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पहले अध्याय पर छठा उपदेश - इफिसियों 1:15-18
उस दुर्दशा को जो हमारे अपने भीतर है। जब हम पाते हैं कि हमारे भीतर सब प्रकार की दुष्टता की कालकोठरी के सिवाय और कुछ नहीं है, तो हम सीखें कि उसकी धार्मिकता की शरण लें, उसे स्रोत ही से खोजें, और मानें कि उसने अपने आप को हमारे प्रति दयालु पिता प्रकट किया है। हम इस बात में सन्देह न करें कि इसके द्वारा उसका अभिप्राय हमें यह भी निश्चय दिलाना था कि उसने जगत की सृष्टि से पहले हमें लेपालक ठहरा लिया था, इसलिए कि हम सच्ची दृढ़ता से उसे पुकारते रहें और कभी हार न मानें।
और इसलिए आओ, हम सब कहें, हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता, इत्यादि।
पहले अध्याय पर छठा उपदेश 15. इस कारण मैं भी, उस विश्वास का समाचार सुनकर जो तुम लोगों में प्रभु यीशु मसीह पर है, और उस प्रेम का जो तुम सब पवित्र लोगों से रखते हो, 16. तुम्हारे लिये धन्यवाद करना नहीं छोड़ता, और अपनी प्रार्थनाओं में तुम्हें स्मरण किया करता हूँ।
17. कि हमारे प्रभु यीशु मसीह का परमेश्वर, जो महिमा का पिता है, तुम्हें अपने ज्ञान के लिये बुद्धि और प्रकाशन की आत्मा दे।
18. अर्थात् तुम्हारे मन की आँखें ज्योतिर्मय हों, ताकि तुम जान लो कि उसके बुलाने से कैसी आशा होती है, और पवित्र लोगों में उसकी मीरास की महिमा का धन कैसा है।
हम पहले ही देख चुके हैं कि सन्त पौलुस ने इफिसियों को उनके उद्धार के न केवल मुख्य बल्कि एकमात्र कारण तक पहुँचाया, और दिखाया कि उन्हें अनिवार्य रूप से सब कुछ परमेश्वर का ही ठहराना चाहिए, उसमें किसी मूर्खतापूर्ण अभिमान को मिलाए बिना, मानो वे यह कहें कि उन्होंने परमेश्वर के उस अनुग्रह को, जो उन्हें मिला, अपनी स्वतंत्र इच्छा से या अपने भीतर के किसी अच्छे अभिप्राय से आगे बढ़ाया था। इसलिए सन्त पौलुस ने वस्तुतः यह दिखाया है कि न केवल इफिसियों को, जिनसे वह बोल रहा था, बल्कि उन सब को भी जो पहले परमेश्वर की कलीसिया रह चुके थे, बिना किसी अपवाद के यह मानना चाहिए कि उनका सारा कल्याण परमेश्वर की ही स्वतंत्र भलाई से निकला, न केवल इसलिए कि वे सब हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा छुड़ाए गए थे, बल्कि इसलिए भी कि उसने उन्हें सुसमाचार पर विश्वास करने के लिये बुलाया था, उस चुनाव के अनुसार जो उसने जगत की सृष्टि से पहले उनका किया था।
और इसलिए भी कि उसने उन्हें सुसमाचार पर विश्वास करने के लिये बुलाया, जगत की सृष्टि से पहले उनके चुने जाने के अनुसार।
और अब वह इस सारे सिद्धान्त की पुष्टि उस साक्षी से करता है जो वह परमेश्वर को देता है, क्योंकि वह उसकी भलाई को बड़ा ठहराता है, तब भी जब वह मानो मनुष्य की आँख से और सब साक्षियों की दृष्टि से अलग हो।
सच है कि सुसमाचार के सिद्धान्त का मूल्य उस समय कम नहीं होना चाहिए जब वह सारे जगत के सामने खुले मुख से प्रचार और प्रकाशित किया जाता है, तो भी बोलनेवाले के लिये आवश्यक है कि वह उसे अपने हृदय में भली-भाँति अंकित रखे, और परमेश्वर तथा उसके
स्वर्गदूतों के सामने अपने आप से वही कहे जो वह मनुष्यों के सामने कहता है। नहीं तो वह केवल बकवाद, या यों कहें कि परमेश्वर के वचन का अपवित्र करना होगा, यदि कोई मनुष्य पुल्पिट पर चढ़कर स्वर्गदूत की नाईं बोले, और इस बीच उसके हृदय में ऐसा कोई अभिप्राय न हो, और जो बात वह कहता है उसका उसे स्वयं निश्चय न हो। इससे तो भला है कि मनुष्य सौ बार डुबा दिया जाए, बजाय इसके कि वह उद्धार और परमेश्वर के सत्य की सबसे उत्कृष्ट साक्षी चारों ओर पहुँचाए, और इस बीच जिस बात का वह प्रचार करता है उसका उसे स्वयं निश्चय न हो, ताकि परमेश्वर और उसके स्वर्गदूत जानें कि वही बात उसके हृदय में अंकित है। इसलिए यह अकारण नहीं है कि सन्त पौलुस ने परमेश्वर की उस स्वतंत्र भलाई का प्रचार करने के बाद, जिससे उसने जिन्हें चाहा चुना, और उन्हें अपने
सुसमाचार के ज्ञान में बुलाया जब उसने उन्हें चुन लिया, और अपने बलवन्त हाथ से उन्हें दृढ़ किया, और जब उसने उन्हें बुलाया तब उन्हें अजेय स्थिरता और दृढ़ता दी, अब यह जोड़ता है कि परमेश्वर जानता है कि उसकी यह साक्षी सच्चे मन से और निष्कपट है। क्योंकि वह यहाँ उन प्रार्थनाओं के विषय में, जो वह अकेले अपने आप करता है, जब कोई मनुष्य उसके विचार को नहीं जान सकता और न यह कि वह अपने मुँह से क्या कहता और बोलता है, यह प्रतिज्ञापूर्वक कहता है कि तब भी वह परमेश्वर के सामने उसी सिद्धान्त को मानता है, क्योंकि वह उससे विनती करता है कि जो काम उसने आरम्भ किया है उसे पूरा करने की कृपा करे। इसलिए यहाँ हमें सबसे पहले यह ध्यान देना है कि जो अपने परिश्रम को कलीसिया की उन्नति के लिये लाभदायक बनाना चाहते हैं, और जिनमें कोई सच्चा उत्साह है, उन्हें केवल सिखाने में ही नहीं लगना चाहिए, बल्कि साथ ही परमेश्वर से प्रार्थना भी करनी चाहिए कि वह अपनी सामर्थ्य और अनुग्रह से उनके साथ काम करे। क्योंकि प्रायः ऐसा होता है कि हम केवल पानी को पीटते हैं (हाँ, चाहे हमारे पास स्वर्गदूतों की जीभें हों), क्योंकि हम परमेश्वर से प्रार्थना नहीं करते कि जो सिद्धान्त हम प्रचार करते हैं उसे वह आगे बढ़ाए।
क्योंकि हम अपने आप से केवल निकम्मे औज़ार हैं, और जब उसने हमें बोलने की शक्ति दे दी है, तो उसे ही उसे प्रभावशाली भी बनाना होगा, जैसा लिखा है कि न तो लगानेवाला कुछ है, और न सींचनेवाला कुछ है, परन्तु बढ़ानेवाला परमेश्वर है। जब ऐसा है, तो जिन पर परमेश्वर की कलीसिया को सिखाने का भार है, वे भय और सावधानी से चलें, और केवल मनुष्यों को परमेश्वर के लिये जीतने का यत्न ही न करें, बल्कि नम्रता से यह भी मानें कि वे अपने आप से कुछ नहीं कर सकते, और वे केवल हवा में एक ध्वनि फेंकेंगे जो तुरन्त लोप हो जाएगी, यदि परमेश्वर अपनी आत्मा की गुप्त सामर्थ्य से उनके साथ काम न करे। इसलिए यही बात है जो हमें उन शब्दों पर स्मरण रखनी है जो सन्त पौलुस यहाँ कहता है।
