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पवित्रता: इसका स्वरूप

यह हिन्दी संस्करण अंग्रेज़ी मूल से पूर्ण रूप से, अनुच्छेद-दर-अनुच्छेद, कृत्रिम बुद्धि (AI) की सहायता से अनुवादित है; मानवीय समीक्षा जारी है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

पवित्रता: इसका स्वरूप

पवित्रता:

इसका स्वरूप, बाधाएँ, कठिनाइयाँ और जड़ें — जे. सी. राइल द्वारा

विषय-सूची

भूमिका

परिचय

1. पाप

2. पवित्रीकरण

3. पवित्रता

4. संघर्ष

5. मूल्य

6. बढ़ोतरी

7. निश्चयता

8. मूसा — एक उदाहरण

9. लूत — एक चेतावनी-स्तम्भ

10. एक स्त्री जिसे स्मरण रखा जाना चाहिए

11. मसीह की सबसे बड़ी विजय-निशानी

12. लहरों का शासक

13. वह कलीसिया जिसे मसीह बनाता है

14. दृश्य कलीसियाओं को चेतावनी

15. "क्या तू मुझसे प्रेम रखता है?"

16. मसीह के बिना

17. प्यास का बुझाया जाना

18. "अगम्य धन"

19. इस समय की आवश्यकताएँ

20. "मसीह ही सब कुछ है"

21. प्राचीन लेखकों के उद्धरण

विस्तारित संस्करण की भूमिका

जो पुस्तक अब पाठक के हाथों में है वह एक छोटी रचना का विस्तारित संस्करण है, जो कई वर्ष पहले प्रकाशित हुई थी और जिसे मसीही जनता ने कृपापूर्वक स्वीकार किया था। इस वर्तमान पुस्तक में इतनी अतिरिक्त सामग्री है कि यह अपनी पूर्ववर्ती पुस्तक से दुगुने आकार की हो गई है। वास्तव में, इस रचना का आधा भाग नया है।

मैं यह सोचने का साहस करता हूँ कि इस पुस्तक में सम्मिलित लेख उन सभी के लिए सहायक सिद्ध होंगे जो पवित्रशास्त्र-सम्मत पवित्रता के विषय में रुचि रखते हैं। यदि वे पवित्रता के वास्तविक स्वरूप पर, और उन परीक्षाओं तथा कठिनाइयों पर जिनकी अपेक्षा उसके पीछे चलनेवाले हर किसी को करनी चाहिए, व्यापक प्रकाश न डालें, तो मैं बहुत भूल में हूँ। सबसे बढ़कर, मैं आशा करता हूँ कि वे इस महान सत्य को सामने लाने में सहायता करेंगे कि मसीह के साथ एकता ही पवित्रता की जड़ है, और नए विश्वासियों को दिखाएँगे कि यीशु मसीह उन सब को कितना बड़ा प्रोत्साहन देता है जो पवित्र होने का प्रयत्न करते हैं।

अंग्रेज़ मसीहियों के बीच पवित्रता के समस्त विषय की वर्तमान स्थिति के सम्बन्ध में, मुझे उस परिचयात्मक निबन्ध में, जो मूल संस्करण में छपा था और अब इस भूमिका के बाद आता है, बहुत कम कुछ जोड़ना है। जैसे-जैसे मेरी आयु बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे मुझे और अधिक विश्वास होता जाता है कि वास्तविक व्यावहारिक पवित्रता पर वह ध्यान नहीं दिया जाता जिसकी वह अधिकारी है, और देश में धर्म का बड़ा दावा करनेवाले अनेक लोगों के बीच जीवन का स्तर अत्यन्त पीड़ादायक रूप से नीचा है। परन्तु साथ ही, मुझे यह भी बढ़ते हुए विश्वास के साथ दिखाई देता है कि कुछ भले इरादेवाले लोगों के आत्मिक जीवन के ऊँचे स्तर को बढ़ावा देने के उत्साही प्रयत्न प्रायः "ज्ञान के अनुसार" नहीं होते, और वास्तव में भलाई से अधिक हानि करने की सम्भावना रखते हैं। मुझे समझाने दीजिए कि मेरा क्या अर्थ है।

तथाकथित "उच्चतर जीवन" और "समर्पण" की सभाओं के लिए भीड़ जुटा लेना सरल है। जिसने मानव स्वभाव को देखा है, अमेरिकी शिविर-सभाओं के वर्णन पढ़े हैं, और "धार्मिक भावनाओं" की विचित्र घटनाओं का अध्ययन किया है, वह यह जानता है।* अनजान प्रचारकों या स्त्रियों के रोमांचक और उत्तेजक भाषण, ऊँचे स्वर में गीत, गरम कमरे, भरे हुए तम्बू, कई दिनों तक अपने चारों ओर सबके चेहरों पर अर्ध-धार्मिक प्रबल भावना का निरन्तर दृश्य, देर रात तक चलनेवाली लम्बी खिंची हुई सभाएँ, अनुभव की सार्वजनिक घोषणा, — इस प्रकार की सारी बातें उस समय बहुत रोचक होती हैं और भलाई करती हुई जान पड़ती हैं। परन्तु क्या वह भलाई वास्तविक, गहरी जमी हुई, ठोस और स्थायी है? यही मुख्य बात है। और मैं इसके विषय में कुछ प्रश्न पूछना चाहूँगा।

क्या जो लोग इन सभाओं में जाते हैं वे घर पर अधिक पवित्र, नम्र, निःस्वार्थ, दयालु, सुशील स्वभाव के, आत्म-त्यागी और मसीह-समान बनते हैं? क्या वे जीवन में अपनी स्थिति से अधिक सन्तुष्ट होते हैं, और उस वस्तु से भिन्न किसी वस्तु की बेचैन लालसा से अधिक मुक्त होते हैं जो परमेश्वर ने उन्हें दी है? क्या पिता, माताएँ, पति और अन्य सम्बन्धी तथा मित्र उन्हें साथ रहने में अधिक सुखद और सहज पाते हैं? क्या वे शोर, गर्मी और उत्तेजना के बिना शान्त रविवार और शान्त अनुग्रह के साधनों का आनन्द ले सकते हैं? सबसे बढ़कर, क्या वे प्रेम में बढ़ते हैं, और विशेषकर उनके प्रति प्रेम में जो अपने धर्म की एक-एक मात्रा और बिन्दु पर उनसे सहमत नहीं हैं?

ये गम्भीर और गहराई से जाँचनेवाले प्रश्न हैं, और गम्भीर विचार के योग्य हैं। मैं आशा करता हूँ कि मैं देश में वास्तविक व्यावहारिक पवित्रता को बढ़ावा देने के लिए किसी भी अन्य के समान चिन्तित हूँ। मैं उन अनेक लोगों के उत्साह और गम्भीरता की सराहना करता हूँ और उसे खुशी से स्वीकार करता हूँ जिनके साथ मैं सहयोग नहीं कर सकता और जो इसे बढ़ावा देने का प्रयत्न कर रहे हैं। परन्तु मैं एक बढ़ते हुए सन्देह को रोक नहीं सकता कि आजकल की बड़ी "जन-सभाएँ", जिनका प्रकट उद्देश्य आत्मिक जीवन को बढ़ावा देना है, निजी घरेलू धर्म, निजी बाइबल-पठन, निजी प्रार्थना, निजी उपयोगिता और परमेश्वर के साथ निजी चलने को बढ़ावा नहीं देतीं। यदि इनका कोई वास्तविक मूल्य है, तो इन्हें लोगों को बेहतर पति, पत्नियाँ, पिता, माताएँ, पुत्र, पुत्रियाँ, भाई, बहनें, स्वामी, स्वामिनियाँ और सेवक बनाना चाहिए। परन्तु मैं इसके स्पष्ट प्रमाण चाहूँगा कि वे ऐसा करती हैं। मैं केवल इतना जानता हूँ कि किसी सार्वजनिक कक्ष में गाते, प्रार्थना करते, सहानुभूति रखते मसीहियों के बीच मसीही होना कहीं अधिक सरल है, बजाय इसके कि एक शान्त, एकान्त, अलग-थलग और प्रतिकूल घर में सच्चे अर्थ में एक संगत मसीही बना जाए। पहली स्थिति ऐसी है जिसमें स्वभाव से बहुत सहायता मिलती है; दूसरी ऐसी है जिसे अनुग्रह के बिना भली-भाँति निभाया नहीं जा सकता। परन्तु हाय, आजकल बहुत से लोग "समर्पण" की बातें करते हैं, जो "नया जन्म" के विषय में "परमेश्वर के वचनों के प्रथम सिद्धान्तों" से अनजान प्रतीत होते हैं।

मैं इस भूमिका को इस दुःखद अनुभूति के साथ समाप्त करता हूँ कि सम्भवतः इसके कुछ पाठक मुझसे सहमत नहीं होंगे। विशेषकर युवाओं के लिए मैं देख सकता हूँ कि तथाकथित "आत्मिक जीवन" आन्दोलन की बड़ी सभाएँ निश्चय ही आकर्षक होंगी। उन्हें स्वाभाविक रूप से उत्साह, हलचल और जोश अच्छा लगता है, और वे कहते हैं, "इसमें हानि कहाँ है?" ऐसा ही सही; हमें असहमत होने पर सहमत होना होगा। जब मैं उनके समान युवा था, तो शायद मैं भी वैसा ही सोचता जैसा वे सोचते हैं। जब वे मेरी आयु के होंगे, तो बहुत सम्भव है कि वे मुझसे सहमत हों।

अपने प्रत्येक और सब पाठकों से मैं अन्त में यह कहता हूँ कि आओ, हम एक-दूसरे के विषय में अपने निर्णयों में प्रेम का व्यवहार करें। जो यह सोचते हैं कि पवित्रता को आधुनिक, तथाकथित "आत्मिक जीवन" आन्दोलन द्वारा बढ़ावा दिया जाना चाहिए, उनके प्रति मैं प्रेम के सिवा और कुछ अनुभव नहीं करता। यदि वे भलाई करते हैं, तो मैं धन्यवादी हूँ। अपने लिए और उनके लिए जो मुझसे सहमत हैं, मैं उनसे बदले में प्रेम रखने को कहता हूँ। अन्तिम दिन यह प्रकट कर देगा कि कौन सही है और कौन गलत। इस बीच, मुझे पूरा निश्चय है कि जो लोग विवेक के कारण हमारे साथ काम नहीं कर सकते, उनके प्रति कटुता और ठण्डापन दिखाना यह प्रमाणित करना है कि हम वास्तविक पवित्रता के विषय में बहुत अनजान हैं।

जे. सी. राइल।

परिचय

इस पुस्तक में सम्मिलित बीस निबन्ध उस उद्देश्य के लिये एक विनम्र योगदान हैं जो आज के समय में बहुत रुचि जगा रहा है—मेरा तात्पर्य पवित्रशास्त्र के अनुसार पवित्रता के उद्देश्य से है। यह ऐसा उद्देश्य है जिसकी सहायता करने का प्रयत्न हर उस व्यक्ति को करना चाहिए जो मसीह से प्रेम रखता है और संसार में उसके राज्य को आगे बढ़ते देखना चाहता है। हर कोई कुछ न कुछ कर सकता है, और मैं भी अपनी छोटी-सी भेंट जोड़ना चाहता हूँ।

पाठक को इन निबन्धों में सीधे विवादपूर्ण बातें बहुत कम मिलेंगी। मैंने आधुनिक शिक्षकों और आधुनिक पुस्तकों के नाम लेने से सावधानीपूर्वक परहेज़ किया है। मैं इसी से सन्तुष्ट रहा हूँ कि बाइबल के अपने अध्ययन, अपने निजी मनन, ज्योति के लिये अपनी प्रार्थनाओं और प्राचीन धर्मशास्त्रियों के अपने पठन का परिणाम प्रस्तुत करूँ। यदि मैं अब भी किसी बात में भूल पर हूँ, तो आशा करता हूँ कि संसार से जाने से पहले मुझे वह दिखा दी जाएगी। हम सब अधूरा ही देखते हैं, और हमारे पास मिट्टी के बरतनों में खज़ाना है। मुझे भरोसा है कि मैं सीखने को तैयार हूँ।

मुझे बहुत वर्षों से यह गहरा विश्वास रहा है कि इस देश के आधुनिक मसीही व्यावहारिक पवित्रता और परमेश्वर के प्रति सम्पूर्ण समर्पण पर पर्याप्त ध्यान नहीं देते। राजनीति, या विवाद, या दलबन्दी की भावना, या सांसारिकता ने हम में से बहुतों के जीवन्त भक्ति-भाव का सार खा डाला है। व्यक्तिगत भक्ति का विषय खेदजनक रूप से पीछे चला गया है। अनेक स्थानों में जीवन का स्तर पीड़ादायक रूप से नीचा हो गया है। "हमारे उद्धारकर्ता परमेश्वर के सिद्धान्त को शोभा देने" (तीतुस 2:10), और अपनी दैनिक आदतों और स्वभाव के द्वारा उसे मनोहर और सुन्दर बनाने के अत्यन्त महत्त्व की बहुत अनदेखी की गई है। संसारी लोग कभी-कभी उचित ही शिकायत करते हैं कि तथाकथित "धार्मिक" लोग उन दूसरों की तरह मिलनसार, निःस्वार्थ और भले स्वभाव के नहीं होते जो धर्म का कोई दावा नहीं करते। फिर भी पवित्रीकरण, अपने स्थान और अनुपात में, धर्मी ठहराया जाने जितना ही महत्त्वपूर्ण है। यदि खरा प्रोटेस्टेंट और सुसमाचारीय सिद्धान्त पवित्र जीवन के साथ न हो, तो वह व्यर्थ है। वह व्यर्थ से भी बुरा है: उससे सचमुच हानि होती है। तेज़ दृष्टि और चतुर संसारी मनुष्य उसे अवास्तविक और खोखली वस्तु जानकर तुच्छ समझते हैं, और धर्म की निन्दा होती है। मेरी दृढ़ धारणा है कि हमें पवित्रशास्त्र के अनुसार पवित्रता के विषय में पूर्ण जागृति की आवश्यकता है, और मैं बहुत कृतज्ञ हूँ कि इस बात की ओर ध्यान दिलाया जा रहा है।

फिर भी यह बहुत महत्त्वपूर्ण है कि सारा विषय सही नींव पर रखा जाए, और इसके विषय में चलनेवाले आन्दोलन को कच्चे, असन्तुलित और एकतरफ़ा कथनों से हानि न पहुँचे। यदि ऐसे कथन बहुत हों, तो हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए। शैतान सच्ची पवित्रता की शक्ति को और इस बात को भली-भाँति जानता है कि उस पर बढ़ा हुआ ध्यान उसके राज्य को कितनी भारी हानि पहुँचाएगा। इसलिये परमेश्वर के सत्य के इस भाग के विषय में झगड़ा और विवाद फैलाना उसके हित में है। जैसे पिछले समय में वह धर्मी ठहराया जाने के विषय में मनुष्यों के मन को उलझाने और भ्रमित करने में सफल हुआ, वैसे ही आज वह पवित्रीकरण के विषय में मनुष्यों से "बिना ज्ञान की बातों से युक्ति को धुंधला" करवाने का प्रयत्न कर रहा है। प्रभु उसे डाँटे! तौभी मैं इस आशा को नहीं छोड़ सकता कि बुराई में से भलाई निकलेगी, चर्चा से सत्य प्रकट होगा, और मतों की विविधता हम सब को पवित्रशास्त्र में और अधिक खोजने, और अधिक प्रार्थना करने, और यह पता लगाने में अधिक परिश्रमी होने की ओर ले जाएगी कि "आत्मा की मनसा" क्या है।

अब इस पुस्तक को प्रकाशित करते समय मैं अपना कर्त्तव्य समझता हूँ कि उन लोगों के लिये कुछ आरम्भिक सुझाव दूँ जिनका ध्यान आज पवित्रीकरण के विषय की ओर विशेष रूप से लगा है। मैं जानता हूँ कि ऐसा करने में मैं ढीठ दिखाई देने का, और सम्भवतः ठेस पहुँचाने का भी जोखिम उठा रहा हूँ। परन्तु परमेश्वर के सत्य के हित में कुछ जोखिम उठाना ही पड़ता है। इसलिये मैं अपने सुझावों को प्रश्नों का रूप दूँगा, और अपने पाठकों से निवेदन करूँगा कि वे इन्हें "पवित्रता के विषय में इस समय के लिये चेतावनियाँ" समझकर लें।

(1) सबसे पहले मैं पूछता हूँ कि क्या विश्वास को एकमात्र आवश्यक वस्तु, और एकमात्र अपेक्षित वस्तु कहना बुद्धिमानी है, जैसा आजकल बहुत लोग पवित्रीकरण के सिद्धान्त का वर्णन करते समय करते प्रतीत होते हैं?—क्या यह बुद्धिमानी है कि इतने नंगे, खुले और बिना शर्त ढंग से, जैसा बहुतेरे करते हैं, यह घोषणा की जाए कि मन फिराए हुए लोगों की पवित्रता केवल विश्वास से है, और व्यक्तिगत प्रयत्न से बिलकुल नहीं? क्या यह परमेश्वर के वचन के अनुपात के अनुसार है? मुझे सन्देह है।

मसीह में विश्वास ही समस्त पवित्रता की जड़ है—पवित्र जीवन की ओर पहला कदम मसीह पर विश्वास करना है—जब तक हम विश्वास नहीं करते तब तक हममें रत्ती भर भी पवित्रता नहीं है—विश्वास के द्वारा मसीह के साथ एक हो जाना ही पवित्र होने का आरम्भ करने और पवित्र बने रहने, दोनों का रहस्य है—जो जीवन हम शरीर में जीते हैं उसे हमें परमेश्वर के पुत्र के विश्वास से जीना है—विश्वास हृदय को शुद्ध करता है—विश्वास वह जय है जो संसार पर जयवन्त होती है—विश्वास ही के द्वारा प्राचीनों ने अच्छी साक्षी पाई—ये सब ऐसे सत्य हैं जिन्हें कोई भी भली-भाँति सिखाया हुआ मसीही कभी नकारने की बात न सोचेगा। परन्तु निश्चय ही पवित्रशास्त्र हमें सिखाता है कि पवित्रता का अनुसरण करने में सच्चे मसीही को विश्वास के साथ-साथ व्यक्तिगत परिश्रम और कर्म की भी आवश्यकता है। यही प्रेरित जो एक स्थान पर कहता है, "मैं शरीर में जो जीवित हूँ तो केवल उस विश्वास से जीवित हूँ जो परमेश्वर के पुत्र पर है," दूसरे स्थान पर कहता है, "मैं लड़ता हूँ—मैं दौड़ता हूँ—मैं अपनी देह को मारता कूटता हूँ;" और अन्य स्थानों पर, "आओ, हम अपने आप को शुद्ध करें—आओ, हम परिश्रम करें—आओ, हम हर एक बोझ को उतार फेंकें।" (गलातियों 2:20; 1 कुरिन्थियों 9:26; 2 कुरिन्थियों 7:1; इब्रानियों 4:11; 12:1।) इसके अतिरिक्त, पवित्रशास्त्र कहीं भी यह नहीं सिखाता कि विश्वास हमें उसी अर्थ में और उसी रीति से पवित्र करता है जिस अर्थ और रीति से वह हमें धर्मी ठहराता है! धर्मी ठहरानेवाला विश्वास ऐसा अनुग्रह है जो "काम नहीं करता," वरन् केवल भरोसा रखता है, मसीह में विश्राम करता और उसी पर टिका रहता है। (रोमियों 4:5।) पवित्र करनेवाला विश्वास ऐसा अनुग्रह है जिसका प्राण ही क्रिया है: वह "प्रेम के द्वारा कार्य करता है," और मुख्य कमानी के समान सारे भीतरी मनुष्य को गतिमान करता है। (गलातियों 5:6।) अन्ततः "विश्वास से पवित्र किए गए" यह सटीक वाक्यांश नए नियम में केवल एक ही बार मिलता है। प्रभु यीशु ने शाऊल से कहा, "मैं तुझे इसलिए भेजता हूँ कि वे पापों की क्षमा और उन लोगों के बीच जो मुझ पर विश्वास करने से पवित्र किए गए हैं, मीरास पाएँ।" फिर भी वहाँ मैं अल्फर्ड से सहमत हूँ कि "विश्वास से" पूरे वाक्य से सम्बन्धित है, और उसे केवल "पवित्र किए गए" शब्द के साथ बाँधना उचित नहीं। सच्चा अर्थ यह है, "कि मुझ पर विश्वास करने के द्वारा वे पापों की क्षमा और पवित्र किए हुओं के बीच मीरास पाएँ।" (प्रेरितों के काम 26:18 की तुलना प्रेरितों के काम 20:32 से कीजिए।)

"विश्वास से पवित्रता" इस वाक्यांश के विषय में, मुझे यह नए नियम में कहीं नहीं मिलता। निर्विवाद रूप से, परमेश्वर के सामने हमारे धर्मी ठहराए जाने के विषय में, मसीह पर विश्वास ही एकमात्र आवश्यक वस्तु है। जो केवल विश्वास करते हैं वे सब धर्मी ठहराए जाते हैं। धार्मिकता उसके लिए गिनी जाती है "जो काम नहीं करता परन्तु विश्वास करता है।" (रोमियों 4:5।) यह कहना पूर्णतः पवित्रशास्त्र-सम्मत और उचित है कि "केवल विश्वास धर्मी ठहराता है।" परन्तु यह कहना उतना ही पवित्रशास्त्र-सम्मत और उचित नहीं कि "केवल विश्वास पवित्र करता है।" इस कथन में बहुत बड़ी सीमा लगाने की आवश्यकता है। एक ही तथ्य पर्याप्त होगा। पौलुस द्वारा हमें बार-बार बताया गया है कि मनुष्य "व्यवस्था के कामों के बिना विश्वास से धर्मी ठहरता है।" परन्तु हमें एक बार भी नहीं बताया गया कि हम "व्यवस्था के कामों के बिना विश्वास से पवित्र किए जाते हैं।" इसके विपरीत, याकूब द्वारा हमें स्पष्ट रूप से बताया गया है कि जिस विश्वास से हम मनुष्यों के सामने प्रत्यक्ष और प्रमाणित रूप से धर्मी ठहरते हैं, वह ऐसा विश्वास है जो "यदि कर्म सहित न हो तो अपने स्वभाव से मरा हुआ है।"* (याकूब 2:17।) उत्तर में मुझसे कहा जा सकता है कि निश्चय ही कोई भी "कर्मों" को पवित्र जीवन का आवश्यक अंग मानने में उनका अनादर करना नहीं चाहता। फिर भी यह अच्छा होगा कि इसे उससे अधिक स्पष्ट किया जाए जितना आजकल बहुत से लोग करते दिखाई देते हैं।

(2) दूसरे स्थान पर मैं पूछता हूँ कि क्या यह बुद्धिमानी है कि कुछ लोगों की भाँति दैनिक जीवन में पवित्रता के लिए दी गई उन अनेक व्यावहारिक उपदेशों को तुलनात्मक रूप से इतना कम महत्त्व दिया जाए, जो पहाड़ी उपदेश में और पौलुस की अधिकांश पत्रियों के उत्तरार्द्ध भाग में पाए जाते हैं? क्या यह परमेश्वर के वचन के अनुपात के अनुसार है? मुझे सन्देह है।

यह कि प्रतिदिन अपने आप को समर्पित करने और परमेश्वर के साथ प्रतिदिन सहभागिता रखने का जीवन हर उस व्यक्ति का लक्ष्य होना चाहिए जो अपने आप को विश्वासी कहता है—यह कि हमें यह आदत डालने का यत्न करना चाहिए कि जो कुछ हमें भार लगे, चाहे बड़ा हो या छोटा, उसे लेकर प्रभु यीशु मसीह के पास जाएँ और उसी पर डाल दें—यह सब, मैं दोहराता हूँ, परमेश्वर का कोई भी भली-भाँति सिखाया हुआ सन्तान विवाद करने का स्वप्न भी न देखेगा। परन्तु निश्चय ही नया नियम हमें सिखाता है कि हमें पवित्र जीवन के विषय में केवल सामान्य बातों से कुछ अधिक की आवश्यकता है, जो अक्सर किसी के विवेक को नहीं चुभतीं और किसी को ठेस नहीं पहुँचातीं। दैनिक जीवन में पवित्रता जिन विवरणों और विशेष अवयवों से बनती है, उन्हें इस विषय को हाथ में लेनेवाले सब लोगों द्वारा पूरी रीति से प्रस्तुत किया जाना और विश्वासियों के सामने ज़ोर देकर रखा जाना चाहिए। सच्ची पवित्रता केवल विश्वास करने और अनुभव करने में नहीं, वरन् करने और सहने में, और सक्रिय तथा निष्क्रिय अनुग्रह के व्यावहारिक प्रदर्शन में है। हमारी जीभ, हमारा स्वभाव, हमारी स्वाभाविक भावनाएँ और झुकाव—माता-पिता और सन्तान, स्वामी और सेवक, पति और पत्नी, शासक और प्रजा के रूप में हमारा आचरण—हमारा पहनावा, समय का हमारा उपयोग, व्यापार में हमारा व्यवहार, रोग और स्वास्थ्य में, धन और निर्धनता में हमारा बर्ताव—ये सब, ये सब ऐसे विषय हैं जिन पर प्रेरित लेखकों ने पूरी रीति से विचार किया है। वे केवल इस सामान्य कथन से सन्तुष्ट नहीं हैं कि हमें क्या विश्वास करना और अनुभव करना चाहिए, और पवित्रता की जड़ें हमारे हृदयों में कैसे रोपी जाएँ। वे और गहरी खुदाई करते हैं। वे विवरण में जाते हैं। वे बारीकी से बताते हैं कि यदि कोई पवित्र जन मसीह में बना रहता है तो उसे अपने परिवार में और अपने ही चूल्हे के पास क्या करना और कैसा होना चाहिए। मुझे सन्देह है कि आजकल के आन्दोलन में इस प्रकार की शिक्षा पर पर्याप्त ध्यान दिया जाता है। जब लोग "ऐसी आशीष" पाने और "ऊँचा जीवन" पा लेने की बातें करते हैं, जो "विश्वास से पवित्रता और आत्म-समर्पण" के किसी उत्साही समर्थक को सुनने के बाद होता है, जबकि उनके परिवार और मित्र उनके दैनिक स्वभाव और व्यवहार में न कोई सुधार देखते हैं और न बढ़ी हुई पवित्रता, तब मसीह के उद्देश्य की बहुत भारी हानि होती है। हमें निश्चय ही स्मरण रखना चाहिए कि सच्ची पवित्रता केवल भीतरी संवेदनाओं और छापों में नहीं है। वह आँसुओं, आहों, शारीरिक उत्तेजना, तेज़ नब्ज़ और अपने प्रिय प्रचारकों तथा अपने ही धार्मिक दल के प्रति उत्कट लगाव की भावना, और हर उस व्यक्ति से झगड़ने की तत्परता से कहीं बढ़कर है जो हमसे सहमत नहीं। वह "मसीह के स्वरूप" का कुछ अंश है, जिसे दूसरे हमारे निजी जीवन, आदतों, चरित्र और कामों में देख और पहचान सकते हैं। (रोमियों 8:29।)

(3) तीसरे स्थान पर मैं पूछता हूँ कि क्या पूर्णता के विषय में अस्पष्ट भाषा का प्रयोग करना, और मसीहियों पर पवित्रता का ऐसा स्तर थोपना, जिसे इस संसार में प्राप्त किया जा सकता है, परन्तु जिसके लिए न तो पवित्रशास्त्र में और न अनुभव में कोई आधार दिखाया जा सकता है, बुद्धिमानी है? मुझे सन्देह है।

विश्वासियों को "परमेश्वर का भय मानकर पवित्रता को सिद्ध करने," "सिद्धता की ओर बढ़ते जाने," और "सिद्ध बनने" का उपदेश दिया गया है, इस बात से अपनी बाइबल को ध्यान से पढ़नेवाला कोई भी व्यक्ति कभी इनकार करने की बात नहीं सोचेगा। (2 कुरिन्थियों 7:1; इब्रानियों 6:1; 2 कुरिन्थियों 13:11।) परन्तु मुझे अभी यह जानना है कि पवित्रशास्त्र में एक भी ऐसा अंश है जो यह सिखाता हो कि शाब्दिक सिद्धता, अर्थात् विचार, वचन या कर्म में पाप से पूर्ण और सम्पूर्ण मुक्ति, इस संसार में आदम की किसी भी सन्तान के लिए प्राप्त करना सम्भव है, या कभी किसी ने प्राप्त की है। एक तुलनात्मक सिद्धता, ज्ञान की सिद्धता, जीवन के हर सम्बन्ध में सर्वांगीण संगति, सिद्धान्त की हर बात में पूरी खराई, यह कभी-कभी परमेश्वर के कुछ विश्वासी लोगों में दिखाई दे सकती है। परन्तु जहाँ तक पूर्ण शाब्दिक सिद्धता का प्रश्न है, हर युग में परमेश्वर के सबसे उत्तम सन्त ही उसका दावा करने में सबसे अन्तिम रहे हैं! इसके विपरीत, उन्हें सदा अपनी पूर्ण अयोग्यता और अपूर्णता का सबसे गहरा बोध रहा है। उन्होंने जितनी अधिक आत्मिक ज्योति पाई, उतना ही अधिक उन्होंने अपनी असंख्य त्रुटियों और कमियों को देखा। उन्हें जितना अधिक अनुग्रह मिला, उतना ही अधिक वे "दीनता से सुसज्जित" होते गए। (1 पतरस 5:5।)

परमेश्वर के वचन में ऐसे किस सन्त का नाम लिया जा सकता है, जिसके जीवन के बहुत से विवरण लिखे गए हैं और जो शाब्दिक रूप से तथा पूर्ण रूप से सिद्ध था? उन सब में से किसने अपने विषय में लिखते समय कभी कहा कि वह अपूर्णता से मुक्त होने का अनुभव करता है? इसके विपरीत, दाऊद, और पौलुस, और यूहन्ना जैसे पुरुष

अत्यन्त प्रबल शब्दों में घोषणा करते हैं कि वे अपने हृदय में दुर्बलता और पाप का अनुभव करते हैं। आधुनिक समय के सबसे पवित्र पुरुष सदा गहरी दीनता के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। क्या हमने कभी शहीद जॉन ब्रैडफोर्ड, या हूकर, या अशर, या बैक्स्टर, या रदरफोर्ड, या मैक्चेन से अधिक पवित्र पुरुष देखे हैं? फिर भी कोई इन पुरुषों के लेखों और पत्रों को पढ़कर यह देखे बिना नहीं रह सकता कि वे प्रतिदिन अपने आप को "दया और अनुग्रह के ऋणी" समझते थे, और जिस बात का वे सबसे अन्तिम दावा करते थे वह सिद्धता थी!

ऐसे तथ्यों के सामने मुझे इन पिछले दिनों में अनेक स्थानों पर सिद्धता के विषय में प्रयोग की जानेवाली भाषा के विरुद्ध आपत्ति करनी ही होगी। मुझे लगता है कि जो लोग इसका प्रयोग करते हैं, वे या तो पाप के स्वभाव को, या परमेश्वर के गुणों को, या अपने हृदयों को, या बाइबल को, या शब्दों के अर्थ को बहुत कम जानते हैं। जब कोई मसीही होने का दावा करनेवाला मुझसे निश्चिन्त होकर कहता है कि वह "जैसा हूँ वैसा ही" जैसे भजनों से आगे बढ़ गया है, और वे उसके वर्तमान अनुभव से नीचे हैं, यद्यपि जब उसने पहले-पहल धर्म को अपनाया था तब वे उसके अनुकूल थे, तो मुझे अवश्य लगता है कि उसकी आत्मा बहुत अस्वस्थ दशा में है! जब कोई मनुष्य शरीर में रहते हुए "बिना पाप के जीवन बिताने" की सम्भावना की बात निश्चिन्त होकर कर सकता है, और सचमुच यह कह सकता है कि उसे "तीन महीने से कोई बुरा विचार नहीं आया," तो मैं केवल इतना कह सकता हूँ कि मेरी राय में वह बहुत अज्ञानी मसीही है! मैं ऐसी शिक्षा का विरोध करता हूँ। इससे कोई लाभ नहीं होता, बल्कि बहुत हानि होती है। यह दूरदर्शी सांसारिक लोगों को, जो जानते हैं कि यह अशुद्ध और असत्य है, धर्म से घृणा दिलाती और दूर करती है। यह परमेश्वर की कुछ सर्वोत्तम सन्तानों को निराश करती है, जो अनुभव करती हैं कि वे इस प्रकार की "सिद्धता" को कभी प्राप्त नहीं कर सकतीं। यह बहुत से दुर्बल भाइयों को फुला देती है, जो कुछ न होते हुए भी अपने आप को कुछ समझने लगते हैं। संक्षेप में, यह एक खतरनाक भ्रम है।

(4) चौथे स्थान पर, क्या यह बुद्धिमानी है कि जैसा बहुत से लोग करते हैं, इतने निश्चय और उग्रता से यह दावा किया जाए कि रोमियों की पत्री का सातवाँ अध्याय उन्नत सन्त के अनुभव का नहीं, बल्कि अपरिवर्तित मनुष्य के, या दुर्बल और अस्थिर विश्वासी के अनुभव का वर्णन करता है? मुझे सन्देह है।

मैं पूरी तरह स्वीकार करता हूँ कि यह विषय अठारह शताब्दियों से, वस्तुतः पौलुस के दिनों से ही, विवादित रहा है। मैं पूरी तरह स्वीकार करता हूँ कि सौ वर्ष पहले जॉन और चार्ल्स वेस्ली तथा फ्लेचर जैसे प्रतिष्ठित मसीही, और हमारे अपने समय के कुछ योग्य लेखकों की तो बात ही क्या, दृढ़ता से कहते हैं कि पौलुस ने यह सातवाँ अध्याय लिखते समय अपने वर्तमान अनुभव का वर्णन नहीं किया था। मैं पूरी तरह स्वीकार करता हूँ कि बहुत से लोग वह नहीं देख पाते जो मैं और बहुत से अन्य लोग देखते हैं, अर्थात् यह कि पौलुस इस अध्याय में ऐसा कुछ नहीं कहता जो हर युग के सबसे प्रतिष्ठित सन्तों के लिखे गए अनुभव से ठीक-ठीक मेल न खाता हो, और वह ऐसी कई बातें कहता है जो न कोई अपरिवर्तित मनुष्य कहने की बात सोचेगा, न कह सकता है, और न कोई दुर्बल विश्वासी। कम से कम मुझे तो ऐसा ही प्रतीत होता है। परन्तु मैं इस अध्याय की किसी विस्तृत चर्चा में नहीं जाऊँगा।*

जिस बात पर मैं ज़ोर देता हूँ वह यह व्यापक तथ्य है कि कलीसिया के हर युग के सर्वोत्तम टीकाकारों ने रोमियों के सातवें अध्याय को लगभग सदा उन्नत विश्वासियों पर लागू किया है। जो टीकाकार यह दृष्टिकोण नहीं रखते, वे, कुछ उज्ज्वल अपवादों को छोड़कर, रोमन कैथोलिक, सोसीनियन और आर्मीनियन रहे हैं। उनके विरुद्ध लगभग सभी धर्म-सुधारकों, लगभग सभी प्यूरिटनों और सर्वोत्तम आधुनिक सुसमाचारवादी धर्मशास्त्रियों का निर्णय खड़ा है। निश्चय ही मुझसे कहा जाएगा कि कोई मनुष्य अचूक नहीं है, कि जिन धर्म-सुधारकों, प्यूरिटनों और आधुनिक धर्मशास्त्रियों का मैं उल्लेख करता हूँ वे पूरी तरह भूल में हो सकते हैं, और रोमन कैथोलिक, सोसीनियन और आर्मीनियन बिलकुल सही हो सकते हैं! हमारे प्रभु ने हमें निःसन्देह यह सिखाया है कि "किसी को स्वामी न कहो।" परन्तु जबकि मैं किसी से यह नहीं कहता कि वह धर्म-सुधारकों और प्यूरिटनों को "स्वामी" कहे, मैं लोगों से यह अवश्य कहता हूँ कि वे इस विषय में उनकी कही बातों को पढ़ें, और यदि वे कर सकें तो उनके तर्कों का उत्तर दें। यह अब तक नहीं किया गया है! जैसा कि कुछ लोग कहते हैं कि उन्हें मानवीय "मतों" और

"सिद्धान्तों" की आवश्यकता नहीं, यह कोई उत्तर है ही नहीं। विवाद का पूरा विषय यह है, "पवित्रशास्त्र के एक अंश का अर्थ क्या है? रोमियों की पत्री के सातवें अध्याय की व्याख्या कैसे की जाए? उसके शब्दों का सच्चा आशय क्या है?" फिर भी हम स्मरण रखें कि एक बड़ा तथ्य है जिसे टाला नहीं जा सकता। एक ओर धर्म-सुधारकों और प्यूरिटनों की राय और व्याख्या खड़ी है, और दूसरी ओर रोमन कैथोलिकों, सोसीनियनों और आर्मीनियनों की राय और व्याख्या। यह बात स्पष्ट रूप से समझ ली जाए।

ऐसे तथ्य के सामने मुझे उस व्यंग्यपूर्ण, ताने भरी और तिरस्कारपूर्ण भाषा के विरुद्ध अपनी आपत्ति दर्ज करानी ही होगी, जिसका प्रयोग इन दिनों रोमियों के सातवें अध्याय के उस मत के कुछ पक्षधर, जिसे मैं आर्मीनियन मत कहने को विवश हूँ, अपने विरोधियों की राय के विषय में बोलते समय प्रायः करते आए हैं। कम से कम इतना तो कहना ही होगा कि ऐसी भाषा अशोभनीय है और अपने ही उद्देश्य को विफल कर देती है। जिस पक्ष का बचाव ऐसी भाषा से किया जाए, वह उचित ही सन्देह के योग्य ठहरता है। सत्य को ऐसे हथियारों की आवश्यकता नहीं। यदि हम किसी से सहमत न हो सकें, तो उनके विचारों की चर्चा अशिष्टता और तिरस्कार के साथ करना आवश्यक नहीं। जिस मत को सर्वोत्तम धर्म-सुधारक और प्यूरिटन जनों का समर्थन और सहारा प्राप्त हो, वह उन्नीसवीं शताब्दी के सब मनों को भले ही कायल न कर सके, तौभी उसकी चर्चा आदर के साथ करना ही उचित होगा।

(5) पाँचवें, क्या आज के दिनों में "हम में मसीह" के सिद्धान्त के विषय में जो भाषा प्रायः प्रयोग की जाती है, उसका प्रयोग करना बुद्धिमानी है? मुझे सन्देह है। क्या इस सिद्धान्त को प्रायः ऐसे स्थान पर नहीं बैठा दिया जाता जो पवित्रशास्त्र में उसका नहीं है? मुझे भय है कि ऐसा ही है।

कि सच्चा विश्वासी मसीह के साथ एक है और मसीह उसमें है, इसका खण्डन करने की बात नए नियम का कोई सावधान पाठक क्षण भर भी नहीं सोचेगा। इसमें सन्देह नहीं कि मसीह और विश्वासी के बीच एक रहस्यमय एकता है। उसके साथ हम मरे, उसके साथ हम गाड़े गए, उसके साथ हम फिर जी उठे, उसके साथ हम स्वर्गीय स्थानों में बैठते हैं। हमारे पास पाँच स्पष्ट वचन हैं जिनमें हमें साफ़ सिखाया गया है कि मसीह "हम में" है, (रोमियों 8:10; गलातियों 2:20; 4:19; इफिसियों 3:17; कुलुस्सियों 3:11)। परन्तु हमें सावधान रहना चाहिए कि इस वाक्यांश से हमारा क्या अभिप्राय है। यह स्पष्ट और सीधी बात है कि "मसीह विश्वास के द्वारा हमारे हृदयों में बसता है," और अपनी आत्मा के द्वारा भीतरी कार्य करता रहता है। परन्तु यदि हमारा कहना यह हो कि इसके अतिरिक्त, इससे परे और इससे ऊपर विश्वासी में मसीह का कोई रहस्यमय निवास है, तो हमें सावधान रहना चाहिए कि हम क्या कर रहे हैं। यदि हम सावधान न रहें, तो हम पाएँगे कि हम पवित्र आत्मा के कार्य की उपेक्षा कर रहे हैं। हम भूल जाएँगे कि मनुष्य के उद्धार की ईश्वरीय योजना में चुनाव परमेश्वर पिता का विशेष कार्य है,—प्रायश्चित, मध्यस्थता और मध्यस्थता की प्रार्थना परमेश्वर पुत्र का विशेष कार्य है,—और पवित्रीकरण परमेश्वर पवित्र आत्मा का विशेष कार्य है। हम भूल जाएँगे कि हमारे प्रभु ने जाते समय कहा था कि वह हमारे पास एक और सहायक भेजेगा, जो सदा हमारे साथ "रहेगा," और मानो उसका स्थान ले लेगा। (यूहन्ना 14:16)। संक्षेप में, इस विचार के अधीन कि हम मसीह का आदर कर रहे हैं, हम पाएँगे कि हम उसके विशेष और निज दान—पवित्र आत्मा—का अनादर कर रहे हैं। निःसन्देह मसीह, परमेश्वर होने के कारण, सब स्थानों में है,—हमारे हृदयों में, स्वर्ग में, उस स्थान में जहाँ दो या तीन उसके नाम पर इकट्ठे होते हैं। परन्तु हमें सचमुच स्मरण रखना चाहिए कि मसीह, हमारे जी उठे हुए सिर और महायाजक के रूप में, विशेष रूप से परमेश्वर के दाहिने हाथ पर है और दूसरी बार आने तक हमारे लिये मध्यस्थता की प्रार्थना करता है; और यह कि मसीह अपने लोगों के हृदयों में अपना कार्य अपनी आत्मा के विशेष कार्य के द्वारा करता है, जिसे भेजने की प्रतिज्ञा उसने संसार को छोड़ते समय की थी। (यूहन्ना 15:26)। रोमियों के आठवें अध्याय की नौवीं और दसवीं आयत की तुलना मुझे यही स्पष्ट दिखाती प्रतीत होती है। यह मुझे निश्चय दिलाती है कि "हम में मसीह" का अर्थ है मसीह हम में "अपनी आत्मा के द्वारा।" सबसे बढ़कर, यूहन्ना के शब्द अत्यन्त स्पष्ट और सुनिश्चित हैं: "इसी रीति से हम जानते हैं, कि वह हम में बना रहता है, अर्थात् उस आत्मा से जो उसने हमें दिया है।" (1 यूहन्ना 3:24)।

यह सब कहने में मैं आशा करता हूँ कि कोई मुझे गलत न समझेगा। मैं यह नहीं कहता कि "हम में मसीह" वाक्यांश पवित्रशास्त्र के विरुद्ध है। परन्तु मैं यह अवश्य कहता हूँ कि इस वाक्यांश में निहित विचार को अतिरंजित और पवित्रशास्त्र-विरुद्ध महत्त्व दे दिए जाने का मुझे बड़ा खतरा दिखाई देता है; और मुझे भय है कि बहुत से लोग आज के दिनों में इसका प्रयोग ठीक-ठीक यह जाने बिना करते हैं कि उनका अभिप्राय क्या है, और अनजाने में शायद पवित्र आत्मा के सामर्थी कार्य का अनादर करते हैं। यदि किसी पाठक को लगे कि इस विषय में मैं अनावश्यक रूप से सतर्क हूँ, तो मैं उन्हें सैमुएल रदरफोर्ड (प्रसिद्ध पत्रों के लेखक) की एक विलक्षण पुस्तक, "आत्मिक मसीह-विरोधी" (The Spiritual Antichrist), की ओर ध्यान दिलाता हूँ। वे वहाँ देखेंगे कि दो शताब्दी पहले विश्वासियों में "मसीह के निवास" के इसी सिद्धान्त की अतिरंजित शिक्षा से अत्यन्त उग्र झूठी शिक्षाएँ उठ खड़ी हुई थीं। वे पाएँगे कि साल्टमार्श, डेल, टाउन और अन्य झूठे शिक्षक, जिनके विरुद्ध भले सैमुएल रदरफोर्ड ने संघर्ष किया, "हम में मसीह" की विचित्र धारणाओं से आरम्भ हुए और फिर उसी सिद्धान्त पर व्यवस्थाविरोधवाद (एन्टीनोमियनवाद) और अत्यन्त बुरे स्वरूप तथा नीच प्रवृत्ति के कट्टरपन की इमारत खड़ी कर दी। वे यह मानते थे कि विश्वासी का अलग, व्यक्तिगत जीवन पूरी तरह जाता रहा है, इसलिये मन फिरानेवाला, विश्वास करनेवाला और कार्य करनेवाला उसमें जीवित मसीह ही है! इस भारी भ्रम की जड़ ऐसे वचनों की जबरन और पवित्रशास्त्र-विरुद्ध व्याख्या थी जैसे "मैं जीवित हूँ; तौभी मैं नहीं, परन्तु मसीह मुझ में जीवित है।" (गलातियों 2:20)। और इसका स्वाभाविक परिणाम यह हुआ कि इस मत के बहुत से अभागे अनुयायी इस सुखद निष्कर्ष पर पहुँचे कि विश्वासी चाहे जो करें, वे उत्तरदायी नहीं! विश्वासी, भला, मर चुके और गाड़े जा चुके थे; और उनमें केवल मसीह जीवित था, और वही उनके लिये सब कुछ सँभालता था! अन्तिम परिणाम यह हुआ कि कुछ ने सोचा कि वे शारीरिक निश्चिन्तता में बैठे रह सकते हैं, क्योंकि उनका व्यक्तिगत उत्तरदायित्व पूरी तरह समाप्त हो गया है, और वे बिना किसी भय के किसी भी प्रकार का पाप कर सकते हैं! हम यह कभी न भूलें कि सत्य, जब विकृत और अतिरंजित कर दिया जाए, तो अत्यन्त खतरनाक झूठी शिक्षाओं की जननी बन सकता है। जब हम "हम में मसीह" की बात करें, तो सावधान रहें कि समझाएँ कि हमारा अभिप्राय क्या है। मुझे भय है कि आज के दिनों में कुछ लोग इसकी उपेक्षा करते हैं।

(6) छठे, क्या रूपान्तरण और समर्पण, या तथाकथित ऊँचे जीवन, के बीच इतनी गहरी, चौड़ी और स्पष्ट विभाजन-रेखा खींचना बुद्धिमानी है, जैसी आज के दिनों में बहुत से लोग खींचते हैं? क्या यह परमेश्वर के वचन के अनुपात के अनुसार है? मुझे सन्देह है।

निःसन्देह इस शिक्षा में कुछ भी नया नहीं है। यह भली-भाँति ज्ञात है कि रोमी कलीसिया के लेखक प्रायः यह मानते हैं कि कलीसिया तीन श्रेणियों में बँटी है—पापी, पश्चात्तापी, और सन्त। आज के जो आधुनिक शिक्षक हमें बताते हैं कि मसीही होने का दावा करनेवाले तीन प्रकार के होते हैं—अपरिवर्तित, परिवर्तित, और पूर्ण समर्पण के "उच्चतर जीवन" के भागी—मुझे तो वे बहुत कुछ उसी भूमि पर खड़े दिखाई देते हैं! परन्तु यह विचार चाहे पुराना हो या नया, रोमी हो या अंग्रेज़ी, मैं यह देखने में बिलकुल असमर्थ हूँ कि पवित्रशास्त्र में इसका कोई आधार है। परमेश्वर का वचन सदा मनुष्यजाति के दो ही बड़े भाग बताता है, इससे अधिक नहीं। वह पाप में जीवित और मृतकों की बात करता है—विश्वासी और अविश्वासी की, परिवर्तित और अपरिवर्तित की, सकरे मार्ग के यात्रियों और चौड़े मार्ग के यात्रियों की, बुद्धिमानों और मूर्खों की, परमेश्वर की सन्तान और शैतान की सन्तान की। इन दोनों बड़ी श्रेणियों में से प्रत्येक के भीतर निःसन्देह पाप और अनुग्रह की भिन्न-भिन्न मात्राएँ होती हैं; परन्तु वह केवल एक ढालू सतह के ऊपरी और निचले सिरे का अन्तर है। इन दोनों बड़ी श्रेणियों के बीच एक विशाल खाई है: वे जीवन और मृत्यु, उजियाले और अंधकार, स्वर्ग और नरक के समान सर्वथा भिन्न हैं। परन्तु तीन श्रेणियों में विभाजन के विषय में परमेश्वर का वचन कुछ भी नहीं कहता! मुझे उन नई-नवेली विभाजन-रेखाओं को खींचने की बुद्धिमानी पर सन्देह है जिन्हें बाइबल ने नहीं खींचा, और मुझे दूसरे परिवर्तन की धारणा सर्वथा अप्रिय है।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि अनुग्रह की एक मात्रा और दूसरी मात्रा में बहुत बड़ा अन्तर है—कि आत्मिक जीवन बढ़ने की गुंजाइश रखता है, और विश्वासियों को हर प्रकार से निरन्तर अनुग्रह में बढ़ते जाने का आग्रह किया जाना चाहिए—यह सब मैं पूरी तरह मानता हूँ। परन्तु किसी विश्वासी के एक ही छलांग में अचानक, रहस्यमय रीति से आशीष और पूर्ण समर्पण की अवस्था में पहुँच जाने का सिद्धान्त मैं स्वीकार नहीं कर सकता। मुझे यह मनुष्य की गढ़ी हुई बात लगती है; और पवित्रशास्त्र में इसे प्रमाणित करनेवाला एक भी स्पष्ट पद मुझे दिखाई नहीं देता। अनुग्रह में क्रमिक वृद्धि, ज्ञान में वृद्धि, विश्वास में वृद्धि, प्रेम में वृद्धि, पवित्रता में वृद्धि, नम्रता में वृद्धि, आत्मिक मन में वृद्धि—यह सब मैं पवित्रशास्त्र में स्पष्ट सिखाया और आग्रहपूर्वक कहा हुआ देखता हूँ, और परमेश्वर के अनेक सन्तों के जीवन में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। परन्तु परिवर्तन से समर्पण तक अचानक, तत्काल छलांगें बाइबल में मुझे दिखाई नहीं देतीं। वास्तव में मुझे सन्देह है कि क्या हमें यह कहने का कोई अधिकार है कि कोई मनुष्य परमेश्वर को समर्पित हुए बिना परिवर्तित हो सकता है! वह और अधिक समर्पित हो सकता है, और अपने अनुग्रह के बढ़ने के साथ होगा भी; परन्तु यदि वह जिस दिन परिवर्तित हुआ और नया जन्म पाया, उसी दिन परमेश्वर को समर्पित नहीं हुआ, तो मैं नहीं जानता कि परिवर्तन का अर्थ क्या है। क्या लोग परिवर्तन की असीम आशीष को कम आँकने और उसका मूल्य घटाने के संकट में नहीं हैं? जब वे विश्वासियों से "उच्चतर जीवन" को दूसरे परिवर्तन के रूप में माँगते हैं, तो क्या वे उस महान प्रथम परिवर्तन की लम्बाई, चौड़ाई, गहराई और ऊँचाई को कम नहीं आँक रहे, जिसे पवित्रशास्त्र नया जन्म, नई सृष्टि और आत्मिक पुनरुत्थान कहता है? हो सकता है मैं भूल कर रहा हूँ। परन्तु पिछले कुछ वर्षों में बहुतों के द्वारा "समर्पण" के विषय में प्रयुक्त कठोर भाषा पढ़ते हुए मुझे कभी-कभी लगा है कि ऐसी भाषा बोलनेवालों ने पहले "परिवर्तन" के विषय में अवश्य ही बहुत निम्न और अपर्याप्त धारणा रखी होगी, यदि वे परिवर्तन के विषय में कुछ जानते भी थे। संक्षेप में, मुझे लगभग यह सन्देह हुआ है कि जब वे समर्पित हुए, तब वास्तव में वे पहली बार परिवर्तित हुए थे!

मैं खुलकर स्वीकार करता हूँ कि मैं पुराने मार्गों को पसन्द करता हूँ। मुझे यह अधिक बुद्धिमानी और सुरक्षित लगता है कि सब परिवर्तित लोगों के सामने अनुग्रह में निरन्तर बढ़ते जाने की सम्भावना, और आगे बढ़ते रहने की, अधिकाधिक बढ़ते जाने की, और हर वर्ष अपने आत्मा, प्राण और शरीर को मसीह के प्रति और अधिक समर्पित और अर्पित करते जाने की परम आवश्यकता पर बल दिया जाए। हम अवश्य सिखाएँ कि प्राप्त करने के लिए अभी और पवित्रता है, और पृथ्वी पर आनन्द लेने के लिए स्वर्ग का उससे कहीं अधिक अंश है जितना अधिकांश विश्वासी अब अनुभव करते हैं। परन्तु मैं किसी परिवर्तित मनुष्य से यह कहने से इनकार करता हूँ कि उसे दूसरे परिवर्तन की आवश्यकता है, और कि वह किसी दिन एक ही विशाल कदम में पूर्ण समर्पण की अवस्था में पहुँच सकता है। मैं इसे सिखाने से इनकार करता हूँ, क्योंकि मुझे पवित्रशास्त्र में ऐसी शिक्षा का कोई आधार नहीं दिखता। मैं इसे सिखाने से इनकार करता हूँ, क्योंकि मैं समझता हूँ कि इस सिद्धान्त की प्रवृत्ति पूरी तरह हानिकारक है; यह दीन और नम्र मनवालों को निराश करती है, और उथले, अज्ञानी और घमण्डी लोगों को अत्यन्त संकटपूर्ण सीमा तक फुला देती है।

(7) सातवें और अन्तिम स्थान पर, क्या विश्वासियों को यह सिखाना बुद्धिमानी है कि उन्हें पाप से लड़ने और संघर्ष करने के विषय में इतना अधिक नहीं सोचना चाहिए, बल्कि "अपने आप को परमेश्वर के हाथ सौंप देना" चाहिए और मसीह के हाथों में निष्क्रिय रहना चाहिए? क्या यह परमेश्वर के वचन के अनुपात के अनुसार है? मुझे सन्देह है।

यह एक सीधा-सादा तथ्य है कि "अपने आप को सौंप दो" यह वाक्यांश नए नियम में केवल एक ही स्थान पर विश्वासियों के लिए कर्तव्य के रूप में मिलता है। वह स्थान रोमियों का छठा अध्याय है, और वहाँ छः पदों के भीतर यह वाक्यांश पाँच बार आता है। (देखिए रोमियों 6:13–19।) परन्तु वहाँ भी यह शब्द "अपने आप को निष्क्रिय भाव से किसी दूसरे के हाथों में रख देने" का अर्थ नहीं सह सकता। यूनानी भाषा का कोई भी विद्यार्थी बता सकता है कि इसका अर्थ तो उपयोग, काम और सेवा के लिए अपने आप को सक्रिय रूप से "प्रस्तुत करना" है। (देखिए रोमियों 12:1।) इसलिए यह वाक्यांश अकेला ही खड़ा है। परन्तु दूसरी ओर, पत्रियों में कम से कम पच्चीस-तीस अलग-अलग अंश गिनाना कठिन न होगा जिनमें विश्वासियों को स्पष्ट रूप से सक्रिय व्यक्तिगत परिश्रम करने की शिक्षा दी गई है, और उन्हें वह सब पूरे उत्साह से करने का उत्तरदायी ठहराया गया है जो मसीह उनसे करवाना चाहता है; उनसे यह नहीं कहा गया कि निष्क्रिय साधन बनकर "अपने आप को सौंप" दें और चुपचाप बैठे रहें, परन्तु यह कि उठें और काम करें। पवित्र उग्रता, संघर्ष, युद्ध, लड़ाई, सैनिक का जीवन और कुश्ती—इन्हें सच्चे मसीही की पहचान बताया गया है। कोई सोच सकता है कि इफिसियों के छठे अध्याय में "परमेश्वर के हथियारों" का जो वर्णन है, वही इस प्रश्न को सुलझा देता है।*—फिर, यह दिखाना भी सरल होगा कि "केवल परमेश्वर के प्रति अपने आप को सौंप देने" के द्वारा, व्यक्तिगत परिश्रम के बिना, पवित्रीकरण का जो सिद्धान्त है, वह ठीक वही सिद्धान्त है जो सत्रहवीं शताब्दी के उन व्यवस्था-विरोधी उन्मादियों का था (जिनका उल्लेख मैं पहले कर चुका हूँ, और जिनका वर्णन रदरफ़र्ड की "आत्मिक मसीह-विरोधी" में है), और इसकी प्रवृत्ति अत्यन्त बुरी है।—फिर, यह दिखाना भी सरल होगा कि यह सिद्धान्त "यात्री की प्रगति" जैसी परखी हुई और मान्य पुस्तकों की सारी शिक्षा को जड़ से उखाड़ देता है, और यदि हम इसे स्वीकार करें तो बनयन की उस पुरानी पुस्तक को आग में डाल देने से बेहतर कुछ नहीं। यदि "यात्री की प्रगति" का मसीही केवल अपने आप को परमेश्वर को सौंपता रहा, और कभी न लड़ा, न संघर्ष किया, न कुश्ती की, तो मैंने उस प्रसिद्ध रूपक को व्यर्थ ही पढ़ा है। परन्तु सीधी सच्चाई यह है कि मनुष्य दो भिन्न बातों को—अर्थात् धर्मी ठहराया जाना और पवित्रीकरण को—आपस में मिला देने पर अड़े रहते हैं। धर्मी ठहराए जाने में मनुष्य से कहने का वचन यह है: विश्वास करो,—केवल विश्वास करो; पवित्रीकरण में वचन यह होना चाहिए: "जागते रहो, प्रार्थना करो, और लड़ो।" जिसे परमेश्वर ने अलग किया है, उसे हम मिलाकर गड़बड़ न करें।

मैं अपनी भूमिका के विषय को यहीं छोड़ता हूँ, और निष्कर्ष की ओर शीघ्रता से बढ़ता हूँ। मैं मानता हूँ कि मैं शोक और चिन्ता के भावों के साथ अपनी कलम रख रहा हूँ। आज के दिन मसीही कहलानेवालों के रवैये में बहुत कुछ ऐसा है जो मुझे चिन्ता से भर देता है, और भविष्य के विषय में मुझे भय से भर देता है।

बहुतों में पवित्रशास्त्र के विषय में आश्चर्यजनक अज्ञानता है, और इसके फलस्वरूप स्थिर, ठोस धर्म का अभाव है। और किसी रीति से मैं इस बात को नहीं समझा सकता कि लोग इतनी सरलता से बच्चों के समान "उछाले जाते और हर एक प्रकार के सिद्धान्त के झोंके से इधर-उधर घुमाए जाते हैं।" (इफिसियों 4:14।) एथेंस के लोगों के समान नई-नई बातों का प्रेम फैला हुआ है, और हमारे पूर्वजों की चली आई, नियमित और घिसी-पिटी राह की किसी भी पुरानी बात के प्रति रोगी अरुचि है। हज़ारों लोग किसी नई आवाज़ और नए सिद्धान्त को सुनने के लिए भीड़ लगाते हैं, और क्षण भर भी यह नहीं सोचते कि जो वे सुन रहे हैं वह सत्य है या नहीं।—ऐसी हर शिक्षा के लिए लगातार लालसा है जो सनसनीखेज़ हो, उत्तेजित करे और भावनाओं को भड़काए।—एक प्रकार के झटके-भरे और उन्मादी मसीही जीवन के लिए अस्वस्थ भूख है। बहुतों का धार्मिक जीवन आत्मिक मद्यपान से कुछ ही बेहतर है, और जिस "नम्र और शान्त आत्मा" की प्रशंसा पतरस प्रेरित करता है, वह बिलकुल भुला दी गई है। (1 पतरस 3:4।) भीड़, रोना-धोना, गरम कमरे, ऊँचे-ऊँचे गीत, और भावनाओं को निरन्तर भड़काते रहना—बहुतों को केवल इन्हीं बातों की चिन्ता है।—सिद्धान्त के भेदों को पहचानने की अक्षमता दूर-दूर तक फैल रही है, और जब तक प्रचारक "चतुर" और "उत्साही" है, तब तक सैकड़ों लोग सोचते प्रतीत होते हैं कि सब ठीक ही होगा, और यदि आप संकेत भी कर दें कि वह अशुद्ध शिक्षा देता है तो वे आपको भयंकर रूप से "संकीर्ण और निर्दय" कहते हैं! मूडी और हेविस, डीन स्टैनली और कैनन लिडन, मैकोनोकी और पियर्सल स्मिथ, ऐसे लोगों की दृष्टि में सब एक-से जान पड़ते हैं। यह सब दुःखद है, बहुत दुःखद। परन्तु यदि इसके अतिरिक्त, बढ़ी हुई पवित्रता के सच्चे हृदयवाले समर्थक भी मार्ग में आपस में झगड़ने और एक-दूसरे को ग़लत समझने लगें, तो यह और भी दुःखद होगा। तब हम सचमुच बुरी दशा में होंगे।

जहाँ तक मेरी बात है, मैं जानता हूँ कि मैं अब जवान सेवक नहीं रहा। मेरा मन शायद कठोर हो चला है, और मैं किसी नए सिद्धान्त को सरलता से ग्रहण नहीं कर सकता। "पुराना ही अच्छा है।" मैं समझता हूँ कि मैं सुसमाचारीय धर्मविज्ञान की पुरानी पाठशाला का हूँ, और इसलिए पवित्रीकरण के विषय में जैसी शिक्षा सिब्ज़ और मैन्टन के "विश्वास का जीवन" में तथा विलियम रोमेन के "विश्वास का जीवन, चाल और विजय" में मिलती है, उसी से मैं सन्तुष्ट हूँ। परन्तु मैं यह आशा अवश्य प्रकट करूँगा कि मेरे जो छोटे भाई पवित्रता के विषय में नए विचार अपना चुके हैं, वे अकारण विभाजन बढ़ाने से सावधान रहें। क्या वे सोचते हैं कि आज के समय में मसीही जीवन के ऊँचे स्तर की आवश्यकता है? मैं भी यही सोचता हूँ।—क्या वे सोचते हैं कि पवित्रता के विषय में अधिक स्पष्ट, सशक्त और पूर्ण शिक्षा की आवश्यकता है? मैं भी यही सोचता हूँ।—क्या वे सोचते हैं कि मसीह को धर्मी ठहराए जाने के साथ-साथ पवित्रीकरण का भी मूल और कर्ता मानकर अधिक ऊँचा उठाना चाहिए? मैं भी यही सोचता हूँ।—क्या वे सोचते हैं कि विश्वासियों से और अधिक आग्रह किया जाना चाहिए कि वे विश्वास से जीएँ? मैं भी यही सोचता हूँ।—क्या वे सोचते हैं कि सुख और उपयोगिता के रहस्य के रूप में विश्वासियों के सामने परमेश्वर के साथ अति निकट की चाल पर और अधिक बल दिया जाना चाहिए? मैं भी यही सोचता हूँ।—इन सब बातों में हम सहमत हैं। परन्तु यदि वे इससे आगे जाना चाहते हैं, तो मैं उनसे कहता हूँ कि सोच-समझकर पैर रखें, और जो उनका आशय है उसे अत्यन्त स्पष्ट और साफ़ शब्दों में समझाएँ।

अन्त में, मुझे प्रेम के साथ यह कहना है कि पवित्रीकरण की शिक्षा देने में अटपटे और नए गढ़े हुए शब्दों और वाक्यांशों का प्रयोग करना अनुचित है। मेरा निवेदन है कि पवित्रता के पक्ष में कोई आन्दोलन नए गढ़े हुए शब्दों से, या असन्तुलित और एकपक्षीय कथनों से, या किन्हीं विशेष पदों को खींचतान कर अलग-थलग करने से, या एक सत्य को दूसरे की हानि पर ऊँचा उठाने से, या पदों का रूपक बनाकर उन पर मनमाना अर्थ चढ़ाने और उनमें से ऐसे अर्थ निचोड़ने से जो पवित्र आत्मा ने उनमें कभी रखे ही नहीं, या उन लोगों के विषय में तिरस्कार और कटुता से बोलने से, जो हमारी आँखों से सब कुछ पूरी तरह नहीं देखते और ठीक हमारे ढंग से काम नहीं करते, आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। ये बातें मेल-मिलाप की ओर नहीं ले जातीं; ये तो बहुतों को दूर हटा देती हैं और उन्हें दूरी पर ही रखती हैं। सच्चे पवित्रीकरण के उद्देश्य को ऐसे हथियारों से सहायता नहीं, बाधा ही पहुँचती है। पवित्रता की सहायता के लिए ऐसा आन्दोलन, जो परमेश्वर की सन्तानों के बीच झगड़ा और विवाद उत्पन्न करे, कुछ सन्देहजनक है। मसीह के नाम पर, और सत्य तथा प्रेम के नाम पर, आइए हम पवित्रता के साथ-साथ मेल-मिलाप का भी पीछा करने का यत्न करें। "इसलिए जिसे परमेश्वर ने जोड़ा है, उसे मनुष्य अलग न करे।"

मेरे हृदय की अभिलाषा है, और मैं प्रतिदिन परमेश्वर से प्रार्थना करता हूँ, कि इंग्लैंड में मसीही कहलानेवालों के बीच व्यक्तिगत पवित्रता बहुत बढ़े। परन्तु मुझे भरोसा है कि जो कोई उसे बढ़ाने का यत्न करें, वे सब पवित्रशास्त्र के अनुपात से दृढ़ता के साथ बँधे रहेंगे, भिन्न बातों में सावधानी से भेद करेंगे, और "बहुमूल्य को निकम्मे से" अलग करेंगे। (यिर्मयाह 15:19)

I. पाप

"पाप व्यवस्था का उल्लंघन है।"—1 यूहन्ना 3:4

जो मसीही पवित्रता के विषय में सही विचार पाना चाहता है, उसे पाप के विशाल और गम्भीर विषय की जाँच से आरम्भ करना होगा। यदि वह ऊँचा निर्माण करना चाहता है तो उसे बहुत गहरी खुदाई करनी होगी। यहाँ भूल करना अत्यन्त हानिकारक है। पवित्रता के विषय में गलत विचार प्रायः मानवीय भ्रष्टता के विषय में गलत विचारों से उत्पन्न होते हैं। पवित्रता पर इस लेख-संग्रह को आरम्भ करते हुए पाप के विषय में कुछ सीधी बातें कहने के लिए मैं कोई क्षमा नहीं माँगता।

सीधा सत्य यह है कि पाप का सही ज्ञान हर उद्धार देनेवाले मसीही विश्वास की जड़ में है। इसके बिना धर्मी ठहराया जाना, मन-परिवर्तन और पवित्रीकरण जैसे सिद्धान्त केवल "शब्द और नाम" हैं, जो मन तक कोई अर्थ नहीं पहुँचाते। इसलिए जब परमेश्वर किसी को मसीह में नई सृष्टि बनाता है, तो वह सबसे पहले उसके हृदय में ज्योति भेजता है और उसे दिखाता है कि वह एक दोषी पापी है। उत्पत्ति में भौतिक सृष्टि का आरम्भ "ज्योति" से हुआ, और आत्मिक सृष्टि का आरम्भ भी इसी से होता है। परमेश्वर पवित्र आत्मा के कार्य द्वारा "हमारे हृदयों में चमकता है," और तब आत्मिक जीवन आरम्भ होता है। (2 कुरिन्थियों 4:6)—पाप के विषय में धुँधले या अस्पष्ट विचार ही आज के अधिकांश भ्रमों, झूठी शिक्षाओं और मिथ्या सिद्धान्तों के मूल हैं। यदि मनुष्य अपनी आत्मा के रोग की खतरनाक प्रकृति को नहीं पहचानता, तो यदि वह झूठे या अधूरे उपचारों से सन्तुष्ट रहता है तो आश्चर्य की बात नहीं। मेरा विश्वास है कि उन्नीसवीं शताब्दी में कलीसिया की सबसे बड़ी आवश्यकताओं में से एक यही रही है, और अब भी है, कि पाप के विषय में अधिक स्पष्ट और पूरी शिक्षा दी जाए।

(1) मैं इस विषय को पाप की कोई परिभाषा देकर आरम्भ करूँगा। "पाप" और "पापी" शब्दों से हम सब निस्सन्देह परिचित हैं। हम प्रायः कहते हैं कि संसार में "पाप" है और मनुष्य

"पाप" करते हैं। परन्तु इन शब्दों और वाक्यांशों से हमारा क्या अर्थ है? क्या हम सचमुच जानते हैं? मुझे भय है कि इस बात पर बहुत मानसिक उलझन और धुँधलापन है। मैं यथासम्भव संक्षेप में इसका उत्तर देने का यत्न करता हूँ।

तो मैं कहता हूँ कि सामान्य रूप से कहें तो "पाप" वही है जो हमारी कलीसिया का नौवाँ अनुच्छेद कहता है: "हर उस मनुष्य के स्वभाव का दोष और भ्रष्टता जो स्वाभाविक रूप से आदम की सन्तान में जन्म लेता है; जिसके कारण मनुष्य मूल धार्मिकता से बहुत दूर निकल गया है (लातीनी में quam longissimè है), और अपने स्वभाव से ही बुराई की ओर झुका हुआ है, यहाँ तक कि शरीर सदा आत्मा के विरुद्ध अभिलाषा करता है; और इसलिए संसार में जन्मा हर व्यक्ति परमेश्वर के क्रोध और दण्ड के योग्य है।" संक्षेप में, पाप वह विशाल नैतिक रोग है जो मानव जाति के हर पद, वर्ग, नाम, जाति, लोग और भाषा को प्रभावित करता है; एक ऐसा रोग जिससे स्त्री से जन्मा केवल एक ही मुक्त था। क्या मुझे कहने की आवश्यकता है कि वह एक यीशु मसीह प्रभु था?

मैं आगे यह भी कहता हूँ कि अधिक विशेष रूप से कहें तो "एक पाप" में कुछ भी करना, कहना, सोचना या कल्पना करना सम्मिलित है जो परमेश्वर के मन और व्यवस्था के पूर्ण अनुरूप न हो। संक्षेप में, पवित्रशास्त्र के अनुसार "पाप" "व्यवस्था का उल्लंघन" है। (1 यूहन्ना 3:4) परमेश्वर की प्रकट की हुई इच्छा और चरित्र के साथ पूर्ण गणितीय समानान्तरता से बाहरी या भीतरी किसी भी तनिक विचलन से पाप ठहरता है, और हम तुरन्त परमेश्वर की दृष्टि में दोषी हो जाते हैं।

निस्सन्देह, जो कोई अपनी बाइबल ध्यान से पढ़ता है, उससे मुझे यह कहने की आवश्यकता नहीं कि मनुष्य हृदय और विचार में परमेश्वर की व्यवस्था तोड़ सकता है, जबकि दुष्टता का कोई प्रत्यक्ष और दिखाई देनेवाला कार्य न हो। हमारे प्रभु ने पहाड़ी उपदेश में इस बात को निर्विवाद रूप से निपटा दिया है। (मत्ती 5:21-28) हमारे अपने एक कवि ने भी सच कहा है, "मनुष्य मुस्कुराता और मुस्कुराता रह सकता है, और फिर भी दुष्ट हो सकता है।"

फिर, नए नियम के सावधान विद्यार्थी से मुझे यह कहने की आवश्यकता नहीं कि करने के पापों के साथ-साथ न करने के पाप भी हैं, और जैसा कि हमारी प्रार्थना-पुस्तक उचित रूप से स्मरण दिलाती है, हम "जो काम करने चाहिए थे उन्हें छोड़ देने" से उतना ही सचमुच पाप करते हैं जितना "जो काम नहीं करने चाहिए थे उन्हें करने" से। मत्ती के सुसमाचार में हमारे स्वामी के गम्भीर वचन इस बात को भी निर्विवाद बना देते हैं। वहाँ लिखा है, "हे श्रापित लोगो, मेरे सामने से उस अनन्त आग में चले जाओ... क्योंकि मैं भूखा था, और तुम ने मुझे खाने को नहीं दिया; मैं प्यासा था, और तुम ने मुझे पानी नहीं पिलाया।" (मत्ती 25:41, 42) पवित्र आर्चबिशप अशर ने अपनी मृत्यु से ठीक पहले एक गहरी और विचारपूर्ण बात कही थी—"हे प्रभु, मेरे सब पापों को क्षमा कर, और विशेष रूप से न करने के मेरे पापों को।"

परन्तु इन दिनों में मैं यह आवश्यक समझता हूँ कि अपने पाठकों को स्मरण दिलाऊँ कि मनुष्य पाप कर सकता है और फिर भी उससे अनजान रह सकता है, और दोषी होते हुए भी अपने आप को निर्दोष मान सकता है। आजकल जो यह कहा जाता है कि "पाप तब तक हमारे लिये पाप नहीं है जब तक हम उसे पहचान न लें और उसके विषय में सचेत न हों," उसके लिये मुझे पवित्रशास्त्र में कोई आधार दिखाई नहीं देता। इसके विपरीत, उस अनुचित रूप से उपेक्षित पुस्तक लैव्यव्यवस्था के 4 और 5 अध्याय में, और गिनती के 15 अध्याय में, मैं देखता हूँ कि इस्राएल को स्पष्ट रूप से सिखाया गया था कि अनजाने में किए गए पाप भी होते हैं जो लोगों को अशुद्ध ठहराते हैं और जिनके लिये प्रायश्चित आवश्यक है। (लैव्य. 4:1–35; 5:14–19; गिनती 15:25–29।) और मैं यह भी देखता हूँ कि हमारे प्रभु ने स्पष्ट रूप से सिखाया कि "जो दास अपने स्वामी की इच्छा नहीं जानता था और उसने उसे पूरा न किया," वह अपनी अनजानता के कारण छूट नहीं गया, परन्तु "मार खाएगा" अर्थात् दण्ड पाएगा। (लूका 12:48।) हमें यह स्मरण रखना अच्छा होगा कि जब हम अपने ही अत्यन्त अधूरे ज्ञान और चेतना को अपनी पापमयता का माप बना लेते हैं, तो हम बहुत ही खतरनाक भूमि पर होते हैं। लैव्यव्यवस्था का और गहरा अध्ययन हमारे लिये बहुत लाभदायक हो सकता है।

(2) इस विशाल नैतिक रोग के, जिसे "पाप" कहा जाता है, मूल और स्रोत के विषय में मुझे कुछ कहना है। मुझे भय है कि इस विषय में बहुत से नाममात्र के मसीहियों के विचार खेदजनक रूप से अधूरे और अनुचित हैं। मैं इसे अनदेखा करने का साहस नहीं कर सकता। तो हम इसे अपने मन में भली-भाँति बैठा लें कि मनुष्य की पापमयता बाहर से नहीं, परन्तु भीतर से आरम्भ होती है। यह बचपन के बुरे पालन-पोषण का परिणाम नहीं है। यह बुरी संगति और बुरे उदाहरणों से नहीं सीखी जाती, जैसा कि कुछ निर्बल मसीही कहना बहुत पसन्द करते हैं। नहीं! यह तो एक पारिवारिक रोग है, जो हमें अपने आदि माता-पिता, आदम और हव्वा, से विरासत में मिला है और जिसके साथ हम जन्म लेते हैं। "परमेश्वर के स्वरूप" में सृजे जाकर, आरम्भ में निर्दोष और धर्मी होकर, हमारे आदि माता-पिता मूल धार्मिकता से गिर गए और पापी तथा भ्रष्ट हो गए। और उसी दिन से लेकर आज तक सब स्त्री-पुरुष गिरे हुए आदम और हव्वा के स्वरूप में जन्म लेते हैं, और बुराई की ओर झुके हुए हृदय और स्वभाव को विरासत में पाते हैं। "एक मनुष्य के द्वारा पाप जगत में आया।"—"जो शरीर से जन्मा है वह शरीर है।"—"हम स्वभाव ही से क्रोध की सन्तान हैं।"—"शारीरिक मन परमेश्वर से बैर है।"—"मन के भीतर से (स्वाभाविक रूप से, जैसे सोते से) बुरे विचार, व्यभिचार" और इसी प्रकार की बातें निकलती हैं। (यूहन्ना 3:6; इफि. 2:3; रोमियों 8:7; मरकुस 7:21।) इस वर्ष जीवन में आनेवाला सबसे सुन्दर शिशु, जो किसी परिवार की किरण बन गया हो, वह वैसा "स्वर्गदूत" या "निर्दोष" नहीं है जैसा उसकी माँ शायद प्यार से उसे कहती है, परन्तु एक छोटा "पापी" है। हाय! जब वह पालने में मुस्कुराता और किलकारियाँ मारता है, तब वह नन्हा प्राणी अपने हृदय में हर प्रकार की दुष्टता के बीज लिये हुए है! बस उसे ध्यान से देखिए, जैसे-जैसे उसका कद बढ़ता है और उसका मन विकसित होता है, आप शीघ्र ही उसमें बुराई की ओर निरन्तर झुकाव और भलाई की ओर अनिच्छा पाएँगे। आप उसमें छल, बुरे स्वभाव, स्वार्थ, हठ, अड़ियलपन, लालच, डाह, जलन और क्रोध की कलियाँ और अंकुर देखेंगे, जो यदि उन्हें प्रश्रय दिया जाए और अकेला छोड़ दिया जाए, तो दुःखद शीघ्रता से बढ़ जाएँगे। बच्चे को ये बातें किसने सिखाईं? उसने ये कहाँ से सीखीं? इन प्रश्नों का उत्तर केवल बाइबल ही दे सकती है!—माता-पिता अपने बच्चों के विषय में जितनी मूर्खता की बातें कहते हैं, उनमें इस आम कथन से बुरी कोई नहीं:—"मेरे बेटे का हृदय मूल रूप से अच्छा है। वह वैसा नहीं है जैसा उसे होना चाहिए; परन्तु वह बुरे हाथों में पड़ गया है। सार्वजनिक स्कूल बुरी जगहें हैं। शिक्षक लड़कों की उपेक्षा करते हैं। फिर भी उसका हृदय मूल रूप से अच्छा है।"—दुर्भाग्य से सत्य ठीक इसके विपरीत है। सब पाप का पहला कारण लड़के के अपने ही हृदय की स्वाभाविक भ्रष्टता में है, स्कूल में नहीं।

(3) मनुष्य के इस विशाल नैतिक रोग की, जिसे पाप कहते हैं, व्यापकता के विषय में हम सावधान रहें कि कोई भूल न करें। एकमात्र सुरक्षित आधार वही है जो पवित्रशास्त्र में हमारे लिये रखा गया है। "उसके मन के विचार की हर एक भावना" स्वभाव से "बुरी ही बुरी होती है, और सदा ऐसी ही रहती है।"—"मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखेबाज़ होता है, उस में असाध्य रोग लगा है।" (उत्पत्ति 6:5; यिर्म. 17:9।) पाप एक ऐसा रोग है जो हमारी नैतिक बनावट के हर भाग में और हमारे मन की हर शक्ति में फैला और समाया हुआ है। बुद्धि, भावनाएँ, तर्कशक्ति और इच्छा, सब न्यूनाधिक रूप से इससे संक्रमित हैं। यहाँ तक कि विवेक भी ऐसा अन्धा हो गया है कि उस पर निश्चित मार्गदर्शक के रूप में भरोसा नहीं किया जा सकता, और जब तक पवित्र आत्मा उसे प्रकाशित न करे, वह मनुष्यों को सही मार्ग पर ले जाने के समान ही गलत मार्ग पर भी ले जा सकता है। संक्षेप में, "नख से सिर तक" हम में "कुछ भी भला-चंगा नहीं।" (यशा. 1:6।) यह रोग शिष्टाचार, विनम्रता, अच्छे व्यवहार और बाहरी मर्यादा के एक पतले आवरण के नीचे छिपा हो सकता है; परन्तु यह स्वभाव में बहुत गहराई तक बैठा है।

मैं पूरी तरह मानता हूँ कि मनुष्य में अब भी अनेक उत्तम और श्रेष्ठ क्षमताएँ बची हुई हैं, और कला, विज्ञान तथा साहित्य में वह असीम योग्यता दिखाता है। परन्तु फिर भी यह तथ्य अपनी जगह बना रहता है कि आत्मिक बातों में वह पूरी तरह "मरा हुआ" है, और उसमें परमेश्वर का न कोई स्वाभाविक ज्ञान है, न प्रेम, न भय। उसकी सर्वोत्तम बातें भी भ्रष्टता से इतनी गुँथी और मिली हुई हैं कि यह विषमता पतन की सच्चाई और व्यापकता को और अधिक स्पष्टता से उभार देती है। यह कि एक ही प्राणी कुछ बातों में इतना ऊँचा और कुछ में इतना नीचा हो,—इतना महान और फिर भी इतना तुच्छ,—इतना श्रेष्ठ और फिर भी इतना नीच,—भौतिक वस्तुओं की कल्पना और रचना में इतना भव्य, और फिर भी अपनी भावनाओं में इतना पतित और गिरा हुआ,—कि वह मिस्र के कर्नाक और लक्सर तथा एथेन्स के पार्थेनन जैसे भवनों की योजना बनाकर उन्हें खड़ा कर सके, और फिर भी नीच देवी-देवताओं, पक्षियों, पशुओं और रेंगनेवाले जन्तुओं की पूजा करे,—कि वह एस्किलस और सोफोक्लीज़ जैसी त्रासदियाँ और थूसीडाइडीज़ जैसा इतिहास रच सके, और फिर भी रोमियों की पत्री के पहले अध्याय में वर्णित घृणित दुर्गुणों का दास बना रहे,—यह सब उन लोगों के लिए एक कठिन पहेली है जो "लिखित परमेश्वर के वचन" का उपहास करते हैं और हमें बाइबल-पूजक कहकर हमारी हँसी उड़ाते हैं। परन्तु यह एक ऐसी गाँठ है जिसे हम बाइबल हाथ में लेकर खोल सकते हैं। हम मान सकते हैं कि मनुष्य में एक भव्य मन्दिर के सारे चिह्न हैं,—ऐसा मन्दिर जिसमें कभी परमेश्वर का निवास था, परन्तु जो अब पूरी तरह खण्डहर हो चुका है,—ऐसा मन्दिर जिसमें कहीं टूटी हुई खिड़की, कहीं द्वार और कहीं एक स्तम्भ अब भी उसकी मूल रचना की भव्यता का धुँधला-सा आभास देता है, परन्तु जो सिरे से सिरे तक अपनी महिमा खो चुका है और अपनी ऊँची दशा से गिर गया है। और हम कहते हैं कि मनुष्य की दशा की इस जटिल समस्या को केवल मूल पाप, अर्थात् जन्म के पाप, के सिद्धान्त और पतन के कुचल देनेवाले प्रभावों के सिवाय और कुछ नहीं सुलझाता।

इसके अतिरिक्त हम यह भी स्मरण रखें कि संसार का हर भाग इस तथ्य की गवाही देता है कि पाप सारी मानवजाति का सार्वभौमिक रोग है। पृथ्वी को पूर्व से पश्चिम तक और ध्रुव से ध्रुव तक खोज डालो,—पृथ्वी के चारों कोनों में हर जलवायु की हर जाति को खोज लो,—अपने ही देश के सर्वोच्च से लेकर निम्नतम तक हर पद और वर्ग को खोज लो,—और हर परिस्थिति और दशा में रिपोर्ट सदा एक-सी ही मिलेगी। प्रशान्त महासागर के सबसे दूरस्थ द्वीप, जो यूरोप, एशिया, अफ्रीका और अमेरिका से पूरी तरह कटे हुए हैं, जहाँ न पूर्वी विलासिता पहुँचती है और न पश्चिमी कला और साहित्य,—ऐसे द्वीप जहाँ के निवासी पुस्तकों, धन, भाप और बारूद से अनजान हैं—जो आधुनिक सभ्यता के दुर्गुणों से अछूते हैं,—ये ही द्वीप, जब पहली बार खोजे गए, सदा वासना, क्रूरता, छल और अन्धविश्वास के नीचतम रूपों के निवास पाए गए। यदि वहाँ के निवासी और कुछ नहीं जानते थे, तो पाप करना उन्हें सदा आता था! हर जगह मनुष्य का हृदय स्वभाव से "सब से अधिक कपटी और असाध्य रोग से ग्रस्त है।" (यिर्मयाह 17:9) मेरी अपनी दृष्टि में उत्पत्ति की पुस्तक और मनुष्य की उत्पत्ति के विषय में मूसा के वृत्तान्त की प्रेरणा का इससे प्रबल कोई प्रमाण नहीं कि पाप की शक्ति, व्यापकता और सार्वभौमिकता कितनी है। मान लो कि सारी मानवजाति एक ही जोड़े से उत्पन्न हुई, और वह जोड़ा गिर गया (जैसा कि उत्पत्ति 3 हमें बताता है), तो हर कहीं मानव स्वभाव की दशा की व्याख्या सहज ही हो जाती है। इसे अस्वीकार करो, जैसा बहुत से करते हैं, तो तुम तुरन्त ऐसी कठिनाइयों में उलझ जाते हो जिनकी कोई व्याख्या नहीं। एक शब्द में, मानवीय भ्रष्टता की एकरूपता और सार्वभौमिकता "अविश्वास की भारी कठिनाइयों" का एक सबसे अकाट्य उदाहरण प्रस्तुत करती है।

अन्त में, मुझे विश्वास है कि पाप की व्यापकता और शक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण वह हठ है जिससे वह मनुष्य से तब भी चिपका रहता है जब वह मन फिरा चुका होता है और पवित्र आत्मा के कार्यों का पात्र बन चुका होता है। नौवें अनुच्छेद की भाषा में कहें तो, "स्वभाव का यह संक्रमण बना रहता है,—हाँ, उनमें भी जो नया जन्म पा चुके हैं।" मानवीय भ्रष्टता की जड़ें इतनी गहरी जमी हैं कि नया जन्म पाने, नवीकृत होने, "धुल जाने, पवित्र किए जाने, धर्मी ठहराए जाने" और मसीह के जीवित अंग बनाए जाने के बाद भी ये जड़ें हमारे हृदय की तह में जीवित रहती हैं, और घर की दीवारों में लगे कोढ़ के समान, जब तक इस पार्थिव तम्बू का घर टूट न जाए, हम उनसे छुटकारा नहीं पाते। निःसन्देह विश्वासी के हृदय में पाप का अब प्रभुत्व नहीं रहता। अनुग्रह के नए सिद्धान्त की निकाल बाहर करनेवाली शक्ति से वह रोका, नियन्त्रित, मारा और क्रूस पर चढ़ाया जाता है। विश्वासी का जीवन विजय का जीवन है, असफलता का नहीं। परन्तु उसके हृदय में जो संघर्ष चलते रहते हैं, वह लड़ाई जिसे उसे प्रतिदिन लड़ना आवश्यक लगता है, अपने भीतरी मनुष्य पर जो सतर्क चौकसी उसे रखनी पड़ती है, शरीर और आत्मा के बीच का संग्राम, वे भीतरी "कराहें" जिन्हें उसके सिवाय कोई नहीं जानता जिसने उन्हें अनुभव किया हो,—ये सब, ये सब एक ही महान सत्य की गवाही देते हैं, ये सब पाप की भारी शक्ति और जीवट को प्रकट करते हैं। निश्चय ही वह शत्रु कितना सामर्थी होगा जो क्रूस पर चढ़ाए जाने पर भी जीवित है! धन्य है वह विश्वासी जो इसे समझता है, और यीशु मसीह में आनन्दित होते हुए शरीर पर भरोसा नहीं रखता; और जब वह कहता है, "परमेश्वर का धन्यवाद हो जो हमें जय देता है," तब भी जागते और प्रार्थना करते रहना नहीं भूलता कि कहीं परीक्षा में न पड़े!

(4) पाप के परमेश्वर की दृष्टि में दोष, घिनौनेपन और घृणित होने के विषय में मैं थोड़े ही शब्द कहूँगा। मैं सोच-समझकर "थोड़े" कहता हूँ। मैं नहीं समझता कि वस्तुओं के स्वभाव को देखते हुए नश्वर मनुष्य उस पवित्र और सिद्ध पुरुष की दृष्टि में, जिससे हमारा सरोकार है, पाप की अत्यन्त पापमयता को किसी भी रीति से समझ सकता है। एक ओर परमेश्वर वह अनादि सत्ता है जो "अपने स्वर्गदूतों पर मूर्खता का दोष लगाता है," और जिसकी दृष्टि में "स्वर्ग भी निर्मल नहीं हैं।" वह विचारों और मनसाओं को भी, और कामों को भी, पढ़ लेता है, और "मन की सच्चाई" चाहता है। (अय्यूब 4:18; 15:15; भजन संहिता 51:6।) दूसरी ओर हम—बेचारे अन्धे प्राणी, जो आज हैं और कल नहीं, जो पाप में जन्मे, पापियों से घिरे, और निर्बलता, दुर्बलता और अपूर्णता के निरन्तर वातावरण में जीते हैं—बुराई की भयानकता की केवल अत्यन्त अपर्याप्त कल्पनाएँ ही कर सकते हैं। हमारे पास उसकी थाह लेने की कोई डोरी नहीं, और उसे नापने का कोई मापदण्ड नहीं। अन्धा मनुष्य तिशियन या राफ़ेल की किसी उत्कृष्ट कृति में और किसी गाँव के साइनबोर्ड पर बने रानी के सिर में कोई अन्तर नहीं देख सकता। बहरा मनुष्य एक छोटी बाँसुरी और गिरजाघर के बड़े अंग-बाजे में भेद नहीं कर सकता। जिन पशुओं की गन्ध हमें सबसे अधिक बुरी लगती है, उन्हें स्वयं यह ज्ञान नहीं होता कि वे बुरी गन्ध वाले हैं, और वे एक दूसरे को बुरे नहीं लगते। और मनुष्य, गिरा हुआ मनुष्य, मेरा विश्वास है, इसका ठीक विचार नहीं कर सकता कि उस परमेश्वर की दृष्टि में पाप कितनी घृणित वस्तु है जिसके हाथ की रचना पूर्ण रूप से सिद्ध है—चाहे हम दूरबीन से देखें, चाहे सूक्ष्मदर्शी से, सिद्ध है—बृहस्पति जैसे विशाल ग्रह की रचना में, जो अपने उपग्रहों समेत सूर्य के चारों ओर घूमते हुए सेकण्ड-सेकण्ड का ठीक समय रखता है, सिद्ध है—और धरती के एक फुट पर रेंगनेवाले सबसे छोटे कीड़े की रचना में भी सिद्ध है। तो भी हम अपने मन में यह दृढ़ता से ठहरा लें कि पाप "वह घृणित वस्तु है जिससे परमेश्वर घृणा करता है";—कि परमेश्वर "की आँखें ऐसी शुद्ध हैं कि वह बुराई को देख नहीं सकता, और उत्पात को देखकर चुप नहीं रह सकता";—कि परमेश्वर की व्यवस्था का छोटे से छोटा उल्लंघन भी हमें "सब का दोषी" ठहराता है;—कि "जो प्राणी पाप करे वही मरेगा";—कि "पाप की मजदूरी तो मृत्यु है";—कि परमेश्वर "मनुष्यों की गुप्त बातों का न्याय करेगा";—कि एक कीड़ा है जो कभी नहीं मरता, और एक आग है जो कभी नहीं बुझती;—कि "दुष्ट अधोलोक में लौट जाएँगे,"—और "अनन्त दण्ड भोगेंगे";—और कि "कोई अशुद्ध वस्तु किसी रीति से" स्वर्ग में "प्रवेश न करेगी।" (यिर्मयाह 44:4; हबक्कूक 1:13; याकूब 2:10; यहेजकेल 18:4; रोमियों 6:23; रोमियों 2:16; मरकुस 9:44; भजन संहिता 9:17; मत्ती 25:46; प्रकाशित वाक्य 21:27।) जब हम यह विचार करते हैं कि ये बातें अत्यन्त दयालु परमेश्वर की पुस्तक में लिखी हैं, तो ये सचमुच भयंकर शब्द हैं!

तो भी पाप की पूर्णता का कोई प्रमाण इतना प्रबल और अकाट्य नहीं जितना हमारे प्रभु यीशु मसीह का क्रूस और दुःखभोग, और उसके स्थानापन्न होने और प्रायश्चित का सारा सिद्धान्त है। वह दोष कितना भयानक रूप से काला होगा जिसका प्रायश्चित परमेश्वर के पुत्र के लहू के बिना और किसी वस्तु से न हो सका। मनुष्य के पाप का वह बोझ कितना भारी होगा जिसके कारण यीशु गतसमनी में कराहा और पीड़ा में लहू की बूँदों जैसा पसीना बहाया, और गुलगुता पर पुकारा, "हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?" (मत्ती 27:46।) मुझे विश्वास है कि जब हम पुनरुत्थान के दिन जागेंगे, तब कोई बात हमें इतनी चकित न करेगी जितना पाप का वह दृश्य जो हम देखेंगे, और अपनी असंख्य चूकों और कमियों पर जो दृष्टि हम डालेंगे। जब तक मसीह दूसरी बार नहीं आता, तब तक हम "पाप की पापमयता" को पूरी रीति से कभी न समझेंगे। जॉर्ज व्हिटफ़ील्ड ने ठीक ही कहा था, "स्वर्ग का गीत यह होगा, परमेश्वर ने क्या कर दिखाया!"

(5) पाप के विषय में विचार करने को केवल एक ही बात शेष है, जिसे मैं छोड़ने का साहस नहीं करता। वह है उसका छल। यह बात अत्यन्त गम्भीर महत्त्व की है, और मेरा सोचना है कि इसपर उतना ध्यान नहीं दिया जाता जितना इसके योग्य है। यह छल तुम इस बात में देख सकते हो कि मनुष्य पाप को परमेश्वर की दृष्टि की अपेक्षा कम पापमय और कम खतरनाक समझने की ओर आश्चर्यजनक रीति से झुके रहते हैं, और उसे हल्का करने, उसके बहाने बनाने और उसके दोष को घटाने को तैयार रहते हैं।—"यह तो बस छोटी सी बात है! परमेश्वर दयालु है! परमेश्वर हर भूल का लेखा नहीं लेता! हमारा इरादा तो अच्छा है! कोई इतना कड़ा नहीं हो सकता! इसमें कौन सी बड़ी हानि है? हम तो वही करते हैं जो और लोग करते हैं!" इस प्रकार की भाषा से कौन परिचित नहीं?—तुम इसे उन चिकने-चुपड़े शब्दों और वाक्यांशों की लम्बी लड़ी में देख सकते हो जो मनुष्यों ने उन बातों को बताने के लिए गढ़े हैं जिन्हें परमेश्वर सरासर दुष्टता और आत्मा का विनाश कहता है। "तेज़," "रंगीला," "मनमौजी," "चंचल," "अविचारी," "ढीला-ढाला" जैसे शब्दों का क्या अर्थ है? वे दिखाते हैं कि मनुष्य अपने आपको यह विश्वास दिलाकर धोखा देने का यत्न करते हैं कि पाप उतना पापमय नहीं जितना परमेश्वर कहता है, और वे उतने बुरे नहीं जितने वास्तव में हैं।—तुम इसे विश्वासियों तक की इस प्रवृत्ति में भी देख सकते हो कि वे अपने बच्चों को सन्देहजनक आचरणों में ढील देते हैं, और धन के प्रेम, परीक्षा से छेड़छाड़ और पारिवारिक भक्ति के नीचे स्तर को स्वीकृति देने के अनिवार्य परिणाम की ओर से अपनी आँखें मूँद लेते हैं।—मुझे डर है कि हम अपनी आत्मा के रोग की अत्यन्त सूक्ष्मता को पर्याप्त रीति से नहीं समझते। हम यह भूल जाने के बहुत अधिक आदी हैं कि पाप की परीक्षा हमारे सामने शायद ही कभी अपने सच्चे रंग में आती है, यह कहती हुई, "मैं तुम्हारा घातक शत्रु हूँ, और तुम्हें सदा के लिए नरक में नाश करना चाहता हूँ।" अरे नहीं! पाप हमारे पास यहूदा की नाईं चुम्बन लेकर आता है; और योआब की नाईं हाथ बढ़ाए और चापलूसी की बातें करता हुआ आता है। वर्जित फल हव्वा को अच्छा और चाहने योग्य लगा; फिर भी उसने उसे अदन से निकलवा दिया। अपने महल की छत पर यों ही टहलना दाऊद को निरापद ही लगा; फिर भी उसका अन्त व्यभिचार और हत्या में हुआ। पाप अपनी आरम्भिक अवस्था में शायद ही कभी पाप जैसा लगता है। इसलिए आओ हम जागते और प्रार्थना करते रहें, ऐसा न हो कि हम परीक्षा में पड़ें। हम दुष्टता को चिकने नाम दे सकते हैं, पर परमेश्वर की दृष्टि में उसके स्वभाव और गुण को नहीं बदल सकते। आओ हम पौलुस के शब्द स्मरण रखें: "प्रतिदिन एक दूसरे को समझाते रहो, ऐसा न हो कि तुम में से कोई पाप के छल में आकर कठोर हो जाए।" (इब्रानियों 3:13।) हमारी प्रार्थना-पुस्तक में यह एक बुद्धिमानी की प्रार्थना है, "संसार, शरीर और शैतान के छलों से, हे भले प्रभु, हमें छुड़ा।"

और अब आगे बढ़ने से पहले, मैं संक्षेप में दो विचार बताता हूँ जो मुझे इस विषय में से अप्रतिरोध्य बल के साथ उठते दिखाई देते हैं।

एक ओर, मैं अपने पाठकों से निवेदन करता हूँ कि वे ध्यान दें कि हम सब के पास दीन होने और अपने आप को नीचा जानने के कितने गहरे कारण हैं। आइए, हम बाइबल में हमारे सामने रखे गए पाप के चित्र के सम्मुख बैठें, और विचार करें कि परमेश्वर की दृष्टि में हम सब कितने दोषी, घृणित और भ्रष्ट प्राणी हैं। हृदय के उस पूर्ण परिवर्तन की, जिसे नया जन्म, नवजन्म या मन-परिवर्तन कहा जाता है, हम सब को कितनी आवश्यकता है! हम में से सर्वोत्तम जन के साथ भी, उसकी सबसे उत्तम दशा में भी, दुर्बलता और अपूर्णता का कितना बड़ा ढेर लगा रहता है! यह कितना गम्भीर विचार है कि "बिना पवित्रता के कोई प्रभु को कदापि न देखेगा!" (इब्रा. 12:14)। अपने जीवन की हर रात्रि को, जब हम अपने छोड़े हुए और किए हुए पापों का स्मरण करते हैं, तब चुंगी लेनेवाले के साथ यह पुकारने का हमारे पास कितना कारण है, "हे परमेश्वर, मुझ पापी पर दया कर!" (लूका 18:13)। प्रार्थना-पुस्तक के सामान्य और प्रभु-भोज के पापस्वीकार सभी नाम मात्र के मसीहियों की वास्तविक दशा के कितने अनुकूल हैं! वह भाषा परमेश्वर की सन्तानों के कितने योग्य है जिसे प्रार्थना-पुस्तक प्रत्येक कलीसिया-सदस्य के मुख में प्रभु-भोज की मेज़ के पास जाने से पहले रखती है, "हमें अपने कुकर्मों का स्मरण दुखदायी है; यह बोझ असह्य है। हम पर दया कर, हम पर दया कर, हे परम दयालु पिता; अपने पुत्र हमारे प्रभु यीशु मसीह के निमित्त हमारा सब बीता हुआ अपराध क्षमा कर।" "यह कितना सच है कि सबसे पवित्र सन्त भी अपने आप में एक अभागा पापी है," और अपने अस्तित्व के अन्तिम क्षण तक दया और अनुग्रह का ऋणी है!

मैं पूरे हृदय से हूकर के "धर्मी ठहराए जाने" पर दिए गए उपदेश के उस अंश का समर्थन करता हूँ जो इन शब्दों से आरम्भ होता है, "हमारे पवित्रतम और सर्वोत्तम कामों पर विचार किया जाए। हम परमेश्वर के प्रति तब से अधिक अच्छी भावना में कभी नहीं होते जब हम प्रार्थना करते हैं; फिर भी जब हम प्रार्थना करते हैं, तब हमारी भावनाएँ कितनी बार बिखर जाती हैं! जिस परमेश्वर से हम बात करते हैं उसकी महान प्रतापमय महिमा के प्रति हम कितना कम आदर दिखाते हैं! अपनी दुर्दशा पर कितना कम पछतावा! उसकी कोमल दया के मधुर प्रभाव का कितना कम स्वाद हम अनुभव करते हैं! क्या हम बहुत बार प्रार्थना आरम्भ करने में उतने ही अनिच्छुक और उसे समाप्त करने में उतने ही प्रसन्न नहीं होते, मानो 'मुझे पुकार' कहकर उसने हम पर कोई बहुत भारी काम डाल दिया हो? जो मैं कहने जा रहा हूँ वह कुछ अति-सा प्रतीत हो सकता है; इसलिए हर एक इसका निर्णय वैसे ही करे जैसे उसका अपना हृदय उसे बताए, और अन्यथा नहीं; मैं तो केवल एक प्रश्न रखूँगा! यदि परमेश्वर हमें इस प्रकार की बात दे, अब्राहम की नाईं नहीं—कि यदि किसी नगर में पचास, चालीस, तीस, बीस—वरन् दस भले मनुष्य भी मिलें तो उनके कारण वह नगर नष्ट न किया जाएगा; परन्तु यदि वह हमारे सामने इतना बड़ा प्रस्ताव रखे कि हमारे पिता आदम के पतन के बाद से मनुष्यों की सब पीढ़ियों को खोज डालो, और एक ऐसा मनुष्य ढूँढ़ निकालो जिसने एक ऐसा काम किया हो जो उससे बिना किसी दाग या दोष के शुद्ध निकला हो; और उस एक मनुष्य के उसी एक काम के कारण न मनुष्य न स्वर्गदूत उन यातनाओं को भोगेगा जो दोनों के लिए तैयार की गई हैं। क्या तुम समझते हो कि मनुष्यों और स्वर्गदूतों को छुड़ाने का यह छुटकारे का मूल्य मनुष्यों की सन्तानों में पाया जा सकता है? हमारे सर्वोत्तम कामों में भी कुछ न कुछ ऐसा होता है जिसे क्षमा किया जाना आवश्यक है।"*

वह गवाही सच्ची है। मेरी अपनी बात यह है कि मुझे विश्वास है कि हमारे पास जितनी अधिक ज्योति होती है, उतना ही हम अपनी पापमयता को देखते हैं; हम स्वर्ग के जितने निकट पहुँचते हैं, उतना ही हम दीनता का वस्त्र पहने होते हैं। कलीसिया के हर युग में, यदि आप जीवनियों का अध्ययन करें, तो यह बात सच पाएँगे कि सबसे प्रतिष्ठित सन्त—ब्रैडफ़ोर्ड, रदरफ़ोर्ड और मैक्चेन जैसे जन—सदा सबसे दीन जन रहे हैं।

दूसरी ओर, मैं अपने पाठकों से निवेदन करता हूँ कि वे ध्यान दें कि परमेश्वर के अनुग्रह के महिमामय सुसमाचार के लिए हमें कितना गहरा धन्यवादी होना चाहिए। मनुष्य की आवश्यकता का उपाय प्रकट किया गया है, जो मनुष्य के रोग जितना ही चौड़ा, विस्तृत और गहरा है। यदि हम पाप को देखें, उसके स्वभाव, उत्पत्ति, सामर्थ्य, विस्तार और घृणित स्वरूप का अध्ययन करें, तो हमें डरने की आवश्यकता नहीं, बशर्ते हम साथ ही उस सर्वशक्तिमान औषधि को भी देखें जो यीशु मसीह में मिलनेवाले उद्धार में हमारे लिए उपलब्ध है। यद्यपि पाप बहुत बढ़ा, तथापि अनुग्रह उससे कहीं अधिक बढ़ा। हाँ: छुटकारे की उस सनातन वाचा में, जिसके पक्ष पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा हैं,—उस वाचा के मध्यस्थ यीशु मसीह धर्मी में, जो एक ही व्यक्ति में सिद्ध परमेश्वर और सिद्ध मनुष्य हैं,—उस कार्य में जो उसने हमारे पापों के लिए मरकर और हमारे धर्मी ठहराए जाने के लिए जी उठकर पूरा किया,—उन पदों में जो वह हमारे महायाजक, प्रतिनिधि, वैद्य, चरवाहे और सहायक के रूप में धारण करता है,—उसके उस बहुमूल्य लहू में जो बहाया गया और जो सब पापों से शुद्ध कर सकता है,—उस सनातन धार्मिकता में जो उसने स्थापित की,—उस निरन्तर मध्यस्थता की प्रार्थना में जो वह परमेश्वर के दाहिने हाथ पर हमारे प्रतिनिधि के रूप में करता रहता है,—महापापियों का भी पूरा-पूरा उद्धार करने की उसकी सामर्थ्य में, अत्यन्त नीच को ग्रहण करने और क्षमा करने की उसकी इच्छा में, अत्यन्त दुर्बल को सहने की उसकी तत्परता में,—पवित्र आत्मा के उस अनुग्रह में जिसे वह अपनी सारी प्रजा के हृदयों में रोपता है, जो उन्हें नया करता है, पवित्र करता है, और पुरानी बातों को जाने देता और सब कुछ नया बना देता है,—इस सब में—और ओह, यह कितना संक्षिप्त चित्र है!—इस सब में, मैं कहता हूँ, पाप के भयानक रोग की पूर्ण, सिद्ध और सम्पूर्ण औषधि है। पाप का सही दृष्टिकोण निस्सन्देह कितना ही भयानक और भारी क्यों न हो, यदि कोई साथ ही यीशु मसीह पर भी सही दृष्टि डाले, तो उसे मूर्छित होने या निराश होने की आवश्यकता नहीं। आश्चर्य नहीं कि पुराने फ्लेवल अपनी उत्तम पुस्तक "जीवन का सोता" के अनेक अध्यायों को इन हृदयस्पर्शी शब्दों के साथ समाप्त करते हैं, "यीशु मसीह के लिए परमेश्वर का धन्यवाद हो।"

इस महान विषय को समाप्त करते हुए, मुझे लगता है कि मैंने इसकी केवल ऊपरी सतह को ही छुआ है। यह ऐसा विषय है जिसे इस प्रकार के एक निबन्ध में पूरी तरह नहीं सँभाला जा सकता। जो इसका पूर्ण और विस्तृत विवेचन देखना चाहे, उसे अनुभवात्मक धर्मविज्ञान के ऐसे गुरुओं की ओर मुड़ना चाहिए जैसे ओवेन, बर्गेस, मैण्टन, चार्नॉक और प्यूरिटन पाठशाला के अन्य दिग्गज। ऐसे विषयों पर प्यूरिटनों की तुलना में कोई लेखक नहीं ठहरता। अब मुझे केवल इतना बताना शेष है कि पाप के सम्पूर्ण सिद्धान्त का आज के समय में कौन-कौन से व्यावहारिक उपयोग लाभदायक रूप से किए जा सकते हैं।

(क) तो मैं पहली बात यह कहता हूँ कि पाप का पवित्रशास्त्रीय दृष्टिकोण उस अस्पष्ट, धुँधली, कुहासे-भरी और धूमिल-सी धर्मशिक्षा का सबसे उत्तम उपचार है, जो आज के युग में पीड़ादायक रूप से प्रचलित है। इस तथ्य से आँखें मूँदना व्यर्थ है कि आजकल तथाकथित मसीही धर्म का एक बहुत बड़ा भाग ऐसा है जिसे आप निश्चित रूप से असत्य तो नहीं कह सकते, परन्तु फिर भी वह पूरा नाप, पूरा तौल और सोलह छटाँक का सेर नहीं है। यह ऐसा मसीही धर्म है जिसमें निःसन्देह "मसीह के विषय में कुछ, अनुग्रह के विषय में कुछ, विश्वास के विषय में कुछ, मन फिराव के विषय में कुछ और पवित्रता के विषय में कुछ" तो है; परन्तु यह वह वास्तविक "वस्तु जैसी वह है" नहीं जो बाइबल में है। बातें अपने स्थान से हटी हुई हैं और अपने अनुपात से बाहर हैं। जैसा बूढ़ा लैटिमर कहता, यह एक प्रकार की "खिचड़ी" है, और इससे कोई भलाई नहीं होती। न तो यह दैनिक आचरण पर प्रभाव डालती है, न जीवन में सांत्वना देती है, न मृत्यु में शान्ति देती है; और जो इसे थामे रहते हैं वे प्रायः बहुत देर से जागकर यह पाते हैं कि उनके पाँवों के नीचे कुछ भी ठोस नहीं है। अब मेरा विश्वास है कि इस अधूरे प्रकार के धर्म को ठीक करने और सुधारने का सबसे सम्भाव्य उपाय यह है कि पाप की पापमयता के विषय में पुराने पवित्रशास्त्रीय सत्य को और अधिक प्रमुखता से सामने रखा जाए। लोग तब तक स्वर्ग की ओर दृढ़ता से मुँह नहीं करेंगे और यात्रियों की भाँति जीवन नहीं बिताएँगे, जब तक वे सचमुच यह अनुभव न करें कि वे नरक के संकट में हैं। आइए हम सब पाप के विषय में पुरानी शिक्षा को पुनः जीवित करने का यत्न करें—बच्चों के कमरों में, पाठशालाओं में, प्रशिक्षण-महाविद्यालयों में, विश्वविद्यालयों में। हम यह न भूलें कि "यदि कोई व्यवस्था को व्यवस्थानुसार काम में लाए तो वह भली है," और कि "व्यवस्था से तो पाप की पहचान होती है।" (1 तीमुथियुस 1:8; रोमियों 3:20; 7:7।) आइए हम व्यवस्था को आगे लाएँ और उसे लोगों के ध्यान पर दबाव के साथ रखें। आइए हम दस आज्ञाओं की व्याख्या करें और उन्हें खोलकर समझाएँ, और दिखाएँ कि उनकी माँगों की लम्बाई, चौड़ाई, गहराई और ऊँचाई कितनी है। पहाड़ी उपदेश में हमारे प्रभु की यही रीति है। हम उनकी योजना का अनुसरण करने से उत्तम कुछ नहीं कर सकते। हम इस पर भरोसा रख सकते हैं कि लोग कभी यीशु के पास नहीं आएँगे, यीशु के साथ नहीं ठहरेंगे और यीशु के लिये नहीं जिएँगे, जब तक वे सचमुच यह न जान लें कि उन्हें क्यों आना है और उनकी आवश्यकता क्या है। जिन्हें आत्मा यीशु की ओर खींचता है वे वही हैं जिन्हें आत्मा ने पाप का कायल किया है। पाप का पूरा कायल हुए बिना लोग यीशु के पास आते और कुछ समय तक उनके पीछे चलते तो दिखाई दे सकते हैं, परन्तु वे शीघ्र ही गिर जाएँगे और संसार में लौट जाएँगे।

(ख) दूसरी बात यह कि पाप का पवित्रशास्त्रीय दृष्टिकोण उस अत्यधिक व्यापक और उदार धर्मशिक्षा का भी सबसे उत्तम उपचार है जो आजकल इतनी प्रचलित है। आधुनिक विचार की प्रवृत्ति यह है कि मत-सिद्धान्तों, विश्वास-वचनों और धर्म की हर प्रकार की सीमाओं को ठुकरा दिया जाए। यह बड़प्पन और बुद्धिमानी समझी जाती है कि किसी भी मत की निन्दा न की जाए, और सब उत्साही तथा चतुर शिक्षकों को भरोसे के योग्य घोषित किया जाए, चाहे उनके मत कितने ही बेमेल और एक-दूसरे को नष्ट करनेवाले क्यों न हों।—सचमुच! हर बात सत्य है और कुछ भी असत्य नहीं! हर कोई सही है और कोई गलत नहीं! हर किसी का उद्धार होने की सम्भावना है और किसी का नाश नहीं होना है?—मसीह का प्रायश्चित और प्रतिस्थापन, शैतान का व्यक्तित्व, पवित्रशास्त्र का चमत्कारिक अंश, भावी दण्ड की वास्तविकता और अनन्तता—ये सब महान नींव के पत्थर मसीही धर्म के जहाज़ का बोझ हल्का करने और उसे आधुनिक विज्ञान के साथ कदम मिलाकर चलने योग्य बनाने के लिये फालतू सामान की भाँति बड़ी निश्चिन्तता से पानी में फेंक दिए जाते हैं।—इन महान सच्चाइयों के पक्ष में खड़े हो जाइए, तो आप संकीर्ण, अनुदार, पुराने ढर्रे के और धर्मशास्त्र के जीवाश्म कहलाते हैं! कोई वचन उद्धृत कीजिए, तो आपको बताया जाता है कि सारा सत्य एक प्राचीन यहूदी पुस्तक के पन्नों में ही सीमित नहीं है, और उस पुस्तक के पूरे होने के बाद स्वतन्त्र खोज ने बहुत-सी बातें पता लगा ली हैं!—अब मैं इस आधुनिक महामारी का प्रतिकार करने में उतना सम्भाव्य और कुछ नहीं जानता जितना पाप के स्वभाव, वास्तविकता, नीचता, सामर्थ्य और दोष के विषय में निरन्तर स्पष्ट कथन। हमें इन व्यापक दृष्टिकोण रखनेवाले लोगों के विवेक पर सीधा प्रहार करना चाहिए और कुछ सीधे प्रश्नों का सीधा उत्तर माँगना चाहिए। हमें उनसे कहना चाहिए कि अपने हृदय पर हाथ रखकर हमें बताएँ कि क्या उनके प्रिय मत बीमारी के दिन में, मृत्यु की घड़ी में, मरते हुए माता-पिता के बिछौने के पास, प्रिय पत्नी या सन्तान की कब्र के पास उन्हें सांत्वना देते हैं। हमें उनसे पूछना चाहिए कि क्या निश्चित सिद्धान्त के बिना एक अस्पष्ट उत्साह ऐसे समयों में उन्हें शान्ति देता है। हमें उन्हें चुनौती देनी चाहिए कि वे हमें बताएँ कि क्या वे कभी-कभी अपने भीतर कुतरनेवाला कोई "कुछ" अनुभव नहीं करते, जिसे संसार भर की स्वतन्त्र खोज, दर्शनशास्त्र और विज्ञान सन्तुष्ट नहीं कर सकते। और तब हमें उन्हें बताना चाहिए कि यह कुतरनेवाला "कुछ" पाप, दोष और भ्रष्टता का बोध है, जिसे वे अपनी गणनाओं में छोड़ रहे हैं। और सबसे बढ़कर हमें उन्हें बताना चाहिए कि उन्हें कभी चैन तब तक नहीं मिलेगा जब तक वे मनुष्य के विनाश और मसीह के छुटकारे के पुराने सिद्धान्तों के आगे झुक न जाएँ, और यीशु पर सरल, बालकों जैसा विश्वास न करें।

(ग) इसके बाद, पाप का सही दृष्टिकोण उस इन्द्रियप्रधान, रीति-रस्मी और औपचारिक मसीही धर्म का सबसे उत्तम प्रतिकार है, जो पिछले पच्चीस वर्षों में बाढ़ की तरह इंग्लैंड पर छा गया और अपने साथ बहुतों को बहा ले गया। मैं भली-भाँति मान सकता हूँ कि धर्म की इस पद्धति में एक विशेष प्रकार के मनों के लिए बहुत कुछ आकर्षक है, जब तक कि विवेक पूरी तरह प्रकाशित नहीं हुआ है। परन्तु जब हमारी रचना का वह अद्भुत अंग, जिसे विवेक कहते हैं, सचमुच जाग उठा हो और जीवित हो, तब मुझे यह मानना कठिन लगता है कि इन्द्रियप्रधान रीति-रस्मी मसीही धर्म हमें पूरी तरह तृप्त कर सकेगा। छोटा बच्चा जब तक भूखा नहीं होता, तब तक चमकीले खिलौनों, गुड़ियों और झुनझुनों से आसानी से शान्त और प्रसन्न हो जाता है; परन्तु जैसे ही उसे अपने भीतर प्रकृति की भूख का अनुभव होता है, हम जानते हैं कि भोजन के सिवा कोई वस्तु उसे तृप्त नहीं करेगी। मनुष्य की आत्मा के विषय में भी ठीक ऐसा ही है। संगीत, फूल, मोमबत्तियाँ, धूप, झण्डे, जुलूस, सुन्दर वस्त्र, पाप-स्वीकार के स्थान और अर्ध-रोमी स्वभाव की मनुष्य-रचित रीतियाँ कुछ परिस्थितियों में उसके लिए ठीक लग सकती हैं। परन्तु जैसे ही वह "जाग उठे और मरे हुओं में से जी उठे," तब वह इन बातों से सन्तुष्ट नहीं रहेगा। ये उसे केवल गम्भीर खिलवाड़ और समय की बर्बादी जान पड़ेंगी। जब वह अपना पाप देख लेता है, तब उसे अपना उद्धारकर्ता भी देखना ही पड़ता है। वह अनुभव करता है कि उसे मृत्युकारी रोग लगा है, और महान वैद्य के सिवा कोई उसे सन्तुष्ट नहीं कर सकता। वह भूखा और प्यासा होता है, और जीवन की रोटी से कम कुछ भी उसे नहीं चाहिए। मैं जो कहने जा रहा हूँ, उसमें शायद साहसी जान पड़ूँ; परन्तु मैं निडर होकर यह दावा करता हूँ कि पिछले पच्चीस वर्षों का चार-पाँचवाँ भाग अर्ध-रोमी मत कभी अस्तित्व में न आता, यदि अंग्रेज़ लोगों को पाप के स्वभाव, उसकी नीचता और उसकी पापमयता की अधिक पूर्ण और स्पष्ट शिक्षा दी गई होती।

(घ) इसके बाद, पाप का सही दृष्टिकोण सिद्धता के उन अतिरंजित सिद्धान्तों का भी सर्वोत्तम प्रतिकारों में से एक है, जिनकी चर्चा आजकल इतनी सुनाई देती है। इस विषय में मैं बहुत थोड़ा कहूँगा, और आशा है कि कहने में किसी को ठेस न पहुँचाऊँगा। यदि जो लोग हम पर सिद्धता का दबाव डालते हैं, उनका अभिप्राय केवल सर्वांगीण संगति और उन सब गुणों पर सावधानी से ध्यान देना है जिनसे मसीही चरित्र बनता है, तो उचित यही है कि हम न केवल उनकी बात सहें, बल्कि उनसे पूरी तरह सहमत भी हों। हम अवश्य ऊँचा लक्ष्य रखें।—परन्तु यदि लोग सचमुच हमसे यह कहना चाहते हैं कि इस संसार में विश्वासी पाप से पूरी तरह छूट सकता है, वर्षों तक परमेश्वर के साथ अटूट और निर्बाध सहभागिता में रह सकता है, और महीनों तक एक भी बुरे विचार का अनुभव नहीं करता, तो मुझे ईमानदारी से कहना होगा कि यह मत मुझे पवित्रशास्त्र के बहुत विरुद्ध लगता है।—मैं इससे भी आगे जाता हूँ। मैं कहता हूँ कि यह मत उसके लिए बहुत खतरनाक है जो इसे मानता है, और उद्धार के खोजियों को निराश, हतोत्साहित और पीछे रोक देने की बहुत सम्भावना रखता है। जब तक हम देह में हैं, तब तक ऐसी सिद्धता की आशा रखने के लिए मुझे परमेश्वर के वचन में तनिक भी आधार नहीं मिलता। मैं मानता हूँ कि हमारे पन्द्रहवें अनुच्छेद के शब्द पूर्णतः सत्य हैं,—कि "केवल मसीह ही निष्पाप है; और हम सब, जो शेष हैं, मसीह में बपतिस्मा पाकर और नया जन्म लेकर भी, बहुत बातों में चूक जाते हैं; और यदि हम कहें कि हम में पाप नहीं, तो हम अपने आप को धोखा देते हैं, और सत्य हम में नहीं है।"—हमारे पहले उपदेश की भाषा में, "हमारे उत्तम से उत्तम कामों में भी अपूर्णताएँ हैं: हम परमेश्वर से उतना प्रेम नहीं करते जितना अपने सारे मन, बुद्धि और शक्ति से करना हमारा कर्तव्य है; हम परमेश्वर का उतना भय नहीं मानते जितना मानना चाहिए; हम परमेश्वर से प्रार्थना भी बहुत और बड़ी अपूर्णताओं के साथ ही करते हैं। हम अपूर्ण रीति से देते, क्षमा करते, विश्वास करते, जीते और आशा रखते हैं; हम अपूर्ण रीति से बोलते, सोचते और करते हैं; हम शैतान, संसार और शरीर से अपूर्ण रीति से लड़ते हैं। इसलिए हम अपनी अपूर्णता की दशा को साफ़-साफ़ मान लेने में लज्जित न हों।"—मैं फिर वही दोहराता हूँ जो कह चुका हूँ: सिद्धता के विषय में उस क्षणिक भ्रम से,—क्योंकि आशा है कि मैं इसे ऐसा ही कह सकूँ,—जो कुछ मनों पर छाया हुआ है, बचाने का सर्वोत्तम उपाय पाप के स्वभाव, पापमयता और छल की स्पष्ट, पूर्ण और सुनिश्चित समझ है।

(ङ) अन्त में, पाप का पवित्रशास्त्र के अनुसार सही दृष्टिकोण व्यक्तिगत पवित्रता के उन निम्न विचारों का उत्तम प्रतिकार सिद्ध होगा, जो कलीसिया के इन अन्तिम दिनों में बड़े दुःखदायी रूप से फैले हुए हैं। मैं जानता हूँ कि यह बहुत पीड़ादायक और नाज़ुक विषय है; परन्तु मैं इससे मुँह मोड़ने का साहस नहीं कर सकता। मेरी यह दुःखभरी धारणा बहुत समय से रही है कि इस देश में मसीही कहलानेवालों के दैनिक जीवन का स्तर धीरे-धीरे गिरता जा रहा है। मुझे भय है कि मसीह के समान प्रेम, दयालुता, अच्छा स्वभाव, निःस्वार्थता, नम्रता, कोमलता, भलमनसाहत, आत्म-त्याग, भलाई करने की धुन और संसार से अलगाव की उतनी कद्र नहीं की जाती जितनी होनी चाहिए, और जितनी हमारे पुरखों के दिनों में की जाती थी।

इस दशा के कारणों में पूरी तरह उतरने का मैं दावा नहीं कर सकता, केवल विचार के लिए कुछ अनुमान ही सुझा सकता हूँ। हो सकता है कि धर्म का एक निश्चित दिखावा इस युग में इतना फ़ैशनेबल और अपेक्षाकृत सरल हो गया है कि जो धाराएँ कभी संकरी और गहरी थीं, वे चौड़ी और उथली हो गई हैं, और बाहरी दिखावे में जो हमने पाया है वह गुण में खो दिया है। हो सकता है कि पिछले पच्चीस वर्षों में धन की भारी वृद्धि ने अनजाने ही सामाजिक जीवन में संसारिकता, भोग-विलास और आराम-प्रेम की महामारी ला दी है। जो वस्तुएँ कभी विलासिता कहलाती थीं, वे अब सुख-सुविधाएँ और आवश्यकताएँ हैं, और इसलिए आत्म-त्याग और "कठिनाई सहना" बहुत कम जाना जाता है। हो सकता है कि इस युग की विशेषता बनी विवाद की भारी मात्रा ने अनजाने ही हमारे आत्मिक जीवन को सुखा दिया है। हम प्रायः सही मत के प्रति उत्साह से ही सन्तुष्ट रहे हैं, और दैनिक व्यावहारिक भक्ति की गम्भीर वास्तविकताओं की उपेक्षा करते रहे हैं। कारण चाहे जो भी हों, मुझे अपना यह विश्वास घोषित करना ही चाहिए कि परिणाम सामने है। हाल के वर्षों में विश्वासियों में व्यक्तिगत पवित्रता का स्तर हमारे पुरखों के दिनों की अपेक्षा नीचा रहा है। इसका पूरा परिणाम यह है कि आत्मा शोकित होता है! और यह बात बहुत दीनता और हृदय की जाँच की माँग करती है।

जिस स्थिति का मैंने उल्लेख किया है, उसके सर्वोत्तम उपचार के विषय में मैं अपनी राय देने का साहस करूँगा। कलीसियाओं में विचार की अन्य शाखाओं को अपना निर्णय स्वयं करना चाहिए। मुझे विश्वास है कि इंजीलवादी कलीसियाई जनों के लिए इसका उपचार पाप के स्वभाव और उसकी पापमयता को अधिक स्पष्टता से समझने में निहित है। अपने आत्मिक जीवन को पुनर्जीवित करने के लिए हमें मिस्र को लौटने और अर्ध-रोमन रीतियों को उधार लेने की कोई आवश्यकता नहीं। हमें पाप-स्वीकार की प्रथा को फिर से स्थापित करने, या मठवाद अथवा संन्यास की ओर लौटने की भी आवश्यकता नहीं। ऐसा कुछ भी नहीं! हमें केवल मन फिराना और अपने पहले कामों को करना है। हमें मूल सिद्धान्तों की ओर लौटना है। हमें "पुराने मार्गों" की ओर लौटना है। हमें परमेश्वर की उपस्थिति में दीनता से बैठकर पूरे विषय का सामना करना है, और स्पष्टता से जाँचना है कि प्रभु यीशु किसे पाप कहता है, और किसे "अपनी इच्छा पूरी करना" कहता है। तब हमें यह समझने का प्रयत्न करना है कि लापरवाह, आराम-पसन्द और अर्ध-सांसारिक जीवन जीना और साथ ही इंजीलवादी सिद्धान्तों को थामे रहना और स्वयं को इंजीलवादी कहना भयानक रूप से सम्भव है! जब हम एक बार देख लें कि पाप कहीं अधिक घृणित है, हमारे कहीं अधिक निकट है, और जितना हमने सोचा था उससे कहीं अधिक दृढ़ता से हमसे चिपका हुआ है, तो मुझे आशा और विश्वास है कि हम मसीह के और निकट खिंच जाएँगे। मसीह के निकट खिंच जाने पर हम उसकी परिपूर्णता में से और गहराई से पीएँगे, और पौलुस की तरह उसमें "विश्वास का जीवन जीना" और अधिक पूर्णता से सीखेंगे। यीशु में विश्वास का जीवन जीना और उसमें बने रहना सीख लेने पर हम अधिक फल लाएँगे, कर्तव्य के लिए अपने को अधिक सामर्थी, परीक्षा में अधिक धीरजवन्त, अपने दीन और निर्बल हृदयों की चौकसी में अधिक सतर्क, और अपने दैनिक छोटे-छोटे व्यवहारों में अपने स्वामी के अधिक समान पाएँगे। जितना हम यह समझेंगे कि मसीह ने हमारे लिए कितना किया है, उतना ही हम मसीह के लिए बहुत कुछ करने का परिश्रम करेंगे। जिसे बहुत क्षमा किया गया, वह बहुत प्रेम करेगा। संक्षेप में, जैसा प्रेरित कहता है, "हम सब, खुले चेहरे से प्रभु की महिमा को दर्पण की नाईं देखते हुए, प्रभु के आत्मा के द्वारा उसी स्वरूप में बदलते जाते हैं।" (2 कुरिन्थियों 3:18)।

चाहे कुछ लोग कुछ भी सोचना या कहना पसन्द करें, इसमें कोई सन्देह नहीं कि पवित्रता के विषय में बढ़ती हुई भावना समय के चिह्नों में से एक है। "आत्मिक जीवन" को बढ़ावा देने के लिए सम्मेलन आजकल आम होते जा रहे हैं। "आत्मिक जीवन" का विषय लगभग प्रति वर्ष महासभा के मंचों पर स्थान पाता है। इसने सारे देश में रुचि और सामान्य ध्यान जगाया है, जिसके लिए हमें धन्यवादी होना चाहिए। खरे सिद्धान्तों पर आधारित कोई भी आन्दोलन, जो हमारे आत्मिक जीवन को गहरा करने और हमारी व्यक्तिगत पवित्रता को बढ़ाने में सहायक हो, इंग्लैंड की कलीसिया के लिए सचमुच एक आशीष होगा। यह हमें एक साथ लाने और हमारे दुःखद विभाजनों को भरने में बहुत सहायक होगा। यह आत्मा के अनुग्रह की कोई नई वर्षा ला सकता है, और इन पिछले दिनों में "मरे हुओं में से जी उठना" ठहर सकता है। परन्तु जैसा मैंने इस लेख के आरम्भ में कहा था, मुझे निश्चय है कि यदि हमें ऊँचा बनाना है तो नीचे से आरम्भ करना होगा। मुझे विश्वास है कि पवित्रता के ऊँचे स्तर को पाने की ओर पहला कदम यह है कि हम पाप की अद्भुत पापमयता को अधिक पूर्णता से समझें।

2. पवित्रीकरण

"सत्य के द्वारा उन्हें पवित्र कर।"—यूहन्ना 17:17

"परमेश्वर की इच्छा यह है कि तुम पवित्र बनो।"—1 थिस्सलुनीकियों 4:3

पवित्रीकरण का विषय ऐसा है जिसे, मुझे भय है, बहुत से लोग अत्यन्त नापसन्द करते हैं। कुछ तो अवज्ञा और तिरस्कार के साथ इससे मुँह फेर लेते हैं। "सन्त" या "पवित्र किया हुआ" मनुष्य बनना उनके लिए सबसे अन्तिम बात है जिसे वे चाहेंगे। फिर भी यह विषय इस प्रकार का व्यवहार पाने योग्य नहीं है। यह शत्रु नहीं, मित्र है।

यह हमारे प्राणों के लिए अत्यन्त महत्त्व का विषय है। यदि बाइबल सच्ची है, तो निश्चित है कि जब तक हम "पवित्र न किए जाएँ", हमारा उद्धार नहीं होगा। बाइबल के अनुसार मसीहीजगत के प्रत्येक स्त्री-पुरुष के उद्धार के लिए तीन बातें नितान्त आवश्यक हैं। ये तीन हैं: धर्मी ठहराया जाना, नया जन्म और पवित्रीकरण। परमेश्वर की प्रत्येक सन्तान में तीनों मिलती हैं: वह नया जन्म पाया हुआ भी है, धर्मी ठहराया गया भी, और पवित्र किया गया भी। जिसमें इन तीनों में से कोई एक भी नहीं है, वह परमेश्वर की दृष्टि में सच्चा मसीही नहीं है, और उसी दशा में मरने पर वह स्वर्ग में नहीं पाया जाएगा और अन्तिम दिन महिमा नहीं पाएगा।

यह विषय आज के समय में विशेष रूप से सामयिक है। पवित्रीकरण के पूरे विषय पर हाल में अनोखे सिद्धान्त उठ खड़े हुए हैं। कुछ इसे धर्मी ठहराए जाने के साथ गड्डमड्ड करते प्रतीत होते हैं। कुछ मुफ़्त अनुग्रह के प्रति उत्साह का बहाना बनाकर इसे घिसकर कुछ नहीं कर देते, और व्यवहार में इसकी पूरी तरह उपेक्षा कर देते हैं। कुछ "कर्मों" को धर्मी ठहराए जाने का भाग बनाए जाने से इतना डरते हैं कि अपने धर्म में "कर्मों" के लिए कोई स्थान ही नहीं पाते। कुछ अपनी आँखों के सामने पवित्रीकरण का गलत स्तर खड़ा कर लेते हैं, और उसे न पाकर अपना जीवन एक कलीसिया से दूसरी कलीसिया, एक भवन से दूसरे भवन, और एक पंथ से दूसरे पंथ में बार-बार चले जाने में व्यर्थ गँवाते हैं, इस व्यर्थ आशा में कि उन्हें वह मिल जाएगा जो वे चाहते हैं। ऐसे दिन में, सुसमाचार के एक महान प्रमुख सिद्धान्त के रूप में इस विषय की शान्तिपूर्वक जाँच हमारे प्राणों के लिए बहुत उपयोगी हो सकती है।

1. पहले, आइए हम पवित्रीकरण के सच्चे स्वभाव पर विचार करें।

2. दूसरे, आइए हम पवित्रीकरण के दृश्य चिह्नों पर विचार करें।

3. अन्त में, आइए हम विचार करें कि धर्मी ठहराया जाना और पवित्रीकरण किन बातों में एक-दूसरे से मिलते और समान हैं, और किन बातों में भिन्न और असमान हैं।

यदि, दुर्भाग्य से, इन पृष्ठों का पाठक उनमें से है जिन्हें इस संसार के सिवाय किसी बात की चिन्ता नहीं, और जो धर्म का कोई दावा नहीं करते, तो मैं आशा नहीं कर सकता कि वह मेरे लिखे में अधिक रुचि लेगा। आप सम्भवतः इसे "शब्दों और नामों" का, और सूक्ष्म प्रश्नों का मामला समझेंगे, जिनमें इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि आप क्या मानते और विश्वास करते हैं। परन्तु यदि आप विचारशील, तर्कसंगत और समझदार मसीही हैं, तो मैं कहने का साहस करता हूँ कि आप पवित्रीकरण के विषय में कुछ स्पष्ट धारणाएँ रखना सार्थक पाएँगे।

1. पहले, हमें पवित्रीकरण के स्वभाव पर विचार करना है। जब बाइबल "पवित्र किए हुए" मनुष्य की बात करती है, तो उसका क्या अर्थ है?

पवित्रीकरण वह आन्तरिक आत्मिक कार्य है जो प्रभु यीशु मसीह पवित्र आत्मा के द्वारा मनुष्य में तब करता है जब वह उसे सच्चा विश्वासी होने के लिये बुलाता है। वह न केवल उसे उसके पापों से अपने लहू में धोता है, परन्तु उसे पाप और संसार के प्रति उसके स्वाभाविक प्रेम से अलग भी करता है, उसके हृदय में एक नया सिद्धान्त डालता है, और उसे जीवन में व्यावहारिक रूप से भक्त बना देता है। जिस साधन से आत्मा यह कार्य पूरा करता है वह प्रायः परमेश्वर का वचन होता है, यद्यपि वह कभी-कभी क्लेशों और परमेश्वर के विधान की भेंटों को भी "बिना वचन के" काम में लाता है (1 पतरस 3:1)। मसीह के इस आत्मा-द्वारा किये गये कार्य का पात्र पवित्रशास्त्र में "पवित्र किया हुआ" मनुष्य कहलाता है।*

जो यह समझता है कि यीशु मसीह केवल इसलिये जिया, मरा और जी उठा कि अपने लोगों के लिये धर्मी ठहराया जाना और पापों की क्षमा प्रदान करे, उसे अभी बहुत कुछ सीखना है। चाहे वह जाने या न जाने, वह हमारे धन्य प्रभु का अपमान कर रहा है, और उसे केवल आधा उद्धारकर्ता बना रहा है। प्रभु यीशु ने वह सब कुछ अपने ऊपर ले लिया है जिसकी उसके लोगों की आत्माओं को आवश्यकता है; न केवल अपनी प्रायश्चित्त करनेवाली मृत्यु के द्वारा उन्हें उनके पापों के दोष से छुड़ाना, परन्तु उनके हृदयों में पवित्र आत्मा को रखकर उन्हें उनके पापों के प्रभुत्व से भी छुड़ाना; न केवल उन्हें धर्मी ठहराना, परन्तु उन्हें पवित्र भी करना। इस प्रकार वह न केवल उनकी "धार्मिकता" है, परन्तु उनका "पवित्रीकरण" भी है (1 कुरिन्थियों 1:30)। आइए हम सुनें कि बाइबल क्या कहती है: "उनके लिये मैं अपने आप को पवित्र करता हूँ ताकि वे भी सत्य के द्वारा पवित्र किए जाएँ।"—"मसीह ने कलीसिया से प्रेम किया और अपने आप को उसके लिये दे दिया, कि उसे पवित्र करे और शुद्ध करे।"—"मसीह ने अपने आप को हमारे लिये दे दिया कि हमें हर प्रकार के अधर्म से छुड़ा ले, और अपने लिये एक ऐसी जाति बना ले जो भले कामों में उत्साही हो।"—"मसीह ने आप ही हमारे पापों को अपनी देह पर लेकर क्रूस पर चढ़ गया, जिससे हम पापों के लिये मरकर धार्मिकता के लिये जीवन बिताएँ।"—"मसीह ने अब उसकी शारीरिक देह में मृत्यु के द्वारा तुम्हारा मेल-मिलाप कर लिया, ताकि तुम्हें अपनी दृष्टि में पवित्र, निष्कलंक और निर्दोष बनाकर उपस्थित करे।" (यूहन्ना 17:19; इफिसियों 5:25; तीतुस 2:14; 1 पतरस 2:24; कुलुस्सियों 1:22.) इन पाँच पदों के अर्थ पर ध्यान से विचार किया जाए। यदि शब्दों का कोई अर्थ है, तो वे यही सिखाते हैं कि मसीह अपने विश्वास करनेवाले लोगों के धर्मी ठहराए जाने के साथ-साथ उनके पवित्रीकरण का भार भी उठाता है। दोनों समान रूप से उस "सब बातों में ठीक की हुई और अटल सनातन वाचा" में ठहराए गए हैं, जिसका मध्यस्थ मसीह है। वास्तव में एक स्थान पर मसीह "पवित्र करनेवाला" और उसके लोग "पवित्र किए जानेवाले" कहलाते हैं। (इब्रानियों 2:11.)

हमारे सामने का विषय इतना गहन और अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है कि उसे चारों ओर से घेरने, रक्षा करने, स्पष्ट करने और रेखांकित करने की आवश्यकता है। जो सिद्धान्त उद्धार के लिये आवश्यक है उसे कभी भी बहुत अधिक स्पष्टता से प्रकट नहीं किया जा सकता, न ही उसे बहुत अधिक प्रकाश में लाया जा सकता है। सिद्धान्तों और सिद्धान्तों के बीच की जो उलझन मसीहियों में दुर्भाग्य से इतनी आम है, उसे दूर करना और धर्म में सत्य और सत्य के बीच के ठीक सम्बन्ध को स्पष्ट करना हमारे धर्मशास्त्र में सटीकता पाने का एक उपाय है। इसलिये मैं अपने पाठकों के सामने पवित्रशास्त्र से लिये गये परस्पर जुड़े हुए कथनों की एक श्रृंखला रखने में संकोच नहीं करूँगा, जो मेरे विचार में पवित्रीकरण के ठीक स्वरूप को परिभाषित करने में उपयोगी सिद्ध होंगे।

(1) तो पवित्रीकरण उस जीवित एकता का अटल परिणाम है जो सच्चा विश्वास एक मसीही को मसीह के साथ देता है।—"जो मुझ में बना रहता है और मैं उस में, वह बहुत फल फलता है।" (यूहन्ना 15:5।) जो डाली फल नहीं लाती वह दाखलता की जीवित डाली नहीं है। मसीह के साथ वह एकता जो हृदय और जीवन पर कोई प्रभाव नहीं डालती, केवल बाहरी रूप की एकता है, जो परमेश्वर के सामने व्यर्थ है। जिस विश्वास का चरित्र पर पवित्र करनेवाला प्रभाव नहीं पड़ता, वह दुष्टात्माओं के विश्वास से अच्छा नहीं। वह "अकेला होने के कारण मरा हुआ विश्वास" है। वह परमेश्वर का दान नहीं है। वह परमेश्वर के चुने हुए लोगों का विश्वास नहीं है। संक्षेप में, जहाँ जीवन का पवित्रीकरण नहीं, वहाँ मसीह में कोई सच्चा विश्वास नहीं। सच्चा विश्वास प्रेम के द्वारा कार्य करता है। वह छुटकारे के प्रति गहरी कृतज्ञता के कारण मनुष्य को प्रभु के लिये जीने को विवश करता है। वह उसे यह अनुभव कराता है कि जिसने उसके लिये प्राण दिए उसके लिये वह कभी भी बहुत अधिक नहीं कर सकता। जिसका बहुत क्षमा किया गया, वह बहुत प्रेम करता है। जिसे लहू शुद्ध करता है, वह ज्योति में चलता है। जिसे मसीह में सच्ची जीवित आशा है, वह अपने आप को वैसा ही पवित्र करता है जैसा वह पवित्र है। (याकूब 2:17–20; तीतुस 1:1; गलातियों 5:6; 1 यूहन्ना 1:7; 3:3।)

(2) फिर, पवित्रीकरण नया जन्म का परिणाम और उससे अविभाज्य फल है। जो नया जन्म पाकर नई सृष्टि बनाया गया है, उसे नया स्वभाव और नया सिद्धान्त मिलता है, और वह सदा नया जीवन जीता है। ऐसा नया जन्म जो मनुष्य को मिल जाए और फिर भी वह पाप या संसारिकता में लापरवाही से जीता रहे, अप्रेरित धर्मशास्त्रियों का गढ़ा हुआ नया जन्म है, जिसका पवित्रशास्त्र में कभी उल्लेख नहीं हुआ। इसके विपरीत, प्रेरित यूहन्ना स्पष्ट कहता है कि "जो कोई परमेश्वर से जन्मा है वह पाप नहीं करता,—धार्मिकता का काम करता है,—भाइयों से प्रेम रखता है,—अपने आप को सुरक्षित रखता है,—और संसार पर जय पाता है।" (1 यूहन्ना 2:29; 3:9–14; 5:4–18।) एक शब्द में, जहाँ पवित्रीकरण नहीं वहाँ नया जन्म नहीं, और जहाँ पवित्र जीवन नहीं वहाँ नया जन्म नहीं। यह निःसन्देह बहुत से मनों को कठोर बात लगती है; परन्तु कठोर हो या न हो, यह बाइबल का सीधा-सादा सत्य है। यह स्पष्ट लिखा है कि जो परमेश्वर से जन्मा है, उसमें परमेश्वर का "बीज बना रहता है, और वह पाप कर ही नहीं सकता, क्योंकि वह परमेश्वर से जन्मा है।" (1 यूहन्ना 3:9।)

(3) पवित्रीकरण फिर उस पवित्र आत्मा के वास का एकमात्र निश्चित प्रमाण है जो उद्धार के लिये अनिवार्य है। "यदि किसी में मसीह का आत्मा नहीं तो वह उसका जन नहीं।" (रोमियों 8:9।) आत्मा कभी आत्मा के भीतर निष्क्रिय और निठल्ला नहीं पड़ा रहता; वह सदा उस फल के द्वारा अपनी उपस्थिति प्रकट करता है जो वह हृदय, चरित्र और जीवन में उत्पन्न करता है। पौलुस कहता है, "आत्मा का फल प्रेम, आनन्द, मेल, धीरज, कृपा, भलाई, विश्वास, नम्रता, और संयम" और ऐसे ही अन्य गुण हैं। (गलातियों 5:22।) जहाँ ये बातें पाई जाती हैं, वहाँ आत्मा है; जहाँ ये बातें नहीं हैं, वहाँ मनुष्य परमेश्वर के सामने मरे हुए हैं। आत्मा की तुलना हवा से की गई है, और हवा के समान वह भी हमारी शारीरिक आँखों से दिखाई नहीं देता। परन्तु जैसे हम लहरों, वृक्षों और धुएँ पर उसके प्रभाव से जान लेते हैं कि हवा चल रही है, वैसे ही हम मनुष्य के आचरण में उसके प्रभावों से जान सकते हैं कि आत्मा उसमें है। यह मानना व्यर्थ है कि हम में आत्मा है, यदि हम "आत्मा के अनुसार चलते" भी नहीं। (गलातियों 5:25।) हम इसे निश्चित बात मान सकते हैं कि जहाँ पवित्र जीवन नहीं, वहाँ पवित्र आत्मा नहीं। जो मुहर आत्मा मसीह के लोगों पर लगाता है वह पवित्रीकरण है। जितने "परमेश्वर के आत्मा के चलाए चलते हैं, वे ही," और केवल वे ही, "परमेश्वर के पुत्र हैं।" (रोमियों 8:14।)

(4) पवित्रीकरण फिर परमेश्वर के चुनाव का एकमात्र निश्चित चिह्न है। निस्सन्देह चुने हुए लोगों के नाम और संख्या एक गुप्त बात है जिसे परमेश्वर ने बुद्धिमानी से अपने ही अधिकार में रखा है, और मनुष्य पर प्रकट नहीं किया। इस संसार में हमें यह नहीं दिया गया कि हम जीवन की पुस्तक के पन्ने देखें और जानें कि हमारे नाम वहाँ हैं या नहीं। परन्तु चुनाव के विषय में यदि एक बात स्पष्ट रूप से कही गई है तो यह कि चुने हुए स्त्री-पुरुष पवित्र जीवन से पहचाने और अलग किये जा सकते हैं। यह स्पष्ट लिखा है कि वे "पवित्रीकरण के द्वारा चुने हुए हैं,—पवित्रीकरण के द्वारा उद्धार के लिये चुने गए हैं,—परमेश्वर के पुत्र के स्वरूप में ढलने के लिये पहले से ठहराए गए हैं,—और जगत की उत्पत्ति से पहले मसीह में इसलिये चुने गए कि पवित्र हों।"—इसीलिये जब पौलुस ने थिस्सलुनीकिया के विश्वासियों के कार्यशील "विश्वास," परिश्रमी "प्रेम" और धीरजवन्त "आशा" को देखा, तो उसने कहा, "मैं जानता हूँ कि परमेश्वर ने तुम्हें चुन लिया है।" (1 पतरस 1:2; 2 थिस्सलुनीकियों 2:13; रोमियों 8:29; इफिसियों 1:4; 1 थिस्सलुनीकियों 1:3, 4।) जो मनुष्य जान-बूझकर और आदतन पाप में जीते हुए यह घमण्ड करता है कि वह परमेश्वर के चुने हुओं में से है, वह केवल अपने आप को धोखा दे रहा है और दुष्ट निन्दा की बात कह रहा है। निस्सन्देह यह जानना कठिन है कि लोग वास्तव में कैसे हैं, और बहुत से लोग जो बाहर से धर्म में भले दिखाई देते हैं, अन्त में खोखले हृदय के कपटी निकल सकते हैं। परन्तु जहाँ कम से कम पवित्रीकरण का कुछ आभास भी नहीं, वहाँ हम निश्चित जान सकते हैं कि चुनाव नहीं है। कलीसिया की प्रश्नोत्तरी सही और बुद्धिमानी से सिखाती है कि पवित्र आत्मा "परमेश्वर के सब चुने हुए लोगों को पवित्र करता है।"

(5) पवित्रीकरण फिर ऐसी वस्तु है जो सदा दिखाई देगी। कलीसिया के महान शिरोमणि के समान, जिससे यह उत्पन्न होता है, यह "छिप नहीं सकता।" "हर एक पेड़ अपने फल से पहचाना जाता है।" (लूका 6:44।) एक सचमुच पवित्र किया हुआ व्यक्ति नम्रता से ऐसा ढका हो सकता है कि वह अपने में दुर्बलता और कमियों के सिवा कुछ न देखे। मूसा के समान, जब वह पहाड़ से उतरा, उसे यह ज्ञात न हो कि उसका मुख चमकता है। भेड़ों और बकरियों के उस महान दृष्टान्त में धर्मियों के समान, वह यह न देख पाए कि उसने कुछ ऐसा किया है जो अपने स्वामी के ध्यान और सराहना के योग्य हो: "हमने कब तुझे भूखा देखा और खिलाया?" (मत्ती 25:37।) परन्तु चाहे वह स्वयं देखे या न देखे, दूसरे सदा उसमें ऐसा स्वभाव, रुचि, चरित्र और जीवन की ऐसी रीति देखेंगे जो और मनुष्यों से भिन्न है। किसी मनुष्य का "पवित्र किया हुआ" होना, जबकि उसके जीवन में कोई पवित्रता दिखाई न दे, यह विचार ही निरी मूर्खता और शब्दों का दुरुपयोग है। ज्योति बहुत मद्धिम हो सकती है; परन्तु अन्धेरे कमरे में यदि केवल एक चिंगारी भी हो, तो वह दिखाई देगी। जीवन बहुत दुर्बल हो सकता है; परन्तु यदि नाड़ी थोड़ी भी धड़कती है, तो वह अनुभव होगी। पवित्र किये हुए मनुष्य के साथ भी ठीक ऐसा ही है: उसका पवित्रीकरण अनुभव किया और देखा जाएगा, चाहे वह स्वयं उसे न समझे। कोई "सन्त" जिसमें संसारिकता या पाप के सिवा कुछ न दिखाई दे, एक ऐसा विचित्र प्राणी है जिसे बाइबल नहीं पहचानती!

