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ग्यारहवाँ उपदेश: दूसरे अध्याय पर तीसरा – इफिसियों 2:8-10
उस बलिदान के सिवाय हमारे पास कोई और शरण नहीं, जिसके द्वारा हमारे प्रभु यीशु मसीह ने परमेश्वर और हमारे बीच प्रायश्चित किया है। और जब कभी हम निर्बल हों, तो हम उससे बिनती करें कि वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा इसका उपाय करे, क्योंकि यही वह साधन है जिसे उसने ठहराया है कि हम उसके सब अनुग्रह-दानों के भागी हो सकें; और हम इसी में यों स्थिर बने रहें कि दूसरों के लिए आदर्श ठहरें, और उन्हें भी अपने साथ विश्वास और सिद्धान्त की एकता में खींच लाने का यत्न करें, और अपने जीवन और अच्छे चाल-चलन से दिखाएँ कि हमने परमेश्वर के पुत्र की ऐसी उत्तम पाठशाला में व्यर्थ शिक्षा नहीं पाई। वह यह अनुग्रह केवल हमें ही नहीं, वरन सब लोगों को भी देने की कृपा करे। आमीन।
ग्यारहवाँ उपदेश, जो दूसरे अध्याय पर तीसरा है। 8. क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है, और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन परमेश्वर का दान है:
9. और न कर्मों के कारण, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे।
10. क्योंकि हम उसकी रचना हैं, और यीशु मसीह में उन भले कामों के लिये सृजे गए जिन्हें परमेश्वर ने पहले से हमारे करने के लिये तैयार किया।
पौलुस पहले दिखा चुका है कि हमारा उद्धार वह सच्चा दर्पण है जिसमें हम परमेश्वर की अनन्त महिमा को देखते हैं, क्योंकि उसकी इच्छा है कि सब बातों से बढ़कर वह अपनी भलाई के द्वारा जाना जाए। इसी कारण उसने दिखाया है कि परमेश्वर ने जगत की सृष्टि से पहले हमें चुन लिया, और यह हममें पाई जानेवाली किसी भी बात को देखकर नहीं,
वरन केवल अपनी ही दया को सन्तुष्ट करने के लिये।
इसलिए यहाँ वह उस बात का निष्कर्ष निकालता है, और समझाता है कि जब उसने हमें बताया कि हमारा लेपालकपन परमेश्वर के हमें अपने अनन्त उद्देश्य में चुन लेने पर निर्भर है और उसी से निकलता है, तो उसका क्या आशय था। अर्थात् यह कि हम मानो पूरी तरह दीन हो जाएँ और मान लें कि हम जो कुछ हैं और हममें जो कुछ भलाई है, वह सब पूरी रीति से परमेश्वर और उसकी केवल सेंतमेंत की भलाई के कारण है। इसी कारण वह कहता है कि हमारा उद्धार अनुग्रह से हुआ है, हमारी ओर से नहीं, वरन परमेश्वर के दान से है, और कर्मों से नहीं।
मनुष्य जिस किसी भलाई और सद्गुण की कल्पना कर सकता है, उन सबको बाहर कर देना ही पर्याप्त होता। परन्तु क्योंकि उस घमण्ड को दबाना कठिन है जिसकी ओर हम इतने झुके हुए हैं, इसलिए पौलुस इस बात को फिर दोहराता है, ताकि वह भली-भाँति समझी जाए और विस्तार से पक्की हो जाए। और साथ ही हमें यह भी ध्यान देना है कि वह इसके सामने विश्वास को कैसे जोड़ता है, एक तो यह दिखाने के लिये कि मनुष्य किस साधन से उद्धार पाते हैं, और दूसरे यह और अधिक जताने के लिये कि मनुष्य अपनी ओर से कुछ नहीं लाते, परन्तु जिस किसी वस्तु की उन्हें आवश्यकता है, उसे परमेश्वर के हाथ से माँगना होगा। क्योंकि विश्वास मनुष्यों के अपनी योग्यता के विषय में सब अहंकार को गिरा देता और मिटा देता है, जैसा कि हम गलातियों की पत्री में और विस्तार से देख चुके हैं। [गलातियों 3:10, 11] क्योंकि वहाँ
पौलुस दिखाता है कि विश्वास कर्मों का स्थान लेता है, क्योंकि हम सब दोषी ठहराए गए हैं। और सचमुच इसके सिवाय कोई और धार्मिकता नहीं कि परमेश्वर की आज्ञाओं का सब प्रकार की सिद्धता से पालन किया जाए। परन्तु कोई मनुष्य इस प्रकार अपना कर्तव्य पूरा नहीं करता, इसलिए हम सब परमेश्वर के सामने श्रापित हैं, और इस कारण परमेश्वर को अपनी भलाई से हमारी सहायता करनी ही होगी। और जब हम विश्वास के द्वारा उस अनुग्रह को ग्रहण करते हैं जो सुसमाचार में हमें दिया जाता है, तो हम इसी से मान लेते हैं कि हमें यीशु मसीह की आवश्यकता है, क्योंकि हमारे अपने भीतर विनाश के सिवाय कुछ नहीं है।
फिर, जब वह इस पद में कहता है कि यह विश्वास से है, तो वह दिखाता है कि यदि परमेश्वर और मनुष्य की तुलना की जाए, तो हमें मानो
बिलकुल नंगे होकर आना होगा, और जब तक परमेश्वर हमें दया करके ग्रहण न कर ले, तब तक हममें लज्जा और घबराहट के सिवाय कुछ न होगा।
अब इसे पक्का करने के लिये प्रेरित आगे कहता है कि "हम परमेश्वर की रचना हैं, और उसने हमें यीशु मसीह में इसलिये रचा है कि हम उन भले कामों में चलें जिन्हें उसने तैयार किया है।" मानो वह कहता है कि परमेश्वर को अपने सेंतमेंत के अनुग्रह के साथ हमसे आगे चलना होगा। क्योंकि हम क्या कर सकते हैं, जब तक परमेश्वर पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से हमें फिर से नया न बना दे, तब तक तो हम सड़ी-गली लाशों के समान हैं? इसलिए यदि कोई मनुष्य अपने में कोई भलाई पाना चाहे, तो उसे वह अपने स्वभाव में या अपने पहले जन्म में नहीं ढूँढ़नी चाहिए, क्योंकि वहाँ भ्रष्टता के सिवाय कुछ नहीं; परन्तु परमेश्वर को पहले हमें सुधारना होगा, तब कहीं हममें भलाई की एक बूँद भी हो सकती है। जब यह ऐसा है, तो हमें यही निष्कर्ष निकालना होगा कि हमारे उद्धार का न कोई और स्रोत है, न कोई और नींव, केवल परमेश्वर की दया ही है, क्योंकि हम किसी भी रीति से अपनी सहायता नहीं कर सकते। इस प्रकार तुम देखते हो कि पौलुस का वास्तविक आशय क्या था।