परन्तु हम में से प्रत्येक को भी इसे सामान्य रूप से अपने ही उपयोग में लाना चाहिए।
इसलिए जब हम परमेश्वर का वचन सीखने आते हैं, या जब हम में से कोई उसे अकेला अपने आप पढ़ता है, तो हम अपनी बुद्धि को इतनी तीक्ष्ण न समझें, और न यह मानें कि जो कुछ पवित्रशास्त्र हमें बताता है उसे समझने के लिये हम पर्याप्त समर्थ हैं। हम अपनी मूर्खता को मानें और प्रार्थना करें
कि परमेश्वर अपने सिद्धान्त को हम पर ऐसा प्रबल करे कि वह हम से छूट न जाए।
यह बात उस क्रम से, जो सन्त पौलुस यहाँ अपनाता है, और अच्छी तरह समझ में आएगी, यदि हम उसके सब शब्दों को भली-भाँति तौलें। वह कहता है कि वह परमेश्वर का धन्यवाद बिना अन्त या विराम के करता है, उस विश्वास के लिये जो उसने सुना कि इफिसुस की कलीसिया में है, और उनके पवित्र लोगों के प्रति प्रेम के लिये।
फिर भी वह परमेश्वर से अपनी प्रार्थना जारी रखता है कि वह उन्हें और अधिक ज्योति दे और उस सिद्धता तक पहुँचाए जिसे पाने के लिये सब विश्वासियों को तब तक परिश्रम करना चाहिए जब तक परमेश्वर उन्हें इस संसार से उठा न ले। अब जब वह कहता है कि वह परमेश्वर का धन्यवाद करना नहीं छोड़ता, तो हम उसके उदाहरण से देखते हैं कि विश्वासियों को अपना समय कहाँ बिताना चाहिए। क्योंकि निश्चय ही, परमेश्वर जो मुख्य बलिदान माँगता और स्वीकार करता है वह यह है कि हम उसके सब उपकारों के लिये उसका आदर करें और उनके लिये उसे उसकी योग्य स्तुति अर्पित करें।
और यह न समझा जाए कि यह, जैसा कहा जाता है, रुक-रुककर या टुकड़ों-टुकड़ों में किया जा सकता है। जैसे परमेश्वर अपनी ओर से उंडेलना बन्द नहीं करता
अपने उपकार अपार रूप से, वैसे ही हम में से हर एक का कर्त्तव्य है कि हम बिना रुके उसे धन्य कहने और उसकी स्तुति करने में अपने आप को लगाएँ। क्योंकि संत पौलुस यहाँ निष्कपट भाव से बोलता है, और जब उसने इफिसियों के लिये परमेश्वर को धन्य कहा, तो उसका आशय अन्य सब कलीसियाओं के लिये भी उतना ही था। तब यदि कोई मनुष्य परमेश्वर के हाथ से पाए हुए उपकारों के विषय में कुछ सोचे ही नहीं, तो यह कैसी कृतघ्नता होगी? हम सब अपने पड़ोसियों के लिये भी परमेश्वर की स्तुति करने को बाध्य हैं। यदि हम सुनें कि परमेश्वर ने सौ कोस दूर अपनी
कलीसिया को समृद्ध किया है या अपने लोगों पर दया दिखाई है, और संक्षेप में, यदि हम कोई भी ऐसी बात सुनें जो हमें आनन्दित करे, तो हमारे मुँह का यह कर्त्तव्य है कि उसके लिये परमेश्वर की स्तुति करने को खुले रहें।
अब यदि हम उन भलाइयों के लिये भी ऐसा करने को बाध्य हैं जो हम स्वयं नहीं देखते, परन्तु जिन्हें हमारे पड़ोसी अनुभव करते हैं, चाहे वे हम से दूर देशों में ही क्यों न हों, तो हमारे विषय में क्या सोचा जाए जब परमेश्वर हमारे
मुँह भर देता है (जैसा भजन संहिता में कहा गया है) और फिर भी हम उसका धन्यवाद करने का कोई विचार ही नहीं रखते? हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि यदि हम अपने खाने-पीने और इस क्षणभंगुर जीवन की सब वस्तुओं के लिये परमेश्वर की स्तुति करने को बाध्य हैं, तो वह हमें अपने साथ इससे असंख्य गुना अधिक बाँध लेता है जब वह हमें स्वर्गीय मीरास के लिये बुलाता है और जब वह अनुग्रह के आत्मिक वरदानों से हमें आशीष देता और धनी करता है, जो हमें इस संसार से कहीं आगे ले जाते हैं। तो जब परमेश्वर हमारे प्रति ऐसी उदारता बरतता है, तब यदि हम उस उदाहरण पर न चलें जो यहाँ संत पौलुस में हमारे सामने रखा गया है, अर्थात् कि हम जीवन भर परमेश्वर के नाम की स्तुति में निरन्तर लगे रहें, तो हमारे पास क्या बहाना रह जाएगा?
अब इसके साथ वह यह भी दिखाता है कि विश्वास और प्रेम परमेश्वर के ही वरदान हैं और हम से नहीं आते, जैसा कि मनुष्य शैतानी अभिमान के कारण सदा कल्पना करते हैं। मैं तुम से पहले कह चुका हूँ कि संत पौलुस ने इफिसियों के विश्वास और प्रेम के लिये परमेश्वर का धन्यवाद करने में कपट नहीं किया। यदि हर मनुष्य अपनी ही प्रवृत्ति से विश्वास कर सकता, या अपनी किसी शक्ति से उसे पा सकता, तो उसकी स्तुति परमेश्वर को नहीं दी जानी चाहिए थी, क्योंकि जो हमें उससे नहीं, औरों से मिला हो, उसके लिये अपने आप को उसका ऋणी मानना केवल उपहास होता। परन्तु यहाँ संत पौलुस परमेश्वर के नाम को इस बात के लिये धन्य कहता है कि उसने इफिसियों को विश्वास से प्रकाशित किया और उनके हृदयों को प्रेम के लिये गढ़ा। इसलिये यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि सब कुछ परमेश्वर ही की ओर से आता है।
अन्यजाति के लोग अपनी स्वतंत्र इच्छा को बीच में लाकर, अपने आप को परमेश्वर का ऋणी केवल अपने सौभाग्य के लिये मानते थे, जैसा वे कहते थे, क्योंकि वे समझते थे कि उनके पास जो कुछ है वह उनकी अपनी शक्ति और चतुराई से है। पोप के अनुयायी भी यह तो मान लेंगे कि परमेश्वर का अनुग्रह हमारी कुछ सहायता करता है, फिर भी वे मनुष्य को ऊँचा ही रखना चाहते हैं और यह मानते हैं कि वह अपनी ही प्रेरणा से विश्वास तक पहुँचता है। यहाँ संत पौलुस इन सब शैतानी मतों को बन्द कर देता है और दिखाता है (जैसा हम पहले देख चुके हैं) कि
संसार में जब कहीं भी कोई कलीसिया हो, या परमेश्वर को पुकारनेवाले कोई लोग हों, जो सुसमाचार के विश्वास पर स्थापित और दृढ़ किए गए हों,
तो उसकी सारी महिमा परमेश्वर ही को मिलनी चाहिए।
और क्यों? क्योंकि उस अवस्था में उसके हाथ को अवश्य कार्य करना पड़ा, क्योंकि मनुष्य कभी किसी भलाई की ओर नहीं झुकते यदि पवित्र आत्मा उन्हें न चलाए और न सँभाले, वरन् उन्हें बलपूर्वक खींच न ले। क्योंकि हम में इतनी बड़ी हठ है कि हम केवल निर्बल और दुर्बल ही नहीं हैं, जैसा पोप के अनुयायी कल्पना करते हैं, परन्तु जब तक वह हमें शुद्ध न करे तब तक परमेश्वर के सर्वथा विरोधी हैं। यही वह बात है जो वह अपने भविष्यद्वक्ता यहेजकेल के द्वारा यह कहकर प्रकट करता है कि जो हृदय पहले पत्थर के थे वे मांस के हृदय बना दिए जाएँगे, अर्थात् वह उन्हें कोमल करेगा और अपनी आज्ञाकारिता के लिये झुका लेगा।
