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नौवाँ उपदेश: दूसरे अध्याय पर पहला — इफिसियों 2:1-5
यीशु मसीह, जो हमारा सनातन परमेश्वर है, यह मानते हुए कि वही है जिससे सब अच्छी वस्तुएँ आती हैं, और यह भी कि सब धन्यवाद उसी को दिया और चुकाया जाना चाहिए।
इसलिए आओ, हम अपने पापों को मानते हुए अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने दण्डवत् करें, और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उन्हें अधिकाधिक समझने दे, और इससे हमारे मन में अपने प्रति ऐसी अरुचि उत्पन्न हो कि हम सच्चे और हार्दिक मन से अपने आपको पूरी रीति से अपने प्रभु यीशु मसीह को सौंप देना चाहें।
और जब कि उसने हमें अपने सुसमाचार के द्वारा पहले ही अपनी ओर बुला लिया है, तो हम अपने आपको ऐसा ढालें कि सब अन्धविश्वासों को त्याग दें, और अपने मन में दृढ़ निश्चय रखें कि स्वर्ग के राज्य तक पहुँचने के जितने उपाय हम सोच सकते हैं वे सब शैतान के छल ही हैं, और हमारे लिए इतना ही बहुत है कि हम केवल यीशु मसीह की शरण लें।
जैसे पिता की यह इच्छा थी कि उसे ऊँचे पर उठाए, ताकि सब मनुष्य उसी की ओर दृष्टि करें, वैसे ही हमारी आँखें भी उसी पर टिकी रहें और हम अपना पूरा मन ऐसे उसी में लगाएँ कि उसके सिवा हमारे पास न कोई और मार्ग हो, न कोई और तैयारी, और हम न इधर भटकें न उधर। जब हम एक बार सीधे मार्ग पर आ जाएँ, तो अपने लक्ष्य की ओर निरन्तर बढ़ते चलें, जब तक कि वहाँ पूरी रीति से पहुँच न जाएँ।
वह यह अनुग्रह केवल हमें ही नहीं, वरन सब लोगों को भी प्रदान करे। आमीन।
नौवाँ उपदेश,
जो दूसरे अध्याय पर पहला है।
1. और उसने तुम्हें भी जिलाया, जो अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुए थे। 2. जिनमें तुम पहले इस संसार की रीति पर, और आकाश के अधिकार के हाकिम अर्थात् उस आत्मा के अनुसार चलते थे, जो अब भी आज्ञा न माननेवालों में कार्य करती है।
3. इनमें हम भी सब के सब पहले अपने शरीर की लालसाओं में दिन बिताते थे, और शरीर तथा मन की इच्छाओं को पूरा करते थे, और अन्य लोगों के समान स्वभाव ही से क्रोध की सन्तान थे।
4. परन्तु परमेश्वर ने जो दया का धनी है, अपने उस बड़े प्रेम के कारण जिससे उसने हम से प्रेम किया, 5. जब हम अपराधों के कारण मरे हुए थे, तो हमें मसीह के साथ जिलाया; तुम्हारा उद्धार अनुग्रह ही से हुआ है।
हम पहले ही देख चुके हैं कि परमेश्वर की अपार भलाई को भली-भाँति समझने के लिए हमें सदा यह विचार करना चाहिए कि हम स्वयं क्या हैं, और जब तक परमेश्वर ने हम पर तरस खाकर हमारी दुर्दशा में हमारी सहायता नहीं की, तब तक हमारी दशा कैसी थी।
जब तक मनुष्य अपने आपको नहीं जाँचते और यह नहीं समझते कि वे कितने दीन और अभागे हैं, तब तक वे परमेश्वर को उस आदर का सौवाँ भाग भी नहीं देंगे जिसका वह अधिकारी है। इसलिए आओ, हम यह पाठ भली-भाँति स्मरण रखें: परमेश्वर को उसके योग्य स्तुति देने के लिए हम में से हर एक को यह सोचना चाहिए कि यदि परमेश्वर ने हमारी ओर अपना हाथ न बढ़ाया होता तो हम अपने आप में क्या होते। और सच पूछो तो सामान्यतः हमारा स्वभाव क्या है? वह बुराई के सिवा और कुछ नहीं सोचता, और पौलुस यहाँ इसी विषय की चर्चा करता है।
पहले अध्याय में पौलुस जिस विषय को लगातार कहता रहा, वह यह था कि हम अपने परमेश्वर को उतना ऊँचा नहीं उठा सकते जितना उचित है, यदि हम उस दया पर विचार करें जो वह हम पर करता है। अब इसे और भली-भाँति प्रकट करने और हमारे हृदय को और गहराई से छूने के लिए वह हमें मानो एक चित्र या दर्पण में दिखाता है कि जब तक
परमेश्वर ने अपने अनुग्रह से उन्हें आगे बढ़कर नहीं थामा और अपनी ओर नहीं बुलाया, तब तक मनुष्य कैसे हैं। इसलिए वह दिखाता है कि हम ऐसे भयानक अन्धकूप में डूबे हुए थे कि उसका विचार मात्र ही हमें चौंका दे और रोंगटे खड़े कर दे। क्योंकि निश्चय ही हमें इससे प्रेरित और उत्साहित होना चाहिए कि हम परमेश्वर के नाम को धन्य कहें, जिसने नरक की गहराइयों में हमें ढूँढ़ा ताकि हमें स्वर्ग के राज्य तक ऊपर खींच ले।
हमारे प्रभु यीशु मसीह यह दिखाने के लिए कि वह हमें किस दशा में पाता है, कहता है कि वह इसलिए आया है कि मरे हुए उसकी आवाज़ सुनकर जी उठें। तुम देखते हो, तब, कि परमेश्वर का पुत्र जो काम अपने ऊपर लेता है वह यह है कि अपने सुसमाचार के सिद्धान्त के द्वारा हमें मृत्यु से जीवन में ले आए। इसी कारण वह आगे कहता है कि जो उस पर विश्वास करते हैं वे उस मृत्यु से, जिसमें वे दबे पड़े थे, पार होकर स्वर्गीय जीवन में प्रवेश कर चुके हैं।
ऐसा नहीं कि विश्वासी उसका आनन्द यहाँ पहले से ही भोग रहे हैं, परन्तु वे आशा के द्वारा उसे इस प्रकार प्राप्त किए हुए हैं कि उन्हें उसका पूरा निश्चय है।
जब हमारे प्रभु यीशु मसीह कहते हैं कि उसकी आवाज़ में मरे हुओं को जिलाने की सामर्थ्य है, तो वह एक उपमा का प्रयोग करता है। क्योंकि हम अपने आपको जैसा भी जीवित समझें, यदि हम परमेश्वर से अलग हैं तो हम आत्मिक मृत्यु में हैं, चाहे अविश्वासी अपनी बुद्धि और सद्गुण पर इतना फूलकर अपने आपको जीवित से भी बढ़कर मानें। वे अपने आपको कठोर कर लेते हैं और अत्यन्त घमण्ड करते हैं। परन्तु आओ, देखें कि जीवन का सोता कहाँ है। वह परमेश्वर में है, और वे उससे दूर किए हुए हैं।