तौभी हम ध्यान दें कि यहाँ वह केवल यही दिखाना नहीं चाहता कि हमें अंशतः परमेश्वर के अनुग्रह की आवश्यकता है और उससे हमारी सहायता इसलिए होती है कि हममें कुछ दुर्बलता और घटी है; वरन वह उस सब कुछ को भी मिटा देता है जो मनुष्य अपने विषय में अपने पुण्य, योग्यता और भले कर्मों के बारे में कभी कल्पना कर सकते हैं। वह दिखाता है कि हम पूरी रीति से निकम्मे हैं, और हमारे उद्धार में परमेश्वर केवल आगे बढ़ने में सहायता ही नहीं करता, वरन उसका आरम्भ, उसकी निरन्तरता और उसकी पूर्णता भी हमारे किसी योगदान के बिना उसी की ओर से है। और यही बात इन शब्दों से प्रकट होती है, "अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है, और यह तुम्हारी ओर से नहीं।" यह निश्चित है कि यहाँ पौलुस परमेश्वर को मनुष्यों के सामने रखता है। और परमेश्वर के अधिकार को स्थापित रखने के लिये वह दिखाता है कि जब हम अपना सारा सामर्थ्य सामने रख चुके हों, उन बातों को भी जो सबसे अधिक हमारी अपनी लगती हैं, तो वह सब धुआँ होकर उड़ जाता है। क्योंकि पौलुस यहाँ किसी पुण्य या योग्यता के अंश की बात नहीं करता, वरन साफ़ कहता है, "तुम्हारी ओर से नहीं।" मानो वह कहता है कि जब मनुष्य अपने सींग इतने ऊँचे उठाते हैं,
और कल्पना करते हैं कि वे कुछ न कुछ ला सकते हैं जिससे परमेश्वर को अपना देनदार बना लें, तो पाया जाएगा कि उनके सिर की चोटी से लेकर पाँव के तलवे तक उनमें गड़बड़ी के सिवाय कुछ नहीं है।
इसलिए, आइए सबसे पहले यह भली-भाँति ध्यान में रखें कि संत पौलुस का उद्देश्य यहाँ मनुष्य की सारी महिमा और घमण्ड को पूरी तरह दूर कर देना था, ताकि केवल परमेश्वर ही ऊँचा किया जाए। और वह यह कहना पर्याप्त नहीं समझता कि परमेश्वर हमारा उद्धारकर्ता है, क्योंकि यह कथन कुछ अस्पष्ट रह जाता, परन्तु जब वह कहता है कि यह अनुग्रह से है (अर्थात् परमेश्वर के सेंतमेंत दान से), तो वह दिखाता है कि वह इसका कारण उसके सिवा और कहीं नहीं खोजता। और इसी कारण वाक्य के दूसरे भाग में वह "दान" शब्द रखता है, और इसके विपरीत कहता है कि हम अपने आप से कुछ भी नहीं कर सकते। परमेश्वर हमें बचाने में अपनी निरी, सेंतमेंत की भलाई प्रकट करता है, और यदि हम समझते हैं कि हम उसमें कुछ भी सहायता या बढ़ावा देते हैं, तो यह परमेश्वर को उसके अधिकार से ठगना है, जो असह्य अपवित्रता है, जिसके कारण हम उस वस्तु से वंचित किए जाने के योग्य ठहरते हैं जो हमें मिली है। क्योंकि जब हम किसी भी रीति से परमेश्वर को कोई बदला नहीं दे सकते, तो कम से कम उन बातों के लिए जो हमारे पास केवल उसकी भलाई से हैं, हमें उसके प्रति अधीनता प्रकट करनी चाहिए, और जब वह हमें इस प्रकार दीन देखता है, तो हमारे उस निरे और सीधे-सादे अंगीकार से संतुष्ट हो जाता है। परन्तु यदि हम इतने कृतघ्न हैं कि जो विशेष रूप से उसी का है उसे अपने ऊपर ले लें, तो निश्चय ही यह उचित दण्ड है कि वह हमें पूरी तरह झटक दे, जैसे वह मनुष्य जो अपनी भूमि के लिए स्वामिभक्ति और अधीनता प्रकट करने से घृणा करता है, उचित रीति से उससे बेदखल कर दिया जाता है।
अब यदि संसार की इन नाशमान वस्तुओं में, और तुच्छ मूल्य की बातों में, वह पक्ष दण्डित होता है जो उस व्यक्ति के प्रति अपना कर्तव्य निभाने से रुकता है जिसके प्रति वह बँधा है, तो हमारा क्या होगा जब हम उद्धार की स्तुति अपने नाम करके परमेश्वर के स्थान पर खड़े होने लगें और उसे उसके अधिकार से वंचित करें? क्या यह शैतानी अत्याचार नहीं, जो हमें पूरी तरह नष्ट होने के योग्य ठहराता है? इसलिए हमारे लिए और भी अधिक आवश्यक है कि हम भली-भाँति ध्यान दें कि इस
अंश में क्या कहा गया है, अर्थात् यह कि हम अनुग्रह से उद्धार पाते हैं और उसमें हमारा कुछ भी योगदान नहीं, परन्तु परमेश्वर हमें वह सब देता है जो कभी हमारे उद्धार से सम्बन्ध रख सकता है। और क्यों? क्योंकि हम कुछ भी नहीं कर सकते: हमारे पास न भले कर्म हैं और न ऐसी योग्यताएँ जिन्हें हम अपने पक्ष में प्रस्तुत करें।
इसके अतिरिक्त, यह सन्देश विचार करने के बहुत योग्य है जब वह कहता है, "ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे।" इससे हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि हमारे उद्धार का कोई अंश परमेश्वर के नाम करना ही पर्याप्त नहीं है; हमें उस स्थिति तक पहुँचना है कि पूरी तरह झुक जाएँ, उस पर किसी प्रकार का दावा किए बिना। हमें अपनी सारी महिमा को नीचा होने देना है, ताकि केवल