(6) पवित्रीकरण फिर ऐसी वस्तु है जिसके लिये हर विश्वासी उत्तरदायी है। यह कहने में मैं भ्रांति नहीं चाहता। मैं भी किसी के समान दृढ़ता से मानता हूँ कि पृथ्वी का हर मनुष्य परमेश्वर के सामने उत्तरदायी है, और अन्तिम दिन सब खोए हुए लोग निरुत्तर और निरुपाय होंगे। हर मनुष्य में अपने "प्राण को खोने" की सामर्थ्य है। (मत्ती 16:26) परन्तु यह मानते हुए मैं दृढ़ता से कहता हूँ कि विश्वासी विशेष और अनोखे रूप से उत्तरदायी हैं, और पवित्र जीवन जीने के विशेष दायित्व के अधीन हैं। वे औरों के समान मरे हुए, अन्धे और बिना नए किये हुए नहीं हैं: वे परमेश्वर के लिये जीवित हैं, और उनके पास ज्योति, ज्ञान और भीतर एक नया सिद्धान्त है। यदि वे पवित्र नहीं हैं तो दोष किसका है, उनका अपना ही नहीं तो? यदि वे पवित्र नहीं किये गए हैं तो वे दोष किस पर डाल सकते हैं, अपने ही पर नहीं तो? परमेश्वर ने, जिसने उन्हें अनुग्रह, नया हृदय और नया स्वभाव दिया है, यदि वे उसकी स्तुति के लिये न जिएँ तो उनका हर बहाना छीन लिया है। यह बात बहुत अधिक भुला दी जाती है। जो मनुष्य सच्चा मसीही होने का दावा करता है, फिर भी पवित्रीकरण की बहुत निचली अवस्था में सन्तुष्ट बैठा रहता है (यदि वह कुछ है भी), और ठण्डे मन से कहता है कि वह "कुछ नहीं कर सकता," वह बहुत दयनीय दृश्य और बहुत अज्ञानी मनुष्य है। आओ, इस भ्रम से सावधान रहें और चौकस रहें। परमेश्वर का वचन अपनी आज्ञाएँ सदा विश्वासियों से उत्तरदायी प्राणियों के रूप में कहता है। यदि पापियों का उद्धारकर्ता हमें नया करनेवाला अनुग्रह देता है और अपने आत्मा से हमें बुलाता है, तो हम निश्चित जान सकते हैं कि वह अपेक्षा रखता है कि हम अपने अनुग्रह का उपयोग करें, और सो न जाएँ। इसी बात को भूलने से बहुत से विश्वासी "पवित्र आत्मा को शोकित" करते हैं, और बहुत निकम्मे और अशान्त मसीही बन जाते हैं।

(7) पवित्रीकरण फिर एक ऐसी बात है जिसमें बढ़ोतरी और श्रेणियाँ हो सकती हैं। मनुष्य पवित्रता में एक सीढ़ी से दूसरी सीढ़ी पर चढ़ सकता है, और अपने जीवन के किसी एक समय में दूसरे समय की अपेक्षा कहीं अधिक पवित्र किया हुआ हो सकता है। वह पहले-पहल विश्वास करने के समय की अपेक्षा अधिक क्षमा पाया हुआ और अधिक धर्मी ठहराया हुआ नहीं हो सकता, चाहे वह इसे अधिक अनुभव करे। परन्तु अधिक पवित्र किया हुआ तो वह निश्चय ही हो सकता है, क्योंकि उसके नये स्वभाव का हर गुण दृढ़, विस्तृत और गहरा किया जा सकता है। हमारे प्रभु की अपने चेलों के लिये की गई अन्तिम प्रार्थना का स्पष्ट अर्थ यही है, जब उसने ये शब्द कहे, "उन्हें पवित्र कर;" और पौलुस की थिस्सलुनीकियों के लिये की गई प्रार्थना का भी, "शान्ति का परमेश्वर आप ही तुम्हें पूरी रीति से पवित्र करे।" (यूहन्ना 17:17; 1 थिस्सलुनीकियों 4:3।) दोनों स्थानों में यह कथन साफ़ दर्शाता है कि पवित्रीकरण का बढ़ना सम्भव है; जबकि "उन्हें धर्मी ठहरा" जैसा कथन पवित्रशास्त्र में किसी विश्वासी के लिये एक बार भी नहीं आया, क्योंकि वह जितना धर्मी ठहराया गया है उससे अधिक धर्मी नहीं ठहराया जा सकता। "आरोपित पवित्रीकरण" के सिद्धान्त के लिये मुझे पवित्रशास्त्र में कोई आधार नहीं मिलता। मुझे यह ऐसा सिद्धान्त लगता है जो भिन्न बातों को आपस में उलझा देता है और बहुत बुरे परिणामों की ओर ले जाता है। कम से कम यह तो निश्चित है कि यह सिद्धान्त सब श्रेष्ठ मसीहियों के अनुभव से सीधे-सीधे खण्डित होता है। यदि किसी एक बात पर परमेश्वर के सबसे पवित्र सन्त सहमत हैं तो वह यह है: कि जैसे-जैसे वे आत्मिक जीवन में आगे बढ़ते हैं, और जितनी निकटता से वे परमेश्वर के साथ चलते हैं, उसी के अनुपात में वे अधिक देखते हैं, अधिक जानते हैं, अधिक अनुभव करते हैं, अधिक करते हैं, अधिक पश्चाताप करते हैं, और अधिक विश्वास करते हैं। संक्षेप में, वे "अनुग्रह में बढ़ते" हैं, जैसा कि पतरस विश्वासियों को ऐसा करने का आग्रह करता है; और पौलुस के वचनों के अनुसार "और भी बढ़ते जाते" हैं। (2 पतरस 3:18; 1 थिस्सलुनीकियों 4:1।)

(8) पवित्रीकरण फिर एक ऐसी बात है जो पवित्रशास्त्र-सम्मत साधनों के परिश्रमपूर्वक उपयोग पर बहुत निर्भर है। "साधनों" से मेरा तात्पर्य है बाइबल पढ़ना, एकान्त की प्रार्थना, सार्वजनिक आराधना में नियमित उपस्थित होना, परमेश्वर के वचन को नियमित सुनना, और प्रभु-भोज में नियमित भाग लेना। मैं इसे एक सीधे तथ्य के रूप में कहता हूँ कि जो इन बातों के प्रति लापरवाह है, उसे पवित्रीकरण में अधिक उन्नति की आशा कभी नहीं करनी चाहिए। मुझे किसी भी श्रेष्ठ सन्त का ऐसा कोई वृत्तान्त नहीं मिलता जिसने इनकी उपेक्षा की हो। ये ठहराई हुई नालियाँ हैं जिनके द्वारा पवित्र आत्मा आत्मा में अनुग्रह की नई आपूर्ति पहुँचाता है, और भीतरी मनुष्य में अपने आरम्भ किये हुए कार्य को दृढ़ करता है। चाहे लोग इसे व्यवस्था का सिद्धान्त कहें, मैं यह कहने से कभी पीछे नहीं हटूँगा कि कोई "परिश्रम के बिना आत्मिक लाभ" नहीं होता। जो किसान अपने खेतों में बीज बोकर ही सन्तुष्ट रहे और कटनी तक उनकी ओर देखे भी नहीं, उससे मैं जितनी समृद्धि की आशा करूँगा, उतनी ही उस विश्वासी से अधिक पवित्रता की आशा करूँगा जो अपनी बाइबल पढ़ने, अपनी प्रार्थनाओं और अपने रविवारों के उपयोग में परिश्रमी नहीं है। हमारा परमेश्वर साधनों के द्वारा कार्य करनेवाला परमेश्वर है, और वह उस मनुष्य की आत्मा को कभी आशीष नहीं देगा जो इतना ऊँचा और आत्मिक होने का दिखावा करता है कि वह इनके बिना भी निभा सकता है।

(9) पवित्रीकरण फिर एक ऐसी बात है जो मनुष्य को भीतरी आत्मिक संघर्ष से नहीं बचाती। संघर्ष से मेरा तात्पर्य है हृदय के भीतर पुराने स्वभाव और नये स्वभाव का, शरीर और आत्मा का संघर्ष, जो हर विश्वासी में एक साथ पाये जाते हैं। (गलातियों 5:17।) उस संघर्ष का गहरा बोध, और उससे उत्पन्न मन की अत्यधिक बेचैनी, इस बात का प्रमाण नहीं कि मनुष्य पवित्र किया हुआ नहीं है। बल्कि मेरा विश्वास है कि ये हमारी दशा के स्वस्थ लक्षण हैं, और प्रमाणित करते हैं कि हम मरे हुए नहीं, जीवित हैं। सच्चा मसीही वह है जिसके पास केवल विवेक की शान्ति ही नहीं, भीतर का युद्ध भी है। वह अपनी शान्ति से ही नहीं, अपने युद्ध से भी पहचाना जा सकता है। यह कहते समय मैं यह नहीं भूलता कि मैं उन भले-मानस मसीहियों के विचारों का खण्डन कर रहा हूँ जो "निष्पाप सिद्धता" नामक सिद्धान्त को मानते हैं। मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता। मेरा विश्वास है कि जो मैं कहता हूँ उसकी पुष्टि पौलुस के रोमियों के सातवें अध्याय के कथन से होती है। मैं उस अध्याय को अपने सब पाठकों के ध्यानपूर्वक अध्ययन के लिये सुझाता हूँ। मुझे पूरा सन्तोष है कि वह किसी अपरिवर्तित मनुष्य के, या किसी नये और अस्थिर मसीही के अनुभव का वर्णन नहीं करता, परन्तु परमेश्वर के साथ निकट सहभागिता रखनेवाले एक पुराने अनुभवी सन्त का। ऐसे मनुष्य के सिवाय कोई यह नहीं कह सकता, "मैं भीतरी मनुष्यत्व से परमेश्वर की व्यवस्था से अति प्रसन्न रहता हूँ।" (रोमियों 7:22।) मेरा यह भी विश्वास है कि जो मैं कहता हूँ उसकी पुष्टि उन सब श्रेष्ठ मसीह-सेवकों के अनुभव से होती है जो कभी हुए हैं। पूरा प्रमाण उनकी दैनन्दिनियों, उनकी आत्मकथाओं और उनके जीवन-चरित्रों में देखा जा सकता है।— यह सब मानते हुए, मैं लोगों से यह कहने में कभी संकोच नहीं करूँगा कि भीतरी संघर्ष इस बात का प्रमाण नहीं कि मनुष्य पवित्र नहीं है, और उन्हें यह नहीं सोचना चाहिए कि वे पवित्र किये हुए नहीं हैं क्योंकि वे भीतरी संघर्ष से पूरी तरह मुक्त अनुभव नहीं करते। ऐसी स्वतन्त्रता हमें निःसन्देह स्वर्ग में मिलेगी; परन्तु इस संसार में हम उसका आनन्द कभी नहीं लेंगे। सर्वोत्तम मसीही का हृदय भी, अपनी सर्वोत्तम दशा में, एक ऐसा खेत है जिस पर दो विरोधी छावनियों का और "दो सेनाओं की सी मण्डली" का अधिकार है। (श्रेष्ठगीत 6:13।) तेरहवें और पन्द्रहवें अनुच्छेदों के ये शब्द सब कलीसियाई जन भली-भाँति विचार करें: "जो नया जन्म पा चुके हैं उनमें भी स्वभाव का संक्रमण बना रहता है।" "यद्यपि हम मसीह में बपतिस्मा पाये हुए और नया जन्म पाये हुए हैं, फिर भी बहुत बातों में चूकते हैं; और यदि हम कहें कि हम में कुछ पाप नहीं, तो हम अपने आप को धोखा देते हैं, और सत्य हम में नहीं है।"*

(10) पवित्रीकरण फिर एक ऐसी बात है जो मनुष्य को धर्मी नहीं ठहरा सकती, तौभी परमेश्वर को प्रसन्न करती है। यह आश्चर्यजनक प्रतीत हो सकता है, फिर भी यह सत्य है। अब तक के सबसे पवित्र सन्त के सबसे पवित्र कार्य भी कमोबेश दोषों और अपूर्णताओं से भरे होते हैं। वे या तो उद्देश्य में खोटे होते हैं या पालन में अधूरे, और अपने आप में "चमकदार पापों" से अधिक कुछ नहीं हैं, जो परमेश्वर के क्रोध और दण्ड के योग्य हैं। यह मान लेना कि ऐसे कार्य परमेश्वर के न्याय की कठोरता को सह सकते हैं, पाप का प्रायश्चित कर सकते हैं और स्वर्ग का पुण्य अर्जित कर सकते हैं, सरासर मूर्खता है। "व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी उसके सामने धर्मी नहीं ठहरेगा।"—"हम इस परिणाम पर पहुँचते हैं कि मनुष्य व्यवस्था के कामों के बिना विश्वास से धर्मी ठहरता है।" (रोमियों 3:20–28।) जिस धार्मिकता में हम परमेश्वर के सामने खड़े हो सकते हैं वह किसी और की धार्मिकता है,—अर्थात् हमारे स्थानापन्न और प्रतिनिधि, प्रभु यीशु मसीह की सिद्ध धार्मिकता। स्वर्ग के लिये हमारा एकमात्र अधिकार उसका कार्य है, हमारा कार्य नहीं। यह ऐसा सत्य है जिसे बनाए रखने के लिये हमें मरने तक को तैयार रहना चाहिए।—फिर भी, इस सब के होते हुए, बाइबल स्पष्ट रूप से सिखाती है कि पवित्र किए गए मनुष्य के पवित्र कार्य, यद्यपि अपूर्ण हैं, परमेश्वर की दृष्टि में प्रसन्नता देनेवाले हैं। "ऐसे बलिदानों से परमेश्वर प्रसन्न होता है।" (इब्रानियों 13:16।) "अपने माता-पिता की आज्ञा मानो, क्योंकि प्रभु में यह भला लगता है।" (कुलुस्सियों 3:20।) "हम उसकी आज्ञाओं को मानते हैं और जो उसे भाता है वही करते हैं।" (1 यूहन्ना 3:22।) इसे कभी न भूलें, क्योंकि यह बड़ी सान्त्वना देनेवाला सिद्धान्त है। जैसे कोई पिता अपने नन्हे बच्चे के उसे प्रसन्न करने के प्रयासों से प्रसन्न होता है, चाहे वह केवल एक फूल तोड़कर लाना या कमरे के पार चलना ही क्यों न हो, वैसे ही स्वर्ग में हमारा पिता अपनी विश्वासी सन्तानों के दीन कार्यों से प्रसन्न होता है। वह उनके कार्यों के उद्देश्य, सिद्धान्त और मनसा को देखता है, केवल उनकी मात्रा और गुण को नहीं। वह उन्हें अपने प्रिय पुत्र के अंग जानकर देखता है, और उसी के कारण, जहाँ कहीं एकनिष्ठ दृष्टि है, वह प्रसन्न होता है। जो कलीसियाई जन इसका विरोध करते हैं, उन्हें इंग्लैंड की कलीसिया के बारहवें अनुच्छेद का अध्ययन करना भला होगा।

(11) पवित्रीकरण फिर एक ऐसी बात है जो न्याय के उस बड़े दिन में हमारे चरित्र की साक्षी के रूप में नितान्त आवश्यक पाई जाएगी। यह कहना बिलकुल व्यर्थ होगा कि हमने मसीह पर विश्वास किया, जब तक कि हमारे विश्वास का कोई पवित्र करनेवाला प्रभाव न रहा हो और वह हमारे जीवन में दिखाई न दिया हो। जब वह बड़ा श्वेत सिंहासन लगाया जाएगा, जब पुस्तकें खोली जाएँगी, जब कब्रें अपने निवासियों को लौटा देंगी, जब मृतक परमेश्वर के न्यायासन के सामने खड़े किए जाएँगे, तब एक ही वस्तु की आवश्यकता होगी: प्रमाण, प्रमाण, प्रमाण। इस बात के कुछ प्रमाण के बिना कि मसीह में हमारा विश्वास सच्चा और खरा था, हम केवल दण्ड पाने के लिये ही फिर जी उठेंगे। मुझे ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता जो उस दिन स्वीकार किया जाएगा, सिवाय पवित्रीकरण के। प्रश्न यह नहीं होगा कि हमने कैसी बातें कीं और क्या दावा किया, बल्कि यह कि हम कैसे जीए और क्या किया। इस विषय में कोई अपने आप को धोखा न दे। भविष्य के विषय में यदि कुछ निश्चित है तो यह निश्चित है कि न्याय होगा; और न्याय के विषय में यदि कुछ निश्चित है तो यह निश्चित है कि उसमें मनुष्यों के "कर्मों" और "कामों" पर विचार और जाँच की जाएगी। (यूहन्ना 5:29; 2 कुरिन्थियों 5:10; प्रकाशित वाक्य 20:13।) जो यह मानता है कि कर्मों का कोई महत्त्व नहीं, क्योंकि वे हमें धर्मी नहीं ठहरा सकते, वह बहुत अज्ञानी मसीही है। यदि वह अपनी आँखें न खोले, तो उसे अपनी हानि उठाकर पता चलेगा कि यदि वह अनुग्रह के किसी प्रमाण के बिना परमेश्वर के न्यायासन के सामने आया, तो उसके लिये अच्छा होता कि वह जन्मा ही न होता।

(12) अन्तिम बात यह कि पवित्रीकरण हमें स्वर्ग के लिये तैयार करने और अभ्यस्त बनाने के लिये नितान्त आवश्यक है। अधिकांश मनुष्य आशा करते हैं कि मरने पर वे स्वर्ग जाएँगे; परन्तु भय है कि थोड़े ही यह विचार करने का कष्ट उठाते हैं कि यदि वे वहाँ पहुँच भी गए तो क्या वे स्वर्ग का आनन्द ले सकेंगे। स्वर्ग मूल रूप से एक पवित्र स्थान है; उसके निवासी सब पवित्र हैं; उसके कार्य सब पवित्र हैं। स्वर्ग में सचमुच सुखी होने के लिये यह स्पष्ट और साफ है कि हमें पृथ्वी पर रहते हुए ही स्वर्ग के लिये कुछ-कुछ अभ्यस्त और तैयार किया जाना चाहिए। मृत्यु के बाद शुद्धिकरण-स्थान (पर्गेटरी) की यह धारणा, जो पापियों को सन्त बना देगा, मनुष्य की गढ़ी हुई झूठी कल्पना है, और बाइबल में कहीं नहीं सिखाई गई। यदि हमें बाद में महिमा में सन्त होना है तो मरने से पहले ही हमें सन्त होना होगा। बहुतों का यह प्रिय विचार कि मरते हुए मनुष्यों को अपने बड़े परिवर्तन के लिये तैयार होने को केवल पापमुक्ति और पापों की क्षमा चाहिए, एक गहरा भ्रम है। हमें पवित्र आत्मा के कार्य की भी आवश्यकता है और मसीह के कार्य की भी; हमें हृदय के नवीकरण की भी आवश्यकता है और प्रायश्चित करनेवाले लहू की भी; हमें पवित्र किए जाने की भी आवश्यकता है और धर्मी ठहराए जाने की भी। मृत्यु-शय्या पर लोगों को यह कहते सुनना आम बात है, "मैं तो बस इतना चाहता हूँ कि प्रभु मेरे पाप क्षमा करे और मुझे विश्राम में ले जाए।" परन्तु जो ऐसी बातें कहते हैं वे भूल जाते हैं कि यदि हमारे पास उसका आनन्द लेने का हृदय ही न हो तो स्वर्ग का विश्राम बिलकुल व्यर्थ होगा! अपवित्र मनुष्य स्वर्ग में क्या करेगा, यदि किसी संयोग से वह वहाँ पहुँच भी गया? इस प्रश्न को सीधे आँख मिलाकर देखा जाए और ईमानदारी से इसका उत्तर दिया जाए। कोई मनुष्य ऐसे स्थान में सुखी हो ही नहीं सकता जहाँ वह अपने वातावरण में न हो, और जहाँ उसके चारों ओर सब कुछ उसकी रुचियों, आदतों और चरित्र के अनुकूल न हो। जब उकाब लोहे के पिंजरे में सुखी होगा, जब भेड़ पानी में सुखी होगी, जब उल्लू दोपहर की चमकती धूप में सुखी होगा, जब मछली सूखी भूमि पर सुखी होगी,—तभी, और उससे पहले नहीं, मैं मानूँगा कि अपवित्र मनुष्य स्वर्ग में सुखी हो सकता है।*

मैं पवित्रीकरण के विषय में ये बारह प्रस्ताव इस दृढ़ विश्वास के साथ रखता हूँ कि ये सत्य हैं, और इन पृष्ठों के सब पाठकों से कहता हूँ कि इन पर भली-भाँति विचार करें। इनमें से प्रत्येक को और विस्तार से और पूर्णता से समझाया जा सकता है, और सभी निजी चिन्तन और मनन के योग्य हैं। इनमें से कुछ का विरोध और खण्डन किया जा सकता है; परन्तु मुझे सन्देह है कि इनमें से कोई भी उलटा जा सकता है या असत्य सिद्ध किया जा सकता है। मैं इनके लिये केवल निष्पक्ष और उचित सुनवाई माँगता हूँ। मैं अपने विवेक से मानता हूँ कि ये पवित्रीकरण के विषय में मनुष्यों को स्पष्ट विचार पाने में सहायता देने की सम्भावना रखते हैं।

II. अब मैं उस दूसरे विषय को लेता हूँ जिस पर मैंने विचार करने का प्रस्ताव रखा था। वह विषय है पवित्रीकरण का दिखाई देनेवाला प्रमाण। एक शब्द में, पवित्र किए गए मनुष्य के दिखाई देनेवाले चिह्न क्या हैं? हम उसमें क्या देखने की आशा कर सकते हैं?

हमारे विषय का यह भाग बहुत व्यापक और कठिन है। यह व्यापक इसलिए है कि इसमें अनेक ब्योरों का उल्लेख करना आवश्यक हो जाता है, जिन्हें इस जैसे लेख की सीमा में पूरी तरह नहीं सँभाला जा सकता। यह कठिन इसलिए है कि इसकी चर्चा किसी को ठेस पहुँचाए बिना हो ही नहीं सकती। फिर भी हर जोखिम उठाकर सत्य कहा जाना चाहिए; और कुछ ऐसा सत्य भी है जिसे आज के समय में विशेष रूप से कहे जाने की आवश्यकता है।

(1) अतः सच्चा पवित्रीकरण धर्म की बातें करने में नहीं है। यह ऐसी बात है जिसे कभी भुलाना नहीं चाहिए। इन पिछले दिनों में शिक्षा और प्रचार के भारी विस्तार के कारण चेतावनी की आवाज़ उठाना नितान्त आवश्यक हो गया है। लोग सुसमाचार के सत्य के विषय में इतना कुछ सुनते हैं कि वे उसके शब्दों और वाक्यांशों से एक अपवित्र परिचय बना लेते हैं, और कभी-कभी उसके सिद्धान्तों के विषय में इतने धाराप्रवाह बोलते हैं कि आप उन्हें सच्चे मसीही समझ बैठें। वास्तव में यह सुनकर जी मिचला उठता है और घृणा होती है कि अनेक लोग "मन फिराव, उद्धारकर्ता, सुसमाचार, शान्ति पाने, मुफ़्त अनुग्रह" और ऐसी ही बातों के विषय में कितनी ठण्डी और छिछली भाषा बोलते जाते हैं, जबकि वे प्रत्यक्ष रूप से पाप की सेवा कर रहे हैं या संसार के लिए जी रहे हैं। क्या हम सन्देह कर सकते हैं कि ऐसी बातें परमेश्वर की दृष्टि में घृणित हैं, और कोसने, शपथ खाने तथा परमेश्वर का नाम व्यर्थ लेने से कुछ ही कम हैं? मसीह हमें केवल जीभ ही को अपनी सेवा में लगाने को नहीं कहता। परमेश्वर नहीं चाहता कि उसके लोग मात्र खोखले ढोल, बजता हुआ पीतल और झंझनाती हुई झाँझ हों। हमें न केवल "वचन और जीभ से" वरन् "काम और सत्य के द्वारा" पवित्र किया जाना है। (1 यूहन्ना 3:18)

(2) सच्चा पवित्रीकरण क्षणिक धार्मिक भावनाओं में नहीं है। इस विषय में भी चेतावनी की बड़ी आवश्यकता है। देश के हर भाग में मिशन सभाएँ और पुनर्जागरण की सभाएँ बहुत ध्यान आकर्षित कर रही हैं और बड़ी हलचल उत्पन्न कर रही हैं। इंग्लैंड की कलीसिया को मानो नया जीवन मिल गया है और वह नई सक्रियता दिखा रही है; और इसके लिए हमें परमेश्वर का धन्यवाद करना चाहिए। परन्तु इन बातों के लाभों के साथ-साथ इनके अपने खतरे भी हैं।

जहाँ कहीं गेहूँ बोया जाता है, वहाँ शैतान निश्चय ही जंगली बीज बोता है। आशंका है कि बहुत से लोग सुसमाचार के प्रचार के अधीन प्रभावित, द्रवित और जागृत दिखाई देते हैं, जबकि वास्तव में उनके हृदय बिलकुल नहीं बदले होते। दूसरों को रोते, आनन्द मनाते या प्रभावित होते देखने की छूत से उत्पन्न एक प्रकार की पाशविक उत्तेजना ही उनकी दशा का सच्चा कारण है। उनके घाव केवल त्वचा तक गहरे हैं, और जिस शान्ति का वे अनुभव करने का दावा करते हैं वह भी केवल त्वचा तक गहरी है। पथरीली भूमि के सुननेवालों के समान वे "वचन को आनन्द से ग्रहण करते हैं" (मत्ती 13:20); परन्तु थोड़े समय बाद वे गिर जाते हैं, संसार में लौट जाते हैं, और पहले से अधिक कठोर और बुरे हो जाते हैं। योना की लौकी के समान वे रातोंरात उग आते हैं और रातोंरात नष्ट हो जाते हैं। इन बातों को भुलाया न जाए। आइए, इस समय हम घावों को ऊपर-ऊपर से चंगा करने और शान्ति, शान्ति पुकारने से सावधान रहें, जबकि शान्ति है ही नहीं। जो कोई धर्म में नई रुचि दिखाए, उससे हम आग्रह करें कि वह पवित्र आत्मा के गहरे, ठोस और पवित्र करनेवाले कार्य से कम किसी बात से सन्तुष्ट न हो। झूठी धार्मिक उत्तेजना के बाद की प्रतिक्रिया आत्मा का अत्यन्त घातक रोग है। जब पुनर्जागरण की गरमी में शैतान मनुष्य में से केवल कुछ समय के लिए निकाला जाता है, और कुछ देर बाद अपने घर में लौट आता है, तो उस मनुष्य की पिछली दशा पहली से भी बुरी हो जाती है। हज़ार गुना अच्छा है कि मनुष्य धीरे-धीरे आरम्भ करे और फिर दृढ़ता से "वचन में बना रहे", बजाय इसके कि जल्दबाज़ी में, बिना खर्च का हिसाब लगाए आरम्भ करे, और कुछ समय बाद लूत की पत्नी के समान पीछे मुड़कर देखे और संसार में लौट जाए। मैं घोषणा करता हूँ कि मैं आत्मा की इससे अधिक खतरनाक कोई दशा नहीं जानता कि हम यह मान बैठें कि हम नया जन्म पा चुके हैं और पवित्र आत्मा द्वारा पवित्र किए जा चुके हैं, केवल इसलिए कि हमने कुछ धार्मिक भावनाएँ बटोर ली हैं।

(3) सच्चा पवित्रीकरण बाहरी रीति-रिवाज़ और ऊपरी भक्ति में नहीं है। यह एक भारी भ्रम है, परन्तु दुर्भाग्य से बहुत सामान्य है। हज़ारों लोग मानो यह समझते हैं कि सच्ची पवित्रता शारीरिक धर्म की अत्यधिक मात्रा में दिखाई देती है, अर्थात् कलीसिया की सभाओं में नियमित उपस्थिति में, प्रभु-भोज में सम्मिलित होने में, उपवासों और सन्तों के दिनों के पालन में, सार्वजनिक आराधना के समय बार-बार झुकने, मुड़ने और भाव-भंगिमाओं तथा मुद्राओं में, स्वयं थोपी हुई कठोरताओं और छोटे-मोटे आत्म-त्यागों में, विशेष प्रकार के वस्त्र पहनने में, और चित्रों तथा क्रूसों के प्रयोग में। मैं खुलकर मानता हूँ कि कुछ लोग विवेकपूर्ण उद्देश्यों से इन बातों को अपनाते हैं और सचमुच विश्वास करते हैं कि इनसे उनकी आत्मा को सहायता मिलती है। परन्तु मुझे भय है कि बहुत से मामलों में यह बाहरी धार्मिकता भीतरी पवित्रता का स्थान लेने के लिए प्रयोग की जाती है; और मुझे पूरा निश्चय है कि यह हृदय के पवित्रीकरण से बहुत ही पीछे रह जाती है। सबसे बढ़कर, जब मैं देखता हूँ कि मसीही धर्म की इस बाहरी, इन्द्रियप्रधान और औपचारिक शैली के अनेक अनुयायी सांसारिकता में डूबे हुए हैं और बिना लज्जा के उसके ठाट-बाट और घमण्ड में सिर के बल कूद पड़ते हैं, तो मुझे लगता है कि इस विषय पर बहुत स्पष्ट बोलने की आवश्यकता है। "शारीरिक सेवा" की भारी मात्रा हो सकती है, जबकि सच्चे पवित्रीकरण का रत्ती भर भी न हो।

(4) पवित्रीकरण का अर्थ यह नहीं है कि हम जीवन में अपने स्थान से अलग हो जाएँ और अपने सामाजिक कर्तव्यों को त्याग दें। हर युग में बहुतों के लिए पवित्रता की खोज में यह मार्ग अपनाना एक फन्दा रहा है। सैकड़ों साधुओं ने स्वयं को किसी जंगल में गाड़ दिया है, और हज़ारों स्त्री-पुरुषों ने अपने आप को मठों और संन्यासिनी-गृहों की दीवारों के भीतर बन्द कर लिया है, इस व्यर्थ विचार से कि ऐसा करने पर वे पाप से बच जाएँगे और अत्यन्त पवित्र बन जाएँगे। वे भूल गए हैं कि कोई ताला या सलाख शैतान को बाहर नहीं रोक सकती, और हम जहाँ कहीं भी जाएँ, सब बुराई की उस जड़ को, अर्थात् अपने ही हृदयों को, अपने साथ ले जाते हैं। भिक्षु या संन्यासिनी बन जाना, या किसी 'दया-गृह' में सम्मिलित हो जाना, पवित्रीकरण का राजमार्ग नहीं है। सच्ची पवित्रता मसीही को कठिनाइयों से बचाती नहीं, बल्कि उनका सामना करना और उन पर जय पाना सिखाती है। मसीह चाहता है कि उसके लोग यह प्रकट करें कि उसका अनुग्रह कोई ऐसा पौधा नहीं जो केवल हरितगृह की आड़ में पनपे, बल्कि एक सुदृढ़ और कठोर वस्तु है जो जीवन के हर सम्बन्ध में फल-फूल सकती है। उस स्थिति में, जिसमें परमेश्वर ने हमें बुलाया है, अपना कर्तव्य निभाना—भ्रष्टता के बीच नमक की तरह और अन्धकार के बीच ज्योति की तरह—पवित्रीकरण का एक मुख्य तत्त्व है। जो मनुष्य किसी गुफा में छिप जाता है वह नहीं, बल्कि वह जो स्वामी या सेवक, माता-पिता या सन्तान के रूप में, परिवार में और सड़क पर, व्यवसाय और व्यापार में परमेश्वर की महिमा करता है, वही पवित्रशास्त्र के अनुसार पवित्र किए गए मनुष्य का नमूना है। हमारे स्वामी ने स्वयं अपनी अन्तिम प्रार्थना में कहा, "मैं यह विनती नहीं करता कि तू उन्हें जगत से उठा ले, परन्तु यह कि तू उन्हें उस दुष्ट से बचाए रख।" (यूहन्ना 17:15।)

(5) पवित्रीकरण का अर्थ कभी-कभार भले कार्य कर लेना नहीं है। यह भीतर एक नए स्वर्गीय सिद्धान्त का नित्य कार्य करना है, जो मनुष्य के दैनिक आचरण में, बड़ी और छोटी दोनों बातों में, आरम्-पार बहता रहता है। इसका निवास हृदय में है, और जैसे शरीर में हृदय का प्रभाव हर अंग पर नियमित रूप से पड़ता है, वैसे ही इसका प्रभाव चरित्र के हर भाग पर पड़ता है। यह उस पम्प के समान नहीं है जो केवल बाहर से चलाए जाने पर ही पानी निकालता है, बल्कि एक अखण्ड सोते के समान है जिससे धारा स्वयं और स्वाभाविक रूप से सदा बहती रहती है। हेरोदेस ने भी, जब उसने यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले की सुनी, "बहुत से काम किए," जबकि उसका हृदय परमेश्वर की दृष्टि में पूर्णतः बिगड़ा हुआ था। (मरकुस 6:20।) ठीक वैसे ही आज भी ऐसे बहुत से लोग हैं जिन पर, जैसा कहा जाता है, "भलाई" के दौरे पड़ते रहते हैं, और वे बीमारी, विपत्ति, परिवार में मृत्यु, सार्वजनिक संकटों या विवेक की अचानक कचोट के प्रभाव में बहुत से भले काम कर डालते हैं। फिर भी कोई भी समझदार देखनेवाला साफ़ देख सकता है कि वे परिवर्तित नहीं हुए हैं, और "पवित्रीकरण" के विषय में कुछ नहीं जानते। हिजकिय्याह के समान एक सच्चा सन्त पूर्ण मन से होगा। वह "परमेश्वर की सब आज्ञाओं को सब विषयों में ठीक जानेगा, और हर झूठे मार्ग से बैर रखेगा।" (2 इतिहास 31:21; भजन संहिता 119:104।)

(6) सच्चा पवित्रीकरण परमेश्वर की व्यवस्था के प्रति नित्य आदर में, और उसे जीवन का नियम मानकर उसकी आज्ञाकारिता में जीने के निरन्तर प्रयास में प्रकट होगा। इससे बड़ा कोई भ्रम नहीं कि मसीही का व्यवस्था और दस आज्ञाओं से कोई सम्बन्ध नहीं, क्योंकि वह उनके पालन से धर्मी नहीं ठहराया जा सकता। वही पवित्र आत्मा जो विश्वासी को व्यवस्था के द्वारा पाप का कायल करता है और उसे धर्मी ठहराए जाने के लिए मसीह के पास ले जाता है, पवित्रीकरण की खोज में उसे व्यवस्था के आत्मिक उपयोग की ओर, एक मित्रवत् मार्गदर्शक के रूप में, सदा ले जाएगा। हमारे प्रभु यीशु मसीह ने दस आज्ञाओं को कभी हल्का नहीं जाना; इसके विपरीत, अपने प्रथम सार्वजनिक प्रवचन, पहाड़ी उपदेश, में उसने उनकी व्याख्या की और उनकी माँगों की गहराई दिखाई। पौलुस ने भी व्यवस्था को कभी हल्का नहीं जाना; इसके विपरीत वह कहता है, "यदि कोई उसे व्यवस्था की रीति पर काम में लाए, तो व्यवस्था भली है।"—"मैं भीतरी मनुष्यत्व से परमेश्वर की व्यवस्था से बहुत प्रसन्न रहता हूँ।" (1 तीमुथियुस 1:8; रोमियों 7:22।) जो सन्त होने का दावा करता है, पर दस आज्ञाओं की हँसी उड़ाता है, और झूठ, कपट, ठगी, चिड़चिड़ेपन, निन्दा, मतवालेपन और सातवीं आज्ञा के उल्लंघन को कुछ नहीं समझता, वह भयंकर भ्रम में पड़ा है। अन्तिम दिन उसे यह सिद्ध करना कठिन होगा कि वह "सन्त" है!

(7) सच्चा पवित्रीकरण मसीह की इच्छा पूरी करने और उसकी व्यावहारिक आज्ञाओं के अनुसार जीने के निरन्तर प्रयास में प्रकट होगा। ये आज्ञाएँ चारों सुसमाचारों में जगह-जगह बिखरी मिलती हैं, और विशेष रूप से पहाड़ी उपदेश में। जो यह मानता है कि ये बातें पवित्रता को बढ़ाने के उद्देश्य के बिना कही गई थीं, और कि मसीही को अपने दैनिक जीवन में इन पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं, वह वास्तव में पागल से कुछ ही अच्छा है, और किसी भी दशा में घोर अज्ञानी है। कुछ मनुष्यों की बातें सुनकर और कुछ की लिखी बातें पढ़कर कोई यह समझ सकता है कि हमारे धन्य प्रभु ने जब वह पृथ्वी पर था तो केवल सिद्धान्त ही सिखाया, और व्यावहारिक कर्तव्यों को सिखाने का काम औरों पर छोड़ दिया! चारों सुसमाचारों का थोड़ा-सा भी ज्ञान हमें बता देना चाहिए कि यह सर्वथा भूल है। उसके चेलों को कैसा होना और क्या करना चाहिए, यह हमारे प्रभु की शिक्षा में बार-बार सामने आता है। सचमुच पवित्र किया गया मनुष्य इसे कभी न भूलेगा। वह ऐसे स्वामी की सेवा करता है जिसने कहा, "जो कुछ मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, यदि उसे करो, तो तुम मेरे मित्र हो।" (यूहन्ना 15:14।)

(8) सच्चा पवित्रीकरण उस आदर्श के अनुसार जीने की निरन्तर लालसा में प्रकट होगा जो प्रेरित पौलुस ने अपनी पत्रियों में कलीसियाओं के सामने रखा है। वह आदर्श उसकी प्रायः सभी पत्रियों के अन्तिम अध्यायों में मिलता है। बहुत से लोगों का यह सामान्य विचार कि पौलुस की रचनाएँ केवल सैद्धान्तिक कथनों और विवादास्पद विषयों से भरी हैं,—धर्मी ठहराया जाना, चुनाव, पूर्वनियति, भविष्यद्वाणी और इसी प्रकार की बातें,—सरासर भ्रम है, और इन अन्तिम दिनों में फैले हुए पवित्रशास्त्र के अज्ञान का शोचनीय प्रमाण है। मैं किसी को भी चुनौती देता हूँ कि वह पौलुस की रचनाओं को ध्यानपूर्वक पढ़े और उनमें जीवन के हर सम्बन्ध में मसीही के कर्तव्य के विषय में, तथा हमारी दैनिक आदतों, स्वभाव और एक दूसरे के प्रति व्यवहार के विषय में बहुत से सीधे-सादे व्यावहारिक निर्देश न पाए। ये निर्देश परमेश्वर की प्रेरणा से इसलिए लिखे गए कि मसीही होने का दावा करनेवालों का सदा मार्गदर्शन करें। जो इन पर ध्यान नहीं देता, वह किसी कलीसिया या उपासनालय का सदस्य तो शायद कहलाकर काम चला ले, परन्तु वह निश्चय ही वैसा मनुष्य नहीं है जिसे बाइबल "पवित्र किया हुआ" कहती है।

(9) सच्चा पवित्रीकरण उन सक्रिय गुणों पर निरन्तर ध्यान देने में प्रकट होगा जिनका उदाहरण हमारे प्रभु ने इतनी सुन्दरता से दिया, और विशेष करके प्रेम के गुण पर। "मैं तुम्हें एक नई आज्ञा देता हूँ, कि एक दूसरे से प्रेम रखो; जैसा मैं ने तुम से प्रेम रखा, वैसा ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम रखो। यदि आपस में प्रेम रखोगे, तो इसी से सब जानेंगे, कि तुम मेरे चेले हो।" (यूहन्ना 13:34, 35।) पवित्र किया हुआ मनुष्य संसार में भलाई करने का, और अपने आसपास के सब लोगों का दुःख घटाने और उनका सुख बढ़ाने का यत्न करेगा। वह अपने स्वामी के समान होने का लक्ष्य रखेगा, जो हर किसी के प्रति दया और प्रेम से भरा था; और यह केवल शब्दों से, लोगों को "प्रिय" कहकर नहीं, वरन् कर्मों और कार्यों और आत्मत्याग के परिश्रम से, जैसा अवसर मिले। जो स्वार्थी मसीही अपने उच्चतर ज्ञान के घमण्ड में सिमटा रहता है, और इसकी कुछ चिन्ता नहीं करता कि दूसरे डूबें या तैरें, स्वर्ग जाएँ या नरक, बस वह इतवार के अच्छे कपड़े पहनकर कलीसिया या उपासनालय चला जाए और "खरा सदस्य" कहलाए,—ऐसा मनुष्य पवित्रीकरण के विषय में कुछ नहीं जानता। वह अपने आप को पृथ्वी पर सन्त समझ ले, परन्तु स्वर्ग में सन्त न होगा। जो मसीह के उदाहरण पर चलना नहीं जानते, उनका उद्धारकर्ता मसीह कभी न ठहरेगा। उद्धार करनेवाला विश्वास और सच्चा परिवर्तन करनेवाला अनुग्रह सदा यीशु के स्वरूप से कुछ न कुछ समानता अवश्य उत्पन्न करेगा।* (कुलुस्सियों 3:10।)

(10) अन्त में, सच्चा पवित्रीकरण मसीही जीवन के निष्क्रिय गुणों पर निरन्तर ध्यान देने में प्रकट होगा। निष्क्रिय गुणों से मेरा अर्थ उन गुणों से है जो विशेष करके परमेश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण में, और एक दूसरे को सहने और क्षमा करने में दिखाई देते हैं। शायद थोड़े ही लोग, जब तक उन्होंने इस बात की जाँच न की हो, यह जानते हैं कि नए नियम में इन गुणों के विषय में कितना कहा गया है, और वे कितना महत्त्वपूर्ण स्थान रखते दिखाई देते हैं। यही वह बात है जिस पर पतरस हमारे प्रभु यीशु मसीह के उदाहरण को हमारे सामने रखते हुए ज़ोर देता है: "मसीह भी तुम्हारे लिये दुख उठाकर, तुम्हें एक आदर्श दे गया है, कि तुम भी उसके चिन्ह पर चलो। न तो उस ने पाप किया, और न उसके मुँह से छल की कोई बात निकली। वह गाली सुनकर गाली नहीं देता था, और दुख उठाकर किसी को भी धमकी नहीं देता था, पर अपने आप को सच्चे न्यायी के हाथ में सौंपता था।" (1 पतरस 2:21–23।)—यही वह एकमात्र अंगीकार है जो प्रभु की प्रार्थना हमसे करवाती है: "और जैसे हम ने अपने अपराधियों को क्षमा किया है, वैसे ही तू भी हमारे अपराधों को क्षमा कर;" और प्रार्थना के अन्त में इसी एक बात पर टीका की गई है।—यही बात पौलुस द्वारा दी गई आत्मा के फलों की सूची का एक तिहाई भाग घेरती है। नौ फल गिनाए गए हैं, और उनमें से तीन, "धीरज, कृपा और नम्रता," निःसन्देह निष्क्रिय गुण हैं। (गलातियों 5:22, 23।) मुझे साफ़ कहना चाहिए कि मैं नहीं समझता कि मसीही इस विषय पर पर्याप्त विचार करते हैं। निष्क्रिय गुणों को प्राप्त करना निःसन्देह सक्रिय गुणों से कठिन है, परन्तु ठीक यही वे गुण हैं जिनका संसार पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है। एक बात मुझे पूरी तरह निश्चित लगती है,—यदि हम उस नम्रता, कोमलता, धीरज और क्षमाशीलता के पीछे नहीं चलते जिन पर बाइबल इतना बल देती है, तो पवित्रीकरण का दावा करना व्यर्थ है। जो लोग दैनिक जीवन में चिड़चिड़े और क्रोधी स्वभाव के वश में रहते हैं, और सदा जीभ से तीखे और अपने आसपास सब के लिए अप्रिय हैं,—द्वेषी लोग, प्रतिशोधी लोग, बदला लेनेवाले लोग, दुर्भावना रखनेवाले लोग,—जिनसे, हाय, संसार बहुत ही भरा पड़ा है!—ये सब पवित्रीकरण के विषय में वह नहीं जानते जो उन्हें जानना चाहिए।

ये पवित्र किए हुए मनुष्य के प्रत्यक्ष चिन्ह हैं। मैं यह नहीं कहता कि ये सब परमेश्वर के सब लोगों में समान रूप से दिखाई देते हैं। मैं खुले मन से मानता हूँ कि सर्वोत्तम लोगों में भी ये पूर्ण और सिद्ध रूप में प्रकट नहीं होते। परन्तु मैं दृढ़ता से कहता हूँ कि जिन बातों की चर्चा मैं करता रहा हूँ वे पवित्रीकरण के पवित्रशास्त्रीय चिन्ह हैं, और जो इनके विषय में कुछ नहीं जानते वे भली-भाँति सन्देह कर सकते हैं कि उनमें कुछ अनुग्रह है भी या नहीं। दूसरे जो चाहें कहें, मैं यह कहने से कभी पीछे न हटूँगा कि सच्चा पवित्रीकरण ऐसी वस्तु है जो देखी जा सकती है, और जिन चिन्हों का खाका खींचने का मैंने यत्न किया है वे न्यूनाधिक रूप में पवित्र किए हुए मनुष्य के चिन्ह हैं।

III. अब मैं अन्त में धर्मी ठहराए जाने और पवित्रीकरण के बीच के भेद पर विचार करने का प्रस्ताव करता हूँ। इन दोनों में क्या समानता है, और क्या भेद है?

हमारे विषय की यह शाखा बहुत महत्वपूर्ण है, यद्यपि मुझे भय है कि यह मेरे सब पाठकों को ऐसी न लगेगी। मैं इसे संक्षेप में कहूँगा, पर इसे बिलकुल छोड़ देने का साहस नहीं कर सकता। बहुत से लोग धर्म में केवल ऊपरी बातों को ही देखते हैं, और धर्मविज्ञान के सूक्ष्म भेदों को "शब्दों और नामों" के प्रश्न समझते हैं, जिनका कोई वास्तविक मूल्य नहीं। परन्तु मैं उन सब को चेतावनी देता हूँ जो अपनी आत्माओं के विषय में गम्भीर हैं, कि मसीही सिद्धान्त में "भिन्न बातों में भेद न करने" से जो अशान्ति उत्पन्न होती है, वह वास्तव में बहुत बड़ी है; और मैं विशेष रूप से उन्हें सलाह देता हूँ कि यदि वे शान्ति को चाहते हैं, तो हमारे सामने के इस विषय के विषय में स्पष्ट समझ प्राप्त करें। धर्मी ठहराया जाना और पवित्रीकरण दो अलग-अलग बातें हैं, यह हमें सदा स्मरण रखना चाहिए। फिर भी कुछ बातों में वे समान हैं और कुछ में भिन्न। आइए, हम यह जानने का प्रयत्न करें कि वे क्या हैं।

तो फिर धर्मी ठहराया जाना और पवित्रीकरण किन बातों में एक समान हैं?

(क) दोनों मूल रूप से परमेश्वर के सेंतमेंत अनुग्रह से उत्पन्न होते हैं। विश्वासी जो धर्मी ठहराए जाते हैं या पवित्र किए जाते हैं, वह केवल उसी के दान से है।

(ख) दोनों उद्धार के उस महान कार्य का भाग हैं जिसे मसीह ने अनन्त वाचा में अपने लोगों की ओर से अपने ऊपर लिया है। मसीह जीवन का सोता है, जिससे क्षमा और पवित्रता दोनों बहती हैं। दोनों की जड़ मसीह है।

(ग) दोनों एक ही व्यक्तियों में पाए जाते हैं। जो धर्मी ठहराए गए हैं वे सदा पवित्र भी किए जाते हैं, और जो पवित्र किए गए हैं वे सदा धर्मी भी ठहराए गए हैं। परमेश्वर ने उन्हें जोड़ दिया है, और वे अलग नहीं किए जा सकते।

(घ) दोनों एक ही समय आरम्भ होते हैं। जिस क्षण मनुष्य धर्मी ठहराया जाने लगता है, उसी क्षण वह पवित्र किया जाने भी लगता है। हो सकता है कि वह इसे अनुभव न करे, परन्तु यह तथ्य है।

(ङ) दोनों उद्धार के लिये समान रूप से आवश्यक हैं। कोई भी मनुष्य बिना नए हृदय के, केवल क्षमा के साथ, बिना पवित्र आत्मा के अनुग्रह के, केवल मसीह के लहू के साथ, बिना अनन्त महिमा की योग्यता के, केवल उसके अधिकार के साथ स्वर्ग में नहीं पहुँचा। एक उतना ही आवश्यक है जितना दूसरा।

ये वे बातें हैं जिनमें धर्मी ठहराया जाना और पवित्रीकरण एक मत हैं। अब हम चित्र को पलटकर देखें कि वे किन बातों में भिन्न हैं।

(क) धर्मी ठहराया जाना किसी मनुष्य को किसी दूसरे, अर्थात् प्रभु यीशु मसीह के कारण धर्मी गिनना और ठहराना है। पवित्रीकरण वास्तव में मनुष्य को भीतर से धर्मी बनाना है, चाहे वह बहुत निर्बल मात्रा में ही क्यों न हो।

(ख) धर्मी ठहराए जाने से हमें जो धार्मिकता मिलती है वह हमारी अपनी नहीं, परन्तु हमारे महान मध्यस्थ मसीह की सनातन सिद्ध धार्मिकता है, जो हम पर गिनी जाती है और विश्वास के द्वारा हमारी अपनी बनाई जाती है। पवित्रीकरण से हमें जो धार्मिकता मिलती है वह हमारी अपनी धार्मिकता है, जो हमें दी गई है, हमारे भीतर बसी है और पवित्र आत्मा के द्वारा हम में उत्पन्न की गई है, परन्तु बहुत दुर्बलता और अपूर्णता से मिली हुई है।

(ग) धर्मी ठहराए जाने में हमारे अपने कर्मों का कोई स्थान नहीं, और मसीह में सीधा-सादा विश्वास ही एकमात्र आवश्यक बात है। पवित्रीकरण में हमारे अपने कर्म बहुत महत्व रखते हैं, और परमेश्वर हमें आज्ञा देता है कि हम लड़ें, चौकसी करें, प्रार्थना करें, यत्न करें, परिश्रम उठाएँ और मेहनत करें।

(घ) धर्मी ठहराया जाना एक पूरा और सम्पूर्ण कार्य है, और मनुष्य जिस क्षण विश्वास करता है उसी क्षण पूरी रीति से धर्मी ठहराया जाता है। पवित्रीकरण तुलनात्मक रूप से अपूर्ण कार्य है, और जब तक हम स्वर्ग न पहुँचें तब तक सिद्ध न होगा।

(ङ) धर्मी ठहराए जाने में कोई बढ़ती या वृद्धि नहीं होती: मनुष्य जिस घड़ी विश्वास के द्वारा पहली बार मसीह के पास आता है, उस घड़ी वह उतना ही धर्मी ठहराया गया है जितना सारी अनन्तता तक रहेगा। पवित्रीकरण विशेष रूप से बढ़ता जानेवाला कार्य है, और जब तक मनुष्य जीवित है तब तक उसमें निरन्तर बढ़ती और विस्तार होता रह सकता है।

(च) धर्मी ठहराए जाने का विशेष सम्बन्ध हमारे व्यक्तित्व से, परमेश्वर की दृष्टि में हमारी स्थिति से और दोष से हमारे छुटकारे से है। पवित्रीकरण का विशेष सम्बन्ध हमारे स्वभाव से और हमारे हृदयों के नैतिक नवीनीकरण से है।

(छ) धर्मी ठहराया जाना हमें स्वर्ग का अधिकार और भीतर प्रवेश करने का साहस देता है। पवित्रीकरण हमें स्वर्ग के योग्य बनाता है, और वहाँ रहते समय उसका आनन्द लेने के लिये हमें तैयार करता है।

(ज) धर्मी ठहराया जाना हमारे विषय में परमेश्वर का कार्य है, और दूसरों को सहज ही दिखाई नहीं देता। पवित्रीकरण हमारे भीतर परमेश्वर का कार्य है, और अपने बाहरी प्रकटीकरण में मनुष्यों की आँखों से छिपा नहीं रह सकता।

मैं इन भेदों की ओर अपने सब पाठकों का ध्यान दिलाता हूँ, और उनसे विनती करता हूँ कि इन पर भली भाँति विचार करें। मुझे निश्चय है कि धर्म के विषय में बहुत से भले अर्थवाले लोगों के अन्धकार और अशान्त भावनाओं का एक बड़ा कारण धर्मी ठहराए जाने और पवित्रीकरण को आपस में मिला देने और उनमें भेद न करने की उनकी आदत है। हमारे मनों पर यह बात जितनी दृढ़ता से बैठाई जाए उतना ही थोड़ा है कि वे दो अलग-अलग बातें हैं। निःसन्देह वे बाँटी नहीं जा सकतीं, और जो कोई उनमें से एक में भागी है वह दोनों में भागी है। परन्तु उन्हें कभी भी, कभी भी आपस में मिलाना नहीं चाहिए, और उनके बीच के भेद को कभी भूलना नहीं चाहिए।

अब मेरे लिये केवल इतना शेष है कि इस विषय को व्यावहारिक उपयोग के कुछ सीधे-सादे शब्दों के साथ समाप्त करूँ। पवित्रीकरण का स्वभाव और उसके दिखाई देनेवाले चिन्ह हमारे सामने रखे जा चुके हैं। इस सारी बात से हमारे मनों में कौन से व्यावहारिक विचार उठने चाहिए?

(1) एक तो यह कि हम सब बहुत से मसीही कहलानेवालों की संकटपूर्ण दशा के बोध के लिये जाग उठें। "बिना पवित्रता के कोई प्रभु को न देखेगा;" बिना पवित्रीकरण के उद्धार नहीं। (इब्रानियों 12:14।) तब तथाकथित धर्म की कितनी बड़ी मात्रा है जो बिलकुल व्यर्थ है! कलीसिया और प्रार्थनालय जानेवालों का कितना बड़ा अनुपात उस चौड़े मार्ग पर है जो विनाश को पहुँचाता है! यह विचार भयानक, कुचल देनेवाला और अभिभूत कर देनेवाला है। आह, काश कि प्रचारक और शिक्षक अपनी आँखें खोलें और अपने चारों ओर की आत्माओं की दशा को समझें! आह, काश कि मनुष्य "आनेवाले क्रोध से भागने" के लिये मनाए जा सकें! यदि अपवित्र आत्माएँ उद्धार पाकर स्वर्ग जा सकती हैं, तो बाइबल सच नहीं है। फिर भी बाइबल सच है और झूठ नहीं बोल सकती! तब अन्त क्या होगा!

(2) दूसरी बात यह कि हम अपनी ही दशा को निश्चित कर लें, और तब तक चैन न लें जब तक हम अनुभव न करें और जान न लें कि हम स्वयं "पवित्र किए गए" हैं। हमारी रुचियाँ, चुनाव, पसन्द और झुकाव क्या हैं? यही महान परखनेवाला प्रश्न है। इससे कुछ अन्तर नहीं पड़ता कि हम मरने से पहले क्या चाहते हैं, क्या आशा रखते हैं और क्या बनना चाहते हैं।

हम अभी क्या हैं? हम क्या कर रहे हैं? क्या हम पवित्र किए गए हैं या नहीं? यदि नहीं, तो दोष पूरी रीति से हमारा अपना है।

(3) दूसरी बात यह कि यदि हम पवित्र किए जाना चाहते हैं, तो हमारा मार्ग स्पष्ट और सीधा है,—हमें मसीह से आरम्भ करना चाहिए। हमें पापी होकर उसके पास जाना चाहिए, इस निवेदन के सिवाय कि हम सर्वथा अभावग्रस्त हैं और कोई निवेदन लेकर नहीं, और परमेश्वर के साथ शान्ति और मेल-मिलाप के लिये विश्वास के द्वारा अपनी आत्मा को उस पर डाल देना चाहिए। हमें अपने आप को उसके हाथों में सौंप देना चाहिए, जैसे किसी भले वैद्य के हाथों में, और दया और अनुग्रह के लिये उसकी दुहाई देनी चाहिए। अनुशंसा के रूप में साथ लाने के लिये हमें किसी वस्तु की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। धर्मी ठहराए जाने की ही नाईं पवित्रीकरण की ओर भी पहला कदम यही है कि हम विश्वास के साथ मसीह के पास आएँ। पहले हमें जीवित होना है और तब काम करना है।

(4) दूसरी बात यह कि यदि हम पवित्रता में बढ़ना और अधिक पवित्र किए जाना चाहते हैं, तो जैसे आरम्भ किया था वैसे ही निरन्तर आगे बढ़ते जाएँ, और सदा मसीह के पास नए सिरे से आवेदन करते रहें। वह वह सिर है जिससे हर एक अंग को पोषण मिलना है। (इफिसियों 4:16।) परमेश्वर के पुत्र पर प्रतिदिन विश्वास का जीवन बिताना, और उसकी परिपूर्णता में से उस प्रतिज्ञा किए हुए अनुग्रह और सामर्थ्य को प्रतिदिन खींचते रहना जो उसने अपने लोगों के लिये रख छोड़ा है,—यही उत्तरोत्तर बढ़ते हुए पवित्रीकरण का बड़ा भेद है। जो विश्वासी एक ही स्थान पर ठहरे हुए दिखाई देते हैं, वे प्रायः यीशु के साथ घनिष्ठ सहभागिता की उपेक्षा करते हैं, और इस प्रकार पवित्र आत्मा को शोकित करते हैं। जिसने क्रूस पर चढ़ाए जाने से पहले की अन्तिम रात को प्रार्थना की, "उन्हें पवित्र कर," वह उस हर एक की सहायता करने को अत्यन्त इच्छुक है जो विश्वास के द्वारा उससे सहायता माँगता और अधिक पवित्र किया जाना चाहता है।

(5) एक और बात यह कि हम यहाँ नीचे अपने ही हृदयों से बहुत अधिक आशा न रखें। अपनी उत्तम से उत्तम दशा में भी हम अपने भीतर प्रतिदिन दीन होने का कारण पाएँगे, और यह जानेंगे कि हम हर घड़ी दया और अनुग्रह के ऋणी और अभावग्रस्त हैं। जितना अधिक प्रकाश हमें मिलेगा, उतनी ही अधिक अपनी अपूर्णता हमें दिखाई देगी। जब हमने आरम्भ किया था तब हम पापी थे, और आगे बढ़ते हुए भी अपने आप को पापी ही पाएँगे; नया किए गए, क्षमा पाए हुए, धर्मी ठहराए गए,—फिर भी अन्त तक पापी। हमारी सम्पूर्ण सिद्धता अभी आनेवाली है, और उसकी आशा ही एक कारण है कि हमें स्वर्ग की लालसा करनी चाहिए।

(6) अन्त में, हम पवित्रीकरण को बहुत महत्त्व देने और पवित्रता के ऊँचे स्तर के लिये संघर्ष करने में कभी लज्जित न हों। जब कुछ लोग बहुत ही निम्न स्तर की उपलब्धि से सन्तुष्ट हैं, और कुछ लोग बिना किसी पवित्रता के जीवन बिताने में भी लज्जित नहीं होते,—केवल कलीसिया और उपासनालय जाने की रीति से सन्तुष्ट रहते हैं, परन्तु चक्की में जुते घोड़े के समान कभी आगे नहीं बढ़ते,—तब हम पुराने मार्गों में दृढ़ बने रहें, आप उच्च पवित्रता का पीछा करें, और दूसरों को भी उसकी साहस के साथ सिफ़ारिश करें। सचमुच सुखी होने का यही एकमात्र मार्ग है।

चाहे दूसरे कुछ भी कहें, हमें इस बात का निश्चय हो कि पवित्रता ही सुख है, और जो मनुष्य जीवन को सबसे अधिक सुखपूर्वक बिताता है वह पवित्र किया हुआ मनुष्य है। निःसन्देह कुछ सच्चे मसीही ऐसे हैं जो बीमारी, या पारिवारिक परीक्षाओं, या अन्य गुप्त कारणों से बहुत कम अनुभव होनेवाली शान्ति का आनन्द उठाते हैं, और स्वर्ग के मार्ग पर अपने सारे दिन विलाप करते हुए चलते हैं। परन्तु ये अपवाद हैं। सामान्य नियम के रूप में, जीवन के लम्बे अनुभव में यह सत्य पाया जाएगा कि "पवित्र किए हुए" लोग पृथ्वी पर सबसे सुखी लोग हैं। उनके पास ठोस सुख हैं जिन्हें संसार न दे सकता है न छीन सकता है। "उसके सब मार्ग मनभावने हैं।"—"तेरी व्यवस्था से प्रीति रखनेवालों को बड़ी शान्ति होती है।"—उसने जो झूठ नहीं बोल सकता यह कहा, "मेरा जूआ सहज और मेरा बोझ हलका है।"—परन्तु यह भी लिखा है, "दुष्टों के लिये शान्ति नहीं।" (नीतिवचन 3:17; भजन संहिता 119:165; मत्ती 11:30; यशायाह 48:22।)

पवित्रीकरण का विषय इतना गम्भीर महत्त्व का है, और उसके विषय में की गई भूलें इतनी अधिक और बड़ी हैं, कि जो पवित्रीकरण के सम्पूर्ण सिद्धान्त का और अधिक गहराई से अध्ययन करना चाहते हैं उन सब के लिये "पवित्र आत्मा पर ओवेन" की पुस्तक की मैं दृढ़ता से सिफ़ारिश करता हूँ, इसके लिये मैं कोई क्षमा नहीं माँगता। इस जैसा कोई एक लेख इस सारे विषय को समेट नहीं सकता।

मैं भली-भाँति जानता हूँ कि आजकल ओवेन की रचनाएँ चलन में नहीं हैं, और बहुत लोग उसे प्यूरिटन कहकर उपेक्षा करना और उसका उपहास करना उचित समझते हैं! फिर भी वह महान धर्मशास्त्री जो कॉमनवेल्थ के दिनों में ऑक्सफ़ोर्ड के क्राइस्ट चर्च का डीन था, इस प्रकार का व्यवहार पाने के योग्य नहीं है। उसकी छोटी उँगली में उन बहुतों की सारी देह से अधिक विद्या और पवित्रशास्त्र का ठोस ज्ञान था जो उसे तुच्छ ठहराते हैं। मैं निःसंकोच कहता हूँ कि जो मनुष्य अनुभवजन्य धर्मविज्ञान का अध्ययन करना चाहता है, उसे उन विषयों के पूर्ण, पवित्रशास्त्रीय और विस्तृत विवेचन के लिये ओवेन और उसके कुछ समकालीनों की पुस्तकों के समान कोई पुस्तकें नहीं मिलेंगी।

III. पवित्रता

"उस पवित्रता के बिना जिसके बिना कोई प्रभु को न देखेगा।"—इब्रानियों 12:14

इस पृष्ठ के आरम्भ का यह पद एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विषय खोलता है। वह विषय व्यावहारिक पवित्रता है। यह एक ऐसा प्रश्न सामने रखता है जो सब मसीही कहलानेवालों का ध्यान माँगता है,—क्या हम पवित्र हैं? क्या हम प्रभु को देखेंगे?

यह प्रश्न कभी असमय नहीं हो सकता। बुद्धिमान जन हमें बताता है, "रोने का समय, और हँसने का भी समय है,—चुप रहने का समय, और बोलने का भी समय है" (सभोपदेशक 3:4, 7); परन्तु ऐसा कोई समय नहीं, एक दिन भी नहीं, जिसमें मनुष्य को पवित्र न होना चाहिए। क्या हम पवित्र हैं?

यह प्रश्न सब पदों और दशाओं के मनुष्यों से सम्बन्ध रखता है। कुछ धनी हैं और कुछ निर्धन,—कुछ विद्वान और कुछ अनपढ़,—कुछ स्वामी और कुछ सेवक; परन्तु जीवन में ऐसा कोई पद या दशा नहीं जिसमें मनुष्य को पवित्र न होना चाहिए। क्या हम पवित्र हैं?

मैं आज इस प्रश्न के विषय में सुने जाने की प्रार्थना करता हूँ। हमारी आत्माओं और परमेश्वर के बीच का हिसाब कैसा है? इस भागदौड़ और कोलाहल से भरे संसार में हम थोड़ी देर ठहरकर पवित्रता के विषय पर विचार करें। मैं मानता हूँ कि मैं इससे अधिक लोकप्रिय और सुखद विषय चुन सकता था। मुझे निश्चय है कि मुझे इससे सरल विषय मिल सकता था। परन्तु मैं गहराई से अनुभव करता हूँ कि मैं हमारी आत्माओं के लिये इससे अधिक समयोचित और लाभदायक विषय नहीं चुन सकता था। परमेश्वर के वचन को यह कहते सुनना एक गम्भीर बात है, "बिना पवित्रता के कोई प्रभु को न देखेगा।" (इब्रानियों 12:14।)

मैं परमेश्वर की सहायता से यह जाँचने का प्रयत्न करूँगा कि सच्ची पवित्रता क्या है, और वह क्यों इतनी आवश्यक है। अन्त में, मैं उस एकमात्र मार्ग को दिखाने का प्रयत्न करूँगा जिससे पवित्रता प्राप्त की जा सकती है। मैं इस विषय पर इस पुस्तक के दूसरे लेख में सैद्धान्तिक पक्ष से पहले ही विचार कर चुका हूँ। अब मैं इसे अपने पाठकों के सामने अधिक सरल और व्यावहारिक दृष्टि से प्रस्तुत करने का प्रयत्न करता हूँ।

I. सबसे पहले, मैं यह दिखाने का प्रयत्न करूँ कि सच्ची व्यावहारिक पवित्रता क्या है,—वे कैसे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर पवित्र कहता है

एक मनुष्य बहुत दूर तक जा सकता है, और फिर भी सच्ची पवित्रता तक कभी नहीं पहुँचता। यह ज्ञान नहीं है,—बिलाम के पास वह था: न यह बड़ा दावा है,—यहूदा इस्करियोती के पास वह था: न यह बहुत से काम करना है,—हेरोदेस के पास वह था: न यह धर्म की कुछ बातों के लिये उत्साह है,—येहू के पास वह था: न यह आचरण की नैतिकता और बाहरी सम्मान्यता है,—उस धनी जवान शासक के पास वह था: न यह उपदेशकों को सुनने में आनन्द लेना है,—यहेजकेल के समय के यहूदियों के पास वह था: न यह भक्त लोगों की संगति रखना है,—योआब, गेहजी और देमास के पास वह था। फिर भी इनमें से कोई पवित्र न था! केवल ये बातें पवित्रता नहीं हैं। मनुष्य में इनमें से कोई एक भी हो सकती है, और फिर भी वह प्रभु को कभी न देखे।

तो फिर सच्ची व्यावहारिक पवित्रता क्या है? इसका उत्तर देना कठिन प्रश्न है। मेरा कहना यह नहीं कि इस विषय पर पवित्रशास्त्र की सामग्री की कोई कमी है। परन्तु मुझे डर है कि कहीं मैं पवित्रता का अधूरा चित्र न दे दूँ, और जो कुछ कहा जाना चाहिए वह सब न कहूँ; या कहीं उसके विषय में ऐसी बातें न कह दूँ जो नहीं कही जानी चाहिए, और इस प्रकार हानि न पहुँचाऊँ। फिर भी मैं पवित्रता का एक चित्र खींचने का प्रयत्न करता हूँ, ताकि हम उसे अपने मन की आँखों के सामने स्पष्ट देख सकें। बस यह कभी न भूला जाए कि सब कुछ कह चुकने के बाद भी मेरा वर्णन अधिक से अधिक एक दीन और अपूर्ण रूपरेखा ही है।

(क) पवित्रता परमेश्वर के साथ एक मन होने की आदत है, जैसा कि हम पवित्रशास्त्र में उसके मन का वर्णन पाते हैं। यह परमेश्वर के निर्णय से सहमत होने की आदत है,—जिससे वह घृणा करता है उससे घृणा करना,—जिससे वह प्रेम करता है उससे प्रेम करना,—और इस संसार की हर बात को उसके वचन के स्तर से मापना। जो परमेश्वर से सबसे अधिक पूर्णता से सहमत है, वही सबसे अधिक पवित्र मनुष्य है।

(ख) पवित्र मनुष्य हर ज्ञात पाप से बचने और हर ज्ञात आज्ञा का पालन करने का प्रयत्न करेगा। उसके मन का झुकाव निश्चित रूप से परमेश्वर की ओर होगा, उसकी इच्छा पूरी करने की सच्ची अभिलाषा होगी,—संसार को अप्रसन्न करने के भय से अधिक उसे अप्रसन्न करने का भय होगा, और उसके सब मार्गों से प्रेम होगा। वह वही अनुभव करेगा जो पौलुस ने किया जब उसने कहा, "मैं भीतरी मनुष्यत्व से तो परमेश्वर की व्यवस्था से बहुत प्रसन्न रहता हूँ" (रोमियों 7:22), और जो दाऊद ने किया जब उसने कहा, "इसलिये मैं तेरे सब उपदेशों को सब विषयों में ठीक जानता हूँ, और सब मिथ्या मार्गों से बैर रखता हूँ।" (भजन संहिता 119:128।)

(ग) पवित्र मनुष्य हमारे प्रभु यीशु मसीह के समान बनने का यत्न करेगा। वह न केवल उस पर विश्वास का जीवन जिएगा और अपनी प्रतिदिन की शान्ति और बल उसी से प्राप्त करेगा, परन्तु वह वही मन रखने का भी परिश्रम करेगा जो उसमें था, और "उसके स्वरूप में समान" बनने का भी। (रोमियों 8:29।) उसका लक्ष्य यह होगा कि वह दूसरों की सहे और उन्हें क्षमा करे, जैसे मसीह ने हमें क्षमा किया,—निःस्वार्थ हो, जैसे मसीह ने अपने आप को प्रसन्न नहीं किया,—प्रेम में चले, जैसे मसीह ने हम से प्रेम किया,—दीन और नम्र हो, जैसे मसीह ने अपने आप को शून्य कर दिया और अपने आप को दीन किया। वह स्मरण रखेगा कि मसीह सत्य का विश्वासयोग्य गवाह था,—कि वह अपनी इच्छा पूरी करने नहीं आया,—कि अपने पिता की इच्छा पूरी करना उसका भोजन और पेय था,—कि वह दूसरों की सेवा करने के लिये बार-बार अपने आप का इन्कार करता था,—कि वह अनुचित अपमानों में नम्र और धीरजवन्त रहा,—कि वह राजाओं से अधिक भक्त निर्धनों का ध्यान रखता था,—कि वह पापियों के प्रति प्रेम और करुणा से भरा था,—कि वह पाप की निन्दा करने में निडर और अडिग था,—कि जब मनुष्यों की प्रशंसा उसे मिल सकती थी तब भी उसने उसे नहीं चाहा,—कि वह भलाई करता फिरा,—कि वह संसारी लोगों से अलग रहा,—कि वह प्रार्थना में लगा रहा,—कि जब परमेश्वर का कार्य करना था तब उसने अपने निकटतम सम्बन्धियों को भी अपने मार्ग में बाधा नहीं बनने दिया। ये बातें पवित्र मनुष्य स्मरण रखने का प्रयत्न करेगा। इन्हीं के अनुसार वह अपने जीवन की दिशा ठहराएगा। वह यूहन्ना के इस वचन को अपने मन में रखेगा, "जो कोई कहता है कि मैं उसमें बना रहता हूँ, उसे चाहिए कि आप भी वैसा ही चले जैसा वह चलता था" (1 यूहन्ना 2:6); और पतरस के इस वचन को, कि "मसीह भी तुम्हारे लिये दुःख उठाकर तुम्हें एक आदर्श दे गया है, कि तुम भी उसके चिन्हों पर चलो।" (1 पतरस 2:21।) धन्य है वह जिसने मसीह को अपना "सब कुछ" बनाना सीख लिया है, उद्धार के लिये भी और आदर्श के लिये भी! यदि लोग अपने आप से यह प्रश्न अधिक बार पूछें, "यदि मसीह मेरे स्थान पर होता तो वह क्या कहता और क्या करता?" तो बहुत समय बचेगा और बहुत पाप रुक जाएगा।

(घ) पवित्र मनुष्य नम्रता, धीरज, कोमलता, सहनशीलता, मधुर स्वभाव और जीभ पर नियन्त्रण का अनुसरण करेगा। वह बहुत कुछ सहेगा, बहुत कुछ सहन करेगा, बहुत कुछ अनदेखा करेगा, और अपने अधिकारों पर अड़ने की बात करने में धीमा होगा। इसका एक उज्ज्वल उदाहरण हम दाऊद के आचरण में देखते हैं जब शिमी ने उसे कोसा,—और मूसा में जब हारून और मरियम ने उसके विरुद्ध बातें कीं। (2 शमूएल 16:10; गिनती 12:3।)

(ङ) पवित्र मनुष्य संयम और आत्म-त्याग का अनुसरण करेगा। वह अपने शरीर की अभिलाषाओं को मारने का परिश्रम करेगा,—अपने शरीर को उसकी लालसाओं और अभिलाषाओं समेत क्रूस पर चढ़ाने का,—अपनी वासनाओं को वश में रखने का,—अपनी शारीरिक प्रवृत्तियों को रोके रखने का, ऐसा न हो कि वे कभी बेकाबू हो जाएँ। ओह, प्रेरितों से प्रभु यीशु का वह वचन कैसा है, "सावधान रहो, ऐसा न हो कि तुम्हारे मन खुमार और मतवालेपन और इस जीवन की चिन्ताओं से सुस्त हो जाएँ" (लूका 21:34); और प्रेरित पौलुस का वह वचन, "मैं अपनी देह को मारता कूटता और वश में लाता हूँ, ऐसा न हो कि दूसरों को प्रचार करके मैं आप ही किसी रीति से निकम्मा ठहरूँ।" (1 कुरिन्थियों 9:27।)

(च) पवित्र मनुष्य प्रेम और भाईचारे की कृपा का अनुसरण करेगा। वह उस सुनहरे नियम का पालन करने का यत्न करेगा कि दूसरों के साथ वैसा ही करे जैसा वह चाहता है कि वे उसके साथ करें, और उनसे वैसे ही बोले जैसे वह चाहता है कि वे उससे बोलें। वह अपने भाइयों के प्रति स्नेह से भरा होगा,—उनकी देह, उनकी सम्पत्ति, उनके चरित्र, उनकी भावनाओं और उनकी आत्माओं के प्रति। पौलुस कहता है, "जो दूसरे से प्रेम रखता है, उसने व्यवस्था पूरी की है।" (रोमियों 13:8।) वह सब झूठ, निन्दा, पीठ पीछे बुराई, छल, बेईमानी और अनुचित व्यवहार से घृणा करेगा, छोटी से छोटी बातों में भी। पवित्रस्थान का शेकेल और हाथ सामान्य प्रयोग में आनेवालों से बड़े थे। वह अपने सम्पूर्ण बाहरी आचरण से अपने धर्म को सँवारने का, और उसे अपने आसपास के सब लोगों की दृष्टि में मनोहर और सुन्दर बनाने का यत्न करेगा। हाय, 1 कुरिन्थियों का तेरहवाँ अध्याय और पहाड़ी उपदेश, जब बहुत से मसीही कहलानेवालों के आचरण के साथ रखे जाते हैं, तो कितने दोषी ठहरानेवाले वचन हैं!

(ग) पवित्र मनुष्य दूसरों के प्रति दया और परोपकार की आत्मा के पीछे चलेगा। वह सारा दिन निठल्ला खड़ा नहीं रहेगा। वह केवल इस बात से सन्तुष्ट नहीं होगा कि उसने किसी की हानि नहीं की—वह भलाई करने का प्रयत्न करेगा। वह अपने समय और अपनी पीढ़ी में उपयोगी बनने का यत्न करेगा, और अपने आस-पास की आत्मिक आवश्यकताओं और दुःख को जहाँ तक हो सके कम करने का प्रयास करेगा। दोरकास ऐसी ही थी, जो "भले कामों और दान करने में सदा लगी रहती थी"—उसने केवल इरादा नहीं किया या बातें नहीं कीं, बल्कि करके दिखाया। पौलुस भी ऐसा ही था: वह कहता है, "मैं तुम्हारी आत्माओं के लिये बहुत आनन्द से खर्च करूँगा, वरन आप भी खर्च हो जाऊँगा; क्या जितना अधिक मैं तुम से प्रेम रखता हूँ, उतना ही कम तुम मुझ से प्रेम रखोगे?" (प्रेरितों के काम 9:36; 2 कुरिन्थियों 12:15।)

(घ) पवित्र मनुष्य हृदय की शुद्धता के पीछे चलेगा। वह आत्मा की हर प्रकार की मलिनता और अशुद्धता से डरेगा, और उन सब बातों से बचने का यत्न करेगा जो उसे उसमें खींच सकती हैं। वह जानता है कि उसका अपना हृदय सूखे ईंधन के समान है, और इसलिये वह परीक्षा की चिंगारियों से परिश्रमपूर्वक दूर रहेगा। जब दाऊद गिर सकता है तो कौन अपनी सामर्थ्य की बात करने का साहस करेगा? रस्मी व्यवस्था से बहुत-सी बातें सीखी जा सकती हैं। उसके अधीन जो मनुष्य केवल किसी हड्डी, या शव, या कब्र, या रोगी को छू लेता, वह तुरन्त परमेश्वर की दृष्टि में अशुद्ध हो जाता था। और ये बातें प्रतीक और छायाएँ थीं। बहुत कम मसीही इस विषय में आवश्यकता से अधिक सतर्क और सावधान रहते हैं।

(ङ) पवित्र मनुष्य परमेश्वर के भय के पीछे चलेगा। मेरा तात्पर्य उस दास के भय से नहीं है जो केवल दण्ड के डर से काम करता है और यदि पकड़े जाने का डर न होता तो आलसी हो जाता। मेरा अभिप्राय उस सन्तान के भय से है जो इसलिये कि वह अपने पिता से प्रेम करती है, इस प्रकार जीना और चलना चाहती है मानो सदा अपने पिता के सामने हो। नहेम्याह इसका कितना उत्तम उदाहरण हमारे सामने रखता है! जब वह यरूशलेम का अधिपति बना तो वह यहूदियों पर भार डाल सकता था और अपने भरण-पोषण के लिये उनसे धन माँग सकता था। पहले के अधिपतियों ने ऐसा ही किया था। यदि वह भी ऐसा करता तो उसे कोई दोष देनेवाला न था। परन्तु वह कहता है, "परमेश्वर के भय के कारण मैंने ऐसा नहीं किया।" (नहेम्याह 5:15।)

(च) पवित्र मनुष्य दीनता के पीछे चलेगा। वह मन की दीनता के साथ दूसरों को अपने से उत्तम समझने की इच्छा करेगा। वह अपने ही हृदय में संसार के किसी भी अन्य हृदय से अधिक बुराई देखेगा। वह अब्राहम की उस भावना को कुछ समझेगा जब वह कहता है, "मैं तो मिट्टी और राख हूँ;"—और याकूब की उस भावना को जब वह कहता है, "मैं तेरी सब दयाओं में से किसी के भी योग्य नहीं हूँ;"—और अय्यूब की उस भावना को जब वह कहता है, "मैं तो तुच्छ हूँ;"—और पौलुस की उस भावना को जब वह कहता है, "मैं सब पापियों में सब से बड़ा हूँ।" पवित्र ब्रैडफोर्ड, जो मसीह का विश्वासयोग्य शहीद था, कभी-कभी अपने पत्रों को इन शब्दों के साथ समाप्त करता था, "एक अति अभागा पापी, जॉन ब्रैडफोर्ड।" भले बूढ़े श्रीमान

ग्रिम्शॉ के अन्तिम शब्द, जब वह मृत्यु-शय्या पर पड़ा था, ये थे, "लो, एक निकम्मा दास जाता है।"

(छ) पवित्र मनुष्य जीवन के सब कर्तव्यों और सम्बन्धों में विश्वासयोग्यता के पीछे चलेगा। वह केवल इतना ही प्रयत्न नहीं करेगा कि अपना स्थान उतनी ही अच्छी रीति से निभाए जितना वे लोग निभाते हैं जिन्हें अपनी आत्मा की कोई चिन्ता नहीं, वरन उनसे भी उत्तम रीति से, क्योंकि उसके पास उनसे ऊँचे उद्देश्य और अधिक सहायता है। पौलुस के उन शब्दों को कभी नहीं भूलना चाहिए, "जो कुछ तुम करते हो, तन मन से करो, यह समझकर कि प्रभु के लिये करते हो,"—"प्रयत्न करने में आलसी न हो; आत्मा में उत्तेजित रहो; प्रभु की सेवा करते रहो।" (कुलुस्सियों 3:23; रोमियों 12:11।) पवित्र जनों को हर काम भली-भाँति करने का लक्ष्य रखना चाहिए, और जहाँ तक हो सके किसी काम को बुरी रीति से करने में उन्हें लज्जित होना चाहिए। दानिय्येल के समान उन्हें अपने विरुद्ध कोई "दोष" न लगने देने का यत्न करना चाहिए, सिवाय "अपने परमेश्वर की व्यवस्था" के विषय में। (दानिय्येल 6:5।) उन्हें अच्छे पति और अच्छी पत्नी, अच्छे माता-पिता और अच्छी सन्तान, अच्छे स्वामी और अच्छे सेवक, अच्छे पड़ोसी, अच्छे मित्र, अच्छे प्रजाजन बनने का प्रयत्न करना चाहिए—निजी जीवन में भी अच्छे और सार्वजनिक जीवन में भी, कारोबार के स्थान पर भी अच्छे और अपने चूल्हे के पास भी अच्छे। यदि पवित्रता इस प्रकार का फल नहीं लाती तो उसका मूल्य बहुत कम है। प्रभु यीशु अपने लोगों से यह जाँचनेवाला प्रश्न पूछता है, "तुम क्या अधिक करते हो?" (मत्ती 5:47।)

(ज) अन्त में, परन्तु कम महत्त्व का नहीं, पवित्र मनुष्य आत्मिक मन के पीछे चलेगा। वह अपना सारा प्रेम ऊपर की वस्तुओं पर लगाने का यत्न करेगा, और पृथ्वी की वस्तुओं को बहुत ढीली पकड़ से थामे रखेगा। वह इस वर्तमान जीवन के कामकाज की उपेक्षा नहीं करेगा; परन्तु उसके मन और विचारों में पहला स्थान आनेवाले जीवन को दिया जाएगा। वह उस मनुष्य के समान जीने का लक्ष्य रखेगा जिसका धन स्वर्ग में है, और इस संसार में से एक परदेशी और यात्री के समान अपने घर की ओर यात्रा करता हुआ निकलेगा। प्रार्थना में, बाइबल में, और परमेश्वर के लोगों की सभा में उसके साथ संगति करना—ये बातें पवित्र मनुष्य के सबसे बड़े आनन्द होंगी। वह हर वस्तु, स्थान और संगति का मूल्य ठीक उतना ही आँकेगा जितना वह उसे परमेश्वर के निकट लाती है। वह कुछ-कुछ

दाऊद की उस भावना में प्रवेश करेगा जब वह कहता है, "मेरा मन तेरे पीछे-पीछे लगा चलता है।" "तू मेरा भाग है।" (भजन संहिता 63:8; 119:57।)

पवित्रता की जो रूपरेखा मैंने साहस करके खींची है, वह यही है। जो लोग "पवित्र" कहलाते हैं, वे ऐसे ही चरित्र के पीछे चलते हैं। पवित्र मनुष्य के मुख्य लक्षण ये ही हैं।

परन्तु यहाँ मैं कहना चाहता हूँ कि मुझे आशा है कि कोई मनुष्य मुझे गलत नहीं समझेगा। मुझे यह भय है कि मेरे अर्थ को गलत समझा जाएगा, और पवित्रता का जो वर्णन मैंने दिया है वह किसी कोमल विवेकवाले को निराश कर देगा। मैं जानबूझकर किसी धर्मी हृदय को उदास नहीं करना चाहता, न किसी विश्वासी के मार्ग में ठोकर का पत्थर रखना चाहता हूँ।

मैं एक क्षण के लिये भी नहीं कहता कि पवित्रता भीतर बसनेवाले पाप की उपस्थिति को बाहर कर देती है। नहीं, बिलकुल नहीं। पवित्र मनुष्य का सबसे बड़ा दुःख यही है कि वह अपने साथ "मृत्यु की देह" लिये फिरता है;—कि प्रायः जब वह भलाई करना चाहता है तो "बुराई उसके पास होती है;" कि पुराना मनुष्य उसकी हर गति में बाधा डालता है, और मानो उसके हर कदम पर उसे पीछे खींचने का यत्न करता है। (रोमियों 7:21।) परन्तु पवित्र मनुष्य की उत्तमता यह है कि वह भीतर बसनेवाले पाप से वैसे मेल नहीं रखता जैसे दूसरे रखते हैं। वह उससे घृणा करता है, उस पर विलाप करता है, और उसकी संगति से छूटने की लालसा रखता है। उसके भीतर पवित्रीकरण का कार्य यरूशलेम की शहरपनाह के समान है,—निर्माण "कठिन समयों में भी" आगे बढ़ता रहता है। (दानिय्येल 9:25।)

और न मैं यह कहता हूँ कि पवित्रता एक ही बार में पक्की और सिद्ध हो जाती है, या यह कि जिन गुणों की मैंने चर्चा की है वे पूरी तरह खिले और बलवन्त दिखाई दें तभी किसी मनुष्य को पवित्र कहा जा सकता है। नहीं, ऐसा बिलकुल नहीं है। पवित्रीकरण सदा क्रमशः बढ़ने वाला कार्य है। किसी के गुण अभी पत्ती की अवस्था में हैं, किसी के बाली की अवस्था में, और किसी के बाली में भरे हुए दानों के समान हैं। हर एक का आरम्भ होना अवश्य है। हमें "छोटी बातों के दिन" को कभी तुच्छ नहीं जानना चाहिए। और सर्वोत्तम जनों में भी पवित्रीकरण एक अधूरा कार्य है। संसार में जीवित रहे सबसे उज्ज्वल सन्तों का इतिहास भी अन्त तक पहुँचने से पहले अनेक "परन्तु," "तौभी" और "फिर भी" से भरा मिलेगा। जब तक हम स्वर्गीय यरूशलेम तक न पहुँचें, सोने में कुछ मैल सदा रहेगा, और ज्योति बिना बादलों के कभी न चमकेगी। सूर्य के मुख पर भी धब्बे हैं। पवित्रस्थान के तराजू पर तौले जाने पर सबसे पवित्र मनुष्यों में भी अनेक दाग और कमियाँ निकलती हैं। उनका जीवन पाप, संसार और शैतान के विरुद्ध निरन्तर युद्ध है; और कभी-कभी तुम उन्हें जयवन्त नहीं, पराजित होते भी देखोगे। शरीर सदा आत्मा के विरुद्ध और आत्मा शरीर के विरुद्ध अभिलाषा करती है, और "हम सब बहुत बार चूक जाते हैं।" (गला. 5:17; याकूब 3:2।)

फिर भी, इस सब के होते हुए, मुझे निश्चय है कि जैसा चरित्र मैंने धुँधले रूप में खींचा है, वैसा चरित्र पाना सब सच्चे मसीहियों के मन की अभिलाषा और प्रार्थना है। यदि वे उस तक पहुँचे नहीं हैं, तो भी उसकी ओर बढ़ते जाते हैं। हो सकता है वे उसे प्राप्त न कर पाएँ, पर उनका लक्ष्य सदा वही रहता है। वे जैसे अभी हैं वैसे न सही, पर जैसा बनने के लिए यत्न और परिश्रम करते हैं, वह यही है।

और मैं साहस और दृढ़ता के साथ यह कहता हूँ कि सच्ची पवित्रता एक बड़ी वास्तविकता है। यह मनुष्य में ऐसी बात है जिसे उसके आसपास के सब लोग देख सकते, जान सकते, पहचान सकते और अनुभव कर सकते हैं। यह ज्योति है: यदि है, तो प्रकट हो जाएगी। यह नमक है: यदि है, तो उसका स्वाद जान लिया जाएगा। यह बहुमूल्य सुगन्धित तेल है: यदि है, तो उसकी उपस्थिति छिप नहीं सकती।

मुझे निश्चय है कि हमें मसीही कहलाने वालों के बहुत से भटकाव और कभी-कभी की बहुत सी शिथिलता के लिए छूट देने को तैयार रहना चाहिए। मैं जानता हूँ कि एक मार्ग एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाता है, फिर भी उसमें अनेक घुमाव और मोड़ होते हैं; और मनुष्य सचमुच पवित्र हो सकता है, फिर भी अनेक निर्बलताओं के कारण भटक जाता है। मिलावट के कारण सोना सोना होना नहीं छोड़ देता, न धुँधली और मन्द होने से ज्योति ज्योति नहीं रहती, न नई और निर्बल होने से अनुग्रह अनुग्रह नहीं रहता। परन्तु सब छूट देने के बाद भी मैं नहीं देखता कि जो मनुष्य जानबूझकर अपने आप को पापों में पड़ने देता है, और उनके कारण दीन और लज्जित नहीं होता, वह "पवित्र" कहलाने के योग्य कैसे ठहरता है। जो जानी हुई कर्तव्यों की जानबूझकर उपेक्षा करने और जिसे परमेश्वर ने मना किया है उसे जानते हुए भी करने की आदत बना लेता है, उसे मैं "पवित्र" कहने का साहस नहीं करता। ओवेन ने ठीक कहा है, "मैं नहीं समझता कि वह मनुष्य सच्चा विश्वासी कैसे हो सकता है जिसके लिए पाप सबसे बड़ा बोझ, शोक और क्लेश नहीं है।"

व्यावहारिक पवित्रता के मुख्य लक्षण ये ही हैं। आओ हम अपने आप को जाँचें और देखें कि क्या हम इससे परिचित हैं। आओ हम अपने आप को परखें।

II. अब आगे मैं यह दिखाने का प्रयत्न करता हूँ कि व्यावहारिक पवित्रता इतनी महत्वपूर्ण क्यों है

क्या पवित्रता हमें बचा सकती है? क्या पवित्रता पाप को दूर कर सकती है, अधर्म को ढाँक सकती है, अपराधों का प्रायश्चित कर सकती है, परमेश्वर के प्रति हमारा ऋण चुका सकती है? नहीं, ज़रा भी नहीं। परमेश्वर न करे कि मैं कभी ऐसा कहूँ। पवित्रता इनमें से कुछ भी नहीं कर सकती। सबसे उज्ज्वल सन्त भी सब "निकम्मे दास" ही हैं। परमेश्वर की पवित्र व्यवस्था की ज्योति में परखे जाने पर हमारे सबसे शुद्ध काम भी मैले चिथड़ों से अधिक अच्छे नहीं ठहरते। जो श्वेत वस्त्र यीशु देता है और विश्वास पहनता है, वही हमारी एकमात्र धार्मिकता, मसीह का नाम हमारा एकमात्र भरोसा, और मेम्ने की जीवन की पुस्तक स्वर्ग पर हमारा एकमात्र अधिकार होनी चाहिए। अपनी सारी पवित्रता के साथ भी हम पापियों से अच्छे नहीं हैं। हमारी सबसे अच्छी वस्तुएँ भी अपूर्णता के दाग और मैल से भरी हैं। वे सब न्यूनाधिक अधूरी हैं, उद्देश्य में खोटी या पूरा करने में कमी वाली। आदम की सन्तानों में से कोई भी व्यवस्था के कामों से कभी धर्मी न ठहरेगा। "क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है, और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन् परमेश्वर का दान है; और न कर्मों के कारण, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे।" (इफि. 2:8, 9।)

तो फिर पवित्रता इतनी महत्वपूर्ण क्यों है? प्रेरित क्यों कहता है, "जिसके बिना कोई प्रभु को न देखेगा"? मैं कुछ कारण क्रम से रखता हूँ।

(क) एक तो हमें इसलिए पवित्र होना चाहिए कि पवित्रशास्त्र में परमेश्वर का वचन इसकी स्पष्ट आज्ञा देता है। प्रभु यीशु अपने लोगों से कहता है, "यदि तुम्हारी धार्मिकता शास्त्रियों और फरीसियों की धार्मिकता से बढ़कर न हो, तो तुम स्वर्ग के राज्य में कभी प्रवेश करने न पाओगे।" (मत्ती 5:20।) "इसलिए तुम सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है।" (मत्ती 5:48।) पौलुस थिस्सलुनीकियों से कहता है, "परमेश्वर की इच्छा यह है कि तुम पवित्र बनो।" (1 थिस्स. 4:3।) और पतरस कहता है, "जिसने तुम्हें बुलाया है वह पवित्र है, इसलिए तुम भी अपने सारे चालचलन में पवित्र बनो; क्योंकि लिखा है, पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ।" (1 पतरस 1:15, 16।) लेटन कहता है, "इसमें व्यवस्था और सुसमाचार एक मत हैं।"

(ख) हमें इसलिए पवित्र होना चाहिए कि मसीह के संसार में आने का एक बड़ा उद्देश्य और प्रयोजन यही है। पौलुस कुरिन्थियों को लिखता है, "वह सब के लिये मरा, कि जो जीवित हैं वे आगे को अपने लिये न जीएँ, परन्तु उसके लिये जो उनके लिये मरा और फिर जी उठा।" (2 कुरि. 5:15।) और इफिसियों को, "मसीह ने कलीसिया से प्रेम करके अपने आप को उसके लिये दे दिया, कि उसे पवित्र करे और शुद्ध करे।" (इफि. 5:25, 26।) और तीतुस को, "उसने अपने आप को हमारे लिये दे दिया, कि हमें हर प्रकार के अधर्म से छुड़ा ले और शुद्ध करके अपने लिये एक ऐसी प्रजा बना ले जो भले-भले कामों में उत्साही हो।" (तीतुस 2:14।) संक्षेप में, यह कहना कि मनुष्य पाप के दोष से तो बचाए जाते हैं, पर साथ ही अपने हृदयों में उसके प्रभुत्व से नहीं बचाए जाते, सारे पवित्रशास्त्र की गवाही का खण्डन करना है। क्या विश्वासियों को चुना हुआ कहा गया है? यह "आत्मा के द्वारा पवित्र किए जाने" के द्वारा है। क्या वे पूर्वनिर्धारित हैं? यह "परमेश्वर के पुत्र के स्वरूप में अनुरूप होने के लिये" है। क्या वे चुने गए हैं? यह "इसलिए कि वे पवित्र हों"। क्या वे बुलाए गए हैं? यह "पवित्र बुलाहट" के साथ है। क्या वे दुःख उठाते हैं? यह इसलिए कि वे "पवित्रता के भागी" हों। यीशु पूर्ण उद्धारकर्ता है। वह विश्वासी के पाप का दोष ही दूर नहीं करता, वरन् इससे भी अधिक करता है, वह उसकी शक्ति को तोड़ देता है। (1 पतरस 1:2; रोमि. 8:29; इफि. 1:4; इब्रा. 12:10।)

(ग) हमें पवित्र होना अवश्य है, क्योंकि हमारे प्रभु यीशु मसीह में हमारे उद्धार देनेवाले विश्वास का यही एकमात्र ठोस प्रमाण है। हमारी कलीसिया का बारहवाँ अनुच्छेद सत्य कहता है कि "यद्यपि भले कर्म हमारे पापों को दूर नहीं कर सकते और न परमेश्वर के न्याय की कठोरता को सह सकते हैं, तो भी वे मसीह में परमेश्वर को प्रसन्न करनेवाले और ग्रहणयोग्य हैं, और सच्चे तथा जीवित विश्वास से अनिवार्य रूप से उत्पन्न होते हैं; यहाँ तक कि उनके द्वारा जीवित विश्वास ऐसा स्पष्ट पहचाना जा सकता है जैसे किसी वृक्ष को उसके फलों से पहचाना जाता है।" याकूब हमें चेतावनी देता है कि मरा हुआ विश्वास भी होता है—ऐसा विश्वास जो होंठों के अंगीकार से आगे नहीं बढ़ता और मनुष्य के चरित्र पर कोई प्रभाव नहीं डालता। (याकूब 2:17।) सच्चा उद्धार देनेवाला विश्वास तो बिलकुल भिन्न प्रकार की वस्तु है। सच्चा विश्वास सदा अपने फलों से प्रकट होता है—वह पवित्र करता है, वह प्रेम के द्वारा कार्य करता है, वह संसार पर जय पाता है, वह हृदय को शुद्ध करता है। मैं जानता हूँ कि लोग मृत्युशय्या के प्रमाणों की चर्चा करना पसन्द करते हैं। जो मित्र उनसे बिछड़ जाते हैं उनके विषय में वे भय, पीड़ा और दुर्बलता की घड़ियों में कहे गए शब्दों के सहारे सान्त्वना पाना चाहते हैं। परन्तु मुझे डर है कि सौ में निन्यानवे मामलों में ऐसे प्रमाणों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। मुझे सन्देह है कि कुछ विरले अपवादों को छोड़कर मनुष्य वैसे ही मरते हैं जैसे वे जिए हैं। इस बात का कि हम मसीह के साथ एक हैं और मसीह हम में है, केवल एक ही सुरक्षित प्रमाण है—पवित्र जीवन। जो प्रभु के लिये जीते हैं, प्रायः वे ही प्रभु में मरते भी हैं। यदि हम धर्मियों की मृत्यु मरना चाहते हैं तो केवल आलसी अभिलाषाओं में सन्तुष्ट न रहें; आइए, हम उसके जीवन को जीने का प्रयत्न करें। ट्रेल का यह कथन सत्य है, "उस मनुष्य की दशा व्यर्थ है और उसका विश्वास खोखला है, जिसे अपनी महिमा की आशा अपने हृदय और जीवन को शुद्ध करती हुई नहीं दिखाई देती।"

(घ) हमें पवित्र होना अवश्य है, क्योंकि प्रभु यीशु मसीह से हम सच्चे मन से प्रेम करते हैं, इसका यही एकमात्र प्रमाण है। इस विषय में उसने यूहन्ना के चौदहवें और पन्द्रहवें अध्याय में अत्यन्त स्पष्ट बातें कही हैं। "यदि तुम मुझ से प्रेम रखते हो, तो मेरी आज्ञाओं को मानोगे।"—"जिसके पास मेरी आज्ञा है और वह उन्हें मानता है, वही मुझ से प्रेम रखता है।"—"यदि कोई मुझ से प्रेम रखे, तो वह मेरे वचन को मानेगा।"—"जो कुछ मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ यदि तुम उसे करो, तो तुम मेरे मित्र हो।" (यूहन्ना 14:15, 21, 23; 15:14।)—इनसे अधिक स्पष्ट शब्द मिलना कठिन है, और धिक्कार है उन पर जो इनकी उपेक्षा करते हैं! निश्चय ही वह मनुष्य आत्मिक रूप से रोगी दशा में होगा जो यह सब सोचते हुए भी कि यीशु ने कितना दुःख उठाया, उन्हीं पापों से चिपका रहता है जिनके लिये वह दुःख सहा गया। यह पाप ही था जिसने काँटों का मुकुट गूँथा—यह पाप ही था जिसने हमारे प्रभु के हाथ, पाँव और पंजर को बेधा—यह पाप ही था जो उसे गतसमनी और कलवरी तक, क्रूस तक और कब्र तक ले गया। हमारे हृदय ठण्डे होंगे यदि हम पाप से घृणा न करें और उससे छुटकारा पाने का परिश्रम न करें, चाहे ऐसा करने में हमें दाहिना हाथ काटना और दाहिनी आँख निकालनी ही क्यों न पड़े।

(ङ) हमें पवित्र होना अवश्य है, क्योंकि हम सचमुच परमेश्वर की सन्तान हैं, इसका यही एकमात्र ठोस प्रमाण है। इस संसार में बच्चे प्रायः अपने माता-पिता के समान होते हैं। निःसन्देह कुछ अधिक और कुछ कम समान होते हैं,—परन्तु ऐसा बहुत कम होता है कि पारिवारिक समानता की कोई झलक न मिले। परमेश्वर की सन्तान के विषय में भी बहुत कुछ यही बात है। प्रभु यीशु कहता है, "यदि तुम अब्राहम की सन्तान होते तो अब्राहम के समान काम करते।"—"यदि परमेश्वर तुम्हारा पिता होता तो तुम मुझ से प्रेम रखते।" (यूहन्ना 8:39, 42।) यदि मनुष्यों में स्वर्गीय पिता की कोई समानता नहीं है, तो उनके उसके "पुत्र" होने की बात करना व्यर्थ है। यदि हम पवित्रता के विषय में कुछ नहीं जानते तो हम जैसा चाहें अपने को बहला लें, परन्तु हम में पवित्र आत्मा का वास नहीं है: हम मरे हुए हैं और हमें फिर से जिलाया जाना अवश्य है,—हम खोए हुए हैं और हमें ढूँढ़ा जाना अवश्य है। "जितने लोग परमेश्वर के आत्मा के चलाए चलते हैं, वे," और केवल वे ही, "परमेश्वर के पुत्र हैं।" (रोमियों 8:14।) हमें अपने जीवन से दिखाना अवश्य है कि हम किस परिवार के हैं।—हमें अपने भले चालचलन से मनुष्यों को दिखाना अवश्य है कि हम सचमुच उस पवित्र जन की सन्तान हैं, नहीं तो हमारी सन्तान होना केवल एक खोखला नाम है। गर्नल कहता है, "यह न कहो कि तुम्हारी नसों में राजकीय रक्त है और तुम परमेश्वर से जन्मे हो, जब तक कि तुम पवित्र होने का साहस करके अपनी वंशावली को प्रमाणित न कर सको।"

(च) हमें पवित्र होना अवश्य है, क्योंकि दूसरों की भलाई करने का सबसे सम्भावित मार्ग यही है। हम इस संसार में केवल अपने लिये नहीं जी सकते। हमारा जीवन उन लोगों के लिये, जो उसे देखते हैं, सदा या तो भलाई करता रहेगा या बुराई। वह एक मौन उपदेश है जिसे सब पढ़ सकते हैं। यह सचमुच दुःख की बात है जब वह परमेश्वर के नहीं, वरन् शैतान के पक्ष का उपदेश बन जाता है। मेरा विश्वास है कि विश्वासियों के पवित्र जीवन के द्वारा मसीह के राज्य के लिये उससे कहीं अधिक किया जाता है जितना हम जानते हैं। ऐसे जीवन में एक ऐसी वास्तविकता होती है जो मनुष्यों को सोचने पर विवश करती है और उन्हें विचार करने को बाध्य करती है। उसमें एक ऐसा भार और प्रभाव होता है जो और कोई वस्तु नहीं दे सकती। वह धर्म को सुन्दर बना देता है, और दूर से दिखाई देनेवाले प्रकाश-स्तम्भ के समान मनुष्यों को उस पर विचार करने के लिये अपनी ओर खींचता है। न्याय का दिन प्रमाणित करेगा कि पवित्र जीवन के द्वारा अनेक पति ही नहीं, और भी बहुत से लोग "बिना वचन के" जीते गए हैं। (1 पतरस 3:1।) आप लोगों से सुसमाचार के सिद्धान्तों के विषय में बातें कर सकते हैं, और थोड़े ही सुनेंगे, और उससे भी थोड़े समझेंगे। परन्तु आपका जीवन एक ऐसा तर्क है जिससे कोई बच नहीं सकता। पवित्रता में एक ऐसा अर्थ है जिसे अत्यन्त अनपढ़ व्यक्ति भी ग्रहण किए बिना नहीं रह सकता। वे धर्मी ठहराए जाने को भले न समझें, परन्तु प्रेम को समझ सकते हैं।

मेरा विश्वास है कि अपवित्र और असंगत मसीही लोगों के द्वारा उससे कहीं अधिक हानि होती है जितनी हमें मालूम है। ऐसे लोग शैतान के सबसे अच्छे सहायकों में से हैं। सेवक जो कुछ अपने होंठों से बनाते हैं, वे उसे अपने जीवन से गिरा देते हैं। वे सुसमाचार के रथ के पहियों को भारी बना देते हैं। वे इस संसार की सन्तानों को जैसे वे हैं वैसे ही बने रहने के लिए कभी न समाप्त होनेवाला बहाना दे देते हैं।—एक अधार्मिक व्यापारी ने कुछ समय पहले कहा, "मुझे इतने धर्म का कोई लाभ नहीं दिखता; मैं देखता हूँ कि मेरे कुछ ग्राहक सदा सुसमाचार, और विश्वास, और चुनाव, और धन्य प्रतिज्ञाओं आदि की बातें करते रहते हैं; फिर भी जब अवसर मिलता है तो यही लोग मुझे पैसे और अधन्ने का धोखा देने में कुछ भी बुरा नहीं मानते। अब यदि धार्मिक लोग ऐसे काम कर सकते हैं, तो मुझे समझ नहीं आता कि धर्म में क्या भलाई है।"—मुझे ऐसी बातें लिखनी पड़ रही हैं इसका मुझे खेद है, पर मुझे भय है कि मसीहियों के जीवन के कारण मसीह के नाम की निन्दा प्रायः की जाती है। आओ, हम सावधान रहें कि कहीं आत्माओं का लहू हमारे हाथ से न माँगा जाए। हे भले प्रभु, असंगति और ढीले चाल-चलन के द्वारा आत्माओं की हत्या से हमें बचा! अहा, यदि और कोई कारण न हो, तो दूसरों के कारण ही हम पवित्र होने का यत्न करें!

(छ) हमें पवित्र होना चाहिए, क्योंकि हमारा वर्तमान सुख बहुत कुछ इसी पर निर्भर करता है। हमें यह बात बार-बार स्मरण दिलाने की आवश्यकता है। हम दुःख के साथ यह भूल जाते हैं कि पाप और शोक में, पवित्रता और आनन्द में, पवित्रीकरण और सांत्वना में गहरा सम्बन्ध है। परमेश्वर ने इसे इतनी बुद्धिमानी से ठहराया है कि हमारा कुशल और हमारा भला करना आपस में जुड़े हुए हैं। उसने दया करके यह प्रबन्ध किया है कि इस संसार में भी मनुष्य का हित इसी में हो कि वह पवित्र हो। हमारा धर्मी ठहराया जाना कर्मों से नहीं है,—हमारा बुलाया जाना और चुनाव हमारे कर्मों के अनुसार नहीं है,—परन्तु जब तक कोई भले कर्मों की उपेक्षा करता है, या पवित्र जीवन बिताने का यत्न नहीं करता, तब तक यह समझना व्यर्थ है कि उसे अपने धर्मी ठहराए जाने का जीवित बोध या अपने बुलाए जाने की निश्चयता होगी। "यदि हम उस की आज्ञाओं को मानेंगे, तो इसी से हम जान लेंगे कि हम उसे जान गए हैं।"—"इसी से हम जानेंगे कि हम सत्य के हैं, और जिस बात में हमारा मन हमें दोष दे, उस के विषय में हम उसके सामने अपने मन को ढाढ़स दे सकेंगे।" (1 यूहन्ना 2:3; 3:19।) जैसे अँधेरे और बादल-भरे दिन में सूर्य की किरणों का अनुभव करने की आशा नहीं की जा सकती, वैसे ही विश्वासी भी जब तक वह मसीह के पीछे पूरी रीति से नहीं चलता, तब तक उसमें दृढ़ सांत्वना की आशा नहीं कर सकता। जब चेलों ने प्रभु को छोड़ा और भाग गए, तब वे संकट से तो बच गए, परन्तु वे दुःखी और उदास थे। जब कुछ ही समय बाद उन्होंने मनुष्यों के सामने उसे साहस से मान लिया, तो वे बन्दीगृह में डाले गए और पीटे गए; पर हमें बताया गया है कि "वे इस बात से आनन्दित होकर महासभा के सामने से चले गए कि हम उसके नाम के लिये निरादर होने के योग्य तो ठहरे।" (प्रेरितों के काम 5:41।) अहा, यदि और कोई कारण न हो, तो अपने ही भले के लिए हम पवित्र होने का यत्न करें! जो यीशु के पीछे सबसे पूरी रीति से चलता है, वह सदा उसके पीछे सबसे अधिक सुख से चलेगा।

(ज) अन्त में, हमें पवित्र होना चाहिए, क्योंकि पृथ्वी पर पवित्रता के बिना हम स्वर्ग का आनन्द लेने के लिए कभी तैयार नहीं होंगे। स्वर्ग एक पवित्र स्थान है। स्वर्ग का प्रभु एक पवित्र हस्ती है। स्वर्गदूत पवित्र प्राणी हैं। स्वर्ग में हर वस्तु पर पवित्रता लिखी है। प्रकाशित वाक्य की पुस्तक स्पष्ट कहती है, "और उस में कोई अपवित्र वस्तु, या घृणित काम करनेवाला, या झूठ का गढ़नेवाला, किसी रीति से प्रवेश न करेगा।" (प्रकाशित वाक्य 21:27।)

इन पन्नों को पढ़नेवाले हर एक से मैं गम्भीरता से पूछता हूँ, यदि हम अपवित्र दशा में मरें तो स्वर्ग में कैसे अपने घर में और सुखी होंगे? मृत्यु कोई परिवर्तन नहीं करती। कब्र कोई बदलाव नहीं लाती। हर एक उसी चरित्र के साथ फिर जी उठेगा जिसके साथ उसने अन्तिम साँस ली थी। यदि हम अभी पवित्रता से अनजान हैं तो हमारा स्थान कहाँ होगा?

क्षण भर के लिए मान लो कि तुम्हें पवित्रता के बिना स्वर्ग में प्रवेश करने दिया गया। तुम क्या करोगे? वहाँ तुम्हें कौन-सा आनन्द मिल सकता है? सब पवित्र लोगों में से तुम किसके साथ अपने आप को जोड़ोगे, और किसके पास बैठोगे? उनके आनन्द तुम्हारे आनन्द नहीं, उनकी रुचियाँ तुम्हारी रुचियाँ नहीं, उनका चरित्र तुम्हारा चरित्र नहीं। यदि तुम पृथ्वी पर पवित्र न रहे हो, तो तुम वहाँ भला कैसे सुखी हो सकोगे?

अब शायद तुम हल्के और लापरवाह लोगों की, संसार की चिन्ता में डूबे और लालची लोगों की, रंगरेलियाँ मनानेवालों और सुख ढूँढ़नेवालों की, अभक्त और अपवित्र लोगों की संगति को पसन्द करते हो। स्वर्ग में ऐसा कोई न होगा।

अब शायद तुम परमेश्वर के पवित्र लोगों को बहुत कठोर, और बहुत नियमों में बँधे, और बहुत गम्भीर समझते हो। तुम उनसे कतराते हो। उनकी संगति में तुम्हें कोई आनन्द नहीं मिलता। स्वर्ग में और कोई संगति न होगी।

अब शायद तुम प्रार्थना करना, और पवित्रशास्त्र पढ़ना, और भजन गाना, नीरस और उदास और मूर्खतापूर्ण काम समझते हो,—ऐसी बात जिसे कभी-कभी सह लिया जाए, पर जिसमें आनन्द न लिया जाए। तुम विश्रामदिन को बोझ और थकावट मानते हो; तुम उसका थोड़ा-सा ही भाग परमेश्वर की आराधना में बिता सकते हो। परन्तु स्मरण रखो, स्वर्ग कभी न समाप्त होनेवाला विश्रामदिन है। वहाँ के निवासी दिन-रात विश्राम नहीं करते, वे कहते रहते हैं, "पवित्र, पवित्र, पवित्र, प्रभु परमेश्वर, सर्वशक्तिमान," और मेम्ने की स्तुति गाते हैं। एक अपवित्र मनुष्य ऐसे काम में कैसे आनन्द पा सकेगा?

क्या तुम सोचते हो कि ऐसा मनुष्य, जिसने जीवन भर वही काम किए हों जिनके विरुद्ध दाऊद, और पौलुस, और यूहन्ना ने कहा, उनसे मिलकर प्रसन्न होगा? क्या वह उनके साथ मीठी सलाह करेगा, और पाएगा कि उसमें और उनमें बहुत कुछ एक समान है?—और सबसे बढ़कर, क्या तुम सोचते हो कि वह क्रूस पर चढ़ाए गए यीशु से आमने-सामने मिलकर आनन्दित होगा, जब कि वह उन्हीं पापों से चिपका रहा जिनके लिए यीशु मरा, जब कि उसने उसके शत्रुओं से प्रेम रखा और उसके मित्रों को तुच्छ जाना? क्या वह भरोसे के साथ उसके सामने खड़ा होगा, और इस पुकार में सम्मिलित होगा, "देखो, यह हमारा परमेश्वर है; हम इसी की बाट जोहते आए हैं, कि वह हमारा उद्धार करे; हम उसके उद्धार से मगन और आनन्दित होंगे"? (यशायाह 25:9।) क्या तुम नहीं सोचते कि अपवित्र मनुष्य की जीभ लज्जा के मारे उसके तालू से चिपक जाएगी, और उसकी एकमात्र इच्छा यही होगी कि वह बाहर निकाल दिया जाए! वह ऐसे देश में जिसे वह जानता ही नहीं एक परदेशी-सा, मसीह की पवित्र भेड़-बकरियों के बीच एक काली भेड़-सा अनुभव करेगा। करूबों और सराफों की वाणी, स्वर्गदूतों और प्रधान स्वर्गदूतों का गीत, और स्वर्ग की सारी मण्डली, उसके लिए ऐसी भाषा होगी जिसे वह समझ नहीं सकता। यहाँ तक कि वायु भी ऐसी लगेगी जिसमें वह साँस न ले सके।

मैं नहीं जानता कि औरों का क्या विचार है, परन्तु मुझे तो यह स्पष्ट दिखाई देता है कि स्वर्ग अपवित्र मनुष्य के लिये एक दुःखदायी स्थान होगा। यह और किसी प्रकार हो ही नहीं सकता। लोग अस्पष्ट रीति से कह तो देते हैं कि "हम स्वर्ग जाने की आशा रखते हैं", परन्तु वे सोचते नहीं कि क्या कह रहे हैं। "ज्योति में पवित्र लोगों के साथ मीरास में सहभागी होने की योग्यता" अवश्य होनी चाहिए। हमारे हृदय कुछ-कुछ उसी सुर में मिले होने चाहिए। महिमा के उत्सव तक पहुँचने के लिये हमें अनुग्रह की पाठशाला से होकर निकलना होगा। इस वर्तमान जीवन में हमारा मन स्वर्गीय बातों में लगा हो और हमारी रुचियाँ स्वर्गीय हों, नहीं तो आनेवाले जीवन में हम कभी अपने आप को स्वर्ग में न पाएँगे।

और अब, आगे बढ़ने से पहले, मुझे प्रयोग के रूप में कुछ शब्द कहने दीजिये।

(1) पहली बात यह कि इन पन्नों को पढ़नेवाले हर एक जन से मैं पूछता हूँ, क्या आप पवित्र हैं? कृपया उस प्रश्न को सुनिये जो मैं आज आपके सामने रखता हूँ। जिस पवित्रता की चर्चा मैं करता आया हूँ, क्या आप उसके विषय में कुछ भी जानते हैं?

मैं यह नहीं पूछता कि आप नियमित रूप से अपनी कलीसिया में जाते हैं या नहीं, आपका बपतिस्मा हुआ है और आपने प्रभु-भोज लिया है या नहीं, आपका नाम मसीही है या नहीं; मैं इन सबसे बढ़कर कुछ पूछता हूँ: क्या आप पवित्र हैं, या नहीं?

मैं यह नहीं पूछता कि आप दूसरों की पवित्रता को अच्छा मानते हैं या नहीं, आपको पवित्र लोगों की जीवनियाँ पढ़ना, पवित्र बातों की चर्चा करना और अपनी मेज़ पर पवित्र पुस्तकें रखना अच्छा लगता है या नहीं, आपका पवित्र होने का इरादा है और आप आशा करते हैं कि किसी दिन पवित्र होंगे; मैं इससे आगे की बात पूछता हूँ: क्या आप स्वयं आज के दिन पवित्र हैं, या नहीं?

और मैं इतनी कठोरता से क्यों पूछता हूँ, और प्रश्न को इतने ज़ोर से क्यों दबाता हूँ? मैं ऐसा इसलिये करता हूँ कि पवित्रशास्त्र कहता है, "जिसके बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा।" यह लिखा हुआ है, यह मेरी कल्पना नहीं है; यह बाइबल है, मेरा निजी मत नहीं; यह परमेश्वर का वचन है, मनुष्य का नहीं, "पवित्रता के बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा" (इब्रा. 12:14)।

हाय, ये कैसे जाँचनेवाले, छाननेवाले शब्द हैं! इन्हें लिखते समय मेरे मन में कैसे-कैसे विचार उठते हैं! मैं संसार की ओर देखता हूँ और उसके अधिकांश भाग को दुष्टता में पड़ा हुआ पाता हूँ। मैं मसीही होने का दावा करनेवालों को देखता हूँ और उनके विशाल बहुमत में मसीही धर्म का केवल नाम ही पाता हूँ। मैं बाइबल की ओर मुड़ता हूँ और आत्मा को यह कहते सुनता हूँ, "पवित्रता के बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा।"

निश्चय ही यह ऐसा वचन है जो हमें अपनी चाल पर विचार करने और अपने हृदय को जाँचने के लिये विवश करे। निश्चय ही इससे हमारे भीतर गम्भीर विचार उठने चाहिए और हमें प्रार्थना की ओर ले जाना चाहिए।

आप मुझे यह कहकर टालने का प्रयत्न कर सकते हैं, "आप इन बातों के विषय में बहुत अनुभव करते और बहुत सोचते हैं, बहुतों की समझ से कहीं अधिक।" मैं उत्तर देता हूँ, "यही मुख्य बात नहीं है। नरक में पड़ी बेचारी खोई हुई आत्माएँ भी इतना तो करती ही हैं। बड़ा प्रश्न यह नहीं कि आप क्या सोचते और क्या अनुभव करते हैं, बल्कि यह है कि आप क्या करते हैं।"

आप कह सकते हैं, "यह कभी अभिप्राय नहीं था कि सब मसीही पवित्र हों, और जैसी पवित्रता का मैंने वर्णन किया है वह केवल बड़े सन्तों और असाधारण वरदानवाले लोगों के लिये है।" मैं उत्तर देता हूँ, "मैं पवित्रशास्त्र में यह नहीं देख पाता। मैं पढ़ता हूँ कि जो कोई मसीह पर यह आशा रखता है वह अपने आप को पवित्र करता है" (1 यूहन्ना 3:3)—"पवित्रता के बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा।"

आप कह सकते हैं, "इस जीवन में इतना पवित्र होना और साथ ही अपना कर्तव्य निभाना असम्भव है; यह हो ही नहीं सकता।" मैं उत्तर देता हूँ, "आप भूल में हैं।" यह हो सकता है। मसीह के आपके पक्ष में होने पर कुछ भी असम्भव नहीं। यह बहुतों ने करके दिखाया है। "दाऊद, ओबद्याह, दानिय्येल और नीरो के घराने के सेवक, ये सब ऐसे उदाहरण हैं जो इसे प्रमाणित करते हैं।"

आप कह सकते हैं, "यदि आप इतने पवित्र होंगे तो औरों से भिन्न दिखेंगे।" मैं उत्तर देता हूँ, "मैं इसे भली-भाँति जानता हूँ। आपको ठीक ऐसा ही होना चाहिए। मसीह के सच्चे दास सदा अपने आस-पास के संसार से भिन्न रहे हैं, एक अलग जाति, एक निज प्रजा; और यदि आप उद्धार पाना चाहते हैं तो आपको भी ऐसा ही होना होगा!"

आप कह सकते हैं, "इस हिसाब से तो बहुत थोड़े लोग उद्धार पाएँगे।" मैं उत्तर देता हूँ, "मैं यह जानता हूँ। पहाड़ी उपदेश में हमें ठीक यही बताया गया है।" प्रभु यीशु ने 1800 वर्ष पहले यही कहा था। "सकेत है वह फाटक और सकरा है वह मार्ग जो जीवन को पहुँचाता है, और थोड़े ही हैं जो उसे पाते हैं" (मत्ती 7:14)। थोड़े ही उद्धार पाएँगे, क्योंकि थोड़े ही उद्धार को खोजने का कष्ट उठाएँगे। मनुष्य थोड़े समय के लिये भी पाप के सुखों और अपनी मनमानी को नहीं त्यागना चाहते। वे "अविनाशी, निर्मल और अजर मीरास" की ओर पीठ फेर लेते हैं। यीशु कहता है, "तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते" (यूहन्ना 5:40)।

आप कह सकते हैं, "ये कठिन बातें हैं; मार्ग बहुत सकरा है।" मैं उत्तर देता हूँ, "मैं यह जानता हूँ। पहाड़ी उपदेश यही कहता है।" प्रभु

यीशु ने 1800 वर्ष पहले यही कहा था। उसने सदा यही कहा कि मनुष्य प्रतिदिन अपना क्रूस उठाएँ, और यदि वे उसके चेले होना चाहते हैं तो हाथ या पाँव काट डालने को भी तैयार रहें। जैसा अन्य बातों में है वैसा ही धर्म में भी है, "बिना कष्ट के लाभ नहीं।" जिसमें कुछ खर्च नहीं होता उसका कुछ मोल भी नहीं।

हम जो कुछ भी कहना उचित समझें, यदि हम प्रभु को देखना चाहते हैं तो हमें पवित्र होना ही होगा। यदि हम पवित्र नहीं तो हमारा मसीही होना कहाँ रहा? हमारे पास केवल मसीही नाम और मसीही ज्ञान ही नहीं, मसीही चरित्र भी होना चाहिए। यदि हम कभी स्वर्ग में सन्त होना चाहते हैं तो हमें पृथ्वी पर सन्त होना होगा। परमेश्वर ने यह कहा है, और वह पीछे नहीं हटेगा: "पवित्रता के बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा।" जेनकिन कहता है, "पोप की सूची तो केवल मरे हुओं को सन्त बनाती है, परन्तु पवित्रशास्त्र जीवितों में पवित्रता की माँग करता है।" ओवेन कहता है, "मनुष्य अपने आप को धोखा न दें; पवित्रीकरण उन सब के लिये अनिवार्य योग्यता है जो उद्धार के लिये प्रभु मसीह की अगुवाई में चलना चाहते हैं। वह स्वर्ग में केवल उन्हीं को ले जाता है जिन्हें वह पृथ्वी पर पवित्र करता है। यह जीवित सिर मरे हुए अंगों को स्वीकार नहीं करेगा।"

निश्चय ही यह आश्चर्य की बात नहीं कि पवित्रशास्त्र कहता है, "तुम्हें नये सिरे से जन्म लेना अवश्य है" (यूहन्ना 3:7)। निश्चय ही यह दोपहर के समान स्पष्ट है कि मसीही होने का दावा करनेवाले बहुतों को, यदि उन्हें कभी उद्धार पाना है, पूर्ण परिवर्तन की आवश्यकता है, नये हृदय, नये स्वभाव की। पुरानी बातें जाती रहें, वे नई सृष्टि बनें। "पवित्रता के बिना कोई मनुष्य," वह चाहे जो भी हो, "प्रभु को कदापि न देखेगा।"

(2) दूसरी बात यह कि मुझे विश्वासियों से कुछ कहने दीजिये। मैं आप से यह प्रश्न पूछता हूँ, "क्या आप समझते हैं कि आप पवित्रता के महत्त्व को उतना अनुभव करते हैं जितना आपको करना चाहिए?"

मैं मानता हूँ कि इस विषय के सम्बन्ध में मुझे इस युग की प्रवृत्ति से भय लगता है। मुझे बहुत सन्देह है कि प्रभु के कुछ लोगों के विचारों और ध्यान में यह विषय वह स्थान रखता भी है या नहीं जिसका यह अधिकारी है। मैं दीनता से यह सुझाव देना चाहता हूँ कि हम अनुग्रह में बढ़ने के सिद्धान्त की उपेक्षा कर बैठते हैं, और इस बात पर पर्याप्त विचार नहीं करते कि कोई व्यक्ति धर्म का दिखावा करने में कितनी दूर तक जा सकता है, फिर भी उसमें अनुग्रह नहीं होता और अन्त में वह परमेश्वर की दृष्टि में मरा हुआ ही ठहरता है। मेरा विश्वास है कि यहूदा इस्करियोती अन्य प्रेरितों के समान ही दिखाई देता था। जब प्रभु ने उन्हें चेताया कि उनमें से एक उसे पकड़वाएगा, तब किसी ने न कहा, "क्या वह यहूदा है?" हमें सरदीस और लौदीकिया की कलीसियाओं के विषय में, जितना हम सोचते हैं, उससे अधिक सोचना चाहिए।

मेरी कोई इच्छा नहीं कि मैं पवित्रता की मूर्ति बना दूँ। मैं मसीह को सिंहासन से उतारकर उसके स्थान पर पवित्रता को बैठाना नहीं चाहता। परन्तु मुझे स्पष्ट रूप से कहना चाहिए कि मैं चाहता हूँ कि इस समय पवित्रीकरण पर उससे अधिक ध्यान दिया जाए जितना दिया जाता दिखाई देता है; इसलिए मैं इस अवसर पर उन सब विश्वासियों से, जिनके हाथों में ये पृष्ठ पहुँचें, इस विषय पर विशेष आग्रह करता हूँ। मुझे भय है कि कभी-कभी यह भुला दिया जाता है कि परमेश्वर ने धर्मी ठहराया जाना और पवित्रीकरण को एक साथ जोड़ दिया है। निःसन्देह ये दो अलग और भिन्न बातें हैं, परन्तु एक दूसरे के बिना कभी नहीं पाई जाती। सब धर्मी ठहराए हुए लोग पवित्र किए जाते हैं, और सब पवित्र किए हुए लोग धर्मी ठहराए गए हैं। जिसे परमेश्वर ने जोड़ा है उसे कोई मनुष्य अलग करने का साहस न करे। जब तक तुम में पवित्रीकरण के कुछ चिह्न न हों, तब तक मुझे अपने धर्मी ठहराए जाने की बात न सुनाओ। जब तक तुम हमें अपने भीतर आत्मा का कार्य न दिखा सको, तब तक अपने लिए किए गए मसीह के कार्य पर घमण्ड न करो। यह न सोचो कि मसीह और आत्मा कभी अलग किए जा सकते हैं। मुझे सन्देह नहीं कि बहुत से विश्वासी ये बातें जानते हैं, परन्तु मैं समझता हूँ कि हमें इनका स्मरण दिलाया जाना अच्छा है। आओ, हम अपने जीवन से सिद्ध करें कि हम इन्हें जानते हैं। आओ, हम इस वचन को निरन्तर अपने सामने रखने का यत्न करें: "पवित्रता का पीछा करो, जिसके बिना कोई प्रभु को न देखेगा।"

मुझे खुलकर कहना चाहिए कि मैं चाहता हूँ कि पवित्रता के विषय में विश्वासियों के मन में वह अत्यधिक संवेदनशीलता न होती जो मैं कभी-कभी देखता हूँ। कोई सचमुच सोच सकता है कि यह विषय छूने में खतरनाक है, इतनी सावधानी से इसे छुआ जाता है! फिर भी जब हम मसीह को "मार्ग, सत्य और जीवन" के रूप में ऊँचा उठा चुके हैं, तब उसके लोगों के चरित्र के विषय में दृढ़ता से बोलने में हम भूल नहीं कर सकते। रदरफ़ोर्ड ने ठीक ही कहा है, "जो मार्ग कर्तव्यों और पवित्रीकरण को नीचा दिखाता है, वह अनुग्रह का मार्ग नहीं है। विश्वास करना और कर्म करना रक्त-सम्बन्धी हैं।"

मैं यह बात पूरी श्रद्धा से कहता हूँ, परन्तु कहना अवश्य है—मुझे कभी-कभी भय होता है कि यदि मसीह अब पृथ्वी पर होता, तो कुछ लोग उसके प्रचार को व्यवस्थावादी समझते; और यदि पौलुस अपनी पत्रियाँ लिख रहा होता, तो ऐसे लोग भी हैं जो सोचते कि उसने अधिकांश पत्रियों के अन्तिम भाग जैसे लिखे हैं वैसे न लिखे होते तो अच्छा होता। परन्तु स्मरण रखें कि प्रभु यीशु ने पहाड़ी उपदेश दिया था, और इफिसियों की पत्री में चार नहीं, छः अध्याय हैं। मुझे इस प्रकार बोलने को विवश होने का दुःख है, परन्तु मुझे निश्चय है कि इसका कारण है।

उस महान धर्मविज्ञानी जॉन ओवन ने, जो क्राइस्ट चर्च के डीन थे, दो सौ वर्ष से भी पहले कहा था कि ऐसे लोग हैं जिनका सारा धर्म बस अपनी भ्रष्टताओं की शिकायत करते फिरने और सबसे यह कहने में है कि वे स्वयं से कुछ नहीं कर सकते। मुझे भय है कि दो शताब्दियों के बाद भी मसीह के कुछ मानने का दावा करनेवाले लोगों के विषय में आज यही बात सच्चाई से कही जा सकती है। मैं जानता हूँ कि पवित्रशास्त्र में ऐसे वचन हैं जो इस प्रकार की शिकायतों को उचित ठहराते हैं। जब ये शिकायतें उन लोगों से आती हैं जो प्रेरित पौलुस के पदचिह्नों पर चलते हैं और उसी के समान पाप, शैतान और संसार के विरुद्ध अच्छी लड़ाई लड़ते हैं, तब मुझे उन पर आपत्ति नहीं। परन्तु जब मुझे यह सन्देह करने का आधार दिखाई देता है, जैसा मैं प्रायः देखता हूँ, कि ये शिकायतें केवल आत्मिक आलस्य को ढकने का आवरण और आत्मिक सुस्ती का बहाना हैं, तब मुझे ऐसी शिकायतें कभी अच्छी नहीं लगतीं। यदि हम पौलुस के साथ कहते हैं, "मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ," तो हम उसके साथ यह भी कह सकें, "मैं लक्ष्य की ओर दौड़ा चला जाता हूँ।" हम एक बात में उसका उदाहरण न दें और दूसरी में उसका अनुसरण न करें। (रोमियों 7:24; फिलिप्पियों 3:14।)

मैं अपने आपको दूसरों से अच्छा नहीं ठहराता; और यदि कोई पूछे, "तू कौन है जो इस प्रकार लिखता है?" तो मैं उत्तर देता हूँ, "मैं सचमुच एक अति तुच्छ प्राणी हूँ।" परन्तु मैं कहता हूँ कि मैं बाइबल पढ़ते हुए यह इच्छा किए बिना नहीं रह सकता कि बहुत से विश्वासी उन्नीसवीं शताब्दी में जैसे हैं, उनसे अधिक आत्मिक, अधिक पवित्र, अधिक एकनिष्ठ, अधिक स्वर्गीय-मन और अधिक पूरे मन वाले हों। मैं विश्वासियों में परदेशी की सी मनोवृत्ति अधिक देखना चाहता हूँ, संसार से अधिक स्पष्ट अलगाव, ऐसा आचरण जो स्पष्टतः स्वर्ग का हो, और परमेश्वर के साथ अधिक निकट की संगति—इसीलिए मैंने जैसा लिखा है वैसा लिखा है।

क्या यह सच नहीं कि आज हमें व्यक्तिगत पवित्रता के ऊँचे स्तर की आवश्यकता है? हमारा धैर्य कहाँ है? हमारी धुन कहाँ है? हमारा प्रेम कहाँ है? हमारे कर्म कहाँ हैं? धर्म की सामर्थ्य कहाँ दिखाई देती है, जैसी बीते दिनों में दिखाई देती थी? वह निश्चित स्वर कहाँ है जो प्राचीन सन्तों को पहचान देता था और संसार को हिला देता था? सचमुच हमारी चाँदी मैल बन गई है, हमारी दाखमधु में पानी मिल गया है, और हमारे नमक में स्वाद बहुत कम रह गया है। हम सब आधे से अधिक सोए हुए हैं। रात बहुत बीत गई है और दिन निकट है। आओ, जागें और फिर न सोएँ। आओ, अपनी आँखें अब तक की अपेक्षा अधिक चौड़ी खोलें। "आओ, हम हर एक रोकनेवाली वस्तु, और उलझानेवाले पाप को दूर करके।"—"आओ, हम अपने आपको शरीर और आत्मा की सब मलिनता से शुद्ध करें, और परमेश्वर के भय में पवित्रता को सिद्ध करें।"—(इब्रानियों 12:1; 2 कुरिन्थियों 7:1।) ओवन कहते हैं, "क्या मसीह मरा, और पाप जीवित रहेगा? क्या वह संसार में क्रूस पर चढ़ाया गया, और संसार के प्रति हमारी लालसाएँ तेज और जीवित रहेंगी? ओह, उस मनुष्य की आत्मा कहाँ है, जो मसीह के क्रूस के द्वारा संसार के लिए क्रूस पर चढ़ाया गया, और संसार उसके लिए!"

III. अब अन्त में मैं उन सब को, जो पवित्र होने की इच्छा रखते हैं, एक सलाह देना चाहता हूँ

क्या आप पवित्र होना चाहते हैं? क्या आप नई सृष्टि बनना चाहते हैं? तो आपको मसीह से आरम्भ करना होगा। जब तक आप अपने पाप और अपनी निर्बलता को अनुभव करके उसकी ओर न भागें, तब तक आप कुछ भी न कर पाएँगे और कोई उन्नति न होगी। वही सारी पवित्रता की जड़ और आरम्भ है, और पवित्र होने का मार्ग यही है कि विश्वास के द्वारा उसके पास आएँ और उससे जुड़ जाएँ। मसीह अपने लोगों के लिये केवल बुद्धि और धार्मिकता ही नहीं, पवित्रीकरण भी है। मनुष्य कभी-कभी सबसे पहले अपने आप को पवित्र बनाने का प्रयत्न करते हैं, और बहुत दुखद परिणाम पाते हैं। वे परिश्रम करते हैं, कष्ट उठाते हैं, कितने ही नए पन्ने पलटते हैं और बहुत से परिवर्तन करते हैं; फिर भी, लोहू बहने के रोग वाली उस स्त्री के समान, जो मसीह के पास आने से पहले थी, वे अनुभव करते हैं कि "कुछ लाभ न हुआ, परन्तु और भी बुरी दशा हो गई।" (मरकुस 5:26।) वे व्यर्थ दौड़ते हैं और व्यर्थ परिश्रम करते हैं; और इसमें आश्चर्य ही क्या, क्योंकि वे ग़लत सिरे से आरम्भ कर रहे हैं। वे रेत की दीवार खड़ी कर रहे हैं; जितनी तेज़ी से वे उसे ऊँचा करते हैं, उतनी ही तेज़ी से उनका काम ढह जाता है। वे रिसते हुए बर्तन से पानी उलीच रहे हैं: रिसाव उन पर भारी पड़ता है, वे रिसाव पर नहीं। "पवित्रता" की कोई और नींव कोई मनुष्य नहीं डाल सकता, सिवाय उसके जो पौलुस ने डाली, अर्थात् यीशु मसीह। "मसीह के बिना हम कुछ भी नहीं कर सकते।" (यूहन्ना 15:5।) ट्रेल का यह कथन कठोर किन्तु सत्य है: "मसीह से अलग बुद्धि विनाशकारी मूर्खता है,—मसीह से अलग धार्मिकता दोष और दण्ड है,—मसीह से अलग पवित्रीकरण मलिनता और पाप है,—मसीह से अलग छुटकारा बन्धन और दासत्व है।"

क्या आप पवित्रता प्राप्त करना चाहते हैं? क्या आप आज अपने भीतर पवित्र होने की सच्ची और हार्दिक इच्छा अनुभव करते हैं? क्या आप ईश्वरीय स्वभाव के सहभागी होना चाहते हैं? तो मसीह के पास जाइए। किसी बात की प्रतीक्षा मत कीजिए। किसी की प्रतीक्षा मत कीजिए। देर मत कीजिए। यह मत सोचिए कि आप अपने आप को तैयार कर लें। जाइए और उस सुन्दर भजन के शब्दों में उससे कहिए,—

"मैं अपने हाथ में कुछ नहीं लाता,

केवल तेरे क्रूस से लिपटा रहता हूँ;

नंगा हूँ, वस्त्र के लिये तेरी ओर भागता हूँ;

असहाय हूँ, अनुग्रह के लिये तुझे ताकता हूँ।"

हमारे पवित्रीकरण के कार्य में एक ईंट या एक पत्थर भी तब तक नहीं रखा जाता जब तक हम मसीह के पास न जाएँ। पवित्रता उसके विश्वासी लोगों के लिये उसका विशेष दान है। पवित्रता वह कार्य है जिसे वह उनके हृदयों में उस आत्मा के द्वारा चलाता है जिसे वह उनके भीतर रखता है। वह "राजा और उद्धारकर्ता" ठहराया गया है कि पापों की क्षमा के साथ मन फिराव भी दे।—"जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया।" (प्रेरितों के काम 5:31; यूहन्ना 1:12, 13।) पवित्रता लोहू से नहीं आती,—माता-पिता उसे अपनी सन्तान को नहीं दे सकते: न शरीर की इच्छा से,—मनुष्य उसे अपने आप में उत्पन्न नहीं कर सकता: न मनुष्य की इच्छा से,—सेवक बपतिस्मा के द्वारा उसे आपको नहीं दे सकते। पवित्रता मसीह से आती है। वह उसके साथ जीवित एकता का फल है। वह सच्ची दाखलता की जीवित डाली होने का फल है। इसलिये मसीह के पास जाइए और कहिए, "हे प्रभु, मुझे केवल पाप के दोष से ही न बचा, परन्तु उस आत्मा को भेज जिसकी तूने प्रतिज्ञा की थी, और मुझे पाप की सामर्थ्य से भी बचा। मुझे पवित्र बना। मुझे अपनी इच्छा पूरी करना सिखा।"

क्या आप पवित्र बने रहना चाहते हैं? तो मसीह में बने रहिए। वह स्वयं कहता है, "तुम मुझ में बने रहो और मैं तुम में; जो मुझ में बना रहता है और मैं उस में, वह बहुत फल फलता है।" (यूहन्ना 15:4, 5।) पिता को यह अच्छा लगा कि उसी में सारी परिपूर्णता वास करे,—विश्वासी की सब आवश्यकताओं की पूरी पूर्ति। यदि आप स्वस्थ रहना चाहते हैं तो वही वह वैद्य है जिसके पास आपको प्रतिदिन जाना चाहिए। वही वह मन्ना है जिसे आपको प्रतिदिन खाना चाहिए, और वही वह चट्टान है जिसमें से आपको प्रतिदिन पीना चाहिए। इस संसार के जंगल से निकलते हुए आपको प्रतिदिन उसी की बाँह का सहारा लेना चाहिए। आपको केवल जड़ पकड़ना ही नहीं, उसमें बढ़ते हुए दृढ़ भी होना चाहिए। पौलुस सचमुच परमेश्वर का जन था,—एक पवित्र पुरुष,—बढ़ता और फलता-फूलता मसीही,—और इस सब का रहस्य क्या था? वह ऐसा मनुष्य था जिसके लिये मसीह "सब कुछ" था। वह सदा "यीशु की ओर ताकता" रहता था। वह कहता है, "जो मुझे सामर्थ्य देता है, उसमें मैं सब कुछ कर सकता हूँ।" "मैं जीवित हूँ, तौभी मैं नहीं, परन्तु मसीह मुझ में जीवित है। मैं शरीर में जो जीवन जीता हूँ, वह परमेश्वर के पुत्र पर विश्वास करके जीता हूँ।" आइए, हम भी जाकर ऐसा ही करें। (इब्रानियों 12:2; फिलिप्पियों 4:13; गलातियों 2:20।)

जो भी इन पन्नों को पढ़ें, वे इन बातों को केवल सुनी-सुनाई बातों से नहीं, अनुभव से जानें! हम सब पवित्रता के महत्त्व को अब तक के अपने अनुभव से कहीं अधिक अनुभव करें! हमारे वर्ष हमारी आत्माओं के लिये पवित्र वर्ष हों, तब वे सुखी वर्ष भी होंगे! चाहे हम जीएँ, तो प्रभु के लिये जीएँ; या चाहे हम मरें, तो प्रभु के लिये मरें: या यदि वह हमें लेने आए, तो हम शान्ति में, निष्कलंक और निर्दोष पाए जाएँ!

IV. संघर्ष

"विश्वास की अच्छी कुश्ती लड़।"—1 तीमुथियुस 6:12

यह एक विचित्र बात है कि "लड़ाई" जैसे विषय में अधिकांश लोगों की जितनी गहरी रुचि होती है, उतनी किसी और विषय में नहीं होती। युवक और युवतियाँ, बूढ़े और छोटे बच्चे, ऊँचे और नीचे, धनी और निर्धन, विद्वान और अनपढ़, सब को युद्धों, लड़ाइयों और संघर्षों में गहरी रुचि होती है।

इसे हम चाहे जैसे समझाने का प्रयत्न करें, यह एक सीधा-सादा तथ्य है। जिस अंग्रेज़ को वाटरलू, इंकरमान, बालाक्लावा या लखनऊ की कहानी में कोई रुचि न हो, उसे हम मन्द बुद्धि का व्यक्ति कहेंगे। हम उस हृदय को ठण्डा और मूर्ख समझेंगे जो फ्रांस और जर्मनी के बीच हुए युद्ध के समय सेडान, स्ट्रासबर्ग, मेट्ज़ और पेरिस के संघर्षों से द्रवित और रोमांचित न हुआ हो।

परन्तु एक और युद्ध है जो मनुष्य के लड़े किसी भी युद्ध से कहीं अधिक महत्त्व का है। यह युद्ध केवल दो-तीन जातियों से ही सम्बन्ध नहीं रखता, वरन् संसार में जन्मे हर मसीही स्त्री-पुरुष से सम्बन्ध रखता है। जिस युद्ध की मैं बात कर रहा हूँ वह आत्मिक युद्ध है। यह वह लड़ाई है जो हर उस व्यक्ति को अपनी आत्मा के विषय में लड़नी पड़ती है जो उद्धार पाना चाहता है।

मैं जानता हूँ कि बहुत से लोग इस युद्ध के विषय में कुछ नहीं जानते। उनसे इसकी चर्चा कीजिए तो वे आपको पागल, उन्मादी या मूर्ख ठहराने को तैयार हो जाते हैं। फिर भी यह उतना ही वास्तविक और सत्य है जितना संसार का देखा हुआ कोई भी युद्ध। इसमें भी आमने-सामने की मुठभेड़ें और घाव हैं। इसमें भी पहरे और थकान है। इसमें भी घेराबन्दी और धावे हैं। इसमें भी जीत और हार है। सबसे बढ़कर, इसके परिणाम भयानक, भारी और अत्यन्त विशेष हैं। सांसारिक युद्ध में जातियों पर पड़ने वाले परिणाम प्रायः अस्थायी और सुधारे जा सकने वाले होते हैं। आत्मिक युद्ध में बात बहुत भिन्न है। उस युद्ध के परिणाम, जब लड़ाई समाप्त हो जाती है, अटल और अनन्त होते हैं।

इसी युद्ध के विषय में पौलुस ने तीमुथियुस को लिखते समय वे जलते हुए शब्द कहे थे, "विश्वास की अच्छी कुश्ती लड़; और उस अनन्त जीवन को धर ले।" इसी युद्ध के विषय में मैं इस निबन्ध में कहना चाहता हूँ। मैं मानता हूँ कि यह विषय पवित्रीकरण और पवित्रता से घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है। जो सच्ची पवित्रता के स्वरूप को समझना चाहता है, उसे जानना चाहिए कि मसीही जन "योद्धा" है। यदि हम पवित्र होना चाहते हैं तो हमें लड़ना ही होगा।

I. पहली बात जो मुझे कहनी है वह यह है: सच्चा मसीही धर्म एक लड़ाई है

सच्चा मसीही धर्म! आइए हम "सच्चा" शब्द पर ध्यान दें। संसार में बहुत-सा ऐसा धर्म प्रचलित है जो सच्चा, खरा मसीही धर्म नहीं है। वह चल जाता है; वह सोई हुई विवेक-शक्तियों को सन्तुष्ट कर देता है; परन्तु वह खरा सिक्का नहीं है। वह वह वास्तविक वस्तु नहीं है जो अठारह सौ वर्ष पहले मसीही धर्म कहलाती थी। हज़ारों स्त्री-पुरुष हर इतवार को गिरजाघरों और प्रार्थनालयों में जाते हैं और अपने आप को मसीही कहते हैं। उनके नाम बपतिस्मा के रजिस्टर में दर्ज हैं। जीवन भर वे मसीही गिने जाते हैं। उनका विवाह भी

मसीही विवाह-विधि से होता है। वे चाहते हैं कि मरने पर उनका अन्तिम संस्कार भी मसीही रीति से हो। परन्तु उनके धर्म में आप कहीं कोई "लड़ाई" नहीं देखते! आत्मिक संघर्ष, परिश्रम, युद्ध, आत्म-त्याग, जागरूकता और रणक्षेत्र के विषय में वे सचमुच कुछ भी नहीं जानते। ऐसा मसीही धर्म मनुष्य को सन्तुष्ट कर सकता है, और जो कोई उसके विरुद्ध कुछ कहे, वह बहुत कठोर और निर्दय समझा जा सकता है; परन्तु यह निश्चय ही बाइबल का मसीही धर्म नहीं है। यह वह धर्म नहीं है जिसकी नींव प्रभु यीशु ने डाली और जिसका प्रचार उसके प्रेरितों ने किया। यह वह धर्म नहीं है जो सच्ची पवित्रता उत्पन्न करता है। सच्चा मसीही धर्म "एक लड़ाई" है।

सच्चे मसीही को सैनिक होने के लिए बुलाया गया है, और उसे अपने मन फिराव के दिन से लेकर मृत्यु के दिन तक सैनिक की तरह ही व्यवहार करना है। उसका जीवन धार्मिक आराम, आलस्य और निश्चिन्तता का जीवन होने के लिए नहीं ठहराया गया है। उसे एक क्षण के लिए भी यह नहीं सोचना चाहिए कि वह स्वर्ग के मार्ग में किसी आरामदेह गाड़ी में यात्रा करनेवाले की तरह सोता और ऊँघता हुआ जा सकता है। यदि वह मसीही धर्म का माप संसार की सन्तानों से लेता है, तो वह ऐसी धारणाओं से सन्तुष्ट रह सकता है; परन्तु उन्हें परमेश्वर के वचन में कोई समर्थन नहीं मिलेगा। यदि बाइबल उसके विश्वास और आचरण का नियम है, तो वह देखेगा कि इस विषय में उसका मार्ग बहुत स्पष्ट रीति से बता दिया गया है। उसे "लड़ना" ही होगा।

मसीही सैनिक को किससे लड़ना है? अन्य मसीहियों से नहीं। उस मनुष्य की धर्म-सम्बन्धी धारणा सचमुच दयनीय है जो समझता है कि धर्म निरन्तर वाद-विवाद में ही है! जो तब तक सन्तुष्ट नहीं होता जब तक वह कलीसिया और कलीसिया के बीच, प्रार्थनालय और प्रार्थनालय के बीच, सम्प्रदाय और सम्प्रदाय के बीच, दल और दल के बीच किसी झगड़े में लगा न रहे, वह अभी तक वैसा नहीं जानता जैसा उसे जानना चाहिए। निस्सन्देह कभी-कभी न्यायालयों की शरण लेना नितान्त आवश्यक हो सकता है, ताकि किसी कलीसिया के अनुच्छेदों, विधि-निर्देशों और आचार-पद्धतियों का सही अर्थ निश्चित किया जा सके। परन्तु सामान्य नियम के रूप में, पाप के पक्ष को इतना बल कभी नहीं मिलता जितना तब मिलता है जब मसीही अपनी शक्ति आपस में झगड़ने में व्यर्थ गँवाते हैं और अपना समय छोटे-मोटे कलहों में बिताते हैं।

नहीं, कदापि नहीं! मसीही की मुख्य लड़ाई संसार, शरीर और शैतान से है। ये उसके कभी न मरनेवाले शत्रु हैं। ये वे तीन प्रमुख शत्रु हैं जिनके विरुद्ध उसे युद्ध करना है। जब तक वह इन तीनों पर जय न पाए, अन्य सब जयें निष्फल और व्यर्थ हैं। यदि उसका स्वभाव स्वर्गदूत जैसा होता और वह गिरा हुआ प्राणी न होता, तो यह युद्ध इतना अनिवार्य न होता। परन्तु भ्रष्ट हृदय, सदा सक्रिय शैतान और फँसानेवाले संसार के रहते उसे या तो "लड़ना" होगा या नष्ट होना होगा।

उसे शरीर से लड़ना है। मन फिराव के बाद भी वह अपने भीतर बुराई की ओर झुकनेवाला स्वभाव और जल के समान दुर्बल और अस्थिर हृदय लिए रहता है। यह हृदय इस संसार में कभी अपूर्णता से मुक्त न होगा, और ऐसी आशा रखना एक दुःखद भ्रम है। उस हृदय को भटकने से बचाने के लिए प्रभु यीशु हमें "जागते रहने और प्रार्थना करने" की आज्ञा देता है। आत्मा तो तैयार है, परन्तु शरीर दुर्बल है। प्रतिदिन संघर्ष करने और प्रार्थना में प्रतिदिन जूझने की आवश्यकता है। पौलुस पुकारता है, "मैं अपनी देह को मारता कूटता, और वश में लाता हूँ।"—"मैं अपने अंगों में दूसरी व्यवस्था देखता हूँ जो मेरी बुद्धि की व्यवस्था से लड़ती है, और मुझे बंधन में डालती है।"—"मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ! मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा?"—"जो मसीह यीशु के हैं, उन्होंने शरीर को उसकी लालसाओं और अभिलाषाओं समेत क्रूस पर चढ़ा दिया है।"—"इसलिये अपने उन अंगों को मार डालो जो पृथ्वी पर हैं।" (मरकुस 14:38; 1 कुरिन्थियों 9:27; रोमियों 7:23, 24; गलातियों 5:24; कुलुस्सियों 3:5।)

उसे संसार से लड़ना है। उस शक्तिशाली शत्रु के सूक्ष्म प्रभाव का प्रतिदिन विरोध करना होगा, और प्रतिदिन की लड़ाई के बिना उस पर कभी जय नहीं पाई जा सकती। संसार की अच्छी वस्तुओं का प्रेम,—संसार की हँसी या निन्दा का भय,—संसार से मेल बनाए रखने की गुप्त इच्छा,—संसार के लोगों जैसा करने और अति न करने की गुप्त कामना,—ये सब आत्मिक शत्रु हैं जो स्वर्ग के मार्ग में मसीही को निरन्तर घेरे रहते हैं, और इन पर जय पाना आवश्यक है। "संसार से मित्रता करना परमेश्वर से बैर करना है; इसलिये जो कोई संसार का मित्र होना चाहता है, वह अपने आप को परमेश्वर का बैरी बनाता है।"—"यदि कोई संसार से प्रेम रखे, तो उसमें पिता का प्रेम नहीं है।"—"संसार मेरे लिये क्रूस पर चढ़ाया गया, और मैं संसार के लिये।"—"जो कोई परमेश्वर से जन्मा है, वह संसार पर जय प्राप्त करता है।"—"इस संसार के सदृश न बनो।" (याकूब 4:4; 1 यूहन्ना 2:15; गलातियों 6:14; 1 यूहन्ना 5:4; रोमियों 12:2।)

उसे शैतान से लड़ना है। मनुष्य का वह पुराना शत्रु मरा नहीं है। आदम और हव्वा के पतन के समय से वह "पृथ्वी पर घूमता फिरता और डोलता फिरता" रहा है, और एक ही बड़े उद्देश्य को पूरा करने के लिये यत्न करता रहा है—मनुष्य की आत्मा का विनाश। न कभी ऊँघता, न कभी सोता, वह सदा "गर्जनेवाले सिंह की नाईं इस खोज में रहता है कि किस को फाड़ खाए।" एक अदृश्य शत्रु होकर वह सदा हमारे निकट रहता है, हमारे मार्ग और हमारे बिछौने के आसपास, और हमारी सब चाल-चलन की टोह लेता रहता है। आरम्भ से "हत्यारा और झूठा" होने के कारण वह रात-दिन परिश्रम करता है कि हमें नरक में गिरा दे। कभी अन्धविश्वास में ले जाकर, कभी अविश्वास का विचार सुझाकर, कभी एक प्रकार की चाल से और कभी दूसरी से, वह सदा हमारी आत्माओं के विरुद्ध अभियान चलाता रहता है। "शैतान ने तुम लोगों को माँग लिया है कि गेहूँ की नाईं फटके।" यदि हम उद्धार पाना चाहते हैं तो इस बलवन्त विरोधी का प्रतिदिन सामना करना होगा। परन्तु "यह जाति" जागते रहने, प्रार्थना करने और लड़ने, और परमेश्वर के सारे हथियार बाँध लेने के बिना "नहीं निकल सकती।" हथियारबन्द बलवन्त मनुष्य को हमारे हृदयों से बाहर रखना प्रतिदिन की लड़ाई के बिना कभी सम्भव न होगा। (अय्यूब 1:7; 1 पतरस 5:8; यूहन्ना 8:44; लूका 22:31; इफिसियों 6:11।)

कुछ लोग सोच सकते हैं कि ये बातें बहुत कठोर हैं। तुम मान बैठे हो कि मैं हद से आगे बढ़ रहा हूँ और रंग कुछ अधिक ही गाढ़ा चढ़ा रहा हूँ। तुम मन ही मन कहते हो कि इंग्लैंड के स्त्री-पुरुष इस सारे कष्ट, युद्ध और लड़ाई के बिना भी निश्चय स्वर्ग पहुँच सकते हैं। कुछ क्षण मेरी सुनो, और मैं दिखाऊँगा कि परमेश्वर की ओर से मेरे पास कहने को कुछ है। इंग्लैंड में हुए सबसे बुद्धिमान सेनापति की उस उक्ति को स्मरण रखो—"युद्ध के समय सबसे बड़ी भूल यह है कि शत्रु को तुच्छ समझा जाए और छोटा-सा युद्ध करने का प्रयत्न किया जाए।" यह मसीही युद्ध कोई हल्की बात नहीं है। मेरी ओर ध्यान दो और जो मैं कहता हूँ उस पर विचार करो। पवित्रशास्त्र क्या कहता है?—"विश्वास की अच्छी लड़ाई लड़; और अनन्त जीवन को धर ले।"—"यीशु मसीह के अच्छे योद्धा की नाईं मेरे साथ दुःख उठा।"—"परमेश्वर के सारे हथियार बाँध लो कि तुम शैतान की युक्तियों के साम्हने खड़े रह सको। क्योंकि हमारा यह मल्लयुद्ध लोहू और मांस से नहीं, परन्तु प्रधानों से और अधिकारियों से, और इस संसार के अन्धकार के हाकिमों से, और उस दुष्टता की आत्मिक सेनाओं से है जो आकाश में हैं। इसलिये परमेश्वर के सारे हथियार बाँध लो कि तुम बुरे दिन में सामना कर सको, और सब कुछ पूरा करके स्थिर रह सको।"—"सकेत द्वार से प्रवेश करने का यत्न करो।"—"उस भोजन के लिये परिश्रम करो जो अनन्त जीवन तक ठहरता है।"—"यह न समझो कि मैं पृथ्वी पर मेल कराने आया हूँ; मैं मेल कराने नहीं, पर तलवार चलवाने आया हूँ।"—"जिस के पास तलवार न हो वह अपने वस्त्र बेचकर एक मोल ले।"—"जागते रहो, विश्वास में स्थिर रहो, पुरुषार्थ करो, बलवन्त होओ।"—"विश्वास और उस उत्तम विवेक को थामे रहकर अच्छी लड़ाई लड़ता रह।" (1 तीमुथियुस 6:12; 2 तीमुथियुस 2:3; इफिसियों 6:11–13; लूका 13:24; यूहन्ना 6:27; मत्ती 10:34; लूका 22:36; 1 कुरिन्थियों 16:13; 1 तीमुथियुस 1:18, 19।) ऐसे वचन मुझे स्पष्ट, सीधे और असंदिग्ध प्रतीत होते हैं। यदि हम ग्रहण करने को तैयार हों तो वे सब एक ही बड़ी शिक्षा देते हैं। वह शिक्षा यह है कि सच्ची मसीहियत एक संघर्ष, एक लड़ाई और एक युद्ध है। जो "लड़ने" की निन्दा करने का दिखावा करता है और सिखाता है कि हमें चुपचाप बैठे रहना और "अपने आप को परमेश्वर को सौंप देना" चाहिए, वह मुझे अपनी बाइबल को नहीं समझता प्रतीत होता, और एक बड़ी भूल करता है।

इंग्लैंड की कलीसिया की बपतिस्मा-विधि क्या कहती है? निःसन्देह वह विधि प्रेरणा से रची हुई नहीं है, और हर अप्रेरित रचना की नाईं उसमें भी त्रुटियाँ हैं; परन्तु सारे भूमण्डल के उन करोड़ों लोगों के लिये, जो अपने आप को अंग्रेज़ कलीसिया-सदस्य मानते और कहलाते हैं, उसका वचन कुछ वज़न के साथ बोलना चाहिए। और वह क्या कहती है? वह हमें बताती है कि इंग्लैंड की कलीसिया में प्रवेश पानेवाले हर नए सदस्य पर ये शब्द कहे जाते हैं—"मैं तुझे पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा देता हूँ।"—"मैं इस बालक पर क्रूस का चिह्न लगाता हूँ, इस बात के चिन्ह में कि वह आगे को क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह के विश्वास को मानने में लज्जित न होगा, और पाप, संसार और शैतान के विरुद्ध उसके झण्डे के नीचे पुरुषार्थ से लड़ेगा, और जीवन के अन्त तक मसीह का विश्वासयोग्य योद्धा और सेवक बना रहेगा।"—निश्चय ही हम सब जानते हैं कि असंख्य मामलों में बपतिस्मा मात्र एक रीति है, और माता-पिता अपने बच्चों को बिना विश्वास, बिना प्रार्थना और बिना सोचे-विचारे बपतिस्मा-कुण्ड पर ले आते हैं, और इसलिये कोई आशीष नहीं पाते। जो मनुष्य मानता है कि ऐसे मामलों में बपतिस्मा औषधि की नाईं यान्त्रिक रीति से काम करता है, और भक्त और अभक्त, प्रार्थना करनेवाले और प्रार्थनाहीन माता-पिता, सब अपने बच्चों के लिये समान लाभ पाते हैं, उसकी मनोदशा अजीब ही होगी। परन्तु एक बात, जो भी हो, अत्यन्त निश्चित है। हर बपतिस्मा-प्राप्त कलीसिया-सदस्य अपने अंगीकार के अनुसार "यीशु मसीह का योद्धा" है, और "पाप, संसार और शैतान के विरुद्ध उसके झण्डे के नीचे लड़ने" की प्रतिज्ञा से बँधा है। जिसे इसमें सन्देह हो, वह अपनी प्रार्थना-पुस्तक उठाए, और उसकी विषय-वस्तु को देखे, ध्यान दे और सीखे। बहुत से उत्साही कलीसिया-सदस्यों की सबसे बुरी बात यह है कि उन्हें इसका बिलकुल ज्ञान नहीं कि उनकी अपनी प्रार्थना-पुस्तक में क्या लिखा है।

हम कलीसिया के सदस्य हों या नहीं, एक बात निश्चित है—यह मसीही युद्ध एक बड़ी वास्तविकता है, और अत्यन्त महत्त्व का विषय है। यह कलीसिया के शासन-प्रबन्ध और विधि-विधान जैसी बात नहीं है, जिस पर मनुष्य मतभेद रखकर भी अन्त में स्वर्ग पहुँच सकते हैं। हम पर अनिवार्यता ठहराई गई है। हमें लड़ना ही होगा। प्रभु यीशु मसीह की सातों कलीसियाओं को लिखी पत्रियों में प्रतिज्ञाएँ केवल उन्हीं के लिये हैं जो "जय पाते हैं।" जहाँ अनुग्रह है वहाँ संघर्ष भी होगा। विश्वासी एक योद्धा है। युद्ध के बिना कोई पवित्रता नहीं। उद्धार पाए हुए लोगों ने सदा एक लड़ाई लड़ी होगी।

यह परम आवश्यकता का युद्ध है। हम यह न सोचें कि इस संग्राम में हम तटस्थ रहकर चुपचाप बैठे रह सकते हैं। जातियों के संघर्ष में शायद ऐसा आचरण सम्भव हो, परन्तु उस युद्ध में जो आत्मा से सम्बन्ध रखता है, यह सर्वथा असम्भव है। हस्तक्षेप न करने की वह बहुचर्चित नीति,—वह "चतुर निष्क्रियता" जो इतने राजनेताओं को भाती है,—चुप बैठे रहने और बातों को जैसी हैं वैसी ही रहने देने की योजना,—यह सब मसीही युद्ध में कभी काम नहीं आएगा। यहाँ तो कोई भी यह बहाना बनाकर सेवा से नहीं बच सकता कि वह "शान्तिप्रिय मनुष्य" है। संसार, शरीर और शैतान से मेल रखना परमेश्वर से बैर रखना है, और उस चौड़े मार्ग पर चलना है जो विनाश को पहुँचाता है। हमारे सामने कोई चुनाव या विकल्प नहीं है। हमें या तो लड़ना होगा या नाश होना होगा।

यह सार्वभौमिक आवश्यकता का युद्ध है। कोई पद, या वर्ग, या आयु छूट का दावा नहीं कर सकती, और न इस लड़ाई से बच सकती है। सेवक और लोग, प्रचारक और सुननेवाले, बूढ़े और जवान, ऊँचे और नीचे, धनी और निर्धन, कुलीन और साधारण, राजा और प्रजा, जमींदार और असामी, विद्वान और अनपढ़,—सब को एक समान शस्त्र उठाकर युद्ध में जाना है। सब के पास स्वभाव से ऐसा हृदय है जो घमण्ड, अविश्वास, आलस्य, संसारीपन और पाप से भरा है। सब ऐसे संसार में जी रहे हैं जो आत्मा के लिए फन्दों, जालों और गड्ढों से घिरा है। सब के निकट एक व्यस्त, बेचैन और द्वेषी शैतान है। महल में बैठी रानी से लेकर निर्धनालय के कंगाल तक, सब को लड़ना होगा, यदि वे उद्धार पाना चाहते हैं।

यह निरन्तर आवश्यकता का युद्ध है। इसमें न साँस लेने का अवकाश है, न युद्धविराम, न सन्धि। सप्ताह के दिनों में भी और रविवार को भी,—एकान्त में भी और सब के सामने भी,—घर में अँगीठी के पास भी और बाहर भी,—जीभ और स्वभाव को वश में रखने जैसी छोटी बातों में भी और राज्यों के शासन जैसी बड़ी बातों में भी,—मसीही का संग्राम बिना रुके चलते रहना चाहिए। जिस शत्रु से हमारा काम है, वह कोई छुट्टी नहीं मनाता, कभी ऊँघता नहीं और कभी सोता नहीं। जब तक हमारी देह में साँस है, हमें अपना कवच पहने रहना है और याद रखना है कि हम शत्रु की भूमि पर हैं। एक मरते हुए सन्त ने कहा, "यरदन के किनारे पर भी मैं देखता हूँ कि शैतान मेरी एड़ियाँ कुतर रहा है।" हमें मरते दम तक लड़ना है।

आओ, हम इन बातों पर भली-भाँति विचार करें। हम चौकसी रखें कि हमारा अपना व्यक्तिगत धर्म वास्तविक, सच्चा और खरा हो। बहुत से तथाकथित मसीहियों का सबसे दुःखद लक्षण यह है कि उनके मसीही जीवन में संघर्ष और युद्ध जैसी कोई बात दिखती ही नहीं। वे खाते हैं, पीते हैं, पहनते हैं, काम करते हैं, मन बहलाते हैं, धन कमाते हैं, धन खर्च करते हैं, और हर सप्ताह एक-दो बार औपचारिक धार्मिक आराधनाओं का थोड़ा-सा क्रम निभा लेते हैं। परन्तु उस महान आत्मिक युद्ध के विषय में,—उसकी चौकसी और जूझने के विषय में, उसकी पीड़ाओं और चिन्ताओं के विषय में, उसकी लड़ाइयों और मुठभेड़ों के विषय में,—वे कुछ भी नहीं जानते प्रतीत होते। हम चौकसी रखें कि यह दशा हमारी न हो। आत्मा की सबसे बुरी दशा वह है "जब बलवन्त हथियार बाँधे हुए अपने घर की रखवाली करता है, तो उसकी संपत्ति बची रहती है",—जब वह स्त्रियों और पुरुषों को "अपनी इच्छा पूरी करने के लिये जीवित पकड़" लेता है, और वे कोई विरोध नहीं करते। सबसे बुरी बेड़ियाँ वे हैं जिन्हें बन्दी न अनुभव करता है, न देखता है। (लूका 11:21; 2 तीमुथियुस 2:26।)

यदि हम भीतरी लड़ाई और संघर्ष के विषय में कुछ भी जानते हैं, तो अपनी आत्मा के विषय में हमें ढाढ़स मिल सकता है। यह सच्ची मसीही पवित्रता का सदा का साथी है। मैं भली-भाँति जानता हूँ कि यही सब कुछ नहीं है, परन्तु यह कुछ तो है। क्या हम अपने हृदय की गहराई में आत्मिक संघर्ष पाते हैं? क्या हम कुछ अनुभव करते हैं कि शरीर आत्मा के विरोध में और आत्मा शरीर के विरोध में लालसा करता है, ताकि हम वह नहीं कर पाते जो करना चाहते हैं? (गलतियों 5:17।) क्या हमें अपने भीतर दो सिद्धान्तों का बोध होता है जो प्रभुत्व के लिए आपस में जूझ रहे हैं? क्या हम अपने भीतरी मनुष्यत्व में कुछ युद्ध अनुभव करते हैं? तो परमेश्वर का धन्यवाद करें! यह एक अच्छा चिह्न है। यह पवित्रीकरण के महान कार्य का अत्यन्त सम्भावित प्रमाण है। सब सच्चे सन्त सैनिक होते हैं। उदासीनता, ठहराव, मुर्दापन और बेपरवाही से तो कुछ भी अच्छा है। हम बहुतों से अच्छी दशा में हैं। अधिकांश तथाकथित मसीहियों को कोई अनुभूति ही नहीं होती। स्पष्ट है कि हम शैतान के मित्र नहीं हैं। संसार के राजाओं के समान वह अपनी ही प्रजा से युद्ध नहीं करता। यही बात कि वह हम पर आक्रमण करता है, हमारे मन को आशा से भर दे। मैं फिर कहता हूँ, आओ हम ढाढ़स बाँधें। परमेश्वर की सन्तान में दो बड़े चिह्न होते हैं, और इन दोनों में से एक हमारे पास है। वह अपने भीतरी संग्राम से भी पहचाना जा सकता है और अपनी भीतरी शान्ति से भी।

II. अब मैं अपने विषय को आगे बढ़ाते हुए दूसरी बात पर आता हूँ: सच्ची मसीहियत विश्वास की लड़ाई है।

इस बात में मसीही संग्राम संसार के संघर्षों से सर्वथा भिन्न है। यह बलवन्त भुजा, तीखी दृष्टि या तेज पैर पर निर्भर नहीं है। यह शारीरिक हथियारों से नहीं, परन्तु आत्मिक हथियारों से लड़ा जाता है। विश्वास वह कब्जा है जिस पर विजय घूमती है। सफलता पूरी तरह विश्वास करने पर निर्भर है।

परमेश्वर के लिखित वचन की सच्चाई में सामान्य विश्वास मसीही सैनिक के चरित्र की प्राथमिक नींव है। वह जो है, जो करता है, जैसा सोचता है, जैसा आचरण करता है, जैसी आशा रखता है, जैसा व्यवहार करता है, वह एक ही सरल कारण से है;—वह पवित्रशास्त्र में प्रकट और निर्धारित की गई कुछ बातों पर विश्वास करता है। "क्योंकि जो परमेश्वर के पास आता है, उसे विश्वास करना चाहिए कि वह है, और अपने खोजनेवालों को प्रतिफल देता है।" (इब्रानियों 11:6।)

आजकल बहुत से लोग ऐसे धर्म की चर्चा करना पसन्द करते हैं जिसमें कोई सिद्धान्त या मत न हो। पहले-पहल यह बहुत अच्छा सुनाई देता है। दूर से यह बहुत सुन्दर दिखता है। परन्तु जैसे ही हम बैठकर इसकी जाँच और विचार करते हैं, हम इसे सर्वथा असम्भव पाते हैं। यह वैसा ही है जैसे बिना हड्डियों और नसों के शरीर की बात करना। जब तक मनुष्य किसी बात पर विश्वास न करे, वह धर्म में न कुछ बनेगा और न कुछ करेगा। जो लोग निरीश्वरवादियों के दुखद और असुविधाजनक विचारों को मानने का दावा करते हैं, उन्हें भी मानना पड़ता है कि वे कुछ तो मानते हैं। सैद्धान्तिक धर्मविज्ञान और मसीही भोलेपन पर, जैसा कि वे कहते हैं, अपनी सारी कटु ताने-बाज़ी के बावजूद, उनका भी अपना एक प्रकार का विश्वास है।

सच्चे मसीहियों के लिए विश्वास उनके आत्मिक जीवन की रीढ़ की हड्डी है। जब तक किसी के हृदय पर कुछ महान सिद्धान्त अंकित न हों जिन्हें वह मानता है, तब तक कोई भी संसार, शरीर और शैतान के विरुद्ध सच्चे मन से नहीं लड़ता। वे सिद्धान्त क्या हैं, यह शायद वह भली-भाँति न जानता हो, और निश्चय ही उन्हें परिभाषित करने या लिख डालने में समर्थ न हो। पर वे वहाँ हैं, और जाने-अनजाने वही उसके धर्म की जड़ें बनते हैं। जहाँ कहीं तुम किसी मनुष्य को देखो — चाहे धनी हो या निर्धन, विद्वान हो या अनपढ़ — जो पाप से मर्दानगी के साथ जूझ रहा है और उस पर जय पाने का प्रयत्न कर रहा है, वहाँ निश्चय जान लो कि कुछ महान सिद्धान्त हैं जिन पर वह मनुष्य विश्वास करता है। जिस कवि ने ये प्रसिद्ध पंक्तियाँ लिखीं—

"विश्वास की रीतियों के लिए अनुग्रहहीन उत्साही लड़ते रहें,

जिसका जीवन सही है, वह ग़लत हो ही नहीं सकता," वह चतुर मनुष्य तो था, पर निकृष्ट धर्मशास्त्री था। विश्वास किए बिना सही जीवन जैसी कोई वस्तु है ही नहीं।

हमारे प्रभु यीशु मसीह के व्यक्तित्व, कार्य और पद पर विशेष विश्वास ही मसीही सैनिक के चरित्र का जीवन, हृदय और प्रमुख प्रेरक शक्ति है।

वह विश्वास की आँखों से एक अनदेखे उद्धारकर्ता को देखता है, जिसने उससे प्रेम किया, उसके लिए अपने आप को दे दिया, उसके ऋण चुका दिए, उसके पापों को उठा लिया, उसके अपराधों को ढो लिया, उसके लिए फिर जी उठा, और स्वर्ग में परमेश्वर के दाहिने हाथ उसके लिए उसका वकील होकर प्रकट होता है। वह यीशु को देखता है और उससे लिपटा रहता है। इस उद्धारकर्ता को देखकर और उस पर भरोसा रखकर वह शान्ति और आशा का अनुभव करता है, और अपने प्राण के शत्रुओं से स्वेच्छा से युद्ध करता है।

वह अपने अनेक पापों को देखता है — अपने निर्बल हृदय को, लुभानेवाले संसार को, व्यस्त शैतान को; और यदि वह केवल इन्हीं को देखता, तो निराश हो जाना उचित होता। पर वह एक सामर्थी उद्धारकर्ता को भी देखता है, एक बिनती करनेवाले उद्धारकर्ता को, एक सहानुभूति रखनेवाले उद्धारकर्ता को — उसके लहू को, उसकी धार्मिकता को, उसके अनन्त याजकपद को — और विश्वास करता है कि यह सब उसका अपना है। वह यीशु को देखता है और अपना पूरा भार उसी पर डाल देता है। उसे देखकर वह आनन्द से लड़ता रहता है, इस पूर्ण भरोसे के साथ कि वह "उसके द्वारा जिसने हम से प्रेम किया, जयवन्त से भी बढ़कर" ठहरेगा। (रोमियों 8:37।)

मसीह की उपस्थिति और सहायता के लिए उसकी तत्परता पर नित्य जीवित विश्वास ही मसीही सैनिक के सफलतापूर्वक लड़ने का भेद है।

यह कभी न भूलना चाहिए कि विश्वास में मात्राएँ होती हैं। सब मनुष्य एक-सा विश्वास नहीं करते, और एक ही व्यक्ति के विश्वास में भी ज्वार-भाटा आता-जाता रहता है; वह किसी समय अधिक सच्चे मन से विश्वास करता है, किसी और समय कम। अपने विश्वास की मात्रा के अनुसार ही मसीही भली या बुरी रीति से लड़ता है, विजय पाता है या कभी-कभी पीछे हटाया जाता है, जयवन्त होकर निकलता है या एक लड़ाई हार जाता है। जिसमें सबसे अधिक विश्वास है, वही सदा सबसे सुखी और सबसे सुखद सैनिक होगा। युद्ध की चिन्ताएँ मनुष्य पर इतनी हल्की और किसी बात से नहीं बैठतीं जितनी मसीह के प्रेम और निरन्तर सुरक्षा के निश्चय से। पाप के विरुद्ध जागते रहने, संघर्ष करने और जूझने की थकान सहने की शक्ति उसे और किसी वस्तु से इतनी नहीं मिलती जितनी भीतर बसे इस भरोसे से कि मसीह उसकी ओर है और सफलता निश्चित है। यह "विश्वास की ढाल" ही है जो उस दुष्ट के सब जलते हुए तीरों को बुझा देती है। — यह वही मनुष्य है जो कह सकता है, "मैं जानता हूँ कि मैंने किस पर विश्वास किया है," — जो दुःख के समय कह सकता है, "मैं लज्जित नहीं हूँ।" — जिसने ये दमकते हुए शब्द लिखे, "हम हियाव नहीं छोड़ते," — "हमारा पल भर का हल्का सा क्लेश हमारे लिए बहुत ही महान और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है," — उसी ने उसी लेखनी से लिखा, "हम तो देखी हुई वस्तुओं को नहीं पर अनदेखी वस्तुओं को देखते रहते हैं; क्योंकि देखी हुई वस्तुएँ थोड़े ही दिन की हैं, परन्तु अनदेखी वस्तुएँ सदा बनी रहती हैं।" — जिसने कहा, "मैं शरीर में जो जीवित हूँ तो केवल उस विश्वास से जीवित हूँ जो परमेश्वर के पुत्र पर है," उसी ने उसी पत्री में कहा, "मेरी ओर से संसार क्रूस पर चढ़ाया गया और मैं संसार की ओर से।" — जिसने कहा, "मेरे लिए जीवित रहना मसीह है," उसी ने उसी पत्री में कहा, "मैंने यह सीखा है कि जिस दशा में हूँ उसी में सन्तोष करूँ।" — "जो मुझे सामर्थ्य देता है उसमें मैं सब कुछ कर सकता हूँ।" — जितना अधिक विश्वास, उतनी अधिक विजय! जितना अधिक विश्वास, उतनी अधिक भीतरी शान्ति! (इफिसियों 6:16; 2 तीमुथियुस 1:12; 2 कुरिन्थियों 4:17, 18; गलातियों 2:20; 6:14; फिलिप्पियों 1:21; 4:11, 13।)

मेरे विचार में विश्वास के मूल्य और महत्त्व को आवश्यकता से अधिक आँकना असम्भव है। प्रेरित पतरस ने इसे "बहुमूल्य" कहा, यह उचित ही है। (2 पतरस 1:1।) मसीही सैनिकों ने विश्वास के द्वारा जो विजयें पाई हैं, उनके सौवें भाग का भी वर्णन करने बैठूँ तो समय कम पड़ जाए।

आओ, अपनी बाइबलें उठाएँ और इब्रानियों की पत्री का ग्यारहवाँ अध्याय ध्यान से पढ़ें। आओ, उन वीरों की लम्बी सूची पर ध्यान दें जिनके नाम वहाँ अंकित हैं — हाबिल से लेकर मूसा तक, उस समय से भी पहले जब मसीह कुँवारी मरियम से जन्मा और सुसमाचार के द्वारा जीवन और अमरता को पूर्ण प्रकाश में लाया। आओ, भली-भाँति देखें कि उन्होंने संसार, शरीर और शैतान के विरुद्ध कैसे-कैसे युद्ध जीते। और फिर स्मरण रखें कि यह सब विश्वास ने ही किया। उन्होंने प्रतिज्ञा किए हुए मसीहा की ओर आशा से देखा। उन्होंने उसे देखा जो अदृश्य है। "विश्वास ही के द्वारा प्राचीनों की अच्छी गवाही दी गई।" (इब्रानियों 11:2–27।)

आओ, आरम्भिक कलीसिया के इतिहास के पन्ने पलटें। देखें कि आदि के मसीहियों ने मृत्यु तक अपने धर्म को कैसे थामे रखा, और अन्यजाति सम्राटों के प्रचण्डतम सताव भी उन्हें डिगा न सके। सदियों तक पोलीकार्प और इग्नातियुस जैसे लोगों की कमी कभी नहीं रही जो मसीह का इनकार करने की अपेक्षा मरने को तैयार थे। जुर्माने, कारागार, यातनाएँ, आग और तलवार शहीदों की उस महान सेना की आत्मा को कुचल न सके। संसार की स्वामिनी रोम की सारी साम्राज्यीय शक्ति भी उस धर्म को मिटाने में असमर्थ सिद्ध हुई जो फिलिस्तीन के कुछ मछुआरों और चुंगी लेनेवालों से आरम्भ हुआ था! और फिर स्मरण रखें कि एक अनदेखे यीशु पर विश्वास ही कलीसिया का बल था। उन्होंने अपनी विजय विश्वास से पाई।

आओ, प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधार की कथा की जाँच करें। उसके प्रमुख योद्धाओं — विक्लिफ़, हस, लूथर, रिडले, लैटिमर और हूपर — के जीवन का अध्ययन करें। देखें कि मसीह के इन वीर सैनिकों ने विरोधियों की एक बड़ी भीड़ के सामने कैसे दृढ़ता से खड़े रहकर अपने सिद्धान्तों के लिए मरने की तैयारी दिखाई। उन्होंने कैसी-कैसी लड़ाइयाँ लड़ीं! कैसे-कैसे वाद-विवाद सहे! कितना विरोध सहा! हथियारबन्द संसार के सामने उन्होंने उद्देश्य की कैसी दृढ़ता दिखाई! और फिर स्मरण रखें कि एक अनदेखे यीशु पर विश्वास ही उनके बल का भेद था। वे विश्वास के द्वारा जयवन्त हुए।

आइए, हम उन लोगों पर विचार करें जिन्होंने पिछले सौ वर्षों में कलीसिया के इतिहास में सबसे गहरी छाप छोड़ी है। देखिए कि वेस्ली, व्हिटफ़ील्ड, वेन और रोमेन जैसे पुरुष अपने समय और अपनी पीढ़ी में अकेले खड़े रहे, और उच्च पदों पर बैठे लोगों के विरोध के सामने, तथा हमारे देश के मसीही कहलानेवालों में से दस में से नौ की निन्दा, उपहास और अत्याचार के सामने, उन्होंने इंग्लैंड के धर्म को फिर से जीवित किया। देखिए कि विलियम विल्बरफ़ोर्स, हैवलॉक और हेडली विकार्स जैसे पुरुषों ने अत्यन्त कठिन परिस्थितियों में मसीह की गवाही दी, और रेजिमेंट के भोजन-मेज़ पर अथवा हाउस ऑफ़ कॉमन्स के सदन में भी मसीह का झण्डा ऊँचा रखा। ध्यान दीजिए कि इन उत्तम गवाहों ने अन्त तक कभी पीठ नहीं दिखाई, और अपने कट्टर से कट्टर विरोधियों का भी आदर पाया। और तब स्मरण रखिए कि अनदेखे मसीह पर विश्वास करना ही उनके सारे चरित्र की कुंजी है। विश्वास ही से वे जीए, चले, स्थिर रहे और जय पाई।

क्या कोई मसीही सैनिक का जीवन जीना चाहता है? वह विश्वास के लिये प्रार्थना करे। यह परमेश्वर का दान है; और ऐसा दान है कि जो माँगते हैं वे कभी व्यर्थ नहीं माँगेंगे। करने से पहले तुम्हें विश्वास करना होगा। यदि लोग धर्म में कुछ नहीं करते, तो इसलिये कि वे विश्वास नहीं करते। विश्वास स्वर्ग की ओर पहला कदम है।

क्या कोई मसीही सैनिक की लड़ाई को सफलता और उन्नति के साथ लड़ना चाहता है? वह विश्वास की निरन्तर बढ़ती के लिये प्रार्थना करे। वह मसीह में बना रहे, मसीह के और निकट आए, और जितने दिन जीवित है प्रतिदिन मसीह पर अपनी पकड़ और दृढ़ करे। उसकी दैनिक प्रार्थना वही हो जो चेलों की थी,—"हमारा विश्वास बढ़ा।" (लूका 17:5।) यदि तुम्हारे पास कुछ भी विश्वास है, तो उसकी चौकसी ईर्ष्या के साथ करो। यह मसीही चरित्र का गढ़ है, जिस पर पूरे दुर्ग की सुरक्षा निर्भर है। यही वह स्थान है जिस पर आक्रमण करना शैतान को प्रिय है। यदि विश्वास गिरा दिया जाए तो सब कुछ उसकी दया पर है। यहाँ, यदि हमें अपने प्राण प्रिय हैं, तो हमें विशेष रूप से चौकस रहना चाहिए।

III. अन्तिम बात जो मुझे कहनी है वह यह है: सच्ची मसीही चाल एक अच्छी लड़ाई है

किसी भी युद्ध के लिये "अच्छा" शब्द का प्रयोग एक विचित्र बात है। संसार के सारे युद्ध कम या अधिक बुरे ही होते हैं। इसमें सन्देह नहीं कि बहुत-से अवसरों पर यह अनिवार्य आवश्यकता होती है,—जातियों की स्वतन्त्रता प्राप्त करने के लिये, निर्बल को बलवान के पैरों तले कुचले जाने से बचाने के लिये,—तो भी यह बुराई ही है। इससे भयंकर मात्रा में रक्तपात और दुःख होता है। यह असंख्य लोगों को, जो अपने परिवर्तन के लिये बिलकुल तैयार नहीं होते, अनन्तकाल में धकेल देता है। यह मनुष्य की सबसे बुरी वासनाओं को जगाता है। इससे सम्पत्ति की भारी हानि और विनाश होता है। यह शान्तिपूर्ण घरों को विलाप करती विधवाओं और अनाथों से भर देता है। यह दूर-दूर तक निर्धनता, कर-भार और राष्ट्रीय संकट फैला देता है। यह समाज की सारी व्यवस्था को बिगाड़ देता है। यह सुसमाचार के काम और मसीही मिशनों की बढ़ती में बाधा डालता है। संक्षेप में, युद्ध एक विशाल और अपरिमेय बुराई है, और हर प्रार्थना करनेवाले को रात-दिन यही पुकारना चाहिए, "हमारे दिनों में शान्ति दे।" तो भी एक ऐसा युद्ध है जो निश्चय ही "अच्छा" है, और एक ऐसी लड़ाई है जिसमें कोई बुराई नहीं। वह युद्ध मसीही युद्ध है। वह लड़ाई आत्मा की लड़ाई है।

अब वे कौन-से कारण हैं जिनसे मसीही लड़ाई "अच्छी लड़ाई" ठहरती है? वे कौन-सी बातें हैं जिनमें उसका युद्ध इस संसार के युद्ध से श्रेष्ठ है? मुझे इस विषय की जाँच करने दीजिए और उसे क्रम से खोलकर रखने दीजिए। मैं इस विषय को अनदेखा करके आगे नहीं बढ़ सकता। मैं नहीं चाहता कि कोई मसीही सैनिक का जीवन खर्च का हिसाब लगाए बिना आरम्भ करे। मैं किसी से यह बात छिपाना नहीं चाहता कि यदि वह पवित्र होकर प्रभु को देखना चाहता है तो उसे लड़ना होगा, और मसीही लड़ाई, यद्यपि आत्मिक है, तौभी वास्तविक और कठिन है। इसमें साहस, निडरता और धीरज चाहिए। परन्तु मैं चाहता हूँ कि मेरे पाठक जानें कि यदि वे केवल युद्ध आरम्भ करें तो प्रोत्साहन भरपूर है। पवित्रशास्त्र मसीही लड़ाई को बिना कारण और आधार के "अच्छी लड़ाई" नहीं कहता। मैं अपना अभिप्राय दिखाने का प्रयत्न करता हूँ।

(क) मसीही की लड़ाई अच्छी है क्योंकि वह सर्वोत्तम सेनापति के अधीन लड़ी जाती है। सब विश्वासियों का अगुवा और सेनापति हमारा ईश्वरीय उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह है,—एक ऐसा उद्धारकर्ता जिसमें पूर्ण बुद्धि, असीम प्रेम और सर्वशक्तिमान सामर्थ्य है। हमारे उद्धार का सरदार अपने सैनिकों को विजय की ओर ले चलने में कभी चूकता नहीं। वह कभी कोई व्यर्थ चाल नहीं चलता, उसके निर्णय में कभी भूल नहीं होती, उससे कभी कोई चूक नहीं होती। उसकी दृष्टि अपने सब अनुयायियों पर रहती है, उनमें सबसे बड़े से लेकर सबसे छोटे तक पर। उसकी सेना का सबसे दीन सेवक भी भुलाया नहीं जाता। सबसे निर्बल और रोगी की भी चिन्ता की जाती है, उसे स्मरण रखा जाता है और उद्धार के लिये सुरक्षित रखा जाता है। जिन आत्माओं को उसने अपने ही लहू से मोल लिया और छुड़ाया है, वे इतनी बहुमूल्य हैं कि उन्हें नष्ट होने और फेंक दिए जाने नहीं दिया जा सकता। निश्चय ही यह अच्छा है!