और यह भी देखें कि मनुष्य का सच्चा जीवन क्या है। वह यह नहीं कि वह चतुर और तीक्ष्ण बुद्धि का हो, अपनी चालाकी और नीति से इस संसार में अपने काम भली-भाँति चला ले, अपने लिए नाम कमा ले, या बुद्धिमान और विवेकी होकर दूसरों को सम्मति दे सके। वह यह भी नहीं कि वह सब मानवीय विद्याओं और कलाओं में निपुण हो या
उदार साहसी पुरुष के रूप में, या मनुष्यों में सराही जानेवाली अन्य खूबियों के स्वामी के रूप में आदर और ख्याति पाए। हमें इससे ऊँची बात से आरम्भ करना चाहिए, अर्थात् यह जानना कि परमेश्वर हमारा पिता है, कि हम उसके वचन की ज्योति से सुरक्षित और बचाए हुए हैं, और विश्वास के द्वारा उद्धार का मार्ग जानने के लिए प्रकाशित किए गए हैं। हमें अपने मन में दृढ़ निश्चय करना चाहिए कि हमारा सम्पूर्ण कल्याण उसी में है, और उसे वहीं पूरी दीनता से ढूँढ़ना चाहिए, और उसे पाने का उपाय भी जानना चाहिए: अर्थात् हमारे प्रभु यीशु मसीह को पाना, जिसमें अनुग्रह की सारी परिपूर्णता हमें दी जाती है।
देखो, तब, मनुष्य का आत्मिक जीवन क्या है और वह कहाँ है: अर्थात् परमेश्वर के वचन की ज्योति में और उसके पवित्र
आत्मा के कार्य में, ताकि हम उस स्वरूप के अनुसार फिर से गढ़े जाएँ जो आदम के पाप से हम में खो गया और बिलकुल बिगड़ गया। क्या यह संसारी लोगों में मिलता है? उनमें भी जो सबसे अधिक आदर पाते हैं? निश्चय ही नहीं।
इसलिए हमारे प्रभु यीशु का यह उपमा देना कारण रहित नहीं है कि हम सुसमाचार के द्वारा मृत्यु से जिलाए जाते हैं। क्योंकि हम चाहे कितने ही फलें-फूलें, मनुष्यों के सामने अच्छी चमक-दमक रखें, और हम में बहुत कुछ ऐसा दिखाई दे जिससे हम आदर पाने योग्य ठहरें, तो भी हम दयनीय लाशें ही हैं। हम में सड़ाहट और गन्दगी के सिवा और कुछ नहीं,
परमेश्वर हमसे घृणा करता है, हम उसके सामने शापित और त्यागे हुए हैं, स्वर्गदूत हमसे घिन करते हैं, सारी सृष्टि हमें कोसती और धिक्कारती है, और सब वस्तुएँ हमसे बदला माँगती हैं क्योंकि हम उन्हें अशुद्ध करते हैं। मनुष्य में ऐसा बिगाड़ है कि जब तक परमेश्वर उन्हें बदल न दे, तब तक स्वर्ग और पृथ्वी को भी उसका संक्रमण लगा रहता है।
हमारे प्रभु यीशु मसीह के कथन का अर्थ यह है कि जब तक हम सुसमाचार के द्वारा, और उससे उत्पन्न होनेवाले विश्वास के द्वारा, नए नहीं बनाए जाते, तब तक हम मरे हुए मनुष्यों के समान हैं। हममें जीवन की एक बूँद भी नहीं जो जीवन कहलाने के योग्य हो। संक्षेप में, हम अपनी कब्रों में गाड़े हुए के समान हैं और हमें उनमें से फिर निकाला जाना अवश्य है; इससे हम समझते हैं कि हम परमेश्वर के राज्य से कटे हुए हैं और हममें गंदगी के सिवा कुछ नहीं है।
तौभी परमेश्वर उनके साथ एक होना स्वीकार करता है जो उस पर और उसकी भलाई पर भरोसा रखते हैं। यही हमारा फिर जी उठना है।
संक्षेप में, हमें सदा यह ध्यान रखना चाहिए कि मनुष्य अपने जन्म ही के साथ मृत्यु को लेकर आता है। केवल इसलिए नहीं कि वह नश्वर है, परन्तु इसलिए भी कि वह परमेश्वर से अलग है। हम नश्वर प्राणी हैं, और यह इस अर्थ में भी सत्य है कि हमें इस संसार से होकर गुज़रना है और जब परमेश्वर चाहे तब यहाँ से विदा होना है। परन्तु हम पहले से ही मरे हुए भी हैं। और वह कैसे? इसलिए कि हमारी आत्माएँ पूरी तरह पापमय हैं। हममें न कोई विचार है, न कोई भाव, जो बुराई की ओर न झुकता हो; सब कुछ परमेश्वर और उसकी धार्मिकता के शासन के विरुद्ध और विद्रोही है। जब हम कुछ भी कल्पना करते हैं, तो अपने मन में पाप और अधर्म के सिवा कुछ गढ़ ही नहीं सकते, जैसा उत्पत्ति में कहा गया है कि परमेश्वर ने देखा कि मनुष्य के मन के विचार और कल्पना में जो कुछ था वह पाप ही था। अब जब ऐसा है, तो समझ लें कि यदि हमें भले और बुरे का ज्ञान होता, और हममें आज से कहीं अधिक कुशलता और विवेक भी होता, तब भी हम इतने बिगड़े हुए हैं कि हमारी सारी अभिलाषाएँ और वासनाएँ परमेश्वर के विरुद्ध ऐसे बलवा करती हैं मानो उससे युद्ध ठान रही हों। जब हम देखते हैं कि हमारी आत्माएँ ऐसी भ्रष्ट हैं और कोई विचार या भाव ऐसा नहीं जो पूरी तरह गलत न हो, तो इसे अचरज की बात न मानें कि परमेश्वर अपने ही मुख से हमें मरा हुआ ठहराता है, चाहे हम अपनी मूर्खतापूर्ण अहंकारी कल्पना में सोचते रहें कि हममें कुछ जीवन है।
यही बात है जो पौलुस अब कह रहा है, कि इफिसियों के लोग पूर्वकथित अनुग्रह के भागी हुए, यद्यपि वे अपने ही अपराधों और अधर्म के कारण मरे हुए थे। मानो वह कहता है,
"इसलिए कि तुम परमेश्वर के अनुग्रह का मूल्य और वह जो कुछ अपने साथ लाता है उसे भली भाँति जान सको, केवल अपनी वर्तमान दशा ही पर मत सोचो, परन्तु यह विचार करो कि यदि परमेश्वर तुम्हें वैसा ही छोड़ देता जैसे तुम अपने आप में थे, और तुम्हारी कुछ भी सहायता न करता, और तुम्हें अपने ही मार्गों पर चलने देता, तो तुम नाश हो गए होते। सोचो कि तुम्हारा स्वभाव क्या है, क्योंकि तुम
