अध्याय 16 / 16

पन्द्रहवाँ उपदेश, दूसरे अध्याय पर सातवाँ - इफिसियों 2:19-22

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पन्द्रहवाँ उपदेश, दूसरे अध्याय पर सातवाँ - इफिसियों 2:19-22

पन्द्रहवाँ उपदेश, जो दूसरे अध्याय पर सातवाँ है। 19 इसलिये तुम अब परदेशी और बाहरी नहीं रहे, परन्तु पवित्र लोगों के संगी स्वदेशी और परमेश्वर के घराने के हो गए हो।

20 और प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं की नींव पर जिसके कोने का पत्थर स्वयं यीशु मसीह ही है, बनाए गए हो।

21 जिसमें सारी इमारत एक साथ जुड़कर प्रभु में एक पवित्र मन्दिर बनती जाती है।

22 जिसमें तुम भी आत्मा के द्वारा परमेश्वर के निवास स्थान होने के लिये एक साथ बनाए जाते हो।

हम यहाँ पहले ही देख चुके हैं कि पवित्र आत्मा ने संत

पौलुस के मुख से हमारे सामने एक दर्पण रखा है, जिसमें हम अपने परमेश्वर की अनन्त भलाई को देख सकें, कि उसने हमें मृत्यु के अन्धकूपों से खींच निकाला, ताकि हमें अपनी सन्तान और स्वर्गीय जीवन का वारिस बनाए। इसी कारण कहा गया है कि जब हम कलीसिया में ग्रहण किए जाते हैं, तो मानो हम किसी पृथ्वी के नगर के नहीं, वरन् स्वर्ग ही के नागरिक बनाए जाते हैं, कि सब कुलपतियों और परमेश्वर के सब विश्वासयोग्य दासों के, वरन् स्वर्गलोक के सब स्वर्गदूतों के भी संगी हों।

और क्योंकि कलीसिया केवल परमेश्वर का नगर ही नहीं, वरन् उसका घर भी कहलाती है, इसलिये पौलुस आगे कहता है कि हम उसके घराने के हैं, ताकि इस प्रकार वह अनुग्रह और कृपा और बढ़कर दिखे जो परमेश्वर ने हम पर की है। क्योंकि परमेश्वर के घर में इकट्ठा किया जाना, और उसका हमारे निकट होना, और निरन्तर उसके पास निःसंकोच पहुँच पाना, हमारे लिये उससे कहीं बढ़कर है कि हम केवल साधारण रीति से उसके किसी नगर के होते।

तब हम देखते हैं कि क्योंकि मनुष्य उस आत्मिक भलाई को, जो हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा मिलती है, कभी यथेष्ट रीति से नहीं आँकते, इसलिये संत पौलुस यहाँ दिखाना चाहता था कि यह कितना उचित है कि हम उस लेपालकपन को सारे संसार से अधिक मूल्यवान समझें, जिसके द्वारा परमेश्वर ने हमारे प्रभु यीशु मसीह के माध्यम से हमें इस प्रकार इकट्ठा किया है कि अब हम आशा के द्वारा उसके साथ निःसंकोच संगति कर सकते हैं।

और वह एक और उपमा देता है, कि हम परमेश्वर का मन्दिर होने के लिये बनाए जाते हैं। कभी-कभी पवित्रशास्त्र कहता है कि हर एक विश्वासी मनुष्य परमेश्वर का मन्दिर है, क्योंकि वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हम में वास करता है।

परन्तु जब सारी कलीसिया के विषय में सामान्य रीति से कहा जाता है, तब हम जीवित पत्थरों के समान हैं, और इमारत ऐसी जुड़ी और बँधी हुई है कि हम में से हर एक उसे सिद्ध करने में काम आता है। तब एक बात दूसरी के विपरीत नहीं है। क्योंकि हर एक विश्वासी अकेला भी परमेश्वर का मन्दिर है, क्योंकि उसे पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा सारी पवित्रता के लिये समर्पित होना चाहिए, और (जैसा मैंने पहले कहा) परमेश्वर हम में वास करता है। तौभी, क्योंकि हमें एक-दूसरे से अलग नहीं होना चाहिए, वरन् विश्वास के बन्धन से एकता में जुड़े रहना चाहिए, इसलिये यह भी बहुत ठीक बैठता है कि हम पत्थर कहलाएँ। जैसे इमारत बहुत से पत्थरों से बनती है, जिनमें से हर एक का अपना काम है, वैसे ही हमें सुसमाचार पर विश्वास करके अपने आप को अपने प्रभु यीशु मसीह से जुड़ने देना चाहिए, कि परमेश्वर हम में वास करे और वहाँ शुद्ध रीति से उसकी आराधना की जाए। और हमें पूरा निश्चय होना चाहिए कि जब कभी हम उसे पुकारेंगे, तो उसे सदा अपने निकट सुनने को पाएँगे, और जब हम उसके नाम से इकट्ठे होंगे, तो उसे सदैव अपने बीच पाएँगे।

यही वह बात है जिसकी चर्चा संत पौलुस यहाँ करता है, जब वह कहता है कि जो लोग अन्यजाति थे और उद्धार की सारी आशा से कटे हुए थे, वे सुसमाचार के द्वारा परमेश्वर के लिये मन्दिर बनने को खड़े किए गए।

अब हम पहले से अच्छी रीति से देखते हैं कि परमेश्वर हमें अपने घराने का कैसे बनाएगा: अर्थात् यदि हमें सुसमाचार के सिद्धान्त की

शुद्ध शिक्षा मिले, तो परमेश्वर हमें अपने मन्दिर मानता है, वह प्रसन्न है कि हम उसकी आराधना करें, और हमारी सेवा को भली मानकर ग्रहण करता है।

इसलिये जब तक हमारे पास सुसमाचार का सिद्धान्त न हो, जो हमें उस उत्तम और अमूल्य आशीष में प्रवेश दिलाए, तब तक हम न स्वर्ग के नागरिक कहला सकते हैं, न परमेश्वर की सन्तान, न उसके घराने के लोग।

और यह इसलिये भी जोड़ा गया है कि हम समझें कि सुसमाचार कितने आदर के योग्य है, और यह भी दिखाए कि उसे ढूँढ़ने के लिये हमें दूर की यात्राएँ करने की आवश्यकता नहीं। क्योंकि परमेश्वर हमें अपने घर में प्रवेश करने का विशेषाधिकार देता है, हमारे लिये द्वार खुला है, कम से कम तब, जब हम उन प्रतिज्ञाओं को ग्रहण करें जो वह करता है। हमें न स्वर्ग में न पृथ्वी में चक्कर काटने की आवश्यकता है:

परमेश्वर हमें बताता है और निश्चय दिलाता है कि उसने हमें लेपालक लिया है, इस अभिप्राय से कि हम पूरी रीति से उसी पर टेक लगाएँ। और इस प्रकार तुम देखते हो कि हम कैसे उसके साथ निःसंकोच हो सकते हैं, और वह हम से जुड़ा रह सकता है।

