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भाग 6
IV. अब मैं उस अन्तिम बात पर आता हूँ जिसकी चर्चा मैंने की थी। मैंने प्रतिज्ञा की थी कि मैं कुछ सम्भावित कारण बताऊँगा कि दृढ़ आशा इतनी कम क्यों प्राप्त होती है। मैं यह बहुत संक्षेप में करूँगा।
यह बहुत गम्भीर प्रश्न है, और हम सब के हृदयों में गहरी जाँच उत्पन्न करना चाहिए। निश्चय ही मसीह के थोड़े ही लोग निश्चयता की इस धन्य आत्मा तक पहुँचते दिखाई देते हैं। अपेक्षाकृत बहुत से लोग विश्वास करते हैं, परन्तु थोड़े ही पूरी रीति से आश्वस्त हैं। अपेक्षाकृत बहुतों में उद्धार देनेवाला विश्वास है, परन्तु थोड़ों में वह महिमामय भरोसा है जो पौलुस की भाषा में चमकता है। मेरे विचार से हम सबको मानना पड़ेगा कि ऐसा ही है।
तो ऐसा क्यों है?—जिस बात को खोजने की दो प्रेरितों ने हमें दृढ़ता से आज्ञा दी है, उसका अनुभव इन पिछले दिनों में बहुत कम विश्वासियों को क्यों है? दृढ़ आशा इतनी दुर्लभ क्यों है?
मैं पूरी नम्रता के साथ इस विषय में कुछ सुझाव देना चाहता हूँ। मैं जानता हूँ कि बहुत से लोगों ने कभी निश्चयता प्राप्त नहीं की, फिर भी मैं पृथ्वी पर और स्वर्ग में भी उनके चरणों में बैठने को सहर्ष तैयार हूँ। सम्भव है कि प्रभु अपनी कुछ सन्तानों के स्वाभाविक स्वभाव में कुछ ऐसा देखता हो जिसके कारण निश्चयता उनके लिए भली नहीं। सम्भव है कि आत्मिक स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए उन्हें बहुत दीन बनाए रखना आवश्यक हो। यह केवल परमेश्वर ही जानता है। तो भी, सब छूट देने के बाद भी, मुझे भय है कि बहुत से विश्वासी बिना दृढ़ आशा के हैं, जिनकी दशा की व्याख्या प्रायः ऐसे कारणों से हो सकती है।
(1) मेरा अनुमान है कि एक अत्यन्त सामान्य कारण धर्मी ठहराए जाने के सिद्धान्त की दोषपूर्ण समझ है।
मेरा झुकाव यह सोचने की ओर है कि बहुत से विश्वासियों के मन में धर्मी ठहराया जाना और पवित्रीकरण अनजाने में आपस में मिल गए हैं। वे सुसमाचार के इस सत्य को ग्रहण करते हैं कि यदि हम सचमुच मसीह के अंग हैं तो हमारे लिए कुछ किया गया है और हमारे भीतर भी कुछ किया जाना आवश्यक है; और इतनी दूर तक वे सही हैं। परन्तु फिर, शायद बिना जाने ही, वे यह विचार ग्रहण कर लेते हैं कि उनका धर्मी ठहराया जाना किसी न किसी सीमा तक उनके भीतर की किसी बात से प्रभावित होता है। वे स्पष्ट नहीं देखते कि परमेश्वर के सम्मुख हमारे ग्रहण किए जाने का एकमात्र आधार मसीह का कार्य है, उनका अपना कार्य नहीं—न पूर्ण रूप से, न अंश में, न सीधे, न परोक्ष रूप से; कि धर्मी ठहराया जाना हमसे पूरी तरह बाहर की बात है, जिसके लिए हमारी ओर से सरल विश्वास के सिवा कुछ भी आवश्यक नहीं—और यह कि सबसे निर्बल विश्वासी भी सबसे बलवन्त विश्वासी के समान पूरी रीति से धर्मी ठहराया गया है।*
बहुत से लोग भूल जाते प्रतीत होते हैं कि हम पापी होकर, और केवल पापी होकर ही, बचाए और धर्मी ठहराए गए हैं; और यदि हम मतूशेलह की आयु तक भी जीएँ तो इससे ऊँचे कुछ भी नहीं हो सकते। छुड़ाए हुए पापी, धर्मी ठहराए हुए पापी, और नए किए हुए पापी तो हम निःसन्देह होंगे—परन्तु अन्त तक सदा पापी, पापी, पापी ही रहेंगे। वे यह नहीं समझते कि हमारे धर्मी ठहराए जाने और हमारे पवित्रीकरण में बड़ा अन्तर है। हमारा धर्मी ठहराया जाना एक सिद्ध और पूरा किया हुआ कार्य है, उसमें कोई श्रेणी-भेद नहीं। हमारा पवित्रीकरण अपूर्ण और अधूरा है, और जीवन की अन्तिम घड़ी तक वैसा ही रहेगा। वे आशा करते प्रतीत होते हैं कि विश्वासी अपने जीवन के किसी काल में कुछ सीमा तक भ्रष्टता से मुक्त हो सकता है और एक प्रकार की आन्तरिक सिद्धता प्राप्त कर सकता है। और अपने हृदयों में स्वर्गदूतों जैसी यह दशा न पाकर वे तुरन्त निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि उनकी दशा में अवश्य कुछ बहुत बड़ी गड़बड़ी है। और इस प्रकार वे जीवन भर विलाप करते फिरते हैं—इस भय से दबे हुए कि मसीह में उनका कोई भाग या अंश नहीं, और सान्त्वना पाने से इनकार करते हुए।
आइए, हम इस बात को भली-भाँति तौलें। यदि कोई विश्वास करनेवाली आत्मा निश्चयता चाहती है और उसे नहीं पाई है, तो वह सबसे पहले अपने आप से पूछे कि क्या उसे पूरा निश्चय है कि वह विश्वास में खरा है, क्या वह भिन्न बातों में भेद करना जानता है, और क्या धर्मी ठहराए जाने के विषय में उसकी आँखें पूरी तरह स्पष्ट हैं। निश्चयता का अनुभव करने की आशा करने से पहले उसे जानना चाहिए कि केवल विश्वास करना और विश्वास से धर्मी ठहराया जाना क्या है।
इस विषय में, और अन्य बहुत से विषयों में भी, पुरानी गलातीवाली झूठी शिक्षा ही सिद्धान्त और आचरण दोनों में भ्रम का सबसे उपजाऊ स्रोत है। लोगों को चाहिए कि मसीह के और मसीह ने उनके लिए जो किया है उसके स्पष्टतर दर्शन खोजें। सुखी है वह मनुष्य जो सचमुच "व्यवस्था के कामों के बिना विश्वास से धर्मी ठहराए जाने" को समझता है।
(2) निश्चयता के अभाव का एक और सामान्य कारण अनुग्रह में बढ़ने के विषय में आलस्य है।
मुझे सन्देह है कि बहुत से सच्चे विश्वासी इस विषय में संकटपूर्ण और पवित्रशास्त्र-विरुद्ध विचार रखते हैं; मेरा अभिप्राय यह नहीं कि वे जानबूझकर ऐसा करते हैं, परन्तु वे उन्हें रखते अवश्य हैं। बहुत से लोग समझते प्रतीत होते हैं कि एक बार मन फिराने के बाद उन्हें और कुछ ध्यान देने को नहीं रहा, और उद्धार की दशा मानो एक आराम-कुर्सी है जिसमें वे बस चुपचाप बैठें, पीछे टिकें और सुखी रहें। वे कल्पना करते हैं कि अनुग्रह उन्हें इसलिए दिया गया है कि वे उसका आनन्द लें, और भूल जाते हैं कि वह तोड़े के समान इसलिए दिया गया है कि उसे काम में लाया जाए, लगाया जाए और बढ़ाया जाए। ऐसे लोग "बढ़ने, उन्नति करने, और अधिक से अधिक बढ़ते जाने, अपने विश्वास में और जोड़ने" आदि की अनेक सीधी आज्ञाओं को आँखों से ओझल कर देते हैं; और इस थोड़ा-सा करनेवाली दशा में, मन की इस चुपचाप बैठी अवस्था में, उनके निश्चयता से चूक जाने पर मुझे कभी आश्चर्य नहीं होता।
मेरा विश्वास है कि आगे बढ़ना हमारा निरन्तर लक्ष्य और अभिलाषा होनी चाहिए, और हर लौटते जन्मदिन पर तथा हर वर्ष के आरम्भ में हमारा नारा होना चाहिए, "और अधिक, और अधिक" (1 थिस्सलुनीकियों 4:1): और अधिक ज्ञान,—और अधिक विश्वास,—और अधिक आज्ञाकारिता,—और अधिक प्रेम। यदि हमने तीस गुणा फल लाया है, तो हमें साठ गुणा लाने का यत्न करना चाहिए; और यदि साठ गुणा लाया है, तो सौ गुणा लाने का प्रयास करना चाहिए। प्रभु की इच्छा हमारा पवित्रीकरण है, और यह हमारी भी इच्छा होनी चाहिए। (मत्ती 13:23; 1 थिस्सलुनीकियों 4:3।)
एक बात पर तो हम किसी भी दशा में भरोसा कर सकते हैं,—परिश्रम और निश्चयता के बीच अटूट सम्बन्ध है। पतरस कहता है, "अपने बुलाए जाने और चुने जाने को सिद्ध करने का सब प्रकार से यत्न करो।" (2 पतरस 1:10।) पौलुस कहता है, "हम चाहते हैं कि तुम में से हर एक अन्त तक पूरी आशा के निश्चय के लिए ऐसा ही यत्न करता रहे।" (इब्रानियों 6:11।) सुलैमान कहता है, "परिश्रमी की आत्मा हृष्ट-पुष्ट की जाएगी।" (नीतिवचन 13:4।) प्यूरिटन लोगों की पुरानी उक्ति में बहुत सत्य है:
"चिपके रहनेवाला विश्वास सुनने से आता है, परन्तु निश्चयता का विश्वास करने के बिना नहीं आता।"
क्या इस लेख का कोई पाठक उन लोगों में से है जो निश्चयता चाहते तो हैं, पर उन्हें वह प्राप्त नहीं हुई? मेरी बात ध्यान से सुनिए। चाहे आप उसे कितना ही चाहें, परिश्रम के बिना वह आपको कभी नहीं मिलेगी। आत्मिक बातों में भी, सांसारिक बातों के समान, बिना परिश्रम के कोई लाभ नहीं होता। "आलसी का प्राण कामना करता रहता है, परन्तु उसका प्राण कुछ नहीं पाता।" (नीतिवचन 13:4)*
(3) निश्चयता की कमी का एक और सामान्य कारण है जीवन में असंगत चाल-चलन।
मुझे दुःख और शोक के साथ यह कहना पड़ता है कि मुझे भय है कि मनुष्यों को निश्चित आशा प्राप्त करने से इससे अधिक बार और कोई बात नहीं रोकती। आज के दिन मसीही होने का दावा करनेवालों की धारा पहले से कहीं अधिक चौड़ी है, और मुझे यह भी मानना पड़ेगा कि वह उतनी ही कम गहरी भी है।
जीवन की असंगति विवेक की शान्ति को पूरी तरह नष्ट कर देती है। ये दोनों बातें परस्पर मेल नहीं खातीं। वे साथ-साथ नहीं चल सकतीं और न चलेंगी। यदि आप अपने उलझा लेनेवाले पापों को पकड़े रहेंगे और उन्हें छोड़ने का मन नहीं बना सकेंगे,—यदि अवसर आने पर दाहिना हाथ काट डालने और दाहिनी आँख निकाल फेंकने से पीछे हटेंगे,—तो मैं निश्चय के साथ कहता हूँ कि आपको निश्चयता नहीं मिलेगी।
डाँवाडोल चाल,—साहसपूर्वक और दृढ़ता से कोई मार्ग अपनाने में पिछड़ना,—संसार के अनुरूप बन जाने की तत्परता,—मसीह के लिए हिचकिचाती हुई गवाही,—धर्म का ढीला-ढाला स्वर,—पवित्रता और आत्मिक जीवन के ऊँचे स्तर से पीछे हटना,—ये सब मिलकर आपकी आत्मा की बारी पर विनाश लाने का अचूक नुस्खा बनते हैं।
यह मान लेना व्यर्थ है कि आप परमेश्वर के सम्मुख अपने क्षमा और ग्रहण किए जाने के विषय में निश्चित और आश्वस्त अनुभव करेंगे, जब तक आप सब बातों के विषय में परमेश्वर की सब आज्ञाओं को ठीक न मानें और हर पाप से, चाहे वह बड़ा हो या छोटा, घृणा न करें। (भजन संहिता 119:128) आपके हृदय की छावनी में आकान जैसा एक भी पाप टिका रहा तो वह आपके हाथों को निर्बल कर देगा और आपकी सान्त्वना को धूल में मिला देगा। यदि आपको आत्मा की गवाही काटनी है, तो आपको प्रतिदिन आत्मा के लिए बोना होगा। आप यह न पाएँगे और न अनुभव करेंगे कि प्रभु के सब मार्ग मनोहर हैं, जब तक आप अपने सब मार्गों में प्रभु को प्रसन्न करने का प्रयत्न न करें।*