(ख) मसीही की लड़ाई अच्छी है, क्योंकि वह सर्वोत्तम सहायताओं के साथ लड़ी जाती है। यद्यपि हर विश्वासी अपने आप में निर्बल है, तौभी पवित्र आत्मा उसमें वास करता है, और उसकी देह पवित्र आत्मा का मन्दिर है। पिता परमेश्वर का चुना हुआ, पुत्र के लहू में धोया हुआ, और आत्मा के द्वारा नया किया हुआ होकर वह अपने खर्च पर युद्ध करने नहीं जाता, और कभी अकेला नहीं होता। परमेश्वर पवित्र आत्मा प्रतिदिन उसे सिखाता, चलाता, मार्ग दिखाता और निर्देश देता है। पिता परमेश्वर अपनी सर्वशक्तिमान सामर्थ्य से उसकी रक्षा करता है। पुत्र परमेश्वर हर क्षण उसके लिये मध्यस्थता की प्रार्थना करता है, जैसे मूसा पर्वत पर करता था जब नीचे घाटी में लड़ाई हो रही थी। ऐसी तिहरी डोरी कभी टूट नहीं सकती! उसकी दैनिक रसद और आपूर्ति कभी समाप्त नहीं होती। उसकी रसद-व्यवस्था में कभी कमी नहीं होती। उसकी रोटी और उसका जल निश्चित हैं। अपने आप में कीड़े के समान निर्बल दिखाई देने पर भी वह प्रभु में बलवन्त है और बड़े-बड़े काम कर सकता है। निश्चय ही यह अच्छा है!

(ग) मसीही लड़ाई एक अच्छी लड़ाई है, क्योंकि वह सर्वोत्तम प्रतिज्ञाओं के सहारे लड़ी जाती है। हर विश्वासी के लिये बहुत ही बड़ी और अनमोल प्रतिज्ञाएँ हैं,—जो सब मसीह में हाँ और आमीन हैं,—ऐसी प्रतिज्ञाएँ जिनका पूरा होना निश्चित है, क्योंकि वे उसकी ओर से हैं जो झूठ नहीं बोल सकता, और जिसमें अपना वचन निभाने की इच्छा के साथ सामर्थ्य भी है। "पाप का तुम पर प्रभुत्व न होगा।"—"शान्ति का परमेश्वर शैतान को तुम्हारे पाँवों से शीघ्र कुचलवा देगा।"—"जिसने तुम में अच्छा काम आरम्भ किया है, वही उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा।"—"जब तू जल में होकर जाए, मैं तेरे संग संग रहूँगा, और जब तू नदियों में होकर चले, तब वे तुझे न डुबा सकेंगी।"—"मेरी भेड़ें कभी नाश न होंगी, और कोई उन्हें मेरे हाथ से छीन न लेगा।"—"जो कोई मेरे पास आएगा उसे मैं कभी न निकालूँगा।"—"मैं तुझे कभी न छोड़ूँगा, और न कभी तुझे त्यागूँगा।"—"मुझे निश्चय है कि न मृत्यु, न जीवन, न वर्तमान, न भविष्य की बातें हमें परमेश्वर के उस प्रेम से, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सकेंगी।" (रोमियों 6:14; रोमियों 16:20; फिलिप्पियों 1:6; यशायाह 43:2; यूहन्ना 10:28; यूहन्ना 6:37; इब्रानियों 13:5; रोमियों 8:38।) ऐसे वचन सोने के भार के बराबर मूल्यवान हैं! कौन नहीं जानता कि आनेवाली सहायता की प्रतिज्ञाओं ने लखनऊ जैसे घिरे हुए नगरों के रक्षकों को ढाढ़स बँधाया और उन्हें उनकी स्वाभाविक शक्ति से ऊपर उठा दिया? क्या हमने कभी नहीं सुना कि "रात से पहले सहायता" की प्रतिज्ञा का वाटरलू की महान विजय में बड़ा हाथ था? फिर भी ऐसी सब प्रतिज्ञाएँ विश्वासियों के उस समृद्ध भण्डार, अर्थात् परमेश्वर की अनन्त प्रतिज्ञाओं, के सामने कुछ भी नहीं हैं। निश्चय यह अच्छा है!

(घ) मसीही की लड़ाई एक अच्छी लड़ाई है, क्योंकि वह सर्वोत्तम परिणामों और फलों के साथ लड़ी जाती है। इसमें संदेह नहीं कि यह ऐसा युद्ध है जिसमें भयंकर संघर्ष, पीड़ादायक टकराव, घाव, चोटें, जागरण, उपवास और थकान हैं। फिर भी हर विश्वासी, बिना किसी अपवाद के, "उसके द्वारा जिसने हम से प्रेम किया, जयवन्त से भी बढ़कर" है। (रोमियों 8:37।) मसीह का कोई सिपाही कभी खोया नहीं जाता, लापता नहीं होता, या रणभूमि में मरा हुआ नहीं छूटता। मसीह की सेना के किसी साधारण सिपाही या अधिकारी के लिये न कभी शोक के वस्त्र पहनने होंगे, न आँसू बहाने होंगे। जब अन्तिम संध्या आएगी, तब सैनिकों की नामावली ठीक वैसी ही निकलेगी जैसी प्रातःकाल थी। अंग्रेज़ी गार्ड्स क्रीमिया के अभियान के लिये लन्दन से एक भव्य दल के रूप में निकले; परन्तु उनमें से बहुत से वीर पुरुषों की हड्डियाँ परदेश की कब्र में रह गईं और उन्होंने लन्दन का मुँह फिर कभी न देखा। मसीही सेना का पहुँचना कितना भिन्न होगा, उस "स्थिर नींववाले नगर" में "जिसका रचनेवाला और बनानेवाला परमेश्वर है।" (इब्रानियों 11:10।) एक भी घटता हुआ न पाया जाएगा। हमारे महान सेनापति के वचन सच्चे ठहरेंगे: "जिन्हें तू ने मुझे दिया, उनमें से मैं ने एक को भी नहीं खोया।" (यूहन्ना 18:9) निश्चय यह अच्छा है!

(ङ) मसीही की लड़ाई अच्छी है, क्योंकि वह लड़नेवाले की आत्मा का भला करती है। अन्य सब युद्धों की प्रवृत्ति बुरी, गिरानेवाली और नैतिक पतन की ओर ले जानेवाली होती है। वे मानव मन की निकृष्टतम भावनाओं को भड़काते हैं। वे विवेक को कठोर बनाते हैं और धर्म तथा नैतिकता की नींव खोखली कर देते हैं। केवल मसीही युद्ध ही मनुष्य में शेष बची हुई उत्तम बातों को जगाने की प्रवृत्ति रखता है। वह नम्रता और प्रेम को बढ़ाता है, स्वार्थ और सांसारिकता को घटाता है, और मनुष्यों को प्रेरित करता है कि वे अपना मन ऊपर की वस्तुओं पर लगाएँ। बूढ़े, रोगी और मरणासन्न लोग पाप, संसार और शैतान के विरुद्ध मसीह की लड़ाइयाँ लड़ने पर कभी पछताते नहीं पाए गए। उनका एकमात्र खेद यही होता है कि उन्होंने मसीह की सेवा बहुत पहले आरम्भ क्यों न की। उस प्रतिष्ठित सन्त फिलिप हेनरी का अनुभव अकेला नहीं है। अपने अन्तिम दिनों में उसने अपने परिवार से कहा, "मैं तुम सब को साक्षी बनाकर कहता हूँ कि मसीह की सेवा में बिताया हुआ जीवन वह सबसे सुखी जीवन है जो मनुष्य पृथ्वी पर बिता सकता है।" निश्चय यह अच्छा है!

(च) मसीही की लड़ाई एक अच्छी लड़ाई है, क्योंकि वह संसार का भला करती है। अन्य सब युद्धों का प्रभाव उजाड़नेवाला, तहस-नहस करनेवाला और हानिकारक होता है। किसी सेना का किसी देश में से होकर गुज़रना वहाँ के निवासियों के लिये भयानक कोड़ा है। जहाँ-जहाँ वह जाती है, कंगाली, बरबादी और हानि फैलाती है। व्यक्तियों, सम्पत्ति, भावनाओं और नैतिकता की हानि उसके साथ अवश्य चलती है। मसीही सिपाहियों के द्वारा उत्पन्न प्रभाव इससे बिलकुल भिन्न हैं। वे जहाँ कहीं रहते हैं, आशीष होते हैं। वे धर्म और नैतिकता का स्तर ऊँचा उठाते हैं। वे मतवालेपन, सब्त के उल्लंघन, दुराचार और बेईमानी की बढ़ती को सदा रोकते हैं। यहाँ तक कि उनके शत्रुओं को भी उनका आदर करना पड़ता है। जहाँ चाहे जाओ, तुम्हें शायद ही कहीं ऐसा मिलेगा कि छावनियाँ और किले आसपास के क्षेत्र का भला करते हों। परन्तु जहाँ चाहे जाओ, तुम पाओगे कि कुछ सच्चे मसीहियों की उपस्थिति आशीष है। निश्चय यह अच्छा है!

(छ) अन्त में, मसीही की लड़ाई अच्छी है, क्योंकि वह उन सब के लिये जो उसे लड़ते हैं, एक महिमामय प्रतिफल पर समाप्त होती है। कौन बता सकता है कि मसीह अपने सब विश्वासयोग्य लोगों को कैसी मजदूरी देगा? कौन आँक सकता है कि हमारे दिव्य सेनापति ने उनके लिये कैसी उत्तम वस्तुएँ रख छोड़ी हैं जो मनुष्यों के सामने उसे मान लेते हैं? कृतज्ञ देश अपने विजयी योद्धाओं को पदक, विक्टोरिया क्रॉस, पेंशन, सामन्ती उपाधियाँ, सम्मान और खिताब दे सकता है। परन्तु वह ऐसा कुछ नहीं दे सकता जो सदा बना रहे और टिका रहे, ऐसा कुछ नहीं जो कब्र के पार ले जाया जा सके। ब्लेनहेम और स्ट्रैथफील्डसे जैसे महल केवल कुछ वर्षों तक ही भोगे जा सकते हैं। सबसे वीर सेनापतियों और सिपाहियों को भी एक दिन भयानकों के राजा के आगे झुकना पड़ेगा। उस मनुष्य की दशा कहीं अधिक उत्तम है जो पाप, संसार और शैतान के विरुद्ध मसीह के झण्डे के नीचे लड़ता है। हो सकता है कि जीते जी उसे मनुष्यों की प्रशंसा थोड़ी ही मिले और वह थोड़े ही सम्मान के साथ कब्र में उतरे; परन्तु उसे वह मिलेगा जो कहीं अधिक उत्तम है, क्योंकि कहीं अधिक स्थायी है। उसे "महिमा का मुकुट मिलेगा जो कभी मुर्झाने का नहीं।" (1 पतरस 5:4।) निश्चय यह अच्छा है!

हम अपने मन में यह बात निश्चित कर लें कि मसीही संघर्ष एक भली लड़ाई है—सचमुच भली, यथार्थ में भली, निश्चय ही भली। अभी हम उसका केवल एक भाग देखते हैं। हम संघर्ष को देखते हैं, पर उसका अन्त नहीं; हम युद्ध-अभियान को देखते हैं, पर उसका प्रतिफल नहीं; हम क्रूस को देखते हैं, पर मुकुट को नहीं। हम थोड़े से दीन, भग्न-हृदय, पश्चातापी, प्रार्थनाशील लोगों को देखते हैं, जो कठिनाइयाँ सहते हैं और संसार से तुच्छ समझे जाते हैं; परन्तु हम उन पर परमेश्वर का हाथ, उन पर मुस्कराता हुआ परमेश्वर का मुख, और उनके लिये तैयार किया हुआ महिमा का राज्य नहीं देखते। ये बातें अभी प्रगट होनी हैं। हम बाहरी रूप देखकर निर्णय न करें। मसीही युद्ध में जितनी भली बातें हमें दिखाई देती हैं, उनसे कहीं अधिक हैं।

अब मैं अपने सारे विषय का समापन व्यावहारिक उपयोग के कुछ शब्दों से करता हूँ। हमारा भाग्य ऐसे समयों में पड़ा है जब संसार को युद्धों और लड़ाइयों के सिवा मानो और कुछ सूझता ही नहीं। एक से अधिक जातियों के प्राण में लोहा घुस रहा है, और कितने ही सुन्दर प्रदेशों का आनन्द बिलकुल जाता रहा है। निश्चय ही ऐसे समयों में एक सेवक लोगों से उचित रीति से कह सकता है कि वे अपने आत्मिक संग्राम को स्मरण रखें। आत्मा के इस महान युद्ध के विषय में मुझे विदा के कुछ शब्द कहने दीजिये।

(1) हो सकता है कि आप इस संसार के प्रतिफलों के लिये कठिन परिश्रम कर रहे हों। सम्भव है आप धन, पद, अधिकार या सुख पाने के लिये एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हों। यदि आपकी दशा ऐसी है, तो सावधान रहिये। आप कड़वी निराशा की फसल बो रहे हैं। यदि आप सचेत न हुए तो आपका अन्त यह होगा कि आप शोक में पड़े रहेंगे।

हजारों लोग उस मार्ग पर चल चुके हैं जिस पर आप चल रहे हैं, और बहुत देर से जागकर उन्होंने देखा कि उसका अन्त दुःख और अनन्त विनाश है। उन्होंने धन, मान, पद और उन्नति के लिये कड़ा संघर्ष किया, और परमेश्वर, मसीह, स्वर्ग और आनेवाले संसार की ओर पीठ फेर ली। और उनका अन्त क्या हुआ? प्रायः, बहुत बार, उन्होंने जान लिया कि उनका सारा जीवन एक बड़ी भूल था। उन्होंने कड़वे अनुभव से उस राजनीतिज्ञ की भावनाओं को चखा जो अपने अन्तिम घण्टों में ऊँचे स्वर से पुकार उठा, "लड़ाई लड़ ली गई: लड़ाई लड़ ली गई: पर जीत नहीं मिली।"

अपने ही सुख के लिये आज ही निश्चय कर लीजिये कि आप प्रभु के पक्ष में आएँगे। अपनी पिछली लापरवाही और अविश्वास को झटक दीजिये। विचारहीन, बुद्धिहीन संसार की रीतियों से निकल आइये। क्रूस उठाइये और मसीह के अच्छे सिपाही बन जाइये। "विश्वास की अच्छी लड़ाई लड़ो," कि आप सुरक्षित होने के साथ सुखी भी हों।

विचार कीजिये कि इस संसार के लोग बिना किसी धार्मिक सिद्धान्त के भी स्वतंत्रता के लिये प्रायः क्या कुछ कर गुज़रते हैं। स्मरण कीजिये कि यूनानियों, रोमियों, स्विस और टायरोलवासियों ने किसी विदेशी जुए के नीचे गर्दन झुकाने के बजाय सब कुछ, यहाँ तक कि प्राण भी, खो देना सहा। उनका उदाहरण आपको होड़ करने के लिये उभारे। यदि मनुष्य नाशमान मुकुट के लिये इतना कर सकते हैं, तो आपको उस मुकुट के लिये कितना अधिक करना चाहिये जो अविनाशी है! दास होने के दुःख का भान करके जाग उठिये। जीवन, सुख और स्वतंत्रता के लिये उठिये और लड़िये।

मसीह के झण्डे के नीचे भर्ती होने और आरम्भ करने से मत डरिये। आपके उद्धार का महान सेनापति अपने पास आनेवाले किसी को भी नहीं ठुकराता। अदुल्लाम की गुफा में दाऊद के समान, वह उन सब को ग्रहण करने को तैयार है जो उसके पास आते हैं, चाहे वे अपने आप को कितना ही अयोग्य समझें। जो मन फिराते और विश्वास करते हैं, उनमें से कोई भी इतना बुरा नहीं कि मसीह की सेना की पंक्तियों में न लिखा जा सके। जो विश्वास से उसके पास आते हैं, वे सब भर्ती किये जाते, वस्त्र पहनाये जाते, शस्त्र दिये जाते, प्रशिक्षित किये जाते, और अन्त में पूरी जीत की ओर ले जाये जाते हैं। आज ही आरम्भ करने से मत डरिये। अब भी आपके लिये स्थान है।

एक बार भर्ती हो जाने पर लड़ते रहने से मत डरिये। आप सिपाही के रूप में जितने पूर्ण और सम्पूर्ण मन से होंगे, उतना ही आप अपने संग्राम को सुखद पाएँगे। निःसन्देह आपका संग्राम पूरा होने से पहले आपको अकसर क्लेश, थकान और कड़ी लड़ाई का सामना करना पड़ेगा। परन्तु इनमें से कोई बात आपको डिगाने न पाए। जो आपके पक्ष में है वह उन सब से बड़ा है जो आपके विरोध में हैं। अनन्त स्वतंत्रता या अनन्त बन्धुआई—ये दो विकल्प आपके सामने हैं। स्वतंत्रता को चुनिये, और अन्त तक लड़िये।

(2) हो सकता है कि आप मसीही संग्राम के विषय में कुछ जानते हों, और पहले से ही एक परखे और जाँचे हुए सिपाही हों। यदि आपकी दशा ऐसी है, तो एक संगी सिपाही की ओर से सलाह और प्रोत्साहन का विदाई शब्द ग्रहण कीजिये। मुझे अपने आप से भी वैसे ही बोलने दीजिये जैसे आपसे। आइये, हम स्मरण दिलाकर अपने मन को जगाएँ। कुछ बातें ऐसी हैं जिन्हें हम कितना ही अधिक याद रखें, कम है।

हम स्मरण रखें कि यदि हम सफलता से लड़ना चाहते हैं तो हमें परमेश्वर के सारे हथियार बाँध लेने चाहिये, और मरने तक उन्हें कभी न उतारना चाहिये। हथियार का एक भी भाग छोड़ा नहीं जा सकता। सत्य का फेंटा, धार्मिकता की झिलम, विश्वास की ढाल, आत्मा की तलवार, आशा का टोप—ये सब आवश्यक हैं। हम एक दिन भी इस हथियार के किसी भाग के बिना नहीं रह सकते। मसीह की सेना के एक पुराने योद्धा ने, जिसकी मृत्यु 200 वर्ष पहले हुई, ठीक ही कहा है, "स्वर्ग में हम हथियारों में नहीं, महिमा के वस्त्रों में दिखाई देंगे। परन्तु यहाँ हमारे हथियार रात-दिन पहने रहने हैं। हमें उन्हीं में चलना, काम करना और सोना है, नहीं तो हम मसीह के सच्चे सिपाही नहीं हैं।" (गर्नल की "मसीही हथियार")

आइये, हम एक प्रेरित योद्धा के गम्भीर शब्दों को स्मरण करें, जो 1800 वर्ष पहले अपने विश्राम में चला गया: "जो कोई योद्धा बनकर लड़ता है, वह जीवन के व्यवहारों में नहीं फँसता, ताकि वह उसे प्रसन्न करे जिसने उसे योद्धा बनाया।" (2 तीमुथियुस 2:4)। हम इस वचन को कभी न भूलें!

हम स्मरण रखें कि कुछ लोग थोड़े समय के लिये अच्छे सिपाही दिखाई दिये, और ऊँचे स्वर से बड़ी-बड़ी बातें करते रहे कि वे क्या करेंगे, फिर भी युद्ध के दिन लज्जाजनक रीति से पीछे हट गये।

हम बिलाम, यहूदा, देमास और लूत की पत्नी को कभी न भूलें। हम जो भी हों, और चाहे जितने निर्बल हों, हम वास्तविक, सच्चे, खरे और निष्कपट बनें।

हम स्मरण रखें कि हमारे प्रेमी उद्धारकर्ता की दृष्टि सुबह, दोपहर और रात हम पर लगी है। वह हमें कभी हमारी सामर्थ्य से अधिक परीक्षा में पड़ने न देगा। वह हमारी निर्बलताओं में हमारे साथ दुःख मान सकता है, क्योंकि उसने आप परीक्षा में पड़कर दुःख उठाया। वह जानता है कि लड़ाइयाँ और संघर्ष क्या होते हैं, क्योंकि स्वयं इस संसार के प्रधान ने उस पर आक्रमण किया। ऐसा महायाजक पाकर, यीशु परमेश्वर के पुत्र को, आइये हम अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामे रहें। (इब्रानियों 4:14)।

आइए, हम स्मरण रखें कि हमसे पहले हज़ारों सैनिकों ने वही युद्ध लड़ा है जो हम लड़ रहे हैं, और उस से जिसने उन से प्रेम किया, वे जयवन्तों से भी बढ़कर निकले। वे मेम्ने के लहू के कारण जयवन्त हुए; और हम भी हो सकते हैं। मसीह की भुजा अब भी उतनी ही सामर्थी है, और मसीह का हृदय अब भी उतना ही प्रेमी है। जिसने हमसे पहले के स्त्री-पुरुषों का उद्धार किया, वह कभी नहीं बदलता। वह "उनका जो उसके द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं, पूरा पूरा उद्धार कर सकता है।" इसलिए आइए, हम सब सन्देह और भय त्याग दें। आइए, हम "उनका अनुकरण करें जो विश्वास और धीरज के द्वारा प्रतिज्ञाओं के अधिकारी होते हैं," और हमारे उनसे आ मिलने की बाट जोह रहे हैं। (इब्रानियों 7:25; 6:12।)

अन्त में, आइए हम स्मरण रखें कि समय थोड़ा है, और प्रभु का आना निकट है। कुछ और युद्ध, और फिर अन्तिम तुरही फूंकी जाएगी, और शान्ति का राजकुमार नई की हुई पृथ्वी पर राज्य करने को आएगा। कुछ और संघर्ष और लड़ाइयाँ, और फिर हम युद्ध, पाप, शोक और मृत्यु को सदा के लिए विदा कह देंगे। इसलिए आइए, हम अन्त तक लड़ते रहें और कभी हार न मानें। हमारे उद्धार के प्रधान ने यों कहा है—"जो जय पाए, वही इन सब का अधिकारी होगा; और मैं उसका परमेश्वर होऊँगा और वह मेरा पुत्र होगा।" (प्रकाशित वाक्य 21:7।)

मैं सब कुछ जॉन बनयन के उन शब्दों के साथ समाप्त करता हूँ जो "पिलग्रिम्स प्रोग्रेस" के एक अत्यन्त सुन्दर अंश में हैं। वह अपने सबसे उत्तम और पवित्र यात्रियों में से एक के अन्त का वर्णन कर रहा है:—

"इसके बाद यह बात चारों ओर फैल गई कि सत्य के लिए वीर श्रीमान को बुलावा आया है, और वही दूत आया है जो दूसरों के पास आया था। और इस बात का प्रमाण कि बुलावा सच्चा है, उसे यह वचन मिला, 'घड़ा सोते पर फूट गया।' (सभोपदेशक 12:6।) जब वह इसे समझ गया, तो उसने अपने मित्रों को बुलाकर उन्हें यह बताया। तब उसने कहा, 'मैं अपने पिता के घर जा रहा हूँ; और यद्यपि मैं बड़ी कठिनाई से यहाँ तक पहुँचा हूँ, फिर भी जहाँ मैं पहुँचा हूँ वहाँ पहुँचने के लिए जितने भी कष्ट मैंने सहे, उन सब का मुझे अब कोई पछतावा नहीं है। मेरी तलवार मैं उसे देता हूँ जो मेरी यात्रा में मेरा उत्तराधिकारी होगा, और मेरा साहस और कौशल उसे जो उसे पा सके। मेरे चिह्न और घाव मैं अपने साथ ले जाता हूँ, कि वे मेरी गवाही दें कि मैंने उसकी लड़ाइयाँ लड़ी हैं जो अब मेरा प्रतिफल देनेवाला होगा।' जब उसके घर जाने का दिन आया, तो बहुत से लोग उसके साथ नदी के किनारे तक गए, और जब वह उसमें उतरा तो उसने कहा, 'हे मृत्यु, तेरा डंक कहाँ है?' और जब वह और गहराई में उतरा तो उसने पुकारा, 'हे अधोलोक, तेरी जय कहाँ है?' इस प्रकार वह पार हो गया, और दूसरी ओर उसके लिए सब तुरहियाँ बजाई गईं।"

हमारा अन्त भी ऐसा ही हो! हम कभी न भूलें कि बिना लड़े जीवित रहते हुए पवित्रता नहीं हो सकती, और मरते समय महिमा का मुकुट नहीं मिल सकता!

5. मूल्य

"तुम में से कौन है कि गढ़ बनाना चाहता हो, और पहले बैठकर खर्च न जोड़े?"—लूका 14:28

इस पृष्ठ के आरम्भ का यह पद बहुत महत्त्वपूर्ण है। ऐसे लोग थोड़े ही हैं जिन्हें प्रायः अपने आप से यह न पूछना पड़ता हो—"इसका मूल्य क्या है?"

सम्पत्ति मोल लेने में, घर बनाने में, कमरे सजाने में, योजनाएँ बनाने में, निवास बदलने में, बच्चों को शिक्षा देने में, आगे की सोचना और विचार करना बुद्धिमानी और विवेक की बात है। यदि बहुत से लोग केवल इस प्रश्न को स्मरण रखें—"इसका मूल्य क्या है?"—तो वे अपने को बहुत शोक और कष्ट से बचा सकते हैं।

परन्तु एक विषय ऐसा है जिसमें "मूल्य का हिसाब लगाना" विशेष रूप से आवश्यक है। वह विषय है हमारी आत्माओं का उद्धार। सच्चा मसीही होने का मूल्य क्या है? सचमुच पवित्र मनुष्य होने का मूल्य क्या है? अन्ततः यही सबसे बड़ा प्रश्न है। इस पर विचार न करने के कारण हज़ारों लोग, अच्छी शुरुआत करते हुए दिखने के बाद, स्वर्ग के मार्ग से मुड़ जाते हैं और सदा के लिए नरक में खो जाते हैं। मैं कुछ ऐसी बातें कहने का प्रयत्न करूँगा जो इस विषय पर प्रकाश डालें।

I. पहले, मैं दिखाऊँगा कि सच्चा मसीही होने का मूल्य क्या है।

II. दूसरे, मैं समझाऊँगा कि मूल्य का हिसाब लगाना इतना अधिक महत्त्वपूर्ण क्यों है।

III. अन्त में, मैं कुछ संकेत दूँगा जो मनुष्यों को मूल्य का ठीक हिसाब लगाने में सहायता कर सकें।

हम विचित्र समय में जी रहे हैं। घटनाएँ अद्भुत तेज़ी से बढ़ रही हैं। हम नहीं जानते कि "एक दिन में क्या होगा;" तो एक वर्ष में क्या हो जाए, इसका हमें कितना कम पता है!—हम बड़े धार्मिक दावों के दिन में जी रहे हैं। देश के हर भाग में मसीही होने का दावा करनेवाले अनेक लोग अधिक पवित्रता और आत्मिक जीवन की उच्च अवस्था की इच्छा प्रकट कर रहे हैं। फिर भी यह देखना अत्यन्त सामान्य है कि लोग वचन को आनन्द से ग्रहण करते हैं, और दो-तीन वर्ष बाद गिर जाते हैं और अपने पापों में लौट जाते हैं। उन्होंने इस बात पर विचार नहीं किया था कि सचमुच दृढ़ विश्वासी और पवित्र मसीही होने का "मूल्य क्या है।" निश्चय ही ये ऐसे समय हैं जब हमें बार-बार बैठकर "मूल्य का हिसाब लगाना" और अपनी आत्माओं की दशा पर विचार करना चाहिए। हमें सावधान रहना चाहिए कि हम क्या कर रहे हैं। यदि हम सचमुच पवित्र होना चाहते हैं, तो यह एक अच्छा चिह्न है। परमेश्वर का धन्यवाद करें कि उसने हमारे हृदयों में यह इच्छा डाली। फिर भी मूल्य का हिसाब लगाना चाहिए। निःसन्देह मसीह का अनन्त जीवन तक का मार्ग मनोहर मार्ग है। परन्तु इस तथ्य से आँखें मूँद लेना मूर्खता है कि उसका मार्ग सकरा है, और मुकुट से पहले क्रूस आता है।

I. पहले मुझे यह दिखाना है कि सच्चा मसीही होने का मूल्य क्या है

मेरे अर्थ में कोई भूल न हो। मैं यह नहीं जाँच रहा कि एक मसीही की आत्मा को बचाने में कितना मूल्य लगा। मैं भली-भाँति जानता हूँ कि प्रायश्चित का प्रबन्ध करने और मनुष्य को नरक से छुड़ाने में परमेश्वर के पुत्र के लहू से कम कुछ न लगा। हमारे छुटकारे के लिए जो मूल्य चुकाया गया, वह कलवरी पर यीशु मसीह की मृत्यु से कम नहीं था। हम "दाम देकर मोल लिए गए हैं।" "मसीह ने अपने आप को सब के छुटकारे के लिए दे दिया।" (1 कुरिन्थियों 6:20; 1 तीमुथियुस 2:6।) परन्तु यह सब प्रश्न से दूर की बात है। जिस बात पर मैं विचार करना चाहता हूँ, वह बिलकुल दूसरी है। वह यह है कि यदि मनुष्य उद्धार पाना चाहता है तो उसे क्या कुछ छोड़ने को तैयार रहना चाहिए। यह उस बलिदान की मात्रा है जिसे मनुष्य को सहना होगा यदि वह मसीह की सेवा करना चाहता है। इसी अर्थ में मैं यह प्रश्न उठाता हूँ, "इसका मूल्य क्या है?" और मैं दृढ़ता से विश्वास करता हूँ कि यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रश्न है।

मैं खुलकर मानता हूँ कि मात्र बाहरी मसीही बनने में बहुत कम खर्च होता है। मनुष्य को केवल इतना करना है कि रविवार को दो बार आराधना के स्थान में जाए और सप्ताह भर कुछ-कुछ नैतिक जीवन बिताए, और वह धर्म के विषय में उतनी ही दूर पहुँच गया जितनी दूर उसके आसपास के हज़ारों लोग कभी पहुँचते हैं। यह सब सस्ता और सहज काम है; इसमें न कोई आत्म-त्याग है, न कोई बलिदान। यदि यही उद्धार देनेवाला मसीही धर्म है और मरने पर हमें स्वर्ग पहुँचा देगा, तो हमें जीवन के मार्ग का वर्णन बदलकर यह लिखना पड़ेगा, "चौड़ा है वह फाटक और चौड़ा है वह मार्ग जो स्वर्ग को पहुँचाता है!"

परन्तु बाइबल के स्तर के अनुसार सच्चा मसीही बनने में कुछ खर्च अवश्य होता है। जीतने के लिए शत्रु हैं, लड़ने के लिए युद्ध हैं, करने के लिए बलिदान हैं, छोड़ने के लिए एक मिस्र है, पार करने के लिए एक जंगल है, उठाने के लिए एक क्रूस है, दौड़ने के लिए एक दौड़ है। मन फिराव का अर्थ मनुष्य को आरामकुर्सी पर बैठाकर सहज ही स्वर्ग पहुँचा देना नहीं है। यह एक भारी संघर्ष का आरम्भ है, जिसमें विजय पाने के लिए बहुत कुछ चुकाना पड़ता है। इसी कारण "लागत गिन लेना" अकथनीय रूप से महत्त्वपूर्ण है।

मैं ठीक-ठीक और विस्तार से दिखाने का प्रयत्न करता हूँ कि सच्चा मसीही बनने में क्या-क्या खर्च होता है। मान लें कि कोई मनुष्य मसीह की सेवा में लगने का मन रखता है, और उसके पीछे चलने की ओर खिंचाव और झुकाव अनुभव करता है। मान लें कि किसी विपत्ति, या किसी आकस्मिक मृत्यु, या किसी जगानेवाले उपदेश ने उसके विवेक को झकझोर दिया है, और उसे अपनी आत्मा का मूल्य समझा दिया है, और वह सच्चा मसीही बनना चाहता है। निश्चय ही उसे प्रोत्साहित करने के लिए सब कुछ है। उसके पाप चाहे कितने ही अधिक और बड़े हों, मुफ़्त क्षमा किए जा सकते हैं। उसका हृदय चाहे कितना ही ठण्डा और कठोर हो, पूरी तरह बदला जा सकता है। मसीह और पवित्र आत्मा, दया और अनुग्रह, सब उसके लिए तैयार हैं। फिर भी उसे लागत गिन लेनी चाहिए। आइए, एक-एक करके विस्तार से देखें कि उसके धर्म में उसे क्या-क्या चुकाना पड़ेगा।

(1) एक तो, उसे अपनी आत्म-धार्मिकता चुकानी पड़ेगी। उसे सारा घमण्ड, ऊँचे विचार और अपनी भलाई का अभिमान त्याग देना होगा।

उसे इसी में सन्तुष्ट होना होगा कि वह एक दीन पापी के रूप में केवल मुफ़्त अनुग्रह से उद्धार पाकर स्वर्ग जाए, और सब कुछ किसी दूसरे के पुण्य और धार्मिकता का ऋणी हो। उसे प्रार्थना-पुस्तक के उन शब्दों को केवल कहना ही नहीं, सचमुच अनुभव भी करना होगा, कि वह "खोई हुई भेड़ के समान भटक गया और बहक गया", कि उसने "वे काम छोड़ दिए जो उसे करने चाहिए थे, और वे काम किए जो उसे नहीं करने चाहिए थे, और उसमें कोई स्वास्थ्य नहीं है।" उसे अपनी नैतिकता, प्रतिष्ठा, प्रार्थना, बाइबल पढ़ने, कलीसिया जाने और संस्कार ग्रहण करने पर से सारा भरोसा छोड़ने को तैयार होना होगा, और यीशु मसीह को छोड़ किसी पर भरोसा नहीं रखना होगा।

अब यह कुछ लोगों को कठिन लगता है। मुझे आश्चर्य नहीं। एक भक्त हलवाहे ने वेस्टन फेवल के सुप्रसिद्ध जेम्स हर्वी से कहा था, "महाशय, पापी स्वयं को नकारने से अधिक कठिन है घमण्डी स्वयं को नकारना। परन्तु यह नितान्त आवश्यक है।" आइए, इस मद को अपने लेखे में सबसे पहले और सबसे ऊपर लिख लें। सच्चा मसीही बनने में मनुष्य को अपनी आत्म-धार्मिकता चुकानी पड़ेगी।

(2) दूसरे, उसे अपने पाप चुकाने पड़ेंगे। उसे हर उस आदत और आचरण को छोड़ने को तैयार होना होगा जो परमेश्वर की दृष्टि में बुरा है। चाहे आसपास का संसार कुछ भी कहे या सोचे, उसे उसके विरुद्ध अपना मुख कठोर करना होगा, उससे झगड़ना होगा, उसे तोड़ देना होगा, उससे लड़ना होगा, उसे क्रूस पर चढ़ाना होगा, और उसे दबाए रखने के लिए परिश्रम करना होगा। यह उसे ईमानदारी और खरेपन से करना होगा। जिस किसी विशेष पाप से उसे प्रेम है, उसके साथ अलग से कोई सन्धि नहीं हो सकती। उसे सब पापों को अपना प्राणघातक शत्रु मानना होगा, और हर झूठे मार्ग से घृणा करनी होगी। चाहे छोटे हों या बड़े, चाहे प्रकट हों या गुप्त, उसके सब पाप पूरी तरह त्यागने होंगे। वे प्रतिदिन उससे कड़ा संघर्ष करेंगे, और कभी-कभी लगभग उस पर हावी भी हो जाएँगे। परन्तु उसे कभी उनके आगे झुकना नहीं है। उसे अपने पापों के साथ निरन्तर युद्ध बनाए रखना होगा। लिखा है, "अपने सारे अपराधों को जो तुम ने किए हैं, उन्हें अपने से दूर करो।"—"अपने पापों और अधर्म के कामों को छोड़ दे।"—"बुराई करना छोड़ दो।"—(यहेजकेल 18:31; दानिय्येल 4:27; यशायाह 1:16।)

यह भी कठिन लगता है। मुझे आश्चर्य नहीं। हमारे पाप अकसर हमें अपनी सन्तान जैसे प्रिय होते हैं: हम उन्हें चाहते हैं, गले लगाते हैं, उनसे चिपके रहते हैं और उनमें आनन्दित होते हैं। उनसे अलग होना दाहिना हाथ काटने, या दाहिनी आँख निकालने जितना कठिन है। परन्तु यह करना ही होगा। यह बिछोह होना ही है। "चाहे बुराई उसके मुँह में मीठी लगे, और वह उसे अपनी जीभ तले छिपाए रखे; और उसे बचाए रखे और न छोड़े," तो भी यदि वह उद्धार पाना चाहता है तो उसे छोड़ना ही होगा। (अय्यूब 20:12, 13।) यदि उसे परमेश्वर का मित्र बनना है तो उसे पाप से झगड़ना होगा। मसीह किसी भी पापी को ग्रहण करने को तैयार है। परन्तु यदि वे अपने पापों से चिपके रहें तो वह उन्हें ग्रहण नहीं करेगा। आइए, इस मद को अपने लेखे में दूसरे स्थान पर लिख लें। मसीही बनने में मनुष्य को अपने पाप चुकाने पड़ेंगे।

(3) तीसरे, उसे अपना आराम-प्रेम चुकाना पड़ेगा। यदि वह स्वर्ग की ओर सफल दौड़ दौड़ना चाहता है तो उसे परिश्रम और कष्ट उठाना होगा। उसे शत्रु की भूमि पर खड़े सैनिक के समान प्रतिदिन चौकसी करनी और सावधान रहना होगा। उसे दिन के हर घण्टे, हर संगति में और हर स्थान में, सार्वजनिक रूप से भी और निजी रूप से भी, अनजान लोगों के बीच भी और घर में भी, अपने आचरण पर ध्यान रखना होगा। उसे अपने समय, अपनी जीभ, अपने स्वभाव, अपने विचारों, अपनी कल्पना, अपने उद्देश्यों और जीवन के हर सम्बन्ध में अपने व्यवहार के विषय में सावधान रहना होगा। उसे अपनी प्रार्थनाओं, बाइबल पढ़ने, और रविवारों को उनके सब अनुग्रह के साधनों सहित काम में लाने में परिश्रमी होना होगा। इन बातों में ध्यान देते हुए वह सिद्धता से बहुत पीछे रह सकता है; परन्तु इनमें से कोई भी ऐसी नहीं जिसकी वह सुरक्षित रूप से उपेक्षा कर सके। "आलसी मनुष्य लालसा तो करता है, परन्तु उसको कुछ नहीं मिलता, परन्तु परिश्रमी लोग हृष्ट-पुष्ट हो जाते हैं।" (नीतिवचन 13:4।)

यह भी कठिन लगता है। अपने धर्म के विषय में "कष्ट" उठाना हमें स्वभाव से जितना अप्रिय है, उतना और कुछ नहीं। हम कष्ट से घृणा करते हैं। हम मन ही मन चाहते हैं कि हमारा मसीही धर्म "किसी और के द्वारा" निभाया जाए, हम किसी और के सहारे भले बन जाएँ, और सब कुछ हमारे लिए कर दिया जाए। जिसमें परिश्रम और मेहनत लगे, वह हमारे हृदय के स्वभाव के बिलकुल विरुद्ध है। परन्तु आत्मा के लिए "बिना परिश्रम कोई लाभ नहीं।" आइए, इस मद को अपने लेखे में तीसरे स्थान पर लिख लें। मसीही बनने में मनुष्य को अपना आराम-प्रेम चुकाना पड़ेगा।

(4) अन्त में, इसमें मनुष्य को संसार की कृपा गँवानी पड़ेगी। यदि वह परमेश्वर को प्रसन्न करता है तो उसे इस बात से सन्तुष्ट रहना होगा कि मनुष्य उसे बुरा समझें। उसे यह कोई अनोखी बात न समझनी चाहिए कि उसका उपहास किया जाए, ठट्ठा उड़ाया जाए, उस पर निन्दा लगाई जाए, उसे सताया जाए, और यहाँ तक कि उससे घृणा भी की जाए। जब उसके धार्मिक विचारों और आचरण को तुच्छ समझा जाए और उन्हें घृणा का पात्र ठहराया जाए तो उसे चकित नहीं होना चाहिए। उसे यह सहना होगा कि बहुत लोग उसे मूर्ख, धर्मोन्मादी और कट्टरपन्थी समझें—उसके शब्दों को तोड़ा-मरोड़ा जाए और उसके कामों को ग़लत रूप में प्रस्तुत किया जाए। वास्तव में, यदि कुछ लोग उसे पागल कहें तो उसे अचम्भा नहीं करना चाहिए। स्वामी कहता है—"जो बात मैं ने तुम से कही थी, 'दास अपने स्वामी से बड़ा नहीं होता', उसको स्मरण रखो। यदि उन्होंने मुझे सताया, तो तुम्हें भी सताएँगे; यदि उन्होंने मेरी बात मानी, तो तुम्हारी भी मानेंगे।" (यूहन्ना 15:20)।

मैं कह सकता हूँ कि यह भी कठोर सुनाई देता है। हमें स्वभावतः अन्यायपूर्ण व्यवहार और झूठे आरोप अच्छे नहीं लगते, और बिना कारण दोषी ठहराया जाना बहुत कठोर लगता है। यदि हम अपने पड़ोसियों की अच्छी राय पाने की इच्छा न रखें तो हम हाड़-मांस के मनुष्य ही न होंगे। निन्दा सुनना, त्यागा जाना, हमारे विषय में झूठ कहा जाना और अकेले खड़े रहना सदा अप्रिय होता है। परन्तु इसका कोई उपाय नहीं है। जो कटोरा हमारे स्वामी ने पिया, वह उसके चेलों को भी पीना होगा। वे "मनुष्यों के निकट तुच्छ और त्यागे हुए" ठहरेंगे। (यशायाह 53:3)। आइए, इस बात को अपने हिसाब में सबसे अन्त में लिख लें। मसीही होने में मनुष्य को संसार की कृपा गँवानी पड़ेगी।

सच्चा मसीही होने में जो मूल्य चुकाना पड़ता है, उसका लेखा यही है। मैं मानता हूँ कि यह सूची भारी है। परन्तु इसमें कौन-सी बात हटाई जा सकती है? वह मनुष्य सचमुच बड़ा साहसी होगा जो यह कहने का दुस्साहस करे कि हम अपनी आत्म-धार्मिकता, अपने पापों, अपने आलस्य और संसार के प्रेम को रखे हुए भी उद्धार पा सकते हैं!

मैं मानता हूँ कि सच्चा मसीही होने में बहुत कुछ चुकाना पड़ता है। परन्तु कौन अपने सही होश में यह सन्देह कर सकता है कि आत्मा के उद्धार के लिए कोई भी मूल्य चुकाना योग्य है? जब जहाज़ के डूबने का भय होता है तो नाविक बहुमूल्य माल को समुद्र में फेंकने में तनिक भी नहीं हिचकते। जब कोई अंग सड़ जाता है तो मनुष्य प्राण बचाने के लिए कठोर से कठोर शल्यक्रिया, यहाँ तक कि अंग कटवाना भी सह लेता है। निश्चय ही मसीही को हर उस वस्तु को छोड़ने के लिए तैयार रहना चाहिए जो उसके और स्वर्ग के बीच बाधा बनती है। जिस धर्म में कुछ मूल्य नहीं चुकाना पड़ता, वह किसी काम का नहीं! बिना क्रूस का सस्ता मसीही धर्म अन्त में बिना मुकुट का निकम्मा मसीही धर्म ही ठहरेगा।

II. अब दूसरे स्थान पर मुझे यह समझाना है कि "मूल्य का हिसाब लगाना" मनुष्य की आत्मा के लिए इतना महत्त्वपूर्ण क्यों है।

मैं इस प्रश्न को सहज ही इस सिद्धान्त से निपटा सकता हूँ कि मसीह की आज्ञा किया हुआ कोई भी कर्तव्य बिना हानि के उपेक्षित नहीं किया जा सकता। मैं दिखा सकता हूँ कि कितने ही लोग जीवन भर उद्धार देनेवाले धर्म के स्वरूप से आँखें मूँदे रहते हैं और यह विचार करने से इनकार करते हैं कि मसीही होने में वास्तव में क्या मूल्य चुकाना पड़ता है। मैं वर्णन कर सकता हूँ कि अन्त में, जब जीवन ढलने लगता है, तब वे जागते हैं और परमेश्वर की ओर फिरने के लिए कुछ बेचैन प्रयत्न करते हैं। मैं बता सकता हूँ कि वे आश्चर्य के साथ पाते हैं कि मन फिराव और परिवर्तन उतने सरल नहीं हैं जितना उन्होंने समझा था, और सच्चा मसीही होने में "बड़ी रकम" लगती है। वे पाते हैं कि घमण्ड, पापमय भोग-विलास, आराम-पसन्दी और सांसारिकता की आदतें उतनी सरलता से नहीं छूटतीं जितना उन्होंने सोचा था। और इसलिए, थोड़े से संघर्ष के बाद, वे निराश होकर हार मान लेते हैं और आशाहीन, अनुग्रहहीन और परमेश्वर से मिलने के अयोग्य होकर संसार से चले जाते हैं! वे जीवन भर अपने आप को यह कहकर बहलाते रहे कि जब हम धर्म को गम्भीरता से ग्रहण करेंगे तब वह सरल काम होगा। परन्तु उनकी आँखें बहुत देर से खुलती हैं, और वे पहली बार जानते हैं कि उनका नाश इसलिए हुआ कि उन्होंने कभी "मूल्य का हिसाब नहीं लगाया।"

परन्तु एक वर्ग के लोग हैं जिनसे मैं अपने विषय के इस भाग में विशेष रूप से बात करना चाहता हूँ। यह एक बड़ा वर्ग है—बढ़ता हुआ वर्ग—और ऐसा वर्ग जो इन दिनों विशेष संकट में है। मैं थोड़े सरल शब्दों में इस वर्ग का वर्णन करने का प्रयत्न करता हूँ। यह हमारे पूरे ध्यान के योग्य है।

जिन लोगों की मैं बात कर रहा हूँ वे धर्म के विषय में असावधान नहीं हैं; वे उसके बारे में बहुत सोचते हैं। वे धर्म से अनजान भी नहीं हैं; वे उसकी रूपरेखा को भली-भाँति जानते हैं। परन्तु उनकी बड़ी कमी यह है कि वे अपने विश्वास में "जड़ पकड़े हुए और नींव डाले हुए" नहीं हैं। प्रायः उन्होंने अपना ज्ञान दूसरों से सुनकर पाया है—धार्मिक परिवारों में रहने या धार्मिक रीतियों में पाले जाने के कारण—परन्तु उसे अपने भीतरी अनुभव से कभी पक्का नहीं किया। प्रायः उन्होंने परिस्थितियों के दबाव में, भावुकता के कारण, उत्तेजना में, या अपने चारों ओर के लोगों की देखा-देखी कुछ करने की धुँधली इच्छा से, बिना हृदय में अनुग्रह का कोई ठोस कार्य हुए, जल्दी में धर्म का दावा अपना लिया है। इस प्रकार के लोग भारी संकट की स्थिति में हैं। यदि बाइबल के उदाहरण कुछ भी महत्त्व रखते हैं, तो ठीक यही वे लोग हैं जिन्हें "मूल्य का हिसाब लगाने" की चेतावनी की आवश्यकता है।

"मूल्य का हिसाब न लगाने" के कारण इस्राएल की सन्तानों में से लाखों मिस्र और कनान के बीच जंगल में दयनीय दशा में नष्ट हुए। वे उत्साह और जोश से भरे हुए मिस्र से निकले, मानो कोई उन्हें रोक न सकेगा। परन्तु जब मार्ग में उन्हें संकट और कठिनाइयाँ मिलीं तो उनका साहस शीघ्र ठण्डा पड़ गया। उन्होंने कभी कष्टों का हिसाब नहीं लगाया था। उन्होंने सोचा था कि प्रतिज्ञा की हुई भूमि कुछ ही दिनों में उनके सामने होगी। इसलिए जब शत्रु, अभाव, भूख और प्यास उनकी परीक्षा लेने लगे, तो वे मूसा और परमेश्वर के विरुद्ध कुड़कुड़ाने लगे और मिस्र को लौट जाना चाहने लगे। एक शब्द में, उन्होंने "मूल्य का हिसाब नहीं लगाया था," इसलिए सब कुछ खो बैठे और अपने पापों में मर गए।

"मूल्य का हिसाब न लगाने" के कारण हमारे प्रभु यीशु मसीह के बहुत-से सुननेवाले कुछ समय बाद पीछे हट गए और "उसके साथ फिर न चले।" (यूहन्ना 6:66)। जब उन्होंने पहले उसके आश्चर्यकर्म देखे और उसका प्रचार सुना, तो उन्होंने समझा कि "परमेश्वर का राज्य अभी प्रगट होने वाला है।" उन्होंने उसके प्रेरितों के साथ अपना भाग लिया और परिणामों का विचार किए बिना उसके पीछे हो लिए। परन्तु जब उन्होंने पाया कि कुछ कठिन सिद्धान्त मानने हैं, कठिन काम करने हैं और कठिन व्यवहार सहना है, तो उनका विश्वास पूरी तरह टूट गया और कुछ भी नहीं निकला। एक शब्द में, उन्होंने "मूल्य का हिसाब नहीं लगाया था," और इसलिए अपने दावे का जहाज़ डुबो बैठे।

"कीमत जोड़ने" की कमी के कारण राजा हेरोदेस अपने पुराने पापों में लौट गया और उसने अपनी आत्मा को नाश कर दिया। उसे यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले का उपदेश सुनना अच्छा लगता था। वह उसे धर्मी और पवित्र पुरुष जानकर उसकी "सुधि रखता" और उसका आदर करता था। उसने बहुत से भले और उचित काम भी "किए"। परन्तु जब उसने देखा कि उसे अपनी प्रिय हेरोदियास को छोड़ना पड़ेगा, तब उसका धर्म पूरी तरह टूट गया। उसने इसका हिसाब नहीं लगाया था। "उसने कीमत नहीं जोड़ी थी।" (मरकुस 6:20।)

"कीमत जोड़ने" की कमी के कारण देमास ने पौलुस का साथ छोड़ा, सुसमाचार को छोड़ा, मसीह को छोड़ा, स्वर्ग को छोड़ा। बहुत समय तक वह अन्यजातियों के इस महान प्रेरित के साथ यात्रा करता रहा, और सचमुच "सहकर्मी" था। परन्तु जब उसने देखा कि वह इस संसार की मित्रता और परमेश्वर की मित्रता दोनों को एक साथ नहीं रख सकता, तब उसने अपना मसीही जीवन छोड़ दिया और संसार से लिपट गया। पौलुस कहता है, "देमास ने इस संसार को प्रिय जानकर मुझे छोड़ दिया।" (2 तीमुथियुस 4:10।) उसने "कीमत नहीं जोड़ी थी।"

"कीमत जोड़ने" की कमी के कारण सामर्थी सुसमाचारी प्रचारकों के सुननेवाले प्रायः दुःखद अन्त को पहुँचते हैं। वे भावुक और उत्तेजित होकर ऐसी बातों का अंगीकार करने लगते हैं जिनका उन्होंने वास्तव में अनुभव नहीं किया। वे वचन को ऐसे अतिशय "आनन्द" से ग्रहण करते हैं कि पुराने मसीही भी चकित रह जाते हैं। कुछ समय तक वे ऐसे उत्साह और जोश से दौड़ते हैं कि लगता है वे सब से आगे निकल जाएँगे। वे आत्मिक बातों के लिये ऐसी उमंग से बोलते और काम करते हैं कि पुराने विश्वासियों को लज्जा आती है। परन्तु जब उनकी भावनाओं की नवीनता और ताज़गी जाती रहती है, तब उनमें परिवर्तन आ जाता है। तब प्रमाणित होता है कि वे पथरीली भूमि के सुननेवालों से अधिक कुछ न थे। बोनेवाले के दृष्टान्त में महान स्वामी ने जो वर्णन किया है, वह ठीक ऐसा ही चरितार्थ होता है: "जब वचन के कारण क्लेश या उपद्रव होता है, तो वह तुरन्त ठोकर खाता है।" (मत्ती 13:21।) धीरे-धीरे उनका उत्साह ठंडा पड़ जाता है और प्रेम शिथिल हो जाता है। कुछ समय बाद परमेश्वर के लोगों की सभा में उनके स्थान खाली दिखाई देते हैं, और मसीहियों के बीच उनकी चर्चा ही नहीं रहती। और क्यों? उन्होंने "कभी कीमत नहीं जोड़ी थी।"

"कीमत जोड़ने" की कमी के कारण धार्मिक पुनर्जागरण के समय मसीही कहलानेवाले सैकड़ों नए लोग कुछ समय बाद संसार में लौट जाते हैं और धर्म को कलंकित करते हैं। वे सच्चे मसीही जीवन के विषय में बड़ी दुःखद भूल से आरम्भ करते हैं। वे समझ बैठते हैं कि यह केवल तथाकथित "मसीह के पास आने" और भीतर आनन्द और शान्ति की तीव्र भावनाएँ पाने में है। इसलिये जब कुछ समय बाद वे देखते हैं कि उठाने के लिये एक क्रूस है, हमारे हृदय छली हैं, और एक व्यस्त शैतान सदा हमारे निकट रहता है, तब वे खिन्न होकर ठंडे पड़ जाते हैं और अपने पुराने पापों में लौट जाते हैं। और क्यों? क्योंकि उन्होंने वास्तव में कभी जाना ही न था कि बाइबल का मसीही जीवन क्या है। उन्होंने कभी नहीं सीखा था कि हमें "कीमत जोड़नी" चाहिए।*

"कीमत जोड़ने" की कमी के कारण भक्त माता-पिता की सन्तानें प्रायः बिगड़ जाती हैं और मसीही धर्म को कलंकित करती हैं। अपनी बाल्यावस्था से ही सुसमाचार के रूप और सिद्धान्त से परिचित, शैशव से ही मुख्य पदों को दोहराना सीखे हुए, प्रति सप्ताह सुसमाचार की शिक्षा पाने या रविवार की पाठशालाओं में दूसरों को सिखाने के अभ्यस्त होकर, वे प्रायः यह जाने बिना कि क्यों, या कभी गम्भीरता से सोचे बिना, एक धर्म का अंगीकार करते हुए बड़े होते हैं। फिर जब प्रौढ़ जीवन की वास्तविकताएँ उन पर दबाव डालने लगती हैं, तो वे प्रायः सब को चकित करते हुए अपना सारा धर्म छोड़ देते हैं और सीधे संसार में कूद पड़ते हैं। और क्यों? उन्होंने मसीही धर्म से जुड़े त्यागों को कभी भली भाँति समझा ही न था। उन्हें कभी "कीमत जोड़ना" सिखाया ही नहीं गया था।

ये गम्भीर और दुःखद सत्य हैं। परन्तु ये सत्य हैं। ये सब उस विषय के अत्यधिक महत्त्व को दिखाने में सहायक हैं जिस पर मैं अब विचार कर रहा हूँ। ये सब इस बात की पूर्ण आवश्यकता की ओर संकेत करते हैं कि इस लेख का विषय उन सब के सामने दृढ़ता से रखा जाए जो पवित्रता की अभिलाषा का अंगीकार करते हैं, और सब कलीसियाओं में ऊँचे स्वर से पुकारा जाए—"कीमत जोड़ो।"

मैं साहस के साथ कहता हूँ कि यदि "कीमत जोड़ने" का कर्तव्य जितना सिखाया जाता है उससे अधिक बार सिखाया जाए तो अच्छा होगा। बहुत से धर्मवादियों में अधीर जल्दबाज़ी का ही चलन है। तात्कालिक मन फिराव और तुरन्त अनुभव होनेवाली शान्ति ही सुसमाचार से मिलनेवाले ऐसे फल हैं जिनकी वे परवाह करते दिखाई देते हैं। इनकी तुलना में अन्य सब बातें छाया में डाल दी जाती हैं। उनके सब परिश्रमों का मुख्य उद्देश्य और लक्ष्य प्रत्यक्षतः इन्हें उत्पन्न करना ही है। मैं बिना झिझक कहता हूँ कि मसीही धर्म की शिक्षा देने की ऐसी नंगी, एकांगी रीति अत्यन्त हानिकारक है।

कोई मेरे आशय को ग़लत न समझे। मैं मनुष्यों को यीशु मसीह में पूर्ण, मुफ़्त, वर्तमान और तुरन्त उद्धार प्रस्तुत करने का पूरा समर्थन करता हूँ। मैं मनुष्य को तुरन्त, तत्काल मन फिराव की सम्भावना और कर्तव्य पर बल देने का पूरा समर्थन करता हूँ। इन बातों में मैं किसी से पीछे नहीं हूँ। परन्तु मैं यह अवश्य कहता हूँ कि ये सत्य मनुष्यों के सामने नंगे रूप में, अकेले और अलग रखे नहीं जाने चाहिए। यदि वे संसार में से निकलकर मसीह की सेवा करने की अभिलाषा का अंगीकार करते हैं, तो उन्हें ईमानदारी से बताया जाना चाहिए कि वे क्या उठा रहे हैं। उन्हें यह बताए बिना कि युद्ध में क्या-क्या सहना पड़ता है, मसीह की सेना की पंक्तियों में धकेला नहीं जाना चाहिए। एक शब्द में, उन्हें ईमानदारी से कहा जाना चाहिए कि "कीमत जोड़ो।"

क्या कोई पूछता है कि इस विषय में हमारे प्रभु यीशु मसीह का व्यवहार क्या था? वह वही पढ़े जो लूका ने लिखा है। वह हमें बताता है कि एक अवसर पर "उसके साथ बड़ी भीड़ जा रही थी: और उसने पीछे फिरकर उनसे कहा, यदि कोई मेरे पास आए, और अपने पिता और माता और पत्नी और लड़के-बालों और भाइयों और बहिनों वरन् अपने प्राण को भी अप्रिय न जाने, तो वह मेरा चेला नहीं हो सकता। और जो कोई अपना क्रूस न उठाए और मेरे पीछे न आए, वह भी मेरा चेला नहीं हो सकता।" (लूका 14:25–27।) मुझे स्पष्ट कहना चाहिए कि मैं इस अंश का मेल बहुत से आधुनिक धार्मिक शिक्षकों के आचरण से नहीं बैठा सकता। फिर भी मेरे विचार में इसका सिद्धान्त दोपहर के सूर्य के समान स्पष्ट है। यह हमें दिखाता है कि हमें मनुष्यों को "कीमत जोड़ने" की स्पष्ट चेतावनी दिए बिना उन्हें चेले होने का अंगीकार करने की जल्दी में नहीं डालना चाहिए।

क्या कोई पूछता है कि बीते दिनों में सुसमाचार के श्रेष्ठ और उत्तम प्रचारकों की रीति क्या रही है? मैं निडर होकर कहता हूँ कि उन सब ने एक स्वर से उस बुद्धिमानी की गवाही दी है जो हमारे प्रभु ने उन भीड़ों के साथ व्यवहार करने में दिखाई, जिनका मैं अभी उल्लेख कर चुका हूँ। लूथर, लैटिमर, बैक्सटर, वेस्ली, व्हिटफ़ील्ड, बैरिज और रोलैंड हिल, ये सब मनुष्य के हृदय की धोखेबाज़ी के प्रति पूरी तरह सचेत थे। वे भली-भाँति जानते थे कि जो चमकता है वह सब सोना नहीं होता, कि दोषबोध का होना मन फिराव नहीं है, कि भावना विश्वास नहीं है, कि भावुकता अनुग्रह नहीं है, और कि सब फूल फल नहीं बनते। "धोखा न खाओ," यही उनकी निरन्तर पुकार थी। "सोच-समझकर देखो कि तुम क्या कर रहे हो। बुलाए जाने से पहले मत दौड़ पड़ो। पहले लागत जोड़ लो।"

यदि हम भलाई करना चाहते हैं, तो अपने प्रभु यीशु मसीह के पदचिह्नों पर चलने में हम कभी लज्जित न हों। यदि तुम चाहो और तुम्हें अवसर मिले, तो दूसरों की आत्माओं के लिए जी-जान से परिश्रम करो। उनसे आग्रह करो कि वे अपनी चाल-चलन पर विचार करें। पवित्र बल के साथ उन्हें विवश करो कि वे भीतर आएँ, अपने हथियार डाल दें और अपने आप को परमेश्वर के हाथों सौंप दें। उन्हें उद्धार का प्रस्ताव दो, ऐसा उद्धार जो तैयार, मुफ़्त, पूर्ण और तुरन्त मिलनेवाला है। मसीह को और उसकी सब आशीषों को उनके स्वीकार करने के लिए उनके सामने रखो। परन्तु अपने सारे कार्य में सत्य कहो, और पूरा सत्य कहो। भर्ती करनेवाले सिपाही की ओछी चालाकियाँ अपनाने में लज्जा मानो। केवल वर्दी, वेतन और महिमा की ही बात न करो; शत्रुओं, युद्ध, कवच, पहरेदारी, कूच और अभ्यास की भी बात करो। मसीही जीवन का केवल एक ही पक्ष प्रस्तुत न करो। जब तुम उस क्रूस की चर्चा करो जिस पर मसीह ने हमारे छुटकारे के लिए प्राण दिए, तो आत्म-त्याग के उस क्रूस को भी न छिपाओ जिसे उठाना ही पड़ेगा। पूरी तरह समझाओ कि मसीही जीवन में क्या-क्या सम्मिलित है। लोगों से बिनती करो कि वे मन फिराएँ और मसीह के पास आएँ; पर साथ ही उनसे कहो कि वे "लागत जोड़ लें।"

III. तीसरी और अन्तिम बात जो मैंने करने को ठहराई थी, वह कुछ संकेत देना है जो लोगों को "लागत" ठीक रीति से जोड़ने में सहायता करें

यदि मैं अपने विषय की इस शाखा पर कुछ न कहूँ तो मुझे सचमुच खेद होगा। मेरी इच्छा किसी को हतोत्साहित करने या मसीह की सेवा से रोकने की नहीं है। मेरे हृदय की इच्छा तो यही है कि हर एक को आगे बढ़ने और क्रूस उठाने के लिए प्रोत्साहित करूँ। हम "लागत" अवश्य जोड़ें, और ध्यान से जोड़ें। परन्तु स्मरण रखें कि यदि हम ठीक-ठीक गणना करें और हर ओर देखें, तो ऐसी कोई बात नहीं जो हमें डराए।

मैं कुछ बातें बताता हूँ जो सच्चे मसीही जीवन की लागत जोड़ते समय हमारी गणना में सदा आनी चाहिए। ईमानदारी और निष्पक्षता से लिखो कि यदि तुम मसीह के चेले बनो तो तुम्हें क्या-क्या छोड़ना और किन-किन बातों से होकर गुज़रना पड़ेगा। कुछ भी न छोड़ो। सब लिख डालो। पर फिर उसके साथ-साथ वे जोड़ भी लिखो जो मैं तुम्हें बताने जा रहा हूँ। यह निष्पक्षता और ठीक-ठीक करो, तो मुझे परिणाम की कोई चिन्ता नहीं।

(क) एक बात यह कि यदि तुम सच्चे मन के और पवित्र मसीही हो, तो लाभ और हानि की गणना करके तुलना करो। सम्भव है तुम इस संसार में कुछ खो दो, परन्तु तुम अपनी अमर आत्मा का उद्धार पाओगे। लिखा है, "यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे और अपनी आत्मा की हानि उठाए, तो उसे क्या लाभ होगा?" (मरकुस 8:36)।

(ख) दूसरी बात यह कि यदि तुम सच्चे मन के और पवित्र मसीही हो, तो प्रशंसा और निन्दा की गणना करके तुलना करो। सम्भव है मनुष्य तुम्हारी निन्दा करें, परन्तु तुम्हें परमेश्वर पिता, परमेश्वर पुत्र और परमेश्वर पवित्र आत्मा की प्रशंसा मिलेगी। तुम्हारी निन्दा कुछ भटके हुए, अन्धे और भूल करनेवाले स्त्री-पुरुषों के मुँह से आएगी। तुम्हारी प्रशंसा राजाओं के राजा और सारी पृथ्वी के न्यायी की ओर से आएगी। वास्तव में धन्य वही हैं जिन्हें वह आशीष देता है। लिखा है, "धन्य हो तुम, जब मनुष्य मेरे कारण तुम्हारी निन्दा करें, और सताएँ और झूठ बोल बोलकर तुम्हारे विरोध में सब प्रकार की बुरी बात कहें। आनन्दित और मगन होना क्योंकि स्वर्ग में तुम्हारे लिये बड़ा प्रतिफल है।" (मत्ती 5:11, 12)।

(ग) तीसरी बात यह कि यदि तुम सच्चे मन के और पवित्र मसीही हो, तो मित्रों और शत्रुओं की गणना करके तुलना करो। एक ओर शैतान और दुष्टों की शत्रुता है। दूसरी ओर तुम पर प्रभु यीशु मसीह की कृपा और मित्रता है। तुम्हारे शत्रु अधिक से अधिक तुम्हारी एड़ी ही को कुचल सकते हैं। वे ज़ोर से क्रोध कर सकते हैं और तुम्हारा नाश करने को जल-थल एक कर सकते हैं; परन्तु वे तुम्हें नष्ट नहीं कर सकते। तुम्हारा मित्र उन्हें जो उसके द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं पूरी रीति से उद्धार करने में समर्थ है। कोई भी उसकी भेड़ों को उसके हाथ से छीन नहीं सकेगा। लिखा है, "जो शरीर को घात करते हैं, और उसके बाद और कुछ नहीं कर सकते, उनसे मत डरो। मैं तुम्हें चेतावनी देता हूँ कि किससे डरना चाहिए: उस से डरो, जिसे घात करने के बाद नरक में डालने का अधिकार है; हाँ, मैं तुम से कहता हूँ, उसी से डरो।" (लूका 12:5)।

(घ) चौथी बात यह कि यदि तुम सच्चे मन के और पवित्र मसीही हो, तो वर्तमान जीवन और आनेवाले जीवन की गणना करके तुलना करो। वर्तमान समय निःसन्देह चैन का समय नहीं है। यह जागते रहने और प्रार्थना करने, लड़ने और जूझने, विश्वास करने और परिश्रम करने का समय है। परन्तु यह केवल थोड़े ही वर्षों के लिए है। आनेवाला समय विश्राम और ताज़गी का समय है। पाप निकाल दिया जाएगा। शैतान बाँध दिया जाएगा। और सबसे उत्तम बात यह कि वह विश्राम सदा के लिए होगा। लिखा है, "हमारा पल भर का हलका सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महान और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है; और हम तो देखी हुई वस्तुओं को नहीं, परन्तु अनदेखी वस्तुओं को देखते रहते हैं, क्योंकि देखी हुई वस्तुएँ थोड़े ही दिन की हैं, परन्तु अनदेखी वस्तुएँ सदा बनी रहती हैं।" (2 कुरिन्थियों 4:17, 18)।

(इ) एक और बात के लिए, यदि तुम सच्चे मन के और पवित्र मसीही हो, तो पाप के सुखों और परमेश्वर की सेवा के आनन्द को गिनकर उनकी तुलना करो। संसारी मनुष्य अपनी चाल से जो सुख पाता है वह खोखला, अवास्तविक और असन्तोषजनक है। वह काँटों की आग के समान है, जो कुछ क्षण चमकती और चटचटाती है, और फिर सदा के लिए बुझ जाती है। मसीह अपने लोगों को जो आनन्द देता है वह ठोस, स्थायी और सारपूर्ण है। वह स्वास्थ्य या परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करता। वह मनुष्य को कभी नहीं छोड़ता, मृत्यु में भी नहीं। उसका अन्त महिमा के उस मुकुट में होता है जो कभी मुर्झाता नहीं। लिखा है,—"भक्तिहीन की आनन्द क्षण भर का ही होता है।"—"मूर्ख का हँसना हाँडी के नीचे जलते हुए काँटों की चटचट के समान है।" (अय्यूब 20:5; सभोपदेशक 7:6।) परन्तु यह भी लिखा है,—"मैं तुम्हें शान्ति दिए जाता हूँ, अपनी शान्ति तुम्हें देता हूँ; जैसे संसार देता है, मैं तुम्हें नहीं देता: तुम्हारा मन न घबराए और न डरे।" (यूहन्ना 14:27।)

(ई) एक और बात के लिए, सच्चे मसीही जीवन में जो कष्ट उठाना पड़ता है, और कब्र के पार दुष्टों के लिए जो कष्ट रखे हैं, उन्हें गिनकर उनकी तुलना करो। क्षण भर के लिए मान लो कि बाइबल पढ़ने, प्रार्थना करने, मन फिराने, विश्वास करने और पवित्र जीवन जीने में परिश्रम और आत्म-त्याग की आवश्यकता होती है। फिर भी यह सब उस "आनेवाले क्रोध" के सामने कुछ भी नहीं जो पश्चातापहीन और अविश्वासी लोगों के लिए संचित है। नरक में बिताया गया एक ही दिन क्रूस उठाते हुए बिताए गए पूरे जीवन से बुरा होगा। "वह कीड़ा जो कभी नहीं मरता, और वह आग जो कभी नहीं बुझती"—इन्हें पूरी रीति से समझना या वर्णन करना मनुष्य की सामर्थ्य से परे है। लिखा है,—"हे पुत्र, स्मरण कर कि तू अपने जीवन में अपनी अच्छी वस्तुएँ पा चुका है, और वैसे ही लाज़र बुरी वस्तुएँ; परन्तु अब वह यहाँ शान्ति पा रहा है और तू तड़प रहा है।" (लूका 16:25।)

(उ) अन्त में, उनकी संख्या गिनकर तुलना करो जो पाप और संसार से फिरकर मसीह की सेवा करते हैं, और उनकी जो मसीह को छोड़कर संसार में लौट जाते हैं। एक ओर तुम हज़ारों को पाओगे;—दूसरी ओर किसी को नहीं। हर वर्ष असंख्य लोग चौड़े मार्ग से निकलकर सकरे मार्ग में प्रवेश करते हैं। जो सचमुच सकरे मार्ग में प्रवेश करते हैं, उनमें से कोई उससे थककर चौड़े मार्ग में नहीं लौटता। नीचे की ओर जानेवाले मार्ग में पैरों के चिह्न अकसर उससे बाहर मुड़ते दिखाई देते हैं। स्वर्ग के मार्ग में सब पदचिह्न एक ही दिशा में हैं। लिखा है,—"दुष्टों का मार्ग अन्धकारमय है।"—"विश्वासघातियों का मार्ग कठिन है।" (नीतिवचन 4:19; 13:15।) परन्तु यह भी लिखा है,—"धर्मियों की चाल भोर की ज्योति के समान है, जिसका प्रकाश दोपहर तक बढ़ता ही रहता है।" (नीतिवचन 4:18।)

निस्सन्देह ऐसे हिसाब अकसर सही नहीं किए जाते। मैं भली-भाँति जानता हूँ कि बहुत से लोग सदा "दो विचारों के बीच लँगड़ाते" रहते हैं। वे यह निश्चय नहीं कर पाते कि मसीह की सेवा करना उचित है। हानि और लाभ, सुविधा और असुविधा, दुःख और आनन्द, सहायता और बाधाएँ उन्हें इतनी बराबर तुली हुई लगती हैं कि वे परमेश्वर के पक्ष में निर्णय नहीं ले पाते। वे इस बड़े हिसाब को ठीक-ठीक नहीं कर पाते। वे परिणाम को उतना स्पष्ट नहीं कर पाते जितना होना चाहिए। उनकी गिनती सही नहीं बैठती।

परन्तु उनकी भूलों का रहस्य क्या है? विश्वास की कमी। अपनी आत्माओं के विषय में सही निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए हममें उस सामर्थी सिद्धान्त का कुछ अंश होना चाहिए जिसका वर्णन पौलुस ने इब्रानियों की पत्री के 11वें अध्याय में किया है। मैं यह दिखाने का प्रयास करता हूँ कि "मूल्य गिनने" के इस महान कार्य में वह सिद्धान्त कैसे काम करता है।

नूह जहाज़ बनाने में कैसे स्थिर रहा? वह पापियों और अविश्वासियों के संसार के बीच अकेला खड़ा था। उसे तिरस्कार, उपहास और ठट्ठा सहना पड़ा। उसकी भुजा को किसने बल दिया, और किसने उसे धीरज से काम करते रहने और यह सब सहने के योग्य बनाया? विश्वास ने। उसने आनेवाले क्रोध पर विश्वास किया। उसने विश्वास किया कि जिस जहाज़ को वह बना रहा है उसके सिवा और कहीं सुरक्षा नहीं है। विश्वास करके उसने संसार की राय को बहुत तुच्छ जाना। उसने विश्वास से "मूल्य गिन लिया" था, और उसे कोई सन्देह न था कि जहाज़ बनाना ही लाभ है।

मूसा ने फ़िरौन के घराने के सुखों को क्यों त्याग दिया, और फ़िरौन की बेटी का पुत्र कहलाने से क्यों इन्कार किया? उसने इब्रानियों जैसे तुच्छ जाने गए लोगों के साथ अपना भाग्य क्यों जोड़ा, और उन्हें दासत्व से छुड़ाने के महान कार्य में इस संसार की सब वस्तुओं को जोखिम में क्यों डाला? शारीरिक आँखों को तो वह सब कुछ खो रहा था और कुछ पा नहीं रहा था। उसे किसने प्रेरित किया? विश्वास ने। उसने विश्वास किया कि फ़िरौन से कहीं ऊपर एक है, जो उसे उसके सारे काम में सुरक्षित पार उतारेगा। उसने विश्वास किया कि "प्रतिफल" मिस्र के सब सम्मानों से कहीं उत्तम है। उसने विश्वास से "मूल्य गिन लिया", मानो "अदृश्य को देखता हुआ", और उसे निश्चय था कि मिस्र को छोड़कर जंगल में निकल जाना ही लाभ है।

फरीसी शाऊल ने मसीही बनने का निश्चय कैसे कर लिया? इस परिवर्तन का मूल्य और बलिदान भयंकर रूप से बड़ा था। उसने अपने ही लोगों के बीच अपनी सब उज्ज्वल सम्भावनाओं को त्याग दिया। मनुष्यों की कृपा के स्थान पर उसने अपने ऊपर मनुष्यों की घृणा, बैर और सताव, यहाँ तक कि मृत्यु तक, बुला ली। उसे यह सब सहने के योग्य किसने बनाया? विश्वास ने। उसने विश्वास किया कि यीशु, जो दमिश्क के मार्ग पर उससे मिला, उसे उस सब से सौ गुणा अधिक दे सकता है जो उसने छोड़ा, और आनेवाले संसार में अनन्त जीवन भी। विश्वास से उसने "मूल्य गिन लिया", और स्पष्ट देखा कि पलड़ा किस ओर भारी है। उसे दृढ़ विश्वास था कि मसीह का क्रूस उठाना ही लाभ है।

आओ, इन बातों पर भली-भाँति ध्यान दें। जिस विश्वास ने नूह, मूसा और पौलुस से वह सब करवाया जो उन्होंने किया, वही विश्वास अपनी आत्माओं के विषय में सही निष्कर्ष पर पहुँचने का बड़ा रहस्य है। जब हम सच्चा मसीही होने का मूल्य गिनने बैठें, तब वही विश्वास हमारा सहायक और तैयार गणक होना चाहिए। वही विश्वास माँगने से मिल सकता है। "वह और अधिक अनुग्रह देता है।" (याकूब 4:6।) उस विश्वास से सज्जित होकर हम वस्तुओं को उनके सच्चे मूल्य पर आँकेंगे। उस विश्वास से भरे होकर हम न क्रूस में कुछ बढ़ाएँगे, न मुकुट में से कुछ घटाएँगे। हमारे निष्कर्ष सब सही होंगे। हमारा कुल योग निर्दोष होगा।

(1) अन्त में, इस लेख का प्रत्येक पाठक गम्भीरता से विचार करे कि क्या उसके धर्म में उसे अभी कुछ भी खर्च करना पड़ता है। बहुत सम्भव है कि तुम्हें कुछ भी खर्च नहीं करना पड़ता। बहुत सम्भव है कि न तो तुम्हें इसमें कोई कष्ट उठाना पड़ता है, न समय देना पड़ता है, न विचार करना, न चिन्ता करनी पड़ती है, न परिश्रम, न पढ़ना, न प्रार्थना करना, न आत्म-त्याग, न संघर्ष, न काम, और न किसी प्रकार का श्रम। अब ध्यान दो कि मैं क्या कहता हूँ। ऐसा धर्म तुम्हारी आत्मा को कभी नहीं बचाएगा। वह जीवित रहते तुम्हें कभी शान्ति नहीं देगा, और मरते समय आशा भी नहीं देगा। वह दुःख के दिन में तुम्हें सम्भाल नहीं सकेगा, और मृत्यु की घड़ी में तुम्हें ढाढ़स नहीं देगा। जिस धर्म में कुछ खर्च नहीं होता, वह कुछ भी मूल्य का नहीं। बहुत देर होने से पहले जाग उठो। जागो और मन फिराओ। जागो और परिवर्तित हो जाओ। जागो और विश्वास करो। जागो और प्रार्थना करो। जब तक तुम मेरे प्रश्न का सन्तोषजनक उत्तर न दे सको, "इसमें क्या खर्च होता है?", तब तक चैन न लो।

(2) यदि परमेश्वर की सेवा करने के लिए तुम्हें उभारनेवाले कारण चाहिए, तो यह सोचो कि तुम्हारी आत्मा के लिए उद्धार का प्रबन्ध करने में कितना मूल्य चुकाना पड़ा। सोचो कि परमेश्वर के पुत्र ने स्वर्ग को छोड़कर मनुष्य का रूप धारण किया, क्रूस पर दुःख उठाया और कब्र में पड़ा रहा, ताकि परमेश्वर को तुम्हारा ऋण चुकाए और तुम्हारे लिए पूर्ण छुटकारा सिद्ध करे। यह सब सोचो और जानो कि अमर आत्मा का स्वामी होना कोई छोटी बात नहीं है। अपनी आत्मा के विषय में कुछ कष्ट उठाना उचित है।

हे आलसी पुरुष या स्त्री, क्या सचमुच यहाँ तक नौबत आ गई है कि तुम परिश्रम की कमी के कारण स्वर्ग को खो दोगे? क्या तुम सचमुच केवल परिश्रम से अरुचि के कारण सदा के लिए जहाज़ डुबो देने पर तुले हुए हो? इस कायर और अनुचित विचार को दूर करो। उठो और पुरुषार्थ दिखाओ। अपने से कहो,

"चाहे इसमें कितना भी खर्च हो, मैं किसी न किसी प्रकार सकेत फाटक से प्रवेश करने का यत्न अवश्य करूँगा।" मसीह के क्रूस की ओर देखो और नया साहस लो। मृत्यु, न्याय और अनन्तकाल की ओर आगे दृष्टि करो और गम्भीर बनो। मसीही होने में बहुत खर्च हो सकता है, परन्तु निश्चय जानो कि यह लाभ का सौदा है।

(3) यदि इस लेख के किसी पाठक को सचमुच लगता है कि उसने मूल्य का हिसाब लगा लिया है और क्रूस उठा लिया है, तो मैं उससे कहता हूँ कि डटे रहो और आगे बढ़ते जाओ। मैं कह सकता हूँ कि तुम्हारा हृदय अकसर मूर्छित होता होगा और निराश होकर छोड़ देने का बड़ा प्रलोभन होता होगा। तुम्हारे शत्रु इतने अधिक, तुम्हारे घेरनेवाले पाप इतने प्रबल, तुम्हारे मित्र इतने थोड़े, और मार्ग इतना चढ़ाईवाला और सकेत प्रतीत होता है कि तुम्हें समझ नहीं आता कि क्या करो। फिर भी मैं कहता हूँ, डटे रहो और आगे बढ़ते जाओ।

समय बहुत थोड़ा है। चौकसी और प्रार्थना के कुछ और वर्ष, इस संसार के समुद्र पर कुछ और थपेड़े, कुछ और मृत्युएँ और परिवर्तन, कुछ और जाड़े और गर्मियाँ, और सब समाप्त हो जाएगा। हम अपनी अन्तिम लड़ाई लड़ चुके होंगे और हमें फिर लड़ने की आवश्यकता न रहेगी।

मसीह की उपस्थिति और संगति यहाँ पृथ्वी पर हमारे सब दुःखों की क्षतिपूर्ति कर देगी। जब हम वैसा ही देखेंगे जैसे हम देखे गए हैं, और जीवन की यात्रा पर पीछे दृष्टि डालेंगे, तो अपने हृदय की दुर्बलता पर आश्चर्य करेंगे। हम चकित होंगे कि हमने अपने क्रूस को इतना बड़ा समझा और अपने मुकुट को इतना तुच्छ। हम चकित होंगे कि "मूल्य का हिसाब लगाते" समय हम कभी सन्देह कर सके कि लाभ का पलड़ा किस ओर भारी है। आओ, हम साहस बाँधें। हम घर से दूर नहीं हैं। सच्चा मसीही और निरन्तर पवित्र मनुष्य होने में बहुत खर्च हो सकता है; परन्तु यह लाभ का सौदा है।

VI. वृद्धि

"हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के अनुग्रह और ज्ञान में बढ़ते जाओ।"—2 पतरस 3:18

इस पृष्ठ के शीर्ष पर दिए गए पद का विषय ऐसा है जिसे पवित्रता पर लिखी इस पुस्तक में छोड़ देने का साहस मैं नहीं कर सकता। यह प्रत्येक सच्चे मसीही के लिए गहरी रुचि का विषय होना चाहिए। यह स्वाभाविक रूप से ये प्रश्न उठाता है: क्या हम अनुग्रह में बढ़ते हैं? क्या हम अपने धर्म में आगे बढ़ते हैं? क्या हम उन्नति करते हैं?

केवल औपचारिक मसीही से मैं यह आशा नहीं कर सकता कि यह प्रश्न उसे ध्यान देने योग्य लगे। जिस मनुष्य के पास रविवार के धर्म जैसी कोई वस्तु मात्र है,—जिसका मसीही धर्म उसके रविवारवाले वस्त्रों के समान है, जो सप्ताह में एक बार पहन लिए जाते हैं और फिर उतारकर रख दिए जाते हैं,—ऐसे मनुष्य से यह आशा नहीं की जा सकती कि वह "अनुग्रह में बढ़ने" की परवाह करे। वह ऐसी बातों के विषय में कुछ नहीं जानता। "वे उसकी दृष्टि में मूर्खता हैं।" (1 कुरिन्थियों 2:14।) परन्तु जो कोई अपनी आत्मा के विषय में सचमुच गम्भीर है, और आत्मिक जीवन का भूखा और प्यासा है, उसके लिए यह प्रश्न खोज लेनेवाले बल के साथ सामने आना चाहिए। क्या हम अपने धर्म में उन्नति करते हैं? क्या हम बढ़ते हैं?

यह प्रश्न सदा उपयोगी है, परन्तु कुछ विशेष अवसरों पर विशेष रूप से। शनिवार की रात, प्रभु-भोज का रविवार, जन्मदिन का लौटना, वर्ष का अन्त,—ये सब ऐसे अवसर हैं जो हमें सोचने को प्रेरित करें और भीतर झाँकने को विवश करें। समय तेज़ी से उड़ रहा है। जीवन तेज़ी से घटता जा रहा है। वह घड़ी प्रतिदिन निकट आ रही है जब हमारे मसीही धर्म की वास्तविकता परखी जाएगी, और यह देखा जाएगा कि हमने "चट्टान" पर नींव डाली है या "रेत" पर। निश्चय ही हमारे लिए उचित है कि हम समय-समय पर अपने आप को जाँचें और अपनी आत्मा का लेखा लें? क्या हम आत्मिक बातों में आगे बढ़ते हैं? क्या हम बढ़ते हैं?

यह प्रश्न आज के दिनों में विशेष महत्त्व रखता है। सिद्धान्त के कुछ विषयों पर, और अन्य बातों के साथ "अनुग्रह में वृद्धि" के विषय पर, जो सच्ची पवित्रता का एक अनिवार्य अंग है, मनुष्यों के मन में कच्चे और विचित्र मत घूम रहे हैं। कुछ लोग उसे पूरी तरह नकारते हैं। कुछ उसे समझा-बुझाकर घटाते-घटाते कुछ भी नहीं रहने देते। हज़ारों उसे गलत समझते हैं, और इसलिए उसकी उपेक्षा करते हैं। ऐसे दिन में मसीही वृद्धि के पूरे विषय को सीधे और खुलकर देखना उपयोगी है।

इस विषय पर विचार करते हुए मैं तीन बातें सामने रखकर स्थापित करना चाहता हूँ:—

I. आत्मिक वृद्धि की वास्तविकता। "अनुग्रह में वृद्धि" नाम की वस्तु होती है।

II. आत्मिक वृद्धि के चिह्न। ऐसे चिह्न हैं जिनसे "अनुग्रह में वृद्धि" पहचानी जा सकती है।

III. आत्मिक वृद्धि के साधन। ऐसे साधन हैं जिन्हें उन लोगों को काम में लाना चाहिए जो "अनुग्रह में वृद्धि" चाहते हैं।

मैं नहीं जानता कि तुम कौन हो, जिसके हाथ में यह लेख पड़ा है। परन्तु इसकी विषय-वस्तु पर तुम्हारा पूरा ध्यान माँगने में मुझे लज्जा नहीं। मेरा विश्वास करो, यह विषय केवल अटकल और वाद-विवाद की बात नहीं है। यदि धर्म में कोई विषय अत्यन्त व्यावहारिक है, तो यह वही है। यह "पवित्रीकरण" के पूरे प्रश्न से घनिष्ठ और अटूट रूप से जुड़ा हुआ है। सच्चे पवित्र लोगों का एक प्रमुख चिह्न यह है कि वे बढ़ते हैं। प्रत्येक सच्चे हृदयवाले और पवित्र मसीही का आत्मिक स्वास्थ्य और समृद्धि, आत्मिक आनन्द और शान्ति, आत्मिक वृद्धि के विषय से घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई है।

I. पहली बात जिसे मैं प्रमाणित करना चाहता हूँ यह है: अनुग्रह में बढ़ना एक वास्तविकता है

कि कोई मसीही इस कथन का इनकार करे, यह पहली दृष्टि में एक विचित्र और शोकजनक बात है। परन्तु यह स्मरण रखना उचित है कि मनुष्य की बुद्धि भी उसकी इच्छा के समान ही भ्रष्ट हो चुकी है। सिद्धान्तों के विषय में मतभेद प्रायः शब्दों के अर्थ के मतभेद से अधिक कुछ नहीं होते। मैं आशा रखने का प्रयत्न करता हूँ कि वर्तमान प्रसंग में भी यही बात है। मैं यह विश्वास करने का प्रयत्न करता हूँ कि जब मैं "अनुग्रह में बढ़ने" की बात कहता हूँ और उसका समर्थन करता हूँ, तब मेरा आशय कुछ और होता है, और जो भाई इसका इनकार करते हैं उनका आशय कुछ और। इसलिए मार्ग साफ़ करने के लिए मुझे अपना अर्थ स्पष्ट कर देने दीजिए।

जब मैं "अनुग्रह में बढ़ने" की बात करता हूँ, तब मेरा यह आशय क्षण भर के लिए भी नहीं है कि मसीह में विश्वासी का हिस्सा बढ़ सकता है। मेरा यह आशय नहीं है कि वह सुरक्षा, परमेश्वर के सामने ग्रहणयोग्यता या निश्चिन्तता में बढ़ सकता है। मेरा यह आशय नहीं है कि वह कभी उससे अधिक धर्मी ठहराया गया, उससे अधिक क्षमा किया गया, उससे अधिक माफ़ किया गया, या परमेश्वर के साथ उससे अधिक शान्ति में हो सकता है जितना वह विश्वास करने के पहले ही क्षण में होता है। मैं दृढ़ता से मानता हूँ कि विश्वासी का धर्मी ठहराया जाना एक समाप्त, सिद्ध और पूर्ण कार्य है; और दुर्बलतम सन्त भी, चाहे वह इसे न जाने और न अनुभव करे, उतना ही पूर्ण रीति से धर्मी ठहराया गया है जितना सबसे सबल सन्त। मैं दृढ़ता से मानता हूँ कि हमारे चुनाव, बुलाहट और मसीह में हमारी स्थिति में न कोई श्रेणी है, न वृद्धि, न घटी। यदि कोई यह सपना देखे कि "अनुग्रह में बढ़ने" से मेरा आशय धर्मी ठहराए जाने में बढ़ना है, तो वह लक्ष्य से बिलकुल दूर है, और जिस पूरे विषय पर मैं विचार कर रहा हूँ उसके विषय में पूरी तरह भूल में है। परमेश्वर की सहायता से मैं उस महिमामय सत्य के लिए सूली पर चढ़ने को तैयार हूँ कि परमेश्वर के सामने धर्मी ठहराए जाने के विषय में हर विश्वासी "मसीह में सिद्ध" है। (कुलुस्सियों 2:10।) जिस क्षण से वह विश्वास करता है, उसके धर्मी ठहराए जाने में न कुछ जोड़ा जा सकता है, न कुछ घटाया जा सकता है।

जब मैं "अनुग्रह में बढ़ने" की बात करता हूँ तब मेरा आशय केवल उन गुणों की मात्रा, परिमाण, बल, तेज और सामर्थ्य में वृद्धि से है जिन्हें पवित्र आत्मा विश्वासी के हृदय में बोता है। मैं मानता हूँ कि इनमें से हर एक गुण बढ़ सकता है, उन्नति कर सकता है और वृद्धि पा सकता है। मैं मानता हूँ कि मन फिराव, विश्वास, आशा, प्रेम, दीनता, उत्साह, साहस और ऐसे ही अन्य गुण छोटे या बड़े, सबल या निर्बल, तेजस्वी या क्षीण हो सकते हैं, और एक ही मनुष्य में उसके जीवन की भिन्न अवस्थाओं में बहुत भिन्न हो सकते हैं। जब मैं कहता हूँ कि कोई मनुष्य "अनुग्रह में बढ़ रहा है", तब मेरा आशय केवल यह है कि उसका पाप-बोध गहरा हो रहा है, उसका विश्वास दृढ़ हो रहा है, उसकी आशा उज्ज्वल हो रही है, उसका प्रेम अधिक विस्तृत हो रहा है, उसकी आत्मिक-मानसिकता अधिक प्रत्यक्ष हो रही है। वह अपने हृदय में भक्ति की सामर्थ्य को अधिक अनुभव करता है। वह अपने जीवन में उसे अधिक प्रकट करता है। वह बल पर बल पाता, विश्वास से विश्वास में और अनुग्रह पर अनुग्रह पाता आगे बढ़ता जा रहा है। ऐसे मनुष्य की दशा का वर्णन दूसरे जिन शब्दों में चाहें करें, यह उनकी इच्छा पर छोड़ता हूँ। मेरे विचार में उसका सबसे सच्चा और उत्तम वर्णन यही है,—वह "अनुग्रह में बढ़ रहा है"।

"अनुग्रह में बढ़ने" के इस सिद्धान्त का एक मुख्य आधार पवित्रशास्त्र की सीधी भाषा है। यदि बाइबल के शब्दों का कुछ अर्थ है, तो "बढ़ना" नाम की एक बात है, और विश्वासियों को "बढ़ने" की चेतावनी दी जानी चाहिए।—पौलुस क्या कहता है? "तुम्हारा विश्वास बहुत बढ़ता जाता है।" (2 थिस्सलुनीकियों 1:3।) "हम तुम से विनती करते हैं कि और भी बढ़ते जाओ।" (1 थिस्सलुनीकियों 4:10।) "परमेश्वर की पहचान में बढ़ते जाओ।" (कुलुस्सियों 1:10।) "आशा है कि जब तुम्हारा विश्वास बढ़ेगा।" (2 कुरिन्थियों 10:15।) "प्रभु ऐसा करे कि तुम्हारा प्रेम बढ़ता जाए।" (1 थिस्सलुनीकियों 3:12।) "कि हम सब बातों में उस में बढ़ते जाएँ।" (इफिसियों 4:15।) "मैं प्रार्थना करता हूँ कि तुम्हारा प्रेम और भी बढ़ता जाए।" (फिलिप्पियों 1:9।) "हम तुम से विनती करते हैं कि जैसे तुम ने हम से सीखा कि किस रीति से चलना और परमेश्वर को प्रसन्न करना चाहिए, वैसे ही और भी बढ़ते जाओ।" (1 थिस्सलुनीकियों 4:1।)—पतरस क्या कहता है? "वचन के निर्मल दूध की लालसा करो, कि उसके द्वारा तुम बढ़ते जाओ।" (1 पतरस 2:2।) "हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के अनुग्रह और ज्ञान में बढ़ते जाओ।" (2 पतरस 3:18।) दूसरे ऐसे पदों के विषय में क्या सोचते हैं, मैं नहीं जानता। मुझे तो ये उस सिद्धान्त को स्थापित करते दिखते हैं जिसके लिए मैं तर्क कर रहा हूँ, और इनकी कोई दूसरी व्याख्या सम्भव नहीं। अनुग्रह में बढ़ना बाइबल में सिखाया गया है। मैं यहीं रुककर और कुछ न कहूँ तो भी चल सकता है।

तथापि दूसरा आधार, जिस पर मैं "अनुग्रह में बढ़ने" के सिद्धान्त को खड़ा करता हूँ, तथ्य और अनुभव का आधार है। मैं नए नियम के किसी भी ईमानदार पाठक से पूछता हूँ कि क्या वह नए नियम के उन सन्तों में, जिनका इतिहास लिखा गया है, अनुग्रह की श्रेणियाँ दोपहर के सूर्य के समान स्पष्ट नहीं देख सकता?—मैं उससे पूछता हूँ कि क्या वह उन्हीं व्यक्तियों में एक समय और दूसरे समय के उनके विश्वास और ज्ञान के बीच उतना ही बड़ा अन्तर नहीं देख सकता जितना एक ही मनुष्य के शैशव और प्रौढ़ अवस्था के बल में होता है?—मैं उससे पूछता हूँ कि क्या पवित्रशास्त्र अपनी भाषा में इसे स्पष्ट रूप से स्वीकार नहीं करता, जब वह "निर्बल" विश्वास और "सबल" विश्वास की चर्चा करता है, और मसीहियों को "नवजात शिशु", "बालक", "जवान" और "पिता" कहता है? (1 पतरस 2:2; 1 यूहन्ना 2:12–14।) सबसे बढ़कर मैं उससे पूछता हूँ कि क्या आज के विश्वासियों का उसका अपना अवलोकन भी उसे इसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचाता?—कौन सच्चा मसीही यह स्वीकार नहीं करेगा कि उसके प्रथम मन फिराव के समय के उसके विश्वास और ज्ञान की मात्रा तथा आज की उसकी उपलब्धियों में उतना ही अन्तर है जितना एक पौधे और पूरे बढ़े हुए वृक्ष में? उसके गुण मूल रूप में वही हैं: परन्तु वे बढ़ गए हैं। दूसरों को ये तथ्य कैसे लगते हैं, मैं नहीं जानता: मेरी दृष्टि में वे अत्यन्त अकाट्य रीति से प्रमाणित करते हैं कि "अनुग्रह में बढ़ना" एक वास्तविक बात है।

अपने विषय के इस भाग पर इतनी देर रुकने में मुझे लगभग लज्जा आती है। वास्तव में, यदि कोई मनुष्य यह कहना चाहता है कि नए मन फिराए हुए व्यक्ति का विश्वास, आशा, ज्ञान और पवित्रता पुराने स्थापित विश्वासी के समान सबल है, और उसमें वृद्धि की आवश्यकता नहीं, तो और तर्क करना समय गँवाना है। निस्सन्देह वे उतने ही वास्तविक हैं, परन्तु उतने सबल नहीं,—उतने ही सच्चे, परन्तु उतने तेजस्वी नहीं,—आत्मा के बोए हुए बीज होने में उतने ही, परन्तु अभी उतने फलवन्त नहीं। और यदि कोई पूछे कि वे कैसे अधिक सबल हों, तो मैं कहता हूँ कि यह उसी प्रक्रिया से होगा जिससे जीवनयुक्त सब वस्तुएँ बढ़ती हैं,—उन्हें बढ़ना होगा। और "अनुग्रह में बढ़ने" से मेरा यही आशय है।*

आइए, जिन बातों की मैं चर्चा करता आया हूँ उनसे हटकर, अपने सामने के इस महान विषय को एक अधिक व्यावहारिक दृष्टि से देखें। मैं चाहता हूँ कि लोग "अनुग्रह में बढ़ने" को आत्मा के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात के रूप में देखें। दूसरे चाहे कुछ भी सोचें, मेरा विश्वास है कि हमारे सर्वोत्तम हित इसी प्रश्न के सही दृष्टिकोण से जुड़े हैं—क्या हम बढ़ रहे हैं?

(क) तो आइए जान लें कि "अनुग्रह में बढ़ना" आत्मिक स्वास्थ्य और समृद्धि का सर्वोत्तम प्रमाण है। किसी बालक, फूल या वृक्ष में हम सब जानते हैं कि जब बढ़वार नहीं होती तो कहीं कुछ गड़बड़ है। किसी पशु या पौधे का स्वस्थ जीवन सदा उन्नति और वृद्धि से प्रकट होता है। हमारी आत्माओं के विषय में भी ठीक यही बात है। यदि वे उन्नति कर रही हैं और भली-भाँति चल रही हैं तो वे बढ़ेंगी।†

(ख) इसके अतिरिक्त यह भी जान लें कि "अनुग्रह में बढ़ना" अपने धर्म में सुखी रहने का एक मार्ग है। परमेश्वर ने बुद्धिमानी से हमारे सुख-चैन और हमारी पवित्रता की वृद्धि को आपस में जोड़ रखा है। उसने अनुग्रहपूर्वक यह हमारे हित में रखा है कि हम आगे बढ़ें और अपने मसीही जीवन में ऊँचा लक्ष्य रखें। एक विश्वासी को अपने धर्म में जितना अनुभव होनेवाला आनन्द मिलता है, वह दूसरे विश्वासी की तुलना में बहुत भिन्न होता है। परन्तु निश्चय जानिए कि सामान्यतः जो मनुष्य "विश्वास करने में आनन्द और शान्ति" सबसे अधिक अनुभव करता है, और जिसके हृदय में आत्मा की गवाही सबसे स्पष्ट है, वह वही है जो बढ़ता है।

(ग) इसके अतिरिक्त यह भी जान लें कि "अनुग्रह में बढ़ना" दूसरों के लिए उपयोगी होने का एक भेद है। दूसरों पर हमारा भला प्रभाव बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि वे हम में क्या देखते हैं। संसार के लोग मसीही धर्म को जितना कानों से नहीं परखते उतना आँखों से परखते हैं। जो मसीही सदा एक ही स्थान पर ठहरा रहता है, देखने में वही मनुष्य, वही छोटी-छोटी त्रुटियाँ, कमज़ोरियाँ, वही फँसानेवाले पाप और तुच्छ दुर्बलताएँ लिए हुए, वह शायद ही कभी बहुत भलाई करनेवाला मसीही होता है। जो मनुष्य मनों को झकझोरता है, हिलाता है और संसार को सोचने पर विवश करता है, वह वही विश्वासी है जो निरन्तर सुधरता और आगे बढ़ता जाता है। जब लोग बढ़वार देखते हैं तो समझते हैं कि वहाँ जीवन और वास्तविकता है।*

(घ) इसके अतिरिक्त यह भी जान लें कि "अनुग्रह में बढ़ने" से परमेश्वर प्रसन्न होता है। निस्सन्देह यह आश्चर्य की बात लग सकती है कि हम जैसे प्राणियों का किया हुआ कोई कार्य परमप्रधान परमेश्वर को आनन्द दे सके। परन्तु बात ऐसी ही है। पवित्रशास्त्र "परमेश्वर को प्रसन्न करने" के लिए चलने की बात कहता है।

पवित्रशास्त्र कहता है कि कुछ बलिदान ऐसे हैं जिनसे "परमेश्वर प्रसन्न होता है।" (1 थिस्सलुनीकियों 4:1; इब्रानियों 13:16।) किसान को यह देखकर आनन्द होता है कि जिन पौधों पर उसने परिश्रम किया है वे फल-फूल रहे हैं और फल ला रहे हैं। उन्हें ठिठुरा हुआ और एक ही स्थिति में रुका हुआ देखकर वह निराश और दुखी हुए बिना नहीं रह सकता। अब हमारा प्रभु स्वयं क्या कहता है? "सच्ची दाखलता मैं हूँ; और मेरा पिता किसान है।"—"मेरे पिता की महिमा इसी से होती है कि तुम बहुत सा फल लाओ, तब ही तुम मेरे चेले ठहरोगे।" (यूहन्ना 15:1, 8।) प्रभु अपने सब लोगों से प्रसन्न रहता है,—पर विशेष करके उनसे जो बढ़ते हैं।

(ङ) सबसे बढ़कर यह जान लें कि "अनुग्रह में बढ़ना" केवल सम्भव ही नहीं, वरन् ऐसी बात है जिसके लिए विश्वासी उत्तरदायी हैं। किसी अपरिवर्तित मनुष्य से, जो पापों में मरा हुआ है, यह कहना कि "अनुग्रह में बढ़ो," निस्सन्देह निरर्थक होगा। परन्तु किसी विश्वासी से, जो जिलाया गया है और परमेश्वर के लिए जीवित है, यह कहना कि बढ़ो, उसे पवित्रशास्त्र के एक स्पष्ट कर्तव्य के लिए बुलाना मात्र है। उसके भीतर एक नया सिद्धान्त है, और उसे बुझाना न देना उसका गम्भीर कर्तव्य है। बढ़ने की उपेक्षा उसे विशेषाधिकारों से वंचित करती है, पवित्र आत्मा को दुखी करती है, और उसकी आत्मा के रथ के पहियों को भारी बना देती है। मैं जानना चाहूँगा कि यदि कोई विश्वासी अनुग्रह में नहीं बढ़ता तो दोष किसका है? मुझे निश्चय है कि दोष परमेश्वर पर नहीं लगाया जा सकता। वह तो "और अनुग्रह देने" में प्रसन्न रहता है; वह "अपने दास के कुशल से प्रसन्न होता है।" (याकूब 4:6; भजन संहिता 35:27।) दोष निस्सन्देह हमारा अपना है। यदि हम नहीं बढ़ते तो हम ही दोषी हैं, और कोई नहीं।

II. दूसरी बात जो मैंने प्रमाणित करने का प्रस्ताव रखा था, वह यह है: ऐसे चिन्ह हैं जिनसे अनुग्रह में बढ़ना जाना जा सकता है

मैं मान लेता हूँ कि हम अनुग्रह में बढ़ने की वास्तविकता और उसके अत्यधिक महत्त्व पर कोई शंका नहीं करते।—यहाँ तक तो ठीक है। परन्तु अब आप जानना चाहते हैं कि कोई कैसे पता लगाए कि वह अनुग्रह में बढ़ रहा है या नहीं? इस प्रश्न का उत्तर मैं पहले तो यह कहकर देता हूँ कि हम अपनी अवस्था के बहुत ही कमज़ोर निर्णायक हैं, और देखनेवाले प्रायः हमें हमसे अधिक भली-भाँति जानते हैं। परन्तु आगे यह भी उत्तर देता हूँ कि अनुग्रह में बढ़ने के निस्सन्देह कुछ बड़े चिन्ह और लक्षण हैं, और जहाँ कहीं आप ये चिन्ह देखें वहाँ आप "बढ़ती हुई" आत्मा को देखते हैं। अब मैं इनमें से कुछ चिन्ह क्रम से आपके सामने रखता हूँ।

(क) "अनुग्रह में बढ़ने" का एक चिन्ह बढ़ती हुई दीनता है। जिस मनुष्य की आत्मा "बढ़ रही" है, वह हर वर्ष अपनी पापमयता और अयोग्यता को और अधिक अनुभव करता है। वह अय्यूब के साथ कहने को तैयार रहता है, "मैं तो नीच हूँ,"—और अब्राहम के साथ, मैं तो "मिट्टी और राख" हूँ,—और याकूब के साथ, "मैं तेरी सब दया के कामों में से कुछ के भी योग्य नहीं,"—और दाऊद के साथ, "मैं कीड़ा हूँ,"—और यशायाह के साथ, "मैं अशुद्ध होंठवाला मनुष्य हूँ,"—और पतरस के साथ, "हे प्रभु, मैं पापी मनुष्य हूँ।" (अय्यूब 40:4; उत्पत्ति 18:27; 32:10; भजन संहिता 22:6; यशायाह 6:5; लूका 5:8।) वह परमेश्वर के जितना निकट आता है, और परमेश्वर की पवित्रता और सिद्धताओं को जितना अधिक देखता है, उतना ही अधिक वह अपनी असंख्य अपूर्णताओं के प्रति सचेत होता जाता है। स्वर्ग के मार्ग पर वह जितना आगे बढ़ता है, उतना ही अधिक समझता है कि पौलुस का क्या अर्थ था जब उसने कहा, "मैं सिद्ध हो चुका हूँ," ऐसा नहीं,—"मैं प्रेरित कहलाने के योग्य भी नहीं,"—"मैं सब पवित्र लोगों में से छोटे से भी छोटा हूँ,"—"मैं सब पापियों में सबसे बड़ा हूँ।" (फिलिप्पियों 3:12; 1 कुरिन्थियों 15:9; इफिसियों 3:8; 1 तीमुथियुस 1:15।) महिमा के लिए वह जितना पका हुआ होता है, पकी हुई बाली की नाईं उतना ही अधिक अपना सिर झुकाता है। उसका प्रकाश जितना उजला और स्पष्ट होता है, उतना ही अधिक वह अपने हृदय की कमियों और दुर्बलताओं को देखता है। जब वह पहले-पहल परिवर्तित हुआ था, तब वह आपसे कहेगा कि उसने उन्हें अब की तुलना में बहुत थोड़ा देखा था। क्या कोई जानना चाहता है कि वह अनुग्रह में बढ़ रहा है या नहीं? निश्चित रहिए कि आप भीतर बढ़ी हुई दीनता को खोजें।*

(ख) "अनुग्रह में बढ़ने" का एक और चिह्न है हमारे प्रभु यीशु मसीह के प्रति बढ़ता हुआ विश्वास और प्रेम। जिस मनुष्य की आत्मा "बढ़ रही" है, वह हर वर्ष मसीह में अधिक पाता है जिस पर वह भरोसा कर सके, और इस बात से अधिक आनन्दित होता है कि उसके पास ऐसा उद्धारकर्ता है। इसमें सन्देह नहीं कि जब उसने पहले-पहल विश्वास किया तब उसने उसमें बहुत कुछ देखा था। उसके विश्वास ने मसीह के प्रायश्चित को थाम लिया और उसे आशा दी।—परन्तु जैसे-जैसे वह अनुग्रह में बढ़ता है, वह मसीह में हज़ारों ऐसी बातें देखता है जिनका आरम्भ में उसे स्वप्न में भी ध्यान न था। उसका प्रेम और सामर्थ्य,—उसका हृदय और उसके अभिप्राय,—प्रतिनिधि, मध्यस्थ, महायाजक, पक्षसमर्थक, वैद्य, चरवाहे और मित्र के रूप में उसके पद, बढ़ती हुई आत्मा पर अवर्णनीय रीति से प्रकट होते जाते हैं। संक्षेप में, वह अपनी आत्मा की आवश्यकताओं के लिए मसीह में ऐसी उपयुक्तता पाता है जिसका आधा भाग भी पहले उसे मालूम न था। यदि कोई जानना चाहे कि वह अनुग्रह में बढ़ रहा है या नहीं, तो वह अपने भीतर देखे कि मसीह का ज्ञान बढ़ा है या नहीं।

(ग) "अनुग्रह में बढ़ने" का एक और चिह्न है जीवन और आचरण की बढ़ती हुई पवित्रता। जिस मनुष्य की आत्मा "बढ़ रही" है, वह हर वर्ष पाप, संसार और शैतान पर अधिक अधिकार पाता है। वह अपने स्वभाव, अपनी बातों और अपने कामों के विषय में अधिक सावधान हो जाता है। वह जीवन के हर सम्बन्ध में अपने आचरण पर अधिक चौकसी रखता है। वह सब बातों में मसीह के स्वरूप के अनुरूप होने का अधिक प्रयत्न करता है, और जैसे अपने उद्धारकर्ता के रूप में उस पर भरोसा रखता है वैसे ही अपने आदर्श के रूप में उसके पीछे चलता है। वह पुरानी प्राप्तियों और पिछले अनुग्रह से सन्तुष्ट नहीं होता। वह पीछे की बातों को भूलकर आगे की बातों की ओर बढ़ता जाता है, और "ऊँचे!" "ऊपर!" "आगे!" "और आगे!"—यही उसका निरन्तर आदर्श-वाक्य बन जाता है। (फिलिप्पियों 3:13)। पृथ्वी पर वह प्यासा है और चाहता है कि उसकी इच्छा परमेश्वर की इच्छा से और भी पूरी रीति से मेल खाए। स्वर्ग में मसीह की उपस्थिति के बाद वह जिस बात की सबसे अधिक बाट जोहता है, वह है सब पाप से पूर्ण रूप से अलग हो जाना। यदि कोई जानना चाहे कि वह अनुग्रह में बढ़ रहा है या नहीं, तो वह अपने भीतर देखे कि पवित्रता बढ़ी है या नहीं।*

(घ) "अनुग्रह में बढ़ने" का एक और चिह्न है रुचि और मन की बढ़ती हुई आत्मिकता। जिस मनुष्य की आत्मा "बढ़ रही" है, वह हर वर्ष आत्मिक बातों में अधिक रुचि लेता है। वह संसार में अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करता। वह घर में हो या बाहर, जीवन के हर सम्बन्ध को विश्वासयोग्यता, परिश्रम और विवेक के साथ निभाता है। परन्तु जिन बातों से वह सबसे अधिक प्रेम रखता है वे आत्मिक बातें हैं। संसार के चलन, रीतियाँ, मनोरंजन और आमोद-प्रमोद उसके हृदय में निरन्तर घटता हुआ स्थान रखते हैं। वह उन्हें सरासर पाप नहीं ठहराता, और न यह कहता है कि जो उनसे कुछ सम्बन्ध रखते हैं वे नरक में जा रहे हैं। वह केवल इतना अनुभव करता है कि उसके अपने मन पर उनकी पकड़ निरन्तर घटती जा रही है, और वे धीरे-धीरे उसकी दृष्टि में छोटे और तुच्छ दिखाई देने लगते हैं। आत्मिक साथी, आत्मिक कार्य और आत्मिक वार्तालाप उसके लिए सदा बढ़ते हुए मूल्य के प्रतीत होते हैं। यदि कोई जानना चाहे कि वह अनुग्रह में बढ़ रहा है या नहीं, तो वह अपने भीतर देखे कि रुचि की आत्मिकता बढ़ी है या नहीं।*

(ङ) "अनुग्रह में बढ़ने" का एक और चिह्न है प्रेम की वृद्धि। जिस मनुष्य की आत्मा "बढ़ रही" है, वह हर वर्ष प्रेम से अधिक भरपूर होता जाता है,—सब मनुष्यों के प्रति प्रेम से, परन्तु विशेष करके भाइयों के प्रति प्रेम से। उसका प्रेम सक्रिय रूप में इस बढ़ती हुई प्रवृत्ति में प्रकट होगा कि वह भलाई करे, दूसरों के लिए कष्ट उठाए, सब से सज्जनता का व्यवहार करे, उदार, सहानुभूतिपूर्ण, विचारशील, कोमल-हृदय और दयालु हो। निष्क्रिय रूप में वह इस बढ़ती हुई प्रवृत्ति में प्रकट होगा कि वह सब मनुष्यों के प्रति नम्र और धीरजवन्त हो, उकसाए जाने पर सह ले और अपने अधिकारों पर अड़ा न रहे, झगड़ने की अपेक्षा बहुत कुछ सह ले और छोड़ दे। बढ़ती हुई आत्मा दूसरों के आचरण का भला अर्थ लगाने का प्रयत्न करेगी, और अन्त तक सब बातों की प्रतीति और सब बातों की आशा रखेगी। पीछे हटने और अनुग्रह में घटने का इससे निश्चित चिह्न और कोई नहीं कि दोष निकालने, छिद्र ढूँढ़ने और दूसरों की निर्बलताएँ देखने की प्रवृत्ति बढ़ती जाए। यदि कोई जानना चाहे कि वह अनुग्रह में बढ़ रहा है या नहीं, तो वह अपने भीतर देखे कि प्रेम बढ़ा है या नहीं।

(च) "अनुग्रह में बढ़ने" का एक और चिह्न है आत्माओं की भलाई करने के प्रयत्न में बढ़ती हुई धुन और परिश्रम। जो मनुष्य सचमुच "बढ़ रहा" है, वह हर वर्ष पापियों के उद्धार में अधिक रुचि लेगा। देश-विदेश में मिशन, सुसमाचार फैलाने के हर प्रकार के प्रयास, धार्मिक ज्योति बढ़ाने और धार्मिक अन्धकार घटाने के किसी भी प्रकार के यत्न,—ये सब बातें हर वर्ष उसके ध्यान में अधिक स्थान पाएँगी। वह "भलाई करने में थकेगा" नहीं, चाहे हर प्रयत्न सफल होता न दिखाई दे। जैसे-जैसे उसकी आयु बढ़ेगी, पृथ्वी पर मसीह के कार्य की प्रगति के लिए उसकी चिन्ता कम न होगी, यद्यपि वह कम आशा रखना सीख जाएगा। परिणाम चाहे जो हो, वह अपने पद के अनुसार देते, प्रार्थना करते, प्रचार करते, बोलते और भेंट करते हुए काम में लगा रहेगा,—और अपने काम को ही अपना प्रतिफल समझेगा। आत्मिक पतन के निश्चित चिह्नों में से एक है दूसरों की आत्माओं और मसीह के राज्य की वृद्धि के विषय में घटती हुई रुचि। यदि कोई जानना चाहे कि वह अनुग्रह में बढ़ रहा है या नहीं, तो वह अपने भीतर देखे कि आत्माओं के उद्धार की चिन्ता बढ़ी है या नहीं।

अनुग्रह में बढ़ने के सबसे विश्वसनीय चिह्न ये ही हैं। आइए हम उन्हें ध्यान से जाँचें, और विचार करें कि हम उनके विषय में क्या जानते हैं। मैं भली-भाँति मान सकता हूँ कि आज के कुछ नाममात्र के मसीहियों को ये बातें अच्छी न लगेंगी। वे ऊँची उड़ान भरनेवाले धार्मिक लोग, जिनकी मसीही जीवन की एकमात्र धारणा निरन्तर आनन्द और उल्लास की अवस्था है,—जो तुमसे कहते हैं कि वे संघर्ष और आत्मा की दीनता के क्षेत्र से बहुत आगे निकल चुके हैं,—ऐसे लोग निःसन्देह मेरे बताए इन चिह्नों को "व्यवस्था की बातें," "शारीरिक," और "दासत्व उत्पन्न करनेवाली" ठहराएँगे। मैं इसका कुछ नहीं कर सकता। इन बातों में मैं किसी मनुष्य को स्वामी नहीं कहता। मैं केवल इतना चाहता हूँ कि मेरे कथनों को पवित्रशास्त्र की तराज़ू में तौला जाए। और मुझे दृढ़ विश्वास है कि जो कुछ मैंने कहा है वह न केवल पवित्रशास्त्र के अनुसार है, वरन् हर युग के सबसे प्रतिष्ठित सन्तों के अनुभव से भी मेल खाता है। मुझे ऐसा मनुष्य दिखाओ जिसमें मेरे बताए हुए छहों चिह्न पाए जाएँ। वही मनुष्य इस प्रश्न का सन्तोषजनक उत्तर दे सकता है: क्या हम बढ़ रहे हैं?

III. तीसरी और अन्तिम बात जिस पर विचार करने का मैंने प्रस्ताव रखा था वह यह है:—वे साधन जिनका उपयोग उन लोगों को करना चाहिए जो अनुग्रह में बढ़ना चाहते हैं। याकूब के ये शब्द कभी भुलाए नहीं जाने चाहिए: "हर एक अच्छा वरदान और हर एक उत्तम दान ऊपर ही से है, और ज्योतियों के पिता की ओर से मिलता है।" (याकूब 1:17।) निःसन्देह यह बात अनुग्रह में बढ़ने के विषय में भी उतनी ही सच है जितनी और हर बात के विषय में। यह "परमेश्वर का दान" है। फिर भी यह सदा स्मरण रखना चाहिए कि परमेश्वर साधनों के द्वारा कार्य करना पसन्द करता है। परमेश्वर ने लक्ष्यों के साथ-साथ साधन भी ठहराए हैं। जो अनुग्रह में बढ़ना चाहता है उसे बढ़ने के साधनों का उपयोग करना चाहिए।*

मुझे भय है कि यह एक ऐसी बात है जिसे विश्वासी बहुत अनदेखा कर देते हैं। बहुत से लोग दूसरों में अनुग्रह की बढ़ोतरी की प्रशंसा करते हैं और चाहते हैं कि वे स्वयं भी वैसे ही हों। परन्तु वे मानो यह समझते हैं कि जो बढ़ते हैं वे परमेश्वर की किसी विशेष देन या अनुदान के कारण वैसे हैं, और चूँकि यह देन उन्हें स्वयं नहीं दी गई, इसलिए उन्हें चुपचाप बैठे रहने में सन्तोष करना चाहिए। यह एक भारी भ्रम है, और मैं अपनी सारी शक्ति से इसके विरुद्ध गवाही देना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि यह स्पष्ट रूप से समझ लिया जाए कि अनुग्रह में बढ़ना उन साधनों के उपयोग से जुड़ा है जो सब विश्वासियों की पहुँच में हैं, और सामान्य नियम के रूप में, बढ़नेवाली आत्माएँ इसलिए वैसी हैं कि वे इन साधनों का उपयोग करती हैं।

मेरे पाठकों से मैं विशेष ध्यान की विनती करता हूँ, जब मैं बढ़ने के साधनों को क्रम से प्रस्तुत करने का प्रयत्न करता हूँ। इस व्यर्थ विचार को सदा के लिए त्याग दो कि यदि कोई विश्वासी अनुग्रह में नहीं बढ़ता तो उसका कोई दोष नहीं है। अपने मन में यह बात बैठा लो कि विश्वासी, अर्थात् वह मनुष्य जिसे आत्मा ने जिलाया है, कोई निर्जीव प्राणी नहीं बल्कि महान क्षमताओं और उत्तरदायित्वों वाला प्राणी है। सुलैमान के ये शब्द तुम्हारे हृदय में उतर जाएँ: "कामकाजी की इच्छा पूरी होती है।" (नीतिवचन 13:4।)

(क) अनुग्रह में बढ़ने के लिए एक आवश्यक बात है निजी अनुग्रह के साधनों के उपयोग में परिश्रम। इनसे मेरा तात्पर्य उन साधनों से है जिनका उपयोग मनुष्य को अकेले ही करना होता है और जिन्हें उसके लिए कोई दूसरा नहीं कर सकता। इस शीर्षक के अन्तर्गत मैं निजी प्रार्थना, पवित्रशास्त्र का निजी पठन, और निजी मनन तथा आत्म-परीक्षा को गिनता हूँ। जो मनुष्य इन तीन बातों के विषय में परिश्रम नहीं करता उसे कभी बढ़ने की आशा नहीं रखनी चाहिए। यहीं सच्ची मसीही जीवन की जड़ें हैं। यहाँ जो चूका वह पूरी तरह चूक गया! यही उस बात का पूरा कारण है कि बहुत से मसीही कहलानेवाले कभी आगे बढ़ते नहीं दिखाई देते। वे अपनी निजी प्रार्थनाओं में लापरवाह और ढीले हैं। वे अपनी बाइबल बहुत कम पढ़ते हैं, और वह भी बहुत कम उत्साह के साथ। वे अपने आप को अपने भीतर झाँकने और अपनी आत्मा की दशा के विषय में शान्त चिन्तन करने के लिए समय नहीं देते।

अपने आप से यह छिपाना व्यर्थ है कि जिस युग में हम जी रहे हैं वह विशेष खतरों से भरा है। यह बड़ी सक्रियता का युग है, और धर्म में बहुत जल्दबाजी, हलचल और उत्तेजना का युग है। निःसन्देह बहुत से लोग "इधर-उधर दौड़ते" हैं और "ज्ञान बढ़ता जाएगा।" (दानिय्येल 12:4।) हज़ारों लोग सार्वजनिक सभाओं, उपदेश सुनने, या किसी भी ऐसी बात के लिए जिसमें "सनसनी" हो, बड़ी आसानी से तैयार हो जाते हैं। थोड़े ही लोगों को इस बात की पूर्ण आवश्यकता याद रहती है कि "अपने अपने मन में सोचो और चुपचाप रहो।" (भजन संहिता 4:4।) परन्तु इसके बिना गहरी आत्मिक उन्नति शायद ही कभी होती है। मुझे सन्देह है कि दो सौ वर्ष पहले के अंग्रेज़ मसीही आज के लोगों की अपेक्षा अपनी बाइबल अधिक पढ़ते थे और परमेश्वर के साथ अकेले अधिक बार रहते थे। आइए हम इस बात को स्मरण रखें! यदि हम चाहते हैं कि हमारी आत्माएँ बढ़ें तो निजी धर्म पर हमारा सबसे पहला ध्यान होना चाहिए।

(ख) अनुग्रह में बढ़ने के लिए एक और आवश्यक बात है अनुग्रह के सार्वजनिक साधनों के उपयोग में सावधानी। इनसे मेरा तात्पर्य उन साधनों से है जो मनुष्य को मसीह की दृश्य कलीसिया के सदस्य के रूप में सुलभ हैं। इस शीर्षक के अन्तर्गत मैं रविवार की नियमित आराधना, परमेश्वर के लोगों के साथ सामूहिक प्रार्थना और स्तुति में सम्मिलित होना, परमेश्वर के वचन का प्रचार, और प्रभु-भोज का संस्कार गिनता हूँ। मैं दृढ़ता से विश्वास करता हूँ कि इन सार्वजनिक साधनों का जिस रीति से उपयोग किया जाता है, उसका विश्वासी की आत्मा की उन्नति से बड़ा सम्बन्ध है। इन्हें ठण्डे और निष्प्राण ढंग से उपयोग करना आसान है। इनकी बहुत जान-पहचान ही हमें लापरवाह बना देती है। उसी आवाज़, उसी प्रकार के शब्दों और उन्हीं रीतियों का बार-बार नियमित रूप से आना हमें सुस्त, कठोर और संवेदनहीन बना सकता है। यह एक फन्दा है जिसमें बहुत से मसीही कहलानेवाले गिर जाते हैं। यदि हम बढ़ना चाहते हैं तो हमें यहाँ सावधान रहना चाहिए। यह ऐसी बात है जिसमें आत्मा प्रायः दुखी होता है और पवित्र लोगों की बड़ी हानि होती है। आइए हम पुरानी प्रार्थनाओं का, पुराने भजन गाने का, प्रभु-भोज की पुरानी वेदी पर घुटने टेकने का, और पुराने सत्यों के प्रचार को सुनने का उतनी ही ताज़गी और भूख के साथ प्रयत्न करें जैसा उस वर्ष में था जब हमने पहले-पहल विश्वास किया था। जब किसी मनुष्य की भोजन में रुचि जाती रहती है तो यह खराब स्वास्थ्य का चिन्ह है; और जब अनुग्रह के साधनों के लिए हमारी भूख जाती रहती है तो यह आत्मिक पतन का चिन्ह है। सार्वजनिक साधनों के विषय में हम जो कुछ भी करें, उसे सदा "अपनी शक्ति भर" करें। (सभोपदेशक 9:10।) यही बढ़ने का मार्ग है!

(ग) अनुग्रह में बढ़ने के लिए एक और आवश्यक बात है दैनिक जीवन की छोटी-छोटी बातों में अपने आचरण की चौकसी। हमारे स्वभाव, हमारी जीभें, जीवन के विभिन्न सम्बन्धों के प्रति हमारे कर्तव्यों का निर्वाह, हमारे समय का उपयोग—यदि हम चाहते हैं कि हमारी आत्माएँ उन्नति करें तो इनमें से प्रत्येक पर सतर्कता से ध्यान देना होगा। जीवन दिनों से बनता है, और दिन घण्टों से, और हर घण्टे की छोटी बातें कभी इतनी छोटी नहीं होतीं कि मसीही की देखरेख के योग्य न हों। जब कोई पेड़ जड़ या भीतर से सड़ने लगता है तो उसकी हानि सबसे पहले छोटी डालियों के छोर पर दिखाई देती है। एक अप्रेरित लेखक कहता है, "जो छोटी बातों को तुच्छ जानता है, वह थोड़ा-थोड़ा करके गिरेगा।" यह गवाही सच्ची है। दूसरे चाहें तो हमें तुच्छ जानें और हमें अत्यधिक नियमबद्ध और बहुत सावधान कहें। आइए हम धीरज से अपने मार्ग पर चलते रहें, यह स्मरण रखते हुए कि "हम एक सटीक परमेश्वर की सेवा करते हैं," कि हमारे प्रभु का उदाहरण सबसे बड़ी बातों के साथ-साथ छोटी से छोटी बातों में भी अनुकरण करने योग्य है, और कि हमें पाप करने के बजाय "प्रतिदिन अपना क्रूस उठाना" और हर घण्टे उठाना चाहिए। हमें ऐसी मसीही जीवन का लक्ष्य रखना चाहिए जो पेड़ के रस की तरह हमारे चरित्र की हर टहनी और हर पत्ती में बहे और सब कुछ पवित्र करे। यह बढ़ने का एक मार्ग है!

(d) अनुग्रह में बढ़ने के लिये एक और आवश्यक बात यह है कि हम जिस संगति में रहते हैं और जो मित्रताएँ बनाते हैं, उनके विषय में सावधान रहें। सम्भवतः मनुष्य के चरित्र को उसकी संगति से बढ़कर और कोई बात प्रभावित नहीं करती। हम जिनके साथ रहते और बातचीत करते हैं, उन्हीं के चाल-चलन और स्वर को अपना लेते हैं, और दुर्भाग्य से भलाई की अपेक्षा बुराई बहुत सरलता से ग्रहण कर लेते हैं। रोग तो लग जाता है, पर स्वास्थ्य नहीं लगता। अब यदि कोई मसीही कहलानेवाला व्यक्ति जान-बूझकर उन लोगों से घनिष्ठता रखता है जो परमेश्वर के मित्र नहीं हैं और जो संसार से चिपके हुए हैं, तो उसकी आत्मा की हानि निश्चित है। इस संसार में किसी भी परिस्थिति में मसीह की सेवा करना यों ही कठिन है। परन्तु यदि हम असावधान और अभक्त लोगों के मित्र हों, तो यह दुगुना कठिन हो जाता है। मित्रता या विवाह-सम्बन्ध में की गई भूलें ही कुछ लोगों के पूरी तरह बढ़ना बन्द कर देने का सारा कारण हैं। "बुरी संगति अच्छे चरित्र को बिगाड़ देती है।" "संसार से मित्रता करना परमेश्वर से बैर करना है।" (1 कुरिन्थियों 15:33; याकूब 4:4)। हम ऐसे मित्र खोजें जो हमें हमारी प्रार्थना, हमारे बाइबल-पठन और हमारे समय के उपयोग के विषय में, अर्थात् हमारी आत्मा, हमारे उद्धार और आनेवाले संसार के विषय में उभारते रहें। कौन कह सकता है कि किसी मित्र का समय पर कहा हुआ एक वचन कितनी भलाई कर सकता है, या कितनी हानि रोक सकता है? अनुग्रह में बढ़ने का यह भी एक उपाय है।*

(e) अनुग्रह में बढ़ने के लिये एक बात और भी नितान्त आवश्यक है, और वह है प्रभु यीशु के साथ नियमित और स्वाभाविक सहभागिता। यह कहते समय कोई एक क्षण के लिये भी यह न समझे कि मैं प्रभु-भोज की बात कर रहा हूँ। मेरा ऐसा कोई अभिप्राय नहीं है। मेरा तात्पर्य विश्वासी और उसके उद्धारकर्ता के बीच उस दैनिक संगति से है, जो केवल विश्वास, प्रार्थना और मनन के द्वारा ही निभाई जा सकती है। मुझे भय है कि यह ऐसी आदत है जिसे बहुत-से विश्वासी बहुत कम जानते हैं। कोई मनुष्य विश्वासी हो सकता है और उसके पाँव चट्टान पर टिके हो सकते हैं, फिर भी वह अपने विशेषाधिकारों से बहुत नीचे जीवन बिता सकता है। मसीह के साथ "एकता" होना और फिर भी उसके साथ यदि बिल्कुल नहीं तो बहुत कम "सहभागिता" होना सम्भव है। फिर भी ऐसी कोई वस्तु अवश्य है।

पवित्रशास्त्र में बताए गए मसीह के नाम और पद मुझे निस्सन्देह यह दिखाते हैं कि सन्त और उसके उद्धारकर्ता के बीच की यह "सहभागिता" कोई मात्र कल्पना नहीं, वरन् एक सच्ची वास्तविकता है। "दूल्हे" और उसकी दुलहिन के बीच,—"सिर" और उसके अंगों के बीच,—"वैद्य" और उसके रोगियों के बीच,—"सहायक" और उसके मुवक्किलों के बीच,—"चरवाहे" और उसकी भेड़ों के बीच,—"गुरु" और उसके शिष्यों के बीच,—स्पष्ट रूप से घनिष्ठ मेल-जोल की आदत, आवश्यक वस्तुओं के लिये प्रतिदिन निवेदन करने की, और अपने हृदय और मन को प्रतिदिन उण्डेलकर उसका भार हलका करने की आदत निहित है। मसीह के साथ व्यवहार करने की ऐसी आदत पापियों के लिये मसीह के किए हुए कार्य पर एक अस्पष्ट सामान्य भरोसे से स्पष्टतः कुछ अधिक है। यह उसके निकट आना और एक प्रेमी, व्यक्तिगत मित्र के रूप में भरोसे के साथ उसे थामे रहना है। मैं सहभागिता से यही समझता हूँ।

अब मेरा विश्वास है कि जो मनुष्य "सहभागिता" की इस आदत को अनुभव से कुछ भी नहीं जानता, वह कभी अनुग्रह में नहीं बढ़ेगा। हमें केवल इस सामान्य खरे ज्ञान से सन्तुष्ट नहीं होना चाहिए कि मसीह परमेश्वर और मनुष्य के बीच मध्यस्थ है, कि धर्मी ठहराया जाना विश्वास से है न कि कर्मों से, और कि हम मसीह पर भरोसा रखते हैं। हमें इससे आगे बढ़ना चाहिए। हमें प्रभु यीशु के साथ व्यक्तिगत घनिष्ठता रखने का प्रयत्न करना चाहिए, और उसके साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए जैसा मनुष्य किसी प्रेमी मित्र के साथ करता है। हमें यह समझना चाहिए कि हर आवश्यकता में सबसे पहले उसी की ओर फिरना, हर कठिनाई के विषय में उससे बातें करना, हर कदम पर उससे परामर्श लेना, अपने सारे दुःख उसके सामने रखना, अपने सब आनन्दों में उसे सहभागी बनाना, सब कुछ उसकी दृष्टि में करना, और हर दिन उसी पर टेक लगाए और उसी की ओर देखते हुए बिताना क्या होता है। पौलुस इसी रीति से जीवन बिताता था: "मैं शरीर में अब जो जीवित हूँ तो केवल उस विश्वास से जीवित हूँ जो परमेश्वर के पुत्र पर है।" "मेरे लिये जीवित रहना मसीह है।" (गलातियों 2:20; फिलिप्पियों 1:21)। जीवन बिताने की इस रीति से अनजान होने के कारण ही बहुत-से लोगों को श्रेष्ठगीत की पुस्तक में कोई सुन्दरता दिखाई नहीं देती। परन्तु जो मनुष्य इस रीति से जीता है, जो मसीह के साथ निरन्तर सहभागिता बनाए रखता है,—मैं ज़ोर देकर कहता हूँ, यही मनुष्य है जिसकी आत्मा बढ़ेगी।

अनुग्रह में बढ़ने के विषय को मैं यहीं छोड़ता हूँ। यदि समय होता तो इसके विषय में और भी बहुत कुछ कहा जा सकता था। परन्तु मैं आशा करता हूँ कि मैंने इतना कह दिया है जिससे मेरे पाठकों को विश्वास हो जाए कि यह विषय अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।—अब मैं सब कुछ कुछ व्यावहारिक प्रयोगों के साथ समाप्त करता हूँ।

(1) सम्भव है कि यह लेख कुछ ऐसे लोगों के हाथ में पड़े जो अनुग्रह में बढ़ने के विषय में कुछ भी नहीं जानते। उन्हें धर्म की कोई चिन्ता नहीं, या बहुत कम है। रविवार को कलीसिया या प्रार्थनालय में उचित रीति से थोड़ा-सा जाना ही उनके मसीही जीवन का सार और सारांश है। वे आत्मिक जीवन से रहित हैं, और इसलिये वे अभी बढ़ भी नहीं सकते। क्या आप इन्हीं लोगों में से एक हैं? यदि हैं, तो आप दयनीय दशा में हैं।

वर्ष खिसकते जा रहे हैं और समय उड़ा जा रहा है। कब्रिस्तान भरते जा रहे हैं और परिवार घटते जा रहे हैं। मृत्यु और न्याय हम सबके और निकट आते जा रहे हैं। फिर भी आप अपनी आत्मा के विषय में सोए हुए मनुष्य के समान जी रहे हैं! कैसा पागलपन! कैसी मूर्खता! इससे बुरी आत्महत्या और क्या हो सकती है?