परन्तु साथ ही वह यह भी दिखाता है कि हमें उसका वचन कहाँ ढूँढ़ना चाहिए। क्योंकि अविश्वासी लोग ऐसे द्वेषी होते हैं कि वे परमेश्वर से बच निकलने के लिये हर प्रकार की चालें ढूँढ़ते हैं। और निश्चय हम देखते हैं कि बहुत से लोग ऐसा दिखावा करते हैं मानो वे परमेश्वर की सेवा करने को तैयार हों, यदि उन्हें प्रकट हो जाए कि वही बोल रहा है: परन्तु साथ ही वे सन्देह करते हैं कि व्यवस्था उसकी ओर से आई या नहीं, और सुसमाचार उसका सत्य है या नहीं।

देखो, मनुष्य अपनी पूरी शक्ति से परमेश्वर का जूआ उतार फेंकना चाहते हैं, कतराकर निकलने, बहाने खोजने और टालमटोल करने के द्वारा।

वे भरे मुँह से यह दावा करते हैं कि उनका अभिप्राय अपने आप को उसके आगे दीन करना है, फिर भी वे नहीं जानते, और न पहचान सकते हैं, कि उसका वचन कौन सा है। और ऐसा क्यों है? केवल उनकी बुराई और कृतघ्नता के कारण।

इसलिये संत पौलुस, ऐसे सब निकम्मे बहानों को रोकने के लिये, हमें बताता है कि क्योंकि परमेश्वर ने मूसा और अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा, और अन्त में अपने प्रेरितों के द्वारा बातें कही हैं, इसलिये हमें निश्चय रखना चाहिए कि जो कुछ

व्यवस्था और सुसमाचार में लिखा है वह स्वयं सत्य है, और हमें इस बात से नहीं डरना चाहिए कि हम भरमाए या धोखा खाए जाएँगे। हम बहुत से उत्तर सुनेंगे, क्योंकि हर मनुष्य जो कुछ उसकी कल्पना में आता है वही गढ़ लेता है। परन्तु परमेश्वर ने जब अपनी व्यवस्था प्रकाशित की, तब अपने वचन को यथेष्ट रीति से प्रमाणित किया। फिर उसने अपने भविष्यद्वक्ताओं को भी यथेष्ट अधिकार दिया, और अन्त में उसके सुसमाचार पर पर्याप्त आश्चर्यकर्मों की मुहर लगाकर उसे स्थिर किया गया।

इसलिये हमारे लिये यह कहना उचित नहीं कि हम नहीं जानते कि यह परमेश्वर का वचन है या नहीं: क्योंकि वह हमारे मुँह में है, वह हमारे निकट है, यहाँ तक कि परमेश्वर ने कृपा करके हमें छोटे बच्चों के समान उससे पोसा है, और नश्वर मनुष्यों को हमारे पास भेजा है कि वे आमने-सामने हम से उसे कहें।

इसलिए सबसे पहले हम यह सीखें कि जब परमेश्वर का वचन ग्रहण करने की बात उठे तब हवा में न उड़ें। हम इसी से सन्तुष्ट रहें कि उसने अपने भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों के द्वारा अपनी इच्छा का पर्याप्त अभिलेख हमें दे दिया है; और इस प्रकार हम उसकी आज्ञाकारिता करेंगे, चाहे उसने अपने पवित्र आत्मा के ऐसे साधनों को काम में लाना ही क्यों न भाया हो; क्योंकि हमारा विश्वास दीनता के बिना हो ही नहीं सकता, और परमेश्वर नश्वर मनुष्यों को वह माध्यम ठहराकर जिनके द्वारा वह हम पर अपने आपको प्रकट करता है, उस दीनता की परीक्षा लेता है।

इसलिए इसे एक सिद्धान्त के रूप में मान लो कि यदि परमेश्वर दृश्य रूप में प्रकट न हो, या स्वर्ग से अपने स्वर्गदूतों को न भेजे, तो इससे हमें खेद नहीं होना चाहिए। क्योंकि हमारे लिए इतना जान लेना ही बहुत है कि भविष्यद्वक्ता और प्रेरित पर्याप्त गवाह हैं, जो उद्धार का सन्देश हमारे पास लाने के लिए चुने और ठहराए गए हैं। साथ ही, सन्त पौलुस दिखाता है कि व्यवस्था, भविष्यद्वक्ताओं और सुसमाचार में बहुत उत्तम सामंजस्य है। सच है कि हम पहले देख चुके हैं कि रीति-विधियों का प्रयोग समाप्त हो चुका है; फिर भी उनका सार अब भी बना हुआ है।

जब परमेश्वर ने सुसमाचार का खुले रूप से संसार में प्रचार करवाया, तो इसलिए नहीं कि वह अस्थिर है, और न इसलिए कि वह मनुष्यों को किसी नई और अनोखी रीति से सिखाना चाहता था, जिससे व्यवस्था का कोई

परिचय न था; क्योंकि व्यवस्था और भविष्यद्वक्ता निरन्तर हमारे प्रभु यीशु मसीह की गवाही देते रहे। और इसी से हमें यह भी स्मरण कराया जाता है कि जो कुछ मूसा और अन्य भविष्यद्वक्ताओं में लिखा है, उस सब से हम अपनी उन्नति करें। क्योंकि आजकल कुछ कल्पनाशील लोग हैं, जो सोचते हैं कि सिद्धान्त के लिए हमें केवल नया

नियम चाहिए, और शेष सब अनावश्यक है। यह सच है कि बुद्धि की सारी पूर्णता सुसमाचार में पूरी रीति से समाई हुई है; पर इससे यह नहीं निकलता कि हमें व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं से उन्नति नहीं पानी चाहिए; क्योंकि हम देखते हैं कि स्वयं प्रेरितों ने अपने सिद्धान्त को उन्हीं की गवाहियों से पक्का किया।

और यहाँ जब सन्त पौलुस कहता है कि हमें उनकी नींव पर बनाया जाना है, तो वह यथेष्ट रूप से दिखाता है कि जो कुछ हमारे प्रभु ने प्राचीन काल में उन्हें दिया, वह आज भी हमारे लिए लाभदायक है, और हमें उसका अभ्यास करना और उसे काम में लाना चाहिए। इसी प्रकार सन्त पतरस कहता है कि वे केवल अपने ही समय के लिए नहीं, वरन् हमारे समय के लिए भी सेवा करते थे। यह सच है कि उन्होंने हमारे प्रभु यीशु मसीह का, और उसके द्वारा हमें मिलनेवाली भली वस्तुओं का कुछ स्वाद चखाया; पर हम वे हैं जो समय की पूर्णता में आ पहुँचे हैं, जैसा सन्त पौलुस दूसरे स्थान पर कहता है। और यही सन्त पतरस के कथन की भी पुष्टि है, अर्थात् यह कि भविष्यद्वक्ताओं का सिद्धान्त हमारी ओर संकेत करता है, और हम उसका सुननेवालों से अधिक पूर्ण आनन्द और बड़ा फल पाते हैं। क्योंकि यीशु मसीह में हमें इतनी बड़ी ज्योति मिली है कि जो बातें तब अन्धकारमय थीं, वे अब हम पर स्पष्ट रीति से खुली और प्रकट हो गई हैं।