मैं परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ कि हमारा उद्धार किसी भी रीति से हमारे अपने कर्मों पर निर्भर नहीं है। हम अनुग्रह से उद्धार पाए हैं,—धार्मिकता के कामों से नहीं,—विश्वास के द्वारा,—व्यवस्था के कामों के बिना। परन्तु मैं नहीं चाहूँगा कि कोई भी विश्वासी एक क्षण के लिए भी यह भूले कि हमारे उद्धार की अनुभूति बहुत कुछ हमारे जीने के ढंग पर निर्भर करती है। असंगति हमारी आँखों को धुँधला कर देगी और हमारे और सूर्य के बीच बादल ले आएगी। बादलों के पीछे सूर्य वैसा ही रहता है, परन्तु आप उसकी चमक को देख न सकेंगे और न उसकी गर्मी का आनन्द ले सकेंगे, और आपकी आत्मा उदास और ठण्डी रहेगी। भले कामों के मार्ग में ही निश्चयता का भोर आपसे भेंट करेगा और आपके हृदय पर प्रकाश बरसाएगा।
दाऊद कहता है, "यहोवा का भेद उसी को बताया जाता है जो उससे डरता है, और वह अपनी वाचा उन्हें समझा देता है।" (भजन संहिता 25:14)
"जो अपना चाल-चलन सीधा रखता है उसको मैं परमेश्वर का किया हुआ उद्धार दिखाऊँगा।" (भजन संहिता 50:23)
"तेरी व्यवस्था से प्रीति रखनेवालों को बड़ी शान्ति होती है; और उनको कुछ ठोकर नहीं लग सकती।" (भजन संहिता 119:165)
"यदि हम ज्योति में चलें, जैसा वह ज्योति में है, तो एक दूसरे से सहभागिता रखते हैं।" (1 यूहन्ना 1:7)
"हम वचन और जीभ ही से नहीं, पर काम और सत्य के द्वारा भी प्रेम करें। इसी से हम जानेंगे कि हम सत्य के हैं, और जिस बात में हमारा मन हमें दोष देगा, उसके विषय में हम उसके सामने अपने मन को आश्वस्त कर सकेंगे।" (1 यूहन्ना 3:18, 19)
"यदि हम उसकी आज्ञाओं को मानें, तो इसी से हम जानते हैं कि हम उसे जान गए हैं।" (1 यूहन्ना 2:3)
पौलुस ऐसा मनुष्य था जो परमेश्वर और मनुष्यों के सम्मुख सदा निर्दोष विवेक रखने का प्रयत्न करता था। (प्रेरितों के काम 24:16) वह साहस के साथ कह सका, "मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैंने विश्वास की रखवाली की है।" इसलिए मुझे आश्चर्य नहीं कि प्रभु ने उसे पूरे भरोसे के साथ यह भी जोड़ने की सामर्थ्य दी, "भविष्य में मेरे लिए धार्मिकता का वह मुकुट रखा हुआ है, जिसे प्रभु, जो धर्मी न्यायी है, उस दिन मुझे देगा।"
यदि प्रभु यीशु का कोई विश्वासी निश्चयता चाहता है और उसे प्राप्त नहीं है, तो वह इस बात पर भी विचार करे। वह अपने हृदय को देखे, अपने विवेक को देखे, अपने जीवन को देखे, अपने चाल-चलन को देखे, अपने घर को देखे। और सम्भव है कि जब वह यह कर चुके, तो कह सके, "मेरे पास निश्चित आशा न होने का एक कारण है।"
जिन तीन बातों का मैंने अभी उल्लेख किया है, उन्हें मैं इस लेख के हर पाठक के निजी विचार के लिए छोड़ता हूँ। मुझे निश्चय है कि वे जाँचने योग्य हैं। हम उन्हें ईमानदारी से जाँचें। और प्रभु हमें सब बातों में समझ दे।
(1) और अब इस महत्त्वपूर्ण पूछताछ को समाप्त करते हुए, मैं पहले उन पाठकों से कहना चाहता हूँ जिन्होंने अब तक अपने आप को प्रभु को नहीं सौंपा, जो अब तक संसार में से निकलकर नहीं आए, जिन्होंने उत्तम भाग नहीं चुना और मसीह के पीछे नहीं हो लिए।
तब मैं आपसे कहता हूँ कि इस विषय से एक सच्चे मसीही के विशेषाधिकारों और सान्त्वनाओं को सीखिए।
मैं नहीं चाहता कि आप प्रभु यीशु मसीह को उसके लोगों से परखें। सबसे अच्छे सेवक भी उस महिमामय
स्वामी का केवल धुँधला-सा चित्र दे सकते हैं। और न मैं चाहता हूँ कि आप उसके राज्य के विशेषाधिकारों को उस सान्त्वना के माप से आँकें जिस तक उसके बहुत से लोग पहुँचते हैं। हाय, हम में से अधिकांश दीन प्राणी हैं! हम उस धन्यता से कम, बहुत कम, रह जाते हैं जिसका हम आनन्द ले सकते थे। परन्तु विश्वास रखिए, हमारे परमेश्वर के नगर में महिमामय वस्तुएँ हैं, जिनका स्वाद निश्चित आशा रखनेवाले इसी जीवन में चखते हैं। वहाँ शान्ति और सान्त्वना की ऐसी लम्बाइयाँ और चौड़ाइयाँ हैं जिनकी कल्पना भी आपके मन में नहीं आई। हमारे पिता के घर में रोटी बहुतायत से है, यहाँ तक कि बच भी जाती है, यद्यपि हम में से बहुत से निश्चय ही उसमें से थोड़ा ही खाते हैं और निर्बल बने रहते हैं। परन्तु इसका दोष हमारे स्वामी पर नहीं लगाना चाहिए: यह सब हमारा अपना ही है।
और अन्त में, परमेश्वर की सबसे निर्बल सन्तान के भीतर भी सान्त्वना की एक ऐसी खान है जिसके विषय में तू कुछ नहीं जानता। तू उसके हृदय की ऊपरी सतह के संघर्ष और हलचल को देखता है, परन्तु उन बहुमूल्य मोतियों को नहीं देखता जो नीचे गहराई में छिपे हैं। मसीह का सबसे दुर्बल अंग भी तेरे साथ अपनी दशा नहीं बदलेगा। वह विश्वासी जिसे सबसे कम निश्चयता प्राप्त है, वह भी तुझसे कहीं अधिक अच्छी दशा में है। उसके पास आशा है, चाहे वह कितनी ही क्षीण क्यों न हो, परन्तु तेरे पास तो बिलकुल नहीं है। उसका एक ऐसा भाग है जो उससे कभी छीना नहीं जाएगा, एक ऐसा उद्धारकर्ता है जो उसे कभी नहीं त्यागेगा, एक ऐसा धन है जो कभी नष्ट नहीं होता, चाहे वह इस समय इन सब बातों को कितना ही कम समझता हो। पर तेरे विषय में, यदि तू जैसा है वैसा ही मर गया, तो तेरी सारी आशाएँ नष्ट हो जाएँगी। ओह, कि तू बुद्धिमान होता! ओह, कि तू इन बातों को समझता! ओह, कि तू अपने अन्त का विचार करता!
यदि मैंने कभी किसी के लिए गहरी करुणा अनुभव की है, तो जगत के इन अन्तिम दिनों में मैं तेरे लिए अनुभव करता हूँ। जिनका सारा धन पृथ्वी पर है और जिनकी सारी आशाएँ कब्र के इसी पार हैं, उनके लिए मेरा हृदय गहराई से दुखी होता है। हाँ! जब मैं देखता हूँ कि पुराने राज्य और राजवंश अपनी नींव तक हिल रहे हैं,—जब मैं देखता हूँ, जैसा कि कुछ वर्ष पहले हम सबने देखा, कि राजा और राजकुमार और धनी और बड़े लोग अपने प्राण बचाकर भाग रहे हैं और उन्हें अपना सिर छिपाने का स्थान भी नहीं सूझता,—जब मैं देखता हूँ कि जनता के भरोसे पर टिकी सम्पत्ति वसन्त में बर्फ के समान पिघल रही है, और सार्वजनिक कोष और पूँजी अपना मूल्य खो रही है,—जब मैं ये बातें देखता हूँ, तो मैं उन लोगों के लिए गहरी करुणा अनुभव करता हूँ जिनके पास इस संसार के दिए हुए भाग से अच्छा कोई भाग नहीं, और उस राज्य में कोई स्थान नहीं जो हिलाया नहीं जा सकता।*
आज ही मसीह के एक सेवक की सलाह मान ले। स्थायी धन की खोज कर,—ऐसे धन की जो तुझसे छीना नहीं जा सकता,—उस नगर की जिसकी नींव स्थिर है। वैसा ही कर जैसा प्रेरित पौलुस ने किया। अपने आपको प्रभु यीशु मसीह को सौंप दे, और उस अविनाशी मुकुट को खोज जो वह देने को तैयार है। उसका जूआ अपने ऊपर उठा ले और उससे सीख। उस संसार से निकल आ जो तुझे कभी सचमुच तृप्त नहीं करेगा, और उस पाप से जो, यदि तू उससे लिपटा रहा, तो अन्त में सर्प के समान डसेगा। दीन पापियों के रूप में प्रभु यीशु के पास आ, और वह तुझे ग्रहण करेगा, क्षमा करेगा, अपनी नया करनेवाली आत्मा देगा, और तुझे शान्ति से भर देगा। यह तुझे संसार की अपेक्षा कहीं अधिक सच्ची सान्त्वना देगा। तेरे हृदय में एक गहरी खाई है जिसे मसीह की शान्ति के सिवा कुछ नहीं भर सकता। भीतर आ और हमारे विशेषाधिकारों में सहभागी हो। हमारे साथ चल, और हमारे पास आकर बैठ।
(2) अन्त में, मुझे इन पृष्ठों को पढ़नेवाले सब विश्वासियों की ओर मुड़कर उनसे भाईचारे की सलाह के कुछ शब्द कहने दें।
मुख्य बात जो मैं तुमसे आग्रहपूर्वक कहता हूँ वह यह है,—यदि तुम्हें मसीह में अपने ग्रहण किए जाने की निश्चित आशा प्राप्त नहीं है, तो आज ही ठान लो कि उसे खोजोगे। उसके लिए परिश्रम करो। उसके पीछे प्रयत्न करो। उसके लिए प्रार्थना करो। जब तक तुम "जान न लो कि तुमने किस पर विश्वास किया है," प्रभु को चैन न लेने दो।
मैं सचमुच अनुभव करता हूँ कि इस समय जो लोग परमेश्वर की सन्तान गिने जाते हैं, उनमें निश्चयता का इतना कम होना लज्जा और निन्दा की बात है। पुराना ट्रेल कहता है, "यह बहुत शोक की बात है कि बहुत से मसीही, मसीह के अपने अनुग्रह से उन्हें बुलाने के बाद बीस या चालीस वर्ष तक जीवित रहे, फिर भी अपने जीवन में सन्देह करते रहे।" आओ, हम उस उत्कट "अभिलाषा" को स्मरण करें जो पौलुस ने प्रकट की कि इब्रानियों में से "प्रत्येक" पूर्ण निश्चयता की खोज करे; और परमेश्वर की आशीष से इस निन्दा को दूर करने का प्रयत्न करें। (इब्रानियों 6:11।)
विश्वासी पाठक, क्या तू सचमुच कहना चाहता है कि तुझे आशा के स्थान पर भरोसा, भरोसे के स्थान पर दृढ़ प्रतीति, और अनिश्चितता के स्थान पर ज्ञान पाने की कोई इच्छा नहीं? क्योंकि निर्बल विश्वास तुझे बचा लेगा, क्या इसलिए तू उसी में सन्तुष्ट रहेगा? क्योंकि निश्चयता तेरे स्वर्ग में प्रवेश के लिए अनिवार्य नहीं है, क्या इसलिए तू पृथ्वी पर उसके बिना सन्तुष्ट रहेगा? हाय, यह आत्मा की स्वस्थ दशा नहीं है; यह प्रेरितों के दिनों की मनोदशा नहीं है! अभी उठ और आगे बढ़। धर्म की नींव ही पर मत अटका रह: सिद्धता की ओर बढ़ता चल। छोटी बातों के दिन से सन्तुष्ट मत हो। दूसरों में उसे कभी तुच्छ मत जान, परन्तु अपने लिए उसमें कभी सन्तुष्ट मत रह।
मेरा विश्वास कर, मेरा विश्वास कर, निश्चयता खोजने योग्य है। जब तू उसके बिना सन्तुष्ट रहता है तो अपनी ही दयाओं को छोड़ देता है। जो बातें मैं कहता हूँ वे तेरी शान्ति के लिए हैं। यदि सांसारिक बातों में निश्चित होना अच्छा है, तो स्वर्गीय बातों में निश्चित होना कितना अधिक अच्छा है! तेरा उद्धार एक स्थिर और निश्चित बात है। परमेश्वर इसे जानता है। तू भी इसे जानने की खोज क्यों न करे? इसमें कुछ भी पवित्रशास्त्र के विरुद्ध नहीं है। पौलुस ने कभी जीवन की पुस्तक नहीं देखी, फिर भी पौलुस कहता है, "मैं जानता हूँ और मुझे निश्चय है।"
इसलिए इसे अपनी प्रतिदिन की प्रार्थना बना कि तेरा विश्वास बढ़े। जैसा तेरा विश्वास होगा वैसी ही तेरी शान्ति होगी। उस धन्य जड़ को और अधिक सींच, और देर-सबेर, परमेश्वर की आशीष से, तू फूल की आशा कर सकता है। हो सकता है कि तू पूर्ण निश्चयता को एकाएक प्राप्त न करे। कभी-कभी प्रतीक्षा करते रहना अच्छा होता है: जो वस्तुएँ हमें बिना परिश्रम मिल जाती हैं उनका हम मूल्य नहीं समझते। परन्तु यदि उसमें देर लगे, तो भी उसकी बाट जोह। खोजता रह, और पाने की आशा रख।
