अध्याय 9 / 14

भाग 9

यह हिन्दी संस्करण अंग्रेज़ी मूल से पूर्ण रूप से, अनुच्छेद-दर-अनुच्छेद, कृत्रिम बुद्धि (AI) की सहायता से अनुवादित है; मानवीय समीक्षा जारी है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

भाग 9

परन्तु यह पूरी तरह भूल है। मृत्यु के बाद कोई परिवर्तन नहीं होता; क़ब्र में कोई मन-परिवर्तन नहीं होता; अन्तिम साँस लेने के बाद कोई नया हृदय नहीं दिया जाता। जिस दिन हम यहाँ से जाते हैं, उसी दिन हम सदा के लिए प्रस्थान कर जाते हैं; जिस दिन हम इस संसार से विदा होते हैं, उसी दिन से हमारी अनन्त दशा आरम्भ हो जाती है। उस दिन से कोई आत्मिक बदलाव नहीं, कोई आत्मिक परिवर्तन नहीं। जैसी हमारी मृत्यु होगी, वैसा ही मृत्यु के बाद हमारा भाग होगा; जैसे वृक्ष गिरता है, वैसे ही उसे पड़ा रहना है।

यदि आप अपरिवर्तित मनुष्य हैं, तो यह बात आपको सोचने पर विवश करे। क्या आप जानते हैं कि आप नरक के कितने निकट हैं? आज ही आपकी मृत्यु हो सकती है; और यदि आप मसीह से बाहर मरे, तो आपकी आँखें तुरन्त नरक में, पीड़ा के बीच खुलेंगी।

यदि आप सच्चे मसीही हैं, तो आप स्वर्ग के उससे कहीं अधिक निकट हैं जितना आप सोचते हैं। आज ही यदि प्रभु आपको ले जाए, तो आप अपने आप को स्वर्गलोक में पाएँगे। प्रतिज्ञा की वह उत्तम भूमि आपके पास ही है। जिन आँखों को आपने दुर्बलता और पीड़ा में बन्द किया था, वे तुरन्त एक ऐसे महिमामय विश्राम में खुलेंगी जिसका वर्णन मेरी जीभ नहीं कर सकती।

और अब समाप्त करते हुए मैं कुछ शब्द और कहता हूँ, फिर मैंने अपनी बात पूरी कर ली।

(1) यह लेख किसी दीन-हृदय और पश्चातापी पापी के हाथ में पड़ सकता है। क्या आप वही मनुष्य हैं? तो आपके लिए यहाँ प्रोत्साहन है। देखिए पश्चातापी डाकू ने क्या किया, और वैसा ही कीजिए। देखिए उसने कैसे प्रार्थना की; देखिए उसने कैसे प्रभु यीशु मसीह को पुकारा; देखिए उसे शान्ति का कैसा उत्तर मिला। भाई या बहन, आप भी ऐसा ही क्यों न करें? आपका भी उद्धार क्यों न हो?

(2) यह लेख किसी घमण्डी और ढीठ संसारी मनुष्य के हाथ में पड़ सकता है। क्या आप वही मनुष्य हैं? तो चेतावनी लीजिए। देखिए अपश्चातापी डाकू जैसा जिया वैसा ही मरा, और सावधान रहिए कि कहीं आपका अन्त भी वैसा ही न हो। हे भटके हुए भाई या बहन, अत्यधिक निश्चिन्त न हो, ऐसा न हो कि तू अपने पापों में मर जाए! जब तक प्रभु मिल सकता है, तब तक उसकी खोज कर। लौट आ, लौट आ; तू क्यों मरे?

(3) यह लेख मसीह में विश्वास का अंगीकार करनेवाले किसी जन के हाथ में पड़ सकता है। क्या आप ऐसे ही जन हैं? तो पश्चातापी डाकू के धर्म को अपने धर्म को परखने की कसौटी बनाइए। देखिए कि आप सच्चे मन फिराव और उद्धार करनेवाले विश्वास, सच्ची दीनता और उत्कट प्रेम के विषय में कुछ जानते हैं या नहीं। भाई या बहन, मसीही जीवन के संसार के मापदण्ड से सन्तुष्ट न हो जाइए। पश्चातापी डाकू के समान मन रखिए, तो आप बुद्धिमान ठहरेंगे।

(4) यह लेख किसी ऐसे जन के हाथ में पड़ सकता है जो दिवंगत विश्वासियों के लिए शोक कर रहा है। क्या आप ऐसे ही जन हैं? तो इस पवित्रशास्त्र से शान्ति लीजिए। देखिए आपके प्रियजन सर्वोत्तम हाथों में हैं। उनकी दशा इससे अच्छी हो ही नहीं सकती। अपने जीवन में वे कभी इतने भले नहीं रहे जितने अब हैं। वे यीशु के साथ हैं, जिससे उनके प्राणों ने पृथ्वी पर प्रेम किया था। आह, अपना स्वार्थी विलाप छोड़ दीजिए! इसके बजाय आनन्द कीजिए कि वे क्लेश से छूट गए और विश्राम में प्रवेश कर चुके हैं।

(5) और यह लेख मसीह के किसी वृद्ध सेवक के हाथ में पड़ सकता है। क्या आप ऐसे ही जन हैं? तो इन पदों से देखिए कि आप घर के कितने निकट हैं। आपका उद्धार उस समय से अधिक निकट है जब आपने पहले-पहल विश्वास किया था। परिश्रम और शोक के कुछ दिन और, फिर राजाओं का राजा आपको बुला भेजेगा; और पल भर में आपका युद्ध समाप्त हो जाएगा, और सब कुछ शान्ति ही शान्ति होगी।

XII. लहरों का स्वामी

"तब बड़ी आँधी आई, और लहरें नाव पर यहाँ तक लगीं कि वह अब पानी से भरी जाती थी।"

"और वह आप पिछले भाग में तकिये पर सो रहा था; तब उन्होंने उसे जगाकर उससे कहा, हे गुरु, क्या तुझे चिन्ता नहीं कि हम नाश हुए जाते हैं?"

"तब उसने उठकर आँधी को डाँटा, और पानी से कहा, चुप रह, थम जा। और आँधी थम गई और बड़ा चैन हो गया।"

"और उसने उनसे कहा, तुम क्यों डरते हो? क्या तुम्हें अब तक विश्वास नहीं?"—मरकुस 4:37–40।

यदि आज के अंगीकार करनेवाले मसीही चारों सुसमाचारों का अध्ययन अपनी वर्तमान आदत से अधिक करते, तो अच्छा होता। निःसन्देह सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र लाभदायक है। बाइबल के एक भाग को दूसरे की हानि पर ऊँचा ठहराना बुद्धिमानी नहीं है। परन्तु मेरा विचार है कि जो लोग पत्रियों से बहुत परिचित हैं, उनके लिए यह भला होता कि वे मत्ती, मरकुस, लूका और यूहन्ना के विषय में भी कुछ और जानते।

अब मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? मैं यह इसलिए कहता हूँ कि मैं चाहता हूँ कि अंगीकार करनेवाले मसीही मसीह के विषय में अधिक जानें। मसीही धर्म के सब सिद्धान्तों और नियमों से परिचित होना अच्छा है। मसीह से स्वयं परिचित होना और भी अच्छा है। विश्वास, अनुग्रह, धर्मी ठहराया जाना और पवित्रीकरण से परिचित होना अच्छा है। ये सब "राजा से सम्बन्ध रखनेवाली" बातें हैं। परन्तु यीशु से स्वयं परिचित होना, राजा का मुख देखना और उसकी सुन्दरता निहारना कहीं अधिक उत्तम है। असाधारण पवित्रता का एक रहस्य यही है। जो मसीह के स्वरूप में ढलना और मसीह-समान मनुष्य बनना चाहता है, उसे निरन्तर स्वयं मसीह का अध्ययन करते रहना चाहिए।

अब सुसमाचार हमें मसीह से परिचित कराने के लिए लिखे गए थे। पवित्र आत्मा ने उसके जीवन और मृत्यु की, उसके वचनों और कामों की कथा हमें चार बार सुनाई है। चार भिन्न-भिन्न प्रेरित हाथों ने उद्धारकर्ता का चित्र खींचा है। उसकी चाल-चलन, उसका व्यवहार, उसकी भावनाएँ, उसकी बुद्धि, उसका अनुग्रह, उसका धैर्य, उसका प्रेम और उसकी सामर्थ्य चार भिन्न गवाहों के द्वारा अनुग्रह से हमारे सामने खोली गई हैं। क्या भेड़ों को चरवाहे से परिचित नहीं होना चाहिए? क्या रोगी को वैद्य से परिचित नहीं होना चाहिए? क्या दुल्हिन को दूल्हे से परिचित नहीं होना चाहिए? क्या पापी को उद्धारकर्ता से परिचित नहीं होना चाहिए? निःसन्देह ऐसा ही होना चाहिए। सुसमाचार इसलिए लिखे गए कि मनुष्य मसीह से परिचित हों, और इसलिए मैं चाहता हूँ कि मनुष्य सुसमाचारों का अध्ययन करें।

यदि हम परमेश्वर के यहाँ ग्रहण किए जाना चाहते हैं तो अपनी आत्माओं का निर्माण किस पर करें? हमें चट्टान, अर्थात् मसीह पर निर्माण करना चाहिए। फलवन्त होने के लिए जिस आत्मा के अनुग्रह की हमें प्रतिदिन आवश्यकता है, उसे हम किससे प्राप्त करें? हमें दाखलता, अर्थात् मसीह से प्राप्त करना चाहिए। जब पृथ्वी के मित्र हमारा साथ छोड़ दें या मर जाएँ, तब हम सहानुभूति के लिए किसकी ओर देखें? हमें अपने बड़े भाई, मसीह की ओर देखना चाहिए। यदि हमारी प्रार्थनाएँ ऊपर सुनी जानी हैं तो उन्हें कौन प्रस्तुत करे? उन्हें हमारे सहायक, मसीह को प्रस्तुत करना चाहिए। हम महिमा के हज़ार वर्ष और उसके बाद की अनन्तता किसके साथ बिताने की आशा रखते हैं? राजाओं के राजा, मसीह के साथ। निश्चय ही हम इस मसीह को आवश्यकता से अधिक नहीं जान सकते! निश्चय ही उसके जीवन के वृत्तान्त में न कोई वचन, न कोई कर्म, न कोई दिन, न कोई कदम, और न कोई विचार ऐसा है जो हमारे लिए अनमोल न हो। हमें यीशु के विषय में लिखी हुई एक-एक पंक्ति से परिचित होने का परिश्रम करना चाहिए।

आइए, अब हम अपने स्वामी के इतिहास का एक पृष्ठ पढ़ें। आइए, विचार करें कि इस लेख के आरम्भ में दिए गए पवित्रशास्त्र के पदों से हम क्या सीख सकते हैं। वहाँ आप यीशु को अपने चेलों के साथ नाव में गलील की झील पार करते हुए देखते हैं। आप देखते हैं कि जब वह सोया हुआ है, तब अचानक आँधी उठती है। लहरें नाव में आ-आकर उसे भर देती हैं। मृत्यु निकट दिखाई देती है। भयभीत चेले अपने स्वामी को जगाते हैं और सहायता के लिए पुकारते हैं। वह उठकर आँधी और लहरों को डाँटता है, और तुरन्त शान्ति हो जाती है। वह अपने साथियों के विश्वासहीन भय को कोमलता से झिड़कता है, और सब कुछ समाप्त हो जाता है। चित्र यही है। यह गहरी शिक्षा से भरा हुआ है। आइए, देखें कि हमें इससे क्या सीखना है।

I. सबसे पहले हम यह सीखें कि मसीह के पीछे चलना हमें पृथ्वी के दुःखों और संकटों से नहीं बचाता

यहाँ प्रभु यीशु के चुने हुए चेले बड़ी चिन्ता में हैं। वह छोटा विश्वासयोग्य झुण्ड, जिसने तब विश्वास किया जब याजक, शास्त्री और फरीसी सब अविश्वासी थे, चरवाहे के द्वारा बहुत व्याकुल होने दिया गया है। मृत्यु का भय सशस्त्र मनुष्य के समान उन पर टूट पड़ता है। गहरा जल उनकी आत्माओं पर चढ़ता दिखाई देता है। पतरस, याकूब और यूहन्ना, जो संसार में स्थापित होनेवाली कलीसिया के स्तम्भ थे, बहुत व्यथित हैं।

सम्भव है उन्होंने यह सब सोचा न हो। सम्भव है उन्होंने यह आशा की हो कि मसीह की सेवा उन्हें कम से कम पृथ्वी के कष्टों की पहुँच से ऊपर उठा देगी। सम्भव है उन्होंने सोचा हो कि जो मरे हुओं को जिला सकता है, रोगियों को चंगा कर सकता है, थोड़ी सी रोटियों से भीड़ को खिला सकता है और एक वचन से दुष्टात्माओं को निकाल सकता है, वह अपने सेवकों को पृथ्वी पर कभी दुःख उठाने न देगा। सम्भव है उन्होंने मान लिया हो कि वह उन्हें सदा सुगम यात्राएँ, अच्छा मौसम, सहज मार्ग, और चिन्ता तथा क्लेश से छुटकारा देता रहेगा।

यदि चेलों ने ऐसा सोचा तो वे बड़ी भूल में थे। प्रभु यीशु ने उन्हें सिखाया कि मनुष्य उसके चुने हुए सेवकों में से एक हो सकता है, फिर भी उसे अनेक चिन्ताओं में से होकर निकलना और अनेक पीड़ाएँ सहनी पड़ सकती हैं।