इसके अतिरिक्त, इन दो शब्दों, विश्वास और प्रेम, के अन्तर्गत संत पौलुस ने मसीहियों की सारी सिद्धता को समेट लिया है। क्योंकि व्यवस्था की पहली पट्टी का लक्ष्य यह है कि हम केवल एक ही परमेश्वर की आराधना करें और सब बातों में उसी पर निर्भर रहें, यह स्वीकार करते हुए कि हम उसके ऐसे ऋणी हैं कि हमें केवल उसी की शरण में भागना चाहिए, और अपना सारा जीवन उसकी सेवा में बिताने का यत्न करना चाहिए।
यही व्यवस्था की पहली पट्टी का सार है।
दूसरी पट्टी की विषयवस्तु और कुछ नहीं, केवल यह है कि हम परस्पर न्याय और सच्चाई से रहें, और अपने पड़ोसियों के साथ ऐसा व्यवहार करें कि हम किसी को हानि पहुँचाए बिना सब मनुष्यों की सहायता करने का यत्न करें। और हमें निश्चय है कि परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था में उत्तम जीवन का ऐसा भला और सिद्ध नियम ठहराया है कि उसमें कुछ जोड़ा नहीं जा सकता। जब बात ऐसी है, तो संत पौलुस का इस स्थान पर यीशु मसीह में विश्वास और पड़ोसी के प्रति प्रेम को सम्पूर्ण मसीही आचरण का सार ठहराना अकारण नहीं है, यह दिखाते हुए कि हमें किसके अनुसार अपने आप को ढालना चाहिए, और हमारा नियम क्या है।
परन्तु इसके साथ हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि वह इस शब्द विश्वास के अन्तर्गत परमेश्वर की सारी सेवा को समेट लेता है। क्योंकि यह असम्भव है कि हम अपने स्वर्गीय पिता के प्रेम में पूरी तरह मोहित न हो जाएँ, जब हम एक बार उसकी भलाई से परिचित हो गए, जैसा उसने अपने एकलौते पुत्र के व्यक्तित्व में हमें दिखाई है। देखो, परमेश्वर हमें घबराहट और मृत्यु की कालकोठरी से बाहर खींच लेता है, हमारे लिये स्वर्गीय राज्य का द्वार खोल देता है, और हम से कहता है कि वह हमें अपनी सन्तान मानेगा। अब क्या हम यह सुनकर और इस पर विश्वास करके भी ऐसा हो सकते हैं कि पूरी तरह उसके हाथों सौंप न दिए जाएँ, संसार को छोड़कर और अपने भीतर की बुराई से घृणा करके, क्योंकि वही हमें उससे अलग करती है? तब तुम देखते हो कि विश्वास शब्द का अर्थ अपने आप को पूर्ण रूप से परमेश्वर के हाथों सौंप देना है।
फिर, विश्वास कोई निष्क्रिय वस्तु नहीं है; उसका अर्थ यह है कि हम परमेश्वर की शरण लें, और जब कभी हम किसी दाग से कलंकित हों, तब उससे प्रार्थना करें कि वह उसे दूर करे। क्योंकि संसार में ऐसी कोई आवश्यकता नहीं जो हमारे लिए एड़ी की चोट के समान न हो, जिसे परमेश्वर हमें इसलिए देता है कि हम उसके पास आएँ।
इसलिए विश्वास में प्रार्थना और बिनती निहित है। इसमें यह भी निहित है कि हम परमेश्वर के नाम को पवित्र ठहराए बिना नहीं रह सकते, अर्थात् उसी पर टिके रहें और उसकी सारी महिमा उसे दें जो उसका अधिकार है, क्योंकि हम जानते हैं कि वह सब कुछ अपनी ही निःशुल्क भलाई से हमें देता है, और हमसे धन्यवाद के बलिदान के सिवाय और कुछ नहीं चाहता। देखिए, इस प्रकार विश्वास में वह सब कुछ निहित है जो व्यवस्था की पहली तख्ती में समाया है। सच है कि यहाँ अंश को पूरे के स्थान पर रखा गया है; फिर भी यह ध्यान रहे कि जिन बातों की हमने चर्चा की है, उन्हें एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता।
अब हमारा यह कर्तव्य है कि हम अपने पड़ोसियों के साथ सीधाई और निष्पक्षता से जीवन बिताएँ, जैसा कि सोलहवें भजन में कहा गया है कि हम सब बातों के लिए परमेश्वर के ऋणी हैं, और उसे बदले में कुछ भी नहीं दे सकते, और जब हम पूरा जोर लगाकर उसे कुछ अर्पण करना चाहते हैं, तब भी हमारा सारा किया हुआ उसके लिए कुछ भी नहीं ठहरता। तब वह हमसे क्या चाहता है? यही कि हम
उसके दीन विश्वासी जनों की भलाई करने में लगे रहें, जैसा कि पौलुस भी इस पद में पवित्र लोगों का स्पष्ट उल्लेख करता है। सच है कि हमें बिना किसी भेद के सब मनुष्यों के प्रति प्रेम दिखाना चाहिए; क्योंकि जब तक हम अपने शत्रुओं से प्रेम न रखें और उनकी सहायता और सहारे के लिए पूरा यत्न न करें, तब तक हम परमेश्वर की सन्तान नहीं हो सकते, जो अपना सूर्य भले और बुरे दोनों पर उदय करता है।
इसलिए हमारा लक्ष्य यही होना चाहिए। फिर भी इससे हमें परमेश्वर की सब सन्तानों से भाईचारे का प्रेम रखने में बाधा नहीं पड़ती, क्योंकि वे एक और भी घनिष्ठ बन्धन से हमारे साथ जुड़े हुए हैं। इसी कारण भजन संहिता के सोलहवें भजन के उस पद में, जो मैंने ऊपर उद्धृत किया, और पौलुस के इस वर्तमान पद में भी कहा गया है कि हमें सब विश्वासियों से प्रेम रखना चाहिए। हाँ, और पौलुस स्वयं एक अन्य स्थान पर इस विषय में उठनेवाली शंका की भली-भाँति चर्चा करता है। क्योंकि वह हमें आज्ञा देता है कि हम सब मनुष्यों से सामान्य रूप से प्रेम रखें, और विशेष करके उनसे जो विश्वास के घराने के हैं। इस प्रकार परमेश्वर चाहता है कि हम उसके समान बनें और सब मनुष्यों की भलाई करने में उसके आदर्श पर चलें, उनकी भी जो इसके योग्य नहीं हैं, यहाँ तक कि जो हमारी आँखें निकालने के सिवाय और कुछ नहीं चाहते, उनके कल्याण के लिए भी हम अपनी पूरी सामर्थ्य भर यत्न करें।
फिर भी, क्योंकि उसने सब विश्वासियों पर अपनी छाप लगाई है और उन्हें हमें सौंपा है, इसलिए वह चाहता है कि हम उनके प्रति विशेष भाईचारे का प्रेम रखें। क्योंकि परमेश्वर के दान जहाँ कहीं दिखाई दें, वहाँ उनका आदर किया जाना चाहिए, जैसा कि पन्द्रहवें
भजन में कहा गया है कि हमें उनसे प्रेम रखना चाहिए जो परमेश्वर का भय मानते हैं और उनसे घृणा करनी चाहिए जो दुष्ट हैं। तब यदि हम उन चिन्हों को देखते हैं जो परमेश्वर ने अपने विश्वासियों में रखे हैं, जिनके द्वारा वह उनके निकट आता है, तो क्या यह उचित नहीं कि हम भी अपनी ओर से उनसे प्रेम रखने के लिए प्रेरित हों? संक्षेप में, हम देखते हैं कि पौलुस ने यहाँ भले और पवित्र चाल-चलन का सम्पूर्ण नियम समेट दिया है: अर्थात् पहले तो हमें अपने आपको पूरी तरह अपने परमेश्वर को सौंप देना है, कि हम दृढ़ता से उसी से लिपटे रहें। और