परमेश्वर ही प्रधान ठहरे। जैसा कि हमने अन्य पदों में देखा है, विशेष रूप से यिर्मयाह के स्थान में, कहा गया है कि परमेश्वर की महिमा वैसी नहीं की जाती जैसी होनी चाहिए, और न हमारे लिए उसमें घमण्ड करना सम्भव है जब तक वह सब जिसे हम अपना समझते हैं गिराकर मिटा न दिया जाए। यदि हम चाहते हैं कि परमेश्वर वह रखे जो उसका अपना है और जिसे वह अपने लिए सुरक्षित रखता है, तो न मनुष्य का सद्गुण, न उसकी बुद्धि, न उसकी सामर्थ्य, न उसकी धार्मिकता आगे रखी जानी चाहिए।
इसलिए हम देखते हैं कि संसार परमेश्वर के साथ जो भी साझेदारियाँ बनाना चाहता है, वे सब मूर्खतापूर्ण कल्पनाएँ और शैतान के भ्रम हैं, जो हमें यह विश्वास दिलाने के लिए परिश्रम करता है कि हम अपने आप से कुछ कर सकते हैं, इस उद्देश्य से कि हमें हमारे परमेश्वर से पूरी तरह उखाड़ ले। क्योंकि जब तक मनुष्य यह कल्पना करता है कि उसमें अपनी भलाई की एक बूँद भी है, तब तक वह कभी अपने आपको परमेश्वर को नहीं सौंपेगा, परन्तु व्यर्थ अहंकार से फूला रहेगा और अपने ही पर टिका रहेगा। जब शैतान हमें मना लेता है कि हम अपने आप से कुछ कर सकते हैं या उद्धार पाने का कोई उपाय निकाल सकते हैं, तब वह हमारे हाथों बहुत कुछ जीत लेता है। उसका लक्ष्य यह है कि हम परमेश्वर में उन बातों को ढूँढ़ना छोड़ दें जो परमेश्वर हमें देता है। इस प्रकार हम खाली रह जाते हैं, कुँवारी मरियम के गीत के अनुसार, जहाँ कहा गया है कि जो अपने ही अभिमान से भरे हैं वे भूखे रह जाएँगे, और परमेश्वर उनके व्यर्थ अहंकार पर हँसकर उसे तुच्छ ठहराएगा।
हम परमेश्वर के अनुग्रह से तब तक तृप्त नहीं किए जा सकते जब तक हम उसकी लालसा न करें और अपनी
घटी को अनुभव न करें, भजन संहिता के उस कथन के अनुसार, "तू अपना मुँह पसार, मैं उसे भर दूँगा।" इसलिए आइए भली-भाँति ध्यान दें कि मनुष्य परमेश्वर के हाथ से वह सब पाने के लिए तब तैयार होंगे जो उनके उद्धार के लिए आवश्यक है, जब वे अपने लिए कुछ भी बचाकर न रखें, परन्तु मान लें कि सारी आत्म-प्रशंसा दूर कर देनी चाहिए।
और (जैसा मैंने पहले कहा) इसी रीति से वे साझेदारियाँ, जो संसार परमेश्वर के साथ बनाने का दिखावा करता है, धराशायी हो जाती हैं। क्योंकि पोप के अनुयायी यह मानने को विवश होते हैं कि परमेश्वर की सहायता के बिना वे कुछ नहीं कर सकते और यदि पवित्र आत्मा से सामर्थ्य न पाएँ तो शैतान का सामना करने में वे अत्यन्त निर्बल हैं। वे अपने मन में यह स्वीकार करने को तैयार हैं कि जब तक परमेश्वर उनकी घटियों को पूरा न करे तब तक वे किसी बात के योग्य नहीं ठहर सकते और यह भी कि उन्हें अपने पापों की क्षमा की आवश्यकता है। तौभी इस सब के होते हुए, वे अपनी स्वतंत्र इच्छा को छोड़ना सहन नहीं कर सकते, परन्तु कल्पना करते हैं कि वे अंशतः अपनी उन्नति कर सकते हैं। इसी पर वे सदा कोई न कोई पुण्य गढ़ते रहते हैं, और यद्यपि वे मानते हैं कि परमेश्वर का अनुग्रह आरम्भ में उनके आगे-आगे चलता है, तौभी वे उसमें सदा अपनी कोई चेष्टा और अपनी भली इच्छा मिला देते हैं। जब वे अपने पापों की क्षमा के लिए परमेश्वर की ओर भागते हैं, तो उसके पास उसके लिए अपने ही प्रायश्चित लेकर आते हैं। इस प्रकार तुम देखते हो कि पोप के अनुयायी अपने उद्धार की स्तुति परमेश्वर को सेंतमेंत और पूरी तरह नहीं सौंपेंगे, परन्तु उसका कुछ अंश, प्रायः बड़ा आधा भाग, अपने लिए रोक रखते हैं।
परन्तु संत पौलुस यहाँ और आगे बढ़ता है और दिखाता है कि हम परमेश्वर को उसकी महिमा से अन्यायपूर्वक ठगते और वंचित करते हैं जब तक कि हम उन सब झूठी धारणाओं को भुला न दें जिनसे संसार अपने आपको धोखा देता है। इसलिए परमेश्वर की महिमा करने का हमारे लिए एकमात्र मार्ग यह स्वीकार करना है कि हम अपने आप से कुछ भी नहीं हैं। दीनता या नम्रता कोई बनावट या झूठा दिखावा नहीं है, जैसा कि बहुत लोग मानते हैं, जो समझते हैं कि उन्होंने एक ही वाक्य में यह कह देने से परमेश्वर को संतुष्ट कर दिया कि वे अभागे पापी हैं और जितने निर्बल हो सकते हैं उतने निर्बल हैं।
इसके विपरीत, हमें पूरी तरह दृढ़ निश्चय करना चाहिए कि मनुष्य अपने ही मस्तिष्क में योग्यताओं, स्वतंत्र इच्छा, तैयारी, सहायता या
सन्तुष्टि शैतान के झूठ और छल-प्रपंच के सिवा कुछ नहीं है। जब हम यह एक बार जान लेंगे, तब हम अपने आप को वैसे ही दीन करेंगे जैसा हमें करना चाहिए, और तब परमेश्वर अपनी वह मर्यादा बनाए रखेगा जिसका वह योग्य है, और हम भी उसे वह आदर देंगे जो उसका अधिकार है। परन्तु यह तब तक नहीं हो सकता जब तक वह सब पूरी तरह मिटा न दिया जाए जो मनुष्य भले कर्मों के विषय में सोचते और कल्पना करते हैं, जिनके द्वारा वे परमेश्वर की दृष्टि में पुण्य कमाना चाहते हैं।
इसके अतिरिक्त, यह भी ध्यान रहे कि यदि हम उस उद्धार के भागी होना चाहते हैं जो परमेश्वर हमें देता है, तो हमें अपने साथ विश्वास के सिवा और कुछ नहीं लाना चाहिए। क्योंकि (जैसा दूसरे स्थान पर कहा गया है) विश्वास भले कर्मों से कोई सहायता नहीं लेता।
