16 में से अध्याय 3

पहले अध्याय पर दूसरा उपदेश - इफिसियों 1:3-4

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पहले अध्याय पर दूसरा उपदेश - इफिसियों 1:3-4

पहले अध्याय पर दूसरा उपदेश: हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्वर और पिता का धन्यवाद हो, कि उसने हमें मसीह में स्वर्गीय स्थानों में सब प्रकार की आशीष दी है: जैसा उसने हमें जगत की उत्पत्ति से पहले उसमें चुन लिया, कि हम उसके निकट प्रेम में पवित्र और निर्दोष हों। - इफिसियों 1:3-4

हम पहले देख चुके हैं कि पौलुस ने किस प्रकार हमें परमेश्वर की स्तुति और धन्यवाद करने का आग्रह दिया, क्योंकि उसने हमें आशीष दी है, और वह भी सांसारिक रीति से नहीं, परन्तु आत्मिक रीति से, ताकि हम यह सीखें कि हम परमेश्वर के उस पितृ-तुल्य भलाई और प्रेम के प्रदर्शन से सन्तुष्ट रहें जो उसने आशा के द्वारा हमारे लिए स्वर्ग के राज्य का द्वार खोलकर हम पर दिखाया है। यहाँ तक कि यद्यपि हम इस संसार में बहुत दुःखों के अधीन हैं, तौभी यह उचित है कि हम परमेश्वर के इस प्रकार हमें चुनने से और हमें अपने पास बुलाने से सन्तुष्ट रहें, जैसा सुसमाचार के द्वारा हमें गवाही दी गई है कि वह हमारा पिता है, इसलिए कि उसने हमें अपने प्रभु यीशु मसीह से ऐसे जोड़ लिया है जैसे अंग अपने सिर से जुड़े होते हैं।

और अब पौलुस हमें उस मूल और सोते के पास, या यों कहें कि उस मुख्य कारण के पास ले आता है जिसके कारण परमेश्वर ने हमें अपने अनुग्रह में ग्रहण किया। क्योंकि यह पर्याप्त नहीं कि परमेश्वर ने अपनी भलाई और दया के भण्डार हम पर उँडेल दिए, कि सुसमाचार के द्वारा हमें स्वर्गीय जीवन की आशा की ओर खींचे; और फिर भी यह बहुत बड़ी बात है। क्योंकि यदि पौलुस वह न जोड़ता जो हम अभी देखते हैं, तो यह समझा जा सकता था कि परमेश्वर का अनुग्रह सब मनुष्यों के लिए साधारण है, और वह उसे बिना किसी अपवाद के सब को देता है, और इसलिए उसे ग्रहण करना हर मनुष्य के अपने सामर्थ्य में उसकी अपनी स्वतंत्र इच्छा से है, जिसके कारण हम में कुछ योग्यता ठहरती।

क्योंकि यदि मनुष्यों में कोई भेद न होता, परन्तु कुछ परमेश्वर के अनुग्रह को पाते और कुछ नहीं पाते, तो और क्या कहा जा सकता, सिवाय इसके कि परमेश्वर ने समस्त मानव जाति पर अपनी कृपा दिखाई है? परन्तु जो लोग प्रभु के सहभागी हैं,

यीशु मसीह के, वे विश्वास के द्वारा उस तक पहुँचते हैं। और इस प्रकार तुम देखते हो कि इसके विषय में क्या समझा जा सकता था। परन्तु पौलुस, मनुष्य की ओर से सब योग्यता को अलग करने के लिए और यह दिखाने के लिए कि सब कुछ परमेश्वर की केवल सेंत-मेंत दी हुई भलाई से आता है, कहता है कि उसने हमें अपने पहले से चुनने के अनुसार आशीष दी है। मानो वह कहता है कि परमेश्वर के अनुग्रह को वैसा ऊँचा करने के लिए जैसा हमें उचित है, हमें उस भेद को देखना चाहिए जो मनुष्य और मनुष्य के बीच रखा गया है। क्योंकि सुसमाचार कुछ लोगों को सुनाया जाता है और दूसरे नहीं जानते कि वह क्या है, परन्तु उससे बिलकुल बाहर रखे गए हैं, मानो परमेश्वर एक प्रदेश में मेंह बरसाए और दूसरे प्रदेश को सूखा रहने दे।

अब, यदि यह पूछा जाए कि परमेश्वर एक भाग पर क्यों कृपा करता है और दूसरे को क्यों छोड़ देता और त्याग देता है, तो इसके सिवाय कोई उत्तर नहीं कि उसे ऐसा ही अच्छा लगा

। किसी स्थान में सुसमाचार के प्रचार पर कुछ लोगों के हृदय जीवते विश्वास से छू जाएँगे, और कुछ जैसे आए थे वैसे ही चले जाएँगे, बिना किसी लाभ के, या फिर वे परमेश्वर के विरुद्ध अपने आप को कठोर कर लेंगे और वह हठ प्रकट कर देंगे जो उनमें पहले से छिपा था। ऐसा भेद कहाँ से आता है? इसी से, कि परमेश्वर एक भाग को अपने पवित्र आत्मा के द्वारा सुधारता है और दूसरे को उनकी स्वाभाविक भ्रष्टता में खोया हुआ छोड़ देता है।

तो तुम देखते हो कि जिस बात में परमेश्वर की भलाई हम पर सबसे अधिक प्रकाशित होती है वह यह है कि हमें सुसमाचार का प्रचार सुनाए जाने से मानो हमें एक चिह्न मिलता है कि वह हम पर तरस खाता है, हम से प्रेम करता है, हमें बुलाता है, और हमें अपनी ओर आकर्षित करता है। परन्तु जब हमें सुनाया गया सिद्धान्त हम हृदय से और प्रभावशाली रीति से ग्रहण करते हैं, तब यह और भी बड़ा और विशेष चिह्न है जिससे हम जान लेते हैं कि परमेश्वर हमारा पिता होना चाहता था और उसने हमें अपनी सन्तान होने के लिए गोद लिया है। इसलिए बिना कारण नहीं है कि पौलुस इस प्रसंग में कहता है कि हम परमेश्वर से आशीषित हैं, अर्थात् उसके हमें पहले से चुनने के अनुसार। क्योंकि हम अपने आप से उसके पास नहीं आए,

