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बारहवाँ उपदेश, दूसरे अध्याय पर चौथा - इफिसियों 2:11-13
वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें इस प्रकार थामे और चलाए कि हमारा सारा प्रयत्न इसके सिवाय और कुछ न हो कि हम अपने जीवन को उसकी पवित्र व्यवस्था के अनुसार ढालें; और वह हमारे उन अनेक पापों की गिनती पर ध्यान न दे जो हम करते हैं, और अपने ही नाश की ओर भटकने से कभी नहीं रुकते, परन्तु अपनी गुप्त सामर्थ्य से हमें थामे रखे, जब तक कि वह हमें इस संसार से उठा न ले, और हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह से न मिला दे, जो सब सिद्धता का सोता है, ताकि हम भी उसमें सिद्ध हो जाएँ।
और इसलिए आओ हम कहें, हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता, इत्यादि।
बारहवाँ उपदेश, जो दूसरे अध्याय पर चौथा है। 11. इसलिए स्मरण रखो कि तुम जो पहले शरीर के विषय में अन्यजाति थे, और जो लोग शरीर में हाथ के किए हुए खतने के कारण खतनावाले कहलाते हैं, वे तुम्हें खतनारहित कहते थे:
12. तुम उस समय मसीह से अलग थे, इस्राएल की प्रजा के अधिकार से बाहर थे, और प्रतिज्ञा की वाचाओं के लिए अजनबी थे, और जगत में न तो तुम्हारी कोई आशा थी और न परमेश्वर।
13. परन्तु अब मसीह यीशु में तुम जो पहले दूर थे, मसीह के लहू के द्वारा निकट लाए गए हो।
यद्यपि जो बातें परमेश्वर के अनुग्रह के विषय में हमें सामान्य रूप से सुनाई जाती हैं, उन्हें हमें उसके नाम की महिमा करने और उससे पाई हुई भलाइयों को स्वीकार करने के लिए प्रेरित करना चाहिए, तथापि यदि कोई बात निजी रूप से हमारे साथ की जाती है, तो उससे हमें और भी अधिक प्रभावित होना चाहिए। संत पौलुस यहाँ यही क्रम अपनाता है। क्योंकि हमने आज सुबह देखा कि उसने कैसे स्पष्ट किया कि मनुष्य में जो कुछ है वह कुछ भी नहीं, ताकि उद्धार की केवल एक ही नींव हो, अर्थात् परमेश्वर की केवल भलाई। अब वह इसी को विशेष रूप से इफिसियों पर लागू करता है, और उनसे चाहता है कि वे उस दशा पर विचार करें जिसमें परमेश्वर ने उन्हें पाया: मानो सारी मानव जाति के विषय में कहकर वह हम में से हर एक को उसके अपने अनुभव की ओर भेज रहा हो। निश्चय ही जो यहाँ इफिसियों से कहा गया है, वह हम पर भी लागू होता है, जैसे कोई मनुष्य हमें आदम के पतन से हम पर आई उस दुर्दशा के विषय में बताकर कहे: "यह भी सोचो कि तुम क्या थे, और उस समय से पहले जब परमेश्वर ने तुम्हें अपने ज्ञान के लिए बुलाया, तुम कैसी पशुता में जीवन बिताते थे।"
तब जो बात हमें ध्यान में रखनी है वह यह है कि संत पौलुस ने यह दिखाकर कि सब मनुष्य, बड़े से छोटे तक, यह मानें कि उनका उद्धार केवल परमेश्वर की भलाई से है, एक और विशेष घोषणा जोड़ दी, जिसमें वह दिखाता है कि विश्वासियों में से हर एक को अपने विषय में क्या जानना चाहिए। यह सच है कि जो बात उसने उस समय के लिए कही वह सब बातों में हमारे दिनों से मेल नहीं खाती, तथापि संत पौलुस का उत्तर सदा अपना प्रभाव रखेगा और उपयोगी रहेगा। क्योंकि यद्यपि हमारा बपतिस्मा हमारे शैशव से हुआ है, तथापि हम उन्हीं में से आए हैं जो कभी परमेश्वर की कलीसिया से कटे हुए थे। क्योंकि यहूदी जगत की सब अन्य जातियों से अलग किए गए थे, ऐसे लोगों के रूप में जिन्हें परमेश्वर ने अपने लिए ठहराया था। तब हम सब (मेरा तात्पर्य अपने पुरखों से है) अन्यजाति थे, इससे पहले कि सुसमाचार का प्रचार किया जाता
जगत में। परन्तु अब फिर हम देखते हैं कि उन लोगों की कृतघ्नता के कारण जो सुसमाचार के सत्य की ओर बुलाए गए थे, हम पर कितना भ्रम छा गया है, और हम इस प्रकार भटक गए हैं कि हम परमेश्वर की कलीसिया से फिर लगभग कट ही गए थे। क्योंकि जो बपतिस्मा हमने अपने बचपन में पाया, उससे हमें इसके सिवाय और कोई लाभ न हुआ कि हम परमेश्वर के सामने दुगुने दोषी ठहरे। क्योंकि जो पोप-तन्त्र के अन्धविश्वासों में और वहाँ की सब मूर्तिपूजाओं में डूबे हुए थे, उन्होंने मानो अपने बपतिस्मा का त्याग कर दिया था और धर्मत्यागी हो गए थे। और हम अपने आपको इस दोष से मुक्त नहीं कर सकते कि हमने परमेश्वर से विश्वासघात किया, क्योंकि हम उसकी आज्ञाकारिता से भटक गए थे। इसलिए हमारे लिए यह उचित नहीं कि हम कोई घमण्ड करें या अपनी दुर्दशा को ढाँपने के लिए कोई बहाना खोजें, परन्तु यह उचित है कि हम खुले रूप से मान लें कि हम परमेश्वर के घोर शत्रु थे और इस योग्य थे कि वह हमें पूरी तरह छोड़ देता, इसलिए कि उसने हमें उद्धार के मार्ग पर फिर लाने के लिए अपना हाथ बढ़ाया।
तो पहले हम इस पाठ को जैसा है वैसा ही लेकर इफिसियों पर लागू करते हैं, और उसके बाद स्वयं उससे लाभ उठाने का प्रयत्न करेंगे। अब आओ हम इन वचनों की अन्तर्वस्तु और सार को देखें: "सोचो और स्मरण करो कि तुम कभी अन्यजाति थे।"
