।
14 क्योंकि वही हमारा मेल है, जिसने दोनों को एक कर दिया, और बीच की दीवार को जो अलग करती थी ढा दिया, 15 अर्थात् बैर को, अपने शरीर के द्वारा, आज्ञाओं की उस व्यवस्था को जो विधियों में थी मिटा दिया, ताकि वह दोनों को अपने में एक नया मनुष्य बना दे।
हम पहले देख चुके हैं कि हम सब स्वभाव से परमेश्वर के बैरी हैं, क्योंकि आदम के पाप के कारण हम सब धार्मिकता से दूर हो गए हैं, इसलिए हम में दुराचार और विद्रोह के सिवा कुछ नहीं है।
यद्यपि मनुष्य अपने आपको बहलाते और फुसलाते हैं, तथापि यह निश्चित है कि वे परमेश्वर के सामने ऐसा कुछ नहीं ला सकते जो उसके क्रोध को न भड़काए।
परमेश्वर के लिए अनिवार्य है कि वह हमें अपनी सन्तान मानने से इन्कार कर दे, जब तक कि हमारे प्रभु यीशु मसीह हमारी अगुवाई न करें, क्योंकि हम किसी और रीति से परमेश्वर के पास नहीं आ सकते।
यहूदियों को परमेश्वर से कुछ घनिष्ठता प्राप्त थी, क्योंकि उसने उन्हें गोद लिया था; कहा गया है कि अब्राहम का वंश पवित्र था। यह इसलिए नहीं था कि वे संसार के शेष लोगों से अधिक योग्य थे, परन्तु परमेश्वर की उस भलाई के कारण था जिससे उसने उन्हें चुना। इसलिए, इससे पहले कि हमारे
प्रभु यीशु मसीह संसार में आए, यहूदी परमेश्वर के अधिक निकट थे, और अन्यजाति दूर थे। इसलिए नहीं कि यहूदी अन्यजातियों से अच्छे थे, जैसा मैं पहले कह चुका, परन्तु इसलिए कि परमेश्वर को यह भाया कि उन्हें अपने घराने में गिने। तो आप देखते हैं कि वे निकट इसलिए थे कि उनसे कहा गया था कि परमेश्वर उनके बीच निवास करता है, और वे याजकों का राज्य थे। यह उन्हें दिए गए चिन्हों से भी प्रकट था, जैसे पवित्रस्थान और उसकी सब सामग्री।
अब पौलुस अन्यजातियों से कहता है कि उनकी दशा बदल गई है। जो पहले परमेश्वर से दूर थे, वे अब यीशु मसीह के क्रूस के द्वारा निकट किए गए हैं। इससे परमेश्वर का अनुग्रह और भी बढ़कर प्रकट होता है। क्योंकि जैसा मैं पहले कह चुका, यदि हम इस पर विचार न करें कि परमेश्वर हमें अपनी ओर खींचने के लिए हाथ बढ़ाने से पहले हमें किस दुर्दशा में पाता है, तो हम कभी न जान पाएँगे कि हम उसके कितने ऋणी और उससे कितने बँधे हुए हैं, और हम पर उसकी दया कितनी बड़ी है।
जब हमें दिखाया जाता है कि जन्म ही से हम शापित हैं, शैतान के अत्याचार के अधीन हैं, पाप के दास हैं, और परमेश्वर मानो हमारे विरुद्ध सज्जित होकर पूरी कठोरता से हमारा न्यायी बनने को खड़ा है; और फिर यह कहा जाता है कि परमेश्वर ने हमें नरक के बन्दीगृह से निकालकर स्वर्ग के राज्य तक पहुँचाया है, और हमें निश्चय दिलाता है कि वहाँ हमारा ऐसा मीरास है जो हम से कभी न छूटेगा, और यह भी दिखाता है कि इन सब बातों का निश्चय हमें यीशु मसीह में है, तब हमारा आश्चर्य से भर जाना अवश्य है, यह सोचकर कि परमेश्वर की भलाई हमारी सारी समझ से परे है। पौलुस यहाँ इसी बात को आगे बढ़ाता है।
यह विषय बार-बार स्मरण करने के योग्य है; यह व्यर्थ की बात नहीं कि हमें स्मरण दिलाया जाए कि हम परमेश्वर को उसका उचित आदर दें और हमारा हृदय दृढ़ता से स्थिर हो, ताकि हम निडर होकर उसे पुकार सकें, और पूरी तरह आश्वस्त और निश्चित हों कि वह सदा हमारा पिता रहेगा और हमें अपनी सन्तान के रूप में ग्रहण करेगा, यदि हम उसके एकलौते पुत्र के अंग हैं, जो सुसमाचार पर विश्वास के द्वारा उससे जुड़े हैं।
तो आप देखते हैं कि पहली बात जो हमें ध्यान देनी है वह यह है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा, क्योंकि उसने अपनी मृत्यु से हमें परमेश्वर पिता से मिला दिया है, हम अब स्वर्ग के राज्य के निकट लाए गए हैं, जिससे हम दूर थे और जहाँ पहुँचने या प्रवेश करने की कोई आशा न थी। और यद्यपि पौलुस ने एक जाति से बात की है, तथापि उसका सन्देश सब के लिए है। इस प्रकार पवित्र आत्मा आज भी उसी सिद्धान्त के द्वारा हमें उभारता है कि हम अपनी दुर्दशा पर विचार करें, ताकि हम
अपने आप में लज्जित हों, और उस अनमोल लाभ को ग्रहण करें जो सुसमाचार में मसीह के व्यक्तित्व के द्वारा हमें दिया जाता है।