इसे स्पष्ट रीति से समझना अच्छा है। यह समझना अच्छा है कि मसीह की सेवा ने कभी मनुष्य को उन सब दुःखों से नहीं बचाया जो शरीर के भाग में आते हैं, और न कभी बचाएगी। यदि आप विश्वासी हैं, तो जब तक आप देह में हैं, आपको अपने भाग की बीमारी और पीड़ा, शोक और आँसू, हानि और क्रूस, मृत्यु और वियोग, बिछड़ना और अलग होना, कष्ट और निराशा की आशा रखनी चाहिए। मसीह ने कभी यह उत्तरदायित्व नहीं लिया कि आप इन सब के बिना स्वर्ग पहुँच जाएँगे। उसने यह उत्तरदायित्व लिया है कि जो उसके पास आएँ उन्हें जीवन और भक्ति से सम्बन्ध रखनेवाली सब वस्तुएँ मिलें; परन्तु उसने कभी यह उत्तरदायित्व नहीं लिया कि वह उन्हें समृद्ध, या धनी, या स्वस्थ बनाएगा, और मृत्यु तथा शोक उनके परिवार में कभी न आएँगे।

मुझे यह विशेषाधिकार प्राप्त है कि मैं मसीह के राजदूतों में से एक हूँ। उसके नाम से मैं किसी भी पुरुष, स्त्री या बालक को, जो उसे पाना चाहे, अनन्त जीवन दे सकता हूँ। उसके नाम से मैं इस लेख को पढ़नेवाले आदम के प्रत्येक पुत्र या पुत्री को क्षमा, शान्ति, अनुग्रह और महिमा प्रदान करता हूँ। परन्तु मैं उस व्यक्ति को सांसारिक समृद्धि को सुसमाचार का अंग बनाकर देने का साहस नहीं कर सकता। मैं उसे दीर्घायु, बढ़ती हुई आय और पीड़ा से मुक्ति देने का साहस नहीं कर सकता। जो मनुष्य क्रूस उठाकर मसीह के पीछे चलता है, उससे मैं यह प्रतिज्ञा करने का साहस नहीं कर सकता कि इस चलने में उसे कभी आँधी का सामना न करना पड़ेगा।

मैं भली-भाँति जानता हूँ कि बहुत से लोगों को ये शर्तें अच्छी नहीं लगतीं। वे मसीह और अच्छा स्वास्थ्य, मसीह और बहुत सा धन, मसीह और परिवार में कोई मृत्यु नहीं, मसीह और कोई थका देनेवाली चिन्ता नहीं, मसीह और बादलों से रहित सदा का प्रभात पाना अधिक पसन्द करेंगे। परन्तु उन्हें मसीह और क्रूस, मसीह और क्लेश, मसीह और संघर्ष, मसीह और गरजती हुई हवा, मसीह और आँधी अच्छे नहीं लगते।

क्या इस लेख को पढ़नेवाले किसी के मन में यही गुप्त विचार है? मेरा विश्वास कीजिए, यदि ऐसा है तो आप बहुत भूल में हैं। मेरी सुनिए, मैं आपको दिखाने का प्रयत्न करूँगा कि आपको अभी बहुत कुछ सीखना है।

यदि मसीह के पीछे चलना कष्ट से बचने का मार्ग होता, तो हम कैसे जानते कि सच्चे मसीही कौन हैं? यदि परीक्षा का फटकना न होता, तो हम गेहूँ को भूसे से कैसे पहचानते? यदि मसीह की सेवा स्वाभाविक रूप से स्वास्थ्य और धन ले आती, तो हम कैसे जानते कि मनुष्य मसीह की सेवा उसी के लिए करते हैं या स्वार्थ के कारण? जाड़े की हवाएँ शीघ्र ही दिखा देती हैं कि कौन से वृक्ष सदाबहार हैं और कौन से नहीं। क्लेश और चिन्ता की आँधियाँ भी इसी प्रकार उपयोगी हैं। वे प्रकट कर देती हैं कि किसका विश्वास सच्चा है, और किसका केवल दिखावा और रीति मात्र है।

यदि मनुष्य पर कोई परीक्षा न आए तो उसमें पवित्रीकरण का महान कार्य कैसे आगे बढ़ेगा? प्रायः क्लेश ही वह एकमात्र आग है जो हमारे हृदयों से चिपके हुए मैल को जला डालती है। क्लेश वह छाँटने की छुरी है जिसे महान किसान हमें भले कर्मों में फलवन्त बनाने के लिए काम में लाता है।

प्रभु के खेत की फसल कभी केवल धूप से नहीं पकती। उसे आँधी, वर्षा और तूफ़ान के दिनों में से होकर निकलना पड़ता है।

यदि आप मसीह की सेवा करना और उद्धार पाना चाहते हैं, तो मैं आपसे विनती करता हूँ कि प्रभु को उसकी अपनी शर्तों पर ग्रहण करें। अपने मन में ठान लें कि आपको अपने भाग के क्रूस और शोक मिलेंगे, तब आप चकित न होंगे। इसे न समझने के कारण बहुत से लोग कुछ समय तक भली-भाँति दौड़ते दिखाई देते हैं, फिर घृणा से पीछे हट जाते हैं और त्याग दिए जाते हैं।

यदि तू परमेश्वर की सन्तान होने का दावा करता है, तो प्रभु यीशु पर छोड़ दे कि वह तुझे अपने ही ढंग से पवित्र करे। इसी में सन्तुष्ट रह कि वह कभी कोई भूल नहीं करता। निश्चय जान कि वह सब कुछ भली रीति से करता है। तेरे चारों ओर आँधी गरज सकती है और जल उमड़ सकता है। परन्तु मत डर, "वह तुझे सीधे मार्ग से ले चला है कि तू बसे हुए नगर में पहुँचे।" (भजन संहिता 107:7।)

II. दूसरे, हम यह सीखें कि प्रभु यीशु मसीह सचमुच और यथार्थ में मनुष्य है

इस छोटे से वृत्तान्त में ऐसे शब्द प्रयुक्त हुए हैं जो सुसमाचारों के अन्य अनेक अंशों के समान इस सत्य को अत्यन्त प्रभावशाली रीति से प्रकट करते हैं। हमें बताया गया है कि जब लहरें नाव पर टकराने लगीं, तब यीशु पिछले भाग में "तकिये पर सो रहा था।" वह थका हुआ था; और मरकुस के चौथे अध्याय का वर्णन पढ़ने के बाद इस पर किसे आश्चर्य होगा? दिन भर आत्माओं के कल्याण के लिए परिश्रम करने के बाद, खुले में विशाल भीड़ को उपदेश देने के बाद, यीशु थक गया था। निश्चय ही यदि परिश्रमी मनुष्य की नींद मीठी होती है, तो हमारे धन्य प्रभु की नींद कितनी अधिक मीठी रही होगी!

आओ, हम इस महान सत्य को अपने मन में गहराई से बैठा लें कि यीशु मसीह वास्तव में और सचमुच मनुष्य था। वह सब बातों में पिता के तुल्य और अनादि परमेश्वर था। परन्तु वह मनुष्य भी था, और उसने मांस और लहू में भाग लिया, और पाप को छोड़ सब बातों में हमारे समान बनाया गया। उसकी देह हमारी देह के समान थी। हमारी तरह वह स्त्री से जन्मा। हमारी तरह वह बढ़ा और डील-डौल में बड़ा हुआ। हमारी तरह वह बहुधा भूखा और प्यासा, और मूर्च्छित और थका हुआ होता था। हमारी तरह उसने खाया और पीया, विश्राम किया और सोया। हमारी तरह उसने शोक किया, रोया, और अनुभव किया। यह सब अति आश्चर्यजनक है, परन्तु ऐसा ही है। जिसने आकाश बनाया, वह पृथ्वी पर एक दीन और थके-माँदे मनुष्य के रूप में इधर-उधर फिरा! जो स्वर्गीय स्थानों में प्रधानों और अधिकारियों पर प्रभुता करता था, उसने हमारी देह के समान दुर्बल देह धारण की। जो उस महिमा में सदा रह सकता था जो उसे पिता के साथ थी, और स्वर्गदूतों की सेनाओं की स्तुति के बीच रह सकता था, वह पृथ्वी पर उतर आया और पापी मनुष्यों के बीच एक मनुष्य होकर रहा। निश्चय ही यही एक तथ्य दीनता, अनुग्रह, तरस और प्रेम का एक अद्भुत चमत्कार है।

इस विचार में मुझे सांत्वना की गहरी खान मिलती है कि यीशु जितना सिद्ध परमेश्वर है उतना ही सिद्ध मनुष्य भी है। जिस पर भरोसा रखने को पवित्रशास्त्र मुझसे कहता है, वह केवल एक महान महायाजक ही नहीं, वरन् सहानुभूति रखनेवाला महायाजक है। वह केवल सामर्थी उद्धारकर्ता ही नहीं, वरन् सहानुभूति रखनेवाला उद्धारकर्ता है। वह केवल परमेश्वर का पुत्र ही नहीं जो उद्धार करने में सामर्थी है, वरन् मनुष्य का पुत्र भी है जो अनुभव करने में समर्थ है।

कौन नहीं जानता कि इस पापमय संसार में हमारे लिए जो वस्तुएँ बची हैं, उनमें सहानुभूति सबसे मधुर वस्तुओं में से एक है? यहाँ नीचे की हमारी अँधेरी यात्रा में यह एक उजला समय होता है, जब हमें कोई ऐसा व्यक्ति मिल जाता है जो हमारे क्लेशों में हमारे साथ सम्मिलित होता है और हमारी चिन्ताओं में हमारे साथ चलता है, जो हमारे रोने में रोता और हमारे आनन्द में आनन्द करता है।

सहानुभूति धन से कहीं उत्तम है, और कहीं अधिक दुर्लभ भी। हज़ारों ऐसे हैं जो दे सकते हैं पर नहीं जानते कि अनुभव करना क्या होता है। हमें खींचने और हमारे हृदय को खोलने की सबसे अधिक शक्ति सहानुभूति में होती है। उचित और सही सम्मति भी बोझिल हृदय पर प्रायः निष्फल और व्यर्थ पड़ती है। क्लेश के दिन दी गई रूखी सलाह प्रायः हमें बन्द कर देती है, हम सिकुड़ जाते हैं और अपने भीतर सिमट जाते हैं। परन्तु ऐसे दिन में सच्ची सहानुभूति हमारी सारी उत्तम भावनाओं को, यदि हममें कोई हैं, जगा देगी, और हम पर ऐसा प्रभाव डालेगी जो और कुछ नहीं डाल सकता। मुझे वह मित्र दो जो सोने-चाँदी में निर्धन होने पर भी सदा सहानुभूति से भरा हृदय तैयार रखता है।

हमारा परमेश्वर यह सब भली भाँति जानता है। वह मनुष्य के हृदय के गुप्त भेद तक जानता है। वह उन मार्गों को जानता है जिनसे उस हृदय तक सबसे सरलता से पहुँचा जा सकता है, और उन स्रोतों को जिनसे वह हृदय सबसे शीघ्र द्रवित होता है। उसने बुद्धिमानी से यह प्रबन्ध किया है कि सुसमाचार का उद्धारकर्ता सामर्थी होने के साथ अनुभव करनेवाला भी हो। उसने हमें ऐसा उद्धारकर्ता दिया है जिसके पास हमें जलती आग में से जलती लकड़ी के समान खींच निकालने के लिए सामर्थी हाथ ही नहीं, वरन् सहानुभूति से भरा ऐसा हृदय भी है जिस पर परिश्रमी और बोझ से दबे लोग विश्राम पा सकते हैं।

मसीह के व्यक्तित्व में दो स्वभावों के मेल में मुझे प्रेम और बुद्धि का अद्भुत प्रमाण दिखाई देता है। यह हमारे उद्धारकर्ता का अद्भुत प्रेम था कि उसने हम जैसे भक्तिहीन विद्रोहियों के लिए दुर्बलता और दीनता सहना स्वीकार किया। यह अद्भुत बुद्धि थी कि उसने अपने आप को इस प्रकार मित्रों का मित्र होने के योग्य बनाया, जो न केवल मनुष्य का उद्धार कर सके, वरन् उसे उसकी ही भूमि पर आकर मिल भी सके। मुझे ऐसा चाहिए जो मेरी आत्मा के छुटकारे के लिए आवश्यक सब कुछ करने में समर्थ हो। यह यीशु कर सकता है, क्योंकि वह परमेश्वर का अनादि पुत्र है। मुझे ऐसा चाहिए जो मेरी दुर्बलताओं और निर्बलताओं को समझ सके, और जब तक मैं मृत्यु की देह से बँधा हूँ, मेरी आत्मा के साथ कोमलता से व्यवहार करे। यह भी यीशु कर सकता है, क्योंकि वह मनुष्य का पुत्र था, और उसकी देह मांस और लहू की मेरी ही देह के समान थी। यदि मेरा उद्धारकर्ता केवल परमेश्वर होता, तो शायद मैं उस पर भरोसा कर लेता, पर बिना भय के उसके निकट कभी न आ सकता। यदि मेरा उद्धारकर्ता केवल मनुष्य होता, तो शायद मैं उससे प्रेम कर लेता, पर यह कभी निश्चित न कर पाता कि वह मेरे पाप हर ले जाने में समर्थ है। परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो, मेरा उद्धारकर्ता परमेश्वर भी है और मनुष्य भी, और मनुष्य भी है और परमेश्वर भी: परमेश्वर, इसलिए मुझे छुड़ाने में समर्थ; मनुष्य, इसलिए मेरे साथ अनुभव करने में समर्थ। सर्वशक्तिमान सामर्थ्य और गहरी से गहरी सहानुभूति एक ही महिमामय व्यक्ति, मेरे प्रभु यीशु मसीह में आ मिलती हैं। निश्चय ही मसीह में विश्वास करनेवाले के पास दृढ़ शान्ति है। वह भली रीति से भरोसा रख सकता है और डरने की उसे आवश्यकता नहीं।