पहले, वह यहूदियों और उन लोगों के बीच भेद करता है जिन्हें परमेश्वर ने अपने ही अन्धकार में चलते रहने दिया था। क्योंकि यह एक विशेष अधिकार था जो परमेश्वर ने अब्राहम की सन्तान को तब दिया जब उसने उन्हें गोद लिया, कि उनसे कहे, "तुम मेरी प्रजा होगे, जिन पर मैं ऐसी कृपा करता हूँ मानो तुम मेरे ही घराने के हो।" तब जो अब्राहम के वंश से नहीं आए थे, वे परमेश्वर के राज्य और कलीसिया से मानो निर्वासित ही थे। और वह जोड़ता है, "शरीर में," उस प्रकार नहीं जैसे वह अन्य कई स्थानों पर उस शब्द को निन्दा के रूप में प्रयोग करता है, परन्तु यह दिखाने के लिए कि परमेश्वर ने एक दृश्य रीति से दिखा दिया था कि उनकी दशा कितनी दयनीय थी, और उसे समझने के लिए किसी गहरी बुद्धि की आवश्यकता न थी। क्योंकि खतना, वह कहता है, मानो मनुष्यों को उनकी
अशुद्धता से छुड़ाने का काम करता था। इसके अतिरिक्त, वह संस्कार परमेश्वर की ओर से इसलिए ठहराया गया था कि यह दिखाए कि मनुष्य का सारा वंश शापित है और हम उन बातों को, जो हमें स्वभाव से मिली हैं, काट डालने और दूर करने के सिवाय और किसी रीति से ठीक रूप में पवित्र और शुद्ध नहीं किए जा सकते। संक्षेप में, जैसे आजकल हमें बपतिस्मा के द्वारा सिखाया जाता है कि जो कुछ हमें जन्म से मिला है उसे त्याग दें, वैसे ही खतना भी एक चिह्न था जो दिखाता था कि सब मनुष्य जब तक अपने स्वभाव को न छोड़ें तब तक अशुद्ध और घिनौने हैं।
तब संत पौलुस का आशय यह है कि उक्त दृश्य चिह्न सब अन्यजातियों को भली-भाँति दिखाता था कि वे मानो परमेश्वर के निकट आने के योग्य नहीं थे, और वह उन्हें विश्वासियों की मण्डली में ग्रहण करना उचित नहीं समझता था। क्योंकि यहूदियों ने खतने को अपनी कल्पना से नहीं गढ़ा था, परन्तु (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) परमेश्वर ने उन्हें शेष जगत से अलग किया था, और यह सब उसके अपने केवल अनुग्रह और भलाई के विशेष अधिकार के कारण था।
इस पर पौलुस आगे यह भी जोड़ता है कि वे उस समय मसीह से रहित थे। इससे और भी अच्छी रीति से यह प्रकट होता है कि मनुष्य भयानक रीति से बिखरे हुए हैं और भटकने के सिवा कुछ नहीं कर सकते, जब तक परमेश्वर उन्हें अपने पुत्र की देह में एक साथ न जोड़ ले और उन्हें अपनी सन्तान होने के लिये ग्रहण न कर ले। क्योंकि हम जानते हैं कि यीशु मसीह जगत की ज्योति है और सारी धार्मिकता उसी में बसती है, और वही हमारा छुटकारा और जीवन है।
इसलिये जब तक हम उसे नहीं जानते, तब तक हमें अन्धकार में पड़े बेचारे अन्धों के समान ही रहना पड़ेगा; हमें मरे हुओं के बराबर ही होना पड़ेगा; हमें सारी पवित्रता, धार्मिकता, सामर्थ्य और हर प्रकार की भलाई से नंगे ही रहना पड़ेगा। और क्योंकि हमारी स्वतंत्रता उसी पर निर्भर है, इसलिये जब तक वह हमें उनसे छुड़ा न ले, तब तक हमें शैतान और पाप के अत्याचार के अधीन ही रहना पड़ेगा। इसी कारण पौलुस
इफिसियों के जन के रूप में हमें यहाँ यीशु मसीह के पास भेजता है, ताकि जो लोग परमेश्वर के पुत्र के सहभागी नहीं हैं, वे जान लें कि उनके लिये उसी दशा में सदा बने रहने से तो सौ बार डूब जाना ही भला होता। और क्यों? क्योंकि जब हम
यीशु मसीह के बिना न जीवन पा सकते हैं, न आत्मा की कुशलता, न धार्मिकता, न कोई और उचित वस्तु, तो यह वैसा ही है मानो वह कहता हो कि हमारे पास अपने आप में पूर्ण निकम्मेपन और विनाश के सिवा और कुछ नहीं है।
वह इसके साथ इस्राएल की राजव्यवस्था को भी जोड़ता है, और इस प्रकार दिखाता है कि यहूदियों से की गई सब प्रतिज्ञाएँ यीशु मसीह पर ही आधारित थीं।
और इसलिये जो उसकी देह के नहीं हैं, वे तुरन्त ही परमेश्वर की सब प्रतिज्ञाओं से वंचित हो जाते हैं, और जीवन की कोई आशा केवल कल्पना के सिवा नहीं रख सकते, जिससे वे अपने आप को धोखा देते हैं। और निश्चय ही वह प्रतिज्ञाओं के साधन (अर्थात् वाचाएँ और दस्तावेज़) भी जोड़ता है, मानो वह यह कहता हो कि परमेश्वर ने यहूदियों को गुप्त रीति से नहीं बुलाया था, बल्कि एक गम्भीर दस्तावेज़ या प्रमाण-पत्र बनाया था, जिससे सारा जगत दण्ड के अधीन छोड़ दिया गया।
इसलिये क्योंकि परमेश्वर ने अब्राहम के वंश को ऊँचा उठाया था, अवश्य था कि शेष जगत उतना ही अधिक लज्जित हो, जैसे यदि कुछ राजा या कुछ नगर आपस में सन्धि करें, तो जो उसमें सम्मिलित नहीं हैं, वे उसमें निहित लाभ से वंचित ही समझे जाते हैं। और जब परमेश्वर ने घोषणा की कि वह यहूदियों को अपनी भेड़-बकरियों का झुण्ड मानता है और उनका पिता और उद्धारकर्ता होगा, तब उसने यह भी घोषित कर दिया कि उसका कोई भाग अन्यजातियों को नहीं मिल सकता, जिन्हें उसने एक प्रकार से त्याग दिया था और जिन पर वैसी दया दिखाना उसने उचित न समझा। अन्त में वह कहता है कि वे परमेश्वर के बिना थे, जो सब बुराई की पराकाष्ठा है। क्योंकि उस मनुष्य का क्या होगा जिसे उसके परमेश्वर ने ऐसा झटक दिया हो कि न उसके लिये कोई पहुँच रह जाए और न उसके पास फिर लौट आने की कोई राह?