इस पर वह यह जोड़ता है कि वही हमारा मेल है, जिसने दोनों को एक कर दिया, अर्थात् उन्हें भी जो दूर थे और उन्हें भी जो निकट थे। जैसे पहले कहे गए वाक्य में पौलुस का उद्देश्य अन्यजातियों को दीन बनाना था और यह दिखाना था कि वे परमेश्वर के कितने ऋणी हैं, वैसे ही यहाँ वह यहूदियों के लिए चेतावनी जोड़ता है कि वे अपना अभिमान गिरा दें, ताकि वे यह न समझें कि परमेश्वर ने उन्हें चुना है, इसलिए वे दूसरे मनुष्यों से उत्तम हैं। क्योंकि मनुष्य सदा अपने आप को हद से बढ़कर ऊँचा उठाने की ओर झुके रहते हैं, इसलिए उस जाति ने परमेश्वर के अनुग्रह का दुरुपयोग किया और अपने आप को यह विश्वास दिला लिया कि अब्राहम का वंश स्वर्गदूतों का वंश है। संक्षेप में, जब उनसे कहा गया कि कलीसिया यहूदियों और अन्यजातियों दोनों से बिना किसी भेद के एकत्र होकर एक होगी, तो उन्होंने सोचा कि परमेश्वर उनके साथ बड़ा अन्याय और अपमान कर रहा है। जबकि उनसे बार-बार कहा गया था कि परमेश्वर ने उन्हें न उनके गुण के कारण चुना, न उनके कुलीन होने के कारण, न किसी और बात के कारण जो उसने उनके व्यक्तित्व में पाई, परन्तु इसलिए कि उसने उनके पूर्वजों से बिना उनकी किसी योग्यता के प्रेम किया था।
इसलिए मूसा और भविष्यद्वक्ताओं ने उन्हें बार-बार चिताया कि वे अपने लिए कुछ भी दावा न करें, परन्तु परमेश्वर की निःशुल्क भलाई को स्वीकार करें और अपने आप को वहीं देखें, ताकि वे मान लें कि यदि दूसरों से बढ़कर उनका कोई विशेषाधिकार है, तो वह उनके अपने कारण से नहीं, न उनके अपने निमित्त है, परन्तु इसलिए है कि परमेश्वर की यह इच्छा हुई कि उन्हें अपनी निज विरासत के रूप में अपने लिए रखे। फिर भी इन सब बातों के होते हुए पौलुस यहाँ दिखाता है कि यदि यहूदी अन्यजातियों के साथ सच्चे भाईचारे में नहीं मिलते, तो वे अपने ही उद्धार को ठुकरा देते हैं।
क्योंकि यद्यपि यहूदी पहले से परमेश्वर के निकट थे और उन्होंने देख लिया था कि वह उन्हें अपनी सन्तान मानता है, फिर भी हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने तक यह बात अनिश्चित ही बनी रही। तब उनके लिए आवश्यक था कि वे मध्यस्थ के द्वारा परमेश्वर से जोड़े जाएँ, नहीं तो उन्हें अपने विवेक में
कोई शान्ति न मिलती। क्योंकि जब मनुष्य अपने आप को परखते हैं, तो उन्हें यह निष्कर्ष निकालना ही पड़ता है कि परमेश्वर न्यायपूर्वक उनका शत्रु है।
और इसके प्रमाण में, हमारे विचारों में, हमारी लालसाओं में, हमारी आत्माओं और हमारे शरीरों में पूर्ण भ्रष्टता के सिवा और क्या है? इसलिए जितनी बार हम सोचते हैं कि हम क्या हैं, उतनी बार हमें काँप उठना चाहिए। परन्तु यहूदियों के पास व्यवस्था की रीतियाँ और छायाएँ थीं, जो उनके लिए परमेश्वर के अनुग्रह की निश्चयता थीं। हाँ, परन्तु यदि वे वहीं ठहर जाते, तो वह कैसी बात होती? क्योंकि पशुओं का लहू उनके दागों को धो नहीं सकता था, न उन्हें परमेश्वर की कृपा में स्थापित कर सकता था। इसलिए उनके लिए यीशु मसीह की शरण लेना अनिवार्य था। और यही कारण है कि पौलुस दिखाता है कि यहूदियों को इतना घमण्ड नहीं करना चाहिए कि अन्यजातियों को द्वार से बाहर कर दें, मानो वे परमेश्वर की कलीसिया में होने के योग्य ही नहीं हैं। क्योंकि यीशु मसीह एक का भी और दूसरे का भी, अपने पिता परमेश्वर के सम्मुख मध्यस्थ है। यहाँ तक कि उसके बिना हम सब उद्धार की आशा से बाहर कर दिए गए हैं। इसलिए इस विषय में किसी को अपने पड़ोसी को तुच्छ नहीं जानना चाहिए, न उसे कंधे के ऊपर से देखना चाहिए, जैसा कि कहावत है। परन्तु हमें विश्वास और प्रेम की सच्ची एकता में एक-दूसरे को अपनाना चाहिए, यह जानते हुए कि हम में से हर एक, बड़े से बड़े से लेकर छोटे से छोटे तक, न्यायपूर्वक परमेश्वर की
कलीसिया से काट दिए जाने के योग्य है, परन्तु वह अपनी ही निरी भलाई से हमें अपने पास इकट्ठा करता है।
इसी रीति से याकूब इस संसार के बड़े लोगों को उपदेश देता है कि वे अपनी छोटाई पर घमण्ड करें, क्योंकि परमेश्वर ने उनकी आँखों की वह पट्टी हटा दी है जो उन्हें अपनी दुर्दशा को जानने से रोकती थी। क्योंकि हम जानते हैं कि मनुष्य जानबूझकर अपनी बड़ाई का दुरुपयोग करते हैं और अपने आप को अद्भुत प्राणी मानते हैं, जब तक कि वे परमेश्वर को नहीं जान लेते। इसलिए इस संसार के बड़े लोगों की आँखों पर पट्टी बँधी है, जो उन्हें धोखा देती है और उन्हें मनमाना करने की छूट लेने देती है। अब याकूब कहता है कि उनके पास अपनी छोटाई पर घमण्ड करने का कारण है, क्योंकि हमारा प्रभु उन्हें दिखाता है कि वे अपने आप में सब आशा से बाहर प्राणी हैं, और फिर भी वह उन्हें अपनी ही दया से अपनी
