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दसवाँ उपदेश, दूसरे अध्याय पर दूसरा – इफिसियों 2:4-6
दसवाँ उपदेश, जो दूसरे अध्याय पर दूसरा है। 3. हम भी आज्ञा न माननेवालों के साथ चलते थे, और शरीर और मन की अभिलाषाओं के अनुसार आचरण करते थे, और स्वभाव से और लोगों के समान क्रोध की सन्तान थे।
4. परन्तु परमेश्वर ने जो दया का धनी है, अपने उस बड़े प्रेम के कारण जिससे उसने हम से प्रेम किया, 5. उस समय भी जब हम पाप के कारण मरे हुए थे, हमें मसीह के साथ जिलाया, जिसके अनुग्रह से तुम्हारा उद्धार हुआ है,
6. और उसके साथ हमें उठाया, और यीशु मसीह में स्वर्गीय स्थानों में उसके साथ बैठाया।
आज सुबह मैंने आपको यह दिखाना आरम्भ किया था कि संत पौलुस का अभिप्राय परमेश्वर की भलाई को सब मनुष्यों तक पहुँचाना था, ताकि किसी को भी अपने विषय में घमण्ड करने का कारण न रहे, मानो उसमें अकेले अपने आप में कोई योग्यता हो। सचमुच, यदि संसार में कभी कोई जाति दूसरों से ऊँची उठाई गई थी, तो वह यहूदी थे, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें अपने घराने के रूप में स्वीकार किया था और उन्हें पवित्र वंश तथा अपनी निज विरासत कहा था। इस दृष्टि से यहूदी दूसरों से श्रेष्ठता पाने के सर्वथा योग्य दिखाई देते थे। फिर भी, इसलिए कि कोई हमारे
प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह को धूमिल न करे, वह कहता है कि वे भी क्रोध की सन्तान थे, इसलिए उनके लिए भी यह बहुत हितकर था कि वे उस गड्ढे से निकाले जाएँ जो अव्यवस्था का गड्ढा है, जिसकी चर्चा मैंने आज सुबह की थी। संक्षेप में, संत पौलुस यहाँ यह दिखाता है कि जिन्हें मनुष्य सबसे उत्कृष्ट समझे, वे भी परमेश्वर के सामने घमण्ड करने के लिए या अपने लिए प्रतिष्ठा कमाने के लिए कुछ भी नहीं ला सकते,
परन्तु सब के सब अनुग्रह से ग्रहण किए जाते हैं, ताकि हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा स्वर्गीय जीवन के वारिस बनाए जाएँ।
अब यहाँ यह प्रश्न उठाया जा सकता है: संत पौलुस अन्यजातियों को यहूदियों के बराबर क्यों ठहराता है, जबकि परमेश्वर ने उनके बीच इतना बड़ा भेद रखा था? क्योंकि ऐसा प्रतीत हो सकता है कि सारी प्रतिज्ञाएँ रद्द कर दी गईं; और यह मनुष्यों के प्रति नहीं, बल्कि परमेश्वर के प्रति अन्याय होगा। यदि हम यह मान लें (जैसा कि आवश्यकता और तर्क से हमें मानना ही पड़ता है) कि परमेश्वर का अब्राहम की सन्तान को चुनना व्यर्थ नहीं था, और उनसे यह कहना कि मैंने तुम्हें अपने घराने और कलीसिया का जानकर अपनाया है, उन्हें धोखा देना नहीं था, तो वे अवश्य परमेश्वर के अधिक निकट और अधिक परिचित रहे होंगे, और उनके पास अवश्य कोई चिन्ह रहा होगा जिससे वे उसके पास इकट्ठे किए जाएँ। तब तो ऐसा लगता है कि संत पौलुस को यहूदियों को इस प्रकार नीचा नहीं दिखाना चाहिए था। परन्तु दूसरी जगह वह दिखाता है कि यह सब भली भाँति मेल खाता है, यदि हम यहूदियों को (एक ओर) परमेश्वर की चुनी हुई और विशेष प्रजा की दशा में देखें, और (दूसरी ओर) यह देखें कि वे (अपने आप में) क्या हैं और परमेश्वर के सामने उन्होंने क्या कमाया है। क्योंकि रोमियों की पत्री में, जब संत पौलुस सारे संसार पर निर्णय सुना चुका और यह दिखा चुका कि कोई भी ऐसा नहीं जो दोषी और खोया हुआ न हो, तब वह यह प्रश्न उठाता है: जब परमेश्वर ने अब्राहम के वंश को इकट्ठा किया और उसे पूर्ण रूप से अपने लिए समर्पित किया, तो उनका क्या होगा? क्या उनमें कोई पवित्रता न होगी? क्योंकि अन्यथा ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर ने केवल खेल किया, और पवित्रशास्त्र में उसका यह कहना कि उसने किसी और जाति के साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया, कुछ भी मूल्य का नहीं था। परन्तु संत पौलुस कहता है कि सच में मनुष्यों को उस अनुग्रह की सराहना करनी चाहिए जो परमेश्वर ने अपनी प्रजा पर प्रकट करना उचित समझा, और इसलिए उन्हें सारे संसार से ऊपर रखा जाना चाहिए, जहाँ तक वे उन आशीषों से सम्पन्न हैं जो उन्हें परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं के द्वारा मिलीं। फिर भी, वह तुरन्त यह भी जोड़ता है कि चूँकि वे आदम की सन्तान में से हैं और अन्य सब मनुष्यों के समान पापी हैं, और हमारे सारे स्वभाव में भ्रष्टता और हठीलेपन के सिवा कुछ नहीं है, इसलिए सब मनुष्यों को विवश होकर
झुकना पड़ता है, और हम सब को मानना ही पड़ेगा कि हम में से एक को दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता, जैसा कि हम इससे पहले गलातियों के दूसरे अध्याय में देख चुके हैं, जहाँ संत पौलुस ने संत पतरस से यों कहा: "हाँ, हम स्वभाव से यहूदी हैं, और ऐसा लगता है कि हमें अकेले अपने आप अलग चलना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर हमारा राजा है, और उसने हमें पवित्र ठहराया है, और हमारे बीच निवास करना अच्छा समझता है।" तो पहली दृष्टि में ऐसा लगता है कि हमें अन्यजातियों को अशुद्ध और ऐसा जन जानकर जिनका परमेश्वर से कोई परिचय नहीं, दूर हटा देना चाहिए। परन्तु आओ, हिसाब पर आएँ