और वह न केवल अपने परमेश्वर से त्यागा हुआ है, वरन् वह नरक की गहराई में और भी नीचे धँसे बिना नहीं रह सकता और परमेश्वर से मानो बैर रखकर उससे लड़ता है, क्योंकि वह हर भलाई के विरुद्ध हठीला और विद्रोही है? तो देखिए, पौलुस यहाँ जो बात रखता है, वह इसलिये कि इफिसियों ने जो बातें उसने कही थीं, उनसे लाभ उठाएँ
आज सवेरे हमारे उद्धार के एकमात्र कारण के विषय में, वह यह है कि हमारे भरोसा रखने के लिये परमेश्वर के केवल निरे अनुग्रह के सिवा और कुछ नहीं है।
परन्तु अब हम अपनी ओर आएँ। मैं पहले ही संक्षेप में बता चुका हूँ कि हमारे पूर्वज उसी दशा में थे जो पौलुस ने यहाँ बताई है।
और इसलिये जब-जब हम सोचते हैं कि हम किस जड़ और मूल से उत्पन्न हुए हैं, तब-तब हमारे पास घमण्ड करने का कोई कारण नहीं। क्योंकि यदि यहूदी लोग स्वयं आज के दिन परमेश्वर के क्रोध और भयानक दण्ड का प्रमाण हैं, जो वह उन पर उनके अविश्वास के कारण डालता है, तो क्या हमारे लिये अपनी आँखें नीची करने का और भी अधिक कारण नहीं, जो मानो असमय जन्मी वस्तुओं के समान हैं? क्योंकि यहूदी उस पवित्र जड़ के हैं जिसे परमेश्वर ने चुना था, और हम तो उनके स्थान पर उसमें केवल कलम लगाए गए हैं। यदि परमेश्वर ने स्वाभाविक डालियों को नहीं छोड़ा, तो हम पर, जो मानो स्वभाव के विरुद्ध भीतर लाए गए हैं, वह क्या न करेगा? देखिए, पौलुस
हमें नम्रता के लिये कैसे उकसाता है, ताकि हम सदा अपने आप को परमेश्वर की निरी भलाई के अधीन करना सीखें और खुले मन से मान लें कि हमारा कल्याण उसी में है। और मैंने दूसरी बात आपसे यह भी कही कि न केवल हमारे पूर्वज उद्धार की आशा से अपरिचित थे क्योंकि वे यहूदियों के समान ग्रहण नहीं किए गए थे, बल्कि वह भयानक बिखराव भी, जो सारे जगत पर आया और आज भी उसमें राज करता है, सब घमण्ड और अहंकार को गिरा दे, ताकि परमेश्वर का अनुग्रह हम पर और भी उज्ज्वल रीति से चमके। अब (जैसा मैंने कहा), यद्यपि हमने बपतिस्मा लिया है और हमारे पास परमेश्वर की भलाई और स्वतंत्र लेपालकपन का चिह्न है, तो भी हम अभागे मूर्तिपूजक थे और अपने प्रभु यीशु
मसीह से दूर चले गए थे, और जिन बातों को हम सबसे अधिक मान देते थे, वे हमारे कल्याण के बदले हमारे और भी बड़े दण्ड का कारण बन गईं। इसलिये यहाँ अपने विषय में सोचने का हमारे पास अच्छा कारण है।
इसके अतिरिक्त, क्योंकि हम परमेश्वर के अनुग्रह की बड़ाई करने में मन्दबुद्धि हैं, आइए हम उस वचन को भली-भाँति तौलें जो पौलुस यहाँ प्रयोग करता है, ताकि वह हमें उन बातों की याद दिलाए जिन्हें हम भूल सकते हैं। क्योंकि जब हमें परमेश्वर का अनुग्रह मिला है, और उसे यह अच्छा लगा है कि हमें
उसके भय में चलने की कोई भली इच्छा दे, और उसने अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हममें ऐसा कार्य किया है कि लोग देख सकें कि हममें कुछ भलाई है, तो यह हमें तुरन्त भुला सकता है कि हम पहले क्या थे, जिससे परमेश्वर का अनुग्रह मानो दबा दिया जाता है। इसलिये, ताकि हमारी वर्तमान दशा परमेश्वर की निरन्तर स्तुति करने और उसकी भलाई और अनुग्रह का, जैसा वह योग्य है, आदर करने में बाधा न बने, समय की कोई लम्बाई उन उपकारों को धुँधला न करे जो हमने परमेश्वर से पाए हैं, परन्तु हम मानो प्रतिदिन उनकी जाँच में लगें। और यद्यपि
परमेश्वर ने आज हमारी दशा बदल दी है, यहाँ तक कि हम वे मनुष्य नहीं रहे जो पहले थे; तौभी हम यह स्मरण रखें कि जब तक परमेश्वर ने हम पर तरस नहीं खाया था, तब तक हम भटकी हुई मूर्ख भेड़ों के समान और सर्वथा खोए हुए पशुओं के समान थे, और यदि वह छोटा-सा आरम्भ न होता, तो हम इससे पहले दस लाख बार नाश हो चुके होते, यदि परमेश्वर ने पहले ही हमारी सुधि न ली होती और उस श्रापित दशा का, जिसमें हम पड़े थे, कोई उपाय न दिया होता। तब तुम देखते हो कि इस वचन पर, जिसके द्वारा पौलुस इफिसियों को स्मरण दिलाता है कि वे पहले क्या थे, हमें यह विचार करना है: यद्यपि परमेश्वर ने वह बात दूर कर दी थी जो उन्हें लज्जित करती, और अपने पवित्र आत्मा से उन पर पहले ही छाप लगा दी थी, यहाँ तक कि वे बहुमूल्य मोतियों के समान हो गए थे, तौभी वह चाहता है कि वे अपने पूर्व जीवन पर विचार करें (जैसा कि वास्तव में है, मन फिराव के वे फल जो पवित्रशास्त्र बताता है), कि जब परमेश्वर ने हमारी ओर अपना हाथ बढ़ाया है और हमें हमारे भटकने से घर लौटा लाया है, तब भी हम अपने पिछले पापों को स्मरण करना न छोड़ें, इस प्रकार कि हम उनके कारण खेदित, लज्जित और शर्मिन्दा हों।
जहाँ वह कहता है कि अन्यजातियों के पास सिर झुकाए रखने का उचित कारण है, क्योंकि वे कभी परमेश्वर की भलाई और प्रेम के निश्चय से रहित थे, वहाँ हमें स्मरण दिलाया जाता है कि जब हमें परमेश्वर के संस्कारों का उपयोग प्राप्त होता है, तो हम परमेश्वर के हाथ से एक अनोखा लाभ पाते हैं, क्योंकि वे इस बात की प्रतिभूति हैं कि वह हमें अपने घराने और कलीसिया का जन मानकर ग्रहण करता और स्वीकार करता है। यह सच है कि यदि हम उनका दुरुपयोग करें, तो हम
उसकी भारी कीमत चुकाएँगे; परन्तु जो भी हो, जब संस्कार उसी उद्देश्य के लिए प्रयोग किए जाते हैं जिसके लिए वे ठहराए गए थे, तब निश्चय ही वे, जैसा मैंने पहले कहा, मानो अनमोल निधियाँ हैं।
क्योंकि यद्यपि हमारे पास परमेश्वर की प्रतिज्ञा है कि वह हमें हमारी माता के गर्भ से निकलते ही अपने बच्चे मानकर ग्रहण करता है, तौभी हमारे शरीर में अशुद्धता के सिवा कुछ नहीं है। अब क्या हमें बपतिस्मा मिला है?