तथापि एक बात है जिससे मैं नहीं चाहता कि तू अनजान रहे: —निश्चयता प्राप्त कर लेने के बाद भी यदि कभी-कभी तुझे सन्देह हों, तो चकित न होना। यह न भूल कि तू पृथ्वी पर है, अभी स्वर्ग में नहीं। तू अब भी देह में है, और तुझमें बसा हुआ पाप है: शरीर अन्त तक आत्मा के विरुद्ध अभिलाषा करता रहेगा। कोढ़ पुराने घर की दीवारों से तब तक न जाएगा जब तक मृत्यु उस घर को गिरा न दे। और एक शैतान भी है, और बलवन्त शैतान: वह शैतान जिसने प्रभु यीशु की परीक्षा की और पतरस को गिराया; और वह इस बात का ध्यान रखेगा कि तू इसे जान ले। कुछ सन्देह सदा रहेंगे। जो कभी सन्देह नहीं करता उसके पास खोने को कुछ नहीं। जो कभी नहीं डरता उसके पास कुछ सचमुच मूल्यवान नहीं है। जो कभी ईर्ष्यालु नहीं होता वह गहरे प्रेम को कम जानता है। परन्तु निराश न हो: जिसने तुझसे प्रेम किया उसके द्वारा तू जयवन्त से भी बढ़कर होगा।*
अन्त में, यह न भूल कि निश्चयता ऐसी वस्तु है जो कुछ समय के लिए खोई जा सकती है, उज्ज्वलतम मसीहियों के द्वारा भी, यदि वे सावधान न रहें।
निश्चयता एक अत्यन्त नाज़ुक पौधा है। इसे प्रतिदिन, प्रतिघण्टे देखभाल, सींचने, सँभालने और सहेजने की आवश्यकता होती है। इसलिए जब यह तुम्हें मिल जाए तब और भी अधिक जागते और प्रार्थना करते रहो। जैसा रदरफ़ोर्ड कहता है, "निश्चयता की बहुत क़द्र करो।" सदा चौकस रहो। जब 'पिलग्रिम्स प्रोग्रेस' में मसीही कुंज में सो गया, तो उसने अपना प्रमाणपत्र खो दिया। इसे स्मरण रखो।
दाऊद अपराध में गिरने के कारण कई महीनों तक निश्चयता खो बैठा। पतरस ने अपने प्रभु का इनकार किया तो उसने उसे खो दिया। दोनों ने उसे निस्सन्देह फिर पाया, परन्तु कड़े आँसुओं के बाद ही। आत्मिक अन्धकार घोड़े पर चढ़कर आता है और पैदल जाता है। वह हमें पता चलने से पहले ही हम पर आ पड़ता है। वह धीरे-धीरे, क्रमशः और बहुत दिनों के बाद ही हमें छोड़ता है। ढलान पर दौड़ना आसान है; चढ़ाई पर चढ़ना कठिन परिश्रम है। इसलिए मेरी चेतावनी स्मरण रखो—जब तुम्हें प्रभु का आनन्द मिले, तब जागते और प्रार्थना करते रहो।
सबसे बढ़कर, आत्मा को शोकित न करो। आत्मा को बुझाओ मत। आत्मा को खिझाओ मत। छोटी-छोटी बुरी आदतों और छोटे-छोटे पापों से खिलवाड़ करके उसे दूर मत भगाओ। पति-पत्नी के बीच की छोटी-छोटी खटपट घरों को दुःखी बना देती है, और छोटी-छोटी असंगतियाँ, जो जानी-बूझी और सही जाएँ, तुम्हारे और आत्मा के बीच अजनबीपन ले आएँगी।
सारी बात का निचोड़ सुनो।
जो मनुष्य मसीह में परमेश्वर के साथ सबसे निकटता से चलता है, वह प्रायः सबसे अधिक शान्ति में रखा जाएगा।
जो विश्वासी प्रभु के पीछे सबसे पूरे मन से चलता है और पवित्रता की सबसे ऊँची श्रेणी का लक्ष्य रखता है, वह सामान्यतः सबसे निश्चित आशा का आनन्द उठाएगा और अपने उद्धार के विषय में उसे सबसे स्पष्ट प्रतीति होगी।
टिप्पणी
अंग्रेज़ धर्मविज्ञानियों से उद्धरण, जो दिखाते हैं कि विश्वास और निश्चयता में भेद है—कि एक विश्वासी धर्मी ठहराया जाकर परमेश्वर के यहाँ ग्रहणयोग्य हो सकता है, फिर भी अपनी सुरक्षा का सुखदायक ज्ञान और प्रतीति न पा सके—और कि मसीह में सबसे निर्बल विश्वास भी, यदि वह सच्चा है, मनुष्य को उतने ही निश्चय से बचाएगा जितना सबसे सबल विश्वास।
(1) "परमेश्वर की दया संसार के सब पापों से बड़ी है। परन्तु हम कभी-कभी ऐसी दशा में होते हैं कि समझते हैं हममें विश्वास है ही नहीं; या यदि है भी तो बहुत ही दुर्बल और क्षीण। इसलिए ये दो बातें हैं: विश्वास रखना, और विश्वास की अनुभूति रखना। क्योंकि कुछ लोग विश्वास की अनुभूति पाने की बड़ी इच्छा रखते हैं, पर उसे पा नहीं सकते; तौभी उन्हें निराश नहीं होना चाहिए, परन्तु परमेश्वर को पुकारते हुए आगे बढ़ते रहें, और अन्त में वह आ जाएगी: परमेश्वर उनके हृदय खोलेगा, और उन्हें अपनी भलाई का अनुभव कराएगा।"—बिशप लैटिमर के उपदेश। 1552।
(2) "निर्बल विश्वास मसीह के लाभों को अपने ऊपर लागू करने, अर्थात् उन्हें ग्रहण करने और अपना बनाने में चूक सकता है। यह साधारण अनुभव में देखा जाता है। क्योंकि बहुत-से लोग दीन और पश्चातापी हृदय के होते हैं, आत्मा और सच्चाई से परमेश्वर की सेवा करते हैं, फिर भी बड़े सन्देहों और डाँवाडोल अवस्था के बिना यह नहीं कह पाते कि मैं जानता हूँ और मुझे पूरा निश्चय है कि मेरे पाप क्षमा हो गए हैं। तो क्या हम कहें कि ऐसे सब लोग विश्वास से रहित हैं? परमेश्वर न करे।"
"यह निर्बल विश्वास भी परमेश्वर की दयामय प्रतिज्ञाओं को पाप की क्षमा के लिए उतने ही सचमुच ग्रहण करता है जितना सबल विश्वास, यद्यपि उतनी दृढ़ता से नहीं। जैसे लकवे से ग्रस्त हाथ वाला मनुष्य भी राजा के हाथ से दान लेने के लिए अपना हाथ उतना ही बढ़ा सकता है जितना स्वस्थ हाथ वाला, चाहे उतनी दृढ़ता और स्थिरता से न बढ़ा सके।"—विलियम पर्किन्स द्वारा 'विश्वास-सूत्र की व्याख्या', जो कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में मसीह का सेवक था। 1612।
(3) "हमारे उद्धार की यह निश्चयता, जिसकी चर्चा पौलुस करता है, पतरस दोहराता है, और दाऊद ने जिसका उल्लेख किया है (भजन संहिता 4:7), विश्वास का वह विशेष फल है जो आत्मिक आनन्द और भीतरी शान्ति उत्पन्न करता है, जो सारी समझ से परे है। यह सच है कि परमेश्वर की सब सन्तानों में यह नहीं होती। वृक्ष एक बात है और वृक्ष का फल दूसरी: विश्वास एक बात है और विश्वास का फल दूसरी। और परमेश्वर के चुने हुओं का वह बचा हुआ भाग, जो इस विश्वास की घटी अनुभव करता है, तौभी विश्वास रखता है।"—रिचर्ड ग्रीनहम के उपदेश, जो परमेश्वर के वचन का सेवक और प्रचारक था। 1612।
(4) "कुछ लोग सोचते हैं कि उनमें विश्वास है ही नहीं, क्योंकि उन्हें पूरी निश्चयता नहीं। फिर भी जो सबसे सुन्दर आग हो सकती है उसमें भी कुछ धुआँ होगा।"—'कुचला हुआ सरकण्डा', रिचर्ड सिब्ब्स द्वारा, जो कैथरीन हॉल, कैम्ब्रिज का मास्टर और लन्दन के ग्रेज़ इन का प्रचारक था। 1630।
(5) "विश्वास का कार्य मसीह को आत्मा पर लागू करना है; और यह सबसे निर्बल विश्वास भी उतना ही कर सकता है जितना सबसे सबल, यदि वह सच्चा हो। बच्चा भी लाठी को उतने ही अच्छे से पकड़ सकता है, यद्यपि मनुष्य जितनी दृढ़ता से नहीं। बन्दी छेद में से सूर्य को देखता है, यद्यपि उतना पूर्ण रीति से नहीं जितना खुली हवा में रहने वाले। जिन्होंने पीतल के साँप को देखा, चाहे बहुत दूर से, तौभी चंगे हो गए।"
"सबसे छोटा विश्वास भी विश्वासी की आत्मा के लिए उतना ही बहुमूल्य है जितना पतरस या पौलुस का विश्वास स्वयं उनके लिए था; क्योंकि वह मसीह को थाम लेता है और अनन्त उद्धार लाता है।"—दूसरी सामान्य पत्री की व्याख्या,
पतरस की, रेवरेण्ड थॉमस एडम्स द्वारा, जो लन्दन के सेंट ग्रेगरी का रेक्टर था। 1633।
(6) "निर्बल विश्वास सच्चा विश्वास है,—उतना ही बहुमूल्य, यद्यपि सबल विश्वास के बराबर बड़ा नहीं: वही पवित्र आत्मा उसका कर्ता, वही सुसमाचार उसका साधन।"
"यदि वह कभी बड़ा न भी हो, तौभी निर्बल विश्वास बचाएगा; क्योंकि वह हमें मसीह में हिस्सेदार बनाता है, और उसे तथा उसके सब लाभों को हमारा बना देता है। क्योंकि हमें हमारे विश्वास की प्रबलता नहीं बचाती, परन्तु हमारे विश्वास की सच्चाई,—और हमारे विश्वास की निर्बलता नहीं, परन्तु विश्वास का अभाव दोषी ठहराता है; क्योंकि सबसे छोटा विश्वास भी मसीह को थाम लेता है, और इस प्रकार हमें बचाएगा। न ही हम अपने विश्वास की योग्यता या मात्रा से बचाए जाते हैं, परन्तु मसीह से, जिसे निर्बल विश्वास भी सबल विश्वास के समान थामता है। जैसे निर्बल हाथ भी, जो भोजन को मुँह तक पहुँचा सके, शरीर को उतना ही पोषण और पुष्टि देगा जितना सबल हाथ; क्योंकि शरीर हाथ की शक्ति से नहीं, परन्तु भोजन की उत्तमता से पोषित होता है।"—'विश्वास का सिद्धान्त', जॉन रोजर्स द्वारा, जो एसेक्स के डेडहम में परमेश्वर के वचन का प्रचारक था। 1634।
(7) "किसी वस्तु का निश्चय से होना एक बात है, और यह जानना कि वह मेरे पास निश्चय से है, दूसरी बात। हम बहुत-सी ऐसी वस्तुएँ ढूँढ़ते हैं जो हमारे हाथों में हैं, और हमारे पास बहुत-सी ऐसी वस्तुएँ हैं जिन्हें हम खोई हुई समझते हैं। इसी प्रकार जिस विश्वासी का विश्वास निश्चित है, वह भी सदा यह नहीं जानता कि वह ऐसा विश्वास करता है। उद्धार के लिए विश्वास आवश्यक है: परन्तु यह पूर्ण निश्चयता कि मैं विश्वास करता हूँ, उतनी आवश्यक नहीं।"—विश्वास पर बॉल। 1637।
(8) "एक निर्बल विश्वास भी होता है, जो फिर भी सच्चा है; और यद्यपि वह निर्बल है, तौभी इसलिए कि वह सच्चा है, मसीह के द्वारा ठुकराया नहीं जाएगा।"
"विश्वास आरम्भ ही से सिद्ध नहीं बनाया जाता, जैसा आदम था; परन्तु वह प्रकृति के सामान्य क्रम में एक मनुष्य के समान है, जो पहले शिशु, फिर बालक, फिर किशोर और तब पुरुष होता है।"
"कुछ लोग सब निर्बल जनों को सर्वथा ठुकरा देते हैं, और विश्वास की हर निर्बलता पर कपट का दोष लगाते हैं। निश्चय ही ऐसे लोग या तो अभिमानी हैं या निर्दयी।"
"कुछ लोग निर्बलों को यह कहकर शान्ति और स्थिरता देते हैं, 'शान्त रह। तुझ में विश्वास और अनुग्रह पर्याप्त है, और तू काफी भला है: तुझे और कुछ नहीं चाहिए, और न तुझे अत्यन्त धर्मी बनना चाहिए।' (सभोपदेशक 7:16।) ये कोमल तो हैं, पर सुरक्षित गद्दे नहीं: ये चापलूस खुशामदी हैं, विश्वासयोग्य मित्र नहीं।"
"कुछ लोग शान्ति देते और समझाते हैं, यह कहकर, 'ढाढ़स बाँध: जिसने तुझ में भला काम आरम्भ किया है वही उसे पूरा भी करेगा; इसलिए प्रार्थना कर कि उसका अनुग्रह तुझ में बढ़ता जाए; हाँ, बैठा मत रह, पर आगे बढ़, और प्रभु के मार्ग में चलता जा।' (इब्रानियों 6:1।) अब यही सबसे सुरक्षित और उत्तम मार्ग है।"—प्रश्न, टिप्पणियाँ आदि, सन्त मत्ती के अनुसार सुसमाचार पर, रिचर्ड वार्ड द्वारा, जो कभी कैम्ब्रिज के विद्यार्थी और लन्दन में सुसमाचार के प्रचारक थे। 1640।
(9) "मनुष्य परमेश्वर के अनुग्रह-पात्र हो सकता है, अनुग्रह की दशा में हो सकता है, परमेश्वर के सामने धर्मी ठहराया गया हो सकता है, और फिर भी अपने उद्धार की, और मसीह में परमेश्वर की कृपा की, अनुभव में आनेवाली निश्चयता से रहित हो सकता है।"