और न हमने अपने आप से उसे खोजा। परन्तु भविष्यद्वक्ता यशायाह का वचन सब में पूरा होना अवश्य है, अर्थात् कि परमेश्वर ने अपने आप को उन पर प्रकट किया जिन्होंने उसे नहीं खोजा, और जो दूर थे उन्होंने उसे निकट देखा। और वह उनसे कहता है, "देखो, मैं यहाँ हूँ, मैं यहाँ हूँ, यद्यपि तुमने मुझे तुच्छ जाना, तौभी मैं तुम्हारे पास आने की कृपा करता हूँ क्योंकि मुझे तुम्हारे कल्याण की चिन्ता है।"

इस प्रकार हम देखते हैं कि पौलुस इस प्रसंग में क्या लक्ष्य रखता था। निश्चय ही यहाँ हमें यह ध्यान देना है कि हम कभी न जानेंगे कि उद्धार कहाँ से आता है जब तक हम अपने मन को परमेश्वर के सनातन उद्देश्य तक न उठाएँ, जिसके द्वारा

उसने जिन्हें अच्छा समझा उन्हें चुन लिया और शेष को उनकी अपनी उलझन और पतन में छोड़ दिया। तो फिर यह आश्चर्य की बात नहीं कि कुछ लोग इस सिद्धान्त को अनोखा और कठिन समझते हैं, क्योंकि यह मनुष्य की स्वाभाविक बुद्धि से किसी रीति से मेल नहीं खाता। यदि कोई दार्शनिकों से पूछे, तो वे सदा यही कहेंगे कि परमेश्वर उनसे प्रेम करता है जो उसके योग्य हैं, और चूँकि सद्गुण उसे भाता है, इसलिए वह उन्हें भी चिह्नित करता है जो उसमें लगे हुए हैं, कि उन्हें अपनी प्रजा ठहराए।

तो तुम देखते हो कि अपनी ही कल्पना के अनुसार हम यही समझेंगे कि परमेश्वर मनुष्य और मनुष्य के बीच कोई और भेद नहीं रखता, कुछ से प्रेम करने और दूसरों से घृणा करने में, सिवाय हर एक मनुष्य की अपनी योग्यता और पात्रता के। परन्तु प्रसंगवश हम यह भी स्मरण रखें कि हमारी अपनी समझ में व्यर्थता के सिवाय कुछ नहीं, और हमें परमेश्वर को अपने नाप से नहीं नापना चाहिए, और यह बहुत ही अति और घमण्ड की बात है कि परमेश्वर को खूँटे से बाँध दें कि वह कुछ न करे सिवाय उसके जो हम सोच सकें और जो हमारी दृष्टि में उचित ठहरे। इसलिए यहाँ मामला परमेश्वर के भेदों का आदर करने का है, जो हमारी समझ से परे हैं, और जिनके बिना हम विश्वास के मूल सिद्धान्तों का स्वाद कभी न चखेंगे। क्योंकि हम जानते हैं कि हमारी बुद्धि सदा दीनता से आरम्भ होनी चाहिए। और इस दीनता का अर्थ यह है कि हम परमेश्वर के न्याय को अपने तराजू में तौलने न लगें, और न उनके न्यायी और निर्णायक बनने का बीड़ा उठाएँ, परन्तु हमें

अपनी बुद्धि की दुर्बलता के कारण संयमी रहना चाहिए, और चूँकि हम स्थूल और मन्दबुद्धि हैं, इसलिए हमें परमेश्वर की बड़ाई करनी चाहिए और जैसा पवित्रशास्त्र हमें सिखाता है वैसा कहना चाहिए, "हे प्रभु, तेरे निर्णय बड़े गहरे सागर के समान हैं, और कोई मनुष्य उन्हें तुझ तक गिनकर नहीं पहुँचा सकता।"

इसलिये तुम देखते हो कि कुछ लोगों को यह सिद्धान्त कठिन और अप्रिय क्यों लगता है: कारण यह है कि वे अपनी ही राय से अत्यधिक बँधे हुए हैं और परमेश्वर की बुद्धि के आगे अपने आपको झुका नहीं सकते कि उसके वचनों को गम्भीरता और नम्रता से ग्रहण करें। और सचमुच हमें पौलुस की उस बात से चेतावनी लेनी चाहिए जो वह कहता है, अर्थात् यह कि मनुष्य अपने स्वभाव से परमेश्वर के भेदों को नहीं समझता, वरन् उन्हें निरी मूर्खता समझता है। और क्यों? क्योंकि हम उसकी युक्ति के भागी नहीं हैं; वे बातें हम पर उसके पवित्र आत्मा के द्वारा प्रगट की जानी चाहिए, नहीं तो हम उन्हें कभी जान ही न सकेंगे। और हमें वे उतनी ही मात्रा में मिलनी चाहिए जितनी वह हमें देता है। पौलुस यहाँ उन बातों की चर्चा करता है जिन्हें हम अनुभव से जानते हैं, अर्थात् यह कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं, कि वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हम पर शासन करता है, कि वह हमारे संकटों में हमें शान्ति देता है, और कि वह धीरज के द्वारा हमें दृढ़ करता है। यदि हम उसके पवित्र आत्मा से प्रकाशित न किए जाते, तो इनमें से किसी भी बात को न समझ पाते।

तो फिर उस बात को हम कैसे समझेंगे जो इससे कहीं ऊँची है, अर्थात् यह कि परमेश्वर ने जगत की सृष्टि से पहले हमें चुन लिया? जब स्थिति ऐसी है, तो आओ हम सीखें कि अपने मन की सब कल्पनाओं को त्यागकर उसके चरणों में रख दें। परमेश्वर जो कुछ हमारे लिये रखता है उसे हम ग्रहण करें, अपने सब आत्म-अभिमान को पूरी तरह छोड़कर, और इस बात का निश्चय रखकर कि अपनी ओर से हम पशुता के सिवा और कुछ नहीं ला सकते। देखो, हमें किस बात को स्मरण रखना है। और सचमुच हम देखते हैं कि पौलुस भी हमें इसी बात पर आने का उपदेश देता है:

"हे मनुष्य, तू कौन है जो परमेश्वर से विवाद करता है?"

बहुत से उत्तर देने के बाद, जो हम प्रायः दिया करते हैं, वह कहता है, "हे मनुष्य, तू कौन है?" "मनुष्य" शब्द से उसका आशय था कि हम

अपनी निर्बलता को पहचानें, क्योंकि हम पृथ्वी के कीड़े और सड़न मात्र हैं।

तो फिर परमेश्वर से विवाद करने के लिये मुँह खोलना कैसी भलाई है? क्या यह समस्त प्राकृतिक व्यवस्था को उलट देना नहीं है?