दूसरे, अपने पड़ोसियों के साथ सीधाई और निष्पक्षता से जीवन बिताएँ, सब बुरे कामों से दूर रहें, और अपनी सामर्थ्य और क्षमता के अनुसार सब मनुष्यों की भलाई करने का यत्न करें।
और यह कैसे हो सकता है? इसी प्रकार कि हम अपने स्वर्गीय पिता को जानें, और उन असीम भलाइयों को पहचानें जो उसने हम पर की हैं, और जिनमें वह प्रतिदिन हमें सहभागी बनाता है, ताकि हमारा सारा जीवन उसी पर निर्भर रहे, और केवल वही वह हो जिसके हाथ से हम अनन्त उद्धार की आशा रखें, और जीवन भर उसे पुकारते और उसका धन्यवाद करते रहें। पहली बात के लिए इतना ही पर्याप्त है।
फिर, जहाँ तक दूसरी बात का सम्बन्ध है, हमारे लिए अपने पड़ोसियों से प्रेम रखना तब तक सम्भव नहीं जब तक हम संयम से जीवन न बिताएँ, कोई बुरा उदाहरण न दिखाएँ, और अपने आचरण पर ऐसा ध्यान न रखें कि किसी को हमारी शिकायत करने का कारण न मिले। क्योंकि उस व्यभिचारी में कौन-सा प्रेम है जो किसी दूसरे की पत्नी का अपमान करने पर तुला हो? या उस चोर में जो दूसरे का माल चुराना चाहता हो? फिर, जब हमारा जीवन पूरी खराई से चलाया जाना चाहिए, तब जब कोई मनुष्य मतवालेपन, निन्दा या ऐसी ही अन्य बातों में फूट पड़ता है, तो ऐसा करने में अवश्य ही दीन लोगों को कष्ट पहुँचता है, उनका माल लुटता है, या हर प्रकार की अन्यायपूर्ण वसूली और अति में पड़ जाना होता है।
इसलिए यदि हम अपने पड़ोसी से प्रेम और ममता रखते हैं, तो हम उनके साथ खरा और सीधा जीवन बिताएँगे, और उसे ऐसी रीति से चलाएँगे कि हम व्यर्थ कल्पनाओं में न उलझें, जैसा कि पोप के अनुयायी करते हैं। क्योंकि वे अपनी रीति-रस्मों में बड़ा परिश्रम करते हैं, और बहुत बड़बड़ाने, यहाँ-वहाँ तीर्थयात्रा पर भटकने, और यह-वह करने को परमेश्वर की सेवा कहते हैं; और इस बीच वे केवल अपनी ही कल्पनाओं में भटकते फिरते हैं; और यह केवल इसलिए कि वे नहीं जानते कि परमेश्वर उन्हें किस ओर बुलाता है। इसलिए ताकि हमारा परिश्रम
व्यर्थ न जाए, आओ हम ध्यान दें कि परमेश्वर किस बात को स्वीकार करता है, और उसी को थामे रहें। क्योंकि यदि हम उस मार्ग में निरन्तर बने रहें जो उसने अपने वचन में हमें दिखाया है, तो हम चूक नहीं सकते, विशेषकर इसलिए कि उसने इतने थोड़े स्थान में हमें वह सब बता दिया है जो हमारे योग्य जीवन बिताने के लिए आवश्यक है।
क्योंकि यदि ग्रन्थ लम्बे और अन्तहीन होते, तो हम यह कहकर बहाना बना लेते कि हम बड़े विद्वान नहीं हैं, और इतनी बातें याद नहीं रख सकते। परन्तु अब, जब हमारा प्रभु अपनी सारी माँगें दो-तीन शब्दों में कह देता है, तो हमें मानना ही पड़ेगा कि यदि हम इतने छोटे और सरल पाठ को भी ग्रहण नहीं करते, तो हम बहुत चिड़चिड़े और हठीले हैं, और जान-बूझकर अपने कान बन्द कर लेते हैं कि कहीं वह जो हमसे कहता है उसे सुन न लें।
अन्त में, 'विश्वास' इस शब्द के विषय में यह भी ध्यान देने योग्य है कि सन्त पौलुस बिना कारण नहीं कहता कि वह विश्वास यीशु मसीह में है, क्योंकि हमें इसी पर दृष्टि लगानी है। प्राचीन काल के पिताओं की आँखों के सामने सदा परमेश्वर का स्वरूप रहता था, क्योंकि वे उसके दयासन के सामने ही बलिदान चढ़ा सकते थे; और किसी अन्य उपाय से वे यह आशा नहीं रख सकते थे कि परमेश्वर उनकी सुनता है या उन पर दयालु है। तब उनके पास वाचा के सन्दूक का दृश्यमान स्वरूप था; पर अब हमारे पास यीशु मसीह है, जो परमेश्वर का स्वरूप है, जो स्वयं में अदृश्य था। क्योंकि सन्त पौलुस बिना कारण नहीं कहता कि परमेश्वर तब तक अगम्य है जब तक वह अपने आपको प्रगट नहीं करता
अपने पुत्र के व्यक्तित्व में। इसलिए, जब हमारे पास यीशु मसीह है जो परमेश्वर का यथार्थ स्वरूप है, तो हमें वहीं दृष्टि लगानी चाहिए।
और यहाँ तुम यह भी देखते हो कि उसे अपने पिता परमेश्वर की सामर्थ्य का यथार्थ स्वरूप क्यों कहा गया है।
क्योंकि यद्यपि व्यक्ति भिन्न-भिन्न हैं, तो भी वह हमारे उद्धार से सम्बन्ध रखनेवाली और उसके लिए आवश्यक बातें हमारे सामने प्रस्तुत करता है, ताकि पुत्र को जानने से हम पिता को भी जानें, जैसा सन्त यूहन्ना कहता है; और जिसके पास पुत्र नहीं, वह पिता का इनकार करता है, चाहे वह उसके पास जाने की कितनी ही घोषणा क्यों न करे। इसलिए, जब यहाँ कहा गया है कि हमें यीशु मसीह में विश्वास करना चाहिए, तो उस चेतावनी को स्मरण करें जो
वह अपने चेलों को देता है: "परमेश्वर पर विश्वास रखो," वह कहता है, "मुझ पर भी विश्वास रखो।" वहाँ वह दिखाता है कि व्यवस्था के अधीन जीनेवाले प्राचीन पिताओं को जब तक वह जगत पर प्रगट न हुआ, केवल धुँधली शिक्षा ही मिली थी।
यह सच है कि वे जीवित परमेश्वर की आराधना करते थे, और मध्यस्थ के बिना उसके पास उनकी पहुँच न थी। तो भी वह केवल छायाओं और प्रतीकों के अधीन था, और उनके पास वैसा प्रकाश न था जैसा आज हमारे पास सुसमाचार के अधीन है। और इसी कारण मैंने तुमसे कहा कि वह परमेश्वर का स्वरूप कहलाता है, जो अपने स्वभाव से अदृश्य है, ऐसा कि जब तक वह ऐसे साधन से अपने आपको प्रगट न करे, हम उसे जान नहीं सकते। संक्षेप में, यह ध्यान रखें कि जब तक हमारा विश्वास यीशु मसीह में स्थिर नहीं होता, हम भटकने के सिवाय और कुछ नहीं करते।
और यह उन भूलों से और भी अच्छी तरह समझ में आएगा जिनसे जगत आज तक रंगा हुआ है। क्योंकि पोप के अनुयायी भली-भाँति घोषणा करेंगे कि वे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं; तुर्क और यहूदी भी उतना ही करते हैं। यह सच है कि पोप के अनुयायी और यहूदी सत्य के सबसे निकट प्रतीत होते हैं; क्योंकि यहूदी घोषणा करते हैं कि वे जीवित परमेश्वर की आराधना करते हैं, उसी परमेश्वर की जिसने मूसा के द्वारा उन्हें अपनी व्यवस्था दी। पर इससे क्या?