कृपा में ले लेता है। और वह कहता है कि दीन जन अपने ऊँचे पद पर आनन्द करें, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें ऊँचा उठाया है, यहाँ तक कि जबकि वे केवल अभागे कीड़े थे और उनमें निन्दा के सिवा कुछ न था, परमेश्वर ने उन्हें उठा लिया और नई सृष्टि बना दिया।
तो तुम देखते हो कि जैसा हमें होना चाहिए वैसे हमें एक करने का उपाय यह है कि हम में से हर एक अपनी श्रेणी में अपने आप को दुर्दशा और दयनीय अवस्था में माने, और जब वह सब कुछ परमेश्वर की निरी दया के हवाले कर दे, तो वह मान ले कि वही दया आज सब पर फैली हुई है, और यह हमारा काम नहीं कि उसे सीमित करें या उस पर लगाम लगाएँ, परन्तु जब उसने हमें चुन लिया है, तो हमारा कर्तव्य है कि जिन्हें उसने हमारे ही समान पंक्ति और संगति में
ठहराया है, उन्हें अपनी सहभागिता में ग्रहण करें। यही वह बात है (मैं कहता हूँ) जो पौलुस का लक्ष्य थी, जब उसने कहा कि हमारा प्रभु यीशु मसीह सब मनुष्यों का मेल है, हाँ, उनका भी जो निकट थे और उनका भी जो अब तक दूर थे। परन्तु फिर भी (जैसा मैंने तुम्हें पहले बताया) उसकी दृष्टि यहूदियों के उस मूर्खतापूर्ण अहंकार पर थी, जो अन्यजातियों को परमेश्वर के राज्य से दूर भगा देता। और वह हमें बताता है कि यदि हम चाहते हैं कि यीशु मसीह हमारा मध्यस्थ हो, जो हमें उसके पिता परमेश्वर तक पहुँचाए और वहाँ हमारा मार्गदर्शन करे, और यह सब परमेश्वर की निरी दया पर आधारित हो, तो हम इतने मूर्ख न बनें कि अपने लिए कुछ दावा करें, मानो हम दूसरे मनुष्यों से उत्तम हैं, या उनसे पहले ठहराए जाने के योग्य हैं, परन्तु हम में से हर एक यह माने कि हम सबको परमेश्वर की अपार दया की आवश्यकता थी, क्योंकि हम सब पाप के अधीन बन्द थे, जैसा कि पौलुस दूसरी जगह कहता है।
अब हमें इसे अपने ही लाभ के लिए भली-भाँति लागू करना चाहिए। क्योंकि कुछ लोग सोचते हैं कि मनुष्य इसलिए अधिक ऊँचे उठाए जाते हैं कि उनमें से कुछ संसार के सामने ईमानदार और निर्दोष आचरण के रहे, कुछ प्रतिष्ठित घरानों में जन्मे, और कुछ उत्कृष्ट गुणों से, या किसी कौशल और चतुराई से सम्पन्न हैं। संक्षेप में, हर मनुष्य जहाँ तक सम्भव हो ढूँढ़ता और खोजता है कि कोई ऐसी बात बताए कि परमेश्वर ने उसके पड़ोसियों के बजाय उसे क्यों ग्रहण किया। परन्तु हम यह सीखें कि यद्यपि हम
बाहरी दिखावे में परमेश्वर के निकट थे, तो भी उसकी कृपा में रहने का, उसे पुकारने का, और यह आशा रखने का कि वह अन्त तक हमें अपने पितृ-प्रेम में थामे रखेगा, एकमात्र मार्ग यह है कि यीशु
मसीह हमारा सिर हो। और यह कैसे हो सकता है? यह निश्चित है कि वह खोए हुए को बचाने आया है। और फिर (जैसा कि दूसरी जगह कहा गया है) यह एक पक्का और विश्वासयोग्य वचन है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह उन पापियों को, जो दण्ड के अधीन थे, उद्धार के लिए फिर बुलाने आया।
जब ऐसा है, तो आओ हम पूरी नम्रता के साथ अपने आप को दीन करना सीखें, और केवल अपने सींग समेट लेना ही नहीं, वरन पूरी तरह दीन होकर पैरों तले आ जाना भी सीखें, ताकि परमेश्वर की महिमा वैसी हो जैसी उसके योग्य है, और हम में से कोई दूसरे के ऊपर सिर न उठाए, पर सब मिलकर एक देह बनें, क्योंकि जिस दशा में हम बुलाए गए हैं वह यही है।
इसके अतिरिक्त, पौलुस ने हमारे प्रभु यीशु मसीह को जो उपाधि दी है, अर्थात् कि वह हमारा मेल है, उस पर भली भाँति विचार करना चाहिए। उसके बिना हम सदा व्याकुल रहते, या पत्थर के ठूँठों के समान होते। जिन्हें अपने पापों का कुछ भी बोध है, वे कठिन पीड़ाओं का अनुभव किए बिना चैन नहीं पा सकते, वरन उनकी बेचैनी ऐसी होती है कि उनके लिए भूमि में धँस जाना इससे अच्छा होता कि वे अपने आप को निरन्तर परमेश्वर के न्यायासन के सामने बुलाया जाता और इस प्रकार संकट में पड़ा हुआ देखें।