यद्यपि उसके पास व्यवस्था का लेखा है, तौभी वह परमेश्वर के सामने ऐसा कुछ नहीं लाता जिससे वह उसे अपने प्रति बाँध सके, वरन् यह गवाही देता है कि हम पूरी तरह खाली हैं और हमारी आशा केवल उसकी मुफ़्त भलाई में ही है। जैसे कोई मनुष्य बड़े संकट में दबा हुआ हो, इतना कि वह उँगली भी न हिला सके और केवल उसकी जीभ ही रह गई हो जिससे वह पुकारे, "हाय, कोई मेरी सहायता करे और मुझ पर तरस खाए," वैसे ही विश्वास को भी वह सारा अभिमान दूर कर देना चाहिए जो हमें अपने ऊपर है, ताकि जो कुछ परमेश्वर हमें देता है उसे हम ग्रहण कर सकें, और उसकी सारी स्तुति उसी के लिए सुरक्षित रहे। इसलिए हमें यही शिक्षा लेनी चाहिए।
और इससे हमें चेतावनी मिलती है कि जब परमेश्वर हमें इतनी कोमलता से बुलाता और खींचता है तब हम कृतघ्न न हों, वरन् दीन और भूखे प्राणियों के समान उसकी ओर दौड़ें, और उसके हाथ से सहायता पाने की सच्ची लालसा रखें, क्योंकि यह उसे भाता है
। क्योंकि हमारे प्रभु यीशु मसीह से बहुतों को लाभ क्यों नहीं होता? इसी कारण कि जब परमेश्वर उन्हें अपने पास आने को उभारता है तब उनके कान बहरे रहते हैं। और सच तो यह है कि उनमें से कुछ ऐसे पशु-समान हैं कि जब तक यहाँ उनके खाने-पीने को सूअरों के समान कुछ मिल जाए, या अपने ही सुख-विलास में लोटने को कुछ हो, तब तक वे स्वर्गीय जीवन की कुछ परवाह नहीं करते। जिन आत्मिक वस्तुओं के लिए हमें परिश्रम करना चाहिए, वे उनके लिए कुछ मायने नहीं रखतीं। इस प्रकार तुम देखते हो कि एक वर्ग परमेश्वर को द्वार से बाहर कर देता है क्योंकि वे शैतान के लुभावनों से सुस्त हो गए हैं, और संसार के सुखों से मतवाले, या कहो कि पूरी तरह मोहित हो गए हैं
—चाहे वह ठाठ-बाट और मान-सम्मान में हो, या धन में, या फिर व्यभिचार और अन्य स्वेच्छाचार में। और दूसरा वर्ग यह समझता है कि उसके पास ऐसा कुछ है जिससे वह परमेश्वर को अपना ऋणी बना ले, जैसा हम बहुत से कपटियों को करते देखते हैं, जो उस व्यर्थ आत्म-भरोसे को नहीं छोड़ सकते जिससे वे मेंढकों के समान फूले हुए हैं।
इसलिए, संक्षेप में, आओ हम इस शब्द "विश्वास" को भली-भाँति ध्यान में रखें, ताकि इस संसार के सुख और आराम हमें परमेश्वर की ओर अपने हृदय उठाने से न रोकें। और यही स्वर्ग में अपना लंगर डालने का सच्चा मार्ग है। क्योंकि पौलुस जिस विश्वास की "सारता" की बात करता है, वह हमें तब तक कभी नहीं मिल सकता जब तक हम संसार में से शीघ्रता से होकर न निकल जाएँ, और यह न जान लें कि हमारा निज भाग और विश्राम-स्थान यहाँ से कहीं और है।
इसके अतिरिक्त, आओ हम सब व्यर्थ कल्पनाओं को झटक दें जो हमारे मन में आ सकती हैं, क्योंकि वे केवल हमें यीशु मसीह से दूर करने का काम करती हैं, ताकि हम उसके पास न आएँ, और न वह हम में कोई प्रवेश पाए। यही वह शिक्षा है जो हमें इस पाठ से लेनी चाहिए।
अब आगे पुष्टि के लिए पौलुस यह जोड़ता है कि हम परमेश्वर की रचना हैं। वह इसे परमेश्वर के हमें सृजने, और हमें इस संसार में रखने के अर्थ में नहीं कहता, परन्तु उसका आशय यह है कि मनुष्य, जैसे वे आदम में जन्म लेते हैं, स्वर्गीय जीवन के योग्य नहीं हैं, और यदि वे सोचते हैं कि इस कारण वे कुछ पा लेंगे, तो वे अपने आप को बहुत धोखा देते हैं, क्योंकि वे मृत प्राणियों और सड़ी हुई लोथ के समान हैं जिनमें सड़ी हुई गन्दगी के सिवा कुछ नहीं। इसके प्रमाण के लिए हमें इस वर्तमान पाठ से बढ़कर किसी और बात को ढूँढ़ने की आवश्यकता नहीं, जहाँ वह कहता है कि हम यीशु मसीह में सृजे गए हैं। इसलिए यहाँ पौलुस उस दोहरे जन्म की तुलना करता है जो सब विश्वासियों में है। क्योंकि हम सब की एक सामान्य सृष्टि है, जिसके द्वारा हम इस संसार में जीते हैं, और परमेश्वर हमें फिर से नया सृजता है जब वह अपने सुसमाचार के द्वारा हमें नया जीवन देने की कृपा करता है। मेरा तात्पर्य यह है कि जब वह अपने ही गुप्त कार्य द्वारा उसे हमारे हृदयों और मनों में अंकित करता है, क्योंकि केवल वचन ही इसके लिए पर्याप्त नहीं है।
इसलिए, जहाँ तक हमारी पहली सृष्टि का सम्बन्ध है, यहूदियों, तुर्कों, अन्यजातियों और हम में कोई भेद नहीं। हम सब एक ही लोंदे में से निकाले गए हैं, हम सब आदम की सन्तान हैं, और हम सब स्वभाव से परमेश्वर के क्रोध के वारिस और शापित हैं, जैसा हम पहले ही पहले देख चुके हैं। तब यदि मनुष्य अपने आप को जाँचें और खोजें कि अपने पहले जन्म से वे क्या हैं, तो वे पाएँगे कि उनमें पाप और दुष्टता के सिवा कुछ नहीं, और जिस बुद्धि को हम अपनी समझते हैं वह पशुता ही है। और जिस ज्योति के विषय में हम सोचते हैं कि उससे हम भले-बुरे को पहचान सकते हैं, वह परमेश्वर के विरुद्ध हठ और घोर विद्वेष ही है। और इस प्रकार तुम देखते हो कि हम अपनी आत्मा के सब अंगों में भ्रष्ट हो गए हैं।
तो अब हम परमेश्वर की कृपा पाने और उसे अपना ऋणी बनाने के लिए क्या कर सकते हैं? क्योंकि यदि हम बुराई के सिवा कुछ नहीं कर सकते, तो वह केवल उसके क्रोध को हमारे विरुद्ध और अधिक भड़काना ही है। हम अपनी माताओं के गर्भ से निकलने से पहले ही अनन्त मृत्यु के योग्य हैं।