बहुत देर हो जाने से पहले जाग जाइए; जागिए, और मरे हुओं में से उठ खड़े होइए, और परमेश्वर के लिये जीइए। उसकी ओर फिरिए जो परमेश्वर के दाहिने हाथ बैठा है, कि वह आपका उद्धारकर्ता और मित्र हो। मसीह की ओर फिरिए, और अपनी आत्मा के विषय में उससे पूरे बल से पुकारिए। अब भी आशा है! जिसने लाज़र को कब्र से बुलाया था, वह बदला नहीं है। जिसने नाईन नगर की विधवा के पुत्र को अर्थी पर से उठ खड़े होने की आज्ञा दी थी, वह आपकी आत्मा के लिये अब भी आश्चर्यकर्म कर सकता है। तुरन्त उसे खोजिए: मसीह को खोजिए, यदि आप नहीं चाहते कि सदा के लिये नाश हो जाएँ। रुककर केवल बातें करते, इरादा करते, मंशा रखते, इच्छा करते और आशा लगाए मत रहिए। मसीह को खोजिए कि आप जीवित हों, और जीवित होकर आप बढ़ते जाएँ।

(2) यह लेख शायद कुछ ऐसे लोगों के हाथों में पड़े, जिन्हें अनुग्रह में बढ़ने के विषय में कुछ जानना चाहिए, परन्तु अभी वे कुछ भी नहीं जानते। जब से वे पहले-पहल मन फिराए, तब से उन्होंने बहुत कम या बिलकुल भी उन्नति नहीं की है। वे मानो "अपनी तलछट पर बैठ गए" हैं। (सपन्याह 1:12।) वे वर्ष-दर-वर्ष पुराने अनुग्रह, पुराने अनुभव, पुराने ज्ञान, पुराने विश्वास, उन्नति के पुराने माप, पुराने धार्मिक वाक्यांशों और पुराने रटे-रटाए वचनों से सन्तुष्ट चलते रहते हैं। गिबोनियों के समान उनकी रोटी सदा फफूँदी लगी रहती है, और उनके जूते पैबन्द लगे और थिगड़े जुड़े हुए हैं। वे कभी आगे बढ़ते नहीं दिखाई देते। क्या आप भी इन्हीं लोगों में से एक हैं? यदि हाँ, तो आप अपने विशेषाधिकारों और उत्तरदायित्वों से बहुत नीचे जी रहे हैं। अब अपने आपको जाँचने का ठीक समय है।

यदि आपके पास यह आशा रखने का कारण है कि आप सच्चे विश्वासी हैं, फिर भी अनुग्रह में नहीं बढ़ते, तो कहीं न कहीं कोई दोष है, और वह गम्भीर दोष है। यह परमेश्वर की इच्छा नहीं हो सकती कि आपकी आत्मा ठहरी रहे। "वह और भी अनुग्रह देता है।" वह "अपने दास की कुशल से प्रसन्न होता है।" (याकूब 4:6; भजन संहिता 35:27।) आपके अपने सुख या उपयोगी होने के लिए भी यह नहीं हो सकता कि आपकी आत्मा ठहरी रहे। बढ़े बिना आप कभी प्रभु में आनन्दित न होंगे। (फिलिप्पियों 4:4।) बढ़े बिना आप कभी दूसरों का भला न करेंगे। निश्चय ही बढ़ोतरी की यह कमी एक गम्भीर बात है! इससे आपके हृदय में गहरी खोजबीन उठनी चाहिए। अवश्य कोई "गुप्त बात" है। (अय्यूब 15:11।) अवश्य कोई कारण है।

मेरी सलाह मानिए। आज ही ठान लीजिए कि आप अपनी ठहरी हुई दशा का कारण खोज निकालेंगे। विश्वासयोग्य और दृढ़ हाथ से अपनी आत्मा के हर कोने को टटोलिए। छावनी के एक छोर से दूसरे छोर तक तब तक खोजिए, जब तक उस आकान को न पा लें जो आपके हाथों को निर्बल कर रहा है। आत्माओं के महान वैद्य प्रभु यीशु मसीह से प्रार्थना करके आरम्भ कीजिए, और उनसे विनती कीजिए कि वे आपके भीतर के गुप्त रोग को, वह जो भी हो, चंगा करें। ऐसे आरम्भ कीजिए मानो आपने पहले कभी उनके पास आवेदन किया ही न हो, और दाहिना हाथ काट डालने और दाहिनी आँख निकाल फेंकने के लिए अनुग्रह माँगिए। परन्तु यदि आपकी आत्मा बढ़ती नहीं, तो कभी, कभी सन्तुष्ट न हों। अपनी शान्ति के लिए, अपनी उपयोगिता के लिए, अपने सृजनहार के काम के आदर के लिए, ठान लीजिए कि कारण का पता लगाएँगे।

(3) यह लेख शायद कुछ ऐसे लोगों के हाथों में पड़े जो सचमुच अनुग्रह में बढ़ रहे हैं, पर उन्हें इसका बोध नहीं, और वे इसे मानेंगे भी नहीं। उनकी बढ़ोतरी ही इसका कारण है कि वे अपनी बढ़ोतरी नहीं देख पाते! नम्रता में उनकी निरन्तर बढ़ोतरी उन्हें यह अनुभव करने से रोकती है कि वे आगे बढ़ रहे हैं।* मूसा के समान, जब वह परमेश्वर से बातें करके पर्वत से उतरा, उनके मुख चमकते हैं। फिर भी मूसा के समान उन्हें इसका पता नहीं। (निर्गमन 34:29।) मैं खुले मन से मानता हूँ कि ऐसे मसीही सामान्य नहीं हैं। फिर भी यहाँ-वहाँ ऐसे पाए जाते हैं। स्वर्गदूतों के आने के समान वे बहुत कम और दूर-दूर मिलते हैं। धन्य है वह पड़ोस जहाँ ऐसे बढ़ते हुए मसीही रहते हैं! उनसे मिलना, उन्हें देखना और उनकी संगति में रहना, मानो "पृथ्वी पर स्वर्ग" के एक अंश से मिलने और उसे देखने के समान है।

अब ऐसे लोगों से मैं क्या कहूँ? मैं क्या कह सकता हूँ? मुझे क्या कहना चाहिए? क्या मैं उनसे कहूँ कि वे अपनी बढ़ोतरी के प्रति सचेत हों और उससे प्रसन्न हों? मैं ऐसा कुछ नहीं करूँगा।—क्या मैं उनसे कहूँ कि अपनी उपलब्धियों पर इतराएँ और दूसरों से अपनी श्रेष्ठता को देखें? परमेश्वर न करे! मैं ऐसा कुछ नहीं करूँगा।—उनसे ऐसी बातें कहने से उनका कोई भला न होगा। उनसे ऐसी बातें कहना, विशेषकर, समय की व्यर्थ बरबादी होगी। बढ़ती हुई आत्मा की यदि कोई एक विशेषता उसे अलग पहचान देती है, तो वह है अपनी अयोग्यता का उसका गहरा बोध। वह अपने में कभी कुछ भी प्रशंसा के योग्य नहीं देखता। वह केवल यही अनुभव करता है कि वह निकम्मा दास है और पापियों में सबसे बड़ा है। न्याय के दिन के चित्र में धर्मी ही कहते हैं, 'हे प्रभु, हमने कब तुझे भूखा देखकर खिलाया?' (मत्ती 25:37।) कभी-कभी दो छोर आश्चर्यजनक रीति से मिल जाते हैं। विवेक से कठोर पापी और उत्तम सन्त एक बात में अनोखे ढंग से एक समान हैं। उनमें से कोई भी अपनी दशा को पूरी तरह नहीं समझता। एक अपना पाप नहीं देखता, और दूसरा अपना अनुग्रह नहीं देखता!

परन्तु क्या मैं बढ़ते हुए मसीहियों से कुछ न कहूँ? क्या कोई सम्मति का वचन नहीं जो मैं उनसे कह सकूँ? जो कुछ मैं कह सकता हूँ उसका सार दो वाक्यों में है: "आगे बढ़ो!" "चलते रहो!"

हमारे पास कभी भी बहुत अधिक नम्रता, मसीह में बहुत अधिक विश्वास, बहुत अधिक पवित्रता, बहुत अधिक आत्मिक मन, बहुत अधिक प्रेम, या दूसरों का भला करने में बहुत अधिक उत्साह नहीं हो सकता। तो आइए, हम निरन्तर पीछे की बातों को भूलते हुए आगे की बातों की ओर बढ़ते जाएँ। (फिलिप्पियों 3:13।) इन बातों में सर्वोत्तम मसीही भी अपने प्रभु के सिद्ध आदर्श से अनन्त रूप से नीचे है। संसार चाहे जो कहे, हम निश्चित रह सकते हैं कि हममें से किसी के "बहुत अच्छा" बन जाने का कोई खतरा नहीं।

आइए, उस प्रचलित धारणा को बेकार की बात मानकर हवा में उड़ा दें कि धर्म में "अति" करना और "बहुत आगे" निकल जाना सम्भव है। यह शैतान का एक प्रिय झूठ है, जिसे वह बड़े परिश्रम से फैलाता है। निःसन्देह ऐसे उन्मादी और धर्मान्ध भी पाए जाते हैं जो अपनी अति और मूर्खताओं से मसीही धर्म की बदनामी कराते हैं। परन्तु यदि कोई यह कहना चाहता है कि कोई नश्वर मनुष्य बहुत अधिक नम्र, बहुत अधिक उदार, बहुत अधिक पवित्र, या भलाई करने में बहुत अधिक परिश्रमी हो सकता है, तो वह या तो अविश्वासी है या मूर्ख। सुख-विलास और धन की सेवा में बहुत आगे निकल जाना आसान है। परन्तु सच्चे धर्म की बातों का अनुसरण करने और मसीह की सेवा करने में कोई अति नहीं हो सकती।

आओ, हम कभी अपने धर्म को दूसरों के धर्म से न नापें, और यह न सोचें कि यदि हम अपने पड़ोसियों से आगे बढ़ गए हैं तो हम पर्याप्त कर रहे हैं। यह शैतान का एक और फन्दा है। आओ, हम अपने ही काम से काम रखें। हमारे स्वामी ने एक अवसर पर कहा, "तुझे इस से क्या? तू मेरे पीछे हो ले।" (यूहन्ना 21:22।) आओ, हम आगे बढ़ते जाएँ, और सिद्धता से कम किसी बात का लक्ष्य न रखें। आओ, हम आगे बढ़ते जाएँ, और मसीह के जीवन और चरित्र को ही अपना एकमात्र नमूना और आदर्श बनाएँ। आओ, हम आगे बढ़ते जाएँ, और प्रतिदिन स्मरण रखें कि अपनी सर्वोत्तम दशा में भी हम अभागे पापी ही हैं। आओ, हम आगे बढ़ते जाएँ, और कभी न भूलें कि इसका कोई अर्थ नहीं कि हम दूसरों से अच्छे हैं या नहीं। अपनी सर्वोत्तम दशा में भी हम जैसे होने चाहिए उससे कहीं बुरे हैं। हम में सुधार की गुंजाइश सदा बनी रहेगी। अन्त तक हम मसीह की दया और अनुग्रह के ऋणी रहेंगे। इसलिए आओ, दूसरों की ओर देखना और अपनी तुलना दूसरों से करना छोड़ दें। यदि हम अपने ही हृदय को देखें तो हमें करने को बहुत कुछ मिल जाएगा।

अन्त में, परन्तु कम महत्त्व की बात नहीं: यदि हम अनुग्रह में बढ़ने के विषय में कुछ जानते हैं, और अधिक जानना चाहते हैं, तो यदि हमें इस संसार में बहुत परीक्षा और क्लेश से होकर जाना पड़े तो आश्चर्य न करें। मेरा दृढ़ विश्वास है कि यह लगभग सभी उत्कृष्ट सन्तों का अनुभव रहा है। अपने धन्य स्वामी के समान वे "दुखी पुरुष और रोग से परिचित" रहे हैं, और "दुःख उठाने के द्वारा सिद्ध" किए गए हैं। (यशा. 53:3; इब्रा. 2:10।) हमारे प्रभु का यह वचन विचारणीय है, "जो डाली मुझ में है और नहीं फलती, उसे वह छाँट डालता है, और जो फलती है, उसे वह छाँटता है ताकि और फले।" (यूहन्ना 15:2।) यह एक खेदजनक सच्चाई है कि निरन्तर सांसारिक समृद्धि, साधारणतः, विश्वासी की आत्मा के लिए हानिकारक होती है। हम उसे सह नहीं सकते। बीमारियाँ, हानियाँ, क्रूस, चिन्ताएँ और निराशाएँ हमें नम्र, चौकस और आत्मिक मन का बनाए रखने के लिए नितान्त आवश्यक प्रतीत होती हैं। वे उतनी ही आवश्यक हैं जितनी दाखलता के लिए छँटाई की छुरी और सोने के लिए गलानेवाले की भट्ठी। वे शरीर और लहू को सुखद नहीं लगतीं। हम उन्हें पसन्द नहीं करते, और प्रायः उनका अर्थ नहीं समझते। "किसी प्रकार की ताड़ना उस समय आनन्द की नहीं, पर शोक ही की जान पड़ती है, तौभी जो उसको सहते-सहते पक्के हो गए हैं, उन्हें बाद में चैन के साथ धार्मिकता का प्रतिफल मिलता है।" (इब्रा. 12:11।) जब हम स्वर्ग पहुँचेंगे तो देखेंगे कि सब कुछ हमारी भलाई के लिए ही कार्य करता रहा। यदि हम अनुग्रह में बढ़ना चाहते हैं तो ये विचार हमारे मन में बने रहें। जब अन्धकार के दिन हम पर आएँ, तो उसे अनोखी बात न समझें। इसके बजाय स्मरण रखें कि ऐसे दिनों में वे पाठ सीखे जाते हैं जो धूप में कभी न सीखे जाते। हम अपने से कहें, "यह भी मेरे लाभ के लिए है, कि मैं परमेश्वर की पवित्रता का भागी बनूँ। यह प्रेम से भेजा गया है। मैं परमेश्वर की सर्वोत्तम पाठशाला में हूँ। ताड़ना ही शिक्षा है। इसका उद्देश्य मुझे बढ़ाना है।"

अनुग्रह में बढ़ने का विषय मैं यहीं छोड़ता हूँ। मुझे आशा है कि मैंने इतना कह दिया है कि कुछ पाठक इसके विषय में सोचने लगें। सब वस्तुएँ बूढ़ी हो रही हैं: संसार बूढ़ा हो रहा है; हम स्वयं भी बूढ़े हो रहे हैं। थोड़ी और गर्मियाँ, थोड़ी और सर्दियाँ, थोड़ी और बीमारियाँ, थोड़े और दुःख, थोड़े और ब्याह, थोड़े और अन्तिम संस्कार, थोड़ी और भेंटें, और थोड़े और बिछोह, और फिर,—क्या? फिर तो हमारी कब्रों पर घास उग रही होगी!

तो क्या यह उचित न होगा कि हम भीतर झाँकें, और अपनी आत्मा से एक सीधा प्रश्न पूछें? धर्म में, उन बातों में जो हमारी शान्ति से सम्बन्ध रखती हैं, व्यक्तिगत पवित्रता के महान विषय में, क्या हम आगे बढ़ रहे हैं? क्या हम बढ़ते हैं?

7. "निश्चयता"

"मैं अब अर्घ की नाईं उण्डेला जाता हूँ, और मेरे कूच करने का समय आ पहुँचा है।"

"मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैं ने विश्वास की रखवाली की है:"

"भविष्य में मेरे लिये धार्मिकता का वह मुकुट रखा हुआ है, जिसे प्रभु, जो धर्मी न्यायी है, उस दिन मुझे देगा, और मुझे ही नहीं, वरन् उन सब को भी जो उसके प्रगट होने को प्रिय जानते हैं।"—2 तीमु. 4:6, 7, 8।

इस पृष्ठ के शीर्ष पर दिए गए पवित्रशास्त्र के वचनों में हम प्रेरित पौलुस को तीन ओर देखते हुए पाते हैं,—नीचे की ओर, पीछे की ओर, आगे की ओर;—नीचे कब्र की ओर,—पीछे अपनी सेवकाई की ओर,—आगे उस बड़े दिन की ओर, न्याय के दिन की ओर!

प्रेरित के पास कुछ क्षण खड़े होकर उसके शब्दों पर ध्यान देना हमारे लिए लाभदायक होगा। धन्य है वह आत्मा जो वहाँ देख सके जहाँ पौलुस ने देखा, और फिर वैसे बोल सके जैसे पौलुस बोला!

(क) वह नीचे कब्र की ओर देखता है, और बिना भय के देखता है। सुनिए वह क्या कहता है:—

"मैं अर्घ की नाईं उण्डेला जाता हूँ।"—मैं उस पशु के समान हूँ जो बलिदान के स्थान पर लाया गया है, और जिसे रस्सियों से वेदी के सींगों तक बाँध दिया गया है। पेय-बलि, जो साधारणतः भेंट के साथ चढ़ाई जाती है, अब उण्डेली जा रही है। अन्तिम विधियाँ पूरी हो चुकी हैं। सब तैयारी हो चुकी है। अब केवल मृत्यु का प्रहार पाना शेष है, और फिर सब समाप्त है।

"मेरे कूच करने का समय आ पहुँचा है।"—मैं उस जहाज़ के समान हूँ जो लंगर उठाकर समुद्र में उतरने को है। जहाज़ पर सब कुछ तैयार है। मैं केवल इतना ठहरता हूँ कि वे रस्से खोल दिए जाएँ जो मुझे किनारे से बाँधे हुए हैं, और तब मैं पाल खोलकर अपनी यात्रा आरम्भ करूँगा।

हमारे ही समान आदम की सन्तान के मुँह से ये शब्द निकलना सचमुच विलक्षण बात है! मृत्यु एक गम्भीर बात है, और जब वह निकट दिखाई दे तब तो और भी अधिक। कब्र एक ठण्डा, हृदय को बैठा देनेवाला स्थान है, और यह दिखावा करना व्यर्थ है कि उसमें कोई भय नहीं। फिर भी यहाँ एक नश्वर मनुष्य है, जो "सब जीवित प्राणियों के लिये ठहराए गए" उस सँकरे "घर" में शान्ति से झाँक सकता है, और उसके किनारे खड़े होकर कह सकता है, "मैं सब देखता हूँ, और डरता नहीं।"

(ख) आओ, हम उसे फिर सुनें। वह पीछे अपने सेवकाई-जीवन की ओर देखता है, और बिना लज्जा के देखता है। सुनिए वह क्या कहता है:—

"मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ।"—यहाँ वह एक सैनिक के रूप में बोलता है। मैंने संसार, शरीर और शैतान के साथ वह अच्छी लड़ाई लड़ी है, जिससे इतने लोग पीछे हट जाते और कतराते हैं।

"मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है।"—यहाँ वह उसके समान बोलता है जो पुरस्कार के लिए दौड़ा हो। जो दौड़ मेरे लिए ठहराई गई थी, मैं उसे दौड़ चुका हूँ। मैं उस मार्ग को तय कर चुका हूँ जो मेरे लिए ठहराया गया था, चाहे वह कितना ही ऊबड़-खाबड़ और चढ़ाईवाला रहा हो। मैं कठिनाइयों के कारण मुड़ा नहीं, और मार्ग की लम्बाई से हताश नहीं हुआ। अब मैं अन्ततः लक्ष्य के दृश्य में हूँ।

"मैं ने विश्वास की रखवाली की है।"—यहाँ वह एक भण्डारी के रूप में बोलता है। जो महिमामय सुसमाचार मुझे सौंपा गया था, उसे मैं ने दृढ़ता से थामे रखा। मैं ने उसमें मनुष्यों की परम्पराएँ नहीं मिलाईं, न अपनी गढ़ी हुई बातें जोड़कर उसकी सरलता बिगाड़ी, और न दूसरों को उसमें मिलावट करने दिया, बल्कि उनके मुँह पर उनका विरोध किया। मानो वह कहता है, "एक सैनिक के रूप में, एक धावक के रूप में, एक भण्डारी के रूप में मैं लज्जित नहीं हूँ।"

वह मसीही धन्य है जो संसार से विदा लेते समय अपने पीछे ऐसी गवाही छोड़ जाता है। अच्छा विवेक किसी मनुष्य को नहीं बचाएगा, किसी पाप को नहीं धोएगा, और हमें स्वर्ग की ओर बाल भर भी नहीं बढ़ाएगा। फिर भी मृत्यु की घड़ी में अच्छा विवेक हमारे बिछौने के पास एक सुखद अतिथि ठहरेगा। "पिलग्रिम्स प्रोग्रेस" में एक सुन्दर अंश है जो वृद्ध ईमानदार के मृत्यु की नदी पार करने का वर्णन करता है। बनियन कहता है, "उस समय नदी कई स्थानों पर अपने किनारों से बाहर बह रही थी; परन्तु ईमानदार जी ने अपने जीवनकाल में अच्छा-विवेक नाम के एक व्यक्ति से कह रखा था कि वह वहाँ उससे मिले; और उसने वैसा ही किया, अपना हाथ बढ़ाया और उसे पार पहुँचा दिया।" हम निश्चित हो सकते हैं कि उस अंश में सत्य की एक खान है।

(ग) आइए, हम प्रेरित की बात एक बार फिर सुनें। वह लेखा-जोखा देने के उस महान दिन की ओर देखता है, और बिना किसी सन्देह के देखता है। उसके शब्दों पर ध्यान दें:—

"भविष्य में मेरे लिये धार्मिकता का वह मुकुट रखा हुआ है, जिसे प्रभु, जो धर्मी न्यायी है, उस दिन मुझे देगा; और मुझे ही नहीं, वरन् उन सब को भी जो उसके प्रगट होने को प्रिय जानते हैं।"—मानो वह कहता है, "एक महिमामय प्रतिफल मेरे लिये तैयार और संचित रखा है, अर्थात् वह मुकुट जो केवल धर्मियों को दिया जाता है। न्याय के उस बड़े दिन प्रभु वह मुकुट मुझे देगा, और मेरे साथ उन सब को भी जिन्होंने अनदेखे उद्धारकर्ता के रूप में उससे प्रेम रखा और उसे आमने-सामने देखने की लालसा की। पृथ्वी पर मेरा काम पूरा हुआ। अब मेरे आगे बस यही एक बात देखने को शेष है, और कुछ नहीं।"

ध्यान दें कि प्रेरित बिना किसी झिझक या अविश्वास के बोलता है। वह उस मुकुट को निश्चित बात, बल्कि अपनी ही बात मानता है। वह अटल भरोसे के साथ अपनी दृढ़ प्रतीति प्रकट करता है कि धर्मी न्यायी उसे वह मुकुट देगा। जिस गम्भीर दिन का वह उल्लेख कर रहा था, उसकी सभी परिस्थितियों और साथ की बातों से पौलुस अपरिचित नहीं था। बड़ा श्वेत सिंहासन, इकट्ठा किया हुआ संसार, खुली हुई पुस्तकें, सब गुप्त बातों का प्रगट होना, सुनते हुए स्वर्गदूत, भयानक दण्ड की आज्ञा, खोए हुए और बचाए हुए लोगों का सदा के लिये अलग किया जाना—ये सब बातें उसे भली-भाँति ज्ञात थीं। परन्तु इनमें से किसी ने उसे विचलित न किया। उसके दृढ़ विश्वास ने इन सब को लाँघ लिया, और उसे केवल यीशु दिखाई दिया, जो उसका सर्वशक्तिमान सहायक है, और छिड़काव का लहू, और धुला हुआ पाप। वह कहता है, "मेरे लिये एक मुकुट रखा हुआ है।" "प्रभु स्वयं उसे मुझे देगा।" वह ऐसे बोलता है मानो यह सब अपनी आँखों से देख रहा हो।

इन पदों में मुख्य बातें ये ही हैं। इनमें से अधिकांश के विषय में मैं नहीं कहूँगा, क्योंकि मैं अपने आप को इस लेख के विशेष विषय तक सीमित रखना चाहता हूँ। मैं इस अंश की केवल एक बात पर विचार करने का प्रयत्न करूँगा। वह बात है "आशा की निश्चयता", जिसके साथ प्रेरित न्याय के दिन में अपनी सम्भावनाओं की ओर देखता है।

मैं यह और भी सहर्ष करूँगा, क्योंकि निश्चयता के विषय का बहुत बड़ा महत्त्व है, और मेरी नम्र समझ में आजकल उसकी प्रायः बड़ी उपेक्षा की जाती है।

परन्तु मैं यह काम भय और थरथराहट के साथ करूँगा। मैं अनुभव करता हूँ कि मैं बहुत कठिन भूमि पर चल रहा हूँ, और इस विषय में उतावली से तथा पवित्रशास्त्र के विरुद्ध बोल देना सहज है। सत्य और भ्रम के बीच का मार्ग यहाँ विशेष रूप से एक सँकरा दर्रा है; और यदि मुझे कुछ लोगों का भला करने की सामर्थ्य मिले और दूसरों की कोई हानि न हो, तो मैं बहुत कृतज्ञ होऊँगा।

निश्चयता के विषय पर बोलते हुए मैं चार बातें सामने रखना चाहता हूँ, और यदि मैं उन्हें अभी बता दूँ तो हमारा मार्ग स्पष्ट हो सकता है।

I. पहले, मैं यह दिखाने का प्रयत्न करूँगा कि निश्चित आशा, जैसी पौलुस यहाँ प्रकट करता है, एक सच्ची और पवित्रशास्त्र के अनुसार बात है।

II. दूसरे, मैं यह खुली स्वीकृति दूँगा कि कोई मनुष्य इस निश्चित आशा तक कभी न पहुँचे, फिर भी उसका उद्धार हो सकता है।

III. तीसरे, मैं कुछ कारण बताऊँगा कि निश्चित आशा की क्यों बहुत अधिक इच्छा करनी चाहिए।

IV. अन्त में, मैं कुछ कारण बताने का प्रयत्न करूँगा कि निश्चित आशा क्यों इतनी कम प्राप्त होती है।

जो लोग इस पुस्तक के महान विषय में रुचि रखते हैं, उन सब से मैं विशेष ध्यान देने का निवेदन करता हूँ। यदि मैं बहुत भूल में नहीं हूँ, तो सच्ची पवित्रता और निश्चयता के बीच बहुत निकट का सम्बन्ध है। इस लेख को समाप्त करने से पहले मैं अपने पाठकों को उस सम्बन्ध का स्वरूप दिखाने की आशा रखता हूँ। अभी तो मैं इतना कहकर सन्तोष करता हूँ कि जहाँ सबसे अधिक पवित्रता होती है, वहाँ प्रायः सबसे अधिक निश्चयता भी होती है।

I. पहले, मैं यह दिखाने का प्रयत्न करूँगा कि निश्चित आशा एक सच्ची और पवित्रशास्त्र के अनुसार बात है

निश्चयता, जैसी पौलुस इस लेख के शीर्ष में दिए गए पदों में प्रकट करता है, कोई कोरी कल्पना या भावना नहीं है। वह शारीरिक उमंग या शरीर के आशावादी स्वभाव का परिणाम नहीं है। वह पवित्र आत्मा का एक वास्तविक दान है, जो मनुष्यों की शारीरिक बनावट या प्रकृति का विचार किए बिना दिया जाता है, और ऐसा दान है जिसे मसीह में हर विश्वासी को पाने का लक्ष्य रखना और खोजना चाहिए।

इन बातों में पहला प्रश्न यह है—पवित्रशास्त्र क्या कहता है? मैं उस प्रश्न का उत्तर बिना तनिक भी झिझक के देता हूँ। मुझे लगता है कि परमेश्वर का वचन स्पष्ट सिखाता है कि विश्वासी अपने उद्धार के विषय में दृढ़ निश्चय तक पहुँच सकता है।

मैं परमेश्वर के सत्य के रूप में पूरे और खुले तौर पर यह स्थापित करता हूँ कि सच्चा मसीही, अर्थात् परिवर्तित मनुष्य, मसीह में विश्वास की ऐसी सुखद सीमा तक पहुँच सकता है कि वह सामान्यतः अपनी आत्मा के क्षमा और सुरक्षा के विषय में पूर्णतः निश्चिन्त अनुभव करे—उसे सन्देह कम सताएँ, भय कम घबराएँ, चिन्ताजनक प्रश्न कम व्याकुल करें—और संक्षेप में, यद्यपि वह पाप के साथ अनेक भीतरी संघर्षों से पीड़ित हो, तो भी वह मृत्यु की ओर बिना काँपे और न्याय की ओर बिना भयभीत हुए देखे।* मैं कहता हूँ, यही बाइबल का सिद्धान्त है।

निश्चयता के विषय में मेरा विवरण यही है। मैं अपने पाठकों से निवेदन करता हूँ कि इसे भली-भाँति ध्यान में रखें। मैं ने यहाँ जो कुछ कहा है, उससे न कम कहता हूँ और न अधिक।

अब ऐसे कथन का प्रायः विरोध और खण्डन किया जाता है। बहुत से लोग इसकी सच्चाई को बिलकुल नहीं देख पाते।

रोम की कलीसिया निश्चयता की अत्यन्त कठोर शब्दों में निन्दा करती है। ट्रेंट की महासभा स्पष्ट घोषणा करती है कि "विश्वासी का अपने पापों की क्षमा के विषय में निश्चय करना व्यर्थ और अभक्ति-भरा भरोसा है;" और रोमी मत के प्रसिद्ध पक्षधर कार्डिनल बेलार्माइन इसे "विधर्मियों का एक प्रमुख भ्रम" कहते हैं।

हमारे ही बीच के संसारी और अविचारी मसीहियों का अधिकांश भाग निश्चयता के सिद्धान्त का विरोध करता है। इसकी चर्चा सुनकर वे बुरा मानते और खीझ उठते हैं। उन्हें यह अच्छा नहीं लगता कि दूसरे लोग चैन से और निश्चिन्त रहें, क्योंकि वे स्वयं कभी ऐसा अनुभव नहीं करते। उनसे पूछिए कि क्या उनके पाप क्षमा हुए हैं, तो सम्भव है वे कहें कि उन्हें नहीं मालूम! वे निश्चयता के सिद्धान्त को ग्रहण नहीं कर सकते, इसमें निश्चय ही कोई आश्चर्य की बात नहीं।

परन्तु कुछ सच्चे विश्वासी भी हैं जो निश्चयता को अस्वीकार करते हैं, या इसे ख़तरे से भरा सिद्धान्त जानकर इससे कतराते हैं। वे इसे धृष्टता की सीमा पर मानते हैं। उन्हें लगता है कि कभी निश्चिन्त न होना, कभी भरोसा न रखना, और अपनी आत्माओं के विषय में एक प्रकार की शंका और अनिश्चितता में जीना ही उचित दीनता है। यह खेद की बात है, और इससे बहुत हानि होती है।

मैं खुलकर मानता हूँ कि कुछ धृष्ट लोग हैं, जो ऐसे भरोसे का दावा करते हैं जिसके लिए उनके पास पवित्रशास्त्र का कोई आधार नहीं। ऐसे लोग सदा रहते हैं जो अपने विषय में अच्छा सोचते हैं जबकि परमेश्वर बुरा सोचता है, जैसे कुछ ऐसे भी हैं जो अपने विषय में बुरा सोचते हैं जबकि परमेश्वर अच्छा सोचता है। ऐसे लोग सदा रहेंगे। पवित्रशास्त्र का कोई ऐसा सत्य कभी नहीं हुआ जिसका दुरुपयोग और जिसकी नक़ल न की गई हो। परमेश्वर का चुनाव,—मनुष्य की असमर्थता,—अनुग्रह से उद्धार,—सबका समान रूप से दुरुपयोग हुआ है। जब तक संसार है तब तक कट्टरपंथी और उन्मादी भी रहेंगे। फिर भी निश्चयता एक वास्तविकता और सच्ची बात है; और परमेश्वर की सन्तानों को किसी सत्य के दुरुपयोग मात्र के कारण उसके उपयोग से पीछे नहीं हटना चाहिए।*

जो लोग वास्तविक और दृढ़ आधार वाली निश्चयता के अस्तित्व को नकारते हैं, उन सबको मेरा उत्तर बस यही है,—पवित्रशास्त्र क्या कहता है? यदि निश्चयता वहाँ नहीं है, तो मेरे पास कहने को और कुछ नहीं।

परन्तु क्या अय्यूब नहीं कहता, "मुझे तो निश्चय है, कि मेरा छुड़ानेवाला जीवित है, और वही अन्त में पृथ्वी पर खड़ा होगा। और मेरी खाल के इस प्रकार नाश हो जाने के बाद भी, मैं शरीर में होकर परमेश्वर का दर्शन करूँगा।" (अय्यूब 19:25, 26)

क्या दाऊद नहीं कहता, "चाहे मैं घोर अन्धकार से भरी हुई तराई में होकर चलूँ, तौभी हानि से न डरूँगा, क्योंकि तू मेरे साथ रहता है; तेरे सोंटे और लाठी से मुझे शान्ति मिलती है।" (भजन संहिता 23:4)

क्या यशायाह नहीं कहता, "जिसका मन तुझ में धीरज धरे हुए है, उसकी तू पूर्ण शान्ति के साथ रक्षा करता है, क्योंकि वह तुझ पर भरोसा रखता है।" (यशायाह 26:3)

और फिर, "धार्मिकता का फल शान्ति और उसका परिणाम सदा के लिए चैन और निश्चिन्तता होगी।" (यशायाह 32:17)

क्या पौलुस रोमियों से नहीं कहता, "मुझे निश्चय है कि न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएँ, न वर्तमान, न भविष्य, न सामर्थ्य, न ऊँचाई, न गहराई, और न कोई और सृष्टि हमें परमेश्वर के प्रेम से, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सकेगी।" (रोमियों 8:38, 39)

क्या वह कुरिन्थियों से नहीं कहता, "हम जानते हैं कि जब हमारा पृथ्वी पर का तम्बू सा घर गिराया जाएगा तो हमें परमेश्वर की ओर से स्वर्ग में एक ऐसा भवन मिलेगा जो हाथों से बना हुआ नहीं, परन्तु चिरस्थायी है।" (2 कुरिन्थियों 5:1)

और फिर, "हम सदा ढाढ़स बाँधे रहते हैं और यह जानते हैं कि जब तक हम देह में रहते हैं, तब तक प्रभु से अलग हैं।" (2 कुरिन्थियों 5:6)

क्या वह तीमुथियुस से नहीं कहता, "मैं जानता हूँ कि मैंने किस पर विश्वास किया है, और मुझे निश्चय है कि वह मेरी धरोहर की उस दिन तक रखवाली कर सकता है।" (2 तीमुथियुस 1:12)

और क्या वह कुलुस्सियों से "समझ की पूरी निश्चयता" (कुलुस्सियों 2:2) की बात नहीं करता, और इब्रानियों से "विश्वास की पूरी निश्चयता" और "आशा की पूरी निश्चयता" की? (इब्रानियों 6:11; 10:22)

क्या पतरस स्पष्ट रूप से नहीं कहता, "अपने बुलाए जाने और चुन लिए जाने को सुदृढ़ करने का यत्न करते रहो।" (2 पतरस 1:10)

क्या यूहन्ना नहीं कहता, "हम जानते हैं कि हम मृत्यु से पार होकर जीवन में पहुँचे हैं।" (1 यूहन्ना 3:14)

और फिर, "मैंने तुम्हें, जो परमेश्वर के पुत्र के नाम पर विश्वास करते हो, ये बातें इसलिए लिखी हैं कि तुम जानो कि अनन्त जीवन तुम्हारा है।" (1 यूहन्ना 5:13)

और फिर, "हम जानते हैं कि हम परमेश्वर से हैं।" (1 यूहन्ना 5:19)

इन बातों के विषय में हम क्या कहें? किसी भी विवादित विषय पर मैं पूरी दीनता के साथ बोलना चाहता हूँ। मैं जानता हूँ कि मैं स्वयं आदम की एक दीन, भूल-चूक करनेवाली सन्तान मात्र हूँ। परन्तु मुझे यह कहना ही होगा कि अभी उद्धृत किए गए खण्डों में मुझे उन "आशाओं" और "भरोसों" से कहीं ऊँची बात दिखाई देती है, जिनसे आज के बहुत से विश्वासी सन्तुष्ट दिखाई देते हैं। मुझे दृढ़ विश्वास, भरोसे और ज्ञान की भाषा दिखाई देती है,—बल्कि मैं लगभग यह भी कह सकता हूँ कि निश्चितता की भाषा। और मैं अपनी ओर से अनुभव करता हूँ कि यदि इन पवित्रशास्त्र के वचनों को उनके सीधे, स्पष्ट अर्थ में लिया जाए, तो निश्चयता का सिद्धान्त सत्य है।

परन्तु जो लोग निश्चयता के सिद्धान्त को धृष्टता की सीमा पर मानकर नापसन्द करते हैं, उन सबको मेरा आगे का उत्तर यह है:—पतरस और पौलुस, अय्यूब और यूहन्ना के पदचिह्नों पर चलना शायद ही धृष्टता कहा जा सके। यदि कभी कोई दीन और नम्र मन के मनुष्य हुए, तो वे सब अति उत्तम रूप से ऐसे ही थे; फिर भी वे सब अपनी दशा के विषय में निश्चित आशा के साथ बोलते हैं। निश्चय ही यह हमें सिखाए कि गहरी दीनता और दृढ़ निश्चयता में पूर्ण सामंजस्य है, और आत्मिक भरोसे तथा अभिमान के बीच कोई अनिवार्य सम्बन्ध नहीं।*

मेरा आगे का उत्तर यह है कि बहुतों ने ऐसी निश्चित आशा प्राप्त की है जैसी हमारा पाठ व्यक्त करता है, आधुनिक समय में भी। मैं एक क्षण के लिए भी यह मानने को तैयार नहीं कि यह केवल प्रेरितों के युग तक सीमित कोई विशेष सुअवसर था। हमारे ही देश में ऐसे बहुत से विश्वासी हुए हैं, जो लगभग अटूट सहभागिता में चलते हुए दिखाई दिए,—जिन्होंने पिता और पुत्र के साथ

सहभागिता बनाए रखी,—जो ऐसे प्रतीत हुए मानो परमेश्वर के मेल-मिलाप किए हुए मुख की ज्योति को अपने ऊपर निरन्तर चमकते हुए लगभग बिना रुके अनुभव करते रहे, और अपना अनुभव लिखकर छोड़ गए। यदि स्थान होता तो मैं प्रसिद्ध नाम गिना सकता था। ऐसा हुआ है, और होता है,—और यही पर्याप्त है।

अन्त में मेरा उत्तर यह है कि जहाँ परमेश्वर बिना किसी शर्त के बोलता है, वहाँ पूरे भरोसे के साथ अनुभव करना,—जब परमेश्वर निश्चित रूप से प्रतिज्ञा करता है तब निश्चित रूप से विश्वास करना,—और उसके वचन और शपथ पर, जो कभी नहीं बदलता, भरोसा रखकर क्षमा और शान्ति का दृढ़ निश्चय रखना, कदापि गलत नहीं हो सकता। यह मान लेना सरासर भूल है कि जो विश्वासी निश्चयता का अनुभव करता है वह अपने भीतर दिखनेवाली किसी बात पर टिका है। वह केवल नई वाचा के मध्यस्थ और सत्य के पवित्रशास्त्र पर टेक लगाता है। वह विश्वास करता है कि प्रभु यीशु जो कहता है वही उसका अर्थ है, और उसे उसके वचन के अनुसार ही ग्रहण करता है। निश्चयता अन्ततः पूर्ण विकसित विश्वास से अधिक कुछ नहीं है; वह पौरुषपूर्ण विश्वास जो मसीह की प्रतिज्ञा को दोनों हाथों से थाम लेता है,—वह विश्वास जो उस भले सूबेदार की तरह तर्क करता है: यदि प्रभु "केवल मुँह से कह दे" तो मैं चंगा हो जाऊँगा। फिर मैं सन्देह क्यों करूँ? (मत्ती 8:8.)*

हम निश्चित हो सकते हैं कि पौलुस संसार में सबसे अन्तिम व्यक्ति था जो अपनी निश्चयता को अपनी किसी बात पर आधारित करता। जो अपने आप को "सब पापियों में सबसे बड़ा" लिख सकता था (1 तीमुथियुस 1:15), उसे अपने दोष और भ्रष्टता का गहरा बोध था। परन्तु उससे भी गहरा बोध उसे उस धार्मिकता की लम्बाई-चौड़ाई का था जो मसीह की ओर से उसे गिनी गई थी।—जो पुकार उठा, "मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ!" (रोमियों 7:24), उसे अपने मन में बुराई के सोते का स्पष्ट बोध था। परन्तु उससे भी स्पष्ट बोध उसे उस दूसरे सोते का था जो "सारे पाप और अशुद्धता" को दूर कर सकता है।—जो अपने आप को "सब पवित्र लोगों में छोटे से भी छोटा" समझता था (इफिसियों 3:8), उसे अपनी निर्बलता का जीवित और स्थायी बोध था। परन्तु उससे भी जीवित बोध उसे इस बात का था कि मसीह की यह प्रतिज्ञा, "मेरी भेड़ें कभी नाश न होंगी" (यूहन्ना 10:28), टल नहीं सकती।—पौलुस जानता था, यदि कोई जानता था, कि वह एक दुर्बल, छोटी नाव है जो तूफानी सागर पर तैर रही है। यदि किसी ने देखा, तो उसने देखा कि उसके चारों ओर लहरें उमड़ रही हैं और आँधी गरज रही है। परन्तु तब उसने अपने आप से दृष्टि हटाकर यीशु की ओर देखा, और वह डरा नहीं। उसे वह लंगर याद था जो परदे के भीतर है, और जो "सुरक्षित और स्थिर" है। (इब्रानियों 6:19.) उसे उसका वचन, उसका कार्य और उसकी निरन्तर मध्यस्थता की प्रार्थना याद थी जिसने उससे प्रेम किया और अपने आप को उसके लिये दे दिया। और यही बात, और कोई नहीं, उसे इतने साहस से यह कहने में समर्थ करती थी, "मेरे लिये धार्मिकता का मुकुट रखा हुआ है, और प्रभु वह मुझे देगा;" और इतने निश्चय से यह निष्कर्ष निकालने में भी, "प्रभु मुझे बचाएगा: मैं कभी लज्जित न होऊँगा।"*

मैं इस विषय के इस भाग पर और अधिक नहीं ठहरूँगा। मेरा विचार है कि यह स्वीकार किया जाएगा कि मैंने अपने इस कथन के लिये कुछ अच्छा आधार दिखा दिया है कि निश्चयता एक सच्ची बात है।

II. अब मैं उस दूसरी बात पर आता हूँ जिसकी मैंने चर्चा की थी। मैंने कहा था कि एक विश्वासी इस निश्चित आशा तक, जिसे पौलुस व्यक्त करता है, कभी न पहुँचे और फिर भी उसका उद्धार हो जाए।

मैं यह बात पूरे मन से मानता हूँ। मैं एक क्षण भी इसका विरोध नहीं करता। मैं नहीं चाहूँगा कि किसी ऐसे पश्चातापी हृदय को उदास करूँ जिसे परमेश्वर ने उदास नहीं किया, या परमेश्वर के किसी मूर्छित सन्तान को हतोत्साहित करूँ, या यह धारणा छोड़ूँ कि जब तक मनुष्य निश्चयता का अनुभव न करे, मसीह में उसका कोई भाग या अंश नहीं।

कोई व्यक्ति मसीह में उद्धार देनेवाला विश्वास रख सकता है, और फिर भी कभी वैसी निश्चित आशा का आनन्द नहीं पाता जैसा प्रेरित पौलुस ने पाया। विश्वास करना और ग्रहण किए जाने की एक धुँधली आशा रखना एक बात है; अपने विश्वास करने में "आनन्द और शान्ति" पाना और आशा में बढ़ते जाना बिलकुल दूसरी बात है। परमेश्वर की सब सन्तानों में विश्वास है; सब में निश्चयता नहीं है। मेरा विचार है कि इसे कभी नहीं भूलना चाहिए।

मैं जानता हूँ कि कुछ बड़े और भले पुरुषों का मत भिन्न रहा है। मेरा विश्वास है कि सुसमाचार के अनेक उत्तम सेवक, जिनके चरणों में मैं सहर्ष बैठना चाहूँगा, उस भेद को नहीं मानते जो मैंने बताया है। परन्तु मैं किसी मनुष्य को गुरु कहलाना नहीं चाहता। मैं किसी भी अन्य व्यक्ति के समान इस विचार से डरता हूँ कि विवेक के घावों को ऊपर-ऊपर से भर दिया जाए; परन्तु जो मत मैंने दिया है उससे भिन्न कोई भी मत मुझे प्रचार करने के लिये अत्यन्त असुविधाजनक सुसमाचार प्रतीत होगा, और ऐसा जो आत्माओं को जीवन के फाटक से बहुत समय तक दूर रखने की सम्भावना रखता है।*

मैं यह कहने से नहीं हिचकता कि अनुग्रह से मनुष्य के पास मसीह की ओर भागने के लिये पर्याप्त विश्वास हो सकता है; वास्तव में उसे थाम लेने के लिये,—वास्तव में उस पर भरोसा रखने के लिये,—वास्तव में परमेश्वर की सन्तान होने के लिये,—वास्तव में उद्धार पाने के लिये पर्याप्त विश्वास; और फिर भी अपने अन्तिम दिन तक वह बहुत चिन्ता, सन्देह और भय से कभी मुक्त न हो।

एक पुराना लेखक कहता है, "एक पत्र लिखा जा सकता है जिस पर मुहर न लगी हो; वैसे ही अनुग्रह हृदय में लिखा हो सकता है, फिर भी आत्मा ने उस पर निश्चयता की मुहर न लगाई हो।"

एक बालक किसी बड़ी सम्पत्ति का उत्तराधिकारी होकर जन्म ले सकता है, और फिर भी अपनी धन-सम्पदा से अनजान रहे; वह बचपन में जिए, बचपन में मरे, और अपनी सम्पत्ति की महानता को कभी न जाने। इसी प्रकार कोई मनुष्य मसीह के परिवार में एक शिशु हो सकता है, शिशु के समान सोचे, शिशु के समान बोले, और उद्धार पाकर भी कभी जीवित आशा का आनन्द न ले, या अपने उत्तराधिकार के वास्तविक अधिकारों को न जाने।

जब मैं निश्चयता की वास्तविकता, विशेषाधिकार और महत्व पर बल देता हूँ तब कोई मेरे अभिप्राय को गलत न समझे। मेरे साथ यह अन्याय न करें कि मैं यह सिखाता हूँ कि केवल वे ही उद्धार पाए हैं जो पौलुस के साथ कह सकें, "मैं जानता हूँ और मुझे निश्चय है,—मेरे लिये मुकुट रखा हुआ है।" मैं ऐसा नहीं कहता। मैं इस प्रकार की कोई शिक्षा नहीं देता।

यदि मनुष्य को उद्धार पाना है तो प्रभु यीशु मसीह में विश्वास उसके पास निस्सन्देह होना ही चाहिए। मैं पिता तक पहुँचने का कोई और मार्ग नहीं जानता। मुझे मसीह को छोड़ किसी और के द्वारा दया का कोई संकेत नहीं दिखता। मनुष्य को अपने पापों और खोई हुई दशा का बोध होना चाहिए,—उसे क्षमा और उद्धार के लिये यीशु के पास आना चाहिए,—उसे अपनी आशा उसी पर और केवल उसी पर रखनी चाहिए। परन्तु यदि उसमें इतना करने भर का विश्वास है, चाहे वह विश्वास कितना ही निर्बल और क्षीण क्यों न हो, तो मैं पवित्रशास्त्र के आधार पर यह वचन देता हूँ कि वह स्वर्ग से चूकेगा नहीं।

हम कभी, कभी भी महिमामय सुसमाचार की निःशुल्कता को कम न करें, और न उसके सुन्दर अनुपात को काटें। हम कभी फाटक को उससे अधिक सकरा और मार्ग को उससे अधिक कठिन न बनाएँ जितना अभिमान और पाप के प्रेम ने उसे पहले ही बना दिया है। प्रभु यीशु बड़ा तरस खानेवाला और कोमल दया का है। वह विश्वास की मात्रा को नहीं, उसके गुण को देखता है: वह उसकी मात्रा नहीं नापता, उसकी सच्चाई को देखता है। वह किसी कुचले हुए नरकट को न तोड़ेगा, और न धुआँ देती हुई बत्ती को बुझाएगा। वह कभी यह कहने का अवसर न आने देगा कि कोई क्रूस के चरणों में नाश हुआ। वह कहता है, "जो कोई मेरे पास आएगा उसे मैं कभी न निकालूँगा।" (यूहन्ना 6:37.)*

हाँ! चाहे मनुष्य का विश्वास राई के दाने के बराबर ही क्यों न हो, यदि वह उसे मसीह के पास ले आता है और उसके वस्त्र के छोर को छूने के योग्य बनाता है, तो वह उद्धार पाएगा,—उतना ही निश्चित रूप से जितना स्वर्गलोक का सबसे पुराना सन्त,—उतना ही पूर्ण और अनन्त रूप से जितना पतरस, या यूहन्ना, या पौलुस। हमारे पवित्रीकरण में कई श्रेणियाँ होती हैं। हमारे धर्मी ठहराए जाने में कोई श्रेणी नहीं होती। जो लिखा है, सो लिखा है, और वह कभी विफल न होगा: "जो कोई उस पर विश्वास करेगा,"—न कि जो कोई दृढ़ और सामर्थी विश्वास रखता हो,—"जो कोई उस पर विश्वास करेगा, वह लज्जित न होगा।" (रोमियों 10:11)।

परन्तु यह स्मरण रखा जाए कि इस सारे समय में उस दीन विश्वासी आत्मा को परमेश्वर के यहाँ अपने क्षमा और ग्रहण किए जाने की पूर्ण निश्चयता न भी हो। वह भय पर भय और सन्देह पर सन्देह से व्याकुल रह सकता है। उसके मन में अनेक प्रश्न और अनेक चिन्ताएँ,—अनेक संघर्ष और अनेक आशंकाएँ,—बादल और अंधकार,—आँधी और तूफ़ान अन्त तक बने रह सकते हैं।

मैं फिर कहता हूँ कि मैं यह उत्तरदायित्व लेता हूँ कि मसीह में केवल सीधा-सादा विश्वास मनुष्य को बचाएगा, चाहे वह कभी निश्चयता तक न पहुँचे; परन्तु मैं यह उत्तरदायित्व नहीं लेता कि वह उसे सशक्त और भरपूर सान्त्वनाओं के साथ स्वर्ग पहुँचाएगा। मैं यह उत्तरदायित्व लेता हूँ कि वह उसे सुरक्षित बन्दरगाह पर पहुँचा देगा; परन्तु यह नहीं कि वह पाल पूरे खोले, निश्चिन्त और आनन्दित होकर उस बन्दरगाह में प्रवेश करेगा। यदि वह अपने मनचाहे बन्दरगाह पर थपेड़े खाया और तूफ़ान से झकझोरा हुआ पहुँचे, और महिमा में आँखें खोलने तक अपनी सुरक्षा को कठिनाई से ही समझ पाए, तो मुझे आश्चर्य न होगा।

मेरा विश्वास है कि विश्वास और निश्चयता के बीच के इस भेद को ध्यान में रखना बहुत महत्त्वपूर्ण है। यह उन बातों को समझाता है जिन्हें धर्म के विषय में खोज करनेवाले को कभी-कभी समझना कठिन लगता है।

स्मरण रखें कि विश्वास जड़ है और निश्चयता फूल है। निःसन्देह जड़ के बिना फूल कभी नहीं हो सकता; परन्तु यह भी उतना ही निश्चित है कि जड़ तो हो सकती है और फूल नहीं।

विश्वास वह दीन काँपती हुई स्त्री है जो भीड़ में यीशु के पीछे से आई और उसके वस्त्र के छोर को छुआ। (मरकुस 5:25)। निश्चयता स्तिफनुस है जो अपने हत्यारों के बीच शान्त खड़ा होकर कहता है, "मैं स्वर्ग को खुला हुआ और मनुष्य के पुत्र को परमेश्वर के दाहिनी ओर खड़ा हुआ देखता हूँ।" (प्रेरितों के काम 7:56)।

विश्वास वह पश्चात्तापी चोर है जो पुकारता है, "हे प्रभु, मुझे स्मरण कर।" (लूका 23:42)। निश्चयता अय्यूब है, जो घावों से भरा हुआ धूल में बैठा कहता है, "मुझे तो निश्चय है कि मेरा छुड़ानेवाला जीवित है" (अय्यूब 19:25); "चाहे वह मुझे घात भी करे, फिर भी मैं उस पर भरोसा रखूँगा।" (अय्यूब 13:15)।

विश्वास पतरस की वह डूबते समय की पुकार है, जब वह डूबने लगा: "हे प्रभु, मुझे बचा!" (मत्ती 14:30)। निश्चयता वही पतरस है, जो बाद के दिनों में महासभा के सामने घोषणा करता है, "यह वही पत्थर है जिसे तुम राजमिस्त्रियों ने तुच्छ जाना और वह कोने का सिरा हो गया। और किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं; क्योंकि स्वर्ग के नीचे मनुष्यों को कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया जिसके द्वारा हम उद्धार पा सकें।" (प्रेरितों के काम 4:11, 12)।

विश्वास वह चिन्तित, काँपती हुई वाणी है, "हे प्रभु, मैं विश्वास करता हूँ; मेरे अविश्वास का उपाय कर।" (मरकुस 9:24)। निश्चयता वह निश्चिन्त चुनौती है, "परमेश्वर के चुने हुओं पर दोष कौन लगाएगा? कौन है जो दण्ड की आज्ञा देगा?" (रोमियों 8:33, 34)। विश्वास शाऊल है जो दमिश्क में यहूदा के घर में शोकित, अन्धा और अकेला प्रार्थना कर रहा है। (प्रेरितों के काम 9:11)। निश्चयता पौलुस है, वह वृद्ध बन्दी, जो शान्ति से कब्र की ओर देखकर कहता है, "मैं जानता हूँ कि मैं ने किस पर विश्वास किया है। मेरे लिये धार्मिकता का मुकुट रखा हुआ है।" (2 तीमुथियुस 1:12; 4:8)।

विश्वास जीवन है। यह कितना बड़ा आशीर्वाद है! जीवन और मृत्यु के बीच की खाई का वर्णन या अनुभव कौन कर सकता है? "जीवित कुत्ता मरे हुए सिंह से अच्छा है।" (सभोपदेशक 9:4)। फिर भी जीवन दुर्बल, रोगी, अस्वस्थ, पीड़ित, परीक्षित, चिन्तित, थका हुआ, बोझिल, आनन्दहीन और अन्त तक मुस्कानहीन भी हो सकता है। निश्चयता जीवन से बढ़कर है। वह स्वास्थ्य, बल, सामर्थ्य, ओज, सक्रियता, ऊर्जा, पुरुषार्थ और सौन्दर्य है।

हमारे सामने प्रश्न यह नहीं है कि "उद्धार पाया या नहीं पाया," परन्तु यह कि "विशेषाधिकार है या नहीं।"—प्रश्न यह नहीं कि शान्ति है या नहीं, परन्तु यह कि बड़ी शान्ति है या थोड़ी शान्ति।—प्रश्न इस संसार के भटकनेवालों और मसीह की पाठशाला के बीच का नहीं है: यह तो केवल उसी पाठशाला के भीतर का प्रश्न है: यह पहली कक्षा और अन्तिम कक्षा के बीच का है।

जिसके पास विश्वास है वह भला करता है। यदि मैं यह सोच पाता कि इस लेख के सब पाठकों के पास यह है तो मैं कितना सुखी होता। धन्य, तीन बार धन्य हैं वे जो विश्वास करते हैं! वे सुरक्षित हैं। वे धोए गए हैं। वे धर्मी ठहराए गए हैं। वे नरक की सामर्थ्य से परे हैं। शैतान अपनी सारी द्वेष-भावना के साथ भी उन्हें कभी मसीह के हाथ से छीन न सकेगा। परन्तु जिसके पास निश्चयता है वह कहीं अधिक अच्छा करता है,—वह अधिक देखता है, अधिक अनुभव करता है, अधिक जानता है, अधिक आनन्द पाता है, और उसके पास व्यवस्थाविवरण में कहे गए वे दिन अधिक होते हैं, अर्थात् "पृथ्वी पर स्वर्ग के दिन।" (व्यवस्थाविवरण 11:21)।*

III. अब मैं उस तीसरी बात की ओर बढ़ता हूँ जिसकी चर्चा मैं ने की थी। मैं कुछ कारण बताऊँगा कि दृढ़ आशा की अभिलाषा क्यों अत्यन्त करने योग्य है

मैं इस बात पर विशेष ध्यान चाहता हूँ। मैं हृदय से चाहता हूँ कि निश्चयता की खोज जितनी की जाती है उससे अधिक की जाए। विश्वास करनेवालों में बहुत-से लोग सन्देह से आरम्भ करते हैं और सन्देह करते ही चलते हैं, सन्देह में जीते हैं और सन्देह में मरते हैं, और एक प्रकार के कुहासे में स्वर्ग पहुँचते हैं।

"आशाओं" और "भरोसों" के विषय में तिरस्कार के ढंग से बोलना मुझे शोभा नहीं देता। परन्तु मुझे डर है कि हम में से बहुत-से उन्हीं में सन्तुष्ट होकर बैठ जाते हैं और आगे नहीं बढ़ते। मैं चाहता हूँ कि प्रभु के परिवार में "शायद-वाले" कम और ऐसे लोग अधिक हों जो कह सकें, "मैं जानता हूँ और मुझे निश्चय है।" ओह, कि सब विश्वासी उत्तम वरदानों की लालसा रखें और उससे कम में सन्तुष्ट न हों! बहुत-से लोग उस पूर्ण आशीर्वाद की धारा से चूक जाते हैं जिसे सुसमाचार पहुँचाने के लिये था। बहुत-से लोग अपनी आत्मा को दीन और भूखी दशा में रखते हैं, जबकि उनका प्रभु कह रहा है, "हे प्रियो, खाओ और भरपूर पीओ।" "माँगो और पाओ कि तुम्हारा आनन्द पूरा हो जाए।" (श्रेष्ठगीत 5:1; यूहन्ना 16:24)।

(1) तो पहली बात यह स्मरण रखें कि निश्चयता की अभिलाषा इसलिये करनी चाहिए कि वह वर्तमान में सान्त्वना और शान्ति देती है।

संदेह और भय मसीह में एक सच्चे विश्वासी के बहुत से आनन्द को बिगाड़ने की सामर्थ्य रखते हैं। अनिश्चितता और असमंजस किसी भी दशा में बुरे होते हैं,—चाहे वह हमारे स्वास्थ्य, हमारी सम्पत्ति, हमारे परिवारों, हमारे स्नेह-सम्बन्धों या हमारे सांसारिक व्यवसायों की बात हो,—परन्तु हमारी आत्माओं के विषय में वे जितने बुरे हैं उतने और कहीं नहीं। और जब तक कोई विश्वासी "मुझे आशा है" और "मुझे भरोसा है" से आगे नहीं बढ़ पाता, तब तक वह स्पष्टतः अपनी आत्मिक दशा के विषय में कुछ अनिश्चितता अनुभव करता है। इन शब्दों में ही यह बात निहित है। वह "मुझे आशा है" इसलिए कहता है क्योंकि वह "मैं जानता हूँ" कहने का साहस नहीं करता।

अब निश्चयता परमेश्वर की सन्तान को इस पीड़ादायक प्रकार की दासता से बहुत हद तक छुड़ाती है, और इस प्रकार उसकी शान्ति में बड़ा योगदान देती है। वह उसे यह अनुभव करने योग्य बनाती है कि जीवन का सबसे बड़ा काम निपटाया जा चुका काम है, सबसे बड़ा ऋण चुकाया जा चुका ऋण है, सबसे बड़ा रोग चंगा हो चुका रोग है, और सबसे बड़ा कार्य पूरा हो चुका कार्य है; और तब अन्य सब काम, रोग, ऋण और कार्य इनकी तुलना में छोटे हैं। इस रीति से निश्चयता उसे क्लेश में धीरज रखनेवाला, शोक में शान्त, दुःख में अडिग, बुरे समाचारों से न डरनेवाला, और हर दशा में सन्तुष्ट बनाती है, क्योंकि वह उसके हृदय को स्थिरता देती है। वह उसके कड़वे प्यालों को मीठा करती है; उसकी क्रूसों का बोझ हलका करती है; जिन ऊबड़-खाबड़ स्थानों से वह होकर चलता है उन्हें समतल करती है; मृत्यु की छाया की घाटी को उजियाला करती है। वह उसे सदा यह अनुभव कराती है कि उसके पाँवों के नीचे कुछ ठोस है, और उसके हाथों में कुछ दृढ़ है,—मार्ग में एक निश्चित मित्र, और अन्त में एक निश्चित घर।*

निश्चयता मनुष्य को दरिद्रता और हानि सहने में सहायता देगी। वह उसे यह कहना सिखाएगी, "मैं जानता हूँ कि स्वर्ग में मेरे लिए एक उत्तम और स्थायी धन रखा है। चाँदी और सोना मेरे पास नहीं, परन्तु अनुग्रह और महिमा मेरी है, और ये कभी पंख लगाकर उड़ नहीं सकतीं। चाहे अंजीर के वृक्ष में फूल न लगें, तौभी मैं प्रभु में आनन्दित रहूँगा।" (हबक्कूक 3:17, 18।)

निश्चयता परमेश्वर की सन्तान को सबसे भारी शोकों में सम्भालेगी, और उसे यह अनुभव करने में सहायता देगी कि "कुशल है।" निश्चय रखनेवाली आत्मा कहेगी, "यद्यपि प्रिय जन मुझसे ले लिए गए, तौभी यीशु वैसा ही है, और युगानुयुग जीवित है। मसीह मरे हुओं में से जी उठकर फिर कभी नहीं मरता। यद्यपि मेरा घर वैसा नहीं जैसा शरीर और लहू चाहता, तौभी मेरे साथ एक सनातन वाचा बाँधी गई है, जो सब बातों में ठीक की हुई और अटल है।" (2 राजाओं 4:26; इब्रानियों 13:8; रोमियों 6:9; 2 शमूएल 23:5।)

निश्चयता मनुष्य को बन्दीगृह में भी परमेश्वर की स्तुति और धन्यवाद करने योग्य बनाएगी, जैसे फिलिप्पी में पौलुस और सीलास ने किया। वह विश्वासी को घोर अन्धकारमय रात में भी गीत, और सब कुछ विपरीत प्रतीत होने पर भी आनन्द दे सकती है।* (अय्यूब 35:10; भजन संहिता 42:8।)

निश्चयता मनुष्य को अगले दिन मृत्यु की पूरी सम्भावना के बीच भी सोने योग्य बनाएगी, जैसे पतरस हेरोदेस के कारागार में सोया था। वह उसे यह कहना सिखाएगी, "मैं शान्ति से लेट जाऊँगा और सो जाऊँगा; क्योंकि हे यहोवा, केवल तू ही मुझे बेखटके रहने देता है।" (भजन संहिता 4:8।)

निश्चयता मनुष्य को मसीह के नाम के लिए अपमान सहने में आनन्दित कर सकती है, जैसा यरूशलेम में बन्दीगृह में डाले जाने पर प्रेरितों ने किया। (प्रेरितों के काम 5:41।) वह उसे स्मरण कराएगी कि वह "आनन्दित और मगन" हो सकता है (मत्ती 5:12), और स्वर्ग में महिमा का एक अति भारी बोझ रखा है जो सब कुछ की क्षतिपूर्ति कर देगा। (2 कुरिन्थियों 4:17।)

निश्चयता विश्वासी को हिंसक और पीड़ादायक मृत्यु का भी निडर होकर सामना करने योग्य बनाएगी, जैसा स्तिुफनुस ने मसीह की कलीसिया के आरम्भ में किया, और जैसा हमारे अपने देश में क्रैनमर, रिडले, हूपर, लैटिमर, रोजर्स और टेलर ने किया। वह उसके हृदय में ये वचन ले आएगी, "जो शरीर को घात करते हैं, और उसके बाद और कुछ नहीं कर सकते, उनसे मत डरो।" (लूका 12:4।) "हे प्रभु यीशु, मेरी आत्मा को ग्रहण कर।" (प्रेरितों के काम 7:59।)†

निश्चयता मनुष्य को पीड़ा और रोग में सम्भालेगी, उसका पूरा बिछौना बिछाएगी, और उसके मरण-तकिये को कोमल करेगी। वह उसे यह कहने योग्य बनाएगी, "यदि हमारा पृथ्वी का घर गिराया जाए, तो हमारे पास परमेश्वर की ओर से एक भवन है।" (2 कुरिन्थियों 5:1।) "मेरी लालसा है कि कूच करके मसीह के साथ रहूँ।" (फिलिप्पियों 1:23।) "मेरे शरीर और मेरे हृदय दोनों हार गए हैं, परन्तु परमेश्वर सर्वदा के लिए मेरे हृदय की चट्टान और मेरा भाग है।"* (भजन संहिता 73:26।)

निश्चयता मृत्यु की घड़ी में जो प्रबल शान्ति दे सकती है, वह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात है। हम इस पर भरोसा कर सकते हैं कि हम निश्चयता को कभी इतना मूल्यवान न समझेंगे जितना तब जब हमारे मरने की बारी आएगी। उस भयानक घड़ी में बहुत कम विश्वासी ऐसे होते हैं जो "निश्चित आशा" के मूल्य और विशेषाधिकार को न पहचान लें, चाहे जीवन भर उन्होंने इसके विषय में कुछ भी सोचा हो। जब तक सूर्य चमकता है और देह में बल है, तब तक साधारण "आशाओं" और "भरोसों" पर जी लेना ठीक है; परन्तु जब हम मरने लगेंगे, तब हम यह कह सकने की इच्छा करेंगे कि "मैं जानता हूँ" और "मैं अनुभव करता हूँ।" मृत्यु की नदी एक ठंडी धारा है, और हमें उसे अकेले पार करना है। कोई सांसारिक मित्र हमारी सहायता नहीं कर सकता। अन्तिम शत्रु, भयानकों का राजा, एक बलवन्त बैरी है। जब हमारी आत्माएँ विदा हो रही हों, तब निश्चयता के प्रबल दाखमधु के समान कोई सुधा नहीं।

बीमारों की भेंट के लिए प्रार्थना-पुस्तक की सेवा में एक सुन्दर वाक्य है: "सर्वशक्तिमान प्रभु, जो उन सब के लिए जो उस पर भरोसा रखते हैं एक अति दृढ़ गढ़ है, अब और सदा तेरी रक्षा करनेवाला हो, और तुझे जानने और अनुभव करने दे कि स्वर्ग के नीचे और कोई नाम नहीं जिसके द्वारा तू स्वास्थ्य और उद्धार पा सके, केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह का नाम।" उस सेवा के रचनेवालों ने वहाँ बड़ी बुद्धि दिखाई। उन्होंने देखा कि जब आँखें धुँधली हो जाती हैं, हृदय निर्बल हो जाता है और आत्मा विदा होने पर होती है, तब मसीह ने हमारे लिए जो किया उसे जानना और अनुभव करना अवश्य है, नहीं तो पूर्ण शान्ति नहीं हो सकती।*

(2) एक और बात के लिए भी स्मरण रखें कि निश्चयता चाहने योग्य है, क्योंकि वह मसीही को एक सक्रिय परिश्रमी मसीही बनाने की प्रवृत्ति रखती है।

साधारणतः पृथ्वी पर मसीह के लिए उतना कोई नहीं करता जितना वे करते हैं जो स्वर्ग में निःशुल्क प्रवेश का पूर्ण भरोसा रखते हैं, और अपने कर्मों पर नहीं, परन्तु मसीह के पूरे किए हुए कार्य पर भरोसा रखते हैं। यह चकित करनेवाली बात लगती होगी, मैं मानता हूँ, परन्तु यह सत्य है।

जिस विश्वासी में निश्चित आशा नहीं होती, वह अपना बहुत सा समय अपनी दशा के विषय में मन ही मन खोज-बीन करने में बिताएगा। एक घबराए हुए, वहमी रोगी के समान वह अपनी ही बीमारियों, अपने ही सन्देहों और प्रश्नों, अपने ही संघर्षों और बिगाड़ से भरा रहेगा। संक्षेप में, तुम प्रायः देखोगे कि वह अपने भीतरी युद्ध में इतना डूबा रहता है कि उसे और बातों के लिये बहुत कम अवकाश मिलता है, और परमेश्वर के लिये काम करने को बहुत कम समय।

परन्तु जिस विश्वासी में पौलुस के समान निश्चित आशा है, वह इन सताने वाली उलझनों से मुक्त है। वह अपने क्षमा और ग्रहण किए जाने के विषय में सन्देहों से अपने प्राण को व्याकुल नहीं करता। वह लहू से मुहरबन्द उस सनातन वाचा को, अपने प्रभु और उद्धारकर्ता के पूर्ण किए हुए कार्य को और कभी न टलने वाले वचन को देखता है, और इसलिये अपने उद्धार को एक पक्की बात मानता है।

और इस प्रकार वह प्रभु के कार्य में अविभाजित ध्यान दे सकता है, और अन्त में अधिक कर सकता है।*

इसके दृष्टान्त के लिये दो अंग्रेज़ प्रवासियों को लो, और मान लो कि वे न्यूज़ीलैंड या ऑस्ट्रेलिया में साथ-साथ बसाए गए हैं। दोनों को साफ़ करने और जोतने के लिये भूमि का एक-एक टुकड़ा दो। जो भाग उन्हें दिए जाएँ वे परिमाण और उपज दोनों में एक समान हों। उस भूमि को हर आवश्यक कानूनी लिखत से उनके लिये पक्का कर दो; वह उन्हें और उनके वंशजों को सदा के लिये निष्कंटक स्वामित्व के रूप में सौंपी जाए; वह हस्तान्तरण सार्वजनिक रूप से दर्ज किया जाए, और मनुष्य की चतुराई से जितने भी दस्तावेज़ और प्रमाण बन सकें, उनसे वह सम्पत्ति उनके लिये सुरक्षित कर दी जाए।

अब मान लो कि उनमें से एक अपनी भूमि को साफ़ करने और जोतने में लग जाता है, और दिन-प्रतिदिन बिना रुके, बिना थमे उस पर परिश्रम करता है।

इसी बीच मान लो कि दूसरा बार-बार अपना काम छोड़कर सार्वजनिक अभिलेखालय जाता है और पूछता है कि क्या वह भूमि सचमुच उसी की है, कहीं कोई भूल तो नहीं हुई, और क्या अन्ततः उन कानूनी लिखतों में, जिनसे वह उसे सौंपी गई थी, कोई त्रुटि तो नहीं है।

पहला कभी अपने अधिकार पर सन्देह नहीं करेगा, बस लगन से काम करता जाएगा। दूसरे को अपने अधिकार का शायद ही कभी निश्चय होगा, और वह अपना आधा समय सिडनी, मेलबर्न या ऑकलैंड जाकर उसके विषय में व्यर्थ पूछताछ करने में बिताएगा।

अब एक वर्ष के बाद इन दोनों में से किसने अधिक उन्नति की होगी? किसने अपनी भूमि के लिये सबसे अधिक किया होगा, सबसे अधिक भूमि जोतने के अधीन की होगी, दिखाने को सबसे अच्छी फ़सलें पाई होंगी, और सब प्रकार से सबसे अधिक समृद्ध होगा?

साधारण समझ वाला कोई भी इस प्रश्न का उत्तर दे सकता है। मुझे उत्तर देने की आवश्यकता नहीं। केवल एक ही उत्तर हो सकता है। अविभाजित ध्यान सदा सबसे बड़ी सफलता पाता है।

"आकाश के भवनों" पर हमारे अधिकार के विषय में भी ऐसा ही है। जिस विश्वासी को अपना अधिकार स्पष्ट दिखाई देता है, और जो अविश्वासी सन्देहों, प्रश्नों और हिचकिचाहटों से विचलित नहीं होता, वही अपने मोल लेने वाले प्रभु के लिये सबसे अधिक करेगा। प्रभु का आनन्द उस मनुष्य का बल होगा। दाऊद कहता है, "अपने किए हुए उद्धार का हर्ष मुझे फिर दे, और उदार आत्मा देकर मुझे सम्भाल। तब मैं अपराधियों को तेरा मार्ग सिखाऊँगा।" (भजन संहिता 51:12।)

प्रेरितों जैसे परिश्रमी मसीही कभी नहीं हुए। वे मानो परिश्रम करने के लिये ही जीते थे। मसीह का कार्य सचमुच उनका भोजन और पेय था। उन्होंने अपने प्राण को अपने लिये प्रिय न जाना। उन्होंने खर्च किया और स्वयं खर्च हुए। उन्होंने सुख-चैन, स्वास्थ्य और संसारी सुविधा को क्रूस के चरणों में रख दिया। और मेरा विश्वास है कि इसका एक बड़ा कारण उनकी निश्चित आशा थी। वे ऐसे मनुष्य थे जो कह सकते थे, "हम जानते हैं कि हम परमेश्वर से हैं, और सारा संसार उस दुष्ट के वश में पड़ा है।" (1 यूहन्ना 5:19।)

(3) एक और बात के लिये स्मरण रखें कि निश्चयता चाहने योग्य है, क्योंकि वह मसीही को दृढ़ निश्चय वाला मसीही बनाने की प्रवृत्ति रखती है।

परमेश्वर की दृष्टि में अपनी दशा के विषय में अनिश्चय और सन्देह एक भारी बुराई है, और बहुत सी बुराइयों की जननी है। यह प्रायः प्रभु के पीछे चलने में डगमगाता और अस्थिर चाल उत्पन्न करता है। निश्चयता बहुत सी गाँठें काटने में और मसीही कर्तव्य के मार्ग को स्पष्ट और सीधा बनाने में सहायता करती है।

बहुत से लोग, जिनके विषय में हम आशा करते हैं कि वे परमेश्वर की सन्तान हैं और उनमें सच्चा अनुग्रह है, चाहे कितना ही निर्बल हो, आचरण की बातों में सन्देहों से लगातार उलझे रहते हैं। "क्या हमें अमुक काम करना चाहिए? क्या हम यह पारिवारिक रीति छोड़ दें? क्या हमें उस संगति में जाना चाहिए? मिलने-जुलने में हम सीमा कहाँ खींचें? हमारे पहनावे और सत्कार का माप क्या हो? क्या किसी भी परिस्थिति में हमें कभी नाचना नहीं है, ताश को हाथ नहीं लगाना है, आमोद-प्रमोद की सभाओं में नहीं जाना है?" ये ऐसे प्रश्न हैं जो उन्हें निरन्तर कष्ट देते प्रतीत होते हैं। और प्रायः, बहुत बार, उनकी उलझन की सीधी जड़ यह होती है कि उन्हें निश्चय नहीं कि वे स्वयं परमेश्वर की सन्तान हैं। उन्होंने अभी यह बात तय नहीं की कि वे फाटक के किस ओर हैं। वे नहीं जानते कि वे जहाज़ के भीतर हैं या नहीं।

उन्हें भली-भाँति लगता है कि परमेश्वर की सन्तान को एक निश्चित रीति से चलना चाहिए; परन्तु बड़ा प्रश्न यह है, "क्या वे स्वयं परमेश्वर की सन्तान हैं?" यदि उन्हें केवल यह अनुभव होता कि वे हैं, तो वे सीधे आगे बढ़ते और दृढ़ मार्ग अपनाते। परन्तु इसके विषय में निश्चित न होने के कारण उनका विवेक सदा हिचकिचाता और रुका रहता है। शैतान कानों में कहता है, "शायद अन्त में तुम केवल कपटी निकलो; तुम्हें दृढ़ मार्ग अपनाने का क्या अधिकार है? प्रतीक्षा करो जब तक तुम सचमुच मसीही न बन जाओ।" और यह फुसफुसाहट प्रायः पलड़ा झुका देती है, और किसी दुःखद समझौते या संसार के साथ दयनीय अनुरूपता की ओर ले जाती है!

मेरा विश्वास है कि आज इतने लोगों के संसार के विषय में आचरण में असंगति, ढुलमुलपन, असन्तोषजनकता और आधे मन की प्रवृत्ति का यही एक मुख्य कारण है। उनका विश्वास टूट जाता है। उन्हें निश्चय नहीं होता कि वे मसीह के हैं, इसलिये संसार से नाता तोड़ने में उन्हें हिचक होती है। वे पुराने मनुष्यत्व की सब चाल छोड़ने से कतराते हैं, क्योंकि उन्हें पूरा भरोसा नहीं कि उन्होंने नया मनुष्यत्व पहन लिया है। संक्षेप में, मुझे थोड़ा भी सन्देह नहीं कि "दो विचारों के बीच लँगड़ाते रहने" का एक गुप्त कारण निश्चयता का अभाव है। जब लोग दृढ़ता से कह सकते हैं, "यहोवा ही परमेश्वर है," तब उनका मार्ग बहुत स्पष्ट हो जाता है। (1 राजाओं 18:39।)

(4) अन्त में यह स्मरण रखें कि निश्चयता चाहने योग्य है, क्योंकि वह सबसे पवित्र मसीही बनाने की प्रवृत्ति रखती है।

यह भी अद्भुत और विचित्र सुनाई देता है, फिर भी सत्य है। यह सुसमाचार के विरोधाभासों में से एक है, जो पहली दृष्टि में तर्क और सामान्य बुद्धि के विपरीत लगता है, फिर भी तथ्य है। कार्डिनल बेलार्माइन शायद ही कभी सत्य से इतनी दूर गया होगा जितना तब, जब उसने कहा, "निश्चयता लापरवाही और आलस्य की ओर ले जाती है।" जिसे मसीह ने सेंतमेंत क्षमा किया है, वह मसीह की महिमा के लिए सदा बहुत कुछ करेगा, और जो इस क्षमा की पूर्ण निश्चयता का आनन्द लेता है, वह साधारणतः परमेश्वर के साथ अत्यन्त घनिष्ठ संगति में चलता रहेगा। यह विश्वासयोग्य वचन है और सब विश्वासियों के स्मरण रखने योग्य है, "और जो कोई उस पर यह आशा रखता है, वह अपने आप को वैसा ही पवित्र करता है, जैसा वह पवित्र है।" (1 यूहन्ना 3:3।) जो आशा पवित्र नहीं करती, वह उपहास, भुलावा और फन्दा है।*

अपने हृदय और जीवन पर चौकसी रखने की सबसे अधिक सम्भावना उन्हीं में है जो परमेश्वर के साथ घनिष्ठ सहभागिता में जीने की शान्ति को जानते हैं। वे अपने विशेषाधिकार को अनुभव करते हैं और उसे खो देने से डरेंगे। वे उस ऊँची दशा से गिरने से, और अपने तथा मसीह के बीच बादल ले आकर अपनी शान्ति बिगाड़ने से भय खाएँगे। जो यात्रा पर थोड़े ही धन के साथ निकलता है, वह खतरे की कम चिन्ता करता है और इसकी परवाह नहीं करता कि कितनी देर रात तक चलता रहे। इसके विपरीत जो सोना और रत्न लेकर चलता है, वह सावधान यात्री होगा। वह अपने मार्ग, ठहरने के स्थान और संगी-साथियों को भली-भाँति परखेगा और कोई जोखिम नहीं उठाएगा। एक पुरानी कहावत है, चाहे वह विज्ञान की दृष्टि से कितनी ही अशुद्ध हो, कि स्थिर तारे ही सबसे अधिक काँपते हैं। जो मनुष्य परमेश्वर के मेल-मिलाप किए हुए मुख की ज्योति का सबसे अधिक आनन्द लेता है, वह उसकी धन्य सान्त्वनाओं के खो जाने से काँपते हुए डरेगा, और ऐसा कुछ भी करने से जिससे पवित्र आत्मा को शोक पहुँचे, सावधानी से भय खाएगा।

मैं ये चार बातें सब मसीही कहलानेवालों के गम्भीर विचार के लिए प्रस्तुत करता हूँ। क्या आप चाहेंगे कि अपने चारों ओर सनातन भुजाओं को अनुभव करें, और यीशु की वाणी को प्रतिदिन अपनी आत्मा के निकट आते और यह कहते सुनें, "मैं तेरा उद्धार हूँ"?—क्या आप अपनी पीढ़ी में दाख की बारी के उपयोगी मज़दूर होना चाहेंगे?—क्या आप चाहेंगे कि सब लोग आपको मसीह के साहसी, दृढ़, निर्णायक, एकचित्त और समझौता न करनेवाले अनुयायी के रूप में जानें?—क्या आप आत्मिक मन और पवित्रता में उत्कृष्ट होना चाहेंगे?—मुझे सन्देह नहीं कि कुछ पाठक कहेंगे, "हमारे हृदय यही बातें चाहते हैं। हम इनके लिए तरसते हैं। हम इनके लिए हाँफते हैं; परन्तु ये हमसे दूर प्रतीत होती हैं।"

अब क्या आपके मन में कभी यह बात नहीं आई कि निश्चयता की उपेक्षा ही आपकी सब विफलताओं का मुख्य रहस्य हो सकती है,—कि जिस थोड़े से विश्वास से आप सन्तुष्ट हैं, वही आपकी अल्प शान्ति का कारण हो सकता है? क्या आप इसे विचित्र बात समझ सकते हैं कि आपके गुण क्षीण और मुरझाए हुए हैं, जबकि विश्वास, जो उन सबकी जड़ और जननी है, निर्बल और दुर्बल रहने दिया जाता है?

आज ही मेरी सलाह मानिए। विश्वास की वृद्धि चाहिए। प्रेरित पौलुस के समान उद्धार की निश्चित आशा चाहिए। परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर सीधा, बालक-सा भरोसा पाने का यत्न कीजिए। पौलुस के साथ यह कह सकने का यत्न कीजिए, "मैं जानता हूँ कि मैं ने किस पर विश्वास किया है: मुझे निश्चय है कि वह मेरा है, और मैं उसका हूँ।"

सम्भव है आप ने दूसरे मार्ग और उपाय आज़माए हों और पूरी तरह विफल रहे हों। अपनी योजना बदलिए। दूसरी दिशा में चलिए। अपने सन्देह त्याग दीजिए। प्रभु की भुजा पर और अधिक पूरी तरह टिक जाइए। निःसंकोच भरोसा करने से आरम्भ कीजिए। प्रभु को उसके वचन पर मान लेने की अपनी अविश्वासी हिचकिचाहट को दूर फेंक दीजिए। आइए, और अपने आप को, अपनी आत्मा को और अपने पापों को अपने अनुग्रहकारी उद्धारकर्ता पर डाल दीजिए। सीधे विश्वास से आरम्भ कीजिए, और शेष सब बातें शीघ्र ही आपको दे दी जाएँगी।*

IV. अब मैं उस अन्तिम बात पर आता हूँ जिसकी मैंने चर्चा की थी। मैंने प्रतिज्ञा की थी कि कुछ सम्भावित कारण बताऊँगा कि निश्चित आशा इतनी कम क्यों पाई जाती है। मैं यह बहुत संक्षेप में करूँगा।

यह बहुत गम्भीर प्रश्न है, और हम सब के हृदय में गहरी खोज जगानी चाहिए। निश्चय ही मसीह के बहुत कम लोग निश्चयता की इस धन्य आत्मा तक पहुँचते दिखाई देते हैं। अपेक्षाकृत बहुत से विश्वास करते हैं, परन्तु थोड़े ही पूरी तरह आश्वस्त हैं। अपेक्षाकृत बहुतों में उद्धार करनेवाला विश्वास है, परन्तु थोड़ों में वह महिमामय भरोसा जो पौलुस की भाषा में चमकता है। मुझे लगता है कि हम सब को मानना पड़ेगा कि ऐसा ही है।

अब ऐसा क्यों है?—जिस बात को खोजने की दो प्रेरितों ने हमें दृढ़ आज्ञा दी है, उसका अनुभवजन्य ज्ञान इन पिछले दिनों में थोड़े ही विश्वासियों को क्यों है? निश्चित आशा इतनी दुर्लभ क्यों है?

मैं पूरी नम्रता से इस विषय में कुछ सुझाव देना चाहता हूँ। मैं जानता हूँ कि बहुतों ने कभी निश्चयता नहीं पाई, फिर भी मैं पृथ्वी पर और स्वर्ग में भी उनके चरणों में बैठने में प्रसन्न होऊँगा। सम्भव है प्रभु अपनी कुछ सन्तानों के स्वाभाविक स्वभाव में कुछ ऐसा देखता हो जिससे निश्चयता उनके लिए भली नहीं है। सम्भव है आत्मिक स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए उन्हें बहुत नम्र बनाए रखना आवश्यक हो। परमेश्वर ही जानता है। फिर भी, सब छूट देने के बाद, मुझे भय है कि निश्चित आशा से रहित बहुत से विश्वासी हैं जिनकी दशा प्रायः ऐसे कारणों से समझाई जा सकती है।

(1) मुझे सन्देह है कि एक अत्यन्त सामान्य कारण धर्मी ठहराए जाने के सिद्धान्त की त्रुटिपूर्ण समझ है।

मेरा झुकाव यह मानने की ओर है कि बहुत से विश्वासियों के मन में धर्मी ठहराया जाना और पवित्रीकरण अनजाने में एक-दूसरे में मिल गए हैं। वे सुसमाचार का यह सत्य ग्रहण करते हैं कि यदि हम मसीह के सच्चे अंग हैं तो हम में कुछ किया जाना चाहिए, और हमारे लिए भी कुछ किया गया है; और इस सीमा तक वे ठीक हैं। परन्तु फिर, शायद बिना जाने ही, वे यह विचार ग्रहण करते प्रतीत होते हैं कि उनका धर्मी ठहराया जाना किसी न किसी मात्रा में उनके भीतर की किसी बात से प्रभावित होता है। वे स्पष्ट नहीं देखते कि परमेश्वर के यहाँ हमारे ग्रहण किए जाने का एकमात्र आधार मसीह का कार्य है, उनका अपना कर्म नहीं—न पूर्ण रूप से, न आंशिक रूप से, न सीधे, न परोक्ष रूप से; कि धर्मी ठहराया जाना हमसे बाहर की बात है, जिसके लिए हमारी ओर से सीधे विश्वास के अतिरिक्त कुछ भी आवश्यक नहीं,—और कि सबसे निर्बल विश्वासी भी उतना ही पूर्ण और सम्पूर्ण रूप से धर्मी ठहराया गया है जितना सबसे बलवन्त।*

बहुत से लोग यह भूल जाते प्रतीत होते हैं कि हम पापी होकर ही उद्धार पाते और धर्मी ठहराए जाते हैं, केवल पापी ही; और यदि हम मतूशेलह की आयु तक भी जीवित रहें, तो भी इससे ऊँचे किसी पद पर कभी नहीं पहुँच सकते। छुड़ाए हुए पापी, धर्मी ठहराए गए पापी, और नए बनाए गए पापी तो हम अवश्य होंगे,—परन्तु पापी, पापी, पापी हम अन्त तक सदा बने रहेंगे। वे यह समझते नहीं जान पड़ते कि हमारे धर्मी ठहराए जाने और हमारे पवित्रीकरण के बीच बड़ा भारी अन्तर है। हमारा धर्मी ठहराया जाना एक सिद्ध और पूरा किया हुआ कार्य है, और उसमें कोई घटा-बढ़ी नहीं होती। हमारा पवित्रीकरण अपूर्ण और अधूरा है, और जीवन की अन्तिम घड़ी तक ऐसा ही रहेगा। वे आशा करते प्रतीत होते हैं कि विश्वासी अपने जीवन के किसी समय कुछ हद तक भ्रष्टता से मुक्त हो सकता है और एक प्रकार की आन्तरिक सिद्धता पा सकता है। और जब वे अपने मन में यह स्वर्गदूतों जैसी दशा नहीं पाते, तो तुरन्त निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि उनकी दशा में अवश्य कुछ बहुत बड़ी गड़बड़ी है। इस प्रकार वे जीवन भर शोक करते हुए चलते हैं,—इस भय से दबे हुए कि मसीह में उनका कोई भाग या अधिकार नहीं, और सांत्वना पाने से इनकार करते हुए।

आइए, इस बात को भली-भाँति तौलें। यदि कोई विश्वासी जन निश्चयता चाहता है और उसे नहीं पाया है, तो वह सबसे पहले अपने आप से पूछे कि क्या उसे पूरा निश्चय है कि वह विश्वास में खरा है, क्या वह भिन्न बातों में भेद करना जानता है, और क्या धर्मी ठहराए जाने के विषय में उसकी आँखें भली-भाँति साफ़ हैं। निश्चयता पाने की आशा करने से पहले उसे यह जानना होगा कि केवल विश्वास करना और विश्वास से धर्मी ठहराया जाना क्या है।

इस विषय में, और अन्य बहुत से विषयों में भी, पुराना गलातियों वाला भ्रम सिद्धान्त और व्यवहार, दोनों में भूल का सबसे उपजाऊ स्रोत है। लोगों को मसीह के विषय में, और मसीह ने उनके लिए क्या किया है, इसके विषय में अधिक स्पष्ट समझ पाने का यत्न करना चाहिए। सुखी है वह मनुष्य जो "व्यवस्था के कामों के बिना विश्वास से धर्मी ठहराए जाने" को सचमुच समझता है।

(2) निश्चयता के अभाव का एक और सामान्य कारण है, अनुग्रह में बढ़ने के विषय में आलस्य।

मुझे सन्देह है कि बहुत से सच्चे विश्वासी इस विषय में खतरनाक और पवित्रशास्त्र-विरुद्ध विचार रखते हैं; मेरा मतलब यह नहीं कि जान-बूझकर, पर वे उन्हें रखते अवश्य हैं। बहुतों को लगता है कि एक बार मन फिराने के बाद उन्हें और कुछ ध्यान देने को नहीं रहता, और उद्धार की दशा मानो एक आराम-कुर्सी है, जिस पर वे बस चुपचाप बैठे, पीठ टिकाए, सुखी रह सकते हैं। वे मानो सोचते हैं कि अनुग्रह उन्हें इसलिए दिया गया है कि वे उसका आनन्द लें, और भूल जाते हैं कि वह तोड़े की नाईं इसलिए दिया गया है कि उसे काम में लाया जाए, लगाया जाए और बढ़ाया जाए। ऐसे लोग उन अनेक सीधी आज्ञाओं को आँखों से ओझल कर देते हैं जो कहती हैं "बढ़ो,—उन्नति करो,—और अधिक से अधिक बढ़ते जाओ,—अपने विश्वास में जोड़ो," और इसी प्रकार की अन्य आज्ञाएँ; और इस कम काम करनेवाली दशा में, मन की इस हाथ पर हाथ धरे बैठने की अवस्था में, यदि वे निश्चयता से चूक जाते हैं तो मुझे कोई आश्चर्य नहीं होता।

मैं मानता हूँ कि आगे बढ़ते जाना हमारा निरन्तर लक्ष्य और अभिलाषा होनी चाहिए, और हर लौटते जन्मदिन पर, और हर वर्ष के आरम्भ में, हमारा नारा यह होना चाहिए, "और भी बढ़ते जाओ" (1 थिस्सलुनीकियों 4:1): और अधिक ज्ञान,—और अधिक विश्वास,—और अधिक आज्ञाकारिता,—और अधिक प्रेम। यदि हमने तीस गुणा फल लाया है, तो हमें साठ गुणा लाने का यत्न करना चाहिए; और यदि साठ गुणा लाया है, तो सौ गुणा लाने का प्रयास करना चाहिए। प्रभु की इच्छा हमारा पवित्रीकरण है, और यह हमारी इच्छा भी होनी चाहिए। (मत्ती 13:23; 1 थिस्सलुनीकियों 4:3।)

एक बात पर तो हम किसी भी दशा में भरोसा कर सकते हैं,—परिश्रम और निश्चयता के बीच अटूट सम्बन्ध है। पतरस कहता है, "अपने बुलाए जाने और चुन लिए जाने को पक्का करने का यत्न करते रहो।" (2 पतरस 1:10।) पौलुस कहता है, "हम चाहते हैं कि तुम में से हर एक जन अन्त तक पूरी आशा के लिए ऐसा ही यत्न करता रहे।" (इब्रानियों 6:11।) सुलैमान कहता है, "परिश्रमियों की जान हष्ट-पुष्ट की जाएगी।" (नीतिवचन 13:4।) पुरिटन लोगों की पुरानी कहावत में बहुत सत्य है:

"चिपके रहने का विश्वास सुनने से आता है, परन्तु निश्चयता का विश्वास बिना करने के नहीं आता।"

क्या इस लेख का कोई पाठक उन में से है जो निश्चयता चाहता तो है, पर उसे पाया नहीं है? मेरी बात ध्यान से सुनो। तुम चाहे कितनी ही इच्छा करो, बिना परिश्रम के उसे कभी नहीं पाओगे। आत्मिक बातों में भी, सांसारिक बातों के समान ही, बिना कष्ट के कोई लाभ नहीं। "आलसी का प्राण लालसा तो करता है, पर उसे कुछ नहीं मिलता।" (नीतिवचन 13:4।)*

(3) निश्चयता के अभाव का एक और सामान्य कारण है, जीवन में असंगत चाल-चलन।

दुःख और शोक के साथ मैं यह कहने को विवश हूँ कि मुझे डर है कि और कोई बात मनुष्यों को पक्की आशा पाने से इतनी बार नहीं रोकती जितनी यह। आज के दिनों में मसीही होने का दावा करनेवालों की धारा पहले से कहीं अधिक चौड़ी है, और साथ ही मुझे यह भी मानना पड़ेगा कि वह कहीं कम गहरी है।

जीवन की असंगति विवेक की शान्ति को सर्वथा नष्ट कर देती है। ये दोनों बातें आपस में मेल नहीं खातीं। वे साथ-साथ नहीं चल सकतीं और न चलेंगी। यदि तुम अपने बने-बनाए पापों को रखना चाहते हो, और उन्हें छोड़ने का मन नहीं बना सकते,—यदि आवश्यकता पड़ने पर दाहिना हाथ काट डालने और दाहिनी आँख निकाल फेंकने से तुम पीछे हटोगे,—तो मैं बाज़ी लगाकर कहता हूँ कि तुम्हें निश्चयता नहीं मिलेगी।

डगमगाती चाल,—साहसी और निर्णायक मार्ग अपनाने में पिछड़ना,—संसार के अनुसार ढल जाने को तैयार रहना,—मसीह के लिए झिझकती गवाही,—धर्म का ढीला-ढाला सुर,—पवित्रता और आत्मिक जीवन के ऊँचे स्तर से कतराना,—ये सब मिलकर तुम्हारे प्राण की बारी पर कुम्हलाहट ले आने का पक्का नुस्खा हैं।

यह मान बैठना व्यर्थ है कि तुम अपने क्षमा और परमेश्वर के यहाँ स्वीकार किए जाने के विषय में निश्चित और आश्वस्त हो जाओगे, जब तक तुम परमेश्वर की सब बातों के विषय में उसकी सब आज्ञाओं को ठीक न मानो, और हर पाप से, चाहे बड़ा हो या छोटा, घृणा न करो। (भजन संहिता 119:128।) तुम्हारे हृदय की छावनी में पलनेवाला एक आकान तुम्हारे हाथ ढीले कर देगा, और तुम्हारी सांत्वनाओं को धूल में मिला देगा। यदि तुम्हें आत्मा की गवाही की उपज काटनी है, तो प्रतिदिन आत्मा के लिए बोना होगा। तुम यह नहीं पाओगे और अनुभव नहीं करोगे कि प्रभु के सब मार्ग मनभावने हैं, जब तक तुम अपने सब मार्गों में प्रभु को प्रसन्न करने का परिश्रम न करो।*

मैं परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ कि हमारा उद्धार किसी भी रीति से हमारे अपने कर्मों पर निर्भर नहीं है। अनुग्रह ही से हमारा उद्धार हुआ है,—धार्मिकता के कर्मों से नहीं,—विश्वास के द्वारा,—व्यवस्था के कामों के बिना। परन्तु मैं किसी भी विश्वासी को एक क्षण के लिए भी यह भूलने न दूँगा कि हमारे उद्धार की अनुभूति बहुत कुछ हमारे जीवन जीने के ढंग पर निर्भर करती है। असंगति हमारी आँखों को धुँधला कर देगी, और हमारे और सूर्य के बीच बादल ले आएगी। सूर्य तो बादलों के पीछे भी वैसा ही रहता है, परन्तु तुम उसकी चमक को न देख पाओगे और न उसकी गरमाहट का आनन्द ले पाओगे, और तुम्हारी आत्मा उदास और ठंडी हो जाएगी। भलाई के मार्ग में ही निश्चयता का प्रभात तुम्हारे पास आएगा, और तुम्हारे हृदय पर चमकेगा।

दाऊद कहता है, "यहोवा का भेद उसी को बताया जाता है जो उससे डरता है, और वह अपनी वाचा उन्हें जता देता है।" (भजन संहिता 25:14)

"जो अपना चालचलन ठीक रखता है उसको मैं परमेश्वर का उद्धार दिखाऊँगा।" (भजन संहिता 50:23)

"तेरी व्यवस्था से प्रीति रखनेवालों को बड़ी शान्ति होती है; और उनको कुछ ठोकर नहीं लग सकती।" (भजन संहिता 119:165)

"यदि हम ज्योति में चलें, जैसा वह ज्योति में है, तो एक दूसरे से सहभागिता रखते हैं।" (1 यूहन्ना 1:7)

"हम वचन और जीभ ही से नहीं, पर काम और सत्य के द्वारा भी प्रेम करें। इसी से हम जानेंगे कि हम सत्य के हैं, और जिस बात में हमारा मन हमें दोष दे, उसके विषय में हम उसके सामने अपने मन को ढाढ़स दे सकेंगे।" (1 यूहन्ना 3:18, 19)

"यदि हम उसकी आज्ञाओं को मानेंगे, तो इसी से हम जान लेंगे कि हम उसे जान गए हैं।" (1 यूहन्ना 2:3)

पौलुस ऐसा मनुष्य था जो इस बात का अभ्यास करता था कि परमेश्वर की और मनुष्यों की ओर उसका विवेक सदा निर्दोष रहे। (प्रेरितों के काम 24:16) वह साहस के साथ कह सकता था, "मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैंने विश्वास की रखवाली की है।" इसलिए मुझे आश्चर्य नहीं कि प्रभु ने उसे यह भी निश्चय के साथ जोड़ने के योग्य किया, "भविष्य में मेरे लिए धार्मिकता का वह मुकुट रखा है, जिसे प्रभु, जो धर्मी न्यायी है, उस दिन मुझे देगा।"

यदि प्रभु यीशु का कोई विश्वासी निश्चयता चाहता है और उसके पास वह नहीं है, तो वह इस बात पर भी विचार करे। वह अपने हृदय को देखे, अपने विवेक को देखे, अपने जीवन को देखे, अपने चालचलन को देखे, अपने घर को देखे। और सम्भव है कि जब वह यह कर चुकेगा, तब वह कह सकेगा, "मेरे पास निश्चित आशा न होने का एक कारण है।"

जिन तीन बातों का मैंने अभी उल्लेख किया है, उन्हें मैं इस लेख के हर पाठक के निजी विचार के लिए छोड़ता हूँ। मुझे निश्चय है कि वे जाँचने योग्य हैं। हम उन्हें ईमानदारी से जाँचें। और प्रभु हमें सब बातों में समझ दे।

(1) और अब इस महत्त्वपूर्ण जाँच को समाप्त करते हुए, मुझे पहले उन पाठकों से कुछ कहने दीजिए जिन्होंने अब तक अपने आपको प्रभु को नहीं सौंपा है, जो अब तक संसार में से बाहर नहीं निकले हैं, जिन्होंने अब तक उत्तम भाग नहीं चुना है और मसीह के पीछे नहीं हो लिए हैं।

इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ कि इस विषय से सच्चे मसीही के विशेषाधिकारों और सान्त्वनाओं को सीखो।

मैं नहीं चाहता कि तुम प्रभु यीशु मसीह को उसके लोगों के द्वारा परखो। सबसे उत्तम सेवक भी तुम्हें उस महिमामय स्वामी का केवल एक धुँधला-सा विचार दे सकते हैं।

और मैं यह भी नहीं चाहता कि तुम उसके राज्य के विशेषाधिकारों को उस सान्त्वना के माप से परखो जिस तक उसके बहुत-से लोग पहुँचते हैं। हाय, हम में से अधिकतर दीन प्राणी हैं! हम उस आशीष से, जिसका हम आनन्द ले सकते थे, बहुत पीछे रह जाते हैं। परन्तु निश्चय जानो कि हमारे परमेश्वर के नगर में महिमामय वस्तुएँ हैं, जिनका स्वाद वे लोग, जिन्हें निश्चित आशा है, इसी जीवन में चख लेते हैं। वहाँ शान्ति और सान्त्वना की ऐसी लम्बाई-चौड़ाई है जिसकी कल्पना भी तुम्हारे मन में नहीं आई। हमारे पिता के घर में भोजन बहुतायत से है, और बचा भी रहता है, यद्यपि हम में से बहुत-से निश्चय ही उसमें से थोड़ा ही खाते हैं और निर्बल बने रहते हैं। परन्तु इसका दोष हमारे स्वामी पर नहीं लगाना चाहिए; यह सब हमारा ही दोष है।

और अन्त में, परमेश्वर के सबसे निर्बल बच्चे के भीतर भी सान्त्वनाओं की एक खान है, जिसके विषय में तुम कुछ नहीं जानते। तुम उसके हृदय की सतह की लड़ाइयाँ और हलचलें देखते हो, परन्तु नीचे गहराई में छिपे बहुमूल्य मोतियों को नहीं देखते। मसीह का सबसे दुर्बल अंग भी तुम्हारी दशा से अपनी दशा नहीं बदलेगा। जिस विश्वासी के पास सबसे थोड़ी निश्चयता है, वह भी तुमसे कहीं अच्छी दशा में है। उसके पास आशा है, चाहे कितनी ही क्षीण हो, परन्तु तुम्हारे पास बिलकुल नहीं। उसके पास ऐसा भाग है जो उससे कभी छीना न जाएगा, ऐसा उद्धारकर्ता है जो उसे कभी न छोड़ेगा, ऐसा धन है जो कभी नाश नहीं होता, चाहे वह इस समय यह सब थोड़ा ही समझता हो। परन्तु तुम्हारे लिए, यदि तुम जैसे हो वैसे ही मर गए, तो तुम्हारी सारी आशाएँ नाश हो जाएँगी। आह, कि तुम बुद्धिमान होते! आह, कि तुम इन बातों को समझते! आह, कि तुम अपने अन्त का विचार करते!

यदि मैंने कभी किसी के लिए गहरा खेद अनुभव किया है, तो संसार के इन अन्तिम दिनों में मैं तुम्हारे लिए अनुभव करता हूँ। मैं उन लोगों के लिए गहरा खेद अनुभव करता हूँ जिनका सारा धन पृथ्वी पर है, और जिनकी सारी आशाएँ कब्र के इस पार ही हैं। हाँ! जब मैं पुराने राज्यों और राजवंशों को नींव तक हिलते देखता हूँ,—जब मैं, जैसा हम सबने कुछ वर्ष पहले देखा, राजाओं, राजकुमारों, धनवानों और बड़े लोगों को अपने प्राण बचाकर भागते और यह भी न जानते देखता हूँ कि सिर कहाँ छिपाएँ,—जब मैं देखता हूँ कि जनता के भरोसे पर टिकी सम्पत्ति वसन्त के हिम की नाईं पिघल रही है, और सार्वजनिक कोष और पूँजी अपना मूल्य खो रहे हैं,—जब मैं ये बातें देखता हूँ, तो मैं उन लोगों के लिए गहरा खेद अनुभव करता हूँ जिनके पास इस संसार के दिए हुए भाग से अच्छा कोई भाग नहीं, और उस राज्य में कोई स्थान नहीं जो हिलाया नहीं जा सकता।*

आज ही मसीह के एक सेवक की सलाह मानो। स्थायी धन की खोज करो,—ऐसा खज़ाना जो तुमसे छीना नहीं जा सकता,—ऐसा नगर जिसकी नींव स्थिर है। वैसा ही करो जैसा प्रेरित पौलुस ने किया। अपने आपको प्रभु यीशु मसीह को सौंप दो, और उस अविनाशी मुकुट की खोज करो जिसे देने को वह तैयार है। उसका जूआ अपने ऊपर उठा लो, और उससे सीखो। उस संसार से निकल आओ जो तुम्हें कभी सचमुच तृप्त नहीं करेगा, और उस पाप से, जो यदि तुम उससे चिपके रहे तो अन्त में सर्प के समान डसेगा। दीन पापियों के रूप में प्रभु यीशु के पास आओ, और वह तुम्हें ग्रहण करेगा, तुम्हें क्षमा करेगा, तुम्हें अपना नया करनेवाला आत्मा देगा, और तुम्हें शान्ति से भर देगा। यह तुम्हें संसार की दी हुई किसी भी वस्तु से अधिक सच्ची सान्त्वना देगा। तुम्हारे हृदय में एक खाई है जिसे मसीह की शान्ति के सिवा कुछ नहीं भर सकता। भीतर आओ और हमारे विशेषाधिकारों में भागी हो जाओ। हमारे साथ आओ, और हमारे पास बैठो।

(2) अन्त में, मुझे इन पृष्ठों को पढ़नेवाले सब विश्वासियों की ओर मुड़कर उनसे भाईचारे की कुछ सलाह कहने दीजिए।

मैं आप से जिस मुख्य बात का आग्रह करता हूँ वह यह है—यदि मसीह में अपनी स्वीकृति की आपको निश्चित आशा नहीं मिली है, तो आज ही ठान लीजिए कि आप उसे खोजेंगे। उसके लिए परिश्रम कीजिए। उसके पीछे प्रयत्न कीजिए। उसके लिए प्रार्थना कीजिए। जब तक आप "जान न लें कि आपने किस पर विश्वास किया है," तब तक प्रभु को चैन न लेने दीजिए।

सचमुच मुझे लगता है कि आज के समय में जो लोग परमेश्वर की सन्तान गिने जाते हैं, उनमें निश्चयता की इतनी थोड़ी मात्रा एक लज्जा और कलंक की बात है। पुराना ट्रेल कहता है, "यह अत्यन्त शोक की बात है कि बहुत से मसीही, जब से मसीह ने उन्हें अपने अनुग्रह से बुलाया है, बीस या चालीस वर्ष तक जीवन भर सन्देह में ही पड़े रहे हैं।" आइए हम उस उत्कट "इच्छा" को स्मरण करें जो पौलुस ने प्रकट की कि इब्रानियों में से "हर एक" पूर्ण निश्चयता की खोज करे; और परमेश्वर की आशीष से हम इस कलंक को दूर करने का यत्न करें। (इब्रा. 6:11।)

विश्वासी पाठक, क्या आप सचमुच यह कहना चाहते हैं कि आपको आशा के बदले भरोसे की, विश्वास के बदले दृढ़ प्रतीति की, अनिश्चितता के बदले ज्ञान की कोई इच्छा नहीं है? क्योंकि निर्बल विश्वास भी आपको बचा लेगा, क्या इसलिए आप उसी में सन्तुष्ट रहेंगे? क्योंकि स्वर्ग में प्रवेश के लिए निश्चयता अनिवार्य नहीं है, क्या इसलिए आप पृथ्वी पर उसके बिना सन्तुष्ट रहेंगे? हाय, आत्मा की यह दशा स्वस्थ नहीं है; यह प्रेरितों के दिनों का मन नहीं है! तुरन्त उठिए और आगे बढ़िए। धर्म की नींव ही पर न अटके रहिए: सिद्धता की ओर बढ़ते जाइए। छोटी बातों के दिन से सन्तुष्ट न रहिए। दूसरों में उसे कभी तुच्छ न जानिए, परन्तु स्वयं उसी में कभी सन्तुष्ट न रहिए।

मेरा विश्वास कीजिए, मेरा विश्वास कीजिए, निश्चयता खोजने के योग्य है। उसके बिना सन्तुष्ट रहकर आप अपनी ही दया को छोड़ देते हैं। जो बातें मैं कहता हूँ वे आपकी शान्ति के लिए हैं। यदि सांसारिक बातों में निश्चित होना अच्छा है, तो स्वर्गीय बातों में निश्चित होना कितना अधिक अच्छा है! आपका उद्धार एक स्थिर और निश्चित बात है। परमेश्वर इसे जानता है। आप भी इसे जानने का यत्न क्यों न करें? इसमें पवित्रशास्त्र के विरुद्ध कुछ नहीं है। पौलुस ने जीवन की पुस्तक कभी नहीं देखी, फिर भी पौलुस कहता है, "मैं जानता हूँ और मुझे निश्चय है।"

इसलिए इसे अपनी प्रतिदिन की प्रार्थना बनाइए कि आपका विश्वास बढ़े। आपके विश्वास के अनुसार ही आपकी शान्ति होगी। उस धन्य जड़ को और अधिक सींचिए, और देर-सबेर परमेश्वर की आशीष से आप फूल की आशा कर सकते हैं। हो सकता है कि आप पूर्ण निश्चयता तक एकाएक न पहुँचें। कभी-कभी प्रतीक्षा में रखा जाना अच्छा होता है: जो वस्तुएँ बिना परिश्रम के मिल जाती हैं उनका हम मूल्य नहीं समझते। परन्तु यदि वह विलम्ब करे तो भी उसकी बाट जोहिए। खोजते रहिए, और पाने की आशा रखिए।

परन्तु एक बात है जिससे मैं नहीं चाहता कि आप अनजान रहें:—यदि निश्चयता पा लेने के बाद भी आपको कभी-कभी सन्देह हो, तो आपको आश्चर्य नहीं करना चाहिए। यह न भूलिए कि आप पृथ्वी पर हैं, अभी स्वर्ग में नहीं। आप अब भी देह में हैं, और आप में बसा हुआ पाप है: शरीर अन्त तक आत्मा के विरुद्ध अभिलाषा करता रहेगा। कोढ़ उस पुराने घर की दीवारों में से तब तक न निकलेगा जब तक मृत्यु उसे गिरा न दे। और एक शैतान भी है, और बलवन्त शैतान: वह शैतान जिसने प्रभु यीशु की परीक्षा की, और पतरस को गिराया; और वह इस बात का ध्यान रखेगा कि आप इसे जान लें। कुछ सन्देह तो सदा रहेंगे। जो कभी सन्देह नहीं करता, उसके पास खोने को कुछ नहीं। जो कभी नहीं डरता, उसके पास कोई सचमुच मूल्यवान वस्तु नहीं। जिसे कभी जलन नहीं होती, वह गहरे प्रेम के विषय में कम जानता है। परन्तु हताश न हों: जिसने आपसे प्रेम किया उसके द्वारा आप जयवन्तों से भी बढ़कर होंगे।*

अन्त में यह न भूलिए कि निश्चयता ऐसी वस्तु है जो कुछ समय के लिए, सबसे उज्ज्वल मसीहियों से भी, खो सकती है, यदि वे सावधान न रहें।

निश्चयता एक अत्यन्त कोमल पौधा है। उसे प्रतिदिन, प्रतिघण्टे देखभाल, सींचने, सँभालने और पोषण की आवश्यकता है। इसलिए उसके मिल जाने पर और अधिक जागते और प्रार्थना करते रहिए। जैसा रदरफ़ोर्ड कहता है, "निश्चयता का बहुत मूल्य समझिए।" सदा चौकसी पर रहिए। 'यात्री की प्रगति' में जब मसीही कुंज में सो गया, तो उसका प्रमाण-पत्र खो गया। इसे स्मरण रखिए।

दाऊद अपराध में गिरकर कई महीनों तक निश्चयता खो बैठा। पतरस ने जब अपने प्रभु का इन्कार किया तब उसे खो दिया। दोनों ने उसे निस्सन्देह फिर पाया, परन्तु कड़वे आँसुओं के बाद ही। आत्मिक अन्धकार घोड़े पर चढ़कर आता है, और पैदल जाता है। हमारे जान लेने से पहले ही वह हम पर आ पड़ता है। वह धीरे-धीरे, और बहुत दिनों के बाद ही हमें छोड़ता है। पहाड़ से नीचे उतरना सरल है। ऊपर चढ़ना कठिन परिश्रम है। इसलिए मेरी चेतावनी स्मरण रखिए,—जब आपके पास प्रभु का आनन्द हो, तो जागते और प्रार्थना करते रहिए।

सबसे बढ़कर, पवित्र आत्मा को शोकित न कीजिए। आत्मा को न बुझाइए। आत्मा को न सताइए। छोटी बुरी आदतों और छोटे पापों से छेड़छाड़ करके उसे दूर न भगाइए। पति-पत्नी के बीच की छोटी-छोटी खटपट घरों को दुःखी कर देती है, और जानी-बूझी और सही गई छोटी-छोटी असंगतियाँ आपके और आत्मा के बीच अपरिचय ले आएँगी।

पूरी बात का सार सुनिए।

जो मनुष्य मसीह में परमेश्वर के साथ सबसे निकटता से चलता है, वह प्रायः सबसे अधिक शान्ति में रखा जाएगा।

जो विश्वासी प्रभु के पीछे सबसे पूर्ण रीति से चलता है और पवित्रता की उच्चतम सीमा का लक्ष्य रखता है, वह साधारणतः सबसे निश्चित आशा का आनन्द लेगा, और अपने उद्धार की सबसे स्पष्ट प्रतीति रखेगा।

टिप्पणी

अंग्रेज़ धर्मशास्त्रियों के उद्धरण, जो दिखाते हैं कि विश्वास और निश्चयता में अन्तर है,—कि एक विश्वासी धर्मी ठहराया जाकर परमेश्वर के यहाँ स्वीकार किया जा सकता है, और फिर भी अपनी सुरक्षा का सुखद ज्ञान और प्रतीति न रखता हो,—और कि मसीह में सबसे निर्बल विश्वास भी, यदि वह सच्चा हो, मनुष्य को उतने ही निश्चय से बचाएगा जितना सबसे सबल विश्वास।

(1) "परमेश्वर की दया संसार के सब पापों से बड़ी है। परन्तु हम कभी-कभी ऐसी दशा में होते हैं कि समझते हैं हम में कोई विश्वास है ही नहीं; या यदि कुछ है तो बहुत दुर्बल और निर्बल। इसलिए ये दो बातें हैं: विश्वास रखना, और विश्वास की अनुभूति रखना। क्योंकि कुछ लोग विश्वास की अनुभूति चाहते तो हैं, परन्तु उसे पा नहीं सकते; फिर भी उन्हें निराश नहीं होना चाहिए, परन्तु परमेश्वर को पुकारते हुए आगे बढ़ते रहें, और अन्त में वह आ जाएगी: परमेश्वर उनके हृदय खोलेगा, और उन्हें अपनी भलाई का अनुभव कराएगा।"—बिशप लैटिमर के उपदेश। 1552।

(2) "निर्बल विश्वास मसीह के लाभों को अपने ऊपर लागू करने, या उन्हें ग्रहण करके अपना बना लेने में चूक सकता है। यह साधारण अनुभव में देखा जाता है। क्योंकि बहुत से मनुष्य दीन और पश्चातापी मन के होते हैं, जो आत्मा और सच्चाई से परमेश्वर की सेवा करते हैं, फिर भी बड़े सन्देहों और डगमगाहट के बिना यह नहीं कह पाते कि मैं जानता हूँ और मुझे पूरा निश्चय है कि मेरे पाप क्षमा हो गए हैं। तो क्या हम कहें कि ऐसे सब लोग विश्वास से रहित हैं? परमेश्वर ऐसा न करे।"

"यह निर्बल विश्वास भी पाप की क्षमा के लिए परमेश्वर की दयामय प्रतिज्ञाओं को उतनी ही सच्चाई से ग्रहण करता है जितना सबल विश्वास, यद्यपि उतनी दृढ़ता से नहीं। जैसे लकवे के मारे हाथ वाला मनुष्य भी राजा के हाथ से दान लेने के लिए अपना हाथ वैसे ही बढ़ा सकता है जैसे अधिक स्वस्थ हाथ वाला, चाहे वह उतनी दृढ़ता और स्थिरता से न बढ़ा सके।"—विश्वास-सूत्र की व्याख्या, लेखक विलियम पर्किन्स, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में मसीह का सेवक। 1612।

(3) "हमारे उद्धार की यह निश्चयता, जिसकी चर्चा पौलुस ने की, जिसे पतरस ने दोहराया, और जिसका उल्लेख दाऊद ने किया है (भजन संहिता 4:7), विश्वास का वह विशेष फल है जो आत्मिक आनन्द और भीतरी शान्ति उत्पन्न करता है, जो समझ से परे है। यह सच है कि परमेश्वर की सब सन्तानों को यह प्राप्त नहीं होती। वृक्ष एक बात है और वृक्ष का फल दूसरी बात; विश्वास एक बात है और विश्वास का फल दूसरी बात। और परमेश्वर के चुने हुओं का वह बचा हुआ दल, जो इस निश्चयता की घटी अनुभव करता है, फिर भी विश्वास रखता है।"—रिचर्ड ग्रीनहैम के उपदेश, जो परमेश्वर के वचन के सेवक और प्रचारक थे। 1612।

(4) "कुछ लोग समझते हैं कि उनमें बिलकुल विश्वास नहीं है, क्योंकि उन्हें पूर्ण निश्चयता नहीं है। फिर भी जो सबसे सुन्दर आग हो सकती है उसमें भी कुछ धुआँ तो होगा ही।"—कुचला हुआ सरकण्डा, लेखक रिचर्ड सिब्स, कैथरीन हॉल, कैम्ब्रिज के मास्टर और लन्दन के ग्रेज़ इन के प्रचारक। 1630।

(5) "विश्वास का कार्य मसीह को आत्मा पर लागू करना है; और यह सबसे निर्बल विश्वास भी उतनी ही अच्छी तरह कर सकता है जितना सबसे सबल विश्वास, यदि वह सच्चा हो। एक बच्चा भी लाठी को पकड़ सकता है, यद्यपि मनुष्य जितनी दृढ़ता से नहीं। बन्दी किसी छेद में से सूर्य को देखता है, यद्यपि उतना पूर्ण रीति से नहीं जितना वे जो खुली हवा में हैं। जिन्होंने पीतल के साँप को देखा, चाहे बहुत दूर से, वे फिर भी चंगे हो गए।"

"सबसे छोटा विश्वास भी विश्वासी की आत्मा के लिए उतना ही बहुमूल्य है जितना पतरस या पौलुस का विश्वास स्वयं उनके लिए था; क्योंकि वह मसीह को थाम लेता है और अनन्त उद्धार लाता है।"—दूसरी सामान्य पत्री की व्याख्या, का

पतरस, लेखक रेवरेण्ड थॉमस एडम्स, सेण्ट ग्रेगरी, लन्दन के रेक्टर। 1633।

(6) "निर्बल विश्वास सच्चा विश्वास है—बहुमूल्य है, यद्यपि सबल विश्वास जितना बड़ा नहीं: वही पवित्र आत्मा उसका कर्ता है, वही सुसमाचार उसका साधन है।"

"यदि वह कभी बड़ा न भी हो, तो भी निर्बल विश्वास बचाएगा; क्योंकि वह हमें मसीह में हिस्सा देता है और उसे तथा उसके सब लाभों को हमारा बना देता है। क्योंकि हमारा उद्धार हमारे विश्वास की प्रबलता से नहीं, परन्तु हमारे विश्वास की सच्चाई से होता है—और दोषी ठहराया जाना हमारे विश्वास की निर्बलता से नहीं, परन्तु विश्वास के अभाव से होता है; क्योंकि सबसे छोटा विश्वास भी मसीह को थाम लेता है, और इस प्रकार हमें बचाएगा। न ही हम अपने विश्वास के मूल्य या परिमाण से बचाए जाते हैं, परन्तु मसीह से, जिसे निर्बल विश्वास भी सबल विश्वास के समान थामता है। जैसे निर्बल हाथ भी जो भोजन को मुँह में डाल सकता है, देह का पोषण वैसे ही करेगा जैसे सबल हाथ करता; क्योंकि देह का पोषण हाथ की शक्ति से नहीं, परन्तु भोजन की अच्छाई से होता है।"—विश्वास का सिद्धान्त, लेखक जॉन रॉजर्स, एसेक्स के डेडम में परमेश्वर के वचन के प्रचारक। 1634।

(7) "किसी वस्तु का निश्चय से पास होना एक बात है, और यह जानना कि वह निश्चय से मेरे पास है, दूसरी बात। हम बहुत सी वस्तुएँ ढूँढ़ते हैं जो हमारे हाथ में ही होती हैं, और बहुत सी वस्तुएँ हमारे पास होती हैं जिन्हें हम खोई हुई समझते हैं। इसी प्रकार एक विश्वासी, जिसका विश्वास पक्का है, फिर भी सदा यह नहीं जानता कि वह ऐसा विश्वास करता है। उद्धार के लिए विश्वास आवश्यक है; परन्तु इस बात की पूर्ण निश्चयता कि मैं विश्वास करता हूँ, उतनी आवश्यक नहीं।"—बॉल, विश्वास पर। 1637।

(8) "एक निर्बल विश्वास है जो फिर भी सच्चा है; और यद्यपि वह निर्बल है, तो भी, क्योंकि वह सच्चा है, मसीह उसे अस्वीकार नहीं करेगा।"

"विश्वास आरम्भ ही में सिद्ध नहीं बनाया जाता, जैसा आदम बनाया गया था; परन्तु वह स्वभाव के साधारण क्रम में एक मनुष्य के समान है, जो पहले शिशु, फिर बालक, फिर जवान, और तब पुरुष होता है।"

"कुछ लोग सब निर्बलों को पूरी तरह ठुकरा देते हैं, और विश्वास की हर निर्बलता पर कपट का दोष लगाते हैं। निश्चय ही ऐसे लोग या तो घमण्डी हैं या निर्दयी।"

"कुछ लोग निर्बलों को ढाढ़स बँधाते और स्थिर करते हुए कहते हैं, 'शान्त रहो। तुम में पर्याप्त विश्वास और अनुग्रह है, और तुम काफी अच्छे हो: तुम्हें और कुछ नहीं चाहिए, और न अधिक धर्मी बनो।' (सभोपदेशक 7:16।) ये कोमल तो हैं, पर सुरक्षित गद्दे नहीं: ये चापलूस हैं, विश्वासयोग्य मित्र नहीं।"

"कुछ लोग ढाढ़स बँधाते और उकसाते हैं, यह कहकर, 'ढाढ़स बाँधो: जिसने तुम में अच्छा काम आरम्भ किया है वही उसे पूरा भी करेगा; इसलिए प्रार्थना करो कि उसका अनुग्रह तुम में बढ़ता जाए; वरन् बैठे न रहो, परन्तु आगे बढ़ो और प्रभु के मार्ग पर चलते जाओ।' (इब्रानियों 6:1।) अब यही सबसे सुरक्षित और उत्तम मार्ग है।"—मत्ती के अनुसार सुसमाचार पर प्रश्न, टिप्पणियाँ आदि, लेखक रिचर्ड वार्ड, जो कभी कैम्ब्रिज के विद्यार्थी और लन्दन में सुसमाचार के प्रचारक थे। 1640।

(9) "मनुष्य परमेश्वर के अनुग्रह-पात्र होने, अनुग्रह की दशा में होने, और परमेश्वर के सामने धर्मी ठहराया गया होने पर भी अपने उद्धार की, और मसीह में परमेश्वर की कृपा की, अनुभव में आने वाली निश्चयता से रहित हो सकता है।"

"मनुष्य में उद्धार करने वाला अनुग्रह हो सकता है और वह स्वयं उसे न पहचाने; मनुष्य में सच्चा धर्मी ठहरानेवाला विश्वास हो सकता है, और उसे उसका ऐसा उपयोग और कार्य प्राप्त न हो कि वह उसमें परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप की सुखदायक निश्चयता उत्पन्न करे। वरन् मैं और भी कहूँगा: मनुष्य अनुग्रह की दशा में हो सकता है और उसमें सच्चा धर्मी ठहरानेवाला विश्वास हो सकता है, फिर भी वह अपने भीतर उसकी अनुभव-जन्य निश्चयता से इतना दूर हो सकता है कि अपने ही अनुभव और भावना में उसे उलटी ही बात का निश्चय जान पड़े। अय्यूब निश्चय ही ऐसी ही दशा में था जब वह परमेश्वर से पुकारकर बोला, 'तू क्यों अपना मुँह फेर लेता है, और मुझे अपना शत्रु गिनता है?' (अय्यूब 13:24।)"

"सबसे निर्बल विश्वास भी धर्मी ठहराता है। यदि तू मसीह को ग्रहण कर सकता है और उस पर भरोसा रख सकता है, चाहे निर्बलतम विश्वास ही से क्यों न हो, तो वह तेरे लिये पर्याप्त होगा। इस बात से सावधान रह कि कहीं तू यह न समझ बैठे कि तुझे धर्मी ठहरानेवाली वस्तु तेरे विश्वास का बल है। नहीं, नहीं; यह तो मसीह और उसकी सिद्ध धार्मिकता है, जिसे तेरा विश्वास ग्रहण करता और जिस पर भरोसा रखता है, वही यह कार्य करती है। जिसका हाथ सबसे दुर्बल और क्षीण है, वह भी भिक्षा ग्रहण कर सकता है और अपने घाव पर रामबाण लेप लगा सकता है, ठीक वैसे ही जैसे सबसे बलवान हाथ वाला; और उससे उतना ही लाभ भी पा सकता है।"—भजन संहिता 51 पर व्याख्यान, जो आर्थर हिल्डर्शम, यीशु मसीह के सेवक ने ऐश्बाइ-डे-ला-ज़ूश में दिए। 1642।

(10) "आपका अनुग्रह चाहे कितना ही निर्बल क्यों न हो, फिर भी यदि आप में अनुग्रह की सच्चाई है, तो आपको धर्मी ठहराए जाने के लिये मसीह की धार्मिकता में उतना ही भाग मिला है जितना बलवन्त मसीही को। आपको भी उतना ही मसीह गिना गया है जितना किसी और को।"—विलियम ब्रिज के उपदेश, जो पहले केम्ब्रिज के इम्मानुएल कॉलेज के फ़ेलो और ग्रेट यारमाउथ में मसीह की कलीसिया के पासबान थे। 1648।

(11) "कुछ लोग ऐसे हैं जो सच्चे विश्वासी हैं, फिर भी विश्वास में निर्बल हैं। वे मसीह और मुफ़्त अनुग्रह को ग्रहण तो करते हैं, परन्तु काँपते हाथ से; उनमें, जैसा कि धर्मशास्त्री कहते हैं, चिपके रहने का विश्वास है; वे मसीह को अपना जानकर उससे लगे रहेंगे। परन्तु उनमें प्रमाण का विश्वास नहीं है; वे अपने आप को उसका नहीं देख पाते। वे विश्वासी हैं, परन्तु अल्पविश्वासी; वे आशा रखते हैं कि मसीह उन्हें त्याग न देगा, परन्तु निश्चित नहीं हैं कि वह उन्हें अपना लेगा।"—मिठास की चुस्कियाँ, या निर्बल विश्वासियों के लिये शान्ति, जॉन ड्यूरेंट द्वारा, जो केंटरबरी के गिरजाघर में प्रचारक थे। 1649।

(12) "तू कहता है, मैं जानता हूँ कि यीशु मसीह पापियों का उद्धार करने के लिये जगत में आया; और कि 'जो कोई उस पर विश्वास करे वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।' (यूहन्ना 3:15)। और मैं इससे इनकार भी नहीं कर सकता कि अपनी पापमय दशा का बोध होने पर मैं कुछ अंश में अपने उद्धारकर्ता पर अपने आप को डालता हूँ, और उसके सर्वसमर्थ छुटकारे को कुछ थामता भी हूँ; परन्तु हाय, उसके विषय में मेरी पकड़ इतनी क्षीण है कि मेरी आत्मा को कोई ठोस शान्ति नहीं दे सकती!"

"धीरज रख, मेरे पुत्र। यदि तू अपने विश्वास के कार्य ही के बल से धर्मी ठहराए जाने और उद्धार पाने की आशा रखता, तो उसकी निर्बलता का बोध तुझे निराश करने का कारण होता; परन्तु अब जब कि इस धन्य कार्य का गुण और प्रभाव उस वस्तु में है जिसे तू थामता है, अर्थात् तेरे परमेश्वर और उद्धारकर्ता के अनन्त पुण्य और दया में, जो तेरी दुर्बलताओं से कम नहीं हो सकती, तो तेरे पास साहस बाँधने और आनन्द से उसके उद्धार की बाट जोहने का कारण है।"

"अपनी दशा को ठीक-ठीक समझ। यहाँ दोहरा हाथ है जो हमें स्वर्ग की ओर उठाता है। हमारे विश्वास का हाथ हमारे उद्धारकर्ता को थामता है; हमारे उद्धारकर्ता की दया और प्रचुर छुटकारे का हाथ हमें थामता है। उसे हमारी पकड़ निर्बल है और सहज ही छूट सकती है; हमें उसकी पकड़ सामर्थी और अटल है।"

"यदि कर्म पर बात टिकी होती, तो हाथ का बल आवश्यक होता; परन्तु अब जब कि केवल एक बहुमूल्य दान को लेने और ग्रहण करने की आवश्यकता है, तो निर्बल हाथ भी वह क्यों न कर सके जो बलवान हाथ करता है? उतने ज़ोर से भले न हो, पर उतनी ही सफलता से।"—बिशप हॉल की "गिलाद का बलसान"। 1650।

(13) "मुझे उद्धार विश्वास के बल पर नहीं, परन्तु विश्वास की सच्चाई पर टिका हुआ मिलता है—विश्वास की सबसे उज्ज्वल श्रेणी पर नहीं, परन्तु किसी भी श्रेणी पर। यह नहीं कहा गया कि यदि तुझ में इतनी श्रेणी का विश्वास है तो तू धर्मी ठहरेगा और उद्धार पाएगा; परन्तु केवल विश्वास करना आवश्यक ठहराया गया है। सच्चे विश्वास की निम्नतम श्रेणी भी यह कर देगी; जैसा कि रोमियों 10:9 में है, 'यदि तू अपने मुँह से यीशु को प्रभु जानकर अंगीकार करे और अपने मन से विश्वास करे कि परमेश्वर ने उसे मरे हुओं में से जिलाया, तो तू निश्चय उद्धार पाएगा।' क्रूस पर चढ़े चोर ने विश्वास की ऐसी ऊँची श्रेणियाँ प्राप्त नहीं की थीं; वह एक ही कार्य से, और वह भी निर्बल विश्वास के, धर्मी ठहराया गया और उसका उद्धार हुआ। (लूका 23:42)।"—भविष्यद्वक्ता यहेजकेल की व्याख्या, विलियम ग्रीनहिल द्वारा, जो स्टेप्नी, लन्दन के रेक्टर तथा यॉर्क और ग्लॉस्टर के ड्यूकों के पुरोहित थे। 1650।

(14) "किसी मनुष्य में सच्चा अनुग्रह हो सकता है, फिर भी उसे परमेश्वर के प्रेम और कृपा, या अपने पापों की क्षमा, या अपनी आत्मा के उद्धार की निश्चयता न हो। कोई परमेश्वर का हो सकता है, और फिर भी वह यह न जाने; उसकी दशा अच्छी हो सकती है, और फिर भी वह उसे न देखे; वह सुरक्षित स्थिति में हो सकता है, जबकि वह सुखद स्थिति में नहीं है। महिमा के न्यायालय में उसका सब कुछ भला हो सकता है, जबकि वह हज़ार जगत देने को तैयार हो कि विवेक के न्यायालय में भी सब कुछ भला होता।"

"निश्चयता मसीही के कुशल-क्षेम के लिये आवश्यक है, परन्तु उसके होने के लिये नहीं; वह मसीही की शान्ति के लिये आवश्यक है, परन्तु उसके उद्धार के लिये नहीं; वह अनुग्रह के कुशल-क्षेम के लिये आवश्यक है, परन्तु अनुग्रह के मात्र अस्तित्व के लिये नहीं। यद्यपि मनुष्य विश्वास के बिना उद्धार नहीं पा सकता, फिर भी निश्चयता के बिना उद्धार पा सकता है। परमेश्वर ने पवित्रशास्त्र के अनेक स्थानों में घोषित किया है कि विश्वास के बिना उद्धार नहीं; परन्तु परमेश्वर ने पवित्रशास्त्र के किसी एक भी स्थान में यह घोषित नहीं किया कि निश्चयता के बिना उद्धार नहीं।"—पृथ्वी पर स्वर्ग, थॉमस ब्रुक्स द्वारा, जो सेंट मार्गरेट, फ़िश स्ट्रीट हिल, लन्दन में सुसमाचार के प्रचारक थे। 1654।

(15) "तुम जो अपने हृदयों के सामने यह स्पष्ट कर सकते हो कि तुम में विश्वास है, चाहे वह निर्बल ही क्यों न हो, हताश न हो, घबराओ मत। विचार करो कि विश्वास की छोटी से छोटी मात्रा भी सच्चा, उद्धार करनेवाला विश्वास है, ठीक वैसे ही जैसे सबसे बड़ी मात्रा। आग की एक चिंगारी भी उतनी ही सच्ची आग है जितनी अग्नि-तत्त्व में कोई और आग। पानी की एक बूँद भी उतना ही सच्चा पानी है जितना सागर में कोई भी पानी। वैसे ही विश्वास का छोटे से छोटा कण भी उतना ही सच्चा विश्वास है, और उतना ही उद्धार करनेवाला है जितना जगत का सबसे बड़ा विश्वास।"

"छोटी से छोटी कली भी जड़ से रस खींचती है, ठीक वैसे ही जैसे सबसे बड़ी डाली। वैसे ही विश्वास की सबसे निर्बल मात्रा भी तुझे सचमुच मसीह में कलम लगाती है, और उसके द्वारा तू मसीह से जीवन खींचता है, ठीक वैसे ही जैसे सबसे सामर्थी विश्वास। सबसे निर्बल विश्वास को भी मसीह के पुण्य और लहू में उतनी ही सहभागिता है जितनी सबसे सामर्थी को।"

"सबसे छोटा विश्वास भी आत्मा को मसीह के साथ जोड़ देता है। सबसे निर्बल विश्वास का परमेश्वर के प्रेम में उतना ही भाग है जितना सबसे सबल विश्वास का। हम मसीह में प्रिय हैं, और विश्वास की सबसे छोटी मात्रा भी हमें मसीह के अंग बना देती है। सबसे छोटे विश्वास का प्रतिज्ञाओं पर उतना ही अधिकार है जितना सबसे सबल विश्वास का। इसलिए निर्बलता के कारण हमारी आत्माएँ हताश न हों।"—विश्वास का स्वभाव और विशेषाधिकार (Nature and Royalties of Faith), सैमुएल बोल्टन, डी.डी., क्राइस्ट्स कॉलेज, कैम्ब्रिज। 1657।

(16) "कुछ लोग डरते हैं कि उनमें विश्वास है ही नहीं, क्योंकि उनमें विश्वास की वह सर्वोच्च श्रेणी नहीं है जो पूर्ण निश्चयता है, या इसलिए कि उन्हें वह सांत्वना प्राप्त नहीं जो औरों को मिलती है, अर्थात् अवर्णनीय और महिमा से भरा आनन्द। परन्तु इस बाधा को मार्ग से हटाने के लिए हमें स्मरण रखना चाहिए कि विश्वास की अनेक श्रेणियाँ हैं। यह सम्भव है कि तुम में विश्वास हो, चाहे वह उच्चतम श्रेणी का न हो, और इसलिए आत्मा में आनन्द न हो। वह विश्वास का एक अंग है, स्वयं विश्वास नहीं। सच तो यह है कि जब हमें निरन्तर सांत्वना की औषधियों से प्रसन्न रखा जाता है, तब यह विश्वास से जीना नहीं, बल्कि अनुभूति से जीना है। जब परमेश्वर हमारी आत्मा पर भरपूर आनन्द के साथ प्रकाश डालता है, उसकी अपेक्षा सांत्वना के बिना परमेश्वर के सहारे जीने के लिए अधिक सबल विश्वास चाहिए।"—मैथ्यू लॉरेंस, इप्सविच के प्रचारक, विश्वास पर। 1657।

(17) "यदि विदेश में किसी ने यह सोचा है कि अपने पाप की क्षमा का विशेष और पूर्ण निश्चय विश्वास का सार है, तो वे इसका उत्तर स्वयं दें। हमारे देश के धर्मविज्ञानी सामान्यतः दूसरा मत रखते हैं। बिशप डेवनेंट और बिशप प्रिडो तथा अन्य लोगों ने भरोसे और निश्चयता के बीच के बड़े अन्तर को दिखाया है, और वे सब निश्चयता को विश्वास की पुत्री, उसका फल और उसका परिणाम मानते और कहते हैं। और हाल के विद्वान आरोस्मिथ हमें बताते हैं कि परमेश्वर विश्वासियों को निश्चयता प्रायः तब तक नहीं देता जब तक वे अनुग्रह में बढ़ न जाएँ; क्योंकि वे कहते हैं कि भरोसे के विश्वास और निश्चयता के विश्वास में वही अन्तर है जो तर्कशक्ति और विद्या में है। तर्कशक्ति विद्या की नींव है; इसलिए जैसे तर्कशक्ति न हो (जैसे पशुओं में) तो विद्या हो ही नहीं सकती, वैसे ही जहाँ चिपके रहने का विश्वास नहीं वहाँ निश्चयता भी नहीं हो सकती। फिर, जैसे कलाओं और विज्ञानों के अध्ययन में भली-भाँति प्रयुक्त तर्कशक्ति विद्या तक पहुँचती है, वैसे ही विश्वास अपने उचित विषय पर और अपने उचित फलों के द्वारा भली-भाँति अभ्यास किए जाने पर निश्चयता तक पहुँचता है। आगे, जैसे लापरवाही, उपेक्षा या किसी प्रचण्ड रोग से विद्या खो जा सकती है जबकि तर्कशक्ति बनी रहती है, वैसे ही परीक्षा या आत्मिक आलस्य से निश्चयता खो जा सकती है जबकि उद्धार देनेवाला विश्वास बना रहता है। अन्त में, जैसे सब मनुष्यों में तर्कशक्ति है पर सब विद्वान नहीं होते, वैसे ही सब नया जन्म पाए हुए लोगों में सुसमाचार की उद्धार-विधि को उद्धार के लिए स्वीकार करने का विश्वास है, परन्तु सब सच्चे विश्वासियों को निश्चयता नहीं होती।"—आर. फेयरक्लॉ, इम्मानुएल कॉलेज, कैम्ब्रिज के फेलो, का उपदेश, साउथवार्क में प्रचारित प्रातःकालीन अभ्यास (Morning Exercises) से। 1660।

(18) "हमें विश्वास की निर्बलता और उसके अभाव में भेद करना चाहिए। निर्बल विश्वास भी सच्चा होता है। कुचला हुआ सरकण्डा निर्बल तो है, परन्तु मसीह उसे नहीं तोड़ेगा। यद्यपि तुम्हारा विश्वास निर्बल है, तौभी हताश न हो। निर्बल विश्वास भी सबल मसीह को ग्रहण कर सकता है; निर्बल हाथ भी विवाह की गाँठ उतनी ही अच्छी तरह बाँध सकता है जितना सबल हाथ; निर्बल आँख भी पीतल का साँप देख सकती थी। प्रतिज्ञा सबल विश्वास से नहीं, सच्चे विश्वास से की गई है। प्रतिज्ञा यह नहीं कहती कि जिसके पास ऐसा दैत्याकार विश्वास है जो पहाड़ों को हटा सके और सिंहों के मुँह बन्द कर सके, वही उद्धार पाएगा; परन्तु यह कि जो कोई विश्वास करता है, चाहे उसका विश्वास कितना ही छोटा क्यों न हो।"

"तुम पर पवित्रीकरण में आत्मा का जल उण्डेला जा सकता है, चाहे निश्चयता में आनन्द का तेल न मिले; चिपके रहने का विश्वास हो सकता है, प्रमाण का नहीं; जड़ में जीवन हो सकता है जबकि डालियों में फल नहीं; और हृदय में विश्वास हो सकता है जबकि निश्चयता का कोई फल नहीं।"—ए बॉडी ऑफ डिविनिटी (A Body of Divinity), थॉमस वॉटसन, पूर्व में सेंट स्टीफेन्स, वॉलब्रुक, लन्दन के सेवक। 1660।

(19) "परमेश्वर की अनेक प्रिय सन्तानें बहुत समय तक अपनी वर्तमान और अनन्त दशा के विषय में अत्यन्त सन्देह में रह सकती हैं, और नहीं जानतीं कि क्या निष्कर्ष निकालें, कि वे दोषी ठहराई जाएँगी या उनका उद्धार होगा। परमेश्वर की कलीसिया में विश्वासी भिन्न-भिन्न बढ़ाव के होते हैं,—पिता, जवान, बच्चे और नन्हे शिशु; और जैसे अधिकांश परिवारों में बड़ों से अधिक शिशु और बच्चे होते हैं, वैसे ही परमेश्वर की कलीसिया में पूर्ण निश्चयता तक बढ़े हुए सबल मसीहियों की अपेक्षा निर्बल, सन्देह करनेवाले मसीही अधिक हैं। शिशु जन्म ले सकता है और फिर भी उसे इसका पता नहीं होता; वैसे ही मनुष्य नया जन्म पा सकता है और फिर भी उसे इसका निश्चय नहीं होता।"

"हम उद्धार देनेवाले विश्वास को, जैसा वह है, और हृदय के पूर्ण निश्चय को एक-दूसरे से अलग करते हैं। जिनका उद्धार होगा उनमें से कुछ को शायद यह निश्चय न हो कि उनका उद्धार होगा; क्योंकि प्रतिज्ञा विश्वास के अनुग्रह से की गई है, उसके प्रमाण से नहीं,—सच्चे विश्वास से, सबल विश्वास से नहीं। वे स्वर्ग के विषय में निश्चित हो सकते हैं, और फिर भी अपनी अनुभूति में स्वर्ग के विषय में निश्चित न हों।"—रेव. थॉमस डूलिटिल, पेम्ब्रोक हॉल, कैम्ब्रिज, और कुछ समय सेंट एल्फेज, लन्दन के रेक्टर, का उपदेश, क्रिप्लगेट में प्रातःकालीन अभ्यास (Morning Exercises) से। 1661।

(20) "क्या धर्मी ठहराए जाने के लिए यह निश्चय होना आवश्यक नहीं कि मेरे पाप क्षमा हो गए हैं और मैं धर्मी ठहराया गया हूँ? नहीं: यह विश्वास का वह कार्य नहीं है जिससे वह धर्मी ठहराता है, परन्तु धर्मी ठहराए जाने के पश्चात् आनेवाला प्रभाव और फल है।"

"एक बात यह है कि मनुष्य का उद्धार निश्चित हो, और दूसरी बात यह कि उसे निश्चय हो कि वह निश्चित है।"

"जैसे कोई मनुष्य नदी में गिर पड़े और डूबने पर हो, और बाढ़ के साथ बहता चला जाए, तब नदी के ऊपर झुकी हुई किसी वृक्ष की डाली देखकर उसे पकड़ ले और अपनी सारी शक्ति से उससे चिपक जाए ताकि बच जाए, और उसके सिवा सहायता का कोई और उपाय न देखकर उसी पर अपने प्राण को दाँव पर लगा दे। यह मनुष्य जैसे ही उस डाली को थाम लेता है, सुरक्षित दशा में आ जाता है, चाहे सारी विपत्तियाँ, भय और आतंक अभी उसके मन से दूर न हुए हों, जब तक कि वह होश में आकर अपने आप को पूरी तरह संकट से बाहर न देख ले। तब उसे निश्चय होता है कि वह सुरक्षित है; परन्तु निश्चय होने से पहले भी वह सुरक्षित था। विश्वासी के साथ भी ठीक ऐसा ही है। विश्वास मसीह को उद्धार के एकमात्र साधन के रूप में देख लेना और उसे थाम लेने के लिये हृदय का हाथ बढ़ाना ही है। परमेश्वर ने वचन कहा है और अपने पुत्र से प्रतिज्ञा की है: मैं उसी को एकमात्र उद्धारकर्ता मानता हूँ, और अपनी आत्मा को उसकी मध्यस्थता से उद्धार पाने के लिये उसे सौंप देता हूँ। जैसे ही आत्मा ऐसा कर पाती है, परमेश्वर अपने पुत्र की धार्मिकता उसके लिये गिन लेता है, और वह स्वर्ग के न्यायालय में वास्तव में धर्मी ठहराया जाता है, यद्यपि विवेक के न्यायालय में उसे तुरन्त चैन और शान्ति नहीं मिलती। वह बाद में मिलती है: किसी को शीघ्र, किसी को देर से, धर्मी ठहराए जाने के फलों और प्रभावों के द्वारा।"— आर्चबिशप अशर की "बॉडी ऑफ डिविनिटी," 1670।

(21) "कुछ लोग इसलिये सन्देह करते हैं कि वे सन्देह करते हैं, और अविश्वास पर अविश्वास बढ़ाते जाते हैं, और यह निष्कर्ष निकालते हैं कि उनमें विश्वास नहीं है, क्योंकि वे अपने भीतर इतना अधिक और बार-बार सन्देह पाते हैं। परन्तु यह बड़ी भूल है। जहाँ बहुत विश्वास है वहाँ भी कुछ सन्देह हो सकते हैं; और जहाँ बहुत सन्देह है वहाँ भी थोड़ा विश्वास हो सकता है।"

"हमारा उद्धारकर्ता अपने ऊपर दृढ़ और स्थिर विश्वास की माँग करता है और उससे प्रसन्न होता है, परन्तु छोटे से छोटे और निर्बल से निर्बल विश्वास को भी अस्वीकार नहीं करता।"—आर्चबिशप लेटन, मत्ती के सुसमाचार के पहले नौ अध्यायों पर व्याख्यान, 1670।

(22) "पहले बहुत से लोगों ने, और वे भी जो अत्यन्त प्रसिद्ध और उच्च पद के थे, सच्चे विश्वास को निश्चयता से, अर्थात् अपने पापों की क्षमा, अपने व्यक्तित्व की स्वीकृति और भविष्य के उद्धार के दृढ़ भरोसे से, कम किसी स्तर पर नहीं रखा है।"

"परन्तु यह बात, जैसे सन्देह में पड़े और त्यागे हुए हज़ारों जनों के लिये अत्यन्त दुःखदायी और निराशाजनक है, क्योंकि यह उन सब को अनुग्रह से वंचित ठहराती है जो निश्चय तक नहीं पहुँचे हैं, वैसे ही इसने पोप के अनुयायियों को बहुत बड़ा लाभ दे दिया है।"

"विश्वास निश्चयता नहीं है। परन्तु यह कभी-कभी सामर्थी, तेजस्वी और वीरतापूर्ण विश्वास का मुकुट और प्रतिफल होती है; जब परमेश्वर का आत्मा प्रमाण देनेवाले प्रकाश के साथ आत्मा पर उतरता है, और वह सारा अन्धकार तथा वे भय और सन्देह तितर-बितर कर देता है जिन्होंने पहले उसे घेर रखा था।"—"बिशप हॉपकिन्स, वाचाओं पर," 1680।

(23) "निश्चयता का न होना अविश्वास नहीं है। निराश आत्माएँ भी विश्वासी हो सकती हैं। मसीह में विश्वास और उस विश्वास की शान्ति के बीच, अनन्त जीवन के लिये विश्वास करने और यह जानने के बीच कि हमें अनन्त जीवन मिला है, स्पष्ट भेद किया गया है। किसी सन्तान का सम्पत्ति पर अधिकार होना एक बात है, और उसे अपने अधिकार का पूरा ज्ञान होना दूसरी बात।"

"विश्वास का चिह्न हृदय पर वैसे लिखा हो सकता है जैसे मुहर पर अक्षर खुदे होते हैं, फिर भी उसमें इतनी धूल भरी हो कि वे पहचाने न जा सकें। धूल अक्षरों के पढ़े जाने में बाधा डालती है, परन्तु उन्हें मिटाती नहीं।"—स्टीफन चार्नॉक के प्रवचन, इम्मानुएल कॉलेज, कैम्ब्रिज, 1680।

(24) "कुछ लोग उद्धार करनेवाले विश्वास को पूरी निश्चयता में रखकर अपनी ही शान्ति स्वयं छीन लेते हैं। विश्वास और विश्वास की अनुभूति दो अलग और पृथक् की जा सकनेवाली दया की देन हैं; आपने सचमुच मसीह को ग्रहण किया हो और फिर भी उसका ज्ञान या निश्चयता ग्रहण न की हो। कुछ ऐसे हैं जो कहते हैं, 'तू हमारा परमेश्वर है,' जिनके विषय में परमेश्वर ने कभी नहीं कहा कि तुम मेरे लोग हो; उन्हें परमेश्वर की सन्तान कहलाने का कोई अधिकार नहीं। दूसरे ऐसे हैं जिनके विषय में परमेश्वर कहता है, 'ये मेरे लोग हैं,' फिर भी वे परमेश्वर को 'अपना परमेश्वर' कहने का साहस नहीं करते; उन्हें परमेश्वर की सन्तान कहलाने का अधिकार है, फिर भी वे इसे नहीं जानते। उन्होंने मसीह को ग्रहण किया है, यही उनकी सुरक्षा है; परन्तु उन्होंने अभी उसका ज्ञान और निश्चयता ग्रहण नहीं की, यही उनका कष्ट है… पिता पालने में पड़े अपने बच्चे को अपना कहता है, यद्यपि बच्चा उसे अपना पिता नहीं जानता।"—मेथड ऑफ ग्रेस, जॉन फ्लेवेल, डार्टमाउथ, डेवन में सुसमाचार के सेवक, 1680।

(25) "यह स्वीकार किया जाता है कि निर्बल विश्वास को भी मसीह के द्वारा परमेश्वर के साथ उतनी ही शान्ति मिलती है जितनी दूसरे को सामर्थी विश्वास से मिलती है, परन्तु उतनी अन्तःकरण की शान्ति नहीं मिलती।"

"निर्बल विश्वास भी मसीही को उतने ही निश्चित रूप से स्वर्ग पहुँचाएगा जितना सामर्थी विश्वास, क्योंकि यह असम्भव है कि सच्चे अनुग्रह का छोटे से छोटा अंश भी नष्ट हो, क्योंकि वह सब अविनाशी बीज है; परन्तु निर्बल और सन्देह करनेवाले मसीही की वहाँ की यात्रा उतनी सुखद नहीं होगी जितनी सामर्थी विश्वास वाले दूसरे की। यद्यपि जहाज़ में सब कोई सकुशल किनारे पहुँचते हैं, फिर भी जो सारे मार्ग समुद्री बीमारी से पीड़ित रहा उसकी यात्रा उतनी आरामदायक नहीं होती जितनी स्वस्थ और बलवान की।"—द क्रिस्चियन इन कम्प्लीट आर्मर, विलियम गर्नल, कभी लेवनहम, सफ़ोक के रेक्टर, 1680।

(26) "यदि अभी आप पर यह प्रकट नहीं होता कि आप पिता की ओर से पुत्र को दिए गए थे, तो निराश न हों। ऐसा हो सकता है, चाहे आप इसे न देखें। दिए हुए बहुत से लोग बहुत समय तक यह नहीं जानते; वरन् मुझे यह कहने में कोई बड़ा खतरा नहीं दिखता कि पुत्र को दिए गए थोड़े से लोग नहीं, अन्धकार, सन्देह और भय में इसके विषय में तब तक रह सकते हैं जब तक अन्तिम और सबसे उज्ज्वल दिन इसे प्रकट न कर दे, और अन्तिम निर्णय इसकी घोषणा न कर दे।"

"इसलिये यदि आप में से कोई अपने चुनाव के विषय में अन्धकार में हो, तो निराश न हो: ऐसा हो सकता है, चाहे आप उसे न जानते हों।"—प्रभु की प्रार्थना पर उपदेश, रॉबर्ट ट्रेल, लन्दन में और कभी क्रैनब्रुक, केन्ट में सुसमाचार के सेवक, 1690।

(27) "निश्चयता विश्वास के अस्तित्व के लिये अनिवार्य नहीं है। यह सामर्थी विश्वास है; परन्तु हम निर्बल विश्वास, थोड़े विश्वास और राई के दाने के समान विश्वास के विषय में भी पढ़ते हैं। यीशु मसीह में सच्चा उद्धार करनेवाला विश्वास केवल अपनी भिन्न मात्राओं से पहचाना जा सकता है; परन्तु हर मात्रा में और हर व्यक्ति में वह सार्वभौमिक रूप से एक ही प्रकार का है।"—उपदेश,

रेवरेंड जॉन न्यूटन, कभी ओल्नी के विकर और सेंट मेरी, वूलनॉथ, लन्दन के रेक्टर, 1767।

(28) "निर्बल विश्वासियों के पास अपने विरुद्ध निष्कर्ष निकालने का कोई कारण नहीं है। निर्बल विश्वास भी मसीह के साथ उतना ही सचमुच जोड़ता है जितना सबल विश्वास,— जैसे दाखलता की सबसे छोटी कली भी जड़ से रस और जीवन उसी प्रकार खींचती है जैसे सबसे सशक्त डाली। इसलिए निर्बल विश्वासियों के पास धन्यवाद देने के लिए बहुत कारण हैं; और अनुग्रह में बढ़ने की लालसा रखते हुए उन्हें उसे अनदेखा नहीं करना चाहिए जो उन्हें पहले ही मिल चुका है।"— आदरणीय हेनरी वेन का पत्र। 1784।

(29) "हमारे उद्धार के लिए आवश्यक और पर्याप्त विश्वास निश्चयता नहीं है। निःसन्देह उसकी प्रवृत्ति ईश्वरीय कृपा की उस जीवित आशा को उत्पन्न करने की होती है जो पूर्ण भरोसे में परिणत होगी। परन्तु वह भरोसा स्वयं वह विश्वास नहीं है जिसकी हम बात कर रहे हैं, और न ही वह अनिवार्य रूप से उसमें सम्मिलित है: वरन् वह एक बिलकुल भिन्न वस्तु है।"

"निश्चयता सामान्यतः उच्च कोटि के विश्वास के साथ रहती है। परन्तु ऐसे सच्चे लोग भी हैं जिन्हें अनुग्रह की केवल थोड़ी मात्रा प्राप्त है, या जिनमें उस अनुग्रह का प्रयोग बहुत बाधित हो सकता है। जब ऐसी कमियाँ या बाधाएँ प्रबल होती हैं, तब बहुत से भय और संकट उठने की आशा की जा सकती है।"—द क्रिश्चियन सिस्टम, आदरणीय थॉमस रॉबिन्सन, विकर, सेंट मेरीज़, लेस्टर। 1795।

(30) "उद्धार और उद्धार का आनन्द सदा एक साथ नहीं होते; वर्तमान अनुभव में आनन्द सदा उद्धार के साथ नहीं आता।"

"एक रोगी स्वस्थ होने की प्रक्रिया में हो सकता है, फिर भी अपने स्वास्थ्य के लौटने के विषय में संदेह में रह सकता है। पीड़ा और दुर्बलता उसे हिचकिचाहट में डाल सकती हैं। कोई बालक अपनी सम्पत्ति या राज्य का उत्तराधिकारी हो सकता है, फिर भी अपने भावी भाग की आशा से उसे कोई आनन्द न मिले। वह अपनी वंशावली खोज पाने, या अपने स्वत्व-पत्र और अपने पिता की वसीयत पढ़ पाने में असमर्थ हो सकता है; या उन्हें पढ़ने की क्षमता होते हुए भी उनका आशय समझने में असमर्थ हो, और उसका संरक्षक कुछ समय तक उसे अज्ञानी रहने देना उचित समझे। परन्तु उसकी अज्ञानता से उसके अधिकार की वैधता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।"

"उद्धार की व्यक्तिगत निश्चयता विश्वास से अनिवार्य रूप से जुड़ी हुई नहीं है। वे अनिवार्यतः एक ही नहीं हैं। प्रत्येक विश्वासी वास्तव में अपने हृदय में उत्पन्न प्रभाव से अपनी सुरक्षा और अपने विशेषाधिकारों का अनुमान लगा सकता है; परन्तु बहुत से जो सचमुच विश्वास करते हैं, धार्मिकता के वचन में अकुशल हैं, और पवित्रशास्त्र की उन बातों से वह निष्कर्ष निकालने में चूक जाते हैं जो निकालना उनके लिए उचित होता।"—भजन संहिता 51 पर व्याख्यान, आदरणीय थॉमस बिडल्फ़, सेवक, सेंट जेम्स, ब्रिस्टल। 1830।

8. मूसा: एक उदाहरण

"विश्वास ही से मूसा ने सयाना होकर फिरौन की बेटी का पुत्र कहलाने से इन्कार किया।"

"और पाप में थोड़े दिन के सुख भोगने से परमेश्वर के लोगों के साथ दुःख भोगना अधिक पसन्द किया।"

"और मसीह के कारण निन्दित होने को मिस्र के भण्डार से बड़ा धन समझा, क्योंकि उसकी आँखें फल पाने की ओर लगी थीं।"—इब्रानियों 11:24–26

परमेश्वर के सबसे प्रतिष्ठित सन्तों के चरित्र, जैसे बाइबल में चित्रित और वर्णित हैं, पवित्रशास्त्र का एक अत्यन्त उपयोगी भाग हैं। अमूर्त सिद्धान्त, नियम और आज्ञाएँ अपने-अपने स्थान पर सब बहुत मूल्यवान हैं; परन्तु अन्ततः आदर्श या उदाहरण से अधिक सहायक कुछ भी नहीं। क्या हम जानना चाहते हैं कि व्यावहारिक पवित्रता क्या है? आइए हम बैठकर किसी अत्यन्त पवित्र जन के चित्र का अध्ययन करें। इस लेख में मैं अपने पाठकों के सामने एक ऐसे मनुष्य का इतिहास रखना चाहता हूँ जो विश्वास से जीया, और जिसने हमारे लिए इस बात का आदर्श छोड़ा कि चरित्र की पवित्रता को बढ़ाने में विश्वास क्या कर सकता है। जो कोई जानना चाहता है कि "विश्वास से जीने" का क्या अर्थ है, उसके लिए मैं मूसा को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करता हूँ।

इब्रानियों की पत्री का ग्यारहवाँ अध्याय, जिससे मेरा पाठ लिया गया है, एक महान अध्याय है: यह सोने के अक्षरों में छापे जाने योग्य है। मैं भली-भाँति मान सकता हूँ कि यह किसी मन फिराए हुए यहूदी के लिए अत्यन्त सुखदायक और उत्साहवर्धक रहा होगा। मेरा अनुमान है कि आदि कलीसिया के किसी भी सदस्य को मसीही धर्म स्वीकार करने में उतनी कठिनाई नहीं हुई जितनी इब्रानियों को हुई। मार्ग सब के लिए सकरा था, परन्तु उनके लिए विशेष रूप से। क्रूस सब के लिए भारी था, परन्तु उन्हें निश्चय ही दुगुना भार उठाना पड़ा। और यह अध्याय उन्हें संजीवनी की भाँति तरोताज़ा कर देता होगा,—यह उनके लिए वैसा होता जैसा "उदास मनवालों के लिए दाखमधु।" इसके शब्द "मधु के छत्ते की नाईं, प्राणों को मीठे और हड्डियों को हरी-भरी करनेवाले" रहे होंगे। (नीतिवचन 31:6; 16:24।)

जिन तीन पदों की मैं व्याख्या करने जा रहा हूँ, वे इस अध्याय में कम से कम रोचक नहीं हैं। वास्तव में मैं समझता हूँ कि कुछ ही पदों का हमारे ध्यान पर इतना सशक्त दावा है। और मैं समझाऊँगा कि मैं ऐसा क्यों कहता हूँ।

मुझे लगता है कि मूसा की कहानी में वर्णित विश्वास का कार्य विशेष रूप से हमारी अपनी स्थिति पर लागू होता है। इस अध्याय के पूर्वार्ध में जिन परमेश्वर के जनों के नाम आए हैं, वे निःसन्देह सब हमारे लिए उदाहरण हैं। परन्तु उनमें से अधिकांश ने जो किया, उसे हम अक्षरशः नहीं कर सकते, चाहे हम उनकी आत्मा को कितना ही क्यों न ग्रहण करें। हमें हाबिल की तरह अक्षरशः बलिदान चढ़ाने,—या नूह की तरह अक्षरशः जहाज़ बनाने,—या अब्राहम की तरह अक्षरशः अपना देश छोड़कर तम्बुओं में रहने और अपने इसहाक को चढ़ाने के लिए नहीं बुलाया गया है। परन्तु मूसा का विश्वास हमारे अधिक निकट आता है। वह हमारे अपने अनुभव के अधिक परिचित ढंग से कार्य करता प्रतीत होता है। उसने उसे ऐसे आचरण को अपनाने के लिए प्रेरित किया जैसा आज के समय में हमें भी, प्रत्येक को अपने-अपने जीवन-क्षेत्र में, कभी-कभी अपनाना पड़ता है यदि हम सुसंगत मसीही बनना चाहें। और इसी कारण मैं समझता हूँ कि ये तीन पद साधारण से अधिक विचार के योग्य हैं।

अब इनके विषय में मेरे पास सरलतम बातों के अतिरिक्त कुछ कहने को नहीं है। मैं केवल यह दिखाने का प्रयास करूँगा कि मूसा ने जो कार्य किए वे कितने महान थे, और किस सिद्धान्त पर उसने उन्हें किया। और तब शायद हम उस व्यावहारिक शिक्षा के लिए बेहतर रूप से तैयार हो सकेंगे जो इन पदों से हर उस व्यक्ति को मिलती प्रतीत होती है जो उसे ग्रहण करेगा।

I. पहले मैं इस विषय में कहूँगा कि मूसा ने क्या त्यागा और किस बात से इन्कार किया

मूसा ने अपनी आत्मा के हित के लिए तीन वस्तुएँ त्याग दीं। उसने अनुभव किया कि यदि वह उन्हें रखेगा तो उसकी आत्मा का उद्धार नहीं होगा;—इसलिए उसने उन्हें त्याग दिया। और ऐसा करके, मैं कहता हूँ कि उसने तीन ऐसे सबसे बड़े बलिदान किए जो मनुष्य का हृदय कभी कर सकता है। आइए देखें।

(1) उसने पद और बड़प्पन त्याग दिया।

"उसने फ़िरौन की बेटी का पुत्र कहलाने से इनकार किया।" उसका इतिहास हम सब जानते हैं। फ़िरौन की बेटी ने उसके शैशव में उसके प्राण बचाए थे। वह इससे भी आगे बढ़ गई थी: उसने उसे गोद लिया था और अपने ही पुत्र के समान उसे शिक्षा दी थी।

यदि कुछ इतिहासकारों पर भरोसा किया जाए, तो वह फ़िरौन की इकलौती सन्तान थी। कुछ तो यहाँ तक कहते हैं कि सामान्य क्रम में मूसा किसी दिन मिस्र का राजा बन जाता!* यह हो भी सकता है, और नहीं भी; हम कुछ कह नहीं सकते। हमारे लिए इतना जान लेना पर्याप्त है कि फ़िरौन की बेटी से सम्बन्ध होने के कारण मूसा, यदि चाहता, तो बहुत बड़ा मनुष्य बन सकता था। यदि वह मिस्र के राजदरबार में अपनी उस स्थिति से सन्तुष्ट रहता जिसमें उसने स्वयं को पाया था, तो वह सहज ही मिस्र के सारे देश में प्रमुख लोगों में (यदि सर्वप्रमुख नहीं तो) गिना जा सकता था।

आइए, क्षण भर विचार करें कि यह परीक्षा कितनी बड़ी थी।

यहाँ एक ऐसा मनुष्य था जो हमारे ही समान भावनाओं वाला था। उसे उतनी महानता मिल सकती थी जितनी पृथ्वी दे सकती है। पद, सामर्थ्य, स्थान, मान-सम्मान, उपाधियाँ, प्रतिष्ठाएँ,—सब कुछ उसके सामने था और उसकी पहुँच के भीतर था। ये वे वस्तुएँ हैं जिनके लिए बहुत से लोग निरन्तर संघर्ष करते रहते हैं। ये वे पुरस्कार हैं जिन्हें पाने के लिए हमारे आस-पास के संसार में अविराम दौड़ लगी रहती है। कुछ बनना, लोगों की दृष्टि में ऊँचा उठना, समाज की सीढ़ी पर चढ़ना, अपने नाम के साथ कोई उपाधि जुड़वा लेना,—ये ही वे बातें हैं जिनके लिए बहुत से लोग समय, विचार, स्वास्थ्य, यहाँ तक कि प्राण भी न्योछावर कर देते हैं। परन्तु मूसा ने इन्हें उपहार में भी लेना न चाहा। उसने इनकी ओर पीठ फेर ली। उसने इन्हें अस्वीकार कर दिया। उसने इन्हें त्याग दिया!