क्या यह हमारे वश में है कि सूर्य को आकाश से रोक दें, या चन्द्रमा को बाँध लें, या, जैसा कहा जाता है, अपनी सामर्थ्य से बाहर दाँत फैलाएँ? तब परमेश्वर से झगड़ना, और उसके न्यायों को, जिन्हें हम समझ ही नहीं सकते, नियन्त्रित करने के लिये तर्क देना हमारे लिये और भी कम उचित है। कुछ लोग हैं जो पूर्वनियति के इस सिद्धान्त को सत्य तो मान लेंगे, जैसा पौलुस यहाँ उसका वर्णन करता है, पर वे चाहते हैं कि इसे ऐसा दबा दिया जाए कि इसकी चर्चा कभी न हो। परन्तु इस प्रकार वे अपने आपको मूर्ख ठहराते हैं, क्योंकि वे उस पवित्र आत्मा को नियन्त्रित करना चाहते हैं जो इसे भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों के द्वारा, वरन् परमेश्वर के एकलौते पुत्र के मुख से भी कहता है। क्योंकि जब हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमें हमारे उद्धार का निश्चय दिलाना चाहा, तो उसने हमें इसी अनन्त चुनाव की ओर भेजा। और इसी प्रकार जब उसने विश्वास के दान को महिमा देनी चाही—एक बार यूहन्ना के दसवें अध्याय में, दूसरी बार पाँचवें में, और तीसरी बार छठवें में। इसलिये इस प्रकार के लोग बहुत देर से आते हैं कि परमेश्वर को चुप करा दें और उन बातों को पवित्र

शास्त्र से मिटा दें जो वहाँ दिखाई गई हैं। क्योंकि सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र लाभदायक है। पौलुस ने यह बात व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं के विषय में कही थी।

इसलिये हम यह भी निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि सुसमाचार में कुछ भी अनावश्यक नहीं, और न कुछ ऐसा है जो किसी भले प्रयोजन को पूरा न करे, और जिससे हम विश्वास और परमेश्वर के भय दोनों में उन्नति न पा सकें।

परन्तु यह सिद्धान्त वहाँ विद्यमान है, और पवित्र आत्मा उसे ऊँचे और निश्चित स्वर में कहता है। इसलिये जो सुसमाचार को काटना-छाँटना और उस पर मुलम्मा चढ़ाना चाहते हैं, वे अवश्य ही मानीकीय मतवादी हैं; क्योंकि जो बात उन्हें अच्छी नहीं लगती उसे वे अलग रख देते हैं और भिन्न-भिन्न टुकड़ों से अपना सुसमाचार गढ़ लेते हैं, केवल उसी को मानते हैं जो उनकी अपनी दृष्टि में भला हो। अब यदि इस प्रकार के पाखण्डियों ने उन बातों को अलग करके, जो एक अटूट

बन्धन में एक साथ रहनी चाहिए, परमेश्वर के विरुद्ध शैतानी हठ दिखाया है, तो वे लोग भी दुष्ट और कपटी हैं जो आज चाहते हैं कि चुनाव का सिद्धान्त चुप्पी में दबा रहे। क्योंकि वे

यदि सम्भव होता तो परमेश्वर पर ही हावी हो जाते, और जब भी वह कोई ऐसी बात कहे जो उन्हें अच्छी न लगे तो उसका मुँह बन्द कर देते। फिर यह भी स्पष्ट दिखाई देता है कि उनकी पशुता कैसी है: पौलुस के पास परमेश्वर की भलाई को महिमा देने के लिये इससे उत्तम कोई प्रमाण नहीं था। यदि कोई और कारण न भी होता, तो भी यह उत्तम होता कि सारा संसार घोर गड़बड़ी में जा पड़े, परन्तु यह सिद्धान्त चुप्पी से दबाया न जाए। क्योंकि यह उचित है कि परमेश्वर अपनी दया के अनन्त भण्डार हमारी आँखों के सामने रखे, और फिर भी उनकी चर्चा न की जाए, वरन् उन्हें पैरों तले रौंद दिया जाए।

परन्तु दो कारण और भी हैं जो दिखाते हैं कि इस सिद्धान्त का प्रचार करना अत्यन्त आवश्यक है और इससे हमें इतना बड़ा लाभ मिलता है कि हमारे लिये उस बात से अनजान रहने की अपेक्षा जो पौलुस हमें यहाँ दिखाता है, यह कहीं अच्छा होता कि हम कभी जन्म ही न लेते। क्योंकि दो बातें हैं जिन पर हमें मुख्यतः ध्यान लगाना चाहिए, और जिनके लिये हमें अपनी सारी बुद्धि और परिश्रम लगाना उचित है। और वे ही उन सब बातों का सार हैं जो परमेश्वर हमें पवित्रशास्त्र के द्वारा सिखाता है। एक यह कि परमेश्वर को उसके योग्य महिमा दी जाए, और दूसरी यह कि हमारे उद्धार की निश्चयता हो, ताकि हम पूरी स्वतन्त्रता से उसे अपना पिता कहकर पुकार सकें। यदि हमारे पास ये दो बातें न हों, तो हम पर हाय, क्योंकि हममें न विश्वास है, न धर्म। हम परमेश्वर की चर्चा तो कर सकते हैं, पर वह झूठ की बात होगी।

जहाँ तक पहली बात का सम्बन्ध है, मैं तुम्हें पहले ही बता चुका हूँ कि परमेश्वर का अनुग्रह तब तक भली-भाँति नहीं जाना जाता जब तक परमेश्वर का चुनाव मानो हमारी आँखों के सामने न रखा जाए। क्योंकि मान लो कि परमेश्वर सब मनुष्यों को एक समान खींचता है, और जो उद्धार पाना चाहते हैं उन्हें अपनी स्वतंत्र इच्छा और अपनी ही प्रेरणा से आना होगा। यदि ऐसा है, तो निश्चित है कि हम परमेश्वर के हाथ से ग्रहण किए जाने के योग्य ठहरते हैं, और वह हर मनुष्य से उसकी योग्यता के अनुसार व्यवहार करे। परन्तु तब परमेश्वर की भलाई किसमें

महिमा पाएगी? इसी में कि उसने अपनी ही निरी स्वतंत्र इच्छा से हमारे आगे बढ़कर हमसे प्रेम किया, जबकि उसने न हममें और न हमारे कर्मों में कुछ ऐसा पाया जिसके कारण वह हमसे प्रेम करे। यदि यह सच है, तो चुनाव अवश्य होना चाहिए। इसलिये परमेश्वर को एक वर्ग को इसलिये ले लेना चाहिए कि उसे ऐसा करना अच्छा लगा, और दूसरे को छोड़ देना चाहिए। अतः यह अति निश्चित बात है कि परमेश्वर की महिमा जैसी होनी चाहिए वैसी प्रकट होकर चमकती नहीं, जब तक यह न जाना जाए कि वह अपनी भलाई और प्रेम वहीं उँडेलता है जहाँ उसे अच्छा लगता है।