इस बीच वे मसीह को ठुकराते हैं, जो व्यवस्था का अन्त और सार है।
जहाँ तक पोप के अनुयायियों का सम्बन्ध है, यद्यपि वे मसीही धर्म को मानते हैं और यीशु मसीह को अपना उद्धारकर्ता कहते हैं, तो भी यह प्रकट है कि वे उसके विरुद्ध युद्ध करते हैं, क्योंकि वे अपनी ही रुचि के अनुसार परमेश्वर की सेवा खड़ी करते हैं, ऐसा कि उनके सब कामों में अव्यवस्था के सिवाय कुछ नहीं। रही तुर्कों की बात, वे भली-भाँति कह सकते हैं, "सर्वशक्तिमान परमेश्वर, आकाश और पृथ्वी का सृष्टिकर्ता," पर क्या हम सोचें कि परमेश्वर स्वयं का इनकार करेगा या अपनी कही बात को पलट देगा, अर्थात् यह कि कोई मनुष्य उसके प्रिय पुत्र के बिना उसके पास नहीं आ सकता, जिसे उसने अपने और मनुष्यों के बीच मध्यस्थ ठहराया है? फिर, हम देखते हैं
कि पोप के अनुयायी भली-भाँति कहेंगे कि वे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, पर इसके साथ ही उन्हें संरक्षक और वकील चाहिए जो उन्हें उसकी उपस्थिति में पहुँचाएँ। फिर, उनके लिए यह पर्याप्त नहीं कि वे हमारे प्रभु यीशु मसीह के लहू से मोल लिए गए हैं; उन्हें अपने पुण्यों को भी जोड़ना है और अपने ही प्रायश्चित्तों से अपना छुटकारा करना है; और जब हम परमेश्वर को अप्रसन्न कर दें, तब हमें ऐसे-ऐसे उपाय चाहिए।
फिर यदि कोई पोप के अनुयायियों के विश्वास की जाँच करना चाहे, तो निश्चय ही वह पाएगा कि वे अपने ही स्वप्नों पर विश्वास करते हैं, और जो कुछ वे करते हैं वह एक उलझी हुई भूलभुलैया मात्र है। क्योंकि यीशु मसीह के साथ वे वह सब मिला देते हैं जो उनके अपने मन में आता है, जबकि हम जानते हैं कि उसे अकेले, पूर्ण रूप में, बने रहना चाहिए। तब हम देखते हैं कि सन्त पौलुस हमें हमारे विश्वास की सच्ची परख की ओर कैसे ले जाता है: वह यह है कि हम यीशु मसीह पर आधारित रहें, ऐसा कि हम अपने आपको सब भलाई से पूरी तरह खाली अनुभव करें, और यह जानें कि हमें उसकी परिपूर्णता में से लेकर सब भली वस्तुओं से भरना है, नहीं तो हम पर हाय। क्योंकि यदि स्वर्ग के सब स्वर्गदूत हमारे पक्ष में होते (यदि यह सम्भव होता), तो भी यह निश्चित है कि यदि हमारे पास वह शिरोमणि न हो तो सब कुछ नष्ट हो जाएगा, जैसा सन्त पौलुस कुलुस्सियों की पत्री के पहले और दूसरे अध्याय में कहता है। और इस प्रकार तुम देखते हो कि इस वाक्य से हमें क्या ग्रहण करना है।
अब, सन्त पौलुस यह कहने के बाद कि वह उन बातों के लिए परमेश्वर का धन्यवाद करता है जो उसने इफिसुस की कलीसिया में पहले से देखीं, यह जोड़ता है कि वह उससे प्रार्थना भी करता है। यह हमें दिखाने के लिए है कि जब हम परमेश्वर को अपने बच्चों पर अपने उत्तम दान उँडेलते देखें, तब हमें उससे विनती करते रहना चाहिए कि वह उन्हें बनाए रखे और आगे बढ़ाए, और यह दो कारणों से। क्योंकि जो खड़ा है वह गिर भी सकता है; और फिर, परमेश्वर को बढ़ाना है
अपने अनुग्रह को और अधिक। क्योंकि जो सबसे सिद्ध हैं, वे भी यदि अपनी घटियों को भली-भाँति देखें तो लज्जित होने का कारण पाएँगे।
तब तुम देखते हो कि सन्त पौलुस हमें जिस बात पर लाता है वह यह है कि जब हम परमेश्वर की स्तुति करते हैं उन दानों के लिए जो उसने अपने
चुने हुए बच्चों पर उँडेले हैं, तब हमें अपने धन्यवाद के साथ प्रार्थना को भी जोड़ना चाहिए। और क्यों? क्योंकि जो उसने आरम्भ किया है उसे पूरा करना केवल उसी के हाथ में है; और हमें सदा यह नींव रखनी चाहिए,
"हे प्रभु, तू अपने ही हाथों के काम को आधा अधूरा न छोड़ेगा।" और जो हमें दूसरों के लिए करना चाहिए, वही हमें अपने लिए भी करना आवश्यक है।
संक्षेप में, हमें यहाँ यह चेतावनी दी गई है कि हम परमेश्वर की भलाई और उन दानों के लिये, जिन्हें हम पहले ही अनुभव कर चुके हैं, इस रीति से उसकी महिमा करें कि साथ ही यह भी समझें कि हममें अब भी बहुत कमी है, और यह हमारे लिये अत्यावश्यक है कि वह हमें अन्त तक स्थिर रहने का अनुग्रह दे। इसके अतिरिक्त वह हमारे दोषों को सुधारे और हममें अपना अनुग्रह तब तक बढ़ाता रहे जब तक हम पूर्ण सिद्धता तक न पहुँच जाएँ; और यह तब तक कभी न होगा जब तक हम इस मरणशील देह से छुटकारा न पा लें। तौभी हम देखते हैं कि आजकल शैतान ऐसे लोगों को अपने वश में किए हुए है जो किसी नारकीय सिद्धता की कल्पना करते हैं, और अपने पिता से केवल पहली तीन विनतियाँ करते हैं, यह कहकर कि परमेश्वर से बस इतनी प्रार्थना करना काफ़ी है कि उसका नाम पवित्र माना जाए, उसका राज्य आए, और उसकी इच्छा पूरी हो; और इस प्रकार वे उस प्रार्थना के शेष भाग को काट डालते हैं जो हमारे प्रभु
यीशु ने हमें दी है।
और इस बात के लिये मेरे पास उनके अपने हाथों के हस्ताक्षर हैं जिन्हें उनके चेले जानते हैं; इनसे वे शैतान के दूत प्रकट करते हैं कि वे नितान्त निर्बुद्धि ही होंगे, क्योंकि वे इतनी दूर बहक गए हैं कि परमेश्वर को यह महिमा देने से इनकार करते हैं कि हम अब भी अपनी निर्बलताओं के बोझ से दबे हुए हैं, भ्रष्टता की भारी गठरी से जकड़े हुए हैं, और दोषों की बहुतायत से घिरे हुए हैं, और परमेश्वर को हमें उनसे और अधिक शुद्ध करते रहना है, वरन् दिन-प्रतिदिन, जब तक वह हमें उस सिद्धता तक न पहुँचा दे जिसके लिये वह हमें बुलाता है। और इस सिद्धान्त पर ध्यान देना हमारे लिये और भी आवश्यक है, क्योंकि पोप के अनुयायी अपने अन्धविश्वासों और मूर्तिपूजा की भूलों में उतने भटके हुए नहीं हैं जितने ये दुष्ट लोग हैं, जो आजकल अपनी गुप्त सभाओं और छिपने के ठिकानों में अपना विष फैलाते फिरते हैं।