(2) और इससे भी बढ़कर,—उसने सुख-विलास को ठुकरा दिया।

यदि वह चाहता तो हर प्रकार का सुख निस्सन्देह उसके चरणों में था,—इन्द्रिय-सुख, बौद्धिक सुख, सामाजिक सुख,—जो कुछ भी उसके मन को भाता। मिस्र कलाकारों का देश था, विद्वानों का निवास-स्थान था, और हर उस व्यक्ति का केन्द्र था जो किसी भी प्रकार का कौशल या विद्या रखता हो। ऐसी कोई वस्तु न थी जो "शरीर की अभिलाषा, आँखों की अभिलाषा और जीविका का घमण्ड" को तृप्त कर सके, और जिसे मूसा की स्थिति में कोई सहज ही पा न सकता और अपनी न बना सकता। (1 यूहन्ना 2:16।)

आइए, फिर विचार करें कि यह परीक्षा भी कितनी बड़ी थी।

स्मरण रहे कि सुख-विलास ही वह एक वस्तु है जिसके लिए करोड़ों लोग जीते हैं। सच्चा सुख किसमें है, इस विषय में उनके विचार भले ही भिन्न हों, परन्तु सब इस बात पर सहमत हैं कि सबसे पहले और सबसे बढ़कर उसे पाना है। छुट्टियों में आनन्द मनाना वह बड़ा लक्ष्य है जिसकी बाट एक स्कूली लड़का जोहता है। स्वयं को स्वतन्त्र बना लेने में सुख और सन्तोष वह निशाना है जिस पर व्यापार में लगा युवक अपनी आँख टिकाए रहता है। धन-सम्पत्ति के साथ व्यापार से निवृत्त होकर सुख और चैन पाना वह उद्देश्य है जो सौदागर अपने सामने रखता है। अपने घर में सुख और शारीरिक आराम पाना निर्धन मनुष्य की सारी कामनाओं का सार है। राजनीति में, यात्राओं में, मनोरंजनों में, संगति में, पुस्तकों में सुख और नई उत्तेजना,—यही वह लक्ष्य है जिसकी ओर धनी मनुष्य ज़ोर लगा रहा है। सुख वह छाया है जिसके पीछे सब एक समान दौड़ रहे हैं,—ऊँचे और नीचे, धनी और निर्धन, बूढ़े और जवान, एक के बाद एक,—हो सकता है कि हर कोई पड़ोसी को उसे खोजने के लिए तुच्छ ठहराने का दिखावा करे,—फिर भी हर कोई अपने ढंग से अपने लिए उसे खोज रहा है,—हर कोई मन ही मन चकित है कि उसे वह क्यों नहीं मिलता,—हर कोई दृढ़ता से मानता है कि कहीं न कहीं वह अवश्य मिलेगा। यही वह प्याला था जो मूसा के होंठों के सामने था। वह सांसारिक सुख का रस जितना चाहता उतना गहरा पी सकता था; परन्तु उसने उसे न चाहा। उसने उसकी ओर पीठ फेर ली। उसने उसे अस्वीकार कर दिया। उसने उसे त्याग दिया!

(3) और इससे भी बढ़कर,—उसने धन-सम्पत्ति को ठुकरा दिया।

"मिस्र के भण्डार" यह वाक्यांश असीम धन-सम्पत्ति की ओर संकेत करता है, जिसका भोग मूसा कर सकता था, यदि वह फ़िरौन की बेटी के साथ रहने से सन्तुष्ट रहता। हम भली-भाँति मान सकते हैं कि ये "भण्डार" एक विशाल सम्पदा रहे होंगे। मिस्र में आज भी इतना कुछ बचा है कि उसके राजा के अधिकार में जो धन था, उसका एक धुँधला-सा अनुमान हमें हो जाता है। पिरामिड, स्तम्भ, मन्दिर और मूर्तियाँ आज भी वहाँ साक्षी बनकर खड़े हैं। कार्नाक, लक्सर, देन्देरा और अन्य बहुत-से स्थानों के खण्डहर आज भी संसार के सबसे विशाल भवन हैं। वे आज तक गवाही देते हैं कि जिस मनुष्य ने मिस्र की सम्पत्ति त्याग दी, उसने ऐसी वस्तु त्यागी जिसका हिसाब लगाना और अनुमान करना हम अंग्रेज़ों के मन के लिए भी कठिन होता।

आइए, एक बार फिर विचार करें कि यह परीक्षा कितनी बड़ी थी।

आइए, क्षण भर धन की शक्ति पर विचार करें,—उस प्रबल प्रभाव पर जो "धन का लोभ" मनुष्यों के मन पर जमा लेता है। हम अपने आस-पास देखें और ध्यान दें कि लोग उसकी कितनी लालसा करते हैं, और उसे पाने के लिए कितना अद्भुत परिश्रम और कष्ट उठाते हैं। उन्हें किसी ऐसे द्वीप के विषय में बताइए जो हज़ारों मील दूर है, जहाँ कोई वस्तु मिलती है जो मँगवाने पर लाभदायक हो सकती है, और तुरन्त जहाज़ों का बेड़ा उसे लाने के लिए भेज दिया जाएगा। उन्हें अपने धन से एक प्रतिशत अधिक कमाने की राह दिखा दीजिए, तो वे आपको सबसे बुद्धिमान लोगों में गिनेंगे,—वे लगभग आपके सामने गिरकर आपकी पूजा करने लगेंगे। धन का स्वामी होना मानो दोषों को छिपा देता है,—अपराधों पर परदा डाल देता है,—मनुष्य को गुणों का वस्त्र पहना देता है। यदि आप धनी हैं, तो लोग बहुत-सी बातों की अनदेखी कर देते हैं! परन्तु यहाँ एक ऐसा मनुष्य था जो धनी हो सकता था, और उसने न चाहा। उसने मिस्र के भण्डार न चाहे। उसने उनकी ओर पीठ फेर ली। उसने उन्हें अस्वीकार कर दिया। उसने उन्हें त्याग दिया!

ये थीं वे वस्तुएँ जिन्हें मूसा ने ठुकरा दिया,—पद, सुख-विलास और धन-सम्पत्ति, तीनों एक साथ।

इन सबके साथ यह भी जोड़ लीजिए कि उसने यह सब सोच-समझकर किया। उसने इन वस्तुओं को जवानी के किसी उतावले जोश में अस्वीकार नहीं किया।—वह चालीस वर्ष का था। वह जीवन की पूर्ण अवस्था में था। वह जानता था कि वह क्या कर रहा है। वह एक अत्यन्त शिक्षित मनुष्य था, "मिस्रियों की सारी विद्या में पारंगत।" (प्रेरितों के काम 7:22।) वह प्रश्न के दोनों पक्षों को तौल सकता था।

इसमें यह भी जोड़ लीजिए कि उसने उन्हें इसलिए नहीं ठुकराया कि उसे ऐसा करना पड़ा था। वह उस मरते हुए मनुष्य के समान नहीं था जो हमसे कहता है, "अब मैं इस संसार में और कुछ नहीं चाहता"; और क्यों?—क्योंकि वह संसार को छोड़ रहा है और उसे रख नहीं सकता। वह उस कंगाल के समान नहीं था जो विवशता को गुण बनाकर कहता है, "मुझे धन की चाह नहीं"; और क्यों?—क्योंकि वह उसे पा नहीं सकता। वह उस बूढ़े के समान नहीं था जो डींग मारता है कि "मैंने सांसारिक सुखों को त्याग दिया है"; और क्यों?—क्योंकि वह थक चुका है और उनका आनन्द नहीं ले सकता। नहीं! मूसा ने उसे ठुकराया जिसका वह आनन्द ले सकता था। पद, सुख और धन ने उसे नहीं छोड़ा, परन्तु उसने उन्हें छोड़ दिया।

तब आप ही निर्णय कीजिए कि क्या मेरा यह कहना ठीक नहीं कि उसका त्याग उन महानतम त्यागों में से एक था जो किसी नश्वर मनुष्य ने कभी किया। औरों ने भी बहुत कुछ ठुकराया है, परन्तु मेरे विचार में किसी ने इतना नहीं जितना मूसा ने। औरों ने आत्म-त्याग और आत्म-संयम के मार्ग में अच्छा किया है, परन्तु वह उन सबसे बढ़कर है।

II. अब मैं दूसरी बात पर आता हूँ जिस पर मैं विचार करना चाहता हूँ। मैं इस पर बोलूँगा कि मूसा ने क्या चुना।

मेरे विचार में उसके चुनाव उसके ठुकराने के समान ही आश्चर्यजनक हैं। उसने अपनी आत्मा के हित के लिए तीन बातें चुनीं। उद्धार का मार्ग उन्हीं में से होकर जाता था, और उसने उस पर चलना चुना; और ऐसा करके उसने वे तीन बातें चुनीं जिन्हें अपनाने की प्रवृत्ति मनुष्य में सबसे कम होती है।

(1) एक तो उसने दुःख और क्लेश को चुना।

उसने फ़िरौन के दरबार का सुख-चैन छोड़ दिया और खुलकर इस्राएल की सन्तान का साथ दिया। वे एक दास बनाई हुई और सताई हुई जाति थे,—अविश्वास, सन्देह और घृणा के पात्र; और जो कोई उनका मित्र बनता, उसे उस कड़वे प्याले का कुछ न कुछ स्वाद अवश्य चखना पड़ता जो वे प्रतिदिन पी रहे थे।

लौकिक दृष्टि से लगता था कि लम्बे और अनिश्चित संघर्ष के बिना मिस्र की दासता से उनके छुटकारे की कोई आशा नहीं। उनके लिए कोई बसा-बसाया घर और देश ऐसी वस्तु प्रतीत होती थी जिसके मिलने की कितनी ही इच्छा क्यों न हो, कोई सम्भावना नहीं थी। वास्तव में, यदि कभी कोई मनुष्य आँखें खोलकर पीड़ा, परीक्षाएँ, निर्धनता, अभाव, संकट, चिन्ता, और सम्भवतः मृत्यु तक को चुनता प्रतीत हुआ, तो वह मूसा था।

आइए, सोचें कि यह चुनाव कितना अद्भुत था।

शरीर और लहू स्वभाव से ही पीड़ा से कतराते हैं। यह हम सब में है। हम एक प्रकार की सहज प्रवृत्ति से दुःख से पीछे हट जाते हैं और यदि बच सकें तो बच निकलते हैं। यदि हमारे सामने दो मार्ग रखे जाएँ जो दोनों उचित लगते हों, तो हम प्रायः वही चुनते हैं जो शरीर और लहू को सबसे कम अप्रिय लगे। जब हमें लगता है कि क्लेश निकट आ रहा है तो हम भय और चिन्ता में दिन बिताते हैं और उससे बचने के हर उपाय करते हैं। और जब वह आ ही जाता है, तो हम प्रायः उसके बोझ के नीचे कुड़कुड़ाते हैं; और यदि हम उसे धीरज से सह पाएँ तो इसे बड़ी बात मानते हैं।

परन्तु यहाँ देखिए! यहाँ एक मनुष्य है जो हमारे ही समान भावनाओं वाला है, और वह वास्तव में क्लेश को चुनता है! मूसा ने देखा कि यदि वह फ़िरौन का दरबार छोड़ेगा तो उसके सामने दुःख का कैसा प्याला होगा, और उसने उसे चुना, उसे श्रेष्ठ जाना और उसे उठा लिया।

(2) परन्तु उसने इससे भी बढ़कर किया; उसने एक तुच्छ जाति की संगति को चुना।

उसने उन बड़े और बुद्धिमान लोगों की संगति छोड़ दी जिनके बीच वह पला-बढ़ा था, और अपने आप को इस्राएल की सन्तान से जोड़ लिया। जो बचपन से पद, धन और विलास के बीच रहा था, वह अपनी ऊँची दशा से उतर आया और निर्धनों के साथ अपना भाग्य बाँध लिया,—दासों, बँधुओं, गुलामों, अछूतों, बन्धुआ मज़दूरों के साथ,—जो पीड़ित, अभावग्रस्त, दुःखी और सताए हुए थे,—ईंट के भट्ठे के मज़दूरों के साथ।

फिर एक बार, यह चुनाव कितना अद्भुत था!

साधारणतः हम यही बहुत समझते हैं कि अपनी ही कठिनाइयों को उठा लें। हमें उन दूसरों पर तरस आ सकता है जिनका भाग्य तुच्छ और तिरस्कृत होना है।—हम उनकी सहायता करने का प्रयत्न भी कर सकते हैं,—उन्हें उठाने के लिए धन दे सकते हैं,—जिन पर वे निर्भर हैं उनसे उनके पक्ष में बोल सकते हैं; परन्तु यहीं आकर हम प्रायः रुक जाते हैं।

परन्तु यहाँ एक मनुष्य है जो इससे कहीं अधिक करता है। वह केवल तिरस्कृत इस्राएल के लिए दुःख ही नहीं मानता, वरन् सचमुच उनके पास उतर जाता है, अपने आप को उनके समाज में मिला लेता है और पूरी तरह उन्हीं के साथ रहता है। यदि ग्रॉसवेनर या बेलग्रेव स्क्वायर का कोई बड़ा आदमी भलाई करने के लिए अपना घर, धन-सम्पत्ति और समाज में अपनी प्रतिष्ठा त्यागकर बेथनल ग्रीन की किसी तंग गली में थोड़े से भत्ते पर रहने चला जाए तो आप आश्चर्य करेंगे। फिर भी यह उस काम का बहुत ही धुँधला और फीका-सा अनुमान देगा जो मूसा ने किया। उसने एक तुच्छ जाति को देखा, और उसने देश के सबसे कुलीन लोगों की संगति के स्थान पर उनकी संगति को चुना। वह उनके साथ एक हो गया,—उनका साथी, क्लेश में उनका सहभागी, उनका सहयोगी, उनका संगी और उनका मित्र।

(3) परन्तु उसने इससे भी अधिक किया। उसने निन्दा और ठट्ठे को चुना।

कौन कल्पना कर सकता है कि फ़िरौन के दरबार से मुड़कर इस्राएल से जा मिलने में मूसा को उपहास और ठट्ठे की कैसी बाढ़ का सामना करना पड़ा होगा? लोग उससे कहते कि वह पागल है, मूर्ख है, निर्बल है, नासमझ है, उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है। वह अपना प्रभाव खो देता; जिनके बीच वह रहा था उन सबकी कृपा और अच्छी राय से वंचित हो जाता। परन्तु इनमें से किसी बात ने उसे विचलित नहीं किया। उसने दरबार छोड़ दिया और दासों से जा मिला!

आइए, फिर सोचें कि यह कैसा चुनाव था!

उपहास और ठट्ठे से अधिक शक्तिशाली वस्तुएँ थोड़ी ही हैं। यह खुली शत्रुता और उत्पीड़न से कहीं अधिक कर सकता है। बहुत-से मनुष्य जो तोप के मुँह तक चढ़ जाते, या निराशा की टुकड़ी का नेतृत्व करते, या दीवार की दरार पर धावा बोल देते, उन्होंने कुछ साथियों की हँसी का सामना करना असम्भव पाया है, और उससे बचने के लिए कर्तव्य के मार्ग से पीछे हट गए हैं। हँसी का पात्र बनना! मज़ाक बन जाना! ताने और व्यंग्य सहना! निर्बल और नासमझ गिना जाना! मूर्ख समझा जाना!—इन सब में कोई बड़ाई नहीं, और अफ़सोस, बहुत-से लोग इसे सहने का मन नहीं बना पाते!

फिर भी यहाँ एक मनुष्य है जिसने इसके लिए मन बना लिया, और परीक्षा से पीछे नहीं हटा। मूसा ने अपने सामने निन्दा और ठट्ठा देखा, और उसने उन्हें चुना और अपने भाग के रूप में स्वीकार किया।

तो ये थीं वे बातें जो मूसा ने चुनीं: क्लेश,—एक तुच्छ जाति की संगति,—और ठट्ठा।

इसके साथ यह भी जोड़ लीजिए कि मूसा कोई निर्बल, अज्ञानी, अशिक्षित मनुष्य नहीं था जो न जानता हो कि वह क्या कर रहा है। आपको विशेष रूप से बताया गया है कि वह "बातों और कामों में सामर्थी" था; फिर भी उसने ऐसा ही चुना! (प्रेरितों के काम 7:22।)

उसके चुनाव की परिस्थितियों पर भी ध्यान दीजिए। उसके लिए वैसा चुनाव करना अनिवार्य नहीं था। किसी ने उसे ऐसा मार्ग अपनाने के लिए विवश नहीं किया। जिन बातों को उसने अपनाया, वे उसकी इच्छा के विरुद्ध उस पर थोपी नहीं गई थीं। वही उनके पीछे गया; वे उसके पीछे नहीं आईं। उसने जो कुछ किया, अपनी स्वतंत्र इच्छा से किया—स्वेच्छा से और अपनी ही प्रेरणा से।

और फिर स्वयं विचार कीजिए कि क्या यह सच नहीं कि उसके चुनाव उसके इन्कारों जितने ही अद्भुत थे। मेरा अनुमान है कि जगत् के आरम्भ से अब तक किसी ने ऐसा चुनाव नहीं किया जैसा हमारे पाठ में मूसा ने किया।

III. और अब मैं तीसरी बात की ओर बढ़ता हूँ—मैं उस सिद्धान्त की चर्चा करता हूँ जिसने मूसा को प्रेरित किया और जिसके कारण उसने वैसा किया जैसा उसने किया।

उसके इस आचरण की व्याख्या कैसे की जाए? इसका क्या संभावित कारण बताया जा सकता है? जिसे सामान्यतः भला कहा जाता है उसे ठुकरा देना और जिसे आमतौर पर बुरा माना जाता है उसे चुन लेना—यह शरीर और लहू का मार्ग नहीं है। यह मनुष्य का स्वभाव नहीं है; इसके लिए किसी स्पष्टीकरण की आवश्यकता है। वह स्पष्टीकरण क्या होगा?

उत्तर हमारे पाठ में ही है। मैं नहीं जानता कि इसकी महानता अधिक सराहनीय है या इसकी सरलता। यह सब एक छोटे से शब्द में समाया है, और वह शब्द है “विश्वास।”

मूसा में विश्वास था। विश्वास ही उसके अद्भुत आचरण का मूल आधार था। विश्वास ने ही उससे वह करवाया जो उसने किया, उसे वह चुनवाया जो उसने चुना, और उसे वह ठुकरवाया जो उसने ठुकराया। उसने यह सब इसलिए किया क्योंकि उसने विश्वास किया।

परमेश्वर ने उसके मन की आँखों के सामने अपनी इच्छा और अपना उद्देश्य रखा। परमेश्वर ने उस पर प्रकट किया कि इस्राएल के वंश से एक उद्धारकर्ता उत्पन्न होना था, कि अब्राहम की इस सन्तान में बड़ी-बड़ी प्रतिज्ञाएँ निहित थीं जिनका पूरा होना अभी शेष था, कि इन प्रतिज्ञाओं के एक भाग के पूरा होने का समय निकट था; और मूसा ने इस पर भरोसा किया और विश्वास किया। फ़िरौन के दरबार को छोड़ने के बाद जीवन-यात्रा में उसका हर क़दम, हर कार्य—प्रत्यक्ष बुराई का उसका चुनाव, प्रत्यक्ष भलाई का उसका इन्कार—सब कुछ इसी स्रोत तक पहुँचाया जाना चाहिए; सब कुछ इसी नींव पर टिका हुआ पाया जाएगा। परमेश्वर ने उससे बात की थी, और उसने परमेश्वर के वचन पर विश्वास किया।

उसने विश्वास किया कि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं को निभाएगा—जो उसने कहा है वह निश्चय पूरा करेगा, और जो उसने वाचा बाँधी है उसे निश्चय पूरा करेगा।

उसने विश्वास किया कि परमेश्वर के लिए कुछ भी असम्भव नहीं। बुद्धि और इन्द्रियाँ कह सकती थीं कि इस्राएल का छुटकारा सम्भव ही नहीं: बाधाएँ बहुत थीं, कठिनाइयाँ बहुत बड़ी थीं। परन्तु विश्वास ने मूसा से कहा कि परमेश्वर सर्वसमर्थ है। परमेश्वर ने यह काम अपने ऊपर लिया है, और यह पूरा होकर रहेगा।

उसने विश्वास किया कि परमेश्वर सर्वज्ञानी है। बुद्धि और इन्द्रियाँ उससे कह सकती थीं कि उसका मार्ग निरर्थक है; कि फ़िरौन की पुत्री से नाता तोड़कर वह उपयोगी प्रभाव को गँवा रहा है और अपने लोगों को लाभ पहुँचाने के सारे अवसर नष्ट कर रहा है। परन्तु विश्वास ने मूसा से कहा कि यदि परमेश्वर कहता है, “इस मार्ग पर चल,” तो वही सबसे उत्तम होगा।

उसने विश्वास किया कि परमेश्वर परम दयालु है। बुद्धि और इन्द्रियाँ संकेत दे सकती थीं कि छुटकारे का कोई अधिक सुखद उपाय मिल सकता है, कोई समझौता हो सकता है, और बहुत-से कष्टों से बचा जा सकता है। परन्तु विश्वास ने मूसा से कहा कि परमेश्वर प्रेम है, और वह अपने लोगों को अत्यावश्यक कटुता से एक बूँद भी अधिक नहीं देगा।

मूसा के लिए विश्वास एक दूरबीन था। उसने उसे दूर की उस उत्तम भूमि को दिखाया—विश्राम, शान्ति और विजय—जबकि धुँधली दृष्टिवाली बुद्धि को केवल परीक्षा और बंजरपन, आँधी और तूफ़ान, थकान और पीड़ा ही दिखाई देती थी।

मूसा के लिए विश्वास एक दुभाषिया था। उसने परमेश्वर की हस्तलिपि की अँधेरी आज्ञाओं में से सुखद अर्थ निकाल लिया, जबकि अज्ञानी इन्द्रियाँ उसमें रहस्य और मूर्खता के सिवा कुछ नहीं देख सकती थीं।

विश्वास ने मूसा से कहा कि यह सारा पद और ऐश्वर्य पृथ्वी का है, मिट्टी का है, एक दीन, व्यर्थ और खोखली वस्तु, नाशवान, क्षणभंगुर और मिट जानेवाली; और परमेश्वर की सेवा के समान कोई सच्ची महानता नहीं। राजा वही है, सच्चा कुलीन वही है जो परमेश्वर के परिवार का है। स्वर्ग में अन्तिम होना नरक में प्रथम होने से उत्तम है।

विश्वास ने मूसा से कहा कि सांसारिक सुख “पाप के सुख” हैं। वे पाप से मिले हुए हैं, पाप की ओर ले जाते हैं, आत्मा के लिए विनाशकारी और परमेश्वर को अप्रसन्न करनेवाले हैं। यदि परमेश्वर उसके विरुद्ध हो तो सुख भोगना कोई बड़ा सान्त्वना नहीं। पाप में चैन से रहने की अपेक्षा परमेश्वर की आज्ञा मानकर दुःख उठाना उत्तम है।

विश्वास ने उससे कहा कि ये सुख अन्ततः केवल “कुछ समय” के लिए हैं। वे टिक नहीं सकते; वे सब अल्पकालिक हैं; शीघ्र ही उसे थका देंगे; कुछ ही वर्षों में उसे इन सबको छोड़ना पड़ेगा।

विश्वास ने उससे कहा कि विश्वासी के लिए स्वर्ग में मिस्र के ख़ज़ानों से कहीं अधिक समृद्ध प्रतिफल है, स्थायी धन, जहाँ न तो कीड़ा और न काई बिगाड़ते हैं, न चोर सेंध लगाकर चुराते हैं। वहाँ का मुकुट अविनाशी होगा; महिमा का भार अत्यन्त और अनन्त होगा;—और यदि उसकी आँखें मिस्र के सोने से चौंधिया रही हों, तो विश्वास ने उसे अनदेखे स्वर्ग की ओर देखने को कहा।

विश्वास ने मूसा से कहा कि क्लेश और दुःख वास्तविक बुराइयाँ नहीं हैं। वे परमेश्वर की पाठशाला हैं, जिसमें वह अनुग्रह की सन्तानों को महिमा के लिए तैयार करता है;—वे औषधियाँ हैं जो हमारी भ्रष्ट इच्छाओं को शुद्ध करने के लिए आवश्यक हैं;—वह भट्ठी हैं जिसमें हमारा मैल जलना चाहिए;—वह छुरी हैं जिससे उन बन्धनों को काटना है जो हमें संसार से बाँधते हैं।

विश्वास ने मूसा से कहा कि तुच्छ समझे जानेवाले इस्राएली परमेश्वर के चुने हुए लोग थे। उसने विश्वास किया कि लेपालकपन, वाचा, प्रतिज्ञाएँ और महिमा उन्हीं की हैं; कि उन्हीं में से एक दिन स्त्री का वह वंश उत्पन्न होना था जो सर्प का सिर कुचलेगा; कि उन पर परमेश्वर की विशेष आशीष थी; कि वे उसकी दृष्टि में प्रिय और सुन्दर थे;—और कि दुष्टता के महलों में राज्य करने की अपेक्षा परमेश्वर के लोगों के बीच द्वारपाल होना उत्तम है।

विश्वास ने मूसा को बताया कि उस पर उंडेली गई सारी निन्दा और तिरस्कार "मसीह की निन्दा" था;—कि मसीह के कारण ठट्ठों में उड़ाया जाना और तुच्छ समझा जाना आदर की बात थी;—कि जो कोई मसीह के लोगों को सताता है वह स्वयं मसीह को सता रहा है;—और कि वह दिन अवश्य आएगा जब उसके शत्रु उसके सामने झुकेंगे और धूल चाटेंगे। यह सब, और इससे भी बहुत कुछ, जिसके विषय में मैं विस्तार से नहीं कह सकता, मूसा ने विश्वास से देखा। यही वे बातें थीं जिन पर उसने विश्वास किया, और विश्वास करके वही किया जो उसने किया। उसे इनका पूरा भरोसा था, और उसने इन्हें अपनाया,—उसने इन्हें निश्चित बातें माना,—उसने इन्हें ठोस सच्चाइयाँ समझा,—उसने इन्हें ऐसा निश्चित जाना मानो उसने अपनी आँखों से देखा हो,—वह इन पर वास्तविकताओं के समान चला;—और इसी ने उसे वह मनुष्य बनाया जो वह था। उसमें विश्वास था। उसने विश्वास किया।

यह देखकर आश्चर्य न करो कि उसने बड़ाई, धन और सुख-विलास को ठुकरा दिया।—उसने दूर आगे की ओर देखा। उसने विश्वास की आँख से राज्यों को धूल में मिलते देखा,—धन को अपने लिये पंख लगाकर उड़ जाते देखा,—सुख-विलास को मृत्यु और न्याय की ओर ले जाते देखा,—और केवल मसीह और उसके छोटे झुण्ड को सदा बने रहते देखा।

यह देखकर चकित न हो कि उसने दुःख, एक तुच्छ जाति और निन्दा को चुन लिया।—उसने सतह के नीचे की बातों को देखा। उसने विश्वास की आँख से देखा कि दुःख केवल क्षण भर का है,—निन्दा दूर हो जाती है और अनन्त आदर में समाप्त होती है,—और परमेश्वर के तुच्छ ठहराए गए लोग महिमा में मसीह के साथ राजाओं के समान राज्य करते हैं।

और क्या वह सही नहीं था? क्या वह मरकर भी आज हमसे बात नहीं करता? फ़िरौन की पुत्री का नाम मिट गया है, या कम से कम अत्यन्त संदिग्ध है।—जिस नगर में फ़िरौन राज्य करता था वह ज्ञात नहीं है।—मिस्र के भण्डार जाते रहे।—परन्तु मूसा का नाम वहाँ-वहाँ जाना जाता है जहाँ-जहाँ बाइबल पढ़ी जाती है, और वह आज भी इस बात का अटल साक्षी है कि "जो विश्वास से जीवित रहता है, वह धन्य है।"

IV. और अब मैं मूसा के इस इतिहास से उचित परिणाम के रूप में निकलनेवाली कुछ व्यावहारिक शिक्षाओं को क्रम से प्रस्तुत करके इस बात को समाप्त करना चाहता हूँ।

कुछ लोग कहेंगे, इन सब बातों का हमसे क्या सम्बन्ध है? हम मिस्र में नहीं रहते,—हमने कोई चमत्कार नहीं देखे,—हम इस्राएली नहीं हैं,—हम इस विषय से थक गए हैं।

यदि तेरे मन का विचार यही है, तो थोड़ा ठहर, और परमेश्वर की सहायता से मैं तुझे दिखाऊँगा कि यहाँ सब सीख सकते हैं और सब शिक्षा पा सकते हैं। जो मसीही जीवन जीना चाहता है और सचमुच पवित्र मनुष्य बनना चाहता है, वह मूसा के इतिहास पर ध्यान दे और बुद्धि प्राप्त करे।

(1) एक बात तो यह कि यदि तुझे कभी उद्धार पाना है, तो तुझे वही चुनाव करना होगा जो मूसा ने किया,—तुझे संसार से बढ़कर परमेश्वर को चुनना होगा।

मेरी बात पर भली-भाँति ध्यान दे। इसे अनदेखा न कर, चाहे और सब कुछ भूल जाए। मैं यह नहीं कहता कि राजनेता को अपना पद छोड़ देना चाहिए और धनवान को अपनी सम्पत्ति त्याग देनी चाहिए। कोई यह न समझे कि मेरा यही अर्थ है। परन्तु मैं कहता हूँ कि यदि कोई मनुष्य उद्धार पाना चाहता है, तो चाहे जीवन में उसकी कोई भी हैसियत हो, उसे क्लेश के लिये तैयार रहना होगा। उसे मन बनाना होगा कि वह बहुत-सी बातें चुने जो बुरी दिखाई देती हैं, और बहुत-सी बातें त्यागे और ठुकराए जो अच्छी दिखाई देती हैं।

मैं कह सकता हूँ कि ये पन्ने पढ़नेवाले कुछ लोगों को यह भाषा अनोखी लगेगी। मैं भली-भाँति जानता हूँ कि तेरे पास धर्म का एक रूप हो सकता है और तुझे अपने मार्ग में कोई कठिनाई न मिले। आजकल एक साधारण सांसारिक प्रकार की मसीहियत है, जो बहुतों के पास है, और वे समझते हैं कि वही बहुत है,—एक सस्ती मसीहियत जो किसी को बुरी नहीं लगती और जिसमें कोई त्याग नहीं करना पड़ता,—जिसकी कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती, और जो किसी काम की नहीं। मैं इस प्रकार के धर्म की बात नहीं कर रहा।

परन्तु यदि तू सचमुच अपनी आत्मा के विषय में गम्भीर है,—यदि तेरा धर्म केवल रविवार को ओढ़ा जानेवाला फैशनदार चोगा मात्र नहीं,—यदि तूने ठान लिया है कि बाइबल के अनुसार जीएगा,—यदि तूने निश्चय किया है कि नए नियम का मसीही बनेगा, तो मैं फिर कहता हूँ, तुझे शीघ्र ही पता चल जाएगा कि तुझे क्रूस उठाना होगा।—तुझे कठिन बातें सहनी होंगी, तुझे अपनी आत्मा के लिये दुःख उठाना होगा, जैसा मूसा ने उठाया, नहीं तो तेरा उद्धार नहीं हो सकता।

उन्नीसवीं शताब्दी में संसार वैसा ही है जैसा सदा से था। मनुष्यों के हृदय अब भी वैसे ही हैं। क्रूस की ठोकर समाप्त नहीं हुई है। परमेश्वर के सच्चे लोग अब भी तुच्छ समझा जानेवाला छोटा झुण्ड हैं। सच्चा सुसमाचारीय धर्म अब भी अपने साथ निन्दा और तिरस्कार लाता है। परमेश्वर के सच्चे दास को अब भी बहुत लोग दुर्बल उन्मादी और मूर्ख समझेंगे।

परन्तु बात यहाँ आकर ठहरती है। क्या तू चाहता है कि तेरी आत्मा का उद्धार हो? तो स्मरण रख, तुझे चुनना होगा कि तू किसकी सेवा करेगा। तू परमेश्वर और धन दोनों की सेवा नहीं कर सकता। तू एक ही समय में दो पक्षों में नहीं हो सकता। तू मसीह का मित्र और संसार का मित्र एक साथ नहीं हो सकता। तुझे इस संसार की सन्तानों में से निकलकर अलग होना होगा; तुझे बहुत उपहास, कष्ट और विरोध सहना होगा, नहीं तो तू सदा के लिये नष्ट हो जाएगा। तुझे वे बातें सोचने और करने के लिये तैयार रहना होगा जिन्हें संसार मूर्खता समझता है, और ऐसे विचार रखने होंगे जो केवल थोड़े ही लोग रखते हैं। इसमें तुझे कुछ खोना पड़ेगा। धारा तेज़ है, और तुझे उसके विरुद्ध चलना है। मार्ग सकरा और चढ़ाई का है, और यह कहने से कोई लाभ नहीं कि ऐसा नहीं है। परन्तु विश्वास रख, बिना त्याग और आत्म-त्याग के कोई उद्धार देनेवाला धर्म नहीं हो सकता।

अब क्या तू कोई त्याग कर रहा है? क्या तेरे धर्म में तुझे कुछ खोना पड़ता है? मैं पूरे स्नेह और कोमलता से तेरे विवेक के सामने यह रखता हूँ,—क्या तू मूसा के समान संसार से बढ़कर परमेश्वर को चुन रहा है, या नहीं? मैं तुझसे विनती करता हूँ कि "हम" के उस जोखिम-भरे शब्द की आड़ न ले: "हमें चाहिए," और "हम आशा करते हैं," और "हमारा विचार है," और ऐसी ही बातें। मैं तुझसे सीधे पूछता हूँ, तू स्वयं क्या कर रहा है? क्या तू कोई भी ऐसी वस्तु छोड़ने को तैयार है जो तुझे परमेश्वर से पीछे रोकती है? या तू संसार के मिस्र से चिपका हुआ है और अपने आप से कहता है, "मुझे यह चाहिए, मुझे यह चाहिए: मैं अपने आप को इससे अलग नहीं कर सकता"? क्या तेरी मसीहियत में कोई क्रूस है? क्या तेरे धर्म में कोई तीखे कोने हैं, कुछ ऐसा जो कभी तेरे आस-पास की सांसारिकता से खटकता और टकराता हो? या सब कुछ चिकना और गोल है, और रीति और फैशन में आराम से बैठाया हुआ है? क्या तू सुसमाचार के क्लेशों के विषय में कुछ जानता है? क्या तेरा विश्वास और आचरण कभी तिरस्कार और निन्दा का विषय बनता है? क्या तेरी आत्मा के कारण कोई तुझे मूर्ख समझता है? क्या तूने फ़िरौन की पुत्री को छोड़कर मन से परमेश्वर के लोगों का साथ पकड़ा है? क्या तू सब कुछ मसीह पर दाँव पर लगा रहा है? जाँचकर देख।

ये कठिन प्रश्न हैं और कड़ी पूछताछ है। मैं क्या करूँ, मैं इन्हें टाल नहीं सकता। मेरा विश्वास है कि ये पवित्रशास्त्र के सत्यों पर आधारित हैं। मुझे स्मरण है कि लिखा है, "जब बड़ी भीड़ यीशु के साथ जा रही थी, तो उसने पीछे फिरकर उन से कहा, यदि कोई मेरे पास आए और अपने पिता और माता और पत्नी और बच्चों और भाइयों और बहिनों बरन अपने प्राण को भी अप्रिय न जाने, तो वह मेरा चेला नहीं हो सकता। और जो कोई अपना क्रूस न उठाए और मेरे पीछे न आए, वह भी मेरा चेला नहीं हो सकता।" (लूका 14:25–27।) मुझे डर है कि बहुत से लोग महिमा तो चाहेंगे, पर अनुग्रह की उन्हें कोई इच्छा नहीं। वे मज़दूरी तो पाना चाहेंगे, पर काम नहीं करना चाहेंगे; फसल तो चाहेंगे, पर परिश्रम नहीं; काटना चाहेंगे, पर बोना नहीं; प्रतिफल चाहेंगे, पर युद्ध नहीं। परन्तु ऐसा नहीं हो सकता। जैसा बनियन कहता है, "कड़वा पहले आना चाहिए, मीठा उसके बाद।" यदि क्रूस नहीं है, तो मुकुट भी नहीं होगा।

(2) दूसरी बात मैं यह कहता हूँ,—विश्वास को छोड़ और कोई वस्तु तुम्हें संसार के सामने परमेश्वर को चुनने के योग्य नहीं बना सकती।

और कुछ भी यह नहीं कर सकता। न ज्ञान, न भावना, न बाहरी रीतियों का नियमित पालन, न अच्छी संगति। इन सबसे कुछ तो हो सकता है, परन्तु इनसे जो फल उत्पन्न होता है उसमें टिके रहने की सामर्थ्य नहीं होती; वह स्थायी नहीं रहता। ऐसे स्रोतों से उपजा धर्म तभी तक ठहरेगा जब तक "वचन के कारण क्लेश या उपद्रव" नहीं आता; पर जैसे ही कोई आता है, वह सूख जाएगा। वह ऐसी घड़ी के समान है जिसमें न कमानी है, न बाट; उसका मुख सुन्दर हो सकता है, तुम उसकी सुइयाँ घुमा सकते हो, परन्तु वह चलेगी नहीं। जिस धर्म को टिकना है उसकी नींव जीवित होनी चाहिए, और वह नींव विश्वास के सिवाय और कोई नहीं।

हृदय से यह सच्चा विश्वास होना चाहिए कि परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ निश्चित हैं और उन पर भरोसा किया जा सकता है;—यह सच्चा विश्वास कि बाइबल में परमेश्वर जो कहता है वह सब सत्य है, और इसके विपरीत हर सिद्धान्त झूठा है, चाहे कोई कुछ भी कहे। यह सच्चा विश्वास होना चाहिए कि परमेश्वर के सब वचन ग्रहण करने योग्य हैं, चाहे वे शरीर और लहू को कितने ही कठोर और अप्रिय क्यों न लगें, और कि उसका मार्ग सही है और बाकी सब गलत। यह होना ही चाहिए, नहीं तो तुम कभी संसार में से निकलकर, क्रूस उठाकर, मसीह के पीछे चलकर उद्धार नहीं पाओगे।

तुम्हें सीखना होगा कि प्रतिज्ञाओं पर सम्पत्ति से अधिक विश्वास करो;—अनदेखी वस्तुओं पर देखी हुई वस्तुओं से अधिक;—स्वर्ग की उन वस्तुओं पर जो दृष्टि से ओझल हैं, पृथ्वी की उन वस्तुओं से अधिक जो तुम्हारी आँखों के सामने हैं;—अदृश्य परमेश्वर की प्रशंसा पर दृश्य मनुष्य की प्रशंसा से अधिक। तब, और केवल तब, तुम मूसा के समान चुनाव करोगे और संसार से बढ़कर परमेश्वर को पसन्द करोगे।

अब मैं इस लेख के हर पाठक से पूछता हूँ, क्या तुम्हारे पास यह विश्वास है? यदि है, तो तुम पाओगे कि भले दिखनेवाले को ठुकराना और बुरे दिखनेवाले को चुनना तुम्हारे लिए सम्भव है।—तुम कल के लाभ की आशा में आज की हानियों को कुछ न समझोगे।—तुम अंधकार में भी मसीह के पीछे चलोगे और अन्त तक उसके साथ खड़े रहोगे। यदि नहीं है, तो मैं चेतावनी देता हूँ, तुम कभी अच्छी लड़ाई न लड़ोगे, और "ऐसे दौड़ोगे" भी नहीं "कि जीत लो।"—तुम शीघ्र ठोकर खाकर संसार की ओर लौट जाओगे।

इन सब से बढ़कर प्रभु यीशु मसीह पर एक सच्चा और स्थिर विश्वास होना चाहिए। जो जीवन तुम शरीर में जीते हो उसे परमेश्वर के पुत्र के विश्वास से जीना चाहिए। यीशु पर निरन्तर टेक लगाने, यीशु की ओर ताकते रहने, यीशु में से खींचने और उसे अपनी आत्मा का मन्ना बनाने की एक दृढ़ आदत होनी चाहिए। तुम्हें यह कह सकने का यत्न करना चाहिए, "मेरे लिए जीना मसीह है।" "जो मुझे सामर्थ्य देता है उसमें मैं सब कुछ कर सकता हूँ।" (फिलिप्पियों 1:21; 4:13।)

यह वही विश्वास था जिसके द्वारा पुराने पवित्र लोगों ने अच्छी गवाही पाई। यही वह हथियार था जिससे उन्होंने संसार को जीता। इसी ने उन्हें वह बनाया जो वे थे।

यही वह विश्वास था जिसने नूह को जहाज़ बनाते रहने दिया जबकि संसार देखता और ठट्ठा करता था,—और अब्राहम से लूत को देश चुनने दिया और स्वयं चुपचाप तम्बुओं में रहने दिया,—और रूत को नाओमी से लिपटे रहने और अपने देश और अपने देवताओं से मुँह फेरने की प्रेरणा दी,—और दानिय्येल को प्रार्थना में लगे रहने दिया जबकि वह जानता था कि सिंहों की माँद तैयार है,—और तीनों जवानों को मूर्तियों की उपासना से इनकार करने दिया जबकि उनकी आँखों के सामने जलता हुआ भट्ठा था,—और मूसा को फ़िरौन के क्रोध से न डरकर मिस्र को छोड़ने दिया। इन सब ने जैसा किया वैसा इसलिए किया कि उन्होंने विश्वास किया। उन्होंने इस मार्ग की कठिनाइयाँ और क्लेश देखे। परन्तु उन्होंने विश्वास से उन सब के ऊपर यीशु को देखा, और आगे बढ़ते गए। प्रेरित पतरस का विश्वास को "बहुमूल्य विश्वास" कहना उचित ही है। (2 पतरस 1:1।)

(3) तीसरी बात मैं यह कहता हूँ,—इतने लोगों के संसारी और अभक्त होने का सच्चा कारण यह है कि उनमें विश्वास नहीं है।

हमें जान लेना चाहिए कि अंगीकार करनेवाले मसीहियों की भीड़ में से अनेक लोग क्षण भर के लिए भी मूसा के समान करने की नहीं सोचेंगे। मीठी-मीठी बातें कहना और इस तथ्य से आँखें मूँद लेना व्यर्थ है। वह मनुष्य अंधा होगा जिसे अपने आसपास हज़ारों लोग दिखाई न दें जो प्रतिदिन परमेश्वर से बढ़कर संसार को चुनते हैं,—अनन्त की वस्तुओं से पहले समय की वस्तुओं को, और आत्मा की वस्तुओं से पहले शरीर की वस्तुओं को रखते हैं। हमें यह मानना अच्छा न लगे, और हम इस तथ्य को अनदेखा करने का बहुत यत्न करें। परन्तु बात ऐसी ही है।

और वे ऐसा क्यों करते हैं? निःसन्देह वे सब हमें कारण और बहाने बताएँगे। कोई संसार के फन्दों की बात करेगा,—कोई समय की कमी की,—कोई अपनी स्थिति की विशेष कठिनाइयों की,—कोई जीवन की चिन्ताओं और व्याकुलताओं की,—कोई परीक्षा की प्रबलता की,—कोई वासनाओं की शक्ति की,—कोई बुरी संगति के प्रभाव की। पर अन्त में बात क्या ठहरती है? उनकी आत्मा की दशा का कहीं छोटा कारण यह है,—वे विश्वास नहीं करते। एक सीधा-सा वाक्य, हारून की लाठी के समान, उनके सब बहानों को निगल जाएगा,—उनमें विश्वास नहीं है।

वे सचमुच यह नहीं मानते कि परमेश्वर जो कहता है वह सत्य है। वे चुपके-चुपके अपने आप को यह सोचकर बहलाते हैं, "यह निश्चय पूरा नहीं होगा,—स्वर्ग पहुँचने का कोई और मार्ग अवश्य होगा, उसके सिवाय जो सेवक बताते हैं,—खो जाने का इतना खतरा निश्चय ही नहीं हो सकता।" संक्षेप में, परमेश्वर ने जो वचन लिखा और कहा है उस पर वे पूरा भरोसा नहीं रखते, और इसलिए उसके अनुसार चलते नहीं। वे नरक पर पूरा विश्वास नहीं करते, इसलिए उससे भागते नहीं,—न स्वर्ग पर, इसलिए उसे ढूँढ़ते नहीं,—न पाप के दोष पर, इसलिए उससे फिरते नहीं,—न परमेश्वर की पवित्रता पर, इसलिए उसका भय नहीं मानते,—न मसीह की अपनी आवश्यकता पर, इसलिए न उस पर भरोसा रखते हैं, न उससे प्रेम करते हैं। उन्हें परमेश्वर पर भरोसा नहीं, इसलिए वे उसके लिए कुछ जोखिम नहीं उठाते। "पिलग्रिम्स प्रोग्रेस" के बालक पैशन की तरह उन्हें अपनी अच्छी वस्तुएँ अभी चाहिए। वे परमेश्वर पर भरोसा नहीं करते, इसलिए प्रतीक्षा भी नहीं कर सकते।

अब हमारा अपना क्या हाल है? क्या हम सारी बाइबल पर विश्वास करते हैं? आइए हम अपने आप से यह प्रश्न पूछें। निश्चय जानिए, सारी बाइबल पर विश्वास करना उससे कहीं बड़ी बात है जितना बहुत लोग समझते हैं। धन्य है वह मनुष्य जो अपने हृदय पर हाथ रखकर कह सके, "मैं विश्वासी हूँ।"

हम कभी-कभी अविश्वासियों की चर्चा ऐसे करते हैं मानो वे संसार में सबसे दुर्लभ लोग हों। और मैं मानता हूँ कि खुले रूप से घोषित अविश्वास आजकल सौभाग्य से बहुत सामान्य नहीं है। परन्तु फिर भी हमारे चारों ओर व्यावहारिक अविश्वास की बहुतायत है, जो अन्त में वोल्टेयर और पेन के सिद्धान्तों के समान ही खतरनाक है। बहुत लोग हैं जो रविवार पर रविवार धर्म-सिद्धान्त दोहराते हैं, और प्रेरितों तथा निकेया के पाठों में जो कुछ है उस सब पर अपना विश्वास घोषित करना आवश्यक समझते हैं। फिर भी यही लोग सारा सप्ताह ऐसे जीते हैं मानो मसीह कभी मरा ही नहीं, और मानो न्याय, मृतकों का पुनरुत्थान और अनन्त जीवन कुछ है ही नहीं। बहुत लोग हैं जो अनन्त बातों और अपनी आत्मा के मूल्य के विषय में बात करने पर कहते हैं, "अरे, हम तो सब जानते हैं।" फिर भी उनका जीवन साफ दिखाता है कि वे कुछ भी वैसा नहीं जानते जैसा जानना चाहिए; और उनकी दशा का सबसे शोचनीय पहलू यह है कि वे समझते हैं कि वे जानते हैं!

यह एक भयानक सत्य है, और पूरे ध्यान के योग्य है, कि जिस ज्ञान पर अमल न किया जाए वह परमेश्वर की दृष्टि में केवल व्यर्थ और निष्फल ही नहीं है। वह इससे कहीं बुरा है। वह न्याय के दिन हमारे दण्ड को बढ़ाएगा और हमारे दोष को और भारी करेगा। जो विश्वास मनुष्य के आचरण को प्रभावित न करे वह विश्वास कहलाने के योग्य नहीं। मसीह की कलीसिया में केवल दो श्रेणियाँ हैं,—वे जो विश्वास करते हैं और वे जो नहीं करते। सच्चे मसीही और केवल बाहरी रूप से स्वीकार करनेवाले के बीच का अन्तर एक ही शब्द में है;—सच्चे मसीही में मूसा के समान "विश्वास" है;—केवल बाहरी रूप से स्वीकार करनेवाले में कोई विश्वास नहीं। सच्चा मसीही विश्वास करता है, इसलिए वैसा जीता है जैसा जीता है; केवल दिखावा करनेवाला विश्वास नहीं करता, इसलिए वैसा है जैसा है। आह, हमारा विश्वास कहाँ है? हम अविश्वासी न बनें, परन्तु विश्वासी बनें।

(4) अन्तिम बात जो मैं कहता हूँ वह यह है,—परमेश्वर के लिए बड़े काम करने का सच्चा भेद यह है कि बड़ा विश्वास रखा जाए।

मेरा मानना है कि इस विषय में हम सब चूक जाने के प्रवृत्त हैं। हम अनुग्रहों, वरदानों और उपलब्धियों के बारे में बहुत सोचते और बहुत बोलते हैं, और यह पर्याप्त रूप से स्मरण नहीं रखते कि विश्वास ही उन सबकी जड़ और जननी है। परमेश्वर के साथ चलने में मनुष्य उतनी ही दूर जाएगा जितना वह विश्वास करता है, उससे आगे नहीं। उसका जीवन सदा उसके विश्वास के अनुपात में होगा। उसकी शान्ति, उसका धैर्य, उसका साहस, उसका उत्साह, उसके काम,—सब उसके विश्वास के अनुसार होंगे।

आप प्रसिद्ध मसीहियों के जीवन-चरित्र पढ़ते हैं, वेस्ली, व्हाइटफील्ड, वेन, मार्टिन, बिकरस्टेथ, सिमियन या मैकचेन जैसे लोगों के। और आप कहने को प्रवृत्त होते हैं, "इन लोगों में कितने अद्भुत वरदान और अनुग्रह थे!" मैं उत्तर देता हूँ, आपको उस जननी-अनुग्रह का आदर करना चाहिए जिसे परमेश्वर ने इब्रानियों की पत्री के 11वें अध्याय में आगे रखा है,—आपको उनके विश्वास का आदर करना चाहिए। निश्चय जानिए, उनमें से हर एक के चरित्र में विश्वास ही मुख्य प्रेरक शक्ति थी।

मैं कल्पना कर सकता हूँ कि कोई कहे, "वे बहुत प्रार्थनाशील थे;—उसी ने उन्हें वह बनाया जो वे थे।" मैं उत्तर देता हूँ, वे बहुत प्रार्थना क्यों करते थे?—केवल इसलिए कि उनमें बहुत विश्वास था। प्रार्थना और क्या है, सिवाय परमेश्वर से बोलते हुए विश्वास के?

कोई और शायद कहे, "वे बहुत परिश्रमी और मेहनती थे,—इसी से उनकी सफलता समझ में आती है।" मैं उत्तर देता हूँ, वे इतने परिश्रमी क्यों थे?—केवल इसलिए कि उनमें विश्वास था। मसीही परिश्रम और क्या है, सिवाय काम करते हुए विश्वास के?

कोई और मुझसे कहेगा, "वे बहुत निडर थे,—इसी ने उन्हें इतना उपयोगी बनाया।" मैं उत्तर देता हूँ, वे इतने निडर क्यों थे?—केवल इसलिए कि उनमें बहुत विश्वास था। मसीही निडरता और क्या है, सिवाय अपना कर्तव्य ईमानदारी से निभाते हुए विश्वास के?

और कोई और पुकारेगा, "उनकी पवित्रता और आत्मिकता ही थी,—जिसने उन्हें प्रभावशाली बनाया।" अन्तिम बार मैं उत्तर देता हूँ, उन्हें पवित्र किसने बनाया?—एक जीवित, यथार्थ अनुभव करनेवाले विश्वास की आत्मा के सिवाय किसी ने नहीं। पवित्रता और क्या है, सिवाय दिखाई देते हुए और देह धारण किए हुए विश्वास के?

अब क्या इस लेख का कोई पाठक अनुग्रह में, और अपने प्रभु यीशु मसीह के ज्ञान में बढ़ना चाहता है? क्या आप बहुत फल लाना चाहते हैं? क्या आप अत्यन्त पवित्र और उपयोगी होना चाहते हैं? क्या आप उजले होकर अपने समय में ज्योति के समान चमकना चाहते हैं? क्या आप मूसा के समान दोपहर के समान स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि आपने संसार के सामने परमेश्वर को चुना है? मुझे निश्चय है कि हर विश्वासी उत्तर देगा, "हाँ! हाँ! हाँ! हम इन्हीं बातों की लालसा और इच्छा करते हैं।"

तो आज मेरी सलाह मानिए:—जाइए और प्रभु यीशु मसीह से वैसे ही पुकारिए जैसे चेलों ने पुकारा था, "हमारा विश्वास बढ़ा।" विश्वास सच्चे मसीही के चरित्र की जड़ है। अपनी जड़ ठीक रखिए, तो आपका फल शीघ्र ही बहुत होगा। आपकी आत्मिक उन्नति सदा आपके विश्वास के अनुसार होगी। जो विश्वास करता है वह केवल उद्धार ही नहीं पाएगा, पर कभी प्यासा न होगा,—जय पाएगा,—स्थिर किया जाएगा,—इस संसार के जल पर दृढ़ता से चलेगा,—और बड़े काम करेगा।

पाठक, यदि आप इस लेख की बातों पर विश्वास करते हैं, और पूर्ण रूप से पवित्र मनुष्य होना चाहते हैं, तो अपने विश्वास के अनुसार चलना आरम्भ कीजिए। मूसा को अपना आदर्श बनाइए। उसके पदचिन्हों पर चलिए। जाइए और वैसा ही कीजिए।

9. लूत: एक चेतावनी-स्तम्भ

"वह टालमटोल करने लगा।"—उत्पत्ति 19:16

पवित्रशास्त्र, जो हमारी शिक्षा के लिये लिखा गया, उसमें चेतावनी-चिह्न भी हैं और आदर्श भी। वह हमें उन उदाहरणों को दिखाता है जिनसे हमें बचना चाहिए, और उनको भी जिनका हमें अनुसरण करना चाहिए। जिस मनुष्य का नाम इस पृष्ठ के आरम्भ में है, वह मसीह की सारी कलीसिया के लिये चेतावनी-चिह्न बनाकर रखा गया है। उसका चरित्र हमारे सामने एक छोटे-से शब्द में रखा गया है:—"वह विलम्ब करता रहा।" आइए, हम बैठकर कुछ क्षण इस चेतावनी-चिह्न को देखें। आइए, हम लूत पर विचार करें।

यह विलम्ब करनेवाला मनुष्य कौन है?—यह विश्वासयोग्य अब्राहम का भतीजा है। और उसने विलम्ब कब किया?—ठीक उसी सुबह, जब सदोम नष्ट होनेवाला था। और उसने विलम्ब कहाँ किया?—सदोम की दीवारों के भीतर ही। और किसके सामने उसने विलम्ब किया?—उन दो स्वर्गदूतों की आँखों के सामने, जो उसे नगर से बाहर निकालने के लिये भेजे गए थे। तब भी "वह विलम्ब करता रहा!"

ये शब्द गम्भीर हैं, और इनमें मनन के लिये बहुत कुछ है। इन्हें धर्म का कोई भी दावा करनेवाले हर एक के कानों में तुरही की तरह गूँजना चाहिए। मुझे आशा है कि ये इस लेख के हर पाठक को सोचने पर विवश करेंगे। कौन जाने ये वही शब्द हों जिनकी तुम्हारी आत्मा को आवश्यकता है? प्रभु यीशु की वाणी तुम्हें आज्ञा देती है कि "लूत की पत्नी को स्मरण रखो।" (लूका 17:32।) उसके एक सेवक की वाणी आज तुम्हें न्योता देती है कि लूत को स्मरण रखो।

मैं यह दिखाने का प्रयत्न करता हूँ कि—

I. लूत स्वयं कैसा मनुष्य था:

II. ऊपर उद्धृत पद उसके विषय में क्या बताता है:

III. उसके विलम्ब करने के क्या कारण हो सकते हैं:

IV. उसके विलम्ब ने किस प्रकार का फल उत्पन्न किया।

मैं उन सब से विशेष ध्यान देने को कहता हूँ जिन्हें अपने सच्चे मसीही होने की आशा है, और जो पवित्र जीवन जीना चाहते हैं। यदि हम पवित्रता का अनुसरण करते हैं, तो हमारे मन में यह बात पक्की रहे कि हमें "विलम्ब" नहीं करना चाहिए।

मैं फिर कहता हूँ, "लूत एक चेतावनी-चिह्न है।"

I. लूत कैसा था?

यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात है। यदि मैं इसे अनदेखा छोड़ दूँ, तो सम्भवतः मैं उन्हीं धर्म का दावा करनेवाले मसीहियों से चूक जाऊँगा जिनकी मैं विशेष रूप से भलाई करना चाहता हूँ। यदि मैं इसे भली-भाँति स्पष्ट न करूँ, तो बहुत-से लोग शायद इस लेख को पढ़कर कहेंगे, "अहा! लूत तो बुरा मनुष्य था,—बेचारा, दुष्ट, अन्धकार में पड़ा हुआ प्राणी,—अपरिवर्तित मनुष्य,—संसार की सन्तान!—तब यदि उसने विलम्ब किया तो कोई आश्चर्य नहीं।"

परन्तु अब ध्यान दो कि मैं क्या कहता हूँ। लूत ऐसा कुछ भी नहीं था। लूत सच्चा विश्वासी था,—मन फिराया हुआ व्यक्ति,—परमेश्वर की सच्ची सन्तान,—धर्मी ठहराया हुआ प्राण,—धर्मी मनुष्य।

क्या मेरे किसी पाठक के हृदय में अनुग्रह है?—तो लूत में भी था। क्या मेरे किसी पाठक को उद्धार की आशा है?—तो लूत को भी थी। क्या मेरा कोई पाठक "नई सृष्टि" है?—तो लूत भी था। क्या मेरा कोई पाठक उस सकरे मार्ग का यात्री है जो जीवन की ओर ले जाता है?—तो लूत भी था।

कोई यह न सोचे कि यह केवल मेरी निजी राय है,—मेरी अपनी मनमानी कल्पना,—ऐसी धारणा जिसे पवित्रशास्त्र का समर्थन नहीं मिलता। कोई यह न समझे कि मैं चाहता हूँ कि वह इसे केवल इसलिये माने कि मैं ऐसा कहता हूँ। पवित्र आत्मा ने उसे "धर्मी" और "न्यायी" कहकर (2 पतरस 2:7, 8) इस बात को विवाद से परे कर दिया है, और उसमें जो अनुग्रह था उसका अच्छा प्रमाण भी हमें दिया है।

एक प्रमाण यह है कि वह दुष्ट स्थान में रहता था, और अपने चारों ओर बुराई को "देखता और सुनता" था (2 पतरस 2:8), फिर भी स्वयं दुष्ट न हुआ। अब बाबुल में दानिय्येल होना,—अहाब के घराने में ओबद्याह होना,—यारोबाम के परिवार में अबिय्याह होना,—नीरो के दरबार में सन्त होना, और सदोम में "धर्मी मनुष्य" होना, इसके लिये मनुष्य में परमेश्वर का अनुग्रह होना अवश्य है। अनुग्रह के बिना यह असम्भव होता।

एक और प्रमाण यह है कि वह अपने चारों ओर देखे हुए "अधर्म के कामों" से अपने जी को खिन्न करता था। (2 पतरस 2:8।) वह पाप को देखकर घायल, दुःखी, पीड़ित और आहत होता था। यह पवित्र दाऊद के समान अनुभव करना था, जो कहता है, "मैं विश्वासघातियों को देखकर घृणा करता हूँ, क्योंकि वे तेरे वचन को नहीं मानते।" "मेरी आँखों से जल की धाराएँ बहती हैं, क्योंकि लोग तेरी व्यवस्था को नहीं मानते।" (भजन संहिता 119:136, 158।) यह पौलुस के समान अनुभव करना था, जो कहता है, "मुझे बड़ा शोक है, और मेरा हृदय निरन्तर दुखता रहता है,—अपने भाइयों के लिये जो शरीर के भाव से मेरे कुटुम्बी हैं।" (रोमियों 9:2, 3।) परमेश्वर के अनुग्रह के सिवा इसका और कोई कारण नहीं बताया जा सकता।

एक और प्रमाण यह है कि वह देखे हुए अधर्म के कामों से "दिन-प्रतिदिन" अपने जी को खिन्न करता रहा। (2 पतरस 2:8।) वह अन्त में पाप के विषय में ठण्डा और गुनगुना नहीं हो गया, जैसा बहुत-से लोग हो जाते हैं। परिचय और आदत ने उसकी भावनाओं की पैनी धार को कुण्ठित नहीं किया, जैसा प्रायः होता है। बहुत-से मनुष्य दुष्टता को पहली बार देखकर चौंक जाते और सहम जाते हैं, फिर भी उसे देखने के इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि अन्त में वे उसे अपेक्षाकृत उदासीनता से देखने लगते हैं। विशेष रूप से यह उन लोगों के साथ होता है जो नगरों और महानगरों में रहते हैं, या उन अंग्रेज़ों के साथ जो यूरोप महाद्वीप में यात्रा करते हैं। ऐसे लोग सब्त के उल्लंघन और खुले पाप के अनेक रूपों के प्रति प्रायः पूरी तरह उदासीन हो जाते हैं। परन्तु लूत के साथ ऐसा नहीं था। और यह भी उसके अनुग्रह की वास्तविकता का एक बड़ा चिह्न है।

ऐसा था लूत,—धर्मी और न्यायी मनुष्य, ऐसा मनुष्य जिस पर स्वयं पवित्र आत्मा ने मुहर और छाप लगाकर उसे स्वर्ग का उत्तराधिकारी ठहराया।

आगे बढ़ने से पहले, आइए हम स्मरण रखें कि सच्चे मसीही में भी बहुत-से दाग, बहुत-सी त्रुटियाँ और बहुत-सी निर्बलताएँ हो सकती हैं, फिर भी वह सच्चा मसीही होता है। हम सोने को इसलिये तुच्छ नहीं समझते कि उसमें बहुत-सा खोट मिला है। हमें अनुग्रह को इसलिये कम नहीं आँकना चाहिए कि उसके साथ बहुत-सा भ्रष्टाचार जुड़ा है। आगे पढ़ोगे तो पाओगे कि लूत को अपने "विलम्ब" की भारी कीमत चुकानी पड़ी। परन्तु पढ़ते समय यह मत भूलना कि लूत परमेश्वर की सन्तान था।

II. आइए, अब दूसरी बात पर चलें जिसका मैंने उल्लेख किया था। ऊपर उद्धृत पद लूत के आचरण के विषय में हमें क्या बताता है?

ये शब्द अद्भुत और चकित कर देनेवाले हैं: "वह विलम्ब करता रहा।"—हम समय और परिस्थितियों पर जितना अधिक विचार करेंगे, उतना ही अधिक इन्हें अद्भुत पाएँगे।

लूत उस नगर की भयानक दशा को जानता था जिसमें वह खड़ा था। उसके घिनौने कामों की "चिल्लाहट" "यहोवा के सामने बहुत बढ़ गई थी।" (उत्पत्ति 19:13।) फिर भी "वह विलम्ब करता रहा।"

लूत उस भयंकर न्याय को जानता था जो उसकी दीवारों के भीतर के सब लोगों पर उतरने को था। स्वर्गदूतों ने साफ़ कह दिया था, "यहोवा ने हमें इसको नष्ट करने के लिये भेजा है।" (उत्पत्ति 19:13।) फिर भी "वह विलम्ब करता रहा।"

लूत जानता था कि परमेश्वर ऐसा परमेश्वर है जो सदा अपना वचन पूरा करता है, और यदि वह कोई बात कहे तो अवश्य उसे करता है। अब्राहम का भतीजा होकर, और उसके साथ बहुत समय रहकर, वह इस बात से अनजान नहीं हो सकता था। फिर भी "वह विलम्ब करता रहा।"

लूत ने विश्वास किया कि खतरा है,—क्योंकि वह अपने दामादों के पास गया और उन्हें भाग जाने की चेतावनी दी। उसने कहा, "उठो, इस स्थान से निकल चलो; क्योंकि यहोवा इस नगर को नाश करने पर है।" (उत्पत्ति 19:14।) तौभी "वह लगा रहा"।

लूत ने परमेश्वर के दूतों को पास खड़े देखा, जो उसके और उसके परिवार के निकलने की बाट जोह रहे थे। उसने क्रोध के उन सेवकों का शब्द अपने कानों में गूँजता सुना जो उसे शीघ्रता करने को कह रहे थे:—"उठ, अपनी पत्नी और अपनी दोनों बेटियों को जो यहाँ हैं ले जा; कहीं ऐसा न हो कि तू भी इस नगर के अधर्म में भस्म हो जाए।" (उत्पत्ति 19:15।) तौभी "वह लगा रहा"।

जब उसे फुर्ती करनी चाहिए थी तब वह धीमा था,—जब आगे बढ़ना चाहिए था तब पीछे रहा,—जब जल्दी करनी चाहिए थी तब खिलवाड़ करता रहा,—जब दौड़ना चाहिए था तब देर लगाता रहा,—जब उसे उत्साह से जलना चाहिए था तब वह ठण्डा रहा। यह अत्यन्त आश्चर्यजनक है! यह लगभग अविश्वसनीय लगता है! यह सच होने के लिए बहुत विचित्र प्रतीत होता है! परन्तु पवित्र आत्मा ने इसे हमारी शिक्षा के लिए लिखवाया है। और ऐसा ही हुआ था।

तौभी, यद्यपि पहली दृष्टि में यह जितना भी आश्चर्यजनक लगे, मुझे भय है कि प्रभु यीशु मसीह के बहुत से लोग लूत के समान ही हैं।

मैं इस पत्र के हर पाठक से कहता हूँ कि जो मैं कह रहा हूँ उसे भली-भाँति ध्यान दे। मैं इसे दोहराता हूँ ताकि मेरे अर्थ के विषय में कोई भूल न रहे। मैंने तुम्हें दिखाया है कि लूत "लगा रहा"।—मैं कहता हूँ कि आज के दिन बहुत से मसीही पुरुष और मसीही स्त्रियाँ लूत के समान ही हैं।

परमेश्वर के बहुत से सच्चे सन्तान ऐसे हैं जो जितना जानते हैं उससे कहीं कम पर चलते हैं, और जितना देखते हैं उससे कहीं कम अभ्यास में लाते हैं, फिर भी वे बहुत वर्षों तक इसी दशा में बने रहते हैं। आश्चर्य है कि वे जितनी दूर तक जाते हैं उतनी दूर तक तो जाते हैं, परन्तु उससे आगे नहीं बढ़ते!

वे सिर को, अर्थात् मसीह को, थामे रहते हैं और सत्य से प्रेम रखते हैं। उन्हें खरा प्रचार अच्छा लगता है, और सुसमाचार के सिद्धान्त का हर अनुच्छेद जब वे सुनते हैं तो उसे मान लेते हैं। फिर भी उनमें कुछ ऐसी अवर्णनीय बात है जो सन्तोषजनक नहीं है। वे निरन्तर ऐसे काम करते रहते हैं जो उनके सेवकों और अधिक उन्नत मसीही मित्रों की आशाओं को निराश करते हैं। आश्चर्य है कि वे ऐसा सोचते हैं, और फिर भी एक ही स्थान पर खड़े रहते हैं!

वे स्वर्ग पर विश्वास करते हैं, फिर भी उसकी लालसा उनमें फीकी ही दिखाई देती है;—और नरक पर विश्वास करते हैं, फिर भी उससे बहुत कम डरते जान पड़ते हैं। वे प्रभु यीशु से प्रेम रखते हैं; परन्तु उसके लिए जो काम वे करते हैं वह थोड़ा है। वे शैतान से घृणा करते हैं; परन्तु अकसर ऐसा लगता है मानो वे उसे अपने पास आने के लिए ललचा रहे हैं। वे जानते हैं कि समय थोड़ा है; परन्तु ऐसे जीते हैं मानो वह लम्बा हो। वे जानते हैं कि उन्हें लड़ाई लड़नी है; फिर भी कोई सोच सकता है कि वे शान्ति में हैं। वे जानते हैं कि उन्हें दौड़ दौड़नी है; फिर भी वे अकसर चुपचाप बैठे हुए लोगों जैसे दिखते हैं। वे जानते हैं कि न्यायी द्वार पर खड़ा है और आनेवाला क्रोध है; फिर भी वे आधे सोए हुए से जान पड़ते हैं। आश्चर्य है कि वे जैसे हैं वैसे हैं, और उससे अधिक कुछ नहीं!

और इन लोगों के विषय में हम क्या कहें? वे अकसर भक्त मित्रों और सम्बन्धियों को उलझन में डाल देते हैं। वे अकसर बड़ी चिन्ता उत्पन्न करते हैं। वे अकसर हृदय में बड़े सन्देह और जाँच-पड़ताल को जन्म देते हैं। परन्तु उन सबको एक ही व्यापक वर्णन में रखा जा सकता है: वे सब लूत के भाई और बहिनें हैं। वे देर लगाते हैं।

ये वे लोग हैं जिनके मन में यह धारणा बैठ जाती है कि सब विश्वासियों के लिए इतना अधिक पवित्र और इतना अधिक आत्मिक होना असम्भव है! वे मानते हैं कि उत्कृष्ट पवित्रता एक सुन्दर वस्तु है। उन्हें उसके विषय में पुस्तकों में पढ़ना, और कभी-कभी दूसरों में उसे देखना भी अच्छा लगता है। परन्तु वे नहीं सोचते कि सबको इतने ऊँचे स्तर का लक्ष्य रखना चाहिए। किसी भी दशा में, वे मन में यही ठान लेते जान पड़ते हैं कि यह उनकी पहुँच से बाहर है।

ये वे लोग हैं जो अपने मन में प्रेम की झूठी धारणाएँ बना लेते हैं, जैसा कि वे उसे कहते हैं। वे अनुदार और संकीर्ण मन के कहलाने से रोगी की तरह डरते हैं, और सदा उलटी चरम सीमा की ओर भागते रहते हैं। वे चाहते हैं कि सबको प्रसन्न करें, सबके अनुकूल बनें, और सबको अच्छे लगें। परन्तु वे यह भूल जाते हैं कि उन्हें पहले इस बात का निश्चय होना चाहिए कि वे परमेश्वर को प्रसन्न करते हैं।

ये वे लोग हैं जो बलिदानों से डरते हैं और आत्मत्याग से कतराते हैं। वे हमारे प्रभु की इस आज्ञा को कभी अपने ऊपर लागू करने में समर्थ नहीं दिखते कि "अपना क्रूस उठाओ" और "दाहिना हाथ काट डालो और दाहिनी आँख निकाल फेंको।" (मत्ती 5:29, 30।) वे इससे इनकार नहीं कर सकते कि हमारे प्रभु ने ये बातें कहीं, परन्तु अपने धर्म में उन्हें इनके लिए कभी कोई स्थान नहीं मिलता। वे अपना जीवन इसी प्रयत्न में बिताते हैं कि फाटक को और चौड़ा और क्रूस को और हलका बना लें। परन्तु वे कभी सफल नहीं होते।

ये वे लोग हैं जो सदा संसार से मेल बनाए रखने का प्रयत्न करते हैं। वे स्पष्ट रूप से अलग न होने के कारण खोजने में, और सन्देहास्पद मनोरंजनों में जाने तथा सन्देहास्पद मित्रताएँ बनाए रखने के लिए मनगढ़न्त बहाने गढ़ने में बड़े चतुर होते हैं। एक दिन तुम्हें बताया जाता है कि वे बाइबल पाठ में उपस्थित हुए: अगले दिन शायद सुनते हो कि वे नाच-रंग में गए। एक दिन वे उपवास करते हैं, या प्रभु-भोज में जाकर संस्कार ग्रहण करते हैं: दूसरे दिन वे सवेरे घुड़दौड़ के मैदान में और रात को नाट्यशाला में होते हैं। एक दिन वे किसी भावुकता जगानेवाले प्रचारक के उपदेश को सुनकर लगभग उन्माद में आ जाते हैं: दूसरे दिन वे किसी उपन्यास पर आँसू बहा रहे होते हैं। वे निरन्तर अपने आप को यह समझाने में परिश्रम करते रहते हैं कि संसारी लोगों के बीच उनकी अपनी भूमि पर थोड़ा-बहुत मिलना-जुलना भलाई करता है। फिर भी उनके विषय में यह स्पष्ट है कि वे कोई भलाई नहीं करते, केवल हानि उठाते हैं।

ये वे लोग हैं जो अपने मन में अपने घेरनेवाले पाप से झगड़ने का साहस नहीं जुटा पाते, चाहे वह आलस्य हो, सुस्ती हो, बुरा स्वभाव हो, घमण्ड हो, स्वार्थ हो, अधीरता हो, या कुछ और हो। वे उसे अपने हृदय का एक काफी शान्त और निर्बाध किरायेदार बना रहने देते हैं। वे कहते हैं, "यह उनके स्वास्थ्य का, या उनकी बनावट का, या उनके स्वभाव का, या उनकी परीक्षाओं का, या उनके ढंग का दोष है। उनके पिता, या माता, या दादी भी उन्हीं के समान थीं, और उन्हें निश्चय है कि वे इसे रोक नहीं सकते।" और जब एक-दो वर्ष की दूरी के बाद तुम उनसे मिलते हो, तो वही बात फिर सुनते हो!

परन्तु सब कुछ एक ही वाक्य में समेटा जा सकता है। वे लूत के भाई और बहिनें हैं। वे देर लगाते हैं।

आह, यदि तू देर लगानेवाली आत्मा है, तो तू सुखी नहीं है! तू जानता है कि तू सुखी नहीं है। यदि तू सुखी होता तो सचमुच आश्चर्य की बात होती। देर लगाना सुखी मसीही जीवन का निश्चित विनाश है। देर लगानेवाले का विवेक उसे भीतरी शान्ति का आनन्द लेने से रोकता है।

सम्भव है कि किसी समय तू भली-भाँति दौड़ रहा था। परन्तु तूने अपना पहला सा प्रेम छोड़ दिया है;—उसके बाद से तूने वैसा चैन कभी अनुभव नहीं किया, और जब तक तू अपने "पहले कामों" की ओर न लौटेगा तब तक कभी न करेगा। (प्रकाशितवाक्य 2:5।) पतरस के समान, जब

प्रभु यीशु बन्दी बना लिए गए, तब तुम दूर से प्रभु के पीछे चल रहे हो; और उसके समान तुम भी पाओगे कि मार्ग सुखद नहीं, परन्तु कठिन है।

आओ, लूत को देखो। लूत के इतिहास पर ध्यान दो। लूत के "ठहरे रहने" पर विचार करो, और बुद्धिमान बनो।

III. अब हम उन कारणों पर विचार करें जिनसे लूत के ठहरे रहने की व्याख्या हो सकती है

यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रश्न है, और मैं इस पर पूरा गम्भीर ध्यान देने का निवेदन करता हूँ। रोग की जड़ को जान लेना उपचार की ओर एक कदम है। जिसे पहले से चेतावनी मिल चुकी है वह पहले से सशस्त्र है।

इस लेख के पाठकों में ऐसा कौन है जो अपने को सुरक्षित समझता है और ठहरे रहने से नहीं डरता? आओ, सुनो, मैं तुम्हें लूत के इतिहास के कुछ अंश बताता हूँ। जैसा उसने किया वैसा करो, तो यह सचमुच आश्चर्य की बात होगी यदि तुम अन्त में आत्मा की उसी दशा में न पहुँच जाओ।

तब पहली बात जो मैं लूत में देखता हूँ यह है,—उसने अपने आरम्भिक जीवन में गलत चुनाव किया।

एक समय था जब अब्राहम और लूत साथ-साथ रहते थे। वे दोनों धनी हो गए, और अब साथ नहीं रह सकते थे। दोनों में बड़े अब्राहम ने नम्रता और शिष्टता की सच्ची भावना से लूत को देश चुनने का अवसर दिया, जब उन्होंने अलग होने का निश्चय किया:—"यदि तू बाईं ओर जाए," उसने कहा, "तो मैं दाहिनी ओर जाऊँगा; और यदि तू दाहिनी ओर जाए तो मैं बाईं ओर जाऊँगा।" (उत्पत्ति 13:9।)

और लूत ने क्या किया?—हमें बताया गया है कि उसने देखा कि सदोम के निकट यरदन की तराई उपजाऊ और अच्छी सिंची हुई थी। वह पशुओं के लिए अच्छा देश था और चरागाहों से भरा था। उसके पास बड़े झुण्ड और गाय-बैल थे, और वह उसकी आवश्यकताओं के बिलकुल अनुकूल था। और यही देश उसने निवास के लिए चुना, केवल इसलिए कि वह उपजाऊ, "सींची हुई भूमि" थी। (उत्पत्ति 13:10।)

वह सदोम नगर के पास था! उसे इसकी परवाह न थी।—सदोम के लोग, जो उसके पड़ोसी होते, दुष्ट थे! इससे कुछ अन्तर न पड़ा।—वे परमेश्वर के सामने अत्यन्त पापी थे! उसके लिए इसमें कोई भेद न था।—चरागाह उपजाऊ था। भूमि अच्छी थी। उसे अपने झुण्डों और पशुओं के लिए ऐसा ही देश चाहिए था। और उस दलील के आगे सारी हिचकिचाहट और शंकाएँ, यदि उसे कोई थीं भी, तुरन्त दब गईं।

उसने देखकर चुना, विश्वास से नहीं। भूलों से बचाए रखने के लिए उसने परमेश्वर से कोई सम्मति नहीं ली। उसने समय की बातों को देखा, अनन्त की बातों को नहीं। उसने अपने सांसारिक लाभ की सोची, अपनी आत्मा की नहीं। उसने केवल यही सोचा कि इस जीवन में क्या सहायक होगा। वह आनेवाले जीवन के गम्भीर कार्य को भूल गया। यह बुरी शुरुआत थी।

परन्तु मैं यह भी देखता हूँ कि लूत पापियों के साथ तब भी मिला-जुला जब ऐसा करने की कोई आवश्यकता न थी।

हमें पहले बताया गया है कि उसने "अपना तम्बू सदोम के निकट खड़ा किया।" (उत्पत्ति 13:12।) यह, जैसा मैं पहले दिखा चुका हूँ, बड़ी भूल थी।

परन्तु अगली बार जब उसका उल्लेख होता है, तो हम उसे सचमुच सदोम ही में रहते पाते हैं। आत्मा स्पष्ट कहता है, "वह सदोम में रहता था।" (उत्पत्ति 14:12।) उसके तम्बू छूट गए। देहात त्याग दिया गया। उसने उस दुष्ट नगर की गलियों ही में एक घर ले लिया।

हमें इस परिवर्तन के कारण नहीं बताए गए। हम नहीं जानते कि इसके लिए कोई अवसर आया हो। हमें निश्चय है कि इसके पीछे परमेश्वर की कोई आज्ञा न थी। सम्भव है उसकी पत्नी को समाज के कारण देहात की अपेक्षा नगर अधिक भाया हो। यह स्पष्ट है कि उसमें स्वयं अनुग्रह न था। सम्भव है उसने लूत को समझाया हो कि बेटियों के लाभ के लिए यह आवश्यक है, कि उनका विवाह हो और वे बस जाएँ। सम्भव है बेटियों ने रंगीन संगति के लिए नगर में रहने का आग्रह किया हो: वे स्पष्टतः हल्के विचारों की युवतियाँ थीं। सम्भव है लूत को स्वयं यह अच्छा लगा हो, कि अपने झुण्डों और पशुओं से अधिक कमाए। मनुष्यों को अपनी इच्छा की पुष्टि के लिए कारणों की कभी कमी नहीं होती। परन्तु एक बात बहुत स्पष्ट है,—लूत बिना किसी उचित कारण के सदोम के बीच रहने लगा।

जब परमेश्वर की सन्तान ये दो बातें करती है जिनका मैंने उल्लेख किया, तो यदि हम कुछ समय बाद उसकी आत्मा के विषय में प्रतिकूल समाचार सुनें तो हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। यदि वह क्लेश की चेतावनी भरी वाणी के प्रति बहरा हो जाए, जैसा लूत हो गया था (उत्पत्ति 14:12), और परीक्षा और संकट के दिन में ठहरे रहनेवाला निकले, जैसा लूत निकला, तो हमें अचम्भा नहीं करना चाहिए।

जीवन में गलत चुनाव करो,—ऐसा चुनाव जो पवित्रशास्त्र के अनुसार न हो,—और बिना आवश्यकता सांसारिक लोगों के बीच बस जाओ, तो अपनी आत्मिकता को हानि पहुँचाने और अपने अनन्त हितों में पिछड़ जाने का मैं इससे निश्चित मार्ग नहीं जानता। यही मार्ग है कि तुम्हारी आत्मा की नाड़ी क्षीण और शिथिल होकर चले। यही मार्ग है कि पाप के विषय में तुम्हारी संवेदना की धार भोथरी और मन्द पड़ जाए। यही मार्ग है कि तुम्हारी आत्मिक पहचान की आँखें धुँधली हो जाएँ, यहाँ तक कि तुम भले-बुरे में मुश्किल से भेद कर सको, और चलते हुए ठोकर खाओ। यही मार्ग है कि तुम्हारे पैरों और अंगों पर नैतिक लकवा आ जाए, और तुम सिय्योन के मार्ग पर डगमगाते, काँपते चलो, मानो टिड्डी भी बोझ हो। यही मार्ग है कि तुम अपने सबसे बुरे शत्रु के हाथ घाटी बेच दो,—युद्ध में शैतान को ऊँचा स्थान दे दो,—लड़ने में अपनी बाँहें बाँध लो,—दौड़ने में अपनी टाँगों में बेड़ियाँ डाल लो,—अपनी शक्ति के स्रोत सुखा दो,—अपनी ऊर्जा को अपंग कर दो,—शिमशोन की नाईं अपने ही बाल काट डालो, और अपने आपको पलिश्तियों के हाथ सौंप दो, अपनी ही आँखें फोड़ लो, चक्की पीसो, और दास बन जाओ।

मैं इस लेख के हर पाठक से आग्रह करता हूँ कि मेरी कही हुई बात को भली-भाँति समझ लो। इन बातों को अपने मन में बैठा लो। इन्हें मत भूलो। इन्हें सवेरे स्मरण करो। रात को फिर स्मरण में लाओ। इन्हें अपने हृदय में गहरे उतरने दो। यदि तुम "ठहरे रहने" से कभी सुरक्षित रहना चाहते हो, तो सांसारिक लोगों के साथ अनावश्यक मेल-जोल से सावधान रहो। लूत के चुनाव से सावधान रहो! यदि तुम आत्मा की सूखी, नीरस, ऊँघती, आलसी, बंजर, भारी, शारीरिक, मूढ़ और जड़ दशा में नहीं बैठ जाना चाहते, तो लूत के चुनाव से सावधान रहो!

(क) निवास-स्थान या घर चुनते समय यह स्मरण रखो। यह पर्याप्त नहीं कि घर आरामदेह हो,—स्थान अच्छा हो,—हवा उत्तम हो,—पड़ोस सुहावना हो,—किराया या दाम कम हो,—गुज़ारा सस्ता हो। अभी और बातों पर भी विचार करना है। तुम्हें अपनी अमर आत्मा का विचार करना चाहिए। जिस घर का तुम विचार कर रहे हो वह तुम्हें स्वर्ग की ओर ले जाने में सहायक होगा या नरक की ओर?—क्या सुगम दूरी के भीतर सुसमाचार का प्रचार होता है?—क्या क्रूस पर चढ़ाया गया मसीह तुम्हारे द्वार की पहुँच में है?—क्या निकट कोई सच्चा परमेश्वर का जन है जो तुम्हारी आत्मा की रखवाली करेगा? यदि तुम्हें जीवन प्रिय है, तो मैं तुम्हें चेताता हूँ कि इसे अनदेखा न करो। लूत के चुनाव से सावधान रहो।

(ख) जीवन में कोई व्यवसाय, स्थान या पेशा चुनते समय इसे स्मरण रखो। यह पर्याप्त नहीं कि वेतन ऊँचा है,—मज़दूरी अच्छी है,—काम हल्का है,—सुविधाएँ अनेक हैं,—आगे बढ़ने की सम्भावनाएँ अत्यन्त अनुकूल हैं। अपनी आत्मा के विषय में सोचो, अपनी अमर आत्मा के विषय में। क्या उसे भोजन मिलेगा या वह भूखी रहेगी? क्या वह उन्नति करेगी या पीछे हट जाएगी? क्या तुम्हारे रविवार तुम्हारे लिए खाली होंगे, और क्या सप्ताह में एक दिन तुम अपने आत्मिक कार्य के लिए पा सकोगे? मैं परमेश्वर की दया का वास्ता देकर तुमसे विनती करता हूँ कि सावधान रहो कि तुम क्या करते हो। कोई उतावला निर्णय मत लो। उस स्थान को हर दृष्टि से देखो,—परमेश्वर की दृष्टि से भी और संसार की दृष्टि से भी। सोना बहुत महँगा भी खरीदा जा सकता है। लूत के चुनाव से चौकस रहो।

(ग) यदि तुम अविवाहित हो, तो पति या पत्नी को चुनते समय इसे स्मरण रखो। यह पर्याप्त नहीं कि तुम्हारी आँखों को भाता है,—तुम्हारी रुचियाँ मेल खाती हैं,—तुम्हारे मन को सामंजस्य मिलता है,—सौम्यता और स्नेह है,—जीवन भर के लिए एक सुखद घर है।

इससे कुछ अधिक की आवश्यकता है। एक आनेवाला जीवन भी है। अपनी आत्मा के विषय में सोचो, अपनी अमर आत्मा के विषय में। जिस मेल की तुम योजना बना रहे हो, उससे क्या वह ऊपर उठेगी या नीचे खिंच जाएगी?—क्या वह अधिक स्वर्गीय बनेगी या अधिक सांसारिक,—मसीह के निकट खिंचेगी या संसार के?—क्या उसकी भक्ति बल में बढ़ेगी या घटेगी?—मैं तुमसे तुम्हारी महिमा की सारी आशाओं का वास्ता देकर विनती करता हूँ कि इसे अपने हिसाब में सम्मिलित करो। बूढ़े बैक्सटर के शब्दों में, "सोचो, और सोचो, और फिर सोचो," इससे पहले कि तुम अपने आपको बाँध लो। "अविश्‍वासियों के साथ असमान जूए में न जुतो।" (2 कुरिन्थियों 6:14) विवाह का नाम कहीं भी मन फिराव के साधनों में नहीं आया है। लूत के चुनाव को स्मरण रखो।

(घ) यदि तुम्हें कभी रेलवे में कोई नौकरी मिले, तो इसे स्मरण रखो।—यह पर्याप्त नहीं कि अच्छा वेतन और नियमित काम हो,—निदेशकों का भरोसा हो, और ऊँचे पद तक पहुँचने का सर्वोत्तम अवसर हो। ये बातें अपनी जगह बहुत अच्छी हैं, परन्तु ये ही सब कुछ नहीं हैं। यदि तुम ऐसी रेल कम्पनी की सेवा करते हो जो रविवार को गाड़ियाँ चलाती है, तो तुम्हारी आत्मा का क्या हाल होगा? सप्ताह का कौन-सा दिन तुम्हारे पास परमेश्वर और अनन्तकाल के लिए होगा? सुसमाचार का प्रचार सुनने के कौन-से अवसर तुम्हें मिलेंगे? मैं गम्भीरता से तुम्हें चेतावनी देता हूँ कि इस पर विचार करो। यदि तुम अपनी थैली तो भर लो, पर अपनी आत्मा में दुर्बलता और दरिद्रता ले आओ, तो तुम्हें कुछ लाभ न होगा। एक अच्छे पद के लिए अपना विश्रामदिन बेच देने से सावधान रहो! एसाव की मसूर की दाल को स्मरण रखो। लूत के चुनाव से चौकस रहो!

कोई पाठक शायद सोचे, "विश्वासी को डरने की आवश्यकता नहीं; वह मसीह की भेड़ है, वह कभी नाश न होगा, उसकी कोई बड़ी हानि नहीं हो सकती। ऐसी छोटी-छोटी बातें बड़े महत्त्व की नहीं हो सकतीं।"

ठीक है, तुम ऐसा सोच सकते हो। परन्तु मैं तुम्हें चेतावनी देता हूँ, यदि तुम इन बातों की उपेक्षा करोगे तो तुम्हारी आत्मा कभी उन्नति न करेगी। सच्चा विश्वासी निश्चय ही त्यागा न जाएगा, चाहे वह पिछड़ जाए। परन्तु यदि वह पिछड़ता है, तो यह मान लेना व्यर्थ है कि उसकी भक्ति फूले-फलेगी। अनुग्रह एक कोमल पौधा है। यदि तुम उसे संजोकर न रखो और उसकी भली-भाँति सेवा न करो, तो इस बुरे संसार में वह शीघ्र ही रोगी हो जाएगा। वह मुरझा सकता है, चाहे मर न सके। सबसे चमकीला सोना भी नम हवा में रखे जाने पर शीघ्र धुँधला हो जाता है। सबसे गरम लोहा भी शीघ्र ठण्डा हो जाता है। उसे लाल तपाने में परिश्रम और कष्ट लगता है; काला और कठोर होने के लिए तो बस उसे छोड़ देना, या थोड़ा-सा ठण्डा पानी ही काफी है।

हो सकता है तुम अभी एक सच्चे, उत्साही मसीही हो। हो सकता है तुम दाऊद के समान अपनी समृद्धि में यह अनुभव करो: "मैं कभी नहीं टलने का।" (भजन संहिता 30:6) परन्तु धोखा न खाओ। तुम्हें केवल लूत के पदचिह्नों पर चलना और लूत का चुनाव करना है, और तुम शीघ्र ही लूत की आत्मिक दशा में आ जाओगे। जैसा उसने किया वैसा करने दो अपने आपको, जैसा उसने व्यवहार किया वैसा व्यवहार करने का साहस करो, और निश्चय जानो कि तुम शीघ्र पाओगे कि तुम भी उसकी तरह एक अभागे "ढीले-ढाले" बन गए हो। तुम शिमशोन की तरह पाओगे कि यहोवा की उपस्थिति अब तुम्हारे साथ नहीं रही। परीक्षा के दिन तुम अपनी लज्जा के लिए एक अनिश्चित और झिझकनेवाले मनुष्य सिद्ध होगे। तुम्हारी भक्ति में घुन लग जाएगा, और तुम्हें पता भी न चलेगा कि वह उसकी जीवन-शक्ति खा गया। तुम्हारे आत्मिक बल पर धीमी क्षय-रोग-सी बीमारी आ जाएगी और उसे अनजाने में ही गला देगी। और अन्त में तुम जागोगे तो पाओगे कि तुम्हारे हाथ प्रभु का काम करने में मुश्किल से समर्थ हैं, और तुम्हारे पाँव प्रभु के मार्ग पर चलने में मुश्किल से तुम्हें ले जा सकते हैं, और तुम्हारा विश्वास राई के दाने से बड़ा नहीं रहा; और यह शायद तुम्हारे जीवन के किसी मोड़ पर होगा, ऐसे समय जब शत्रु बाढ़ की नाईं चढ़ा आ रहा हो, और तुम्हारी आवश्यकता सबसे गहरी हो।

आह, यदि तुम भक्ति में ढीले-ढाले नहीं बनना चाहते, तो इन बातों पर विचार करो! वैसा करने से सावधान रहो जैसा लूत ने किया!

IV. अब हम पूछें कि लूत की ढीली-ढाली आत्मा ने अन्त में किस प्रकार का फल उत्पन्न किया

मैं इस बात को अनेक कारणों से, और विशेषकर आज के समय में, छोड़कर आगे नहीं बढ़ना चाहता। कुछ लोग ऐसे हैं जो कहने को तैयार होंगे, "आख़िर लूत का उद्धार तो हुआ: वह धर्मी ठहराया गया,—वह स्वर्ग पहुँचा। मुझे और कुछ नहीं चाहिए। यदि मैं स्वर्ग पहुँच जाऊँ तो सन्तुष्ट रहूँगा।" यदि तुम्हारे मन का विचार यही है, तो एक क्षण रुको, और मेरी थोड़ी और सुनो। मैं लूत के इतिहास की एक-दो बातें तुम्हें दिखाऊँगा जो ध्यान देने योग्य हैं, और शायद तुम्हारा मन बदल दें।

मैं इस विषय पर ठहरना सर्वप्रथम महत्त्व की बात समझता हूँ। मैं सदा यही दृढ़ता से कहूँगा कि उत्कृष्ट पवित्रता और उत्कृष्ट उपयोगिता में घनिष्ठतम सम्बन्ध है,—कि सुख और "प्रभु के पीछे पूरी रीति से चलना" साथ-साथ चलते हैं,—और यदि विश्वासी ढीले-ढाले रहेंगे, तो उन्हें यह आशा न रखनी चाहिए कि वे अपनी पीढ़ी में उपयोगी होंगे, या बहुत सन्त और मसीह के समान होंगे, या विश्वास में बड़े आनन्द और शान्ति का अनुभव करेंगे।

(क) तब, एक बात तो यह देखें कि लूत ने सदोम के निवासियों में कोई भलाई नहीं की।

लूत सम्भवतः अनेक वर्षों तक सदोम में रहा। निस्सन्देह उसके पास परमेश्वर की बातों की चर्चा करने और आत्माओं को पाप से फेरने का यत्न करने के अनेक बहुमूल्य अवसर थे। परन्तु लगता है कि लूत ने कुछ भी सिद्ध नहीं किया। जान पड़ता है कि अपने आसपास रहनेवाले लोगों पर उसका कोई प्रभाव या वज़न नहीं था। उसके पास वह आदर और श्रद्धा न थी जो संसार के लोग भी प्रायः परमेश्वर के किसी उज्ज्वल सेवक को दे देते हैं।

सदोम भर में, लूत के घर की दीवारों के बाहर, एक भी धर्मी जन नहीं मिला। उसके पड़ोसियों में से किसी ने उसकी गवाही पर विश्वास नहीं किया। उसके जान-पहचानवालों में से किसी ने उस प्रभु का आदर नहीं किया जिसकी वह आराधना करता था। उसके सेवकों में से किसी ने अपने स्वामी के परमेश्वर की सेवा नहीं की। "चारों ओर से सब लोगों" में से किसी को भी उसकी राय की रत्ती भर परवाह न थी, जब उसने उनकी दुष्टता को रोकने का यत्न किया। उन्होंने कहा, "यह एक जन परदेशी होकर यहाँ रहने आया, और अब न्यायी बन बैठा है।" (उत्पत्ति 19:9।) उसके जीवन का कोई वज़न न था; उसकी बातें सुनी नहीं गईं; उसके धर्म ने किसी को अपने पीछे चलने के लिए नहीं खींचा।

और सचमुच मुझे इस पर आश्चर्य नहीं होता! सामान्य नियम यह है कि ढीले पड़े हुए जन संसार का कुछ भला नहीं करते और परमेश्वर के काम को कोई आदर नहीं दिलाते। उनके नमक में इतना स्वाद नहीं होता कि अपने आस-पास की सड़ाहट को सुधार सके। वे "मसीह की पत्रियाँ" नहीं हैं जो "सब मनुष्यों से जानी और पढ़ी" जाएँ। (2 कुरिन्थियों 3:2।) उनके चाल-चलन में न कोई खींचनेवाली शक्ति है, न कोई आकर्षण, न मसीह की झलक। आइए, हम इसे स्मरण रखें।

(ख) दूसरी बात यह देखें कि लूत ने अपने परिवार, सम्बन्धियों या परिचितों में से किसी को भी स्वर्ग की ओर बढ़ने में सहायता नहीं दी।

हमें यह नहीं बताया गया कि उसका परिवार कितना बड़ा था। परन्तु इतना हम जानते हैं कि जिस दिन वह सदोम से बुलाया गया, उस दिन उसकी एक पत्नी और कम से कम दो बेटियाँ थीं, और हो सकता है कि और सन्तानें भी रही हों।

परन्तु लूत का परिवार बड़ा हो या छोटा, मेरे विचार में एक बात बिलकुल स्पष्ट है—उन सबमें एक भी ऐसा न था जो परमेश्वर का भय मानता हो!

जब वह "निकलकर अपने दामादों से, जिनके साथ उसकी बेटियों का विवाह होनेवाला था, बातें करने लगा" और उन्हें सदोम पर आनेवाले न्यायदण्डों से भाग निकलने की चेतावनी दी, तब हमें बताया गया है कि "वह अपने दामादों की दृष्टि में ठट्ठा करनेवाला सा जान पड़ा।" (उत्पत्ति 19:14।) ये कैसे भयानक शब्द हैं! यह मानो यह कहना था, "तुम्हारी बात की परवाह ही कौन करता है?" जब तक संसार बना रहेगा, ये बातें इस घृणा का दुःखद प्रमाण रहेंगी जिससे धर्म में ढीले पड़े हुए व्यक्ति को देखा जाता है।

और लूत की पत्नी का क्या हुआ? वह उसके साथ नगर से निकली तो सही, पर दूर न गई। उसमें इतना विश्वास न था कि इतनी शीघ्र भागने की आवश्यकता को समझ सके। भागना आरम्भ करते ही उसने अपना मन सदोम में ही छोड़ दिया। स्पष्टतम आज्ञा के होते हुए भी (उत्पत्ति 19:17) कि पीछे मुड़कर न देखना, उसने अपने पति के पीछे से मुड़कर देखा, और तुरन्त नमक का खम्भा बन गई।

और लूत की दोनों बेटियों का क्या हुआ? वे बच तो निकलीं, परन्तु केवल शैतान का काम करने के लिए। वे अपने पिता को बुराई के लिए लुभानेवाली बनीं, और उसे घोर से घोर पाप में ले गईं।

संक्षेप में, लूत अपने परिवार में अकेला ही खड़ा जान पड़ता है! वह एक भी प्राण को नरक के द्वार से पीछे हटाने का साधन न बना!

और मुझे इस पर आश्चर्य नहीं। ढीले पड़े हुए जनों को उनके अपने ही परिवार भाँप लेते हैं; और भाँप लेने पर वे तुच्छ ठहरते हैं। उनके निकटतम सम्बन्धी, और कुछ समझें या न समझें, असंगति को अवश्य समझ लेते हैं। वे यह दुःखद, पर स्वाभाविक, निष्कर्ष निकालते हैं, "यदि यह सचमुच वह सब मानता जो यह मानने का दावा करता है, तो यह ऐसे न चलता।" ढीले पड़े हुए माता-पिता की सन्तान प्रायः भक्त नहीं होती। बच्चे की आँख कानों से कहीं अधिक ग्रहण करती है। बच्चा सदा यह देखता है कि तुम क्या करते हो, इससे कहीं अधिक कि तुम क्या कहते हो। आइए, हम इसे स्मरण रखें।

(ग) तीसरी बात यह देखें कि लूत मरते समय अपने पीछे कोई प्रमाण नहीं छोड़ गया।

सदोम से भागने के बाद लूत के विषय में हम बहुत कम जानते हैं, और जो कुछ जानते हैं वह सन्तोषजनक नहीं है।

सोअर के लिए उसका विनती करना, क्योंकि वह "छोटा सा" था—फिर बाद में सोअर को छोड़ देना—और गुफा में उसका आचरण—सब के सब एक ही कथा कहते हैं। ये सब उसमें विद्यमान अनुग्रह की निर्बलता को और उस नीची आत्मिक दशा को दिखाते हैं जिसमें वह गिर गया था।

हम नहीं जानते कि बच निकलने के बाद वह कितने समय तक जीवित रहा। हम नहीं जानते कि वह कहाँ मरा, या कब मरा—क्या उसने अब्राहम को फिर देखा—उसकी मृत्यु किस प्रकार की थी—उसने क्या कहा या क्या सोचा। ये सब बातें छिपी हुई हैं। अब्राहम, इसहाक, याकूब, यूसुफ और दाऊद के अन्तिम दिनों का वर्णन हमें मिलता है—परन्तु लूत के विषय में एक शब्द भी नहीं। ओह, लूत की मृत्यु-शय्या कैसी अन्धकारमय रही होगी!

ऐसा जान पड़ता है कि पवित्रशास्त्र ने जान-बूझकर उसके ऊपर परदा डाल दिया है। उसके अन्त के विषय में एक पीड़ादायक चुप्पी है। वह बुझते हुए दीपक के समान चला जाता है और अपने पीछे बुरी गन्ध छोड़ जाता है। और यदि नए नियम में हमें विशेष रूप से न बताया गया होता कि लूत "धर्मी" था, तो मैं सचमुच मानता हूँ कि हम इस पर सन्देह करते कि लूत उद्धार पाया हुआ प्राण था भी या नहीं।

परन्तु उसके इस दुःखद अन्त पर मुझे आश्चर्य नहीं। ढीले पड़े हुए विश्वासी प्रायः जैसा बोते हैं वैसा ही काटते हैं। उनका ढीलापन अकसर तब उनसे आ मिलता है जब उनका प्राण निकल रहा होता है। अन्त में उनके पास थोड़ी ही शान्ति होती है। वे स्वर्ग पहुँचते तो अवश्य हैं; परन्तु दयनीय दशा में पहुँचते हैं—थके-माँदे और पाँव में छाले लिए, निर्बलता और आँसुओं में, अन्धकार और आँधी में। वे उद्धार पाते हैं, परन्तु "जैसे आग में से होकर" उद्धार पाते हैं। (1 कुरिन्थियों 3:15।)

मैं इस लेख के प्रत्येक पाठक से कहता हूँ कि इन तीन बातों पर, जिनका मैंने अभी उल्लेख किया है, विचार करे। मेरा आशय गलत न समझें। यह देखकर आश्चर्य होता है कि लोग अपने प्राणों से सम्बन्ध रखनेवाली बातों को गलत समझने का थोड़ा सा भी बहाना कितनी जल्दी पकड़ लेते हैं!

मैं तुमसे यह नहीं कहता कि जो विश्वासी "ढीले" नहीं पड़ते वे स्वतः ही संसार के लिए बड़े उपयोगी साधन ठहरेंगे। नूह ने एक सौ बीस वर्ष प्रचार किया, और किसी ने उसका विश्वास न किया। प्रभु यीशु का भी उनके अपने लोगों यहूदियों ने आदर न किया।

न ही मैं तुमसे यह कहता हूँ कि जो विश्वासी ढीले नहीं पड़ते वे स्वतः ही अपने परिवारों और सम्बन्धियों के मन फिराए जाने का कारण बनेंगे। दाऊद की सन्तानों में से बहुत सी अभक्त थीं। प्रभु यीशु पर तो उनके अपने भाइयों ने भी विश्वास न किया।

परन्तु मैं यह अवश्य कहता हूँ कि लूत के बुरे चुनाव और लूत के ढीले पड़ने के बीच, तथा लूत के ढीले पड़ने और अपने परिवार तथा संसार के लिए उसके निष्फल होने के बीच, कोई सम्बन्ध न देखना लगभग असम्भव है। मेरा विश्वास है कि पवित्र आत्मा की यही इच्छा थी कि हम इसे देखें। मेरा विश्वास है कि पवित्र आत्मा ने उसे सब मसीही कहलानेवालों के लिए एक चेतावनी-स्तम्भ बनाना चाहा। और मुझे निश्चय है कि मैंने इस सम्पूर्ण इतिहास से जो शिक्षाएँ निकालने का यत्न किया है, वे गम्भीर विचार के योग्य हैं।

और अब मुझे इस लेख के सब पाठकों से, और विशेषकर उन सबसे जो अपने आप को मसीह में विश्वासी कहते हैं, विदा के कुछ शब्द कहने दीजिए।

मेरी यह इच्छा नहीं कि मैं तुम्हारे हृदयों को उदास करूँ। मैं नहीं चाहता कि मसीही मार्ग की कोई निराशाजनक तस्वीर तुम्हारे सामने रखूँ। मेरा एकमात्र उद्देश्य तुम्हें मित्रभाव से चेतावनी देना है। मैं तुम्हारी शान्ति और सान्त्वना चाहता हूँ। मैं तुम्हें सुरक्षित होने के साथ-साथ सुखी भी देखना चाहूँगा, और धर्मी ठहराए जाने के साथ-साथ आनन्दित भी। मैंने जैसा कहा है, तुम्हारी भलाई के लिए ही कहा है।

तुम ऐसे दिनों में जी रहे हो जब लूत के समान ढिलाई भरा धर्म बहुत फैला हुआ है। धर्म के अंगीकार की धारा पहले से कहीं अधिक चौड़ी है, परन्तु अनेक स्थानों पर कहीं कम गहरी। एक प्रकार का मसीही धर्म अब लगभग प्रचलन में है। इंग्लैण्ड की कलीसिया के किसी दल से जुड़ना और उसके हितों के लिए उत्साह दिखाना, इस युग के प्रमुख विवादों की चर्चा करना, लोकप्रिय धार्मिक पुस्तकें छपते ही खरीदकर अपनी मेज़ पर सजाना, सभाओं में जाना, संस्थाओं को चन्दा देना, उपदेशकों की गुणवत्ता पर बहस करना, और संवेदनात्मक धर्म के हर नए रूप के लिए जो उभर आए जोश और उत्तेजना से भर जाना — ये सब अब अपेक्षाकृत आसान और आम उपलब्धियाँ हैं। इनसे अब कोई व्यक्ति अलग नहीं दिखता। इनमें त्याग की आवश्यकता बहुत कम या बिलकुल नहीं है। इनमें कोई क्रूस उठाना नहीं पड़ता।

परन्तु परमेश्वर के साथ निकटता से चलना, सचमुच आत्मिक मन वाला होना, परदेशियों और यात्रियों की भाँति व्यवहार करना, समय के उपयोग में, बातचीत में, मनोरंजन में और पहनावे में संसार से अलग रहना, हर स्थान पर मसीह के लिए विश्वासयोग्य गवाही देना, हर समाज में अपने स्वामी की सुगन्ध छोड़ जाना, प्रार्थनाशील, नम्र, निःस्वार्थ, सुशील, शान्त, सहज सन्तुष्ट, उदार, धैर्यवान और दीन होना, हर प्रकार के पाप से सतर्क भय रखना और संसार की ओर से अपने संकट के प्रति काँपते हुए जागरूक रहना — ये बातें अब भी दुर्लभ हैं! जो सच्चे मसीही कहलाते हैं उनमें भी ये आम नहीं हैं, और सबसे बुरी बात यह है कि इनके अभाव को उतना महसूस नहीं किया जाता और उस पर उतना शोक नहीं किया जाता जितना किया जाना चाहिए।

ऐसे दिन में मैं इस लेख के हर विश्वासी पाठक को सलाह देने का साहस करता हूँ। इससे मुँह न मोड़ो। मेरे स्पष्ट बोलने पर क्रोधित न हो। मैं तुमसे कहता हूँ कि “अपने बुलाए जाने और चुने जाने को सिद्ध करने का भरसक प्रयत्न करो।” (2 पतरस 1:10।) मैं तुमसे कहता हूँ कि आलसी न बनो, लापरवाह न हो, अनुग्रह की थोड़ी सी मात्रा से सन्तुष्ट न रहो, संसार से थोड़ा-सा अच्छा होने पर सन्तोष न करो। मैं गम्भीरता से चेतावनी देता हूँ कि वह करने का प्रयत्न मत करो जो कभी हो नहीं सकता — अर्थात् मसीह की सेवा भी करना और संसार से भी मेल बनाए रखना। मैं तुम्हें पुकारता हूँ और विनती करता हूँ कि पूर्ण मन वाले मसीही बनो, उत्कृष्ट पवित्रता के पीछे चलो, पवित्रीकरण की उच्च श्रेणी का लक्ष्य रखो, समर्पित जीवन जियो, अपने शरीर को परमेश्वर के लिए “जीवित बलिदान” करके चढ़ाओ, और “आत्मा के अनुसार चलो।” (रोमियों 12:1; गलातियों 5:25।) मैं तुम्हें आदेश देता हूँ और समझाता हूँ — स्वर्ग की तुम्हारी सारी आशाओं और महिमा की तुम्हारी सारी लालसाओं की दुहाई देकर — यदि तुम सुखी होना चाहते हो, यदि तुम उपयोगी होना चाहते हो, तो ढीले आत्मा न बनो।

क्या तुम जानना चाहते हो कि समय क्या माँग रहा है? जातियों का हिल जाना, प्राचीन वस्तुओं का उखाड़ा जाना, राज्यों का उलट जाना, मनुष्यों के मन की हलचल और बेचैनी — ये क्या कहते हैं? ये सब ऊँचे स्वर में पुकारते हैं: हे मसीही! ढिलाई न कर!

क्या तुम चाहते हो कि मसीह के दूसरे आगमन पर तुम तैयार पाए जाओ — कमर बँधी हुई, दीपक जलता हुआ, तुम स्वयं निडर और उससे भेंट करने को तैयार? तो ढिलाई न करो!

क्या तुम अपने विश्वास में बहुत अनुभव होने वाली सान्त्वना पाना चाहते हो, अपने भीतर पवित्र आत्मा की गवाही अनुभव करना चाहते हो, यह जानना चाहते हो कि तुमने किस पर विश्वास किया है, और उदास, शिकायती, चिड़चिड़ा, हतोत्साहित और विषादग्रस्त मसीही नहीं बनना चाहते? तो ढिलाई न करो!

क्या तुम बीमारी के दिन और मृत्यु-शय्या पर अपने उद्धार की दृढ़ निश्चयता पाना चाहते हो? क्या तुम विश्वास की आँख से स्वर्ग को खुलते और यीशु को अपने स्वागत के लिए उठते देखना चाहते हो? तो ढिलाई न करो!

क्या तुम अपने पीछे बड़े और स्पष्ट प्रमाण छोड़ जाना चाहते हो? क्या तुम चाहते हो कि हम तुम्हें आशा के साथ क़ब्र में रखें और मृत्यु के बाद तुम्हारी दशा की चर्चा बिना किसी सन्देह के करें? तो ढिलाई न करो!

क्या तुम अपने दिन और अपनी पीढ़ी में संसार के लिए उपयोगी होना चाहते हो? क्या तुम मनुष्यों को पाप से मसीह की ओर खींचना, अपने सिद्धान्त को शोभायमान करना और अपने स्वामी के काम को उनकी आँखों में सुन्दर और आकर्षक बनाना चाहते हो? तो ढिलाई न करो!

क्या तुम अपने बच्चों और सम्बन्धियों को स्वर्ग की ओर बढ़ने में सहायता देना चाहते हो, और उनसे यह कहलवाना चाहते हो, “हम तुम्हारे साथ चलेंगे” — न कि उन्हें अविश्वासी और सब धर्म से घृणा करने वाला बनाना? तो ढिलाई न करो!

क्या तुम मसीह के प्रकट होने के दिन बड़ा मुकुट पाना चाहते हो, महिमा में सबसे छोटा और तुच्छ तारा नहीं बनना चाहते, और परमेश्वर के राज्य में अपने आपको सबसे पिछला और सबसे नीचा नहीं पाना चाहते? तो ढिलाई न करो!

ओह, हममें से कोई भी ढिलाई न करे! समय ढिलाई नहीं करता, मृत्यु ढिलाई नहीं करती, न्याय ढिलाई नहीं करता, शैतान ढिलाई नहीं करता, संसार ढिलाई नहीं करता। परमेश्वर की सन्तान भी ढिलाई न करे।

क्या इस लेख के किसी पाठक को लगता है कि वह ढिलाई करने वाला है? क्या इन पृष्ठों को पढ़ते समय तुम्हारा हृदय भारी और विवेक पीड़ित हुआ है? क्या तुम्हारे भीतर कुछ फुसफुसाता है, “वह मनुष्य मैं ही हूँ”? तो सुनो जो मैं कह रहा हूँ। तुम्हारे प्राण की दशा ठीक नहीं है। जागो, और बेहतर करने का प्रयत्न करो।

यदि तुम ढिलाई करने वाले हो, तो तुम्हें अभी मसीह के पास जाकर चंगा हो जाना चाहिए। तुम्हें वही पुरानी औषधि काम में लानी है; तुम्हें उसी पुराने सोते में स्नान करना है। तुम्हें फिर मसीह की ओर मुड़ना है और चंगा होना है। किसी काम को करने का तरीका यही है कि उसे किया जाए। इसे अभी करो!

क्षण भर के लिए भी यह मत सोचो कि तुम्हारी दशा सुधार के परे है। यह मत सोचो कि लम्बे समय तक सूखी, सुस्त और भारी आत्मिक दशा में रहने के कारण पुनर्जागरण की कोई आशा नहीं। क्या प्रभु यीशु मसीह सब आत्मिक रोगों के लिए ठहराया हुआ वैद्य नहीं है? क्या उसने पृथ्वी पर रहते हुए हर प्रकार का रोग चंगा नहीं किया? क्या उसने हर प्रकार की दुष्टात्मा को नहीं निकाला? क्या उसने बेचारे भटके हुए पतरस को नहीं उठाया और उसके मुँह में नया गीत नहीं दिया? ओह, सन्देह न करो, परन्तु सच्चे मन से विश्वास करो कि वह तुम्हारे भीतर अपने कार्य को फिर जीवित करेगा! बस ढिलाई से मुड़ो, अपनी मूर्खता मान लो, और आओ — तुरन्त मसीह के पास आओ। भविष्यद्वक्ता के ये वचन धन्य हैं: “केवल अपना दोष मान ले।” — “हे भटकी हुई सन्तानो, लौट आओ, मैं तुम्हारा भटक जाना चंगा करूँगा।” (यिर्मयाह 3:13, 22।)

और आओ, हम सब दूसरों की आत्माओं को भी स्मरण रखें, जैसे अपनी आत्मा को रखते हैं। यदि हम किसी भाई या बहन को कभी ढीला पड़ते देखें, तो उसे जगाने का, उसे चैतन्य करने का, उसे उभारने का यत्न करें। जैसे-जैसे हमें अवसर मिले, हम सब "एक दूसरे को समझाते रहें।" "आओ, हम प्रेम और भले कामों में एक दूसरे को उसकाएँ।" (इब्रा. 3:13; 10:24।) हम एक दूसरे से यह कहने से न डरें, "भाई, या बहन, क्या तू लूत को भूल गया है? जाग! और लूत को स्मरण कर!—जाग, और अब ढील न कर।"

10. एक स्त्री जिसे स्मरण रखना है

"लूत की पत्नी को स्मरण रखो।"—लूका 17:32

पवित्रशास्त्र में इस पृष्ठ के शीर्षक वाली चेतावनी से अधिक गम्भीर चेतावनियाँ बहुत कम हैं। प्रभु यीशु मसीह हम से कहता है, "लूत की पत्नी को स्मरण रखो।"

लूत की पत्नी धर्म का अंगीकार करनेवाली थी; उसका पति एक "धर्मी पुरुष" था। (2 पतरस 2:8।) जिस दिन सदोम नाश किया गया, उस दिन वह अपने पति के साथ सदोम से निकली; उसने अपने पति के पीछे से, परमेश्वर की स्पष्ट आज्ञा के विरुद्ध, नगर की ओर मुड़कर देखा; वह तुरन्त मर गई और नमक का खम्भा बन गई। और प्रभु यीशु मसीह उसे अपनी कलीसिया के सामने एक सावधान करनेवाली ज्योति-स्तम्भ के रूप में प्रस्तुत करता है; वह कहता है, "लूत की पत्नी को स्मरण रखो।"

जब हम उस व्यक्ति पर विचार करते हैं जिसका नाम यीशु लेता है, तो यह एक गम्भीर चेतावनी है। वह हमें अब्राहम, या इसहाक, या याकूब, या सारा, या हन्ना, या रूत को स्मरण रखने को नहीं कहता। नहीं; वह उस एक को चुनता है जिसकी आत्मा सदा के लिये खो गई। वह हमें पुकारकर कहता है, "लूत की पत्नी को स्मरण रखो।"

जब हम उस विषय पर विचार करते हैं जिस पर यीशु बोल रहा है, तो यह एक गम्भीर चेतावनी है। वह अपने ही दूसरे आगमन के विषय में, संसार का न्याय करने के लिये, बात कर रहा है; वह उस भयानक अनुपस्थिति-दशा का वर्णन कर रहा है जिसमें बहुत से लोग पाए जाएँगे। उसके मन में अन्तिम दिन हैं, जब वह कहता है, "लूत की पत्नी को स्मरण रखो।"

जब हम उस पर विचार करते हैं जो यह चेतावनी देता है, तो यह एक गम्भीर चेतावनी है। प्रभु यीशु प्रेम, दया और करुणा से परिपूर्ण है; वह ऐसा है जो कुचले हुए नरकट को न तोड़ेगा और धुआँ उठते सन के बत्ते को न बुझाएगा। वह अविश्वासी यरूशलेम के लिये रो सका, और अपने क्रूस पर चढ़ानेवालों के लिये प्रार्थना कर सका; फिर भी वह भी हमें खोई हुई आत्माओं की सुधि दिलाना उचित समझता है। वह भी कहता है, "लूत की पत्नी को स्मरण रखो।"

जब हम उन लोगों पर विचार करते हैं जिन्हें यह पहले-पहल दी गई थी, तो यह एक गम्भीर चेतावनी है। प्रभु यीशु अपने चेलों से बोल रहा था; वह उन शास्त्रियों और फरीसियों से बात नहीं कर रहा था जो उससे बैर रखते थे, परन्तु पतरस, याकूब और यूहन्ना से, और बहुत से अन्य लोगों से जो उससे प्रेम रखते थे; फिर भी उनको भी चेतावनी देना वह उचित समझता है। उनसे भी वह कहता है, "लूत की पत्नी को स्मरण रखो।"

जिस रीति से यह चेतावनी दी गई, उस पर विचार करें तो यह एक गम्भीर चेतावनी है। वह केवल यह नहीं कहता, "लूत की पत्नी के पीछे चलने से सावधान रहो,—उसका अनुकरण करने से चौकस रहो,—उसके समान न बनो।" वह एक भिन्न शब्द का प्रयोग करता है; वह कहता है, "स्मरण रखो।" वह ऐसे बोलता है मानो हम सब इस विषय को भूल जाने के संकट में हों; वह हमारी आलसी स्मरण-शक्ति को जगाता है; वह हमें आज्ञा देता है कि इस घटना को अपने मन के सामने बनाए रखें। वह पुकारता है, "लूत की पत्नी को स्मरण रखो।"

मैं उन शिक्षाओं की जाँच करने का प्रस्ताव रखता हूँ जो लूत की पत्नी हमें सिखाने के लिये ठहराई गई है। मुझे निश्चय है कि उसका इतिहास कलीसिया के लिये उपयोगी शिक्षा से भरा हुआ है। अन्तिम दिन हम पर आ पहुँचे हैं; प्रभु यीशु का दूसरा आगमन निकट आ रहा है; कलीसिया में संसारिकता का संकट वर्ष-प्रतिवर्ष बढ़ता जा रहा है। हम उस रोग के विरुद्ध, जो हमारे चारों ओर फैला है, रक्षा-साधनों और औषधियों से सुसज्जित हों; और, कम से कम नहीं, हम लूत की पत्नी की कथा से भली-भाँति परिचित हो जाएँ।

इस विषय को क्रम से अपने मन के सामने रखने के लिये मैं तीन बातें करूँगा।

1. मैं उन धार्मिक विशेषाधिकारों की चर्चा करूँगा जो लूत की पत्नी को प्राप्त थे।

2. मैं उस पाप की चर्चा करूँगा जो लूत की पत्नी ने किया।

3. मैं उस न्याय-दण्ड की चर्चा करूँगा जो परमेश्वर ने उस पर डाला।

1. पहले मैं उन धार्मिक विशेषाधिकारों की चर्चा करूँगा जो लूत की पत्नी को प्राप्त थे।

अब्राहम और लूत के दिनों में पृथ्वी पर सच्चा उद्धार देनेवाला धर्म दुर्लभ था; न बाइबल थीं, न सेवक, न कलीसियाएँ, न पत्रक, न मिशनरी। परमेश्वर का ज्ञान थोड़े से अनुगृहीत परिवारों तक ही सीमित था; संसार के अधिकांश निवासी अन्धकार, अज्ञानता, अन्धविश्वास और पाप में जी रहे थे। सम्भवतः सौ में एक को भी लूत की पत्नी के समान भला उदाहरण, ऐसी आत्मिक संगति, ऐसा स्पष्ट ज्ञान, ऐसी साफ़ चेतावनियाँ प्राप्त न थीं। अपने समय के लाखों साथी प्राणियों की तुलना में लूत की पत्नी एक अनुगृहीत स्त्री थी।

उसका पति एक भक्त पुरुष था; उसके विवाह-सम्बन्ध से चाचा के रूप में अब्राहम था, जो विश्वासियों का पिता है। इन दोनों धर्मी पुरुषों का विश्वास, ज्ञान और प्रार्थनाएँ उससे छिपी नहीं रह सकती थीं। यह असम्भव है कि वह उनके साथ किसी भी समय तक तम्बुओं में रही हो और यह न जानी हो कि वे किसके हैं और किसकी सेवा करते हैं। उनके लिये धर्म कोई मात्र औपचारिक बात नहीं थी; वह उनके जीवन का प्रधान सिद्धान्त और उनके सब कामों का मूल स्रोत था। यह सब लूत की पत्नी ने अवश्य देखा और जाना होगा। यह कोई छोटा विशेषाधिकार न था।

जब अब्राम ने पहले-पहल प्रतिज्ञाएँ पाईं, तब सम्भव है कि लूत की पत्नी वहाँ रही हो। जब उसने बेतेल और अय के बीच अपने तम्बू के पास वेदी बनाई, तब सम्भव है कि वह वहाँ रही हो। जब उसका पति कदोर्लाओमेर द्वारा बन्दी बनाया गया और परमेश्वर के हस्तक्षेप से छुड़ाया गया, तब वह वहाँ थी। जब सालेम का राजा मलिकिसिदक रोटी और दाखमधु लेकर अब्राहम से भेंट करने आया, तब वह वहाँ थी। जब स्वर्गदूत सदोम में आए और उसके पति को भाग जाने की चेतावनी दी, तब उसने उन्हें देखा; जब उन्होंने उनका हाथ पकड़कर उन्हें नगर से बाहर निकाला, तब वह उनमें से एक थी जिनकी उन्होंने भाग निकलने में सहायता की। मैं फिर कहता हूँ, ये कोई छोटे विशेषाधिकार न थे।

फिर भी इन सब विशेषाधिकारों का लूत की पत्नी के हृदय पर क्या अच्छा प्रभाव पड़ा? कुछ भी नहीं। अपने सब अवसरों और अनुग्रह के साधनों के होते हुए भी,—स्वर्ग से मिली अपनी सब विशेष चेतावनियों और सन्देशों के होते हुए भी, वह अनुग्रह-रहित, परमेश्वर-रहित, मन न फिरानेवाली और अविश्वासी ही जीवित रही और उसी दशा में मरी। उसकी समझ की आँखें कभी न खुलीं; उसके विवेक में सचमुच कभी हलचल या जीवन न आया; उसकी इच्छा कभी सचमुच परमेश्वर की आज्ञाकारिता में न लाई गई; उसका मन कभी सचमुच ऊपर की बातों पर न लगा। उसके पास जो धर्म का बाहरी रूप था, वह दिखावे के लिए बनाए रखा गया था, भीतरी अनुभूति से नहीं: वह एक चोगा था जो अपने साथियों को प्रसन्न करने के लिए ओढ़ा गया था, उसके मूल्य के किसी बोध से नहीं। जैसा लूत के घर में और लोग करते थे, वैसा ही वह भी करती थी: वह अपने पति की रीतियों के अनुसार चलती थी: उसने उसके धर्म का कोई विरोध नहीं किया: उसने अपने आपको निष्क्रिय होकर उसके पीछे खिंचने दिया: परन्तु इस सारे समय में परमेश्वर की दृष्टि में उसका हृदय ठीक न था। संसार उसके हृदय में था, और उसका हृदय संसार में था। इसी दशा में वह जीवित रही, और इसी दशा में मरी।

इस सब में सीखने को बहुत कुछ है: मैं यहाँ एक ऐसी शिक्षा देखता हूँ जो आज के दिनों में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। तुम ऐसे समय में जी रहे हो जब लूत की पत्नी के समान बहुत से लोग हैं: आओ, और वह शिक्षा सुनो जो उसका उदाहरण देने के लिए है।

तो यह सीखो कि केवल धार्मिक विशेषाधिकारों का होना किसी की आत्मा को नहीं बचाएगा। तुम्हारे पास हर प्रकार के आत्मिक लाभ हो सकते हैं; तुम अनुग्रह के साधनों और सबसे समृद्ध अवसरों की पूरी धूप में जी सकते हो; तुम सर्वोत्तम प्रचार और चुनी हुई शिक्षा का आनन्द ले सकते हो; तुम ज्योति, ज्ञान, पवित्रता और उत्तम संगति के बीच रह सकते हो। यह सब हो सकता है, फिर भी तुम स्वयं मन-परिवर्तन के बिना रह सकते हो, और अन्त में सदा के लिए खो सकते हो।

मैं कह सकता हूँ कि यह सिद्धान्त कुछ पाठकों को कठोर लगता है। मैं जानता हूँ कि बहुत से लोग समझते हैं कि दृढ़ मसीही बनने के लिए उन्हें केवल धार्मिक विशेषाधिकार चाहिए। वे मानते हैं कि वे इस समय जैसे होने चाहिए वैसे नहीं हैं: परन्तु वे यह दलील देते हैं कि उनकी स्थिति इतनी कठिन है, और उनकी कठिनाइयाँ इतनी अधिक हैं। उन्हें भक्त पति, या भक्त पत्नी दे दो,—उन्हें भक्त साथी, या भक्त स्वामी दे दो,—उन्हें सुसमाचार का प्रचार दे दो,—उन्हें विशेषाधिकार दे दो, तब वे परमेश्वर के साथ चलेंगे।

यह सब भूल है। यह पूरा भ्रम है। आत्माओं को बचाने के लिए विशेषाधिकारों से कुछ अधिक चाहिए। योआब दाऊद का सेनापति था; गेहजी एलीशा का सेवक था; देमास पौलुस का साथी था; यहूदा इस्करियोती मसीह का चेला था; और लूत की पत्नी संसारी और अविश्वासी थी। ये सब अपने पापों में मरे। वे ज्ञान, चेतावनियों और अवसरों के होते हुए भी गड्ढे में उतर गए; और वे सब हमें सिखाते हैं कि मनुष्यों को केवल विशेषाधिकार ही नहीं चाहिए। उन्हें पवित्र आत्मा का अनुग्रह चाहिए।

हम धार्मिक विशेषाधिकारों का मूल्य जानें, परन्तु पूरी तरह उन्हीं पर भरोसा न रखें। हम जीवन की सब बातों में उनका लाभ पाना चाहें, परन्तु उन्हें मसीह के स्थान पर न रखें। यदि परमेश्वर हमें वे दे, तो हम धन्यवाद के साथ उनका उपयोग करें, परन्तु इस बात का ध्यान रखें कि वे हमारे हृदय और जीवन में कुछ फल उत्पन्न करें। यदि वे भलाई न करें, तो वे प्रायः सीधी हानि करते हैं: वे विवेक को सुन्न कर देते हैं, उत्तरदायित्व बढ़ा देते हैं, और दण्ड को और गम्भीर बना देते हैं। जो आग मोम को पिघलाती है, वही मिट्टी को कठोर करती है; जो सूर्य जीवित वृक्ष को बढ़ाता है, वही मरे हुए वृक्ष को सुखाकर जलने के योग्य बना देता है। पवित्र बातों से निष्फल परिचय के समान और कुछ मनुष्य के हृदय को इतना कठोर नहीं करता। मैं फिर कहता हूँ, लोगों को मसीही केवल विशेषाधिकार नहीं बनाते, परन्तु पवित्र आत्मा का अनुग्रह बनाता है। उसके बिना कोई मनुष्य कभी नहीं बचेगा।

मैं आज के दिनों में सुसमाचारीय मण्डलियों के सदस्यों से कहता हूँ कि जो मैं कह रहा हूँ उसे भली भाँति ध्यान में रखो। तुम श्रीमान क के, या श्रीमान ख के गिरजे में जाते हो: तुम उसे उत्तम प्रचारक समझते हो; तुम उसके उपदेशों से आनन्दित होते हो; तुम किसी और को उतने चैन से नहीं सुन सकते; उसकी सेवकाई में आने से तुमने बहुत सी बातें सीखी हैं; तुम उसके सुननेवालों में से एक होना बड़ा विशेषाधिकार समझते हो! यह सब बहुत अच्छा है। यह विशेषाधिकार है। यदि तुम्हारे जैसे सेवक हज़ार गुना बढ़ जाएँ तो मैं धन्यवादी होऊँगा। परन्तु अन्त में, तुम्हारे हृदय में क्या है? क्या तुमने अब तक पवित्र आत्मा पाया है? यदि नहीं, तो तुम लूत की पत्नी से किसी बात में अच्छे नहीं हो।

मैं धार्मिक परिवारों के सेवकों से कहता हूँ कि जो मैं कह रहा हूँ उसे भली भाँति ध्यान में रखो। ऐसे घर में रहना बड़ा विशेषाधिकार है जहाँ परमेश्वर का भय राज्य करता है। यह विशेषाधिकार है कि सुबह और शाम पारिवारिक प्रार्थना सुनो, परमेश्वर के वचन की नियमित व्याख्या सुनो, शान्त रविवार पाओ, और सदा गिरजे में जा सको। जब तुम नौकरी ढूँढ़ो तब तुम्हें इन्हीं बातों की खोज करनी चाहिए: यही बातें किसी स्थान को सचमुच अच्छा बनाती हैं। ऊँची मज़दूरी और हल्का काम संसारीपन, सब्त तोड़ने और पाप के निरन्तर चक्र की कमी पूरी नहीं कर सकते। परन्तु चौकस रहो कि इन बातों से सन्तुष्ट होकर न बैठ जाओ: यह न समझो कि इन सब आत्मिक लाभों के कारण तुम अवश्य स्वर्ग जाओगे। पारिवारिक प्रार्थना में सम्मिलित होने के साथ-साथ तुम्हारे अपने हृदय में अनुग्रह होना चाहिए। यदि नहीं, तो तुम इस समय लूत की पत्नी से अच्छे नहीं हो।

मैं धार्मिक माता-पिता की सन्तानों से कहता हूँ कि जो मैं कह रहा हूँ उसे भली भाँति ध्यान में रखो। भक्त पिता और माता की सन्तान होना और बहुत सी प्रार्थनाओं के बीच पाला जाना सबसे बड़ा विशेषाधिकार है। यह सचमुच धन्य बात है कि हमें अपनी शैशवावस्था से सुसमाचार सिखाया जाए, और जिस क्षण से हम कुछ भी याद कर सकें, उसी क्षण से पाप, यीशु, पवित्र आत्मा, पवित्रता और स्वर्ग की बातें सुनें। परन्तु, ओह, चौकस रहो कि इन सब विशेषाधिकारों की धूप में तुम बंजर और निष्फल न रह जाओ: सावधान रहो कि जो अनेक लाभ तुम्हें मिले हैं उनके होते हुए भी तुम्हारा हृदय कठोर, मन न फिरानेवाला और संसारी ही न रहे। तुम अपने माता-पिता के धर्म के भरोसे परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकते। तुम्हें जीवन की रोटी स्वयं खानी होगी, और अपने ही हृदय में आत्मा की गवाही पानी होगी। तुम्हारा अपना मन फिराव, तुम्हारा अपना विश्वास, और तुम्हारा अपना पवित्रीकरण होना चाहिए। यदि नहीं, तो तुम लूत की पत्नी से अच्छे नहीं हो।

मैं परमेश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि इन दिनों के सब मसीही कहलानेवाले लोग इन बातों को अपने मन में रखें। हम कभी न भूलें कि केवल विशेषाधिकार हमें बचा नहीं सकते। ज्योति और ज्ञान, विश्वासयोग्य प्रचार, अनुग्रह के प्रचुर साधन और पवित्र लोगों की संगति—ये सब बड़ी आशीषें और लाभ हैं। धन्य हैं वे जिन्हें ये मिले हैं! परन्तु अन्त में एक बात ऐसी है जिसके बिना विशेषाधिकार व्यर्थ हैं: वह एक बात पवित्र आत्मा का अनुग्रह है। लूत की पत्नी को बहुत से विशेषाधिकार मिले थे; परन्तु लूत की पत्नी में अनुग्रह नहीं था।

II. अब मैं उस पाप की चर्चा करूँगा जो लूत की पत्नी ने किया।

उसके पाप का इतिहास पवित्र आत्मा ने थोड़े और सरल शब्दों में दिया है:—"उसने अपने पति के पीछे से मुड़कर देखा, और वह नमक का खम्भा बन गई।" हमें इससे अधिक कुछ नहीं बताया गया। इस इतिहास में एक नंगी गम्भीरता है। उसके अपराध का सारांश इन तीन शब्दों में है, "उसने मुड़कर देखा।"

क्या इस लेख के किसी पाठक की दृष्टि में यह पाप छोटा लगता है? क्या लूत की पत्नी का दोष इतना तुच्छ दिखता है कि उस पर ऐसा दण्ड पड़े? मैं कह सकता हूँ कि कुछ हृदयों में यही भावना उठती है। जब मैं इस विषय पर आपसे तर्क करूँ तो मेरी ओर ध्यान दीजिए। उस दृष्टि में पहली नज़र में दिखने से कहीं अधिक था; उसने जितना कहा, उससे कहीं अधिक का संकेत दिया। सुनिए, और आप सुनेंगे।

(क) वह दृष्टि एक छोटी बात थी, परन्तु उसने लूत की पत्नी का सच्चा स्वभाव प्रकट कर दिया। छोटी बातें प्रायः मनुष्य के मन की दशा को बड़ी बातों से भी अच्छी तरह दिखा देती हैं, और छोटे लक्षण प्रायः घातक और असाध्य रोगों के चिन्ह होते हैं। जो फल हव्वा ने खाया वह छोटी बात थी, परन्तु उससे प्रमाणित हुआ कि वह निर्दोषता से गिरकर पापी हो गई है। मेहराब में एक दरार छोटी बात लगती है, परन्तु वह सिद्ध करती है कि नींव धँस रही है और पूरी इमारत असुरक्षित है। सुबह की थोड़ी खाँसी एक तुच्छ रोग लगती है, परन्तु वह प्रायः शरीर के क्षीण होने का प्रमाण होती है और क्षय, तपेदिक और मृत्यु तक ले जाती है। एक तिनका दिखा सकता है कि हवा किस ओर बह रही है, और एक दृष्टि पापी के हृदय की सड़ी हुई दशा दिखा सकती है। (मत्ती 5:28।)

(ख) वह दृष्टि एक छोटी बात थी, परन्तु उसने लूत की पत्नी की अनाज्ञाकारिता को बता दिया। स्वर्गदूत की आज्ञा सीधी और स्पष्ट थी: "पीछे फिरकर न देखना।" (उत्पत्ति 19:17।) लूत की पत्नी ने इस आज्ञा को मानने से इनकार किया। परन्तु पवित्र आत्मा कहता है कि "आज्ञा मानना बलिदान से उत्तम है," और "हठ करना भी जादू-टोने के पाप के समान है।" (1 शमूएल 15:22, 23।) जब परमेश्वर अपने वचन के द्वारा या अपने दूतों के द्वारा साफ़ बोलता है, तो मनुष्य का कर्तव्य स्पष्ट है।

(ग) वह दृष्टि एक छोटी बात थी, परन्तु उसने लूत की पत्नी के घमण्ड-भरे अविश्वास को बता दिया। वह सन्देह करती दिखाई दी कि परमेश्वर सचमुच सदोम को नष्ट करने जा रहा है; ऐसा प्रतीत हुआ कि उसे न कोई ख़तरा दिखा, न इतनी जल्दी भागने की कोई आवश्यकता। परन्तु विश्वास के बिना परमेश्वर को प्रसन्न करना अनहोना है। (इब्रानियों 11:6।) जैसे ही मनुष्य सोचने लगता है कि वह परमेश्वर से अधिक जानता है, और परमेश्वर जब चेतावनी देता है तो उसका कोई अर्थ नहीं होता, उसकी आत्मा बड़े संकट में पड़ जाती है। जब हम परमेश्वर के कामों का कारण न समझ सकें, तो हमारा कर्तव्य है कि चुप रहें और विश्वास करें।

(घ) वह दृष्टि एक छोटी बात थी, परन्तु उसने लूत की पत्नी के गुप्त संसार-प्रेम को बता दिया। उसका शरीर बाहर था, परन्तु उसका हृदय सदोम में था। जब वह अपने घर से भागी तब अपना प्रेम पीछे छोड़ आई थी। उसकी आँख उसी स्थान की ओर मुड़ी जहाँ उसका धन था, जैसे कुतुबनुमा की सुई ध्रुव की ओर मुड़ती है। और यही उसके पाप की चरम सीमा थी। "संसार से मित्रता करना परमेश्वर से बैर करना है।" (याकूब 4:4।) "यदि कोई संसार से प्रेम रखे, तो उसमें पिता का प्रेम नहीं है।" (1 यूहन्ना 2:15।)

मैं अपने पाठकों से हमारे विषय के इस भाग पर विशेष ध्यान देने को कहता हूँ। मेरा विश्वास है कि प्रभु यीशु विशेष रूप से हमारे मन को इसी ओर ले जाना चाहता है। मेरा विश्वास है कि वह चाहता है कि हम देखें कि लूत की पत्नी संसार की ओर मुड़कर देखने से नष्ट हुई। उसका अंगीकार किसी समय सुन्दर और दिखावटी था, परन्तु उसने संसार को सचमुच कभी नहीं छोड़ा। एक समय वह उद्धार के मार्ग पर दिखाई देती थी, परन्तु तब भी उसके हृदय के निम्नतम और गहनतम विचार संसार के लिए थे। संसारिकता का भारी ख़तरा ही वह बड़ी शिक्षा है जो प्रभु यीशु हमें सिखाना चाहता है। ओह, कि हम सब के पास देखने की आँख और समझने का मन हो!