मरे हुए थे, और इसकी कोई आशा न थी कि तुम फिर जिलाए जाओगे, क्योंकि जब मनुष्य एक बार मर जाए तो अपनी स्वतंत्र इच्छा के बल से स्वयं को फिर जीवन देना उसके सामर्थ्य में नहीं। इसलिए जान लो कि परमेश्वर ने तुम्हें सब विनाश के अंधकूप में से, वरन् नरक की तह में से निकाल लिया, जब उसने तुम्हें अपनी सन्तान बनाने के लिए लेपालक करना और अपने सुसमाचार के ज्ञान में बुलाना स्वीकार किया।"
हम देखते हैं कि पौलुस का यह कथन हमारे प्रभु यीशु मसीह के सिद्धान्त और गवाही के अनुरूप है।
इसलिए जब कभी हम अपने ही गुणों पर घमण्ड करने और यह कल्पना करने के लिए परखे जाएँ कि हममें कुछ ऐसा है जो आदर के योग्य है, तब हम सदा उस सोते की ओर लौट जाएँ। हम अपनी स्वाभाविक दशा की ओर लौटें और विचार करें कि यदि परमेश्वर अपनी असीम दया से हमें उस उलझन में से न निकालता जिसके जाल में हम फँसे थे, और हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमें छुड़ा न लेता, तो हम नाश हो गए होते, और आज भी वैसे ही होते।
यह बात जान-बूझकर "अपराधों और पापों में" कहकर कही गई है, ताकि सब मनुष्यों के मुँह बन्द हो जाएँ, और कोई अपने आप को सर्व-साधारण की पंक्ति से अलग न कर ले, और यह न सोचे कि हमारे स्वभाव के बिगाड़ से बढ़कर कुछ गम्भीर है, जिसे केवल मृत्यु ही रोक सकती है। यदि पौलुस
इन दोनों शब्दों में से केवल एक ही रखता, या तो "अपराध" या "पाप", तो तुरन्त उत्तर-प्रत्युत्तर होने लगता। कुछ लोग अपने आप को सर्व-साधारण की पंक्ति से बाहर समझ लेते, और दूसरे कहते, "ठीक है, हममें कुछ पाप तो है, हममें कुछ दोष तो है, पर इससे यह नहीं निकलता कि परमेश्वर हमें पूरी तरह दोषी ठहराकर शापित करता है। क्या वह हमारे साथ ऐसी कठोरता और अति करेगा?"
परन्तु पौलुस ने दोनों शब्दों को साथ जोड़ दिया ताकि दिखाए कि हमारे स्वभाव में दुष्टता और पाप के सिवा कुछ नहीं, और संक्षेप में यह कि उसमें जीवन की एक बूँद भी नहीं मिलती। इसलिए मानो वह उस बात को और भारी और घृणित बना रहा है, जिसे
मनुष्य अपनी ओर से हल्का कर देते हैं। क्योंकि यदि हममें थोड़ा-सा भी गुण हो, या उसकी छाया ही हो, तो हम उसे संसार के सब पहाड़ों से ऊँचा उठा देते हैं। परन्तु यदि हममें कोई दोष हों, चाहे वे कितने ही भारी और प्रत्यक्ष क्यों न हों, हम उन्हें बहुत हल्की भूलें ठहरा देते हैं।
इसलिए पौलुस के लिए आवश्यक था कि वह मनुष्यों के इस दुस्साहस को तोड़ दे और उन्हें दिखाए कि वे पूरी तरह पाप में डूबे हुए हैं। यद्यपि वह यहाँ इफिसियों से बोल रहा है, फिर भी वह सब मनुष्यों से सामान्य रूप से बोलता है।
सच तो यह है कि वह यह कहकर इसे और अच्छी तरह प्रकट करता है कि हम संसार की चाल के अनुसार चलते थे। क्योंकि बुराई छिपी रहती है जब तक वह अपने फलों से प्रकट न हो जाए। मनुष्य परमेश्वर के सामने जैसा दीन होना चाहिए वैसा इसीलिए नहीं हो पाते कि वे अपनी चापलूसी करते रहते हैं, जब तक उनका दोष सिद्ध न हो जाए और वे विरोध करते हुए भी झुकने और सिर नीचा करने को विवश न कर दिए जाएँ। हम देखते हैं कि हममें कैसा कपट है, यहाँ तक कि हम अपने आप को समझा लेते हैं कि काला सफ़ेद है और जब तक हमारे कुकर्म हमारे मुँह पर खोलकर रखे न जाएँ, और कोई उन्हें हमारे सिर पर सिद्ध करके हमारा मुँह बन्द न कर दे, तब तक हम कभी अपने आप को दोषी नहीं पाते।
बहुत सी दुष्ट कल्पनाएँ मन में आना, या यह अथवा वह बुराई करने के लिये परीक्षा में पड़ना — इसे हम बिलकुल भी पाप नहीं समझते। संक्षेप में, पौलुस ने ठीक ही कहा कि इफिसियों के लोग अपने पापों में चलते थे, ताकि वह दिखा सके कि वह ऐसी बात नहीं कह रहा जो उनके लिये अज्ञात होनी चाहिये। क्योंकि अपने जीवन को, और जो कुछ वे थे, और जिस मार्ग पर वे चले थे, उसे देखकर उन्हें यह मानने पर विवश होना चाहिये था कि वे परमेश्वर के सामने पूरी रीति से त्यागे हुए और शापित थे। इसलिये जब कभी हमारा कपट हमें परमेश्वर के आगे दीन होने और अपने पापों को मानकर अपने आप को नम्र करने से रोके, तब हम अपने जीवन में झाँकना सीखें। सच है कि चाहे हम अपनी की हुई दस लाख भूलें भी देख लें, तो भी वह उसके आगे कुछ नहीं जो परमेश्वर जानता है। फिर भी, हमें भली भाँति जगाने के लिये, ताकि हम अपनी ही सांत्वना से धोखा न खाएँ, जैसा कि हम करते आए हैं, हम सदा जड़ को उसके फलों से परखें। सो जब हम देखते हैं
कि हम इतने प्रकार से परमेश्वर को अप्रसन्न करने के दोषी हैं, तो हम इस निष्कर्ष पर पहुँचें कि हमारे स्वभाव में हठधर्मिता के सिवाय कुछ नहीं है।
यह दिखाने के लिये और भी अच्छी रीति से कि वह यहाँ किसी एक प्रकार के मनुष्यों की नहीं, वरन् सारी मानवजाति की बात कर रहा है, पौलुस आगे कहता है कि यह संसार की रीति के अनुसार था। यहाँ जिस शब्द का वह प्रयोग करता है उसका अर्थ समय की धारा है। मानो वह कहता है कि जैसे हम प्रतिदिन सूर्य को उगते और अस्त होते देखते हैं, और जैसे हम शीत और ग्रीष्म को एक के पीछे एक आते देखते हैं, वैसे ही मनुष्य का परमेश्वर के विरुद्ध पूरी रीति से हठीला, द्वेषी और विद्रोही होना एक साधारण चलन है, वरन् उसका स्वभाव ही है, और उसमें सब प्रकार की अश्लीलता और भ्रष्टता के सिवाय कुछ नहीं। मनुष्यों को यह कहना शोभा नहीं देता, "चुप रहो, बुरी रीति ने ज़ोर पकड़ लिया है।" और फिर, "यह कुछ लोगों पर लागू होता है, सब पर नहीं। कुछ जातियाँ दूसरों से अधिक पापी हैं, और कुछ मनुष्य दूसरों से अधिक हठीले और दुष्ट हैं, पर फिर भी कुछ अन्य मनुष्यों में सदा कुछ सद्गुण पाया ही जाएगा।" नहीं, पौलुस