परन्तु वे जैसे भी हों, आइए हम भली-भाँति ध्यान दें कि पवित्र आत्मा हमें यहाँ क्या दिखाता है, जब पौलुस कहता है कि वह परमेश्वर से प्रार्थना करता है। और क्यों? मैं तुम्हें पहले ही बता चुका हूँ कि इफिसियों ने उन्नति की थी, और परमेश्वर और उसके पवित्र आत्मा के दान उनमें बढ़ गए थे: यह उसने दिखा दिया है। अब बात को समेटते हुए वह आगे कहता है कि वह परमेश्वर से प्रार्थना करता है कि वह उन्हें वह दे जो उनके पास नहीं है, और जिसकी उन्हें अब भी घटी है। जब ऐसा है, तो आइए हम ध्यान दें कि हमने जितनी अधिक उन्नति की है, उतना ही अधिक हमारे पास अपने आप को दीन करने का कारण है, और पूरी नम्रता से परमेश्वर से विनती करने का कि जो काम उसने आरम्भ किया है उसे पूरा करे, और बढ़ाता रहे
अपने दान हममें, जब तक हमें और आगे बढ़ने की आवश्यकता न रहे, जो उस मिलन के समय होगा, जिसके विषय में हम चौथे अध्याय में और कहेंगे।
परन्तु फिर भी हमें पौलुस के प्रयुक्त शब्दों पर भली-भाँति ध्यान देना चाहिए। क्योंकि वह कहता है, "हमारे प्रभु यीशु मसीह का परमेश्वर, महिमा का पिता," अर्थात् महिमामय पिता (क्योंकि "महिमा का पिता" यह वाक्यांश इब्रानी भाषा में "महिमामय पिता" के अर्थ में रखा जाता है), तुम्हें अपने ज्ञान के लिये आत्मिक प्रकाशन दे। अब, जब पौलुस हमें यहाँ यीशु मसीह की ओर भेजता है, और कहता है कि जिस परमेश्वर को वह पुकारता है वही हमारे प्रभु यीशु मसीह का परमेश्वर है, वरन् उसका पिता भी, तो यह इसलिये है कि वह दिखाए कि उसे सुने जाने का कितना भरोसा था, और इसलिये भी कि इफिसियों को प्रार्थना करने की इसी रीति और नियम पर चलने का साहस मिले, और जब कभी उन्हें परमेश्वर की ओर फिरने का अवसर हो, तब वे वही मार्ग पकड़ें जो उसने पकड़ा, और हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा आने की सीधी रेखा पर बने रहें।
परन्तु अब, यदि कोई पूछे कि परमेश्वर हमारे प्रभु यीशु मसीह के ऊपर कैसे है, तो यह प्रश्न सरलता से सुलझ जाता है, यदि हम मध्यस्थ के व्यक्तित्व पर दृष्टि रखें, जो हमारे स्थान और हमारी दशा में दीन हुआ, कि परमेश्वर और हमारे बीच का साधन हो। यह सच है कि यीशु मसीह अपने
पिता के साथ एक ही है, और जब हम जीवते परमेश्वर की बात करते हैं, तो हमें स्वीकार करना चाहिए कि ईश्वरत्व की सारी परिपूर्णता उसमें वास करती है।
इसलिये हमें अपने प्रभु यीशु मसीह को अलग नहीं करना चाहिए, मानो वह कोई नया परमेश्वर हो और उससे भिन्न कोई और जो आदि से पूर्वजों को दिखाया गया था (जैसा कि आजकल कुछ शैतान के दूत कहते हैं, जिन्होंने वह घिनौनी नीचता और घृणित बात उठाई है)। परन्तु वह वही एक ही परमेश्वर है जिसने पिता के व्यक्तित्व में अपने आप को हम पर प्रकट किया, और इसलिये हम उसे यीशु मसीह में खोजते हैं। क्योंकि यीशु मसीह में हमें मध्यस्थ के पद पर विचार करना है, कि उसने अपने आप को इस प्रकार दीन किया
। इसलिये नहीं कि उसने अपने प्रताप में से तनिक भी खोया, या अपनी अनन्त महिमा में से कुछ भी घटा या कम हुआ—ऐसी कोई बात हुई ही नहीं। परन्तु हमारे विषय में वह दीन हुआ, वरन् पूरी रीति से अपने आप को खाली कर दिया। और हमें यह कहने में लज्जित नहीं होना चाहिए कि यीशु
मसीह दीन हुआ, क्योंकि लिखा है कि उसने अपने आप को खाली कर दिया: क्योंकि फिलिप्पियों को लिखते हुए पौलुस ठीक यही शब्द प्रयोग करता है।
इसलिये, जब हम यीशु मसीह की बात इस रूप में करते हैं कि वह हमसे जुड़ा हुआ है, ताकि हमें अपने पिता के पास पहुँचाए, तो वह परमेश्वर अपने पिता के अधीन है, अर्थात् इस दृष्टि से कि उसने हमारा स्वभाव धारण किया और हमारा साथी बन गया। और यही कारण है कि उसने अपने चेलों से कहा (जैसा कि यूहन्ना अपने बीसवें अध्याय में बताता है), "मेरे भाइयों के पास जाकर उनसे कह दो कि मैं अपने परमेश्वर और तुम्हारे परमेश्वर, अपने पिता और तुम्हारे
पिता के पास ऊपर जाता हूँ।" देखो, यीशु मसीह अपने विश्वासयोग्य लोगों के साथ अपने आप को इस रीति से जोड़ता है कि वह कहता है कि उनके साथ उसका परमेश्वर एक ही होगा।
हाँ, परन्तु किस रीति से? क्योंकि क्या वह स्वयं परमेश्वर नहीं है? है: तथापि इसलिये कि वह हमारे शरीर से ढका हुआ है, और इसलिये कि उसने देहधारी होना स्वीकार किया, ताकि हम उसकी देह के अंग हो सकें: इसी कारण हमारे साथ उसका परमेश्वर एक है।
और इसी कारण प्रेरित यशायाह के इस वचन को उसके व्यक्तित्व पर लागू करता है: "देख, मैं उन सेवकों के साथ यहाँ हूँ जिन्हें तूने मुझे दिया है," ताकि यीशु मसीह वहाँ एक सेनापति के रूप में आए, जो अपने राजा और प्रधान के सामने अपने आप को प्रस्तुत करता है, और कहता है, "देख, मैं उन बालकों की मण्डली के साथ यहाँ हूँ जिन्हें तूने मुझे दिया है।"
बात चाहे जैसी हो, हम देखते हैं कि यीशु मसीह हमें परमेश्वर अपने पिता की ओर खींचता है, ताकि हम पूरे भरोसे के साथ उसके पास जाएँ, और वह हमें ग्रहण करे। क्योंकि और कौन है जो इतना साहस करे कि अपने आप से यह प्रतिज्ञा करे कि उसकी विनती सुनी जाएगी? हम कौन-सा अनुग्रह पा सकते थे, यदि यीशु मसीह के द्वारा हमारे लिये द्वार न खोला जाता, और वह उस बात को पूरा न करता जो उसने कही है, अर्थात् कि वही मार्ग है?