"मनुष्य में उद्धार करनेवाला अनुग्रह हो सकता है, और वह स्वयं उसे न जाने; मनुष्य में सच्चा धर्मी ठहरानेवाला विश्वास हो सकता है, और उसे उसका ऐसा प्रयोग और प्रभाव प्राप्त न हो कि परमेश्वर के साथ अपने मेल-मिलाप की सुखद निश्चयता उसमें उत्पन्न हो। वरन् मैं और भी कहूँगा: मनुष्य अनुग्रह की दशा में हो सकता है, और उसमें सच्चा धर्मी ठहरानेवाला विश्वास हो सकता है, और फिर भी वह अपने भीतर उसकी अनुभव में आनेवाली निश्चयता से इतना दूर हो सकता है कि अपनी ही समझ और अनुभूति में उसे उलटी ही निश्चयता जान पड़े। अय्यूब निश्चय ही इसी दशा में था जब उसने परमेश्वर से दुहाई दी, 'तू क्यों अपना मुँह फेर लेता है, और मुझे अपना शत्रु गिनता है?' (अय्यूब 13:24।)"
"सबसे निर्बल विश्वास भी धर्मी ठहराएगा। यदि तू सबसे निर्बल विश्वास से भी मसीह को ग्रहण करके उस पर भरोसा रख सके, तो वह तेरे लिए पर्याप्त होगा। चौकस रह कि तू यह न समझे कि तेरे विश्वास का बल तुझे धर्मी ठहराता है। नहीं, नहीं: यह मसीह और उसकी सिद्ध धार्मिकता है, जिसे तेरा विश्वास ग्रहण करता और जिस पर भरोसा रखता है, वही यह करती है। जिसका हाथ सबसे दुर्बल और क्षीण है, वह भी भिक्षा ले सकता और अपने घाव पर अचूक मरहम लगा सकता है, ठीक वैसे ही जैसे जिसका हाथ सबसे बलवान है, और उससे उतना ही लाभ भी पा सकता है।"—भजन संहिता 51 पर व्याख्यान, ऐशबाई-डे-ला-ज़ूच में दिए गए, आर्थर हिल्डरशम द्वारा, जो यीशु मसीह के सेवक थे। 1642।
(10) "चाहे तुम्हारा अनुग्रह कितना ही निर्बल क्यों न हो, फिर भी यदि तुम में अनुग्रह की सच्चाई है, तो तुम्हारे धर्मी ठहराए जाने के लिए मसीह की धार्मिकता में तुम्हारा उतना ही बड़ा भाग है जितना बलवान मसीही का। तुम्हें भी मसीह उतना ही गिना गया है जितना किसी और को।"—विलियम ब्रिज के उपदेश, जो पहले एमानुएल कॉलेज, कैम्ब्रिज के फेलो और ग्रेट यारमाउथ में मसीह की कलीसिया के पासबान थे। 1648।
(11) "कुछ लोग सच्चे विश्वासी हैं, फिर भी विश्वास में निर्बल हैं। वे मसीह और मुफ़्त अनुग्रह को सचमुच ग्रहण करते हैं, परन्तु काँपते हाथ से; उनमें, जैसा धर्मविज्ञानी कहते हैं, चिपके रहने का विश्वास है; वे मसीह से अपने ही जानकर लिपटे रहेंगे। परन्तु उनमें प्रमाण का विश्वास नहीं है; वे अपने आप को उसके नहीं देख पाते। वे विश्वासी हैं, पर अल्प-विश्वासी; वे आशा रखते हैं कि मसीह उन्हें त्याग नहीं देगा, पर निश्चित नहीं हैं कि वह उन्हें अपना लेगा।"—मधुर बूँदें, या निर्बल विश्वासियों के लिए शान्ति, जॉन ड्यूरेंट द्वारा, जो कैन्टरबरी कैथेड्रल के प्रचारक थे। 1649।
(12) "मैं जानता हूँ, तू कहता है, कि यीशु मसीह पापियों का उद्धार करने के लिए जगत में आया; और कि 'जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।' (यूहन्ना 3:15।) और मैं यह भी जानता हूँ कि अपनी पापमय दशा का बोध होने पर मैंने कुछ मात्रा में अपने उद्धारकर्ता पर अपने को डाल दिया है, और उसके सर्वसमर्थ छुटकारे को कुछ थामा है: परन्तु हाय, उसके विषय में मेरी पकड़ इतनी क्षीण है कि वह मेरी आत्मा को कोई ठोस शान्ति नहीं दे सकती!"
"ढाढ़स बाँध, मेरे पुत्र। यदि तू अपने विश्वास के कार्य ही के बल से धर्मी ठहरने और उद्धार पाने की आशा रखता, तो उसकी निर्बलता के बोध से तेरा हताश होना उचित होता; परन्तु अब जबकि इस सुखद कार्य की सामर्थ्य और प्रभाव उस विषय में है जिसे तू थामता है, अर्थात् तेरे परमेश्वर और उद्धारकर्ता की असीम योग्यता और दया में, जो तेरी दुर्बलताओं से घट नहीं सकती, तब तेरे पास अपने आप को ढाढ़स देने और आनन्द से उसके उद्धार की बाट जोहने का कारण है।"
"अपनी दशा को ठीक समझ। यहाँ दोहरा हाथ है जो हमें स्वर्ग की ओर उठाता है। हमारा विश्वास का हाथ हमारे उद्धारकर्ता को थामता है; हमारे उद्धारकर्ता का दया और भरपूर छुटकारे का हाथ हमें थामता है। उसे हमारी पकड़ निर्बल है और सहज में छूट जाती है; हमें उसकी पकड़ दृढ़ और अटल है।"
"यदि कर्म पर बल दिया जाता, तो हाथ का बल आवश्यक होता; परन्तु अब जब केवल एक बहुमूल्य दान को लेने और ग्रहण करने की आवश्यकता है, तो निर्बल हाथ भी वह क्यों न कर सके जो बलवान कर सकता है? बल से भले न सही, पर वैसे ही।"—बिशप हॉल की "गिलाद का बलसान।" 1650।
(13) "मुझे उद्धार विश्वास के बल पर नहीं, पर विश्वास की सच्चाई पर टिका हुआ मिलता है,—विश्वास की सबसे उज्ज्वल मात्रा पर नहीं, पर किसी भी मात्रा पर। यह नहीं कहा गया कि यदि तुम में इतनी मात्रा का विश्वास हो तो तुम धर्मी ठहराए और उद्धार पाओगे; परन्तु केवल विश्वास करना आवश्यक कहा गया है। सच्चे विश्वास की सबसे छोटी मात्रा भी यह कर देगी; जैसा रोमियों 10:9 में है, 'यदि तू अपने मुँह से यीशु को प्रभु जानकर अंगीकार करे और अपने मन से विश्वास करे कि परमेश्वर ने उसे मरे हुओं में से जिलाया, तो तू निश्चय उद्धार पाएगा।' क्रूस पर के चोर ने विश्वास की ऐसी ऊँची मात्रा प्राप्त नहीं की थी: वह एक ही कार्य से, और वह भी निर्बल विश्वास के, धर्मी ठहराया गया और उद्धार पाया। (लूका 23:42।)"—यहेजकेल भविष्यद्वक्ता की व्याख्या, विलियम ग्रीनहिल द्वारा, जो स्टेपनी, लन्दन के रेक्टर और ड्यूक ऑफ़ यॉर्क तथा ग्लॉस्टर के पादरी थे। 1650।
(14) "किसी मनुष्य में सच्चा अनुग्रह हो सकता है, चाहे उसे परमेश्वर के प्रेम और कृपा की, या अपने पापों की क्षमा और अपनी आत्मा के उद्धार की निश्चयता न हो। कोई मनुष्य परमेश्वर का हो सकता है, फिर भी यह न जाने; उसकी दशा अच्छी हो सकती है, फिर भी वह उसे देख न पाए; वह सुरक्षित अवस्था में हो सकता है, जबकि वह चैन की स्थिति में नहीं है। महिमा के दरबार में उसके लिए सब कुछ कुशल हो सकता है, जबकि वह विवेक के दरबार में सब कुछ कुशल देखने के लिए हज़ार संसार भी दे डालता।"
"निश्चयता मसीही के कल्याण के लिए आवश्यक है, परन्तु उसके मसीही होने के लिए नहीं; वह मसीही की सांत्वना के लिए आवश्यक है, परन्तु उसके उद्धार के लिए नहीं; वह अनुग्रह के कल्याण के लिए आवश्यक है, परन्तु अनुग्रह के मात्र होने के लिए नहीं। यद्यपि कोई मनुष्य विश्वास के बिना उद्धार नहीं पा सकता, तथापि वह निश्चयता के बिना उद्धार पा सकता है। परमेश्वर ने पवित्रशास्त्र के अनेक स्थानों में यह प्रकट किया है कि विश्वास के बिना उद्धार नहीं; परन्तु परमेश्वर ने पवित्रशास्त्र के किसी एक स्थान में भी यह प्रकट नहीं किया कि निश्चयता के बिना उद्धार नहीं।"—स्वर्ग पृथ्वी पर (Heaven on Earth), थॉमस ब्रुक्स, सुसमाचार प्रचारक, सेंट मार्गरेट, फिश स्ट्रीट हिल, लंदन। 1654।
(15) "तुम जो अपने मन में यह स्पष्ट कर सकते हो कि तुम में विश्वास है, चाहे वह निर्बल ही हो, हियाव न छोड़ो, व्याकुल न हो। यह सोचो कि विश्वास की छोटी से छोटी मात्रा भी सच्चा विश्वास है, और बड़े से बड़े विश्वास के समान उद्धार करनेवाला विश्वास है। आग की एक चिंगारी भी उतनी ही सच्ची आग है जितनी अग्नि-तत्त्व में कोई भी आग। पानी की एक बूँद भी उतना ही सच्चा पानी है जितना समुद्र में कोई भी पानी। इसी प्रकार विश्वास का छोटे से छोटा कण भी उतना ही सच्चा विश्वास है, और संसार के सबसे बड़े विश्वास के समान उद्धार करनेवाला है।"
"छोटी से छोटी कली भी जड़ से रस खींचती है, जैसे सबसे बड़ी डाली। इसी प्रकार विश्वास की सबसे निर्बल मात्रा भी तुम्हें उतनी ही सचमुच मसीह में कलम लगाती है, और उसके द्वारा मसीह से जीवन खींचती है, जैसे सबसे सबल विश्वास। सबसे निर्बल विश्वास को भी मसीह के पुण्य और लहू की सहभागिता वैसे ही मिलती है जैसे सबसे सबल को।"
"छोटे से छोटा विश्वास भी आत्मा का ब्याह मसीह से कर देता है। सबसे निर्बल विश्वास का भी परमेश्वर के प्रेम में उतना ही भाग है जितना सबसे सबल का। हम मसीह में प्रिय ठहरे हैं, और विश्वास की छोटी से छोटी मात्रा हमें मसीह के अंग बना देती है। छोटे से छोटे विश्वास का भी प्रतिज्ञाओं पर उतना ही अधिकार है जितना सबसे सबल का। इसलिए हमारी आत्माएँ निर्बलता के कारण हियाव न छोड़ें।"—विश्वास का स्वभाव और राजसी अधिकार (Nature and Royalties of Faith), सैमुएल बोल्टन, डी.डी., क्राइस्ट्स कॉलेज, कैम्ब्रिज। 1657।
(16) "कुछ लोग डरते हैं कि उनमें विश्वास है ही नहीं, क्योंकि उनमें विश्वास की सबसे ऊँची मात्रा, अर्थात् पूर्ण निश्चयता, नहीं है, या इसलिए कि उनमें वह सांत्वना नहीं जो औरों को मिलती है, अर्थात् वह आनन्द जो वर्णन से बाहर और महिमा से भरपूर है। परन्तु इस पत्थर को मार्ग से हटाने के लिए हमें स्मरण रखना चाहिए कि विश्वास की कई मात्राएँ होती हैं। सम्भव है कि तुम में विश्वास हो, यद्यपि विश्वास की सबसे ऊँची मात्रा न हो, और इसलिए पवित्र आत्मा में आनन्द न हो। वह तो विश्वास का एक अंग है, स्वयं विश्वास नहीं। जब हम निरन्तर बलवर्धक औषधियों से प्रसन्न रखे जाते हैं, तब यह वास्तव में विश्वास से जीना कम और इन्द्रियों के अनुभव से जीना अधिक है। जब परमेश्वर हमारी आत्मा पर अत्यन्त आनन्द के साथ चमकता है, उसकी अपेक्षा बिना सांत्वना के परमेश्वर के सहारे जीने के लिए अधिक सबल विश्वास चाहिए।"—मैथ्यू लॉरेंस, इप्सविच के प्रचारक, विश्वास पर। 1657।