कहता है, क्योंकि यह संसार की सामान्य रीति है। मानो वह कहता है, यह (सब मनुष्यों के लिये) इतना स्वाभाविक है कि इस पर विवाद की गुंजाइश नहीं कि एक मनुष्य बुरा है और दूसरा भला। क्योंकि जैसे मछली पानी सोखने के लिये बनी है, वैसे ही हम सब प्रकार के अधर्म और पापों को पीने के लिये, वरन् उनमें मतवाले होने के लिये बने हैं। हम उनसे इतने भरे और ठुँसे हैं कि फट पड़ते हैं।
इस प्रकार तुम देखते हो कि पौलुस का अभिप्राय किसी एक प्रकार के मनुष्यों को डाँटना नहीं था, वरन् बिना किसी अपवाद के सब मनुष्यों को दिखाना था कि जब तक परमेश्वर उसे ठीक न करे, तब तक उनकी दशा क्या है। इसलिये आओ, हम अपनी आँखें खोलें और पौलुस की बात पर ध्यान दें, तो हम पाएँगे कि हमारी सारी योग्यता और कुलीनता का वर्णन यहीं हुआ है। यहाँ हमारा कुल-चिह्न अंकित है: अर्थात् जब तक परमेश्वर अपने केवल अनुग्रह से हमें जिलाता नहीं, तब तक हम मरे हुए लोग ही हैं।
फिर, इसलिये कि हम जानें कि यह मृत्यु हमारे अपने पापों के सिवाय और कहीं से नहीं आती, यह कहा गया है कि हम सब भ्रष्ट हो गए हैं, कि हम में दोषों, पापों और अपराधों के सिवाय कुछ नहीं, और हमारा सारा जीवन इसकी गवाही देता है, क्योंकि फल बताता है कि जड़ क्या है।
और दूसरी ओर, कि हमारा भटक जाना केवल एक बार का नहीं, वरन् हम पूरी रीति से बुराई की ओर झुके हैं। हम उसकी ओर प्रवृत्त हैं, वरन् हम सिर के बल उसमें गिरे जा रहे हैं, और हम ऐसे उन्माद से हाँके जाते हैं कि जब तक वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें अपने वश में न कर ले, तब तक हम परमेश्वर से लड़ना कभी नहीं छोड़ते।
और पौलुस ऐसा कहना ही यथेष्ट नहीं समझता, वरन् ऐसी बातें जोड़ता है जो हमें और भी थरथराने वाली होनी चाहिये, कि यह आकाश के अधिकार के हाकिम के अनुसार है, जैसा कि संसार में उसका सारा अधिकार है, उस आत्मा के अनुसार जो सब अविश्वासियों पर प्रभुता करता है। उसका इस प्रकार बोलना यह दिखाने के लिये है कि जब तक परमेश्वर हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमें जिला न दे और हमें अपने पास इकट्ठा न कर ले, तब तक शैतान का हम पर अधिकार है। देखो, मैं तुमसे विनती करता हूँ, जब तक यीशु मसीह उन्हें छुड़ा न ले, तब तक मनुष्यों की प्रतिष्ठा क्या है। वे एक बार मरकर नहीं रह जाते, वरन् सदा के लिये मरते हैं, और उसे अपने सुसमाचार के द्वारा उन्हें उस उद्धार का भागी बनाना पड़ता है जो उसने उनके लिये मोल लिया है।
तब, जब तक परमेश्वर अपने अनुग्रह से हम में कार्य न करे, तब तक हम किसके हैं? शैतान के: वही हमारा हाकिम है। संक्षेप में, उसका हम पर पूरा अधिकार है और वह हम पर ऐसा अत्याचार से शासन करता है कि हमें बलपूर्वक अपनी ओर खींचने के सिवाय और कुछ नहीं होता।
परन्तु पौलुस "आत्मा" शब्द का प्रयोग जान-बूझकर करता है, यह दिखाने के लिये कि शैतान हमारे सब विचारों, हमारी सब भावनाओं और हमारी सब अभिलाषाओं पर शासन करता है, कि वह हम पर अधिकार रखता है, और हम सब पूरी रीति से उसके बँधुआ दास हैं। एक शब्द में, हम एक उँगली नहीं हिला सकते, हम एक बार भी हिल नहीं सकते, हम एक विचार भी नहीं सोच सकते, परन्तु शैतान हमारी कोहनी पर है और हमें इस रीति से खींचता है कि हम पूरी तरह परमेश्वर के प्राणघातक शत्रु बन जाते हैं। जब हम ये बातें सुनते हैं, तो यह हमारे सो जाने और अपने आप को बहलाने का समय नहीं, और न इतने उद्धत और ढीठ होने का कि हम अब भी परमेश्वर से मुक़दमा लड़ते रहें, मानो हम में कुछ भलाई हो, और वह हमारे गुणों को मानने के लिये बाध्य हो।
क्या वे मनुष्य बुद्धि से बहुत दूर नहीं जो अपने कपट में डटे रहते हैं, और परमेश्वर के सामने अपना पक्ष लेकर खड़े होना और अपने उत्तरों से उसे जीतना चाहते हैं, जब पवित्र आत्मा ने हमारे सिरों पर ऐसा भयानक और डरावना दण्ड गरजकर सुना दिया है? तब, यदि मनुष्य को अपने आप में और अपने स्वभाव में देखा जाए, तो वह क्या कह सकेगा? देखो, वह परमेश्वर का शापित प्राणी है और अन्य सब प्राणियों की गणना से, कीड़ों, मक्खियों, जूँओं और कृमियों तक की गणना से बाहर निकाल फेंके जाने के योग्य है। क्योंकि संसार के किसी भी कृमि का मूल्य मनुष्य से अधिक है। क्योंकि मनुष्य वह प्राणी है जिसमें परमेश्वर का स्वरूप बिगड़ गया है, और जो भलाई उसने उसमें रखी थी वह भ्रष्ट हो गई है। उसमें पाप के सिवाय कुछ नहीं, यहाँ तक कि हम शैतान के अंग हैं, और वह न केवल हम पर शासन करता है, वरन् हम पर अधिकार भी रखता है और हमारा हाकिम है।
क्या हम अपने मन में इस बात का पूरा विश्वास कर चुके हैं? क्या एक ओर हमारे पास यह कारण न होगा कि हम काँपते हुए अपने प्रभु यीशु
मसीह के पास दौड़ें और अपने आप को उसके पंखों की छाया में छिपाए रखें? और दूसरी ओर, यदि हम इतने कृतघ्न हों कि परमेश्वर की भलाई को बड़ा न मानें कि उसने हमें ऐसे कारागार से निकालकर अपने पास खींच लिया, ताकि हमें न केवल स्वर्ग के स्वर्गदूतों का, वरन् हमारे प्रभु का भी संगी और भाई बनाए, तो क्या यह पशुओं जैसी जड़ता न होगी?