(वह कहता है), और हम सब में से कोई ऐसा नहीं जो परमेश्वर के सामने ऋणी न हो, और जिसे अपने आप को अभागा पापी न जानना पड़े। चूँकि ऐसा है,
परमेश्वर को सब मनुष्यों का न्यायी होना ही चाहिए, और हमें उसकी महिमा के सामने तब तक दबे रहना होगा जब तक हम अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा उससे मेल-मिलाप न कर लें। संक्षेप में, इस पद में संत पौलुस का अभिप्राय परमेश्वर के अनुग्रह को घटाना नहीं है, परन्तु यह दिखाना है कि स्वर्ग के उद्धार और विरासत को पाने के लिए यहूदियों के पास अपने भीतर और कोई साधन नहीं था, सिवाय इसके कि वे हमारे प्रभु यीशु मसीह के अंग बनें, और उन्हें सदा पहले अपने आप को शापित और दण्ड के योग्य मानना पड़ेगा। क्योंकि जो योग्यता उनके पास है वह मात्र अनायास मिला हुआ लाभ है, और वे अन्य सब मनुष्यों के समान पाप में जन्मे हैं और शाप के अधीन हैं, और परमेश्वर का उन्हें अपने लिए अपनाना और चुनना एक विशेष और (जैसा कि कहा जाता है) अलौकिक दान था। तो आप देखते हैं कि स्वभाव से यहूदी भी शेष सारे संसार के समान खोए हुए हैं, और फिर भी परमेश्वर ने उन्हें भी दया के लिए ग्रहण किया है।
प्रसंगवश, हमें यह ध्यान देना चाहिए कि "स्वभाव" शब्द के द्वारा संत पौलुस केवल यही नहीं दिखाता कि हम आदत से पापी हैं, कि हम में से हर एक अपने साथी को रास्ते से हटा देता है, और हम भले की अपेक्षा बुरे के पीछे चलने की ओर बहुत झुके रहते हैं, परन्तु इसमें इससे आगे की बात भी है, अर्थात् यह कि हम में से हर एक अपने जन्म से ही पाप अपने साथ लाता है। खाना-पीना तो हमारे साथ चलनेवाली बातें हैं, परन्तु पाप हम में इस जीवन से सम्बन्धित सब बातों से अधिक जड़ पकड़े हुए है।
सचमुच, अन्यजाति के लोगों को यह अनोखी बात लगेगी कि छोटे बच्चे,
जो भले और बुरे में भेद नहीं कर सकते, और जिनमें न विवेक है, न इच्छा, वे पहले से ही पापी हों और परमेश्वर के सामने दण्ड के योग्य ठहरें, संत पौलुस के उस कथन के अनुसार, जो उन्हें क्रोध की सन्तान कहता है।
फिर भी चाहे हम चाहें या न चाहें, हमें अपने आप को दण्ड के योग्य मानना ही पड़ेगा। जैसे ही नन्हे बच्चे कोई संकेत देने के योग्य होते हैं, यह निश्चित है कि वे यह भली-भाँति और आवश्यकता से अधिक प्रकट कर देंगे कि वे हठीले और दुष्ट हैं, और उनमें कोई गुप्त विष छिपा हुआ है। और यद्यपि वे उसे आरम्भ में बाहर नहीं निकालते, तौभी वे सांपों के बच्चों के समान हैं। जब ऐसा ही है, तो हम समझ लें कि पौलुस बिना कारण हमें यहूदियों के समान क्रोध की सन्तान नहीं कहता, और वह उन शिशुओं तक को इससे बाहर नहीं रखता, जिन्हें लोग निर्दोष कहते हैं और वैसा ही मान लेते हैं। क्योंकि हमें अपनी धारणा को, या उन बातों को जो हमारी आँखों के सामने दिखाई देती हैं, नहीं देखना चाहिए, परन्तु परमेश्वर को महिमा देनी चाहिए, जो इसका सक्षम न्यायी है, चाहे हम इसे समझ न पाएँ। संसार चाहे कैसा ही चले, हमें सदैव उसी बात पर लौटना होगा जो इक्यावनवें भजन में कही गई है, अर्थात् कि हम न केवल प्रतिदिन नाना प्रकार से परमेश्वर के विरुद्ध अपराध करते हैं, वरन् पहले ही से, इससे भी पूर्व कि हमने कुछ किया या सोचा हो, उसके सम्मुख घृणित हैं, क्योंकि हम पाप और शाप में उत्पन्न हुए थे। और इस शब्द के द्वारा
क्रोध की सन्तान, पौलुस का अर्थ यह है कि हम मृत्यु के उत्तराधिकारी हैं, और जैसे ही हम गर्भ में आते हैं, परमेश्वर का हमारा शत्रु होना अवश्य ठहरता है। तौभी परमेश्वर निर्दयी नहीं है, और वह उन वस्तुओं से बैर नहीं रखता जो उसके अपने हाथ की बनाई हुई हैं। यह तब सच होता यदि हममें वैसी ही शुद्धता होती जैसी हमारे आदिपिता आदम में थी, इस वचन के अनुसार कि परमेश्वर ने जो कुछ बनाया वह अच्छा था। तब तो परमेश्वर को हममें अपनी ही रचना से घृणा करनी पड़ती। परन्तु हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि जब वह हमसे बैर रखता है और मानो हम सब से बदला लेने को सन्नद्ध है, तो हमने इसे भली-भाँति कमाया है। और यद्यपि पाप को, जैसा कि आप कहेंगे, उँगली से दिखाया नहीं जा सकता, तौभी परमेश्वर उसे भली-भाँति जानता है, और हमें इस पर मुँह बन्द रखना चाहिए। पौलुस के अभिप्राय पर इस पाठ को लागू करते हुए हमें यही सार निकालना है। क्योंकि यदि यहूदी, जिन्हें कोई विशेष अधिकार प्राप्त प्रतीत होता था या होना चाहिए था,
तौभी मनुष्यों की सामान्य दशा में गिने गए हैं, तो हम जो अन्यजाति में उत्पन्न हुए हैं, यदि परमेश्वर के सम्मुख कोई घमण्ड दिखाने का साहस करें, तो क्या कह सकते हैं? सो हमारे लिए दुगुनी लज्जा का पर्याप्त कारण है, क्योंकि जिनकी तुलना में हम कुछ भी नहीं हैं, उन्हें भी परमेश्वर के राज्य में प्रवेश केवल उसकी मुफ़्त दया से, और हमारे प्रभु यीशु