इसलिए आओ, हम व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं का अध्ययन करें, यह भली-भाँति जानते हुए कि वे हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह तक ले जाते हैं। क्योंकि वही वह लक्ष्य है जो हमारे सामने रखा गया है, और जिस पर आज हम निशाना बाँधते हैं, जैसा कहा गया है कि यीशु मसीह व्यवस्था का अन्त है, और वही वह नमूना भी है जो मूसा ने पहाड़ पर देखा। कहा गया है कि व्यवस्था और भविष्यद्वक्ता उसकी गवाही देते हैं, और स्वयं हमारा प्रभु यीशु मसीह भी यहूदियों को डाँटता है, और उनसे कहता है कि क्योंकि वे व्यवस्था पर घमण्ड करते थे,

इसलिए वे परमेश्वर के सामने और भी अधिक दोषी और क्षमा के अयोग्य थे, और उनका अपराध और भी अधिक घोर और अनुचित था, क्योंकि उन्होंने उसे ठुकरा दिया जिसकी ओर व्यवस्था हमें भेजती है, और जिसके पास व्यवस्था हमें रोके रखना चाहती है।

इसलिए इससे हमें यह निष्कर्ष निकालना है कि पवित्रशास्त्र में भली-भाँति लाभ उठाने के लिए हमें सदैव अपने प्रभु यीशु मसीह की ओर लौटना चाहिए, और बिना कभी मुड़े उसी पर अपनी आँखें टिकाए रखनी चाहिए। तुम बहुत से ऐसे लोग देखोगे जो पवित्रशास्त्र पढ़ने में अपने आपको बहुत सताते हैं, वे और कुछ नहीं करते, केवल उसके पन्ने पलटते रहते हैं; और फिर भी दस वर्ष के अन्त में वे उसमें उतने ही जानकार होते हैं मानो उन्होंने उसकी एक पंक्ति भी न पढ़ी हो। और क्यों? इसलिए कि वे केवल इधर-उधर भटकते हैं, और किसी निश्चित लक्ष्य पर निशाना नहीं बाँधते; और सांसारिक विद्या में भी तुम बहुतेरे ऐसे लोग देखोगे जो परिश्रम तो बहुत करते हैं, पर सब व्यर्थ होता है, क्योंकि वे न क्रम रखते हैं, न माप, और चारों ओर से बटोरने के सिवा कुछ नहीं करते। इसका परिणाम यह होता है कि वे सदा नए सिरे से खोजते रहते हैं, और कभी किसी बात को पूर्णता तक नहीं पहुँचा पाते; और यद्यपि उन्होंने हर प्रकार के बहुत से वाक्य इकट्ठे कर लिए हों, तौभी उनमें कोई पकड़ नहीं होती।

ठीक ऐसा ही उनके साथ भी होता है जो पवित्रशास्त्र के पढ़ने में परिश्रम तो करते हैं, पर नहीं जानते कि वह कौन-सा बिन्दु है जिस पर उन्हें ठहरना चाहिए: अर्थात् हमारा प्रभु यीशु मसीह। क्योंकि जैसे कहा गया है कि हमारी सारी पूर्णता सुसमाचार में है, वैसे ही दूसरी ओर यह भी कहा गया है कि हमारा

प्रभु यीशु मसीह हमें परमेश्वर अपने पिता की बुद्धि होने के लिए दिया गया है, जैसा सन्त पौलुस कुरिन्थियों की पहली पत्री में कहता है। और जैसे व्यवस्था के विषय में कहा गया है, "मार्ग यही है, इसी पर चलो"; वैसे ही हमारे प्रभु

यीशु मसीह के विषय में भी कहा गया है कि वही सच्चा मार्ग है। फिर, जैसा कहा गया है, "हे यहोवा, तेरा वचन मेरे पाँव के लिए दीपक है"; वैसे ही हमारा प्रभु यीशु मसीह कहता है, "जगत की ज्योति मैं हूँ; जो मेरे पीछे चलता है, वह भटक नहीं सकता।"

इसलिए हम देखते हैं कि पवित्रशास्त्र में जो कुछ भी कहा गया है, वह अब हमारे प्रभु यीशु मसीह में पूरा हुआ है, ताकि हमें दिखाया जाए कि वही एकमात्र है जिसे हमें थामना है। और सचमुच, यह व्यर्थ नहीं कि वह परमेश्वर अपने पिता का जीवित स्वरूप कहलाता है। क्योंकि यद्यपि परमेश्वर में ज्योति के सिवा कुछ नहीं है, तौभी हम उस ज्योति तक कभी नहीं पहुँच सकेंगे, जब तक हमारा प्रभु यीशु मसीह नीचे आकर हमें वहाँ तक उठा न ले, और हमें उस स्थान में प्रवेश न दे जो पहले हमारे लिए बन्द था।

इसलिए तुम देखते हो कि सन्त पौलुस के इन वचनों पर से हमें यह निष्कर्ष निकालना है कि भविष्यद्वक्ता और प्रेरित इसलिए चुने और ठहराए गए कि हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर तक पहुँचाएँ; जो उसका सच्चा स्वरूप है; और इसलिए पवित्रशास्त्र में उन्नति पाने के लिए हमें अपनी सारी इन्द्रियाँ और मन केवल उसी पर स्थिर करने चाहिए।

और इसके विपरीत, हम यह भी निष्कर्ष निकालें कि जो लोग अपने आप को व्यर्थ कुतूहलों में लगाते हैं, और परमेश्वर की दी हुई सीमा से अधिक बुद्धिमान बनना चाहते हैं, वे सदा उलझन में ही पड़े रहेंगे। वे आगे बढ़ने के बदले और अधिक पीछे हटते जाते हैं; इसके अनेक उदाहरण हम देखते हैं, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, और हमारे लिए उचित है कि उनसे शिक्षा लें। क्योंकि संसार के सब भ्रष्टाचार का कारण क्या है? इतनी बड़ी संख्या में त्रुटियों का, अधर्म की इतनी बहुतायत का, और सब ओर राज्य करनेवाले अन्धविश्वासों के इतने बड़े भण्डार का कारण क्या है, सिवाय इसके कि मनुष्य अपनी मूर्खतापूर्ण अभिलाषाओं और शारीरिक रुचियों में ही मचलते रहते हैं, और यीशु मसीह की उस सादगी से, जैसी वह सुसमाचार में बताई गई है, कभी सन्तुष्ट नहीं होते?

इसलिए जो बात यहाँ हमें बताई गई है, उसे हमें और भी भली भाँति मन में रखना चाहिए: अर्थात् यह कि हम अपने प्रभु यीशु को सदा अपनी आँखों के सामने और अपनी दृष्टि में रखें,

मसीह को, यदि हम पवित्रशास्त्र में एक अचूक विश्राम-स्थान पाना और उसमें उन्नति करना चाहते हैं। और इसी से हम यह भी देखते हैं कि हमें परमेश्वर के वचन को यहाँ-

वहाँ ढूँढ़ने की आवश्यकता नहीं: क्योंकि हमें भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों के पास भेजा गया है, मानो हमसे कहा गया हो कि वे ही हमारा नियम हैं जिसके भीतर हमें रहना है, और हमारे विश्वास को इधर-उधर भटकने की अनुमति नहीं, परन्तु उसे परमेश्वर के वचन की आज्ञाकारिता में, जैसा वह पवित्रशास्त्र में निहित है, लगाम से बँधा रहना चाहिए।