मेरा विश्वास है कि मसीह की कलीसिया को संसारिकता के विरुद्ध चेतावनियों की जितनी आवश्यकता आज है, उतनी पहले कभी न थी। कहा जाता है कि हर युग की अपनी एक विशेष महामारी होती है; इस समय मसीहियों की आत्माओं को जो महामारी लगती है वह संसार का प्रेम है। यह वह मरी है जो अंधकार में चलती है, और वह रोग है जो दोपहर को नाश करता है। उसने "बहुतों को घायल करके गिरा दिया है; हाँ, बहुत से बलवन्त भी उससे घायल हुए हैं।" मैं चेतावनी की आवाज़ उठाना चाहता हूँ, और उन सब के सोए हुए विवेक को जगाना चाहता हूँ जो धर्म का अंगीकार करते हैं। मैं ऊँची आवाज़ में पुकारना चाहता हूँ, "लूत की पत्नी के पाप को स्मरण रखो।" वह न हत्यारी थी, न व्यभिचारिणी, न चोर—परन्तु वह धर्म का अंगीकार करनेवाली थी, और उसने मुड़कर देखा।

हमारी कलीसियाओं में हज़ारों बपतिस्मा पाए हुए लोग हैं जो दुराचार और अविश्वास से तो बचे हुए हैं, फिर भी संसार के प्रेम के शिकार हो जाते हैं। हज़ारों ऐसे हैं जो कुछ समय तक अच्छी तरह दौड़ते हैं, और लगता है कि वे स्वर्ग तक पहुँच जाएँगे, परन्तु थोड़ी देर में दौड़ छोड़ देते हैं और मसीह की ओर बिलकुल पीठ फेर लेते हैं। और उन्हें किसने रोका? क्या उन्होंने बाइबल को असत्य पाया? क्या उन्होंने प्रभु यीशु को अपना वचन पूरा करने में चूकते पाया? नहीं, बिलकुल नहीं। परन्तु उन्हें वह महामारी लग गई; वे इस संसार के प्रेम से संक्रमित हो गए हैं। मैं इस लेख को पढ़नेवाले हर सच्चे मन के सुसमाचारवादी सेवक से अपील करता हूँ: मैं उससे कहता हूँ कि अपनी मण्डली के चारों ओर देखे। मैं हर पुराने मसीही से अपील करता हूँ: मैं उससे कहता हूँ कि अपने परिचितों के घेरे में देखे। मुझे निश्चय है कि मैं सत्य कह रहा हूँ। मुझे निश्चय है कि अब लूत की पत्नी के पाप को स्मरण करने का समय आ गया है।

(क) धार्मिक परिवारों के कितने ही बच्चे अच्छी शुरुआत करके बुरा अन्त करते हैं! अपने बचपन के दिनों में वे धर्म से भरे हुए प्रतीत होते हैं। वे बहुत से पद और भजन दोहरा सकते हैं; उनमें आत्मिक भावनाएँ और पाप की कायल करनेवाली समझ होती है; वे प्रभु यीशु के प्रति प्रेम और स्वर्ग की लालसा प्रकट करते हैं; उन्हें कलीसिया जाने और उपदेश सुनने में आनन्द आता है; वे ऐसी बातें कहते हैं जिन्हें उनके स्नेही माता-पिता अनुग्रह के चिह्न मानकर संजोकर रखते हैं; वे ऐसे काम करते हैं कि सम्बन्धी कहने लगते हैं, "यह बालक कैसा होगा?" परन्तु हाय, उनकी भलाई कितनी बार भोर के बादल की नाईं और उस ओस की नाईं जो उड़ जाती है, लुप्त हो जाती है! बालक युवक बन जाता है, और उसे मनोरंजन, शिकार-खेल, रंगरेलियों और अति-भोग के सिवा किसी बात की चिन्ता नहीं रहती। बालिका युवती बन जाती है, और उसे वस्त्रों, चमक-दमक भरी मण्डली, उपन्यास पढ़ने और उत्तेजना के सिवा किसी बात की चिन्ता नहीं रहती। वह आत्मिकता कहाँ गई जो कभी इतना उज्ज्वल भविष्य दिखाती थी? वह सब जाती रही; वह दब गई; संसार के प्रेम की बाढ़ में डूब गई। वे लूत की पत्नी के पदचिह्नों पर चलते हैं। वे पीछे मुड़कर देखते हैं।

(ख) विवाहित लोगों में से कितने ही देखने में धर्म के मार्ग पर अच्छे चलते हैं, जब तक कि उनके बच्चे बड़े होने नहीं लगते,—और तब वे गिर जाते हैं! अपने विवाहित जीवन के आरम्भिक वर्षों में वे लगन से मसीह के पीछे चलते और अच्छा अंगीकार करते दिखाई देते हैं। वे नियमित रूप से सुसमाचार का प्रचार सुनने जाते हैं; वे भले कर्मों में फलवन्त होते हैं; वे कभी व्यर्थ और उड़ाऊ संगति में नहीं देखे जाते। उनका विश्वास और आचरण दोनों खरे होते हैं और साथ-साथ चलते हैं। परन्तु हाय, जब कोई जवान परिवार बड़ा होने लगता है और बेटे-बेटियों को जीवन में आगे बढ़ाना पड़ता है, तब घराने पर कितनी बार आत्मिक रोग छा जाता है। उनकी आदतों, पहनावे, मनोरंजन और समय के उपयोग में संसारिकता का खमीर दिखाई देने लगता है। वे अब इस विषय में कठोर नहीं रहते कि किनकी संगति रखें और कहाँ-कहाँ जाएँ। अलगाव की वह स्पष्ट रेखा कहाँ गई जिसे वे कभी मानते थे? सांसारिक मनोरंजनों से वह अटल परहेज़ कहाँ गया जो कभी उनके चालचलन की पहचान था? वह सब भुला दिया गया। वह सब पुराने पंचांग की नाईं एक ओर रख दिया गया। उन पर एक परिवर्तन आ गया है: संसार की आत्मा ने उनके हृदयों पर अधिकार कर लिया है। वे लूत की पत्नी के पदचिह्नों पर चलते हैं। वे पीछे मुड़कर देखते हैं।

(ग) कितनी ही युवतियाँ बीस-इक्कीस वर्ष की आयु तक दृढ़ धर्म से प्रेम रखती दिखाई देती हैं, और तब सब कुछ खो बैठती हैं! जीवन के इस समय तक धार्मिक विषयों में उनका आचरण सब प्रकार से उत्तम होता है। वे निजी प्रार्थना की आदत बनाए रखती हैं; वे लगन से अपनी बाइबल पढ़ती हैं; अवसर मिलने पर वे निर्धनों से भेंट करती हैं; जहाँ अवसर हो वहाँ रविवार की पाठशालाओं में सिखाती हैं; वे निर्धनों की शारीरिक और आत्मिक आवश्यकताओं की सेवा करती हैं; उन्हें धार्मिक मित्र भाते हैं; उन्हें धार्मिक विषयों पर बातचीत करना प्रिय लगता है; वे धार्मिक वाक्यांशों और धार्मिक अनुभव से भरे पत्र लिखती हैं। परन्तु हाय, वे कितनी बार पानी की नाईं अस्थिर निकलती हैं और संसार के प्रेम से नष्ट हो जाती हैं! थोड़ा-थोड़ा करके वे गिरती जाती हैं और अपना पहला सा प्रेम खो देती हैं। थोड़ा-थोड़ा करके "दिखाई देनेवाली वस्तुएँ" उनके मन से "अनदेखी वस्तुओं" को ठेल देती हैं, और टिड्डी-दल की महामारी की नाईं उनकी आत्माओं की हर हरी वस्तु को चट कर जाती हैं। कदम-कदम करके वे उस दृढ़ स्थिति से पीछे हटती जाती हैं जो उन्होंने कभी ली थी। वे खरी शिक्षा के विषय में सजग रहना छोड़ देती हैं; वे यह जताने लगती हैं कि यह सोचना "निर्दयता" है कि एक व्यक्ति में दूसरे से अधिक धर्म है; वे पाती हैं कि समाज की रीतियों से किसी प्रकार का अलगाव रखने का प्रयास "संकीर्णता" है। कुछ समय में वे अपना प्रेम किसी ऐसे पुरुष को दे देती हैं जो दृढ़ धर्म का कोई दावा नहीं करता। अन्त में वे अपने मसीही जीवन का अन्तिम अवशेष भी त्याग देती हैं और पूरी तरह संसार की सन्तान बन जाती हैं। वे लूत की पत्नी के पदचिह्नों पर चलती हैं। वे पीछे मुड़कर देखती हैं।

(घ) हमारी कलीसियाओं में प्रभु-भोज में सहभागी होनेवाले कितने ही लोग किसी समय उत्साही और गम्भीर अंगीकार करनेवाले थे, और अब सुस्त, औपचारिक और ठण्डे हो गए हैं! एक समय था जब उनके समान धर्म में जीवित कोई दिखाई न देता था; अनुग्रह के साधनों में उपस्थित रहने में कोई उतना लगनशील न था; सुसमाचार के उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिए कोई उतना चिन्तित और हर भले काम के लिए उतना तत्पर न था; आत्मिक शिक्षा के लिए कोई उतना कृतज्ञ न था; अनुग्रह में बढ़ने की इच्छा में कोई उतना उत्सुक न दिखता था। परन्तु अब, हाय, सब कुछ बदला हुआ लगता है! "और वस्तुओं के लोभ" ने उनके हृदयों पर अधिकार कर लिया है और वचन के अच्छे बीज को दबा दिया है। संसार का धन, संसार के प्रतिफल, संसार का साहित्य, संसार के मान-सम्मान अब उनके प्रेम में पहला स्थान रखते हैं। उनसे बात करो, तो आत्मिक बातों के विषय में कोई उत्तर न पाओगे। उनके दैनिक आचरण को देखो, तो परमेश्वर के राज्य के लिए कोई उत्साह न दिखेगा। उनके पास धर्म तो है, पर अब वह जीवित धर्म नहीं रहा। उनके पूर्व मसीही जीवन का सोता सूख गया और जाता रहा; आत्मिक यन्त्र की आग बुझ गई और ठण्डी पड़ गई: पृथ्वी ने उस ज्वाला को बुझा दिया जो कभी इतनी प्रज्वलित थी। वे लूत की पत्नी के पदचिह्नों पर चले हैं। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा है।

(ङ) कितने ही पादरी कुछ वर्षों तक अपने पेशे में कठिन परिश्रम करते हैं, और फिर इस वर्तमान संसार के प्रेम के कारण आलसी और निकम्मे हो जाते हैं! अपनी सेवकाई के आरम्भ में वे मसीह के लिये खर्च होने और स्वयं खर्च हो जाने को तैयार दिखाई देते हैं; वे समय और असमय तत्पर रहते हैं; उनका प्रचार जीवन्त होता है और उनकी कलीसियाएँ भरी रहती हैं। उनकी मण्डलियों की अच्छी देखभाल होती है; घर-घर के उपदेश, प्रार्थना-सभाएँ और घर-घर जाकर भेंट करना उनका साप्ताहिक आनन्द होता है। परन्तु हाय, कितनी बार "आत्मा से आरम्भ करके" वे "शरीर पर आकर अन्त" करते हैं, और शिमशोन के समान उस दलीला, अर्थात् संसार, की गोद में अपनी शक्ति खो बैठते हैं! उन्हें किसी धनी पद पर नियुक्ति मिल जाती है; वे किसी सांसारिक स्त्री से विवाह कर लेते हैं; वे घमण्ड से फूल उठते हैं, और अध्ययन तथा प्रार्थना की उपेक्षा करते हैं। एक कड़कड़ाता पाला उन आत्मिक फूलों को काट डालता है जो कभी इतने सुन्दर खिले थे। उनके प्रचार में से अभिषेक और सामर्थ्य जाता रहता है; उनका सप्ताह के दिनों का काम घटता चला जाता है; जिस समाज में वे उठते-बैठते हैं वह कम चुना हुआ होता जाता है; उनकी बातचीत का स्वर अधिक सांसारिक हो जाता है। वे मनुष्य की राय की परवाह न करना छोड़ देते हैं; वे "अतिवादी विचारों" का रोगी भय अपने मन में भर लेते हैं, और किसी को ठेस पहुँचाने के सावधान डर से भर जाते हैं। और अन्त में वह मनुष्य, जो कभी प्रेरितों का सच्चा उत्तराधिकारी और मसीह का भला सिपाही बनने की आशा दिलाता था, अपनी तलछट पर आ बैठता है, और एक पादरी माली, किसान या भोज में जानेवाला बनकर रह जाता है, जिससे न कोई ठोकर खाता है और न कोई उद्धार पाता है। उसकी कलीसिया आधी खाली हो जाती है; उसका प्रभाव घटता जाता है; संसार ने उसे हाथ-पाँव से बाँध लिया है। वह लूत की पत्नी के पदचिह्नों पर चला है। उसने पीछे फिरकर देखा है।*

इन बातों के विषय में लिखना दुखदायी है, परन्तु इन्हें देखना उससे कहीं अधिक दुखदायी है। यह देखना दुखदायी है कि मसीही होने का दावा करनेवाले लोग इस विषय में लुभावने तर्कों से अपने विवेक को कैसे अन्धा कर लेते हैं, और "अपने पद के कर्तव्यों," "जीवन की शिष्टताओं," और "प्रसन्न धर्म" की आवश्यकता की बातें करके खुली सांसारिकता का बचाव करते हैं।

यह देखना दुखदायी है कि कितने ही वीर जहाज़ सफलता की हर आशा के साथ जीवन की यात्रा पर निकलते हैं, और सांसारिकता का यह छेद पड़ने पर अपने पूरे माल के साथ सुरक्षा के बन्दरगाह की आँखों के सामने ही डूब जाते हैं। सबसे दुखदायी बात यह देखना है कि कितने ही लोग अपने आप को यह कहकर बहलाते हैं कि उनकी आत्मा का सब कुछ ठीक है, जबकि संसार के इस प्रेम के कारण सब कुछ बिगड़ा हुआ है। उन पर यहाँ-वहाँ पके बाल आ गए हैं, और वे जानते भी नहीं। उन्होंने याकूब, दाऊद और पतरस के साथ आरम्भ किया, और उनका अन्त एसाव, शाऊल और यहूदा इस्करियोती के साथ होने की सम्भावना है। उन्होंने रूत, हन्ना, मरियम और पिरसिस के साथ आरम्भ किया, और उनका अन्त लूत की पत्नी के साथ होने की सम्भावना है।

आधे मन के धर्म से सावधान रहो। किसी गौण उद्देश्य से मसीह के पीछे चलने से सावधान रहो,—सम्बन्धियों और मित्रों को प्रसन्न करने के लिये,—उस स्थान या परिवार की रीति के अनुसार चलने के लिये जहाँ तुम रहते हो,—सम्मानित दिखने और धार्मिक होने की ख्याति पाने के लिये। यदि तुम मसीह के पीछे चलते ही हो, तो उसी के निमित्त उसके पीछे चलो। पूर्ण बनो, सच्चे बनो, ईमानदार बनो, खरे बनो, पूरे मन से लगे रहो। यदि तुम्हारा कोई धर्म है ही, तो तुम्हारा धर्म सच्चा हो। देखो कि तुम लूत की पत्नी का पाप न करो।

कभी यह मत समझो कि तुम धर्म में बहुत आगे बढ़ सकते हो, और गुप्त रूप से संसार के साथ मेल बनाए रखने का प्रयत्न करने से सावधान रहो। मैं नहीं चाहता कि इस लेख का कोई पाठक संन्यासी, भिक्षु या भिक्षुणी बन जाए; मैं चाहता हूँ कि हर कोई उस दशा में जिसमें उसे बुलाया गया है अपना सच्चा कर्तव्य निभाए। परन्तु मैं हर मसीही कहलानेवाले से, जो सुखी होना चाहता है, आग्रह करता हूँ कि परमेश्वर और संसार के बीच कोई समझौता न करने का अत्यन्त महत्त्व है। कठोर सौदा करने का प्रयत्न मत करो, मानो तुम मसीह को अपने मन का यथासम्भव कम देना और इस जीवन की वस्तुओं में से यथासम्भव अधिक रख लेना चाहते हो। सावधान रहो कि कहीं तुम अपने ही आप को न ठग लो और सब कुछ खोकर न रह जाओ। मसीह से अपने सम्पूर्ण मन, बुद्धि, प्राण और शक्ति से प्रेम रखो। पहले परमेश्वर के राज्य की खोज करो, और विश्वास करो कि तब ये सब वस्तुएँ तुम्हें दी जाएँगी। चौकस रहो कि तुम उस चरित्र की प्रतिलिपि न निकलो जिसे जॉन बनियन ने खींचा है,—श्रीमान् दोनों ओर मुँह रखनेवाला। अपने सुख के लिये, अपनी उपयोगिता के लिये, अपनी सुरक्षा के लिये, अपनी आत्मा के लिये, लूत की पत्नी के पाप से सावधान रहो। ओह, हमारे प्रभु यीशु मसीह का यह वचन कितना गम्भीर है, "जो कोई अपना हाथ हल पर रखकर पीछे देखता है, वह परमेश्वर के राज्य के योग्य नहीं।" (लूका 9:62।)

III. अब मैं अन्त में उस दण्ड के विषय में कहूँगा जो परमेश्वर ने लूत की पत्नी को दिया

पवित्रशास्त्र उसके अन्त का वर्णन थोड़े और सरल शब्दों में करता है। लिखा है कि "उसने पीछे फिरकर देखा और वह नमक का खम्भा बन गई।" इस दोषी स्त्री पर परमेश्वर का न्याय पूरा करने के लिये एक आश्चर्यकर्म किया गया। उसी सर्वशक्तिमान हाथ ने, जिसने पहले उसे जीवन दिया था, पलक झपकते ही वह जीवन ले लिया। जीवित मांस और लहू से वह नमक का खम्भा बना दी गई।

किसी आत्मा के लिये यह कैसा भयानक अन्त था! किसी भी समय मरना एक गम्भीर बात है। दयालु मित्रों और सम्बन्धियों के बीच मरना, अपने बिछौने पर शान्ति और चैन से मरना, भक्त जनों की प्रार्थनाओं को अपने कानों में गूँजते हुए सुनते मरना, अनुग्रह के द्वारा उद्धार की पूर्ण निश्चयता में उत्तम आशा के साथ मरना, प्रभु यीशु पर टेक लगाए और सुसमाचार की प्रतिज्ञाओं से सँभाले हुए मरना,—मैं कहता हूँ, ऐसे मरना भी एक गम्भीर बात है। परन्तु अचानक और एक क्षण में मरना, पाप करते-करते ही मरना, पूर्ण स्वास्थ्य और बल में मरना, क्रोधित परमेश्वर के सीधे हस्तक्षेप से मरना,—यह तो सचमुच भयानक है। फिर भी लूत की पत्नी का अन्त यही था। मैं प्रार्थना-पुस्तक की विनती-प्रार्थना को दोष नहीं दे सकता, जैसा कुछ लोग देते हैं, कि वह इस निवेदन को बनाए रखती है, "हे भले प्रभु, हमें अचानक मृत्यु से बचा।"

किसी आत्मा के लिये यह कैसा निराशाजनक अन्त था! कुछ ऐसे मामले होते हैं जहाँ हम उन लोगों की आत्माओं के विषय में, जिन्हें हम कब्र में उतरते देखते हैं, मानो आशा के विरुद्ध भी आशा रखते हैं। हम अपने आप को समझाने का प्रयत्न करते हैं कि हमारे उस बेचारे गुज़रे हुए भाई या बहन ने अन्तिम क्षण में उद्धार के लिये मन फिराया होगा, और ग्यारहवें घण्टे में मसीह के वस्त्र के छोर को पकड़ लिया होगा। हम परमेश्वर की दयाओं को स्मरण करते हैं; हम आत्मा की सामर्थ्य को याद करते हैं; हम पश्चातापी चोर के उदाहरण पर विचार करते हैं; हम मन ही मन कहते हैं कि उद्धार का वह कार्य उस मृत्यु-शय्या पर भी हुआ होगा, जिसे बताने की शक्ति उस मरते हुए व्यक्ति में न रही हो। परन्तु जब कोई मनुष्य पाप करते-करते ही अचानक काट डाला जाता है, तब ऐसी सब आशाओं का अन्त हो जाता है। जब आत्मा दुष्टता के बीच ही, विचार या प्रार्थना के एक क्षण के बिना भी, बुला ली जाए, तब दयालुता भी कुछ नहीं कह सकती। लूत की पत्नी का अन्त ऐसा ही था। यह निराशाजनक अन्त था। वह नरक में गई।

परन्तु इन बातों पर ध्यान देना हम सब के लिये भला है। यह स्मरण दिलाया जाना भला है कि परमेश्वर जानबूझकर पाप करनेवालों को कठोर दण्ड दे सकता है, और बड़े विशेषाधिकारों का दुरुपयोग आत्मा पर बड़ा क्रोध ले आता है। फिरौन ने वे सब आश्चर्यकर्म देखे जो मूसा ने किए;—कोरह, दातान और अबीराम ने सीनै पर्वत से परमेश्वर को बोलते सुना था;—होफ़नी और फिनहास परमेश्वर के महायाजक के पुत्र थे;—शाऊल शमूएल की सेवकाई के पूरे प्रकाश में जीवित रहा;—अहाब को भविष्यद्वक्ता एलिय्याह ने बार-बार चिताया;—अबशालोम को दाऊद की सन्तानों में से होने का विशेषाधिकार प्राप्त था;—बेलशस्सर के द्वार के पास ही भविष्यद्वक्ता दानिय्येल रहता था;—हनन्याह और सफीरा उन दिनों कलीसिया में सम्मिलित हुए जब प्रेरित आश्चर्यकर्म कर रहे थे;—यहूदा इस्करियोती स्वयं हमारे प्रभु यीशु मसीह का चुना हुआ साथी था। परन्तु उन सब ने ज्योति और ज्ञान के विरुद्ध ढिठाई से पाप किया; और वे सब अचानक बिना किसी उपाय के नष्ट हो गए। उन्हें मन फिराने के लिये न समय मिला न अवसर। जैसे वे जीए, वैसे ही मरे; जैसे वे थे, वैसे ही शीघ्रता से परमेश्वर से भेंट करने चले गए। वे अपने सब पापों के साथ चले गए, अक्षमित, अनवीकृत और स्वर्ग के लिये सर्वथा अयोग्य। और मरकर भी वे बोलते हैं। वे लूत की पत्नी के समान हमें बताते हैं कि ज्योति के विरुद्ध पाप करना भयानक बात है, कि परमेश्वर पाप से घृणा करता है, और कि नरक है।

मैं नरक के विषय में अपने पाठकों से खुलकर बोलने को विवश अनुभव करता हूँ। लूत की पत्नी के अन्त से जो अवसर मिलता है, उसका लाभ उठाने की मुझे अनुमति दीजिए। मेरा विश्वास है कि वह समय आ गया है जब नरक की वास्तविकता और अनन्तता के विषय में स्पष्ट बोलना एक निश्चित कर्तव्य है। झूठी शिक्षा की एक बाढ़ अभी-अभी हम पर टूट पड़ी है। लोग हमें बताने लगे हैं कि “परमेश्वर इतना दयालु है कि आत्माओं को सदा के लिये दण्ड नहीं देगा,—कि परमेश्वर का एक ऐसा प्रेम है जो नरक से भी नीचे तक जाता है,—और कि सारी मानवजाति, चाहे उनमें से कुछ कितने ही दुष्ट और अधर्मी क्यों न हों, देर-सबेर बचा ली जाएगी।” हमें प्रेरितों के मसीही धर्म के पुराने मार्गों को छोड़ देने का निमन्त्रण दिया जाता है। हमें बताया जाता है कि नरक, शैतान और दण्ड के विषय में हमारे पूर्वजों के विचार अब पुराने और बीते ज़माने के हैं। हमें तथाकथित “अधिक दयालु धर्मविज्ञान” को अपनाना है, और नरक को एक मूर्तिपूजकों की कथा, या बच्चों और मूर्खों को डराने का हौआ मानना है। ऐसी झूठी शिक्षा के विरुद्ध मैं तो विरोध करना चाहता हूँ। यह विवाद चाहे कितना ही पीड़ादायक, दुःखद और कष्टकारी क्यों न हो, हमें इससे कतराना या इस विषय का सामना करने से मुँह मोड़ना नहीं चाहिए। मैं तो इस दृढ़ निश्चय पर हूँ कि पुरानी स्थिति पर स्थिर रहूँ और नरक की वास्तविकता और अनन्तता का प्रतिपादन करूँ।

मेरा विश्वास कीजिए, यह कोई मात्र अनुमान का प्रश्न नहीं है। इसे आराधना-विधियों और कलीसिया-व्यवस्था के विवादों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इसे यहेजकेल के मन्दिर के अर्थ या प्रकाशितवाक्य के प्रतीकों जैसे रहस्यमय प्रश्नों में नहीं गिना जा सकता। यह ऐसा प्रश्न है जो समस्त सुसमाचार की नींव में निहित है। परमेश्वर के नैतिक गुण, उसका न्याय, उसकी पवित्रता, उसकी शुद्धता, ये सब इसमें सम्मिलित हैं। मसीह में व्यक्तिगत विश्वास की आवश्यकता और आत्मा द्वारा पवित्रीकरण, ये सब दाँव पर लगे हैं। नरक के विषय में पुराने सिद्धान्त को एक बार उलट दीजिए, तो मसीही धर्म की सारी व्यवस्था डगमगा जाती है, उसके पेंच ढीले हो जाते हैं, कीलें निकल जाती हैं और वह अस्त-व्यस्त हो जाती है।

मेरा विश्वास कीजिए, यह ऐसा प्रश्न नहीं है जिसमें हमें मनुष्यों के सिद्धान्तों और आविष्कारों का सहारा लेना पड़े। पवित्रशास्त्र ने नरक के विषय में स्पष्ट और पूर्ण रूप से कहा है। मेरी दृष्टि में बाइबल के साथ ईमानदारी से व्यवहार करना और इस विषय में उन निष्कर्षों से बचना असम्भव है जिन तक वह हमें पहुँचाती है। यदि शब्दों का कोई अर्थ है, तो नरक नाम का एक स्थान है। यदि पदों की उचित व्याख्या की जाए, तो ऐसे लोग हैं जो उसमें डाले जाएँगे। यदि भाषा का कोई अर्थ है, तो नरक सदा के लिये है। मेरा विश्वास है कि जो मनुष्य इस प्रश्न पर बाइबल की साक्षी को टालने के तर्क ढूँढ़ता है, वह ऐसी मनःस्थिति में पहुँच चुका है जहाँ तर्क करना व्यर्थ है। जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है, यह तर्क करना कि हमारा अस्तित्व नहीं है, उतना ही सरल लगता है जितना यह तर्क करना कि बाइबल नरक की वास्तविकता और अनन्तता की शिक्षा नहीं देती।

(क) इस बात को अपने मन में दृढ़ता से बैठा लीजिए कि वही बाइबल जो सिखाती है कि परमेश्वर ने दया और करुणा से मसीह को पापियों के लिये मरने भेजा, यह भी सिखाती है कि परमेश्वर पाप से घृणा करता है, और अपने स्वभाव ही के कारण उन सब को दण्ड देने को विवश है जो पाप से लिपटे रहते हैं या उसके द्वारा ठहराए गए उद्धार को ठुकराते हैं। वही अध्याय जो घोषणा करता है कि “परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा,” यह भी घोषणा करता है कि अविश्वासी पर “परमेश्वर का क्रोध बना रहता है।” (यूहन्ना 3:16, 36।) वही सुसमाचार जो इस शुभ सन्देश के साथ पृथ्वी पर पहुँचाया गया, “जो विश्वास करे और बपतिस्मा ले उसी का उद्धार होगा,” उसी साँस में यह भी घोषणा करता है, “जो विश्वास न करेगा वह दोषी ठहराया जाएगा।” (मरकुस 16:16।)

(ख) अपने मन में यह दृढ़ता से बैठा लें कि परमेश्वर ने बाइबल में प्रमाण पर प्रमाण दिए हैं कि वह कठोर और अविश्वासियों को दण्ड देगा, और वह अपने शत्रुओं से बदला ले सकता है, साथ ही पश्चात्तापी पर दया भी दिखा सकता है। जल-प्रलय से पुराने संसार का डूबना,—सदोम और अमोरा का जलाया जाना,—फिरौन और उसकी सारी सेना का लाल समुद्र में नाश होना,—कोरह, दातान और अबीराम पर न्याय,—कनान की सातों जातियों का पूर्ण विनाश,—ये सब एक ही भयानक सत्य सिखाते हैं। ये सब हमें इसलिए दिए गए हैं कि वे चेतावनी के संकेत और सूचक हों, ताकि हम परमेश्वर को क्रोध न दिलाएँ। इन सबका उद्देश्य यह है कि आनेवाली बातों पर पड़े परदे का कोना उठाया जाए, और हमें स्मरण दिलाया जाए कि परमेश्वर का क्रोध भी एक वास्तविकता है। ये सब हमें स्पष्ट बताते हैं कि "दुष्ट अधोलोक में लौट जाएँगे।" (भजन संहिता 9:17।)

(ग) अपने मन में यह दृढ़ता से बैठा लें कि प्रभु यीशु मसीह ने स्वयं नरक की वास्तविकता और अनन्तता के विषय में अत्यन्त स्पष्ट रूप से कहा है। धनवान और लाज़र के दृष्टान्त में ऐसी बातें हैं जो मनुष्यों को थरथरा देनी चाहिए। परन्तु वह अकेला नहीं है। नरक की भयानकता को व्यक्त करने के लिए किसी के होठों ने इतने शब्द नहीं कहे जितने उसके होठों ने, जो ऐसा बोला जैसा कोई मनुष्य कभी नहीं बोला, और जिसने कहा, "जो वचन तुम सुनते हो वह मेरा नहीं वरन् पिता का है जिसने मुझे भेजा।" (यूहन्ना 14:24।) नरक, नरक की आग, नरक का दण्ड, अनन्त दण्ड, दण्ड के लिए पुनरुत्थान, अनन्त आग, यातना का स्थान, विनाश, बाहर का अन्धकार, वह कीड़ा जो कभी नहीं मरता, वह आग जो कभी नहीं बुझती, रोने, विलाप करने और दाँत पीसने का स्थान, अनन्त दण्ड—ये, ये ही वे शब्द हैं जिन्हें स्वयं प्रभु यीशु मसीह ने प्रयोग किया। उस दयनीय बकवास को दूर करें जो आज के दिनों में लोग करते हैं, जो हमसे कहते हैं कि सुसमाचार के सेवकों को नरक के विषय में कभी नहीं बोलना चाहिए! जब वे इस प्रकार बोलते हैं तो केवल अपनी अज्ञानता या अपनी बेईमानी ही प्रकट करते हैं। कोई भी मनुष्य ईमानदारी से चारों सुसमाचारों को पढ़कर यह देखने से नहीं चूक सकता कि जो मसीह के उदाहरण पर चलना चाहे उसे नरक के विषय में बोलना ही होगा।

(घ) अन्त में, अपने मन में यह दृढ़ता से बैठा लें कि स्वर्ग के विषय में पवित्रशास्त्र जो सांत्वना देनेवाली धारणाएँ हमें देता है, वे सब समाप्त हो जाती हैं यदि हम एक बार नरक की वास्तविकता या अनन्तता का इनकार कर दें। क्या जो लोग दुष्ट और अभक्त मरते हैं उनके लिए भविष्य में कोई अलग निवास-स्थान नहीं है? क्या मृत्यु के बाद सब मनुष्य एक अस्त-व्यस्त भीड़ में मिला दिए जाएँगे? तब तो स्वर्ग कुछ भी स्वर्ग न रहेगा! यह बिलकुल असम्भव है कि दो जन सुख से एक साथ रहें जब तक वे सहमत न हों।—क्या कोई ऐसा समय आएगा जब नरक और दण्ड की अवधि समाप्त हो जाएगी? क्या दुष्ट लोग युगों के क्लेश के बाद स्वर्ग में प्रवेश पाएँगे? तब तो आत्मा के द्वारा पवित्रीकरण की आवश्यकता को ठुकराया और तुच्छ ठहराया जाता है! मैं पढ़ता हूँ कि मनुष्य पृथ्वी पर ही पवित्र किए जा सकते और स्वर्ग के योग्य बनाए जा सकते हैं; मैं नरक में किसी पवित्रीकरण के विषय में कुछ नहीं पढ़ता। ऐसे निराधार और पवित्रशास्त्र-विरोधी सिद्धान्तों को दूर करें! नरक की अनन्तता बाइबल में उतनी ही स्पष्टता से बताई गई है जितनी स्वर्ग की अनन्तता। एक बार यह मान लें कि नरक अनन्त नहीं है, तो आप यह भी कह सकते हैं कि परमेश्वर और स्वर्ग भी अनन्त नहीं हैं। जो यूनानी शब्द "अनन्त दण्ड" वाक्यांश में प्रयुक्त हुआ है, वही शब्द प्रभु यीशु ने "अनन्त जीवन" वाक्यांश में, और पौलुस ने "अनन्त परमेश्वर" वाक्यांश में प्रयोग किया है। (मत्ती 25:46; रोमियों 16:26।)

मैं जानता हूँ कि यह सब बहुत लोगों के कानों को भयानक लगता है। मुझे इसमें आश्चर्य नहीं। परन्तु जो एकमात्र प्रश्न हमें सुलझाना है वह यह है,—क्या यह पवित्रशास्त्र के अनुसार है? क्या यह सत्य है? मैं दृढ़ता से कहता हूँ कि यह ऐसा ही है; और मैं यह भी कहता हूँ कि मसीही कहलानेवालों को बार-बार स्मरण दिलाया जाना चाहिए कि वे खो सकते हैं और नरक में जा सकते हैं।

मैं जानता हूँ कि नरक के विषय में सब स्पष्ट शिक्षा का इनकार करना, और उसे घृणित नामों से बदनाम करना आसान है। मैंने प्रायः "संकीर्ण विचार, पुराने ढर्रे की धारणाएँ, और गन्धक का धर्मविज्ञान" और ऐसी ही बातें सुनी हैं। मुझे प्रायः बताया गया है कि आज के समय में "उदार" विचारों की आवश्यकता है। मैं उतना ही उदार होना चाहता हूँ जितनी बाइबल है, न कम न अधिक। मैं कहता हूँ कि संकीर्ण विचारों का धर्मविज्ञानी वह है जो बाइबल के उन भागों को काट-छाँट देता है जो स्वाभाविक मन को अच्छे नहीं लगते, और परमेश्वर की युक्ति के किसी भी भाग को ठुकरा देता है।

परमेश्वर जानता है कि मैं नरक के विषय में कभी पीड़ा और दुःख के बिना नहीं बोलता। मैं सुसमाचार का उद्धार बड़े से बड़े पापी को भी सहर्ष देना चाहूँगा। मैं मरणासन्न अवस्था में पड़े अत्यन्त नीच और भ्रष्ट मनुष्य से भी सहर्ष कहूँगा, "मन फिरा, और यीशु पर विश्वास कर, तो तू उद्धार पाएगा।" परन्तु परमेश्वर न करे कि मैं कभी किसी नश्वर मनुष्य से यह बात छिपाऊँ कि पवित्रशास्त्र स्वर्ग के साथ-साथ नरक को भी प्रकट करता है, और सुसमाचार यह सिखाता है कि मनुष्य बचाए भी जा सकते हैं और खो भी सकते हैं। जो पहरुआ आग को देखकर चुप रहता है, वह घोर लापरवाही का दोषी है,—जो चिकित्सक हमें बताता है कि हम स्वस्थ हो रहे हैं जबकि हम मर रहे हैं, वह झूठा मित्र है; और जो सेवक अपने उपदेशों में अपने लोगों से नरक की बात छिपाता है, वह न विश्वासयोग्य है न प्रेमी।

परमेश्वर के सत्य के किसी भी भाग को छिपाने में कहाँ का प्रेम है? सबसे दयालु मित्र वही है जो मुझे मेरे संकट की पूरी सीमा बताता है। अपश्चात्तापी और अभक्त लोगों से भविष्य को छिपाने का क्या लाभ? निश्चय ही यह शैतान की सहायता करने के समान है, यदि हम उन्हें स्पष्ट रूप से न बताएँ कि "जो प्राणी पाप करे वही मरेगा।" कौन जाने कि बहुत से बपतिस्मा-प्राप्त लोगों की दयनीय लापरवाही का कारण यही हो कि उन्हें कभी नरक के विषय में स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया? कौन कह सकता है कि यदि सेवक उन्हें आनेवाले क्रोध से भागने के लिए अधिक विश्वासयोग्यता से समझाते तो हज़ारों मन फिराते? सचमुच, मुझे भय है कि हममें से बहुत से इस बात में दोषी हैं: हमारे बीच एक रोगी कोमलता है जो मसीह की कोमलता नहीं है। हमने दया की बात की है, परन्तु न्याय की नहीं; हमने स्वर्ग के विषय में बहुत उपदेश दिए हैं, परन्तु नरक के विषय में थोड़े; हम "नीच, गँवार और धर्मोन्मादी" समझे जाने के दयनीय भय से बह गए हैं। हम भूल गए हैं कि हमारा न्याय करनेवाला प्रभु है, और जो मनुष्य वही सिद्धान्त सिखाता है जो मसीह ने सिखाया, वह गलत नहीं हो सकता।

यदि आप कभी एक स्वस्थ, पवित्रशास्त्रीय मसीही बनना चाहते हैं, तो मैं आपसे विनती करता हूँ कि अपने धर्मशास्त्र में नरक को भी स्थान दें। इसे अपने मन में एक स्थिर सिद्धान्त के रूप में स्थापित कर लें कि परमेश्वर जैसे दया का परमेश्वर है वैसे ही न्याय का भी परमेश्वर है; और जिन्हीं सनातन योजनाओं ने स्वर्ग के आनन्द की नींव डाली, उन्हीं ने नरक के दुःख की नींव भी डाली है। इसे अपने मन की आँखों के सामने बनाए रखें कि जो कोई बिना क्षमा पाए और बिना नया किए जाए मरता है, वह परमेश्वर की उपस्थिति के लिए सर्वथा अयोग्य है और उसका सदा के लिए खो जाना निश्चित है। वे स्वर्ग का आनन्द उठाने के योग्य नहीं हैं; वे वहाँ सुखी नहीं हो सकते। उन्हें अपने ही स्थान को जाना होगा; और वह स्थान नरक है। अहा, अविश्वास के इन दिनों में पूरी बाइबल पर विश्वास करना कितनी बड़ी बात है!

यदि आप कभी एक स्वस्थ और पवित्रशास्त्रीय मसीही बनना चाहते हैं, तो मैं आपसे विनती करता हूँ कि ऐसी किसी भी सेवकाई से सावधान रहें जो नरक की वास्तविकता और उसकी अनन्तता को स्पष्ट रूप से नहीं सिखाती। ऐसी सेवकाई सांत्वना देनेवाली और सुहावनी हो सकती है, परन्तु इस बात की कहीं अधिक सम्भावना है कि वह आपको सुला दे, न कि आपको मसीह के पास ले जाए या विश्वास में आपको दृढ़ करे। परमेश्वर के सत्य का कोई भी अंश छोड़ देने से पूरे को बिगाड़े बिना नहीं रहा जा सकता। वह प्रचार बहुत अधूरा है जो केवल परमेश्वर की दया और स्वर्ग के आनन्द पर ही ठहरा रहता है, और प्रभु के भय और नरक के दुःखों को कभी प्रस्तुत नहीं करता। वह लोकप्रिय हो सकता है, परन्तु पवित्रशास्त्रीय नहीं; वह मन बहला सकता और सन्तुष्ट कर सकता है, परन्तु बचा नहीं सकता। मुझे ऐसा प्रचार चाहिए जो उस किसी भी बात को न छिपाए जो परमेश्वर ने प्रकट की है। आप इसे कठोर और रूखा कह सकते हैं; आप हमसे कह सकते हैं कि लोगों को डराना उनका भला करने का तरीका नहीं है। परन्तु आप यह भूल रहे हैं कि सुसमाचार का मुख्य उद्देश्य मनुष्यों को इस बात के लिए मनाना है कि वे "आनेवाले क्रोध से भागें," और जब तक मनुष्य डरें नहीं तब तक उनसे भागने की आशा करना व्यर्थ है। कितना अच्छा होता यदि बहुत-से मसीही कहलानेवाले लोग अपनी आत्माओं के विषय में उससे अधिक डरते जितना वे अब डरते हैं!

यदि आप एक स्वस्थ मसीही होना चाहते हैं, तो बार-बार विचार करें कि आपका अपना अन्त क्या होगा। क्या वह सुख होगा या दुःख? क्या वह धर्मी की मृत्यु होगी, या लूत की पत्नी के समान आशाहीन मृत्यु? आप सदा जीवित नहीं रह सकते; एक दिन अन्त अवश्य होगा। एक दिन अन्तिम उपदेश सुना जाएगा; एक दिन अन्तिम प्रार्थना की जाएगी; एक दिन बाइबल का अन्तिम अध्याय पढ़ा जाएगा;—सोचना, चाहना, आशा रखना, इरादा करना, ठान लेना, सन्देह करना, हिचकिचाना,—सब कुछ अन्त में समाप्त हो जाएगा। आपको इस संसार को छोड़ना होगा और पवित्र परमेश्वर के सामने खड़ा होना होगा। ओह, कि आप बुद्धिमान होते! ओह, कि आप अपने अन्त का विचार करते!

आप सदा खिलवाड़ नहीं कर सकते; एक समय आएगा जब आपको गम्भीर होना ही पड़ेगा। आप अपनी आत्मा की चिन्ताओं को सदा के लिए टाल नहीं सकते; एक दिन आएगा जब आपको परमेश्वर के साथ लेखा देना होगा। आप सदा गाते, नाचते, खाते, पीते, सजते-संवरते, पढ़ते, हँसते, ठट्ठा करते, योजनाएँ बनाते और धन कमाते नहीं रह सकते। ग्रीष्म के कीट सदा धूप में खेलते नहीं रह सकते; ठण्डी, सिहरन भरी साँझ अन्त में आ ही जाएगी और उनका खेल सदा के लिए रोक देगी। आपके साथ भी ऐसा ही होगा। आप अभी धर्म को टाल सकते हैं और परमेश्वर के सेवकों की सलाह ठुकरा सकते हैं; परन्तु दिन की ठण्डक निकट आ रही है, जब परमेश्वर आपसे बातें करने को उतर आएगा। और आपका अन्त क्या होगा? क्या वह लूत की पत्नी के समान आशाहीन होगा?

मैं परमेश्वर की दया की दुहाई देकर आपसे विनती करता हूँ कि इस प्रश्न का सीधे सामना करें। मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि जब तक आपका हृदय संसार से चिपका हुआ है, तब तक परमेश्वर की दया की अस्पष्ट आशाओं से अपने विवेक का गला न घोंटें। मैं आपसे याचना करता हूँ कि परमेश्वर के प्रेम के विषय में बचकानी कल्पनाओं से अपने कायल होने की आवाज़ को न दबाएँ, जबकि आपके दैनिक चाल-चलन और आदतें साफ़ दिखाती हैं कि "पिता का प्रेम आप में नहीं है।" परमेश्वर में दया है, एक नदी के समान,—परन्तु वह यीशु मसीह पर विश्वास करनेवाले पश्चातापी जन के लिए है। पापियों के प्रति परमेश्वर का एक प्रेम है जो वर्णन से परे और अगम है,—परन्तु वह उनके लिए है जो "मसीह की आवाज़ सुनते और उसके पीछे चलते हैं।" उस प्रेम में अपना भाग पाने का यत्न करें। हर जानी हुई पाप को छोड़ दें; संसार में से साहस के साथ निकल आएँ; प्रार्थना में परमेश्वर को ज़ोर से पुकारें; समय और अनन्तकाल के लिए अपने आपको पूरी तरह और बिना किसी शर्त के प्रभु यीशु पर छोड़ दें; हर बोझ को उतार फेंकें। किसी भी वस्तु से चिपके न रहें, चाहे वह कितनी ही प्रिय क्यों न हो, यदि वह आपकी आत्मा के उद्धार में बाधा डालती है; हर वस्तु को त्याग दें, चाहे वह कितनी ही बहुमूल्य हो, जो आपके और स्वर्ग के बीच आती है। यह पुराना, जहाज़ के टूटे हुए मलबे जैसा संसार आपके पैरों तले तेज़ी से डूब रहा है; एक ही बात आवश्यक है: जीवन-नौका में स्थान पाना और सुरक्षित किनारे पहुँचना। अपने बुलाए जाने और चुने जाने को दृढ़ करने का पूरा यत्न करें। आपके घर और सम्पत्ति का चाहे जो हो, यह देख लें कि स्वर्ग आपके लिए निश्चित हो। ओह, इस संसार में हँसी का पात्र बनना और अति करनेवाला समझा जाना लाख गुना अच्छा है, इससे कि कोई मण्डली के बीच से नरक में जा गिरे और लूत की पत्नी के समान अन्त पाए!

और अब, मैं इस लेख को समाप्त करता हूँ, इसे पढ़नेवाले सब लोगों के सामने कुछ प्रश्न रखकर, ताकि यह विषय उनके विवेक पर अंकित हो जाए। आपने लूत की पत्नी का इतिहास देखा है,—उसके विशेषाधिकार, उसका पाप और उसका अन्त। आपको बताया गया है कि पवित्र आत्मा के दान के बिना विशेषाधिकार कितने निकम्मे हैं, संसारिकता का कितना खतरा है और नरक कितना वास्तविक है। अब मुझे अनुमति दें कि सब कुछ आपके अपने हृदय से कुछ सीधी विनतियों पर समाप्त करूँ। बहुत प्रकाश, ज्ञान और स्वीकारोक्ति के इस दिन में मैं आत्माओं को जहाज़ टूटने से बचाने के लिए एक दीपस्तम्भ खड़ा करना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि सब आत्मिक यात्रियों के जलमार्ग में एक तैरता चिह्न बाँध दूँ और उस पर लिख दूँ, "लूत की पत्नी को स्मरण रखो।"

(क) क्या आप मसीह के दूसरे आगमन के विषय में लापरवाह हैं? हाय, बहुत-से हैं! वे सदोम के लोगों और नूह के दिनों के लोगों के समान जीते हैं: वे खाते-पीते, लगाते-बनाते, ब्याह करते और ब्याहे जाते हैं, और ऐसा व्यवहार करते हैं मानो मसीह कभी लौटने वाला ही नहीं। यदि आप ऐसे ही जन हैं, तो मैं आज आपसे कहता हूँ, सावधान रहें: "लूत की पत्नी को स्मरण रखो।"

(ख) क्या आप अपने मसीही जीवन में गुनगुने और ठण्डे हैं? हाय, बहुत-से हैं! वे दो स्वामियों की सेवा करने का यत्न करते हैं: वे परमेश्वर और धन दोनों से मित्रता बनाए रखने का परिश्रम करते हैं। वे एक प्रकार के आत्मिक चमगादड़ बनने का प्रयास करते हैं, न इधर के न उधर के: न पूरे सच्चे मसीही, और न पूरे संसार के लोग। यदि आप ऐसे ही जन हैं, तो मैं आज आपसे कहता हूँ, सावधान रहें: "लूत की पत्नी को स्मरण रखो।"

(ग) क्या आप दो विचारों के बीच डगमगा रहे हैं, और संसार में लौट जाने की ओर झुके हुए हैं? हाय, बहुत से ऐसे हैं! वे क्रूस से डरते हैं; वे भीतर ही भीतर पक्की मसीही भक्ति की कठिनाई और निन्दा को नापसन्द करते हैं। वे जंगल और मन्ना से थक चुके हैं, और यदि बन पड़े तो मिस्र को लौट जाना चाहते हैं। यदि आप ऐसे ही हैं, तो मैं आज आपसे कहता हूँ: सावधान रहो: "लूत की पत्नी को स्मरण रखो।"

(घ) क्या आप किसी सहज उलझानेवाले पाप को चुपके से पाल रहे हैं? हाय, बहुत से ऐसे हैं! वे धर्म के अंगीकार में बहुत आगे तक जाते हैं; वे बहुत सी उचित बातें करते हैं, और परमेश्वर के लोगों से बहुत मिलते-जुलते हैं। परन्तु उनमें सदा कोई प्रिय बुरी आदत रहती है, जिसे वे अपने हृदय से उखाड़ नहीं पाते। छिपी हुई सांसारिकता, या लोभ, या वासना उनकी त्वचा की तरह उनसे चिपकी रहती है। वे अपनी सब मूर्तियों को टूटते देखने को तैयार हैं, पर इस एक को नहीं। यदि आप ऐसे ही हैं, तो मैं आज आपसे कहता हूँ: सावधान रहो: "लूत की पत्नी को स्मरण रखो।"

(ङ) क्या आप छोटे पापों के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं? हाय, बहुत से ऐसे हैं! वे सुसमाचार के बड़े मूल सिद्धान्तों को थामे रहते हैं। वे सब घोर दुराचार, या परमेश्वर की व्यवस्था के खुले उल्लंघन से दूर रहते हैं; परन्तु छोटी-छोटी असंगतियों के विषय में वे दुःखद रूप से लापरवाह, और उनके लिए बहाने बनाने को दुःखद रूप से तैयार रहते हैं। वे हमसे कहते हैं, "यह तो केवल थोड़ा सा क्रोध है, या थोड़ी सी हल्की बात, या थोड़ी सी असावधानी, या थोड़ी सी भूल है;—परमेश्वर ऐसी छोटी बातों का हिसाब नहीं लेता। हममें से कोई भी सिद्ध नहीं है: परमेश्वर कभी इसकी माँग नहीं करेगा।"—यदि आप ऐसे ही हैं, तो मैं आज आपसे कहता हूँ: सावधान रहो: "लूत की पत्नी को स्मरण रखो।"

(च) क्या आप धार्मिक विशेषाधिकारों पर टिके हुए हैं? हाय, बहुत से ऐसा करते हैं! उन्हें सुसमाचार का नियमित प्रचार सुनने, और बहुत सी विधियों तथा अनुग्रह के साधनों में सम्मिलित होने का अवसर मिलता है: और वे अपनी तलछट पर बैठ जाते हैं। वे "धनवान हैं, और मालामाल हो गए हैं, और उन्हें किसी वस्तु की घटी नहीं" (प्रकाशित वाक्य 3:17); जबकि उनमें न विश्वास है, न अनुग्रह, न आत्मिक मन, न स्वर्ग के योग्य तैयारी। यदि आप ऐसे ही हैं, तो मैं आज आपसे कहता हूँ: सावधान रहो: "लूत की पत्नी को स्मरण रखो।"

(छ) क्या आप अपने धार्मिक ज्ञान पर भरोसा कर रहे हैं? हाय, बहुत से ऐसा करते हैं! वे दूसरे मनुष्यों की तरह अज्ञानी नहीं हैं: वे सच्चे और झूठे सिद्धान्त का अन्तर जानते हैं। वे विवाद कर सकते हैं, तर्क कर सकते हैं, बहस कर सकते हैं, पद उद्धृत कर सकते हैं; परन्तु इस सारे समय में वे मन नहीं फिराए गए हैं, और अब भी अपराधों और पापों में मरे हुए हैं। यदि आप ऐसे ही हैं, तो मैं आज आपसे कहता हूँ: सावधान रहो: "लूत की पत्नी को स्मरण रखो।"

(ज) क्या आप धर्म का कुछ अंगीकार तो करते हैं, फिर भी संसार से चिपके हुए हैं? हाय, बहुत से ऐसा करते हैं! उनका लक्ष्य मसीही समझे जाना है। उन्हें गम्भीर, स्थिर, शिष्ट, नियमित कलीसिया जानेवाले लोग कहलाने का मान अच्छा लगता है; फिर भी उनका पहनावा, उनकी रुचियाँ, उनके साथी, उनके मनोरंजन साफ़ बताते हैं कि वे संसार के हैं। यदि आप ऐसे ही हैं, तो मैं आज आपसे कहता हूँ: सावधान रहो: "लूत की पत्नी को स्मरण रखो।"

(झ) क्या आप इस भरोसे पर हैं कि मृत्युशय्या पर मन फिरा लेंगे? हाय, बहुत से ऐसा करते हैं! वे जानते हैं कि वे वैसे नहीं हैं जैसे उन्हें होना चाहिए: वे अब तक नया जन्म नहीं पाए हैं, और मरने के योग्य नहीं हैं। परन्तु वे अपने आपको बहलाते हैं कि जब उनकी अन्तिम बीमारी आएगी तो उन्हें समय मिलेगा कि मन फिराएँ और मसीह को थाम लें, और क्षमा पाकर, पवित्र किए जाकर तथा स्वर्ग के योग्य होकर संसार से विदा हों। वे भूल जाते हैं कि लोग अकसर बहुत अचानक मर जाते हैं, और जैसे जीते हैं वैसे ही प्रायः मरते भी हैं। यदि आप ऐसे ही हैं, तो मैं आज आपसे कहता हूँ: सावधान रहो: "लूत की पत्नी को स्मरण रखो।"

(ञ) क्या आप किसी इंजीली मण्डली के सदस्य हैं? बहुत से हैं, और हाय, इससे आगे नहीं बढ़ते! वे रविवार पर रविवार सत्य सुनते हैं, और निचली चक्की के पाट के समान कठोर बने रहते हैं। उपदेश पर उपदेश उनके कानों में गूँजता है। महीने पर महीने उन्हें मन फिराने, विश्वास करने, मसीह के पास आने और उद्धार पाने का न्यौता दिया जाता है। वर्ष पर वर्ष बीत जाता है, और वे बदलते नहीं। वे किसी प्रिय सेवक की शिक्षा के नीचे अपना आसन बनाए रखते हैं, और अपने प्रिय पापों को भी बनाए रखते हैं। यदि आप ऐसे ही हैं, तो मैं आज आपसे कहता हूँ: सावधान रहो: "लूत की पत्नी को स्मरण रखो।"

आह, हमारे प्रभु यीशु मसीह के ये गम्भीर वचन हमारे सब के हृदयों पर गहराई से खुदे रहें! जब हम ऊँघते हों तब ये हमें जगाएँ,—जब हम मरे हुए से हों तब हमें जिलाएँ,—जब हम सुस्त हों तब हमें तेज़ करें,—जब हम ठण्डे पड़ें तब हमें गर्म करें! जब हम पीछे हट रहे हों तब ये हमें आगे बढ़ाने के लिए अंकुश बनें, और जब हम इधर-उधर भटक रहे हों तब हमें रोकने के लिए लगाम बनें! जब शैतान हमारे हृदय पर कोई चतुर परीक्षा फेंके, तब ये हमारी रक्षा के लिए ढाल बनें; और जब वह निडर होकर कहे, "मसीह को छोड़ दे, संसार में लौट आ, और मेरे पीछे चल!" तब लड़ने के लिए तलवार बनें। आह, परीक्षा की ऐसी घड़ियों में हम कह सकें, "हे मेरे प्राण, अपने उद्धारकर्ता की चेतावनी को स्मरण कर! हे प्राण, हे प्राण, क्या तू उसके वचन भूल गया है? हे प्राण, हे प्राण, 'लूत की पत्नी को स्मरण रख।'"

XI. मसीह की सबसे बड़ी विजय-निशानी

"और जो कुकर्मी लटकाए गए थे, उनमें से एक ने उसकी निन्दा करके कहा, यदि तू मसीह है, तो अपने आप को और हमें बचा।"

"इस पर दूसरे ने उसे डाँटकर उत्तर दिया, क्या तू परमेश्वर से भी नहीं डरता, तू भी तो वही दण्ड पा रहा है?"

"और हम तो न्यायानुसार दण्ड पा रहे हैं, क्योंकि हम अपने कामों का ठीक फल पा रहे हैं; पर इस ने कोई अनुचित काम नहीं किया।"

"तब उस ने यीशु से कहा, हे प्रभु, जब तू अपने राज्य में आए, तो मुझे स्मरण कर।"

"उस ने उस से कहा, मैं तुझ से सच कहता हूँ, कि आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा।"—लूका 23:39–43।

नए नियम में बहुत कम अंश ऐसे हैं जो लोगों के कानों में इस लेख के शीर्ष की इन आयतों से अधिक परिचित हों। इनमें "पश्चाताप करनेवाले चोर" की प्रसिद्ध कथा है।

और यह उचित तथा भला है कि ये आयतें भली-भाँति जानी जाएँ। इन्होंने बहुत से व्याकुल मनों को शान्ति दी है; इन्होंने बहुत से बेचैन विवेकों को चैन पहुँचाया है; ये बहुत से घायल हृदयों के लिए चंगाई का मरहम रही हैं; ये बहुत से पाप-रोगी आत्माओं के लिए औषधि रही हैं; इन्होंने कितने ही मरते हुओं के तकियों को सहारा दिया है। जहाँ कहीं मसीह का सुसमाचार प्रचार किया जाएगा, वहाँ ये आयतें सदा आदर, प्रेम और स्मरण पाती रहेंगी।

मैं इन आयतों के विषय में कुछ कहना चाहता हूँ। मैं उन मुख्य शिक्षाओं को खोलकर समझाने का यत्न करूँगा जो इनके द्वारा दी जाने को हैं। जिस किसी के हाथ में यह लेख पड़े, उसकी विशेष मानसिक दशा को मैं देख नहीं सकता।

परन्तु मैं इस अंश में ऐसे सत्य देख सकता हूँ जिन्हें कोई मनुष्य कभी भी अत्यधिक नहीं जान सकता। यहाँ वह सबसे बड़ी विजय-निशानी है जो मसीह ने कभी जीती।

I. सबसे पहले, इन पदों से हमें मसीह की सामर्थ्य और पापियों को बचाने की उसकी इच्छा के विषय में सीखना है

पश्चात्तापी चोर के वृत्तान्त से यही मुख्य सिद्धान्त निकलता है। यह हमें वह बात सिखाता है जो सुननेवाले हर किसी के कानों में संगीत के समान होनी चाहिए—यह सिखाता है कि यीशु मसीह "उद्धार करने में पराक्रमी" है। (यशा. 63:1।)

मैं हर किसी से पूछता हूँ कि क्या कोई मामला इस पश्चात्तापी चोर के कभी के मामले से अधिक निराशाजनक और हताश करनेवाला दिख सकता था?

वह एक दुष्ट मनुष्य था—कुकर्मी था—चोर था, यदि हत्यारा नहीं तो। हम यह जानते हैं, क्योंकि केवल ऐसे ही लोग क्रूस पर चढ़ाए जाते थे। वह व्यवस्था तोड़ने का उचित दण्ड भोग रहा था। और जैसा उसने दुष्टता में जीवन बिताया था, वैसे ही वह दुष्टता में मरने को भी ठाने हुए दिखता था—क्योंकि पहले, जब वह क्रूस पर चढ़ाया गया, तब उसने हमारे प्रभु की निन्दा की थी।

और वह मरता हुआ मनुष्य था। वह वहाँ क्रूस में कीलों से जड़ा लटका था, जिससे वह जीवित उतरनेवाला नहीं था। अब उसमें हाथ या पाँव हिलाने की भी शक्ति न थी। उसके घण्टे गिने जा चुके थे: कब्र उसके लिए तैयार थी। उसके और मृत्यु के बीच बस एक कदम का अन्तर था।

यदि कभी कोई आत्मा नरक के कगार पर मण्डराती थी, तो वह इस चोर की आत्मा थी। यदि कभी कोई मामला ऐसा था जो खोया हुआ, गया हुआ और सुधार से परे दिखता था, तो वह उसका था। यदि कभी आदम की सन्तानों में कोई ऐसा था जिसे शैतान ने अपना निश्चित जान लिया था, तो वह यही मनुष्य था।

परन्तु अब देखो कि क्या हुआ। उसने निन्दा और कुफ्र बकना छोड़ दिया, जैसा वह आरम्भ में करता था: वह बिलकुल दूसरे ढंग से बोलने लगा। वह प्रार्थना में हमारे धन्य प्रभु की ओर फिरा। उसने यीशु से प्रार्थना की कि "जब तू अपने राज्य में आए, तो मेरी सुधि लेना।" उसने माँगा कि उसकी आत्मा की चिन्ता की जाए, उसके पाप क्षमा किए जाएँ, और दूसरे लोक में उसका स्मरण किया जाए। सचमुच यह अद्भुत परिवर्तन था!

और फिर देखो कि उसे किस प्रकार का उत्तर मिला। कुछ लोग कहते कि वह इतना दुष्ट मनुष्य था कि उसका उद्धार नहीं हो सकता था; परन्तु ऐसा नहीं था। कुछ लोग सोचते कि बहुत देर हो चुकी थी: द्वार बन्द हो गया था, और दया के लिए स्थान न रहा था; परन्तु बिलकुल देर नहीं हुई थी। प्रभु यीशु ने उसे तुरन्त उत्तर दिया—उससे कृपा से बात की—उसे निश्चय दिलाया कि वह उसी दिन उसके साथ स्वर्गलोक में होगा—उसे पूरी रीति से क्षमा किया—उसके पापों से उसे भली-भाँति शुद्ध किया—उसे अनुग्रह से ग्रहण किया—उसे मुफ़्त में धर्मी ठहराया—उसे नरक के फाटकों से उठा लिया—उसे महिमा का अधिकार दे दिया। उद्धार पाई हुई आत्माओं की उस सारी भीड़ में से किसी को भी अपने उद्धार का ऐसा महिमामय निश्चय कभी नहीं मिला जैसा इस पश्चात्तापी चोर को मिला। उत्पत्ति से लेकर प्रकाशितवाक्य तक पूरी सूची देख जाओ, तुम्हें कोई ऐसा न मिलेगा जिससे ऐसे वचन कहे गए हों—"आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा।"

मेरा विश्वास है कि प्रभु यीशु ने उद्धार करने की अपनी सामर्थ्य और इच्छा का इतना पूरा प्रमाण कभी नहीं दिया जितना इस अवसर पर दिया। जिस दिन वह सबसे निर्बल दिखता था, उसी दिन उसने दिखाया कि वह सामर्थी छुड़ानेवाला है। जिस घड़ी उसका शरीर पीड़ा से टूट रहा था, उसी घड़ी उसने दिखाया कि वह दूसरों के लिए कोमलता से सहानुभूति रख सकता है। जिस समय वह स्वयं मर रहा था, उसी समय उसने एक पापी को अनन्त जीवन दिया।

अब क्या मुझे यह कहने का अधिकार नहीं कि मसीह "जो उसके द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं, उनका पूरी रीति से उद्धार कर सकता है"? (इब्रा. 7:25।) इसका प्रमाण देखो। यदि कभी कोई पापी उद्धार पाने से बहुत दूर निकल चुका था, तो वह यही चोर था। फिर भी वह आग में से निकाली हुई लकड़ी के समान खींच लिया गया।

क्या मुझे यह कहने का अधिकार नहीं कि मसीह हर उस दीन पापी को ग्रहण करेगा जो विश्वास की प्रार्थना लेकर उसके पास आता है, और किसी को निकाल न देगा? इसका प्रमाण देखो। यदि कभी कोई ऐसा था जो ग्रहण किए जाने के लिए बहुत बुरा दिखता था, तो वह यही मनुष्य था। फिर भी दया का द्वार उसके लिए भी पूरा खुला था।

क्या मुझे यह कहने का अधिकार नहीं कि अनुग्रह ही से, विश्वास के द्वारा, तुम्हारा उद्धार हुआ है, कर्मों से नहीं: मत डरो, केवल विश्वास करो? इसका प्रमाण देखो। इस चोर ने कभी बपतिस्मा नहीं लिया; वह किसी दृश्य कलीसिया का सदस्य न था; उसने कभी प्रभु-भोज नहीं लिया; उसने मसीह के लिए कभी कोई काम नहीं किया; उसने मसीह के कार्य के लिए कभी धन नहीं दिया! परन्तु उसमें विश्वास था, और इसलिए उसका उद्धार हुआ।

क्या मुझे यह कहने का अधिकार नहीं कि सबसे नया विश्वास भी मनुष्य की आत्मा को बचाएगा, यदि वह सच्चा हो? इसका प्रमाण देखो। इस मनुष्य का विश्वास केवल एक दिन का था; परन्तु उसने उसे मसीह के पास पहुँचाया और नरक से बचा लिया।

तो बाइबल में ऐसा अंश होते हुए कोई स्त्री या पुरुष क्यों निराश हो? यीशु ऐसा चिकित्सक है जो निराशाजनक रोगों को भी चंगा कर सकता है। वह मरी हुई आत्माओं को जिला सकता है, और जो बातें हैं ही नहीं उन्हें ऐसे बुला सकता है मानो वे हों।

किसी स्त्री या पुरुष को कभी निराश नहीं होना चाहिए! यीशु अब भी वैसा ही है जैसा अठारह सौ वर्ष पहले था। मृत्यु और अधोलोक की कुंजियाँ उसके हाथ में हैं। जब वह खोलता है तब कोई बन्द नहीं कर सकता।*

क्या हुआ यदि तुम्हारे पाप तुम्हारे सिर के बालों से भी अधिक हैं? क्या हुआ यदि तुम्हारी बुरी आदतें तुम्हारी आयु के साथ बढ़ी हैं और तुम्हारे बल के साथ दृढ़ हुई हैं? क्या हुआ यदि तुमने अपने जीवन के सारे दिन अब तक भलाई से बैर और बुराई से प्रेम किया है? ये बातें निश्चय ही दुःखद हैं; परन्तु तुम्हारे लिए भी आशा है। मसीह तुम्हें चंगा कर सकता है: मसीह तुम्हें तुम्हारी दीन दशा से उठा सकता है। स्वर्ग तुम्हारे विरुद्ध बन्द नहीं है। यदि तुम नम्रता से अपनी आत्मा को उसके हाथों में सौंप दो, तो मसीह तुम्हें भीतर ले लेने में समर्थ है।

क्या तुम्हारे पाप क्षमा हो गए हैं? यदि नहीं, तो मैं आज तुम्हारे सामने पूर्ण और मुफ़्त उद्धार रखता हूँ। मैं तुम्हें न्यौता देता हूँ कि पश्चात्तापी चोर के पदचिह्नों पर चलो: मसीह के पास आओ और जीवित रहो। मैं तुमसे कहता हूँ कि यीशु बड़ा दयालु और कोमल करुणावाला है। मैं तुमसे कहता हूँ कि तुम्हारी आत्मा को जो कुछ चाहिए वह सब कर सकता है। चाहे तुम्हारे पाप लाल रंग के समान हों, वह उन्हें हिम के समान श्वेत कर सकता है; चाहे वे किरमिजी रंग के समान लाल हों, तो भी वे ऊन के समान हो जाएँगे। तुम्हारा उद्धार दूसरे के समान क्यों न हो? मसीह के पास आओ और जीवित रहो।

क्या तुम सच्चे विश्वासी हो? यदि हो, तो तुम्हें मसीह पर घमण्ड करना चाहिए। अपने विश्वास, अपनी भावनाओं, अपने ज्ञान, अपनी प्रार्थनाओं, अपने सुधार, अपनी परिश्रमशीलता पर घमण्ड मत करो। मसीह को छोड़ किसी बात पर घमण्ड मत करो। हाय! हम में से जो सबसे अच्छे हैं वे भी उस दयालु और सामर्थी उद्धारकर्ता को बहुत कम जानते हैं। हम उसे ऊँचा नहीं उठाते और उस पर पर्याप्त घमण्ड नहीं करते। आओ प्रार्थना करें कि हम उसमें जो परिपूर्णता है उसे और अधिक देख सकें।

क्या आप कभी दूसरों का भला करने का प्रयत्न करते हैं? यदि करते हैं, तो उन्हें मसीह के विषय में बताना न भूलें। जवानों को बताइए, गरीबों को बताइए, बूढ़ों को बताइए, अज्ञानियों को बताइए, बीमारों को बताइए, मरते हुओं को बताइए—उन सब को मसीह के विषय में बताइए। उन्हें उसकी सामर्थ्य के विषय में बताइए, और उसके प्रेम के विषय में बताइए; उसके कामों के विषय में बताइए, और उसकी भावनाओं के विषय में बताइए; उन्हें बताइए कि उसने सबसे बड़े पापी के लिये क्या किया है; उन्हें बताइए कि वह समय के अन्तिम दिन तक क्या करने को तैयार है: उन्हें यह बार-बार बताइए। मसीह की चर्चा करने से कभी न थकिए। उनसे खुलकर और पूरे मन से, निःशुल्क और बिना किसी शर्त के, बिना कुछ छिपाए और बिना सन्देह के कहिए, "मसीह के पास आ जाओ, जैसे उस पश्चातापी चोर ने किया; मसीह के पास आओ, और तुम उद्धार पाओगे।"

II. इस अंश से हमें जो दूसरी शिक्षा मिलनी चाहिए वह यह है।—यदि कुछ लोग मृत्यु की घड़ी में ही उद्धार पाते हैं, तो दूसरे नहीं पाते।

यह एक ऐसा सत्य है जिसे कभी अनदेखा नहीं करना चाहिए, और मैं इसे बिना कहे छोड़ने का साहस नहीं कर सकता। यह सत्य उस दूसरे अपराधी के दुःखद अन्त में स्पष्ट दिखाई देता है, और इसे बहुत बार भुला दिया जाता है। लोग भूल जाते हैं कि वहाँ "दो चोर" थे।

उस दूसरे चोर का क्या हुआ जो क्रूस पर चढ़ाया गया था? उसने अपने पाप से मुँह क्यों नहीं मोड़ा, और प्रभु को क्यों नहीं पुकारा? वह कठोर और अपश्चातापी क्यों बना रहा? उसका उद्धार क्यों नहीं हुआ? ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयत्न करना व्यर्थ है। आइए हम तथ्य को जैसा पाते हैं वैसा ही स्वीकार करें, और देखें कि वह हमें क्या सिखाना चाहता है।

हमें यह कहने का कोई अधिकार नहीं कि यह चोर अपने साथी से अधिक बुरा मनुष्य था: इसका कोई प्रमाण नहीं है। दोनों स्पष्ट रूप से दुष्ट मनुष्य थे; दोनों अपने कामों का उचित प्रतिफल पा रहे थे; दोनों हमारे प्रभु यीशु मसीह के पास लटके हुए थे; दोनों ने उसे अपने हत्यारों के लिये प्रार्थना करते सुना, दोनों ने उसे धीरज से दुःख सहते देखा। परन्तु एक ने मन फिराया, जबकि दूसरा कठोर बना रहा; एक प्रार्थना करने लगा, जबकि दूसरा निन्दा करता रहा; एक अपने अन्तिम घण्टों में मन फिराकर परमेश्वर की ओर लौट आया, जबकि दूसरा बुरा मनुष्य ही मरा, जैसा वह जीया था; एक को स्वर्गलोक में ले जाया गया, जबकि दूसरा अपने स्थान को गया,—शैतान और उसके दूतों के स्थान को।

अब ये बातें हमारी चेतावनी के लिये लिखी गई हैं। इन पदों में सान्त्वना के साथ-साथ चेतावनी भी है, और वह बहुत गम्भीर चेतावनी है।

वे मुझे ऊँचे स्वर में बताती हैं कि यद्यपि कुछ लोग अपनी मृत्यु-शय्या पर मन फिरा सकते हैं और परमेश्वर की ओर लौट सकते हैं, फिर भी इससे यह बिलकुल नहीं निकलता कि सब ऐसा करेंगे। मृत्यु-शय्या सदा उद्धार का समय नहीं होती।

वे मुझे ऊँचे स्वर में बताती हैं कि दो मनुष्यों को अपनी आत्मा की भलाई पाने के एक जैसे अवसर मिल सकते हैं, वे एक ही स्थिति में रखे जा सकते हैं, एक जैसी बातें देख सकते हैं और एक जैसी बातें सुन सकते हैं,—फिर भी उन दोनों में से केवल एक ही उनसे लाभ उठाएगा, मन फिराएगा, विश्वास करेगा और उद्धार पाएगा।

वे मुझे सबसे बढ़कर यह बताती हैं कि मन फिराव और विश्वास परमेश्वर के दान हैं और मनुष्य के अपने वश में नहीं हैं; और यदि कोई अपने आप को यह कहकर बहलाता है कि वह अपने समय पर मन फिरा सकता है, अपना समय स्वयं चुन सकता है, जब चाहे प्रभु को खोज सकता है, और उस पश्चातापी चोर के समान अन्त घड़ी में भी उद्धार पा सकता है,—तो अन्त में वह पाएगा कि वह बहुत बड़े धोखे में था।

और इस बात को स्मरण रखना भला और लाभदायक है। इसी विषय में संसार में भ्रम की बड़ी भारी मात्रा है। मैं देखता हूँ कि बहुत से लोग अपना जीवन बीतने देते हैं, और मरने के लिये बिलकुल तैयार नहीं होते। मैं देखता हूँ कि बहुत से लोग मानते हैं कि उन्हें मन फिराना चाहिए, फिर भी वे अपना मन फिराव सदा टालते रहते हैं। और मेरा विश्वास है कि इसका एक बड़ा कारण यह है कि अधिकांश लोग समझते हैं कि वे जब चाहें परमेश्वर की ओर लौट सकते हैं! वे दाख की बारी के मज़दूर के दृष्टान्त को, जो ग्यारहवें घण्टे की बात करता है, तोड़-मरोड़कर उसका ऐसा उपयोग करते हैं जैसा उसका उद्देश्य कभी नहीं था। वे उन पदों के सुखद भाग पर ठहरे रहते हैं जिन पर मैं अब विचार कर रहा हूँ, और शेष को भूल जाते हैं। वे उस चोर की बात करते हैं जो स्वर्गलोक में गया और उद्धार पाया, और उसे भूल जाते हैं जो वैसा ही मरा जैसा वह जीया था,—और नाश हुआ।*

मैं इस लेख को पढ़नेवाले प्रत्येक समझदार मनुष्य से विनती करता हूँ कि वह सावधान रहे कि इस भूल में न पड़े।

बाइबल में मनुष्यों के इतिहास को देखिए, और देखिए कि जिन धारणाओं की मैं चर्चा कर रहा हूँ उनका कितनी बार खण्डन हुआ है। भली-भाँति ध्यान दीजिए कि इस बात के कितने प्रमाण हैं कि दो मनुष्यों को एक ही ज्योति दी जा सकती है, और उनमें से केवल एक ही उसका उपयोग करता है; और किसी को भी परमेश्वर की दया के साथ मनमानी करने, और यह मान लेने का अधिकार नहीं कि वह जब चाहे मन फिरा सकेगा।

शाऊल और दाऊद को देखिए। वे लगभग एक ही समय में जीए; वे जीवन में एक ही स्तर से उठे; वे संसार में एक ही पद पर बुलाए गए; उन्होंने एक ही भविष्यद्वक्ता शमूएल की सेवकाई का लाभ उठाया; उन्होंने उतने ही वर्ष राज्य किया!—फिर भी एक का उद्धार हुआ, और दूसरा नाश हुआ।

सिरगियुस पौलुस और गल्लियो को देखिए। वे दोनों रोमी हाकिम थे; वे दोनों अपनी पीढ़ी में बुद्धिमान और समझदार पुरुष थे; उन दोनों ने प्रेरित पौलुस को प्रचार करते सुना! परन्तु एक ने विश्वास किया और बपतिस्मा लिया,—दूसरे ने "इन बातों की कुछ चिन्ता न की।" (प्रेरितों के काम 18:17।)

अपने आसपास के संसार को देखिए। देखिए कि आपकी आँखों के सामने निरन्तर क्या हो रहा है। प्रायः दो बहनें एक ही सेवकाई में उपस्थित होती हैं, एक ही सत्य सुनती हैं, एक ही उपदेश सुनती हैं; फिर भी केवल एक ही परमेश्वर की ओर फिरती है, जबकि दूसरी बिलकुल अप्रभावित रहती है। प्रायः दो मित्र एक ही धार्मिक पुस्तक पढ़ते हैं: एक उससे इतना प्रभावित होता है कि मसीह के लिये सब कुछ छोड़ देता है; दूसरे को उसमें कुछ भी दिखाई नहीं देता, और वह पहले जैसा ही बना रहता है। सैकड़ों लोगों ने डॉडरिज की "Rise and Progress" को बिना लाभ के पढ़ा है: विल्बरफोर्स के लिये वह आत्मिक जीवन के आरम्भ का एक साधन बनी। हज़ारों लोगों ने विल्बरफोर्स की "Practical View of Christianity" पढ़ी, और उसे बिना बदले हुए रख दिया: जब से लेघ रिचमंड ने उसे पढ़ा तब से वह दूसरा ही मनुष्य बन गया। किसी भी मनुष्य के पास यह कहने का कोई आधार नहीं कि "उद्धार मेरे अपने वश में है।"

मैं इन बातों की व्याख्या करने का दावा नहीं करता। मैं इन्हें केवल बड़े तथ्यों के रूप में आपके सामने रखता हूँ; और मैं आपसे विनती करता हूँ कि इन पर भली-भाँति विचार कीजिए।

आप मुझे गलत न समझें। मैं आपको निरुत्साहित करना नहीं चाहता। मैं ये बातें पूरे स्नेह से कहता हूँ, ताकि आपको खतरे की चेतावनी दे सकूँ। मैं इन्हें आपको स्वर्ग से पीछे हटाने के लिये नहीं कहता।—मैं इन्हें इसलिये कहता हूँ कि आपको आगे खींचूँ, और आपको मसीह के पास ले आऊँ, जब तक कि वह मिल सकता है।

मैं चाहता हूँ कि तुम दुस्साहस से सावधान रहो। परमेश्वर की दया और करुणा का दुरुपयोग मत करो। मैं तुमसे विनती करता हूँ, पाप में बने न रहो और यह न सोचो कि जब तुम चाहो, जब तुम्हें अच्छा लगे, जब तुम्हारी इच्छा हो और जब तुम निश्चय करो, तभी मन फिरा सकते हो, विश्वास कर सकते हो और उद्धार पा सकते हो। मैं सदा तुम्हारे सामने एक खुला द्वार रखना चाहूँगा। मैं सदा यही कहूँगा, "जब तक जीवन है तब तक आशा है।" परन्तु यदि तुम बुद्धिमान होना चाहते हो, तो जो बात तुम्हारी आत्मा से सम्बन्ध रखती है उसे किसी भी बात के लिए टालो मत।

मैं चाहता हूँ कि यदि तुम्हारे मन में अच्छे विचार और भक्तिपूर्ण दृढ़ विश्वास हों, तो उन्हें हाथ से निकल जाने देने से सावधान रहो। उन्हें सँजोकर रखो और उन्हें पोषण दो, ऐसा न हो कि तुम उन्हें सदा के लिए खो दो। उनसे पूरा लाभ उठाओ, ऐसा न हो कि वे पंख लगाकर उड़ जाएँ। क्या तुम्हारे मन में प्रार्थना आरम्भ करने की इच्छा है? उसे तुरन्त अमल में लाओ। क्या तुम्हारे मन में सचमुच मसीह की सेवा आरम्भ करने का विचार है? तुरन्त उसमें लग जाओ। क्या तुम्हें कोई आत्मिक ज्योति मिल रही है? ध्यान रखो कि तुम अपनी ज्योति के अनुसार जीओ। अवसरों से खिलवाड़ मत करो, ऐसा न हो कि वह दिन आए जब तुम उनका उपयोग करना चाहो और कर न सको। देर मत करो, ऐसा न हो कि तुम बुद्धिमान बनो तो बहुत देर हो चुकी हो।

तुम शायद कहो, "मन फिराने में कभी देर नहीं होती।" मैं उत्तर देता हूँ,—यह बात ठीक तो है; परन्तु देर से किया गया मन फिराव बहुत कम सच्चा होता है। और मैं आगे यह भी कहता हूँ कि यदि तुम मन फिराने को टालते रहो, तो तुम निश्चित नहीं हो सकते कि तुम कभी मन फिराओगे भी।

तुम कह सकते हो, "मुझे डरने की क्या आवश्यकता है?—पश्चाताप करनेवाला चोर तो बचा लिया गया।" मैं उत्तर देता हूँ,—"यह सच है; परन्तु उसी वचन को फिर से देखो जो तुम्हें बताता है कि दूसरा चोर खो गया।"

III. इन पदों से जो तीसरी शिक्षा हमें लेनी है वह यह है: पवित्र आत्मा उद्धार पानेवाली आत्माओं को सदा एक ही मार्ग से ले चलता है

यह एक ऐसी बात है जो विशेष ध्यान के योग्य है, और प्रायः इसकी अनदेखी की जाती है। लोग केवल इस मोटी बात को देखते हैं कि पश्चाताप करनेवाला चोर मरते समय बचा लिया गया, और इससे आगे कुछ नहीं देखते।

वे उन प्रमाणों पर विचार नहीं करते जो इस चोर ने अपने पीछे छोड़े। वे इस बात पर ध्यान नहीं देते कि उसने अपने हृदय में पवित्र आत्मा के कार्य के कितने भरपूर प्रमाण दिए। और इन्हीं प्रमाणों को मैं खोलकर दिखाना चाहता हूँ। मैं तुम्हें दिखाना चाहता हूँ कि पवित्र आत्मा सदा एक ही रीति से कार्य करता है, और चाहे वह किसी मनुष्य को एक घण्टे में परिवर्तित कर दे, जैसा उसने पश्चाताप करनेवाले चोर के साथ किया, या धीरे-धीरे, जैसा वह दूसरों के साथ करता है,—जिन चरणों से वह आत्माओं को स्वर्ग तक पहुँचाता है वे सदा एक ही होते हैं।

मैं इसे इस लेख के हर पढ़नेवाले के लिए स्पष्ट करने का यत्न करता हूँ। मैं तुम्हें सावधान करना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि तुम इस प्रचलित धारणा को त्याग दो कि मृत्युशय्या से स्वर्ग तक कोई सरल राजमार्ग है। मैं चाहता हूँ कि तुम भली-भाँति समझ लो कि हर उद्धार पाई हुई आत्मा एक ही अनुभव से होकर निकलती है, और पश्चाताप करनेवाले चोर के धर्म के मूल सिद्धान्त ठीक वही थे जो अब तक जीवित रहे सबसे पुराने सन्त के थे।

(क) तो पहली बात, देखो कि इस मनुष्य का विश्वास कितना दृढ़ था।

उसने यीशु को "प्रभु" कहा। उसने अपना यह विश्वास प्रकट किया कि उसका एक "राज्य" होगा। उसने विश्वास किया कि वह उसे अनन्त जीवन और महिमा देने में समर्थ है, और इसी विश्वास में उसने उससे प्रार्थना की। उसने उस पर लगाए गए सब आरोपों के विरुद्ध उसकी निर्दोषता का समर्थन किया। उसने कहा, "इसने कोई अनुचित काम नहीं किया।" सम्भव है औरों ने भी प्रभु को निर्दोष समझा हो,—परन्तु इस बेचारे मरते हुए मनुष्य के सिवा किसी ने खुलकर यह नहीं कहा।

और यह सब कब हुआ? यह तब हुआ जब सारी जाति मसीह का इन्कार कर चुकी थी,—चिल्ला रही थी, "उसे क्रूस पर चढ़ा, उसे क्रूस पर चढ़ा: कैसर को छोड़ हमारा कोई राजा नहीं,"—जब प्रधान याजकों और फरीसियों ने उसे दोषी ठहराकर "मृत्यु के योग्य" ठहरा दिया था,—जब उसके अपने चेले भी उसे छोड़कर भाग गए थे,—जब वह क्रूस पर निढाल, लहूलुहान और मरता हुआ लटक रहा था, अपराधियों में गिना हुआ और शापित ठहराया हुआ। यही वह घड़ी थी जब चोर ने मसीह पर विश्वास किया और उससे प्रार्थना की! निश्चय ही संसार के आरम्भ से ऐसा विश्वास कभी नहीं देखा गया।*

चेलों ने बड़े-बड़े चिन्ह और आश्चर्यकर्म देखे थे। उन्होंने मरे हुओं को एक वचन से जी उठते देखा था,—कोढ़ियों को एक स्पर्श से चंगा होते,—अन्धों को दृष्टि पाते,—गूँगों को बोलते,—लँगड़ों को चलते। उन्होंने कुछ रोटियों और मछलियों से हज़ारों को खिलाया जाता देखा था। उन्होंने अपने स्वामी को जल पर ऐसे चलते देखा था जैसे सूखी भूमि पर। उन सब ने उसे ऐसा बोलते सुना था जैसा किसी मनुष्य ने कभी नहीं बोला, और आगे आनेवाली अच्छी वस्तुओं की प्रतिज्ञाएँ देते सुना था। उनमें से कुछ ने रूपान्तरण के पर्वत पर उसकी महिमा का पूर्वस्वाद पाया था। निस्सन्देह उनका विश्वास "परमेश्वर का दान" था, फिर भी उन्हें उसे सहारा देनेवाली बहुत सी बातें मिली थीं।

मरते हुए चोर ने ऊपर बताई गई इनमें से कोई बात नहीं देखी। उसने हमारे प्रभु को केवल पीड़ा में, निर्बलता में, दुःख और वेदना में देखा। उसने उसे अपमानजनक दण्ड भोगते देखा; त्यागा हुआ, उपहास किया हुआ, तुच्छ ठहराया हुआ, निन्दित। उसने उसे उसकी अपनी जाति के सब बड़े, बुद्धिमान और कुलीन लोगों द्वारा ठुकराया जाते देखा,—उसका बल ठीकरे की नाईं सूख गया, उसका प्राण अधोलोक के निकट पहुँच रहा था। (भजन संहिता 22:15; 88:3।) उसने न राजदण्ड देखा, न राजमुकुट, न कोई बाहरी प्रभुता, न कोई महिमा, न प्रताप, न सामर्थ्य, न बल के कोई चिन्ह। फिर भी मरते हुए चोर ने विश्वास किया, और मसीह के राज्य की बाट जोही।

क्या तुम जानना चाहते हो कि तुममें पवित्र आत्मा है या नहीं? तो आज मेरे इस प्रश्न पर ध्यान दो।—मसीह में तुम्हारा विश्वास कहाँ है?

(ख) दूसरी बात देखो कि चोर को पाप का कैसा सही बोध था। वह अपने साथी से कहता है, "हम तो अपने कामों का ठीक फल पा रहे हैं।" वह अपनी अधार्मिकता को और अपने दण्ड के न्यायसंगत होने को स्वीकार करता है। वह अपने आप को निर्दोष ठहराने या अपनी दुष्टता का बहाना बनाने का कोई प्रयास नहीं करता। वह उस मनुष्य की नाईं बोलता है जो अपने बीते अधर्म के स्मरण से दीन और नम्र हो गया हो। परमेश्वर की सब सन्तानें यही अनुभव करती हैं। वे यह मानने को तैयार रहती हैं कि वे नरक के योग्य बेचारे पापी हैं। वे अपने हृदय से भी और होठों से भी कह सकती हैं, "हमने वे काम छोड़ दिए जो हमें करने चाहिए थे, और वे काम किए जो हमें नहीं करने चाहिए थे, और हम में कोई स्वास्थ्य नहीं है।"

क्या तुम जानना चाहते हो कि तुममें पवित्र आत्मा है या नहीं? तो मेरे प्रश्न पर ध्यान दो।—क्या तुम अपने पापों को अनुभव करते हो?

(ग) दूसरी बात यह देखिए कि उस चोर ने अपने साथी के प्रति कैसा भ्रातृप्रेम दिखाया। उसने उसकी निन्दा और ईश-निन्दा को रोकने और उसे सुमति पर लाने का प्रयत्न किया। वह कहता है, "क्या तू परमेश्वर से भी नहीं डरता, जब कि तू भी वही दण्ड पा रहा है?" अनुग्रह का इससे अधिक निश्चित चिन्ह और कोई नहीं! अनुग्रह मनुष्य को उसके स्वार्थ से झकझोर देता है, और उसे दूसरों की आत्माओं के लिए चिन्ता करना सिखाता है। जब सामरी स्त्री मन फिराकर विश्वासी बनी, तो वह अपना घड़ा छोड़कर नगर को दौड़ी गई, और कहने लगी, "आओ, एक मनुष्य को देखो, जिस ने मुझे सब कुछ जो मैं ने किया था, बता दिया: कहीं यह तो मसीह नहीं है?" (यूहन्ना 4:28, 29)। जब शाऊल का मन फिरा, तो तुरन्त वह दमिश्क के आराधनालय में गया और अपने इस्राएली भाइयों के सामने गवाही दी कि "वह परमेश्वर का पुत्र है।" (प्रेरितों के काम 9:20)।

क्या आप जानना चाहते हैं कि आप में आत्मा है या नहीं? तो बताइए, आत्माओं के लिए आपका प्रेम और करुणा कहाँ है?

एक शब्द में कहें, तो पश्चात्तापी चोर में आप पवित्र आत्मा का सिद्ध किया हुआ कार्य देखते हैं। विश्वासी के चरित्र का प्रत्येक अंश उसमें पाया जा सकता है। मन फिराने के बाद उसका जीवन चाहे कितना ही छोटा रहा, फिर भी उसे इस बात के भरपूर प्रमाण छोड़ने का समय मिला कि वह परमेश्वर की सन्तान था। उसका विश्वास, उसकी प्रार्थना, उसकी दीनता, उसका भ्रातृप्रेम, ये सब उसके मन फिराव की सच्चाई के अचूक साक्षी हैं। वह केवल नाम का पश्चात्तापी नहीं था, वरन् कर्म और सच्चाई में पश्चात्तापी था।

इसलिए कोई यह न सोचे कि पश्चात्तापी चोर का उद्धार हो गया, तो मनुष्य आत्मा के कार्य का कोई प्रमाण छोड़े बिना भी उद्धार पा सकते हैं। ऐसा मनुष्य भली-भाँति विचार करे कि इस मनुष्य ने कैसे प्रमाण छोड़े, और सावधान हो जाए।

लोग कभी-कभी जिन्हें वे मृत्यु-शय्या के प्रमाण कहते हैं, उनके विषय में जो कहते हैं, उसे सुनकर दुःख होता है। यह देखकर सचमुच भय लगता है कि कुछ लोग कितनी थोड़ी बात से सन्तुष्ट हो जाते हैं, और अपने आप को कितनी सरलता से समझा लेते हैं कि उनके प्रियजन स्वर्ग पहुँच गए। जब उनका कोई सम्बन्धी मर जाता है, तब वे आपको बताएँगे कि "उसने एक दिन कितनी सुन्दर प्रार्थना की थी,—या वह कितनी अच्छी तरह बातें करता था—या वह अपने पुराने चाल-चलन पर कितना पछताता था, और कहता था कि यदि वह अच्छा हो गया तो बिलकुल भिन्न जीवन बिताएगा,—या उसे इस संसार की किसी वस्तु की चाह नहीं थी,—या वह चाहता था कि लोग उसे पढ़कर सुनाएँ और उसके साथ प्रार्थना करें।" और इतना आधार पाकर उन्हें यह सुखद आशा हो जाती है कि वह उद्धार पा गया! हो सकता है मसीह का नाम तक न लिया गया हो,—उद्धार के मार्ग की चर्चा तक न हुई हो। पर इससे क्या; थोड़ी-सी धर्म की बात तो हुई, बस इसी से वे सन्तुष्ट हैं!

अब इस लेख के किसी पाठक की भावनाओं को ठेस पहुँचाना मेरी इच्छा नहीं है, पर इस विषय पर मुझे स्पष्ट बोलना ही होगा, और मैं बोलूँगा।

मैं एक बार स्पष्ट कह दूँ कि साधारण नियम के रूप में, मृत्यु-शय्या के प्रमाणों जितना असन्तोषजनक और कुछ नहीं है। बीमार और भयभीत होने पर मनुष्य जो बातें कहते हैं और जो भावनाएँ प्रकट करते हैं, उन पर बहुत भरोसा नहीं किया जा सकता। प्रायः, बहुत बार, वे भय का परिणाम होती हैं और हृदय की गहराई से नहीं निकलतीं। प्रायः, बहुत बार, वे रटी-रटाई बातें होती हैं, जो सेवकों और चिन्तित मित्रों के मुँह से सुनकर पकड़ ली गई हैं, पर जिन्हें स्पष्टतः अनुभव नहीं किया गया। और यह बात इस सुविदित तथ्य से अधिक स्पष्ट और किसी बात से सिद्ध नहीं हो सकती कि अधिकतर लोग, जो रोग-शय्या पर सुधरने की प्रतिज्ञा करते हैं और पहली बार धर्म की चर्चा करते हैं, वे यदि चंगे हो जाएँ तो फिर पाप और संसार की ओर लौट जाते हैं।

जब किसी मनुष्य ने अपना जीवन असावधानी और मूर्खता में बिताया हो, तो उसकी मृत्यु-शय्या पर उसकी आत्मा के विषय में मुझे सन्तुष्ट करने के लिए कुछ अच्छे शब्दों और शुभ कामनाओं से अधिक कुछ चाहिए। मेरे लिए इतना काफ़ी नहीं कि वह मुझे अपने पास बाइबल पढ़ने दे और अपनी शय्या के पास प्रार्थना करने दे,—या वह कहे, "मैंने धर्म के विषय में उतना नहीं सोचा जितना सोचना चाहिए था, और यदि मैं अच्छा हो गया तो मैं एक भिन्न मनुष्य बनूँगा।" यह सब मुझे सन्तुष्ट नहीं करता; इससे उसकी दशा के विषय में मुझे आनन्द नहीं मिलता। जहाँ तक यह जाता है, ठीक है, पर यह मन फिराव नहीं है। अपने ढंग से ठीक है, पर यह मसीह में विश्वास नहीं है। जब तक मैं मन फिराव और मसीह में विश्वास न देखूँ, मैं सन्तुष्ट नहीं हो सकता और न होने का साहस कर सकता हूँ। दूसरे चाहें तो सन्तुष्ट हो जाएँ, और अपने मित्र की मृत्यु के बाद कहें कि उन्हें आशा है कि वह स्वर्ग गया है। मैं तो मुँह बन्द रखना और कुछ न कहना अधिक अच्छा समझूँगा। मरणासन्न मनुष्य में चाहे राई के दाने के बराबर ही सही, मन फिराव और विश्वास का अल्पतम अंश भी हो, तो मैं सन्तुष्ट हो जाऊँगा। पर मन फिराव और विश्वास से कम किसी बात से सन्तुष्ट हो जाना मुझे अविश्वास के लगभग बराबर प्रतीत होता है।

आप अपनी आत्मा की दशा के विषय में कैसा प्रमाण छोड़ जाना चाहते हैं? पश्चात्तापी चोर का उदाहरण लीजिए, तो आप भला करेंगे।

जब हम आपको आपकी सँकरी शय्या तक पहुँचा दें, तब यह प्रमाणित करने के लिए कि आप सच्चे विश्वासी थे, हमें बिखरे हुए शब्द और धर्म के टुकड़े न खोजने पड़ें। हमें हिचकिचाते हुए एक दूसरे से यह न कहना पड़े, "मुझे आशा है कि वह सुखी है; एक दिन वह कितना अच्छा बोला था; और एक और अवसर पर बाइबल के एक अध्याय से वह कितना प्रसन्न दिखाई दिया; और उसे अमुक व्यक्ति पसन्द था, जो भला मनुष्य है।" हम आपकी दशा के विषय में निश्चय के साथ बोल सकें। आपके मन फिराव, विश्वास और पवित्रता का हमारे पास कोई ठोस प्रमाण हो, ताकि कोई क्षण भर भी आपकी दशा पर सन्देह न कर सके। निश्चय जानिए, इसके बिना आपके पीछे छूटे हुए लोग आपकी आत्मा के विषय में कोई ठोस सान्त्वना नहीं पा सकते। आपके दफ़न के समय हम धर्म की रीति पूरी कर सकते हैं और उदार आशाएँ प्रकट कर सकते हैं। हम कब्रिस्तान के फाटक पर आपसे मिलकर कह सकते हैं, "धन्य हैं वे जो प्रभु में मरते हैं।" पर इससे आपकी दशा नहीं बदलेगी! यदि आप परमेश्वर की ओर मन फिराए बिना,—मन फिराव के बिना, और विश्वास के बिना,—मर गए, तो आपका अन्तिम संस्कार केवल एक खोई हुई आत्मा का अन्तिम संस्कार होगा; तब आपके लिए अच्छा होता कि आप कभी जन्मे ही न होते।

IV. इसके आगे, इन पदों से हमें यह सीखना है कि मसीह के विश्वासी जब मरते हैं तो प्रभु के साथ होते हैं।

यह आप हमारे प्रभु के उन शब्दों से जान सकते हैं जो उसने पश्चात्तापी चोर से कहे: "आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा।" और फिलिप्पियों की पत्री में भी इसी से मिलता-जुलता एक वाक्य है, जहाँ पौलुस कहता है कि उसकी लालसा है कि "कूच करके मसीह के साथ रहूँ।" (फिलिप्पियों 1:23)।

इस विषय पर मैं बहुत कम कहूँगा। मैं इसे केवल आपके निजी मनन के लिए आपके सामने रखना चाहता हूँ। मेरे अपने मन में तो यह सान्त्वना और शान्ति से भरा हुआ है।

मृत्यु के बाद विश्वासी "मसीह के साथ" होते हैं। यह बात उन अनेक कठिन प्रश्नों का उत्तर देती है जो अन्यथा मनुष्य के व्यस्त और बेचैन मन को उलझाए रखते। मरे हुए पवित्र लोगों का निवासस्थान, उनके आनन्द, उनकी अनुभूतियाँ, उनकी प्रसन्नता — सब कुछ इस एक सरल कथन में समा जाता है — वे "मसीह के साथ" हैं।

मैं दिवंगत विश्वासियों की पृथक् अवस्था के विषय में पूरी व्याख्या नहीं कर सकता। यह एक ऊँचा और गहरा विषय है, जिसे मनुष्य का मन न तो समझ सकता है और न उसकी थाह ले सकता है। मैं जानता हूँ कि उनकी प्रसन्नता उस प्रसन्नता से कम है जो तब होगी जब अन्तिम दिन पुनरुत्थान में उनकी देह फिर जी उठेगी और यीशु पृथ्वी पर लौटेगा। फिर भी मैं यह भी जानता हूँ कि वे धन्य विश्राम का आनन्द ले रहे हैं — परिश्रम से विश्राम, शोक से विश्राम, पीड़ा से विश्राम, और पाप से विश्राम। परन्तु इसलिए कि मैं इन बातों की व्याख्या नहीं कर सकता, यह नहीं कि मुझे इसका निश्चय न हो कि वे पृथ्वी पर कभी जितने सुखी थे उससे कहीं अधिक सुखी हैं। मैं उनकी प्रसन्नता इसी वचन में देखता हूँ, "वे मसीह के साथ हैं," और जब मैं यह देख लेता हूँ तो इतना ही मेरे लिए बहुत है।

यदि भेड़ें चरवाहे के साथ हैं — यदि अंग सिर के साथ हैं — यदि मसीह के परिवार की सन्तान उसके साथ हैं जिसने उनसे प्रेम किया और पृथ्वी पर उनकी तीर्थयात्रा के सब दिनों में उन्हें उठाए रखा, तो सब कुछ कुशल है, सब कुछ ठीक है।

मैं यह वर्णन नहीं कर सकता कि स्वर्गलोक कैसा स्थान है, क्योंकि मैं देह से अलग हुई आत्मा की दशा को समझ नहीं सकता। परन्तु स्वर्गलोक का इससे अधिक उज्ज्वल चित्र मैं नहीं माँगता कि मसीह वहाँ है।* मृत्यु और पुनरुत्थान के बीच की अवस्था का जो चित्र कल्पना खींचती है, उसकी अन्य सब बातें इसकी तुलना में कुछ भी नहीं हैं।

वह वहाँ कैसे है, और किस रीति से है, यह मैं नहीं जानता। जब मृत्यु में मेरी आँखें बन्द हों तब मैं केवल स्वर्गलोक में मसीह को देख सकूँ, मेरे लिए यही बहुत है। भजनकार ने ठीक ही कहा है, "तेरे निकट आनन्द की भरपूरी है।" (भजन संहिता 16:11।) एक मरती हुई लड़की की यह बात सच्ची थी, जब उसकी माता ने स्वर्गलोक का वर्णन करके उसे ढाढ़स देना चाहा। माता ने बच्ची से कहा, "वहाँ तुझे न कोई पीड़ा होगी, न कोई रोग; वहाँ तू अपने उन भाई-बहनों को देखेगी जो तुझसे पहले चले गए हैं, और सदा प्रसन्न रहेगी।" उत्तर मिला, "आह, माँ! पर एक बात इन सब से उत्तम है, और वह यह कि वहाँ मसीह होगा।"

हो सकता है कि तुम अपनी आत्मा के विषय में अधिक नहीं सोचते। हो सकता है कि तुम अपने उद्धारकर्ता के रूप में मसीह को कम जानते हो, और अनुभव से कभी नहीं चखा कि वह कैसा अनमोल है। फिर भी शायद तुम आशा रखते हो कि मरने पर स्वर्गलोक जाओगे। निश्चय ही यह वचन ऐसा है जो तुम्हें सोचने पर विवश करे। स्वर्गलोक वह स्थान है जहाँ मसीह है। तो क्या वह ऐसा स्थान हो सकता है जिसका आनन्द तुम ले सको?

हो सकता है कि तुम विश्वासी हो, फिर भी कब्र के विचार से काँपते हो। वह तुम्हें ठंडी और उदास लगती है। तुम्हें ऐसा लगता है मानो तुम्हारे आगे सब अन्धकारमय, धुँधला और सान्त्वनाहीन है। मत डरो, इस पद से हियाव बाँधो। तुम स्वर्गलोक जा रहे हो, और मसीह वहाँ होगा।

5. इन पदों से जो अन्तिम बात हमें सीखनी है वह यह है: हर मनुष्य की आत्मा का अनन्त भाग उसके अत्यन्त निकट है

हमारा प्रभु पश्चातापी चोर से कहता है, "आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा।" वह किसी दूर के समय का नाम नहीं लेता; वह अपने सुख की अवस्था में प्रवेश करने को कोई "दूर की" बात नहीं कहता, वह "आज" की बात करता है — "इसी दिन जब तू क्रूस पर लटका है।"

यह कितना निकट लगता है! यह वचन हमारे सनातन निवासस्थान को कितना भयानक रूप से निकट ले आता है! सुख या दुःख, शोक या आनन्द, मसीह की उपस्थिति या दुष्टात्माओं की संगति — सब हमारे निकट हैं। दाऊद कहता है, "मेरे और मृत्यु के बीच बस एक कदम का अन्तर है।" (1 शमूएल 20:3।) हम कह सकते हैं कि हमारे और स्वर्गलोक या नरक के बीच भी बस एक कदम का अन्तर है।

हम में से कोई भी इसे वैसा नहीं समझता जैसा समझना चाहिए। अब समय आ गया है कि हम इस विषय में अपनी स्वप्निल मानसिक दशा को झटक दें जिसमें हम जी रहे हैं। हम विश्वासियों के विषय में भी ऐसा कहने और सोचने लगते हैं मानो मृत्यु कोई लम्बी यात्रा हो — मानो मरता हुआ पवित्र जन किसी लम्बी समुद्र-यात्रा पर निकल पड़ा हो। यह सब गलत है, बिलकुल गलत! उनका बन्दरगाह और उनका घर पास ही है, और वे उसमें प्रवेश कर चुके हैं।

हम में से कुछ लोग कड़वे अनुभव से जानते हैं कि अपने प्रियजनों की मृत्यु और उस घड़ी के बीच, जब हम उन्हें अपनी आँखों से ओझल करके मिट्टी देते हैं, कितना लम्बा और थका देनेवाला समय होता है। ऐसे सप्ताह हमारे सारे जीवन के सबसे धीमे, सबसे उदास और सबसे भारी सप्ताह होते हैं। परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो, कि दिवंगत पवित्र लोगों की आत्माएँ अपनी अन्तिम साँस लेने के क्षण से ही स्वतन्त्र हो जाती हैं। जब हम रो रहे होते हैं, और ताबूत तैयार हो रहा होता है, और शोक के वस्त्र जुटाए जा रहे होते हैं, और अन्तिम कष्टदायक प्रबन्ध किए जा रहे होते हैं, तब हमारे प्रियजनों की आत्माएँ मसीह की उपस्थिति का आनन्द ले रही होती हैं। वे शरीर के बोझ से सदा के लिए छूट गए हैं। वे वहाँ हैं "जहाँ दुष्ट लोग फिर दुःख नहीं देते, और थके-माँदे विश्राम पाते हैं।" (अय्यूब 3:17।)

जिस क्षण विश्वासी मरते हैं, वे उसी क्षण स्वर्गलोक में होते हैं। उनकी लड़ाई लड़ी जा चुकी: उनका संघर्ष समाप्त हो गया। वे उस उदास तराई से होकर निकल चुके जिस पर हमें एक दिन चलना है; वे उस अँधेरी नदी के पार जा चुके जिसे हमें एक दिन पार करना है। उन्होंने वह अन्तिम कड़वा कटोरा पी लिया जो पाप ने मनुष्य के लिए तैयार किया है: वे उस स्थान पर पहुँच गए हैं जहाँ शोक और आहें नहीं रहतीं। निश्चय ही हमें उन्हें लौटा लाने की इच्छा नहीं करनी चाहिए! हमें उनके लिए नहीं, अपने लिए रोना चाहिए।

हम अब भी युद्ध कर रहे हैं, परन्तु वे शान्ति में हैं। हम परिश्रम कर रहे हैं, परन्तु वे विश्राम में हैं। हम चौकसी कर रहे हैं, परन्तु वे सो रहे हैं। हम अपना आत्मिक कवच पहने हुए हैं, परन्तु उन्होंने उसे सदा के लिए उतार दिया है। हम अब भी समुद्र में हैं, परन्तु वे बन्दरगाह में सुरक्षित हैं। हमारे पास आँसू हैं, परन्तु उनके पास आनन्द है। हम परदेशी और यात्री हैं, परन्तु वे तो घर पर हैं। निश्चय ही मसीह में मरे हुए लोग जीवितों से उत्तम हैं! निश्चय ही जिस घड़ी वह दीन पवित्र जन मरता है, उसी घड़ी वह पृथ्वी के सबसे ऊँचे जन से भी ऊँचा और अधिक सुखी हो जाता है।*

मुझे भय है कि इस विषय में बहुत बड़ा भ्रम फैला हुआ है। मुझे भय है कि बहुत से लोग, जो रोमी कैथोलिक नहीं हैं और शुद्धिकरण-स्थान (पर्गेटरी) में विश्वास न करने का दावा करते हैं, फिर भी अपने मन में मृत्यु के तात्कालिक परिणामों के विषय में कुछ विचित्र धारणाएँ रखते हैं।

मुझे भय है कि बहुतों के मन में एक अस्पष्ट-सी धारणा है कि मृत्यु और उनकी अनन्त दशा के बीच कोई अन्तराल या कुछ समय है। वे कल्पना करते हैं कि उन्हें एक प्रकार के शुद्ध करनेवाले परिवर्तन से होकर जाना पड़ेगा, और यद्यपि वे स्वर्ग के अयोग्य मरते हैं, तौभी अन्त में वे उसके योग्य ठहरेंगे!

परन्तु यह पूरी तरह भूल है। मृत्यु के पश्चात् कोई परिवर्तन नहीं होता; कब्र में कोई मन-फिराव नहीं होता; अन्तिम साँस लेने के बाद कोई नया मन नहीं दिया जाता। जिस दिन हम यहाँ से जाते हैं, उसी दिन हम सदा के लिए प्रस्थान करते हैं; जिस दिन हम इस संसार से जाते हैं, उसी दिन से हमारी अनन्त दशा आरम्भ हो जाती है। उस दिन से कोई आत्मिक बदलाव नहीं होता, कोई आत्मिक परिवर्तन नहीं होता। जैसे हम मरते हैं, वैसे ही मृत्यु के बाद हमें अपना भाग मिलेगा; जैसे वृक्ष गिरता है, वैसे ही उसे पड़ा रहना होगा।

यदि तू अपरिवर्तित मनुष्य है, तो यह बात तुझे सोचने पर विवश करे। क्या तू जानता है कि तू नरक के निकट है? आज ही तू मर सकता है; और यदि तू मसीह से बाहर मरा, तो तेरी आँखें तुरन्त नरक में, और पीड़ा में खुलेंगी।

यदि तू सच्चा मसीही है, तो तू स्वर्ग के उससे कहीं अधिक निकट है जितना तू समझता है। यदि आज ही प्रभु तुझे ले जाए, तो तू अपने आपको स्वर्गलोक में पाएगा। प्रतिज्ञा का वह उत्तम देश तेरे निकट है। जिन आँखों को तूने दुर्बलता और पीड़ा में बन्द किया था, वे तुरन्त एक ऐसे महिमामय विश्राम में खुलेंगी जिसका वर्णन मेरी जीभ नहीं कर सकती।

और अब समाप्ति में मैं कुछ शब्द कहूँगा, और फिर बात पूरी करूँगा।

(1) यह लेख किसी दीन-हृदय और पछतानेवाले पापी के हाथ में पड़ सकता है। क्या तू वही मनुष्य है? तो तेरे लिए यहाँ प्रोत्साहन है। देख कि पश्चात्तापी चोर ने क्या किया, और वैसा ही तू भी कर। देख कि उसने कैसे प्रार्थना की; देख कि उसने कैसे प्रभु यीशु मसीह को पुकारा; देख कि उसे शान्ति का कैसा उत्तर मिला। हे भाई या बहन, तू भी वैसा ही क्यों न करे? तेरा भी उद्धार क्यों न हो?

(2) यह लेख संसार के किसी घमण्डी और ढीठ मनुष्य के हाथ में पड़ सकता है। क्या तू वही मनुष्य है? तो चेतावनी ले। देख कि पश्चात्ताप न करनेवाला चोर जैसा जिया वैसा ही मरा, और सावधान रह कि तेरा भी वैसा ही अन्त न हो। हे भटके हुए भाई या बहन, अत्यधिक आत्मविश्वासी न हो, ऐसा न हो कि तू अपने पापों में मरे! जब तक प्रभु मिल सकता है तब तक उसे ढूँढ़। फिर, फिर; तू क्यों मरे?

(3) यह लेख मसीह में विश्वास का अंगीकार करनेवाले किसी जन के हाथ में पड़ सकता है। क्या तू ऐसा ही है? तो पश्चात्तापी चोर के धर्म को पैमाना बनाकर अपने धर्म को परख। देख कि तू सच्चे मन फिराव और उद्धार देनेवाले विश्वास, सच्ची नम्रता और उत्साही प्रेम के विषय में कुछ जानता है या नहीं। हे भाई या बहन, मसीही जीवन के विषय में संसार के मापदण्ड से सन्तुष्ट न हो। पश्चात्तापी चोर के समान मन रख, तो तू बुद्धिमान ठहरेगा।

(4) यह लेख किसी ऐसे जन के हाथ में पड़ सकता है जो दिवंगत विश्वासियों के लिए शोक कर रहा है। क्या तू ऐसा ही है? तो इस पवित्रशास्त्र से सान्त्वना ले। देख कि तेरे प्रियजन सर्वोत्तम हाथों में हैं। उनकी दशा इससे अच्छी नहीं हो सकती। अपने जीवन में वे कभी इतने भले न थे जितने अब हैं। वे यीशु के साथ हैं, जिससे उनके प्राण पृथ्वी पर प्रेम करते थे। हे, अपना स्वार्थी शोक छोड़ दे! आनन्द कर कि वे कष्ट से छूट गए और विश्राम में प्रवेश कर चुके हैं।

(5) और यह लेख मसीह के किसी वृद्ध सेवक के हाथ में पड़ सकता है। क्या तू ऐसा ही है? तो इन वचनों से देख कि तू घर के कितने निकट है। तेरा उद्धार उस समय से अधिक निकट है जब तूने पहले विश्वास किया था। परिश्रम और दुःख के कुछ दिन और, तब राजाओं का राजा तुझे बुला भेजेगा; और क्षण भर में तेरा युद्ध समाप्त हो जाएगा, और सब कुछ शान्ति होगा।

12. लहरों का स्वामी

"तब बड़ी आँधी आई, और लहरें नाव पर यहाँ तक लगीं कि वह पानी से भरी जाती थी।"

"और वह आप पिछले भाग में तकिये पर सो रहा था; तब उन्होंने उसे जगाकर उससे कहा, हे गुरु, क्या तुझे चिन्ता नहीं कि हम नाश हुए जाते हैं?"

"तब उसने उठकर आँधी को डाँटा, और पानी से कहा, शान्त रह, थम जा। और आँधी थम गई और बड़ा चैन हो गया।"

"और उसने उनसे कहा, तुम क्यों डरते हो? क्या तुम्हें अब तक विश्वास नहीं?"—मरकुस 4:37–40।

अच्छा होता यदि आज के मसीही कहलानेवाले लोग चारों सुसमाचारों का अध्ययन उससे अधिक करते जितना वे करते हैं। निस्सन्देह सारा पवित्रशास्त्र लाभदायक है। बाइबल के एक भाग को दूसरे की हानि पर ऊँचा ठहराना बुद्धिमानी नहीं है। परन्तु मेरा विचार है कि जो पत्रियों से बहुत परिचित हैं, उनके लिए यह भला होगा कि वे मत्ती, मरकुस, लूका और यूहन्ना के विषय में कुछ और जानें।

अब मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? मैं यह इसलिए कहता हूँ कि मैं चाहता हूँ कि मसीही कहलानेवाले लोग मसीह के विषय में अधिक जानें। मसीही धर्म के सब सिद्धान्तों और नियमों से परिचित होना अच्छा है। स्वयं मसीह से परिचित होना उससे भी अच्छा है। विश्वास, अनुग्रह, धर्मी ठहराया जाना और पवित्रीकरण से परिचित होना अच्छा है। ये सब "राजा से सम्बन्ध रखनेवाली" बातें हैं। परन्तु स्वयं यीशु से परिचित होना, राजा का मुख देखना और उसकी सुन्दरता को निहारना कहीं अधिक उत्तम है। यही उत्कृष्ट पवित्रता का एक रहस्य है। जो मसीह के स्वरूप में ढलना और मसीह-समान मनुष्य बनना चाहता है, उसे निरन्तर स्वयं मसीह का अध्ययन करते रहना चाहिए।

अब सुसमाचार इसलिए लिखे गए कि हम मसीह से परिचित हों। पवित्र आत्मा ने हमें उसके जीवन और मृत्यु की, उसकी बातों और उसके कामों की कथा चार बार सुनाई है। चार भिन्न प्रेरित हाथों ने उद्धारकर्ता का चित्र खींचा है। उसके चाल-चलन, उसके व्यवहार, उसकी भावनाएँ, उसकी बुद्धि, उसका अनुग्रह, उसका धीरज, उसका प्रेम, उसकी सामर्थ्य हमारे सामने चार भिन्न साक्षियों के द्वारा कृपापूर्वक खोले गए हैं। क्या भेड़ों को चरवाहे से परिचित नहीं होना चाहिए? क्या रोगी को वैद्य से परिचित नहीं होना चाहिए? क्या दुल्हिन को दूल्हे से परिचित नहीं होना चाहिए? क्या पापी को उद्धारकर्ता से परिचित नहीं होना चाहिए? निस्सन्देह ऐसा ही होना चाहिए। सुसमाचार इसलिए लिखे गए कि मनुष्य मसीह से परिचित हों, और इसीलिए मैं चाहता हूँ कि मनुष्य सुसमाचारों का अध्ययन करें।

यदि हम परमेश्वर के यहाँ ग्रहणयोग्य ठहरना चाहते हैं तो अपनी आत्माओं को किस पर बनाएँ? हमें चट्टान, मसीह पर बनाना चाहिए। फलवन्त होने के लिए हमें प्रतिदिन जिस आत्मा के अनुग्रह की आवश्यकता है, उसे हम किससे प्राप्त करें? हमें दाखलता, मसीह से प्राप्त करना चाहिए। जब सांसारिक मित्र हमें त्याग दें या मर जाएँ, तब सहानुभूति के लिए हम किसकी ओर देखें? हमें अपने बड़े भाई, मसीह की ओर देखना चाहिए। यदि हमारी प्रार्थनाएँ ऊपर सुनी जानी हैं तो उन्हें कौन प्रस्तुत करे? उन्हें हमारे अधिवक्ता, मसीह को प्रस्तुत करना चाहिए। हम हज़ार वर्ष की महिमा और उसके बाद की अनन्तता किसके साथ बिताने की आशा रखते हैं? राजाओं के राजा, मसीह के साथ। निश्चय ही हम इस मसीह को बहुत अधिक नहीं जान सकते! निश्चय ही उसके जीवन के विवरण में कोई शब्द, कोई कर्म, कोई दिन, कोई कदम या कोई विचार ऐसा नहीं जो हमारे लिए बहुमूल्य न होना चाहिए। हमें यीशु के विषय में लिखी हुई एक-एक पंक्ति से परिचित होने का परिश्रम करना चाहिए।

आओ, अब हम अपने स्वामी के इतिहास का एक पृष्ठ पढ़ें। आओ, विचार करें कि इस लेख के आरम्भ में दिए गए पवित्रशास्त्र के पदों से हम क्या सीख सकते हैं। वहाँ तुम यीशु को अपने चेलों के साथ नाव में गलील की झील पार करते हुए देखते हो। तुम देखते हो कि जब वह सो रहा है, तभी अचानक आँधी उठती है। लहरें नाव में थपेड़े मारती हैं और उसे भर देती हैं। मृत्यु निकट दिखाई देती है। भयभीत चेले अपने स्वामी को जगाते हैं और सहायता के लिए पुकारते हैं। वह उठता है और आँधी और लहरों को डाँटता है, और तुरन्त सन्नाटा छा जाता है। वह अपने साथियों के विश्वासहीन भय को कोमलता से झिड़कता है, और सब कुछ समाप्त हो जाता है। यह चित्र ऐसा है जिसमें गहरी शिक्षा भरी है। आओ, अब देखें कि हमें इससे क्या सीखना है।

I. सबसे पहले हम यह सीखें कि मसीह के पीछे चलने से हमारे सांसारिक दुःख और क्लेश नहीं रुक जाते

यहाँ प्रभु यीशु के चुने हुए चेले बड़ी चिन्ता में हैं। वह विश्वासी छोटा झुण्ड, जिसने तब विश्वास किया जब याजक, शास्त्री और फरीसी सब अविश्वासी थे, चरवाहे की ओर से बहुत व्याकुल होने दिया गया है। मृत्यु का भय किसी शस्त्रधारी मनुष्य के समान उन पर टूट पड़ता है। गहरा जल उनकी आत्माओं के ऊपर से बह जाने को है। पतरस, याकूब और यूहन्ना, जो संसार में स्थापित होनेवाली कलीसिया के खम्भे थे, बहुत संकट में हैं।

सम्भव है उन्होंने इन सब बातों का हिसाब न लगाया हो। सम्भव है उन्होंने सोचा हो कि मसीह की सेवा कम से कम उन्हें सांसारिक क्लेशों की पहुँच से ऊपर उठा देगी। सम्भव है वे समझते हों कि जो मरे हुओं को जिला सकता है, रोगियों को चंगा कर सकता है, थोड़ी रोटियों से भीड़ को खिला सकता है और एक वचन से दुष्टात्माओं को निकाल सकता है, वह अपने सेवकों को पृथ्वी पर कभी दुःख भोगने न देगा। सम्भव है उन्होंने मान लिया हो कि वह उन्हें सदा सुगम यात्रा, अच्छा मौसम, सरल मार्ग और चिन्ता तथा कष्ट से मुक्ति देगा।

यदि चेलों ने ऐसा सोचा, तो वे बहुत भूल में थे। प्रभु यीशु ने उन्हें सिखाया कि मनुष्य उसके चुने हुए सेवकों में से एक होकर भी अनेक चिन्ताओं से होकर निकल सकता है और अनेक पीड़ाएँ सह सकता है।

इसे भली-भाँति समझ लेना अच्छा है। यह समझ लेना अच्छा है कि मसीह की सेवा ने कभी किसी मनुष्य को शरीर के सब कष्टों से नहीं बचाया, और न कभी बचाएगी। यदि तुम विश्वासी हो, तो जब तक देह में हो, तुम्हें अपने हिस्से की बीमारी और पीड़ा, शोक और आँसू, हानि और क्रूस, मृत्यु और वियोग, बिछोह और जुदाई, खीझ और निराशा की आशा रखनी चाहिए। मसीह यह कभी नहीं ठहराता कि तुम इनके बिना स्वर्ग पहुँचो। उसने यह तो ठहराया है कि जो उसके पास आएँ उन्हें जीवन और भक्ति से सम्बन्ध रखनेवाली सब वस्तुएँ मिलेंगी; परन्तु उसने कभी यह नहीं ठहराया कि वह उन्हें समृद्ध, धनी या स्वस्थ बनाएगा, और उनके परिवार में मृत्यु और शोक कभी न आएगा।

मुझे यह सौभाग्य प्राप्त है कि मैं मसीह के राजदूतों में से एक हूँ। उसके नाम से मैं किसी भी पुरुष, स्त्री या बालक को, जो उसे लेना चाहे, अनन्त जीवन दे सकता हूँ। उसके नाम से मैं आदम के प्रत्येक पुत्र या पुत्री को, जो यह लेख पढ़ता है, क्षमा, शान्ति, अनुग्रह और महिमा देता हूँ। परन्तु मैं उस व्यक्ति को सांसारिक समृद्धि सुसमाचार का अंश और भाग बनाकर नहीं दे सकता। मैं उसे दीर्घायु, बढ़ी हुई आय और पीड़ा से मुक्ति देने का साहस नहीं करता। जो मनुष्य क्रूस उठाकर मसीह के पीछे चलता है, उससे मैं यह प्रतिज्ञा करने का साहस नहीं करता कि उस चलने में उसे कभी आँधी का सामना न करना पड़ेगा।

मैं भली-भाँति जानता हूँ कि बहुत से लोगों को ये शर्तें अच्छी नहीं लगतीं। वे मसीह और अच्छा स्वास्थ्य चाहेंगे, मसीह और बहुत सा धन, मसीह और अपने परिवार में कोई मृत्यु नहीं, मसीह और कोई थका देनेवाली चिन्ता नहीं, मसीह और बिना बादलों का सदा बना रहनेवाला प्रभात। परन्तु उन्हें मसीह और क्रूस, मसीह और क्लेश, मसीह और संघर्ष, मसीह और गरजती हवा, मसीह और आँधी अच्छे नहीं लगते।

क्या इस लेख के पाठकों में से किसी के मन का गुप्त विचार यही है? मेरा विश्वास करो, यदि है, तो तुम बहुत भूल में हो। मेरी बात सुनो, और मैं तुम्हें दिखाने का प्रयत्न करूँगा कि तुम्हें अभी बहुत कुछ सीखना है।

यदि मसीह के पीछे चलना क्लेश से मुक्त होने का मार्ग होता, तो तुम कैसे जानते कि सच्चे मसीही कौन हैं? यदि परीक्षा का फटकना न होता, तो हम गेहूँ को भूसे से कैसे पहचानते? यदि उसकी सेवा स्वाभाविक रूप से स्वास्थ्य और धन साथ लाती, तो हम कैसे जानते कि मनुष्य मसीह की सेवा उसी के लिए करते हैं या स्वार्थ के कारण? जाड़े की हवाएँ शीघ्र ही हमें दिखा देती हैं कि कौन से वृक्ष सदाबहार हैं और कौन से नहीं। दुःख और चिन्ता की आँधियाँ भी इसी प्रकार लाभदायक हैं। वे प्रकट कर देती हैं कि किसका विश्वास सच्चा है, और किसका केवल दिखावा और रीति मात्र है।

यदि मनुष्य पर कोई परीक्षा न आए तो उसमें पवित्रीकरण का महान कार्य कैसे आगे बढ़ेगा? क्लेश प्रायः वही एकमात्र आग है जो हमारे हृदयों में चिपके मैल को जला देती है। क्लेश वह छँटाई की छुरी है जिसे महान किसान हमें भले कर्मों में फलवन्त बनाने के लिए काम में लाता है।

प्रभु के खेत की फसल केवल धूप से कदाचित् ही पकती है। उसे हवा, वर्षा और आँधी के दिनों से भी होकर निकलना पड़ता है।

यदि तुम मसीह की सेवा करना और उद्धार पाना चाहते हो, तो मैं तुमसे विनती करता हूँ कि प्रभु को उसी की शर्तों पर स्वीकार करो। अपने मन में ठान लो कि तुम्हें अपने हिस्से के क्रूस और दुःख मिलेंगे, तब तुम्हें आश्चर्य न होगा। इसे न समझने के कारण बहुत से लोग कुछ समय तक भली-भाँति दौड़ते दिखाई देते हैं, फिर घृणा से पीछे हट जाते हैं और त्याग दिए जाते हैं।

यदि तुम परमेश्वर की सन्तान होने का दावा करते हो, तो प्रभु यीशु को अपने ढंग से तुम्हें पवित्र करने दो। इसी में सन्तुष्ट रहो कि वह कभी कोई भूल नहीं करता। निश्चय जानो कि वह सब कुछ भली रीति से करता है। हवाएँ तुम्हारे चारों ओर गरजें और जल उफनें, तो भी मत डरो, "वह तुम्हें सीधे मार्ग से ले चल रहा है, ताकि तुम्हें बसे हुए नगर में पहुँचाए।" (भजन संहिता 107:7)।

II. दूसरी बात हम यह सीखें कि प्रभु यीशु मसीह सचमुच और यथार्थ में मनुष्य है

इस छोटे से वृत्तान्त में ऐसे शब्द आए हैं जो सुसमाचारों के अनेक अन्य अंशों के समान इस सत्य को बहुत प्रभावशाली रीति से प्रकट करते हैं। हमें बताया गया है कि जब लहरें नाव पर टकराने लगीं, तब यीशु पिछले भाग में "तकिये पर सो रहा था।" वह थका हुआ था; और मरकुस के चौथे अध्याय का वर्णन पढ़ने के बाद इस पर कौन आश्चर्य करेगा? दिन भर प्राणों की भलाई के लिए परिश्रम करने के बाद,—खुले में विशाल भीड़ को प्रचार करने के बाद, यीशु थक गया था। निश्चय ही यदि परिश्रमी मनुष्य की नींद मीठी होती है, तो हमारे धन्य प्रभु की नींद कितनी अधिक मीठी रही होगी!

आओ, इस महान सत्य को अपने मन में गहराई से बैठा लें कि यीशु मसीह वास्तव में और सचमुच मनुष्य था। वह सब बातों में पिता के तुल्य और अनन्त परमेश्वर था। परन्तु वह मनुष्य भी था, और उसने मांस और लहू में सहभागी होकर पाप को छोड़ सब बातों में हमारे समान रूप धारण किया। उसकी देह हमारी देह के समान थी। हमारे समान वह स्त्री से जन्मा। हमारे समान वह बढ़ा और डील-डौल में बड़ा हुआ। हमारे समान वह प्रायः भूखा और प्यासा, और निर्बल और थका हुआ होता था। हमारे समान उसने खाया और पीया, विश्राम किया और सोया। हमारे समान वह शोकित हुआ, रोया, और अनुभव करता रहा। यह सब अति आश्चर्यजनक है, पर ऐसा ही है। जिसने आकाश को बनाया, वह पृथ्वी पर एक दीन थके हुए मनुष्य के रूप में इधर-उधर फिरता रहा! जो स्वर्गीय स्थानों में प्रधानों और अधिकारियों पर राज्य करता था, उसने हमारे समान एक निर्बल देह धारण की। वह उस महिमा में, जो उसे पिता के साथ थी, स्वर्गदूतों की असंख्य सेनाओं की स्तुति के बीच सदा रह सकता था, पर पृथ्वी पर उतर आया और पापी मनुष्यों के बीच मनुष्य होकर रहा। निश्चय यही एक तथ्य दीनता, अनुग्रह, तरस और प्रेम का अद्भुत चमत्कार है।

मुझे इस विचार में सान्त्वना की गहरी खान मिलती है कि यीशु जितना सिद्ध परमेश्वर है उतना ही सिद्ध मनुष्य भी है। जिस पर भरोसा रखने को पवित्रशास्त्र मुझसे कहता है, वह केवल एक महान महायाजक नहीं, वरन् सहानुभूति रखनेवाला महायाजक है। वह केवल सामर्थी उद्धारकर्ता नहीं, वरन् सहानुभूति रखनेवाला उद्धारकर्ता है। वह केवल परमेश्वर का पुत्र नहीं जो बचाने में सामर्थी है, वरन् मनुष्य का पुत्र भी है जो हमारी दशा को अनुभव कर सकता है।

कौन नहीं जानता कि सहानुभूति इस पापमय संसार में हमारे लिए बची हुई सबसे मधुर वस्तुओं में से एक है? हमारी यहाँ की अन्धकारमय यात्रा में वह एक उजला समय होता है, जब हमें कोई ऐसा व्यक्ति मिलता है जो हमारे कष्टों में सहभागी होता है और हमारी चिन्ताओं में हमारे साथ चलता है,—जो हमारे रोने पर रोता है और हमारे आनन्द में आनन्दित होता है।

सहानुभूति धन से कहीं उत्तम है, और कहीं अधिक दुर्लभ भी। हज़ारों लोग दे सकते हैं, पर नहीं जानते कि अनुभव करना क्या होता है। सहानुभूति में हमें अपनी ओर खींचने और हमारे हृदय खोलने की सबसे बड़ी सामर्थ्य है। उचित और ठीक सलाह भारी मन पर प्रायः निष्फल और व्यर्थ गिरती है। संकट के दिन दी गई ठंडी सलाह हमें प्रायः बन्द कर देती है और हम सिकुड़कर अपने भीतर सिमट जाते हैं। परन्तु ऐसे दिन में सच्ची सहानुभूति, यदि हममें कोई भली भावनाएँ हैं, तो उन सबको जगा देगी, और ऐसा प्रभाव डालेगी जैसा और कुछ नहीं डाल सकता। मुझे ऐसा मित्र दो जो सोने-चाँदी में निर्धन होकर भी सदा सहानुभूति से भरा हृदय रखता हो।

हमारा परमेश्वर यह सब भली-भाँति जानता है। वह मनुष्य के हृदय के गुप्त भेदों को जानता है। वह उन मार्गों को जानता है जिनसे उस हृदय तक सबसे सहज पहुँचा जाता है, और उन झरनों को जिनसे वह हृदय सबसे शीघ्र द्रवित होता है। उसने बुद्धिमानी से यह प्रबन्ध किया कि सुसमाचार का उद्धारकर्ता सामर्थी होने के साथ अनुभव करनेवाला भी हो। उसने हमें ऐसा उद्धारकर्ता दिया है जिसके पास हमें जलती आग से निकाली हुई लकड़ियों के समान खींच लेने का दृढ़ हाथ ही नहीं, वरन् ऐसा सहानुभूतिपूर्ण हृदय भी है जिस पर परिश्रमी और बोझ से दबे हुए लोग विश्राम पा सकते हैं।

मसीह के व्यक्तित्व में दो स्वभावों के मेल में मुझे प्रेम और बुद्धि का एक अद्भुत प्रमाण दिखाई देता है। हमारे उद्धारकर्ता का यह अद्भुत प्रेम था कि हम जैसे अधर्मी विद्रोहियों के लिए वह निर्बलता और दीनता से होकर जाने को झुका। यह भी अद्भुत बुद्धि थी कि उसने अपने आप को इस प्रकार मित्रों के मित्र होने के योग्य बनाया, जो मनुष्य को बचा भी सके और उससे उसी की भूमि पर मिल भी सके। मुझे एक ऐसा चाहिए जो मेरे प्राण के छुटकारे के लिए आवश्यक सब कुछ कर सके। यह यीशु कर सकता है, क्योंकि वह परमेश्वर का अनन्त पुत्र है। मुझे ऐसा चाहिए जो मेरी निर्बलताओं और दुर्बलताओं को समझे, और जब तक मैं मृत्यु की देह से बँधा हूँ तब तक मेरे प्राण के साथ कोमलता से व्यवहार करे। यह भी यीशु कर सकता है, क्योंकि वह मनुष्य का पुत्र था, और उसका मांस और लहू मेरे ही समान था। यदि मेरा उद्धारकर्ता केवल परमेश्वर होता, तो शायद मैं उस पर भरोसा रख लेता, पर उसके निकट भय के बिना कभी न आ सकता। यदि मेरा उद्धारकर्ता केवल मनुष्य होता, तो मैं उससे प्रेम तो कर लेता, पर यह निश्चय कभी न कर पाता कि वह मेरे पाप दूर कर सकता है। परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो, मेरा उद्धारकर्ता परमेश्वर भी है और मनुष्य भी, और मनुष्य भी है और परमेश्वर भी,—परमेश्वर, इसलिए मुझे छुड़ाने में समर्थ,—मनुष्य, इसलिए मेरे साथ अनुभव करने में समर्थ। सर्वशक्तिमान सामर्थ्य और गहरी सहानुभूति एक ही महिमामय व्यक्ति, मेरे प्रभु यीशु मसीह में एकत्र हैं। निश्चय मसीह में विश्वास करनेवाले को दृढ़ सान्त्वना प्राप्त है। वह भली-भाँति भरोसा रख सकता है और डर नहीं सकता।

यदि इस लेख का कोई पाठक जानता है कि दया और क्षमा के लिए अनुग्रह के सिंहासन के पास जाना क्या होता है, तो वह यह कभी न भूले कि जिस मध्यस्थ के द्वारा वह परमेश्वर के निकट आता है, वह मनुष्य मसीह यीशु है।

तुम्हारे प्राण का काम एक ऐसे महायाजक के हाथ में है जो तुम्हारी निर्बलताओं में तुम्हारे साथ दुःखी हो सकता है। तुम्हारा सामना किसी ऐसे प्राणी से नहीं है जिसका स्वभाव इतना ऊँचा और महिमामय हो कि तुम्हारा मन उसे किसी रीति से समझ ही न सके। तुम्हारा काम यीशु से है, जिसकी देह तुम्हारी देह के समान थी, और जो पृथ्वी पर तुम्हारे ही समान मनुष्य था। वह उस संसार को भली-भाँति जानता है जिससे होकर तुम संघर्ष करते जा रहे हो, क्योंकि वह तैंतीस वर्ष उसी के बीच रहा। वह "पापियों के विरोध" को भली-भाँति जानता है, जो तुम्हें प्रायः निराश करता है, क्योंकि उसने स्वयं उसे सहा। (इब्रानियों 12:3)। वह तुम्हारे आत्मिक शत्रु, शैतान की चतुराई और चाल को भली-भाँति जानता है, क्योंकि उसने जंगल में उससे मल्लयुद्ध किया। निश्चय ऐसे पक्षसमर्थक के होते हुए तुम भली-भाँति निडर हो सकते हो।

यदि तू जानता है कि पृथ्वी के दुःखों में आत्मिक शान्ति के लिये प्रभु यीशु के पास जाना क्या होता है, तो तुझे उसके देहधारण के दिनों को और उसके मानव स्वभाव को भली भाँति स्मरण रखना चाहिए।

तू ऐसे जन के पास जा रहा है जो तेरी भावनाओं को अनुभव से जानता है, और जिसने कड़वे कटोरे को गहराई तक पिया है, क्योंकि वह "दुखी पुरुष और रोग से परिचित था।" (यशायाह 53:3)। यीशु मनुष्य के हृदय को जानता है,—मनुष्य की शारीरिक पीड़ाओं को,—मनुष्य की कठिनाइयों को, क्योंकि वह स्वयं एक मनुष्य था, और पृथ्वी पर उसके पास मांस और लहू था। वह सूखार के कुएँ पर थका हुआ बैठा। बैतनिय्याह में लाज़र की कब्र पर वह रोया। गतसमनी में उसका पसीना बड़ी-बड़ी बूँदों के रूप में लहू होकर टपका। कलवरी पर उसने पीड़ा से कराहा।

वह तेरी संवेदनाओं से अपरिचित नहीं है। वह मानव स्वभाव से जुड़ी हर बात से परिचित है, केवल पाप को छोड़कर।

(क) क्या तू दीन और अभावग्रस्त है? यीशु भी वैसा ही था। लोमड़ियों के भट और आकाश के पक्षियों के बसेरे होते हैं, परन्तु मनुष्य के पुत्र के पास सिर धरने की भी जगह न थी। वह एक तुच्छ समझे जानेवाले नगर में रहा। लोग कहा करते थे, "क्या नासरत से कोई भली वस्तु निकल सकती है?" (यूहन्ना 1:46)। वह बढ़ई का पुत्र समझा जाता था। उसने उधार की नाव पर प्रचार किया, उधार के गदहे पर चढ़कर यरूशलेम में प्रवेश किया, और उधार की कब्र में गाड़ा गया।

(ख) क्या तू संसार में अकेला है, और उन लोगों द्वारा उपेक्षित है जिन्हें तुझसे प्रेम करना चाहिए? यीशु भी वैसा ही था। वह अपने घर आया, और उसके अपनों ने उसे ग्रहण न किया। वह इस्राएल के घराने की खोई हुई भेड़ों के लिये मसीह होकर आया, और उन्होंने उसे ठुकरा दिया। इस संसार के हाकिमों ने उसे स्वीकार न किया। जो थोड़े लोग उसके पीछे चले वे चुंगी लेनेवाले और मछुए थे। और अन्त में इन्होंने भी उसे छोड़ दिया, और हर एक अपने-अपने स्थान को तितर-बितर हो गया।

(ग) क्या तुझे ग़लत समझा जाता है, तेरी ग़लत छवि बनाई जाती है, तेरी निन्दा होती है, और तुझे सताया जाता है? यीशु के साथ भी ऐसा ही हुआ। उसे पेटू और पियक्कड़, चुंगी लेनेवालों का मित्र, सामरी, पागल और दुष्टात्मा-ग्रस्त कहा गया। उसके चरित्र पर झूठा दोष लगाया गया। उस पर झूठे आरोप लगाए गए। उस पर अन्यायपूर्ण दण्ड की आज्ञा दी गई, और निर्दोष होते हुए भी वह अपराधी ठहराया गया, और अपराधी के रूप में क्रूस पर मरा।

(घ) क्या शैतान तुझे परखता है, और तेरे मन में भयानक विचार डालता है? उसने यीशु को भी परखा। उसने उसे परमेश्वर के पितृवत् विधान पर अविश्वास करने को कहा। "इन पत्थरों से कह कि रोटियाँ बन जाएँ।" उसने उसे अनावश्यक संकट में अपने आप को डालकर परमेश्वर की परीक्षा लेने का सुझाव दिया। मन्दिर के कंगूरे पर से "अपने आप को नीचे गिरा दे।" उसने उसे यह सुझाव दिया कि अपने प्रति थोड़ी-सी अधीनता के एक छोटे से कार्य से वह जगत के राज्य अपने लिये प्राप्त कर ले। "यदि तू गिरकर मुझे प्रणाम करे तो मैं यह सब कुछ तुझे दे दूँगा।" (मत्ती 4:1–10)।

(ङ) क्या तू कभी मन में भारी वेदना और संघर्ष अनुभव करता है? क्या तुझे अन्धकार में ऐसा लगता है मानो परमेश्वर ने तुझे छोड़ दिया है? यीशु ने भी ऐसा ही अनुभव किया। गतसमनी की बाटिका में उसने मन के कितने कष्ट सहे, कौन बता सकता है? जब उसने पुकारा, "हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?" (मत्ती 27:46), तब उसकी आत्मा की पीड़ा की गहराई को कौन माप सकता है?

मनुष्य के हृदय की आवश्यकताओं के लिये हमारे प्रभु यीशु मसीह से अधिक उपयुक्त उद्धारकर्ता की कल्पना करना असम्भव है,—न केवल उसकी सामर्थ्य के कारण, वरन् उसकी सहानुभूति के कारण भी उपयुक्त,—न केवल उसकी ईश्वरता के कारण, वरन् उसकी मनुष्यता के कारण भी उपयुक्त। मैं तुझसे विनती करता हूँ, यह बात अपने मन में दृढ़ता से बैठाने का प्रयत्न कर कि मसीह, जो आत्माओं का शरणस्थान है, परमेश्वर होने के साथ-साथ मनुष्य भी है। उसे राजाओं का राजा और प्रभुओं का प्रभु जानकर आदर दे। परन्तु ऐसा करते हुए यह कभी न भूल कि उसकी एक देह थी, और वह एक मनुष्य था। इस सत्य को थाम ले, और कभी इसे हाथ से न जाने दे। अभागा सोसीनियन यह कहकर भयंकर भूल करता है कि मसीह केवल मनुष्य था, परमेश्वर नहीं। परन्तु उस भ्रम की प्रतिक्रिया में तू यह न भूल जाना कि मसीह पूरा परमेश्वर होने के साथ-साथ पूरा मनुष्य भी था।

रोमन कैथोलिक की उस तुच्छ दलील पर क्षण भर भी कान न दे, जब वह तुझसे कहता है कि कुँवारी मरियम और सन्त मसीह से अधिक सहानुभूति रखनेवाले हैं। उसे उत्तर दे कि ऐसी दलील पवित्रशास्त्र और मसीह के सच्चे स्वभाव की अज्ञानता से उपजती है। उसे उत्तर दे कि तूने मसीह को ऐसा नहीं जाना कि उसे केवल कठोर न्यायी और डरने योग्य हस्ती समझे। उसे उत्तर दे कि चारों सुसमाचारों ने तुझे सिखाया है कि उसे सबसे अधिक प्रेम और सहानुभूति रखनेवाला मित्र, और साथ ही सबसे सामर्थी और शक्तिशाली उद्धारकर्ता समझ। उसे उत्तर दे कि जब तक तू अपनी थकी हुई आत्मा को मनुष्य मसीह यीशु पर विश्राम दे सकता है, तब तक तुझे सन्तों और स्वर्गदूतों से, कुँवारी मरियम से या जिब्राईल से, किसी शान्ति की आवश्यकता नहीं।

III. तीसरी बात यह सीखें कि एक सच्चे मसीही में भी बहुत दुर्बलता और निर्बलता हो सकती है

इसका एक स्पष्ट प्रमाण यहाँ वर्णित चेलों के आचरण में मिलता है, जब लहरें नाव पर टूट पड़ीं। उन्होंने घबराकर यीशु को जगाया। उन्होंने भय और चिन्ता में उससे कहा, "हे गुरु, क्या तुझे चिन्ता नहीं कि हम नाश हुए जाते हैं?"

इसमें अधीरता थी। वे तब तक प्रतीक्षा कर सकते थे जब तक उनका प्रभु अपनी नींद से उठना उचित न समझे।

इसमें अविश्वास था। वे भूल गए कि वे उसकी देखरेख में हैं जिसके हाथ में सारी सामर्थ्य है। "हम नाश हुए जाते हैं।"

इसमें सन्देह था। उन्होंने ऐसे बात की मानो उन्हें अपने प्रभु की उनकी सुरक्षा और कुशल-क्षेम के प्रति चिन्ता और परवाह पर सन्देह हो। "क्या तुझे चिन्ता नहीं कि हम नाश हुए जाते हैं?"

बेचारे अविश्वासी जन! उन्हें डरने का क्या अधिकार था? वे प्रमाण पर प्रमाण देख चुके थे कि जब तक दूल्हा उनके साथ है, सब कुछ भला ही होगा। वे अपने प्रति उसके प्रेम और कृपा के बार-बार के उदाहरण देख चुके थे, जो उन्हें यह विश्वास दिलाने के लिये काफी थे कि वह उन्हें कभी सचमुच हानि नहीं पहुँचने देगा। परन्तु वर्तमान संकट में सब कुछ भुला दिया गया। तात्कालिक संकट का बोध अक्सर मनुष्यों की स्मरण-शक्ति को बिगाड़ देता है। भय प्रायः बीते अनुभव से तर्क नहीं कर पाता। उन्होंने आँधी की आवाज़ सुनी। उन्होंने लहरें देखीं। उन्होंने अपने ऊपर ठण्डे जल की थपेड़ें अनुभव कीं। उन्होंने सोचा कि मृत्यु निकट है। वे और अधिक देर तक अनिश्चितता में प्रतीक्षा न कर सके। उन्होंने कहा, "क्या तुझे चिन्ता नहीं कि हम नाश हुए जाते हैं?"

परन्तु अन्ततः हम यह समझें कि यह उस बात का केवल एक चित्र है जो हर युग में विश्वासियों के बीच निरन्तर होती रहती है। मुझे सन्देह है कि आज भी ऐसे बहुत से चेले हैं जो यहाँ वर्णित चेलों के समान हैं।

परमेश्वर की बहुत-सी सन्तानें तब तक भली-भाँति चलती रहती हैं जब तक उन पर कोई परीक्षा नहीं आती। अच्छे मौसम के दिनों में वे मसीह के पीछे बड़ी सहजता से चलती हैं। वे मान लेती हैं कि वे पूरी तरह उसी पर भरोसा रखती हैं। वे अपने आप को यह सोचकर सराहती हैं कि उन्होंने अपनी सारी चिन्ता उसी पर डाल दी है। उनकी गिनती बहुत अच्छे मसीहियों में होने लगती है।

परन्तु अचानक कोई अनपेक्षित परीक्षा उन पर आ पड़ती है। उनकी सम्पत्ति पंख लगाकर उड़ जाती है। उनका अपना स्वास्थ्य बिगड़ जाता है। मृत्यु उनके घर में आ घुसती है। वचन के कारण क्लेश या उपद्रव उठ खड़ा होता है। और अब उनका विश्वास कहाँ है? वह दृढ़ भरोसा कहाँ है जो उन्हें अपने पास होने का भ्रम था? उनकी शान्ति, उनकी आशा, उनकी अधीनता कहाँ है? हाय, उन्हें ढूँढ़ा जाता है पर वे मिलते नहीं। वे तराजू में तौले जाते हैं और घटी में पाए जाते हैं। भय, सन्देह, व्याकुलता और चिन्ता बाढ़ की नाईं उन पर टूट पड़ती हैं, और वे बुद्धि खो बैठने की दशा में पहुँच जाते हैं। मैं जानता हूँ कि यह एक दुःखद वर्णन है। मैं केवल हर सच्चे मसीही के विवेक के सामने यह प्रश्न रखता हूँ कि क्या यह सही और सच नहीं है?

सीधी-सी बात यह है कि जब तक सच्चे मसीही देह में हैं, उनमें शाब्दिक और पूर्ण सिद्धता नहीं होती। परमेश्वर के सबसे उत्तम और तेजस्वी सन्त भी एक दीन, मिश्रित प्राणी ही हैं। वह चाहे नया जन्म पाया हुआ, नया किया हुआ और पवित्र किया हुआ हो, तौभी निर्बलता से घिरा रहता है। पृथ्वी पर कोई ऐसा धर्मी मनुष्य नहीं जो भलाई ही करे और पाप न करे। हम सब बहुत बातों में चूक जाते हैं। मनुष्य में उद्धार देनेवाला सच्चा विश्वास हो सकता है, फिर भी वह सदा उसके हाथ में और काम में लाने को तैयार न हो। (सभोपदेशक 7:20; याकूब 3:2)।

अब्राहम विश्वासियों का पिता था। विश्वास ही से उसने अपना देश और अपने कुटुम्ब को छोड़ा, और परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार एक ऐसे देश को निकल गया जिसे उसने कभी देखा न था। विश्वास ही से वह उस देश में परदेशी की नाईं रहने पर सन्तुष्ट रहा, यह मानते हुए कि परमेश्वर उसे उसका अधिकार देगा। फिर भी यही अब्राहम अविश्वास से इतना हार गया कि मनुष्य के भय के कारण उसने सारा को अपनी पत्नी नहीं, बहन कहलवाने दिया। यह बड़ी निर्बलता थी। तौभी अब्राहम से बड़े सन्त बहुत कम हुए हैं।

दाऊद परमेश्वर के मन के अनुसार एक मनुष्य था। जब वह केवल जवान ही था, तब उसमें इतना विश्वास था कि वह विशालकाय गोलियत से लड़ने निकला। उसने सबके सामने अपना यह विश्वास प्रकट किया कि जिस यहोवा ने उसे सिंह और भालू के पंजे से छुड़ाया, वही उसे इस पलिश्ती से भी छुड़ाएगा। उसमें इस बात पर भी विश्वास था कि परमेश्वर की प्रतिज्ञा के अनुसार वह एक दिन इस्राएल का राजा होगा, यद्यपि केवल थोड़े से लोग उसके साथ थे, शाऊल पहाड़ों पर तीतर की नाईं उसका पीछा करता था, और प्रायः उसके और मृत्यु के बीच बस एक ही डग का अन्तर जान पड़ता था। फिर भी यही दाऊद किसी समय भय और अविश्वास से इतना घिर गया कि उसने कहा, "किसी न किसी दिन मैं शाऊल के हाथ से नाश हो जाऊँगा।" (1 शमूएल 27:1)। वह परमेश्वर के हाथ से पाए हुए अपने अनेक आश्चर्यजनक छुटकारों को भूल गया। उसने केवल अपने वर्तमान संकट को देखा, और अधर्मी पलिश्तियों के बीच शरण ली। निश्चय ही यह बड़ी निर्बलता थी। तौभी दाऊद से दृढ़ विश्वासी बहुत कम हुए हैं।

मैं जानता हूँ कि किसी के लिए यह कहना सहज है, "यह सब सच है, पर इससे चेलों का भय क्षमा के योग्य नहीं ठहरता। यीशु स्वयं उनके साथ था। उन्हें डरना नहीं चाहिए था। मैं तो उनकी नाईं कभी ऐसा कायर और अविश्वासी न होता!" जो मनुष्य इस प्रकार तर्क करता है, उससे मैं कहता हूँ कि वह अपने मन को कम जानता है। मैं उससे कहता हूँ कि जिसकी परीक्षा नहीं हुई, वह अपनी निर्बलताओं की लम्बाई-चौड़ाई नहीं जानता। यदि वह ऐसी परिस्थितियों में रखा जाए जो उसे उभार दें, तो कोई नहीं कह सकता कि उसमें कितनी निर्बलता प्रकट हो जाए।

क्या इस लेख के किसी पाठक को लगता है कि वह मसीह पर विश्वास रखता है? क्या तुम उसमें ऐसा प्रेम और भरोसा अनुभव करते हो कि यह समझ ही नहीं सकते कि कोई घटना तुम्हें बहुत विचलित कर सकती है? यह सब अच्छा है। यह सुनकर मुझे आनन्द होता है। परन्तु क्या इस विश्वास की परीक्षा हुई है? क्या इस भरोसे को कसौटी पर कसा गया है? यदि नहीं, तो इन चेलों को जल्दी में दोषी न ठहराओ। अभिमानी न बनो, पर डरते रहो। यह न सोचो कि क्योंकि तुम्हारा मन अभी जीवित अवस्था में है, इसलिए यह अवस्था सदा बनी रहेगी। यह न कहो कि क्योंकि आज तुम्हारी भावनाएँ उत्साही और उमंग भरी हैं, इसलिए "कल का दिन भी आज ही के समान, बल्कि उससे भी बढ़कर होगा।" यह न कहो कि क्योंकि अभी तुम्हारा मन मसीह की दया की प्रबल अनुभूति से ऊँचा उठा है, इसलिए "मैं जीवन भर उसे कभी न भूलूँगा।" आह, अपने विषय में इस खुशामदी अनुमान को कुछ घटाना सीखो। तुम अपने आप को पूरी तरह नहीं जानते। तुम्हारे भीतरी मनुष्यत्व में ऐसी बहुत-सी बातें हैं जिनका तुम्हें अभी पता नहीं। प्रभु तुम्हें वैसे ही छोड़ सकता है जैसे उसने हिजकिय्याह को छोड़ा, ताकि तुम्हारे मन में जो कुछ है वह तुम्हें दिखा दे। (2 इतिहास 32:31)। धन्य है वह जो "दीनता से कमर बाँधे हुए" है। "क्या ही धन्य है वह मनुष्य जो निरन्तर प्रभु का भय मानता रहता है।" "इसलिए जो समझता है, मैं स्थिर हूँ, वह चौकस रहे कि कहीं गिर न पड़े।" (1 पतरस 5:5; नीतिवचन 28:14; 1 कुरिन्थियों 10:12)।

मैं इस बात पर क्यों इतना रुकता हूँ? क्या मैं नाम के मसीहियों की भ्रष्टता के लिए बहाना बनाना और उनके पापों को क्षमा के योग्य ठहराना चाहता हूँ? परमेश्वर न करे!—क्या मैं पवित्रीकरण के स्तर को नीचा करना और किसी को मसीह का आलसी, निकम्मा सिपाही होने में सहारा देना चाहता हूँ? परमेश्वर न करे!—क्या मैं मन फिराए हुओं और मन न फिराए हुओं के बीच की चौड़ी रेखा को मिटाना और असंगतियों की ओर से आँख मूँद लेना चाहता हूँ? मैं फिर कहता हूँ, परमेश्वर न करे!—मेरा दृढ़ मत है कि सच्चे मसीही और झूठे मसीही में, विश्वासी और अविश्वासी में, परमेश्वर की सन्तानों और संसार की सन्तानों में बहुत बड़ा अन्तर है। मेरा दृढ़ मत है कि यह अन्तर केवल विश्वास का नहीं, वरन् जीवन का है,—केवल अंगीकार का नहीं, वरन् आचरण का भी है। मेरा दृढ़ मत है कि विश्वासी की चाल अविश्वासी की चाल से उतनी ही भिन्न होनी चाहिए जितना कड़वा मीठे से, उजियाला अन्धकार से, और गर्मी ठण्ड से भिन्न होती है।

परन्तु मैं चाहता हूँ कि नए मसीही यह समझ लें कि उन्हें अपने भीतर क्या पाने की आशा रखनी चाहिए। मैं चाहता हूँ कि अपनी निर्बलता और दुर्बलता को देखकर वे ठोकर न खाएँ और न उलझन में पड़ें। मैं चाहता हूँ कि वे देखें कि शैतान की सारी कानाफूसियों के विरोध में भी उनमें सच्चा विश्वास और अनुग्रह हो सकता है, चाहे वे अपने भीतर बहुत से सन्देह और भय अनुभव करते हों। मैं चाहता हूँ कि वे ध्यान दें कि पतरस, याकूब, यूहन्ना और उनके साथी सच्चे चेले थे, फिर भी इतने आत्मिक न थे कि डर न सकें। मैं उनसे यह नहीं कहता कि चेलों के अविश्वास को अपने लिए बहाना बना लें। परन्तु मैं उनसे यह अवश्य कहता हूँ कि यह साफ़ दिखाता है कि जब तक वे देह में हैं, तब तक वे यह आशा न रखें कि विश्वास भय की पहुँच से परे होगा।

सबसे बढ़कर, मैं चाहता हूँ कि सब मसीही यह समझें कि उन्हें दूसरे विश्वासियों में क्या पाने की आशा रखनी चाहिए। किसी मनुष्य में कुछ भ्रष्टता देखकर तुम जल्दबाज़ी में यह निष्कर्ष न निकालो कि उसमें अनुग्रह नहीं है। सूर्य के मुख पर भी धब्बे हैं; फिर भी सूर्य तेज़ चमकता है और सारे जगत को प्रकाशित करता है। ऑस्ट्रेलिया से आनेवाले सोने के बहुत से डलों में स्फटिक और मैल मिली होती है; फिर भी कौन इस कारण सोने को बिलकुल निकम्मा समझता है? संसार के कुछ उत्तम हीरों में भी दोष होते हैं; फिर भी वे उन्हें अनमोल मूल्य के समझे जाने से नहीं रोकते। इस रोगी नाज़ुक-मिज़ाजी को दूर करो, जो बहुतों को ऐसा बना देती है कि किसी मनुष्य में थोड़े से दोष देखकर ही उसे बहिष्कृत करने को तैयार हो जाएँ! हम अनुग्रह देखने में अधिक फुर्तीले और अपूर्णताएँ देखने में अधिक धीमे हों! यह जान लें कि यदि हम यह नहीं मान सकते कि भ्रष्टता के रहते अनुग्रह हो सकता है, तो हमें संसार में कहीं अनुग्रह मिलेगा ही नहीं। हम अभी देह में हैं। शैतान मरा नहीं है। हम अभी स्वर्गदूतों के समान नहीं हैं। स्वर्ग अभी आरम्भ नहीं हुआ है। कोढ़ घर की दीवारों से निकला नहीं है, चाहे हम उन्हें कितना ही खुरचें, और जब तक घर ढा न दिया जाए, तब तक निकलेगा भी नहीं। हमारी देह निश्चय ही पवित्र आत्मा का मन्दिर है, परन्तु जब तक वह जिलाई या बदली न जाए, तब तक सिद्ध मन्दिर नहीं है। अनुग्रह निश्चय ही एक धन है, परन्तु मिट्टी के बरतनों में रखा हुआ धन। यह सम्भव है कि कोई मनुष्य मसीह के लिए सब कुछ छोड़ दे, और फिर भी कभी-कभी सन्देह और भय से घिर जाए।

मैं इस लेख के हर पाठक से विनती करता हूँ कि इसे स्मरण रखे। यह ध्यान देने योग्य शिक्षा है। प्रेरितों ने मसीह पर विश्वास किया, मसीह से प्रेम रखा और मसीह के पीछे चलने के लिए सब कुछ छोड़ दिया। फिर भी इस आँधी में तुम देखते हो कि प्रेरित डर गए। उनके विषय में अपने न्याय में उदार होना सीखो। अपने मन से अपनी आशाओं में संयम रखना सीखो। इस सत्य के लिए मरते दम तक लड़ो कि कोई मनुष्य सच्चा मसीही नहीं है जो फिरा नहीं है और पवित्र जन नहीं है। परन्तु यह भी मानो कि कोई मनुष्य फिरा हुआ हो सकता है, नया मन पा चुका हो सकता है और पवित्र जन हो सकता है, फिर भी दुर्बलता, सन्देह और भय का शिकार हो सकता है।

4. चौथे स्थान पर, आओ हम प्रभु यीशु मसीह की सामर्थ्य को सीखें

जिस वृत्तान्त पर मैं अब विचार कर रहा हूँ, उसमें उसकी सामर्थ्य का एक अद्भुत उदाहरण है। लहरें उस नाव में टूट रही थीं जिसमें यीशु था। भयभीत चेलों ने उसे जगाया और सहायता के लिए पुकारा। "उसने उठकर आँधी को डाँटा, और समुद्र से कहा, शान्त रह, थम जा। और आँधी थम गई और बड़ा चैन हो गया।" यह एक अद्भुत चमत्कार था। सर्वशक्तिमान के सिवा कोई यह नहीं कर सकता था।

एक वचन से हवाओं को थमा देना! कौन नहीं जानता कि किसी असम्भव बात का वर्णन करने के लिए यह एक प्रचलित कहावत है, "तुम हवा से बातें करने जैसा ही कर रहे हो!" फिर भी यीशु हवा को डाँटता है और वह तुरन्त थम जाती है। यह सामर्थ्य थी।

एक वाणी से लहरों को शान्त करना! इतिहास का कौन पाठक नहीं जानता कि इंग्लैंड के एक पराक्रमी राजा ने किनारे पर चढ़ते ज्वार को रोकने का व्यर्थ प्रयत्न किया था? फिर भी यहाँ एक है जो आँधी में उफनती लहरों से कहता है, "शान्त रह," और तुरन्त बड़ा चैन हो गया। यहाँ सामर्थ्य थी।

यह सब मनुष्यों के लिए भला है कि प्रभु यीशु मसीह की सामर्थ्य के विषय में स्पष्ट विचार रखें। पापी जान ले कि जिस दयालु उद्धारकर्ता की ओर भागने के लिए उससे आग्रह किया जाता है और जिस पर भरोसा रखने के लिए उसे बुलाया जाता है, वह सर्वशक्तिमान से कम कुछ नहीं है, और सब प्राणियों पर उसका अधिकार है कि अनन्त जीवन दे। (प्रकाशित वाक्य 1:8; यूहन्ना 17:2)। चिन्तित खोजी समझ ले कि यदि वह यीशु पर साहस करके भरोसा रखे और क्रूस उठा ले, तो वह उस पर भरोसा रखता है जिसे स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिकार दिया गया है। (मत्ती 28:18)। विश्वासी जंगल में यात्रा करते हुए स्मरण रखे कि उसका मध्यस्थ, और सहायक, और वैद्य, और चरवाहा, और छुड़ानेवाला प्रभुओं का प्रभु और राजाओं का राजा है, और उसके द्वारा सब कुछ किया जा सकता है। (प्रकाशित वाक्य 17:14; फिलिप्पियों 4:13)। सब इस विषय का अध्ययन करें, क्योंकि यह अध्ययन के योग्य है।

(क) इसका अध्ययन उसकी सृष्टि के कामों में करो। "सब कुछ उसी के द्वारा उत्पन्न हुआ और जो कुछ उत्पन्न हुआ है, उसमें से कोई भी वस्तु उसके बिना उत्पन्न न हुई।" (यूहन्ना 1:3)। आकाश और उसके निवासियों का सारा तेजस्वी दल, पृथ्वी और जो कुछ उसमें है, समुद्र और जो कुछ उसमें है, ऊँचे सूर्य से लेकर नीचे के छोटे से कीड़े तक सारी सृष्टि मसीह का काम थी। उसने कहा और वे अस्तित्व में आए। उसने आज्ञा दी और वे होने लगे। वही यीशु, जो बैतलहम में एक दीन स्त्री से जन्मा और नासरत में एक बढ़ई के घर में रहा, सब वस्तुओं का रचनेवाला था। क्या यह सामर्थ्य न थी?

(ख) इसका अध्ययन उसके विधान के कामों में और जगत में सब वस्तुओं के व्यवस्थित बने रहने में करो। "उसी में सब वस्तुएँ स्थिर रहती हैं।" (कुलुस्सियों 1:17)। सूर्य, चन्द्रमा और तारे एक सिद्ध व्यवस्था में घूमते हैं। वसन्त, ग्रीष्म, शरद और शिशिर नियमित क्रम से एक के बाद एक आते हैं। वे आज तक बने हैं और चूकते नहीं, उसकी ठहराई हुई विधि के अनुसार जो कलवरी पर मरा। (भजन संहिता 119:91)। इस जगत के राज्य उठते और बढ़ते हैं, घटते और मिट जाते हैं। पृथ्वी के शासक योजनाएँ और युक्तियाँ बनाते हैं, व्यवस्थाएँ बनाते और बदलते हैं, युद्ध करते हैं, किसी को गिराते और किसी को उठाते हैं। परन्तु वे यह बहुत कम सोचते हैं कि वे केवल यीशु की इच्छा से राज्य करते हैं, और परमेश्वर के मेमने की अनुमति के बिना कुछ नहीं होता। वे नहीं जानते कि वे और उनकी प्रजा सब उस क्रूस पर चढ़ाए गए के हाथ में पानी की एक बूँद के समान हैं, और वह जातियों को बढ़ाता और जातियों को घटाता है, ठीक अपनी इच्छा के अनुसार। क्या यह सामर्थ्य नहीं है?

(ग) इस विषय का अध्ययन विशेष करके उन आश्चर्यकर्मों में कीजिए जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने पृथ्वी पर अपनी सेवकाई के तीन वर्षों में किए। उन सामर्थ्य के कामों से सीखिए कि जो बातें मनुष्य से नहीं हो सकतीं, वे मसीह से हो सकती हैं। उसके हर एक आश्चर्यकर्म को आत्मिक बातों का प्रतीक और चित्र मानिए। उसमें इस बात की एक सुन्दर झलक देखिए कि वह आपकी आत्मा के लिए क्या कर सकता है। जो एक वचन से मरे हुओं को जिला सकता था, वह मनुष्य को पाप की मृत्यु से भी उतनी ही सहजता से जिला सकता है। जो अन्धों को आँखें, बहरों को सुनने की शक्ति और गूँगों को बोलने की शक्ति दे सकता था, वह पापियों को भी परमेश्वर का राज्य देखने, सुसमाचार की आनन्दमय ध्वनि सुनने और छुटकारा देनेवाले प्रेम की स्तुति करने के योग्य बना सकता है। जो एक स्पर्श से कोढ़ को चंगा कर सकता था, वह हृदय के हर रोग को चंगा कर सकता है। जो दुष्टात्माओं को निकाल सकता था, वह हर उलझानेवाले पाप को अपने अनुग्रह के आगे झुकने की आज्ञा दे सकता है। आह, मसीह के आश्चर्यकर्मों को इसी दृष्टि से पढ़ना आरम्भ कीजिए! आप चाहे जितने दुष्ट, बुरे और भ्रष्ट अनुभव करते हों, इस विचार से सान्त्वना पाइए कि आप मसीह की चंगा करने की सामर्थ्य से बाहर नहीं हैं। स्मरण रखिए कि मसीह में न केवल दया की परिपूर्णता है, वरन् सामर्थ्य की भी परिपूर्णता है।

(घ) इस विषय का अध्ययन विशेष करके उस रूप में कीजिए जिसमें वह आज आपके सामने रखा गया है। मुझे निश्चय है कि आपका हृदय कभी-कभी आँधी में लहरों की नाईं इधर-उधर उछाला गया है। आपने उसे उस अशान्त समुद्र के जल की नाईं व्याकुल पाया है जिसे चैन नहीं मिलता। आइए, आज सुनिए कि एक ऐसा है जो आपको विश्राम दे सकता है। यीशु आपके हृदय से, उसका रोग चाहे जो हो, कह सकता है, "शान्त रह, चुप रह!"