मसीह के द्वारा मेल-मिलाप पाने से ही मिलता है।
परन्तु एक और प्रश्न या शंका बाकी है। क्योंकि यहूदी परमेश्वर के शत्रु कैसे हो सकते थे, जबकि वह पहले ही उनका पिता होना स्वीकार कर चुका था? कोई कह सकता है कि जिन बातों की छाया दिखाई गई थी, उनका सत्य और सार अभी पूरा होना बाकी था। परन्तु हमें आगे यह भी ध्यान देना चाहिए कि यद्यपि परमेश्वर ने अब्राहम में यहूदियों को ग्रहण किया था, तौभी वे यीशु मसीह में ग्रहण किए गए, और वह अनुग्रह उसी पर आधारित था, इस वचन के अनुसार, "तेरे वंश के द्वारा पृथ्वी की सारी जातियाँ आशीष पाएँगी।" और हम गलातियों की पत्री में देख चुके हैं कि वह वंश हमारे प्रभु यीशु मसीह को सूचित करता है, क्योंकि उसके बिना कोई एकता नहीं, केवल पूर्ण बिखराव है। जब ऐसा है, तो इसमें आश्चर्य नहीं कि कलीसिया में यहूदियों का ग्रहण किया जाना, और अन्यजातियों का भी, यहाँ पौलुस परमेश्वर की केवल मुफ़्त दी हुई भलाई ही को ठहराता है।
तथापि एक दूसरी बात भी है जिसे भूलना नहीं चाहिए: वह यह कि यद्यपि यहूदियों ने ऐसा अनुग्रह पाया था, तौभी वे छुड़ानेवाले के आने तक अनिश्चय में ठहरे रहे। और इसी कारण हम किसी और स्थान पर देखेंगे कि जो निकट थे और जो दूर थे, दोनों उसी के द्वारा मेल-मिलाप में लाए गए। क्योंकि हम जानते हैं कि लहू बहाए बिना परमेश्वर के साथ कोई प्रायश्चित नहीं हो सकता। अब व्यवस्था के बलिदान पाप को दूर नहीं कर सकते थे, न परमेश्वर के क्रोध और शाप को शान्त कर सकते थे। जब मनुष्य बैल, बछड़े या मेम्ने का लहू चढ़ाते थे, तो वह परमेश्वर के साथ प्रायश्चित करने के लिए नहीं था;
उन पशुओं में ऐसी कोई शक्ति नहीं थी, क्योंकि नाशमान वस्तु आत्मा तक नहीं पहुँचती। इसलिए यह निष्कर्ष निकलता है कि यहूदी आशा के द्वारा परमेश्वर की सन्तान थे, और तौभी जब तक छुड़ानेवाले की देह में प्रायश्चित पूरा न हुआ, वे उससे पूरी तरह अलग थे। और इसी रीति से परमेश्वर ने उन पर वैसी ही कृपा दिखाई जैसी शेष संसार पर। और इसी कारण पौलुस यह भी जोड़ता है कि परमेश्वर ने, जो दया का धनी है, उन्हें भी जिलाया, जैसा अन्यजातियों को, अपने उस बड़े प्रेम के अनुसार जिससे उसने उनसे प्रेम किया।
मुख्य बात (जैसा मैंने आज प्रातः आपसे कहा) जिसे पौलुस उठाता है, यह है कि हम अपनी मूल दशा की ओर लौटकर, और यह विचार करके कि परमेश्वर हमें किस दशा में पाता है, और जब
परमेश्वर हमारी ओर अपना हाथ बढ़ाता है तब हम किस कालकोठरी से निकलते हैं, अपनी दुर्दशा पर लज्जित हों, वरन् उससे घृणा करना सीखें। और दूसरी बात यह कि हम उसकी भलाई को और भी अधिक बढ़ाकर मानें, क्योंकि यह अविश्वसनीय बात है कि वह जीवन के सिद्धान्त को नरक की तली तक उतार लाने की कृपा करे ताकि हमें जिलाए, क्योंकि हम वहीं धँसे हुए थे। इसलिए हमें इन शब्दों पर भली-भाँति ध्यान देना चाहिए, जहाँ कहा गया है कि परमेश्वर ने, जो दया का धनी है, हमें जब हम मरे हुए थे, अपने उस बड़े प्रेम के अनुसार जिलाया जो वह हमसे रखता है। सच है कि यह उपाधि परमेश्वर पर सदा ही लागू हो सकती थी, क्योंकि वह न घटता है न बढ़ता है, और इस प्रकार परमेश्वर सदैव भलाई में धनी रहेगा। परन्तु हमें स्थान की परिस्थिति और उस विषय पर भी ध्यान देना चाहिए जिसकी चर्चा पौलुस यहाँ करता है, अर्थात् कि परमेश्वर ने हमारी दुर्दशा की गहराई के अनुसार अपनी दया के अनमोल भण्डार हम पर उंडेले हैं। और इसी कारण वह यह भी जोड़ता है कि उस बड़े प्रेम के अनुसार जिससे उसने हमसे प्रेम किया। क्योंकि परमेश्वर में ऐसी भलाई अवश्य रही होगी जो हमें मोह ले, क्योंकि वह हमारी सारी क्षमता से परे है, और चाहे हम उसमें कितना ही अपने आप को लगा दें, उसका सौवाँ भाग भी चख नहीं सकते।
और क्यों? क्योंकि जब पौलुस कहता है कि परमेश्वर ने हमसे प्रेम किया, तब वह विशेष रूप से अपनी और उन जैसों की चर्चा करता है, जो चुने गए थे
उसी जाति के बीच, जबकि उनमें से अधिकांश काट डाले गए। क्योंकि यद्यपि यहूदी पहिलौठे थे और उत्तराधिकार के अधिकार से हम पर उनकी श्रेष्ठता थी, और हम तो केवल असमय जन्मे हुए तुच्छ जनों के समान हैं, जैसा कि पौलुस अपने विषय में कहता है, तौभी हम देखते हैं कि वे अब परमेश्वर के राज्य से निकाल दिए गए हैं और ऐसा उदाहरण बन गए हैं जिसे देखकर हमारे सिर के बाल खड़े हो जाने चाहिए, जब हम उन पर प्रकट किए गए परमेश्वर के क्रोध और दण्ड को देखते हैं। इसलिए, जबकि पौलुस और कुछ थोड़े से और लोग यहूदियों में से चुने गए, तो यह परमेश्वर के उस प्रेम के कारण था जो उनकी ओर अधिक प्रत्यक्ष दिखाई देता था। वैसे ही आजकल, यदि सुसमाचार का प्रचार सारे संसार में शुद्ध रीति से होता, और विश्वास सब मनुष्यों को बिना भेदभाव के दिया जाता, ऐसा कि कोई ऐसा न रहता जिसे पवित्र आत्मा तुरन्त न छूता, और हम सब एक