अब यदि इस पद को भली भाँति समझा गया होता, तो निश्चय ही बेचारा संसार ऐसी अव्यवस्था में न होता जैसी हम उसमें देखते हैं। क्योंकि मनुष्यों ने उद्धार के इतने मार्ग क्यों गढ़ लिए हैं, सिवाय इसके कि उन्होंने हमारे प्रभु यीशु मसीह की सामर्थ्य को नहीं जाना, जैसी वह यहाँ हमें दिखाई गई है? और सचमुच, कोई पोप के अनुयायियों की सब कल्पनाओं को देखे, तो पाएगा कि उनके अन्धविश्वास का कोई अन्त नहीं: और इस बीच उन्होंने यीशु मसीह को लगभग भुला ही दिया है, या यों कहें कि उसे इस प्रकार गाड़ दिया है कि उसकी कुछ भी चिन्ता नहीं की। और क्या यह परमेश्वर के सत्य को बिगाड़ना और झूठा ठहराना नहीं था, जब मनुष्य यह नहीं जानते थे कि वह किस ओर ले जाता है, और किस उद्देश्य से दिया गया है, अर्थात् कैसे वह इसलिए दिया गया कि हमें पूरी रीति से अपने

प्रभु यीशु मसीह में बनाए रखे, कि हम उससे लिपटे रहें, और अपनी आत्माओं के लिए विश्राम पाएँ, जैसा वह स्वयं कहता है?

फिर, दूसरी ओर, आज के दिन पोप के अनुयायी किस आधार पर टिके हैं? अपनी महासभाओं पर, अपनी आज्ञप्तियों पर, उन बातों पर जो मनुष्यों ने अपनी ही बुद्धि से गढ़ी हैं: और फिर भी वे हमें यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि सारी सिद्धता वहीं मिलती है। क्योंकि जो बातें यीशु मसीह और उसके प्रेरितों ने सिखाई हैं, वे तो, वे कहते हैं, केवल आरम्भिक प्रवेश-द्वार हैं: हाँ, और उन्हें यह कहने में लाज भी नहीं आती कि वे बातें केवल वर्णमाला के समान हैं, और यीशु

मसीह ने अधिक ऊँची और उत्कृष्ट बातों को कहने से अपने को रोके रखा, इसलिए पवित्रशास्त्र तो छोटे बच्चों की प्रश्नोत्तरी मात्र है, और सिद्धता की अवस्था तक पहुँचने के लिए हमें पवित्र महासभाएँ चाहिए, जिनमें परमेश्वर उन भेदों को प्रकट करता है जो पहले अज्ञात थे।

अब जब शैतान ने उन्हें ऐसा पूरी तरह मोह लिया और अन्धा कर दिया है कि उन्होंने परमेश्वर के वचन को पैरों तले रौंदने का यत्न किया है, ताकि हम बिना किसी अच्छे मार्गदर्शन के इधर-उधर भटकते फिरें, तो हमारे पास और भी अधिक कारण है कि जो बात पौलुस हमें यहाँ बताता है उसे मन में रखें, अर्थात् यह कि जो कुछ पवित्रशास्त्र में जोड़ा जाए उसे हम अस्वीकार करें, और निश्चय जानें कि परमेश्वर ने अपने भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों को ऐसा आदेश दिया है कि उन्होंने हमारे उद्धार के लिए लाभदायक या आवश्यक कोई भी बात नहीं छोड़ी। यदि हम उसकी पाठशाला में उन्नति करना चाहते हैं, तो हमें अपनी ओर से कोई टुकड़े या अंश नहीं मिलाने चाहिए, और न यहाँ-वहाँ से ऐसी बातें उधार लेने लगना चाहिए जो उस शुद्ध सिद्धान्त के विपरीत हैं, परन्तु ऐसे सब व्यवहार से घृणा करनी चाहिए, हाँ, सब प्रकार की जोड़-तोड़ से घृणा करनी चाहिए, जैसे उस खमीर से जो पूरे गूँधे हुए आटे को खट्टा करके बिगाड़ देता है, क्योंकि परमेश्वर उस सब को दोषी ठहराता है जो मनुष्य व्यवस्था और सुसमाचार में जोड़ने का साहस करते हैं, जिनसे हमें किसी रीति से भी फिरना नहीं है। क्योंकि यह व्यर्थ नहीं कहा गया है: "मार्ग यही है, इसी पर चलो।" और जब यीशु मसीह कहता है कि वह मार्ग और जगत की ज्योति है: तो वह इसलिए कि हम उसी में बने रहें, किसी रीति से दाहिने या बाएँ मुड़े बिना।

इस पद पर, जहाँ परमेश्वर के सिद्धान्त की बात है, और भविष्यद्वक्ताओं तथा प्रेरितों को उसके सन्देशवाहक कहा गया है, एक और बात हमें विचारनी है: यह कि हम, उनका कार्य जानकर, ऐसे लोगों से शिक्षा पाना स्वीकार न करें जिन्हें परमेश्वर ने अपनी इच्छा का कभी भेदी नहीं बनाया, और जिन्हें वह अस्वीकार करता है जब वे उन बातों में एक शब्द भी जोड़ने का यत्न करते हैं जिन्हें वह निर्विवाद रूप से माना और थामा जाना चाहता है। यह सच है कि कलीसिया भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों के सिद्धान्त के दैनिक प्रचार के बिना टिक नहीं सकती: और जो भी सिखाने के लिए ठहराए गए हैं, वे परमेश्वर के घर के राजमिस्त्री, बढ़ई और निर्माता कहलाते हैं। इसलिए, जहाँ तक वे कलीसिया के निर्माता हैं, वे भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों के साथ एक ही हैं। फिर भी इससे यह नहीं निकलता कि वे व्यवस्था में से जो चाहें

ले लें, या अपनी ही कल्पनाओं का प्रचार करने की छूट ले लें: परन्तु उन्हें अपनी सामग्री उस शुद्ध सोते से निकालनी चाहिए जो पवित्रशास्त्र में हमारे सामने रखा गया है, ताकि हम निरन्तर व्यवस्था और सुसमाचार की सादगी में बने रहें, और विश्वास की आज्ञाकारिता के स्थान पर किसी भटकानेवाले मत से दूषित न हों, वह विश्वास जो उसी साधन से सन्तुष्ट रहता है जो परमेश्वर ने ठहराया है।

फिर, जब पौलुस कहता है कि यीशु मसीह नींव और कोने का सिरा-पत्थर है: तो इसका अर्थ यह नहीं कि यीशु मसीह के साथ कुछ भी मिलाना उचित है, मानो वह इमारत का केवल एक अंश बनाए और शेष औरों से पूरा किया जाए: परन्तु इससे यह दिखाया जाता है कि हमें उसी पर बनाया जाना है, जैसा पौलुस कुरिन्थियों की पहली पत्री के तीसरे अध्याय में हमें समझाता है, जहाँ वह कहता है कि कोई मनुष्य उस नींव को छोड़ जो पड़ चुकी है, अर्थात् यीशु मसीह को, कोई दूसरी नींव नहीं डाल सकता। इससे पौलुस

पौलुस हमें समझाता है कि मनुष्य कोई ऐसी वस्तु प्रस्तुत नहीं कर सकते जिस पर वे अपने उद्धार की नींव रखें और उसे स्थिर करें: वह कहता है, यीशु मसीह को छोड़ कोई और नींव है ही नहीं।