(17) "यदि विदेश में किसी ने यह सोचा है कि अपने पाप की क्षमा का विशेष और पूर्ण निश्चय विश्वास का सार है, तो वे इसका उत्तर स्वयं दें। हमारे देश के धर्मशास्त्री सामान्यतः दूसरी राय के हैं। बिशप डेवनेन्ट और बिशप प्रिडो, तथा अन्य लोगों ने भरोसा रखने और निश्चयता के बीच के बड़े भेद को दिखाया है, और वे सब निश्चयता को विश्वास की पुत्री, फल और परिणाम गिनते और कहते हैं। और स्वर्गीय विद्वान एरोस्मिथ हमें बताता है कि परमेश्वर विश्वासियों को निश्चयता प्रायः तब तक नहीं देता जब तक वे अनुग्रह में बढ़ न जाएँ; क्योंकि वह कहता है कि भरोसे के विश्वास और निश्चयता के विश्वास में वही अन्तर है जो बुद्धि और विद्या में है। बुद्धि विद्या की नींव है; अतः जैसे बुद्धि के न होने पर (जैसा पशुओं में) विद्या नहीं हो सकती, वैसे ही जहाँ चिपके रहने का विश्वास नहीं वहाँ निश्चयता नहीं हो सकती। फिर: जैसे कला और विज्ञान के अध्ययन में भली-भाँति प्रयुक्त बुद्धि विद्या तक पहुँचती है, वैसे ही अपने उचित विषय पर और अपने उचित फलों के द्वारा भली-भाँति प्रयुक्त विश्वास निश्चयता तक पहुँचता है। और, जैसे असावधानी, ध्यान न देने या किसी प्रचण्ड रोग से विद्या जाती रह सकती है जबकि बुद्धि बनी रहती है, वैसे ही परीक्षा या आत्मिक आलस्य से निश्चयता जाती रह सकती है जबकि उद्धार करनेवाला विश्वास बना रह सकता है। अन्त में, जैसे सब मनुष्यों में बुद्धि है परन्तु सब विद्वान नहीं, वैसे ही सब नया जन्म पाए हुए लोगों में उद्धार के सुसमाचारीय मार्ग को उद्धार के लिए मानने का विश्वास है, परन्तु सब सच्चे विश्वासियों में निश्चयता नहीं।"—आर. फेयरक्लॉ का उपदेश, इम्मानुएल कॉलेज, कैम्ब्रिज के फेलो, मॉर्निंग एक्सरसाइज़ेज़ में, साउथवार्क में प्रचारित। 1660।
(18) "हमें विश्वास की निर्बलता और विश्वास के अभाव में भेद करना चाहिए। निर्बल विश्वास भी सच्चा है। कुचला हुआ सरकण्डा निर्बल तो है, फिर भी ऐसा है जिसे मसीह न तोड़ेगा। यद्यपि तुम्हारा विश्वास निर्बल ही हो, तथापि हियाव न छोड़ो। निर्बल विश्वास भी सबल मसीह को ग्रहण कर सकता है; निर्बल हाथ भी ब्याह की गाँठ वैसे ही बाँध सकता है जैसे सबल; निर्बल आँख भी पीतल के साँप को देख सकती थी। प्रतिज्ञा सबल विश्वास से नहीं, सच्चे विश्वास से की गई है। प्रतिज्ञा यह नहीं कहती, कि जिसमें पहाड़ों को हटा देनेवाला, सिंहों के मुँह बन्द कर देनेवाला दानवी विश्वास हो उसका उद्धार होगा; परन्तु जो कोई विश्वास करता है, चाहे उसका विश्वास कितना ही छोटा हो।"
"पवित्रीकरण में तुम पर पवित्र आत्मा का जल उँडेला जा सकता है, चाहे निश्चयता में आनन्द का तेल न हो; चिपके रहने का विश्वास हो सकता है, प्रमाण का विश्वास न हो; जड़ में जीवन हो सकता है जबकि डालियों में फल नहीं, और मन में विश्वास हो सकता है जबकि निश्चयता का कोई फल नहीं।"—ए बॉडी ऑफ डिविनिटी (A Body of Divinity), थॉमस वॉटसन, पूर्व में सेंट स्टीफन्स, वॉलब्रुक, लंदन के सेवक। 1660।
(19) "परमेश्वर की अनेक प्रिय सन्तानें बहुत समय तक अपनी वर्तमान और अनन्त दशा के विषय में अत्यन्त सन्देह में पड़ी रह सकती हैं, और नहीं जानतीं कि क्या निष्कर्ष निकालें, कि वे दण्डित होंगी या उनका उद्धार होगा। परमेश्वर की कलीसिया में विश्वासी अलग-अलग बढ़ती के होते हैं—पिता, जवान, बच्चे और नन्हे शिशु; और जैसे अधिकतर परिवारों में बड़े मनुष्यों से अधिक शिशु और बच्चे होते हैं, वैसे ही परमेश्वर की कलीसिया में पूर्ण निश्चयता तक बढ़े हुए दृढ़ मसीहियों से अधिक निर्बल, सन्देह करनेवाले मसीही होते हैं। शिशु का जन्म हो सकता है और उसे इसका पता न हो; इसी प्रकार मनुष्य का नया जन्म हो सकता है और उसे इसका निश्चय न हो।"
"हम उद्धार देनेवाले विश्वास को, जैसा वह अपने आप में है, और हृदय के पूर्ण भरोसे को, दो अलग बातें मानते हैं। जिनका उद्धार होना है, उनमें से कुछ को शायद यह निश्चय न हो कि उनका उद्धार होगा; क्योंकि प्रतिज्ञा विश्वास के अनुग्रह से की गई है, उसके प्रमाण से नहीं—सच्चे विश्वास से की गई है, प्रबल विश्वास से नहीं। वे स्वर्ग के विषय में निश्चित हो सकते हैं, फिर भी अपनी समझ में स्वर्ग के विषय में निश्चयता न रखते हों।"—रेव. थॉमस डूलिटल का उपदेश, जो पेम्ब्रोक हॉल, कैम्ब्रिज के थे और कुछ समय सेंट अल्फेज, लन्दन के रेक्टर रहे; क्रिप्पलगेट के प्रातःकालीन सम्मेलनों (Morning Exercises) में। 1661।
(20) "क्या धर्मी ठहराए जाने के लिए यह निश्चय होना आवश्यक है कि मेरे पाप क्षमा हो गए हैं और मैं धर्मी ठहराया गया हूँ? नहीं: जहाँ तक विश्वास धर्मी ठहराता है, यह विश्वास का कार्य नहीं है, परन्तु धर्मी ठहराए जाने के बाद आनेवाला प्रभाव और फल है।"
"एक बात यह है कि मनुष्य का उद्धार निश्चित हो, और दूसरी बात यह है कि उसे यह निश्चय हो कि वह निश्चित है।"
"जैसे कोई मनुष्य नदी में गिर पड़े और डूबने पर हो, और बाढ़ में बहते-बहते उसे नदी के ऊपर झुकी हुई किसी वृक्ष की डाल दिखाई दे, जिसे वह पकड़ लेता है और बचने के लिए अपनी पूरी शक्ति से उससे लिपट जाता है, और सहायता का कोई और उपाय न देखकर अपना प्राण उसी पर छोड़ देता है। जैसे ही उसने उस डाल को पकड़ा, वह सुरक्षित दशा में है, यद्यपि सब संकट, भय और आतंक अभी उसके मन से दूर नहीं हुए हैं, जब तक कि वह होश में आकर स्वयं को पूरी तरह खतरे से बाहर न देख ले। तब वह निश्चित है कि वह सुरक्षित है; परन्तु वह निश्चित होने से पहले ही सुरक्षित था। विश्वासी की दशा भी ऐसी ही है। विश्वास केवल मसीह को उद्धार का एकमात्र उपाय देख लेना है, और हृदय का उसे थामने के लिए बढ़ना है। परमेश्वर ने वचन कहा है और अपने पुत्र से प्रतिज्ञा की है: मैं उसे एकमात्र उद्धारकर्ता मानता हूँ, और अपनी आत्मा को उसी के हाथ सौंपता हूँ कि उसकी मध्यस्थता से उसका उद्धार हो। जैसे ही आत्मा यह कर लेती है, परमेश्वर अपने पुत्र की धार्मिकता उसके लेखे में गिन देता है, और वह स्वर्ग की अदालत में वास्तव में धर्मी ठहराई जाती है, यद्यपि विवेक की अदालत में वह तुरन्त शान्त और सन्तुष्ट नहीं होती। वह बाद में होता है: किसी में जल्दी, किसी में देर से, धर्मी ठहराए जाने के फलों और प्रभावों से।"—आर्चबिशप अशर की "बॉडी ऑफ डिवीनिटी" (Body of Divinity)। 1670।
(21) "कुछ लोग इसलिए सन्देह करते हैं कि वे सन्देह करते हैं, और अविश्वास पर अविश्वास बढ़ाते जाते हैं, और यह निष्कर्ष निकालते हैं कि उनमें विश्वास नहीं है, क्योंकि वे अपने भीतर इतना अधिक और बार-बार सन्देह पाते हैं। परन्तु यह बड़ी भूल है। जहाँ बहुत विश्वास हो, वहाँ भी कुछ सन्देह हो सकते हैं; और जहाँ बहुत सन्देह हो, वहाँ भी थोड़ा विश्वास हो सकता है।"
"हमारा उद्धारकर्ता अपने ऊपर दृढ़ और स्थिर विश्वास की माँग करता है और उससे प्रसन्न होता है, तौभी जो सबसे छोटा और निर्बल है उसे वह अस्वीकार नहीं करता।"—आर्चबिशप लेटन के व्याख्यान, सन्त मत्ती के सुसमाचार के पहले नौ अध्यायों पर। 1670।
(22) "पहले के बहुत लोगों ने, और वे भी जो अत्यन्त प्रसिद्ध और उच्च पद के थे, सच्चे विश्वास को निश्चयता से कम नहीं माना, अर्थात् अपने पापों की क्षमा, अपने जनों की स्वीकृति और अपने भावी उद्धार का दृढ़ भरोसा।"
"परन्तु यह बात, जहाँ एक ओर हज़ारों सन्देह करनेवाली और त्यागी हुई आत्माओं के लिए अत्यन्त दुःखद और असान्त्वनादायक है, क्योंकि जो निश्चयता तक नहीं पहुँचे वे सब अनुग्रह से वंचित ठहरते हैं, वहीं इसने पोप के अनुयायियों को बहुत बड़ा अवसर दे दिया है।"
"विश्वास निश्चयता नहीं है। परन्तु निश्चयता कभी-कभी प्रबल, सशक्त और वीर विश्वास का मुकुट और प्रतिफल होती है; परमेश्वर की आत्मा प्रमाण देनेवाली ज्योति के साथ आत्मा पर उतर आती है, और वह सारा अन्धकार तथा वे भय और सन्देह दूर कर देती है जो पहले उस पर छाए हुए थे।"—"बिशप हॉपकिन्स, वाचाओं पर।" 1680।
(23) "निश्चयता का अभाव अविश्वास नहीं है। मुरझाई हुई आत्माएँ भी विश्वासी हो सकती हैं। मसीह पर विश्वास और उस विश्वास की सान्त्वना के बीच, अनन्त जीवन के लिए विश्वास करने और यह जानने के बीच कि हमें अनन्त जीवन मिला है, स्पष्ट भेद किया गया है। इसमें और इसमें अन्तर है कि पुत्र का किसी सम्पत्ति पर अधिकार हो, और वह अपने अधिकार को पूरी तरह जानता भी हो।"
"विश्वास का स्वरूप हृदय पर ऐसे लिखा जा सकता है जैसे मुहर पर अक्षर खुदे हों, फिर भी वह इतनी धूल से भर गया हो कि अक्षर पहचाने न जाएँ। धूल अक्षरों को पढ़ने में बाधा डालती है, परन्तु उन्हें मिटाती नहीं।"—स्टीफन चार्नॉक के प्रवचन, जो इम्मानुएल कॉलेज, कैम्ब्रिज के थे। 1680।
(24) "कुछ लोग उद्धार देनेवाले विश्वास को पूर्ण निश्चयता में रखकर अपनी ही सान्त्वना छीन लेते हैं। विश्वास, और विश्वास का बोध, दो अलग और पृथक् किए जा सकनेवाले अनुग्रह हैं; तुम सचमुच मसीह को ग्रहण कर चुके हो सकते हो और फिर भी उसका ज्ञान या निश्चयता न पाई हो। कुछ ऐसे हैं जो कहते हैं, 'तू हमारा परमेश्वर है,' जिनके विषय में परमेश्वर ने कभी नहीं कहा कि तुम मेरे लोग हो; उन्हें परमेश्वर की सन्तान कहलाने का कोई अधिकार नहीं: और कुछ ऐसे हैं जिनके विषय में परमेश्वर कहता है, 'ये मेरे लोग हैं,' फिर भी वे परमेश्वर को 'अपना परमेश्वर' कहने का साहस नहीं करते; उन्हें परमेश्वर की सन्तान कहलाने का अधिकार है, फिर भी वे इसे नहीं जानते। उन्होंने मसीह को ग्रहण किया है, यही उनकी सुरक्षा है; परन्तु उन्होंने अभी उसका ज्ञान और निश्चयता नहीं पाई, यही उनका कष्ट है … पिता पालने में पड़े अपने बच्चे को अपना मानता है, परन्तु बच्चा उसे अपना पिता नहीं जानता।"—"मेथड ऑफ ग्रेस" (Method of Grace), जॉन फ्लैवल, डार्टमाउथ, डेवन में सुसमाचार के सेवक। 1680।
(25) "यह स्वीकार किया जाता है कि निर्बल विश्वास को भी मसीह के द्वारा परमेश्वर के साथ उतनी ही शान्ति है जितनी दूसरे को प्रबल विश्वास से, परन्तु उतनी हार्दिक शान्ति नहीं।"
"निर्बल विश्वास भी मसीही को स्वर्ग में उतना ही निश्चित रूप से पहुँचाएगा जितना सबल विश्वास, क्योंकि यह असम्भव है कि सच्चे अनुग्रह का छोटे-से-छोटा अंश भी नष्ट हो, क्योंकि वह सब अविनाशी बीज है; परन्तु निर्बल और सन्देह करनेवाले मसीही की वहाँ की यात्रा उतनी सुखद नहीं होती जितनी सबल विश्वासवाले की होती है। यद्यपि जहाज़ के सब यात्री सुरक्षित किनारे पर पहुँच जाते हैं, तथापि जो सारे मार्ग समुद्र-रोग से पीड़ित रहा, उसकी यात्रा उसके समान आनन्ददायक नहीं होती जो बलवन्त और स्वस्थ है।"—दी क्रिश्चियन इन कम्प्लीट आर्मर, विलियम गर्नल द्वारा, जो कभी लावेनहम, सफ़ोक के रेक्टर थे। 1680।