समान होते, तो यह प्रकृति के सामान्य क्रम के समान प्रतीत होता। और जैसे खाना-पीना सब मनुष्यों के लिए समान है, वैसे ही ऐसा लगता कि यह हमें अपनी ही स्वाभाविक प्रेरणा से मिला है, और यह परमेश्वर का कोई विशेष अनुग्रह नहीं है। परन्तु जब हम इतने देशों को भूख से तड़पते देखते हैं, ऐसा कि उन पर अच्छे सिद्धान्त की एक बूँद भी नहीं बरसती, वरन् बेचारे लोग शैतान के झूठ और छल-प्रपंचों से पाले जा रहे हैं, और दूसरी ओर परमेश्वर हमें यहाँ ज्योति देता है और अपने वचन से हमें सींचता है, तो यह उस बड़े प्रेम को छोड़ और किससे आता है जिसकी चर्चा पौलुस यहाँ करता है? फिर, बहुत से मनुष्यों के कान सुसमाचार से भरे रहते हैं, तौभी मनुष्यों की आँखों को स्पष्ट दिखाई देता है कि वे उससे कठोर-मन हो जाते हैं और बद से बदतर होते जाते हैं। क्योंकि यह निश्चित है कि पोप-तन्त्र में भी इतने भयानक राक्षस न मिलेंगे जितने वहाँ मिलते हैं जहाँ सुसमाचार का प्रचार और अंगीकार किया जाता है, क्योंकि वे कहेंगे कि हम सुधारे गए हैं, और फिर भी वे साक्षात् देहधारी शैतान जैसे दिखाई देते हैं, और ऐसे दृश्य देखने के लिए हमें दूर जाने की आवश्यकता नहीं। सो हम यहाँ ध्यान दें कि हमें यह कल्पना नहीं करनी चाहिए कि हम में से किसी के पास अपने साथियों से बढ़कर कुछ है जिससे वह परमेश्वर को प्रसन्न करे, और न अपने आप को कुछ समझना चाहिए। इसके विपरीत, हमें सदा उस सोते के पास लौटना चाहिए जो कभी सूखता नहीं, और उन गड्ढों के पास नहीं जाना चाहिए जो छेदों से भरे हैं और पानी नहीं रोक सकते, या यों कहें कि जिनमें कीचड़ और मैल के सिवाय कुछ नहीं है
(क्योंकि मनुष्यों की सारी शान और ठाठ-बाट इससे अच्छी नहीं), वरन् हमारे परमेश्वर के उसी प्रेम से जल भरें, और मान लें कि परमेश्वर को किसी और के द्वारा मनाया या प्रेरित नहीं किया जाना है, परन्तु केवल यह कि उसे यही भाया कि वह हमसे मुफ़्त प्रेम करे, हमें अपना ले, और सुसमाचार के विश्वास में अपने पवित्र आत्मा से हमें ज्योति दे। और इस प्रकार तुम देखते हो कि पौलुस
का यहाँ क्या अभिप्राय था।
अब दूसरी ओर, इसलिए कि मनुष्य (जो सदा चतुराई से काम लेते हैं और कोई न कोई बहाना या छिपने की जगह ढूँढ़ते रहते हैं) शैतान के अत्याचार के अधीन होने का बहाना बनाकर अपने आप को निर्दोष न ठहराएँ, या यह न कहें कि यह उनके सिर नहीं मढ़ा जाना चाहिए, पौलुस दिखाता है कि वह दासत्व स्वेच्छा से ही है। मैंने आज सुबह तुम्हें दिखाया कि हमारे सारे स्वतंत्र चुनाव के होते हुए, और हमारी बुद्धि और इच्छा के होते हुए भी, हम मानो शैतान की सेवा में जकड़े हुए हैं, ऐसा कि हम सारी दुष्टता के सिवाय कुछ कर ही नहीं सकते, और यदि परमेश्वर ने हम पर दया न की होती तो हम स्वभाव से संसार के सबसे निकृष्ट चोरों से किसी प्रकार अच्छे न होते, जैसा कि पौलुस अन्य सब मनुष्यों को हमारे सामने दर्पण के समान रखता है, यहाँ तक कि उन्हें भी जो परमेश्वर और सारी व्यवस्था-मर्यादा को तुच्छ जानते हैं, और शैतान के द्वारा सब प्रकार के उपद्रव में धकेले जाते हैं, और कहता है कि यदि परमेश्वर हम पर दयालु न हुआ होता तो हम भी उन्हीं के समान होते।
परन्तु अब बहुत से ऐसे हैं जो परमेश्वर पर कुड़कुड़ाते हैं और उससे मुकद्दमा लड़ते हैं, यह कहकर: यदि स्वतंत्र इच्छा इतनी बिगड़ गई है, तो हमारा क्या होगा? यदि मनुष्य अपने आप को भलाई में लगा सकते, और फिर भी उसकी कुछ परवाह न करके बुराई में लग जाते, तो निश्चय ही यह उचित और न्यायसंगत होता कि वे दोषी ठहराए जाएँ। परन्तु यदि वे बुराई के सिवाय कुछ कर ही नहीं सकते, तो परमेश्वर उन्हें दोषी क्यों ठहराए? कम से कम उन्हें सहा तो जाना चाहिए, क्योंकि यह प्रत्यक्ष है कि वे अपनी माता के गर्भ से ही शैतान के अधिकार में रखे गए हैं। देखो, बहुत से लोग अपने हाथ धोने की आशा में क्या-क्या कहते हैं। और वे तो व्यर्थ बहानों से अपने आप को निर्दोष ठहराकर ही सन्तुष्ट नहीं होते, वरन् परमेश्वर की निन्दा भी करते हैं, मानो अपने नाश का कारण वही हो। परन्तु
पौलुस, ऐसी निन्दाओं को रोकने के लिए, कहता है कि जो शैतान और पाप की दासता में हैं वे इस सब के होते हुए भी उचित रीति से दोषी ठहरते रहते हैं। क्योंकि वे बलपूर्वक उसमें नहीं धकेले जाते: वे अधीन तो हैं, परन्तु अपनी ही अच्छी इच्छा से।
और इसीलिए वह कहता है कि जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के पास लौटा लाए गए हैं वे भी शरीर की लालसाओं में चलते थे; अर्थात् इससे पहले कि परमेश्वर ने उन्हें बदला, और अपने पवित्र आत्मा के द्वारा अपनी आज्ञाकारिता में लाया, वे अपनी ही दुष्ट लालसाओं में चलते थे।