यदि इस लेख का कोई पाठक जानता है कि दया और क्षमा के लिए अनुग्रह के सिंहासन के पास जाना क्या होता है, तो वह कभी न भूले कि जिस मध्यस्थ के द्वारा वह परमेश्वर के निकट आता है, वह मनुष्य मसीह यीशु है।

तेरी आत्मा का कार्य एक ऐसे महायाजक के हाथ में है जो तेरी निर्बलताओं में तेरे साथ दुःखी हो सकता है। तेरा सामना किसी ऐसे सत्ता से नहीं जो इतनी ऊँची और महिमामय हो कि तेरा मन उसे किसी रीति से समझ ही न सके। तेरा सामना यीशु से है, जिसकी देह तेरी देह के समान थी, और जो पृथ्वी पर तेरे ही समान मनुष्य था। वह उस संसार को भली भाँति जानता है जिससे होकर तू संघर्ष करता हुआ जा रहा है, क्योंकि वह तैंतीस वर्ष उसी के बीच रहा। वह "पापियों के विरोध" को भली भाँति जानता है, जो तुझे बार-बार निराश करता है, क्योंकि उसने स्वयं उसे सहा। (इब्रानियों 12:3।) वह तेरे आत्मिक शत्रु, शैतान, की चतुराई और छल को भली भाँति जानता है, क्योंकि वह जंगल में उससे जूझा था। निश्चय ही ऐसे सहायक के रहते तू निडर हो सकता है।

यदि आप जानते हैं कि पार्थिव क्लेशों में आत्मिक शान्ति के लिये प्रभु यीशु के पास जाना क्या होता है, तो आपको उसकी देह के दिन और उसका मानव स्वभाव भली-भाँति स्मरण रखना चाहिए।

आप ऐसे जन के पास जा रहे हैं जो अनुभव से आपकी भावनाओं को जानता है और जिसने कड़वा प्याला गहराई तक पिया है, क्योंकि वह "दुखी पुरुष था, रोग से परिचित था।" (यशायाह 53:3।) यीशु मनुष्य के मन को जानता है,—मनुष्य की शारीरिक पीड़ाओं को,—मनुष्य की कठिनाइयों को, क्योंकि वह स्वयं मनुष्य था, और पृथ्वी पर उसके पास मांस और लहू था। वह सूखार के कुएँ के पास थका हुआ बैठा। वह बैतनिय्याह में लाज़र की क़ब्र पर रोया। गतसमनी में उसका पसीना बड़ी-बड़ी बूँदों के रूप में लहू बनकर टपका। कलवरी पर वह पीड़ा से कराहा।

वह आपकी अनुभूतियों से अपरिचित नहीं है। मानव स्वभाव की हर बात से वह परिचित है, केवल पाप को छोड़कर।

(क) क्या आप दीन और अभावग्रस्त हैं? यीशु भी था। लोमड़ियों के भट और आकाश के पक्षियों के बसेरे होते हैं, परन्तु मनुष्य के पुत्र के पास सिर धरने की भी जगह नहीं थी। वह एक तुच्छ समझे जानेवाले नगर में रहा। लोग कहा करते थे, "क्या कोई अच्छी वस्तु नासरत से निकल सकती है?" (यूहन्ना 1:46।) वह बढ़ई का पुत्र समझा गया। उसने माँगी हुई नाव पर से उपदेश दिया, माँगे हुए गधे पर यरूशलेम में प्रवेश किया, और माँगी हुई क़ब्र में गाड़ा गया।

(ख) क्या आप संसार में अकेले हैं और उन लोगों से उपेक्षित, जिन्हें आपसे प्रेम करना चाहिए? यीशु भी था। वह अपने घर आया, और उसके अपनों ने उसे ग्रहण न किया। वह इस्राएल के घराने की खोई हुई भेड़ों के लिये मसीहा होकर आया, और उन्होंने उसे ठुकरा दिया। इस जगत के हाकिमों ने उसे न माना। जो थोड़े-से लोग उसके पीछे चले वे महसूल लेनेवाले और मछुए थे। और अन्त में इन्होंने भी उसे छोड़ दिया, और हर एक अपने-अपने स्थान को बिखर गया।

(ग) क्या लोग आपको ग़लत समझते हैं, आपके विषय में झूठ कहते हैं, आपकी निन्दा और आप पर अत्याचार करते हैं? यीशु के साथ भी यही हुआ। उसे पेटू और पियक्कड़, महसूल लेनेवालों का मित्र, सामरी, पागल और दुष्टात्मा से ग्रस्त कहा गया। उसके चरित्र पर झूठा दोष लगाया गया। उस पर झूठे अभियोग लगाए गए। उस पर अन्यायपूर्ण दण्डाज्ञा सुनाई गई, और निर्दोष होते हुए भी वह अपराधी ठहराया गया और अपराधी की भाँति क्रूस पर मरा।

(घ) क्या शैतान आपको परखता है और आपके मन में भयानक विचार डालता है? उसने यीशु को भी परखा। उसने उसे परमेश्वर की पितृतुल्य देखरेख पर अविश्वास करने को कहा: "इन पत्थरों से कह दे कि रोटियाँ बन जाएँ।" उसने उसे अनावश्यक संकट में पड़कर परमेश्वर की परीक्षा लेने का प्रस्ताव दिया: मन्दिर के कंगूरे पर से "अपने आप को नीचे गिरा दे।" उसने उसे सुझाया कि अपने सामने केवल एक छोटा-सा झुकने का काम करके संसार के राज्य अपने कर ले: "यदि तू गिरकर मुझे प्रणाम करे तो मैं यह सब कुछ तुझे दे दूँगा।" (मत्ती 4:1–10।)

(ङ) क्या आप कभी मन की गहरी वेदना और संघर्ष का अनुभव करते हैं? क्या आपको अन्धकार-सा लगता है, मानो परमेश्वर ने आपको छोड़ दिया हो? यीशु को भी ऐसा ही लगा। उसने बारी में जो मानसिक पीड़ाएँ सहीं, उनकी सीमा कौन बता सकता है? जब वह पुकारा, "हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?" (मत्ती 27:46) तब उसकी आत्मा की पीड़ा की गहराई कौन नाप सकता है?

मनुष्य के हृदय की आवश्यकताओं के लिये हमारे प्रभु यीशु मसीह से बढ़कर उपयुक्त उद्धारकर्ता की कल्पना करना असम्भव है,—न केवल अपनी सामर्थ्य के कारण, वरन् अपनी सहानुभूति के कारण भी उपयुक्त,—न केवल अपने ईश्वरत्व के कारण, वरन् अपने मनुष्यत्व के कारण भी। मैं आपसे विनती करता हूँ, यह बात अपने मन में दृढ़ता से बैठाने का प्रयत्न कीजिए कि मसीह, जो आत्माओं का शरणस्थान है, परमेश्वर के साथ-साथ मनुष्य भी है। उसे राजाओं का राजा और प्रभुओं का प्रभु जानकर उसका आदर कीजिए। परन्तु ऐसा करते हुए यह कभी न भूलिए कि उसकी एक देह थी और वह मनुष्य था। इस सत्य को थामे रहिए और कभी न छोड़िए। अभागा सोसीनियन भयंकर भूल करता है जब वह कहता है कि मसीह केवल मनुष्य था, परमेश्वर नहीं। परन्तु उस भ्रम की प्रतिक्रिया में आप यह न भूल जाएँ कि मसीह यद्यपि पूर्ण परमेश्वर था, तथापि वह पूर्ण मनुष्य भी था।

रोमन कैथोलिक की उस तुच्छ दलील पर क्षण भर भी कान न दीजिए जब वह कहता है कि कुँवारी मरियम और सन्त मसीह से अधिक सहानुभूति रखनेवाले हैं। उसे उत्तर दीजिए कि ऐसी दलील पवित्रशास्त्र और मसीह के सच्चे स्वरूप की अज्ञानता से उपजती है। उसे उत्तर दीजिए कि आपने मसीह को ऐसा नहीं सीखा कि उसे केवल कठोर न्यायी और भय के योग्य सत्ता समझें। उसे उत्तर दीजिए कि चारों सुसमाचारों ने आपको सिखाया है कि उसे मित्रों में सबसे प्रेमी और सहानुभूतिशील, और साथ ही उद्धारकर्ताओं में सबसे बलवन्त और सामर्थी मानें। उसे उत्तर दीजिए कि जब तक आप अपनी थकी हुई आत्मा को मनुष्य मसीह यीशु पर विश्राम दे सकते हैं, तब तक आपको सन्तों और स्वर्गदूतों से, कुँवारी मरियम या जिब्राईल से, कोई शान्ति नहीं चाहिए।

III. तीसरी बात हम यह सीखें कि सच्चे मसीही में भी बहुत दुर्बलता और निर्बलता हो सकती है

इसका स्पष्ट प्रमाण आपको यहाँ लिखे चेलों के आचरण में मिलता है, जब लहरें नाव पर टूट पड़ीं। उन्होंने हड़बड़ाकर यीशु को जगाया। उन्होंने भय और चिन्ता में उससे कहा, "हे गुरु, क्या तुझे चिन्ता नहीं कि हम नाश हुए जाते हैं?"

उनमें अधीरता थी। वे उतनी देर प्रतीक्षा कर सकते थे जब तक उनका प्रभु अपनी नींद से उठना उचित समझता।

उनमें अविश्वास था। वे भूल गए कि वे उसकी रक्षा में हैं जिसके हाथ में सारी सामर्थ्य है। "हम नाश हुए जाते हैं।"

उनमें अविश्वास का भाव था। वे ऐसे बोले मानो उन्हें अपने प्रभु की देखभाल और उनकी सुरक्षा व कुशल की चिन्ता पर सन्देह हो। "क्या तुझे चिन्ता नहीं कि हम नाश हुए जाते हैं?"

बेचारे अविश्वासी जन! उन्हें डरने का क्या अधिकार था? वे प्रमाण पर प्रमाण देख चुके थे कि जब तक दूल्हा उनके साथ है तब तक सब कुछ कुशल ही होगा। वे बार-बार उसके प्रेम और कृपा के उदाहरण देख चुके थे, जो उन्हें विश्वास दिलाने के लिये काफ़ी थे कि वह उन्हें कभी सचमुच हानि न पहुँचने देगा। परन्तु वर्तमान संकट में सब भुला दिया गया। तत्काल संकट का भान प्रायः मनुष्यों की स्मरणशक्ति को बिगाड़ देता है। भय प्रायः बीते अनुभव से तर्क नहीं कर पाता। उन्होंने आँधी की साँय-साँय सुनी। उन्होंने लहरें देखीं। उन्होंने ठंडे जल को अपने ऊपर थपेड़े मारते अनुभव किया। उन्होंने मान लिया कि मृत्यु निकट है। वे और अधिक अनिश्चय में प्रतीक्षा न कर सके। उन्होंने कहा, "क्या तुझे चिन्ता नहीं कि हम नाश हुए जाते हैं?"

परन्तु अन्ततः हम समझ लें कि यह उसी बात का चित्र मात्र है जो हर युग में विश्वासियों के बीच निरन्तर होती रहती है। मुझे आशंका है कि आज भी बहुत-से चेले ठीक वैसे ही हैं जैसे यहाँ वर्णित हैं।

परमेश्वर की सन्तानों में से बहुत-सी तब तक बहुत अच्छी चलती हैं जब तक उन पर कोई परीक्षा नहीं आती। अच्छे मौसम के दिनों में वे मसीह के पीछे बड़ी सहजता से चलती हैं। वे समझती हैं कि वे पूरी तरह उसी पर भरोसा रखती हैं। वे अपने आप को यह कहकर बहलाती हैं कि उन्होंने अपनी सारी चिन्ता उसी पर डाल दी है। उन्हें बहुत अच्छे मसीही होने की ख्याति मिल जाती है।

परन्तु अचानक कोई अनपेक्षित परीक्षा उन पर टूट पड़ती है। उनकी सम्पत्ति मानो पंख लगाकर उड़ जाती है। उनका अपना स्वास्थ्य बिगड़ जाता है। उनके घर में मृत्यु आ पहुँचती है। वचन के कारण क्लेश या सताव उठ खड़ा होता है। और तब उनका विश्वास कहाँ है? वह दृढ़ भरोसा कहाँ है जो वे समझती थीं कि उनके पास है? उनकी शान्ति, उनकी आशा, उनकी अधीनता कहाँ है? हाय, वे ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलतीं। वे तराजू में तौली जाती हैं और घटी में पाई जाती हैं। भय, सन्देह, व्याकुलता और चिन्ता बाढ़ की तरह उन पर टूट पड़ती हैं, और वे हक्की-बक्की रह जाती हैं। मैं जानता हूँ कि यह एक दुःखद वर्णन है। मैं तो इसे हर सच्चे मसीही के विवेक के सामने केवल यह पूछने के लिए रखता हूँ कि क्या यह सही और सच नहीं है?