(26) "यदि अब तक आप पर यह प्रकट नहीं होता कि पिता ने आपको पुत्र को दिया है, तो हताश न हों। हो सकता है कि ऐसा हो, चाहे आप उसे न देख पाएँ। जो दिए गए हैं उनमें से बहुत-से लोग बहुत समय तक यह नहीं जानते; वरन् मुझे यह कहने में कोई बड़ा खतरा नहीं दिखता कि पुत्र को दिए हुए लोगों में से कुछ अन्तिम और सबसे उज्ज्वल दिन के प्रकट होने तक, और अन्तिम निर्णय की घोषणा होने तक, इस विषय में अंधकार, सन्देहों और भय में पड़े रहें।"
"इसलिए यदि आप में से कोई अपने चुने जाने के विषय में अंधकार में हो, तो हताश न हो: हो सकता है कि ऐसा हो, चाहे आप उसे न जानते हों।"—प्रभु की प्रार्थना पर उपदेश, रॉबर्ट ट्रेल द्वारा, जो लन्दन में सुसमाचार के सेवक थे और कभी क्रैनब्रुक, केंट में रहे। 1690।
(27) "निश्चयता विश्वास के अस्तित्व के लिए अनिवार्य नहीं है। यह सबल विश्वास है; परन्तु हम निर्बल विश्वास, थोड़े विश्वास और राई के दाने के समान विश्वास के विषय में भी पढ़ते हैं। यीशु मसीह में सच्चा उद्धार देनेवाला विश्वास केवल अपनी भिन्न-भिन्न मात्राओं से पहचाना जा सकता है; परन्तु हर मात्रा में और हर व्यक्ति में वह सर्वत्र एक ही प्रकार का होता है।"—उपदेश, आदरणीय
जॉन न्यूटन द्वारा, जो कभी ओल्नी के विकर और सेंट मेरी, वूलनॉथ, लन्दन के रेक्टर थे। 1767।
(28) "निर्बल विश्वासियों के लिए अपने विरुद्ध निष्कर्ष निकालने का कोई कारण नहीं है। निर्बल विश्वास भी सबल विश्वास के समान मसीह से सचमुच जोड़ता है,—जैसे दाखलता की छोटी-से-छोटी कली भी जड़ से रस और जीवन उसी प्रकार खींचती है जैसे सबसे सबल डाली। इसलिए निर्बल विश्वासियों के पास धन्यवाद करने के लिए बहुत कारण हैं; और अनुग्रह में बढ़ने की लालसा रखते हुए उन्हें उसकी अनदेखी नहीं करनी चाहिए जो उन्हें पहले ही मिल चुका है।"—आदरणीय हेनरी वेन का पत्र। 1784।
(29) "हमारे उद्धार के लिए आवश्यक और पर्याप्त विश्वास निश्चयता नहीं है। निःसन्देह इसकी प्रवृत्ति परमेश्वर की कृपा की उस जीवित आशा को उत्पन्न करना है जो पूर्ण भरोसे में परिणत होगी। परन्तु वह भरोसा स्वयं वह विश्वास नहीं है जिसकी हम चर्चा कर रहे हैं, और न वह अनिवार्य रूप से उसमें समाया हुआ है: वरन् वह एक बिलकुल भिन्न वस्तु है।
"निश्चयता सामान्यतः विश्वास की उच्च मात्रा के साथ होती है। परन्तु ऐसे सच्चे जन भी हैं जिन्हें अनुग्रह की केवल थोड़ी मात्रा मिली है, या जिनमें उस अनुग्रह के प्रयोग में बहुत बाधा आ सकती है। जब ऐसी कमियाँ या बाधाएँ प्रबल हों, तो बहुत-से भय और क्लेश उत्पन्न होने की आशा की जा सकती है।"—दी क्रिश्चियन सिस्टम, आदरणीय थॉमस रॉबिन्सन द्वारा, जो सेंट मेरी, लीसेस्टर के विकर थे। 1795।
(30) "उद्धार और उद्धार का आनन्द सदा एक साथ नहीं होते; वर्तमान अनुभव में बाद वाला सदा पहले वाले के साथ नहीं होता।"
"एक रोगी व्यक्ति स्वस्थ होने की प्रक्रिया में हो सकता है, फिर भी अपने स्वास्थ्य के लौटने के विषय में सन्देह में हो। पीड़ा और दुर्बलता उसे संकोच में डाल सकती है। एक बालक अपनी सम्पत्ति या राज्य का उत्तराधिकारी हो सकता है, फिर भी अपने भावी भाग की आशा से कोई आनन्द न पाए। वह अपनी वंशावली का पता न लगा सके, या अपने स्वत्व-पत्र और अपने पिता की वसीयत को न पढ़ सके; या पढ़ने की क्षमता रखते हुए भी उनका आशय न समझ सके, और उसका संरक्षक कुछ समय के लिए उसे अज्ञान में रहने देना उचित समझे। परन्तु उसका अज्ञान उसके अधिकार की वैधता को प्रभावित नहीं करता।"
"उद्धार की व्यक्तिगत निश्चयता का विश्वास से अनिवार्य सम्बन्ध नहीं है। वे अनिवार्य रूप से एक ही नहीं हैं। प्रत्येक विश्वासी वास्तव में अपने हृदय में उत्पन्न प्रभाव से अपनी सुरक्षा और अपने विशेषाधिकारों का अनुमान लगा सकता है; परन्तु बहुत-से जो सचमुच विश्वास करते हैं, धार्मिकता के वचन में अकुशल होते हैं, और पवित्रशास्त्र की आधार-बातों से वह निष्कर्ष निकालने में चूक जाते हैं जो निकालना उनके लिए उचित होता।"—भजन संहिता 51 पर व्याख्यान, आदरणीय थॉमस बिडल्फ़ द्वारा, जो सेंट जेम्स, ब्रिस्टल के सेवक थे। 1830।
VIII. मूसा: एक उदाहरण
"विश्वास ही से मूसा ने सयाना होकर फ़िरौन की बेटी का पुत्र कहलाने से इन्कार किया।"
"और पाप में थोड़े दिन के सुख भोगने से परमेश्वर के लोगों के साथ दुःख भोगना अधिक पसन्द किया।"
"और मसीह के कारण निन्दित होने को मिस्र के भण्डार से बड़ा धन समझा, क्योंकि उसकी आँखें फल पाने की ओर लगी थीं।"—इब्रानियों 11:24–26
परमेश्वर के सबसे प्रतिष्ठित सन्तों के चरित्र, जैसे वे बाइबल में चित्रित और वर्णित हैं, पवित्रशास्त्र का अत्यन्त उपयोगी भाग हैं। अमूर्त सिद्धान्त, मूल-तत्त्व और आज्ञाएँ अपनी रीति से सब बहुत मूल्यवान हैं; परन्तु अन्ततः आदर्श या उदाहरण से अधिक सहायक कुछ नहीं। क्या हम जानना चाहते हैं कि व्यावहारिक पवित्रता क्या है? आइए हम बैठकर किसी अत्यन्त पवित्र पुरुष के चित्र का अध्ययन करें। इस लेख में मैं अपने पाठकों के सामने एक ऐसे पुरुष का इतिहास रखना चाहता हूँ जो विश्वास से जिया, और हमारे लिए इस बात का आदर्श छोड़ गया कि विश्वास चरित्र की पवित्रता को बढ़ाने में क्या कर सकता है। जो कोई जानना चाहता है कि "विश्वास से जीना" क्या है, उसके लिए मैं मूसा को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करता हूँ।
इब्रानियों की पत्री का ग्यारहवाँ अध्याय, जिससे मेरा पाठ लिया गया है, एक महान अध्याय है: वह सोने के अक्षरों में छापे जाने के योग्य है। मैं भली-भाँति मान सकता हूँ कि मन फिराए हुए यहूदी के लिए वह अत्यन्त उत्साहवर्धक और ढाढ़स देनेवाला रहा होगा। मैं समझता हूँ कि आदि कलीसिया के किसी भी सदस्य को मसीही धर्म को अंगीकार करने में उतनी कठिनाई नहीं हुई जितनी इब्रानियों को हुई। मार्ग सबके लिए सकरा था, परन्तु उनके लिए विशेष रूप से। क्रूस सबके लिए भारी था, परन्तु उन्हें तो निश्चय ही दुगुना बोझ उठाना पड़ा। और यह अध्याय उन्हें औषधि के समान तरोताज़ा करता होगा,—यह उनके लिए "उदास मनवालों के लिए दाखमधु" के समान था। उसके शब्द "मधु के छत्ते के समान मनभावने, प्राण को मीठे और हड्डियों को निरोग करनेवाले" रहे होंगे। (नीति. 31:6; 16:24।)
जिन तीन पदों की मैं व्याख्या करने जा रहा हूँ वे इस अध्याय के सबसे कम रोचक पदों में से नहीं हैं। वरन् मुझे लगता है कि हमारे ध्यान पर इतना सशक्त दावा बहुत कम पदों का है, यदि किसी का है भी। और मैं बताऊँगा कि मैं ऐसा क्यों कहता हूँ।
मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि मूसा की कथा में वर्णित विश्वास का कार्य विशेष रूप से हमारे अपने विषय में सीधा लागू होता है। इस अध्याय के पहले भाग में जिन परमेश्वर के जनों के नाम आए हैं, वे निःसन्देह सब हमारे लिए आदर्श हैं। परन्तु उनमें से अधिकांश ने जो कुछ किया, उसे हम अक्षरशः नहीं कर सकते, चाहे हम उनकी आत्मा को कितना ही ग्रहण क्यों न करें। हमें हाबिल के समान अक्षरशः बलिदान चढ़ाने, या नूह के समान अक्षरशः जहाज़ बनाने, या अब्राहम के समान अक्षरशः अपना देश छोड़कर तम्बुओं में रहने और अपना इसहाक चढ़ाने के लिए नहीं बुलाया गया है। परन्तु मूसा का विश्वास हमारे अधिक निकट आता है। वह हमारे अपने अनुभव से अधिक परिचित रीति से कार्य करता प्रतीत होता है। उसी ने उसे ऐसा आचरण अपनाने के लिए प्रेरित किया जैसा आज के दिनों में हमें भी, यदि हम सच्चे मसीही बनकर रहना चाहें, अपने-अपने जीवन-क्षेत्र में कभी-कभी अपनाना पड़ता है। और इसी कारण मैं समझता हूँ कि ये तीन पद साधारण से अधिक ध्यान के योग्य हैं।
अब इनके विषय में मुझे केवल सीधी-सादी बातें ही कहनी हैं। मैं केवल यह दिखाने का प्रयत्न करूँगा कि मूसा ने जो कार्य किए वे कितने महान थे, और उसने उन्हें किस सिद्धान्त पर किया। तब शायद हम उस व्यावहारिक शिक्षा के लिए अधिक तैयार होंगे जो ये पद हर उस व्यक्ति के सामने रखते प्रतीत होते हैं जो उसे ग्रहण करना चाहे।
I. पहले, मैं इस विषय में कहूँगा कि मूसा ने क्या त्यागा और किसे अस्वीकार किया
मूसा ने अपनी आत्मा के हित के लिए तीन वस्तुएँ त्याग दीं। उसने अनुभव किया कि यदि वह उन्हें रखेगा तो उसकी आत्मा का उद्धार न होगा; इसलिए उसने उन्हें त्याग दिया। और ऐसा करके, मैं कहता हूँ कि उसने वे तीन सबसे बड़े बलिदान किए जो मनुष्य का हृदय कभी कर सकता है। आइए देखें।
(1) उसने पद और बड़ाई को त्याग दिया।
"उसने फ़िरौन की बेटी का पुत्र कहलाने से इनकार किया।" उसका इतिहास हम सब जानते हैं। फ़िरौन की बेटी ने उसकी शैशवावस्था में उसके प्राण बचाए थे। वह इससे भी आगे बढ़ी: उसने उसे गोद लिया और अपने ही पुत्र के समान उसे शिक्षा दी।
यदि इतिहास के कुछ लेखकों पर भरोसा किया जा सके, तो वह फ़िरौन की इकलौती सन्तान थी। कुछ तो यहाँ तक कहते हैं कि सामान्य क्रम में मूसा किसी दिन मिस्र का राजा बनता!* यह हो भी सकता है और नहीं भी; हम नहीं कह सकते। हमारे लिए इतना जान लेना पर्याप्त है कि फ़िरौन की बेटी से अपने सम्बन्ध के कारण मूसा, यदि चाहता, तो बहुत बड़ा मनुष्य बन सकता था। यदि वह मिस्र के राजदरबार में अपनी उस स्थिति से सन्तुष्ट रहता, तो वह सहज ही मिस्र देश में प्रथम पंक्ति के लोगों में (यदि सबसे पहला नहीं तो) गिना जा सकता था।
आइए, क्षण भर विचार करें कि यह परीक्षा कितनी बड़ी थी।
यहाँ एक ऐसा मनुष्य था जो हमारे ही समान भावनाओं वाला था। उसे वह सब बड़ाई मिल सकती थी जो पृथ्वी दे सकती है। पद, सामर्थ्य, स्थान, मान, पदवियाँ, प्रतिष्ठा—सब उसके सामने थे और उसकी पहुँच में थे। ये वे वस्तुएँ हैं जिनके लिए बहुत से लोग निरन्तर संघर्ष करते रहते हैं। ये वे पुरस्कार हैं जिन्हें पाने के लिए हमारे चारों ओर के संसार में अनवरत दौड़ लगी रहती है। कुछ होना, लोगों की दृष्टि में ऊँचा समझा जाना, समाज की सीढ़ी पर चढ़ना, अपने नाम के साथ कोई उपाधि जुड़वाना—इन्हीं बातों के लिए बहुत से लोग समय, विचार, स्वास्थ्य और प्राण तक निछावर कर देते हैं। परन्तु मूसा ने इन्हें उपहार में पाकर भी न लिया। उसने इनकी ओर पीठ फेर ली। उसने इन्हें अस्वीकार कर दिया। उसने इन्हें त्याग दिया!