यह सच है कि मनुष्य मान लेंगे कि उनका स्वभाव पापी है, परन्तु फिर भी वे कहते हैं कि इतना पर्याप्त है कि इच्छा कुछ और हो। सब मनुष्य मान लेंगे कि यह इच्छा ही है जो पाप और पुण्य में भेद करती है। परन्तु जब दार्शनिक इस रीति से बोलते थे, तो उनकी यह धारणा थी कि हमारी इच्छा स्वतंत्र और निर्बाध है। और यही बात उन्हें भ्रम में डालती थी, क्योंकि वे नहीं जानते थे कि हम आदम के पतन से बिगड़ गए हैं, और फिर भी उचित रीति से शापित होना नहीं छोड़ते, क्योंकि परमेश्वर को अप्रसन्न करना हम अपनी ही अच्छी इच्छा से करते हैं। और इसलिए वह फिर आगे जोड़ता है, अपने शरीर और अपने विचारों की इच्छाओं को पूरा करते हुए।
मानो वह कह रहा हो कि जो शैतान के वश में हैं, और पाप की दासता में रखे गए हैं, वे कोई विवशता का बहाना नहीं बना सकते। क्यों? क्योंकि यह उनकी अपनी ही इच्छा है जो उन्हें उसकी ओर धकेलती है। इस प्रकार तुम देखते हो कि सार रूप में कैसे
संत पौलुस का अभिप्राय सब निन्दकों के मुँह बन्द करना था, ताकि मनुष्य यह बहाना बनाकर परमेश्वर से झगड़ा न करें कि उन्हें उनकी दुष्टता का दोषी नहीं ठहराना चाहिए, क्योंकि वे स्वभाव से ही उसके अधीन हैं। परन्तु इसके साथ यह भी ध्यान दें कि संत पौलुस ने विचारों को शरीर के साथ कैसे जोड़ा है, ताकि हम जानें कि पाप हम में सर्वत्र व्याप्त है, और हम में कोई भाग ऐसा शुद्ध और निर्मल नहीं जहाँ यह विष न फैला हो। क्योंकि पोप के अनुयायी यह तो मान ही लेंगे कि हम आदम में भ्रष्ट हो गए हैं, परन्तु वे कहते हैं कि जब हमें परीक्षा होती है तब हमारा झुकाव सदा बुराई की ओर तो होता है, फिर भी यदि हम विवेक की सुनें, और अपनी अभिलाषाओं पर भली रीति से अंकुश लगाकर उन्हें वश में रखें, तो हम प्रत्यक्ष देखेंगे कि हम भलाई करने में सर्वथा असमर्थ नहीं हैं।
और इस प्रकार पोप के अनुयायियों का मत यह है कि मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा में वह सामर्थ्य नहीं रही जो आरम्भ में थी, परन्तु वह घायल हुई है, हाँ, बुरी रीति से अपंग भी हो गई है, तो भी उसमें अब तक कुछ जीवन बचा है, अर्थात् जैसा वे कल्पना करते हैं, कुछ सद्गुण शेष है।
परन्तु हमने आज प्रातःकाल देखा कि पवित्र आत्मा का निश्चित निर्णय इससे कहीं अधिक व्यापक है, अर्थात् यह कि हम केवल रोगी ही नहीं वरन् मरे हुए हैं, जब तक यीशु मसीह के द्वारा फिर जिलाए नहीं जाते। अब संत पौलुस इसी बात की पुष्टि करता है, और कहता है कि केवल हमारी दुष्ट अभिलाषाएँ और वे भावनाएँ, जिन्हें इन्द्रियों की लालसाएँ कहा जाता है, जिनमें हम पशुओं के समान हैं, ही हमें इधर-उधर नहीं खींचतीं, परन्तु हमें इस विषय को और कठोरता से लेना चाहिए। हमारे सब विचार, हमारे सब निश्चय, और मनुष्य में जो कुछ भी सबसे उत्तम माना जाता है, वह सब क्या है? संत पौलुस कहता है कि वे निरी दुष्टता हैं। क्योंकि यदि परमेश्वर हमें हमारे ही विचारों के पीछे चलने दे, तो निश्चय है कि उससे बढ़कर भयानक गड़बड़ी और कुछ न होगी।
इसलिए हम देखते हैं कि यहाँ मनुष्य आधे-अधूरे रीति से नम्र नहीं किए जाते कि केवल अपनी दुर्बलता मान लें और यह स्वीकार करें कि उन्हें परमेश्वर की ओर से कुछ सहायता की आवश्यकता है। इसके विपरीत, हम देखते हैं कि वे उसके सामने पूरी रीति से दोषी ठहरे हैं, क्योंकि यहाँ उनके विचार दुष्ट और टेढ़े कहे गए हैं, और उनमें ऐसा कुछ भी नहीं जो परमेश्वर के क्रोध को उन पर भड़कने से न रोके। इसलिए एक ओर हम अपने आप को दोषी मानें, और निश्चय जानें कि आदम में हम परमेश्वर के सब अनुग्रहों से उचित रीति से वंचित किए गए। और दूसरी ओर, हम इसे बहाना न बनाएँ, इस आशा में कि ऐसी युक्ति से बच निकलेंगे, मानो हम पाप के दास नहीं, और हम स्वयं उसके लिए किसी रीति से दोषी नहीं, क्योंकि हम जन्म ही से शैतान के फन्दों और जालों में जकड़े हुए हैं। परन्तु हमें सदा यह विचार करना चाहिए कि हम में से हर एक अपने रोग का स्रोत अपने ही विवेक में पाएगा। मनुष्य जितना चाहें बहस कर लें, परन्तु यदि वे प्रवेश करें
अपने भीतर, और अपने विवेक से पूछें, तो तुम उन्हें बिना किसी उत्तर के दोषी और लज्जित देखोगे। जब मनुष्य जो कुछ कह सकता था कह चुका, और समझता है कि उसने बाज़ी जीत ली, यह कहकर कि उसकी अपनी कोई स्वतंत्र इच्छा नहीं, और न परमेश्वर का सामना करने की सामर्थ्य है, तो फिर बस यही एक बात कहना शेष रहता है: तू क्या समझता है कि वह कौन है जो तुझे बुराई की ओर उकसाता है? अरे, वह तो शैतान है। तू ठीक कहता है। परन्तु थोड़ा ध्यान दे कि क्या यह तुझे पूरी रीति से निर्दोष ठहराता है, या तू भली भाँति नहीं जानता कि तू अपने ही मन की प्रेरणा से उकसाया और धकेला गया था? क्या तू नहीं जानता कि बुराई का स्रोत और जड़ तुझ ही में है? जब तू परमेश्वर के विरुद्ध ऐसा विद्रोही है, कि तेरे विचार असत्य और अविश्वास से भरे हैं, और इतने अधिक इसलिए कि तेरी अभिलाषाएँ मर्यादा से बाहर हैं, और परमेश्वर तथा उसकी धार्मिकता के विरुद्ध पाँति बाँधे खड़ी हैं, यहाँ तक कि उसी से युद्ध करती हैं: जब तू यह सब देखता है, तो क्या तुझे अब भी उससे बहस करनी चाहिए?