तब यदि यीशु मसीह हमारा मेल न हो, तो निश्चय ही हमारे विवेक का जाग उठना हमें भयभीत करेगा और हमें मानो यातना-यन्त्र पर कसे रखेगा, क्योंकि वह हमें यह अनुभव कराएगा कि परमेश्वर शत्रु के समान हमारे विरोध में खड़ा है। नहीं तो वह हमें पूरी तरह घबरा देगा और पशुओं के समान बना देगा, ऐसा कि हम न केवल और गहरे गिरेंगे, वरन शैतान के ऐसे वश में हो जाएँगे कि अपने पापों के लिए हमें कोई शोक या पछतावा रहेगा ही नहीं। इसलिए यह शिक्षा, जिसमें कहा गया है कि यीशु मसीह हमारा मेल है, जितनी बार दोहराई जाए कम है। पहले, यह हमें चेतावनी देती है कि हम अपने पापों से गहराई से प्रभावित हों, कि हम उनके लिए खेदित हों, क्योंकि परमेश्वर की भलाई उन्हीं को अपने पास बुलाती है जो थके और बोझ से दबे हैं। फिर, जब हम यह एक बार जान लेते हैं, तब हम सब अविश्वास पर जय पा सकते हैं
और सन्देह पर भी, क्योंकि यद्यपि हमने परमेश्वर के क्रोध को भड़काया है, तथापि वह हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा फिर शान्त हो गया है। यद्यपि हम परमेश्वर से झगड़ते रहे और उसके विरुद्ध लगातार युद्ध करते रहे, तथापि यीशु
मसीह ने हमारे बीच मेल करा दिया है। और यद्यपि परमेश्वर हमारे पापों के कारण और हमारे दुष्ट और हठीले स्वभाव के कारण हम से घृणा करता है, तथापि यीशु मसीह वह सब दूर कर देता है, ताकि परमेश्वर हमें ग्रहण करे, केवल अपनी रचना के रूप में नहीं जो उसके अपने स्वरूप में गढ़ी गई, वरन अपने प्रिय बच्चों के रूप में भी, जिन्हें
उसने अपने राज्य का वारिस होने के लिए गोद लिया है। और इस प्रकार तुम देखते हो कि इस कथन से हमें क्या सीखना है।
यदि यह बात भली भाँति समझ ली जाती, तो संसार इतना डाँवाँडोल न होता, और न इतना अस्थिर जितना वह है। क्योंकि आजकल अधिकांश लोग कभी इधर कभी उधर बहाए जाते हैं, और भटकने के सिवा और कुछ नहीं करते।
पोप के अनुयायियों को एक ओर तो उनका अभिमान सीधे परमेश्वर की ओर बढ़ते रहने से रोके रखता है। वे अपनी स्वतंत्र इच्छा और अपनी योग्यता को जितना हो सके थामे रखेंगे, और यीशु मसीह के अनुग्रह से जितना हो सके दूर रहेंगे। और परमेश्वर इस बीच उन्हें वैसा ही फल देता है जैसे वे योग्य हैं। क्योंकि जो लोग उस शैतानी आत्म-धारणा में इतने जकड़े हुए हैं कि वे अपने जीवन को ऐसे ढाल सकते हैं कि परमेश्वर के पास आ सकें और उसके हाथ से कुछ कमा सकें, और फिर जब वे ऐसा कर चुकें तो उसके साथ हिसाब भी चुका लें, उनका सब कुछ हवा की तरह उड़ जाता है, और वे दूसरे छोर पर जा पहुँचते हैं, यह कहते हुए, "यदि हमारी स्वतंत्र इच्छा न हो तो हमारा उद्धार कैसे होगा?" और इस प्रकार वे पूरी तरह व्याकुल हो जाते हैं।
इस बीच यीशु मसीह की सदा उपेक्षा होती रहती है। वे अपनी पगडण्डियाँ बना लेते हैं और यीशु मसीह के पास नहीं जाते, जो सच्चा मार्ग है।
इसलिए जब वे उस सही मार्ग को छोड़ देते हैं जो उन्हें भटका नहीं सकता, तो उन्हें कभी एक ओर और कभी दूसरी ओर भटकना ही पड़ेगा, और बहुत देर तक अपने आप को थकाने के बाद वे अपने हाथ-पैर तोड़ बैठते हैं, और अन्त में पाते हैं कि वे जितना आगे बढ़ते हैं उतना ही पीछे हटते जाते हैं
परमेश्वर से। इसलिए पौलुस के इन वचनों को तौलना हमारे लिए और भी आवश्यक है, जिनमें हमें यह निश्चय दिलाया गया है कि यदि यीशु मसीह हमारा मेल हो और हम पूरी तरह उसी पर विश्राम करें, तो हमारे परमेश्वर के हाथ से हम प्रेम के साथ ग्रहण किए जाएँगे। और इसी कारण मैं इसके साथ पहले उद्धृत पाठ का वह कथन भी जोड़ता हूँ, अर्थात्, "तुम अपने मन में विश्राम पाओगे।" इससे हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें समझाता है कि वे सब जो अपने आप को उससे अलग करते हैं और उसे अपना मध्यस्थ रखकर सन्तुष्ट नहीं होते, सदा बेचैन रहेंगे।
यद्यपि वे इसके और उसके सहारे अपने आप को ढाढ़स बँधाते और सँभाले रखते हैं, तथापि बाद में वे डर जाते हैं और ऐसा कोई विश्रामस्थान नहीं पाते जहाँ पैर टिका सकें, और न कोई सुरक्षित बन्दरगाह जहाँ आँधी से बच निकलें।
इसलिए यदि हम परमेश्वर को स्वतंत्रता से और बिना किसी सन्देह के पुकारना चाहते हैं, तो हमारा कर्तव्य है कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के पास जाएँ और पूरी तरह निश्चय करें कि वही हमारा मेल है। अन्त में, सब मनुष्यों को, बिना किसी अपवाद के, यहीं आना है, चाहे वे जो परमेश्वर के निकट हैं, चाहे वे जो दूर हैं। यदि कोई यह समझता है कि उसमें कुछ योग्यता या पात्रता है, तो वह निश्चय ही हमारे प्रभु
यीशु मसीह के पास तब तक नहीं आएगा जब तक वह उस कल्पना को पैरों तले न रौंद दे। फिर दूसरी ओर, चाहे बाहरी रूप में हम हज़ार बार आशा से परे हों, तथापि हम अपने आप को निश्चय दिलाएँ कि हमारे प्रभु यीशु