वहाँ हमें दिखाया गया है कि परमेश्वर हमें हमारी सारी अशुद्धता से धोता और शुद्ध करता है, कि वह हमें उस उलझन से बाहर खींच लेता है जिसमें हम अपने पिता आदम के साथ पड़े थे, और कि वह चाहता है कि हम यीशु
मसीह को पहिनें, ताकि हम उसकी सारी सम्पत्ति के भागी हों, मानो वह हमारी अपनी ही हो।
तब हम देखते हैं कि बपतिस्मा का अर्थ क्या है, और इसलिए हमें परमेश्वर के इस अनुग्रह को कितना मूल्यवान समझना चाहिए कि वह इस प्रकार हमारे पास आता है, और अपने आपको इतने घरेलू ढंग से हमारा पिता दिखाता है।
प्रभु-भोज के विषय में भी इतना ही कहना चाहिए। क्योंकि वहाँ प्रत्यक्ष दिखाया जाता है कि यीशु मसीह हमारी आत्माओं का सच्चा भोजन है, कि जैसे हमारे शरीर रोटी और दाखरस से पोषित और पुष्ट होते हैं, वैसे ही हमारा आत्मिक जीवन परमेश्वर के पुत्र के सार ही से है। तब जब हमारा
प्रभु यीशु मानो हाथों-हाथ हमें दिखाता है कि वह अपनी देह और लहू हमें आत्मिक भोजन और पेय होने के लिए देता है, तो क्या यह इस संसार की सब वस्तुओं से कहीं अधिक मूल्यवान नहीं? और यहाँ हम देखते हैं कि अधिकांश मनुष्य कितने द्वेषी और हठीले हैं, क्योंकि प्रभु-भोज के विषय में बहुत-से लोग उसके पास आते हैं जो अभागे पशुओं की भाँति वहाँ टूट पड़ते हैं, यह जाने बिना कि वह किसलिए ठहराया गया था। कुछ फिर उसे केवल रीति और साधारण चलन बना लेते हैं, और यद्यपि उन्हें सिखाया गया है कि वह हमारे किस काम का है, तौभी वे उस पर मुँह बिचकाते हैं, और जब वह बीत जाता है तो उनके लिए सब एक-सा हो जाता है।
और कुछ अन्य उसे जान-बूझकर अशुद्ध करते हैं। और बपतिस्मा के विषय में हम देखते हैं कि संसार का क्या हाल है। क्योंकि जबकि हमें प्रतिदिन, और दिन में केवल एक बार नहीं पर घड़ी-घड़ी, बपतिस्मा और प्रभु-भोज दोनों पर विचार करना चाहिए, ताकि हम परमेश्वर के अनुग्रह में और भी दृढ़ हों, तब भी कोई मनुष्य उस ओर इतना कम मन लगाता है,
कि यदि कलीसिया में बपतिस्मा दिया जाए, तो लोग उसे कुछ नहीं गिनते। सौ में से मुश्किल से एक मिलेगा जो ठीक-ठीक बता सके कि हमारे लेपालकपन का वह चिह्न क्या सूचित करता है। फिर भी तुम देखते हो कि उस अज्ञानता के साथ कितनी अवज्ञा जुड़ी हुई है। क्या परमेश्वर को, हमारे प्रति अपनी इतनी सहनशीलता और हमारी प्रतीक्षा में अपने धीरज के पश्चात्, ऐसे अनादर का बदला न लेना चाहिए, जब उसके अनुग्रह को हमारे बीच इतना हल्का समझा जाता है? इसलिए यह हमारे लिए और भी आवश्यक है कि हम ध्यान से देखें कि पौलुस यहाँ हमें क्या बताता है, जब वह कहता है कि अन्यजाति, उन संस्कारों से वंचित होकर जो परमेश्वर अपने बच्चों को अपनी भलाई और प्रेम की प्रतिभूति के लिए देता है, दयनीय दशा में हैं, ताकि हम उस विशेषाधिकार को मूल्यवान जानना सीखें जो उसने हमें दिया है, न कि उस पर मूर्खता से घमण्ड करें, जैसे कपटी लोग करते हैं जो निरन्तर परमेश्वर के नाम का दुरुपयोग करते हैं, पर इतनी बड़ी कीमत और मूल्य की वस्तु से हम सचमुच लाभ उठाएँ, और यह जानें कि हम उन लोगों से तनिक भी अच्छे नहीं हैं जो भूख से मरती दीन आत्माओं के समान हैं, जिनके विरुद्ध परमेश्वर अब भी द्वार बन्द रखता है, और जिन्हें वह अपनी उन प्रतिभूतियों में भागी होने के योग्य नहीं ठहराता, जिनमें वह प्रकट और साक्षी करता है कि वह हमारा पिता होगा। तुम देखते हो कि तुर्कों में भी यहूदियों की तरह खतना है, तौभी उसका कुछ मूल्य नहीं, क्योंकि उसके साथ परमेश्वर की कोई प्रतिज्ञा नहीं रही, और फिर भी हम उन्हीं के समान आदम की सन्तान हैं। हमें बपतिस्मा क्यों मिला है, इसके सिवा कि
परमेश्वर चाहता था कि वह हम पर और भी दयालु ठहरे और अपनी भलाई के धन को प्रकट करे? फिर, पोप के अनुयायी मसीही कहलाना चाहते हैं, और हमारी ही तरह उनके पास बपतिस्मा है। और तो भी इसी बीच वे पवित्र भोज से वंचित हैं, वरन् उनके पास घृणित मिस्सा है, जिसमें वे हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग का इन्कार करते हैं। और इसका क्या कारण है कि हमें उनसे बढ़कर ठहराया जाए, इसके सिवा कि परमेश्वर हमें अपनी असीम दया के दर्पण बनाना चाहता था? इसलिए हमारे लिए और भी आवश्यक है कि हम भय और सावधानी से चलें, और उन बातों को मूल्यवान जानें जिन्हें परमेश्वर हमें इतनी योग्यता और श्रेष्ठता की दिखाता है, ताकि हम उनसे लाभ उठाएँ। इसलिए इसे एक विशेष बात जानकर ध्यान में रखो
पौलुस जब यहाँ खतने और बिन खतने की बात करता है, तब इसी बात पर ध्यान देना चाहिए। क्योंकि यद्यपि वह और स्थानों में कहता है कि खतना कुछ नहीं है (परन्तु यह इसलिए कि वह मिटा दिया गया और व्यवस्था की अन्य सब प्रतीकों के समान उसका प्रयोग समाप्त हो गया), तथापि जिस समय परमेश्वर ने उसे ठहराया था, और जब तक यहूदी उसे पवित्रता से मानते रहे, तब तक वह उनके लिए परमेश्वर के लेपालकपन की पक्की प्रतिज्ञा थी, मानो उसने उन्हें आदम की सन्तानों में पाई जानेवाली सारी मलिनता से शुद्ध करके अपना निज बना लिया हो।