इसलिए हम कोई बचाव के छिद्र न खोजें, क्योंकि हम अपने साथ, वरन् अपने भीतर, एक पर्याप्त न्यायी लिए फिरते हैं, अर्थात् हम में से हर एक का अपना विवेक हमें दोषी ठहराता है। इस अंश में संत पौलुस का लक्ष्य यही था। और इससे हमें यह चेतावनी भी मिलती है कि हम अपने ऊपर किसी बात का भरोसा न करें, परन्तु अपनी सब इन्द्रियों और कल्पनाओं पर, और उस सारी समझ और तर्क पर जो हम अपने में समझते हैं, लगाम लगाएँ। क्योंकि जब तक हम अपने आप का इस प्रकार त्याग न करें, निश्चय है कि हम कभी परमेश्वर की सेवा में लगने के योग्य न होंगे।
और संत पौलुस स्पष्ट कहता है कि जिन्हें परमेश्वर ने जिलाया है वे इसी रीति से हमारे प्रभु यीशु मसीह के सहभागी बनाए गए हैं, क्योंकि उन्हें जीवन उसी में मिलता है। यह सच है कि हमें उसे परमेश्वर के अस्तित्व में खोजना चाहिए: तो भी, क्योंकि वह हमारे लिए बहुत ऊँचा है, यहाँ तक कि हम उस तक पहुँच नहीं सकते, वरन् उसके निकट भी नहीं पहुँच सकते, इसलिए हमारे प्रभु
यीशु को मार्ग कहा गया है। और वह अपने आप को हमारे सामने रखता है, और इसकी बाट नहीं जोहता कि हम उसे ऐसे खोजें मानो वह हम से दूर हो, परन्तु अपनी बाहें फैलाकर हमें अपनी ओर खींचता है, यहाँ तक कि अपने सुसमाचार में वह कहता है, "यदि कोई
प्यासा हो तो मेरे पास आकर पीए।" और यह उसके व्यक्तित्व में पूरा होता है, जैसा पहले कहा जा चुका है।
इसलिए इस बात पर ध्यान दिया जाए, जहाँ संत पौलुस कहता है कि जो पहले मरे हुए थे वे यीशु मसीह के द्वारा फिर जिलाए गए। और यहाँ हम उस बात को और भी स्पष्ट देखते हैं जिसकी चर्चा मैंने आज प्रातःकाल संक्षेप में की थी: अर्थात् यह कि संत पौलुस किसी दिखाई देनेवाली मृत्यु की बात नहीं करता, जिसका न्याय मनुष्य बाहरी दृष्टि से कर सकते हैं, परन्तु उस भ्रष्टता की जो हमारी आत्माओं में है, क्योंकि वह हम सब में दोष पाता है। तो फिर हम स्वर्गीय जीवन को कैसे प्राप्त कर सकते हैं? हम कैसे उठाए और जिलाए जाएँगे कि उस विरासत के अधिकारी हों जिसकी हमसे प्रतिज्ञा की गई है? दूसरी ओर हम देखते हैं कि हम जितने कष्ट हो सकते हैं उन सब के अधीन हैं। इसलिए यह अवश्य उस नए जीवन के विषय में कहा गया है जिसकी चर्चा वह अन्य स्थानों पर करता है। अब निश्चय है कि यह जीवन हम में अभी सिद्ध नहीं हुआ है: इसका केवल थोड़ा-सा आरम्भ है, जो हमें आगे ले चलने और अन्त तक पहुँचाने के लिए है, और वह अन्त तब होगा जब हम उस पूर्ण महिमा में पहुँचेंगे जिसकी चर्चा वह यहाँ करता है।
और हम यह भी देखते हैं कि पौलुस ने अपने आप को एक उदाहरण के रूप में रखते हुए यह कहा कि उसने हमारे प्रभु यीशु मसीह के लिये सब कुछ त्याग दिया, यहाँ तक कि अपनी धार्मिकता के विषय में जो मूर्खतापूर्ण धारणा उसे थी उसे भी, इतना कि यद्यपि लोग उसे एक छोटा-सा स्वर्गदूत समझते थे, तौभी वह जानता था कि उसे यीशु मसीह में परमेश्वर के सेंतमेंत अनुग्रह ही से उद्धार पाना आवश्यक है। और अपने सारे सम्मान और धन के बदले उसने इतनी निन्दाएँ, इतनी यातनाएँ, इतनी मार और इतने बन्दीगृह सहे कि कोई कहता कि वह संसार से ऊपर उठा लिया गया है। तौभी वह आगे यह कहता है, कि ऐसा नहीं कि मैं लक्ष्य तक पहुँच चुका हूँ, परन्तु मैं अपने आप को आगे की ओर खींचता हूँ और बीते समय को भूल जाता हूँ। क्योंकि यदि मैं उन बातों पर ठहर जाऊँ
जो मैं कर चुका हूँ, और कहूँ कि मैं इतनी मुठभेड़ों में विजयी हुआ, मैंने ऐसी वीरता दिखाई, मैंने हर जगह सुसमाचार प्रचार करना नहीं छोड़ा, मैंने ऐसा काम किया कि मेरे सिद्धान्त का फल
सारे संसार में पहुँचा, मैं समुद्र पार गया, मैं ऐसी असभ्य जातियों के बीच रहा जहाँ परमेश्वर और उसके सुसमाचार की चर्चा पहले कभी सुनी ही न गई थी, मुझ पर बहुत सी रुकावटें आईं और मैं उन सब पर जयवन्त हुआ, मैंने इतने शत्रुओं का सामना किया और उन सब पर प्रबल हुआ। यदि पौलुस इन सब बातों को मन में रखता, तो वह ठण्डा पड़ जाता, क्योंकि जब हम एक बार अपने मन में यह सोचते हैं, "हाय, मैंने अपनी ओर से बहुत कर लिया, अब दूसरे अपनी पंक्तियों में आगे बढ़ें," तो पीछे हट जाना हमारे लिये सरल होता है। और इस प्रकार हम में से हर एक कुछ न कुछ पाकर विदा ले लेता,
न जाने क्या। परन्तु पौलुस कहता है कि वह बीते समय को भूल जाता है, ताकि आलस्य का वह अवसर कट जाए जो उसके मन में आ सकता था; और वह कहता है कि वह अपने आप को आगे की ओर खींचता है और उसे पाने के लिये बाँहें फैलाए रहता है।
और पौलुस कब तक अपने आप को आगे खींचता रहा? अन्त तक।
तो आओ हम भली भाँति ध्यान दें कि हमारी महिमा कभी सिद्ध न होगी, अर्थात् जिस महिमा की हम बाट जोहते हैं उसका पूरा आनन्द हम अन्त तक कभी न उठा पाएँगे। इसलिये हमें सदा अपनी दीनता से चेतावनी लेनी चाहिए, परमेश्वर के सामने उस पर विलाप करना चाहिए, और मान लेना चाहिए कि हम सब कुछ के लिये केवल उसी की भलाई के ऋणी हैं। अब हमारी दशा चाहे जैसी हो, हम देखते हैं कि परमेश्वर की आत्मा के द्वारा हम नये जीवन के लिये सुधारे गए हैं, और यद्यपि हम अविश्वासियों के बीच रहते हैं और अनेक दुःखों के अधीन हैं, वरन् हम में पाप भी बसा हुआ है, तौभी हम में से ऐसा कोई नहीं जो यह न अनुभव करे कि परमेश्वर ने अपने पवित्र आत्मा की जो बयाना हमें दी है वह न व्यर्थ है और न निष्फल।