क्या हुआ यदि भीतर आपका विवेक असंख्य अपराधों की स्मृति से कोड़े खा रहा है, और प्रलोभन के हर झोंके से फटा जा रहा है? क्या हुआ यदि बीते दिनों के घिनौने कुकर्मों का स्मरण आपको दुःखदायी है और बोझ असह्य? क्या हुआ यदि आपका हृदय बुराई से भरा जान पड़ता है और पाप दास की नाईं आपको जहाँ चाहे खींचे लिए जाता है? क्या हुआ यदि शैतान विजेता की नाईं आपकी आत्मा पर इधर-उधर सवारी कर रहा है और आपसे कहता है कि उससे लड़ना व्यर्थ है, आपके लिए कोई आशा नहीं? मैं आपसे कहता हूँ कि एक ऐसा है जो आपको भी क्षमा और शान्ति दे सकता है। मेरा प्रभु और स्वामी यीशु मसीह शैतान के उत्पात को डाँट सकता है, आपकी आत्मा के दुःख को भी शान्त कर सकता है, और आपसे भी कह सकता है, "शान्त रह, चुप रह!" वह अपराध का वह बादल छिन्न-भिन्न कर सकता है जो अब आपको दबाए हुए है। वह निराशा को जाने की आज्ञा दे सकता है। वह भय को दूर भगा सकता है। वह दासत्व की आत्मा को हटाकर आपको लेपालकपन की आत्मा से भर सकता है। शैतान आपकी आत्मा को सशस्त्र बलवन्त मनुष्य की नाईं जकड़े हो सकता है, परन्तु यीशु उससे अधिक बलवन्त है, और जब वह आज्ञा देता है तो बन्दियों को छूटना ही पड़ता है। आह, यदि कोई व्याकुल पाठक भीतर शान्ति चाहता है, तो वह आज ही यीशु मसीह के पास जाए, और सब कुछ अच्छा हो जाएगा!

परन्तु यदि आपका हृदय परमेश्वर के साथ ठीक है, फिर भी आप सांसारिक संकट के बोझ से दबे हैं, तो क्या? यदि निर्धनता का भय आपको इधर-उधर उछाल रहा है और आपको डुबा देनेवाला प्रतीत होता है, तो क्या? यदि शरीर की पीड़ा दिन-प्रतिदिन आपको बेचैन किए दे रही है, तो क्या? यदि आप अचानक सक्रिय उपयोगिता से अलग कर दिए गए हैं और निर्बलता के कारण हाथ पर हाथ धरे बैठने को विवश हैं, तो क्या? यदि मृत्यु आपके घर में आ गई है और आपकी राहेल, या यूसुफ, या बिन्यामीन को ले गई है, और आपको अकेला छोड़ गई है, शोक से भूमि पर कुचला हुआ, तो क्या? यदि यह सब कुछ हो चुका है, तब भी मसीह में सान्त्वना है। वह घायल हृदयों से उतनी ही सहजता से शान्ति की बात कह सकता है जितनी सहजता से अशान्त समुद्रों को शान्त करता है। वह विद्रोही इच्छाओं को उतने ही सामर्थ्य से डाँट सकता है जितने सामर्थ्य से उमड़ती आँधियों को। वह शोक के तूफानों को थमा सकता है और उत्तेजित मनोवेगों को उतने ही निश्चय से चुप करा सकता है जितने निश्चय से उसने गलील की आँधी को थामा। वह भारी से भारी चिन्ता से कह सकता है, "शान्त रह, चुप रह!" चिन्ता और क्लेश की बाढ़ें प्रबल हो सकती हैं, परन्तु यीशु जल-प्रलय पर विराजमान है, और समुद्र की लहरों से अधिक सामर्थी है। (भजन संहिता 93:4।) संकट की आँधियाँ आपके चारों ओर भयंकर रूप से गरज सकती हैं, परन्तु यीशु उन्हें अपने हाथ में थामे है और जब चाहे उन्हें रोक सकता है। आह, यदि इस लेख का कोई पाठक टूटे मन का, चिन्ताओं से घिरा और शोकित है, तो वह यीशु मसीह के पास जाए और उसे पुकारे, और वह ताज़गी पाएगा। वह कहता है, "हे सब परिश्रम करनेवालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।" (मत्ती 11:28।)

मैं उन सब को जो अपने आप को मसीही कहते हैं, निमन्त्रण देता हूँ कि मसीह की सामर्थ्य के विषय में विशाल दृष्टिकोण रखें। और किसी बात पर चाहे सन्देह कीजिए, परन्तु मसीह की सामर्थ्य पर कभी सन्देह न कीजिए। आप भीतर ही भीतर पाप से प्रेम तो नहीं रखते, यह सन्देहजनक हो सकता है। आप अकेले में संसार से तो नहीं चिपके हैं, यह सन्देहजनक हो सकता है। एक दीन पापी के रूप में अनुग्रह से उद्धार पाने के विचार के विरुद्ध आपके स्वभाव का घमण्ड तो नहीं उठ रहा, यह सन्देहजनक हो सकता है। परन्तु एक बात सन्देहजनक नहीं है, और वह यह कि मसीह "पूरी रीति से उद्धार कर सकता है," और यदि आप उसे करने दें तो वह आपका उद्धार करेगा। (इब्रानियों 7:25।)

5. अन्त में, आइए हम सीखें कि प्रभु यीशु निर्बल विश्वासियों के साथ कितनी कोमलता और धैर्य से व्यवहार करता है।

यह सत्य उन वचनों में प्रकट होता है जो उसने अपने चेलों से कहे, जब आँधी थम गई और शान्ति हो गई। वह उन्हें भली-भाँति कड़ी डाँट सुना सकता था। वह उन्हें वे सब बड़े काम स्मरण दिला सकता था जो उसने उनके लिए किए थे, और उनकी कायरता और अविश्वास पर उन्हें झिड़क सकता था, परन्तु प्रभु के वचनों में क्रोध का नाम तक नहीं है। वह केवल दो प्रश्न पूछता है: "तुम क्यों डरते हो? तुम में विश्वास कैसे नहीं है?"

पृथ्वी पर अपने चेलों के प्रति हमारे प्रभु का समस्त आचरण ध्यानपूर्वक विचार करने योग्य है। वह उस करुणा और सहनशीलता पर सुन्दर प्रकाश डालता है जो उसमें है। निश्चय ही किसी गुरु के ऐसे शिष्य नहीं हुए होंगे जो पाठ सीखने में उतने मन्द हों जितने प्रेरितों में यीशु के थे। निश्चय ही किसी शिष्य को ऐसा धैर्यवान और सहनशील शिक्षक नहीं मिला होगा जैसा प्रेरितों को मसीह में मिला। इस विषय के जितने प्रमाण सुसमाचारों में बिखरे पड़े हैं, उन सब को एकत्र कीजिए और देखिए कि मेरी बात कितनी सत्य है।

हमारे प्रभु की सेवकाई के किसी भी समय में चेले यह पूरी तरह समझते हुए नहीं दिखाई दिए कि वह संसार में किस उद्देश्य से आया है। दीनता, प्रायश्चित, क्रूसीकरण — ये बातें उनके लिए छिपी हुई थीं। उनके स्वामी ने जो कुछ उस पर बीतनेवाला था उसके विषय में जो सबसे साफ़ शब्द और सबसे स्पष्ट चेतावनियाँ कहीं, उनका उनके मन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वे समझे नहीं। उन्होंने बूझा नहीं। यह बात उनकी आँखों से छिपी रही। एक बार तो पतरस ने हमारे प्रभु को दुःख उठाने से रोकने का प्रयत्न भी किया। उसने कहा, "हे प्रभु, परमेश्वर न करे; तुझ पर ऐसा कभी न होगा।" (मत्ती 16:22; लूका 18:34; 9:45।)

उनकी आत्मा और व्यवहार में तुम्हें बहुधा ऐसी बातें दिखाई देंगी जो किसी भी प्रकार सराहने योग्य नहीं हैं। हमें बताया गया है कि एक दिन उन्होंने आपस में विवाद किया कि हम में सबसे बड़ा कौन है। (मरकुस 9:34।) एक और दिन उन्होंने उसके आश्चर्यकर्मों पर ध्यान न दिया, और उनके मन कठोर हो गए। (मरकुस 6:52।) एक बार उन में से दो ने चाहा कि स्वर्ग से आग बरसाकर एक गाँव को भस्म कर दें, क्योंकि उस गाँव ने उन्हें ग्रहण नहीं किया। (लूका 9:54।) गतसमनी की वाटिका में उन में से जो तीन सबसे अच्छे थे वे उस समय सो गए जब उन्हें जागना और प्रार्थना करनी चाहिए थी। उसके पकड़वाए जाने की घड़ी में वे सब उसे छोड़कर भाग गए, और सबसे बुरी बात यह कि बारहों में सबसे आगे बढ़नेवाले पतरस ने शपथ खाकर तीन बार अपने स्वामी का इन्कार किया।

पुनरुत्थान के बाद भी तुम देखते हो कि वही अविश्वास और मन की कठोरता उनसे चिपकी रही; यद्यपि उन्होंने अपने प्रभु को अपनी आँखों से देखा और अपने हाथों से छुआ, तब भी उन में से कुछ ने सन्देह किया। वे विश्वास में कितने निर्बल थे! "जो कुछ भविष्यद्वक्ताओं ने कहा है उस पर विश्वास करने" में उनका मन कितना धीमा था! (लूका 24:25।) हमारे प्रभु के शब्दों, कार्यों, जीवन और मृत्यु का अर्थ समझने में वे कितने पिछड़े हुए थे!

परन्तु अपनी पूरी सेवकाई में इन चेलों के प्रति हमारे प्रभु के व्यवहार में तुम क्या देखते हो? तुम्हें केवल अपरिवर्तनीय तरस, करुणा, कृपा, कोमलता, धीरज, सहनशीलता और प्रेम ही दिखाई देता है।

वह उनकी मूर्खता के कारण उन्हें त्याग नहीं देता। वह उनके अविश्वास के कारण उन्हें ठुकराता नहीं। वह उनकी कायरता के कारण उन्हें सदा के लिए निकाल नहीं देता। वह उन्हें उतना ही सिखाता है जितना वे सह सकते हैं। वह उन्हें एक-एक पग करके आगे ले चलता है, जैसे दाई किसी शिशु को तब चलाती है जब वह पहली बार चलना आरम्भ करता है। मरे हुओं में से जी उठते ही वह उन्हें कृपा-भरे सन्देश भेजता है। उसने स्त्रियों से कहा, "जाओ, मेरे भाइयों से कहो कि गलील को चले जाएँ, वहाँ वे मुझे देखेंगे।" (मत्ती 28:10।) वह उन्हें फिर अपने चारों ओर इकट्ठा करता है। वह पतरस को उसके स्थान पर पुनः स्थापित करता है और उससे कहता है कि "मेरी भेड़ों को चरा।" (यूहन्ना 21:17।) अन्तिम बार स्वर्ग पर चढ़ने से पहले वह चालीस दिन तक उनके साथ रहने की दीनता करता है। वह उन्हें अपने दूत बनाकर भेजता है कि वे जाएँ और अन्यजातियों में सुसमाचार का प्रचार करें। विदा होते समय वह उन्हें आशीष देता है और इस अनुग्रहपूर्ण प्रतिज्ञा से उनका हियाव बँधाता है, "देखो, मैं जगत के अन्त तक सदा तुम्हारे संग हूँ।" (मत्ती 28:20।) निश्चय यह ऐसा प्रेम था जो ज्ञान से परे है। यह मनुष्य का स्वभाव नहीं है।

सारा संसार जान ले कि प्रभु मसीह बहुत ही तरस खानेवाला और कोमल दया से भरा है। वह कुचले हुए सरकण्डे को न तोड़ेगा और धुआँ देती हुई बत्ती को न बुझाएगा। जैसे पिता अपने बच्चों पर तरस खाता है, वैसे ही वह अपने डरवैयों पर तरस खाता है। जिस प्रकार माता अपने बच्चे को शान्ति देती है, उसी प्रकार वह अपने लोगों को शान्ति देगा। (याकूब 5:11; मत्ती 12:20; भजन संहिता 103:13; यशायाह 66:13।) वह अपने झुण्ड के मेम्नों की भी चिन्ता करता है और बूढ़ी भेड़ों की भी। वह अपने बाड़े के बीमार और निर्बल जनों की भी चिन्ता करता है और बलवानों की भी। लिखा है कि वह उन्हें अपनी गोद में उठाए रखेगा, पर उन में से एक को भी खोने न देगा। (यशायाह 40:11।) वह अपनी देह के सबसे छोटे अंग की भी चिन्ता करता है और सबसे बड़े अंग की भी। वह अपने परिवार के बालकों की भी चिन्ता करता है और सयाने पुरुषों की भी। वह अपनी वाटिका के सबसे कोमल नन्हे पौधों की भी चिन्ता करता है और लबानोन के देवदार की भी। सब उसकी जीवन की पुस्तक में हैं और सब उसकी देख-रेख में हैं। सब एक सनातन वाचा में उसे सौंपे गए हैं, और उसने सब निर्बलताओं के होते हुए भी हर एक को सुरक्षित घर पहुँचाने का भार अपने ऊपर लिया है। पापी बस विश्वास के द्वारा मसीह को पकड़ ले, तब चाहे वह कितना ही निर्बल हो, मसीह का वचन उससे बँधा हुआ है, "मैं तुझे कभी न छोड़ूँगा और न कभी तुझे त्यागूँगा।" वह कभी-कभी प्रेम से उसे ताड़ना दे सकता है। वह समय-समय पर उसे कोमलता से डाँट सकता है। परन्तु वह उसे कभी, कभी नहीं छोड़ेगा। शैतान उसे मसीह के हाथ से कभी छीन न सकेगा।

सारा संसार जान ले कि प्रभु यीशु अपने विश्वासी लोगों को उनकी कमियों और निर्बलताओं के कारण नहीं त्यागेगा। पति इसलिए अपनी पत्नी को नहीं त्याग देता कि उसमें दोष पाता है। माता इसलिए अपने शिशु को नहीं छोड़ देती कि वह निर्बल, दुर्बल और अनजान है। और प्रभु मसीह उन बेचारे पापियों को नहीं ठुकराता जिन्होंने अपनी आत्माएँ उसके हाथों में सौंप दी हैं, चाहे वह उन में दाग और अपूर्णताएँ देखता हो। अरे नहीं! अपने लोगों के दोषों को क्षमा करना और उनके बहकने को चंगा करना, उनके निर्बल अनुग्रहों को बहुत मानना और उनके बहुत से दोषों को क्षमा करना यही उसकी महिमा है। इब्रानियों का ग्यारहवाँ अध्याय अद्भुत अध्याय है। यह देखना आश्चर्यजनक है कि पवित्र आत्मा उस अध्याय में जिन महान जनों के नाम दर्ज हैं उनके विषय में कैसे बोलता है। वहाँ प्रभु के लोगों का विश्वास सामने रखा गया है और स्मरण किया गया है। परन्तु बहुतेरों के दोष, जिनका वहाँ सरलता से उल्लेख किया जा सकता था, छोड़ दिए गए हैं और उनकी चर्चा तक नहीं की गई।

इस लेख के पाठकों में अब कौन है जो उद्धार की अभिलाषा तो रखता है, परन्तु निश्चय करने से डरता है, कि कहीं आगे चलकर गिर न पड़े? मैं तुमसे विनती करता हूँ, प्रभु यीशु की कोमलता और धीरज पर विचार करो और फिर न डरो। क्रूस उठाने और हियाव के साथ संसार में से निकल आने से मत डरो। वही प्रभु और उद्धारकर्ता जिसने चेलों को सहा, तुम्हें भी सहने को तैयार और इच्छुक है। यदि तुम ठोकर खाओगे तो वह तुम्हें उठाएगा। यदि तुम भटकोगे तो वह कोमलता से तुम्हें लौटा लाएगा। यदि तुम मूर्छित हो जाओगे तो वह तुम्हें फिर जिलाएगा। वह तुम्हें मिस्र से निकालकर जंगल में नाश होने न देगा। वह तुम्हें सुरक्षित प्रतिज्ञा की हुई भूमि में पहुँचाएगा। बस अपने आपको उसकी अगुवाई में सौंप दो, तब, तुम्हारे बदले मेरी आत्मा बाज़ी पर, वह तुम्हें सुरक्षित घर पहुँचाएगा। बस मसीह का शब्द सुनो और उसके पीछे हो लो, और तुम कभी नाश न होगे।

इस लेख के पाठकों में ऐसा कौन है जो मन फिरा चुका है और अपने प्रभु की इच्छा पूरी करना चाहता है? आज अपने स्वामी की कोमलता और धीरज से उदाहरण लो, और दूसरों के प्रति कोमल हृदय और दयालु होना सीखो। नए आरम्भ करनेवालों के साथ नरमी से व्यवहार करो। यह आशा मत रखो कि वे सब कुछ जानें और सब कुछ एकदम समझ लें। उनका हाथ थामो। उन्हें आगे बढ़ाओ और उनका उत्साह बढ़ाओ। उस हृदय को उदास करने के बजाय, जिसे परमेश्वर उदास नहीं करना चाहता, सब बातों की प्रतीति करो और सब बातों की आशा रखो। भटके हुओं के साथ नरमी से व्यवहार करो। उनसे ऐसे मुँह मत फेरो मानो उनका मामला निराशाजनक हो। उन्हें उनके पहले स्थान पर लौटा लाने के लिए हर उचित उपाय करो। अपने आप को और अपनी बार-बार की निर्बलताओं को ध्यान में रखो, और दूसरों के साथ वैसा ही करो जैसा तुम चाहते हो कि तुम्हारे साथ किया जाए। हाय, स्वामी के मन का अभाव उसके अनेक चेलों में दुःखद रूप से दिखाई देता है। मुझे डर है कि आज के दिनों में बहुत कम कलीसियाएँ ऐसी हैं जो अपने प्रभु का इनकार करनेवाले पतरस को कई वर्षों तक फिर से सहभागिता में ग्रहण करतीं। बहुत कम विश्वासी बरनबास का काम करने को तैयार हैं,—नए मन फिरानेवालों का हाथ थामने और उनके पहले कदमों में उनका उत्साह बढ़ाने को तत्पर। सच तो यह है कि हमें विश्वासियों पर आत्मा के उँडेले जाने की लगभग उतनी ही आवश्यकता है जितनी संसार पर।

और अब मुझे अपने पाठकों से बस इतना कहना है कि जो शिक्षाएँ मैंने उनके सामने रखी हैं उनका व्यावहारिक उपयोग करें। आज तुमने पाँच बातें सुनी हैं।

पहली। यह कि मसीह की सेवा तुम्हें कष्टों से नहीं बचाएगी। सबसे पवित्र सन्तों को भी ये कष्ट सहने पड़ते हैं।

दूसरी। यह कि मसीह परमेश्वर होने के साथ-साथ सचमुच मनुष्य भी है।

तीसरी। यह कि विश्वासियों में बहुत निर्बलता और दुर्बलता हो सकती है, फिर भी वे सच्चे विश्वासी हो सकते हैं।

चौथी। यह कि मसीह के पास सारा अधिकार है; और

पाँचवीं। यह कि मसीह अपने लोगों के प्रति धीरज और दया से भरा है। इन पाँचों शिक्षाओं को स्मरण रखो, तो तुम्हारा भला होगा।

कुछ क्षण मेरे साथ धीरज रखो, ताकि मैं कुछ शब्द कहकर तुम्हारे पढ़ी हुई बातों को तुम्हारे हृदय में और गहराई से बैठा दूँ।

(1) इस लेख को सम्भवतः कुछ ऐसे लोग भी पढ़ेंगे जो मसीह की सेवा को अनुभव से नहीं जानते, और न स्वयं मसीह को जानते हैं।

ऐसे लोग बहुत हैं जिन्हें उन बातों में, जिनके विषय में मैं लिखता रहा हूँ, कोई रुचि ही नहीं है। उनका सारा धन नीचे ही है। वे पूरी तरह संसार की बातों में डूबे हुए हैं। उन्हें विश्वासी के संघर्ष, और जूझने, और निर्बलताओं, और सन्देहों, और भय की कोई चिन्ता नहीं।

उन्हें इसकी बहुत कम चिन्ता है कि मसीह मनुष्य है या परमेश्वर। उन्हें इसकी भी कम चिन्ता है कि उसने आश्चर्यकर्म किए या नहीं। यह सब शब्दों, और नामों, और रूपों की बात है, जिनके विषय में वे अपने आप को कष्ट नहीं देते। वे संसार में परमेश्वर के बिना हैं।

यदि संयोग से तुम ऐसे ही मनुष्य हो, तो मैं तुम्हें केवल गम्भीरता से चेतावनी दे सकता हूँ कि तुम्हारा वर्तमान मार्ग सदा नहीं चल सकता। तुम सदा जीवित नहीं रहोगे। अन्त अवश्य आएगा। सफेद बाल, बुढ़ापा, रोग, दुर्बलताएँ, मृत्यु,—ये सब तुम्हारे सामने हैं, और एक दिन तुम्हें इनका सामना करना ही होगा। जब वह दिन आएगा तब तुम क्या करोगे?

आज मेरे शब्दों को स्मरण रखो। जब तुम बीमार और मरते समय होगे तब तुम्हें कोई सान्त्वना न मिलेगी, जब तक यीशु मसीह तुम्हारा मित्र न हो। तुम दुःख और घबराहट के साथ जान जाओगे कि मनुष्य चाहे कितनी ही बातें और डींगें मारें, जब वे मृत्यु-शय्या पर पहुँचते हैं तो मसीह के बिना काम नहीं चला सकते। तुम सेवकों को बुलवा सकते हो, उनसे प्रार्थनाएँ पढ़वा सकते हो, और संस्कार ले सकते हो। तुम मसीही धर्म की हर रीति और विधि पूरी कर सकते हो। परन्तु यदि तुम अपने जीवन के प्रभात में लापरवाह और संसारी जीवन बिताते रहे और मसीह को तुच्छ जाना, तो यदि मसीह तुम्हारे अन्तिम समय में तुम्हें तुम्हारे ही हाल पर छोड़ दे तो आश्चर्य मत करना। हाय! ये गम्भीर वचन हैं, और खेद की बात है कि ये प्रायः पूरे होते हैं: "मैं भी तुम्हारी विपत्ति के समय हँसूँगा; और जब तुम पर भय आ पड़ेगा तब मैं ठट्ठा करूँगा।" (नीतिवचन 1:26)

तो आओ, आज उस मनुष्य की सम्मति मानो जो तुम्हारी आत्मा से प्रेम रखता है। बुराई करना छोड़ दो। भलाई करना सीखो। मूर्खता को त्यागो और समझ के मार्ग में चलो। उस घमण्ड को दूर फेंको जो तुम्हारे हृदय से चिपका है, और प्रभु यीशु को तब तक ढूँढ़ो जब तक वह मिल सकता है। उस आत्मिक आलस्य को दूर फेंको जो तुम्हारी आत्मा को निर्बल बना रहा है, और अपनी बाइबल, अपनी प्रार्थनाओं और अपने रविवारों के विषय में परिश्रम करने का निश्चय करो। उस संसार से नाता तोड़ो जो तुम्हें कभी सचमुच तृप्त नहीं कर सकता, और उस धन को ढूँढ़ो जो अकेला ही सचमुच अविनाशी है। ओह, कि प्रभु के अपने ही वचन तुम्हारे विवेक में स्थान पाएँ! "हे भोले लोगो, तुम कब तक भोलेपन से प्रीति रखोगे? और ठट्ठा करनेवाले कब तक ठट्ठा करने से प्रसन्न होंगे? और मूर्ख कब तक ज्ञान से बैर रखेंगे? तुम मेरी डाँट सुनकर मन फिराओ; सुनो, मैं अपनी आत्मा तुम्हारे लिये उँडेल दूँगा; मैं अपने वचन तुम्हें बताऊँगा।" (नीतिवचन 1:22, 23) मेरा विश्वास है कि यहूदा इस्करियोती का सबसे बड़ा पाप यह था कि उसने क्षमा नहीं माँगी और अपने प्रभु की ओर नहीं लौटा। सावधान रहो, कहीं यह तुम्हारा भी पाप न हो।

(2) यह लेख सम्भवतः कुछ ऐसे लोगों के हाथों में भी पड़ेगा जो प्रभु यीशु से प्रेम रखते हैं और उस पर विश्वास करते हैं, फिर भी उससे और अधिक प्रेम करना चाहते हैं।

यदि तुम ऐसे मनुष्य हो, तो उपदेश के वचन को सह लो और उसे अपने हृदय में बैठा लो।

एक बात के लिए इसे सदा वर्तमान सत्य के रूप में अपने मन में रखो कि प्रभु यीशु एक सचमुच जीवित व्यक्ति है, और उसके साथ वैसा ही व्यवहार करो।

मुझे डर है कि आज के दिनों में अनेक अंगीकार करनेवालों की दृष्टि से हमारे प्रभु का व्यक्तित्व दुःखद रूप से ओझल हो गया है। उनकी बातें उद्धारकर्ता के विषय में कम और उद्धार के विषय में अधिक होती हैं;—छुड़ानेवाले के विषय में कम और छुटकारे के विषय में अधिक;—यीशु के विषय में कम और धर्मी ठहराए जाने के विषय में अधिक;—मसीह के व्यक्तित्व के विषय में कम और मसीह के कार्य के विषय में अधिक। यह बड़ा दोष है, और यही अनेक अंगीकार करनेवालों के धर्म के नीरस और सत्वहीन स्वरूप का पूरा कारण है।

यदि तुम कभी भी अनुग्रह में बढ़ना और विश्वास करने में आनन्द और शान्ति पाना चाहते हो, तो इस भ्रम में पड़ने से सावधान रहो। सुसमाचार को केवल नीरस सिद्धान्तों का संग्रह मानना छोड़ दो। इसके बजाय उसे एक सामर्थी जीवित व्यक्ति का प्रकाशन समझो, जिसकी दृष्टि में तुम्हें प्रतिदिन जीवन बिताना है। उसे केवल अमूर्त प्रस्तावों और गूढ़ सिद्धान्तों तथा नियमों का समूह मानना छोड़ दो। उसे एक महिमामय व्यक्तिगत मित्र से परिचय के रूप में देखो। प्रेरितों ने ठीक इसी प्रकार का सुसमाचार प्रचार किया। वे संसार में घूम-घूमकर मनुष्यों को केवल प्रेम, दया और क्षमा की अमूर्त बातें नहीं सुनाते थे। उनके सब उपदेशों का मुख्य विषय एक वास्तविक जीवित मसीह का प्रेम से भरा हृदय था। यही वह सुसमाचार है जो पवित्रीकरण और महिमा के योग्य बनाने में सबसे अधिक सहायक है। निश्चय ही कोई भी बात हमें उस स्वर्ग के लिए इतनी तैयार नहीं कर सकती, जहाँ मसीह की व्यक्तिगत उपस्थिति ही सब कुछ होगी, और उस महिमा के लिए जहाँ हम मसीह से आमने-सामने मिलेंगे, जितना कि यहाँ पृथ्वी पर मसीह के साथ एक वास्तविक जीवित व्यक्ति के रूप में सहभागिता का अनुभव करना। एक विचार और एक व्यक्ति में धरती-आकाश का अन्तर है।

और एक बात यह है कि इस सत्य को सदा अपने मन में रखने का प्रयत्न करो कि प्रभु यीशु बिलकुल अपरिवर्तित है।

वह उद्धारकर्ता, जिस पर तुम भरोसा रखते हो, कल और आज और युगानुयुग एक सा है। उसमें न कोई परिवर्तन है, न अदल-बदल की छाया। यद्यपि वह स्वर्ग में परमेश्वर के दाहिने हाथ पर विराजमान है, तौभी हृदय से वह वैसा ही है जैसा 1800 वर्ष पहले पृथ्वी पर था। इसे स्मरण रखो, तो तुम्हारा भला होगा।

फिलिस्तीन में उसकी सब यात्राओं में उसके पीछे-पीछे चलो। देखो कि जो कोई उसके पास आया उसने उसे कैसे ग्रहण किया और किसी को निकाल न दिया। देखो कि दुःख की हर कथा सुनने के लिए उसके पास कान थे, हर संकट में सहायता करने के लिए हाथ थे, और जिन्हें सहानुभूति की आवश्यकता थी उन सब के लिए करुणा से भरा हृदय था। फिर अपने आप से कहो, "यही यीशु मेरा प्रभु और उद्धारकर्ता है। स्थान और समय ने उसमें कोई अन्तर नहीं डाला। वह जैसा था, वैसा ही है और सदा वैसा ही रहेगा।"

निश्चय ही यह विचार तुम्हारे प्रतिदिन के धर्म में जीवन और वास्तविकता भर देगा। निश्चय ही यह विचार आनेवाली भली वस्तुओं की तुम्हारी आशा को ठोस आधार और रूप देगा। निश्चय ही यह आनन्दपूर्वक मनन का विषय है कि जो तैंतीस वर्ष पृथ्वी पर रहा और जिसका जीवन हम सुसमाचारों में पढ़ते हैं, वही उद्धारकर्ता है जिसकी उपस्थिति में हम अनन्तकाल बिताएँगे।

इस लेख का अन्तिम वचन वही होगा जो पहला था। मैं चाहता हूँ कि लोग चारों सुसमाचारों को जितना पढ़ते हैं उससे अधिक पढ़ें। मैं चाहता हूँ कि लोग मसीह से अधिक परिचित हों। मैं चाहता हूँ कि अपरिवर्तित लोग यीशु को जानें, कि उसके द्वारा उन्हें अनन्त जीवन मिले। मैं चाहता हूँ कि विश्वासी यीशु को और अच्छी तरह जानें, कि वे अधिक सुखी, अधिक पवित्र और ज्योति में पवित्र लोगों के भाग के योग्य बन जाएँ। सबसे पवित्र मनुष्य वही होगा जो पौलुस के साथ यह कहना सीख ले, "मेरे लिए जीवित रहना मसीह है।" (फिलिप्पियों 1:21।)

XIII. वह कलीसिया जिसे मसीह

बनाता है

"इस पत्थर पर मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा, और अधोलोक के फाटक उस पर प्रबल न होंगे।"—मत्ती 16:18

क्या हम उस कलीसिया के हैं जो चट्टान पर बनी है? क्या हम उस एकमात्र कलीसिया के सदस्य हैं जिसमें हमारी आत्माओं का उद्धार हो सकता है?— ये गम्भीर प्रश्न हैं। ये गम्भीर विचार के योग्य हैं। जो कोई यह लेख पढ़े, मैं उससे ध्यान देने का निवेदन करता हूँ, क्योंकि मैं उस एक सच्ची, पवित्र, सार्वभौमिक कलीसिया को दिखाने का प्रयत्न करूँगा और मनुष्यों के पाँवों को उस एकमात्र सुरक्षित भेड़शाला की ओर चलाऊँगा। "यह कलीसिया क्या है? वह कैसी है? उसके चिह्न क्या हैं? वह कहाँ मिलती है?" इन सब बातों पर मुझे कुछ कहना है। मैं हमारे प्रभु यीशु मसीह के उन वचनों को खोलने जा रहा हूँ जो इस पृष्ठ के शीर्ष पर हैं। वह कहता है, "इस पत्थर पर मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा, और अधोलोक के फाटक उस पर प्रबल न होंगे।"

इन प्रसिद्ध वचनों में पाँच बातें हैं जो हमारा ध्यान माँगती हैं:—

I. एक भवन: "मेरी कलीसिया।"

II. एक बनानेवाला: मसीह कहता है, "मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा।"

III. एक नींव: "इस पत्थर पर मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा।"

IV. निहित संकट: "अधोलोक के फाटक।"

V. घोषित सुरक्षा: "अधोलोक के फाटक उस पर प्रबल न होंगे।"

आज के समय में यह पूरा विषय विशेष ध्यान की माँग करता है। हमें कभी न भूलना चाहिए कि पवित्रता उन सब की प्रमुख विशेषता है जो उस एक सच्ची कलीसिया के हैं।

I. पहले, हमें पाठ में एक भवन का उल्लेख मिलता है। प्रभु यीशु मसीह "मेरी कलीसिया" की बात करता है।

अब यह कलीसिया क्या है? इससे अधिक महत्त्व के प्रश्न बहुत कम पूछे जा सकते हैं। इस विषय पर उचित ध्यान न देने के कारण संसार में जो भ्रम घुस आए हैं वे न थोड़े हैं, न छोटे।

हमारे पाठ की कलीसिया कोई भौतिक भवन नहीं है। वह लकड़ी, ईंट, पत्थर या संगमरमर से हाथों का बनाया हुआ कोई मन्दिर नहीं है। वह स्त्रियों और पुरुषों की एक मण्डली है।—वह पृथ्वी पर कोई विशेष दृश्य कलीसिया नहीं है। वह पूर्वी कलीसिया या पश्चिमी कलीसिया नहीं है। वह इंग्लैंड की कलीसिया या स्कॉटलैंड की कलीसिया नहीं है।—सबसे बढ़कर, वह निश्चय ही रोम की कलीसिया नहीं है। हमारे पाठ की कलीसिया मनुष्य की दृष्टि में किसी भी दृश्य कलीसिया से बहुत कम दिखावा करती है, परन्तु परमेश्वर की दृष्टि में उससे कहीं अधिक महत्त्व रखती है।

हमारे पाठ की कलीसिया प्रभु यीशु मसीह के सब सच्चे विश्वासियों से, उन सब से जो सचमुच पवित्र हैं और जिनका मन फिर गया है, मिलकर बनी है। उसमें वे सब सम्मिलित हैं जिन्होंने पाप से मन फिराया है, विश्वास के द्वारा मसीह की ओर भागे हैं और उसमें नई सृष्टि बनाए गए हैं। उसमें परमेश्वर के सब चुने हुए लोग, वे सब जिन्होंने परमेश्वर का अनुग्रह पाया है, वे सब जो मसीह के लहू से धोए गए हैं, वे सब जिन्हें मसीह की धार्मिकता पहनाई गई है, और वे सब जिनका नया जन्म हुआ और जो मसीह के आत्मा से पवित्र किए गए हैं, सम्मिलित हैं। ऐसे सब लोग, हर नाम, पद, जाति, लोग और भाषा के, हमारे पाठ की कलीसिया बनाते हैं। यही मसीह की देह है। यही मसीह की भेड़ों का झुण्ड है। यही दुल्हिन है। यही मेम्ने की पत्नी है। यही प्रेरितों के विश्वास-वचन और निकेया के विश्वास-वचन की "पवित्र सार्वभौमिक और प्रेरितीय कलीसिया" है। यही इंग्लैंड की कलीसिया की प्रभु-भोज की विधि में कही गई "सब विश्वासयोग्य लोगों की धन्य मण्डली" है। यही "चट्टान पर बनी कलीसिया" है।

इस कलीसिया के सब सदस्य एक ही रीति से परमेश्वर की आराधना नहीं करते, और न ही एक ही प्रकार की शासन-व्यवस्था को मानते हैं। उनमें से कुछ अध्यक्षों के अधीन हैं और कुछ प्राचीनों के अधीन। उनमें से कुछ सार्वजनिक आराधना के समय प्रार्थना-पुस्तक का प्रयोग करते हैं, और कुछ कोई पुस्तक काम में नहीं लाते।

इंग्लैंड की कलीसिया का चौंतीसवाँ अनुच्छेद बड़ी बुद्धिमानी से घोषित करता है, "यह आवश्यक नहीं कि रीति-रिवाज सब स्थानों में एक ही और एक जैसे हों।" परन्तु इस कलीसिया के सब सदस्य एक ही अनुग्रह के सिंहासन के पास आते हैं। वे सब एक ही मन से आराधना करते हैं। वे सब एक ही आत्मा के द्वारा चलाए जाते हैं। वे सब सचमुच और सच्चाई से पवित्र हैं। वे सब "हल्लिलूय्याह" कह सकते हैं, और वे सब उत्तर में "आमीन" कह सकते हैं।

यही वह कलीसिया है जिसकी पृथ्वी की सब दृश्य कलीसियाएँ सेविकाएँ और दासियाँ हैं। चाहे वे एपिस्कोपल हों, इंडिपेंडेंट हों या प्रेस्बिटेरियन, वे सब उसी एक सच्ची कलीसिया के हित की सेवा करती हैं। वे वह ढाँचा हैं जिसकी आड़ में वह महान भवन बनाया जा रहा है। वे वह छिलका हैं जिसके नीचे जीवित गिरी बढ़ती है। उनकी उपयोगिता की भिन्न-भिन्न मात्राएँ हैं। उनमें सबसे उत्तम और योग्य वही है जो मसीह की सच्ची कलीसिया के लिए सबसे अधिक सदस्य तैयार करती है। परन्तु किसी दृश्य कलीसिया को यह कहने का कोई अधिकार नहीं कि "हम ही एकमात्र सच्ची कलीसिया हैं। हम ही लोग हैं, और हमारे साथ ही बुद्धि मर जाएगी।" किसी दृश्य कलीसिया को कभी यह कहने का साहस नहीं करना चाहिए, "हम सदा बने रहेंगे। नरक के फाटक मुझ पर प्रबल न होंगे।"

यही वह कलीसिया है जिसे प्रभु की रक्षा, स्थिरता, सुरक्षा और अन्तिम महिमा की अनुग्रहपूर्ण प्रतिज्ञाएँ प्राप्त हैं। हूकर कहता है, "परमेश्वर अपनी कलीसियाओं पर जो अनन्त प्रेम और उद्धार करनेवाली दया दिखाता है, उसके विषय में हम पवित्रशास्त्र में जो कुछ भी पढ़ते हैं, उसका उचित पात्र केवल यही कलीसिया है, जिसे हम ठीक ही मसीह की रहस्यमय देह कहते हैं।" इस संसार में सच्ची कलीसिया चाहे कितनी ही छोटी और तुच्छ समझी जाए, परमेश्वर की दृष्टि में वह बहुमूल्य और आदरणीय है। सुलैमान का मन्दिर अपनी सारी महिमा के साथ भी उस कलीसिया की तुलना में तुच्छ और घृणित था जो चट्टान पर बनी है।

मुझे आशा है कि जो बातें मैंने अभी कही हैं वे इस लेख के सब पाठकों के मन में गहराई से उतरेंगी। "कलीसिया" के विषय में खरी शिक्षा पर दृढ़ रहें। यहाँ की भूल खतरनाक और आत्मा को नाश करनेवाले भ्रमों तक पहुँचा सकती है। सच्चे विश्वासियों से बनी कलीसिया ही वह कलीसिया है जिसके लिए हम सेवक विशेष रूप से प्रचार करने को ठहराए गए हैं। जिस कलीसिया में वे सब सम्मिलित हैं जो मन फिराते हैं और सुसमाचार पर विश्वास करते हैं, उसी कलीसिया का सदस्य हम आपको देखना चाहते हैं। जब तक आप नई सृष्टि न बन जाएँ और उस एक सच्ची कलीसिया के सदस्य न हो जाएँ, तब तक न हमारा काम पूरा होता है और न हमारे हृदय सन्तुष्ट होते हैं। जो कलीसिया "चट्टान पर बनी है" उसके बाहर कोई उद्धार नहीं।

II. अब मैं उस दूसरी बात की ओर बढ़ता हूँ जिसकी ओर मैंने आपका ध्यान दिलाने का प्रस्ताव रखा था। हमारे पाठ में केवल एक भवन ही नहीं, एक बनानेवाला भी है। प्रभु यीशु मसीह घोषणा करता है, "मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा।"

मसीह की सच्ची कलीसिया की कोमलता से देखभाल धन्य त्रिएकता के तीनों जनों द्वारा की जाती है। बाइबल में प्रकट किए गए उद्धार की योजना में निःसन्देह परमेश्वर पिता चुनता है, परमेश्वर पुत्र छुड़ाता है, और परमेश्वर पवित्र आत्मा मसीह की रहस्यमय देह के हर सदस्य को पवित्र करता है। परमेश्वर पिता, परमेश्वर पुत्र और परमेश्वर पवित्र आत्मा, तीन जन और एक परमेश्वर, हर उद्धार पाई हुई आत्मा के उद्धार के लिए मिलकर कार्य करते हैं। यह वह सत्य है जिसे कभी नहीं भूलना चाहिए। फिर भी एक विशेष अर्थ में कलीसिया की सहायता का भार प्रभु यीशु मसीह पर रखा गया है। वही विशेष रूप से और सर्वोपरि रूप से कलीसिया का छुड़ानेवाला और उद्धारकर्ता है। इसीलिए हम उसे हमारे पाठ में यह कहते हुए पाते हैं, "मैं बनाऊँगा"—भवन बनाने का कार्य मेरा विशेष कार्य है।

यह मसीह ही है जो कलीसिया के सदस्यों को ठीक समय पर बुलाता है। वे "यीशु मसीह के बुलाए हुए" हैं। (रोमियों 1:6।) यह मसीह ही है जो उन्हें जिलाता है। "पुत्र जिन्हें चाहता है उन्हें जिलाता है।" (यूहन्ना 5:21।) यह मसीह ही है जो उनके पापों को धो देता है। उसने "हम से प्रेम किया, और अपने लहू के द्वारा हमें हमारे पापों से छुड़ाया।" (प्रकाशितवाक्य 1:5।) यह मसीह ही है जो उन्हें शान्ति देता है। "मैं तुम्हें शान्ति दिए जाता हूँ, अपनी शान्ति तुम्हें देता हूँ।" (यूहन्ना

14:27।) यह मसीह ही है जो उन्हें अनन्त जीवन देता है। "मैं उन्हें अनन्त जीवन देता हूँ, और वे कभी नाश न होंगी।" (यूहन्ना 10:28।) यह मसीह ही है जो उन्हें मन फिराव प्रदान करता है। "उसी को परमेश्वर ने प्रधान और उद्धारकर्ता ठहराकर अपने दाहिने हाथ से सर्वोच्च कर दिया, कि वह मन फिराव को दे।" (प्रेरितों के काम 5:31।) यह मसीह ही है जो उन्हें परमेश्वर की सन्तान बनने के योग्य करता है। "जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्वर की सन्तान होने का अधिकार दिया।" (यूहन्ना 1:12।) यह मसीह ही है जो उनके भीतर आरम्भ हुए कार्य को आगे बढ़ाता है। "इसलिए कि मैं जीवित हूँ, तुम भी जीवित रहोगे।" (यूहन्ना 14:19।) संक्षेप में, "पिता की यह प्रसन्नता हुई कि सारी परिपूर्णता मसीह में वास करे।" (कुलुस्सियों 1:19।) वह विश्वास का कर्ता और सिद्ध करनेवाला है। वह जीवन है। वह सिर है। उसी से मसीहियों की रहस्यमय देह का हर जोड़ और अंग पोषण पाता है। उसी के द्वारा वे कर्तव्य के लिए सामर्थ्य पाते हैं। उसी के द्वारा वे गिरने से बचाए रखे जाते हैं। वह उन्हें अन्त तक सम्भाले रखेगा, और अत्यन्त आनन्द के साथ उन्हें पिता के सिंहासन के सामने निर्दोष करके खड़ा करेगा। वह सब विश्वासियों में सब कुछ है।

वह सामर्थी एजेंट, जिसके द्वारा प्रभु यीशु मसीह अपनी कलीसिया के सदस्यों में यह कार्य पूरा करता है, निःसन्देह पवित्र आत्मा है। वही मसीह और उसके लाभों को आत्मा पर लागू करता है। वही नित्य नया करता, जगाता, कायल करता, क्रूस तक ले जाता, रूपान्तरित करता, और संसार में से पत्थर पर पत्थर निकालकर उसे रहस्यमय भवन में जोड़ता रहता है। परन्तु महान प्रधान राजमिस्त्री, जिसने छुटकारे का कार्य पूरा करके उसे सिद्धता तक पहुँचाने का भार उठाया है, वह परमेश्वर का पुत्र है, वह "वचन जो शरीर बना।" वह यीशु मसीह ही है जो "बनाता है।"

सच्ची कलीसिया के निर्माण में प्रभु यीशु अनेक अधीनस्थ साधनों को काम में लाने की कृपा करता है। सुसमाचार की सेवकाई, पवित्रशास्त्र का प्रसार, मित्रवत् डाँट, समय पर कहा गया वचन, दुःखों का खींचनेवाला प्रभाव,—ये सब वे साधन और उपाय हैं जिनके द्वारा उसका कार्य आगे बढ़ता है और आत्मा प्राणों में जीवन पहुँचाता है। परन्तु मसीह ही वह महान् निरीक्षक वास्तुकार है, जो जो कुछ किया जाता है उस सब का प्रबन्ध, मार्गदर्शन और निर्देशन करता है। पौलुस तो लगा सकता है और अपुल्लोस सींच सकता है, परन्तु बढ़ानेवाला परमेश्वर है। (1 कुरिन्थियों 3:6।) सेवक प्रचार कर सकते हैं और लेखक लिख सकते हैं, परन्तु निर्माण केवल प्रभु यीशु मसीह ही कर सकता है। और यदि वह निर्माण न करे, तो कार्य रुका ही रहता है।

प्रभु यीशु मसीह जिस बुद्धि से अपनी कलीसिया का निर्माण करता है वह कितनी महान् है! सब कुछ ठीक समय पर और ठीक रीति से किया जाता है। हर पत्थर अपनी बारी पर अपने ठीक स्थान पर रखा जाता है। कभी वह बड़े पत्थर चुनता है और कभी छोटे। कभी कार्य शीघ्रता से बढ़ता है और कभी धीरे-धीरे। मनुष्य प्रायः अधीर हो जाता है और सोचता है कि कुछ नहीं हो रहा। परन्तु मनुष्य का समय परमेश्वर का समय नहीं है। उसकी दृष्टि में हज़ार वर्ष केवल एक दिन के बराबर हैं। वह महान् निर्माणकर्ता कभी भूल नहीं करता। वह जानता है कि वह क्या कर रहा है। वह आदि से अन्त को देखता है। वह एक सिद्ध, अटल और निश्चित योजना के अनुसार कार्य करता है। माइकल एंजेलो और रेन जैसे वास्तुकारों की सबसे भव्य कल्पनाएँ भी मसीह की अपनी कलीसिया के विषय में बुद्धिमान् योजनाओं की तुलना में मात्र तुच्छ और बच्चों का खेल हैं।

अपनी कलीसिया के निर्माण में मसीह जो करुणा और दया प्रकट करता है वह कितनी महान् है! वह प्रायः सबसे अनुपयुक्त और सबसे खुरदरे पत्थरों को चुनता है और उन्हें एक अति उत्तम कार्य में बैठा देता है। वह पिछले पापों और बीते अपराधों के कारण किसी को तुच्छ नहीं जानता और किसी को ठुकराता नहीं। वह प्रायः फरीसियों और चुंगी लेनेवालों को अपने घर के खम्भे बना देता है। उसे दया दिखाने में आनन्द आता है। वह प्रायः सबसे अधिक असावधान और अभक्त लोगों को लेकर उन्हें अपने आत्मिक मन्दिर के सुघड़ कोने के पत्थर बना देता है।

अपनी कलीसिया के निर्माण में मसीह जो सामर्थ्य प्रदर्शित करता है वह कितनी महान् है! वह संसार, शरीर और शैतान के विरोध के होते हुए भी अपना कार्य चलाता रहता है। आँधी में, तूफ़ान में, कठिन समयों में, चुपचाप, शान्ति से, बिना शोर के, बिना हलचल के, बिना उत्तेजना के, निर्माण सुलैमान के मन्दिर के समान आगे बढ़ता जाता है। वह घोषणा करता है, "मैं काम करूँगा, तो कौन उसे रोक सकता है?" (यशायाह 43:13।)

इस संसार की सन्तान इस कलीसिया के निर्माण में बहुत कम या बिलकुल रुचि नहीं लेती। उन्हें प्राणों के मन फिराव की कोई चिन्ता नहीं। टूटे हुए आत्माओं और पछतानेवाले हृदयों से उनका क्या लेना-देना? पाप का बोध या प्रभु यीशु पर विश्वास उनके लिए क्या मायने रखता है? उनकी दृष्टि में यह सब "मूर्खता" है। परन्तु जब संसार की सन्तान को कोई चिन्ता नहीं, तब परमेश्वर के स्वर्गदूतों के सामने आनन्द मनाया जाता है। सच्ची कलीसिया की रक्षा के लिए प्रकृति के नियम बहुत बार रोक दिए गए हैं। उस कलीसिया की भलाई के लिए इस संसार में परमेश्वर के सारे विधान के कार्य नियोजित और व्यवस्थित किए जाते हैं। चुने हुए लोगों के कारण युद्ध समाप्त किए जाते हैं और किसी जाति को शान्ति दी जाती है। राजनेताओं, शासकों, सम्राटों, राजाओं, राष्ट्रपतियों और सरकारों के प्रधानों की अपनी योजनाएँ और युक्तियाँ होती हैं, और वे उन्हें बहुत महत्त्वपूर्ण समझते हैं। परन्तु एक और कार्य चल रहा है जो अनन्त गुना अधिक महत्त्व का है, जिसके लिए वे परमेश्वर के हाथों में केवल "कुल्हाड़ी और आरी" हैं। (यशायाह 10:15।) वह कार्य मसीह के आत्मिक मन्दिर का निर्माण है, अर्थात् जीवते पत्थरों को एक ही सच्ची कलीसिया में इकट्ठा करना।

हमें गहराई से धन्यवादी होना चाहिए कि सच्ची कलीसिया के निर्माण का भार एक सामर्थी के कन्धों पर रखा गया है। यदि कार्य मनुष्य पर निर्भर होता, तो वह शीघ्र ही रुक जाता। परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो, कार्य उस निर्माणकर्ता के हाथों में है जो अपनी योजनाओं को पूरा करने में कभी असफल नहीं होता! मसीह सर्वशक्तिमान् निर्माणकर्ता है। वह अपना कार्य चलाता रहेगा, चाहे जातियाँ और दृश्य कलीसियाएँ अपना कर्तव्य न जानें। मसीह कभी असफल न होगा। जिस कार्य को उसने हाथ में लिया है उसे वह निश्चय ही पूरा करेगा।

III.—अब मैं उस तीसरी बात पर आता हूँ जिस पर मैंने विचार करने का प्रस्ताव रखा था,—वह नींव जिस पर यह कलीसिया बनी है। प्रभु यीशु मसीह हमें बताता है, "इस चट्टान पर मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा"

जब प्रभु यीशु मसीह ने इस नींव के विषय में कहा तो उसका क्या अर्थ था? क्या उसका अर्थ प्रेरित पतरस से था, जिससे वह बात कर रहा था? मेरे विचार में निश्चय ही नहीं। यदि उसका अर्थ पतरस से होता, तो मुझे कोई कारण नहीं दिखता कि उसने यह क्यों न कहा, "तुझ पर" मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा। यदि उसका अर्थ पतरस से होता, तो वह निश्चय ही यह उतनी ही स्पष्टता से कहता कि मैं अपनी कलीसिया तुझ पर बनाऊँगा, जितनी स्पष्टता से उसने कहा, "मैं तुझे कुंजियाँ दूँगा।"—नहीं, वह प्रेरित पतरस का व्यक्तित्व नहीं, परन्तु वह उत्तम अंगीकार था जो प्रेरित ने अभी-अभी किया था! वह पतरस नहीं, जो भूल करनेवाला और अस्थिर मनुष्य था, परन्तु वह सामर्थी सत्य था जो पिता ने पतरस पर प्रकट किया था। चट्टान स्वयं यीशु मसीह के विषय का सत्य था। वह मसीह की मध्यस्थता और मसीह का मसीहापन था। वह धन्य सत्य यह था कि यीशु ही प्रतिज्ञा किया हुआ उद्धारकर्ता, सच्चा ज़मानतदार और परमेश्वर और मनुष्य के बीच वास्तविक मध्यस्थता करनेवाला है। यही वह चट्टान थी, और यही वह नींव, जिस पर मसीह की कलीसिया बनाई जानी थी।

सच्ची कलीसिया की नींव बड़ी कीमत पर रखी गई। इसके लिए आवश्यक था कि परमेश्वर का पुत्र हमारा स्वभाव धारण करे, और उसी स्वभाव में जीए, दुःख उठाए और मरे, अपने पापों के लिए नहीं, परन्तु हमारे पापों के लिए। इसके लिए आवश्यक था कि उसी स्वभाव में मसीह कब्र में जाए और फिर जी उठे। इसके लिए आवश्यक था कि उसी स्वभाव में मसीह स्वर्ग पर चढ़ जाए, कि परमेश्वर के दाहिने हाथ बैठे, और अपने सब लोगों के लिए अनन्त छुटकारा प्राप्त कर चुका हो। कोई और नींव खोए हुए, दोषी, भ्रष्ट, निर्बल और असहाय पापियों की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकती थी।

वह नींव, एक बार प्राप्त हो जाने पर, अत्यन्त दृढ़ है। वह सारे जगत के पापों का भार उठा सकती है। जिन विश्वासियों ने उस पर निर्माण किया है उन सब के सारे पापों का भार उसने उठाया है। विचार के पाप, कल्पना के पाप, हृदय के पाप, मन के पाप, वे पाप जिन्हें हर एक ने देखा है, और वे पाप जिन्हें कोई मनुष्य नहीं जानता, परमेश्वर के विरुद्ध पाप, और मनुष्य के विरुद्ध पाप, सब प्रकार और सब रूप के पाप, वह सामर्थी चट्टान इन सब पापों का भार उठा सकती है और टल नहीं सकती। मसीह की मध्यस्थता का पद सारे जगत के सारे पापों के लिए पर्याप्त उपाय है।

मसीह की सच्ची कलीसिया का हर एक सदस्य इसी एक नींव से जुड़ा हुआ है। बहुत सी बातों में विश्वासी बँटे हुए और असहमत हैं। परन्तु अपनी आत्मा की नींव के विषय में वे सब एक मन के हैं। चाहे एपिस्कोपल हों या प्रेस्बिटेरियन, बैपटिस्ट हों या मेथोडिस्ट, सब विश्वासी एक ही स्थान पर मिलते हैं। वे सब चट्टान पर बने हैं। उनसे पूछो कि उन्हें अपनी शान्ति, आशा और आनेवाली भलाइयों की आनन्दमय प्रत्याशा कहाँ से मिलती है। तुम पाओगे कि यह सब उसी एक सामर्थी स्रोत से बहता है, अर्थात् परमेश्वर और मनुष्य के बीच मध्यस्थ मसीह से, और उस पद से जो मसीह पापियों के महायाजक और जमानती के रूप में धारण करता है।

यदि तुम जानना चाहते हो कि तुम उस एक सच्ची कलीसिया के सदस्य हो या नहीं, तो अपनी नींव को देखो। यह ऐसी बात है जिसे तुम स्वयं जान सकते हो। तुम्हारी सार्वजनिक आराधना हम देख सकते हैं; परन्तु हम यह नहीं देख सकते कि तुम व्यक्तिगत रूप से चट्टान पर बने हो या नहीं। प्रभु की मेज़ पर तुम्हारी उपस्थिति हम देख सकते हैं; परन्तु हम यह नहीं देख सकते कि तुम मसीह से जुड़े हो, मसीह के साथ एक हो, और मसीह तुम में है। सावधान रहो कि अपने निज उद्धार के विषय में तुमसे कोई भूल न हो। देखो कि तुम्हारी अपनी आत्मा चट्टान पर है। इसके बिना और सब कुछ व्यर्थ है। इसके बिना तुम न्याय के दिन खड़े न रह सकोगे। उस दिन महल में रेत पर पाए जाने से हज़ार गुना अच्छा है एक झोपड़ी में "चट्टान पर" पाया जाना!

4. चौथे स्थान पर मैं कलीसिया की उन अन्तर्निहित परीक्षाओं के विषय में कहने लगता हूँ जिनका हमारे पाठ में संकेत है। वहाँ "नरक के फाटकों" का उल्लेख है। इस कथन से हमें नरक के राजा, अर्थात् शैतान, की सामर्थ्य समझनी चाहिए। (तुलना करो भजन संहिता 9:13; 107:18; यशायाह 38:10।)

मसीह की सच्ची कलीसिया का इतिहास सदा संघर्ष और युद्ध का रहा है। उस पर निरन्तर एक घातक शत्रु, अर्थात् इस संसार के राजा शैतान, का आक्रमण होता रहा है। शैतान मसीह की सच्ची कलीसिया से अमिट घृणा रखता है। वह उसके सब सदस्यों के विरुद्ध सदा विरोध भड़काता रहता है। वह संसार के लोगों को सदा अपनी इच्छा पूरी करने और परमेश्वर के लोगों को हानि पहुँचाने और सताने के लिए उकसाता रहता है। यदि वह सिर को कुचल नहीं सकता, तो वह एड़ी को कुचलेगा। यदि वह विश्वासियों को स्वर्ग से वंचित नहीं कर सकता, तो मार्ग में उन्हें सताएगा।

नरक की शक्तियों से युद्ध मसीह की सारी देह का अनुभव छः हज़ार वर्षों से रहा है। वह सदा एक ऐसी झाड़ी रही है जो जलती तो है पर भस्म नहीं होती, एक ऐसी स्त्री जो जंगल में भागती है पर निगली नहीं जाती। (निर्गमन 3:2; प्रकाशितवाक्य 12:6, 16।) दृश्य कलीसियाओं के उन्नति के समय और शान्ति के दिन होते हैं, परन्तु सच्ची कलीसिया के लिए शान्ति का कोई समय कभी नहीं रहा। उसका संघर्ष निरन्तर है। उसका युद्ध कभी समाप्त नहीं होता।

नरक की शक्तियों से युद्ध सच्ची कलीसिया के हर एक सदस्य का अनुभव है। हर एक को लड़ना पड़ता है। सब सन्तों के जीवन युद्धों के वृत्तान्त नहीं तो और क्या हैं? पौलुस, याकूब, पतरस, यूहन्ना, पॉलीकार्प, क्रिसोस्टम, ऑगस्टीन, लूथर, कैल्विन, लैटिमर और बैक्स्टर जैसे लोग निरन्तर युद्ध में लगे सैनिक नहीं तो और क्या थे? कभी सन्तों पर स्वयं आक्रमण हुआ है, और कभी उनकी सम्पत्ति पर। कभी उन्हें निन्दा और झूठे अपवादों से सताया गया है, और कभी खुले उत्पीड़न से। परन्तु किसी न किसी रीति से शैतान कलीसिया से निरन्तर लड़ता रहा है। "नरक के फाटक" मसीह के लोगों पर निरन्तर धावा करते रहे हैं।

हम जो सुसमाचार का प्रचार करते हैं, उन सब को जो मसीह के पास आते हैं "बड़ी और अनमोल प्रतिज्ञाएँ" दे सकते हैं। (2 पतरस 1:4।) हम अपने स्वामी के नाम से साहसपूर्वक तुम्हें परमेश्वर की वह शान्ति दे सकते हैं जो सारी समझ से परे है। हर उस व्यक्ति को जो मसीह के पास आए और उस पर विश्वास करे, दया, मुफ़्त अनुग्रह और पूर्ण उद्धार दिया जाता है। परन्तु हम तुम्हें संसार या शैतान के साथ शान्ति की प्रतिज्ञा नहीं देते। इसके विपरीत हम तुम्हें चेतावनी देते हैं कि जब तक तुम देह में हो, युद्ध अवश्य होगा। हम तुम्हें रोकना या मसीह की सेवा से हटाना नहीं चाहते। परन्तु हम चाहते हैं कि तुम "गिन लो" और भली-भाँति समझ लो कि मसीह की सेवा में क्या-क्या सम्मिलित है। (लूका 14:28।)

(क) नरक के फाटकों की शत्रुता पर आश्चर्य मत करो। "यदि तुम संसार के होते, तो संसार अपनों से प्रीति रखता।" (यूहन्ना 15:19।) जब तक संसार संसार है और शैतान शैतान, तब तक युद्ध अवश्य रहेगा, और मसीह के विश्वासियों को सैनिक होना ही होगा। संसार ने मसीह से बैर किया, और जब तक पृथ्वी बनी है संसार सच्चे मसीहियों से बैर करेगा। जैसा महान धर्म-सुधारक लूथर ने कहा, "जब तक कलीसिया पृथ्वी पर है, कैन हाबिल की हत्या करता रहेगा।"

(ख) नरक के फाटकों की शत्रुता के लिए तैयार रहो। परमेश्वर के सारे हथियार बाँध लो। दाऊद के गुम्मट में हज़ार ढालें टँगी हैं, जो परमेश्वर के लोगों के काम के लिए पूरी तरह तैयार हैं। हमारे युद्ध के हथियारों को हमारे ही जैसे लाखों दीन पापियों ने आज़माया है, और वे कभी विफल नहीं पाए गए।

(ग) नरक के फाटकों की शत्रुता में धीरज रखो। यह सब तुम्हारी भलाई के लिए एक साथ काम कर रहा है। यह पवित्र करने में सहायक होता है। यह तुम्हें जागता रखेगा। यह तुम्हें दीन बनाएगा। यह तुम्हें प्रभु यीशु मसीह के और निकट ले आएगा। यह तुम्हें संसार से छुड़ाएगा। यह तुम्हें अधिक प्रार्थना करने में सहायता देगा। सबसे बढ़कर, यह तुम्हारे मन में स्वर्ग की लालसा जगाएगा। यह तुम्हें सिखाएगा कि तुम होंठों से ही नहीं, मन से भी कहो, "हे प्रभु यीशु, आ। तेरा राज्य आए।"

(द) नरक की शत्रुता से हतोत्साहित न हो। परमेश्वर की सच्ची सन्तान का संघर्ष उतना ही अनुग्रह का चिन्ह है जितनी वह आन्तरिक शान्ति जिसका वह आनन्द लेता है। क्रूस नहीं तो मुकुट नहीं! संघर्ष नहीं तो उद्धार देनेवाली मसीहियत नहीं! हमारे प्रभु यीशु मसीह ने कहा, "धन्य हो तुम, जब मनुष्य मेरे कारण तुम्हारी निन्दा करें, और सताएँ और झूठ बोल बोलकर तुम्हारे विरोध में सब प्रकार की बुरी बात कहें।" यदि धर्म के कारण तुम पर कभी सताव नहीं आता, और सब मनुष्य तुम्हारी प्रशंसा ही करते हैं, तो तुम्हें यह सन्देह करने का पूरा कारण है कि तुम "चट्टान पर बनी कलीसिया" के हो भी या नहीं। (मत्ती 5:11; लूका 6:26।)

5. अब एक बात और विचार करने को रह गई है—मसीह की सच्ची कलीसिया की सुरक्षा। निर्माता की ओर से एक महिमामय प्रतिज्ञा दी गई है, "अधोलोक के फाटक उस पर प्रबल न होंगे।"

जो झूठ नहीं बोल सकता, उसने अपना वचन दिया है कि नरक की सारी शक्तियाँ उसकी कलीसिया को कभी उलट न सकेंगी। वह हर आक्रमण के होते हुए भी बनी रहेगी और स्थिर खड़ी रहेगी। वह कभी पराजित न होगी। सृष्ट की हुई सब अन्य वस्तुएँ नष्ट होती और मिटती जाती हैं, परन्तु वह कलीसिया नहीं जो चट्टान पर बनी है।

साम्राज्य शीघ्रता से एक के बाद एक उठे और गिरे हैं। मिस्र, अश्शूर, बाबुल, फारस, सोर, कार्थेज, रोम, यूनान, वेनिस—ये सब आज कहाँ हैं? ये सब मनुष्य के हाथ की रचनाएँ थीं, और मिट गईं। परन्तु मसीह की सच्ची कलीसिया जीवित है।

सबसे सामर्थी नगर खण्डहरों के ढेर बन गए हैं। बाबुल की चौड़ी शहरपनाह धूल में मिल गई है। नीनवे के राजमहल धूल के टीलों से ढके हैं। थेबेस के सौ फाटक अब केवल इतिहास की बात हैं। सोर वह स्थान है जहाँ मछुए अपने जाल सुखाते हैं। कार्थेज उजाड़ पड़ा है। फिर भी इस सारे समय में सच्ची कलीसिया खड़ी है। अधोलोक के फाटक उस पर प्रबल नहीं होते।

सबसे आरम्भिक दृश्य कलीसियाएँ बहुत सी जगहों पर क्षीण होकर नष्ट हो गईं। इफिसुस की कलीसिया और अन्ताकिया की कलीसिया कहाँ है? अलेक्जेंड्रिया की कलीसिया और कुस्तुन्तुनिया की कलीसिया कहाँ है? कुरिन्थ, फिलिप्पी और थिस्सलुनीके की कलीसियाएँ कहाँ हैं? वास्तव में वे सब कहाँ हैं? वे परमेश्वर के वचन से भटक गईं। उन्हें अपने अध्यक्षों, महासभाओं, रीतियों, विद्या और प्राचीनता पर गर्व था। उन्होंने मसीह के सच्चे क्रूस पर घमण्ड नहीं किया। उन्होंने सुसमाचार को दृढ़ता से नहीं थामे रखा। उन्होंने प्रभु यीशु को उसका उचित पद और विश्वास को उसका उचित स्थान नहीं दिया। अब वे बीती हुई बातों में गिनी जाती हैं। उनका दीवट हटा लिया गया है। परन्तु इस सारे समय में सच्ची कलीसिया जीवित रही है।

क्या सच्ची कलीसिया एक देश में सताई गई है? वह दूसरे देश को भाग गई है।—क्या एक भूमि पर वह रौंदी और दबाई गई है? उसने किसी दूसरी जलवायु में जड़ पकड़ी और फली-फूली है।—आग, तलवार, कारागार, जुर्माने और दण्ड उसकी जीवन-शक्ति को कभी नष्ट नहीं कर सके। उसके सतानेवाले मर गए और अपने स्थान को चले गए, परन्तु परमेश्वर का वचन जीवित रहा, बढ़ा और फैलता गया। यह सच्ची कलीसिया मनुष्य की आँखों को चाहे जितनी निर्बल दिखे, वह एक ऐसी निहाई है जिस पर बीते समयों में अनेक हथौड़े टूटे हैं, और सम्भवतः अन्त तक और भी बहुत टूटेंगे। "जो तुम्हें छूता है, वह उसकी आँख की पुतली को छूता है।" (जकर्याह 2:8।)

हमारे पाठ की प्रतिज्ञा सच्ची कलीसिया की सम्पूर्ण देह के विषय में सत्य है। मसीह संसार में कभी बिना साक्षी के न होगा। बुरे से बुरे समयों में भी उसके अपने लोग रहे हैं। अहाब के दिनों में भी इस्राएल में उसके सात हज़ार थे। मेरा विश्वास है कि अब भी रोमी और यूनानी कलीसियाओं के अन्धकारपूर्ण स्थानों में कुछ लोग हैं, जो बहुत निर्बलता के होते हुए भी मसीह की सेवा करते हैं। शैतान भयंकर रूप से उग्र हो सकता है। कुछ देशों में कलीसिया बहुत नीची दशा में पहुँच सकती है। परन्तु अधोलोक के फाटक कभी पूरी तरह "प्रबल" न होंगे।

हमारे पाठ की प्रतिज्ञा कलीसिया के हर एक सदस्य के विषय में भी सत्य है। परमेश्वर के कुछ लोग इतने हतोत्साहित और व्याकुल हुए हैं कि उन्होंने अपनी सुरक्षा से निराशा कर ली। कुछ बुरी तरह गिरे, जैसे दाऊद और पतरस गिरे। कुछ थोड़े समय के लिए विश्वास से हट गए, जैसे क्रैनमर और ज्यूएल। बहुतों की परीक्षा कठोर सन्देहों और भयों से हुई है। परन्तु सब अन्त में सुरक्षित घर पहुँच गए, सबसे छोटे भी और सबसे बड़े भी, सबसे निर्बल भी और सबसे सबल भी।—और अन्त तक ऐसा ही होगा। क्या तुम कल के सूर्य को उगने से रोक सकते हो? क्या तुम ब्रिस्टल की खाड़ी के ज्वार को चढ़ने-उतरने से रोक सकते हो? क्या तुम ग्रहों को उनकी अपनी कक्षाओं में चलने से रोक सकते हो? तब, और केवल तब ही, तुम किसी विश्वासी का उद्धार रोक सकते हो, चाहे वह कितना ही निर्बल हो,—उस कलीसिया के किसी जीवते पत्थर की अन्तिम सुरक्षा को रोक सकते हो जो चट्टान पर बनी है, चाहे वह पत्थर कितना ही छोटा या तुच्छ क्यों न दिखे।

सच्ची कलीसिया मसीह की देह है। उस रहस्यमय देह की एक भी हड्डी कभी तोड़ी न जाएगी।—सच्ची कलीसिया मसीह की दुल्हिन है। जिन्हें परमेश्वर ने अनन्त वाचा में जोड़ा है, वे कभी अलग न किए जाएँगे।—सच्ची कलीसिया मसीह की भेड़-बकरियों का झुण्ड है। जब सिंह आकर दाऊद के झुण्ड में से मेम्ना उठा ले गया, तब दाऊद उठा और उसे उसके मुँह से छुड़ा लाया। मसीह भी ऐसा ही करेगा। वह दाऊद का उससे बड़ा पुत्र है। मसीह के झुण्ड का एक भी रोगी मेम्ना नष्ट न होगा। वह अन्तिम दिन अपने पिता से कहेगा, "जिन्हें तू ने मुझे दिया, उनमें से मैं ने एक को भी न खोया।" (यूहन्ना 18:9।)—सच्ची कलीसिया पृथ्वी का गेहूँ है। उसे फटका जा सकता है, ओसाया जा सकता है, थपेड़े खिलाए और इधर-उधर उछाले जा सकते हैं। परन्तु एक दाना भी न खोएगा। जंगली दाने और भूसी जलाई जाएगी। गेहूँ खत्ते में इकट्ठा किया जाएगा।—सच्ची कलीसिया मसीह की सेना है। हमारे उद्धार का सेनापति अपने किसी सैनिक को नहीं खोता। उसकी योजनाएँ कभी विफल नहीं होतीं। उसकी रसद कभी नहीं घटती। उसकी सैनिक-सूची अन्त में भी वही है जो आरम्भ में थी। कुछ वर्ष पहले क्रीमिया के युद्ध में जो पुरुष वीरता से इंग्लैण्ड से कूच करके गए, उनमें से कितने कभी लौटकर नहीं आए! जो पलटनें बाजे बजाते और झण्डे लहराते हुए सबल और प्रसन्न होकर निकलीं, उनकी हड्डियाँ परदेश में पड़ी रहीं, और वे अपने देश को कभी न लौटीं। परन्तु मसीह की सेना के साथ ऐसा नहीं है। अन्त में उसका एक भी सैनिक कम न होगा। वह स्वयं घोषणा करता है, "वे कभी नष्ट न होंगी।" (यूहन्ना 10:28।)

शैतान सच्ची कलीसिया के कुछ सदस्यों को बन्दीगृह में डलवा सकता है। वह मार सकता है, जला सकता है, यातना दे सकता है और फाँसी पर लटकवा सकता है। परन्तु देह को मार डालने के बाद वह और कुछ नहीं कर सकता। वह आत्मा को हानि नहीं पहुँचा सकता। कुछ वर्ष पहले जब फ्रांसीसी सेना ने रोम पर अधिकार किया, तो उन्हें इन्क्विज़िशन के अधीन एक बन्दीगृह की कोठरी की दीवारों पर एक बन्दी के शब्द मिले। वह कौन था, हम नहीं जानते। परन्तु उसके शब्द स्मरण रखने योग्य हैं। "वह मरने पर भी अब तक बोलता है।" उसने दीवारों पर, सम्भवतः एक अन्यायपूर्ण मुकद्दमे और उससे भी अधिक अन्यायपूर्ण बहिष्कार के बाद, ये मर्मस्पर्शी शब्द लिखे थे:—"धन्य यीशु, वे मुझे तेरी सच्ची कलीसिया से बाहर नहीं निकाल सकते।" यह लेख सत्य है! शैतान की सारी सामर्थ्य मिलकर भी मसीह की सच्ची कलीसिया में से एक भी विश्वासी को बाहर नहीं निकाल सकती।

मुझे भरोसा है कि इस लेख का कोई भी पाठक कभी भय को मसीह की सेवा आरम्भ करने से रोकने नहीं देगा। जिसे तुम अपनी आत्मा सौंपते हो, उसे स्वर्ग और पृथ्वी में सारा अधिकार प्राप्त है, और वह तुम्हारी रक्षा करेगा। वह तुम्हें कभी त्यागे जाने नहीं देगा। सम्बन्धी विरोध कर सकते हैं। पड़ोसी उपहास कर सकते हैं। संसार निन्दा, हँसी-ठट्ठा, मज़ाक और ताने कर सकता है। मत डरो! मत डरो! नरक की सामर्थ्य तुम्हारी आत्मा पर कभी प्रबल नहीं होगी। जो तुम्हारे पक्ष में है, वह उन सब से बड़ा है जो तुम्हारे विरोध में हैं।

जब सेवक मर जाएँ और सन्त उठा लिए जाएँ, तब मसीह की कलीसिया के लिए मत डरो। मसीह सदा अपने कार्य को स्थिर रख सकता है। वह उत्तम सेवक और अधिक तेजस्वी तारे खड़े करेगा। सब तारे उसके दाहिने हाथ में हैं। भविष्य के विषय में सारी चिन्ता छोड़ दो। राजनीतिज्ञों के उपायों या भेड़ों के भेष में भेड़ियों के षड्यन्त्रों से निराश होना छोड़ दो। मसीह सदा अपनी कलीसिया का प्रबन्ध करेगा। मसीह इस बात का ध्यान रखेगा कि "अधोलोक के फाटक उस पर प्रबल न होंगे।" सब कुछ भली रीति से चल रहा है, चाहे हमारी आँखें उसे न देख पाएँ। इस जगत के राज्य अवश्य ही हमारे परमेश्वर और उसके मसीह के राज्य बन जाएँगे।

अब मैं इस लेख को व्यावहारिक प्रयोग के कुछ शब्दों के साथ समाप्त करता हूँ।

(1) प्रयोग का मेरा पहला शब्द एक प्रश्न होगा। वह प्रश्न क्या होगा? मैं क्या पूछूँ? मैं उसी बात पर लौटता हूँ जिससे मैंने आरम्भ किया था। मैं अपने लेख के प्रारम्भिक वाक्य पर लौटता हूँ। मैं तुमसे पूछता हूँ, क्या तुम मसीह की एक सच्ची कलीसिया के सदस्य हो? क्या तुम परमेश्वर की दृष्टि में सर्वोच्च और उत्तम अर्थ में "कलीसिया के सदस्य" हो? अब तुम जानते हो कि मेरा अभिप्राय क्या है। मैं इंग्लैण्ड की कलीसिया से बहुत आगे देखता हूँ। मैं गिरजाघर या प्रार्थनालय की बात नहीं कर रहा। मैं "चट्टान पर बनी हुई कलीसिया" की बात करता हूँ। मैं पूरी गम्भीरता से तुमसे पूछता हूँ—क्या तुम उस कलीसिया के सदस्य हो? क्या तुम उस महान नींव से जुड़े हो? क्या तुम चट्टान पर हो? क्या तुमने पवित्र आत्मा पाया है? क्या आत्मा तुम्हारी आत्मा के साथ गवाही देता है कि तुम मसीह के साथ एक हो, और मसीह तुम्हारे साथ?—मैं परमेश्वर के नाम में तुमसे विनती करता हूँ कि इन प्रश्नों को अपने मन में रखो और भली-भाँति विचार करो। यदि तुम्हारा मन-परिवर्तन नहीं हुआ है, तो तुम अभी "चट्टान पर बनी कलीसिया" के नहीं हो।

इस लेख का प्रत्येक पाठक अपने विषय में सचेत रहे, यदि वह मेरे प्रश्न का सन्तोषजनक उत्तर नहीं दे सकता। सावधान रहो, सावधान रहो, कि तुम अपनी आत्मा को सदा के लिए नाश न कर बैठो। सावधान रहो कि कहीं अन्त में अधोलोक के फाटक तुम पर प्रबल न हो जाएँ, शैतान तुम्हें अपना ठहराए और तुम सदा के लिए त्याग दिए जाओ। सावधान रहो कि कहीं तुम बाइबलों के देश से और मसीह के सुसमाचार के पूरे प्रकाश में होते हुए भी गड्ढे में न जा गिरो। सावधान रहो कि कहीं तुम अन्त में मसीह के बाएँ हाथ पर न पाए जाओ—एक खोया हुआ एपिस्कोपल या खोया हुआ प्रेस्बिटेरियन, खोया हुआ बैपटिस्ट या खोया हुआ मेथोडिस्ट—खोए हुए इसलिए कि अपने दल और अपनी प्रभु-भोज की मेज़ के लिए सारे उत्साह के होते हुए भी तुम कभी उस एक सच्ची कलीसिया से नहीं जुड़े।

(2) प्रयोग का मेरा दूसरा शब्द एक निमन्त्रण होगा। मैं इसे हर उस व्यक्ति से कहता हूँ जो अब तक सच्चा विश्वासी नहीं हुआ है। मैं तुमसे कहता हूँ, आओ और बिना देर किए उस एक सच्ची कलीसिया से जुड़ जाओ। आओ और प्रभु यीशु मसीह के साथ एक ऐसी अनन्त वाचा में जुड़ जाओ जो कभी भुलाई न जाएगी।

मेरी बात को भली-भाँति सोचो। मैं तुम्हें गम्भीरता से चिताता हूँ कि मेरे निमन्त्रण का अर्थ गलत न समझो। मैं तुमसे यह नहीं कहता कि जिस दृश्य कलीसिया के तुम सदस्य हो उसे छोड़ दो। मैं रीतियों और दलों की मूर्तिपूजा से घृणा करता हूँ। मैं दूसरों को अपने दल में खींचने की भावना से घृणा करता हूँ। परन्तु मैं तुमसे कहता हूँ कि मसीह के पास आओ और उद्धार पाओ। निर्णय का दिन कभी न कभी अवश्य आएगा। इसी घड़ी क्यों नहीं? आज ही क्यों नहीं, जब तक "आज" कहलाता है?—इसी रात क्यों नहीं, कल सुबह सूर्य उगने से पहले?—उसके पास आओ जो क्रूस पर पापियों के लिए मरा और सब पापियों को निमन्त्रण देता है कि विश्वास के द्वारा उसके पास आकर उद्धार पाएँ। मेरे स्वामी यीशु मसीह के पास आओ। आओ, मैं कहता हूँ, क्योंकि अब सब कुछ तैयार है। दया तुम्हारे लिए तैयार है। स्वर्ग तुम्हारे लिए तैयार है। स्वर्गदूत तुम्हारे विषय में आनन्द मनाने को तैयार हैं। मसीह तुम्हें ग्रहण करने को तैयार है। मसीह तुम्हें आनन्द से ग्रहण करेगा और अपने बच्चों में तुम्हारा स्वागत करेगा। जहाज़ में आ जाओ।—परमेश्वर के क्रोध की बाढ़ शीघ्र ही पृथ्वी पर टूट पड़ेगी;—जहाज़ में आ जाओ और सुरक्षित रहो।

उस एक सच्ची कलीसिया की जीवन-नौका में आ जाओ। यह पुराना संसार शीघ्र ही टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा! क्या तुम इसका काँपना नहीं सुनते? संसार तो रेत के टीले पर अटका हुआ एक टूटा जहाज़ मात्र है। रात बहुत बीत चुकी है—लहरें उठने लगी हैं,—हवा तेज़ हो रही है,—तूफ़ान शीघ्र ही इस पुराने जहाज़ को चूर-चूर कर देगा। परन्तु जीवन-नौका उतारी जा चुकी है, और हम, सुसमाचार के सेवक, तुमसे विनती करते हैं कि जीवन-नौका में आकर उद्धार पाओ। हम तुमसे विनती करते हैं कि तुरन्त उठो और मसीह के पास आओ।

क्या तुम पूछते हो, "मैं कैसे आऊँ? मेरे पाप बहुत हैं। मैं अब भी बहुत दुष्ट हूँ। मैं आने का साहस नहीं कर सकता।"—इस विचार को दूर करो! यह शैतान का प्रलोभन है। पापी की दशा में ही मसीह के पास आओ। जैसे हो वैसे ही आओ। उस सुन्दर भजन के शब्द सुनो:—

"जैसा हूँ, बिना किसी बहाने के,

केवल इसलिए कि तेरा लहू मेरे लिए बहा,

और तू मुझे अपने पास आने को बुलाता है,

हे परमेश्वर के मेमने, मैं आता हूँ।"

मसीह के पास आने का यही मार्ग है। तुम्हें किसी बात की प्रतीक्षा किए बिना और किसी बात के लिए रुके बिना आना चाहिए। तुम्हें भूखे पापी की तरह तृप्त होने के लिए आना चाहिए,—कंगाल पापी की तरह धनी होने के लिए,—बुरे और अयोग्य पापी की तरह धार्मिकता का वस्त्र पहनने के लिए। इस प्रकार आने पर मसीह तुम्हें ग्रहण करेगा। जो मसीह के पास "आता है" उसे वह "किसी रीति से न निकालेगा।" ओह! आओ, यीशु मसीह के पास आओ। विश्वास के द्वारा "सच्ची कलीसिया" में आ जाओ और उद्धार पाओ।

(3) अन्त में, मैं उन सब विश्वासियों को एक उपदेश देना चाहता हूँ जिनके हाथ में यह पत्र पड़े।

पवित्र जीवन जीने का यत्न करो। उस कलीसिया के योग्य चाल चलो जिसके तुम सदस्य हो। स्वर्ग के नागरिकों के समान जीओ। अपनी ज्योति मनुष्यों के सामने चमकने दो, ताकि संसार तुम्हारे आचरण से लाभ उठाए। उन्हें जानने दो कि तुम किसके हो और किसकी सेवा करते हो। मसीह की पत्रियाँ बनो, जो सब मनुष्यों से जानी और पढ़ी जाती हैं—ऐसे स्पष्ट अक्षरों में लिखी हुई कि कोई तुम्हारे विषय में यह न कह सके, "मैं नहीं जानता कि यह मनुष्य मसीह का अंग है या नहीं।" जो सच्ची, व्यावहारिक पवित्रता के विषय में कुछ नहीं जानता, वह "चट्टान पर बनी कलीसिया" का अंग नहीं है।

साहसी जीवन जीने का यत्न करो। मनुष्यों के सामने मसीह को मान लो। तुम जिस भी पद पर हो, उसी पद पर मसीह को मानो। तुम उससे क्यों लज्जित हो? वह क्रूस पर तुमसे लज्जित नहीं हुआ। वह अब भी स्वर्ग में अपने पिता के सामने तुम्हें मान लेने को तैयार है। तुम उससे क्यों लज्जित हो? साहसी बनो। बहुत साहसी बनो। अच्छा सिपाही अपनी वर्दी से लज्जित नहीं होता। सच्चे विश्वासी को कभी मसीह से लज्जित नहीं होना चाहिए।

आनन्दमय जीवन जीने का यत्न करो। उन मनुष्यों के समान जीओ जो उस धन्य आशा—यीशु मसीह के दूसरे आगमन—की बाट जोहते हैं। यही वह आशा है जिसकी ओर हम सबको दृष्टि लगानी चाहिए। हमारे मन को इतना स्वर्ग जाने के विचार से नहीं, जितना स्वर्ग के हमारे पास आने के विचार से भरना चाहिए। परमेश्वर के सब लोगों के लिए "एक अच्छा समय आनेवाला है"—मसीह की सारी कलीसिया के लिए एक अच्छा समय—सब विश्वासियों के लिए एक अच्छा समय; —पश्चाताप न करनेवालों और अविश्वासियों के लिए बुरा समय, पर सच्चे मसीहियों के लिए अच्छा समय। उस अच्छे समय के लिए आओ हम प्रतीक्षा करें, जागते रहें और प्रार्थना करें।

मचान शीघ्र ही उतार लिया जाएगा।—अन्तिम पत्थर शीघ्र ही लाया जाएगा।—शिखर का पत्थर भवन पर रखा जाएगा। थोड़ा ही समय और, तब उस कलीसिया की पूरी सुन्दरता, जिसे मसीह बना रहा है, स्पष्ट दिखाई देगी।

महान प्रधान राजमिस्त्री शीघ्र ही स्वयं आएगा। एकत्र हुए लोकों के सामने एक ऐसा भवन दिखाया जाएगा जिसमें कोई अपूर्णता न होगी। उद्धारकर्ता और उद्धार पाए हुए लोग एक साथ आनन्द करेंगे। सारा विश्व मान लेगा कि मसीह की कलीसिया के निर्माण में सब कुछ भली रीति से किया गया। उस दिन कहा जाएगा—यदि पहले कभी न कहा गया हो—"धन्य हैं वे सब जो चट्टान पर बनी कलीसिया के हैं!"

14. दृश्य कलीसियाओं को चेतावनी

"जिस के कान हों वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है।"—प्रकाशित वाक्य 3:22

मैं मान सकता हूँ कि इस पत्र का हर पाठक मसीह की किसी न किसी दृश्य कलीसिया का सदस्य है। मैं अभी यह नहीं पूछता कि तुम एपिस्कोपल हो, या प्रेस्बिटेरियन, या स्वतन्त्र। मैं केवल यह मानता हूँ कि तुम नास्तिक या अविश्वासी कहलाना पसन्द न करोगे। तुम मसीही होने का दावा करनेवालों की किसी दृश्य, विशेष या राष्ट्रीय मण्डली की सार्वजनिक आराधना में सम्मिलित होते हो।

अब, तुम्हारी कलीसिया का नाम चाहे जो हो, मैं तुम्हें पवित्रशास्त्र के उस पद की ओर विशेष ध्यान देने का निमन्त्रण देता हूँ जो तुम्हारी आँखों के सामने है। मैं तुम्हें चिताता हूँ कि स्मरण रखो, उस पद के शब्द तुमसे सम्बन्ध रखते हैं। वे तुम्हारी शिक्षा के लिए, और उन सबके लिए लिखे गए हैं जो अपने आप को मसीही कहते हैं। "जिस के कान हों वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है।"

यह पद प्रकाशित वाक्य की पुस्तक के दूसरे और तीसरे अध्यायों में सात बार दोहराया गया है। वहाँ प्रभु यीशु अपने दास यूहन्ना के हाथ से एशिया की सातों कलीसियाओं को सात अलग-अलग पत्र भेजता है। सातों बार वह अपना पत्र इन्हीं गम्भीर शब्दों पर समाप्त करता है, "जिस के कान हों वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है।"

अब प्रभु परमेश्वर अपने सब कामों में सिद्ध है। वह कुछ भी संयोग से नहीं करता। उसने पवित्रशास्त्र का कोई भाग संयोग से नहीं लिखवाया। उसके सब कामों में तुम उद्देश्य, प्रयोजन और योजना देख सकते हो। हर ग्रह के आकार और कक्षा में उद्देश्य था। छोटी से छोटी मक्खी के पंख की बनावट में उद्देश्य था। बाइबल के हर पद में उद्देश्य था। जहाँ-जहाँ कोई पद दोहराया गया, उस हर दोहराव में उद्देश्य था। हमारी आँखों के सामने के इस पद के सात बार दोहराए जाने में उद्देश्य था। इसका एक अर्थ था, और हम से अपेक्षा थी कि इस पर ध्यान दें।

मुझे लगता है कि यह पद सब सच्चे मसीहियों का ध्यान विशेष रूप से "कलीसियाओं को लिखे गए" सातों पत्रों की ओर खींचता है। मेरा विश्वास है कि इसका उद्देश्य यह था कि विश्वासी उन बातों पर विशेष ध्यान दें जो इन सात पत्रों में हैं।

मैं कुछ मुख्य सत्य बताने का यत्न करूँ जो मुझे इन सात पत्रों से सिखाए जाते प्रतीत होते हैं। ये हमारे समय के लिए सत्य हैं,—अन्तिम दिनों के लिए सत्य,—ऐसे सत्य जिन्हें हम जितना भी भली-भाँति जानें थोड़ा है,—ऐसे सत्य जिन्हें हम सबके लिए अपनी वर्तमान दशा से कहीं अधिक अच्छी रीति से जानना और अनुभव करना भला होगा।

I. मैं अपने पाठकों से पहली बात यह देखने को कहता हूँ कि प्रभु यीशु सातों पत्रों में केवल सिद्धान्त, आचरण, शिक्षा और प्रतिज्ञा की बातों के विषय में ही बोलता है

मैं तुमसे कहता हूँ कि कलीसियाओं को लिखे गए इन सातों पत्रों को शान्ति से और अवकाश के समय देखो, तब तुम शीघ्र ही समझ जाओगे कि मेरा क्या तात्पर्य है।

तुम देखोगे कि प्रभु यीशु कभी झूठे सिद्धान्तों और अधर्मी, असंगत आचरण में दोष निकालता है, और उन्हें कड़ाई से डाँटता है।

तुम देखोगे कि वह कभी विश्वास, धीरज, काम, परिश्रम और स्थिरता की प्रशंसा करता है, और इन अनुग्रहों की उच्च सराहना करता है।

तुम कभी उसे मन फिराव, सुधार, पहले प्रेम की ओर लौटने, अपने पास फिर से आने,—और ऐसी ही बातों की आज्ञा देते पाओगे।

परन्तु मैं चाहता हूँ कि तुम देखो कि तुम प्रभु को किसी पत्र में कलीसिया के शासन या विधियों पर ज़ोर देते नहीं पाओगे। वह संस्कारों या रीतियों के विषय में कुछ नहीं कहता। वह प्रार्थना-पुस्तकों या निर्धारित रूपों का उल्लेख नहीं करता। वह यूहन्ना को बपतिस्मा, या प्रभु-भोज, या प्रेरितीय उत्तराधिकार, या सेवकों के विषय में एक शब्द भी लिखने का निर्देश नहीं देता। संक्षेप में, जिसे "संस्कारवादी पद्धति" कहा जा सकता है, उसके मुख्य सिद्धान्त सातों पत्रों में आदि से अन्त तक किसी एक में भी सामने नहीं रखे गए।

अब मैं इस पर क्यों ठहरता हूँ?—मैं यह इसलिए करता हूँ कि आज के दिनों में बहुत से मसीही होने का दावा करनेवाले हमसे चाहते हैं कि हम इन बातों को प्रथम, मुख्य और सर्वोपरि महत्त्व की मानें।

कुछ लोग ऐसा मानते प्रतीत होते हैं कि अध्यक्ष के बिना कोई कलीसिया नहीं हो सकती, और प्रार्थना-विधि-पुस्तक के बिना कोई भक्ति नहीं हो सकती। उनका विश्वास जान पड़ता है कि संस्कारों का महत्त्व सिखाना सेवक का पहला काम है, और अपने पल्ली के गिरजे से जुड़े रहना लोगों का पहला कर्तव्य।

पर जब मैं यह कहता हूँ तो कोई मेरी बात को ग़लत न समझे। यह धारणा मत बना लीजिए कि मैं संस्कारों को महत्त्वहीन समझता हूँ। इसके विपरीत, मैं उन्हें उन सब के लिए बड़ी आशीषें मानता हूँ जो उन्हें "उचित रीति से, योग्य होकर और विश्वास के साथ" ग्रहण करते हैं। यह भी न सोचिए कि मैं अध्यक्षीय व्यवस्था, प्रार्थना-विधि-पुस्तक और पल्ली-व्यवस्था का कोई मूल्य नहीं समझता। इसके विपरीत, मेरी दृष्टि में जिस कलीसिया में ये तीनों बातें हों और साथ ही सुसमाचारीय सेवकाई भी हो, वह उस कलीसिया से कहीं अधिक पूर्ण और उपयोगी है जिसमें ये न पाई जाएँ।

परन्तु मैं यह कहता हूँ कि संस्कार, कलीसिया का शासन-प्रबन्ध, प्रार्थना-विधि-पुस्तक का उपयोग, रीति-रिवाजों और विधियों का पालन, ये सब विश्वास, मन फिराव और पवित्रता की तुलना में कुछ भी नहीं हैं। और ऐसा कहने में मेरा अधिकार सातों कलीसियाओं के प्रति हमारे प्रभु के सारे वचनों का पूरा आशय है।

यदि कलीसिया-शासन का कोई विशेष रूप उतना ही महत्त्वपूर्ण होता जितना कुछ लोग कहते हैं, तो मैं कभी विश्वास नहीं कर सकता कि कलीसिया के महान शिर ने यहाँ उसके विषय में कुछ न कहा होता। मैं अपेक्षा करता कि सरदीस और लौदीकिया को इस विषय में कुछ कहा गया होता। पर मुझे कुछ भी नहीं मिलता। और मेरे विचार में यह चुप्पी अपने आप में एक बड़ा तथ्य है।

मैं इफिसुस के प्राचीनों से कहे गए पौलुस के विदाई के शब्दों में भी ठीक यही बात देखे बिना नहीं रह सकता। (प्रेरितों के काम 20:27–35।) वह उन्हें सदा के लिए छोड़ रहा था। वह पृथ्वी पर अपना अन्तिम आदेश दे रहा था, और ऐसे बोल रहा था जैसे अपने श्रोताओं का मुँह फिर न देखेगा। फिर भी उस आदेश में संस्कारों और कलीसिया-शासन के विषय में एक शब्द भी नहीं है। यदि उनके विषय में बोलने का कभी कोई समय था, तो वह यही था। पर वह कुछ नहीं कहता; और मेरा विश्वास है कि यह चुप्पी जान-बूझकर थी।

यही एक कारण है कि हम, जो ठीक या ग़लत, सुसमाचारीय पादरी कहलाते हैं, अध्यक्षों, प्रार्थना-पुस्तक और विधियों के विषय में उतना प्रचार नहीं करते जितना शायद किया जा सकता। इसलिए नहीं कि हम उनका मूल्य नहीं समझते, बल्कि इसलिए कि हम उन्हें उनके स्थान, अनुपात और रीति के अनुसार मानते हैं। हम उनका सचमुच उतना ही मूल्य समझते हैं जितना कोई और, और उनके लिए धन्यवादी हैं। परन्तु हम मानते हैं कि परमेश्वर की ओर मन फिराव, हमारे प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास और पवित्र चालचलन, मनुष्यों की आत्माओं के लिए कहीं अधिक महत्त्व के विषय हैं। इनके बिना कोई उद्धार नहीं पा सकता। ये पहली और सबसे भारी बातें हैं, और इसलिए हम इन्हीं पर ज़ोर देते हैं।

यहीं एक और कारण भी है कि हम मनुष्यों से बार-बार आग्रह करते हैं कि वे धर्म के केवल बाहरी भाग से सन्तुष्ट न हों। आपने देखा होगा कि हम अकसर आपको चिताते हैं कि कलीसिया की सदस्यता और कलीसिया के विशेषाधिकारों पर भरोसा मत रखिए। हम कहते हैं कि इतने से सन्तुष्ट न हो जाइए कि रविवार को गिरजे में आते हैं और प्रभु-भोज की मेज़ तक पहुँचते हैं। हम अकसर आपको स्मरण दिलाते हैं कि जो बाहर से यहूदी है वह यहूदी नहीं, कि आपको "नये सिरे से जन्म" लेना ही होगा, कि आपमें वह "विश्वास जो प्रेम के द्वारा प्रभाव करता है" होना चाहिए, कि आपके हृदय में आत्मा के द्वारा "नई सृष्टि" होनी चाहिए। हम ऐसा इसलिए करते हैं कि हमें यही मसीह का मन प्रतीत होता है। सात अलग-अलग कलीसियाओं को सात बार लिखते समय वह इन्हीं बातों पर ठहरता है। हम अनुभव करते हैं कि यदि हम उसके पीछे चलें तो हमसे बड़ी भूल नहीं हो सकती।

मैं जानता हूँ कि लोग हम पर आरोप लगाते हैं कि हम जिन विषयों की चर्चा मैंने की है उनके प्रति "निम्न दृष्टिकोण" रखते हैं। यदि हमारे विचार "निम्न" समझे जाते हैं तो यह छोटी बात है, जब तक हमारा विवेक हमें बताता है कि वे पवित्रशास्त्र के अनुसार हैं। जिसे "ऊँचा धरातल" कहा जाता है, वह सदा सुरक्षित धरातल नहीं होता। जो बिलाम ने कहा वही हमारा उत्तर होना चाहिए, "जो कुछ यहोवा कहे वही मैं कहूँगा।" (गिनती 24:13।)

सीधी सच्चाई यह है कि आज इंग्लैंड में मसीही धर्म की दो अलग और भिन्न व्यवस्थाएँ हैं। इससे इनकार करना व्यर्थ है। उनका होना एक बड़ा तथ्य है, और ऐसा जिसे भली-भाँति जान लेना आवश्यक है।

एक व्यवस्था के अनुसार धर्म केवल एक सामूहिक व्यवस्था है। आपको लोगों के एक निश्चित समुदाय का सदस्य होना है। इस समुदाय की सदस्यता के बल पर आपको इस जीवन और अनन्तकाल दोनों के लिए बड़े-बड़े विशेषाधिकार मिल जाते हैं। इससे बहुत अन्तर नहीं पड़ता कि आप कैसे हैं और कैसा अनुभव करते हैं। आपको अपनी भावनाओं से अपने आपको नहीं परखना है। आप एक बड़े कलीसियाई निकाय के सदस्य हैं। फिर उसके सारे विशेषाधिकार और छूटें आपकी अपनी हैं। क्या आप उस एकमात्र सच्चे दृश्य कलीसियाई निकाय के हैं? यही मुख्य प्रश्न है।

दूसरी व्यवस्था के अनुसार धर्म मुख्य रूप से आपके और मसीह के बीच का व्यक्तिगत विषय है। किसी भी कलीसियाई निकाय के बाहरी सदस्य होने से, चाहे वह निकाय कितना ही खरा क्यों न हो, आपकी आत्मा का उद्धार नहीं होगा। ऐसी सदस्यता न एक भी पाप धोएगी, न न्याय के दिन आपको भरोसा देगी। मसीह पर व्यक्तिगत विश्वास होना चाहिए, आपके और परमेश्वर के बीच व्यक्तिगत व्यवहार, और आपके अपने हृदय तथा पवित्र आत्मा के बीच अनुभव की हुई सहभागिता। क्या आपमें यह व्यक्तिगत विश्वास है? क्या आपकी आत्मा में पवित्र आत्मा का यह अनुभव किया हुआ कार्य है? यही मुख्य प्रश्न है। यदि नहीं, तो आप खो जाएँगे।

यही अन्तिम व्यवस्था है जिससे वे लोग, जो सुसमाचारीय सेवक कहलाते हैं, जुड़े रहते और जिसकी शिक्षा देते हैं। वे ऐसा इसलिए करते हैं कि उन्हें निश्चय है कि यही पवित्रशास्त्र की व्यवस्था है। वे ऐसा इसलिए करते हैं कि उन्हें विश्वास है कि कोई भी दूसरी व्यवस्था अत्यन्त भयानक परिणाम उत्पन्न करती है और मनुष्यों को उनकी वास्तविक दशा के विषय में घातक रीति से भ्रम में डालने वाली है। वे ऐसा इसलिए करते हैं कि वे मानते हैं कि शिक्षा की यही एकमात्र व्यवस्था है जिस पर परमेश्वर आशीष देगा, और कोई कलीसिया उतनी नहीं फलेगी-फूलेगी जितनी वह जिसमें मन फिराव, विश्वास, मन-परिवर्तन और पवित्र आत्मा का कार्य सेवक के उपदेश के प्रमुख विषय हों।

मैं एक बार फिर कहता हूँ, आइए हम "कलीसियाओं को लिखी गई सातों पत्रियों" को बार-बार ध्यान से देखें।

II. दूसरी बात, मैं अपने पाठकों से कहता हूँ कि ध्यान दें कि प्रत्येक पत्री में प्रभु यीशु कहता है, मैं तेरे कामों को जानता हूँ।

यह दोहराया गया वाक्यांश बहुत ही विचारणीय है। ये शब्द हम सात बार पढ़ते हैं, यह यों ही नहीं है।

एक कलीसिया से प्रभु यीशु कहता है, मैं तेरा परिश्रम और धीरज जानता हूँ, — दूसरी से, तेरा क्लेश और दरिद्रता, — तीसरी से, तेरा प्रेम, और सेवा, और विश्वास। परन्तु सब से वह उन्हीं शब्दों का प्रयोग करता है जिन पर मैं अब ठहरता हूँ, "मैं तेरे कर्मों को जानता हूँ।" यह नहीं कि, "मैं तेरे अंगीकार को जानता हूँ, — तेरी अभिलाषाओं को, — तेरे संकल्पों को, — तेरी इच्छाओं को," — परन्तु तेरे कर्मों को। "मैं तेरे कर्मों को जानता हूँ।"

अंगीकार करनेवाले मसीही के कर्म बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। वे तेरी आत्मा को नहीं बचा सकते। वे तुझे धर्मी नहीं ठहरा सकते। वे तेरे पापों को मिटा नहीं सकते। वे तुझे परमेश्वर के क्रोध से छुड़ा नहीं सकते। परन्तु इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि क्योंकि वे तुझे बचा नहीं सकते, इसलिए वे महत्त्वहीन हैं। सावधान रह और ऐसी धारणा से बचा रह। जो मनुष्य ऐसा सोचता है वह भयानक रीति से धोखे में है।

मैं प्रायः सोचता हूँ कि मैं व्यवस्था के कामों के बिना विश्वास से धर्मी ठहराए जाने के सिद्धान्त के लिए प्रसन्नता से प्राण भी दे सकता हूँ। परन्तु मुझे एक सामान्य नियम के रूप में गम्भीरता से यह भी दृढ़ता से कहना चाहिए कि मनुष्य के कर्म ही उसके धर्म का प्रमाण हैं। यदि तू अपने आप को मसीही कहता है, तो तुझे अपने दैनिक चाल-चलन और व्यवहार में इसे दिखाना होगा। स्मरण कर कि अब्राहम और राहाब का विश्वास उनके कर्मों से प्रमाणित हुआ। (याकूब 2:21–25।) स्मरण रख कि यदि हम कर्मों से परमेश्वर का इन्कार करते हैं, तो यह कहने से कि हम उसे जानते हैं, न मुझे कुछ लाभ है न तुझे। (तीतुस 1:16।) प्रभु यीशु के वचन स्मरण कर, "हर एक पेड़ अपने फल से पहचाना जाता है।" (लूका 6:44।)

परन्तु अंगीकार करनेवाले मसीही के कर्म चाहे जैसे भी हों, यीशु कहता है, "मैं उन्हें जानता हूँ!" "यहोवा की आँखें सब स्थानों में लगी रहती हैं, वे बुरे और भले दोनों को देखती रहती हैं।" (नीतिवचन 15:3।) तूने कभी कोई ऐसा काम नहीं किया, चाहे कितना ही गुप्त हो, जिसे यीशु ने न देखा हो। तूने कभी ऐसी कोई बात नहीं कही, चाहे फुसफुसाहट में ही क्यों न हो, जिसे यीशु ने न सुना हो। तूने कभी ऐसी कोई चिट्ठी नहीं लिखी, चाहे अपने सब से प्रिय मित्र को ही क्यों न हो, जिसे यीशु ने न पढ़ा हो। तूने कभी ऐसा कोई विचार नहीं सोचा, चाहे कितना ही छिपा हुआ हो, जिससे यीशु परिचित न हो। उसकी आँखें धधकती आग की ज्वाला के समान हैं। उसके लिए अन्धकार भी अन्धकार नहीं। सब कुछ उसके सामने खुला और प्रगट है। वह हर एक से कहता है, "मैं तेरे कर्मों को जानता हूँ।"

(क) प्रभु यीशु सब अपश्चातापी और अविश्वासी आत्माओं के कर्मों को जानता है, और एक दिन उन्हें दण्ड देगा। वे स्वर्ग में भुलाए नहीं गए हैं, चाहे पृथ्वी पर भुला दिए गए हों। जब बड़ा श्वेत सिंहासन लगाया जाएगा, और पुस्तकें खोली जाएँगी, तब दुष्ट मृतकों का न्याय "उनके कर्मों के अनुसार" किया जाएगा।

(ख) प्रभु यीशु अपने लोगों के कर्मों को जानता है, और उन्हें तौलता है। "उसके द्वारा कर्म तौले जाते हैं।" (1 शमूएल 2:3।) वह सब विश्वासियों के कामों का कारण और उद्देश्य जानता है। वह उनके उठाए हर कदम में उनकी मनसा को देखता है। वह पहचानता है कि कितना उसके लिए किया गया है और कितना प्रशंसा के लिए। हाय!

विश्वासियों के द्वारा बहुत सी बातें ऐसी की जाती हैं जो तुझे और मुझे बहुत अच्छी लगती हैं, परन्तु मसीह की दृष्टि में उनका मूल्य बहुत कम है।

(ग) प्रभु यीशु अपने सब लोगों के कर्मों को जानता है, और एक दिन उन्हें प्रतिफल देगा। वह अपने नाम से कही गई किसी भी दयालु बात, या किए गए किसी भी दयालु काम को अनदेखा नहीं करता। वह विश्वास के छोटे से छोटे फल को भी स्वीकार करेगा, और अपने प्रकट होने के दिन संसार के सामने उसकी घोषणा करेगा। यदि तू प्रभु यीशु से प्रेम करता है, और उसके पीछे चलता है, तो निश्चित जान कि प्रभु में तेरा काम और परिश्रम व्यर्थ नहीं है। जो प्रभु में मरते हैं उनके कर्म "उनके साथ हो लेते हैं।" (प्रकाशितवाक्य 14:13।) वे उनके आगे नहीं जाते, न उनके बगल में, परन्तु उनके पीछे-पीछे चलते हैं, और मसीह के प्रकट होने के दिन स्वीकार किए जाएँगे। मीना का दृष्टान्त पूरा होगा। "हर एक व्यक्ति अपने ही परिश्रम के अनुसार अपना प्रतिफल पाएगा।" (1 कुरिन्थियों 3:8।) संसार तुझे नहीं जानता, क्योंकि वह तेरे स्वामी को नहीं जानता। परन्तु यीशु सब देखता और जानता है। "मैं तेरे कर्मों को जानता हूँ।"

विचार कर कि यहाँ सब संसारी और कपटी अंगीकार करनेवालों के लिए कितनी गम्भीर चेतावनी है। ऐसे सब लोग इन वचनों को पढ़ें, ध्यान दें और मन में बैठाएँ। यीशु तुझसे कहता है, "मैं तेरे कर्मों को जानता हूँ।" तू मुझे या किसी और सेवक को धोखा दे सकता है; ऐसा करना सरल है। तू मेरे हाथ से रोटी और दाखरस ले सकता है, और फिर भी अपने मन में अधर्म से लिपटा रह सकता है। तू सप्ताह-दर-सप्ताह किसी सुसमाचारीय प्रचारक के मंच के नीचे बैठकर गम्भीर मुख से उसकी बातें सुन सकता है, परन्तु उन पर विश्वास न करे। परन्तु यह स्मरण रख, तू मसीह को धोखा नहीं दे सकता। जिसने सरदीस की मृतावस्था और लौदीकिया की गुनगुनाहट को पहचान लिया, वह तुझे भीतर-बाहर से देखता है, और यदि तू मन न फिराए तो अन्तिम दिन तुझे प्रकट कर देगा।

अरे! मेरा विश्वास कर, कपट हारने का खेल है। कुछ और दिखना और कुछ और होना, मसीही का नाम रखना पर उसकी वास्तविकता न रखना, इसका कभी कोई परिणाम नहीं निकलेगा। निश्चित जान, यदि इस विषय में तेरा विवेक तुझे दोषी ठहराता और धिक्कारता है, — तो निश्चित जान कि तेरा पाप तुझे पकड़ लेगा। जिस आँख ने आकान को सोने की ईंट चुराकर छिपाते देखा था, वही तुझ पर लगी है। जिस पुस्तक में गेहजी, और हनन्याह, और सफीरा के कामों का लेखा है, वह तेरे चाल-चलन का भी लेखा रख रही है। यीशु दया करके आज तुझे चेतावनी का एक वचन भेजता है। वह कहता है, "मैं तेरे कर्मों को जानता हूँ।"

परन्तु यह भी विचार कर कि यहाँ हर सच्चे और खरे मन के विश्वासी के लिए कितना प्रोत्साहन है। तुझसे भी यीशु कहता है, "मैं तेरे कर्मों को जानता हूँ।" तुझे अपने किसी भी काम में कोई सुन्दरता नहीं दिखती। सब कुछ अधूरा, कलंकित और अशुद्ध लगता है। तू अपनी ही कमियों से प्रायः मन में उदास हो जाता है। तू प्रायः अनुभव करता है कि तेरा सारा जीवन एक बड़ा बकाया है, और हर दिन या तो कोरा है या धब्बा। परन्तु अब जान ले कि यीशु तेरे हर उस काम में, जो तू उसे प्रसन्न करने की सच्ची इच्छा से करता है, कुछ न कुछ सुन्दरता देख सकता है। उसकी आँख उस छोटी से छोटी बात में भी उत्तमता पहचान सकती है जो उसके अपने आत्मा का फल है। वह तेरे कामों के मैल में से सोने के कण चुन सकता है, और तेरे सब कामों में भूसे में से गेहूँ छाँट सकता है। तेरे सब आँसू उसकी कुप्पी में रखे जाते हैं। दूसरों की भलाई करने के तेरे प्रयास, चाहे कितने ही दुर्बल हों, उसकी स्मरण-पुस्तक में लिखे हैं। उसके नाम से दिया गया ठण्डे पानी का छोटे से छोटा कटोरा भी अपना प्रतिफल नहीं खोएगा। वह तेरे काम और प्रेम के परिश्रम को नहीं भूलता, चाहे संसार उसे कितना ही तुच्छ जाने।

यह बहुत ही अद्भुत है; पर ऐसा ही है। यीशु अपने लोगों में अपनी आत्मा के कार्य का आदर करना और उनकी निर्बलताओं को अनदेखा करना पसन्द करता है। वह राहाब के विश्वास का उल्लेख करता है, उसके झूठ का नहीं। वह अपने प्रेरितों की इस बात के लिए प्रशंसा करता है कि वे उसकी परीक्षाओं में उसके साथ बने रहे, और उनकी अज्ञानता तथा विश्वास की कमी को अनदेखा कर देता है। (लूका 22:28)। "जैसे पिता अपने बालकों पर दया करता है, वैसे ही यहोवा अपने डरवैयों पर दया करता है।" (भजन संहिता 103:13)। और जैसे पिता अपने बच्चों के छोटे से छोटे कामों में, जिनके विषय में कोई अजनबी कुछ नहीं जानता, आनन्द पाता है, वैसे ही मैं मानता हूँ कि प्रभु भी उसकी सेवा करने के हमारे दीन और निर्बल प्रयासों में आनन्द पाता है।

परन्तु यह सब बहुत अद्भुत है। मैं भली-भाँति समझ सकता हूँ कि न्याय के दिन धर्मी लोग कहेंगे, "हे प्रभु, हमने कब तुझे भूखा देखकर खिलाया, या प्यासा देखकर पिलाया? हमने कब तुझे परदेशी देखकर अपने घर में ठहराया, या नंगा देखकर कपड़े पहनाए? हमने कब तुझे बीमार या बन्दीगृह में देखा और तेरे पास आए?" (मत्ती 25:37–39)। यह सचमुच अविश्वसनीय और असम्भव लग सकता है कि उस महान दिन में उन्होंने कुछ भी ऐसा किया हो जिसका नाम लिया जा सके! फिर भी ऐसा ही है। सब विश्वासी इससे सान्त्वना पाएँ। प्रभु कहता है, "मैं तेरे कामों को जानता हूँ।" इससे तुझे दीन होना चाहिए। परन्तु इससे तुझे डरना नहीं चाहिए।

III. मैं अपने पाठकों से विनती करता हूँ कि वे तीसरी और अन्तिम बात पर ध्यान दें कि हर पत्री में प्रभु यीशु जय पानेवाले को एक प्रतिज्ञा देता है

यीशु सात बार कलीसियाओं को बहुत बड़ी और बहुमूल्य प्रतिज्ञाएँ देता है। हर एक प्रतिज्ञा अलग है, और हर एक में दृढ़ सान्त्वना भरी है: पर हर एक जय पानेवाले मसीही को सम्बोधित है। यह सदा "जो जय पाए" या "जो जय पाता है उसे" के रूप में आता है। मैं तुमसे इस बात पर ध्यान देने को कहता हूँ।

हर प्रकट मसीही मसीह का सिपाही है। वह अपने बपतिस्मा के द्वारा पाप, संसार और शैतान के विरुद्ध मसीह की लड़ाई लड़ने के लिए बंधा हुआ है। जो मनुष्य ऐसा नहीं करता वह अपनी शपथ तोड़ता है। वह आत्मिक रूप से अपराधी है। वह उन प्रतिज्ञाओं को पूरा नहीं करता जो उसके लिए की गई थीं। जो मनुष्य ऐसा नहीं करता, वह व्यवहार में अपने मसीही होने का ही इनकार कर रहा है। यही तथ्य कि वह किसी कलीसिया से सम्बन्ध रखता है, मसीही आराधना-स्थल में जाता है, और अपने आपको मसीही कहता है, इस बात की सार्वजनिक घोषणा है कि वह यीशु मसीह का सिपाही गिना जाना चाहता है।

प्रकट मसीही के लिए हथियार तैयार रखे गए हैं, यदि वह उन्हें काम में लाए। पौलुस इफिसियों से कहता है, "परमेश्वर के सारे हथियार बाँध लो।" "सत्य से अपनी कमर कसकर, और धार्मिकता की झिलम पहनकर खड़े रहो।" "उद्धार का टोप, और आत्मा की तलवार, जो परमेश्वर का वचन है, ले लो।" "इन सब के साथ विश्वास की ढाल ले लो।" (इफिसियों 6:13–17)। और सबसे बढ़कर प्रकट मसीही के पास सर्वोत्तम अगुवा है,—यीशु जो उद्धार का सेनापति है, जिसके द्वारा वह जयवन्त से भी बढ़कर हो सकता है,—सर्वोत्तम रसद है, अर्थात् जीवन की रोटी और जल,—और उसे सर्वोत्तम वेतन की प्रतिज्ञा मिली है,—अनन्त महिमा का भार।

ये सब पुरानी बातें हैं। मैं इन पर अभी रुककर अपने विषय से नहीं भटकूँगा।

जिस एक बात को मैं अभी तुम्हारी आत्मा पर अंकित करना चाहता हूँ, वह यह है कि सच्चा विश्वासी केवल सिपाही ही नहीं, वरन् विजयी सिपाही है।—वह केवल यह नहीं कहता कि वह पाप, संसार और शैतान के विरुद्ध मसीह के पक्ष में लड़ता है, पर वह सचमुच लड़ता है और जय पाता है।

अब यही सच्चे मसीहियों का एक बड़ा विशेष चिह्न है। दूसरे लोग शायद मसीह की सेना की पंक्तियों में गिने जाना पसन्द करें। दूसरे लोगों में महिमा के मुकुट के लिए आलसी इच्छाएँ और ढीली-ढाली लालसाएँ हो सकती हैं। पर सिपाही का काम केवल सच्चा मसीही ही करता है। केवल वही अपनी आत्मा के शत्रुओं का ठीक-ठीक सामना करता है,—सचमुच उनसे लड़ता है,—और उस लड़ाई में उन पर जय पाता है।

इन सात पत्रियों से मैं चाहता हूँ कि लोग एक बड़ी शिक्षा सीखें, वह यह कि यदि तुम यह प्रमाणित करना चाहते हो कि तुम नया जन्म पा चुके हो और स्वर्ग जा रहे हो, तो तुम्हें मसीह का विजयी सिपाही होना होगा। यदि तुम यह स्पष्ट करना चाहते हो कि मसीह की बहुमूल्य प्रतिज्ञाओं पर तुम्हारा कोई अधिकार है, तो तुम्हें मसीह के काम में उत्तम लड़ाई लड़नी होगी, और उस लड़ाई में तुम्हें जय पानी होगी।

विजय ही इस बात का एकमात्र सन्तोषजनक प्रमाण है कि तुम्हारा धर्म उद्धार देनेवाला है। शायद तुम्हें अच्छे उपदेश अच्छे लगते हैं। तुम बाइबल का आदर करते हो और कभी-कभी उसे पढ़ते हो। तुम सुबह-शाम प्रार्थना करते हो। तुम पारिवारिक प्रार्थना करते हो और धार्मिक संस्थाओं को दान देते हो। इसके लिए मैं परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ। यह सब बहुत अच्छा है। पर लड़ाई कैसी चल रही है? इस सारे समय में वह बड़ा संघर्ष कैसा चल रहा है? क्या तुम संसार के प्रेम और मनुष्य के भय पर जय पा रहे हो? क्या तुम अपने ही मन की भावनाओं, स्वभाव और अभिलाषाओं पर जय पा रहे हो? क्या तुम शैतान का सामना करके उसे अपने पास से भगा रहे हो? इस विषय में तुम्हारी दशा कैसी है? तुम्हें या तो पाप, शैतान और संसार पर राज्य करना होगा या उनकी सेवा करनी होगी। कोई बीच का मार्ग नहीं है। तुम्हें या तो जय पानी होगी या नाश होना होगा।

मैं भली-भाँति जानता हूँ कि जो लड़ाई तुम्हें लड़नी है वह कठिन है, और मैं चाहता हूँ कि तुम भी यह जानो। यदि तुम अनन्त जीवन को पकड़ना चाहते हो तो तुम्हें विश्वास की उत्तम लड़ाई लड़नी होगी और कठिनाइयाँ सहनी होंगी। यदि तुम स्वर्ग पहुँचना चाहते हो तो तुम्हें प्रतिदिन के संघर्ष के लिए मन बना लेना होगा। मनुष्यों के गढ़े हुए स्वर्ग के छोटे मार्ग हो सकते हैं;—पर प्राचीन मसीही धर्म,—वह पुराना भला मार्ग,—क्रूस का मार्ग है,—संघर्ष का मार्ग है। पाप, संसार और शैतान को सचमुच मार डालना, उनका सामना करना और उन पर जय पाना होगा।

यह वही मार्ग है जिस पर प्राचीन काल के सन्त चले हैं, और उन्होंने ऊपर अपना अभिलेख छोड़ा है।

(क) जब मूसा ने मिस्र में पाप के सुखों को ठुकरा दिया और परमेश्वर के लोगों के साथ दुःख उठाना चुना,—यह जय पाना था: उसने सुख के प्रेम पर जय पाई।

(ख) जब मीकायाह ने राजा अहाब के लिए मीठी-मीठी बातों की भविष्यद्वाणी करने से इनकार कर दिया,—यद्यपि वह जानता था कि सत्य कहने पर उसे सताया जाएगा,—यह जय पाना था: उसने सुख-चैन के प्रेम पर जय पाई।

(ग) जब दानिय्येल ने प्रार्थना करना छोड़ने से इनकार कर दिया, यद्यपि वह जानता था कि उसके लिए सिंहों की गुफा तैयार है,—यह जय पाना था: उसने मृत्यु के भय पर जय पाई।

(घ) जब मत्ती हमारे प्रभु की आज्ञा पर चुंगी की चौकी से उठा, सब कुछ छोड़कर उसके पीछे हो लिया,—यह जय पाना था: उसने धन के प्रेम पर जय पाई।

(ङ) जब पतरस और यूहन्ना ने महासभा के सामने निडर होकर खड़े होकर कहा, "यह तो हमसे हो नहीं सकता कि जो हमने देखा और सुना है, वह न कहें,"—यह जय पाना था: उन्होंने मनुष्य के भय पर जय पाई।

(च) जब फरीसी शाऊल ने यहूदियों में पदोन्नति की अपनी सारी आशाएँ त्याग दीं, और उसी यीशु का प्रचार किया जिसे उसने कभी सताया था,—तब यह विजय पाना था: उसने मनुष्य की प्रशंसा के प्रेम पर विजय पाई।

जो कुछ इन लोगों ने किया, वही तुम्हें भी करना होगा यदि तुम उद्धार पाना चाहते हो। वे तुम्हारे समान दुर्बलताओं वाले मनुष्य थे, फिर भी उन्होंने जय पाई। उन पर उतनी परीक्षाएँ आईं जितनी तुम पर आ सकती हैं, फिर भी उन्होंने जय पाई। वे लड़े। उन्होंने कुश्ती की। उन्होंने संघर्ष किया। तुम्हें भी यही करना होगा।

उनकी विजय का रहस्य क्या था?—उनका विश्वास। उन्होंने यीशु पर विश्वास किया, और विश्वास करके सामर्थी बनाए गए। उन्होंने यीशु पर विश्वास किया, और विश्वास करके थामे रखे गए। अपनी सारी लड़ाइयों में उन्होंने अपनी आँखें यीशु पर लगाए रखीं, और उसने उन्हें न कभी छोड़ा न कभी त्यागा। "उन्होंने मेम्ने के लहू के कारण, और अपनी गवाही के वचन के कारण उस पर जय पाई है," और तुम भी पा सकते हो। (प्रकाशित वाक्य 12:11।)

मैं ये शब्द तुम्हारे सामने रखता हूँ। मैं तुमसे विनती करता हूँ कि इन्हें अपने हृदय में रखो। परमेश्वर के अनुग्रह से यह ठान लो कि तुम एक जयवन्त मसीही बनोगे।

मुझे बहुत से मसीही कहलानेवालों के विषय में बड़ी चिन्ता है। मुझे उनमें लड़ाई का कोई चिह्न नहीं दिखता, विजय की तो बात ही क्या। वे मसीह के पक्ष में एक भी वार नहीं करते। वे उसके शत्रुओं से मेल रखते हैं। उन्हें पाप से कोई बैर नहीं।—मैं तुम्हें चेतावनी देता हूँ, यह मसीही जीवन नहीं है। यह स्वर्ग का मार्ग नहीं है।

जो लोग नियमित रूप से सुसमाचार सुनते हैं, उनके विषय में भी मुझे प्रायः बड़ी चिन्ता होती है। मुझे डर है कि कहीं तुम उसके सिद्धान्तों की ध्वनि से इतने परिचित न हो जाओ कि अनजाने ही उसकी सामर्थ्य के प्रति मरे हुए हो जाओ। मुझे डर है कि कहीं तुम्हारा धर्म अपनी निर्बलता और भ्रष्टता की थोड़ी सी अस्पष्ट बातों, और मसीह के विषय में कुछ भावुक वाक्यों तक ही सिमटकर न रह जाए, जबकि मसीह के पक्ष में वास्तविक और व्यावहारिक लड़ाई बिलकुल अनदेखी रह जाए। ओह! मन की इस दशा से सावधान रहो। "वचन पर चलनेवाले बनो, और केवल सुननेवाले ही नहीं।" जय नहीं,—तो मुकुट नहीं! लड़ो और जय पाओ! (याकूब 1:22।)

जवान पुरुषो और स्त्रियो, और विशेषकर तुम जो धार्मिक परिवारों में पले हो, मुझे तुम्हारे विषय में बड़ी चिन्ता है। मुझे डर है कि तुम्हें हर परीक्षा के सामने झुक जाने की आदत न पड़ जाए। मुझे डर है कि तुम संसार और शैतान को "नहीं!" कहने से डरने न लगो,—और जब पापी तुम्हें फुसलाएँ, तो सहमत हो जाना ही सबसे सरल समझने लगो। मैं तुमसे विनती करता हूँ, झुक जाने से सावधान रहो। हर समझौता तुम्हें और निर्बल करेगा। संसार में यह ठानकर जाओ कि तुम मसीह की लड़ाई लड़ोगे,—और लड़ते हुए आगे बढ़ो।

प्रभु यीशु के विश्वासियो, चाहे तुम किसी भी कलीसिया या किसी भी पद के हो, मुझे तुम्हारे लिए गहरी सहानुभूति है। मैं जानता हूँ कि तुम्हारा मार्ग कठिन है। मैं जानता हूँ कि तुम्हें एक घोर संग्राम लड़ना पड़ता है। मैं जानता हूँ कि तुम्हें प्रायः यह कहने का प्रलोभन होता है, "इसका कोई लाभ नहीं," और अपने हथियार बिलकुल डाल देने का।

प्रिय भाइयो और बहनो, ढाढ़स बाँधो। मैं तुमसे विनती करता हूँ, सान्त्वना पाओ। अपनी स्थिति के उजले पक्ष को देखो। लड़ते रहने के लिए प्रोत्साहित हो जाओ। समय थोड़ा है। प्रभु निकट है। रात बहुत बीत चुकी है। तुम्हारे जैसे निर्बल लाखों लोगों ने यही लड़ाई लड़ी है। उन लाखों में से एक को भी शैतान अन्त में बन्दी बनाकर न ले जा सका। तुम्हारे शत्रु बलवन्त हैं,—परन्तु तुम्हारे उद्धार का अगुवा उनसे भी बलवन्त है।—उसकी भुजा, उसका अनुग्रह और उसका आत्मा तुम्हें थामे रखेंगे। ढाढ़स बाँधो। निराश न हो।

यदि तुम एक-दो लड़ाइयाँ हार भी जाओ तो क्या? तुम सब कुछ नहीं हारोगे। यदि तुम कभी-कभी थक भी जाओ तो क्या? तुम पूरी तरह गिराए नहीं जाओगे। यदि तुम सात बार भी गिरो तो क्या? तुम नष्ट नहीं किए जाओगे। पाप से सावधान रहो, और पाप का तुम पर प्रभुत्व न होगा। शैतान का साम्हना करो, और वह तुम्हारे पास से भाग जाएगा। संसार में से साहस के साथ निकल आओ, और संसार को तुम्हें जाने देना ही पड़ेगा। अन्त में तुम पाओगे कि तुम जयवन्तों से भी बढ़कर हो,—तुम "जय पाओगे।"

अब मैं पूरे विषय से कुछ शब्द उपयोग के लिए कहता हूँ, और फिर समाप्त करता हूँ।

(1) पहली बात यह कि जो केवल संसार के लिए जी रहे हैं, उन सबको मैं चेतावनी देता हूँ कि वे ध्यान दें कि वे क्या कर रहे हैं। तुम मसीह के शत्रु हो, चाहे तुम यह न जानते हो। वह तुम्हारे चालचलन पर ध्यान रखता है, चाहे तुम उससे मुँह फेर लो और उसे अपना हृदय देने से इनकार कर दो। वह तुम्हारे दैनिक जीवन को देख रहा है, और तुम्हारे दैनिक मार्गों को पढ़ रहा है। तुम्हारे सब विचारों, शब्दों और कामों का एक दिन पुनरुत्थान होगा। तुम उन्हें भूल सकते हो, परन्तु परमेश्वर नहीं भूलता। तुम उनके विषय में लापरवाह हो सकते हो, परन्तु वे स्मरण की पुस्तक में सावधानी से लिखे जा रहे हैं। ओह! संसारी मनुष्य, इस पर विचार कर! काँप, काँप, और मन फिरा।

(2) दूसरी बात यह कि सब औपचारिकतावादियों और आत्म-धर्मी लोगों को मैं चेतावनी देता हूँ कि वे सावधान रहें कि कहीं धोखे में न रहें। तुम कल्पना करते हो कि तुम स्वर्ग जाओगे क्योंकि तुम नियमित रूप से कलीसिया जाते हो। तुम अनन्त जीवन की आशा पालते हो क्योंकि तुम सदा प्रभु-भोज में रहते हो, और अपनी पंक्ति में कभी अनुपस्थित नहीं होते। परन्तु तुम्हारा मन फिराव कहाँ है? तुम्हारा विश्वास कहाँ है? नए हृदय के तुम्हारे प्रमाण कहाँ हैं? आत्मा का कार्य कहाँ है? नए जन्म के तुम्हारे प्रमाण कहाँ हैं? ओह! औपचारिक मसीही, इन प्रश्नों पर विचार कर! काँप, काँप, और मन फिरा।

(3) तीसरी बात यह कि कलीसियाओं के सब लापरवाह सदस्यों को मैं चेतावनी देता हूँ कि वे सावधान रहें, कहीं ऐसा न हो कि वे अपनी आत्माओं के साथ खिलवाड़ करते हुए नरक में जा पड़ें। तुम वर्ष पर वर्ष ऐसे जीते चले जाते हो मानो पाप, संसार और शैतान से कोई लड़ाई लड़नी ही न हो। तुम जीवन में मुस्कराते, हँसते, शिष्ट स्त्री-पुरुष बनकर निकल जाते हो, और ऐसा व्यवहार करते हो मानो न शैतान है, न स्वर्ग, न नरक। ओह! लापरवाह कलीसिया-सदस्य, चाहे तू लापरवाह नाम-मात्र का एपिस्कोपल हो, या प्रेस्बिटेरियन, या इंडिपेंडेंट, या बैपटिस्ट, जाग और अनन्त वास्तविकताओं को उनके सच्चे प्रकाश में देख! जाग और परमेश्वर के सारे हथियार बाँध ले! जाग और प्राण के लिए कठोर संघर्ष कर! काँप, काँप, और मन फिरा।

(4) एक और बात के लिये, मैं हर उस व्यक्ति को चेतावनी देता हूँ जो उद्धार पाना चाहता है कि वह संसार के धर्म-स्तर से सन्तुष्ट न हो। निश्चय ही आँखें खोलकर देखनेवाला कोई भी मनुष्य यह देखने से नहीं चूक सकता कि नए नियम की मसीहियत अधिकांश नाममात्र के मसीहियों की मसीहियत से कहीं अधिक ऊँची और गहरी है। वह औपचारिक, ढीली-ढाली, थोड़ा-सा करनेवाली वस्तु, जिसे अधिकतर लोग धर्म कहते हैं, स्पष्ट ही प्रभु यीशु का धर्म नहीं है। जिन बातों की प्रशंसा वह इन सात पत्रियों में करता है, संसार उनकी प्रशंसा नहीं करता। जिन बातों पर वह दोष लगाता है, संसार उनमें कोई हानि नहीं देखता। ओह! यदि तुम मसीह के पीछे चलना चाहते हो, तो संसार की मसीहियत से सन्तुष्ट न हो! काँपो, काँपो, और मन फिराओ।

(5) अन्त में, मैं हर उस व्यक्ति को चेतावनी देता हूँ जो प्रभु यीशु में विश्वासी होने का दावा करता है कि वह थोड़े-से धर्म से सन्तुष्ट न हो।

मसीह की कलीसिया में जितने दृश्य हैं, उनमें से मेरी अपनी आँखों को सबसे अधिक पीड़ा देनेवाला दृश्य मैं उस मसीही का जानता हूँ जो थोड़े-से अनुग्रह, थोड़े-से मन फिराव, थोड़े-से विश्वास, थोड़े-से ज्ञान, थोड़े-से प्रेम और थोड़ी-सी पवित्रता से सन्तुष्ट और तृप्त है। मैं इस पुस्तिका को पढ़नेवाली हर विश्वासी आत्मा से विनती और आग्रह करता हूँ कि वह ऐसा मनुष्य न बने। यदि तुम्हारे मन में उपयोगी होने की कोई अभिलाषा है, यदि तुम अपने प्रभु की महिमा को बढ़ाना चाहते हो, यदि तुम्हें भीतरी शान्ति की कोई लालसा है, तो थोड़े-से धर्म से सन्तुष्ट न हो।

हम तो बल्कि अपने जीवन के हर वर्ष में इस बात का यत्न करें कि जितनी आत्मिक उन्नति हमने अब तक की है उससे अधिक करें; अनुग्रह में और प्रभु यीशु के ज्ञान में बढ़ते जाएँ; नम्रता और आत्म-परिचय में बढ़ें; आत्मिकता और स्वर्गीय मन में बढ़ें; अपने प्रभु के स्वरूप के अनुरूप होने में बढ़ें।

हम इफिसुस के समान अपना पहला प्रेम छोड़ देने से, लौदीकिया के समान गुनगुने हो जाने से, पिरगमुन के समान झूठे आचरण को सहन करने से, थूआतीरा के समान झूठी शिक्षा से छेड़-छाड़ करने से, और सरदीस के समान अधमरे होकर मरने को तैयार हो जाने से सावधान रहें।

हम तो बल्कि उत्तम वरदानों की लालसा करें। हम उत्कृष्ट पवित्रता का लक्ष्य रखें। हम स्मुरना और फिलदिलफिया के समान होने का यत्न करें। जो कुछ हमारे पास पहले से है उसे दृढ़ता से थामे रहें, और निरन्तर और अधिक पाने की खोज करें। हम ऐसे मसीही होने का परिश्रम करें जो पहचाने जा सकें। हमारा विशिष्ट चरित्र यह न हो कि हम विज्ञान के मनुष्य हैं, या साहित्यिक योग्यता के मनुष्य हैं, या संसार के मनुष्य हैं, या भोग-विलास के मनुष्य हैं, या व्यापार के मनुष्य हैं, परन्तु “परमेश्वर के जन” हैं। हम ऐसा जीवन बिताएँ कि सब देख सकें कि हमारे लिये परमेश्वर की बातें सबसे पहली बातें हैं, और परमेश्वर की महिमा हमारे जीवन का पहला लक्ष्य है; वर्तमान समय में मसीह के पीछे चलना हमारा परम उद्देश्य है, और आनेवाले समय में मसीह के साथ रहना हमारी परम अभिलाषा है।

हम इस प्रकार जीवन बिताएँ, तो हम सुखी होंगे। हम इस प्रकार जीवन बिताएँ, तो हम संसार का भला करेंगे। हम इस प्रकार जीवन बिताएँ, तो जब हमें मिट्टी दी जाएगी तब हम अपने पीछे अच्छी गवाही छोड़ जाएँगे। हम इस प्रकार जीवन बिताएँ, तो कलीसियाओं के नाम आत्मा का जो वचन कहा गया है वह हमारे लिये व्यर्थ न कहा गया होगा।

15. “क्या तू मुझसे प्रेम रखता है?”

“क्या तू मुझसे प्रेम रखता है?”—यूहन्ना 21:16

इस लेख के शीर्षक का यह प्रश्न मसीह ने प्रेरित पतरस से पूछा था। इससे अधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न नहीं पूछा जा सकता था। ये शब्द कहे जाने को अठारह सौ वर्ष बीत चुके हैं। परन्तु आज भी यह पूछताछ अत्यन्त हृदय-भेदी और लाभदायक है।

किसी न किसी से प्रेम करने की प्रवृत्ति उन सबसे साधारण भावनाओं में से एक है जो परमेश्वर ने मानव स्वभाव में रोपी हैं। खेद है कि लोग प्रायः अपना स्नेह अयोग्य वस्तुओं पर लगा देते हैं। मैं चाहता हूँ कि आज उसके लिये स्थान माँगूँ जो अकेला हमारे हृदयों की सर्वोत्तम भावनाओं के योग्य है। मैं चाहता हूँ कि मनुष्य अपने प्रेम का कुछ भाग उस दिव्य जन को दें जिसने हमसे प्रेम किया और हमारे लिये अपने आप को दे दिया। अपने सारे प्रेम-व्यवहार में वे मसीह से प्रेम रखना न भूलें।

मुझे अनुमति दीजिए कि मैं इस पुस्तिका के हर पाठक का ध्यान इस महान विषय की ओर दिलाऊँ। यह केवल उत्साही और धुनी लोगों की बात नहीं है। यह हर उस विवेकशील मसीही के विचार के योग्य है जो बाइबल पर विश्वास करता है। हमारा उद्धार स्वयं इसी से जुड़ा है। जीवन या मृत्यु, स्वर्ग या नरक, इस सीधे-सादे प्रश्न का उत्तर देने की हमारी क्षमता पर निर्भर हैं: “क्या तू मसीह से प्रेम रखता है?”

इस विषय को खोलते हुए मैं दो बातें सामने रखना चाहता हूँ।

I. पहले, मुझे दिखाने दीजिए कि सच्चे मसीही की मसीह के प्रति विशेष भावना क्या है—वह उससे प्रेम रखता है।

सच्चा मसीही केवल बपतिस्मा पाया हुआ स्त्री या पुरुष नहीं होता। वह इससे कुछ अधिक होता है। वह ऐसा व्यक्ति नहीं है जो केवल औपचारिकता के लिये रविवार को किसी गिरजे या प्रार्थनालय में जाता है और सप्ताह के शेष दिन ऐसे बिताता है मानो कोई परमेश्वर है ही नहीं। औपचारिकता मसीहियत नहीं है। अज्ञानता-भरी मुँह की आराधना सच्चा धर्म नहीं है। पवित्रशास्त्र स्पष्ट कहता है—“जो इस्राएल के वंश के हैं, वे सब इस्राएली नहीं हैं।” (रोमियों 9:6।) इन शब्दों की व्यावहारिक शिक्षा स्पष्ट और सीधी है। जो मसीह की दृश्य कलीसिया के सदस्य हैं, वे सब सच्चे मसीही नहीं हैं।

सच्चा मसीही वह है जिसका धर्म उसके हृदय और जीवन में है। उसे वह स्वयं अपने हृदय में अनुभव करता है। दूसरे उसे उसके आचरण और जीवन में देखते हैं। वह अपनी पापमयता, दोष और बुराई को अनुभव करता है और मन फिराता है। वह यीशु मसीह को वह दिव्य उद्धारकर्ता देखता है जिसकी उसकी आत्मा को आवश्यकता है, और अपने आप को उसे सौंप देता है। वह अपने भ्रष्ट और शारीरिक स्वभाववाले पुराने मनुष्यत्व को उतार फेंकता है और नया मनुष्यत्व पहिन लेता है। वह नया और पवित्र जीवन बिताता है, और संसार, शरीर और शैतान के विरुद्ध नित्य संघर्ष करता है। मसीह स्वयं उसकी मसीहियत की आधारशिला है। उससे पूछो कि अपने बहुत से पापों की क्षमा के लिये वह किस पर भरोसा रखता है, तो वह तुम्हें बताएगा कि मसीह की मृत्यु पर।—उससे पूछो कि न्याय के दिन निर्दोष खड़े रहने की आशा वह किस धार्मिकता में रखता है, तो वह तुम्हें बताएगा कि मसीह की धार्मिकता में।—उससे पूछो कि अपना जीवन ढालने का प्रतिरूप उसने किसे बनाया है, तो वह तुम्हें बताएगा कि मसीह के आदर्श को।

परन्तु इस सब के अतिरिक्त, सच्चे मसीही में एक बात ऐसी है जो विशेष रूप से उसी की है। वह बात है मसीह के प्रति प्रेम। ज्ञान, विश्वास, आशा, श्रद्धा, आज्ञाकारिता—ये सब सच्चे मसीही के चरित्र के स्पष्ट लक्षण हैं। परन्तु यदि तुम उसके दिव्य स्वामी के प्रति उसके “प्रेम” को छोड़ दो, तो उसका चित्र बहुत अधूरा रहेगा। वह केवल जानता, भरोसा रखता और आज्ञा मानता ही नहीं। वह इससे आगे जाता है—वह प्रेम करता है।

सच्चे मसीही का यह विलक्षण चिन्ह ऐसा है जिसका उल्लेख हमें बाइबल में कई बार मिलता है। "हमारे प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास" यह एक ऐसा वाक्यांश है जिससे बहुत से मसीही परिचित हैं। यह कभी न भूला जाए कि पवित्र आत्मा ने प्रेम का उल्लेख भी लगभग उतने ही सशक्त शब्दों में किया है जितना विश्वास का। जितना बड़ा खतरा "विश्वास न करनेवाले" पर है, उतना ही बड़ा खतरा "प्रेम न रखनेवाले" पर भी है। विश्वास न करना और प्रेम न रखना, दोनों ही अनन्त विनाश की ओर ले जानेवाली सीढ़ियाँ हैं।

सुनिए, पौलुस कुरिन्थियों से क्या कहता है: "यदि कोई प्रभु यीशु मसीह से प्रेम न रखे तो वह श्रापित हो। हमारा प्रभु आनेवाला है।" (1 कुरिन्थियों 16:22।) पौलुस उस मनुष्य के लिए बच निकलने का कोई मार्ग नहीं छोड़ता जो मसीह से प्रेम नहीं रखता। वह उसके लिए न कोई बचाव का रास्ता छोड़ता है, न कोई बहाना। कोई मनुष्य स्पष्ट बौद्धिक ज्ञान के बिना भी उद्धार पा सकता है। वह पतरस के समान साहस में चूक सकता है और मनुष्य के भय से दब सकता है। वह दाऊद के समान भयंकर रीति से गिर सकता है, फिर भी उठ सकता है। परन्तु यदि कोई मनुष्य मसीह से प्रेम नहीं रखता, तो वह जीवन के मार्ग पर नहीं है। श्राप अब तक उस पर है। वह उस चौड़े मार्ग पर है जो विनाश की ओर ले जाता है।

सुनिए, पौलुस इफिसियों से क्या कहता है: "जो हमारे प्रभु यीशु मसीह से सच्चा प्रेम रखते हैं उन सब पर अनुग्रह होता रहे।" (इफिसियों 6:24।) प्रेरित यहाँ सब सच्चे मसीहियों के लिए अपनी शुभकामनाएँ भेज रहा है और अपनी भलाई की इच्छा प्रकट कर रहा है। उनमें से बहुतों को उसने निश्चय ही कभी देखा नहीं था। आरम्भिक कलीसियाओं में बहुत से लोग, यह हम निश्चित रूप से मान सकते हैं, विश्वास, ज्ञान और आत्म-त्याग में निर्बल थे। तो अपना सन्देश भेजते समय वह उनका वर्णन कैसे करे? वह कौन-से शब्द काम में ले जो निर्बल भाइयों को हतोत्साहित न करें? वह एक व्यापक अभिव्यक्ति चुनता है जो सब सच्चे मसीहियों को एक ही साझा नाम के अधीन ठीक-ठीक वर्णित करती है। सब लोग शिक्षा या आचरण में एक ही स्तर तक नहीं पहुँचे थे। परन्तु सब ने सच्चाई से मसीह से प्रेम किया।

सुनिए, हमारे प्रभु यीशु मसीह स्वयं यहूदियों से क्या कहते हैं: "यदि परमेश्वर तुम्हारा पिता होता तो तुम मुझसे प्रेम रखते।" (यूहन्ना 8:42।) उन्होंने देखा कि उनके भटके हुए शत्रु अपनी आत्मिक दशा से इस एकमात्र आधार पर सन्तुष्ट थे कि वे अब्राहम की सन्तान हैं। उन्होंने उन्हें, हमारे अपने समय के बहुत से अज्ञानी मसीहियों के समान, परमेश्वर की सन्तान होने का दावा करते देखा, और इसके लिए इससे अच्छा कोई कारण न था कि उनका खतना हुआ था और वे यहूदी कलीसिया के थे। वे यह व्यापक सिद्धान्त रखते हैं कि कोई मनुष्य परमेश्वर की सन्तान नहीं है जो परमेश्वर के एकलौते पुत्र से प्रेम नहीं रखता। जो मसीह से प्रेम नहीं रखता, उसे परमेश्वर को पिता कहने का कोई अधिकार नहीं। बहुत से मसीहियों के लिए यह अच्छा होता यदि वे स्मरण रखते कि यह प्रबल सिद्धान्त उन पर भी उतना ही लागू होता है जितना यहूदियों पर। मसीह से प्रेम नहीं,—तो परमेश्वर की सन्तान होना भी नहीं!

एक बार फिर सुनिए कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने मरे हुओं में से जी उठने के बाद प्रेरित पतरस से क्या कहा। उन्होंने उससे तीन बार यह प्रश्न पूछा, "हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझसे प्रेम रखता है?" (यूहन्ना 21:15–17।) यह अवसर उल्लेखनीय था। वे अपने भटके हुए चेले को कोमलता से उसके तीन बार के पतन की स्मरण दिलाना चाहते थे। कलीसिया को चराने की उसकी सेवा उसे सार्वजनिक रूप से लौटाने से पहले वे उससे विश्वास की एक नई स्वीकारोक्ति करवाना चाहते थे। और उन्होंने उससे कौन-सा प्रश्न पूछा? वे कह सकते थे,—"क्या तू विश्वास करता है? क्या तू मन फिरा चुका है? क्या तू मुझे स्वीकार करने को तैयार है? क्या तू मेरी आज्ञा मानेगा?" उन्होंने इनमें से कोई शब्द नहीं कहा। वे केवल यह कहते हैं, "क्या तू मुझसे प्रेम रखता है?" वे चाहते हैं कि हम जानें कि मनुष्य का मसीही होना इसी बात पर टिका है। प्रश्न सुनने में चाहे कितना ही सरल हो, वह अत्यन्त गहरी जाँच करनेवाला था। अत्यन्त अनपढ़ गरीब मनुष्य के लिए भी सादा और सुगम होते हुए, उसमें ऐसी बात है जो सबसे आगे बढ़े हुए प्रेरित की सच्चाई को भी परखती है। यदि मनुष्य सचमुच मसीह से प्रेम रखता है, तो सब ठीक है;—यदि नहीं, तो सब कुछ गलत है।

क्या आप मसीह के प्रति इस विलक्षण भावना का रहस्य जानना चाहते हैं जो सच्चे मसीही को अलग पहचान देती है? वह आपको यूहन्ना के इन शब्दों में मिलता है, "हम इसलिए प्रेम करते हैं कि पहले उसने हम से प्रेम किया।" (1 यूहन्ना 4:19।) यह पद निःसन्देह विशेष रूप से पिता परमेश्वर पर लागू होता है। परन्तु यह पुत्र परमेश्वर के विषय में भी उतना ही सत्य है।

सच्चा मसीही मसीह से उन सब कामों के लिए प्रेम रखता है जो उसने उसके लिए किए हैं। उसने उसके बदले में दुःख उठाया और क्रूस पर उसके लिए मरा। उसने अपने लहू से उसे पाप के दोष, पाप की शक्ति और पाप के परिणामों से छुड़ाया है। उसने अपनी आत्मा के द्वारा उसे आत्म-ज्ञान, मन फिराव, विश्वास, आशा और पवित्रता के लिए बुलाया है। उसने उसके सब अनेक पापों को क्षमा किया और मिटा डाला है। उसने उसे संसार, शरीर और शैतान की बन्धुआई से मुक्त किया है। उसने उसे नरक के किनारे से उठाकर सकरे मार्ग पर रखा और उसका मुख स्वर्ग की ओर फेर दिया है। उसने उसे अन्धकार के बदले ज्योति, बेचैनी के बदले विवेक की शान्ति, अनिश्चितता के बदले आशा और मृत्यु के बदले जीवन दिया है। क्या आप आश्चर्य कर सकते हैं कि सच्चा मसीही मसीह से प्रेम रखता है?

और वह उससे उन सब कामों के लिए भी प्रेम रखता है जो वह अब भी कर रहा है। वह अनुभव करता है कि वह प्रतिदिन उसकी अनेक कमियों और दुर्बलताओं को धो रहा है और परमेश्वर के सामने उसकी आत्मा का मुकद्दमा लड़ रहा है। वह प्रतिदिन उसकी आत्मा की सब आवश्यकताएँ पूरी कर रहा है और उसे घड़ी-घड़ी दया और अनुग्रह की पूर्ति दे रहा है। वह प्रतिदिन अपनी आत्मा के द्वारा उसे बसने के योग्य नगर की ओर ले जा रहा है, जब वह निर्बल और अज्ञानी होता है तब उसे सह रहा है, जब वह ठोकर खाकर गिरता है तब उसे उठा रहा है, उसके अनेक शत्रुओं से उसकी रक्षा कर रहा है, और स्वर्ग में उसके लिए एक अनन्त घर तैयार कर रहा है। क्या आप आश्चर्य कर सकते हैं कि सच्चा मसीही मसीह से प्रेम रखता है?

क्या कारागार में पड़ा हुआ कर्जदार उस मित्र से प्रेम नहीं रखता जो अचानक और बिना किसी योग्यता के उसके सारे कर्ज चुका दे, उसे नई पूँजी दे, और उसे अपना साझेदार बना ले? क्या युद्ध में बन्दी बना हुआ मनुष्य उस मनुष्य से प्रेम नहीं रखता जो अपने प्राण जोखिम में डालकर शत्रु की पंक्तियों को चीरता हुआ आए, उसे छुड़ाए और स्वतन्त्र करे? क्या डूबता हुआ नाविक उस मनुष्य से प्रेम नहीं रखता जो समुद्र में कूद पड़े, उसके पीछे गोता लगाए, उसके सिर के बाल पकड़ ले और बड़े प्रयत्न से उसे जल की कब्र से बचा ले? एक बालक भी ऐसे प्रश्नों का उत्तर दे सकता है। ठीक इसी प्रकार और इन्हीं सिद्धान्तों पर सच्चा मसीही यीशु मसीह से प्रेम रखता है।

(क) मसीह के प्रति यह प्रेम उद्धार देनेवाले विश्वास का अविभाज्य साथी है। शैतानों का सा विश्वास, अर्थात् केवल बुद्धि का विश्वास, मनुष्य में प्रेम के बिना भी हो सकता है; परन्तु जो विश्वास उद्धार देता है वह ऐसा नहीं होता। प्रेम विश्वास का स्थान नहीं ले सकता। वह धर्मी नहीं ठहरा सकता। वह आत्मा को मसीह से नहीं जोड़ता। वह विवेक को शान्ति नहीं दे सकता। परन्तु जहाँ मसीह में सच्चा, धर्मी ठहरानेवाला विश्वास है, वहाँ मसीह के प्रति हृदय का प्रेम भी सदा होगा। जिसे सचमुच क्षमा मिली है, वही मनुष्य सचमुच प्रेम करेगा। (लूका 7:47।) यदि किसी मनुष्य में मसीह के प्रति प्रेम नहीं है, तो निश्चय जानो कि उसमें विश्वास भी नहीं है।

(ख) मसीह के प्रति प्रेम ही मसीह के लिए किए जानेवाले कार्य का मुख्य प्रेरक है। पृथ्वी पर उसके उद्देश्य के लिए कर्तव्य-बोध से, या जो उचित और ठीक है उसके ज्ञान से बहुत कम किया जाता है। हाथ तभी हिलेंगे और हिलते रहेंगे जब हृदय में रुचि होगी। उत्तेजना मसीही के हाथों को कभी-कभी रुक-रुककर काम करने के लिए झकझोर तो सकती है। परन्तु प्रेम के बिना भले कामों में धीरज के साथ लगे रहना और देश में या विदेश में मिशन के कार्य में अथक परिश्रम करना सम्भव नहीं। अस्पताल की परिचारिका अपना कर्तव्य ठीक और भली-भाँति निभा सकती है; वह रोगी को ठीक समय पर दवा दे सकती है, उसे खिला सकती है, उसकी सेवा कर सकती है और उसकी सब आवश्यकताओं का ध्यान रख सकती है। परन्तु उस परिचारिका में और उस पत्नी में जो अपने प्रिय पति की रोग-शय्या की सेवा करती है, या उस माता में जो मरते हुए बच्चे के पास जागती रहती है, बहुत बड़ा अन्तर है। एक कर्तव्य-बोध से काम करती है, दूसरी स्नेह और प्रेम से। एक अपना कर्तव्य इसलिए निभाती है कि उसे उसका वेतन मिलता है, दूसरी जो है वह अपने हृदय के कारण है। मसीह की सेवा के विषय में भी ठीक यही बात है। कलीसिया के बड़े-बड़े कार्यकर्ता, जिन्होंने मिशन-क्षेत्र में निराशाजनक परिस्थितियों में अगुवाई की और संसार को उलट-पलट कर दिया, वे सब विशेष रूप से मसीह से प्रेम रखनेवाले थे।

ओवेन और बैक्स्टर, रदरफोर्ड और जॉर्ज हर्बर्ट, लेइटन और हार्वी, व्हाइटफ़ील्ड और वेस्ले, हेनरी मार्टिन और जडसन, बिकरस्टेथ और सिमियन, ह्यूइटसन और मैक्चेन, स्टोवेल और मैक्नील के चरित्रों की जाँच करो। इन लोगों ने संसार पर अपनी छाप छोड़ी है। और उनके चरित्रों की सामान्य विशेषता क्या थी?

उन सब ने मसीह से प्रेम किया। वे केवल एक विश्वास-वचन को नहीं मानते थे। वे एक व्यक्ति से, अर्थात् प्रभु यीशु मसीह से प्रेम करते थे।

(ग) मसीह के प्रति प्रेम वह बात है जिस पर बच्चों को धर्म सिखाते समय हमें विशेष रूप से बल देना चाहिए। चुनाव, आरोपित धार्मिकता, मूल पाप, धर्मी ठहराया जाना, पवित्रीकरण, यहाँ तक कि स्वयं विश्वास भी, ऐसी बातें हैं जो कभी-कभी छोटी आयु के बच्चे को उलझन में डाल देती हैं। परन्तु यीशु से प्रेम उनकी समझ की पहुँच में कहीं अधिक जान पड़ता है। कि उसने उनसे अपनी मृत्यु तक प्रेम किया, और उन्हें भी बदले में उससे प्रेम करना चाहिए, यह ऐसी शिक्षा है जो उनके मन की सीमा में समाती है। यह कितना सच है, "बालकों और दूध पीते बच्चों के मुँह से तू ने अपनी स्तुति पूरी कराई है!" (मत्ती 21:16।) असंख्य मसीही ऐसे हैं जो अथानासियस, नीकिया और प्रेरितों के विश्वास-वचन की एक-एक बात जानते हैं, फिर भी वे सच्चे मसीही जीवन के विषय में उस छोटे बच्चे से भी कम जानते हैं जो केवल इतना जानता है कि वह मसीह से प्रेम करता है।

(घ) मसीह के प्रति प्रेम पृथ्वी पर मसीह की कलीसिया की हर शाखा के विश्वासियों का सामान्य मिलन-बिन्दु है। चाहे वे एपिस्कोपल हों या प्रेस्बिटेरियन, बैपटिस्ट हों या इंडिपेंडेंट, केल्विनवादी हों या आर्मीनियन, मेथोडिस्ट हों या मोरावियन, लूथरन हों या सुधारवादी, स्थापित कलीसिया के हों या स्वतंत्र, यहाँ कम से कम वे एकमत हैं। रीति-विधियों और संस्कारों के विषय में, कलीसिया के शासन और आराधना की पद्धतियों के विषय में उनमें प्रायः बहुत मतभेद होता है। परन्तु एक बात में तो वे अवश्य एक हैं। जिस पर उन्होंने अपने उद्धार की आशा बाँधी है, उसके प्रति उन सब की भावना एक ही है। वे "प्रभु यीशु मसीह से निष्कपट प्रेम रखते हैं।" (इफिसियों 6:24।) उनमें से बहुत-से शायद व्यवस्थित धर्मविज्ञान से अनजान हैं और अपने विश्वास के पक्ष में बहुत कमज़ोर तर्क दे पाएँगे। परन्तु वे सब जानते हैं कि जिसने उनके पापों के लिए प्राण दिए उसके प्रति वे क्या अनुभव करते हैं। एक वृद्ध अनपढ़ मसीही स्त्री ने डॉ. चामर्स से कहा, "श्रीमान, मैं मसीह के विषय में अधिक बोल नहीं सकती; परन्तु यदि उसके लिए बोल न सकूँ, तो उसके लिए मर तो सकती हूँ!"