मैं अभी कह चुका हूँ कि उसके वचन का प्रचार हमारे लिए एक अद्वितीय लाभ है, और इसी कारण व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं में बार-बार कहा गया है कि परमेश्वर ने किसी और जाति के साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया जैसा अब्राहम की सन्तान के साथ किया, कि उसने उन्हें चुनना और अपनाना स्वीकार किया। जब व्यवस्था का संक्षिप्त लेख लिखा गया, तब इस्राएल की सन्तान को उभारा गया कि वे परमेश्वर की स्तुति करें, क्योंकि उसने उन्हें दिया था

अपनी व्यवस्था देना स्वीकार किया, और इस बीच बेचारे अन्यजातियों को ऐसे लोगों की नाईं अकेला छोड़ दिया जैसे वे उसके कुछ थे ही नहीं। परन्तु यह उससे भी कहीं बड़ा और विशेष सौभाग्य है जब वह उस वचन के द्वारा हमें लाभ पहुँचाता है। क्योंकि यह निश्चित है कि जो बातें हमें सुनाई जानी चाहिए, उन्हें हमारे कानों में प्रतिदिन गूँजते रहने दें, तो भी हमें उनसे कुछ लाभ न होगा, जब तक कि परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे भीतर हमसे न बोले। तब इस विषय में परमेश्वर दोहरा अनुग्रह दिखाता है। एक तब, जब वह हमें सुसमाचार सुनाने के लिए मनुष्यों को खड़ा करता है, क्योंकि कोई मनुष्य अपने आप यह काम करने के योग्य और समर्थ नहीं है।

इसलिए आवश्यक है कि वे परमेश्वर के भेजे हुए हों, जो हमें उसकी ओर बुलाते हैं और हमारे सामने उद्धार की आशा रखते हैं। परन्तु इतने पर भी हम भली-भाँति ध्यान रखें कि हम तब तक विश्वास नहीं कर सकते जब तक परमेश्वर अपने

पवित्र आत्मा के द्वारा अपने आप को हम पर प्रकट न करे और पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे हृदयों से वैसे ही न बोले जैसे उसने मनुष्य के मुँह से हमारे कानों से बातें की हैं।

इसी कारण भविष्यद्वक्ता यशायाह कहता है, "हमारे समाचार की प्रतीति किसने की? और यहोवा का भुजबल किस पर प्रगट हुआ?" वह दिखाता है कि संसार में तब तक कोई विश्वास नहीं है जब तक परमेश्वर ने

अपने पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से मनुष्यों के मनों और हृदयों में काम न किया हो। इसी कारण से हमारे प्रभु यीशु ने भी कहा कि कोई मनुष्य उसके पास नहीं आ सकता जब तक पिता उसे खींच न ले। वह कहता है, "परन्तु जिस किसी ने मेरे पिता से सीखा है, वही अपने आप को मुझे सौंपता है।" संक्षेप में, हम स्पष्ट देखते हैं कि परमेश्वर हमारे प्रति दयालु ठहरता है जब वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें प्रकाशित करना स्वीकार करता है, ताकि हम उसके सुसमाचार के विश्वास की ओर खींचे जाएँ। यदि यही कार्य सब मनुष्यों के साथ साधारणतः और बिना भेद के होता, तो भी हमारे पास परमेश्वर की बड़ाई करने का कारण होता। परन्तु अब जब हम देखते हैं कि कुछ लोग कठोर हो जाते हैं और कुछ चंचल, और कुछ सुनी हुई बातों से कोई लाभ उठाए बिना अपने रास्ते चले जाते हैं, और कुछ तो बिलकुल जड़ बने रहते हैं, तब यह निश्चित है कि इससे परमेश्वर का अनुग्रह हम पर और भी प्रकट होता है, जैसा कि लूका कहता है कि पौलुस के प्रचार पर जितने अनन्त जीवन के लिए ठहराए गए थे, उन सब ने विश्वास किया। निश्चय ही पौलुस का उपदेश सुननेवालों की संख्या बड़ी थी, और बिना किसी सन्देह के, उसके पक्ष में इतना बड़ा अनुग्रह था जो पत्थरों तक को भी हिला देता। फिर भी एक बड़ी टोली अपने अविश्वास और हठ में बनी रही, और दूसरों ने विश्वास किया।

अब यह स्पष्ट दिखाई देता है कि इसका कारण यह नहीं था कि एक दल दूसरे से अधिक भला या उत्तम स्वभाव का था, या एक में दूसरे से अधिक कोई सद्गुण की प्रवृत्ति थी, परन्तु इसलिए कि परमेश्वर ने उन्हें उद्धार के लिए पहले से ठहरा दिया था। इसलिए एक शब्द में हम देखते हैं कि मनुष्य की सारी योग्यता समाप्त होनी चाहिए और पैरों तले कुचली जानी चाहिए, नहीं तो परमेश्वर को उसकी योग्य स्तुति न मिलेगी। हाँ, और हमें यह समझना चाहिए कि विश्वास हम से नहीं उत्पन्न होता, क्योंकि यदि होता, तो हमारे कर्मों में कुछ योग्यता ठहरती। यह सच है कि विश्वास के द्वारा हम मानते हैं कि हम में दुर्दशा के सिवाय कुछ नहीं, कि हम दोषी और श्रापित हैं, और अपने साथ अपने पापों की स्वीकृति के सिवाय कुछ नहीं लाते। परन्तु फिर भी यदि हमारा विश्वास हमारे अपने ही उपजाए होता, तो वह कुछ योग्यता का कारण ठहरता। इसलिए हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए

कि मनुष्यों के लिए विश्वास करना तब तक असम्भव है जब तक वह उन्हें ऊपर से न दिया जाए।