मसीह में हमारे सब अधर्मों की स्मृति मिटा देने की पूरी सामर्थ्य है, ताकि परमेश्वर हमें अपने अनुग्रह में ग्रहण करे। इसी के अनुसार पौलुस
ने यह कहकर कि यीशु मसीह अभागे पापियों को बचाने आया, यह भी जोड़ दिया कि वह स्वयं इसका उदाहरण है: क्योंकि जो कलीसिया का सतानेवाला, सुसमाचार का शत्रु और निर्दोष लहू का बहानेवाला था, वह फिर भी न केवल साधारण पंक्ति में ग्रहण किया गया, वरन प्रेरित के रूप में, कि सारे जगत में उद्धार का सन्देश ले जाए और प्रचार करे, जिससे वह पहले बाहर रखा गया था।
तो जब परमेश्वर ने अपनी भलाई के भण्डार उस पर उँडेल दिए, तब हम भली भाँति अपने आप को निश्चय दिला सकते हैं कि यदि हम अपने प्रभु पर भरोसा रखें
यीशु मसीह के पास आएँ और उसकी मृत्यु और दुःखभोग के द्वारा परमेश्वर अपने पिता से मेल-मिलाप करना चाहें, तो चाहे हम नरक की तलहटी में ही क्यों न हों, वहाँ से भी हमारा उद्धार किया जाएगा, और यीशु मसीह सचमुच दिखा देगा कि उसकी उपाधि उसे कल्पना के बल पर नहीं दी गई थी। इस प्रकार तुम देखते हो कि संत पौलुस के इन शब्दों से हमें आगे क्या सीखना है।
अब वह यह कहता है कि यीशु मसीह ने उस दीवार को गिरा दिया जो उनके बीच थी। वह इस उपमा का प्रयोग यह प्रकट करने के लिए करता है कि रीति-विधियाँ और प्रतीक रद्द हो गए हैं, ताकि अब कोई बात हमें मेल और भाईचारे के प्रेम में एक होने से न रोके। इसके तुरन्त बाद वह व्यवस्था की रीति-विधियों की तुलना बैर से करता है। जैसे अब हमारे पास बपतिस्मा है, जो हमें अन्यजातियों से अलग करता है, वैसे ही जब परमेश्वर ने यहूदियों को चुना,
तब उसने उन्हें खतना दिया। जब हमारा बपतिस्मा होता है, तो हम वह चिह्न धारण करते हैं जिसके द्वारा परमेश्वर चाहता है कि हम उसकी कलीसिया और उसके पुत्र यीशु मसीह की भेड़-बकरियों के झुण्ड के अंग के रूप में पहचाने जाएँ। व्यवस्था के समय में खतने का भी यही अर्थ और यही प्रयोजन था। बलिदान उनके लिए इस बात की गवाही थे कि परमेश्वर उनके पाप क्षमा करता है। चूँकि ऐसा विशेषाधिकार अब्राहम के वंश को छोड़ किसी और को नहीं दिया गया था, इसलिए कहा जाता है कि वह उनके बीच एक दीवार के समान था। वह भेड़ों को भीतर रखने के लिए घेरी हुई भूमि के समान, या पशुओं को भीतर रखने के लिए बाड़े के समान था। उस समय सचमुच ऐसा ही था। क्योंकि परमेश्वर ने, जैसा मूसा के गीत में दिखाया गया है, अब्राहम के वंश को शेष संसार से अलग रखने के लिए अपनी रेखाएँ खींच दी थीं। वहाँ परमेश्वर का मार्ग था, और रीति-विधियाँ उस जाति को परमेश्वर की रखवाली और सुरक्षा में रखने के लिए दीवारों या बाड़ों के समान थीं। और अन्यजातियाँ क्या थीं?
वे संयोग के भरोसे विनाश तक भटकती चली गईं, जैसा कहा गया है कि परमेश्वर ने उन पर यह अनुग्रह नहीं किया था कि अपनी धार्मिकता उन पर प्रकट करे। संत पौलुस भी स्पष्ट रूप से दिखाता है कि परमेश्वर ने उन्हें अपने ही मार्गों पर चलने दिया था और इस विषय में वे अभागे पशुओं के समान रहे थे।
अब हम समझते हैं कि जब संत पौलुस रीति-विधियों के विषय में कहता है, तो उसका क्या आशय है, कि वे किस प्रकार यहूदियों को अन्यजातियों से अलग करनेवाली दीवार के समान थीं। परन्तु अब वे सब गिरा दी गई हैं, क्योंकि यीशु मसीह, जो उनका सत्य और सच्चा सार है, उन सब छायाओं को मिटाने आ गया है।
रीति-सम्बन्धी व्यवस्था इसलिए नहीं दी गई थी कि लोग पूरी तरह उसी पर ध्यान लगाएँ और उसी पर भरोसा रखें, जैसा कपटी लोग करते हैं, जो परमेश्वर के अभिप्राय को बिगाड़ देते हैं। वह यीशु मसीह की अनुपस्थिति की पूर्ति के लिए थी, जैसा संत पौलुस कुलुस्सियों के दूसरे अध्याय में उनके विषय में कहता है। यहूदियों के पास अभी वह प्रतिज्ञा-चिह्न नहीं था जो हमें हमारे प्रभु यीशु
मसीह में दिया गया है, और इसलिए आवश्यक था कि जब तक वह संसार पर प्रकट न हो, तब तक उन्हें अच्छी आशा में थामे रखा जाए। इसलिए उन सब बातों का उसके आने पर गिरा दिया जाना अकारण नहीं था, क्योंकि अब वह हमारे लिए धार्मिकता का दिन-सूर्य है। इसलिए यह उचित नहीं कि हम अब और अँधेरी छायाओं के सहारे चलाए जाएँ। इस प्रकार बैर मिट गया है, क्योंकि अब हम उस वंश से जुड़ गए हैं जिसे परमेश्वर ने अपने लिए ठहराया था, और अब कोई भेद है ही नहीं। चूँकि हम विश्वास के द्वारा अब्राहम की सन्तान बनाए गए हैं, इसलिए हमारे बीच केवल एक ही आत्मिक कुटुम्ब है।