यद्यपि हम नन्हे बच्चे में पाप को नहीं देखते, तौभी उसके भीतर उसका बीज है, और परमेश्वर घोषणा करता है कि हम सब नरक की तह में डूबा दिए जाने के योग्य हैं। तब यदि नन्हा बच्चा इस संसार का उजियाला देखने से पहले ही पहले से इतने न्यायपूर्वक दोषी ठहराया गया है, तो हमारे विषय में क्या कहा जाए जब हम जन्म लेते हैं और सचमुच पापी दिखाई देते हैं, और हमारा स्वभाव पूरी तरह पापमय है? और जब हम बड़े हो जाएँ, तब परमेश्वर से समझौता करने के लिए हम क्या कर सकते हैं, ताकि हम उसके अनुग्रह को आगे बढ़ाने में सहायक हों, और हमारा ऐसा करना हमारे उद्धार को बढ़ावा देने का साधन बने? देखो पौलुस इस पाठ में क्या कहना चाहता है, जहाँ वह कहता है कि हम परमेश्वर की रचना हैं।
मानो वह कहता हो, "हे बेचारे प्राणी, तू इस बात में साझेदार बनने की सोचता है, अपने आप को आगे बढ़ाकर कोई पुण्य दिखाने का दावा करता है, और यह समझता है कि तू परमेश्वर के पास जाने और आरम्भ करने के योग्य है, ताकि उसे अपनी ओर से तेरा ऋणी होना पड़े। तूने यह कब आरम्भ किया? यदि तू कहे कि जन्म से पहले आरम्भ किया, तो तू इस योग्य है कि लोग तेरे मुँह पर थूकें। और यदि तू कहे कि उसके बाद, उम्र के बीच
सात वर्ष की आयु में, और बीस या तीस वर्ष की आयु में, जिस समय तुम सुसमाचार से प्रकाशित किए गए थे: इसके विपरीत तुम्हारे विषय में यह भलीभाँति प्रमाणित हो चुका है कि तुम्हारे भीतर भलाई करने की एक बूँद भर भी इच्छा नहीं थी, परन्तु तुम्हारे सब विचार और अभिलाषाएँ परमेश्वर के विरुद्ध सर्वथा विद्रोही थीं, और योद्धाओं की नाईं उसकी धार्मिकता से लड़ रही थीं। इसलिये जन्म से लेकर तुमने परमेश्वर से लड़ने के सिवाय और कुछ नहीं किया। फिर यदि तुम इसे उस समय से गिनो जब तुम एक छोटे शिशु थे, जो श्वेत और श्याम में भेद नहीं कर सकता था, तो भी तुम आदम की श्रापित जाति के थे। सो तुम जिस ओर भी मुड़ो, बुद्धि को तुम्हें यह मानने पर विवश होना ही पड़ेगा कि तुम परमेश्वर की ओर कुछ भी करने में असमर्थ थे, और इसलिये जो कुछ उसने तुम्हारे कल्याण के लिये किया है, वह सब केवल उसी का माना जाना चाहिए, और उसमें से एक बूँद भी अपने लिये दावा नहीं करना चाहिए।"
इस प्रकार हम अब देखते हैं कि पौलुस इस पाठ में हमें परमेश्वर की रचना या कारीगरी क्यों कहता है, जैसा कि भजन संहिता में भी कहा गया है कि जो उसकी कलीसिया के घराने के लोग थे, वे उसकी भेड़ें भी थे।
क्योंकि वहाँ भविष्यद्वक्ता इस्राएल की सन्तान को अलग करके बताता है, जिन्हें परमेश्वर ने केवल अपनी ही भलाई से इकट्ठा किया था, कि उन्हें अन्यजातियों से अलग रखे। यह निश्चित है कि परमेश्वर को उस वंश को अपने लिये रख लेने, या उन्हें औरों से अधिक मान देने का और कोई कारण नहीं मिला, सिवाय इसके कि उसने केवल अपनी ही दया से उन्हें चुन लिया था। आज हमारे विषय में भी यही कहना चाहिए।
और जो वह आगे जोड़ता है, अर्थात् यह कि हम मसीह यीशु में सृजे गए, यह हमें और भी गहराई से स्पर्श करना चाहिए। क्योंकि वहाँ वह दिखाता है कि आदम में हमारी सृष्टि हमें केवल विनाश तक ले जाती है, और इसलिये हमारा नए सिरे से रचा और सृजा जाना आवश्यक है, अर्थात् यीशु
मसीह में, जो दूसरा आदम है, जैसा कि वह स्वयं उसे रोमियों की पहली पत्री में और कुरिन्थियों की पहली पत्री के पन्द्रहवें अध्याय में कहता है। तो तुम देखते हो कि यह शब्द "सृजना"
उन लोगों का मुँह बन्द करने और उनके घमण्ड को दूर करने के लिये पर्याप्त है जो अपनी योग्यता पर डींग मारते हैं। क्योंकि जब वे ऐसा कहते हैं, तो इसका अर्थ यह निकलता है कि वे अपने आप के रचनेवाले थे। जो मनुष्य अपने लिये किसी प्रकार की इच्छा की स्वतन्त्रता का दावा करता है और यह मान लेता है कि भलाई करने का कोई साधन या सामर्थ्य उसके पास है
(अपने आप से), वह वस्तुतः यह कह रहा है कि वह एक सृष्टिकर्ता है। परन्तु ऐसा कोई मनुष्य नहीं जो ऐसी निन्दा से घृणा न करे। संसार के सबसे अन्धे और सबसे पागल लोग भी "सृष्टि" शब्द को पवित्र और पावन वस्तु मानते हैं और कहेंगे कि परमेश्वर ही सब वस्तुओं का सृष्टिकर्ता या बनानेवाला है।
फिर भी हे कपटी, तू अपने मुँह से यही मानता है, और फिर भी झूठ बोलता है, क्योंकि तू समझता है कि तेरे अपने कल्याण और उद्धार को आगे बढ़ाने के लिये तुझमें कुछ स्वतन्त्र इच्छा है। और इस प्रकार तू हमारे विश्वास की पहली धारा का इन्कार करता है: क्योंकि तू परमेश्वर को केवल आधा सृष्टिकर्ता बनाता है। वे अपने मुँह से सहज ही मान लेंगे कि परमेश्वर सृष्टिकर्ता है, हाँ, और जहाँ तक इस सांसारिक जीवन की बात है, वे कहेंगे कि वे इसे उसी से पाते हैं। परन्तु अब एक कहीं अधिक उत्तम जीवन है, अर्थात् वह जिसकी हम आशा करते हैं और जिसे हम विश्वास के द्वारा पहले से ही पा चुके हैं, चाहे हम अभी उसका पूरा आनन्द न उठाते हों। और वह जीवन कितना अधिक बहुमूल्य और योग्य है, जिसमें हम परमेश्वर की महिमा के भागी होंगे, उस यात्रा के जीवन की अपेक्षा जो हम इस संसार में बिताते हैं, जो केवल एक छाया है जो मिट जाती है?