निश्चय ही पौलुस यहाँ एक ऐसी बात बताता है जो ध्यान देने के बहुत योग्य है, जब वह कहता है, "धन्य है परमेश्वर।" और किस कारण? इसी कारण कि उसने हमें यीशु मसीह में ऐसा धनी किया है कि हमारा जीवन सुखी और धन्य है। और फिर वह आगे कहता है, "जैसा उसने हमें चुन लिया।" क्या विश्वास उन आत्मिक धनों में नहीं गिना जाता जिनका उल्लेख पौलुस करता है? हाँ, और इससे भी बढ़कर, वह उनमें प्रधान है। क्योंकि विश्वास ही के द्वारा हम पवित्र आत्मा पाते हैं। विश्वास ही के द्वारा हम अपनी विपत्तियों में धीरज धरनेवाले बनते हैं। विश्वास ही के द्वारा हम परमेश्वर के आज्ञाकारी बनते हैं। विश्वास ही के द्वारा हम उसकी सेवा के लिए पवित्र किए जाते हैं। संक्षेप में, विश्वास उन आत्मिक आशीषों में सदा प्रधान बना रहता है जो परमेश्वर हम पर उण्डेलता है। अब आइए, पौलुस के क्रम को स्मरण रखें। वह कहता है कि परमेश्वर ने हमें विश्वास भी वैसे ही दिया है जैसे और सब कुछ, "जैसा उसने हमें चुन लिया।" तो हम देखते हैं कि विश्वास परमेश्वर के चुनाव पर निर्भर है, नहीं तो हमें पौलुस को झूठा ठहराना पड़ेगा।

इसलिए पहले बिन्दु के विषय में, तुम देखते हो कि जो लोग पूर्वनियति की चर्चा स्पष्ट और खुले रूप से किया जाना सहन नहीं कर सकते, वे परमेश्वर के अनुग्रह के घोर शत्रु हैं, और अपनी पूरी शक्ति से उसका सामना करेंगे। क्योंकि, जैसा मैंने पहले कहा, उसको छिपा देना सारे धर्म को उलट देना होगा।

दूसरा बिन्दु हमारे उद्धार की निश्चयता है। पोप के अनुयायी कहते हैं कि हमें उसके विषय में सन्देह करना चाहिए, और हम परमेश्वर के पास केवल इस अनुमान के साथ आ सकते हैं कि वह हमें ग्रहण करेगा, परन्तु इस बात का निश्चय करना कि वह ग्रहण करेगा, यह हमें न करना चाहिए, क्योंकि वह बहुत बड़ा दुस्साहस होगा। परन्तु जब हम परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं, तब हमें उसे

पिता कहना चाहिए, कम से कम तब, यदि हम हमारे प्रभु यीशु मसीह के चेले हैं, क्योंकि उसने हमें ऐसा ही करना सिखाया है। अब क्या हम उसे संयोगवश पिता कहते हैं? या हम अपने भीतर निश्चित हैं कि वह हमारा पिता है? यदि नहीं, तो हमारी प्रार्थनाओं में कपट के सिवाय कुछ नहीं, और पहला शब्द जो हम बोलेंगे वह निरा झूठ होगा।

इसलिए पोप के अनुयायी कभी नहीं जानते कि परमेश्वर से प्रार्थना करना क्या होता है, क्योंकि वे कहते हैं कि हमें अपने उद्धार के विषय में निश्चित नहीं होना चाहिए। परन्तु जैसा कि हम विशेषकर तीसरे अध्याय में देखेंगे, पवित्रशास्त्र हमें दिखाता है कि यदि हमें परमेश्वर से ठीक रीति से प्रार्थना करनी है, तो हमारे भीतर यीशु मसीह पर विश्वास होना आवश्यक है, जो हमें भरोसा देता है, और उसी भरोसे से हम शीघ्र ही साहस पाते हैं। तब संसार की चाल चाहे जैसी हो, हमें न कुड़कुड़ाना चाहिए, न सन्देह करना चाहिए, वरन् अपने मन में पूरी तरह निश्चित और आश्वस्त होना चाहिए कि परमेश्वर हमें अपनी सन्तान गिनता है। और यह कैसे हो सकता है, सिवाय इसके कि हम उसकी दया को विश्वास के द्वारा ग्रहण करें, जैसा कि वह उसे अपने सुसमाचार में हमारे सामने रखता है, और साथ ही इस बात का निश्चय रखें कि हम उसके सनातन चुनाव में दृढ़ता से स्थापित हैं? क्योंकि यदि हमारा विश्वास स्वयं हम पर निर्भर होता, तो वह निश्चय ही शीघ्र हमारे हाथ से फिसल जाता, और यदि ऊपर से उसे थामा न जाता तो वह हिलाकर गिरा दिया जाता। और यद्यपि जैसा पतरस कहता है, हम विश्वास के द्वारा रखे और बचाए जाते हैं, तथापि वह परमेश्वर ही है

जो हमें रखता और बचाए रखता है। तब यदि हमारा विश्वास परमेश्वर के सनातन चुनाव पर आधारित न होता, तो यह निश्चित है कि शैतान उसे घण्टे के हर क्षण हमसे छीन सकता था। यद्यपि आज हम संसार में सबसे अधिक दृढ़ होते, तौभी कल हम गिर सकते थे। परन्तु हमारा प्रभु

यीशु सब परीक्षाओं के विरुद्ध हमें दृढ़ करने का उपाय हमें यह कहकर दिखाता है, "तुम अपने आप से मेरे पास नहीं आते, वरन् स्वर्गीय

पिता तुम्हें मेरे पास लाता है, और क्योंकि मैंने तुम्हें अपनी रखवाली में ले लिया है, इसलिए अब और मत डरो, क्योंकि मैं तुम्हें अपने पिता परमेश्वर का भाग जानता हूँ, और जिसने तुम्हारा भार मुझे सौंपा और तुम्हें मेरे हाथ में रखा है, वह सब से बलवन्त है।"

तब हम देखते हैं कि परमेश्वर की महिमा प्रकट करने के अतिरिक्त हमारे उद्धार की निश्चयता भी परमेश्वर के सनातन पूर्वनियति पर टिकी है, और यही हमें उस बात पर विचार करने के लिए प्रेरित करने को पर्याप्त कारण होना चाहिए जिसकी चर्चा पौलुस इस स्थान पर करता है। यह सच है, जैसा कि मैं पहले संकेत कर चुका हूँ, कि बहुत से लोग यह सुनकर चौंक उठते हैं कि परमेश्वर ने जिसे चाहा उसे चुन लिया और शेष सब को ठुकरा दिया। क्योंकि हम देखते हैं कि परमेश्वर के पास आनेवालों की संख्या बहुत थोड़ी है। तब उसने बाकी लोगों को क्यों ठुकरा दिया?