आइए हम ध्यान दें कि बपतिस्मा और प्रभु-भोज, जो मसीह के ठहराए हुए संस्कार हैं, व्यवस्था के प्रतीकों के समान कोई विभाजन नहीं हैं। यद्यपि हम अविश्वासियों से और उन लोगों से अलग हैं जो कभी परमेश्वर की कलीसिया के भीतर नहीं आए, फिर भी संसार में कोई एक निश्चित जाति नहीं है जिसे वह अलग से विशेष रूप से अपनाता हो, बल्कि वह चाहता है कि उसका अनुग्रह सब पर फैले। अब वैसा कोई भेद नहीं रहा जैसा पहले था, जब यह कहा जा सकता था कि हम अब्राहम के वंश से हैं, हम वे हैं जिन्हें परमेश्वर ने गोद लेने के लिए चुना है। अब कोई ऐसा नहीं कह सकता, क्योंकि अब न यहूदी रहा न अन्यजाति, जैसा पवित्रशास्त्र के अनेक स्थानों में कहा गया है। इसलिए जो कोई भी, चाहे किसी भी जाति का हो, शुद्ध रीति से परमेश्वर का नाम पुकारता है, वह उसे भाता है और उसके द्वारा ग्रहण किया जाता है, जैसा संत पतरस प्रेरितों के काम के सोलहवें अध्याय में और अपनी पहली पत्री में भी कहता है। बपतिस्मा और प्रभु-भोज आज
सारे संसार को एक करने का काम करते हैं। चाहे सबसे असभ्य लोग ही क्यों न आएँ, परमेश्वर उन्हें ग्रहण करेगा। उन्हें बपतिस्मा दिया जाएगा, क्योंकि वह उन सबका है जो परमेश्वर के एकलौते पुत्र की देह में एक साथ जोड़े गए हैं।
अब आइए हम इस पाठ को अपनी उन्नति के लिए लागू करें। सबसे पहले हम यह समझ लें कि रीति-विधियों का व्यवहार में रद्द किया जाना ही हमारे लिए स्वर्ग के राज्य को खोलने की कुंजी था। उनकी पूर्णता हमारे प्रभु यीशु मसीह में पूरी तरह प्रकट हुई, ताकि पहले से कहीं अधिक स्पष्ट हो जाए कि वे तुच्छ या निष्फल बातें नहीं थीं। फिर भी, इस सब के बावजूद, उनका प्रयोग करना हमारा काम नहीं, क्योंकि उन सबकी पूरी सिद्धता हमारे पास यीशु मसीह में है। इसी से हम देखते हैं कि परमेश्वर ने उन पर अपनी भलाई कैसे उण्डेली जिन्हें उसने पहले त्याग दिया था। यही वह साधन है जिससे आज हम उसके हैं। इसी कारण सुसमाचार बिना भेदभाव के सारे संसार में प्रचारित किया जाता है, ताकि हमारे पूर्वज, जो अन्यजाति के लोग थे, कलीसिया में ग्रहण किए गए, और हम उनके स्थान पर आ गए हैं। यद्यपि दिखाई देता है कि संसार पूरी तरह उजड़ गया है और उसमें भयानक सुनसानी छा गई है, फिर भी परमेश्वर ने उस बात को पूरा किया है जो उसकी व्यवस्था में कही गई है, अर्थात् वह हज़ार पीढ़ियों तक अपनी दया बनाए रखता है। इस प्रकार तुम देखते हो कि सबसे पहले हमें क्या स्मरण रखना है।
दूसरे, यद्यपि बपतिस्मा किसी एक जाति, नगर या देश के लिए विशेष रूप से नहीं है, फिर भी जब परमेश्वर हमें अपने संस्कारों का उपयोग देता है, ताकि हमें अपने लेपालकपन का निश्चय दिलाए और उस आशा को पोषित करे जो उसने हमें अपने सुसमाचार के द्वारा दी है, तो हम मानो उसके द्वारा चिह्नित कर दिए जाते हैं।
यह सच है कि जो लोग हमारे प्रभु यीशु मसीह से पीछे हट जाते हैं, वे एक अर्थ में अपने बपतिस्मा को व्यर्थ कर देते हैं, परन्तु यह उन्हें बहुत महँगा पड़ेगा, क्योंकि वह प्रतिज्ञा-चिह्न और बयाना जो परमेश्वर हमें यह दिखाने के लिए देता है कि हम हमारे प्रभु यीशु मसीह से जुड़े हैं और उसे पहने हुए हैं (जैसा कुरिन्थियों की पहली पत्री के बारहवें अध्याय में कहा गया है), बहुत
इतनी बहुमूल्य वस्तु का इस प्रकार दुरुपयोग हुआ। इसलिए वे सब जो कलीसिया के नाम से अपने आप को कलंकित करते हैं और फिर भी अनुशासनहीन और भ्रष्ट लोग हैं, किसी दिन जान लेंगे कि अपने बपतिस्मा को, जिसे परमेश्वर ने उनके उद्धार के लिए ठहराया था, इस प्रकार अपवित्र करना कितनी विश्वासघाती दुष्टता है।
परन्तु हम अपनी ओर से चौकस रहें कि संसार की मलिनता से अलग किए हुए लोगों के समान चलें। क्योंकि जैसा पतरस कहता है, हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमें अपने पास इसी कारण इकट्ठा किया है कि हम उसकी महिमा करें, जिसने हमें इस संसार और शैतान के अन्धकार से निकालकर अपनी ज्योति में पहुँचाया। गलातियों की पत्री में हम पहले देख चुके हैं कि यीशु मसीह चाहता है कि उसकी मृत्यु हमें संसार की सारी अशुद्धता और मलिनता से अलग करने के काम आए। इसी प्रकार थिस्सलुनीकियों की पहली पत्री में पौलुस कहता है कि हम अशुद्धता के लिए नहीं बुलाए गए हैं, परन्तु हमें पवित्र होना चाहिए और पवित्रता में अपने परमेश्वर के प्रति समर्पित रहना चाहिए, ताकि हम सचमुच दिखा सकें कि जो कुछ उसने हमें दिया है उस सब से हम उसका आदर करना चाहते हैं। इसलिए पौलुस के इन शब्दों से हमें यह शिक्षा लेनी है कि हम जंगली और पागल पशुओं के समान भटकते न फिरें, और न उसके विरुद्ध लात मारें, परन्तु शान्त मन से अपने परमेश्वर का जूआ उठाएँ और सच्ची आज्ञाकारिता के साथ उसके पास आएँ।