सीधी सच्चाई यह है कि जब तक सच्चे मसीही देह में हैं, उनमें अक्षरशः और पूर्ण सिद्धता नहीं होती। परमेश्वर के सन्तों में जो सबसे अच्छा और सबसे उज्ज्वल है, वह भी एक दीन और मिश्रित प्राणी ही है। चाहे वह परिवर्तित, नया किया हुआ और पवित्र किया हुआ हो, फिर भी वह निर्बलता से घिरा हुआ है। पृथ्वी पर कोई ऐसा धर्मी मनुष्य नहीं जो भलाई ही करे और पाप न करे। हम सब बहुत बातों में चूक जाते हैं। मनुष्य में उद्धार देनेवाला सच्चा विश्वास हो सकता है, फिर भी वह सदा उसके हाथ में और काम में लाने को तैयार न हो। (सभोपदेशक 7:20; याकूब 3:2।)

अब्राहम विश्वासियों का पिता था। विश्वास ही से उसने अपना देश और अपने कुटुम्बियों को छोड़ा और परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार एक ऐसे देश को चला गया जिसे उसने कभी देखा न था। विश्वास ही से वह उस देश में परदेशी की नाईं रहने पर सन्तुष्ट रहा, यह मानते हुए कि परमेश्वर उसे वह देश मीरास में देगा। फिर भी यही अब्राहम अविश्वास से इतना हार गया कि मनुष्य के भय के कारण उसने सारा को अपनी पत्नी नहीं, वरन् अपनी बहन कहलवाने दिया। यह बड़ी निर्बलता थी। फिर भी अब्राहम से बड़े सन्त बहुत कम हुए हैं।

दाऊद परमेश्वर के मन के अनुसार मनुष्य था। जब वह केवल जवान ही था, तब भी उसमें इतना विश्वास था कि वह दैत्य गोलियत से लड़ने निकल पड़ा। उसने सब के सामने अपना यह विश्वास प्रकट किया कि जिस यहोवा ने उसे सिंह और भालू के पंजे से बचाया, वही उसे इस पलिश्ती से भी बचाएगा। उसमें परमेश्वर की इस प्रतिज्ञा पर विश्वास करने की सामर्थ्य थी कि वह एक दिन इस्राएल का राजा होगा, यद्यपि उसके थोड़े ही संगी थे, शाऊल उसका पहाड़ों पर तीतर की नाईं पीछा करता था, और उसके तथा मृत्यु के बीच अक्सर केवल एक ही डग का अन्तर जान पड़ता था। फिर भी यही दाऊद एक समय भय और अविश्वास से इतना घिर गया कि उसने कहा, “मैं किसी न किसी दिन शाऊल के हाथ से नष्ट हो जाऊँगा।” (1 शमूएल 27:1।) वह परमेश्वर के हाथ से पाए हुए अपने अनेक अद्भुत छुटकारों को भूल गया। उसने केवल अपने सामने के संकट का विचार किया और अधर्मी पलिश्तियों के बीच शरण ली। निश्चय ही यह बड़ी निर्बलता थी। फिर भी दाऊद से अधिक दृढ़ विश्वासी बहुत कम हुए हैं।

मैं जानता हूँ कि किसी मनुष्य के लिए यह उत्तर देना सहज है, “यह सब बहुत सच है, परन्तु इससे चेलों के भय का कोई बहाना नहीं बनता। यीशु तो सचमुच उनके साथ था। उन्हें डरना नहीं चाहिए था। मैं तो कभी उनके समान ऐसा कायर और अविश्वासी न होता!” जो मनुष्य इस प्रकार तर्क करता है, उससे मैं कहता हूँ कि वह अपने मन को बहुत कम जानता है। मैं उससे कहता हूँ कि जिसकी परीक्षा नहीं हुई, वह अपनी निर्बलताओं की लम्बाई-चौड़ाई को नहीं जानता। यदि कोई मनुष्य ऐसी परिस्थितियों में रखा जाए जो उसकी निर्बलता को प्रकट करें, तो कोई नहीं कह सकता कि उसमें कितनी निर्बलता दिखाई देगी।

क्या इस लेख का कोई पाठक सोचता है कि वह मसीह पर विश्वास करता है? क्या तुम उसके प्रति ऐसा प्रेम और भरोसा अनुभव करते हो कि यह समझ ही नहीं सकते कि कोई भी घटना तुम्हें बहुत विचलित कर सकती है? यह सब अच्छा है। यह सुनकर मुझे आनन्द होता है। परन्तु क्या इस विश्वास की परीक्षा हुई है? क्या इस भरोसे को कसौटी पर कसा गया है? यदि नहीं, तो इन चेलों को जल्दबाजी में दोषी ठहराने से सावधान रहो। अभिमानी न बनो, पर डरते रहो। यह न सोचो कि तुम्हारा हृदय अभी जैसी जीवित दशा में है, वैसी दशा सदा बनी रहेगी। इसलिए कि आज तुम्हारी भावनाएँ उष्ण और उत्साहपूर्ण हैं, यह न कहो कि “कल का दिन भी आज के समान, वरन् इससे भी बढ़कर होगा।” इसलिए कि अभी तुम्हारा हृदय मसीह की दया के प्रबल बोध से उठा हुआ है, यह न कहो कि “मैं जीवन भर उसे कभी न भूलूँगा।” ओह, अपने विषय में इस चापलूसी भरे अनुमान को कुछ घटाना सीखो। तुम अपने आप को भली भाँति नहीं जानते। तुम्हारे भीतरी मनुष्यत्व में अनेक बातें हैं जिनके विषय में तुम अभी नहीं जानते। प्रभु तुम्हें भी हिजकिय्याह के समान छोड़ सकता है, ताकि तुम्हारे हृदय में जो कुछ है वह सब तुम्हें दिखा दे। (2 इतिहास 32:31।) धन्य है वह जो “दीनता का वस्त्र पहने हुए” है।—“क्या ही धन्य है वह जो निरन्तर डरता रहता है।” “जो समझता है, ‘मैं स्थिर हूँ,’ वह चौकस रहे कि कहीं गिर न पड़े।” (1 पतरस 5:5; नीतिवचन 28:14; 1 कुरिन्थियों 10:12।)

मैं इस बात पर क्यों इतना ठहरता हूँ? क्या मैं मसीही कहलानेवालों की बिगड़ी हुई दशा के लिए क्षमा माँगना और उनके पापों का बहाना बनाना चाहता हूँ? परमेश्वर न करे!—क्या मैं पवित्रीकरण के स्तर को घटाना और किसी को मसीह का आलसी, निकम्मा सिपाही बनने में प्रोत्साहन देना चाहता हूँ? परमेश्वर न करे!—क्या मैं परिवर्तित और अपरिवर्तित लोगों के बीच की मोटी भेद-रेखा को मिटाना और असंगतियों की ओर से आँख मूँद लेना चाहता हूँ? मैं फिर कहता हूँ, परमेश्वर न करे!—मैं दृढ़ता से मानता हूँ कि सच्चे और झूठे मसीही में, विश्वासी और अविश्वासी में, परमेश्वर की सन्तानों और संसार की सन्तानों में बहुत बड़ा अन्तर है। मैं दृढ़ता से मानता हूँ कि यह अन्तर केवल विश्वास का नहीं, वरन् जीवन का है—केवल अंगीकार का नहीं, वरन् आचरण का है। मैं दृढ़ता से मानता हूँ कि विश्वासी का चालचलन अविश्वासी के चालचलन से ऐसा भिन्न होना चाहिए जैसे कड़वा मीठे से, उजियाला अन्धकार से, और गर्मी ठण्ड से भिन्न होती है।

परन्तु मैं चाहता हूँ कि नए मसीही यह समझें कि उन्हें अपने भीतर क्या-क्या पाने की अपेक्षा रखनी चाहिए। मैं चाहता हूँ कि अपनी दुर्बलता और निर्बलता को देखकर वे ठोकर न खाएँ और न उलझन में पड़ें। मैं चाहता हूँ कि वे देखें कि शैतान की सारी कानाफूसियों के विपरीत भी उनमें सच्चा विश्वास और अनुग्रह हो सकता है, चाहे भीतर बहुत सन्देह और भय का अनुभव हो। मैं चाहता हूँ कि वे ध्यान दें कि पतरस, याकूब, यूहन्ना और उनके साथी सच्चे चेले थे, फिर भी इतने आत्मिक न थे कि डर न सकें। मैं उनसे यह नहीं कहता कि चेलों के अविश्वास को अपने लिए बहाना बना लें। परन्तु मैं यह अवश्य कहता हूँ कि यह साफ़ दिखाता है कि जब तक वे देह में हैं, तब तक वे यह आशा न रखें कि विश्वास भय की पहुँच से परे होगा।

सबसे बढ़कर मैं चाहता हूँ कि सब मसीही यह समझें कि दूसरे विश्वासियों से उन्हें क्या अपेक्षा रखनी चाहिए। किसी मनुष्य में कुछ भ्रष्टता देखकर तुम उतावली में यह निष्कर्ष न निकालो कि उसमें अनुग्रह है ही नहीं। सूर्य के मुख पर भी धब्बे हैं; फिर भी सूर्य तेज चमकता है और सारे संसार को प्रकाशित करता है। ऑस्ट्रेलिया से आनेवाले सोने के बहुत-से डले में स्फटिक और मैल मिला रहता है; फिर भी क्या कोई इस कारण उस सोने को बिलकुल व्यर्थ समझता है? संसार के सबसे उत्तम हीरों में भी दोष होते हैं; फिर भी इस कारण उनका अनमोल मूल्य कम नहीं होता। ऐसी रोगी नाज़ुकमिज़ाजी दूर हो, जो किसी मनुष्य में दो-चार दोष देखते ही उसे बहिष्कृत करने को तैयार कर देती है! हम अनुग्रह को देखने में शीघ्र और अपूर्णताओं को देखने में धीमे हों! हम जान लें कि यदि हम भ्रष्टता के रहते अनुग्रह का होना स्वीकार नहीं कर सकते, तो हमें संसार में कहीं अनुग्रह न मिलेगा। हम अभी देह में हैं। शैतान मरा नहीं है। हम अभी स्वर्गदूतों के समान नहीं हैं। स्वर्ग अभी आरम्भ नहीं हुआ। घर की दीवारों से कोढ़ चाहे कितना ही खुरचा जाए, वह तब तक नहीं जाता जब तक घर ही गिरा न दिया जाए। हमारी देह निश्चय ही पवित्र आत्मा का मन्दिर है, परन्तु जब तक वह जिलाई या बदली न जाए, सिद्ध मन्दिर नहीं है। अनुग्रह निश्चय ही एक धन है, परन्तु मिट्टी के बर्तनों में रखा हुआ धन। यह सम्भव है कि कोई मनुष्य मसीह के लिए सब कुछ त्याग दे, और फिर भी कभी-कभी सन्देह और भय उसे आ घेरें।

मैं इस लेख के हर पाठक से विनती करता हूँ कि इसे स्मरण रखे। यह पाठ ध्यान देने योग्य है। प्रेरितों ने मसीह पर विश्वास किया, मसीह से प्रेम किया और उसके पीछे चलने के लिए सब कुछ छोड़ दिया। फिर भी इस आँधी में तुम देखते हो कि प्रेरित डर गए। उनके विषय में अपने न्याय में उदार होना सीखो। अपने मन से अपनी अपेक्षाओं में संयमी होना सीखो। इस सत्य के लिए मरते दम तक लड़ो कि जो मनुष्य मन फिराया हुआ और पवित्र नहीं है, वह सच्चा मसीही नहीं है। परन्तु यह भी मानो कि कोई मनुष्य मन फिराया हुआ, नया हृदय पाया हुआ और पवित्र जन हो सकता है, और फिर भी निर्बलता, सन्देह और भय के वश में आ सकता है।

4. चौथी बात, आओ हम प्रभु यीशु मसीह की सामर्थ्य को सीखें

जिस वृत्तान्त पर मैं अब विचार कर रहा हूँ, उसमें उसकी सामर्थ्य का एक सुस्पष्ट उदाहरण तुम्हारे सामने है। लहरें उस नाव में टूट-टूटकर आ रही थीं जिसमें यीशु था। भयभीत चेलों ने उसे जगाया और सहायता के लिए पुकारा। "तब उसने उठकर आँधी को डाँटा, और पानी से कहा, चुप रह, थम जा। और आँधी थम गई और बड़ा चैन हो गया।" यह एक अद्भुत चमत्कार था। यह सर्वशक्तिमान के सिवा और कोई नहीं कर सकता था।

एक वचन से आँधी को थमा देना! कौन नहीं जानता कि किसी असम्भव बात को बताने के लिए यह कहावत आम है, "तुम हवा से बात करने जैसा काम कर रहे हो!" फिर भी यीशु हवा को डाँटता है और वह तुरन्त थम जाती है। यह सामर्थ्य थी।

एक आवाज़ से लहरों को शान्त कर देना! इतिहास का कौन-सा पाठक नहीं जानता कि इंग्लैंड के एक पराक्रमी राजा ने तट पर चढ़ते ज्वार को रोकने का प्रयत्न किया और व्यर्थ रहा? फिर भी यहाँ एक है जो तूफ़ान में उफनती लहरों से कहता है, "चुप रह, थम जा," और तुरन्त बड़ा चैन हो जाता है। यह सामर्थ्य थी।