शेष लोगों को क्यों ठुकरा दिया? मानो यह कहा जाए कि परमेश्वर की इच्छा हमारे प्रति नियम नहीं ठहरनी चाहिए। हमें पहले यह ध्यान देना चाहिए कि परमेश्वर किसी भी व्यक्ति का किसी रीति से ऋणी नहीं है। क्योंकि यदि वह ऋणी होता, तो हम उसके साथ मुकद्दमा कर सकते थे। परन्तु क्योंकि उसकी ओर से वह हमारा कुछ भी ऋणी नहीं, वरन् हम सब मिलकर उसके ऋणी हैं, तो अब देखें कि उससे झगड़कर हम क्या पाएँगे। क्योंकि यदि हम परमेश्वर को इस बात के लिए विवश करना चाहें कि

वह सब मनुष्यों के साथ एक सा व्यवहार करे, तो उसे नश्वर प्राणियों से भी कम स्वतंत्रता मिलेगी।

यदि कोई मनुष्य धनी है, तो वह अपनी सम्पत्ति के साथ जो चाहे कर सकता है। यदि वह किसी पर उदारता दिखाए, तो क्या यह उचित है कि उस पर अदालत में मुकद्दमा चलाया जाए और हर कोई उससे वैसी ही रकम माँगे? देखो, कोई मनुष्य अपनी इच्छा से किसी प्रिय जन को आगे बढ़ाता है। अब यदि सब कंगाल लोग आकर उससे माँग करें कि वह उनके लिए भी उतना ही करे मानो यह उसका अनिवार्य कर्तव्य हो, तो क्या यह मूर्खता की बात न होगी? सचमुच, कोई मनुष्य संसार के सबसे दूर के परदेशी को भी अपना पुत्र और उत्तराधिकारी बनाने के लिए अपना ले सकता है, और ऐसा करने की उसे स्वतंत्रता है। देखो, परमेश्वर सब मनुष्यों पर उदार है, क्योंकि वह

अपना सूर्य भले और बुरे दोनों पर उदय करता है। केवल मनुष्यों में से एक निश्चित भाग को वह अलग रखता है, जिन्हें अपनी

सन्तान बनाकर अपनाने का विशेषाधिकार वह प्रदान करता है। क्या? क्या हम फिर उसके विरुद्ध कुड़कुड़ाने लगें? यदि कोई ऐसा कहे, तो क्या यह नहीं लगेगा कि परमेश्वर पक्षपात करनेवाला है?

नहीं, ऐसा नहीं है, क्योंकि वह धनवान को चुनकर कंगाल को नहीं छोड़ता। वह कुलीनों और सम्भ्रान्तों को तुच्छ और नीच पद के मनुष्यों से अधिक नहीं चुनता, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि परमेश्वर के सामने कोई पक्षपात है। क्योंकि अयोग्य लोगों को चुनने में उसका ध्यान केवल अपनी निरी भलाई पर रहता है। न उसे इस बात की चिन्ता है कि कोई दूसरे से अधिक योग्य है, वरन् वह जिसे चाहता है उसे ले लेता है।

हम और क्या चाहते हैं? तब क्या यह उचित कारण नहीं कि हम परमेश्वर की इच्छा से सन्तुष्ट रहें और अपने आप को रोके रखें और उसे चुनने दें जिसे वह चाहे? क्योंकि उसकी इच्छा ही

न्याय और धार्मिकता का सर्वोच्च नियम है। और इस प्रकार तुम देखते हो कि सारे संसार के मुँह बन्द कर दिए गए हैं। और यद्यपि दुष्ट और अन्यजातीय लोग परमेश्वर पर बकवाद करने और गालियाँ देने, वरन् ऐसा करने के लिए उसकी निन्दा करने का प्रयत्न करते हैं, तथापि क्या वह अपनी धार्मिकता और अनन्त बुद्धि का समर्थन करने के लिए पर्याप्त सामर्थी नहीं? और जब वे जी भरकर बड़बड़ा चुकें, तब भी क्या अन्त में उन्हें लज्जित नहीं होना पड़ेगा? हमारे लिए, हम देखते हैं कि पौलुस यहाँ क्या कहता है, क्योंकि जब वह कहता है कि परमेश्वर ने हमें आशीष दी है, अर्थात् इस रीति से कि उसने अपने पवित्र

आत्मा के द्वारा हमें सुसमाचार के विश्वास से प्रकाशित किया और हमें अपने प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह में सहभागी बनाया, तो यह कोई गूढ़ सिद्धान्त नहीं; इसी से वह दिखाता है कि उसने जगत की सृष्टि से पहले हमें चुन लिया था। और इसलिए हम समझ लें कि परमेश्वर के अनुग्रह की ठीक रीति से बड़ाई करने के लिए हमें, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, इसी सोते और मूल कारण अर्थात् चुनाव तक पहुँचना चाहिए।

अब हमें और आगे बढ़ना है, ताकि उन सब बातों और योग्यताओं को और अच्छी तरह निकाल बाहर करें जिनका मनुष्य बहाना कर सकते हैं; क्योंकि हम सदा अपने लिए कुछ न कुछ दावा करने की ओर झुके रहते हैं और शून्य कर दिए जाना सह नहीं सकते, इसलिए वह कहता है, जगत की सृष्टि से पहले। तो फिर, क्योंकि ऐसी कल्पना से हम अपने आप को वह कुछ रखनेवाला समझते हैं जो हमारे पास नहीं है, इसलिए आवश्यक था कि पौलुस यहाँ ऐसी सब काल्पनिक मूर्खता को गिरा दे। और इसी कारण वह कहता है कि जब हम अभी जन्मे भी नहीं थे तब हम अपने आप को आगे नहीं बढ़ा सकते थे। अब सचमुच परमेश्वर ने जगत की सृष्टि से पहले हमें चुना, तो हम तब उसके पास क्या ला सकते थे

उसके लिए? पोप के अनुयायियों के पास इस विषय में एक छोटा-सा बहाना है। क्योंकि वे कहते हैं कि परमेश्वर ने उद्धार के लिए ऐसों को चुना जिन्होंने अब तक उसे अर्जित नहीं किया था, पर फिर भी उसने ऐसों को चुना जिन्हें उसने पहले से देख लिया था कि वे उसके योग्य ठहरेंगे। इस प्रकार वे मानते हैं कि चुनाव से पहले न क्रम में न समय में कोई योग्यता थी, परन्तु परमेश्वर, जिसके लिए सब कुछ खुला है, जानता था कि कौन उसके योग्य होगा। पोप के अनुयायी इसी प्रकार इसके विषय में कहते हैं।

इसलिए, जब तक वे परमेश्वर के चुनाव का इन्कार नहीं करते, और बस यह दिखाने के लिए कि वे दुष्ट मण्डलियाँ जो आजकल उसकी चर्चा तक सहन नहीं कर सकतीं,