यीशु मसीह, जो महिमा का प्रभु है? इसी रीति से वह सब निन्दा को दूर कर देता है, और सब प्राणियों की घृणा का पात्र होने के बदले हमें अपनी छाप धारण कराता है, कि स्वर्गदूत हमें अपने भाई जानकर हमारा आदर और आलिंगन करें, और हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें अपनी देह के अंग स्वीकार करे। सो अब हम पौलुस का अभिप्राय समझ गए।
और आगे, कि सब उत्तर-प्रत्युत्तर थम जाएँ, वह दिखाता है कि शैतान की सामर्थ्य क्या है। क्योंकि वह एक ही शब्द में कह सकता था,
"तुम संसार की रीति पर चले," अर्थात् शैतानी रीति पर। परन्तु एक शब्द में शैतान का नाम लेने के बदले वह पहले कहता है,
"उस हाकिम के अनुसार जो आकाश के अधिकार का अधिकारी है," और "उस आत्मा के अनुसार जो अब भी आज्ञा न माननेवालों में कार्य करता है।" यह कहकर कि "वह
हाकिम जो आकाश के अधिकार का अधिकारी है," वह हमारी सारी आशा तोड़ देता है।
क्योंकि शैतान व्यर्थ ही संसार का हाकिम नहीं कहलाता। फिर भी इसलिए नहीं कि वह सूर्य, चन्द्रमा, तारों, आकाश और पृथ्वी पर राज्य करता है, परन्तु इसलिए कि वह हमें अपने बन्धनों में बन्दी बनाए रखता है, क्योंकि हम परमेश्वर के शासन के योग्य नहीं ठहरे। यदि आदम उस निर्दोष दशा में बना रहता जिसमें परमेश्वर ने उसे रचा था, तो परमेश्वर हमें अपनी सन्तान जानकर रखता। परन्तु हमारे आदि पिता के गिरने के बाद परमेश्वर ने हमें छोड़ दिया, और शैतान ने हम पर अधिकार कर लिया।
यह सच है कि शैतान परमेश्वर की आज्ञा के बिना कुछ भी नहीं कर सकता।
क्योंकि जब उसे संसार का हाकिम कहा जाता है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह परमेश्वर से इस प्रकार लड़ता है कि यह जाना ही न जा सके कि कौन बलवन्त है। यह तो शापित निन्दा होती, जैसी उन विधर्मियों की है जिन्होंने पवित्रशास्त्र में ऐसे वाक्य देखकर यह कल्पना कर ली कि शैतान कभी-कभी परमेश्वर का सामना करता है, और उसमें ऐसा बल और सामर्थ्य है कि परमेश्वर को कभी-कभी उसके लिए स्थान छोड़ना पड़ता है। परन्तु ऐसी बातें निरा पागलपन हैं। तौभी शैतान की यह सर्वसत्ता परमेश्वर का धर्ममय बदला है। जैसा कहा गया है, जब हम यह सह नहीं सकते कि वह हम पर राज्य करे, तब वह हमें हमारे शत्रुओं के हाथ में सौंप देता है। और यह बात हम सब में पूरी और सच्ची ठहरती है। क्योंकि परमेश्वर ने
अपनी छाप हम पर लगाई थी, इसलिए हमें उसकी आत्मा से चलाया जाना चाहिए था। परन्तु हमारा आदि पिता अपने आप को ऊँचा उठाना चाहता था, वह परमेश्वर के विरुद्ध अपने रोएँ खड़े करना चाहता था, और अपनी दशा और सीमा से सन्तुष्ट न रहा। इसलिए जब उसने इस रीति से विद्रोह किया और परमेश्वर के परम प्रभुत्व में रहना उसके मन को न भाया, तो वह शैतान के हाथ सौंप दिया गया और उसके अधीन हो गया। क्योंकि वह यह सह न सका कि परमेश्वर उस पर राज्य करे, इसलिए उसे दूसरा स्वामी चाहिए था, और वह अधीनता सब मनुष्यों पर सामान्य रूप से आ पड़ी।
सो हम ध्यान दें कि शैतान की सर्वसत्ता और अत्याचार मनुष्यों के पाप पर परमेश्वर का धर्ममय बदला है। यह एक
बात हुई। इसलिए हम यह न समझें कि शैतान के गले में लगाम ढीली छोड़ दी गई है, या उसे जो चाहे करने की स्वतंत्रता है, यद्यपि परमेश्वर उसका विरोध करता है। परन्तु यह कि हम उसके हाथ छोड़ दिए गए और सौंप दिए गए हैं। और कि हम इस अधीनता को और भली-भाँति जानें,
पौलुस कहता है कि वह आकाश में है, जैसा वह पत्री के अन्त में फिर विस्तार से कहेगा। वह सीधे यह भी कह सकता था, "उस हाकिम के अनुसार जिसके पास बड़ी सामर्थ्य है," जैसे हमारा प्रभु यीशु कहता है कि वह बलवन्त मनुष्य है जो संसार को शान्ति से अपने अधिकार में रखता है। तो देखो, शैतान हाकिम इसलिए कहलाता है कि उसके पास ऐसी सामर्थ्य है जिसका हम सामना नहीं कर सकते।
और इसके सिवाय पौलुस उसका स्थान आकाश में ठहराता है। इसलिए नहीं कि दुष्ट आत्माएँ किसी निश्चित स्थान में बन्द हैं, क्योंकि हम स्वयं देखते हैं कि वे मनुष्यों की देह में, यहाँ तक कि सूअरों की देह में भी, प्रवेश करती हैं, जब हमारा प्रभु उन्हें आज्ञा और सामर्थ्य देता है। परन्तु वह जान-बूझकर आकाश की बात इसलिए कहता है कि हम समझें कि वे हमारे सिरों के ऊपर हैं। यदि हमारा कोई शत्रु हो, तो हम देखेंगे कि क्या उसे गिरा सकते हैं। परन्तु यदि उसका पाँव पहले ही हमारे गले पर हो, यदि वह हमारे पेट को रौंद रहा हो, यदि वह पहले ही हम पर चढ़ बैठा हो, तो फिर क्या उपाय है? हमारी ओर से कुछ भी नहीं। इसी कारण पौलुस यहाँ आकाश की बात स्पष्ट रूप से कहता है, मानो यह कहना चाहता हो कि मनुष्य चाहे घमण्ड करें और सिर ऊँचा करें, और ढिठाई से अपने को बढ़ाएँ, तौभी शैतान अपनी सारी सामर्थ्य के साथ उनके ऊपर है। संक्षेप में, वह दिखाता है कि हम उस शापित दासत्व के हाथ पूरी तरह सौंपे जा चुके हैं।