फिर भी, इसलिए कि हम और भली भाँति जानें कि हमें अपने प्रभु यीशु मसीह के मार्गदर्शन की कितनी आवश्यकता है, पौलुस यहाँ हमारे सामने परमेश्वर की असीम महिमा रखता है। तब हम इतना साहस कैसे कर सकते हैं कि अपने आप को परमेश्वर की दृष्टि के सामने प्रस्तुत करें, यदि हमारा कोई ऐसा मध्यस्थ न होता जो हमारे लिए वहाँ तक पहुँचने का मार्ग बनाता है? क्योंकि जब सूर्य मनुष्यों की आँखों को चौंधिया देता है, और उसकी गर्मी हमें झुलसा देती है, जबकि हम उससे बहुत दूर हैं, तो जब हम परमेश्वर के निकट जाना चाहें तब हमारा क्या होगा? क्योंकि सूर्य एक छोटी सी शक्ति के सिवाय और क्या है, जो परमेश्वर ने उसमें फूँकी है? और जब हम परमेश्वर की उस अगम्य महिमा के निकट पहुँचें, तो क्या हम मानो निगल न लिए जाएँगे? तो भी, यदि हमारे पास यीशु मसीह है, तो हमें यह समझना है कि परमेश्वर केवल महिमा का पिता ही नहीं, वरन् दया का भी पिता है, और वह उन पर करुणा की दृष्टि रखता है जो सबसे अधिक दीन हैं और जो संसार की निन्दा और तिरस्कार में पड़े हैं। देखो, यही वह बात है जिस पर भरोसा रखकर हमें प्रार्थना करनी चाहिए, उस
परमेश्वर से।
पौलुस यहाँ स्पष्ट रूप से परमेश्वर से प्रार्थना करता है कि वह इफिसियों को बुद्धि और प्रकाशन की आत्मा दे। यह निश्चित है कि परमेश्वर ने अपने सुसमाचार का सत्य उन पर पहले ही प्रगट कर दिया था, जैसा कि देखा जाता है। और सचमुच, यदि परमेश्वर ने हमारे भीतर पहले ही कार्य न किया होता तो हमारे पास विश्वास या ज्योति की एक चिंगारी भी न होती, जैसा कि मत्ती के सोलहवें अध्याय में पतरस से कहा गया है, "मांस और लहू ने नहीं, परन्तु मेरे पिता ने जो स्वर्ग में है, यह तुझ पर प्रगट किया है।" फिर भी इस सब के होते हुए,
पतरस आगे चलकर दिखाता है कि वह मसीह के आत्मिक
राज्य के विषय में कुछ भी नहीं जानता था। तब यद्यपि वह अपनी वर्णमाला सीखनेवाले किसी नासमझ नौसिखिए के समान ही था, तो भी उसके विषय में यह गवाही दी गई है कि सुसमाचार का जो थोड़ा सा स्वाद उसे मिला था वह स्वर्ग की ओर से दान था।
इससे हम देखते हैं कि परमेश्वर को हम में अपने दानों को अधिक से अधिक बढ़ाना पड़ता है, और इसी कारण हमारे जीवन को मार्ग कहा गया है, क्योंकि हमें सदा आगे बढ़ते रहना है जब तक हमारी दौड़ पूरी न हो जाए। और जो कोई इस संसार में किसी सिद्धता की कल्पना करता है, वह शैतान के वश में है और परमेश्वर के अनुग्रह को पूरी तरह त्याग देता है। फिर भी हम यह न समझ बैठें कि परमेश्वर अपना उद्देश्य बदल देता है (क्योंकि वह परिवर्तनशील नहीं है) या अपने अनुग्रह को मनुष्यों की इच्छा के अनुसार टुकड़े-टुकड़े कटने देता है। परन्तु उसने यह क्रम ठहराया है कि हम दिन-प्रतिदिन बढ़ते जाएँ, और साथ ही गम्भीरता से अपनी घटियों को स्वीकार करना सीखें, उनके लिए कराहें, उनसे अप्रसन्न रहें, और अपने आप को सदा भय में रखें।
इस प्रकार तुम देखते हो कि ये दोनों बातें भली भाँति मेल खाती हैं: अर्थात् इफिसियों ने प्रकाशन की आत्मा पहले ही पाई थी, तो भी उन्हें परमेश्वर से उसे दिए जाने की आवश्यकता थी। क्योंकि यद्यपि आत्मा तो एक ही है, तो भी दान भिन्न-भिन्न हैं, और वे हम में से हर एक को माप के अनुसार, और जैसा उसे देना भाता है वैसा बाँटे जाते हैं। केवल यीशु मसीह ही है जिसने उन्हें पूर्ण रूप से पाया है। वही अकेला वह सोता है जो कभी सूख नहीं सकता; उसी पर परमेश्वर की आत्मा ठहरी है, ताकि हम सब उसके भागी हो जाएँ। और अपनी ओर से हम यह स्वीकार करें कि हम में जो सबसे बुद्धिमान है उसे भी सदा शिष्य बने रहना और अपनी मृत्यु के दिन तक सीखते ही रहना आवश्यक है।
तो भी, इसी बीच, हम यह ध्यान दें कि प्रकाशन शब्द हमें हर प्रकार के अन्धेपन का दोषी ठहराता है। क्योंकि हमारी आँखें खुली हैं कि हम श्वेत और श्याम में भेद करें: हम सूर्य और चन्द्रमा को देखते हैं, हम इन सांसारिक वस्तुओं को देखते हैं और उनका न्याय कर सकते हैं: उस विषय के लिए हमें किसी नए प्रकाशन की आवश्यकता नहीं,
क्योंकि वह हमें स्वभाव से मिला है। यह सच है कि हमारी आँखें परमेश्वर की सामर्थ्य और भलाई के साधन हैं, जिनके द्वारा वह हमें ज्योति का आनन्द लेने देता है: परन्तु वह तो एक साधारण बात है। परन्तु यहाँ पौलुस हमें दिखाता है कि हम अन्धे हैं और परमेश्वर के आत्मिक अनुग्रह का हम कुछ भी बोध नहीं करते, जब तक वह हमारी आँखें न खोले और उनके सामने पड़े आवरण या परदे को हटा न दे, वरन् हमें नई दृष्टि न दे, जो हमारे पास नहीं है। क्योंकि हमारी आँखें बन्द होने से भी बदतर हैं जब तक कि
वह अपनी पवित्र आत्मा से उन्हें ज्योतिर्मय न करे। इस प्रकार तुम देखते हो कि हमें क्या ध्यान में रखना है।
और यही वह बात है जिसे वह आगे भी कहता चलता है। अर्थात् (वह कहता है) कि तुम्हारे मन की आँखें ज्योतिर्मय हों। परन्तु कोई कह सकता है, "यदि प्रकाशन की आत्मा हमें पहले ही मिल चुकी है, तो हमें उसकी आवश्यकता क्यों है?" सचमुच, मानो तुम्हें कुछ दिखाई ही नहीं देता था। यह सच है कि तुम कुछ अंश तक देखते हो: परन्तु तुम्हारी आँखें अब भी बहुत धुँधली हैं।
और यह बात सामान्यतः सब मनुष्यों के विषय में कही जा सकती है, जैसा कहा गया है कि इस संसार में हम वस्तुओं को धुँधले रूप से, और मानो दर्पण में से, देखते हैं, जब तक कि हम परमेश्वर को उसकी स्वर्गीय महिमा में देखने योग्य न हो जाएँ, जिस समय हम उसके समान बन जाएँगे।
फिर, इसलिए कि लोग यह आपत्ति न उठाएँ (और न कहें), "क्या परमेश्वर को हम पर इस रीति से बातें प्रगट करनी पड़ेंगी, मानो हम ऐसी दशा में हैं कि कुछ भी देख नहीं सकते? और क्या मनुष्य बिना विवेक या निर्णय-शक्ति के पशु के समान होगा?" इसका उत्तर यह है कि यह सच है कि हम में कुछ समझ है, तो भी हम अन्धे हैं, क्योंकि हम पाप से भ्रष्ट हो गए हैं। इसलिए परमेश्वर को हमें नई आँखें देनी पड़ती हैं, जैसा मैंने पहले कहा। और वह बुद्धि शब्द इसलिए जोड़ता है कि मनुष्यों के उस मूर्खतापूर्ण अहंकार को और अच्छी तरह दबाए, जब वे बिना पंखों के उड़कर परमेश्वर तक पहुँचना चाहते हैं। क्योंकि ऐसा कोई मनुष्य नहीं जो बुद्धिमान न होना चाहे।
यदि हम परमेश्वर के हाथ से खोजकर सच्ची बुद्धि चाहते, तो यह भली और सुव्यवस्थित अभिलाषा होती। परन्तु हम में दो दोष हैं: क्योंकि हम अपनी ही धारणा के अनुसार बुद्धिमान होना चाहते हैं। "क्या मैं अपने आप पर शासन करने के लिए पर्याप्त बुद्धिमान नहीं हूँ?" मूर्ख ऐसा कहेगा। और इसी बीच हम परमेश्वर के वचन को तुच्छ जानते हैं, और हम में से हर एक चाहता है कि उसकी गर्दन पर से लगाम ढीली कर दी जाए, और जो उसे अच्छा लगे वह करने की छूट मिले। परन्तु यह बहुत बड़ा अहंकार है। दूसरा दोष यह है कि पवित्रशास्त्र पढ़ते समय हम सदा यह कल्पना करते हैं कि वहाँ जो बातें हैं उनके ज्ञान तक हम अपने ही विवेक से पहुँच जाएँगे। परन्तु यहाँ पौलुस द्वारा ये दोनों ही अस्वीकार कर दिए गए हैं।