यदि कोई यह कहे कि जब तक यीशु मसीह हम में कार्य नहीं करता उससे पहले भी हम में कुछ जीवन तो है, जैसा देखा जाता है, तो इसका उत्तर आज सवेरे संक्षेप में दिया जा चुका है: कि जो कुछ भी मनुष्यों में स्वभाव से है वह उन्हें परमेश्वर तक नहीं पहुँचा सकता, वरन् उन्हें इसी संसार में टिकाए रखता है; इसलिये जब स्वर्गीय जीवन की बात हो तो उसमें से किसी का भी लेखा नहीं होना चाहिए। तब लोग चारों ओर से हम पर तालियाँ बजाएँ:
तौभी जब परमेश्वर हमारी गर्दन पर से लगाम ढीली छोड़ देता है और हमें अपनी ही कल्पना और रुचि के अनुसार चलने देता है, तो हम मरे हुए ही हैं। मनुष्य में कुछ तर्कशक्ति तो हो सकती है, परन्तु जब तक वह अपने ही स्वभाव में है तब तक वह क्या कर सकती है? वह परमेश्वर के और सारे सत्य के विरुद्ध लड़ेगी। तौभी वे कहते हैं कि मनुष्य में इच्छा है; परन्तु वही इच्छा दुष्ट है। यह सच है (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) कि उसमें कोई सामर्थ्य नहीं। तौभी, क्योंकि मनुष्य दुष्ट और हठीला है, और उसके भीतर विद्रोह की शापित जड़ है, ऐसी कि वह बुराई के सिवाय और कुछ कर ही नहीं सकता, वह स्वेच्छा से परमेश्वर को अप्रसन्न करता है। और जब ऐसा है, तो हम साहस के साथ यह निष्कर्ष निकालें कि जब तक हम अपने प्रभु यीशु मसीह के जीवन में सहभागी नहीं बनाए जाते तब तक हम मृत्यु में हैं, और वह उस आत्मा को जो उसने पाया है हम में से हर एक को उतनी मात्रा में देता है जितनी वह चाहता है, जैसा कहा गया है कि परमेश्वर की आत्मा उस पर ठहरी और उसे भरपूरी से दी गई, और अब उसे अपने विश्वासियों में से हर एक को बाँटना है। इसलिये जैसे हमारा प्रभु यीशु
मसीह हमें अपने पवित्र आत्मा का स्वाद चखाता है, और जिस मात्रा में वह उसके द्वारा हमें बलवन्त करता है, उसी मात्रा में हम उसमें और उसके साथ जिलाए जाते हैं।
अब इस पर वह यह जोड़ता है कि उसने हमें अपने प्रभु यीशु मसीह के साथ स्वर्गीय स्थानों में बैठाया है। यह उस अनुग्रह को, जिसकी चर्चा हम अब तक कर चुके हैं, और भी अधिक बढ़ाकर दिखाता है। यदि वह एक ही शब्द में कह देता कि हम जिलाए गए, तो वह पर्याप्त होता, और उससे हमारे हृदय परमेश्वर की स्तुति गाने, उसी में लगे रहने और अपना सारा प्रयत्न उसी में लगाने के लिये अवश्य भड़क उठने चाहिए थे। परन्तु हमारी ठण्डक और आलस्य के कारण यहाँ और अधिक ज़ोर दिया गया है।
क्योंकि पौलुस ने एक ओर यह दिखाया है कि हम मरे हुए थे और शैतान के अत्याचार के अधीन बँधुआई में पड़े थे। हाय, ये भयानक बातें हैं। और अब दूसरी ओर वह यह बताता है कि परमेश्वर ने न केवल हमसे प्रेम किया, वरन् हमें अपने में महिमा भी दी, और हम नरक की तलहटी से उठाकर स्वर्ग के राज्य तक ऊँचे पहुँचाए गए हैं, जहाँ उसने हमें बसाया है और अपने स्वर्गदूतों के बीच हमें आसन दिए हैं।
तो जब हम यह सुनते हैं, तब यदि हम अपने परमेश्वर की अनमोल भलाई की महिमा करने में पूरी गम्भीरता न दिखाएँ, और यह निष्कर्ष न निकालें कि हम उसके इतने ऋणी और उससे इतने बँधे हुए हैं कि यदि हम जीवन भर और कुछ न करके केवल उस अनुग्रह का प्रचार करते रहें जिसे हमने उसके हाथ से अनुभव करके जाना है, तब भी वह कुछ भी नहीं होगा, तो हम निश्चय ही बहुत मूढ़ और हमारी बुद्धि बहुत पशुओं जैसी है। और इस प्रकार तुम देखते हो कि पौलुस ने जानबूझकर क्यों लिखा कि हम यीशु मसीह के साथ स्वर्ग तक उठाए गए हैं।
और इस पर से हमें एक बहुत लाभदायक उपदेश ग्रहण करना है, वह यह कि यद्यपि हम यहाँ कीचड़ में हैं और बेचारे मेंढकों की नाईं रेंगते ही हैं, तौभी हमें इस दशा को धीरज से सहना चाहिए, क्योंकि दूसरी ओर परमेश्वर ने हमें, जो कुछ भी न थे, वरन् शापित प्राणी भी थे, इतना ऊँचा उठा लिया है। इसलिए जब कभी हमें इस जगत में भूख और प्यास सहनी पड़े, या अविश्वासियों से उपहास सहना पड़े, या बहुत से अत्याचारों को झेलना पड़े, तो हम उसी बात की शरण लें जो यहाँ कही गई है: अर्थात् यह कि तौभी हम यीशु मसीह के साथ स्वर्ग में पहले ही बैठाए जा चुके हैं, चाहे ऐसे रीति से नहीं कि वह हमारी आँखों को दिखाई दे। क्योंकि इस विषय में हमें आशा को और उस बात को स्थान देना है जो एक और पद में कही गई है, अर्थात् यह कि हमारा जीवन छिपा हुआ है, और हमें तब तक चुपचाप ठहरे रहना है जब तक वह हमारे प्रभु के आगमन पर प्रकट न हो
यीशु मसीह के।