सब मनुष्यों के लिए भला है कि प्रभु यीशु मसीह की सामर्थ्य के विषय में उनके विचार स्पष्ट हों। पापी जान ले कि वह दयालु उद्धारकर्ता, जिसकी ओर भागने का उसे आग्रह किया जाता है और जिस पर भरोसा रखने का उसे निमन्त्रण दिया जाता है, सर्वशक्तिमान से कम नहीं है, और सब प्राणियों पर उसे अधिकार है कि अनन्त जीवन दे। (प्रकाशितवाक्य 1:8; यूहन्ना 17:2।) चिन्तित खोजी समझ ले कि यदि वह केवल यीशु पर साहस करके भरोसा रखे और क्रूस उठा ले, तो वह उस पर भरोसा रखता है जिसे स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिकार दिया गया है। (मत्ती 28:18।) विश्वासी जंगल की यात्रा में स्मरण रखे कि उसका मध्यस्थ, और सहायक, और वैद्य, और चरवाहा, और छुड़ानेवाला प्रभुओं का प्रभु और राजाओं का राजा है, और उसके द्वारा सब कुछ हो सकता है। (प्रकाशितवाक्य 17:14; फिलिप्पियों 4:13।) सब इस विषय का अध्ययन करें, क्योंकि यह अध्ययन के योग्य है।

(क) इसका अध्ययन उसकी सृष्टि की रचनाओं में करो। "सब कुछ उसी के द्वारा उत्पन्न हुआ और जो कुछ उत्पन्न हुआ है उसमें से कोई भी वस्तु उसके बिना उत्पन्न न हुई।" (यूहन्ना 1:3।) आकाश और उसके निवासियों की सारी महिमामय सेना, पृथ्वी और जो कुछ उसमें है, समुद्र और जो कुछ उसमें है, ऊपर के सूर्य से लेकर नीचे के छोटे-से-छोटे कीड़े तक सारी सृष्टि मसीह की रचना थी। उसने कहा और वे अस्तित्व में आ गए। उसने आज्ञा दी और वे होने लगे। वही यीशु, जो बैतलहम में एक दीन स्त्री से जन्मा और नासरत में एक बढ़ई के घर में रहा, सब वस्तुओं का रचयिता था। क्या यह सामर्थ्य नहीं थी?

(ख) इसका अध्ययन उसके विधान के कामों में और संसार में सब वस्तुओं के व्यवस्थित बने रहने में करो। "उसी में सब वस्तुएँ स्थिर रहती हैं।" (कुलुस्सियों 1:17।) सूर्य, चन्द्रमा और तारे एक सिद्ध व्यवस्था में घूमते हैं। वसन्त, ग्रीष्म, शरद और शीत ऋतुएँ एक के बाद एक नियमित क्रम से आती हैं। वे आज के दिन तक बनी हैं और नहीं चूकतीं; यह उसकी आज्ञा के अनुसार है जो गलगता पर मरा। (भजन संहिता 119:91।) इस संसार के राज्य उठते और बढ़ते हैं, फिर घटते और मिट जाते हैं। पृथ्वी के शासक योजनाएँ और युक्तियाँ बनाते हैं, व्यवस्थाएँ रचते और बदलते हैं, युद्ध करते हैं, एक को गिराते और दूसरे को उठाते हैं। परन्तु वे यह बहुत कम सोचते हैं कि वे केवल यीशु की इच्छा से राज करते हैं और परमेश्वर के मेम्ने की अनुमति के बिना कुछ नहीं होता। वे नहीं जानते कि वे और उनकी प्रजा सब उस क्रूस पर चढ़ाए गए की हथेली में जल की एक बूँद के समान हैं, और वह अपनी इच्छा के अनुसार जातियों को बढ़ाता और घटाता है। क्या यह सामर्थ्य नहीं है?

(ग) इस विषय का अध्ययन विशेष रूप से उन आश्चर्यकर्मों में भी कीजिए जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने पृथ्वी पर अपनी सेवकाई के तीन वर्षों में किए। उन सामर्थ्य के कार्यों से सीखिए कि जो बातें मनुष्य से असम्भव हैं वे मसीह से सम्भव हैं। उसके हर आश्चर्यकर्म को आत्मिक बातों का प्रतीक और चित्र मानिए। उसमें इस बात की एक मनोहर तस्वीर देखिए कि वह आपकी आत्मा के लिए क्या कर सकता है। जो एक वचन से मरे हुओं को जिला सकता था, वह मनुष्य को पाप की मृत्यु से भी उतनी ही सहजता से जिला सकता है। जो अन्धों को आँखें, बहरों को सुनने की शक्ति और गूँगों को बोलने की शक्ति दे सकता था, वह पापियों को भी परमेश्वर का राज्य देखने, सुसमाचार की आनन्दमय ध्वनि सुनने और छुड़ानेवाले प्रेम का गुणगान करने के योग्य बना सकता है। जो एक स्पर्श से कोढ़ चंगा कर सकता था, वह हृदय का हर रोग भी चंगा कर सकता है। जो दुष्टात्माओं को निकाल सकता था, वह हर उलझानेवाले पाप को अपने अनुग्रह के आगे झुकने की आज्ञा दे सकता है। आह, मसीह के आश्चर्यकर्मों को इसी दृष्टि से पढ़ना आरम्भ कीजिए! आप चाहे अपने को कितना ही दुष्ट, बुरा और भ्रष्ट अनुभव करें, इस विचार से ढाढ़स बाँधिए कि आप मसीह की चंगा करने की सामर्थ्य से बाहर नहीं हैं। स्मरण रखिए कि मसीह में केवल दया की भरपूरी ही नहीं, सामर्थ्य की भरपूरी भी है।

(घ) इस विषय का अध्ययन विशेष रूप से उस रूप में कीजिए जैसा वह आज आपके सामने रखा गया है। मुझे निश्चय है कि आपका हृदय कभी-कभी आँधी में लहरों के समान इधर-उधर उछाला गया है। आपने उसे उस अशान्त समुद्र के जल के समान व्याकुल पाया है जो चैन नहीं ले पाता। आज आकर सुनिए कि एक ऐसा है जो आपको विश्राम दे सकता है। यीशु आपके हृदय से, उसका रोग जो भी हो, कह सकता है, "शान्त रह, थम जा!"

क्या हुआ यदि आपका विवेक असंख्य अपराधों की स्मृति से कोड़े खा रहा है, और प्रलोभन के हर झोंके से फटा जा रहा है? क्या हुआ यदि बीते दिनों के भयानक दुराचार की याद आपके लिए दुखदायी और बोझ असह्य है? क्या हुआ यदि आपका हृदय बुराई से भरा लगता है, और पाप किसी दास की नाईं आपको जहाँ चाहे खींचे लिए जाता है? क्या हुआ यदि शैतान विजेता की नाईं आपकी आत्मा पर चढ़ा घूमता है, और कहता है कि उससे लड़ना व्यर्थ है, आपके लिए कोई आशा नहीं? मैं आपसे कहता हूँ कि एक ऐसा है जो आपको भी क्षमा और शान्ति दे सकता है। मेरा प्रभु और स्वामी यीशु मसीह शैतान के उत्पात को डाँट सकता है, आपकी आत्मा की पीड़ा को भी शान्त कर सकता है, और आपसे भी कह सकता है, "शान्त रह, थम जा!" वह दोष का वह बादल बिखेर सकता है जो अब आपको दबाए हुए है। वह निराशा को जाने की आज्ञा दे सकता है। वह भय को दूर भगा सकता है। वह दासत्व की आत्मा को हटाकर आपको लेपालकपन की आत्मा से भर सकता है। शैतान आपकी आत्मा को हथियारबन्द बलवन्त मनुष्य की नाईं पकड़े रहे, परन्तु यीशु उससे बलवन्त है, और जब वह आज्ञा देता है तब बन्दियों को छूटना ही पड़ता है। आह, यदि कोई व्याकुल पाठक भीतर की शान्ति चाहता है, तो आज ही यीशु मसीह के पास जाए, और सब कुछ अच्छा हो जाएगा!

पर यदि आपका हृदय परमेश्वर के सामने ठीक है, फिर भी आप सांसारिक क्लेश के बोझ से दबे हुए हैं तो? यदि निर्धनता का भय आपको इधर-उधर उछाल रहा है और आपको डुबो देता प्रतीत होता है तो? यदि शरीर की पीड़ा दिन-प्रतिदिन आपको व्याकुल किए दे रही है तो? यदि आप अचानक सक्रिय सेवा से हटा दिए गए हैं, और दुर्बलता के कारण चुपचाप बैठे रहने और कुछ न कर पाने को विवश हैं तो? यदि मृत्यु आपके घर में आ गई है, और आपकी राहेल, या यूसुफ, या बिन्यामीन को ले गई है, और आपको अकेला छोड़ गई है, शोक से भूमि पर कुचला हुआ तो? यदि यह सब हो चुका है तो? तब भी मसीह में शान्ति है। वह घायल हृदयों से शान्ति की बात उतनी ही सहजता से कह सकता है जितनी सहजता से वह व्याकुल समुद्र को शान्त करता है। वह विद्रोही इच्छाओं को उतने ही सामर्थ्य से डाँट सकता है जितने सामर्थ्य से उमड़ती हवाओं को। वह शोक की आँधियों को उतने ही निश्चय से थमा सकता है और उत्तेजित मनोवेगों को उतने ही निश्चय से चुप करा सकता है जितने निश्चय से उसने गलील की आँधी को रोका। वह सबसे भारी चिन्ता से भी कह सकता है, "शान्त रह, थम जा!" चिन्ता और क्लेश की बाढ़ें प्रबल हो सकती हैं, परन्तु यीशु जल-प्रलय के ऊपर विराजमान है, और समुद्र की लहरों से अधिक शक्तिशाली है। (भजन संहिता 93:4।) क्लेश की हवाएँ आपके चारों ओर भयंकर रूप से गरज सकती हैं, परन्तु यीशु उन्हें अपने हाथ में थामे रखता है, और जब चाहे उन्हें रोक सकता है। आह, यदि इस लेख का कोई पाठक टूटे मन का, चिन्ताओं से घिसा हुआ और शोकित है, तो वह यीशु मसीह के पास जाए और उसे पुकारे, और वह नया बल पाएगा। वह कहता है, "हे सब परिश्रम करनेवालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।" (मत्ती 11:28।)

मैं उन सब को, जो अपने को मसीही कहते हैं, आमन्त्रित करता हूँ कि वे मसीह की सामर्थ्य के विषय में ऊँचे विचार रखें। चाहें तो और किसी भी बात पर सन्देह कीजिए, परन्तु मसीह की सामर्थ्य पर कभी सन्देह न कीजिए। आप भीतर ही भीतर पाप से प्रेम तो नहीं रखते, यह सन्देहजनक हो सकता है। आप गुप्त रूप से संसार से चिपके तो नहीं हैं, यह सन्देहजनक हो सकता है। आपके स्वभाव का अहंकार इस विचार के विरुद्ध तो नहीं उठता कि आप एक दीन पापी की नाईं अनुग्रह से उद्धार पाएँ, यह सन्देहजनक हो सकता है। परन्तु एक बात सन्देह की नहीं है, और वह यह कि मसीह "पूरी रीति से उद्धार करने में समर्थ है," और यदि आप उसे अवसर दें तो वह आपका उद्धार करेगा। (इब्रानियों 7:25।)

5. अन्त में आइए सीखें कि प्रभु यीशु दुर्बल विश्वासियों के साथ कितनी कोमलता और धैर्य से व्यवहार करता है

यह सत्य उन शब्दों में प्रकट होता है जो उसने अपने चेलों से कहे, जब हवा थम गई और बड़ा चैन हो गया। वह उन्हें कड़ी डाँट दे सकता था। वह उन्हें वे सब बड़े काम स्मरण करा सकता था जो उसने उनके लिए किए थे, और उनकी कायरता और अविश्वास के लिए उन्हें झिड़क सकता था, परन्तु प्रभु के शब्दों में क्रोध का लेश भी नहीं है। वह केवल दो प्रश्न पूछता है: "तुम क्यों डरते हो? तुम में विश्वास क्यों नहीं है?"