यह कहने के बाद वह आगे कहता है कि वे मसीह से रहित और प्रतिज्ञाओं से रहित थे। यहाँ वह दिखाता है कि संस्कार अपना बल परमेश्वर के वचन से लेते और पाते हैं। क्योंकि यदि केवल नंगे चिह्न ही होते, तो कोई बड़ी बात न होती। यदि खतना यहूदियों को बिना किसी सिद्धान्त या शिक्षा के दिया जाता, तो उससे क्या लाभ होता? निश्चय ही उन्हें उससे कुछ भी भलाई न होती। परन्तु जब परमेश्वर कहता है, “मैं वह परमेश्वर हूँ जो तुम्हें पवित्र करता है, तुम मेरी सन्तान होगे, मैं तुम्हें ग्रहण करूँगा और तुम्हें अपना निज भाग बना लूँगा; और दूसरी ओर मैं अपने आप को भी तुम्हें देता हूँ, और तुम्हारा जीवन ठहरूँगा,” तो जब खतने के साथ ऐसी प्रतिज्ञाएँ थीं, तब वह यहूदियों के लिए अनमोल निधि था, क्योंकि नींव (अर्थात् हमारा प्रभु यीशु मसीह) दृढ़ता से डाली गई थी, जिस पर प्रतिज्ञाएँ स्थापित और, जैसा कि कहा जा सकता है, पक्की की गई थीं।
इसी कारण पौलुस यहाँ इस्राएल की प्रजा के अधिकार, परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं के साधनों और हमारे प्रभु यीशु
मसीह को एक साथ जोड़ता है।
तथापि, इस्राएल की प्रजा के अधिकार की बात करके वह दिखाता है कि परमेश्वर ने एक निश्चित वंश को चुना था जिसे वह पवित्र ठहराना चाहता था, और इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि बाकी सब अपवित्र थे। प्रतिज्ञाओं के साधनों की बात करके वह दिखाता है (जैसा मैं पहले छू चुका हूँ) कि हमें खतने को अपने आप में नहीं देखना चाहिए, वरन उसे उसके सच्चे उद्देश्य की ओर मोड़ना चाहिए। हमें यह जानना आवश्यक है कि
परमेश्वर ने उसे यहूदियों में क्यों चलाना चाहा, नहीं तो वह बन्दर का खिलौना मात्र है, उन अनेक मूर्खतापूर्ण भक्ति-क्रियाओं के समान जो अन्यजातियों के पास थीं, जिनसे वे पवित्रता पाने की आशा करते थे, परन्तु वह सब केवल दुरुपयोग और छल था क्योंकि उनके पास परमेश्वर की कोई प्रतिज्ञा न थी। इसी प्रकार आजकल पोप-तन्त्र में वे कहते हैं कि उनके पास बहुत से संस्कार हैं, और उनके साथ जितने हो सकें उतने स्वांग और खिलौने हैं, परन्तु परमेश्वर उस सब को अस्वीकार करता है; वह केवल तुच्छ कूड़ा है। और क्यों? क्योंकि उन्हें पवित्र करनेवाला कोई वचन नहीं है।
इसलिए आओ, हम भली भाँति ध्यान दें कि संस्कारों से लाभ उठाने के लिए हमें उनके विषय में सदा परमेश्वर के सिद्धान्त से शिक्षा पानी चाहिए। और इससे हम समझ सकते हैं कि बहुत से लोग जो अब कलीसिया में सबसे ऊँचे माने जाते हैं, वे परमेश्वर की कलीसिया से कटे हुए हैं। क्योंकि इस बीच वह शिक्षा कहाँ है जो उन्हें उन लाभों का भागी बनाने के लिए चाहिए जो परमेश्वर उन्हें देता है? वे अपने बपतिस्मा का हवाला देंगे, और कहेंगे कि वे प्रभु-भोज लेते हैं। यदि कोई उनसे पूछे कि किस उद्देश्य से, तो वे कुछ भी नहीं समझते, और यह संस्कारों की सामर्थ्य को पूरी तरह मिटा देना है। इसलिए हमारे लिए और भी आवश्यक है कि इस बात पर लौटें, अर्थात् सुसमाचार से यह सीखें कि बपतिस्मा किस उद्देश्य से ठहराया गया, वह हमें क्या फल देता है, और उसका सही और वैध प्रयोग क्या है, और यह भी विचार करें कि पवित्र भोज से हमें क्या लाभ है। क्योंकि यदि हमारे पास परमेश्वर का वचन नहीं है, तो हमारा प्रभु स्वयं हमें बताता है कि जो संस्कार हम ग्रहण करते हैं वे मानो मूल्यहीन हो जाते हैं, और उनमें झूठ के सिवा कुछ नहीं रहता। और जैसे यदि कोई राजकुमार की मुहर ऐसे पत्र पर लगा दे जिसमें कुछ लिखा न हो, या जिसमें केवल कल्पनाएँ और स्वप्न गढ़े गए हों, तो यह मृत्युदण्ड के योग्य अपराध होगा: वैसे ही, क्योंकि संस्कार हमारे लिए परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं की गारंटी देनेवाली मुहरों के समान हैं और उन्हें हमारे बीच अधिकार देते हैं, यदि हम उन्हें उसके वचन से अलग करें, तो निश्चय है कि हम परमेश्वर और उसके स्वर्गदूतों के सामने जालसाज़ ठहरते हैं। इसलिए इस प्रसंग में यह एक और बात है जिस पर हमें ध्यान देना है।
और हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि यीशु मसीह को इस्राएल की प्रजा के अधिकार, संस्कारों और प्रतिज्ञाओं के साथ रखा गया है, यह दिखाने के लिए कि वही है जिस पर हम सब निर्भर हैं। क्योंकि यह निश्चित है कि परमेश्वर कभी मनुष्यों के पास मध्यस्थ के बिना नहीं आता। क्योंकि वह अधर्म से घृणा करता है, और सब मनुष्य आदम में श्रापित हैं, इसलिए आवश्यक था कि हमारा प्रभु यीशु मसीह बीच में आए, ताकि हमारे लिए परमेश्वर तक कोई पहुँच और प्रवेश हो। और इसी कारण पौलुस यह भी कहता है कि वह परमेश्वर की सब प्रतिज्ञाओं की “हाँ” और “आमीन” है।
क्योंकि यीशु मसीह के बिना परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं की कभी कोई निश्चयता न होगी। और इसी कारण व्यवस्था में सब वस्तुएँ लहू से समर्पित की गईं, हाँ, यहाँ तक कि व्यवस्था की पुस्तक भी। जब वाचा सबके सामने पढ़ी गई, और लोगों में गम्भीरता से सुनाई गई, तब पुस्तक पर बलिदान का लहू छिड़का गया, यह दिखाने के लिए कि व्यवस्था में समाया सारा सिद्धान्त, और वे सब प्रतिज्ञाएँ जिनके द्वारा