फिर, हम जानते हैं कि उसका प्रभुत्व सब जगह फैला हुआ है: इसलिए हम सब, बड़े से लेकर छोटे तक, उसके आगे झुकें, और उन अनेक लाभों को न छोड़ें जो वह हमें देता है और जो हम उसी के द्वारा पाते हैं।

परन्तु हम कभी न समझ पाएँगे कि यीशु मसीह ही हमारी एकमात्र नींव कैसे है, जब तक हम यह न जानें कि वह किस उद्देश्य से भेजा गया, जैसा पहले उल्लेख किए गए पाठ के अनुसार है, जहाँ पौलुस कहता है कि वह हमारे लिये हमारी बुद्धि होने को दिया गया। और केवल यही नहीं, वह आगे यह भी कहता है कि वह हमारे लिये हमारी धार्मिकता, छुटकारा और पवित्रता होने को दिया गया।

मानो वह कह रहा हो कि यीशु मसीह हमारी बुद्धि है, जिससे हमें पूरी रीति से लगे रहना चाहिए, क्योंकि हम वहाँ देख सकते हैं कि वही

सब कल्याण का सोता है, और हमारे उद्धार के लिये जो कुछ आवश्यक है वह सब उसी में है।

तब यदि हम एक बार जान लें कि यीशु मसीह किस उद्देश्य से दिया गया, और उन अनन्त लाभों को जान लें जिनका वह हमें भागी बनाएगा, तो हम और सब भोजन छोड़ देंगे: अर्थात् जो कुछ मनुष्य हमारे सामने रखे वह सब हमारे लिये केवल व्यर्थ ठहरेगा, वरन् गोबर और मैल के समान, क्योंकि हम अपने प्रभु यीशु मसीह से पूरी रीति से तृप्त हो जाएँगे। अब, इसलिए, कि हम समझ सकें कि वह कलीसिया की नींव कैसे है, और हमें उसी पर स्थिर होना चाहिए, आइए हम ध्यान दें कि ऐसा इसलिए है कि परमेश्वर ने अपने एकलौते पुत्र के द्वारा अपने आप को हम पर पूरी रीति से प्रकट किया है, और हमारे उद्धार के लिये जो कुछ आवश्यक या चाहने योग्य है वह सब उसके हाथ में रख दिया है, ताकि हम उसकी परिपूर्णता में से ले सकें, जैसा यूहन्ना के पहले अध्याय में उसके विषय में कहा गया है।

और वास्तव में, यही वह रीति है जिससे हमें इस पाठ का उपयोग करना चाहिए, जहाँ कहा गया है कि हमारा प्रभु यीशु मसीह इस प्रकार प्रधान कोने का पत्थर है कि वह कोने में सारे भवन को सँभाले रखता है: और हम जानते हैं कि भवन का सबसे अधिक भार कोने पर ही होता है।

परन्तु साथ ही यह भी ध्यान दें कि पौलुस का आशय यह नहीं था कि मसीह को अकेला एक पंक्ति में रखे, और उसके साथ और पत्थर भी बिठाए जिनका अधिकार और प्रभुत्व उसी के समान हो: बल्कि केवल यह दिखाना था कि व्यवस्था और सुसमाचार के बीच, उनके सार के विषय में, अब कोई भेद नहीं रहा, परन्तु हमारा प्रभु यीशु मसीह सब का अन्त है, और हम उसके द्वारा इस प्रकार जोड़े और बुने गए हैं कि हम सब परमेश्वर का मन्दिर बनाए गए हैं, और विश्वास की एकता के द्वारा उस आत्मिक भवन के हैं जिसमें परमेश्वर वास करना चाहता है। तौभी, यदि हमारा विश्वास पूरी रीति से हमारे प्रभु यीशु

मसीह पर नहीं टिका, तो निश्चय है कि हम इस नींव पर बनाए नहीं जा सकते।

क्योंकि जब पोप के अनुयायी परमेश्वर के हाथ से अपने लिये अनुग्रह पाने को संरक्षक और सहायक गढ़ते हैं, और पुण्य कमाने के लिये बहुत से साधन ढेर करते हैं,

तो यह ऐसा ही है मानो वे अपने आप को यीशु मसीह से अपरिचित बना रहे हों। और जो कोई उससे ज़रा भी, एक उँगली की चौड़ाई भर भी, फिर जाए, उसका विनाश में गिरना अनिवार्य है। क्योंकि नींव का स्वभाव ही यह है कि वह सारे भवन को सँभाले रखे। अब यदि भवन बहुत चौड़ा हो और नींव के ऊपर निकल आए, तो उसका गिर पड़ना अनिवार्य है। हमारा हाल भी ऐसा ही है। यदि हम यीशु मसीह पर नहीं बनाए गए, अर्थात् हमारा विश्वास उसी के साथ सीधा और बराबर नहीं बैठा, और हम उससे जुड़े नहीं रहते, उसमें कुछ भी और जोड़े बिना, तो उसे हमें अपनों में से कोई न मानना और हमें पूरी तरह निकाल फेंकना ही होगा।

और सच्चाई से कहें, तो पोप के अनुयायी और उन जैसे लोग इधर-उधर भटकने और अपनी इच्छा से नए साधन जोड़ने के द्वारा अपनी बड़ी कृतघ्नता को भली-भाँति प्रकट करते हैं। यह अन्याय और अत्याचार जो वे हमारे प्रभु यीशु मसीह के साथ करते हैं, इसका पूरा पात्र है कि हम उन्हें गिरा दें और परमेश्वर की कलीसिया से पूरी तरह काट डालें।

इसलिए यदि हम उस लाभ को भोगना चाहते हैं जो पौलुस यहाँ हमारे सामने रखता है, तो हम सावधान रहें कि हमारा विश्वास व्यवस्था और सुसमाचार के अनुसार ऐसा ढले कि जो कुछ मनुष्य ने गढ़ा हो उसे ठुकरा दे, और अपने आप को निश्चय दिलाएँ कि यही हमें विनाश की ओर खींचने का निकटतम मार्ग है, और यह कि हम यीशु मसीह पर ऐसे नहीं जमाए जा सकते कि उस पर सदा दृढ़ रहें, जब तक हम वे सब बातें न मानें जो व्यवस्था और सुसमाचार में उसके विषय में कही और प्रमाणित की गई हैं, और मनुष्यों को उसमें कुछ भी जोड़ने की छूट न दें।

तो आप देखते हैं कि पौलुस के इन वचनों में हमें जो चेतावनी दी गई है वह यह है कि हम न तो हमारे प्रभु यीशु मसीह के हैं, न परमेश्वर की कलीसिया के हो सकते हैं, सिवाय इसके कि हम व्यवस्था और सुसमाचार के शुद्ध सिद्धान्त पर चलें, और (जैसा कहा जाए) वह सारी मैल और घृणित वस्तुएँ छोड़ दें जो मनुष्यों ने अपने ही स्वप्नों और सनकों से गढ़ी हैं, चाहे वे बुद्धि का कितना ही सुन्दर रंग-रूप क्यों न ओढ़े हों। क्योंकि उनके पास लोगों को यह विश्वास दिलाने के लिये कि इतनी सजावटी वस्तुओं का जोड़ना अकारण नहीं है, बहुत सी चिकनी-चुपड़ी बातें मिल ही जाएँगी। परन्तु चाहे