पृथ्वी पर अपने चेलों के प्रति हमारे प्रभु के सारे आचरण पर ध्यान से विचार करना उचित है। उससे उस करुणा और सहनशीलता पर सुन्दर प्रकाश पड़ता है जो उसमें है। निश्चय ही किसी गुरु के शिष्य अपना पाठ सीखने में उतने मन्द न रहे होंगे जितने यीशु के प्रेरित थे। और निश्चय ही किसी शिष्य को इतना धैर्यवान और सहनशील शिक्षक न मिला होगा जितना प्रेरितों को मसीह में मिला। सुसमाचारों में बिखरे हुए इस विषय के सारे प्रमाण एकत्र कीजिए, और मेरी बात की सत्यता देखिए।

हमारे प्रभु की सेवकाई के किसी भी समय में ऐसा नहीं लगा कि चेले उसके जगत में आने के उद्देश्य को पूरी रीति से समझ सके हों। दीनता, प्रायश्चित, क्रूस की मृत्यु—ये बातें उनके लिए छिपी हुई थीं। उनके स्वामी ने अपने ऊपर आनेवाली बातों के विषय में जो सबसे स्पष्ट शब्द और साफ चेतावनियाँ दीं, उनका भी उनके मनों पर कोई प्रभाव पड़ता नहीं दिखाई दिया। वे समझे नहीं। वे जान न सके। यह बात उनकी आँखों से छिपी रही। एक बार तो पतरस ने प्रभु को दुःख उठाने से रोकने का भी प्रयत्न किया। उसने कहा, "हे प्रभु, परमेश्वर न करे; तुझ पर ऐसा कभी न होगा।" (मत्ती 16:22; लूका 18:34; 9:45।)

अकसर तुम उनके मन और व्यवहार में ऐसी बातें देखोगे जो किसी रीति से सराहने योग्य नहीं हैं। एक दिन हमें बताया गया है कि उन्होंने आपस में विवाद किया कि हम में बड़ा कौन है। (मरकुस 9:34।) एक और दिन उन्होंने उसके आश्चर्यकर्मों पर ध्यान न दिया, और उनके मन कठोर हो गए। (मरकुस 6:52।) एक बार उनमें से दो ने एक गाँव पर आकाश से आग बरसाना चाहा, क्योंकि उसने उन्हें ग्रहण नहीं किया। (लूका 9:54।) गतसमनी के बाग में उनमें से जो तीन सबसे अच्छे थे, वे जागने और प्रार्थना करने के बजाय सो गए। उसके पकड़वाए जाने की घड़ी में सब उसे छोड़कर भाग गए, और सबसे बुरी बात यह कि बारहों में सबसे आगे बढ़नेवाले पतरस ने अपने स्वामी का तीन बार शपथ खाकर इनकार किया।

पुनरुत्थान के बाद भी तुम देखते हो कि वही अविश्वास और मन की कठोरता उनसे चिपकी रही; यद्यपि उन्होंने अपने प्रभु को अपनी आँखों से देखा और अपने हाथों से छुआ, तब भी कुछ ने सन्देह किया। वे विश्वास में कितने निर्बल थे! "जो कुछ भविष्यद्वक्ताओं ने कहा है, उन सब पर विश्वास करने" में उनके मन कितने धीमे थे! (लूका 24:25।) हमारे प्रभु के वचनों, कामों, जीवन और मृत्यु का अर्थ समझने में वे कितने पिछड़े हुए थे!

परन्तु इन चेलों के प्रति प्रभु के व्यवहार में, उसकी सारी सेवकाई भर, तुम क्या देखते हो? तुम केवल अटल करुणा, दया, कृपा, कोमलता, धीरज, सहनशीलता और प्रेम ही देखते हो।

वह उनकी मूर्खता के कारण उन्हें त्याग नहीं देता। वह उनके अविश्वास के कारण उन्हें ठुकराता नहीं। वह उनकी कायरता के कारण उन्हें सदा के लिए अलग नहीं कर देता। वह उन्हें उतना ही सिखाता है जितना वे सह सकते हैं। वह उन्हें एक-एक कदम करके आगे ले चलता है, जैसे धाय किसी शिशु को तब चलाती है जब वह पहले-पहल चलना आरम्भ करता है। मरे हुओं में से जी उठते ही वह उन्हें कोमल सन्देश भेजता है। उसने स्त्रियों से कहा, "जाओ, मेरे भाइयों से कहो कि गलील को चले जाएँ, वहाँ वे मुझे देखेंगे।" (मत्ती 28:10।) वह उन्हें एक बार फिर अपने चारों ओर इकट्ठा करता है। वह पतरस को उसके स्थान पर बहाल करता है, और उसे आज्ञा देता है कि "मेरी भेड़ों को चरा।" (यूहन्ना 21:17।) वह अन्तिम रूप से स्वर्ग पर उठाए जाने से पहले चालीस दिन तक उनके साथ रहने की कृपा करता है। वह उन्हें अपने दूत बनाकर भेजता है कि वे जाकर अन्यजातियों में सुसमाचार का प्रचार करें। बिदा होते समय वह उन्हें आशीष देता है, और इस अनुग्रह भरी प्रतिज्ञा से उन्हें ढाढ़स बँधाता है, "देखो, मैं जगत के अन्त तक सदा तुम्हारे संग हूँ।" (मत्ती 28:20।) सचमुच यह ऐसा प्रेम था जो ज्ञान से परे है। यह मनुष्य का तरीका नहीं है।

सारा संसार जान ले कि प्रभु मसीह अत्यन्त करुणामय और कोमल दया से भरा है। वह कुचले हुए सरकण्डे को न तोड़ेगा, और धुआँ देती हुई बत्ती को न बुझाएगा। जैसे पिता अपने बालकों पर तरस खाता है, वैसे ही वह अपने भय माननेवालों पर तरस खाता है। जैसे माता अपने पुत्र को शान्ति देती है, वैसे ही वह अपने लोगों को शान्ति देगा। (याकूब 5:11; मत्ती 12:20; भजन संहिता 103:13; यशायाह 66:13।) वह अपने झुण्ड के मेम्नों की भी चिन्ता करता है और बूढ़ी भेड़ों की भी। वह अपने बाड़े के रोगी और दुर्बल जनों की भी चिन्ता करता है और बलवानों की भी। लिखा है कि वह उन्हें अपनी गोद में उठा लेगा, परन्तु उनमें से एक को भी खोने न देगा। (यशायाह 40:11।) वह अपनी देह के सबसे छोटे अंग की भी चिन्ता करता है और सबसे बड़े की भी। वह अपने परिवार के नन्हे बच्चों की भी चिन्ता करता है और बड़े हुए पुरुषों की भी। वह अपनी बारी के सबसे कोमल नन्हे पौधों की भी चिन्ता करता है और लबानोन के देवदार की भी। सब उसकी जीवन की पुस्तक में हैं, और सब उसकी देखरेख में हैं। सब एक सनातन वाचा में उसे सौंपे गए हैं, और उसने सारी निर्बलताओं के होते हुए भी एक-एक को सुरक्षित घर पहुँचाने का बीड़ा उठाया है। बस कोई पापी विश्वास के द्वारा मसीह को थाम ले, तब चाहे वह कितना ही निर्बल हो, मसीह का वचन उससे बँधा है, "मैं तुझे कभी न छोड़ूँगा और न कभी तुझे त्यागूँगा।" वह कभी-कभी प्रेम से उसे ताड़ना दे सकता है। वह कभी-कभी उसे कोमलता से डाँट सकता है। परन्तु वह उसे कभी, कभी नहीं छोड़ेगा। शैतान उसे मसीह के हाथ से कभी छीन न सकेगा।

सारा संसार जान ले कि प्रभु यीशु अपने विश्वासी लोगों को उनकी कमियों और निर्बलताओं के कारण त्याग नहीं देगा। पति अपनी पत्नी में दोष पाकर उसे छोड़ नहीं देता। माता अपने शिशु को इसलिए नहीं त्यागती कि वह निर्बल, कमज़ोर और अनजान है। और प्रभु मसीह उन बेचारे पापियों को नहीं ठुकराता जिन्होंने अपनी आत्माएँ उसके हाथों में सौंप दी हैं, इसलिए कि वह उनमें दाग और अपूर्णताएँ देखता है। नहीं! यह तो उसकी महिमा है कि वह अपने लोगों के दोषों को अनदेखा करे और उनकी भटकन को चंगा करे,—उनके निर्बल अनुग्रहों को मूल्यवान ठहराए, और उनके बहुत से दोषों को क्षमा करे। इब्रानियों का ग्यारहवाँ अध्याय अद्भुत है। यह देखना आश्चर्यजनक है कि पवित्र आत्मा उन भक्तों के विषय में कैसे बोलता है जिनके नाम उस अध्याय में दर्ज हैं। वहाँ प्रभु के लोगों का विश्वास सामने रखा गया है और स्मरण किया गया है। परन्तु बहुतों के दोष, जो आसानी से सामने लाए जा सकते थे, छोड़ दिए गए हैं, और उनका कहीं उल्लेख नहीं किया गया।

इस लेख के पाठकों में अब कौन है जो उद्धार की इच्छा तो रखता है, परन्तु निश्चय करने से डरता है, कि कहीं आगे चलकर वह गिर न जाए? मैं तुमसे विनती करता हूँ, प्रभु यीशु की कोमलता और धीरज पर विचार करो, और फिर न डरो। क्रूस उठाने और साहस के साथ संसार में से निकल आने से मत डरो। वही प्रभु और उद्धारकर्ता जिसने चेलों को सहा, तुम्हें भी सहने को तैयार और इच्छुक है। यदि तुम ठोकर खाओगे तो वह तुम्हें उठाएगा। यदि तुम भटकोगे तो वह कोमलता से तुम्हें लौटा लाएगा। यदि तुम मूर्छित होगे तो वह तुम्हें फिर जिलाएगा। वह तुम्हें मिस्र से निकालकर जंगल में नाश होने न देगा। वह तुम्हें प्रतिज्ञा के देश में सुरक्षित पहुँचाएगा। बस अपने आप को उसकी अगुवाई में सौंप दो, तब, मेरी आत्मा तुम्हारी आत्मा के लिए ज़मानत है, वह तुम्हें सुरक्षित घर पहुँचाएगा। बस मसीह की आवाज़ सुनो और उसके पीछे चलो, तो तुम कभी नाश न होगे।

इस पत्र के पाठकों में कौन है जो मन फिराकर लौट आया है और अपने प्रभु की इच्छा पूरी करना चाहता है? आज अपने स्वामी की कोमलता और सहनशीलता से उदाहरण लो, और दूसरों के प्रति कोमल-हृदय और दयालु होना सीखो। नए आरम्भ करनेवालों के साथ नरमी से व्यवहार करो। यह आशा मत रखो कि वे सब कुछ जानते और सब कुछ एकदम समझते हों। उनका हाथ थामो। उन्हें आगे ले चलो और उनका हियाव बढ़ाओ। उस हृदय को उदास करने की अपेक्षा, जिसे परमेश्वर उदास नहीं करना चाहता, सब बातों की प्रतीति करो और सब बातों की आशा रखो। पीछे हटनेवालों के साथ नरमी से व्यवहार करो। उनकी ओर पीठ मत फेरो मानो उनकी दशा आशाहीन हो। उन्हें उनके पहले स्थान पर लौटा लाने के लिए हर उचित उपाय काम में लाओ। अपने आप पर और अपनी बार-बार की निर्बलताओं पर विचार करो, और दूसरों के साथ वैसा ही करो जैसा तुम चाहते हो कि वे तुम्हारे साथ करें। हाय, स्वामी के मन का अभाव उसके बहुत से चेलों में दुःखद रूप से दिखाई देता है। मुझे भय है कि आज के दिनों में कम ही कलीसियाएँ ऐसी होंगी जो पतरस को, अपने प्रभु का इनकार करने के बाद, बहुत वर्षों तक फिर सहभागिता में ग्रहण करतीं। ऐसे विश्वासी भी थोड़े ही हैं जो बरनबास का काम करने को तैयार हों, अर्थात् नए मन फिरानेवालों का हाथ थामने और उनके आरम्भ ही में उन्हें प्रोत्साहित करने को इच्छुक हों। सचमुच हमें विश्वासियों पर आत्मा के उंडेले जाने की लगभग उतनी ही आवश्यकता है जितनी संसार पर।

और अब मुझे अपने पाठकों से केवल इतना कहना है कि जो शिक्षाएँ मैंने उनके सामने रखी हैं, उन्हें व्यवहार में लाएँ। आज तुमने पाँच बातें सुनी हैं।

पहली: यह कि मसीह की सेवा तुम्हें क्लेशों से नहीं बचाएगी। सबसे पवित्र सन्त भी उनके अधीन रहते हैं।

दूसरी: यह कि मसीह परमेश्वर होने के साथ-साथ सचमुच मनुष्य भी है।

तीसरी: यह कि विश्वासियों में बहुत निर्बलता और दुर्बलता हो सकती है, फिर भी वे सच्चे विश्वासी हो सकते हैं।

चौथी: यह कि मसीह के पास सारा अधिकार है; और

पाँचवीं: यह कि मसीह अपने लोगों के प्रति धीरज और दयालुता से भरपूर है। इन पाँच शिक्षाओं को स्मरण रखो, तो तुम्हारा भला होगा।

थोड़ी देर मेरे साथ सहो, जब मैं तुम्हारे पढ़े हुए इन विषयों को तुम्हारे हृदय में और गहराई से बैठाने के लिए कुछ शब्द कहता हूँ।

(1) यह पत्र सम्भवतः कुछ ऐसे लोगों के हाथ में भी पड़ेगा जो मसीह की सेवा या स्वयं मसीह को अनुभव से बिलकुल नहीं जानते।

ऐसे लोग बहुत हैं जिन्हें उन बातों में कोई रुचि नहीं जिनके विषय में मैं लिखता रहा हूँ। उनका धन सब नीचे ही है। वे पूरी तरह संसार की बातों में लगे हैं। उन्हें विश्वासी के संघर्ष, उसकी लड़ाइयों, निर्बलताओं, सन्देहों और भयों की कोई चिन्ता नहीं।

उन्हें इसकी कम ही चिन्ता है कि मसीह मनुष्य है या परमेश्वर। उन्हें इसकी भी कम ही परवाह है कि उसने चमत्कार किए या नहीं। उनके लिए यह सब शब्दों, नामों और रूपों की बात है, जिनके विषय में वे अपने आपको कष्ट नहीं देते। वे संसार में बिना परमेश्वर के हैं।

यदि संयोग से तुम भी ऐसे ही मनुष्य हो, तो मैं तुम्हें केवल गम्भीरता से चेतावनी दे सकता हूँ कि तुम्हारा वर्तमान मार्ग सदा नहीं चल सकता। तुम सदा जीवित नहीं रहोगे। इसका अन्त अवश्य होगा। पके बाल, बुढ़ापा, रोग, दुर्बलताएँ, मृत्यु, ये सब तुम्हारे आगे हैं और एक दिन इनका सामना करना ही होगा। जब वह दिन आएगा तब तुम क्या करोगे?