बात को और स्पष्ट करने के लिए वह जोड़ता है, "आत्मा के अनुसार।" क्योंकि हम उस दशा को, जिसकी वह बात करता है, क्यों नहीं देख पाते? इसी कारण कि हम शारीरिक हैं। यदि हम पर कोई अत्याचारी राज्य करता, जो आज हम पर एक कर लगाता, कल दूसरा; लोगों के घर लूटता, और अगले दिन किसी-किसी का गला काटता, पत्नियों का अपमान करता, और दूसरे घोर अत्याचार करता, तो हम उसे भली-भाँति समझ लेते। और क्यों? क्योंकि जो बातें हमारे शरीर को
छूती हैं, उन्हें हम तुरन्त अनुभव करते हैं, और हम ऐसे सांसारिक हैं कि जब तक बात इस वर्तमान जीवन से सम्बन्ध न रखे, हम कुछ नहीं समझते। इसी कारण हम अपनी ही दुर्दशा को नहीं देखते, क्योंकि वह अदृश्य है। हम नहीं सोचते कि शैतान ऐसा अत्याचारी है, या जैसा भयानक वह है, क्योंकि हम उसे देखते नहीं।
परन्तु पौलुस हमसे कहता है कि हमें इस संसार से ऊपर देखना चाहिए, और हमारी आँखें उन आँखों से भिन्न होनी चाहिए जो दृश्य वस्तुओं को देखती हैं, और हमारे लिए आवश्यक है कि हम शैतान को देखें, यद्यपि वह आत्मा है। और यद्यपि उसके पास न मारने को हाथ हैं, न चलने को पाँव, न ऐसी और कोई वस्तु, तौभी वह संसार भर में सोचे जा सकनेवाले सब अत्याचारियों में निकृष्टतम है। और क्यों? क्योंकि वह अदृश्य होकर भीतर घुस आता है। यदि कोई मनुष्य ऐसा होता जो तलवार या लाठी के बिना, विष या ज़हर के बिना, धमकी या और किसी बात के बिना, दूसरों के सिरों और हृदयों में, यहाँ तक कि उनके विचारों और भावनाओं में प्रवेश कर सकता, या जिसके हाथ में सौ मौतें होतीं और वह उन्हें इस रीति से भीतर पहुँचा सकता कि किसी को पता भी न चले, तो मैं तुमसे पूछता हूँ, क्या ऐसा शत्रु उन शत्रुओं से कहीं अधिक डरने योग्य न होता जो बड़े बल से सुसज्जित होकर और बड़ा कोलाहल मचाते हुए आते हैं? हाँ, निश्चय ही।
अब पौलुस हमें बताता है कि शैतान ऐसा ही है, क्योंकि वह आत्मा है, वह कहता है। तो फिर, जब उस आत्मिक शत्रु की बात होती है, तब हम वैसे शारीरिक न बनें जैसे हम आदी रहे हैं, और न अपनी ही मोटी और मूर्खतापूर्ण कल्पना के अनुसार न्याय करें। परन्तु हम अपने आप को निश्चय दिलाएँ कि वह हमारी बिना किसी तुलना के कहीं अधिक हानि कर सकता है, इसकी अपेक्षा कि हम देख पाते कि वह हमारी ओर कैसे आया और हमारे भीतर कैसे घुसा। इसलिए, क्योंकि वह आत्मा है, हम उससे और भी अधिक डरें।
इसलिए कि विश्वासी लोग इस पूर्वोक्त बात तक पहुँचने के लिए, अर्थात् अपनी ही दुर्दशा को जानने के लिए, और भी भली रीति से तैयार हों, जब तक
परमेश्वर ने उसका प्रबन्ध न कर दिया हो, पौलुस अपने कथन की एक और पुष्टि जोड़ता है।
जैसे ही हमने विश्वास पाया और परमेश्वर के पवित्र आत्मा से ज्योति पाई, यदि हम में भलाई करने की कोई इच्छा है, तो हम तुरन्त अपने परमेश्वर की सेवा करने का यत्न करेंगे। और ऐसा लगेगा कि यही पर्याप्त है। परन्तु यदि कोई विश्वासी अपने भीतर झाँके, तो उसे अप्रसन्न होने, आहें भरने और कराहने के लिए बहुत कुछ मिलेगा। जैसा मैं पहले तुमसे कह चुका हूँ, स्वयं पौलुस ने भी माना कि वह अभागा रहा है और पुकार उठा, "मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा?" तब विश्वासियों को अपने भीतर परमेश्वर के सामने विलाप करने के लिए सदा बहुत कुछ मिलेगा। फिर भी, क्योंकि परमेश्वर ने हम में कुछ भलाई, कुछ सद्भावना और कुछ भला अभिप्राय रख दिया है, वही हमारे स्वभाव की अधमता को आधा ढाँप देता है, इसलिए हम बहुत समय तक नहीं जानते कि हमारी दशा कितनी दयनीय है, जब तक हम केवल अपने ही विषय में सोचते हैं, अर्थात् अपने विषय में, जैसे हम उसके बाद हैं जब परमेश्वर ने अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें कुछ सुधार दिया है।
इसीलिए पौलुस हमें भेजता है कि हम देखें कि अविश्वासी कैसे हैं। यदि हम संसार को देखें, तो कुछ लोग लोभ में पड़े दिखेंगे, कुछ लूट-खसोट में, और केवल वे छोटे चोर ही नहीं जिन्हें कोड़े लगते और फाँसी होती है, परन्तु वे भी जो घरों में, बाज़ारों में और न्याय के स्थानों में डाकू हैं। हम देखेंगे कि अधिकतर मनुष्यों में न विश्वासयोग्यता है, न निष्ठा, परन्तु सब लोग न्याय या सीधाई का कोई लिहाज़ किए बिना लूट-खसोट में लगे हैं। हम देखेंगे कि कुछ व्यभिचार और निर्लज्जता में बह जाते हैं, कुछ मतवालेपन में, और कुछ अन्य दुष्टता और उच्छृंखल आचरण में। हम देखेंगे कि लोग धड़ल्ले से शपथ खाते हैं, झूठी गवाही देते हैं, और अन्य शापित काम करते हैं।