इसके अतिरिक्त हमें अपनी भटकती हुई अभिलाषाओं पर लगाम लगानी चाहिए, ताकि हम पवित्र लोगों के समान, परमेश्वर को समर्पित लोगों के समान, और अन्त में उसकी निज विरासत के समान चलें। देखो, आज हमें इस पाठ पर किस प्रकार चलना है।
अब वह जानबूझकर जोड़ता है कि यीशु मसीह ने यह सब शरीर में किया, अर्थात् हमारे स्वभाव में, ताकि हम निश्चित रहें कि उसके व्यक्तित्व में हम परमेश्वर की सन्तान के रूप में स्वीकार किए गए हैं। क्योंकि जैसे आदम में हम सब नाश हुए, वैसे ही हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा, जो दूसरा आदम है, हम उद्धार की आशा में लौटाए गए हैं। वास्तव में प्रेरित हमें दिखाता है कि हम निडर होकर भरोसा रख सकते हैं कि उसके कारण परमेश्वर सदा हमारा पिता रहेगा।
क्योंकि उसने स्वर्गदूतों का स्वभाव नहीं, परन्तु अब्राहम के वंश का स्वभाव लिया। यद्यपि मत्ती यीशु मसीह की वंशावली में आरम्भ करता है
अब्राहम से, जो स्रोत और जड़ के समान है, तौभी लूका हमें और आगे ले जाता है और बताता है कि यीशु मसीह केवल यहूदियों के लिए प्रकट नहीं हुआ। सचमुच मत्ती यह बहुत उचित कारण से करता है, अर्थात् यह दिखाने के लिए कि यीशु मसीह विशेष रूप से उन प्रतिज्ञाओं को पूरा करने आया जो प्राचीन काल से की गई थीं। परन्तु लूका वही बात दिखाता है जो पौलुस यहाँ बताता है: अर्थात् जब हम अपने आदि पिता आदम तक पहुँच जाएँगे, तब भी पाएँगे कि हमारा प्रभु यीशु मसीह उससे भी पहले था। यह सच है कि वह पवित्र आत्मा की गुप्त और अद्भुत सामर्थ्य से अपनी माता के गर्भ में आया, तौभी वह अब्राहम, दाऊद और आदम का सच्चा वंशज होने से रुका नहीं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि इसी रीति से हम परमेश्वर से जुड़े हैं, क्योंकि वह हमारा सच्चा भाई है। हमें दूर खोजने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि हम उसकी हड्डी की हड्डी और उसके मांस का मांस हैं, जैसा कि हम आगे पाँचवें अध्याय में देखेंगे। इस प्रकार तुम देखते हो कि पौलुस ने यह बात जोड़कर क्या अभिप्राय रखा, कि इन सब बातों की पूर्ति यीशु मसीह के शरीर में हुई। क्योंकि यदि हम यीशु मसीह में उसकी स्वर्गीय महिमा और ईश्वरीय प्रताप के सिवा और कुछ न देखें, तो क्या होगा? हम घबरा जाएँगे और कह सकते हैं कि वह हमसे इतनी दूर है कि हम उसके पास नहीं पहुँच सकते। परन्तु अब, जबकि उसका शरीर वही है जो हमारा है और वह सचमुच मनुष्य बन गया है, पाप को छोड़ सब बातों में हमारे समान, और उसने हमारे दुःख-कष्ट, हमारी घटियाँ और हमारी दुर्दशा अपने ऊपर ले ली, ताकि वह हम पर तरस खाए, जैसा प्रेरित कहता है, तो हम निश्चित हो सकते हैं कि जब हम अपने आप को परमेश्वर के सामने अर्पित करेंगे, तब उसके एकलौते पुत्र के व्यक्तित्व में उससे जुड़ जाएँगे। क्योंकि जैसे वह सच्चा परमेश्वर है, वैसे ही दूसरी ओर वह हमारा सगा भी है, क्योंकि वह यहाँ उतर आया और दासत्व की इस दशा में रहने से पीछे नहीं हटा, ताकि उसके द्वारा हम महिमा पाएँ। क्योंकि जैसे उसने केवल अपने आप को नीचा ही नहीं किया, वरन् अपने आप को पूरी रीति से खाली भी कर दिया,
वैसे ही वह हमें भी अपनी स्वर्गीय महिमा में ऊपर उठाएगा। इसी कारण वह हमारा भाई कहलाता है। जब हम सन्देह और उलझन में हों कि
परमेश्वर हमें ग्रहण करेगा या नहीं, तब यह एक ही बात सारे अविश्वास को तोड़ देनी चाहिए। क्योंकि जब हमारे पास यह साक्षी है कि यीशु
मसीह हमारा भाई है, तो और क्या चाहिए? सो हम भली-भाँति समझ सकते हैं कि परमेश्वर ने हमें कैसी गन्दगी और अशुद्धता से, वरन् कैसी गहरी खाई से निकाला, क्योंकि उसने हमें अपने पितृ-प्रेम का निश्चय दिलाया है, जिस पर हमारा उद्धार आधारित है, और वह भी यीशु मसीह के व्यक्तित्व में।