आज मेरे शब्दों को स्मरण रखो। रोगी और मरते समय तुम्हें कोई सान्त्वना नहीं मिलेगी, जब तक यीशु मसीह तुम्हारा मित्र न हो। तुम अपने दुःख और लज्जा के साथ यह जान लोगे कि मनुष्य चाहे कितना ही बोलें और घमण्ड करें, मृत्युशय्या पर पहुँचकर वे मसीह के बिना नहीं रह सकते। तुम सेवकों को बुलवा सकते हो, उनसे प्रार्थनाएँ पढ़वा सकते हो और संस्कार ले सकते हो। तुम मसीही धर्म की हर रीति और विधि पूरी कर सकते हो। परन्तु यदि तुम अपने जीवन के प्रभात में लापरवाह और संसारी जीवन बिताते और मसीह को तुच्छ जानते रहे, तो यदि मसीह तुम्हें तुम्हारे अन्तिम दिनों में तुम्हारे ही हाल पर छोड़ दे तो आश्चर्य मत करना। हाय! ये गम्भीर शब्द हैं, और प्रायः दुःखद रीति से पूरे होते हैं: "मैं भी तुम्हारी विपत्ति के समय हँसूँगा; और जब तुम पर भय आ पड़ेगा तब ठट्ठा करूँगा।" (नीतिवचन 1:26)

इसलिए आज आओ, और उस व्यक्ति की सम्मति मानो जो तुम्हारी आत्मा से प्रेम करता है। बुराई करना छोड़ दो। भलाई करना सीखो। मूर्खों को छोड़ो और समझ के मार्ग पर चलो। उस घमण्ड को दूर करो जो तुम्हारे हृदय से लिपटा है, और प्रभु यीशु को ढूँढ़ो जब तक वह मिल सकता है। उस आत्मिक आलस्य को दूर करो जो तुम्हारी आत्मा को शिथिल कर रहा है, और ठान लो कि अपनी बाइबल, अपनी प्रार्थनाओं और अपने रविवारों के विषय में परिश्रम करोगे। उस संसार से मुँह मोड़ो जो तुम्हें कभी सचमुच तृप्त नहीं कर सकता, और उस धन को ढूँढ़ो जो अकेला ही सच्चे अर्थ में अविनाशी है। ओ, प्रभु के अपने ही वचनों को तुम्हारे विवेक में स्थान मिले! "हे भोले लोगो, तुम कब तक भोलेपन से प्रीति रखोगे? और ठट्ठा करनेवाले कब तक ठट्ठा करने से और मूर्ख लोग ज्ञान से बैर रखने से प्रसन्न रहेंगे? तुम मेरी डाँट सुनकर मन फिराओ; सुनो, मैं अपनी आत्मा तुम्हारे लिये उण्डेल दूँगा; मैं तुम को अपने वचन बताऊँगा।" (नीतिवचन 1:22, 23) मेरा विश्वास है कि यहूदा इस्करियोती का सबसे बड़ा पाप यह था कि उसने क्षमा नहीं माँगी और अपने प्रभु की ओर नहीं लौटा। सावधान रहो कि वह तुम्हारा भी पाप न बने।

(2) यह पत्र सम्भवतः कुछ ऐसे लोगों के हाथ में भी पड़ेगा जो प्रभु यीशु से प्रेम रखते हैं और उस पर विश्वास करते हैं, फिर भी चाहते हैं कि उससे और अधिक प्रेम करें।

यदि तुम ऐसे मनुष्य हो, तो इस उपदेश के वचन को सह लो और उसे अपने हृदय में लगाओ।

एक बात के लिए यह सदा उपस्थित सत्य अपने मन के सामने रखो कि प्रभु यीशु सचमुच जीवित व्यक्ति है, और उसके साथ वैसा ही व्यवहार करो।

मुझे भय है कि आज के दिनों में बहुत से अंगीकार करनेवालों के मन से हमारे प्रभु का व्यक्तित्व दुःखद रूप से ओझल हो गया है। उनकी बातचीत उद्धारकर्ता की अपेक्षा उद्धार के विषय में अधिक होती है; छुड़ानेवाले की अपेक्षा छुटकारे के विषय में; यीशु की अपेक्षा धर्मी ठहराए जाने के विषय में; मसीह के व्यक्तित्व की अपेक्षा मसीह के कार्य के विषय में। यह बड़ा दोष है, और बहुत से अंगीकार करनेवालों के धर्म के नीरस और सूखे स्वरूप का पूरा कारण यही है।

यदि तुम कभी अनुग्रह में बढ़ना चाहते हो, और विश्वास करने में आनन्द और शान्ति पाना चाहते हो, तो इस भ्रम में पड़ने से सावधान रहो। सुसमाचार को सूखे सिद्धान्तों का मात्र संग्रह समझना छोड़ दो। उसे बल्कि एक सामर्थी जीवित सत्ता के प्रकाशन के रूप में देखो, जिसकी दृष्टि में तुम्हें प्रतिदिन जीना है। उसे केवल अमूर्त प्रस्थापनाओं और गूढ़ सिद्धान्तों और नियमों का समूह समझना छोड़ दो। उसे एक महिमामय व्यक्तिगत मित्र से परिचय के रूप में देखो। प्रेरितों ने ठीक इसी प्रकार का सुसमाचार प्रचार किया था। वे संसार में घूम-घूमकर लोगों को केवल अमूर्त रूप में प्रेम, और दया, और क्षमा की बातें नहीं सुनाते थे। उनके सब उपदेशों का मुख्य विषय एक वास्तविक जीवित मसीह का प्रेम से भरा हृदय था। पवित्रीकरण और महिमा के योग्य बनाने के लिये यही सुसमाचार सबसे अधिक उपयुक्त है। निश्चय ही उस स्वर्ग के लिये, जहाँ मसीह की व्यक्तिगत उपस्थिति ही सब कुछ होगी, और उस महिमा के लिये, जहाँ हम मसीह से आमने-सामने मिलेंगे, हमें तैयार करने में इससे बढ़कर कोई बात कारगर नहीं हो सकती कि हम यहाँ पृथ्वी पर मसीह के साथ सहभागिता को एक वास्तविक जीवित व्यक्ति के साथ सहभागिता के रूप में अनुभव करें। एक विचार और एक व्यक्ति में धरती-आकाश का अन्तर है।

फिर दूसरी बात यह कि इस सत्य को सदा अपने मन में सामने रखने का प्रयत्न करो कि प्रभु यीशु बिलकुल अपरिवर्तनीय है।

वह उद्धारकर्ता, जिस पर तुम भरोसा रखते हो, कल और आज और युगानुयुग एक सा है। उसमें न कोई परिवर्तन है, न छाया के समान बदलाव। यद्यपि वह स्वर्ग में परमेश्वर के दाहिने हाथ ऊँचे पर विराजमान है, तौभी हृदय में वह ठीक वैसा ही है जैसा 1800 वर्ष पहले पृथ्वी पर था। इसे स्मरण रखो, और तुम्हारा भला होगा।

फिलिस्तीन में उसकी आने-जाने की सब यात्राओं में उसके पीछे-पीछे चलो। ध्यान दो कि जितने उसके पास आए उन सबको उसने ग्रहण किया और किसी को निकाल न दिया। ध्यान दो कि दुःख की हर कहानी सुनने को उसके कान थे, हर संकट में सहायता करने को उसका हाथ था, और जिन्हें सहानुभूति की आवश्यकता थी उन सबके लिये उसका हृदय पसीजता था। और तब अपने आप से कहो, "यही यीशु मेरा प्रभु और उद्धारकर्ता है। स्थान और समय ने उसमें कोई अन्तर नहीं डाला। वह जैसा था, वैसा ही है, और सदा वैसा ही रहेगा।"

निश्चय ही यह विचार तुम्हारे प्रतिदिन के धर्म में जीवन और वास्तविकता भर देगा। निश्चय ही यह विचार आनेवाली उत्तम वस्तुओं की तुम्हारी आशा को ठोस आधार और रूप देगा। निश्चय ही यह आनन्द से मनन करने की बात है कि जो तैंतीस वर्ष पृथ्वी पर रहा, और जिसका जीवन हम सुसमाचारों में पढ़ते हैं, वही उद्धारकर्ता है जिसकी उपस्थिति में हम अनन्तकाल बिताएँगे।

इस लेख का अन्तिम शब्द वही होगा जो पहला था। मैं चाहता हूँ कि लोग चारों सुसमाचारों को जितना पढ़ते हैं उससे अधिक पढ़ें। मैं चाहता हूँ कि लोग मसीह से और अच्छी तरह परिचित हों। मैं चाहता हूँ कि अपरिवर्तित लोग यीशु को जानें, ताकि उसके द्वारा उन्हें अनन्त जीवन मिले। मैं चाहता हूँ कि विश्वासी यीशु को और अच्छी तरह जानें, ताकि वे और अधिक सुखी, और अधिक पवित्र, और ज्योति में पवित्र लोगों के भाग के और अधिक योग्य बनें। वही मनुष्य सबसे अधिक पवित्र होगा जो पौलुस के साथ यह कहना सीख लेगा, "मेरे लिये जीवित रहना मसीह है।" (फिलिप्पियों 1:21।)

13. वह कलीसिया जिसे मसीह

बनाता है

"इस पत्थर पर मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा, और अधोलोक के फाटक उस पर प्रबल न होंगे।"—मत्ती 16:18

क्या हम उस कलीसिया के हैं जो चट्टान पर बनी है? क्या हम उसी एक कलीसिया के सदस्य हैं जिसमें हमारी आत्माओं का उद्धार हो सकता है?—ये गम्भीर प्रश्न हैं। ये गम्भीर विचार के योग्य हैं। मैं इस लेख के सब पाठकों से ध्यान देने को कहता हूँ, क्योंकि मैं उस एक सच्ची, पवित्र, सार्वभौमिक कलीसिया को दिखाने का प्रयत्न करूँगा, और लोगों के पाँवों को उसी एकमात्र सुरक्षित भेड़शाला की ओर ले जाऊँगा। "यह कलीसिया क्या है? वह कैसी है? उसके चिह्न क्या हैं? वह कहाँ पाई जाती है?" इन सब बातों पर मुझे कुछ कहना है। मैं हमारे प्रभु यीशु मसीह के उन वचनों को खोलने जा रहा हूँ जो इस पृष्ठ के शीर्ष पर लिखे हैं। वह घोषणा करता है, "इस पत्थर पर मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा, और अधोलोक के फाटक उस पर प्रबल न होंगे।"

इन प्रसिद्ध वचनों में पाँच बातें हैं जो हमारा ध्यान माँगती हैं:—

1. एक भवन: "मेरी कलीसिया।"

2. एक बनानेवाला: मसीह कहता है, "मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा।"

3. एक नींव: "इस पत्थर पर मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा।"

4. निहित संकट: "अधोलोक के फाटक।"

5. प्रतिज्ञात सुरक्षा: "अधोलोक के फाटक उस पर प्रबल न होंगे।"

आज के समय में पूरा विषय विशेष ध्यान की माँग करता है। हमें कभी न भूलना चाहिए कि पवित्रता उन सब की प्रमुख विशेषता है जो उस एक सच्ची कलीसिया के हैं।

1. पहली बात, हमारे पाठ में एक भवन का उल्लेख है। प्रभु यीशु मसीह "मेरी कलीसिया" की बात कहता है।

अब यह कलीसिया क्या है? इससे बढ़कर महत्त्वपूर्ण पूछताछ कम ही हो सकती है। इस विषय पर उचित ध्यान न देने के कारण संसार में जो भ्रम घुस आए हैं वे न थोड़े हैं, न छोटे।

हमारे पाठ की कलीसिया कोई भौतिक भवन नहीं है। वह लकड़ी, या ईंट, या पत्थर, या संगमरमर से हाथों का बनाया हुआ मन्दिर नहीं है। वह स्त्रियों और पुरुषों की एक मण्डली है।—वह पृथ्वी पर कोई विशेष दृश्य कलीसिया नहीं है। वह पूर्वी कलीसिया या पश्चिमी कलीसिया नहीं है। वह इंग्लैंड की कलीसिया या स्कॉटलैंड की कलीसिया नहीं है।—सबसे बढ़कर, वह निश्चय ही रोम की कलीसिया नहीं है। हमारे पाठ की कलीसिया मनुष्य की दृष्टि में किसी भी दृश्य कलीसिया से बहुत कम दिखावा करती है, परन्तु परमेश्वर की दृष्टि में बहुत अधिक महत्त्व रखती है।