फिर, हम गुप्त छल-प्रपंच, विष देना, द्वेष, बैर, विश्वासघात और दुष्ट कर्म देखेंगे। संक्षेप में, हम कुछ को इतना शैतानी देखेंगे कि वे ऐसे सिर के बल कूद पड़ते हैं मानो जान-बूझकर परमेश्वर से युद्ध करने पर तुले हों। ये ऐसी बातें हैं जो हमें चकित कर सकती हैं। और यद्यपि हम मंदबुद्धि हैं, तौभी जब हम संसार में बातों को इतना बिगड़ा हुआ देखते हैं, तब हमें कुछ पश्चाताप तो होना चाहिए।
तौभी पौलुस कहता है कि यदि हम विचार करें कि क्या किया जाता है, और कैसे सब कुछ उलट-पुलट हो गया है, और संसार परमेश्वर का विरोध करने में कैसी स्वतंत्रता लेता है, तो हमें चाहिए कि इसे अपने ऊपर लगाएँ और यह निष्कर्ष निकालें: यही मेरे साथ भी हो सकता था, हाँ, उतना ही जितना मैं उन लोगों में देखता हूँ जो सबसे अभागे हैं।
क्योंकि जब हम बाहर फैले रोगों को देखते हैं, कि कुछ लोग नासूरों और अन्य घिनौने रोगों से खाए जा रहे हैं, और कुछ पर जितनी भयंकर बीमारियाँ हो सकती हैं उतनी हैं, तो हमें उन पर मनन करना चाहिए और कहना चाहिए,
"यदि परमेश्वर मुझ पर तरस न खाता, तो ऐसा ही, हाँ इससे भी बुरा, मुझ पर भी आ पड़ता।" क्योंकि हम सब उनका बीज अपने भीतर लिए फिरते हैं, और न केवल अपनी देह में परन्तु अपनी आत्मा में भी। क्योंकि स्वभावों में कुछ भिन्नता हो सकती है, ताकि कुछ लोग दूसरों से अधिक बलवान और हृष्ट-पुष्ट हों, परन्तु मनुष्य की आत्मा पूरी तरह भ्रष्ट और बिगड़ी हुई है। इसलिए जो पाप हम में राज्य करते हैं, वे सब हमारे लिए चेतावनियाँ हैं कि हम अपनी आँखें नीची करें और परमेश्वर और उसके स्वर्गदूतों के सामने लज्जित हों, हाँ, और अपने आप से घृणा करें और पूरी तरह से घिन करें। इस प्रकार तुम देखते हो कि क्यों
पौलुस ने यहाँ यह जोड़ा है कि शैतान अब भी कार्य करता है। वह "अब" शब्द का प्रयोग करता है, मानो कह रहा हो, "मेरे मित्रो, यदि अपनी वर्तमान दशा को देखते हुए तुम्हें कुछ भला दिखाई देता है, और वही तुम्हें पूरी रीति से दीन होने से और यह अनुभव करने से रोकता है कि यदि परमेश्वर ने तुम पर तरस और दया न की होती तो तुम कितने अभागे होते, तो देखो कि तुम्हारे आस-पास क्या किया जाता है, देखो कि अविश्वासी कैसा व्यवहार करते हैं, और तुम उन्हें जंगली पशुओं और अपने ही उद्धार के शत्रुओं के समान पाओगे। तुम उन्हें परमेश्वर के विरुद्ध और सब धर्म-न्याय के विरुद्ध पूरी तरह पागल पाओगे। संक्षेप में, तुम ऐसे बड़े-बड़े अधर्म देखोगे जो मनुष्यों को चकित कर देंगे और उनसे कहलवाएँगे, 'हाय, क्या यह सम्भव है कि ऐसा हो?' और इस प्रकार तुम देखते हो कि तुम क्या हो।"
यह मत कहो, "छि, तू निकम्मे।" तुम ऐसे व्यक्ति में दोष निकाल सकते हो, परन्तु तुम्हें तुरन्त उसे स्वादिष्ट बनाने के लिए यह मसाला मिलाना चाहिए,
"मुझ पर परमेश्वर की दया कितनी बड़ी रही है?" तब हम कभी
उस पाप को, जो हम सब जगह दूसरे मनुष्यों में देखते हैं, दोषी न ठहराएँ, यह विचार किए बिना कि "यदि परमेश्वर ने मुझे लगाम न दी होती, तो मैं भी उतना ही गहरा गिर जाता जितना गहरा मैं दूसरों को गिरा हुआ देखता हूँ।" इसलिए यह हमें तुरन्त प्रार्थना करने को उभारे कि परमेश्वर हमें परीक्षा में न ले जाए। हम परमेश्वर की असीम भलाई को स्वीकार करें कि उसे यह भाया है कि वह हम पर इस रीति से राज्य करे कि हम उन भयानक पतनों में नहीं गिरते जो हम अपने आस-पास देखते हैं। क्योंकि जब हम संसार के सबसे दुष्टों को देखते हैं, हाँ, उन्हें भी जिनसे हमें राक्षसों के समान घृणा करनी पड़ती है, तब हमें (जैसा मैंने पहले कहा) अपने आप से यह निष्कर्ष निकालना चाहिए, "हाय, यदि परमेश्वर इसका उपाय न करता, तो हम पर भी उतना ही बीतता।"
और इस प्रकार तुम देखते हो कि हमें उस शिक्षा को कैसे व्यवहार में लाना चाहिए। पौलुस विशेष रूप से विद्रोही सन्तानों की बात करता है यह दिखाने के लिए कि हम में कोई आज्ञाकारिता नहीं होगी, जब तक कि परमेश्वर उसे हम में न डाले, हमें सुधार न दे, हमारी उस निकम्मेपन को न बदल दे जिसमें हम पहले पड़े थे, और जो भलाई उसने आरम्भ की है उसे बनाए न रखे और बढ़ाए न। नहीं तो शैतान ने हमें इस प्रकार अपने अधिकार में कर लिया है कि वह हमें निश्चय ही पशुओं के समान खींच ले जाएगा।
यह सच है कि पौलुस थोड़ी ही देर बाद यह भी जोड़ता है कि यह बात केवल अन्यजातियों पर ही लागू नहीं होती (यद्यपि उनमें परमेश्वर का अनुग्रह बहुत प्रकट था), वरन् सबसे उत्तम मनुष्य भी इसमें सम्मिलित थे, और (इसके अतिरिक्त) यहूदी भी (जो अपने आप को मनुष्यों के सामान्य श्राप से छूट का विशेष विशेषाधिकार प्राप्त समझते थे) तब तक निराश्रित और दण्ड के भागी थे जब तक कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने उन्हें छुड़ा न लिया।