(2) और इससे बढ़कर, उसने सुख-विलास को अस्वीकार किया।
सब प्रकार का सुख, निःसन्देह, उसके चरणों में था, यदि वह उसे लेना चाहता—इन्द्रिय-सुख, बौद्धिक सुख, सामाजिक सुख—जो कुछ भी उसकी कल्पना को भाए। मिस्र कलाकारों का देश था, विद्वानों का निवास था, और हर प्रकार की निपुणता या विद्या वाले लोगों का आश्रय-स्थल था। "शरीर की अभिलाषा, आँखों की अभिलाषा और जीविका का घमण्ड" जिस किसी बात को तृप्त कर सकते हैं, मूसा के स्थान पर कोई भी उसे सहज ही पा सकता और अपना बना सकता था। (1 यूहन्ना 2:16।)
आइए, फिर विचार करें कि यह परीक्षा भी कितनी बड़ी थी।
स्मरण रहे कि सुख वह एक वस्तु है जिसके लिए करोड़ों लोग जीते हैं। सच्चे सुख के विषय में शायद उनके विचार भिन्न-भिन्न हों, परन्तु सब इस बात में सहमत हैं कि सबसे पहले और सबसे बढ़कर उसे पाना है। छुट्टियों में आनन्द मनाना वह बड़ा लक्ष्य है जिसकी ओर स्कूल का बालक आँख लगाए रहता है। अपने को स्वतन्त्र बना लेने की सन्तुष्टि वह निशाना है जिस पर व्यापार में लगा युवक दृष्टि टिकाए रहता है। धन-सम्पत्ति के साथ व्यापार से अवकाश लेकर चैन से रहना वह उद्देश्य है जो व्यापारी अपने सामने रखता है। अपने घर में शारीरिक सुख-सुविधा पाना निर्धन की सारी इच्छाओं का सार है। राजनीति में, यात्रा में, मनोरंजन में, संगति में, पुस्तकों में नया रोमांच पाना—यही वह लक्ष्य है जिसकी ओर धनवान खिंचा चला जाता है। सुख वह छाया है जिसका पीछा सब करते हैं—ऊँचे और नीचे, धनी और निर्धन, बूढ़े और जवान, सब के सब—हर कोई, शायद, अपने पड़ोसी को उसे खोजने के लिए तुच्छ समझने का ढोंग करता हुआ—हर कोई अपने-अपने ढंग से उसे अपने लिए खोजता हुआ—हर कोई मन ही मन चकित कि वह उसे क्यों नहीं पाता—हर कोई दृढ़ता से मानता हुआ कि कहीं न कहीं वह अवश्य मिलेगा। यही वह कटोरा था जो मूसा के होंठों के सामने था। वह सांसारिक सुख का जितना चाहता उतना गहरा पान कर सकता था; परन्तु उसने उसे नहीं चाहा। उसने उसकी ओर पीठ फेर ली। उसने उसे अस्वीकार कर दिया। उसने उसे त्याग दिया!
(3) और इससे बढ़कर, उसने धन को अस्वीकार किया।
"मिस्र के भण्डार" यह कथन असीम सम्पत्ति की ओर संकेत करता प्रतीत होता है, जिसका भोग मूसा कर सकता था, यदि वह फ़िरौन की बेटी के पास रहने से सन्तुष्ट होता। हम भली-भाँति मान सकते हैं कि ये "भण्डार" एक विशाल कोष रहे होंगे। मिस्र में आज भी इतना शेष है कि वहाँ के राजा के अधिकार में जो धन था उसका कुछ धुँधला-सा अनुमान हो सके। पिरामिड, स्तम्भ, मन्दिर और मूर्तियाँ आज भी वहाँ साक्षी बनकर खड़े हैं। कर्नाक, लक्सर, डेन्डेरा और अनेक अन्य स्थानों के खण्डहर आज भी संसार की सबसे विशाल इमारतें हैं। वे आज तक इस बात की गवाही देते हैं कि जिस मनुष्य ने मिस्र के धन को त्याग दिया, उसने कुछ ऐसा त्यागा जिसका हिसाब लगाना और आकलन करना हम अंग्रेज़ों के मन के लिए भी कठिन होता।
आइए, एक बार फिर विचार करें कि यह परीक्षा कितनी बड़ी थी।
आइए, क्षण भर के लिए धन की शक्ति पर विचार करें—उस अपार प्रभाव पर जो "धन के लोभ" का मनुष्यों के मन पर होता है। आइए, अपने चारों ओर देखें कि लोग उसकी कैसी लालसा करते हैं, और उसे पाने के लिए कितना अद्भुत परिश्रम और कष्ट उठाते हैं। उन्हें हज़ारों मील दूर किसी द्वीप के बारे में बताइए, जहाँ कोई ऐसी वस्तु मिलती है जो मँगवाने पर लाभदायक हो सकती है, और तुरन्त उसे लाने के लिए जहाज़ों का बेड़ा भेज दिया जाएगा। उन्हें अपने धन से एक प्रतिशत अधिक कमाने का उपाय दिखाइए, और वे आपको सबसे बुद्धिमान लोगों में गिनेंगे—वे लगभग आपके सामने गिरकर आपकी पूजा ही करने लगेंगे। धन का स्वामी होना मानो दोषों को छिपा देता है, अपराधों पर पर्दा डाल देता है, और मनुष्य को गुणों का वस्त्र पहना देता है। यदि आप धनी हैं तो लोग बहुत-सी बातों की अनदेखी कर जाते हैं! परन्तु यहाँ एक ऐसा मनुष्य है जो धनी हो सकता था, और नहीं हुआ। उसने मिस्र के भण्डारों को स्वीकार नहीं किया। उसने उनकी ओर पीठ फेर ली। उसने उन्हें ठुकरा दिया। उसने उन्हें त्याग दिया!
मूसा ने ऐसी वस्तुओं को ठुकराया—पद, सुख-विलास और धन, तीनों को एक साथ।
इस सब में यह भी जोड़ लीजिए कि उसने यह सब सोच-समझकर किया। उसने इन वस्तुओं को जवानी के किसी क्षणिक जोश में नहीं ठुकराया—वह चालीस वर्ष का था। वह जीवन के पूर्ण यौवन में था। वह जानता था कि वह क्या कर रहा है। वह एक उच्च शिक्षा प्राप्त मनुष्य था, "मिस्रियों की सारी विद्या में पारंगत।" (प्रेरितों के काम 7:22।) वह प्रश्न के दोनों पक्षों को तौल सकता था।
इसमें यह भी जोड़ लीजिए कि उसने इन्हें इसलिए नहीं ठुकराया कि वह विवश था। वह उस मरते हुए मनुष्य के समान नहीं था जो हमसे कहता है कि "अब इस संसार में उसे कुछ नहीं चाहिए"; और क्यों?—क्योंकि वह संसार को छोड़ रहा है, और उसे रख नहीं सकता। वह उस कंगाल के समान नहीं था जो अपनी लाचारी को ही गुण बना लेता है और कहता है कि "उसे धन की चाह नहीं"; और क्यों?—क्योंकि वह उसे पा नहीं सकता। वह उस बूढ़े के समान नहीं था जो डींग मारता है कि "उसने सांसारिक सुखों को त्याग दिया है"; और क्यों?—क्योंकि वह थक चुका है, और उनका आनन्द नहीं ले सकता। नहीं! मूसा ने उसे ठुकराया जिसका वह आनन्द ले सकता था। पद, सुख-विलास और धन ने उसे नहीं छोड़ा, परन्तु उसने उन्हें छोड़ा।
और तब आप ही निर्णय कीजिए कि क्या मेरा यह कहना ठीक नहीं कि उसका बलिदान मरणहार मनुष्य द्वारा किए गए सबसे बड़े बलिदानों में से एक था। औरों ने भी बहुत कुछ त्यागा है, परन्तु मेरे विचार में किसी ने इतना नहीं त्यागा जितना मूसा ने। औरों ने आत्म-बलिदान और आत्म-त्याग में अच्छा किया है, परन्तु वह उन सब से बढ़कर है।
II. और अब मैं उस दूसरी बात पर आता हूँ जिस पर मैं विचार करना चाहता हूँ। मैं इस पर बोलूँगा कि मूसा ने क्या चुना।
मैं समझता हूँ कि उसका चुनाव उसके ठुकराने के समान ही अद्भुत था। उसने अपनी आत्मा के हित के लिए तीन वस्तुएँ चुनीं। उद्धार का मार्ग उन्हीं में से होकर जाता था, और वह उस पर चला; और ऐसा करते हुए उसने वे तीन वस्तुएँ चुनीं जिन्हें अपनाने के लिए मनुष्य सबसे कम तैयार रहता है।
(1) एक तो उसने दुःख और क्लेश को चुना।
उसने फ़िरौन के दरबार का सुख-चैन छोड़ दिया, और खुलकर इस्राएल की सन्तान का पक्ष लिया। वे एक दास बनाई हुई और सताई हुई जाति थे—अविश्वास, सन्देह और घृणा के पात्र; और जो कोई उनका मित्र बनता, उसे उस कड़वे कटोरे का कुछ स्वाद अवश्य चखना पड़ता जिसे वे प्रतिदिन पी रहे थे।
सांसारिक दृष्टि को ऐसा कोई अवसर दिखाई न देता था कि लम्बे और अनिश्चित संघर्ष के बिना वे मिस्र की दासता से छुड़ाए जाएँगे। उनके लिए कोई बसा-बसाया घर और देश मिलना, चाहे कितना ही चाहा जाए, ऐसी वस्तु प्रतीत होता था जिसके मिलने की सम्भावना नहीं। वास्तव में, यदि कभी कोई मनुष्य आँखें खोलकर पीड़ा, परीक्षाएँ, निर्धनता, अभाव, संकट, चिन्ता, और सम्भवतः मृत्यु तक को चुनता दिखाई दिया, तो वह मूसा था।
आइए विचार करें कि यह चुनाव कितना अद्भुत था।
शरीर और लहू स्वभाव से ही पीड़ा से दूर भागते हैं। यह हम सब में है। हम मानो सहज बुद्धि से दुःख से पीछे हट जाते हैं, और यदि हो सके तो उससे बचते हैं। यदि हमारे सामने कर्म के दो मार्ग रखे जाएँ जो दोनों उचित दिखाई दें, तो हम प्रायः वही लेते हैं जो शरीर और लहू को सबसे कम अप्रिय लगे। जब हमें लगता है कि क्लेश निकट आ रहा है, तो हम भय और चिन्ता में दिन बिताते हैं, और उससे बचने के हर उपाय करते हैं। और जब वह आ ही जाता है, तो हम प्रायः उसके बोझ तले कुढ़ते और बड़बड़ाते हैं; और यदि हम उसे धैर्य से सह भी लें तो उसे बहुत बड़ी बात मानते हैं।
परन्तु यहाँ देखिए! यहाँ हमारे ही समान भावनाओं वाला एक मनुष्य है, और वह सचमुच क्लेश को चुनता है! मूसा ने देखा कि यदि वह फ़िरौन के दरबार को छोड़ता है तो उसके सामने दुःख का कटोरा है, और उसने उसे चुना, उसे अधिक पसन्द किया, और उसे उठा लिया।
(2) परन्तु उसने इससे भी अधिक किया, उसने एक तुच्छ जानी गई जाति की संगति को चुना।
उसने बड़े और बुद्धिमान लोगों की संगति को छोड़ दिया, जिनके बीच उसका पालन-पोषण हुआ था, और अपने आप को इस्राएल की सन्तान से जोड़ लिया। वह जो बचपन से पद, धन और ऐश्वर्य के बीच रहा था, अपनी ऊँची दशा से उतर आया, और उसने निर्धन लोगों के साथ अपना भाग डाला—दासों, बंधुआ मज़दूरों, हेलोटों, अछूतों, बंधुआ सेवकों, पीड़ितों, कंगालों, दुखियों, सताए हुओं के साथ—ईंट के भट्ठे के मज़दूरों के साथ।
एक बार फिर, यह चुनाव कितना अद्भुत था!
साधारणतः हम समझते हैं कि अपनी ही कठिनाइयों को उठा लेना काफ़ी है। हम उन दूसरों के लिए खेद कर सकते हैं जिनका भाग्य नीच और तुच्छ समझा जाना है—हम उनकी सहायता करने का प्रयत्न भी कर सकते हैं—हम उन्हें उठाने के लिए धन दे सकते हैं—हम जिन पर वे निर्भर हैं उनसे उनके लिए कह सकते हैं; परन्तु यहीं आकर हम प्रायः रुक जाते हैं।
परन्तु यहाँ एक ऐसा मनुष्य है जो इससे कहीं अधिक करता है। वह तुच्छ जाने गए इस्राएल के लिए केवल सहानुभूति ही नहीं रखता, वरन् सचमुच उनके पास नीचे उतर जाता है, अपने आप को उनके समाज में जोड़ देता है, और पूरी तरह उनके साथ रहने लगता है। यदि ग्रोसवेनर या बेलग्रेव स्क्वायर का कोई बड़ा आदमी भलाई करने के लिए अपना घर, धन-सम्पत्ति और समाज में अपना स्थान छोड़कर बेथनल ग्रीन की किसी तंग गली में थोड़े-से भत्ते पर रहने चला जाए, तो आप चकित रह जाएँगे। फिर भी इससे मूसा के किए हुए कार्य की बहुत ही धुँधली और फीकी-सी धारणा मिलती है। उसने एक तुच्छ जानी गई जाति को देखा, और देश के सबसे कुलीन लोगों की संगति की अपेक्षा उनकी संगति को चुना। वह उनके साथ एक हो गया—उनका साथी, क्लेश में उनका सहभागी, उनका सहयोगी, उनका संगी, और उनका मित्र।
(3) परन्तु उसने इससे भी बढ़कर किया। उसने निन्दा और तिरस्कार को चुना।
कौन कल्पना कर सकता है कि फ़िरौन के दरबार से मुड़कर इस्राएल से मिल जाने में मूसा को उपहास और हँसी की कैसी बाढ़ का सामना करना पड़ा होगा? लोग उससे कहते कि वह पागल है, मूर्ख है, निर्बल है, बुद्धिहीन है, उसकी मति मारी गई है। वह अपना प्रभाव खो देता; जिन लोगों के बीच वह रहा था उन सब की कृपा और अच्छी राय से वह हाथ धो बैठता। परन्तु इनमें से किसी भी बात ने उसे डिगाया नहीं। उसने दरबार छोड़ा और दासों से जा मिला!