परमेश्वर उन्हें अपनी सन्तान बनाता है जिन्हें उसने अपनी कलीसिया में स्वीकार किया है, हमारे प्रभु यीशु मसीह के लहू से पक्की की जानी चाहिए। तो क्या हम चाहते हैं कि प्रतिज्ञाएँ निश्चित और अचूक हों? क्या हम उनके विषय में निश्चय पाना चाहते हैं ताकि हम स्वतन्त्रता से परमेश्वर को पुकार सकें और सब परीक्षाओं से लड़ सकें? तो हमें सदा यीशु मसीह की ओर लौटना चाहिए। यह बड़ी बात है कि परमेश्वर अपने पवित्र मुख से हमें बताता है कि वह हमें अपने लिए रख छोड़ेगा, तथापि जब तक हम अपनी आँखें अपने प्रभु यीशु मसीह पर न लगाएँ और यह न जानें कि परमेश्वर उसके कारण हमसे प्रसन्न है, जिससे हमारे पाप गाड़ दिए गए हैं और कभी लेखे में न आएँगे, तब तक हमें उसकी महिमा के सामने निरन्तर काँपते रहना चाहिए। इस प्रकार तुम देखते हो कि प्रतिज्ञाएँ, संस्कार और जो कुछ हमारे पास है, सब यीशु मसीह के द्वारा पक्का किया जाना चाहिए। संक्षेप में (यदि मैं मनुष्यों की तुलना करूँ और साधारण भाषा में कहूँ) वही सच्चा मसाला है जो हमारे उद्धार से सम्बन्ध रखनेवाली सब वस्तुओं को स्वादिष्ट बनाता है। क्योंकि उसके बिना हम सदा मूर्छित मनुष्यों के समान पड़े रहते, और (जैसा मैं कह चुका हूँ) हम कोई आशा नहीं बाँध सकते, न हमारे मन ऐसे स्थिर हो सकते कि हम शरण के लिए परमेश्वर की ओर जा सकें।
इसलिए पौलुस का यह कहना अकारण नहीं है कि जिनके पास
न खतना, न और कोई संस्कार जिनके द्वारा हम परमेश्वर के लिये पवित्र ठहराए जाते हैं, और न उद्धार की कोई प्रतिज्ञा मसीह के बिना है।
और अब वह एक ऐसी बात जोड़ता है जो पहली दृष्टि में कठिन और अनोखी लग सकती है, जब वह कहता है कि इफिसियों के लोग परमेश्वर के बिना थे। क्योंकि यह निश्चित है कि यद्यपि वे अभागे मूर्तिपूजक थे, तौभी उनकी यह एक धारणा तो थी कि संसार अपने आप नहीं बना। क्योंकि हम जानते हैं कि सब मनुष्यों में धर्म का कोई न कोई बीज सदा बना रहा है, और वे भी जो अपनी सीमा लाँघकर परमेश्वर के सारे ज्ञान को मिटा डालने तक पहुँच जाते हैं, पहले तो अत्यन्त घिनौने राक्षस हैं। दूसरे, चाहे वे परमेश्वर के सारे ज्ञान को पैरों तले रौंदने का कितना ही यत्न करें, तौभी उन्हें हृदय की ऐसी धड़कनें सहनी ही पड़ती हैं जो उनके न चाहने पर भी उन्हें चुभती हैं, और वे यह अनुभव करने पर विवश होते हैं कि वे परमेश्वर के हाथ से बच नहीं सकते।
बात जैसी भी हो, हम स्वभाव से ही यह जानने की ओर झुके हैं कि परमेश्वर है। और अन्यजातियों के पास भी सदा अपनी भक्ति और अपनी तथाकथित ईश्वरीय आराधना रही है, जिससे प्रकट होता है कि वे किसी ईश्वरत्व की आराधना करते थे। तब पौलुस यहाँ कैसे कहता है कि वे परमेश्वर के बिना थे? हमें ध्यान देना चाहिए कि मनुष्यों के लिये इतना ही काफ़ी नहीं कि वे मान लें कि कोई न कोई ईश्वरत्व है, और किसी परमेश्वर की सेवा करके अपना कर्तव्य निभाने का यत्न करें, परन्तु उनमें एक निश्चित और दृढ़ विश्वास भी होना चाहिए, ताकि वे इधर-उधर भटकते न फिरें, जैसा रोमियों की पत्री के पहले अध्याय में कहा गया है, जहाँ लिखा है कि जो लोग परमेश्वर के अनोखे रूप गढ़ते हैं वे अपनी ही मूर्खतापूर्ण कल्पनाओं में लुप्त हो जाते हैं। अब यह निश्चित है कि जो परमेश्वर के वचन से, व्यवस्था से, भविष्यद्वक्ताओं से और सुसमाचार से शिक्षा नहीं पाते, वे सही मार्ग से बाहर हैं, और एक प्रकार से अपनी बुद्धि की सीमा पर खड़े हैं, यहाँ तक कि वे डगमगाते नरकटों के समान इधर-उधर डोलते रहते हैं जो हर हवा के आगे झुक जाते हैं, और इसी से परमेश्वर के नाना रूप गढ़ लेते हैं। क्योंकि हर मनुष्य अपने ही मन में टेढ़ी-मेढ़ी धारणाएँ गढ़ता और रचता है, और हम जानते हैं कि मनुष्य की बुद्धि मूर्तिपूजा और अन्धविश्वास की एक कार्यशाला है, यहाँ तक कि यदि कोई मनुष्य अपनी ही कल्पना का विश्वास करे, तो निश्चित है कि वह
परमेश्वर को छोड़ देगा और अपने ही मन में कोई मूर्ति गढ़ लेगा। देखो, हम कैसे हैं।
और यह भली-भाँति कहा जा सकता है कि जब हम अपनी ही कल्पनाओं और अपनी झूठी धारणाओं में इस प्रकार भटकते फिरते हैं, तब हम परमेश्वर के बिना हैं। और इसी कारण पौलुस कहता है कि जिन्होंने किसी अनजाने देवता की आराधना करनी चाही, उन्होंने मूर्तियों और काल्पनिक धारणाओं के सिवा किसी की आराधना नहीं की, और परमेश्वर का उनसे कोई सम्बन्ध नहीं, और इसलिये वे उसके द्वारा पूरी तरह त्यागे हुए थे, मानो वे पहले ही उससे फिर गए हों और उसे त्याग चुके हों। इसलिये हमें और भी अधिक चाहिए कि हम परिश्रम और यत्न करें कि जान लें वह कौन सा परमेश्वर है जिसकी आराधना हमें करनी चाहिए।
मैं तुम्हें पहले ही बता चुका हूँ कि किसी मनुष्य के लिये यह कह देना काफ़ी नहीं कि उसका आशय भला था और उसका मतलब परमेश्वर की आराधना करना था। यह किसी काम का नहीं, क्योंकि परमेश्वर को वह छूट पसन्द नहीं जो मनुष्य इस या उस बात पर विश्वास कर लेने के लिये अपने आप को देते हैं। जब ऐसा है, तो हमें पूरी सावधानी से परमेश्वर के सामने उपस्थित होना चाहिए, कि वह हमें अपने पास आने का मार्ग दिखाए। नहीं तो हम भटक ही जाएँगे, और जो सबसे तेज़ दौड़ेगा वह उससे सबसे दूर होगा, वरन् अन्त में अपनी गर्दन तोड़ बैठेगा। देखो, हम किस दशा में हैं, जब तक परमेश्वर अपना हाथ हमारी ओर न बढ़ाए और हमें सही मार्ग पर न लगाए, ताकि हम अपने जीवन भर बेचारे भटकते पशुओं के समान न रहें।