वे कैसे भी करें, यदि हम यीशु मसीह से जुड़ना और एक होना चाहते हैं, तो हमें उसमें ऐसे बने रहना चाहिए कि किसी और वस्तु को कुछ भी न गिनें।

और इसी के साथ हम यह भी देखते हैं कि परमेश्वर की सन्तान माने जाने के लिये हमें सच्ची एकता में लगना चाहिए। क्योंकि पौलुस यहाँ ये दोनों बातें साथ-साथ रखता है: और वास्तव में, ये अलग हो ही नहीं सकतीं। मसीहियों को, जब परमेश्वर का वचन उन्हें शुद्ध रीति से सिखाया जाता है, एक मन और एक चित्त होकर उन बातों को ग्रहण करना चाहिए जो इस प्रकार उनके सामने रखी जाती हैं, और उनके बीच भाईचारे की एकता होनी चाहिए, कि मानो एक ही मुँह से बोलें, और एक शुद्ध और सरल अंगीकार करें।

तब, जैसे अब तक हमने देखा कि हमें केवल परमेश्वर के शुद्ध वचन पर ही बनाया जाना चाहिए, वैसे ही यहाँ हमें दिखाया गया है कि हममें से हर एक को अपनी ही राय पर अड़ा नहीं रहना चाहिए, बल्कि अपने आप को विश्वास की एकता के अनुसार ढालना चाहिए, जैसा पौलुस फिलिप्पियों के तीसरे अध्याय में इसके विषय में कहता है: यदि तुम सिद्ध होना चाहते हो, तो सब एक ही लक्ष्य की ओर बढ़ो, और सचमुच एक में जुड़े रहो। क्योंकि हम जानते हैं कि महत्त्वाकांक्षा हमें निरन्तर गुदगुदाती रहती है, और हर कोई अपने लिये कुछ अलग चाहता है, जिससे अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाए। जितने भी पाखण्डी मत कभी हुए हैं उन सब का मूल कारण यही अहंकार है, जो मनुष्यों के हृदयों में इतना गहरा जड़ पकड़े है कि जब हम सब को सीखनेवाला होना चाहिए, तब हम में से हर एक शिक्षक बनने पर तुला रहता है।

और सचमुच, जो औरों को सिखाने वाला है, उसे अपनी ओर से कुछ भी सामने नहीं रखना चाहिए, वरन् जो कुछ उसने हमारे प्रभु यीशु मसीह से सीखा है, केवल वही उन्हें सुनाना चाहिए। परन्तु मनुष्य इतने हठीले हैं कि वे सदा उससे अधिक जानना चाहते हैं जितना उनके लिए उचित है; इसी कारण वे बुरा आचरण करते हैं, और हर कोई अपनी पाठशाला खोलना चाहता है कि अपना प्रदर्शन करे। परन्तु यहाँ कहा गया है कि इस रीति के बदले हमें आपस में एक होना है, ताकि हम सब मानो एक ही मुँह से बोलें, और मान लें कि हमारा केवल एक ही परमेश्वर है,

और एक ही पिता है, और यह दिखाएँ कि हमारा यीशु मसीह के सिवाय और कोई स्वामी नहीं।

तथापि यह सच है कि ऐसी एकता पर्याप्त नहीं होगी; परन्तु मैं तुम्हें पहले ही बता चुका हूँ कि हमें कहाँ से आरम्भ करना चाहिए: अर्थात् उस शुद्ध शिक्षा से जो हमें भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों से मिलती है। पोप के अनुयायी अपनी एकता का बहुत बखान करते हैं; और वे ऐसा कर भी सकते हैं, क्योंकि शैतान ने उन्हें इस प्रकार वश में कर रखा है कि वे उसमें पूरी तरह मतवाले हो गए हैं। सच तो यह है कि उनके बीच झगड़ा-झंझट और खींचातानी बहुत है, और जब वे अपने ही आराधनालयों में होते हैं तो कुत्तों की भाँति एक-दूसरे पर झपटते हैं; फिर भी सब प्रकार की अभक्ति को बनाए रखने में वे गोखरू की भाँति आपस में चिपके रहते हैं। जब वे परमेश्वर के सत्य के विरुद्ध अपने ही झूठों के समर्थन में तर्क देते हैं, तब हम उनका शैतानी उन्माद और जान-बूझकर की गई हठधर्मिता देखते हैं।

परन्तु पौलुस हमें दिखाता है कि हमें किस रीति से एक होना चाहिए: अर्थात् स्वप्नों और बकवाद में नहीं, न उन बातों में जो मनुष्यों ने अपने ही भण्डार से निकाली हैं, परन्तु भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों के सिद्धान्त में।

अब जब कि पोप के अनुयायियों ने पवित्रशास्त्र को निकाल बाहर किया है, और यद्यपि वे उसे ग्रहण करने का दिखावा करते हैं, तो भी अपनी ही गढ़ी हुई बातों से उसे बिगाड़ते हैं, वरन् उसे सर्वथा झूठा और भ्रष्ट कर डालते हैं: इसी से हम देखते हैं कि वे अपनी गणना से कितने दूर हैं, जो खुले मुँह से डींग मारते हैं कि हम परमेश्वर की कलीसिया हैं; क्योंकि जब उनके पास भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों का सिद्धान्त ही नहीं, तो उनमें कलीसिया का कोई चिह्न है ही नहीं। चाहे लोग पवित्रशास्त्र की सब बातें बिना किसी विरोध के ग्रहण करने को तैयार हों, तो भी यदि वे उसमें अपनी कल्पनाएँ मिलाने लगें, तो उसी से मसीही धर्म बिगड़ और गड़बड़ा चुका है।

अब वे परमेश्वर के सत्य को अपनी गढ़ी हुई बातों से उलझाते ही नहीं, वरन् उसे पूरी तरह उलट देते हैं: यहाँ तक कि उनके हाथों परमेश्वर की सेवा सर्वथा भ्रष्ट हो गई है, बेचारी आत्माएँ इधर-उधर हाँकी जाती हैं, और हमारे

प्रभु यीशु मसीह को लूटा जाता है, क्योंकि वे उसके विषय में केवल एक काल्पनिक धारणा गढ़ लेते हैं, और उसके पद इस और उस मनुष्य को सौंप देते हैं, मानो वह कोई लूट का माल हो। अतः जब हम देखते हैं कि पोप के अनुयायी इस प्रकार ढिठाई और पागलपन से परमेश्वर के वचन को उलट-पुलट कर देते हैं, तो हम भली-भाँति यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि चाहे वे अपने आप को कलीसिया कहकर कितनी ही डींग मारें, फिर भी परमेश्वर उन्हें अस्वीकार करता है, वरन् उनसे सर्वथा घृणा करता है: और यदि कोई मनुष्य उस डाकुओं की खोह से बाहर नहीं निकलता, तो उसके लिए हमारे प्रभु