अब यदि तुम पोप के अनुयायियों से पूछो कि स्वर्गीय जीवन उन्हें किससे मिलता है, तो वे कहेंगे, "हम इसे कुछ परमेश्वर के अनुग्रह से और कुछ अपनी स्वतन्त्र इच्छा से पाते हैं।" क्योंकि वे उसका कुछ भाग अपने ऊपर आरोपित करते हैं, और इस प्रकार परमेश्वर के साथ श्रेय बाँटने का विचार रखते हैं, इसलिये हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि वे स्वयं को अपना सृष्टिकर्ता मानते हैं। पर इस पर वे उत्तर देंगे और विरोध करेंगे कि उनका ऐसा कोई अभिप्राय कभी नहीं था, और वे ऐसी निन्दा कहने से तो मर जाना ही अच्छा समझेंगे।
हाँ, परन्तु इस बीच अधिक मूल्य की वस्तु कौन सी है? इस संसार में नश्वर मनुष्य के रूप में अपने आप को रचना, या
अनन्त जीवन को मोल लेना? पौलुस हमें बताता है कि यदि हम अपनी स्वतन्त्र इच्छा और सामर्थ्य से कुछ भी कर सकते हैं, तो परमेश्वर पूरी रीति से हमारा सृष्टिकर्ता नहीं ठहरता।
परन्तु वह कहता है कि हम उसकी रचना और उसके बनाए हुए हैं, स्वर्गीय जीवन के विषय में भी। हमें इसे सदा स्मरण रखना चाहिए, क्योंकि पौलुस इस क्षणभंगुर जीवन के विषय में नहीं, परन्तु स्वर्ग के राज्य के उत्तराधिकारी होने के विषय में बोलता है। तो हम देखते हैं कि पोप के अनुयायी अपने घमण्ड में परमेश्वर को ललकारते हैं, जैसे नीच निन्दक होते हैं। और इसलिये, हमारे विषय में, यदि हम उस अनुग्रह के भागी होना चाहते हैं जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमारे लिये मोल लिया गया है, तो हमें सब आत्म-महत्व से छुटकारा पाना होगा और यह स्वीकार करना होगा कि हमारे भले काम का आरम्भ इसी में से उपजता है कि परमेश्वर ने हमें अपने पास बुलाना उचित समझा, और उसके पूर्वगामी अनुग्रह से।
संक्षेप में, पौलुस का अर्थ यह है कि वे सब जो समझते हैं कि उन्होंने परमेश्वर से कुछ पाने का अधिकार अर्जित किया है, मानते हैं कि वे बड़ी योग्यता के लोग हैं, जबकि सच्चाई में वे पहले ही मरे हुए हैं और कुछ भी नहीं हैं। एक मरा हुआ मनुष्य क्या कर सकता है? और निश्चय ही हम मरे हुए हैं
(जैसा कि मैं पहले बता चुका हूँ) जब तक परमेश्वर विश्वास के द्वारा और अपने पवित्र आत्मा के कार्य से हमें फिर जिलाता नहीं। अब यदि हम मरे हुए हैं, तो हम क्या भला कर सकते हैं, या अपने आप को कुछ भी करने के योग्य कैसे बना सकते हैं? फिर, हम कुछ भी नहीं हैं, क्योंकि "सृजना" शब्द का अर्थ है कि हमारे भीतर जो कुछ है वह परमेश्वर का किया हुआ है। जैसे जब कहा जाता है कि उसने जगत को शून्य से सृजा, तो इसका अर्थ है कि जहाँ पहले कुछ भी न था, वहाँ उसने उसे अस्तित्व दिया जो था ही नहीं।
वैसे ही, आत्मिक जीवन के विषय में, सृजे जाने का अर्थ है कि हम पहले कुछ भी नहीं थे। अब यदि हम कुछ भी नहीं हैं, तो क्या हम परमेश्वर को बाध्य कर सकेंगे कि वह हमें यह या वह दे? क्या ये बातें प्रकृति के सर्वथा विरुद्ध नहीं हैं? तो आओ हम भलीभाँति ध्यान दें कि यह जानने के लिये कि हम केवल अनुग्रह से कैसे उद्धार पाते हैं, और यह कि हमारे पास सब कुछ परमेश्वर के दान और उसकी निःशुल्क भलाई से है, हमें इस बात पर आना होगा कि परमेश्वर ने हमें हमारा अस्तित्व दिया। इसकी गवाही अब्राहम के उदाहरण से मिलती है, रोमियों के चौथे
अध्याय में। अब्राहम की देह में हम वह देखते हैं जो हमारी आत्माओं में है।
जब यीशु मसीह की प्रतिज्ञा अब्राहम से उसके पुत्र इसहाक में की गई, तो तुम जानते हो कि वह एक सर्वथा निर्बल और बाँझ मनुष्य था, और उसकी पत्नी भी बहुत बूढ़ी हो चुकी थी।
इसलिए यह कि वह अपनी ओर से सन्तान उत्पन्न करे, या उसकी पत्नी अपनी ओर से गर्भ धारण करे—ये बातें असम्भव थीं। परन्तु उसने उस
परमेश्वर पर विश्वास किया, जो अनहोनी बातों को ऐसे बुला लेता है मानो वे हों, और उन्हें अस्तित्व देता है।
जब अब्राहम सूखे ठूँठ के समान था, और उसमें न बल था न जीवन-शक्ति, फिर भी उसे वह प्रतिज्ञा मिली जो उससे की गई थी; तो इसमें हमें यह देखना चाहिए कि जब तक हम अपनी असमर्थता को न मानें, और सबसे पहले अपनी ही दृष्टि में पूरी तरह दीन न हो जाएँ, तब तक हम परमेश्वर के अनुग्रह के भागी नहीं हो सकते, ताकि हमारा प्रभु हमारे जीवन का आरम्भ करे और उसे तब तक निभाता रहे जब तक वह उसे पूर्ण सिद्धता तक न पहुँचा दे।
इसके अतिरिक्त, यह भली-भाँति ध्यान दें कि उसका यह कहना कि "मसीह यीशु में", हमें उस भ्रष्टता की ओर लौटाता है जो हमें आदम से विरासत में मिली है। क्योंकि जब तक हम इसे अपने ही भीतर से उठता हुआ अनुभव न करें, तब तक हमारे मन में कभी यह बात नहीं बैठती कि हम अपने आप को दोषी मान लें। फिर यह इस बात को भी दिखाता है कि यह लाभ सब मनुष्यों के लिए सामान्य नहीं है, परन्तु केवल उन्हीं के लिए है जिन्हें परमेश्वर ने चुना है, जैसा कि हम पहले देख चुके हैं कि हम जगत की सृष्टि से पहले चुने गए थे। अतः यह आदम की सारी सन्तान पर सामान्य रूप से लागू नहीं होता, परन्तु केवल उन पर जो यीशु मसीह में नए किए गए हैं। इसलिए यह ऐसा ही है मानो पौलुस यह दिखा रहा हो कि हमें उपचार की आवश्यकता है क्योंकि हम पहले से ही खोए हुए और दण्ड के भागी हैं, जब परमेश्वर यीशु मसीह के द्वारा हमें उस कालकोठरी से निकाल लेता है जिसमें हम पड़े थे।
यह उस बात की और भी अच्छी पुष्टि करता है जो हम पहले देख चुके हैं, अर्थात् यह कि जब तक परमेश्वर हमें नया न बनाए तब तक हम विश्वासी नहीं हो सकते, ताकि स्वर्गीय जीवन से सम्बन्ध रखनेवाली सारी बातें और वे सारी
आत्मिक आशीषें जो हमारे पास हैं, हम उसी से पाएँ। अब, जब हम यीशु मसीह में सृजे गए हैं, तो यह ऐसा ही है मानो यह कहा गया हो कि जितनी धार्मिकता, जितनी बुद्धि, जितना सद्गुण और जितनी भलाई हमारे भीतर है, वह सब हम उसी सोते से खींचते हैं; और परमेश्वर ने उन्हें यों ही इधर-उधर बिखेर नहीं दिया, परन्तु हमारे उद्धार से सम्बन्ध रखनेवाली सब बातों की परिपूर्णता यीशु मसीह में रख दी है। इसलिए जब हम एक बार उसकी देह के अंग बना दिए जाते हैं, तो उसके सब लाभों के भागी भी बना दिए जाते हैं। उसके बिना हम अपने उद्धार के सब अंशों से कटे हुए हैं, मानो हम सड़ी-गली, दुर्गन्ध-भरी अभागी लाशें हों, और हममें गन्दगी के सिवा कुछ न हो, जैसा कि मैं पहले बता चुका हूँ। इस प्रकार आप देखते हैं कि जब पौलुस कहता है कि हम केवल परमेश्वर की कारीगरी ही नहीं, परन्तु यीशु मसीह में सृजे भी गए हैं, तब हमें और क्या ध्यान देना है।
अब वह आगे कहता है, "भले कामों के लिए जिन्हें परमेश्वर ने पहले से हमारे लिए तैयार किया, कि हम उन में चलें।" उसने भले कर्मों को इस स्थान पर इसलिए रखा है कि यह दिखाए कि मनुष्यों का यह सोचना कितनी मूर्खता, बल्कि कितना पागलपन और उन्माद है कि वे अपनी ओर से भले कर्म ला सकते हैं, मानो वे उनकी आस्तीन में रखे हों, या मानो वे उनकी अपनी ही उपज हों। क्योंकि अवश्य ही (वह कहता है) परमेश्वर ने उन्हें तैयार किया होगा, और हमें उन्हें उसी के हाथ से पाना होगा। यह ऐसा ही है मानो वह कहे: आओ, अपना बल और अपने गुण यहाँ दिखाओ; परमेश्वर के सामने ज़रा हिसाब तो दो; क्योंकि तुम्हारा घमण्ड दबता नहीं, और तुम अब भी अकड़े ही खड़े हो, तो जो कुछ तुम सोचते हो कि तुम्हारे पक्ष में काम आ सकता है, वह सब सामने लाओ।
तुम कहते हो, ठीक है, और हम अपने भले कर्म लाएँगे, जैसा कि पोप के अनुयायी करते आए हैं, जो इस प्रकार दलील देते हैं: क्या? अब क्या? क्या हम अपने ही पुण्य और अपने भले कर्मों से उद्धार नहीं पाएँगे? पौलुस कहता है, तो तुम उन्हें कहाँ से लाते हो? क्या तुमने उन्हें अपनी ही दुकान में गढ़ा है?