फिर, क्योंकि उसने पवित्रशास्त्र में अपनी महिमा का एक अभिलेख हमें दिया है, इसलिये हमें उसी में सीमित रहना चाहिए और ऐसी किसी बात को जानने का लालच न करना चाहिए जो वहाँ हमें नहीं दिखाई गई। तो फिर परमेश्वर को जानने के लिये हमारा ध्रुवतारा क्या हो? यह कि हम अपने आप को उसके वचन से सिखाए जाने दें, और इतने विवेकी हों कि जो कुछ वहाँ लिखा है उसे बिना विरोध के ग्रहण करें और उसमें कुछ भी जोड़ने का साहस न करें। और हमें यह सावधानी और भी अधिक रखनी चाहिए, क्योंकि हम जानते हैं कि यूहन्ना कैसे घोषणा करता है कि जिसके पास पुत्र नहीं, उसके पास पिता भी नहीं। तो जैसा मैं तुम्हें बता चुका हूँ कि क्योंकि परमेश्वर
इसी वचन में अपने आप को प्रकट करता है, इसलिये हमें उसे वहीं खोजना चाहिए; वैसे ही क्योंकि हमारा प्रभु यीशु मसीह उसका जीवित स्वरूप है, इसलिये हम यह जानने के लिये कि परमेश्वर क्या है, अति ऊँचे तर्क-वितर्कों में न पड़ें, परन्तु यीशु मसीह के पास जाएँ, यह मानते हुए कि हमें परमेश्वर पिता तक पहुँचाना उसी का कार्य है, और यह कि हमें उसी के द्वारा चलाया जाना चाहिए, और तब हम निश्चित होंगे कि इस संसार में हम परमेश्वर के बिना नहीं होंगे।
अब यदि वे लोग जो इतना परिश्रम करते हैं और परमेश्वर की सेवा करने के लिये इधर-उधर दौड़ते फिरते हैं, यहाँ इसलिये दोषी ठहराए जाते हैं कि वे परमेश्वर के बिना थे, क्योंकि उन्होंने सच्चा नियम नहीं थामा, परन्तु अपने अन्धविश्वासों में छले गए: तो उन कुत्तों और सूअरों का क्या होगा जिन्हें परमेश्वर का कोई भय ही नहीं, विशेषकर इसलिये कि पवित्रशास्त्र से अपने कान गुँजवाकर सत्य की कुछ समझ पा लेने के बाद भी वे अपने आप को सारे ज्ञान से वंचित कर लेते और पशु बन जाते हैं? ऐसे लोगों की एक बड़ी संख्या हम आजकल देखते हैं, जो अवसर का लाभ उठाकर और अपनी इच्छा से मौज उड़ाने के लिये, उस ज्योति को बुझा देने या धुँधला कर देने पर उतारू हैं जो परमेश्वर ने उन पर चमकाई थी, यहाँ तक कि परमेश्वर की महिमा को खुली चुनौती देने तक, मानो अब कोई शिक्षा रही ही नहीं।
हम देखते हैं कि यह शापित बीज आज सारे संसार में कैसे बिखरा हुआ है। परन्तु (जैसा मैंने पहले कहा) यदि वे बेचारे अज्ञानी, जिनके पास कभी कोई निश्चित मार्ग नहीं था, परन्तु अन्धे अभागों के समान परमेश्वर को खोजते इधर-उधर भटकते रहे, और उसने अपने आप को उन पर प्रकट नहीं किया, उनके पास कोई बहाना नहीं, वरन् परमेश्वर के हाथ से दोषी ठहराए गए क्योंकि उनके पास सच्ची जड़ नहीं थी, तो उन अभागों का क्या होगा जो परमेश्वर को इस प्रकार तुच्छ जानते हैं, और उसके विरोध में खड़े होकर कहते हैं, हम नहीं जानते कि सच्चे सिद्धान्त और धर्म का क्या अर्थ है। इसलिये हमें और भी अधिक अपने आप को दीन करना और यह जानना चाहिए कि परमेश्वर ने अपने आप को हम पर प्रकट किया है, अब जबकि वह एक अटूट बन्धन से हमारे साथ जुड़ गया है, और अपने आप को हमारा पिता दिखाया है, और हमें अपने प्रभु यीशु मसीह की देह के अंग बनाने की कृपा की है, और हमें उसके साथ एक किया है, इस शर्त पर कि
कि जो कुछ उसका है वह अब हमारा है: हमें चाहिए कि हम उस अनुग्रह की बड़ाई करना सीखें, और यह स्वीकार करें कि हम क्या थे, और यदि परमेश्वर ने हम पर दया न की होती तो हम अब भी क्या होते।
इस पर कोई यह पूछ सकता है कि पौलुस "संसार" शब्द से क्या समझाना चाहता था: क्योंकि ऐसा प्रतीत होगा कि संसार में रहते हुए भी वे परमेश्वर के बिना नहीं थे। फिर भी यह कहकर उसने बात को और भी गम्भीर बना दिया कि इफिसियों ने सूर्य का प्रकाश पाया था, सारे तत्वों ने उनकी सेवा की थी, और परमेश्वर की देन से उन्होंने उसकी सब सृष्टि में इतनी सुख-सुविधाएँ पाई थीं, फिर भी उन्होंने उसे नहीं जाना। क्योंकि संसार और क्या है, सिवाय एक खुले रंगमंच के, जिस पर परमेश्वर अपनी महिमा को प्रकट करना चाहता है? आओ, हम अपनी आँखें उठाएँ: क्या सूर्य, चन्द्रमा और तारे हमें उसकी ओर नहीं ले जाते जिसने उन्हें वे गुण दिए जो हम उनमें देखते हैं? क्योंकि देखो, सूर्य हमसे बहुत दूर है, फिर भी वह हमें प्रकाश देता है। फिर वह पृथ्वी से फल उपजवाता है, और हम उसकी दोहरी गति भी देखते हैं: और यद्यपि वह कभी एक ओर तो कभी दूसरी ओर भटकता प्रतीत होता है, तो भी वह अपनी परिधि को निरन्तर बनाए रखता है, और इतना विशाल पिण्ड होने पर भी वह कभी नहीं भूलता कि उसे एक ओर या दूसरी ओर कितनी दूर तक जाना है। यदि कोई गेंद या गोला ऊपर टिकाए रखना हो तो उसे किसी सहारे की आवश्यकता पड़ेगी: परन्तु देखो, सूर्य को थामने के लिए परमेश्वर की गुप्त सामर्थ्य के सिवाय और कुछ नहीं है: फिर भी वह इतना विशाल और अपार पिण्ड है कि सारी पृथ्वी से बढ़कर है। वह ऊपर चढ़े या नीचे उतरे, इधर मुड़े या उधर लौटे: तो भी वह प्रतिदिन सारे संसार में अपनी राह पर चलता रहता है, और प्रतिवर्ष विपरीत दिशा में भी, और इन सब बातों में उससे कभी चूक नहीं होती।
संक्षेप में, जब हम आकाश को निहारते हैं, तब हमें परमेश्वर के पास जाने की लालसा से विभोर हो जाना चाहिए। फिर, जब हम उन वस्तुओं को देखते हैं जो हमारे अधिक निकट हैं, अर्थात् उन भली वस्तुओं की विविधता जो परमेश्वर हमें देता है, तब भी हमारे पास वैसा ही करने का कारण है। अन्त में, और आगे जाए बिना,
आओ हम अपने ही भीतर झाँकें। यदि कोई मनुष्य अपनी एक ही उँगली को देखे, तो उसमें परमेश्वर की कैसी कारीगरी और कैसी भलाई है!