यीशु मसीह से जुड़ना असम्भव है।

इस प्रकार तुम देखते हो कि हमें यह बात स्मरण रखनी है कि परमेश्वर के एकलौते पुत्र के द्वारा उससे जुड़ने, स्वर्ग के स्वर्गदूतों के साथी होने, और कुलपतियों, पवित्र राजाओं तथा भविष्यद्वक्ताओं के भाई बनने के लिए हमें पोप-तन्त्र के उन नारकीय आराधनालयों से बाहर निकलना होगा, जहाँ स्पष्ट है कि मसीह-विरोधी राज्य करता है, और यीशु मसीह अपने अधिकार और प्रभुता से सर्वथा वंचित कर दिया गया है। और सचमुच हम उनका शापित दुस्साहस देखते हैं कि वे यह कहने का साहस कर बैठे हैं कि रोम का आसन कलीसिया की नींव है। क्योंकि वे मत्ती के सोलहवें अध्याय में हमारे प्रभु यीशु मसीह के इन वचनों का दुरुपयोग करते हैं: "तू पतरस है, और मैं इस पत्थर पर अपनी कलीसिया बनाऊँगा।" अब जब यीशु मसीह कहता है कि पतरस स्वयं उसी पर (अर्थात् यीशु मसीह पर) बनाया जाएगा, तो उसका अभिप्राय यह नहीं कि वह अपना पद उसे या किसी और को सौंप दे: परन्तु इससे प्रकट होता है कि पोप के अनुयायियों में न पवित्रशास्त्र के प्रति कोई आदर रहा है, न सीखने की कोई इच्छा, वरन् उनके लिए सब कुछ एक समान था, बस वे ऐसा अत्याचार खड़ा कर सकें जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के राज्य को कुचल दे, और यदि सम्भव हो तो उसे पूरी तरह मिटा दे; और उन्होंने खुली निन्दा करने में भी कोई विवेक की चिन्ता नहीं की, यहाँ तक कि छोटे बच्चों को भी उनके मुँह पर थूकना चाहिए था, क्योंकि उनके बीच जो घोर पशुता है और रही है, उसे देखते हुए यही उचित था। और इसी में यह भी देखा जाता है कि शैतान ने कैसे घने अन्धकार में राज्य किया, कि परमेश्वर का वचन गाड़ दिया गया, वरन् सर्वथा

बिगाड़ दिया गया, और अभागा संसार कुछ समय के लिए उससे पूरी तरह वंचित कर दिया गया, यद्यपि वह उनका नित्य का भोजन था।

इसलिए आओ, हम उन सब निन्दाओं से घृणा करें, और अपने मन में निश्चय रखें कि हम हमारे प्रभु यीशु मसीह को छोड़ और किसी पर स्थापित नहीं हो सकते, और जब हम एक बार विश्वासयोग्यता से उसमें शिक्षित हो जाएँ, तो हमें कहीं और से उधार लेने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि जो कुछ हमारे उद्धार के लिए आवश्यक है वह सब वह हमारे लिए ले आया है। और यह उचित नहीं कि हम उसका इतना बड़ा अनादर करें कि कहीं और से कोई सहारा ढूँढ़ें: परन्तु हमें पूरी तरह उसी में स्थिर रहना चाहिए। यही उन बातों का अभिप्राय है जो पौलुस यहाँ कहता है।

और इसके बाद वह यह भी जोड़ता है कि हम सब को एक आत्मिक भवन के रूप में बनाया जाना और बढ़ना चाहिए, परमेश्वर तक, और आत्मा में। पहले, जहाँ वह कहता है कि हमें बनाया जाना है, वहाँ उसका आशय हमें इसलिए जगाना है कि हम और भी भली रीति से दिन-प्रतिदिन विश्वास में अधिक से अधिक बढ़ते जाएँ। वह "बढ़ना" शब्द भी प्रयोग करता है, और उसका तात्पर्य वास्तव में दो बातों से है। पहली यह कि हमें अपने आप को इतना सिद्ध न समझ लेना चाहिए जितना आवश्यक हो, जैसा कुछ कल्पनाशील लोग करते हैं, जिन्हें तुम अहंकार से इतना फूला हुआ पाओगे कि वे अपने आप को पर्याप्त बुद्धिमान मान बैठते हैं और परमेश्वर के वचन को देखना, या उससे शिक्षा पाने के लिए उसे सुनना तुच्छ जानते हैं। परन्तु ऐसे घमण्ड पर हाय, क्योंकि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के चेले नहीं हो सकते जब तक हम यह न जानें कि हमें उसमें दृढ़ किया जाना और अपने जीवन भर उसमें उन्नति करते रहना चाहिए। क्योंकि परमेश्वर का वचन ऐसी ऊँचाई, चौड़ाई और लम्बाई का है कि यदि कोई मनुष्य खाना, पीना और सोना छोड़ दे और अपने आप को पूरी तरह उसी में लगा दे, तब भी वह सब कुछ कभी नहीं जान पाएगा। इसलिए हमें जीवन भर उसमें परिश्रम करते रहना चाहिए, यह जानते हुए कि परमेश्वर अभी केवल हमें मार्ग पर लगाना चाहता है, और हमें थोड़ा-थोड़ा करके आगे बढ़ना है, और निरन्तर दीनता और नम्रता में बने रहना है।

फिर, पौलुस हमें दिखाता है कि अपने प्रभु यीशु मसीह में स्थिर होने के लिए, और उसके द्वारा हमें दी गई सब उत्तम वस्तुओं में उन्नति पाने के लिए,

हमारे पास उसका वचन होना अवश्य है, ताकि हम उसी पर बनाए जाएँ और उसी पर अधिकाधिक बढ़ते जाएँ। इसे सिद्ध करने के लिए हमें सीखने को तैयार रहना चाहिए, और दिन-प्रतिदिन अपने विश्वास को दृढ़ करने के लिए नई सहायता खोजने का परिश्रम करना चाहिए, जो इस संसार में कभी सिद्ध नहीं होगा, जैसा कि हम अनुभव से भली-भाँति जानते हैं। इस प्रकार तुम देखते हो कि पौलुस का उस भवन में हमारे बढ़ने और आगे जाने के विषय में यहाँ जो कहा गया है, उससे क्या तात्पर्य था। तौभी वह कहता है, "प्रभु में," और इससे दिखाता है कि हम से केवल एक सुन्दर दिखावा ही अपेक्षित नहीं है।

मुख्य बात यह है कि परमेश्वर हम से प्रसन्न हो, और हम पूरी तरह उसी को सौंपे जाएँ, ताकि उसे हम में स्थान और जगह मिले, और वह हम में अपने मन्दिर की तरह वास करे।

क्योंकि पोप के अनुयायी दूसरी ओर हम से कहीं अधिक दिखावा करेंगे: उनके पास बड़ी भीड़ें हैं, जिन पर वे चरम सीमा तक फूले हुए हैं। और इसी पर वे हमें तुच्छ जानते हैं, क्योंकि उनकी तुलना में हम केवल मुट्ठी भर लोग हैं। वे कहते हैं, "क्या मसीही जगत सारे यूरोप, यूनान और अफ्रीका में फैला हुआ नहीं है? और फिर भी देखो, ये नीच लोग जिनके पास न अधिकार है, न साख, न और कुछ, कलीसिया कहलाना चाहते हैं।" तो तुम देखते हो कि पोप के अनुयायी शैतानी घमण्ड और ढिठाई से हमें झटक देते हैं, क्योंकि उनके पक्ष में बड़ा आडम्बर और हर प्रकार का धन है, यहाँ तक कि यदि कोई उनके मन्दिरों में जाए तो वह उन पर मोहित हो जाता है, मानो वह पृथ्वी के किसी स्वर्ग में हो। परन्तु जो चमकता है वह सब सोना नहीं होता। और यद्यपि उनका आडम्बर बेचारे अज्ञानी लोगों की आँखों में धूल झोंक सकता है, जिन्हें हम वास्तव में ऐसी बातों से बहक जाते देखते हैं, तौभी वे सब परमेश्वर के सामने घृणित वस्तु के सिवाय और कुछ नहीं हैं।