हमारे पाठ की कलीसिया प्रभु यीशु मसीह के सब सच्चे विश्वासियों से, उन सब से जो सचमुच पवित्र और परिवर्तित लोग हैं, मिलकर बनी है। उसमें वे सब सम्मिलित हैं जिन्होंने पाप से मन फिराया है, और विश्वास के द्वारा मसीह की ओर भागे हैं, और उसमें नई सृष्टि बनाए गए हैं। उसमें परमेश्वर के सब चुने हुए लोग, वे सब जिन्होंने परमेश्वर का अनुग्रह पाया है, वे सब जो मसीह के लहू में धोए गए हैं, वे सब जिन्हें मसीह की धार्मिकता पहनाई गई है, वे सब जो नए सिरे से जन्मे हैं और मसीह के आत्मा से पवित्र किए गए हैं, सम्मिलित हैं। ऐसे सब लोग, चाहे किसी नाम, पद, जाति, लोग या भाषा के हों, हमारे पाठ की कलीसिया को बनाते हैं। यही मसीह की देह है। यही मसीह की भेड़ों का झुण्ड है। यही दुल्हिन है। यही मेम्ने की पत्नी है। यही प्रेरितों के विश्वास-सूत्र और निकेया के विश्वास-सूत्र की "पवित्र सार्वभौमिक और प्रेरितीय कलीसिया" है। यही इंग्लैंड की कलीसिया की प्रभु-भोज की विधि में कहा गया "सब विश्वासयोग्य लोगों का धन्य समुदाय" है। यही "चट्टान पर बनी कलीसिया" है।

इस कलीसिया के सब सदस्य एक ही रीति से परमेश्वर की आराधना नहीं करते, और न ही सब एक ही प्रकार का प्रशासन अपनाते हैं। इनमें से कुछ अध्यक्षों के अधीन चलते हैं और कुछ प्राचीनों के अधीन। कुछ सार्वजनिक आराधना के समय प्रार्थना-पुस्तक का प्रयोग करते हैं और कुछ किसी का भी प्रयोग नहीं करते।

इंग्लैंड की कलीसिया का चौंतीसवाँ अनुच्छेद बड़ी बुद्धिमानी से घोषित करता है, "यह आवश्यक नहीं कि रीति-रिवाज सब स्थानों में एक ही और एक जैसे हों।" परन्तु इस कलीसिया के सब सदस्य अनुग्रह के एक ही सिंहासन के पास आते हैं। वे सब एक मन से आराधना करते हैं। वे सब एक ही आत्मा के द्वारा चलाए जाते हैं। वे सब सचमुच और सच्चाई से पवित्र हैं। वे सब "हल्लिलूय्याह" कह सकते हैं, और सब उत्तर में "आमीन" कह सकते हैं।

यही वह कलीसिया है जिसकी सेवक और दासियाँ पृथ्वी की सारी दृश्य कलीसियाएँ हैं। चाहे वे एपिस्कोपल हों, स्वतंत्र हों या प्रेस्बिटेरियन हों, वे सब उस एक सच्ची कलीसिया के हितों की सेवा करती हैं। वे मचान के समान हैं, जिसके पीछे वह महान भवन बनाया जाता है। वे उस छिलके के समान हैं, जिसके नीचे जीवित दाना बढ़ता है। उनकी उपयोगिता के अलग-अलग दर्जे हैं। उनमें सबसे उत्तम और योग्य वह है जो मसीह की सच्ची कलीसिया के लिए सबसे अधिक सदस्य तैयार करती है। परन्तु किसी दृश्य कलीसिया को यह कहने का अधिकार नहीं कि "हम ही एकमात्र सच्ची कलीसिया हैं। हम ही वे लोग हैं, और बुद्धि हमारे साथ ही मर जाएगी।" किसी दृश्य कलीसिया को कभी यह कहने का साहस नहीं करना चाहिए, "हम सदा स्थिर रहेंगे। अधोलोक के फाटक मुझ पर प्रबल न होंगे।"

यही वह कलीसिया है जिससे प्रभु की अनुग्रहपूर्ण प्रतिज्ञाएँ सम्बन्ध रखती हैं—रक्षा, स्थिरता, सुरक्षा और अन्तिम महिमा की प्रतिज्ञाएँ। हूकर कहता है, "पवित्रशास्त्र में हम परमेश्वर के उस अनन्त प्रेम और बचानेवाली दया के विषय में जो कुछ पढ़ते हैं, जो वह अपनी कलीसियाओं पर प्रकट करता है, उसका एकमात्र उचित पात्र यही कलीसिया है, जिसे हम ठीक ही मसीह की रहस्यमय देह कहते हैं।" इस संसार में सच्ची कलीसिया चाहे कितनी ही छोटी और तुच्छ समझी जाए, परमेश्वर की दृष्टि में वह बहुमूल्य और आदरणीय है। सुलैमान का मन्दिर अपनी सारी महिमा के साथ भी उस कलीसिया की तुलना में तुच्छ और निकम्मा था जो चट्टान पर बनी है।

मुझे भरोसा है कि जो बातें मैंने अभी कही हैं, वे इस लेख के सब पढ़नेवालों के मन में गहराई तक बैठ जाएँगी। "कलीसिया" के विषय में खरी शिक्षा पर दृढ़ रहो। यहाँ की भूल खतरनाक और आत्मा का नाश करनेवाले भ्रमों की ओर ले जा सकती है। वह कलीसिया जो सच्चे विश्वासियों से बनी है, वही कलीसिया है जिसके लिए हम सेवक विशेष रूप से प्रचार करने को ठहराए गए हैं। वह कलीसिया जिसमें वे सब सम्मिलित हैं जो मन फिराते और सुसमाचार पर विश्वास करते हैं, वही कलीसिया है जिसका सदस्य हम तुम्हें देखना चाहते हैं। हमारा काम पूरा नहीं होता और हमारे मन को सन्तोष नहीं मिलता, जब तक तुम नई सृष्टि न बन जाओ और उस एक सच्ची कलीसिया के सदस्य न हो जाओ। उस कलीसिया के बाहर जो "चट्टान पर बनी है" कोई उद्धार नहीं है।

2. अब मैं उस दूसरी बात पर आता हूँ जिसकी ओर मैंने आपका ध्यान दिलाने का प्रस्ताव रखा था। हमारे पाठ में केवल एक भवन ही नहीं, एक बनानेवाला भी है। प्रभु यीशु मसीह घोषणा करता है, "मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा।"

मसीह की सच्ची कलीसिया की कोमल देखभाल धन्य त्रिएकता के तीनों जनों के द्वारा होती है। बाइबल में प्रकट किए गए उद्धार की योजना में निःसन्देह परमेश्वर पिता चुनता है, परमेश्वर पुत्र छुड़ाता है, और परमेश्वर पवित्र आत्मा मसीह की रहस्यमय देह के हर सदस्य को पवित्र करता है। परमेश्वर पिता, परमेश्वर पुत्र और परमेश्वर पवित्र आत्मा—तीन जन और एक परमेश्वर—हर बचाई गई आत्मा के उद्धार के लिए मिलकर कार्य करते हैं। यह वह सत्य है जिसे कभी भुलाना नहीं चाहिए। फिर भी एक विशेष अर्थ में कलीसिया का भार प्रभु यीशु मसीह पर रखा गया है। वही विशेष और सर्वोपरि रूप से कलीसिया का छुड़ानेवाला और उद्धारकर्ता है। इसी कारण हम उसे हमारे पाठ में यह कहते हुए पाते हैं, "मैं बनाऊँगा"—बनाने का काम मेरा विशेष काम है।

मसीह ही कलीसिया के सदस्यों को ठीक समय पर बुलाता है। वे "यीशु मसीह के बुलाए हुए" हैं। (रोमियों 1:6।) मसीह ही उन्हें जिलाता है। "पुत्र जिन्हें चाहता है उन्हें जिलाता है।" (यूहन्ना 5:21।) मसीह ही उनके पाप धोता है। उसने "हम से प्रेम किया और अपने लहू के द्वारा हमें हमारे पापों से छुड़ाया।" (प्रकाशित वाक्य 1:5।) मसीह ही उन्हें शान्ति देता है। "मैं तुम्हारे लिए शान्ति छोड़ जाता हूँ, अपनी शान्ति तुम्हें देता हूँ।" (यूहन्ना

14:27।) मसीह ही उन्हें अनन्त जीवन देता है। "मैं उन्हें अनन्त जीवन देता हूँ, और वे कभी नाश न होंगी।" (यूहन्ना 10:28।) मसीह ही उन्हें मन फिराव प्रदान करता है। "उसी को परमेश्वर ने अपने दाहिने हाथ से प्रधान और उद्धारकर्ता ठहराकर ऊँचे पर चढ़ाया, कि वह मन फिराव दे।" (प्रेरितों के काम 5:31।) मसीह ही उन्हें परमेश्वर की सन्तान बनने के योग्य करता है। "जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्वर की सन्तान होने का अधिकार दिया।" (यूहन्ना 1:12।) मसीह ही उनमें आरम्भ किए गए कार्य को आगे बढ़ाता है। "इसलिए कि मैं जीवित हूँ, तुम भी जीवित रहोगे।" (यूहन्ना 14:19।) संक्षेप में, "पिता की यह इच्छा हुई कि सारी पूर्णता मसीह में वास करे।" (कुलुस्सियों 1:19।) वही विश्वास का कर्ता और सिद्ध करनेवाला है। वही जीवन है। वही सिर है। उसी से मसीहियों की रहस्यमय देह का हर जोड़ और हर अंग पोषण पाता है। उसी के द्वारा वे कर्तव्य के लिए बलवन्त किए जाते हैं। उसी के द्वारा वे गिरने से बचाए जाते हैं। वह उन्हें अन्त तक सम्भाले रखेगा, और उन्हें निर्दोष करके पिता के सिंहासन के सामने बड़े आनन्द के साथ खड़ा करेगा। वह सब विश्वासियों में सब कुछ है।

वह सामर्थी कारिन्दा, जिसके द्वारा प्रभु यीशु मसीह अपनी कलीसिया के सदस्यों में यह कार्य पूरा करता है, निःसन्देह पवित्र आत्मा है। वही मसीह और उसके लाभों को आत्मा पर लागू करता है। वही सदा नया करनेवाला, जगानेवाला, कायल करनेवाला, क्रूस की ओर ले चलनेवाला और रूपान्तरित करनेवाला है, जो संसार में से एक-एक पत्थर निकालकर उसे उस रहस्यमय भवन में जोड़ता जाता है। परन्तु महान प्रधान बनानेवाला, जिसने छुटकारे के कार्य को पूरा करने और उसे सिद्ध करने का उत्तरदायित्व उठाया है, परमेश्वर का पुत्र है, वह "वचन जो शरीर बना।" यीशु मसीह ही "बनाता" है।

सच्ची कलीसिया के निर्माण में प्रभु यीशु अनेक गौण साधनों को काम में लाने की कृपा करता है। सुसमाचार की सेवकाई, पवित्रशास्त्र का प्रसार, मित्रवत् डाँट, ठीक समय पर कहा गया वचन, और दुःखों का खींचनेवाला प्रभाव—ये सब वे साधन और उपाय हैं जिनसे उसका कार्य आगे बढ़ता है और आत्मा प्राणों तक जीवन पहुँचाता है। परन्तु मसीह ही वह महान निरीक्षक वास्तुकार है, जो किए जानेवाले सब कुछ का प्रबन्ध, मार्गदर्शन और निर्देशन करता है। पौलुस बो सकता है और अपुल्लोस सींच सकता है, परन्तु बढ़ानेवाला परमेश्वर है। (1 कुरिन्थियों 3:6।) सेवक प्रचार कर सकते हैं और लेखक लिख सकते हैं, परन्तु निर्माण केवल प्रभु यीशु मसीह ही कर सकता है। और जब तक वह निर्माण न करे, कार्य रुका रहता है।

प्रभु यीशु मसीह जिस बुद्धि से अपनी कलीसिया का निर्माण करता है, वह कितनी महान है! सब कुछ ठीक समय पर और ठीक रीति से होता है। हर पत्थर अपनी बारी पर अपने ठीक स्थान पर रखा जाता है। कभी वह बड़े पत्थर चुनता है और कभी छोटे। कभी कार्य तेजी से बढ़ता है और कभी धीरे-धीरे। मनुष्य प्रायः अधीर हो जाता है और समझता है कि कुछ भी नहीं हो रहा। परन्तु मनुष्य का समय परमेश्वर का समय नहीं है। उसकी दृष्टि में हजार वर्ष एक दिन के बराबर हैं। वह महान निर्माता कोई भूल नहीं करता। वह जानता है कि क्या कर रहा है। वह आरम्भ से ही अन्त को देखता है। वह एक सिद्ध, अटल और निश्चित योजना के अनुसार कार्य करता है। माइकल एंजेलो और रेन जैसे वास्तुकारों की बड़ी से बड़ी कल्पनाएँ भी अपनी कलीसिया के विषय में मसीह की बुद्धिमान योजनाओं के सामने मात्र तुच्छ और बच्चों का खेल हैं।

अपनी कलीसिया के निर्माण में मसीह जो दीनता और दया दिखाता है, वह कितनी महान है! वह प्रायः सबसे अनुपयुक्त और सबसे खुरदरे पत्थरों को चुनता है और उन्हें एक अत्युत्तम कार्य में बैठा देता है। वह किसी को भी उसके पिछले पापों और बीते अपराधों के कारण तुच्छ नहीं जानता और न ठुकराता है। वह प्रायः फरीसियों और चुंगी लेनेवालों को अपने घर के खम्भे बना देता है। उसे दया दिखाने में आनन्द आता है। वह प्रायः सबसे लापरवाह और अभक्त लोगों को लेकर उन्हें अपने आत्मिक मन्दिर के चमकाए हुए कोने के पत्थर बना देता है।

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