तो हम उस संसार में हैं जहाँ परमेश्वर इतने चमत्कार प्रकट करता है, जिनके द्वारा उसका अभिप्राय है कि वह जाना जाए और उसकी आराधना की जाए: फिर भी हम पशुओं के समान व्यवहार करते हैं, और बिना किसी समझ के मूर्खों की भाँति चलते रहते हैं, उस परमेश्वर को नहीं जानते जिसने हमें बनाया और गढ़ा, वही जो अपनी सब सृष्टि में, ऊपर भी और नीचे भी, अपने आप को प्रकट करता और दिखाता है। तो क्या यह उन लोगों को निरुत्तर करने के लिए पर्याप्त नहीं, जो अपनी अज्ञानता में पशुओं के समान बर्ताव करते हैं, जो यहाँ केवल परमेश्वर की भलाइयों को चट कर जाने के लिए जीते हैं, और इस बीच उसका आदर करने या उसकी सेवा अर्पित करने के लिए उसके पास नहीं लौटते?
तब यह बिना कारण नहीं है कि पौलुस आगे यह भी जोड़ता है कि जो लोग सुसमाचार के ज्ञान से ऐसे वंचित थे, वे जगत में परमेश्वर से रहित थे।
अब इसी पर, दूसरी ओर, वह परमेश्वर के उस अनुग्रह को सामने रखता है जो उन्होंने पाया था, ताकि वे जानें कि वह उनकी अपनी कमाई नहीं, और न उनकी अपनी युक्ति या सामर्थ्य से प्राप्त हुआ, परन्तु उन्हें भली-भाँति सोचना चाहिए कि वे कितने अधिक ऋणी हैं
परमेश्वर के, जिसने उन्हें नरक के गहरे अन्धकूपों से उठाकर स्वर्ग तक पहुँचाया। यदि परमेश्वर ने हमें तब केवल अपना हाथ बढ़ाकर उठाया होता जब हम भूमि पर ही गिरे थे, और फिर हमें हमारी उसी दशा में छोड़ दिया होता, तो भी हम उसके ऋणी होते। क्योंकि जब हम गिर पड़ते हैं और कोई हमें फिर से उठाता है, तो हम उसका धन्यवाद करते हैं, और हमें करना भी चाहिए। अब देखो, परमेश्वर ने हमें केवल भूमि से ही नहीं उठाया, वरन् नरक की खाई में से भी खींच निकाला। और उसका ऐसा करना इसलिए नहीं कि हम यहाँ नीचे पृथ्वी पर रेंगते रहें, या उन भलाइयों का आनन्द लेते रहें जो वह हमें अभी यहाँ देता है: परन्तु इसलिए कि हमें स्वर्ग के राज्य तक पहुँचाए, जैसा कि हम पहले देख चुके हैं कि हम विश्वास के द्वारा उसके अधिकारी हो चुके हैं, और यीशु मसीह में उस महिमा में बैठाए गए हैं जो उसने हमारे लिए मोल ली है, क्योंकि वह हमारी ओर से उसमें प्रवेश कर चुका है। जब ऐसा है, तो क्या हमारे पास परमेश्वर के अनुग्रह की और भी अधिक बड़ाई करने का कारण नहीं है?
तो पौलुस के कथन का आशय तुम्हारे सामने है, जब वह कहता है कि अब यीशु मसीह के द्वारा तुम परमेश्वर के निकट हो गए हो, हाँ तुम (वह कहता है) जो पहले दूर थे। इसलिए संक्षेप में (क्योंकि इस समय सारी बात को खोलकर नहीं रखा जा सकता) हम यह समझ लें कि चाहे मनुष्यों में अपने भीतर कुछ योग्यता दिखाई देती हो, फिर भी जब तक वे परमेश्वर से अलग हैं, वे अपने ही विनाश की ओर भटके बिना नहीं रह सकते, क्योंकि स्वभाव से वे उसके लिए अजनबी हैं, वरन् उससे पूरी तरह कटे हुए हैं।
इसके अतिरिक्त, हम में से हर एक अपने विषय में जान ले कि हम परमेश्वर को कैसे भूल गए थे, और उससे पूरी तरह फिर गए थे, जब तक कि उसने हमें फिर अपने पास नहीं बुलाया। जब हम यह जान लें, तो आओ हम उसके अनुग्रह की बड़ाई करना सीखें कि उसने हमें अपने साथ मिलाने की कृपा की, और उस सारी शत्रुता को दूर कर दिया जो उसके और हमारे बीच थी, और अपने प्राणघातक शत्रुओं को अपनी सन्तान बना लिया, और यह मानकर चलें कि यह सब हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हुआ है, ताकि हम उसी सोते से वह सब खींच लें जो हमारे उद्धार से सम्बन्ध रखता है। और फिर इस पर भी विचार करें कि जो सहायताएँ परमेश्वर ने हमें दी हैं, जिनके द्वारा हम यीशु मसीह के पास आएँ और उसमें दृढ़ किए जाएँ, उनसे हमें कितना लाभ मिलता है, ताकि हमारा सिद्धान्त दृढ़ और निश्चित हो। उदाहरण के लिए, जब प्रतिदिन हमें सुसमाचार सुनाया जाता है, तो वहाँ यीशु मसीह हमारे सामने प्रस्तुत किया जाता है, और वह अपनी ओर से हमें अपने पास बुलाता है। संक्षेप में, उसकी बाहें हमें गले लगाने के लिए फैली हुई हैं। हम इसे समझें: और तब उसमें संस्कारों को भी जोड़ें, और यह देखते हुए कि यीशु
मसीह ने न केवल सुसमाचार के खुले प्रचार की आज्ञा दी है, जिसमें वह अपने आप को हमारा चरवाहा दिखाता है और चाहता है कि हम उसके झुण्ड हों, वरन् बपतिस्मा के द्वारा, और अपने अन्तिम
भोज के द्वारा भी इसी बात को पक्का करता है: आओ हम ध्यान रखें कि हम अपनी ही दुष्टता और कृतघ्नता से उन चिह्नों को निष्फल न कर दें: वरन्
(बल्कि) विचार करें कि परमेश्वर ने उन्हें किस उद्देश्य से ठहराया है, और हम उनका ऐसा उपयोग करें कि विश्वास में उत्तरोत्तर बढ़ते जाएँ, और उसके द्वारा ऐसी धुन से भर उठें कि हम अपने आप को समर्पित करने का यत्न करें