इस प्रकार पौलुस हमें दिखाता है कि हमें पोप के अनुयायियों से, चाहे वे संख्या में बहुत अधिक और बहुगुणित हों, डाह नहीं करना चाहिए: क्योंकि वे केवल बिना देह का सिर हैं, या यों कहें कि एक रुई भरी हुई और नकली देह हैं। संक्षेप में, जिसे पोप के अनुयायी अपनी कलीसिया कहते हैं, वह एक राक्षसी आकृति है। क्योंकि उसका कोई सिर नहीं है, इसलिए कि यीशु मसीह का

उस पर कोई प्रधानता नहीं, और न उसमें उसका कोई अंश या भाग है। इसलिए, ताकि हम जानें कि हमें कैसे बढ़ना चाहिए: हम से कहा गया है कि हमें प्रभु तक, और आत्मा में बढ़ना है, पौलुस कहता है। यहाँ वह हमें सब सांसारिक अन्धविश्वासों से खींच लेता है, और हमें समझाता है कि वे केवल तुच्छ कूड़ा हैं, वरन परमेश्वर के सामने गोबर हैं, जो उनसे घृणा करता है।

इसलिए हमें आत्मा में बढ़ना चाहिए। और निश्चय ही हम देखते हैं कि जैसे ही हमें देह की पूर्ति और सार अर्थात् हमारे प्रभु

यीशु मसीह मिला, व्यवस्था की छायाएँ तुरन्त जाती रहीं। और अब जब वह आ चुका है, तो हमें उन प्रतीकों की ओर और नहीं ताकना चाहिए। जब ऐसा है, तो हमें उन बातों को, जो मनुष्य बीच में लाते हैं, कहीं अधिक छोड़ देना चाहिए। वे कितनी ही ऊँची और उत्कृष्ट क्यों न हों, हम उन्हें गन्दगी की तरह अपने से दूर फेंक दें, और इसी में सन्तुष्ट रहें कि हमारा प्रभु यीशु मसीह चाहता है कि हम उसमें आत्मिक रीति से बनाए जाएँ। और इस प्रकार तुम देखते हो कि उसका सिद्धान्त हमारे लिए कैसा मधुर और मनोहर होना चाहिए, वरन हमें पूरी तरह अपने प्रेम में मोहित कर ले, ताकि हम स्वतंत्र मन से संसार को छोड़ दें और अपने आप को अपने प्रभु यीशु मसीह को सौंप दें। परन्तु दूसरी ओर यह भी, कि हम सावधान रहें, कहीं ऐसा न हो कि वह न्याय जिसकी वह उन्हें चेतावनी देता है जो इस पत्थर को ठुकरा देते हैं, हमारे सिर पर आ पड़े, इस वचन के अनुसार, "देखो, मैं सिय्योन में एक बहुमूल्य पत्थर रखता हूँ।" जब यीशु मसीह हमारी नींव होने के लिए हमें दिया गया है, तो हमारे पास वहाँ एक बहुमूल्य पत्थर है, जिस पर यदि हम बनाए जाएँ तो हम अपने उद्धार के विषय में निश्चिन्त हो सकते हैं। और हमें डरने की आवश्यकता नहीं कि वह हमें थामे रखने के लिए पर्याप्त दृढ़ नहीं है, क्योंकि वह हमें कभी निराश नहीं करेगा। परन्तु यदि हम उस पत्थर से टकराने लगें, तो निश्चय है कि हम उसके सामने खड़े नहीं रह सकेंगे, वरन उसके नीचे धँस जाएँगे, और अन्त में वह हमें कुचल देगा और टुकड़े-टुकड़े कर देगा। इसलिए हम चौकस रहें कि हमारा प्रभु यीशु मसीह ठोकर खाने का पत्थर न बन जाए, जैसा आजकल संसार का तरीका है जो उससे बैर रखता है, यहाँ तक कि हर मनुष्य घमण्ड और विद्रोह से अपने रोंगटे खड़े करके उससे टकराने को दौड़ता है: परन्तु हम

अपने चालचलन पर भली-भाँति विचार करें, और नम्रता से अपनी सेवा उसे सौंपने को तैयार रहें, ताकि वह हमें अन्त तक थामे रखे।

और यद्यपि हम देखते हैं कि यीशु मसीह को संसार ने ठुकरा दिया है, और हमें यह अजीब लग सकता है कि मनुष्य उसके विरुद्ध ऐसा संघर्ष करें, और वह मानो निशाना बनाकर तीर चलाने का लक्ष्य ठहरे, तौभी हम उसे अब भी बहुमूल्य पत्थर मानना न छोड़ें, जैसा कि सन्त पतरस अपनी पहली पत्री के दूसरे अध्याय में हमें सलाह देता है। तो देखिए, जब हम उन प्रतिज्ञाओं को सुनते हैं जो पौलुस हमें बताता है, तब एक ओर हमें अपने प्रभु यीशु मसीह की ओर खिंचकर अपने आपको पूरी तरह उसके हाथ सौंप देना चाहिए, और संसार की उन सब बातों को भूल जाना चाहिए जो सबसे उत्तम प्रतीत होती हैं। दूसरी ओर, हम सावधान रहें कि उसे बहुमूल्य पत्थर के रूप में ग्रहण करने से तिरस्कार करने के कारण हमारी कृतघ्नता का दण्ड हमें न मिले, क्योंकि परमेश्वर हमें बताता है कि हमारा सारा कल्याण इसी में है कि हम उसका मन्दिर हैं, और हमारे हाथों से उसका नाम पुकारा जाता है।

इसलिए आइए, हम ऐसे महान और अनमोल लाभ से लाभ उठाएँ, और उसमें और अधिक बढ़ते और उन्नति करते जाएँ, जब तक हम स्वर्गीय विरासत तक न पहुँच जाएँ, जहाँ हम उन सब उत्तम वस्तुओं का पूर्ण आनन्द पाएँगे जिन्हें वह हमें अभी केवल विश्वास के द्वारा अनुभव कराता है।

और अब आइए, हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने पापों को मानते हुए गिर पड़ें, और उससे प्रार्थना करें कि वह कृपा करके उनकी स्मृति मिटा दे, ताकि वे उसके सामने लेखा में न आएँ; और वह हमें सुधारे, ताकि हम पूरी तरह उसी से लिपटे रहें, और हमारी निर्बलताओं को सहे, ताकि हम योग्य न होते हुए भी हर समय निःसंकोच उसके पास आना न छोड़ें। और इस प्रकार आइए, हम सब कहें, हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता, इत्यादि।

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मोनर्जिज़्म बुक्स

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