या तुम्हारी अपनी लगाई कोई बारी है जिसमें से तुम उन्हें तोड़ लाते हो? या वे, न जाने कैसे, तुम्हारे ही परिश्रम और चतुराई से उपजते हैं, ताकि तुम उनके द्वारा अपना उद्धार आगे बढ़ा सको? नहीं, बल्कि इसके विपरीत जान लो कि परमेश्वर ने उन्हें तैयार किया है। और क्या यह उचित है कि
तुम उसके विरुद्ध उत्तर दो, जब उसने तुम पर तरस खाया और तुम्हारे प्रति उदारता दिखाई? क्या यह उचित है कि तुम उसे चुकाने को आगे बढ़ने का साहस करो, मानो तुम्हारे पास अपना कुछ हो?
जब किसी मनुष्य की भली-भाँति देखभाल की गई हो, और उसके सराय-स्वामी ने ज़रूरत के समय उसे धन उधार दिया हो, और उसने वह उसके हाथ से ले लिया हो (उसे चुकाने के लिए), तो क्या वह बाद में यह डींग मारेगा कि मैंने अपने सराय-स्वामी को चुका दिया? एक ऐसा सराय-स्वामी भी है जो न केवल मनुष्य पर दया करके सन्तुष्ट होता है, परन्तु उसे बिस्तर और भोजन दोनों देने के बाद उससे यह भी कहता है,
"लो, यह रखो, इसी से चुका देना: ताकि तुम्हें ऐसा न लगे कि मेरे उपकार का उद्देश्य तुम्हें अपना अधीन बना लेना था, इसलिए मैं तुम्हारे हाथ से भुगतान लूँगा, हाँ, परन्तु वह मेरी ही थैली से निकलेगा।" अब जिसके साथ ऐसी उदारता की गई हो, क्या वह जाकर कहेगा कि मैंने अपने सराय-स्वामी को अच्छी तरह चुका दिया? हाँ, और किस धन से? उसी धन से जो उसके हाथ में दिया गया था।
उन लोगों की स्थिति ऐसी ही है जो अपने भले कर्म आगे रखकर यह कहते हैं कि परमेश्वर ने उन्हें मुफ्त में उद्धार नहीं दिया, परन्तु वे स्वयं भी उसमें सहायक थे। हाँ, परन्तु वे उन भले कर्मों को कहाँ से लाते हैं? पौलुस का यही लक्ष्य था जब उसने कहा कि परमेश्वर ने भले कर्म तैयार किए। यह सच है कि परमेश्वर व्यवस्था के द्वारा मनुष्यों के चाल-चलन को तैयार करता है, जिसमें वह हमें एक निश्चित नियम देता है कि हम उसकी इच्छा के अनुसार कैसे चलें; और यह ऐसा ही है मानो वह हमारे चलने के लिए मार्ग बना देता है जैसा हमें चलना चाहिए। परन्तु यह हमारे किसी काम का न होता, यदि हम भले कर्मों को स्वयं परमेश्वर के हाथ से न पाते। जब परमेश्वर हमें कोई आज्ञा देता है, तो उसकी ध्वनि हमारे कानों में तो गूँजती रह सकती है, परन्तु वह हमारे हृदयों में कभी नहीं उतरती, क्योंकि हम घमण्ड और दुष्टता से भरे हैं, और संक्षेप में, जब तक वह हमारे हृदयों को कोमल करके उन्हें पूरी तरह बदल न दे, तब तक परमेश्वर की आज्ञा मानना हमारे लिए असम्भव है।
और यही बात हमें भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा, और सारे पवित्रशास्त्र में बताई गई है। इसलिए परमेश्वर को एक और
तैयारी करनी ही पड़ती है: अर्थात् जब वह हमें सिखा चुका और बता चुका कि क्या भला है और उसे क्या भाता है, तो इसके बाद उसे हमें सुधारना होगा, और अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें ऐसे चलाना और सँभालना होगा कि हमारे जीवन और उसकी व्यवस्था के बीच एक मेल हो। तब, जब तक परमेश्वर इस रीति से भले कर्मों को तैयार न करे, अर्थात् जब तक वह अपनी इच्छा दिखाकर हमें उन्हें न दे, और अपनी सामर्थ्य से हमसे उन्हें करवा भी न ले, तब तक हम पूर्णतः निकम्मे ही रहेंगे।
अब, जब ऐसा है, तो आओ हम परमेश्वर के सामने दीन होना सीखें, बीते हुए समय के लिए भी और आनेवाले समय के लिए भी। बीते हुए के विषय में हम मान लें कि परमेश्वर ने हमें नरक की खाई में से खींच निकाला है, और जबकि हम स्वभाव से ही दण्ड के योग्य ठहरे हुए थे, उसने कृपा करके हमें अपनी सन्तान बना लिया। इसलिए हम इतने घमण्डी न बनें कि यह समझें कि हमारे पास यह या वह अपना है, परन्तु जैसा वह योग्य है वैसी उसकी महिमा हो। हम अपने मन में निश्चय कर लें कि उसने हमें मृत्यु से इसलिए खींच लिया कि हमारे उद्धार का आरम्भ, सोता, जड़ और एकमात्र कारण उसी की केवल मुफ़्त दी हुई भलाई से निकले।
इस प्रकार तुम देखते हो कि सचमुच अपने उद्धार की सारी महिमा परमेश्वर को देना सच्ची दीनता की बात है। और आनेवाले समय के विषय में हमें जान लेना चाहिए कि यदि परमेश्वर हमारी अगुआई न करे, तो हम कोई भलाई करने के लिए अपनी एक छोटी उँगली तक नहीं हिला सकते, और भले कर्म भी हम उसी के हाथ से और उसके पवित्र आत्मा के हाथ से पाते हैं। इसलिए जब-जब हम अपनी निर्बलता का अनुभव करें, तब-तब हम शरण के लिए उसी की ओर भागें।
जब हमसे कोई भला काम हो जाए, तो वह हमें किसी घमण्ड से न फुलाए, परन्तु हम सदा यही समझें कि हम परमेश्वर के प्रति और भी अधिक कठोरता से, बल्कि दुगुने रूप से बँधे हुए हैं। जो अभी बहुत निर्बल है, उसे मानना चाहिए कि वह परमेश्वर की दया का बहुत ऋणी है कि वह उसे सह रहा है; परन्तु जो औरों से आगे बढ़ा हुआ है और सारी पवित्रता का दर्पण-सा है, उसे मानना चाहिए कि वह उसका और भी अधिक ऋणी है।