इस प्रकार तुम देखते हो कि सुसमाचार के विश्वास में बुलाए जाने के बाद परमेश्वर की सन्तानों की जिस भिन्न-भिन्न दशा की बात यहाँ कही गई है, उसे हमें वास्तव में किस रीति से समझना चाहिए। परन्तु इसके साथ हमें यह कल्पना नहीं करनी चाहिए कि इस जगत में कोई ऐसा पृथ्वी का स्वर्गलोक है जहाँ हमें न कष्ट होगा, न शोक; हमें यह मानना चाहिए कि हम यहाँ कभी चैन से न रहेंगे, परन्तु जैसा मैंने पहले कहा, हमें विश्वास को स्थान देना है। और इसके अतिरिक्त, जब पवित्र आत्मा पौलुस के मुख से यह प्रमाणित करता है कि हम ऊँचे उठाए जाएँगे, तब हमारे लिए आवश्यक है कि हम सिर झुकाए रहें, अपने आप को दबाए जाने दें
अपने शत्रुओं से, और उनके सारे घमण्ड के साथ उनसे हार जाने दें। मैं कहता हूँ कि हमें ये बातें सहनी होंगी, और फिर भी इसी बीच इस सिद्धान्त पर पूरी रीति से निश्चय और दृढ़ संकल्प रखना होगा कि इतने पर भी हम स्वर्ग के राज्य के अधिकारी होने से नहीं चूकेंगे, क्योंकि यह असम्भव है कि सिर अपने अंगों से अलग हो जाए, और हमारा प्रभु यीशु मसीह केवल अपने ही लिए वहाँ नहीं गया है।
हमें सदा उसी मूल सिद्धान्त की शरण लेनी चाहिए। हमारा यह मानना कि यीशु मसीह मरे हुओं में से जी उठा और स्वर्ग पर चढ़ गया, केवल उसे उसके अपने व्यक्तित्व में महिमा देने के लिए नहीं है। यह सच है कि सबसे पहले यह होना अवश्य है कि सब घुटने उसके सामने झुकें, और स्वर्ग और पृथ्वी के सब प्राणी, वरन् नरक के भी, उसकी अधीनता मानें। परन्तु तौभी, जिस एकता की चर्चा हम पहले कर चुके हैं, वह इसी में पूरी होती है कि यीशु मसीह ने हमें अपनी देह में इकट्ठा करके अपने ही में वह बात आरम्भ कर दी है जिसे वह हम में पूरा करना चाहता है, अर्थात् जब उचित समय आएगा। इसलिए,
यीशु मसीह स्वर्ग पर इसलिए चढ़ गया कि इन दिनों में हमारे लिए वह द्वार खोले जो आदम के पाप से हमारे लिए बन्द हो गया था, और यही हमारे उसके साथ पहले से बैठे होने की वास्तविक रीति है।
और इसके साथ ही पौलुस एक ही शब्द में बता देता है कि उसका अभिप्राय क्या था।
सच है, यह कथन अपने उचित स्थान पर और विस्तार से समझाया जाएगा, जहाँ पौलुस स्वयं अगले उपदेश में उसकी और विस्तृत चर्चा करेगा। तौभी हम देख सकते हैं कि उसका लक्ष्य क्या था, ताकि हमारे पास निशाना लगाने के लिए एक सच्चा और ठीक चिह्न हो: वह यह है कि हम अनुग्रह से उद्धार पाए हैं, और कोई मनुष्य अपनी ओर से किसी बात का दावा नहीं कर सकता। फिर भी हमारे लिए इतना ही पर्याप्त नहीं कि हमने एक शब्द में यह मान लिया कि हमारा उद्धार परमेश्वर की मुफ़्त कृपा से है, और इसे अपने भीतर भी अनुभव कर लिया, परन्तु हमें इसके साथ उसी अनुग्रह की असीम महानता से प्रेम भी करना चाहिए, यह सोचकर कि हम क्या हैं, कैसे सारी बुराई हम ही से उत्पन्न होती है, और इसमें इनकार की कोई गुंजाइश नहीं, क्योंकि हमारे दोष हमें बहुत अधिक दोषी ठहराते हैं, यहाँ तक कि यदि परमेश्वर
हम पर उससे सौ गुना अधिक कठोरता करे जितनी वह करता है, तौभी हम उससे न झगड़ सकते, न उससे विवाद कर सकते, वरन् अपने ही विवेक की यह साक्षी सदा हमारे पास रहती कि हम न्यायपूर्वक मृत्यु के योग्य हैं, और वह हमारे अपने कर्मों के कारण हमारा हक है।
तो जब बात ऐसी है, तब हम इस सिद्धान्त को दृढ़ता से थामे रहें, क्योंकि यदि हम एक बार जान लें कि हम में कोई एक-आध बुरा दाग ही नहीं, परन्तु असंख्य बुराइयाँ हैं, तो हमारे सारे जीवन के लिए हमें बड़ा लाभ होगा।
इसलिए आओ, हम अपने आप से अप्रसन्न होना, अपने आप से घृणा और बैर रखना सीखें, और फिर जब हम उस अनुग्रह के पास आएँ जो हमारे प्रभु यीशु मसीह में हमें दिखाया गया है, तब समझें कि उसके बिना शैतान को हम पर पूरा और सम्पूर्ण अधिकार चाहिए था और वह हम पर वैसे ही राज्य करता जैसा उसने पहले किया था। और यह भी ध्यान रखें कि हम ऐसे अनुग्रह से लाभ उठाएँ कि वह हमारे सारे शाप को दूर करने के काम आए। और तब हम निश्चय रखें कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमारी सारी दुर्दशाएँ न केवल हमारे लाभ के लिए बदल जाएँगी, परन्तु वह हमें ऐसा बल भी देगा कि हम अपनी दशा पर भली-भाँति गर्व कर सकें: और यद्यपि हमें बहुत सी परीक्षाओं से लड़ना पड़ता है, और हम अपनी ओर से निर्बल हैं, तौभी हम उन पर ऐसी रीति से जय पाएँगे कि हमें अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद करने का कारण होगा, क्योंकि उससे जुड़े होने के कारण
हम सब उत्तम वस्तुओं की पूर्ण सिद्धता तक पहुँचने से नहीं चूक सकते।
अब आओ, हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने दोषों को मानते हुए दण्डवत् करें और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उन्हें ऐसा अनुभव कराए कि हम केवल तीन-चार दोष ही न मानें, परन्तु अपने जन्म तक पहुँचकर यह भी मान लें कि हम में पाप के सिवा और कुछ नहीं, और हमारे परमेश्वर से हमारे मेल-मिलाप का और कोई मार्ग नहीं सिवा हमारे प्रभु यीशु
मसीह के लहू, मृत्यु और दुःखभोग के। इसलिए जितनी बार हम अपने भीतर कोई ऐसी चुभन अनुभव करें जो हमें परमेश्वर के अनुग्रह से भटकाए, और हमें उसके न्यायासन के सामने बुलाए, हम