यहाँ हम उस बात को और भी भली भाँति देखते हैं जिसकी चर्चा हमने कुछ ही देर पहले की थी: अर्थात् किसी एक ही प्रकार के मनुष्यों का उल्लेख नहीं है, परन्तु पवित्र आत्मा सब मनुष्यों पर गरजता है, ताकि हम सब छोटे से लेकर बड़े तक नम्र किए जाएँ। परन्तु इस पर अभी पूरी रीति से विचार नहीं किया जा सकता।
इसलिए निष्कर्ष के रूप में हमें वही ग्रहण करना चाहिए जो पौलुस सिखाता है: अर्थात् परमेश्वर ने हमें जिलाया है। इससे उसका अभिप्राय हमें यह जताना है
कि हम अपनी माताओं के गर्भ से जीवन लेकर नहीं आते, परन्तु पाप के कारण जब हम इस संसार में आते हैं तब मृत्यु में होते हैं, जो न होने से भी बुरा है। इसका खण्डन नहीं हो सकता, क्योंकि हम अपने भीतर भ्रष्टता और दुष्टता के सिवा और कुछ नहीं पाएँगे, और मनुष्य जितना इसे कुरेदता है उतनी ही यह दुर्गन्ध देती है। हमारे भीतर जो सब अधर्म का बड़ा और गहरा तहख़ाना है उसे देखने से हम और भी कतराएँगे।
इसलिए हमारे लिए आवश्यक है कि हम जिलाए जाएँ और हमें जीवन दिया जाए, स्वभाव से नहीं, परन्तु हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह से, क्योंकि हम उसी के द्वारा नये किए गए हैं। हमें जानना चाहिए कि परमेश्वर ने हमें एक दुर्दशा और श्रापित अवस्था से निकाला है, और इस कारण सब व्यर्थ घमण्ड को भूल जाना चाहिए। हम यह न समझें कि जो स्तुति परमेश्वर के योग्य है वह हम कभी उसे देंगे, जब तक कि हम अपनी सारी दुर्दशा से घृणा न करें और यह न जान लें कि शैतान हम पर राज्य करता है जब तक परमेश्वर हमें उसके पंजों से छीन न ले और उसके श्रापित अत्याचार से स्वतन्त्र न कर दे।
क्या इससे बढ़कर कोई बात अरुचिकर हो सकती है कि हम शैतान के अधीन हैं, और वह न केवल हमारी देहों पर, जैसा कोई सांसारिक अत्याचारी करता है, वरन् हमारी आत्माओं और हमारे सब विचारों पर भी राज्य करता है? क्योंकि वह आत्मा है, और हमारे भीतर कुछ भी ऐसा नहीं जो उससे भ्रष्ट और उसके विष से भरा हुआ न हो। यह जानकर हम यह भी विचारें कि परमेश्वर ने हमें उस दशा में पाकर भी हमें तुच्छ न जाना, और न यह बात उसे हमारी सहायता करने से रोक सकी। जैसे पौलुस भी यही तर्क करता है जब वह कहता है कि जब यीशु मसीह ने हमें छुड़ाया तब हम परमेश्वर के घोर शत्रु थे।
अतः हम इस निष्कर्ष पर पहुँचें कि जब परमेश्वर हमें अपने पास बुलाता है तब वह हमारी दुर्दशा के सिवा और किसी बात का विचार नहीं करता। वह यह नहीं देखता कि हम उसे ढूँढ़ते हैं या नहीं, क्योंकि यह कैसे सम्भव होता? हम तो पूरी तरह पीछे हटते हैं। वह यह नहीं देखता कि हम उसकी कुछ सेवा कर सकते हैं या नहीं, क्योंकि हम तो उसके विरुद्ध घोर विद्रोही हैं। वह यह नहीं देखता कि
हमारे भीतर कोई भली प्रवृत्ति है या नहीं, क्योंकि हमारे सब विचार और अभिलाषाएँ उसकी धार्मिकता से लड़नेवाले घोर शत्रु हैं। तो फिर वह किस पर दृष्टि करता है? कौन सी बात उसे हमारी सहायता के लिए प्रेरित करती है? वही असंख्य दुर्दशाएँ जो वह हमारे भीतर पाता है और वह भयानक उलझन जिसमें हम पड़े हैं: ये ही बातें परमेश्वर को हम पर दया दिखाने की ओर झुकाती हैं।
इसलिए सब मुँह बन्द हो जाएँ, और हम इस विषय में कुछ भी प्रस्तुत करने का साहस न करें मानो हमने परमेश्वर को अपने से बाँध लिया हो या उसने हम में कोई ऐसी बात पाई हो जिसके कारण वह हम पर कृपा करे। क्योंकि उसे सब कुछ अपने ही में से लेना होता है, और सब कुछ अपनी ही असीम भलाई से करना होता है, क्योंकि वह हमें दीन, दण्ड के भागी और पूरी तरह निराश्रित देखता है।
यही बात हमें भलाई करने के लिए उभारे, और न केवल हमारे रोगों के लिए वरन् हमारी मृत्यु के लिए भी उपाय करे। क्योंकि यदि हम केवल पाप और दुर्गुण से भ्रष्ट होते, तो रोग पहले ही असाध्य हो चुका होता। परन्तु इसके अतिरिक्त एक मृत्यु है, हाँ, आत्मिक मृत्यु, जो संसार के सब साधनों और उपायों से ठीक नहीं हो सकती। परमेश्वर को अपना
हाथ इस पर रखना पड़ता है, और ऐसे सामर्थ्य से, कि यह जाना जाए कि वह हमें एक आश्चर्यकर्म से बचाता है।
और अब आइए, हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने पापों को मानते हुए दण्डवत् करें, और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उनका ऐसा बोध कराए कि हम उन्हें छोड़ दें और दिन-प्रतिदिन उनसे और अधिक छूटते जाएँ। और इस बीच वह अपनी भलाई से हमें सह ले, और हमसे बहुत कठोर जाँच न करे, वरन् थोड़ा-थोड़ा करके उस दुष्टता को घटाए और सुधारे जो हम में बहुत अधिक राज्य करती है, और हमें शैतान के दास न रहने दे, परन्तु हमारे प्रभु यीशु
मसीह के द्वारा हमें स्वतन्त्र करे, जिससे हमें अपनी सारी आत्मिक स्वतन्त्रता प्राप्त है।
और इसलिए आइए, हम सब कहें: सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता, इत्यादि।