आइए फिर विचार करें कि यह कैसा चुनाव था!
उपहास और तिरस्कार से अधिक सामर्थी वस्तुएँ बहुत कम हैं। यह खुले बैर और सताव से कहीं अधिक कर सकता है। कितने ही मनुष्य जो तोप के मुँह तक चले जाते, या निराशाजनक आक्रमण का नेतृत्व करते, या दीवार की दरार पर धावा बोल देते, कुछ साथियों की हँसी का सामना करना असम्भव पाते हैं, और उससे बचने के लिए कर्त्तव्य के मार्ग से पीछे हट जाते हैं। हँसी का पात्र बनना! मज़ाक बन जाना! ठट्ठों और तानों का निशाना होना! निर्बल और मूर्ख गिना जाना! मूर्ख समझा जाना!—इन सब में कोई बड़ाई नहीं है, और हाय, बहुत-से लोग इसे सहने का मन नहीं बना पाते!
फिर भी यहाँ एक मनुष्य है जिसने इसके लिए अपना मन बना लिया, और इस परीक्षा से पीछे नहीं हटा। मूसा ने अपने सामने निन्दा और तिरस्कार को देखा, और उन्हीं को चुन लिया, और उन्हीं को अपना भाग मान लिया।
इस प्रकार मूसा ने ये बातें चुनीं: क्लेश,—एक तुच्छ ठहराई हुई जाति की संगति,—और तिरस्कार।
इसके साथ यह भी स्मरण रखें कि मूसा कोई निर्बल, अज्ञानी, अनपढ़ मनुष्य नहीं था, जो न जानता हो कि वह क्या कर रहा है। तुम्हें विशेष रूप से बताया गया है कि वह "बातों और कामों में सामर्थी" था; फिर भी उसने ऐसा ही चुना! (प्रेरितों के काम 7:22।)
उसके चुनाव की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखें। उसे ऐसा चुनने के लिए विवश नहीं किया गया था। किसी ने उसे ऐसे मार्ग पर चलने को बाध्य नहीं किया। जो बातें उसने अपनाईं, वे उसकी इच्छा के विरुद्ध उस पर थोपी नहीं गईं। वही उनके पीछे गया; वे उसके पीछे नहीं आईं। जो कुछ उसने किया, अपनी स्वतंत्र इच्छा से किया,—स्वेच्छा से, अपनी ही ओर से।
और तब स्वयं विचार करें कि क्या यह सच नहीं कि उसके चुनाव उसके इनकारों के समान ही आश्चर्यजनक थे। मेरा विचार है कि जब से संसार बना है, किसी ने कभी ऐसा चुनाव नहीं किया जैसा हमारे पाठ में मूसा ने किया।
III. अब मैं तीसरी बात की ओर बढ़ता हूँ:—मुझे उस सिद्धान्त की चर्चा करने दें जिसने मूसा को प्रेरित किया, और जिसके कारण उसने वैसा किया जैसा उसने किया।
उसके इस आचरण की व्याख्या कैसे हो? इसका क्या सम्भव कारण दिया जा सकता है? जिसे साधारणतः अच्छा कहा जाता है उसे ठुकराना, और जिसे सामान्यतः बुरा माना जाता है उसे चुनना—यह मांस और लहू का मार्ग नहीं है। यह मनुष्य का स्वभाव नहीं है; इसके लिए कोई व्याख्या चाहिए। वह व्याख्या क्या होगी?
इसका उत्तर हमारे पाठ में है। मैं नहीं जानता कि इसकी महानता अधिक सराहनीय है या इसकी सरलता। यह सब एक छोटे-से शब्द में है, और वह शब्द है "विश्वास"।
मूसा में विश्वास था। विश्वास ही उसके अद्भुत आचरण का मुख्य स्रोत था। विश्वास ने ही उससे वैसा करवाया जैसा उसने किया, उसे वही चुनने दिया जो उसने चुना, और वही ठुकराने दिया जो उसने ठुकराया। उसने यह सब इसलिए किया कि उसने विश्वास किया।
परमेश्वर ने उसके मन की आँखों के सामने अपनी इच्छा और अपना उद्देश्य रखा। परमेश्वर ने उस पर प्रकट किया कि इस्राएल के वंश से एक उद्धारकर्ता उत्पन्न होना है, कि अब्राहम की इन सन्तानों के साथ बड़ी-बड़ी प्रतिज्ञाएँ बँधी हैं जो अभी पूरी होनी हैं, और कि इन प्रतिज्ञाओं के एक भाग के पूरा होने का समय निकट है; और मूसा ने इस पर भरोसा किया, और विश्वास किया। और फिरौन के दरबार को छोड़ने के बाद उसके जीवन-यात्रा का हर कदम, उसका हर कार्य,—प्रत्यक्ष बुराई का उसका चुनाव, प्रत्यक्ष भलाई का उसका इनकार,—सब, सब इसी स्रोत तक पहुँचाए जाने चाहिए; सब इसी नींव पर टिका हुआ पाया जाएगा। परमेश्वर ने उससे बात की थी, और उसने परमेश्वर के वचन पर विश्वास किया।
उसने विश्वास किया कि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करेगा,—कि जो उसने कहा है उसे वह निश्चय करेगा, और जो उसने वाचा बाँधी है उसे वह निश्चय पूरा करेगा।
उसने विश्वास किया कि परमेश्वर के लिए कुछ भी असम्भव नहीं। तर्क और इन्द्रियाँ कह सकती थीं कि इस्राएल का छुटकारा सोचने की बात ही नहीं है: बाधाएँ बहुत हैं, कठिनाइयाँ बहुत बड़ी हैं। परन्तु विश्वास ने मूसा से कहा कि परमेश्वर सर्वसामर्थी है। परमेश्वर ने यह काम अपने ऊपर ले लिया है, और यह पूरा होगा।
उसने विश्वास किया कि परमेश्वर सर्वबुद्धिमान है। तर्क और इन्द्रियाँ उससे कह सकती थीं कि उसका मार्ग मूर्खतापूर्ण है; कि फिरौन की बेटी से नाता तोड़कर वह अपना उपयोगी प्रभाव गँवा रहा है, और अपने लोगों को लाभ पहुँचाने की सारी आशा नष्ट कर रहा है। परन्तु विश्वास ने मूसा से कहा कि यदि परमेश्वर कहता है "इस मार्ग पर चल", तो वही सर्वोत्तम होगा।
उसने विश्वास किया कि परमेश्वर सर्वदयालु है। तर्क और इन्द्रियाँ संकेत दे सकती थीं कि छुटकारे का कोई अधिक सुखद उपाय मिल सकता है, कि कोई समझौता हो सकता है, और बहुत-सी कठिनाइयों से बचा जा सकता है। परन्तु विश्वास ने मूसा से कहा कि परमेश्वर प्रेम है, और अपने लोगों को कड़वाहट की एक बूँद भी उससे अधिक नहीं देगा जितनी नितान्त आवश्यक है।
विश्वास मूसा के लिए दूरबीन था। उसने उसे दूर की उस उत्तम भूमि को दिखाया,—विश्राम, शान्ति और विजय को, जबकि धुँधली दृष्टिवाला तर्क केवल परीक्षा और बंजरपन, आँधी और तूफ़ान, थकावट और पीड़ा ही देख पाता था।
विश्वास मूसा के लिए व्याख्याकार था। उसने उसे परमेश्वर के हाथ के लेख की गूढ़ आज्ञाओं में सुखद अर्थ ढूँढ़ निकालने योग्य बनाया, जबकि अज्ञानी इन्द्रियाँ उसमें रहस्य और मूर्खता के सिवा कुछ नहीं देख सकती थीं।
विश्वास ने मूसा से कहा कि यह सारा पद और बड़ाई पृथ्वी की है, मिट्टी की है, एक तुच्छ, व्यर्थ, खोखली वस्तु, क्षणभंगुर, अल्पकालिक और मिट जानेवाली; और कि परमेश्वर की सेवा करने के समान कोई सच्ची बड़ाई नहीं। राजा वही है, सच्चा कुलीन वही है जो परमेश्वर के घराने का है। स्वर्ग में सबसे अन्तिम होना नरक में सबसे पहले होने से उत्तम है।
विश्वास ने मूसा से कहा कि सांसारिक सुख "पाप के सुख" हैं। वे पाप से मिले हुए हैं, पाप की ओर ले जाते हैं, आत्मा के लिए विनाशकारी हैं, और परमेश्वर को अप्रसन्न करनेवाले हैं। जब परमेश्वर उसके विरुद्ध हो तब सुख भोगने में थोड़ा ही चैन होगा। पाप में आराम से रहने से परमेश्वर की आज्ञा मानकर दुःख उठाना उत्तम है।
विश्वास ने मूसा से कहा कि ये सुख अन्ततः केवल "कुछ समय" के लिए हैं। वे टिक नहीं सकते; सब अल्पकालिक हैं; वे शीघ्र ही उसे थका देंगे; कुछ ही वर्षों में उसे इन सबको छोड़ना पड़ेगा।
विश्वास ने उससे कहा कि स्वर्ग में विश्वासी के लिए मिस्र के भण्डारों से कहीं अधिक समृद्ध प्रतिफल है, स्थायी धन, जहाँ न कीड़ा, न काई बिगाड़ते हैं, और न चोर सेंध लगाकर चुराते हैं। वहाँ का मुकुट अविनाशी होगा; महिमा का भार अत्यन्त महान और अनन्त होगा;—और यदि मिस्र के सोने से उसकी आँखें चौंधिया रही हों, तो विश्वास ने उसे अनदेखे स्वर्ग की ओर दृष्टि फेरने को कहा।
विश्वास ने मूसा से कहा कि क्लेश और दुःख वास्तविक बुराइयाँ नहीं हैं।—वे परमेश्वर की पाठशाला हैं, जिसमें वह अनुग्रह की सन्तानों को महिमा के लिए तैयार करता है;—वे औषधियाँ हैं जो हमारी भ्रष्ट इच्छाओं को शुद्ध करने के लिए आवश्यक हैं;—वह भट्ठी हैं जिसे हमारा मैल जलाना है;—वह छुरी हैं जिसे उन बन्धनों को काटना है जो हमें संसार से बाँधते हैं।
विश्वास ने मूसा को बताया कि तुच्छ समझे जानेवाले इस्राएली परमेश्वर की चुनी हुई प्रजा हैं। उसने विश्वास किया कि उन्हीं का लेपालकपन, और वाचाएँ, और प्रतिज्ञाएँ, और महिमा है; कि उन्हीं में से एक दिन स्त्री का वह वंश जन्म लेगा जो सर्प के सिर को कुचलेगा; कि परमेश्वर की विशेष आशीष उन पर है; कि वे उसकी दृष्टि में प्रिय और सुन्दर हैं;—और यह कि दुष्टता के महलों में राज्य करने से परमेश्वर की प्रजा के बीच द्वारपाल होना कहीं उत्तम है।
विश्वास ने मूसा को बताया कि उस पर जो भी निन्दा और तिरस्कार उँडेला जा रहा था वह "मसीह की निन्दा" थी;—कि मसीह के कारण ठट्ठों में उड़ाया जाना और तुच्छ समझा जाना आदर की बात है;—कि जो कोई मसीह के लोगों को सताता है वह स्वयं मसीह को सताता है;—और यह कि वह दिन अवश्य आएगा जब उसके शत्रु उसके आगे झुकेंगे और धूल चाटेंगे। यह सब, और इससे भी बहुत कुछ, जिसका मैं विस्तार से वर्णन नहीं कर सकता, मूसा ने विश्वास से देखा। यही वे बातें थीं जिन पर उसने विश्वास किया, और विश्वास करके वही किया जो उसने किया। उसे उन पर प्रतीति थी, और उसने उन्हें अपनाया,—उसने उन्हें निश्चित बातें माना,—उन्हें ठोस सच्चाइयाँ समझा,—उन्हें ऐसी निश्चित माना मानो उन्हें अपनी आँखों से देख लिया हो,—और उसने उन पर वास्तविकता के समान कार्य किया;—और इसी ने उसे वह मनुष्य बनाया जो वह था। उसमें विश्वास था। उसने विश्वास किया।
यदि उसने बड़ाई, धन और सुख को ठुकरा दिया तो इस पर आश्चर्य मत करो।—उसने दूर आगे तक देखा। उसने विश्वास की आँख से राज्यों को धूल में मिलते देखा,—धन को अपने लिए पंख लगाकर उड़ जाते देखा,—सुखों को मृत्यु और न्याय की ओर ले जाते देखा,—और केवल मसीह और उसके छोटे झुण्ड को सदा बने रहते देखा।
यदि उसने दुःख, एक तुच्छ समझी जानेवाली प्रजा और निन्दा को चुन लिया तो इस पर अचम्भा मत करो।—उसने सतह के नीचे की बातें देखीं। उसने विश्वास की आँख से देखा कि दुःख केवल क्षण भर का है,—निन्दा दूर हो जाती है और अनन्त आदर में बदल जाती है,—और परमेश्वर की तुच्छ समझी गई प्रजा महिमा में मसीह के साथ राजाओं के समान राज्य करती है।
और क्या वह सही नहीं था? क्या वह मरा हुआ होकर भी आज इसी दिन हमसे नहीं बोल रहा? फिरौन की बेटी का नाम मिट गया है, या कम से कम अत्यन्त सन्देहास्पद है।—वह नगर जहाँ फिरौन राज्य करता था, ज्ञात नहीं।—मिस्र के भण्डार जाते रहे।—परन्तु मूसा का नाम वहाँ-वहाँ जाना जाता है जहाँ-जहाँ बाइबल पढ़ी जाती है, और वह आज भी इस बात का स्थायी साक्षी है कि "जो विश्वास से जीवित रहता है, वह धन्य है।"