क्योंकि जब वह परमेश्वर से यह चाहता है कि वह अपने विश्वासयोग्य जनों को बुद्धि की आत्मा दे, तब वह दिखाता है कि उनमें कोई विवेक नहीं, वे बुद्धिहीन पशुओं से बढ़कर नहीं हैं, जब तक हमारे प्रभु यीशु मसीह की अगुवाई न हो, ताकि वे स्वर्ग के राज्य तक पहुँचें। क्योंकि सांसारिक और लौकिक बातों में भी परमेश्वर यह विवेक किसी को नहीं देता, केवल उन्हीं को देता है जिन्हें वह भला समझता है। अब यदि वह अपनी विशेष भलाई को सदा अपने ही पास रखता है, कि जिसे चाहे उसे संसार की इन तुच्छ बातों में अपना मार्ग निकालने का विवेक दे, तो वह अविश्वासियों को भी तीक्ष्ण दृष्टिवाला बनाता है; इसलिए जब बात स्वर्गीय जीवन की हो, तब हममें कोई तैयारी नहीं है। इसी कारण संत पौलुस उस बात को पहले से मानकर चलता है जो मैं पहले कह चुका हूँ, अर्थात् यह कि हमें परमेश्वर के हाथ से सिखाया जाना है, ताकि सुसमाचार की गवाही के द्वारा सत्य के सिद्धान्त से हम उसे जानें। क्योंकि उसके बिना हम उन कल्पनावादी लोगों के समान होते जो परमेश्वर के पवित्र आत्मा के प्रकाशन के बहाने इधर-उधर भटकते फिरते हैं; परन्तु यह उस रीति के अनुसार नहीं है जिसमें संत
पौलुस "प्रकाशन" शब्द को लेता है, जब वह परमेश्वर से प्रार्थना करता है कि वह उसे अपने बच्चों को दे।
उदाहरण के लिए, जब यीशु मसीह अपनी आत्मा की चर्चा करता है, तो वह उसे उस शिक्षा से अलग नहीं करता जो उसने प्रचार की थी। वह कहता है, "जब वह आत्मा आएगा, तो तुम्हें सारा सत्य बताएगा।" और यह कैसे? क्या
प्रेरितों ने उसे पहले ही नहीं पा लिया था? हाँ; परन्तु वह आगे कहता है, "जो बातें तुम अब मेरे मुँह से सुनते हो, वही वह तुम्हें दिखाएगा।" संक्षेप में, पवित्र आत्मा का यह विशेष कार्य है कि वह हमें इस रीति से सिखाए कि जो वचन हम सुनते हैं, उसका प्रभाव और स्थान बना रहे, और हम उसी से लाभ उठा सकें।
और इसी पर संत पौलुस यह भी दिखाता है कि हमारा सारा प्रकाश और ज्ञान किसमें है: अर्थात् परमेश्वर को उसके एकलौते पुत्र के व्यक्तित्व में जानने में।
वह कहता है, यही वह बात है जिससे हमें सन्तुष्ट रहना चाहिए। क्योंकि यदि हमारी बुद्धि उन बातों को खोजने के लिए उतावली है जो हमारी समझ से परे हैं, तो आओ थोड़ा विचार करें कि हमारी समझ कितनी निर्बल और कच्ची है। और यदि हमारी बुद्धि इतनी स्थूल और भारी है, तो जब हम स्वर्ग और पृथ्वी से ऊपर उड़ना चाहें तो क्या करेंगे? क्या हम इतने छोटे स्थान में वह सब समझ सकते हैं? फिर भी हम देखते हैं कि मनुष्य इसकी और उसकी खोज करने में, और परमेश्वर के विरुद्ध वाद-विवाद के रूप में प्रश्न उठाने में कितनी असीम छूट ले लेते हैं। इसी कारण संत पौलुस यहाँ हमें दिखाता है कि यदि हम बुद्धिमान बनना चाहते हैं, तो हमें संयमी होना चाहिए: अर्थात् हमें यह समझना होगा कि परमेश्वर और हमारा प्रभु यीशु मसीह कैसा है, जैसा कि वह स्वयं आगे चलकर दिखाएगा। जब हम एक बार इस बिन्दु तक पहुँच जाते हैं, तो हमारे पास इतना है जितना हमारे लिए पर्याप्त होना चाहिए, और यदि हम इससे आगे जाने का साहस करें, तो यह जान-बूझकर अपना ही विनाश करना है। संत पौलुस इसे आगे विस्तार से दिखाएगा, परन्तु हमारे लिए इतना पर्याप्त होना चाहिए कि इस पद में, और सारे पवित्रशास्त्र में, हमें यह सीखना है कि वह परमेश्वर कौन है जिसकी हमें सेवा करनी चाहिए, उसकी इच्छा क्या है, हम उस पर कैसे भरोसा रखें, उससे प्रार्थना करने के लिए हमें कैसे प्रवेश मिले, और सब समयों में सहायता के लिए उसकी ओर कैसे भागें। यही वह बात है जिसमें हमें अपने आपको लगाना चाहिए।
परन्तु यह तब तक नहीं हो सकता जब तक वह सब कुछ जिसकी हमें आवश्यकता है, और जो हमारे कल्याण के लिए उपलब्ध है, यीशु मसीह में न मिले, जिसमें परमेश्वर ने अपने आपको प्रगट किया है। क्योंकि अपने आप में परमेश्वर की महिमा बहुत ऊँची
बात है, और यदि वह हमारे पास उतर न आया होता, तो उसके निकट पहुँचने से पहले हम सौ बार नष्ट हो जाते। परन्तु यदि हमारे पास यीशु मसीह है, तो वहाँ हमारे पास उसकी एक जीवित प्रतिमा है, जिसमें हम वह सब देख सकते हैं जो हमारे उद्धार के लिए आवश्यक है। क्योंकि वहाँ हम समझते हैं कि परमेश्वर हमारा पिता है, और कि हम अपने सब पापों से शुद्ध किए गए हैं ताकि परमेश्वर की महिमा में रूपान्तरित हों। वहाँ हम देखते हैं कि परमेश्वर हमें कैसे धर्मी मानकर ग्रहण करता है, और कि हम फिर से परमेश्वर से मेल-मिलाप कर चुके हैं। वहाँ हम जानते हैं कि उसने हमें कैसे छुड़ाया है, और कि हम उसके पवित्र आत्मा के अनुग्रह से कभी वंचित नहीं छोड़े जाएँगे, जब तक वह हमें हमारे उत्तराधिकार के आनन्द तक न पहुँचा दे। इस प्रकार हम ये सब बातें अपने प्रभु यीशु मसीह में जानते हैं। और इसी कारण संत
पौलुस दूसरे स्थान पर कहता है कि वह यीशु मसीह को छोड़ और कुछ जानना नहीं चाहता था, और कि वही अकेला है जिस पर उसने घमण्ड करने का निश्चय किया था।
इसी के अनुसार हमने पहले देखा है कि कैसे उसने सब कुछ छोड़ दिया कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस के नीचे बना रहे, और यद्यपि संसार की दृष्टि में उसमें लज्जा और अपमान के सिवा कुछ नहीं, तौभी वह घोषणा करता है कि जो कुछ वह पहले मूल्यवान समझता था उस सब को उसने त्याग दिया, और उन्हें केवल बाधा और हानि, वरन् कूड़ा और गोबर समझा, इसलिए कि वह हमारे प्रभु यीशु मसीह से लिपटा रहे। और यह दिखाने के लिए कि जो लोग अपने ही गुणों की मूर्खतापूर्ण धारणा से ग्रसित हैं, वे अपने आपको हमारे प्रभु यीशु मसीह से अलग कर लेते हैं, और यदि हमें उससे जुड़ना है, तो हमें वह सब छोड़ देना होगा जो हम अपना मानते हैं, और अपने आपको उसके सामने सब भलाई से रिक्त करके प्रस्तुत करना होगा, ताकि उसके हाथ से भरे जाएँ।
और यहाँ तुम यह भी देखते हो कि संत पौलुस क्यों कहता है कि वह उद्धार के बन्दरगाह पर कंगाल और बिलकुल नंगा पहुँचना पसन्द करेगा, बजाय इसके कि समुद्र के बीच में जीवित रहे और वहाँ निगल लिया जाए। क्योंकि यद्यपि वह एक पवित्र मनुष्य, और मानो आधा स्वर्गदूत माना जाता था, तौभी उसने इस सब की कोई गिनती न की, यदि वह पापों की क्षमा का सहभागी हो सके जो दी गई थी