देहधारी शैतान के समान हैं, और पोप के अनुयायियों से भी कहीं अधिक उग्र और घृणित दुष्टता का समर्थन करती हैं।

हमें यह ध्यान देना चाहिए कि पोप के अनुयायी मानते हैं कि परमेश्वर ने जगत की सृष्टि से भी पहले जिन्हें उचित समझा उन्हें चुना और पूर्वनियत किया; वे इस पर दृढ़ रहते हैं, पर ये शैतान इसका इन्कार करते हैं, और इस रीति से परमेश्वर के विधान को उलटकर उसकी महिमा को पूरी तरह कलंकित करना चाहते हैं। पोप के अनुयायी, कम से कम उनमें से जो सीधी राह पर चले हैं — और मैं यहाँ उन्हीं भिक्षुओं और संन्यासियों की बात कर रहा हूँ जो विद्यालयी धर्मशास्त्री कहलाते हैं — यह भी मानते हैं कि परमेश्वर का यह चुनाव स्वतंत्र है, और उसने किसी को भी अपनी ही इच्छा के सिवा किसी और कारण से नहीं चुना। परन्तु फिर तुरन्त ही वे सब कुछ गड़बड़ा और उलझा देते हैं, क्योंकि वे कहते हैं कि जब परमेश्वर ने जिसे चाहा उसे चुना, तो उसने यह इसलिए किया कि वे उसके योग्य ठहरें। और इसी पर वे अपने सारे पुण्य का आधार रखते हैं, क्योंकि वे यह निष्कर्ष निकालते हैं कि मनुष्य अपनी ही सामर्थ्य से स्वर्ग का राज्य जीत सकते हैं। वे मानते तो हैं कि जहाँ तक चुनाव की बात है, वह एक मुफ़्त दान है। पर वे सदा अपनी उसी कल्पित धारणा पर लौट आते हैं कि परमेश्वर ने पहले से देख लिया था कि कौन भलाई करेगा। परन्तु वह उसे कैसे पहले से देखता जो हो ही नहीं सकता था? क्योंकि हम जानते हैं कि सारी

आदम की सन्तान भ्रष्ट हो चुकी है, और हममें भलाई करने का एक विचार तक सोचने की सामर्थ्य नहीं, तब भला करने की सामर्थ्य तो और भी कहाँ! सचमुच, यदि परमेश्वर एक लाख वर्ष तक भी हमारी बाट जोहता, और हम इतने समय तक जगत में बने रह सकते, तब भी यह निश्चित है कि हम कभी उसके पास न आते, और न कुछ और करते, केवल अपने ही दण्ड के लिए बुराई को निरन्तर बढ़ाते जाते। संक्षेप में, मनुष्य जगत में जितना अधिक जीते हैं, उतना ही अपने को अपने विनाश में और गहरा डुबोते जाते हैं। और इसलिए परमेश्वर उस वस्तु को पहले से कैसे देख सकता था जो हममें थी ही नहीं, जब तक कि उसने स्वयं उसे हममें न डाला?

तब हम परमेश्वर के अधीन कैसे हों, हम उसकी आज्ञा कैसे मानें? हममें ऐसा प्राप्त किया हुआ मन कैसे है जो उसके विश्वास के अनुसार अपने आप को समर्पित करे? ये सब बातें उसी की ओर से आती हैं। और इसलिए यह निष्कर्ष निकलता है कि उसे सब कुछ

स्वयं ही करना पड़ता है। इसलिए आओ, हम विचार करें कि जब पौलुस कहता है कि परमेश्वर ने जगत की उत्पत्ति से पहले हमें चुना, तो वह एक सच्ची बात को पहले से मानकर चलता है, अर्थात् यह कि परमेश्वर हममें उस बुराई के सिवा, जो वहाँ थी, और कुछ नहीं देख सकता था, क्योंकि उसे पाने के लिए वहाँ भलाई की एक बूँद भी न थी। तो जब उसने हमें चुना है, तो यह उसकी निःशुल्क भलाई का अत्यन्त प्रत्यक्ष प्रमाण है। और इसी कारण रोमियों के नौवें अध्याय में, जहाँ वह दो जुड़वाँ याकूब और एसाव की चर्चा करता है, जब वे अभी अपनी माता के गर्भ में ही थे, और उन्होंने भला या बुरा कुछ भी नहीं किया था, इसलिए कि सब कुछ केवल बुलानेवाले की ओर से हो, न कि काम करनेवाले की ओर से, कहा गया कि बड़ा छोटे की सेवा करेगा।

तब हम देखते हैं कि जो बात वह यहाँ संक्षेप में छूता है, उसे पौलुस वहाँ अधिक विस्तार से बताता है; अर्थात् जब परमेश्वर ने जगत की सृष्टि से पहले हमें चुना, तो उससे वह भली-भाँति दिखाता है कि एक मनुष्य दूसरे से अधिक योग्य या श्रेष्ठ नहीं, और उसने किसी योग्यता का कोई ध्यान नहीं रखा। इसलिए, जब याकूब और एसाव के बीच भेद उनके भला या बुरा कुछ करने से पहले ही रखा गया, और वह कर्मों से नहीं बल्कि बुलानेवाले से हुआ, तो सारी स्तुति परमेश्वर को ही दी जानी चाहिए, और मनुष्यों के लिए कुछ भी बचाकर नहीं रखा जाना चाहिए।

और इस प्रकार तुम फिर एक बार देखते हो कि हमें यहाँ क्या ध्यान देना है, जब

पौलुस कहता है कि हम जगत की सृष्टि से पहले चुने गए। वह इस बात को और भी दृढ़ करता है जब कहता है कि यह यीशु मसीह में किया गया। यदि हम अपने आप में चुने गए होते, तो कहा जा सकता था कि परमेश्वर ने हममें कोई गुप्त गुण पाया था जो मनुष्यों को ज्ञात नहीं; परन्तु जब उसने हमें चुना है, अर्थात् हमसे प्रेम किया है, तो वह हमारे बाहर से ही है।

इसका हम क्या उत्तर दें? यदि मैं किसी मनुष्य की भलाई करता हूँ तो इसलिए कि मैं उससे प्रेम करता हूँ। और यदि मेरे प्रेम का कारण ढूँढ़ा जाए, तो वह यह होगा कि हम एक जैसे हैं, हमारी दशाएँ एक सी हैं, या कोई और बात; परन्तु हमें परमेश्वर में कोई समानता कल्पित नहीं करनी चाहिए। और इसीलिए हमें यहाँ स्पष्ट रूप से बताया गया है, क्योंकि पौलुस कहता है कि हम यीशु मसीह में चुने गए।