क्योंकि हम देखते हैं कि अभागे पोप के अनुयायी नहीं जानते कि किस सन्त के आगे मन्नत मानें। अपने आप को हर बहाने से वंचित करने के लिए, ताकि उन्हें दोषी ठहराने के लिए और किसी कार्यवाही की आवश्यकता न रहे, उन्होंने इसे एक आम कहावत बना लिया है।
क्योंकि इसी एक कथन में कि वे नहीं जानते किस सन्त के आगे झुकें, वे अपने आप को विश्वासहीन, अपने ऊपर किसी सलाह और सहारे से रहित, और भटके हुए पशुओं के समान प्रकट करते हैं। क्योंकि उनके पास सन्तों की इतनी भीड़ है कि उन्होंने उनके पूरे झुण्ड बना डाले हैं। यह सच है कि वे सब कुँवारी मरियम को अपनी वकील मानते हैं; वे मीकाएल सन्त, या पतरस सन्त को, या किसी और सन्त को अपना संरक्षक मान लेते हैं, जैसा उनका अन्धविश्वासी मन उन्हें इधर-उधर ले जाता है। तौभी वे जो कुछ करते हैं मन की अशान्ति के साथ करते हैं, और उन्हें कभी चैन नहीं मिलेगा, क्योंकि उनके पास टिकने के लिए परमेश्वर का कोई वचन नहीं है। जब वे अपने आप को किसी उलझन में फँसा पाते हैं, तब वे अभागे, निराश्रित प्राणियों के समान होते हैं जो बिलकुल बेबस हो जाते हैं, क्योंकि वे भली-भाँति देखते हैं कि चाहे कितना ही छटपटाएँ और हाथ-पैर मारें, उन्हें कोई राहत नहीं मिलती। परन्तु अब, जबकि हम उस आशा के विषय में निश्चित हैं जो हमें रखनी चाहिए, क्योंकि हमारा प्रभु यीशु मसीह हमारी शान्ति है और हमें परमेश्वर पिता से मिलाने के लिए दिया गया है, तो हम समझें कि यह अनमोल उपकार है, जिसके लिए यदि आवश्यकता पड़े तो दस लाख मृत्यु सहने से भी हमें नहीं डरना चाहिए।
इसलिए पौलुस कहता है कि व्यवस्था विधियों और आज्ञाओं में समाई हुई थी, ताकि यह दिखाए कि जब परमेश्वर ने अन्यजातियों को उद्धार के लिये बुलाना चाहा, तब उसने भले और पवित्र चालचलन की व्यवस्था को रद्द नहीं किया, वरन् केवल उन रीतियों को मिटा दिया जो विशेष रूप से उसी समय के लिये थीं और जो केवल अब्राहम के वंश को ही दी गई थीं।
उस समय के लिये थीं और जो केवल अब्राहम के वंश को ही दी गई थीं।
तो तुम देखते हो कि क्या मिटाया गया। इसलिए आओ, हम व्यवस्था के प्रतीकों को छोड़ दें, जैसे खतना, बलि चढ़ाना, पर्व के दिन जैसे वे तब मनाए जाते थे, भोजन-वस्तुओं का भेद, दीपक, सुगन्ध-द्रव्य, और वह सब जो मूसा के द्वारा लिखा गया है। क्योंकि ये सब वस्तुएँ मसीह के आने पर लुप्त हो जानी ही थीं। फिर भी इतना होने पर भी आओ, हम उस व्यवस्था को थामे रहें जो परमेश्वर ने हमें दी है, जो अटल है। अर्थात् आओ, हम उसकी आराधना शुद्ध रीति से करें, उसको पुकारें, उस पर भरोसा रखें, उन सब भलाइयों के लिये जो उसने हम पर की हैं उसका आदर करें, और उसके नाम को पवित्र मानें। फिर आओ, हम अपने आप को यह सिखाएँ कि पवित्र जीवन में चलें, और अपने पड़ोसियों के प्रति ऐसे विवेक के साथ रहें कि हम किसी से अन्याय या हानि न करें, और अन्त में आओ, हम अपने आप को संसार की सब अशुद्धियों से अलग कर लें। यहाँ तुम देखते हो कि जो व्यवस्था परमेश्वर ने हमें इसलिये दी कि हम उससे अपने जीवन को चलाएँ, वह अब भी बनी रहनी चाहिए, क्योंकि वह मिटाई नहीं गई, वरन् केवल वही जो रीतियों और प्रतीकों में समाया था, जो थोड़े समय के लिये था और यीशु मसीह के द्वारा समाप्त होने को था। अब जब हमें उन छायाओं को त्याग देना उचित है जो मूसा और भविष्यद्वक्ताओं के समय में प्रचलित थीं और अपनी पूरी सीमा तक पहुँच चुकीं, तो यह और भी अधिक उचित है कि मसीही
कलीसिया पर आज के दिनों में मनुष्यों की गढ़ी हुई बातों का बोझ न डाला जाए।
इसी के अनुसार पौलुस हमें बताता है कि हमें परमेश्वर की व्यवस्था से सन्तुष्ट रहना चाहिए, जो हमें यह दिखाती है कि हम किस प्रकार निर्दोष ठहर सकते हैं। अर्थात् धार्मिकता, न्याय, सच्चाई और दया में चलने से, और विशेष करके परमेश्वर को शुद्ध रीति से और आत्मिक ढंग से पुकारने से। इसे एक बात के रूप में ध्यान में रखो।
फिर वह कहता है कि व्यवस्था की छायाएँ इन दिनों में न केवल अनावश्यक होंगी, वरन् एक परदे के समान भी होंगी जो हमें अन्धकार में ही रखे रहेगा और हमें अपने प्रभु यीशु मसीह को, जैसा कि हमें करना चाहिए, उसके सुसमाचार के दर्पण में देखने से रोकेगा। इसलिए आओ, हम यह निष्कर्ष निकालें कि वह धार्मिकता जो परमेश्वर हमारे हाथों से चाहता है, उससे सर्वथा भिन्न है जिसकी कल्पना पोप के अनुयायियों ने की है। क्योंकि वे सब बातें जो