क्यों? क्योंकि उसका अपना कुछ भी नहीं; वह सब कुछ परमेश्वर से और केवल उसकी मुफ़्त भलाई से रखता है। इसलिए हम जीवन भर ऐसे चलें कि वर्ष-वर्ष, महीने-महीने, दिन-दिन, घण्टे-घण्टे और पल-पल निरन्तर यह मानते रहें कि जो भलाई परमेश्वर ने अपनी निरी दया से हमें दी है, उसके लिए हम उसके ऋणी हैं, और सब बातों के लिए अपने आप को उसका उपकृत समझें।
अन्त में हम यह भी ध्यान दें कि यहाँ पौलुस का उद्देश्य हमारे उद्धार के सब कारणों को एक-एक करके गिनाना नहीं है, परन्तु मनुष्यों के अहंकार को घटाना है, ताकि वे कोई डींग न मारें, और न ऐसा भाव दिखाएँ मानो परमेश्वर उनका देनदार है। इसलिए पौलुस के लिए इतना ही काफ़ी है।
कि उसने सब मनुष्यों के मुँह ऐसे बन्द कर दिए हैं कि वे अपना कुछ भी होने का दावा न करें। क्योंकि इसके विपरीत, जब परमेश्वर हमें भले कर्म देता है, तो चाहे वे उसकी निरी भलाई के फल हों, तो भी वे उसके हाथ से हमारे लिए कुछ मोल नहीं ले सकते। हमें सदा अपने पापों की क्षमा पर ही अपने आप को टिकाना और स्थिर करना चाहिए। हमारी सारी धार्मिकता वहीं है।
संक्षेप में, अपने उद्धार के लिए परमेश्वर को उसके योग्य स्तुति देने में दो बातें आवश्यक हैं: पहली, कि हम मानें कि हमारे पास सब कुछ उसी से है; और दूसरी, कि हम मानें कि वे सब भले कर्म और सारी भली इच्छा जो उसने हमें पहले ही दी है, न तो उसके हाथ से हमारे लिए अनुग्रह मोल लेने के लिए हैं, न हमारे भरोसा करने के लिए, परन्तु हमें यह दिखाने के लिए हैं कि उसे हमें थामे रखना और हमारे सब पापों को गाड़कर भुला देना आवश्यक है, और इसी रीति से हम उसके सामने धर्मी ठहरते हैं, क्योंकि
वह हमें छोड़ देता है, यद्यपि हम सौ बार दण्ड के योग्य हैं।
तो संक्षेप में, जब हमें बताया जाता है कि मनुष्य में न स्वतंत्र इच्छा है और न कुछ और, तो इसलिए कि हम सारी महिमा परमेश्वर को देना सीखें और अपने आप पर घमण्ड करने का कोई कारण न रखें।
इसके बाद, यह जानकर हमें समझना चाहिए कि यदि हमें यह निश्चय न होता कि आँसू बहाते और विलाप करते हुए परमेश्वर के पास आने से हमें सदा अनुग्रह और दया मिलेगी, तो हम निरन्तर क्लेश और घबराहट में रहते। और कैसे? क्योंकि वह हमें क्षमा करना चाहता है; और यद्यपि वह हम पर बिजली गिराकर हमें डुबा सकता था, तो भी वह हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमारे पापों को गाड़ देता है और हमें सदा दया के साथ ग्रहण करता है।
इस प्रकार तुम देखते हो कि मनुष्यों को हर बात में और हर अवस्था में अपनी दृष्टि में लज्जित होना और अपनी दुष्टता पर शर्मिन्दा होना चाहिए, ताकि वे परमेश्वर की महिमा करें; और साथ ही यह भी मानें कि वे सदा सन्देह और वेदना में रहते, यदि परमेश्वर निरन्तर उन पर तरस न खाता, और यदि हमारे प्रभु की मृत्यु और दुःखभोग न होता
यीशु मसीह वह बलिदान है जिसके द्वारा हमारा उसके साथ मेल-मिलाप हुआ है। इसलिए परमेश्वर को जगत का उद्धारकर्ता मानना और घोषित करना यही सच्चा मार्ग है; और यही मार्ग है कि हम सब कुछ हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह का ठहराएँ, जैसा वह योग्य है: अर्थात् उस सारे घमण्ड को मिटाकर और दूर करके जो हम अपने आप में रखने का दिखावा करते हैं, और तब यह मान लें कि हममें जो कुछ भलाई है वह न केवल परमेश्वर की डाली हुई है, बल्कि उसे हमारी निर्बलताओं को भी सहना पड़ता है, क्योंकि हम उसके क्रोध को भड़काना नहीं छोड़ते, जब तक कि वह उस प्रायश्चित को हमारे लिए प्रभावी न करे जो हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग से किया गया।
अब आओ, हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने पापों को मानते हुए दण्डवत् करें, और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उनका बोध अधिकाधिक कराए, जब तक हम ऐसे नीचे न किए जाएँ कि हममें पाप का दिखावा तक न रहे; और इस बीच भी हम अपने प्रभु यीशु मसीह की सहायता और मदद ढूँढ़ते रहें। और क्योंकि उसने अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें कुछ हद तक प्रकाश दे भी दिया है, इसलिए उसे भाए कि वह हममें अपना अनुग्रह अधिकाधिक बढ़ाए, जब तक कि उसे पूरी रीति से हम तक न पहुँचा दे; और इस बीच
आत्मा के द्वारा, वह हममें अपना अनुग्रह अधिकाधिक बढ़ाता रहे, जब तक कि उसे पूरी रीति से हम तक न पहुँचा दे; और इस बीच,