क्या परमेश्वर ने हमसे प्रेम करना स्वीकार करते समय हमारी ओर दृष्टि की? नहीं, क्योंकि तब तो वह हमें पूरी तरह भयभीत कर देता। यह सच है कि हमारी दुर्दशा को देखकर उसे हम पर तरस और करुणा आई, कि हमें छुड़ाए। परन्तु वह इसलिए था कि वह हमसे पहले ही अपने प्रभु यीशु मसीह में प्रेम कर चुका था; तब परमेश्वर के सामने अवश्य ही उसका नमूना और दर्पण रहा होगा, जिसमें वह हमें देखता। अर्थात् उसे हमारे

प्रभु यीशु मसीह की ओर देखना पड़ा, तब कहीं वह हमें चुन सका और बुला सका। और संक्षेप में, पौलुस यह दिखा चुकने के बाद कि हम परमेश्वर के सामने कुछ भी नहीं ला सकते थे, बल्कि उसने अपनी निःशुल्क भलाई से हमें जगत की सृष्टि से पहले चुनकर हमसे आगे बढ़कर पहल की, एक और अधिक निश्चित प्रमाण जोड़ता है, अर्थात् यह कि उसने यह हमारे प्रभु यीशु मसीह में किया, जो मानो परमेश्वर के हमें चुनने के निश्चय का सच्चा अभिलेख-ग्रन्थ है, अर्थात् सारे अनन्तकाल से पहले उसका ऐसा करना। यह मानो हमारा लिखित अभिलेख में दर्ज किया जाना था, और पवित्र

शास्त्र परमेश्वर के चुनाव को जीवन की पुस्तक कहता है। जैसा मैंने पहले कहा, यीशु मसीह एक लेखा-पुस्तक का काम करता है, उसी में हम अंकित हैं, और उसी में परमेश्वर हमें अपनी सन्तान के रूप में पहचानता है। तब, क्योंकि परमेश्वर की दृष्टि यीशु मसीह के व्यक्तित्व में हम पर थी, इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि उसने हममें कुछ भी नहीं पाया जो उसके लिए परिश्रम करता, कि वह हमें चुन ले।

सारांश यह है कि हमें इसे आगे भी स्मरण रखना है। इसके बाद यह आता है कि यह इसलिए है कि हम परमेश्वर के सामने प्रेम में पवित्र और निर्दोष हों।

यह "प्रेम" शब्द परमेश्वर से जोड़ा जा सकता है, मानो यह कहा गया हो कि हमें इसका और कोई कारण नहीं मिलेगा कि परमेश्वर ने हमें अपनी सन्तान बना लेना क्यों स्वीकार किया, केवल उसका अपना निःशुल्क प्रेम। या फिर, जैसा अधिक सम्भव है,

पौलुस यहाँ दिखाता है कि विश्वासियों की सच्ची खराई और सिद्धता यही है कि वे परमेश्वर के सामने सब प्रकार की धार्मिकता में चलें। हम अभी इसका पूरा वर्णन नहीं कर सकते, परन्तु संक्षेप में यह बताना पर्याप्त होगा कि पौलुस कहाँ

पौलुस की दृष्टि इस पर थी, क्योंकि वह यहाँ दिखाता है कि यद्यपि परमेश्वर का चुनाव स्वतंत्र है और मनुष्यों की सारी योग्यता, कर्मों और

गुणों को गिरा देता और दूर कर देता है, तथापि इससे हमें बुराई करने, अस्त-व्यस्त जीवन बिताने या भटकते फिरने की छूट नहीं मिलती, परन्तु इसके विपरीत यह हमें उस बुराई से निकालने के लिये है जिसमें हम डूबे हुए थे। क्योंकि स्वभाव से हम परमेश्वर के क्रोध को भड़काने के सिवा और कुछ नहीं कर सकते। दुष्टता सदा हम में राज्य करेगी, और हम शैतान के बन्धनों और अत्याचार के नीचे दबे रहेंगे।

इसलिये परमेश्वर को हम में कार्य करना और हमें बदलना होगा, क्योंकि पौलुस कहता है कि सारी भलाई उसके चुनाव से आती है। तो तुम देखते हो कि वह विश्वासियों को इस बात तक पहुँचाना चाहता है कि वे जानें कि परमेश्वर ने उन्हें अपनी निःशुल्क भलाई से उस जीवन के लिये चुना। इसलिये वह उन्हें दुष्टता में पड़ने की छूट नहीं देता, परन्तु उन्हें अपने लिये निष्कलंक रखना और सुरक्षित बनाए रखना चाहता है। क्योंकि हमें परमेश्वर का चुनना और पवित्रता के लिये हमें बुलाना ऐसी बातें हैं जो अलग नहीं की जा सकतीं, वरन् साथ-साथ जुड़ी हैं; जैसा पौलुस एक और वचन में भी कहता है कि हम अशुद्धता और मलिनता के लिये नहीं बुलाए गए, परन्तु सम्पूर्ण भक्ति और पवित्रता में परमेश्वर के लिये समर्पित होने के लिये बुलाए गए हैं।

अब, क्योंकि हम इस समय सारी बात का विस्तार नहीं कर सकते, आओ हम इस शिक्षा से लाभ उठाने का प्रयत्न करें। और क्योंकि हम अब अपने प्रभु यीशु मसीह के भोज को ग्रहण करने के लिये अपने आप को तैयार करने पर हैं, जो हमारे लिये चुनाव का भी और हमारे उद्धार की आशा का भी, तथा उन सब आत्मिक आशीषों का भी जो परमेश्वर की निःशुल्क भलाई के इस सोते और स्रोत से निकलती हैं, एक प्रतिज्ञा-चिह्न है, आओ हम विचार करें कि वहाँ उसने अपनी धन-सम्पत्ति हम पर प्रकट की, इसलिये नहीं कि हम उसका दुरुपयोग करें, परन्तु इस उद्देश्य से कि हमारे द्वारा उसकी महिमा हो, केवल हमारे मुँह से ही नहीं, वरन् हमारे सारे जीवन से भी।

और क्योंकि हम सब कुछ उसी से पाते हैं, आओ हम यह भी सीखें कि हम उसी के बनें, और अपने आप को उसकी आज्ञा मानने के लिये सौंप दें, कि वह हम से शान्ति से आनन्दित हो। और आओ हम सदा इसी लक्ष्य पर निशाना साधे रहें, अर्थात् इस बात की निश्चयता प्राप्त करना कि वह हमें अपनी सन्तान गिनता है, उसकी छाप को धारण करके

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