(ङ) मसीह के प्रति प्रेम स्वर्ग में सब उद्धार पाए हुए लोगों का विशिष्ट चिह्न होगा। वह असंख्य भीड़, जिसे कोई गिन नहीं सकता, सब एक मन की होगी। पुराने मतभेद एक सामान्य भावना में विलीन हो जाएँगे। पुराने सैद्धान्तिक भेद, जिनके लिए पृथ्वी पर उग्र झगड़े हुए, मसीह के प्रति ऋण की एक सामान्य अनुभूति से ढक जाएँगे। लूथर और ज़्विंगली फिर विवाद नहीं करेंगे। वेस्ले और टॉप्लेडी फिर वाद-विवाद में समय नहीं गँवाएँगे। कलीसिया के लोग और असहमत लोग फिर एक दूसरे को काटेंगे और खाएँगे नहीं। सब अपने आप को एक हृदय और एक स्वर से स्तुति के उस गीत में सम्मिलित पाएँगे, "जो हम से प्रेम रखता है, और जिसने अपने लहू के द्वारा हमें हमारे पापों से छुड़ाया है, और हमें एक राज्य और अपने पिता परमेश्वर के लिए याजक भी बनाया; उसी की महिमा और पराक्रम युगानुयुग रहे। आमीन।" (प्रकाशित वाक्य 1:5-6।)

जो शब्द जॉन बनयन ने मृत्यु की नदी में खड़े श्रीमान् स्टैंडफ़ास्ट के मुँह में डाले हैं, वे बहुत सुन्दर हैं। उसने कहा, "इस नदी ने बहुतों को भयभीत किया है; हाँ, इसके विचार ने भी मुझे बार-बार डराया है। परन्तु अब मुझे लगता है कि मैं निश्चिन्त खड़ा हूँ: मेरा पाँव उसी पर टिका है जिस पर उन याजकों के पाँव टिके थे जो वाचा का सन्दूक उठाए हुए थे, जब इस्राएल यरदन पार कर रहा था। पानी तो सचमुच जीभ को कड़वा और पेट को ठंडा लगता है; फिर भी जहाँ मैं जा रहा हूँ उसका, और उस साथ का जो उस पार मेरी बाट जोह रहा है, विचार मेरे हृदय में धधकते अंगारे के समान पड़ा है। अब मैं अपने आप को अपनी यात्रा के अन्त पर देखता हूँ; मेरे परिश्रम के दिन समाप्त हुए। मैं उस सिर को देखने जा रहा हूँ जिस पर काँटों का मुकुट रखा गया, और उस मुख को जिस पर मेरे लिये थूका गया। पहले मैं सुनने और विश्वास से जीता रहा, परन्तु अब वहाँ जा रहा हूँ जहाँ मैं देखने से जीऊँगा, और उसके साथ रहूँगा जिसकी संगति में मैं आनन्दित होता हूँ। मुझे अपने प्रभु की चर्चा सुनना प्रिय रहा है; और जहाँ कहीं मैंने भूमि पर उसके जूते की छाप देखी, वहाँ मैंने भी अपना पाँव रखना चाहा। उसका नाम मेरे लिये कस्तूरी की डिबिया रहा है; हाँ, सब इत्रों से भी अधिक मधुर! उसका शब्द मुझे अत्यन्त मधुर लगा है; और उसके मुख को मैंने उन लोगों से भी अधिक चाहा है जो सूर्य के प्रकाश को चाहते हैं!" धन्य हैं वे जो इस अनुभव के विषय में कुछ जानते हैं! जो स्वर्ग के योग्य सुर में होना चाहता है, उसे मसीह के प्रेम के विषय में कुछ जानना ही होगा। जो उस प्रेम से अनजान ही मर जाता है, उसके लिये अच्छा होता कि वह कभी जन्म ही न लेता।

II. अब दूसरी बात में मैं उन विशेष चिह्नों को दिखाना चाहता हूँ जिनके द्वारा मसीह के प्रति प्रेम अपने आप को प्रकट करता है

यह बात अत्यन्त महत्त्व की है। यदि मसीह के प्रति प्रेम के बिना उद्धार नहीं है,—यदि जो मसीह से प्रेम नहीं रखता वह अनन्त दण्ड के संकट में है, तो हम सब का कर्तव्य है कि इस विषय में हम जो कुछ जानते हैं उसे बहुत स्पष्ट रीति से जाँचें। मसीह स्वर्ग में है, और हम पृथ्वी पर हैं। उस मनुष्य को किस प्रकार पहचाना जाए जो उससे प्रेम रखता है?

सौभाग्य से यह ऐसी बात है जिसे ठहराना बहुत कठिन नहीं। हम कैसे जानते हैं कि हम पृथ्वी पर किसी व्यक्ति से प्रेम रखते हैं? इस संसार में पति और पत्नी के बीच,—माता-पिता और सन्तान के बीच,—भाई और बहन के बीच,—मित्र और मित्र के बीच प्रेम किस रीति से प्रकट होता है? इन प्रश्नों का उत्तर साधारण बुद्धि और अवलोकन से दिया जाए, तो मैं और कुछ नहीं माँगता। इन प्रश्नों का उत्तर ईमानदारी से दिया जाए, तो हमारे सामने की गाँठ खुल जाती है। हमारे बीच स्नेह किस प्रकार प्रकट होता है?

(क) यदि हम किसी व्यक्ति से प्रेम रखते हैं, तो हमें उसके विषय में सोचना अच्छा लगता है। हमें उसकी सुधि दिलाए जाने की आवश्यकता नहीं होती। हम उसका नाम, उसका रूप, उसका स्वभाव, उसके विचार, उसकी रुचियाँ, उसकी स्थिति, या उसका व्यवसाय नहीं भूलते। दिन में कई बार वह हमारे मन की आँखों के सामने आ खड़ा होता है। चाहे वह बहुत दूर हो, फिर भी वह हमारे विचारों में प्रायः उपस्थित रहता है। ठीक यही सच्चे मसीही और मसीह के बीच भी होता है! मसीह "उसके हृदय में बसता है," और प्रतिदिन कम या अधिक उसका ध्यान किया जाता है। (इफिसियों 3:17।) सच्चे मसीही को यह याद दिलाने की आवश्यकता नहीं कि उसका एक क्रूस पर चढ़ाया हुआ स्वामी है। वह उसके विषय में प्रायः सोचता है। वह कभी नहीं भूलता कि उसका एक दिन, एक उद्देश्य और एक प्रजा है, और कि उसकी प्रजा में वह भी एक है। धर्म में अच्छी स्मरण-शक्ति का वास्तविक भेद स्नेह है। कोई सांसारिक मनुष्य मसीह के विषय में अधिक नहीं सोच सकता, जब तक कि मसीह उसके ध्यान में डाला न जाए, क्योंकि उसे उससे कोई स्नेह नहीं। सच्चा मसीही जितने दिन जीवित रहता है, प्रतिदिन मसीह के विषय में सोचता है, और इसका केवल यही एक सीधा कारण है कि वह उससे प्रेम रखता है।

(ख) यदि हम किसी व्यक्ति से प्रेम रखते हैं, तो हमें उसके विषय में सुनना अच्छा लगता है। जो लोग उसकी चर्चा करते हैं उनकी बात सुनने में हमें आनन्द मिलता है। उसके विषय में दूसरे जो समाचार देते हैं उसमें हमारी रुचि होती है। जब दूसरे लोग उसकी बातें करते हैं, और उसकी चाल-चलन, उसकी कही बातों, उसके कामों और उसकी योजनाओं का वर्णन करते हैं, तब हम पूरा ध्यान लगा देते हैं। कुछ लोग उसकी चर्चा पूरी उदासीनता से सुन सकते हैं, परन्तु उसके नाम की ध्वनि मात्र से हमारा हृदय भीतर उछल पड़ता है। ठीक यही सच्चे मसीही और मसीह के बीच भी होता है! सच्चा मसीही अपने स्वामी के विषय में कुछ सुनने से आनन्दित होता है। उसे वे उपदेश सबसे अच्छे लगते हैं जो मसीह से भरे होते हैं। उसे वह संगति सबसे अधिक भाती है जिसमें लोग मसीह की बातों की चर्चा करते हैं। मैंने एक वृद्ध वेल्श विश्वासिनी के विषय में पढ़ा है, जो प्रत्येक रविवार को कई मील पैदल चलकर एक अंग्रेज़ पादरी का प्रचार सुनने जाती थी, यद्यपि वह अंग्रेज़ी का एक शब्द भी नहीं समझती थी। उससे पूछा गया कि वह ऐसा क्यों करती है। उसने उत्तर दिया कि वह पादरी अपने उपदेशों में मसीह का नाम इतनी बार लेता है कि उससे उसे लाभ होता है। वह अपने उद्धारकर्ता के नाम से भी प्रेम रखती थी।

(ग) यदि हम किसी व्यक्ति से प्रेम रखते हैं, तो हमें उसके विषय में पढ़ना अच्छा लगता है। परदेस गए पति की चिट्ठी से पत्नी को, या परदेस गए पुत्र की चिट्ठी से माता को कितना गहरा आनन्द मिलता है। दूसरे उस चिट्ठी में ध्यान देने योग्य कुछ नहीं देखते। वे उसे पूरा पढ़ने का कष्ट भी मुश्किल से उठाते हैं। परन्तु जो लिखनेवाले से प्रेम रखते हैं, वे उस चिट्ठी में कुछ ऐसा देखते हैं जो और कोई नहीं देख सकता। वे उसे निधि के समान अपने साथ लिये फिरते हैं। वे उसे बार-बार पढ़ते हैं। ठीक यही सच्चे मसीही और मसीह के बीच भी होता है! सच्चा मसीही पवित्रशास्त्र पढ़ने से आनन्दित होता है, क्योंकि वह उसे उसके प्रिय उद्धारकर्ता के विषय में बताता है। उन्हें पढ़ना उसके लिये थका देनेवाला काम नहीं। यात्रा पर जाते समय उसे अपनी बाइबल साथ ले जाने की सुधि शायद ही कभी दिलानी पड़ती है। वह उसके बिना सुखी नहीं रह सकता। और यह सब क्यों है? इसलिये कि पवित्रशास्त्र उसी की गवाही देता है जिससे उसका मन प्रेम रखता है, अर्थात् मसीह की।

(घ) यदि हम किसी व्यक्ति से प्रेम करते हैं, तो हम उसे प्रसन्न करना चाहते हैं। हम उसकी रुचियों और विचारों को जानने में आनन्द पाते हैं, उसकी सलाह पर चलते हैं, और वे काम करते हैं जिन्हें वह पसन्द करता है। हम उसकी इच्छा पूरी करने के लिए अपने आप को वंचित भी कर लेते हैं, जिन बातों से वह अप्रसन्न होता है उनसे दूर रहते हैं, और ऐसी बातें सीखते हैं जिनकी ओर हमारा स्वभाव से झुकाव नहीं होता, क्योंकि हम समझते हैं कि इससे उसे आनन्द होगा। ठीक यही सच्चे मसीही और मसीह के बीच भी है! सच्चा मसीही शरीर और आत्मा दोनों में पवित्र होकर उसे प्रसन्न करने का यत्न करता है। उसे उसके दैनिक आचरण में कोई ऐसी बात दिखाइए जिससे मसीह घृणा करता है, तो वह उसे छोड़ देगा। उसे कोई ऐसी बात दिखाइए जिसमें मसीह प्रसन्न होता है, तो वह उसके पीछे चलेगा। वह मसीह की माँगों पर कुड़कुड़ाता नहीं कि वे बहुत कठोर और कड़ी हैं, जैसा संसार के लोग करते हैं। उसके लिए मसीह की आज्ञाएँ भारी नहीं हैं, और मसीह का बोझ हल्का है। और यह सब क्यों है? केवल इसलिए कि वह उससे प्रेम करता है।

(ङ) यदि हम किसी व्यक्ति से प्रेम करते हैं, तो हमें उसके मित्र भी अच्छे लगते हैं। उन्हें जानने से पहले ही हमारा मन उनकी ओर झुका रहता है। एक ही व्यक्ति के प्रति साझा प्रेम का बन्धन हमें उनकी ओर खींचता है। जब हम उनसे मिलते हैं तो हमें नहीं लगता कि हम बिलकुल अजनबी हैं। हमारे बीच एकता की एक डोर होती है। वे उसी से प्रेम करते हैं जिससे हम करते हैं, और यही अपने आप में परिचय है। ठीक यही सच्चे मसीही और मसीह के बीच भी है! सच्चा मसीही मसीह के सब मित्रों को अपना मित्र समझता है, एक ही देह के अंग, एक ही परिवार की सन्तान, एक ही सेना के सिपाही, और एक ही घर की ओर जानेवाले यात्री। जब वह उनसे मिलता है तो उसे ऐसा लगता है मानो वह उन्हें बहुत समय से जानता है। कई वर्षों की जान-पहचान वाले अनेक सांसारिक लोगों की अपेक्षा वह उनके साथ कुछ ही मिनटों में अधिक अपनापन अनुभव करता है। और इस सबका भेद क्या है? केवल यह कि एक ही उद्धारकर्ता के प्रति स्नेह और एक ही प्रभु से प्रेम है।

(च) यदि हम किसी व्यक्ति से प्रेम करते हैं, तो हम उसके नाम और सम्मान के विषय में चिन्तित रहते हैं। जब कोई उसके विरुद्ध बोलता है तो हम चुप नहीं रहते, उसके पक्ष में बोलते हैं और उसका बचाव करते हैं। हम अपना कर्तव्य समझते हैं कि उसके हितों और उसकी प्रतिष्ठा की रक्षा करें। जो उसके साथ बुरा व्यवहार करता है उसे हम लगभग वैसी ही अप्रसन्नता से देखते हैं मानो उसने हमारे साथ बुरा व्यवहार किया हो। ठीक यही सच्चे मसीही और मसीह के बीच भी है! सच्चा मसीही अपने स्वामी के वचन, नाम, कलीसिया या दिन को नीचा दिखाने के सब प्रयासों को धर्मी जलन की दृष्टि से देखता है। आवश्यकता पड़े तो वह राजाओं के सामने भी उसे मान लेगा, और उस पर आए थोड़े-से अपमान के प्रति भी संवेदनशील रहेगा। वह चुप नहीं रहेगा और अपने स्वामी के काम को लज्जित होने नहीं देगा, बिना उसके विरुद्ध गवाही दिए। और यह सब क्यों है? केवल इसलिए कि वह उससे प्रेम करता है।

(छ) यदि हम किसी व्यक्ति से प्रेम करते हैं, तो हम उससे बातें करना चाहते हैं। हम उसे अपने सब विचार बताते हैं और अपना सारा मन उसके सामने उँडेल देते हैं। हमें बातचीत के विषय ढूँढ़ने में कोई कठिनाई नहीं होती। दूसरों के सामने हम चाहे कितने ही चुप और संकोची क्यों न हों, अपने प्रिय मित्र से बात करना हमें सरल लगता है। हम चाहे कितनी ही बार मिलें, बात करने को कभी कुछ कम नहीं पड़ता। हमारे पास सदा बहुत कुछ कहने, पूछने, बताने और बाँटने को होता है। ठीक यही सच्चे मसीही और मसीह के बीच भी है! सच्चे मसीही को अपने उद्धारकर्ता से बात करने में कोई कठिनाई नहीं होती। प्रतिदिन उसके पास उसे बताने को कुछ न कुछ होता है, और जब तक वह उसे बता न दे, उसे चैन नहीं मिलता। वह प्रत्येक सुबह और रात प्रार्थना में उससे बातें करता है। वह उसे अपनी आवश्यकताएँ और इच्छाएँ, अपनी भावनाएँ और अपने भय बताता है। कठिनाई में वह उससे सम्मति माँगता है। संकट में वह उससे शान्ति माँगता है। वह ऐसा किए बिना रह ही नहीं सकता। उसे अपने उद्धारकर्ता से निरन्तर बातचीत करनी ही पड़ती है, नहीं तो वह मार्ग में ही थक कर गिर पड़ेगा। और यह क्यों है? केवल इसलिए कि वह उससे प्रेम करता है।

(ज) अन्त में, यदि हम किसी व्यक्ति से प्रेम करते हैं, तो हम सदा उसके साथ रहना चाहते हैं। उसके विषय में सोचना, सुनना, पढ़ना और कभी-कभी बात करना, ये सब अपनी जगह ठीक हैं। परन्तु जब हम सचमुच लोगों से प्रेम करते हैं तो हमें इससे कुछ अधिक चाहिए। हम सदा उनके संग रहने की लालसा करते हैं। हम चाहते हैं कि निरन्तर उनकी संगति में रहें और बिना किसी रुकावट या विदा के उनके साथ सहभागिता रखें। ठीक यही सच्चे मसीही और मसीह के बीच भी है! सच्चे मसीही का हृदय उस धन्य दिन की लालसा करता है जब वह अपने स्वामी को आमने-सामने देखेगा और फिर कभी बाहर न जाएगा। वह चाहता है कि पाप करना, पश्चाताप करना और विश्वास करना समाप्त हो जाए और वह अनन्त जीवन आरम्भ हो जब वह वैसा ही देखेगा जैसा वह देखा गया है, और फिर कभी पाप न करेगा। उसने विश्वास से जीना मधुर पाया है, और वह अनुभव करता है कि देखकर जीना और भी मधुर होगा। उसे मसीह के विषय में सुनना, बात करना और पढ़ना सुखद लगा है। अपनी आँखों से मसीह को देखना और फिर कभी उसे न छोड़ना कितना अधिक सुखद होगा! वह अनुभव करता है, "आँखों से देख लेना, मन की चंचलता से उत्तम है।" (सभोपदेशक 6:9।) और यह सब क्यों है? केवल इसलिए कि वह उससे प्रेम करता है।

सच्चे प्रेम की पहचान के ये ही चिह्न हैं। ये सब स्पष्ट, सरल और सहज ही समझ में आनेवाले हैं। इनमें कुछ भी अँधेरा, गूढ़ या रहस्यमय नहीं है। इन्हें ईमानदारी से काम में लाइए और निष्पक्षता से परखिए, तो आपको इस लेख के विषय पर कुछ प्रकाश अवश्य मिलेगा।

सम्भव है कि भारतीय विद्रोह या क्रीमिया के युद्ध के समय आपका कोई प्रिय पुत्र सेना में रहा हो। सम्भव है कि वह उस युद्ध में सक्रिय रूप से लगा हुआ था, ठीक संघर्ष के बीच में। क्या आपको स्मरण नहीं कि उस पुत्र के विषय में आपकी भावनाएँ कितनी प्रबल, गहरी और चिन्ता से भरी थीं?—वही प्रेम था!

सम्भव है कि आपने जाना हो कि नौसेना में अपने प्रिय पति का होना कैसा होता है, जो कर्तव्य के कारण बार-बार घर से बुलाए जाते थे और अनेक महीनों, यहाँ तक कि वर्षों तक आपसे दूर रहते थे। क्या आपको उस बिछड़ने के समय की अपनी दुखभरी भावनाएँ स्मरण नहीं?—वही प्रेम था!

सम्भव है कि इस समय लन्दन में आपका कोई प्रिय भाई हो, जो व्यापार में अपना मार्ग बनाने के लिए पहली बार एक बड़े नगर की परीक्षाओं के बीच उतरा है। वह कैसा निकलेगा? वह कैसे आगे बढ़ेगा? क्या आप उसे फिर कभी देख पाएँगी? क्या आप नहीं जानतीं कि आप अकसर उस भाई के विषय में सोचती हैं?—यही स्नेह है!

हो सकता है कि आपकी सगाई किसी ऐसे व्यक्ति से हुई हो जो हर रीति से आपके अनुकूल है। परन्तु विवेक यह आवश्यक ठहराता है कि विवाह कुछ दूर के समय के लिये टाल दिया जाए, और कर्तव्य यह आवश्यक बनाता है कि आप उससे दूर रहें जिसे आपने अपनी पत्नी बनाने की प्रतिज्ञा की है। क्या आपको मानना न पड़ेगा कि वह प्रायः आपके विचारों में रहती है?—क्या आपको मानना न पड़ेगा कि आप उसके विषय में सुनना और उसकी चिट्ठी पाना चाहते हैं, और उसे देखने के लिये तरसते हैं?—यही प्रेम है!

मैं ऐसी बातें कह रहा हूँ जो हर किसी को जानी-पहचानी हैं। मुझे उन पर और अधिक रुकने की आवश्यकता नहीं। वे पहाड़ों जितनी पुरानी हैं। उन्हें सारे संसार में समझा जाता है। आदम के वंश की कदाचित् ही कोई शाखा हो जो स्नेह और प्रेम के विषय में कुछ न जानती हो। इसलिये यह कभी न कहा जाए कि हम यह पता नहीं लगा सकते कि कोई मसीही सचमुच मसीह से प्रेम रखता है या नहीं। यह जाना जा सकता है; यह पता लगाया जा सकता है; प्रमाण सब आपके हाथ में तैयार हैं। आपने उन्हें आज ही सुना है। प्रभु यीशु मसीह के प्रति प्रेम कोई छिपा हुआ रहस्य या अदृश्य वस्तु नहीं है। वह ज्योति के समान है,—वह दिखाई देगा। वह ध्वनि के समान है,—वह सुनाई देगा। वह ताप के समान है,—वह अनुभव होगा। जहाँ वह है, वहाँ छिपा नहीं रह सकता। जहाँ वह दिखाई नहीं देता, वहाँ निश्चय जानिए कि वह है ही नहीं।

अब मेरे लिये इस लेख को समाप्त करने का समय आ गया है। परन्तु मैं इसके विषय को उन सब के व्यक्तिगत विवेक पर दृढ़ता से डाले बिना समाप्त नहीं कर सकता जिनके हाथों में यह पहुँचा है। मैं यह सारे प्रेम और स्नेह से करता हूँ। यह लेख लिखते समय परमेश्वर से मेरे हृदय की इच्छा और प्रार्थना यह है कि आत्माओं का भला हो।

1. सबसे पहले, मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि उस प्रश्न का सामना कीजिए जो मसीह ने पतरस से पूछा था, और उसका उत्तर अपने लिये स्वयं देने का प्रयत्न कीजिए। इसे गम्भीरता से देखिए। इसकी सावधानी से जाँच कीजिए। इसे भली-भाँति तौलिए। इसके विषय में मैंने जो कुछ कहा है उसे पढ़ लेने के बाद, क्या आप सच्चाई से कह सकते हैं कि आप मसीह से प्रेम रखते हैं?

यह कहना उत्तर नहीं है कि आप मसीही धर्म की सच्चाई पर विश्वास करते हैं और मसीही विश्वास के अनुच्छेदों को मानते हैं। ऐसा धर्म आपकी आत्मा को कभी नहीं बचाएगा। दुष्टात्माएँ भी एक प्रकार से विश्वास करती हैं, और थरथराती हैं। (याकूब 2:19।) सच्चा उद्धार देनेवाला मसीही धर्म केवल कुछ मतों को मान लेना और कुछ धारणाओं को पकड़े रहना नहीं है। उसका सार एक जीवते व्यक्ति को जानना, उस पर भरोसा रखना और उससे प्रेम करना है, जो हमारे लिये मरा,—अर्थात् प्रभु मसीह। आरम्भिक मसीही, जैसे फीबे, और पिरसिस, और त्रूफैना, और त्रूफोसा, और गयुस, और फिलेमोन, सम्भवतः धर्म-सिद्धान्त के विषय में बहुत कम जानते थे। परन्तु उन सब के धर्म में यह महान प्रमुख लक्षण था कि वे मसीह से प्रेम रखते थे।

यह कहना भी उत्तर नहीं है कि आप भावनाओं के धर्म को अनुचित मानते हैं। यदि इससे आपका तात्पर्य यह है कि आप केवल भावनाओं से बने धर्म को नापसन्द करते हैं, तो मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ। परन्तु यदि आपका तात्पर्य भावनाओं को सर्वथा निकाल देना है, तो आप मसीही धर्म के विषय में बहुत कम जानते होंगे। बाइबल हमें स्पष्ट सिखाती है कि मनुष्य में किसी सच्चे धर्म के बिना भी अच्छी भावनाएँ हो सकती हैं। परन्तु वह इतना ही स्पष्ट यह भी सिखाती है कि मसीह के प्रति कुछ भावना के बिना कोई सच्चा धर्म नहीं हो सकता।

यह छिपाना व्यर्थ है कि यदि आप मसीह से प्रेम नहीं रखते, तो आपकी आत्मा बड़े संकट में है। जीते जी आपके पास अभी उद्धार देनेवाला कोई विश्वास नहीं है। यदि आप मर जाएँ तो स्वर्ग के योग्य नहीं हैं। जो मसीह के प्रति प्रेम के बिना जीता है, वह उसके प्रति किसी ऋण का बोध नहीं कर सकता। जो मसीह के प्रति प्रेम के बिना मरता है, वह उस स्वर्ग में कभी सुखी नहीं हो सकता जहाँ मसीह ही सब कुछ और सब में है। अपनी स्थिति का संकट जानने के लिये जाग उठिए। अपनी आँखें खोलिए। अपने मार्गों पर ध्यान कीजिए, और बुद्धिमान बनिए। मैं केवल एक मित्र के रूप में आपको चेतावनी दे सकता हूँ। परन्तु यह मैं अपने सारे हृदय और प्राण से करता हूँ। परमेश्वर करे कि यह चेतावनी व्यर्थ न जाए!

2. दूसरी बात, यदि आप मसीह से प्रेम नहीं रखते, तो मैं आपको साफ़-साफ़ बताता हूँ कि इसका कारण क्या है। आपको उसके प्रति किसी ऋण का बोध नहीं है। आपको उसके प्रति कृतज्ञता का कोई भाव नहीं है। आपको यह स्थायी स्मरण नहीं है कि आपने उससे कुछ पाया है। ऐसी स्थिति में यह सम्भव नहीं, यह सम्भावित नहीं, यह उचित नहीं कि आप उससे प्रेम रखें।

इस स्थिति का एक ही उपाय है। वह उपाय आत्म-ज्ञान और पवित्र आत्मा की शिक्षा है। आपकी समझ की आँखें खुलनी चाहिए। आपको जानना होगा कि आप स्वभाव से क्या हैं। आपको वह महान रहस्य खोजना होगा, अर्थात् परमेश्वर की दृष्टि में अपना दोष और खालीपन।

हो सकता है आप अपनी बाइबल कभी पढ़ते ही न हों, या केवल औपचारिकता के रूप में कभी-कभार एक अध्याय पढ़ लेते हों, बिना रुचि, समझ या अपने पर लागू किए। आज मेरी सलाह मानिए, और अपना तरीका बदल दीजिए। बाइबल को सच्चे मन से पढ़नेवाले मनुष्य की तरह पढ़ना आरम्भ कीजिए, और जब तक उससे परिचित न हो जाएँ तब तक विश्राम न कीजिए। पढ़िए कि परमेश्वर की व्यवस्था क्या माँगती है, जैसा कि प्रभु यीशु ने मत्ती के पाँचवें अध्याय में समझाया है। पढ़िए कि पौलुस अपनी पत्री रोमियों के पहले दो अध्यायों में मानव स्वभाव का वर्णन कैसे करता है। ऐसे अंशों का अध्ययन आत्मा की शिक्षा के लिये प्रार्थना के साथ कीजिए, और तब कहिए कि क्या आप परमेश्वर के देनदार नहीं हैं, और मसीह जैसे मित्र की बड़ी आवश्यकतावाले देनदार नहीं हैं।

हो सकता है आप ऐसे हों जिन्होंने सच्ची, हार्दिक, गम्भीर प्रार्थना के विषय में कुछ भी नहीं जाना। आप धर्म को गिरजाघरों, उपासनालयों, रीतियों, सेवाओं और रविवारों का मामला समझने के आदी रहे हैं, परन्तु ऐसी वस्तु नहीं जिसमें भीतरी मनुष्य का गम्भीर और हार्दिक ध्यान चाहिए। आज मेरी सलाह मानिए, और अपना तरीका बदल दीजिए। अपनी आत्मा के विषय में परमेश्वर से सच्चे मन से बिनती करने की आदत डालिए। उससे ज्योति, शिक्षा और आत्म-ज्ञान माँगिए। उससे विनती कीजिए कि वह आपको वह सब दिखाए जो आपकी आत्मा के उद्धार के लिये जानना आवश्यक है। यह अपने सारे हृदय और मन से कीजिए, और मुझे कोई सन्देह नहीं कि शीघ्र ही आप मसीह की आवश्यकता अनुभव करेंगे।

जो सलाह मैं देता हूँ वह साधारण और पुराने ढंग की लग सकती है। इस कारण उसे तुच्छ न जानिए। यह वही पुराना भला मार्ग है जिस पर लाखों लोग चल चुके हैं और जिन्होंने अपनी आत्मा के लिये शान्ति पाई है। मसीह से प्रेम न रखना अनन्त विनाश के निकट संकट में होना है। मसीह की अपनी आवश्यकता और मसीह के प्रति अपने आश्चर्यजनक ऋण को देखना उससे प्रेम करने का पहला कदम है। अपने आपको जानना और परमेश्वर के सम्मुख अपनी वास्तविक दशा का पता लगाना ही अपनी आवश्यकता देखने का एकमात्र मार्ग है। परमेश्वर की पुस्तक को खोजना और प्रार्थना में परमेश्वर से ज्योति माँगना ही उद्धार देनेवाला ज्ञान पाने का सही मार्ग है। मेरी दी हुई सलाह को मानने से ऊपर न बनिए। इसे मानिए और उद्धार पाइए।

(3) अन्त में, यदि आप सचमुच मसीह के प्रति प्रेम के विषय में कुछ भी जानते हैं, तो विदा के समय की दो बातें—सान्त्वना और सलाह के रूप में—स्वीकार कीजिए। प्रभु करे कि वे आपके लिए भलाई का कारण बनें।

पहली बात यह कि यदि आप कर्म और सच्चाई से मसीह से प्रेम करते हैं, तो इस विचार से आनन्दित हों कि आपके पास अपनी आत्मा की दशा के विषय में अच्छा प्रमाण है। मैं आज आपसे कहता हूँ, प्रेम अनुग्रह का प्रमाण है।

यदि आप कभी-कभी सन्देह और भय से व्याकुल हो जाते हैं, तो क्या हुआ? यदि आपको यह कहना कठिन लगता है कि आपका विश्वास सच्चा है और आपका अनुग्रह वास्तविक है, तो क्या हुआ? यदि आपकी आँखें प्रायः आँसुओं से इतनी धुँधली हो जाती हैं कि आप परमेश्वर की ओर से अपने बुलाए जाने और चुने जाने को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते, तो क्या हुआ? फिर भी आशा और दृढ़ सान्त्वना का आधार है, यदि आपका हृदय यह गवाही दे सके कि आप मसीह से प्रेम करते हैं। जहाँ सच्चा प्रेम है वहाँ विश्वास और अनुग्रह है। यदि उसने आपके लिए कुछ न किया होता तो आप उससे प्रेम न करते। आपका प्रेम ही भलाई का एक चिन्ह है।

दूसरी बात यह कि यदि आप मसीह से प्रेम करते हैं, तो दूसरों को यह दिखाने और जताने में कभी लज्जित न हों। उसके लिए बोलिए। उसकी गवाही दीजिए। उसके लिए जीवित रहिए। उसके लिए काम कीजिए। यदि उसने आपसे प्रेम किया है और अपने ही लहू से आपको आपके पापों से धो दिया है, तो आपको दूसरों पर यह प्रकट करने से कभी पीछे हटने की आवश्यकता नहीं कि आप यह अनुभव करते हैं और बदले में उससे प्रेम करते हैं।

एक विचारहीन, अभक्त अंग्रेज़ यात्री ने उत्तर अमेरिका के एक मसीही बने रेड इंडियन से कहा, "भाई, क्या कारण है कि तुम मसीह को इतना महत्त्व देते हो, और उसके विषय में इतना बोलते हो? इस मसीह ने तुम्हारे लिए ऐसा क्या किया है कि तुम उसके विषय में इतना हो-हल्ला करते हो?"

उस मन फिराए हुए इंडियन ने उसे शब्दों में उत्तर नहीं दिया। उसने कुछ सूखे पत्ते और काई इकट्ठी की और उनसे भूमि पर एक घेरा बनाया। उसने एक जीवित कीड़ा उठाया और उसे घेरे के बीच में रख दिया। फिर उसने आग जलाई और काई और पत्तों में आग लगा दी। लपट शीघ्र ही ऊपर उठी, और गर्मी से कीड़ा झुलसने लगा। वह पीड़ा में तड़पता रहा, और चारों ओर से निकलने का व्यर्थ प्रयत्न करके बीच में सिकुड़कर पड़ गया, मानो निराशा में मरने को हो। उसी क्षण इंडियन ने हाथ बढ़ाया, कीड़े को कोमलता से उठाया और अपनी छाती पर रख लिया। उसने अंग्रेज़ से कहा, "परदेशी, क्या तुम इस कीड़े को देखते हो? मैं वही नाश होता हुआ प्राणी था। मैं अपने पापों में मर रहा था, आशाहीन, असहाय, और अनन्त आग के किनारे पर था। यीशु मसीह ही था जिसने अपनी सामर्थ्य की भुजा बढ़ाई। यीशु मसीह ही था जिसने अपने अनुग्रह के हाथ से मुझे छुड़ाया, और सदा की जलन में से मुझे खींच निकाला। यीशु मसीह ही था जिसने मुझ पापी कीड़े को अपने प्रेम के हृदय के निकट रखा। परदेशी, यही कारण है कि मैं यीशु मसीह की चर्चा करता हूँ और उसे इतना महत्त्व देता हूँ। मैं इससे लज्जित नहीं हूँ, क्योंकि मैं उससे प्रेम करता हूँ।"

यदि हम मसीह के प्रति प्रेम के विषय में कुछ भी जानते हैं, तो हमारा भी वैसा ही मन हो जैसा इस उत्तर अमेरिकी इंडियन का था! हम कभी यह न सोचें कि हम मसीह से बहुत अधिक प्रेम कर सकते हैं, उसके लिए बहुत अधिक पूर्णता से जी सकते हैं, उसे बहुत अधिक साहस से मान सकते हैं, उसके लिए बहुत अधिक मन लगाकर अपने आपको लगा सकते हैं! पुनरुत्थान की सुबह जो बातें हमें चकित करेंगी, उन सब में, मेरा विश्वास है, यह सबसे अधिक चकित करेगी कि हमने मरने से पहले मसीह से और अधिक प्रेम क्यों नहीं किया।

XVI. मसीह के बिना!

"तुम मसीह से अलग थे।"—इफिसियों 2:12

इस लेख के शीर्ष का यह पद इफिसियों की उस दशा का वर्णन करता है जब वे मसीही नहीं बने थे। परन्तु बात इतनी ही नहीं है। यह इंग्लैंड के प्रत्येक उस स्त्री-पुरुष की दशा का वर्णन करता है जो अब तक परमेश्वर की ओर नहीं फिरा है। इससे अधिक दयनीय दशा की कल्पना नहीं की जा सकती! धन के बिना, या स्वास्थ्य के बिना, या घर के बिना, या मित्रों के बिना होना भी बुरा है। परन्तु "मसीह के बिना" होना कहीं अधिक बुरा है।

आज हम इस पद की जाँच करें और देखें कि इसमें क्या है। कौन जाने कि यह इस लेख के किसी पाठक के लिए परमेश्वर की ओर से सन्देश ठहरे?

I. पहले यह विचार करें कि किसी मनुष्य के विषय में कब कहा जा सकता है कि वह "मसीह के बिना" है

स्मरण रहे कि "मसीह के बिना" यह वाक्यांश मेरा गढ़ा हुआ नहीं है। ये शब्द पहले मैंने नहीं गढ़े, बल्कि ये पवित्र आत्मा की प्रेरणा से लिखे गए थे। पौलुस ने इनका प्रयोग तब किया जब वह इफिसुस के मसीहियों को स्मरण दिला रहा था कि सुसमाचार सुनने और विश्वास करने से पहले उनकी दशा क्या थी।

निस्सन्देह वे अज्ञानी और अन्धकार में थे, मूर्तिपूजा और अन्यजातियों के अन्धविश्वास में दबे हुए, झूठी देवी दियाना के उपासक। परन्तु वह इस सब को पूरी तरह छोड़ देता है। मानो उसे लगता है कि इससे उनकी दशा का केवल आंशिक वर्णन होगा। इसलिए वह एक चित्र खींचता है, जिसकी पहली ही विशेषता हमारे सामने का यह वाक्यांश है: "उस समय तुम मसीह से अलग थे" (इफिसियों 2:12)। अब इस वाक्यांश का अर्थ क्या है?

(क) मनुष्य "मसीह के बिना" तब होता है जब उसके पास उसका कोई बौद्धिक ज्ञान नहीं होता। निस्सन्देह लाखों लोग इसी दशा में हैं। वे न तो यह जानते हैं कि मसीह कौन है,—न यह कि उसने क्या किया है,—न यह कि उसने क्या सिखाया,—न यह कि वह क्यों क्रूस पर चढ़ाया गया,—न यह कि वह अब कहाँ है,—न यह कि वह मनुष्य-जाति के लिए क्या है। संक्षेप में, वे उसके विषय में बिलकुल अज्ञानी हैं। अन्यजाति के लोग, जिन्होंने कभी सुसमाचार नहीं सुना, निश्चय ही पहले इसी वर्णन के अन्तर्गत आते हैं। परन्तु दुर्भाग्य से वे अकेले नहीं हैं। आज इंग्लैंड में हज़ारों लोग रहते हैं जिनके पास मसीह के विषय में अन्यजातियों से भी मुश्किल से अधिक स्पष्ट विचार हैं। उनसे पूछिए कि वे यीशु मसीह के विषय में क्या जानते हैं, और आप उस घने अन्धकार को देखकर दंग रह जाएँगे जो उनके मन पर छाया है। उनके मृत्यु-शय्या पर उनसे मिलिए, और आप पाएँगे कि वे आपको मसीह के विषय में उतना ही बता सकते हैं जितना मुहम्मद के विषय में। देहात की कलीसियाओं में हज़ारों इसी दशा में हैं, और नगरों में भी हज़ारों। और ऐसे सब लोगों के विषय में एक ही बात कही जा सकती है। वे "मसीह के बिना" हैं।

मैं जानता हूँ कि कुछ आधुनिक धर्मशास्त्री उस दृष्टिकोण को नहीं मानते जो मैंने अभी बताया है। वे हमसे कहते हैं कि सारी मानवजाति का मसीह में भाग और हिस्सा है, चाहे वे उसे जानते हों या न जानते हों। वे कहते हैं कि सब स्त्री-पुरुष, चाहे जीवन भर कितने ही अज्ञानी रहे हों, मरने पर मसीह की दया से स्वर्ग में ले लिए जाएँगे! मेरा दृढ़ विश्वास है कि ऐसे विचारों का परमेश्वर के वचन से कोई मेल नहीं बैठ सकता। लिखा है, "अनन्त जीवन यह है कि वे तुझ अद्वैत सच्चे परमेश्वर को और यीशु मसीह को, जिसे तू ने भेजा है, जानें।" (यूहन्ना 17:3।) दुष्टों के चिन्हों में से एक यह है कि जिनसे परमेश्वर अन्तिम दिन पलटा लेगा, वे "परमेश्वर को नहीं जानते।" (2 थिस्सलुनीकियों 1:8।) अनजाना मसीह उद्धारकर्ता नहीं है। मृत्यु के बाद अन्यजातियों की क्या दशा होगी?—जिस जंगली मनुष्य ने कभी सुसमाचार नहीं सुना, उसका न्याय कैसे होगा?—परमेश्वर असहाय अज्ञानियों और अशिक्षितों के साथ कैसा व्यवहार करेगा?—ये सब ऐसे प्रश्न हैं जिन्हें हम निश्चिन्त होकर छोड़ सकते हैं। हम इस बात पर भरोसा रख सकते हैं कि "सारी पृथ्वी का न्यायी न्याय ही करेगा।" (उत्पत्ति 18:25।) परन्तु हमें पवित्रशास्त्र का विरोध नहीं करना चाहिए। यदि बाइबल के शब्दों का कोई अर्थ है, तो मसीह से अनजान होना "मसीह से रहित" होना है।

(ब) परन्तु बात इतनी ही नहीं है। मनुष्य "मसीह से रहित" तब भी होता है जब उसे अपने उद्धारकर्ता के रूप में उस पर हृदय से विश्वास नहीं होता। मसीह के विषय में सब कुछ जान लेना और फिर भी उस पर भरोसा न रखना पूरी तरह सम्भव है। बहुत से लोग विश्वास-वचन का एक-एक अनुच्छेद जानते हैं, और धड़ल्ले से कह सकते हैं कि मसीह "कुँवारी मरियम से जन्मा, पुन्तियुस पीलातुस के समय में दुःख उठाया, क्रूस पर चढ़ाया गया, मरा और गाड़ा गया।" उन्होंने यह स्कूल में सीखा था। यह उनकी स्मृति में जमा हुआ है। परन्तु वे अपने ज्ञान का कोई व्यावहारिक उपयोग नहीं करते। वे किसी ऐसी वस्तु पर भरोसा रखते हैं जो "मसीह" नहीं है। वे स्वर्ग जाने की आशा इसलिए रखते हैं कि वे नैतिक और सदाचारी हैं,—इसलिए कि वे प्रार्थना करते हैं और कलीसिया जाते हैं,—इसलिए कि उनका बपतिस्मा हुआ है और वे प्रभु-भोज में सम्मिलित होते हैं। परन्तु मसीह के द्वारा परमेश्वर की दया पर जीवित विश्वास,—मसीह के लहू, उसकी धार्मिकता और उसकी मध्यस्थता की प्रार्थना पर सच्चे और समझदारी-भरे भरोसे,—के विषय में वे कुछ भी नहीं जानते। ऐसे सब लोगों के विषय में मुझे केवल एक ही सच्चा वर्णन दिखाई देता है। वे "मसीह से रहित" हैं।

मैं जानता हूँ कि बहुत से लोग मेरी इस बात की सच्चाई को स्वीकार नहीं करते। कुछ लोग हमसे कहते हैं कि सब बपतिस्मा पाए हुए लोग अपने बपतिस्मा के कारण मसीह के अंग हैं। कुछ और लोग कहते हैं कि जहाँ सिर का ज्ञान है, वहाँ किसी मनुष्य के मसीह में भाग पर प्रश्न उठाने का हमें कोई अधिकार नहीं। इन विचारों के लिए मेरे पास केवल एक सीधा उत्तर है। बाइबल हमें मना करती है कि हम किसी मनुष्य को तब तक मसीह से जुड़ा हुआ कहें जब तक वह विश्वास न करे। बपतिस्मा इस बात का प्रमाण नहीं कि हम मसीह से जुड़े हैं। शमौन जादूगर का बपतिस्मा हुआ था, फिर भी उससे स्पष्ट कहा गया कि "इस बात में तेरा न कोई भाग है और न अंश।" (प्रेरितों के काम 8:21।) सिर का ज्ञान भी इस बात का प्रमाण नहीं कि हम मसीह से जुड़े हैं। दुष्टात्माएँ मसीह को भली-भाँति जानती हैं, परन्तु उसमें उनका कोई भाग नहीं। इसमें सन्देह नहीं कि परमेश्वर अनादिकाल से जानता है कि कौन उसके हैं। परन्तु मनुष्य किसी के धर्मी ठहराए जाने के विषय में तब तक कुछ नहीं जानता जब तक वह विश्वास न करे। बड़ा प्रश्न यही है, "क्या हम विश्वास करते हैं?" लिखा है, "जो पुत्र पर विश्वास नहीं करता, वह जीवन को नहीं देखेगा, परन्तु परमेश्वर का क्रोध उस पर बना रहता है।" "जो विश्वास न करेगा वह दोषी ठहराया जाएगा।" (यूहन्ना 3:36; मरकुस 16:16।) यदि बाइबल के शब्दों का कोई अर्थ है, तो विश्वास से रहित होना "मसीह से रहित" होना है।

(स) परन्तु मुझे अभी एक बात और कहनी है। मनुष्य "मसीह से रहित" तब भी होता है जब उसके जीवन में पवित्र आत्मा का कार्य दिखाई नहीं देता। यदि कोई आँख खोलकर देखे तो कौन इस बात को देखे बिना रह सकता है कि मसीही कहलानेवाले असंख्य लोग हृदय के भीतरी परिवर्तन के विषय में कुछ नहीं जानते। वे तुमसे कहेंगे कि वे मसीही धर्म को मानते हैं; वे अपने आराधना-स्थलों में ठीक-ठाक नियमितता से जाते हैं; वे समझते हैं कि विवाह और अन्त्येष्टि कलीसिया की सब रीतियों के साथ होना उचित है; यदि उनके मसीही होने पर सन्देह किया जाए तो वे बहुत बुरा मानेंगे। परन्तु उनके जीवन में पवित्र आत्मा कहाँ दिखाई देता है? उनके हृदय और उनकी भावनाएँ किस पर लगी हैं? उनकी रुचियों, आदतों और चाल-चलन में किसका स्वरूप और किसकी छाप उभरकर दिखाई देती है? हाय, इसका उत्तर केवल एक ही हो सकता है! वे पवित्र आत्मा के नया बनानेवाले और पवित्र करनेवाले कार्य के विषय में अनुभव से कुछ नहीं जानते। वे अब तक परमेश्वर के लिए मरे हुए हैं। और ऐसे सब लोगों के विषय में केवल एक ही बात कही जा सकती है। वे "मसीह से रहित" हैं।

मैं फिर यह भी भली-भाँति जानता हूँ कि बहुत कम लोग इसे स्वीकार करेंगे। अधिकांश लोग तुमसे कहेंगे कि मसीहियों से इतना माँगना और हर एक पर मन-परिवर्तन का आग्रह करना अति है, उन्माद है और बढ़ा-चढ़ाकर कहना है। वे कहेंगे कि जिस ऊँचे आदर्श की चर्चा मैंने अभी की, उसे संसार से बाहर निकले बिना निभाना असम्भव है; और हम निश्चय ही इतने बड़े सन्त बने बिना भी स्वर्ग जा सकते हैं। इस सब के उत्तर में मैं केवल इतना ही कह सकता हूँ: पवित्रशास्त्र क्या कहता है? प्रभु क्या कहता है? लिखा है, "जब तक कोई नये सिरे से न जन्मे तब तक वह परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।"—"जब तक तुम न फिरो और बालकों के समान न बनो, तुम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने न पाओगे।"—"जो कोई कहता है कि मैं उसमें बना रहता हूँ, उसे चाहिए कि आप भी वैसे ही चले जैसा वह चलता था।"—"यदि किसी में मसीह का आत्मा नहीं तो वह उसका जन नहीं।" (यूहन्ना 3:3; मत्ती 18:3; 1 यूहन्ना 2:6; रोमियों 8:9।) पवित्रशास्त्र की बात टल नहीं सकती। यदि बाइबल के शब्दों का कोई अर्थ है, तो आत्मा से रहित होना "मसीह से रहित" होना है।

जो तीन बातें मैंने अभी रखी हैं, उन्हें मैं आपके गम्भीर और प्रार्थनापूर्ण विचार के लिए सौंपता हूँ। ध्यान दीजिए कि वे किस निष्कर्ष पर पहुँचती हैं। उन्हें हर ओर से ध्यानपूर्वक जाँचिए। मसीह में उद्धार देनेवाला भाग पाने के लिए ज्ञान, विश्वास और पवित्र आत्मा का अनुग्रह, ये तीनों नितान्त आवश्यक हैं। जो इनके बिना है, वह "मसीह से रहित" है।

कितने ही लोग कितने दुःखद रूप से अज्ञानी हैं! वे धर्म के विषय में सचमुच कुछ भी नहीं जानते। मसीह, पवित्र आत्मा, विश्वास, अनुग्रह, मन-परिवर्तन और पवित्रीकरण उनके लिए मात्र "शब्द और नाम" हैं। यदि उनके प्राण भी बचने होते, तो भी वे नहीं समझा सकते कि इनका क्या अर्थ है। और क्या ऐसी अज्ञानता किसी को स्वर्ग पहुँचा सकती है? असम्भव! ज्ञान के बिना, "मसीह से रहित!"

कितने ही लोग कितने दुःखद रूप से स्व-धर्मी हैं! वे सन्तोष के साथ बातें करते हैं कि उन्होंने "अपना कर्तव्य निभाया है," और "सब के साथ भलाई की है," और सदा "अपनी कलीसिया से जुड़े रहे हैं," और "कभी इतने बुरे नहीं रहे" जितने कुछ और लोग हैं;—और इसलिए वे समझते हैं कि उन्हें अवश्य स्वर्ग जाना ही है! और पाप की गहरी समझ और मसीह के लहू और बलिदान पर सीधे-सादे विश्वास का उनके धर्म में कोई स्थान ही नहीं दिखता। उनकी सारी बातें करने की हैं, विश्वास करने की कभी नहीं। और क्या ऐसी स्व-धार्मिकता किसी को स्वर्ग पहुँचा सकती है? कभी नहीं! विश्वास के बिना, "मसीह के बिना!"

कितने ही लोग कितने दुःखद रूप से अभक्त हैं! वे परमेश्वर के सब्त, परमेश्वर की बाइबल, परमेश्वर की विधियों और परमेश्वर के संस्कारों की आदतन उपेक्षा में जीवन बिताते हैं। जिन कामों को परमेश्वर ने साफ़ मना किया है, उन्हें करने में वे कुछ भी बुरा नहीं मानते। वे निरन्तर ऐसे मार्गों पर चलते हैं जो परमेश्वर की आज्ञाओं के सीधे विरुद्ध हैं। और क्या ऐसी अभक्ति का अन्त उद्धार में हो सकता है? असम्भव! पवित्र आत्मा के बिना, "मसीह के बिना!"

मैं भली-भाँति जानता हूँ कि पहली दृष्टि में ये बातें कठोर, तीखी, रूखी और कड़ी लगती हैं। परन्तु अन्ततः क्या ये परमेश्वर का वही सत्य नहीं जो पवित्रशास्त्र में हम पर प्रकट किया गया है? यदि ये सत्य हैं, तो क्या इन्हें बताया नहीं जाना चाहिए? यदि इनका जानना आवश्यक है, तो क्या इन्हें स्पष्ट रूप से नहीं कहा जाना चाहिए? यदि मैं अपने मन को कुछ भी जानता हूँ, तो मेरी सबसे बड़ी अभिलाषा यही है कि पापियों के प्रति परमेश्वर के प्रेम के धन की महिमा करूँ। मैं सारी मानवजाति को बताना चाहता हूँ कि जो कोई खोजे, उसके लिए परमेश्वर के हृदय में दया और करुणा का कितना भण्डार रखा है। परन्तु मुझे कहीं यह नहीं मिलता कि अज्ञानी, अविश्वासी और अपरिवर्तित लोगों का मसीह में कोई भाग है! यदि मैं भूल पर हूँ, तो जो कोई मुझे इससे उत्तम मार्ग दिखाए, मैं उसका धन्यवादी होऊँगा। परन्तु जब तक वह मुझे न दिखाया जाए, मुझे अपने कहे हुए पदों पर दृढ़ रहना ही होगा। मैं उन्हें छोड़ने का साहस नहीं करता, ऐसा न हो कि परमेश्वर के वचन को छल से बरतने का दोषी ठहरूँ। मैं उनके विषय में चुप रहने का साहस नहीं करता, ऐसा न हो कि आत्माओं के लहू का लेखा मुझसे माँगा जाए। जो मनुष्य ज्ञान के बिना, विश्वास के बिना और पवित्र आत्मा के बिना है, वह "मसीह के बिना" मनुष्य है!

II. अब मैं एक और बात की ओर मुड़ता हूँ जिस पर मैं विचार करना चाहता हूँ। "मसीह के बिना" मनुष्य की वास्तविक दशा क्या है?

यह हमारे वर्तमान विषय की ऐसी शाखा है जिस पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है। यदि मैं इसे इसके सच्चे रंगों में दिखा सकूँ तो मैं सचमुच धन्यवादी होऊँगा। मैं सहज ही कल्पना कर सकता हूँ कि कोई पाठक अपने मन में कहता होगा, "अच्छा, मान लो कि मैं मसीह के बिना हूँ, तो इसमें बड़ी हानि क्या है? मुझे आशा है कि परमेश्वर दयालु होगा। मैं बहुतों से अधिक बुरा नहीं हूँ। मुझे भरोसा है कि अन्त में सब ठीक हो जाएगा।" मेरी सुनो, और परमेश्वर की सहायता से मैं यह दिखाने का यत्न करूँगा कि तुम बहुत बड़े धोखे में हो। "मसीह के बिना" सब ठीक नहीं होगा, परन्तु सब कुछ भयंकर रूप से बिगड़ा हुआ है।

(क) पहली बात यह कि मसीह के बिना होना परमेश्वर के बिना होना है। प्रेरित पौलुस ने इफिसियों से स्पष्ट शब्दों में यही कहा। प्रसिद्ध वाक्य जो इन शब्दों से आरम्भ होता है,—"तुम मसीह से अलग थे," उसे वह इन शब्दों पर समाप्त करता है,—"और जगत में तुम्हारे लिए कोई आशा न थी, और तुम परमेश्वर से रहित थे।" और जो विचार करता है वह इस पर क्यों चकित हो? जिस मनुष्य को परमेश्वर के विषय में बहुत नीचे विचार हैं, वही उसे अत्यन्त शुद्ध, पवित्र, महिमामय और आत्मिक सत्ता नहीं मान सकता। वह मनुष्य अवश्य ही बहुत अन्धा है जो यह नहीं देखता कि मानव स्वभाव भ्रष्ट, पापी और अशुद्ध है। तो फिर मनुष्य जैसा कीड़ा परमेश्वर के निकट चैन से कैसे आ सकता है? वह भय के बिना उसकी ओर भरोसे से कैसे देख सकता है? वह बिना डर और घबराहट के उससे कैसे बोल सकता, उससे व्यवहार कर सकता, और उसके साथ रहने की आशा कर सकता है? परमेश्वर और मनुष्य के बीच एक मध्यस्थ अवश्य होना चाहिए, और इस पद को भरनेवाला केवल एक ही है। वह एक मसीह है।

तू कौन है जो मसीह से अलग और स्वतन्त्र रूप से परमेश्वर की दया और परमेश्वर के प्रेम की बातें करता है? पवित्रशास्त्र में ऐसा कोई प्रेम और ऐसी कोई दया नहीं लिखी है। आज यह जान ले कि मसीह से बाहर परमेश्वर "भस्म करनेवाली आग" है। (इब्रा. 12:29।) इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह दयालु है: दया में धनी, दया में भरपूर। परन्तु उसकी दया उसके प्रिय पुत्र यीशु मसीह की मध्यस्थता से अटूट रूप से जुड़ी है। उसे नियुक्त मार्ग के रूप में उसी से होकर बहना होगा, नहीं तो वह बह ही नहीं सकती। लिखा है, "जो पुत्र का आदर नहीं करता, वह पिता का, जिसने उसे भेजा है, आदर नहीं करता।"—"मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता।" (यूहन्ना 5:23; 14:6।) "मसीह के बिना" हम परमेश्वर के बिना हैं।

(ख) दूसरी बात यह कि मसीह के बिना होना शान्ति के बिना होना है। हर मनुष्य के भीतर एक विवेक है, जिसे सच्चे अर्थ में सुखी होने से पहले सन्तुष्ट होना आवश्यक है। जब तक यह विवेक सोया हुआ या अधमरा रहता है, तब तक निःसन्देह वह बहुत ठीक-ठाक चलता रहता है। परन्तु जैसे ही मनुष्य का विवेक जागता है, और वह बीते पापों, वर्तमान कमज़ोरियों और भविष्य के न्याय के विषय में सोचने लगता है, तुरन्त उसे पता चल जाता है कि उसे भीतरी विश्राम देनेवाली किसी वस्तु की आवश्यकता है। परन्तु वह कौन-सी वस्तु दे सकती है? पश्चाताप, प्रार्थना, बाइबल पढ़ना, कलीसिया जाना, संस्कार ग्रहण करना और आत्म-दमन आज़माए जा सकते हैं, और व्यर्थ आज़माए जाते हैं। इन्होंने आज तक किसी के विवेक का बोझ नहीं उतारा। फिर भी शान्ति तो मिलनी ही चाहिए!

केवल एक ही वस्तु विवेक को शान्ति दे सकती है, और वह है यीशु मसीह का लहू जो उस पर छिड़का जाता है। यह स्पष्ट समझ कि मसीह की मृत्यु परमेश्वर के प्रति हमारे ऋण का वास्तविक भुगतान थी, और उस मृत्यु का पुण्य मनुष्य को तब सौंपा जाता है जब वह विश्वास करता है, भीतरी शान्ति का महान भेद है। यह विवेक की हर लालसा को पूरा करता है। हर दोषारोपण का उत्तर देता है। हर भय को शान्त करता है। लिखा है, "मैंने ये बातें तुमसे इसलिए कही हैं कि तुम्हें मुझमें शान्ति मिले।" "वही हमारा मेल है।" "धर्मी ठहराए जाकर विश्वास से हम अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के साथ मेल रखें।" (यूहन्ना 16:33; इफि. 2:14; रोमि. 5:1।) हमें उसके क्रूस के लहू के द्वारा शान्ति मिलती है: गहरी खान जैसी शान्ति,—सदा बहनेवाली धारा जैसी शान्ति। परन्तु "मसीह के बिना" हम शान्ति के बिना हैं।

(ग) एक और बात यह है कि मसीह के बिना होना आशा के बिना होना है। किसी न किसी प्रकार की आशा तो लगभग हर कोई समझता है कि उसके पास है। ऐसा मनुष्य शायद ही मिले जो निडर होकर कहे कि उसे अपनी आत्मा के विषय में कोई आशा ही नहीं है। परन्तु ऐसे कितने कम हैं जो "उस आशा के विषय में जो उनमें है" "उत्तर" दे सकें! (1 पतरस 3:15।) कितने कम हैं जो उसे समझा सकें, उसका वर्णन कर सकें और उसकी नींव दिखा सकें! कितनी ही आशाएँ एक धुंधली और खोखली भावना से अधिक कुछ नहीं हैं, जिन्हें बीमारी का दिन और मृत्यु की घड़ी बिल्कुल व्यर्थ ठहराएगी,—जो न तो सांत्वना दे सकती हैं और न बचा सकती हैं।

केवल एक ही आशा है जिसकी जड़, जीवन, बल और दृढ़ता है, और वह वह आशा है जो मनुष्य के छुड़ानेवाले के रूप में मसीह के कार्य और पद की महान चट्टान पर बनी है। "उस नींव को छोड़ जो पड़ी है, और वह यीशु मसीह है, कोई दूसरी नींव नहीं डाल सकता।" (1 कुरिन्थियों 3:11।) जो इस कोने के पत्थर पर बनाता है वह "लज्जित नहीं होगा।" इस आशा में यथार्थता है। यह देखे और परखे जाने को सह सकती है। यह हर पूछताछ का सामना कर सकती है। इसे भीतर-बाहर खोज डालो, तो भी तुम्हें इसमें कोई दोष न मिलेगा। इसके सिवा अन्य सब आशाएँ व्यर्थ हैं। वे गर्मी में सूखे झरनों के समान हैं, जो मनुष्य को ठीक तब धोखा देते हैं जब उसकी आवश्यकता सबसे अधिक होती है। वे उन कमज़ोर जहाज़ों के समान हैं जो बन्दरगाह में शान्त पड़े रहने तक भले दिखते हैं, परन्तु जब समुद्र की आँधी और लहरें उन्हें परखने लगती हैं, तब उनकी सड़ी हुई दशा प्रकट हो जाती है और वे जल के नीचे डूब जाते हैं। मसीह के बिना कोई अच्छी आशा नहीं होती, और "मसीह के बिना" होना "आशाहीन" होना है। (इफिसियों 2:12।)

(घ) एक और बात यह है कि मसीह के बिना होना स्वर्ग के बिना होना है। यह कहने में मेरा अर्थ केवल इतना नहीं है कि स्वर्ग में प्रवेश नहीं मिलेगा, वरन् यह भी कि "मसीह के बिना" वहाँ होने में कोई सुख न होगा। जिस मनुष्य का कोई उद्धारकर्ता और छुड़ानेवाला नहीं, वह स्वर्ग में कभी अपनापन अनुभव नहीं कर सकता। उसे लगेगा कि वहाँ होने का उसे कोई वैध अधिकार या हक़ नहीं है: हियाव, भरोसा और मन की शान्ति असम्भव होगी। पवित्र और निर्मल स्वर्गदूतों के बीच, पवित्र और निर्मल परमेश्वर की दृष्टि के नीचे, वह सिर ऊँचा न कर सकेगा: वह घबराया हुआ और लज्जित होगा। स्वर्ग के सब सच्चे दर्शनों का मूल तत्त्व ही यह है कि मसीह वहाँ है।

तू कौन है जो ऐसे स्वर्ग का स्वप्न देखता है जिसमें मसीह का कोई स्थान नहीं? जाग, और अपनी मूर्खता को पहचान। जान ले कि बाइबल में स्वर्ग के जितने भी वर्णन हैं, उन सब में मसीह की उपस्थिति एक अनिवार्य विशेषता है। यूहन्ना कहता है, "सिंहासन के बीच एक मेम्ना खड़ा था, मानो उसका वध किया गया हो।" स्वर्ग के सिंहासन को ही "परमेश्वर और मेम्ने का सिंहासन" कहा गया है।—"मेम्ना ही स्वर्ग की ज्योति है, और वही उसका मन्दिर है।"—स्वर्ग में रहनेवाले पवित्र लोगों को "मेम्ना चरवाहा बनकर चराएगा" और "उन्हें जीवन रूपी जल के सोतों के पास ले जाएगा।" स्वर्ग में पवित्र लोगों की सभा को "मेम्ने के ब्याह का भोज" कहा गया है। (प्रकाशितवाक्य 5:6; 22:3; 21:22, 23; 7:17; 19:9।) मसीह के बिना स्वर्ग वह स्वर्ग नहीं होगा जो बाइबल में है। "मसीह के बिना" होना स्वर्ग के बिना होना है।

मैं इन बातों में सरलता से और जोड़ सकता हूँ। मैं तुम्हें बता सकता हूँ कि मसीह के बिना होना जीवन के बिना, बल के बिना, सुरक्षा के बिना, नींव के बिना, स्वर्ग में किसी मित्र के बिना, धार्मिकता के बिना होना है। जो मसीह के बिना हैं उनसे बुरी दशा में कोई नहीं!

जो नूह के लिए जहाज़ था, जो मिस्र में इस्राएल के लिए फसह का मेम्ना था, जो जंगल में गोत्रों के लिए मन्ना, चोट खाई हुई चट्टान, पीतल का साँप, बादल और आग का खम्भा और बलि का बकरा था, वह सब कुछ प्रभु यीशु मनुष्य की आत्मा के लिए होने को ठहराया गया है। जो मसीह के बिना हैं उनसे अधिक निर्धन कोई नहीं!

जो जड़ डालियों के लिए है, जो वायु हमारे फेफड़ों के लिए है, जो भोजन और जल हमारी देह के लिए है, जो सूर्य सृष्टि के लिए है, वह सब और उससे भी बहुत कुछ मसीह हमारे लिए होने को ठहराया गया है। जो मसीह के बिना हैं उनसे अधिक असहाय और दयनीय कोई नहीं!

मैं मानता हूँ कि यदि बीमारी और मृत्यु जैसी कोई वस्तु न होती,—यदि स्त्री-पुरुष कभी बूढ़े न होते और इस पृथ्वी पर सदा जीवित रहते,—तो इस लेख का विषय कुछ महत्त्व का न होता। परन्तु तुम जानते हो कि बीमारी, मृत्यु और कब्र दुःखद सच्चाइयाँ हैं।

यदि यही जीवन सब कुछ होता,—यदि कोई न्याय, कोई स्वर्ग, कोई नरक, कोई अनन्तता न होती,—तो इस पर्चे के सुझाए ऐसे प्रश्नों में अपने को उलझाना केवल समय की बर्बादी होती। परन्तु तुम्हारे पास विवेक है। तुम भली-भाँति जानते हो कि कब्र के उस पार लेखा देने का एक दिन है। एक न्याय अभी आनेवाला है।

निश्चय ही इस लेख का विषय कोई हल्की बात नहीं है। यह छोटी या महत्त्वहीन बात नहीं है। यह हर समझदार व्यक्ति का ध्यान माँगता है। यह उस सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न की जड़ में है, अर्थात् हमारी आत्माओं का उद्धार। "मसीह के बिना" होना अत्यन्त अभागा होना है।

(1) और अब मैं हर उस व्यक्ति से जिसने यह लेख पूरा पढ़ा है, कहता हूँ कि अपने आपको जाँचो और अपनी सही दशा का पता लगाओ। क्या तुम मसीह के बिना हो?

जीवन को बिना किसी गम्भीर विचार और आत्म-परीक्षा के बीत जाने न दो। तुम सदा वैसे ही नहीं चलते रह सकते जैसे अब चल रहे हो। एक दिन आएगा जब खाना, पीना, सोना, सजना-सँवरना, आनन्द मनाना और धन खर्च करना समाप्त हो जाएगा। एक दिन तुम्हारा स्थान खाली होगा, और लोग तुम्हारा उल्लेख केवल एक मरे हुए और चले गए व्यक्ति के रूप में करेंगे। और यदि तुम अपनी आत्मा के विषय में बिना सोचे, बिना परमेश्वर के और बिना मसीह के जिए और मरे, तो तब तुम कहाँ होगे? ओह, स्मरण रखो, धन, स्वास्थ्य, मित्रों, संगति और अच्छे खान-पान के बिना होना हज़ार गुना अच्छा है, इससे कि मसीह के बिना होना!

(2) यदि तुम अब तक मसीह के बिना जिए हो, तो मैं पूरे प्रेम से तुम्हें न्यौता देता हूँ कि बिना देर किए अपना मार्ग बदल दो। प्रभु यीशु को तब तक ढूँढ़ो जब तक वह मिल सकता है। जब तक वह निकट है उसे पुकारो। वह परमेश्वर के दाहिने हाथ बैठा है, और जो कोई उसके पास आता है, चाहे वह कितना ही पापी और लापरवाह रहा हो, उसे पूरा-पूरा उद्धार देने में समर्थ है। वह परमेश्वर के दाहिने हाथ बैठा है, और हर उस व्यक्ति की प्रार्थना सुनने को तैयार है जो अनुभव करता है कि उसका बीता जीवन सब गलत रहा है और जो सुधारा जाना चाहता है। मसीह को ढूँढ़ो, बिना देर किए मसीह को ढूँढ़ो। अपने आपको परिचित कराओ

उसके पास जाने में लज्जित न हो। इसी वर्ष मसीह के मित्रों में से एक बन जाओ, और तुम एक दिन कहोगे कि यह तुम्हारे जीवन का सबसे सुखी वर्ष था।

(3) यदि तुम पहले से ही मसीह के मित्रों में से एक बन चुके हो, तो मैं तुम्हें समझाता हूँ कि तुम कृतज्ञ मनुष्य बनो। इस अपार दया के विषय में गहराई से जागृत हो कि तुम्हारा एक सर्वशक्तिमान उद्धारकर्ता है, स्वर्ग पर तुम्हारा अधिकार है, एक अनन्त घर है, और एक ऐसा मित्र है जो कभी नहीं मरता! कुछ ही वर्ष और, और हमारे परिवार के सब मिलन समाप्त हो जाएँगे। यह सोचकर कितनी शान्ति मिलती है कि मसीह में हमारे पास ऐसा कुछ है जिसे हम कभी खो नहीं सकते!

उन लोगों की शोकपूर्ण दशा के विषय में और गहराई से जागृत हो जो "मसीह के बिना" हैं। हमें प्रायः उन बहुतों की सुधि दिलाई जाती है जिनके पास भोजन, वस्त्र, पाठशाला या कलीसिया नहीं है। आओ, हम उन पर तरस खाएँ और जहाँ तक हो सके उनकी सहायता करें। परन्तु हम यह कभी न भूलें कि कुछ लोगों की दशा इससे कहीं अधिक दयनीय है। वे कौन हैं? वे लोग जो "मसीह के बिना" हैं!

क्या हमारे कोई सम्बन्धी "मसीह के बिना" हैं? आओ, हम उनके लिए चिन्ता करें, उनके लिए प्रार्थना करें, राजा से उनके विषय में बातें करें, और सुसमाचार को उनके सामने रखने का यत्न करें। उन्हें मसीह के पास लाने के प्रयत्न में हम कोई कसर न छोड़ें।

क्या हमारे कोई पड़ोसी "मसीह के बिना" हैं? आओ, हम उनकी आत्मा के उद्धार के लिए हर प्रकार से परिश्रम करें। रात आनेवाली है जब कोई काम नहीं कर सकता। धन्य है वह जो इस अटल प्रतीति के साथ जीता है कि "मसीह में" होना शान्ति, सुरक्षा और सुख है, और "मसीह के बिना" होना विनाश के कगार पर होना है।

17. प्यास बुझाई गई*

"फिर पर्व के अन्तिम दिन, जो मुख्य दिन है, यीशु खड़ा हुआ और पुकारकर कहा, यदि कोई प्यासा हो तो मेरे पास आकर पीए। जो मुझ पर विश्वास करेगा, जैसा पवित्रशास्त्र में आया है, उसके हृदय में से जीवन के जल की नदियाँ बह निकलेंगी।"—यूहन्ना 7:37, 38

इस लेख के शीर्ष पर जो पद है उसमें मसीह के उन महान वचनों में से एक है जो सोने के अक्षरों में छापे जाने योग्य हैं। आकाश के सब तारे उजले और सुन्दर हैं; फिर भी एक बालक भी देख सकता है कि एक तारा महिमा में दूसरे से बढ़कर है। सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है; परन्तु वह हृदय सचमुच ठण्डा और मन्द होगा जो यह अनुभव न करे कि कुछ पद विशेष रूप से समृद्ध और परिपूर्ण हैं। ऐसे पदों में यह पद एक है।

इस पद की पूरी सामर्थ्य और सुन्दरता देखने के लिए हमें वह स्थान, वह समय और वह अवसर स्मरण करना चाहिए जब यह वचन कहा गया।

तो वह स्थान यरूशलेम था, जो यहूदी धर्म की राजधानी और याजकों और शास्त्रियों, फरीसियों और सदूकियों का गढ़ था।—अवसर झोपड़ियों का पर्व था, जो उन बड़े वार्षिक पर्वों में से एक था जब हर यहूदी, यदि हो सके तो, व्यवस्था के अनुसार मन्दिर को जाता था।—समय "पर्व का अन्तिम दिन" था, जब सब रीतियाँ समाप्ति पर आ रही थीं, जब परम्परागत रीति के अनुसार शीलोह के सोते से लाया गया जल गम्भीरता के साथ वेदी पर उँडेला जा चुका था, और आराधकों के लिए घर लौटने के सिवा कुछ शेष न था।

इसी निर्णायक क्षण में हमारे प्रभु यीशु मसीह एक ऊँचे स्थान पर "खड़े" हुए और इकट्ठी भीड़ से बोले। मुझे सन्देह नहीं कि उन्होंने उनके हृदय पढ़ लिए। उन्होंने उन्हें पीड़ित विवेक और असन्तुष्ट मन लिए लौटते देखा, क्योंकि अपने अन्धे शिक्षकों, फरीसियों और सदूकियों से उन्हें कुछ नहीं मिला था, और वे दिखावटी रीतियों की निष्फल स्मृति के सिवा कुछ साथ नहीं ले जा रहे थे। उन्होंने उन्हें देखा और उन पर तरस खाया, और एक दूत के समान ऊँचे स्वर से पुकारा, "यदि कोई प्यासा हो तो मेरे पास आकर पीए।"—कि इस स्मरणीय अवसर पर हमारे प्रभु ने बस इतना ही कहा, इसमें मुझे सन्देह है। मेरा अनुमान है कि यह उनके सम्बोधन का केवल मुख्य स्वर है। परन्तु मेरी समझ में उनके होठों से निकला पहला वाक्य यही था: "यदि कोई प्यासा हो तो मेरे पास आए।" यदि किसी को जीवित, तृप्त करनेवाला जल चाहिए, तो वह मेरे पास आए।

चलते-चलते मैं अपने पाठकों को स्मरण दिला दूँ कि किसी भविष्यद्वक्ता या प्रेरित ने कभी ऐसी भाषा बोलने का साहस नहीं किया। मूसा ने होबाब से कहा, "हमारे संग चल" (गिनती 10:29); यशायाह कहता है, "आओ, जल के पास आओ" (यशायाह 55:1); यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला कहता है, "देखो, परमेश्वर का मेम्ना" (यूहन्ना 1:29); पौलुस कहता है, "प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर" (प्रेरितों के काम 16:31)। परन्तु नासरत के यीशु को छोड़ किसी ने कभी नहीं कहा, "मेरे पास आओ।" यह तथ्य बहुत अर्थपूर्ण है। जिसने कहा, "मेरे पास आओ," वह यह कहते समय जानता और अनुभव करता था कि वह परमेश्वर का अनन्त पुत्र, प्रतिज्ञा किया हुआ मसीहा और जगत का उद्धारकर्ता है।

हमारे प्रभु के इस महान वचन में तीन बातें हैं जिन पर मैं अब ध्यान दिलाना चाहता हूँ।

I. यहाँ एक स्थिति मानी गई है: "यदि कोई प्यासा हो।"

II. यहाँ एक उपाय सुझाया गया है: "वह मेरे पास आकर पीए।"

III. यहाँ एक प्रतिज्ञा दी गई है: "जो मुझ पर विश्वास करेगा, जैसा पवित्रशास्त्र में आया है, उसके हृदय में से जीवन के जल की नदियाँ बह निकलेंगी।"

इनमें से प्रत्येक बात उन सब से सम्बन्ध रखती है जिनके हाथों में यह लेख पहुँचे। प्रत्येक के विषय में मुझे कुछ कहना है।

I. तो पहले, यहाँ एक स्थिति मानी गई है। हमारे प्रभु कहते हैं, "यदि कोई प्यासा हो"

शारीरिक प्यास निश्चय ही वह सबसे पीड़ादायक अनुभूति है जो नश्वर मनुष्य की देह को सहनी पड़ती है। कलकत्ता की काल-कोठरी के अभागे पीड़ितों की कथा पढ़ो।—उससे पूछो जिसने तपते उष्णकटिबन्धीय सूर्य के नीचे मरुस्थल के मैदान पार किए हों।—कोई भी बूढ़ा सैनिक तुम्हें बताएगा कि रणभूमि में घायलों की सबसे बड़ी आवश्यकता क्या होती है।—स्मरण करो कि मध्य-सागर में खो गए जहाजों के नाविकों को, जो बिना जल के नावों में कई दिन भटकते रहे, क्या-क्या सहना पड़ता है।—दृष्टान्त के धनी मनुष्य के भयानक शब्दों पर ध्यान दो: "लाजर को भेज ताकि वह अपनी उँगली का सिरा पानी में भिगोकर मेरी जीभ ठण्डी करे, क्योंकि मैं इस ज्वाला में तड़प रहा हूँ।" (लूका 16:24) गवाही सदा एक-सी है। प्यास से अधिक भयंकर और असह्य कुछ नहीं।

परन्तु यदि शारीरिक प्यास इतनी पीड़ादायक है, तो आत्मा की प्यास कितनी अधिक पीड़ादायक होगी? अनन्त दण्ड का सबसे बुरा भाग शारीरिक दुःख नहीं है। इस संसार में भी वह मन और भीतरी मनुष्य के दुःख की तुलना में हल्की बात है। अपनी आत्माओं का मूल्य देखना और यह जान लेना कि वे अनन्त विनाश के खतरे में हैं,—क्षमा न पाए हुए पाप का बोझ अनुभव करना और यह न जानना कि राहत के लिए किधर मुड़ें,—विवेक का रोगी और बेचैन होना और उपचार से अनजान रहना,—यह जान लेना कि हम मर रहे हैं, प्रतिदिन मर रहे हैं, फिर भी परमेश्वर से भेंट करने के लिए तैयार नहीं हैं,—अपने ही दोष और दुष्टता का कुछ स्पष्ट दर्शन पाना, फिर भी क्षमा के विषय में पूरे अन्धकार में रहना,—यही पीड़ा की चरम सीमा है,—वह पीड़ा जो आत्मा और प्राण को सोख लेती है, और जोड़ों और गूदे को बेधती है! और निःसन्देह यही वह प्यास है जिसकी चर्चा हमारे प्रभु कर रहे हैं। यह क्षमा, पापमोचन और परमेश्वर के साथ मेल की प्यास है। यह वास्तव में जाग उठे विवेक की लालसा है, जो तृप्ति चाहता है पर यह नहीं जानता कि वह कहाँ मिलेगी, जो सूखे स्थानों में भटकता है और विश्राम नहीं पा सकता।

यही वह प्यास है जो यहूदियों ने अनुभव की, जब पिन्तेकुस्त के दिन पतरस ने उन्हें प्रचार सुनाया। लिखा है कि उनके "हृदय छिद गए, और वे कहने लगे, हे भाइयो, हम क्या करें?" (प्रेरितों के काम 2:37)।

यही वह प्यास है जो फिलिप्पी के दारोगा ने अनुभव की, जब वह अपने आत्मिक संकट के प्रति जाग उठा और भूकम्प से बन्दीगृह को अपने पैरों तले डोलते हुए अनुभव किया। लिखा है कि वह "काँपता हुआ पौलुस और सीलास के आगे गिर पड़ा, और उन्हें बाहर लाकर कहा, हे साहिबो, उद्धार पाने के लिये मैं क्या करूँ?" (प्रेरितों के काम 16:30)।

यही वह प्यास है जो परमेश्वर के अनेक महान सेवकों ने अनुभव की प्रतीत होती है, जब पहली बार उनके मनों में ज्योति फूटी। मानी-मत के झूठे शिक्षकों के बीच विश्राम ढूँढ़ते और उसे न पाते हुए अगस्तीन,—एरफ़ुर्ट के मठ में भिक्षुओं के बीच सत्य को टटोलते हुए लूथर,—अपनी एल्स्टो की कुटिया में सन्देहों और संघर्षों के बीच तड़पते हुए जॉन बनियन,—ऑक्सफ़ोर्ड के विद्यार्थी के रूप में स्पष्ट शिक्षा के अभाव में अपने ऊपर थोपी हुई कठोर तपस्याओं के नीचे कराहते हुए जॉर्ज व्हाइटफ़ील्ड,—सभी ने अपने अनुभव को लेखबद्ध छोड़ा है। मेरा विश्वास है कि जब हमारे प्रभु ने "प्यास" की बात कही तो वे सब जानते थे कि उसका अर्थ क्या है।

और निश्चय ही यह कहना अधिक न होगा कि हम सबको इस प्यास के विषय में कुछ न कुछ जानना चाहिए, भले ही उतना नहीं जितना अगस्तीन, लूथर, बनियन या व्हाइटफ़ील्ड ने जाना। हम एक मरते हुए संसार में जीते हैं,—यदि हम स्वीकार करें तो हमें जानना ही होगा कि कब्र के पार एक संसार है और मृत्यु के बाद न्याय आता है,—अपने श्रेष्ठ क्षणों में हमें अनुभव करना ही होगा कि हम सब कितने दीन, निर्बल, अस्थिर और अधूरे प्राणी हैं, और परमेश्वर से भेंट करने के लिए कितने अयोग्य हैं,—और अपने हृदय की गहराई में हमें इसका बोध होना ही चाहिए कि समय के हमारे उपयोग पर ही अनन्तकाल में हमारा स्थान निर्भर है,—इसलिए हमें जीवते परमेश्वर के साथ मेल के बोध के लिए "प्यास" जैसा कुछ अनुभव करना और समझना चाहिए। परन्तु हाय, मनुष्य के पतित स्वभाव का इससे अधिक निश्चित प्रमाण कुछ नहीं कि आत्मिक भूख का सामान्य अभाव है! धन के लिए, सत्ता के लिए, सुख के लिए, पद के लिए, मान के लिए, प्रतिष्ठा के लिए,—इन सबके लिए अब विशाल बहुमत तीव्र प्यास से भरा है। निराशाजनक आक्रमणों का नेतृत्व करने, सोना खोदने, दीवार की दरार पर धावा बोलने, उत्तरी ध्रुव तक मोटी जमी बर्फ़ को काटकर मार्ग बनाने का प्रयत्न करने के लिए साहसी और स्वयंसेवकों की कोई कमी नहीं। इन नाशमान मुकुटों के लिए होड़ उग्र और अनवरत है! परन्तु अनन्त जीवन के प्यासे तुलना में बहुत थोड़े हैं। आश्चर्य नहीं कि पवित्रशास्त्र में स्वाभाविक मनुष्य को "मरा हुआ", "सोया हुआ", अन्धा और बहरा कहा गया है। आश्चर्य नहीं कि कहा गया है कि उसे दूसरे जन्म और नई सृष्टि की आवश्यकता है। देह में सड़न का इससे निश्चित कोई लक्षण नहीं कि सारी संवेदना जाती रहे। आत्मा की रोगी दशा का इससे अधिक पीड़ादायक कोई चिह्न नहीं कि आत्मिक प्यास का सर्वथा अभाव हो। हाय उस मनुष्य पर जिसके विषय में उद्धारकर्ता कह सके, "तू नहीं जानता कि तू अभागा और तुच्छ और दरिद्र और अन्धा और नंगा है।" (प्रकाशित वाक्य 3:17)।

परन्तु इस लेख के पाठकों में ऐसा कौन है जो पाप का बोझ अनुभव करता है और परमेश्वर के साथ मेल की लालसा रखता है? कौन है जो हमारी प्रार्थना-पुस्तक के पापस्वीकार के इन शब्दों को सचमुच अनुभव करता है,—"मैं खोई हुई भेड़ के समान भटक गया हूँ,—मुझ में कोई स्वास्थ्य नहीं,—मैं एक अभागा अपराधी हूँ"? कौन है जो हमारी सहभागिता-सेवा की पूर्णता में प्रवेश करता है और सच्चाई से कह सकता है, "मेरे पापों का स्मरण दुःखदायी है, और उनका बोझ असह्य है"? तुम वही मनुष्य हो जिसे परमेश्वर का धन्यवाद करना चाहिए। पाप का बोध, दोष का बोध और आत्मा की दरिद्रता का बोध वह पहला पत्थर है जिसे पवित्र आत्मा तब रखता है जब वह आत्मिक मन्दिर बनाता है। वह पाप के विषय में कायल करता है। भौतिक सृष्टि में जो सबसे पहले अस्तित्व में बुलाई गई वह ज्योति थी। (उत्पत्ति 1:3)। हमारी अपनी दशा के विषय में ज्योति नई सृष्टि का पहला कार्य है। प्यासी आत्मा, मैं फिर कहता हूँ, तुम वही व्यक्ति हो जिसे परमेश्वर का धन्यवाद करना चाहिए। परमेश्वर का राज्य तुम्हारे निकट है। स्वर्ग की ओर पहला कदम तब नहीं उठता जब हम अपने को भला अनुभव करने लगते हैं, परन्तु तब जब हम अपने को बुरा अनुभव करते हैं। किसने तुझे सिखाया कि तू नंगा है? यह भीतरी ज्योति कहाँ से आई? किसने तेरी आँखें खोलीं और तुझे देखने और अनुभव करने योग्य बनाया? आज जान ले कि मांस और लहू ने नहीं, परन्तु हमारे स्वर्गीय पिता ने ये बातें तुझ पर प्रकट की हैं। विश्वविद्यालय उपाधियाँ दे सकते हैं, और पाठशालाएँ सब भेदों का ज्ञान दे सकती हैं, परन्तु वे मनुष्यों को पाप का बोध नहीं करा सकतीं। अपनी आत्मिक आवश्यकता को समझना और सच्ची आत्मिक प्यास अनुभव करना उद्धार देनेवाले मसीही जीवन का ककहरा है।

अय्यूब की पुस्तक में एलीहू का यह एक महान कथन है,—"परमेश्वर मनुष्यों पर दृष्टि करता है, और यदि कोई कहे, मैंने पाप किया, और जो सच था उसको उलटा किया, और उससे मुझे कुछ लाभ न हुआ; तो वह उसके प्राण को कब्र में पड़ने से बचाएगा, और उसका जीवन ज्योति को देखेगा।" (अय्यूब 33:27, 28)। जो आत्मिक "प्यास" के विषय में कुछ भी जानता है वह लज्जित न हो। बल्कि वह अपना सिर उठाए और आशा करने लगे। वह प्रार्थना करे कि परमेश्वर ने जो कार्य आरम्भ किया है उसे आगे बढ़ाए और उसे और अधिक अनुभव कराए।

II. अब मैं मानी हुई दशा से प्रस्तावित उपचार की ओर आता हूँ। हमारे धन्य प्रभु यीशु मसीह कहते हैं, "यदि कोई प्यासा हो तो मेरे पास आकर पीए"

इस छोटे से वाक्य में एक महान सरलता है जिसकी जितनी सराहना की जाए कम है। इसमें एक भी शब्द ऐसा नहीं जिसका शाब्दिक अर्थ किसी बच्चे को स्पष्ट न हो। फिर भी, जितना सरल यह दिखाई देता है, उतना ही आत्मिक अर्थ से भरपूर है। कोहिनूर हीरे के समान, जिसे आप अँगूठे और उँगली के बीच थाम सकते हैं, यह अनमोल है। यह उस महान समस्या को सुलझाता है जिसे यूनान और रोम के सारे दार्शनिक कभी न सुलझा सके, "मनुष्य परमेश्वर के साथ शान्ति कैसे पा सकता है?" इसे अपनी स्मृति में अपने प्रभु के छः अन्य स्वर्णिम वचनों के साथ रखिए। "जीवन की रोटी मैं हूँ: जो मेरे पास आएगा वह कभी भूखा न होगा, और जो मुझ पर विश्वास करेगा वह कभी प्यासा न होगा।"—"जगत की ज्योति मैं हूँ: जो मेरे पीछे हो लेगा वह अन्धकार में न चलेगा, परन्तु जीवन की ज्योति पाएगा।"—"द्वार मैं हूँ: यदि कोई मेरे द्वारा भीतर प्रवेश करे तो उद्धार पाएगा।"—"मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ: बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता।"—"हे सब परिश्रम करनेवालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।"—"जो मेरे पास आएगा उसे मैं कभी न निकालूँगा।"—इन छः वचनों में आज का यह वचन भी जोड़ लीजिए। सातों को कण्ठस्थ कर लीजिए। इन्हें अपने मन में दृढ़ता से जमा लीजिए और कभी जाने न दीजिए। जब बीमारी की शय्या पर और मृत्यु की घड़ी में आपके पाँव उस ठंडी नदी को छुएँगे, तब आप इन सातों वचनों को हर मोल से बढ़कर पाएँगे। (यूहन्ना 6:35; 8:12; 10:9; 14:6; मत्ती 11:28; यूहन्ना 6:37।)

क्योंकि इन सरल शब्दों का सार और तत्त्व क्या है? यह यह है। मसीह वह जीवन के जल का सोता है जिसे परमेश्वर ने प्यासी आत्माओं के लिए अनुग्रहपूर्वक ठहराया है। उसी से, मूसा द्वारा मारी गई चट्टान के समान, उन सब के लिए जल की प्रचुर धारा बहती है जो इस संसार के जंगल में यात्रा करते हैं। उसमें, जो हमारा छुड़ानेवाला और प्रतिनिधि है, जो हमारे पापों के लिए क्रूस पर चढ़ाया गया और हमें धर्मी ठहराने के लिए जिलाया गया, उन सब वस्तुओं की अनन्त आपूर्ति है जिनकी मनुष्यों को आवश्यकता हो सकती है,—क्षमा, पापमोचन, दया, अनुग्रह, शान्ति, विश्राम, राहत, सान्त्वना और आशा।

यह समृद्ध प्रबन्ध मसीह ने अपने ही बहुमूल्य लहू का दाम देकर हमारे लिए मोल लिया है। इस अद्भुत सोते को खोलने के लिए उसने पाप के लिए दुःख उठाया, अर्थात् धर्मी ने अधर्मियों के लिए, और हमारे पापों को अपनी देह पर लिए हुए क्रूस पर चढ़ गया। जो पाप से अज्ञात था, उसे उसने हमारे लिए पाप ठहराया, ताकि हम उसमें होकर परमेश्वर की धार्मिकता बन जाएँ। (1 पतरस 2:24; 3:18; 2 कुरिन्थियों 5:21।) और अब वह उन सब का, जो परिश्रम करते और बोझ से दबे हैं, राहत देनेवाला, और उन सब का, जो प्यासे हैं, जीवन का जल देनेवाला होने के लिए मुहरबन्द और नियुक्त किया गया है। पापियों को ग्रहण करना उसका कार्य है। उन्हें क्षमा, जीवन और शान्ति देना उसका आनन्द है। और इस वचन के शब्द एक घोषणा हैं जो वह सारी मानवजाति के लिए करता है,—"यदि कोई प्यासा हो तो मेरे पास आकर पिए।"

किसी औषधि की प्रभावशीलता बहुत कुछ इस पर निर्भर करती है कि उसका उपयोग किस प्रकार किया जाता है। सर्वश्रेष्ठ चिकित्सक का सर्वोत्तम नुस्ख़ा भी व्यर्थ है यदि हम उसके साथ दिए गए निर्देशों का पालन करने से इनकार करें। जीवन के जल के उस सोते के विषय में जब मैं कुछ सावधानी और सलाह देता हूँ, तो इस उपदेश के वचन को धैर्य से सुनिए।

(क) जो प्यासा है और राहत चाहता है, उसे स्वयं मसीह के पास आना चाहिए। उसे केवल मसीह की कलीसिया और उसकी विधियों के पास, या प्रार्थना और स्तुति के लिए उसके लोगों की सभाओं में आकर ही सन्तुष्ट नहीं हो जाना चाहिए। उसे उसकी पवित्र मेज़ पर ही रुक नहीं जाना चाहिए, और न ही उसके नियुक्त सेवकों के सामने अपना हृदय खोल देने भर से सन्तुष्ट हो जाना चाहिए। अरे नहीं! जो केवल इन जलों को पीकर सन्तुष्ट है, वह "फिर प्यासा होगा।" (यूहन्ना 4:13।) उसे इससे ऊँचे, इससे आगे, बहुत आगे जाना होगा। उसे स्वयं मसीह से व्यक्तिगत व्यवहार करना होगा: उसके बिना धर्म की और सब बातें व्यर्थ हैं। राजा का महल, सेवा में उपस्थित दास, सजा-सजाया भोज-भवन, यहाँ तक कि स्वयं भोज भी,—यदि हम राजा से बात न करें तो सब कुछ नगण्य है। केवल उसी का हाथ हमारी पीठ से बोझ उतारकर हमें स्वतंत्र अनुभव करा सकता है। मनुष्य का हाथ कब्र से पत्थर हटाकर मृतक को दिखा सकता है; परन्तु यीशु के अतिरिक्त कोई मृतक से यह नहीं कह सकता, "निकल आ और जी उठ।" (यूहन्ना 11:41–43।) हमें सीधे मसीह से व्यवहार करना चाहिए।

(ख) फिर: जो प्यासा है और मसीह से राहत चाहता है, उसे सचमुच उसके पास आना चाहिए। केवल इच्छा करना, बातें करना, मंशा रखना, इरादा करना, संकल्प करना और आशा रखना पर्याप्त नहीं है। नरक, वह भयानक वास्तविकता, सच ही कहा जाता है कि अच्छे इरादों से पटा पड़ा है। हज़ारों लोग प्रतिवर्ष इसी प्रकार खो जाते हैं, और बन्दरगाह के ठीक बाहर दुर्दशा में नाश हो जाते हैं। मंशा और इरादा रखते हुए वे जीते हैं; मंशा और इरादा रखते हुए वे मरते हैं। अरे नहीं! हमें "उठकर आना" चाहिए! यदि उड़ाऊ पुत्र केवल यह कहकर सन्तुष्ट हो जाता कि, "मेरे पिता के कितने ही मज़दूरों को भोजन से अधिक रोटी मिलती है, और मैं यहाँ भूखा मर रहा हूँ! मैं आशा करता हूँ कि किसी दिन घर लौटूँगा," तो वह सदा सूअरों के बीच ही रह जाता। जब वह

उठकर अपने पिता के पास आया, तभी उसके पिता ने दौड़कर उसे गले लगाया और कहा, "अच्छे से अच्छा वस्त्र निकालकर उसे पहनाओ।—आओ, हम खाएँ और आनन्द करें।" (लूका 15:20–23।) उसी के समान, हमें भी न केवल "अपने आपे में आना" और विचार करना है, परन्तु सचमुच महायाजक के पास, मसीह के पास, आना है। हमें चिकित्सक के पास आना है।

(ग) एक बार और: जो प्यासा है और मसीह के पास आना चाहता है, उसे स्मरण रखना चाहिए कि केवल एक ही बात आवश्यक है, अर्थात् सरल विश्वास। वह अवश्य पश्चाताप करनेवाले, टूटे हुए और खेदित मन से आए; परन्तु वह इस सपने में न रहे कि स्वीकार किए जाने के लिए इसी पर भरोसा किया जा सकता है। विश्वास ही वह एकमात्र हाथ है जो जीवन का जल हमारे होंठों तक पहुँचा सकता है। हमारे धर्मी ठहराए जाने के विषय में सब कुछ विश्वास की धुरी पर ही घूमता है। बार-बार लिखा है कि "जो कोई विश्वास करे वह नाश न होगा, परन्तु अनन्त जीवन पाएगा।" (यूहन्ना 3:15, 16।) "जो काम नहीं करता, परन्तु भक्तिहीन के धर्मी ठहरानेवाले पर विश्वास करता है, उसका विश्वास उसके लिए धार्मिकता गिना जाता है।" (रोमियों 4:5।) धन्य है वह जो उस अनुपम भजन में निर्धारित सिद्धान्त को थाम सकता है,—

जैसा हूँ वैसा ही! बिना किसी दलील के,

सिवाय इसके कि तेरा लहू मेरे लिए बहाया गया,

और तू मुझे अपने पास आने को बुलाता है,—

हे परमेश्वर के मेमने, मैं आता हूँ!

प्यास बुझाने का यह उपाय कितना सरल दिखाई देता है! परन्तु हाय, कुछ लोगों को इसे ग्रहण करने के लिए मनाना कितना कठिन है! उनसे कहो कि कोई बड़ा कार्य करें, अपनी देह को ताड़ना दें, तीर्थयात्रा पर जाएँ, अपनी सारी सम्पत्ति कंगालों को खिलाने में लगा दें, और इस प्रकार उद्धार का पुण्य कमाएँ, तो वे जैसा कहा जाए वैसा करने का यत्न करेंगे। परन्तु उनसे कहो कि पुण्य, कर्म या कुछ करने का सारा विचार त्याग दें और रिक्त हाथों से खाली पापियों के रूप में मसीह के पास आएँ, तो वे नामान को तरह तिरस्कार से मुँह फेरने को तैयार हो जाते हैं। (2 राजाओं 5:12।) मानव स्वभाव हर युग में एक-सा ही रहता है। अब भी कुछ लोग यहूदियों जैसे हैं और कुछ यूनानियों जैसे। यहूदियों के लिए क्रूस पर चढ़ाया गया मसीह अब भी ठोकर का कारण है और यूनानियों के लिए मूर्खता। उनकी परम्परा तो कभी समाप्त ही नहीं हुई! हमारे प्रभु ने घमण्डी शास्त्रियों से महासभा में जो बात कही थी, उससे अधिक सच्चा वचन उसने कभी नहीं कहा— "तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना ही नहीं चाहते।" (यूहन्ना 5:40।)

परन्तु प्यास बुझाने का यह उपाय चाहे जितना सरल दिखाई दे, मनुष्य के आत्मिक रोग की यही एकमात्र औषधि है, और पृथ्वी से स्वर्ग तक पहुँचने का यही एकमात्र पुल है। राजा और उनकी प्रजा, प्रचारक और श्रोता, स्वामी और सेवक, ऊँचे और नीचे, धनी और निर्धन, पढ़े-लिखे और अनपढ़, सभी को इस जीवन-जल में से पीना होगा, और उसी रीति से पीना होगा। अठारह शताब्दियों से मनुष्य थके हुए विवेक के लिए कोई और औषधि खोजने का परिश्रम करते आए हैं; परन्तु उनका परिश्रम व्यर्थ रहा। "फूटे हौद, जो जल नहीं रख सकते" (यिर्मयाह 2:13) खोदते-खोदते हज़ारों लोगों के हाथों में छाले पड़ गए और उनके बाल पक गए, और अन्त में उन्हें उसी पुराने सोते के पास लौटना पड़ा, और अपनी अन्तिम घड़ियों में उन्होंने मान लिया कि सच्ची शान्ति यहीं, केवल मसीह में है।

और प्यास बुझाने का यह पुराना उपाय चाहे जितना सरल दिखाई दे, यही सब युगों में परमेश्वर के सबसे महान दासों के भीतरी जीवन की जड़ है। कलीसिया के इतिहास के हर युग में सन्त और शहीद क्या रहे हैं, सिवाय उन मनुष्यों के जो प्रतिदिन विश्वास के द्वारा मसीह के पास आए और जिन्होंने "उसके मांस को सचमुच खाने की वस्तु और उसके लहू को सचमुच पीने की वस्तु" पाया? (यूहन्ना 6:55।) वे सब क्या रहे हैं, सिवाय उन मनुष्यों के जिन्होंने परमेश्वर के पुत्र पर विश्वास का जीवन जिया और उसमें जो परिपूर्णता है उसमें से प्रतिदिन पिया? (गलातियों 2:20।) कम से कम इस बात में, जिन सच्चे और उत्तम मसीहियों ने संसार पर अपनी छाप छोड़ी है, वे सब एकमत रहे हैं। पवित्र प्राचीन पिता और धर्म-सुधारक, पवित्र अंग्रेज़ी कलीसिया के धर्मशास्त्री और प्यूरिटन, पवित्र एपिस्कोपल और नॉनकन्फ़ॉर्मिस्ट, सबने अपनी सर्वोत्तम घड़ियों में जीवन के उस सोते के मूल्य की एक-सी गवाही दी है। अपने जीवन में वे कभी-कभी चाहे कितने ही अलग और विवादी रहे हों, पर अपनी मृत्यु में वे बँटे हुए नहीं रहे। भयानक मृत्यु-राजा के साथ अपने अन्तिम संघर्ष में उन्होंने केवल मसीह के क्रूस को थामे रखा, और "बहुमूल्य लहू" तथा सब पाप और अशुद्धता के लिए खुले हुए सोते को छोड़ किसी और बात पर घमण्ड नहीं किया।

हमें कितना धन्यवादी होना चाहिए कि हम ऐसे देश में रहते हैं जहाँ आत्मिक प्यास का यह महान उपाय जाना जाता है— ऐसे देश में जहाँ खुली बाइबल है, सुसमाचार का प्रचार होता है और अनुग्रह के साधन बहुतायत से हैं— ऐसे देश में जहाँ हर रविवार को 20,000 मंचों से मसीह के बलिदान की प्रभावशीलता कम या अधिक पूर्णता के साथ अब भी घोषित की जाती है! हम अपने विशेषाधिकारों का मूल्य नहीं समझते। मन्ना की परिचितता ही हमें उसे तुच्छ समझने पर विवश करती है, ठीक वैसे ही जैसे इस्राएल ने जंगल में "उस निकम्मी रोटी" से घृणा की थी। (गिनती 21:5।) परन्तु अनुपम प्लेटो जैसे किसी अन्यजाति दार्शनिक के पृष्ठ पलटो, और देखो कि वह आँखों पर पट्टी बाँधे हुए मनुष्य की तरह प्रकाश को टटोलता रहा और द्वार खोजते-खोजते थक गया। हमारी सुन्दर प्रभु-भोज की विधि के उन चार "सान्त्वना के वचनों" को, जो प्रार्थना-पुस्तक में हैं, पकड़ लेनेवाला अत्यन्त दीन किसान भी परमेश्वर के साथ मेल की राह के विषय में उस एथेंसवासी ज्ञानी से अधिक जानता है।— उन विश्वासयोग्य यात्रियों और मिशनरियों के वृत्तान्तों की ओर मुड़ो जो उन अन्यजातियों की दशा का वर्णन करते हैं जिन्होंने कभी सुसमाचार नहीं सुना। अफ़्रीका के नरबलि और हिन्दुस्तान के भक्तों की अपने ऊपर लाई हुई भयानक यातनाओं के विषय में पढ़ो, और स्मरण रखो कि वे सब एक अबुझ "प्यास" और परमेश्वर के निकट पहुँचने की एक अन्धी और अतृप्त इच्छा का परिणाम हैं। और फिर यह जानकर धन्यवादी होना सीखो कि तुम्हारा भाग तुम्हारे ही जैसे देश में पड़ा है। हाय, मुझे भय है कि हमारी कृतघ्नता के कारण परमेश्वर का हमारे साथ विवाद है! वह हृदय सचमुच ठण्डा और मरा हुआ होगा जो अफ़्रीका, चीन और हिन्दुस्तान की दशा का अध्ययन करके भी इस बात के लिए परमेश्वर का धन्यवाद न करे कि वह मसीही इंग्लैंड में रहता है।

3. अन्त में, मैं उस प्रतिज्ञा की ओर मुड़ता हूँ जो मसीह के पास आनेवाले सब लोगों को दी गई है। "जो मुझ पर विश्वास करेगा, जैसा पवित्रशास्त्र में आया है, उसके हृदय में से जीवन के जल की नदियाँ बह निकलेंगी।"

पवित्रशास्त्र की प्रतिज्ञाओं का विषय बहुत विशाल और अत्यन्त रोचक है। मुझे सन्देह है कि आज के दिनों में उसे वह ध्यान मिलता है जिसका वह अधिकारी है। "क्लार्क की पवित्रशास्त्र की प्रतिज्ञाएँ" एक पुरानी पुस्तक है जिसका अध्ययन अब, मुझे लगता है, हमारे पूर्वजों के दिनों की अपेक्षा बहुत कम होता है। थोड़े ही मसीही इस बात को समझते हैं कि बाइबल में उन सब लोगों के विशेष लाभ और प्रोत्साहन के लिए, जो उनका उपयोग करें, कितने, और कितनी लम्बाई, चौड़ाई, गहराई और ऊँचाई तथा विविधता वाले बहुमूल्य "होगा" और "करूँगा" जमा करके रखे गए हैं।

फिर भी इस जीवन के मनुष्य-मनुष्य के सारे लेन-देन के मूल में लगभग सर्वत्र प्रतिज्ञा ही पड़ी होती है। हर सभ्य देश में आदम की अधिकांश सन्तानें प्रतिदिन प्रतिज्ञाओं के विश्वास पर ही कार्य करती हैं। खेत में काम करनेवाला मज़दूर सोमवार प्रातः से शनिवार की रात तक कड़ा परिश्रम करता है, क्योंकि उसे विश्वास है कि सप्ताह के अन्त में उसे उसकी प्रतिज्ञा की हुई मज़दूरी मिलेगी। सिपाही सेना में भर्ती होता है और नाविक जहाज़ की बही में अपना नाम लिखवाता है, इस पूर्ण भरोसे के साथ कि जिनके अधीन वे सेवा करते हैं वे किसी आगामी समय में उन्हें उनका प्रतिज्ञा किया हुआ वेतन देंगे। किसी घराने की सबसे साधारण दासी भी दिन-प्रतिदिन अपने नियत कामों में लगी रहती है, इस विश्वास में कि उसकी मालकिन उसे प्रतिज्ञा की हुई मज़दूरी देगी। बड़े नगरों के कारोबार में, सौदागरों, महाजनों और व्यापारियों के बीच, प्रतिज्ञाओं पर निरन्तर विश्वास के बिना कुछ भी न हो सके। हर समझदार मनुष्य जानता है कि चेक, हुण्डियाँ और वचन-पत्र ही वे साधन हैं जिनके द्वारा व्यापार के अधिकांश कार्य चलाए जा सकते हैं। व्यापारी लोग देखने से नहीं, वरन् विश्वास से कार्य करने को विवश हैं। वे प्रतिज्ञाओं पर विश्वास करते हैं और चाहते हैं कि उन पर भी विश्वास किया जाए। वास्तव में, प्रतिज्ञाएँ, प्रतिज्ञाओं पर विश्वास, और प्रतिज्ञाओं के विश्वास से उपजे कार्य ही सारे मसीही जगत् में मनुष्य के अपने संगी मनुष्यों के साथ होनेवाले दस में से नौ व्यवहारों की रीढ़ हैं।

अब इसी प्रकार बाइबल के धर्म में भी प्रतिज्ञाएँ एक बड़ा साधन हैं जिनके द्वारा परमेश्वर मनुष्य की आत्मा के निकट आना भाता है। पवित्रशास्त्र का सावधान विद्यार्थी यह देखे बिना नहीं रह सकता कि परमेश्वर निरन्तर मनुष्य के सामने ऐसे प्रलोभन रखता है कि वह उसकी सुने, उसकी आज्ञा माने और उसकी सेवा करे; और यह वचन देता है कि यदि मनुष्य केवल ध्यान दे और विश्वास करे तो वह बड़े-बड़े काम करेगा। संक्षेप में, जैसा पतरस कहता है, “हमें बहुमूल्य और बहुत ही बड़ी प्रतिज्ञाएँ दी गई हैं।” (2 पतरस 1:4)। जिसने दया करके सारा पवित्रशास्त्र हमारी शिक्षा के लिये लिखवाया, उसने मानव स्वभाव का अपना सिद्ध ज्ञान इस प्रकार प्रकट किया है कि इस पुस्तक में हर प्रकार के अनुभव और जीवन की हर दशा के अनुकूल प्रतिज्ञाओं का पूरा भण्डार बिछा दिया है। मानो वह कहता है, “क्या तुम जानना चाहते हो कि मैं तुम्हारे लिये क्या करने का वचन देता हूँ? क्या तुम मेरी शर्तें सुनना चाहते हो?”—“बाइबल उठाओ और पढ़ो।”

परन्तु आदम की सन्तानों की प्रतिज्ञाओं और परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं में एक बड़ा अन्तर है, जिसे कभी भूलना नहीं चाहिए। मनुष्य की प्रतिज्ञाओं का पूरा होना निश्चित नहीं। अच्छी से अच्छी इच्छा और मंशा होने पर भी वह सदा अपना वचन निभा नहीं सकता। रोग और मृत्यु किसी शस्त्रधारी की नाईं बीच में आकर प्रतिज्ञा करनेवाले को इस जगत् से उठा ले जा सकते हैं। युद्ध, महामारी, अकाल, फसल की विफलता या आँधी-तूफ़ान उसकी सम्पत्ति छीनकर उसके लिये अपनी प्रतिज्ञाएँ पूरी करना असम्भव कर सकते हैं। इसके विपरीत, परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ अवश्य निभाई जाती हैं। वह सर्वशक्तिमान है; उसने जो कहा है उसे करने से उसे कोई रोक नहीं सकता। वह कभी नहीं बदलता: वह सदा “एक ही मन का” है, और उसमें “न तो कोई परिवर्तन होता है, न अदल-बदल के कारण उस पर छाया पड़ती है।” (अय्यूब 23:13; याकूब 1:17)। वह सदा अपना वचन पूरा करेगा। एक बात है जो, जैसा एक छोटी लड़की ने अपनी शिक्षिका को चकित करते हुए कहा था, परमेश्वर नहीं कर सकता: “यह तो अनहोना है कि परमेश्वर झूठ बोले।” (इब्रानियों 6:18)। अत्यन्त असम्भव और अनहोनी बातें भी, जब परमेश्वर ने एक बार कह दिया कि वह उन्हें करेगा, सदा पूरी हुई हैं। जल-प्रलय से पुराने संसार का नाश और जहाज़ में नूह की रक्षा, इसहाक का जन्म, इस्राएल का मिस्र से छुटकारा, दाऊद का राजसिंहासन पर बैठाया जाना—

शाऊल के स्थान पर—मसीह का चमत्कारिक जन्म, मसीह का पुनरुत्थान, यहूदियों का सारी पृथ्वी पर बिखर जाना और एक अलग जाति के रूप में उनका निरन्तर बचे रहना—इनसे अधिक असम्भव और अनहोनी घटनाओं की कल्पना कौन कर सकता है? फिर भी परमेश्वर ने कहा कि ये होंगी, और ठीक समय पर ये सब पूरी हुईं। सच तो यह है कि परमेश्वर के लिये किसी काम को करना उतना ही सहज है जितना उसे कहना। वह जो भी प्रतिज्ञा करता है, उसे अवश्य पूरा करेगा।

पवित्रशास्त्र की प्रतिज्ञाओं की विविधता और समृद्धि के विषय में इस छोटे से निबन्ध में जितना कहना सम्भव है, उससे कहीं अधिक कहा जा सकता है। उनकी संख्या असंख्य है। यह विषय लगभग अक्षय है। मनुष्य के जीवन में, बाल्यावस्था से बुढ़ापे तक, कोई ऐसा पड़ाव, या कोई ऐसी दशा जिसमें मनुष्य रखा जा सके, शायद ही हो, जिसके लिये बाइबल ने हर उस जन को प्रोत्साहन न दिया हो जो परमेश्वर की दृष्टि में भला करना चाहता है। परमेश्वर के भण्डार में हर दशा के लिये “होगा” और “करूँगा” के वचन हैं। परमेश्वर की असीम दया और करुणा के विषय में,—उन सब को ग्रहण करने की उसकी तत्परता के विषय में जो मन फिराते और विश्वास करते हैं,—बड़े से बड़े पापियों को क्षमा करने, माफ़ करने और छुड़ाने की उसकी इच्छा के विषय में,—हृदय बदलने और हमारे भ्रष्ट स्वभाव को पलट देने की उसकी सामर्थ्य के विषय में,—प्रार्थना करने, सुसमाचार सुनने और अनुग्रह के सिंहासन के निकट आने के प्रोत्साहनों के विषय में,—कर्त्तव्य के लिये बल, संकट में शान्ति, उलझन में मार्गदर्शन, रोग में सहायता, मृत्यु में सान्त्वना, शोक में सहारा, कब्र के पार सुख, और महिमा में प्रतिफल के विषय में,—इन सब बातों के लिये वचन में प्रतिज्ञाओं की भरपूर आपूर्ति है। इसकी भरमार का अनुमान कोई तब तक नहीं लगा सकता जब तक वह इस विषय को लगातार ध्यान में रखकर पवित्रशास्त्र में सावधानी से खोज न करे। यदि किसी को सन्देह हो, तो मैं केवल इतना कहूँगा, “आकर देख लो।” सुलैमान के दरबार में शेबा की रानी की नाईं तुम भी शीघ्र ही कहोगे, “आधी बात भी मुझे नहीं बताई गई थी।” (1 राजाओं 10:7)।

हमारे प्रभु यीशु मसीह की जो प्रतिज्ञा इस लेख के शीर्षक में है, वह कुछ विशेष है। जो लोग आत्मिक प्यास अनुभव करते हैं और राहत के लिये उसके पास आते हैं, उन सब के लिये वह अनोखे रूप में प्रोत्साहन से भरपूर है, और इसीलिये वह विशेष ध्यान के योग्य है। हमारे प्रभु की अधिकांश प्रतिज्ञाएँ विशेष रूप से उसी व्यक्ति के लाभ से सम्बन्ध रखती हैं जिससे वे कही गई हों। हमारे सामने की प्रतिज्ञा का दायरा कहीं अधिक व्यापक है: ऐसा लगता है कि वह उन लोगों के अतिरिक्त जिनसे उसने बात की, और भी अनेकों से सम्बन्ध रखती है। क्योंकि वह क्या कहता है? —"जो मुझ पर विश्वास करेगा, जैसा पवित्रशास्त्र में आया है" (और जो सब कहीं यही सिखाता है), "उसके हृदय में से जीवन के जल की नदियाँ बह निकलेंगी। उसने यह बात उस आत्मा के विषय में कही, जिसे उस पर विश्वास करनेवाले पाने पर थे।" निःसन्देह ये शब्द लाक्षणिक हैं,—उसी प्रकार लाक्षणिक जैसे इस वाक्य के आरम्भिक शब्द हैं,—"प्यास" और "पीना" के समान लाक्षणिक। परन्तु पवित्रशास्त्र के सब रूपकों में बड़ा सत्य निहित है; और हमारे सामने के इस रूपक का अभिप्राय क्या था, यह मैं अब दिखाने का प्रयत्न करूँगा।

(1) पहली बात यह कि मेरा विश्वास है कि हमारे प्रभु का आशय यह था कि जो विश्वास के द्वारा उसके पास आता है, उसे अपनी आत्मा की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये वह सब कुछ भरपूरी से मिलेगा जिसकी वह इच्छा कर सकता है। आत्मा उसे क्षमा, शान्ति और आशा का ऐसा स्थायी बोध देगा कि वह उसके भीतरी मनुष्यत्व में कभी न सूखनेवाले सोते के समान होगा। "मसीह की बातों" से, जिन्हें आत्मा उसे दिखाएगा (यूहन्ना 16:15), वह ऐसा तृप्त होगा कि मृत्यु, न्याय और अनन्तकाल के विषय में आत्मिक चिन्ता से विश्राम पाएगा। अपनी निर्बलताओं या शैतान के प्रलोभनों के कारण उस पर अन्धकार और सन्देह के समय आ सकते हैं। परन्तु सामान्यतः, एक बार विश्वास के द्वारा मसीह के पास आ जाने पर, वह अपने हृदय के अन्तरतम में सांत्वना का कभी न चूकनेवाला सोता पाएगा। यह समझ लें कि हमारे सामने की प्रतिज्ञा में सबसे पहली बात यही है। हमारा प्रभु मानो कहता है,—"हे चिन्तित प्राणी, बस मेरे पास आ,—बस मेरे पास आ, और तेरी आत्मिक चिन्ता दूर होगी। मैं अपने प्रायश्चित और मध्यस्थता की प्रार्थना के द्वारा, पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से, तेरे हृदय में क्षमा और शान्ति का ऐसा बोध रखूँगा कि तू फिर कभी पूरी तरह प्यासा न होगा। जब तक तू देह में है, तुझे सन्देह, भय और संघर्ष हो सकते हैं। परन्तु एक बार मेरे पास आकर और

मुझे अपना उद्धारकर्ता मान लेने के बाद, तू अपने आप को कभी पूरी तरह निराश न पाएगा। तेरे भीतरी मनुष्यत्व की दशा ऐसी पूरी तरह बदल जाएगी कि तुझे लगेगा मानो तेरे भीतर जल का कभी न थमनेवाला सोता है।"

इन बातों के विषय में हम क्या कहें? मैं अपना विश्वास घोषित करता हूँ कि जब कभी कोई पुरुष या स्त्री सचमुच विश्वास के द्वारा मसीह के पास आता है, तो वह इस प्रतिज्ञा को पूरी होती पाता है। सम्भव है कि वह अनुग्रह में निर्बल हो, और अपनी दशा के विषय में उसके मन में अनेक शंकाएँ हों। सम्भव है कि वह यह कहने का साहस न करे कि मैं मन फिराया हुआ, धर्मी ठहराया गया, पवित्र किया गया और ज्योति में पवित्र लोगों के भाग का अधिकारी बनने के योग्य हूँ। फिर भी मैं निडर होकर कहता हूँ कि मसीह में सबसे दीन और सबसे निर्बल विश्वासी के भीतर भी कुछ ऐसा है जिसे वह छोड़ना नहीं चाहेगा, चाहे वह अभी उसे पूरी तरह न समझता हो। और वह "कुछ" क्या है? वह ठीक वही "जीवन के जल की नदी" है जो आदम की हर सन्तान के हृदय में तभी बहने लगती है जब वह मसीह के पास आकर पीता है। इसी अर्थ में मेरा विश्वास है कि मसीह की यह अद्भुत प्रतिज्ञा सदा पूरी होती है।

(2) परन्तु क्या इस लेख के शीर्षक की प्रतिज्ञा में बस इतना ही है? कदापि नहीं। अभी बहुत कुछ शेष है। अभी और भी आगे है। मेरा विश्वास है कि हमारे प्रभु का आशय हमें यह समझाना था कि जो विश्वास के द्वारा उसके पास आता है, उसे न केवल अपनी आत्मा के लिये आवश्यक सब कुछ भरपूरी से मिलेगा, वरन् वह दूसरों की आत्माओं के लिये भी आशीष का स्रोत बन जाएगा। उसमें बसनेवाली आत्मा उसे अपने संगी मनुष्यों के लिये भलाई का सोता बना देगी, ऐसा कि अन्तिम दिन यह पाया जाएगा कि उसमें से "जीवन के जल की नदियाँ" बह निकली हैं।

हमारे प्रभु की प्रतिज्ञा का यह बहुत महत्त्वपूर्ण भाग है, और यह एक ऐसा विषय खोलता है जिसे बहुत से मसीही कम ही समझते और ग्रहण करते हैं। परन्तु यह गहरी रुचि का विषय है, और इसे जितना ध्यान मिलता है उससे कहीं अधिक मिलना चाहिये। मैं इसे परमेश्वर का सत्य मानता हूँ। मैं मानता हूँ कि जैसे "हम में से कोई अपने लिये नहीं जीता" (रोमियों 14:7), वैसे ही कोई भी मनुष्य केवल अपने लिये मन नहीं फिराता; और एक पुरुष या स्त्री का मन फिराना परमेश्वर के अद्भुत विधान में सदा दूसरों के मन फिराने की ओर ले जाता है। मैं एक क्षण के लिये भी यह नहीं कहता कि सब विश्वासी इसे जानते हैं। मुझे कहीं अधिक सम्भव लगता है कि बहुत से लोग विश्वास में जीते और मरते हैं, और यह नहीं जानते कि उन्होंने किसी आत्मा की भलाई की है। परन्तु मेरा विश्वास है कि पुनरुत्थान की भोर और न्याय के दिन, जब सब मसीहियों का गुप्त इतिहास प्रकट किया जाएगा, तब सिद्ध होगा कि हमारे सामने की प्रतिज्ञा का पूरा अर्थ कभी विफल नहीं हुआ। मुझे सन्देह है कि कोई ऐसा विश्वासी होगा जो किसी न किसी के लिये "जीवन के जल की नदी" न रहा हो,—ऐसी नाली जिसके द्वारा आत्मा ने उद्धार करनेवाला अनुग्रह पहुँचाया हो। यहाँ तक कि मन फिरानेवाला चोर भी, मन फिराने के बाद उसका समय कितना ही थोड़ा रहा, हज़ारों आत्माओं के लिये आशीष का स्रोत रहा है!

(क) कुछ विश्वासी जीवित रहते हुए "जीवन के जल की नदियाँ" होते हैं। उनके वचन, उनकी बातचीत, उनका प्रचार, उनकी शिक्षा, सब ऐसे साधन हैं जिनके द्वारा जीवन का जल उनके संगी मनुष्यों के हृदयों में बहा है। उदाहरण के लिये ऐसे थे प्रेरित, जिन्होंने कोई पत्री नहीं लिखी, और केवल वचन का प्रचार किया। ऐसे थे लूथर, और व्हाइटफ़ील्ड, और वेस्ली, और बेरिज, और रोलैंड्स, और हज़ारों अन्य, जिनके विषय में मैं अभी विशेष रूप से नहीं कह सकता।

(ख) कुछ विश्वासी अपनी मृत्यु के समय "जीवित जल की नदियाँ" ठहरते हैं। भयंकरों के राजा का सामना करने में उनका साहस, अत्यन्त पीड़ादायक यातनाओं में उनकी निर्भीकता, खम्भे से बँधे होने पर भी मसीह के सत्य के प्रति उनकी अटल निष्ठा, कब्र के किनारे पर उनकी प्रकट शान्ति—इन सबने हज़ारों को सोचने पर विवश किया है और सैकड़ों को मन फिराने और विश्वास करने की ओर ले गई है। उदाहरण के लिए, आदि कलीसिया के वे शहीद ऐसे ही थे जिन्हें रोमी सम्राटों ने सताया। जॉन हस और प्राग का जेरोम भी ऐसे ही थे। क्रेनमर, रिडली, लैटिमर, हूपर और मेरी के शासन-काल के शहीदों की वह महान सेना भी ऐसी ही थी। शिमशोन की तरह उन्होंने अपनी मृत्यु में जो कार्य किया, वह उस कार्य से कहीं बड़ा था जो उन्होंने अपने जीवन में किया।

(ग) कुछ विश्वासी अपनी मृत्यु के बहुत समय बाद भी "जीवित जल की नदियाँ" ठहरते हैं। जिन हाथों ने कलम थामी थी, उनके धूल में मिल जाने के बहुत बाद भी वे अपनी पुस्तकों और लेखों के द्वारा संसार के हर भाग में भलाई करते रहते हैं। बनियन, बैक्सटर, ओवेन, जॉर्ज हर्बर्ट और रॉबर्ट मैकचेन ऐसे ही लोग थे। परमेश्वर के ये धन्य सेवक सम्भवतः अपनी पुस्तकों के द्वारा इस समय उससे अधिक भलाई कर रहे हैं जितनी उन्होंने जीवित रहते अपनी वाणी से की थी। "वह मर कर भी अब तक बोलता है।" (इब्रानियों 11:4।)

(घ) अन्त में, कुछ विश्वासी अपने दैनिक आचरण और व्यवहार की सुन्दरता के द्वारा "जीवित जल की नदियाँ" हैं। बहुत से शान्त, कोमल और अटल मसीही हैं, जो संसार में न कोई दिखावा करते हैं और न कोई शोर मचाते हैं, फिर भी अनजाने ही अपने आस-पास के सब लोगों पर भलाई का गहरा प्रभाव डालते हैं। वे "बिना वचन के खिंच जाते हैं।" (1 पतरस 3:1।) उनका प्रेम, उनकी दयालुता, उनका मधुर स्वभाव, उनका धैर्य, उनकी निःस्वार्थता एक विस्तृत मण्डली पर चुपचाप प्रभाव डालती है और बहुत-से मनों में विचार और आत्म-परख के बीज बो देती है। एक वृद्धा ने, जो बड़ी शान्ति के साथ मरी, उत्तम गवाही दी; उसने कहा कि परमेश्वर के बाद वह अपने उद्धार के लिए श्री व्हाइटफ़ील्ड की ऋणी है:—"यह उनका कोई प्रचार नहीं था; यह उनकी कही हुई कोई बात भी नहीं थी। यह तो उनके दैनिक जीवन की वह सुन्दर निरन्तरता और दयालुता थी, जो मैंने उस घर में देखी जहाँ वे ठहरे थे, जब मैं छोटी बच्ची थी। मैंने अपने मन में कहा, यदि मुझे कभी कोई धर्म मिला, तो श्री व्हाइटफ़ील्ड का परमेश्वर ही मेरा परमेश्वर होगा।"

आइए, हम सब अपने प्रभु की प्रतिज्ञा के इस दृष्टिकोण को थाम लें और इसे कभी न भूलें। एक पल के लिए भी यह न सोचें कि यदि आप विश्वास के द्वारा मसीह के पास आएँ और उसके पीछे चलें, तो केवल आपकी ही आत्मा का उद्धार होगा। दूसरों के लिए "जीवित जल की नदी" होने की धन्यता पर विचार कीजिए। कौन जानता है कि आप ही बहुत-से और लोगों को मसीह के पास लाने का साधन न बनें? इसी बात को निरन्तर ध्यान में रखकर जिएँ, कार्य करें, बोलें, प्रार्थना करें और परिश्रम करें। मैं एक ऐसे परिवार को जानता था जिसमें पिता, माता और दस सन्तानें थीं, जिसमें सच्चा धर्म एक बेटी से आरम्भ हुआ; और जब यह आरम्भ हुआ तब वह अकेली थी, और परिवार के शेष सब लोग संसार में थे। फिर भी अपनी मृत्यु से पहले उसने अपने माता-पिता और सब भाई-बहनों को परमेश्वर की ओर फिरते देखा, और मनुष्य की दृष्टि से यह सब उसी के प्रभाव से आरम्भ हुआ! इसे देखते हुए निश्चय ही हमें इस बात पर सन्देह नहीं करना चाहिए कि एक विश्वासी दूसरों के लिए "जीवित जल की नदी" हो सकता है। हो सकता है कि मन-परिवर्तन आपके जीवनकाल में न हों, और आप उन्हें देखे बिना ही मर जाएँ। परन्तु कभी सन्देह न करें कि एक का मन-परिवर्तन प्रायः और मन-परिवर्तनों की ओर ले जाता है, और कम ही लोग अकेले स्वर्ग जाते हैं। जब उत्तर के प्रेरित, हॉवर्थ के ग्रिम्शॉ की मृत्यु हुई, तो वे अपने पुत्र को अनुग्रहहीन और परमेश्वरहीन छोड़ गए। बाद में पुत्र का मन-परिवर्तन हुआ, क्योंकि वह अपने पिता की सलाह और उदाहरण को कभी नहीं भूला था। और उसके अन्तिम शब्द ये थे, "जब मेरे बूढ़े पिता मुझे स्वर्ग में देखेंगे तो क्या कहेंगे?" आइए, हम साहस रखें और मसीह की प्रतिज्ञा पर विश्वास करके आशा बाँधे रहें।

(1) और अब, इस लेख को समाप्त करने से पहले, मैं आपसे एक सीधा प्रश्न पूछता हूँ। क्या आप आत्मिक प्यास के विषय में कुछ जानते हैं? क्या आपने कभी अपनी आत्मा के विषय में सच्ची और गहरी चिन्ता का कुछ अनुभव किया है?—मुझे डर है कि बहुतेरे इसके विषय में कुछ नहीं जानते। मैंने एक तिहाई शताब्दी के पीड़ादायक अनुभव से सीखा है कि लोग वर्षों तक परमेश्वर के भवन में आते रह सकते हैं और फिर भी न अपने पापों को अनुभव करते हैं, न उद्धार पाने की इच्छा करते हैं। इस संसार की चिन्ताएँ, सुख-विलास का प्रेम, "और वस्तुओं का लोभ" हर रविवार को अच्छे बीज को दबा देते हैं और उसे निष्फल कर देते हैं। वे कलीसिया में ऐसे हृदयों के साथ आते हैं जो उस पत्थर के फर्श के समान ठंडे होते हैं जिस पर वे चलते हैं। वे वहाँ से ऐसे ही विचारहीन और अप्रभावित लौट जाते हैं जैसी पुरानी संगमरमर की वे मूर्तियाँ, जो दीवारों के स्मारकों से उन्हें देखती रहती हैं। ठीक है, ऐसा हो सकता है; परन्तु जब तक कोई जीवित है, मैं उसके विषय में निराश नहीं होता। लंदन के सेंट पॉल गिरजाघर का वह महान पुराना घण्टा, जो इतने वर्षों से घण्टे बजाता आया है, दिन के कामकाजी समय में बहुत कम लोगों को सुनाई देता है। गलियों के यातायात का कोलाहल और शोर उसकी ध्वनि को दबा देने और लोगों को उसे सुनने से रोकने की अद्भुत शक्ति रखता है। परन्तु जब दिन का काम समाप्त हो जाता है, मेज़ें बन्द हो जाती हैं, द्वार बन्द हो जाते हैं, पुस्तकें रख दी जाती हैं और उस विशाल नगर में शान्ति छा जाती है, तो स्थिति बदल जाती है। जब वह पुराना घण्टा रात में ग्यारह, बारह, एक, दो और तीन बजाता है, तो हज़ारों लोग उसे सुनते हैं जिन्होंने दिन में उसे कभी नहीं सुना था। और इसी प्रकार मैं आशा करता हूँ कि बहुतेरों के साथ उनकी आत्मा के विषय में भी ऐसा ही होगा। अभी, स्वास्थ्य और बल की प्रचुरता में, व्यापार की भागदौड़ और उथल-पुथल में, मुझे डर है कि आपके विवेक की आवाज़ प्रायः दब जाती है और आप उसे सुन नहीं पाते। परन्तु वह दिन आ सकता है जब विवेक का महान घण्टा, आपको अच्छा लगे या न लगे, अपनी आवाज़ सुनाएगा। वह समय आ सकता है जब आप शान्ति में अलग पड़े हों, और रोग के कारण चुपचाप बैठने को विवश हों, तब आपको अपने भीतर देखने और अपनी आत्मा की चिन्ताओं पर विचार करने के लिए बाध्य होना पड़े। और तब, जब जागृत विवेक का वह महान घण्टा आपके कानों में बज रहा होगा, मुझे भरोसा है कि इस लेख को पढ़नेवाला कितना ही मनुष्य परमेश्वर की वाणी सुनेगा और मन फिराएगा, प्यासा होना सीखेगा, और राहत के लिए मसीह के पास आना सीखेगा। हाँ, मैं परमेश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि बहुत देर हो जाने से पहले आपको अनुभव करना सिखाया जाए!

(2) परन्तु क्या तुम इसी क्षण कुछ अनुभव कर रहे हो? क्या तुम्हारा विवेक जागा हुआ है और कार्य कर रहा है? क्या तुम आत्मिक प्यास को महसूस करते हो और राहत की लालसा रखते हो? तो आज मैं अपने स्वामी के नाम से तुम्हारे लिए जो निमन्त्रण लाया हूँ उसे सुनो:—"यदि कोई," चाहे वह कोई भी हो,—यदि कोई, ऊँचा या नीचा, धनी या निर्धन, पढ़ा-लिखा या अनपढ़,—"यदि कोई प्यासा हो, तो वह मसीह के पास आए और पीए।" इस निमन्त्रण को बिना देर किए सुनो और स्वीकार करो। किसी बात की प्रतीक्षा मत करो। किसी की प्रतीक्षा मत करो। कौन जानता है कि कहीं तुम "किसी सुविधाजनक समय" की प्रतीक्षा करते-करते बहुत देर न कर दो? एक जीवते छुड़ानेवाले का हाथ अब स्वर्ग से बढ़ा हुआ है; परन्तु वह हटाया भी जा सकता है। सोता अभी खुला है; परन्तु वह शीघ्र ही सदा के लिए बन्द भी हो सकता है। "यदि कोई प्यासा हो, तो वह बिना देर किए आए और पीए।" चाहे तुम बड़े पापी रहे हो, और चेतावनियों, सम्मतियों और उपदेशों का विरोध करते रहे हो, तौभी आओ।—चाहे तुमने ज्योति और ज्ञान के विरुद्ध, पिता की सलाह और माता के आँसुओं के विरुद्ध पाप किया हो, चाहे तुम वर्षों से बिना विश्रामदिन और बिना प्रार्थना के जीते रहे हो, तौभी आओ।—यह मत कहो कि तुम नहीं जानते कि कैसे आना है, कि तुम समझते नहीं कि विश्वास करना क्या है, कि तुम्हें और प्रकाश की प्रतीक्षा करनी चाहिए। क्या कोई थका हुआ मनुष्य कहेगा कि वह लेटने के लिए भी बहुत थका है? या डूबता हुआ मनुष्य कहेगा कि वह नहीं जानता कि सहायता के लिए बढ़े हुए हाथ को कैसे पकड़ना है? या जहाज़ टूटने पर बचा हुआ नाविक, जब जीवन-नौका उस फँसे हुए ढाँचे के बगल में खड़ी हो, कहेगा कि वह नहीं जानता कि उसमें कैसे कूदना है? अरे, इन व्यर्थ बहानों को दूर फेंको! उठो और आओ! द्वार बन्द नहीं हुआ है। सोता अभी बन्द नहीं हुआ। प्रभु यीशु तुम्हें बुलाते हैं। इतना ही पर्याप्त है कि तुम प्यास अनुभव करते हो और उद्धार पाना चाहते हो। आओ: बिना देर किए मसीह के पास आओ। पाप के लिए कौन उस सोते के पास आया और उसे सूखा पाया? कौन असन्तुष्ट होकर लौटा?

(3) परन्तु क्या तुम पहले ही मसीह के पास आ चुके हो और राहत पा चुके हो? तो और निकट आओ, और भी निकट। मसीह के साथ तुम्हारी सहभागिता जितनी घनिष्ठ होगी, तुम उतनी ही अधिक शान्ति अनुभव करोगे। तुम जितना अधिक प्रतिदिन उस सोते के पास रहोगे, उतना ही अधिक अपने भीतर "अनन्त जीवन के लिये उमड़ते हुए जल का सोता" अनुभव करोगे। (यूहन्ना 4:14।) तुम केवल स्वयं धन्य नहीं होगे, वरन् दूसरों के लिए भी आशीष का स्रोत बनोगे।

इस बुरे संसार में शायद तुम वह सारी अनुभव होनेवाली शान्ति न पाओ जो तुम चाहते हो। परन्तु स्मरण रखो कि तुम्हें दो स्वर्ग नहीं मिल सकते। पूर्ण सुख अभी आनेवाला है। शैतान अभी बाँधा नहीं गया है। उन सब के लिए "एक अच्छा समय आनेवाला है" जो अपने पापों को पहचानते हैं और मसीह के पास आते हैं, और अपनी प्यासी आत्माओं को उसकी रखवाली में सौंप देते हैं। जब वह फिर आएगा तब वे पूरी तरह तृप्त हो जाएँगे। उन्हें वह सारा मार्ग स्मरण आएगा जिससे वे ले जाए गए, और वे अपने ऊपर बीती हर बात की आवश्यकता देखेंगे। सबसे बढ़कर, उन्हें आश्चर्य होगा कि वे इतने समय तक मसीह के बिना कैसे जी सके, और उसके पास आने में कैसे हिचकिचाते रहे।

स्कॉटलैण्ड में ग्लेनक्रो नामक एक घाटी-मार्ग है, जो उन आत्माओं के लिए स्वर्ग कैसा होगा, इसका सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत करता है जो मसीह के पास आती हैं। ग्लेनक्रो से होकर जानेवाली सड़क यात्री को एक लम्बी और खड़ी चढ़ाई पर ले जाती है, जिसमें अनेक छोटे मोड़ और घुमाव आते हैं। परन्तु जब घाटी-मार्ग की चोटी पर पहुँचते हैं, तो सड़क के किनारे एक पत्थर दिखाई देता है जिस पर ये सीधे-सादे शब्द खुदे हैं:—"विश्राम करो, और धन्यवादी बनो।" ये शब्द उन भावनाओं का वर्णन करते हैं जिनके साथ हर प्यासा जन, जो मसीह के पास आता है, स्वर्ग में प्रवेश करेगा। सकरे मार्ग की चोटी अन्त में हमारी होगी। हम अपनी थका देनेवाली यात्राओं से छूट जाएँगे, और परमेश्वर के राज्य में बैठेंगे। हम अपने जीवन के सारे मार्ग को धन्यवाद के साथ पीछे मुड़कर देखेंगे, और उस खड़ी चढ़ाई के हर पग की पूर्ण बुद्धि को देखेंगे जिससे हम ले जाए गए। हम उस महिमामय विश्राम में ऊपर की यात्रा के परिश्रम को भूल जाएँगे। यहाँ, इस संसार में, मसीह में विश्राम की हमारी अनुभूति अधिक से अधिक क्षीण और अधूरी है: कभी-कभी हमें "जीवन का जल" पूरी तरह चखने जैसा भी नहीं लगता। परन्तु जब वह जो सिद्ध है आ जाएगा, तब वह जो अधूरा है मिट जाएगा। "जब मैं जाग उठूँगा तब तेरे स्वरूप से सन्तुष्ट हूँगा।" (भजन संहिता 17:15।) हम उसके सुखों की नदी से पीएँगे और फिर कभी प्यासे न होंगे।

टिप्पणी

एक पुराने लेखक का एक अंश है जो इस निबन्ध में उल्लिखित कुछ बातों पर इतना प्रकाश डालता है कि उसे पाठक के सामने पूरा रखने के लिए मुझे किसी क्षमा-याचना की आवश्यकता नहीं। वह एक ऐसी पुस्तक से लिया गया है जो कम जानी जाती है और उससे भी कम पढ़ी जाती है। उससे मुझे लाभ हुआ है, और मैं समझता हूँ कि दूसरों को भी लाभ होगा।

"जब कोई मनुष्य जगाया जाता है, और उस बिन्दु पर पहुँचाया जाता है जहाँ सबको पहुँचना ही है, नहीं तो उससे भी बुरी दशा में, कि 'उद्धार पाने के लिये मैं क्या करूँ?' (प्रेरितों के काम 16:30, 31), तो हमारे पास इसका प्रेरितों वाला उत्तर है: 'प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर, तो तू और तेरा घराना उद्धार पाएगा।' यह उत्तर इतना पुराना है कि बहुतों को यह अप्रचलित लगता है। परन्तु यह अब भी और सदा ताज़ा, नया और रुचिकर रहेगा, और जब तक विवेक और संसार बना रहेगा, विवेक की इस महान समस्या का यही एकमात्र समाधान है। मनुष्य की कोई चतुराई या कला इसमें कोई दरार या दोष न पा सकेगी, न कोई दूसरा या इससे अच्छा उत्तर गढ़ सकेगी; और इसके सिवा कोई और जागे हुए विवेक के घाव को ठीक रीति से चंगा नहीं कर सकता।"

"आओ, हम इस मनुष्य को हमारे इस्राएल के कुछ गुरुओं के पास इस दशा में समाधान और राहत ढूँढ़ने के लिये भेजें। उनके सिद्धान्तों के अनुसार वे उससे यही कहेंगे, 'मन फिरा, और अपने जाने हुए पापों पर शोक कर, और उन्हें छोड़ दे और उनसे घृणा कर; तब परमेश्वर तुझ पर दया करेगा।' 'हाय!' (वह बेचारा मनुष्य कहता है), 'मेरा हृदय कठोर है, और मैं ठीक रीति से मन नहीं फिरा सकता; वरन् मैं अपने हृदय को उस समय से भी अधिक कठोर और नीच पाता हूँ जब मैं पाप में निश्चिन्त था।' यदि तुम इस मनुष्य से मसीह के लिये योग्यताओं की बात करो, तो वह उनके विषय में कुछ नहीं जानता; यदि सच्ची आज्ञाकारिता की बात करो, तो उसका उत्तर स्वाभाविक और तैयार है: 'आज्ञाकारिता तो जीवित मनुष्य का काम है, और सच्चाई केवल नए किए हुए प्राण में होती है।' इसलिये मरे हुए, अनवीनीकृत पापी के लिये सच्ची आज्ञाकारिता भी उतनी ही असम्भव है जितनी सिद्ध आज्ञाकारिता। जागे हुए पापी को यही सही उत्तर क्यों न दिया जाए: 'प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर, तो तू उद्धार पाएगा'? उसे बताओ कि मसीह कौन है, पापियों के लिये अनन्त छुटकारा प्राप्त करने के लिये उसने क्या किया और क्या सहा, और यह सब परमेश्वर और उसके पिता की इच्छा के अनुसार हुआ। उसे परमेश्वर के पुत्र द्वारा सम्पन्न किए गए सुसमाचार के उद्धार का सीधा-सादा वृत्तान्त सुनाओ; सुसमाचार का इतिहास और भेद उसे साफ़-साफ़ बताओ। सम्भव है कि पवित्र आत्मा उसके द्वारा विश्वास उत्पन्न करे, जैसा उसने अन्यजातियों के उन पहले फलों में किया था। (प्रेरितों के काम 10:44।)"

"यदि वह पूछे कि यीशु मसीह पर विश्वास करने का उसके पास क्या अधिकार है? तो उससे कहो कि उसके लिये यह नितान्त अनिवार्य है; क्योंकि उस पर विश्वास किए बिना उसे अनन्त काल तक नाश होना पड़ेगा। उससे कहो कि परमेश्वर ने मसीह और उसके सारे छुटकारे का अनुग्रहपूर्ण प्रस्ताव उसके सामने रखा है; और यह प्रतिज्ञा भी है कि विश्वास के द्वारा उस प्रस्ताव को स्वीकार करने पर मसीह और उसके साथ उद्धार उसका हो जाता है। उससे कहो कि परमेश्वर की स्पष्ट आज्ञा है (1 यूहन्ना 3:23) कि मसीह के नाम पर विश्वास करे; और जैसे वह नैतिक व्यवस्था की किसी भी आज्ञा के पालन का विवेक रखता है, वैसे ही इसके पालन का भी रखे। उससे मसीह की उद्धार करने की सामर्थ्य और भली इच्छा की बात कहो; कि जिसने भी अपने आप को उस पर छोड़ दिया उसे उसने कभी अस्वीकार नहीं किया; कि निराश दशाएँ उसकी उद्धार की कला की महिमामय विजय हैं। उससे कहो कि विश्वास और अविश्वास के बीच कोई मध्य मार्ग नहीं है; कि एक की उपेक्षा करने और दूसरे में बने रहने का कोई बहाना नहीं है; कि उद्धार के लिये प्रभु यीशु पर विश्वास करना परमेश्वर को उसकी व्यवस्था की सारी आज्ञाकारिता से अधिक भाता है; और अविश्वास सब पापों में परमेश्वर को सबसे अधिक क्रोध दिलाने वाला और मनुष्य को सबसे अधिक दण्ड के योग्य ठहराने वाला है। उसके पापों की भारी संख्या, व्यवस्था के श्राप और न्यायी के रूप में परमेश्वर की कठोरता के विरुद्ध उसके सामने रखने को कोई राहत नहीं, सिवाय परमेश्वर के उस मुफ़्त और असीम अनुग्रह के जो मसीह के अपने आप को बलिदान करके किए गए प्रायश्चित्त के पुण्य में है।"

"यदि वह कहे कि यीशु मसीह पर विश्वास करना क्या है? तो इस विषय में मुझे वचन में ऐसा कोई प्रश्न नहीं मिलता; बल्कि सब किसी न किसी रीति से इसका अर्थ समझते थे: वे यहूदी जो उस पर विश्वास नहीं करते थे (यूहन्ना 6:28–30); प्रधान याजक और फरीसी (यूहन्ना 7:48); वह अन्धा मनुष्य। (यूहन्ना 9:35।) जब मसीह ने उससे पूछा, क्या तू परमेश्वर के पुत्र पर विश्वास करता है? तो उसने उत्तर दिया, हे प्रभु, वह कौन है कि मैं उस पर विश्वास करूँ? जब मसीह ने उसे बता दिया (पद 37), तब उसने यह नहीं कहा, उस पर विश्वास करना क्या है? परन्तु कहा, हे प्रभु, मैं विश्वास करता हूँ; और उसे दण्डवत् किया: और इस प्रकार उसने उस पर विश्वास का अंगीकार भी किया और उसके अनुसार काम भी किया। वैसे ही उस मिर्गी के रोगी के पिता ने (मरकुस 9:23, 24), और खोजे ने (प्रेरितों के काम 8:37) — ये सब, मसीह के शत्रु और उसके चेले दोनों, जानते थे कि उस पर विश्वास का अर्थ यह मानना है कि नासरत का वह मनुष्य यीशु परमेश्वर का पुत्र, मसीहा और जगत का उद्धारकर्ता है, ताकि उसके नाम में उद्धार को ग्रहण किया जाए और उसकी बाट जोही जाए। (प्रेरितों के काम 4:12।) यही सर्वसाधारण समाचार था जिसे मसीह और उसके प्रेरितों और चेलों ने प्रचारित किया, और जिसने भी सुना उसने जाना।"

"यदि वह फिर भी पूछे कि उसे क्या विश्वास करना है? तो तुम उससे कहो कि उसे यह विश्वास करने के लिये नहीं बुलाया गया कि वह मसीह में है, और उसके पाप क्षमा हो गए हैं, और वह धर्मी ठहराया गया है; परन्तु उसे मसीह के विषय में परमेश्वर की साक्षी पर विश्वास करना है। (1 यूहन्ना 5:10–12।) और वह साक्षी यह है कि परमेश्वर हमें अनन्त जीवन अपने पुत्र यीशु मसीह में देता है (अर्थात् प्रस्तुत करता है); और जितने इस समाचार पर हृदय से विश्वास करते हैं और इस शुभ समाचार पर अपनी आत्माओं को टिकाते हैं, वे उद्धार पाएँगे। (रोमियों 10:9–11।) और उसे इसी प्रकार विश्वास करना है, कि वह धर्मी ठहराया जाए। (गलातियों 2:16।)"

"यदि वह फिर भी कहे कि यह विश्वास करना कठिन है, तो यह एक अच्छा सन्देह है, पर इसका समाधान सहज है। यह दर्शाता है कि मनुष्य गहराई से दीन किया गया है। कोई भी व्यक्ति परमेश्वर की व्यवस्था का पूरी रीति से पालन करने में अपनी असमर्थता देख सकता है; पर थोड़े ही लोग विश्वास करने की कठिनाई को पाते हैं। उसकी राहत और समाधान के लिये उससे पूछो कि वह क्या है जो उसे विश्वास करना कठिन बनाता है? क्या वह धर्मी ठहराए जाने और उद्धार पाने की अनिच्छा है? क्या वह यीशु मसीह के द्वारा इस प्रकार उद्धार पाने की अनिच्छा है जिससे परमेश्वर के अनुग्रह की स्तुति हो और अपने ऊपर सब घमण्ड व्यर्थ ठहरे? वह निश्चय इससे इनकार करेगा। क्या वह सुसमाचार की साक्षी की सच्चाई पर अविश्वास है? इसे वह स्वीकार करने का साहस नहीं करेगा। क्या वह मसीह की उद्धार करने की सामर्थ्य या भली इच्छा पर सन्देह है? यह तो सुसमाचार में परमेश्वर की साक्षी का खण्डन करना है। क्या वह इसलिये है कि उसे मसीह और उसके छुटकारे में अपने भाग का सन्देह है? तुम उससे कहो कि मसीह पर विश्वास करना ही उसमें भाग को पूरा करता है।"

"यदि वह कहे कि मैं यीशु मसीह पर विश्वास नहीं कर सकता क्योंकि इस विश्वास को क्रियान्वित करना कठिन है, और इसे निकालने के लिये ईश्वरीय सामर्थ्य चाहिए जो मुझे नहीं मिलती, तो तुम्हें उससे कहना है कि यीशु मसीह पर विश्वास करना कोई काम नहीं, परन्तु यीशु मसीह पर टिकना है। तुम्हें उससे कहना है कि यह बहाना उतना ही अनुचित है जितना यह कि कोई मनुष्य यात्रा से थका हुआ और एक कदम भी आगे चलने में असमर्थ होकर तर्क करे, 'मैं इतना थका हूँ कि लेट भी नहीं सकता,' जबकि वास्तव में वह न खड़ा हो सकता है न चल सकता है। वह बेचारा थका हुआ पापी तब तक यीशु मसीह पर विश्वास नहीं कर सकता जब तक वह यह न पाए कि वह अपने लिये कुछ नहीं कर सकता; और अपने पहले विश्वास में वह सदा अपने आप में निराश और असहाय मनुष्य के समान उद्धार के लिये मसीह की ओर फिरता है। और सुसमाचार से ऐसे तर्कों द्वारा प्रभु (जैसा उसने बहुत बार किया है) विश्वास, और विश्वास करने के द्वारा आनन्द और शान्ति पहुँचाएगा।"—रॉबर्ट ट्रेल की रचनाएँ, 1696। खण्ड 1। 266–269।

18. "अगम्य धन"*

"मुझ पर जो सब पवित्र लोगों में से छोटे से भी छोटा हूँ, यह अनुग्रह हुआ कि मैं अन्यजातियों को मसीह के अगम्य धन का सुसमाचार सुनाऊँ।"—इफिसियों 3:8

यदि हम इस वाक्य को पहली बार पढ़ा जाते सुनें, तो मेरे विचार में हम सब यही अनुभव करेंगे कि यह एक अत्यन्त उल्लेखनीय वाक्य है, चाहे हम यह न भी जानते हों कि इसे किसने लिखा है। इसमें जो साहसपूर्ण और प्रभावशाली अलंकार हैं, उनके कारण यह उल्लेखनीय है। "सब पवित्र लोगों में से छोटे से भी छोटा";—"मसीह का अगम्य धन";—ये सचमुच ऐसे "विचार हैं जिनमें प्राण की साँस है, और ऐसे शब्द हैं जो जलते हैं।"

परन्तु जब हम उस मनुष्य पर विचार करते हैं जिसने इसे लिखा, तब यह वाक्य दुगुना उल्लेखनीय हो जाता है। लिखनेवाला और कोई नहीं, अन्यजातियों का वह महान प्रेरित, पौलुस था,—उस श्रेष्ठ छोटी यहूदी सेना का अगुवा, जो अठारह सौ वर्ष पहले फिलिस्तीन से निकली और जिसने संसार को उलट-पुलट कर दिया,—मसीह का वह उत्तम योद्धा जिसने मानव-जाति पर, अपने निष्पाप स्वामी को छोड़, किसी भी स्त्री से जन्मे व्यक्ति से अधिक गहरी छाप छोड़ी,—ऐसी छाप जो आज तक बनी हुई है। निश्चय ही ऐसे मनुष्य की लेखनी से निकला ऐसा वाक्य विशेष ध्यान की माँग करता है।

आइए, हम इस पद पर दृढ़ता से दृष्टि जमाएँ और इसमें तीन बातों पर ध्यान दें:—

I. पहली, पौलुस अपने विषय में क्या कहता है। वह कहता है, "मैं सब पवित्र लोगों में से छोटे से भी छोटा हूँ।"

II. दूसरी, पौलुस अपनी सेवकाई के पद के विषय में क्या कहता है। वह कहता है, "मुझ पर अनुग्रह हुआ कि मैं प्रचार करूँ।"

III. तीसरी, पौलुस अपने प्रचार के महान विषय के बारे में क्या कहता है। वह उसे "मसीह का अगम्य धन" कहता है।

मुझे भरोसा है कि इन तीनों बातों पर कहे गए कुछ शब्द सारे पद को स्मरण-शक्ति, विवेक, हृदय और मन में दृढ़ता से बैठाने में सहायक होंगे।

I. पहले, आइए देखें कि पौलुस अपने विषय में क्या कहता है

जो भाषा वह प्रयोग करता है वह अनोखे रूप से प्रबल है। प्रसिद्ध कलीसियाओं का संस्थापक, चौदह प्रेरणा-प्राप्त पत्रियों का लेखक, वह मनुष्य जो "बड़े से बड़े प्रेरितों से किसी बात में कम न था," जो "बहुत ही परिश्रम करनेवाला, कोड़े खाने में अत्यधिक, बार-बार कैद में, बार-बार मृत्यु के जोखिमों में" रहा,—वह मनुष्य जिसने प्राणों के लिये "आप खर्च किया और खर्च हो गया," और जिसने "सब बातों को मसीह के कारण हानि समझा,"—वह मनुष्य जो सच्चाई से कह सका, "मेरे लिये जीवित रहना मसीह है, और मर जाना लाभ है,"—अपने विषय में हम उसे क्या कहते पाते हैं? वह एक बलपूर्ण तुलनात्मक और उत्कृष्टतासूचक रूप का प्रयोग करता है। वह कहता है, "मैं सब पवित्र लोगों में से छोटे से भी छोटा हूँ।" सबसे छोटा पवित्र जन कितना तुच्छ प्राणी है! फिर भी पौलुस कहता है, "मैं उस मनुष्य से भी छोटा हूँ।"

मुझे सन्देह है कि ऐसी भाषा उन बहुतों के लिये लगभग अबोधगम्य है जो अपने आप को मसीही कहते और मानते हैं। बाइबल और अपने हृदय, दोनों से अनजान होने के कारण, वे समझ नहीं पाते कि जब कोई पवित्र जन अपने विषय में और अपनी उपलब्धियों के विषय में इतनी दीनता से बोलता है तो उसका क्या अर्थ है। वे आपसे कहेंगे, "यह तो केवल बोलने का एक ढंग है; इसका अर्थ केवल इतना ही हो सकता है कि जब पौलुस नया-नया था और उसने पहले-पहल मसीह की सेवा आरम्भ की थी, तब वह कैसा था।" यह कितना सच है कि "शारीरिक मनुष्य परमेश्वर के आत्मा की बातें ग्रहण नहीं करता।" (1 कुरिन्थियों 2:14।) सच्चे मसीही की प्रार्थनाएँ, स्तुतियाँ, संघर्ष, भय, आशाएँ, आनन्द, शोक, रोमियों 7 का सारा अनुभव,—सब की सब संसारी मनुष्य के लिये "मूर्खता" हैं। जैसे अन्धा मनुष्य रेनॉल्ड्स या गेन्सबरो के चित्रों का निर्णायक नहीं हो सकता, और बहरा हैंडल के मसीहा का आनन्द नहीं ले सकता, वैसे ही अपरिवर्तित मनुष्य एक प्रेरित द्वारा अपने विषय में किए गए दीन मूल्यांकन को पूरी तरह नहीं समझ सकता।

परन्तु हम निश्चिन्त रह सकते हैं कि पौलुस ने अपनी लेखनी से जो लिखा, वह उसने सचमुच अपने हृदय में अनुभव किया। हमारे पद की भाषा अकेली नहीं है। अन्य स्थानों में तो वह इससे भी बढ़कर है। फिलिप्पियों से वह कहता है, "मैं ने अब तक न पाया है, न सिद्ध हो चुका हूँ; पर आगे बढ़ता जाता हूँ।" कुरिन्थियों से वह कहता है, "मैं प्रेरितों में सबसे छोटा हूँ, बरन प्रेरित कहलाने के योग्य भी नहीं।" तीमुथियुस से वह कहता है, "मैं पापियों में सब से बड़ा हूँ।" रोमियों से वह पुकार उठता है, "हाय, मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ! मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा?" (फिलिप्पियों 3:12; 1 कुरिन्थियों 15:9; 1 तीमुथियुस 1:15; रोमियों 7:24।) सीधी सच्ची बात यह है कि पौलुस ने अपने हृदय के अन्तरतम में किसी और के भीतर जितनी त्रुटियाँ और दुर्बलताएँ देखीं, उनसे कहीं अधिक अपने भीतर देखीं। उसकी समझ की आँखें परमेश्वर के पवित्र आत्मा द्वारा इतनी पूरी तरह खोल दी गई थीं कि उसने अपने भीतर सैकड़ों बुराइयाँ पहचान लीं, जिन्हें अन्य मनुष्यों की मन्द आँखों ने कभी देखा ही नहीं। संक्षेप में, बड़ी आत्मिक ज्योति पाकर, उसे अपने स्वाभाविक भ्रष्टाचार की गहरी समझ थी, और वह सिर से पाँव तक दीनता से सजा हुआ था। (1 पतरस 5:5।)

अब हम स्पष्ट रूप से समझ लें कि पौलुस जैसी दीनता अन्यजातियों के उस महान प्रेरित की कोई विशेष विशेषता नहीं थी। इसके विपरीत, यह प्रत्येक युग में परमेश्वर के सबसे प्रतिष्ठित पवित्र लोगों का एक प्रमुख चिह्न है। मनुष्यों के हृदय में जितना अधिक सच्चा अनुग्रह होता है, उनमें पाप का बोध उतना ही गहरा होता है। पवित्र आत्मा उनके प्राणों में जितनी अधिक ज्योति उण्डेलता है, उतना ही वे अपनी दुर्बलताएँ, अशुद्धताएँ और अन्धकार देख पाते हैं। मृत आत्मा कुछ भी अनुभव नहीं करती और कुछ नहीं देखती; जीवन के साथ स्पष्ट दृष्टि, कोमल विवेक और आत्मिक संवेदनशीलता आती है। देखिए कि अब्राहम, याकूब, अय्यूब, दाऊद और यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले ने अपने विषय में कितने दीन वचन कहे।

ब्रैडफोर्ड, हूकर, जॉर्ज हर्बर्ट, बेवरिज, बैक्सटर और मैक्चेन जैसे आधुनिक पवित्र लोगों की जीवनियों का अध्ययन कीजिए। ध्यान दीजिए कि चरित्र की एक ही विशेषता उन सब में कैसे समान है,—पाप का बहुत गहरा बोध।

ऊपरी और उथले मसीही अपने पहले प्रेम की गर्मी में, यदि चाहें, तो सिद्धता की बातें करें। कलीसिया के इतिहास के हर युग में, पौलुस से लेकर आज तक, महान पवित्र लोग सदा "दीनता से सजे" रहे हैं।

इस लेख के पाठकों में से जो उद्धार पाना चाहता है, वह आज ही जान ले कि स्वर्ग की ओर पहले कदम पाप का गहरा बोध और अपने विषय में दीन मूल्यांकन हैं। वह उस निर्बल और मूर्खतापूर्ण परम्परा को दूर फेंक दे कि धर्म का आरम्भ अपने आप को "अच्छा" अनुभव करना है। इसके बजाय वह पवित्रशास्त्र के उस महान सिद्धान्त को थाम ले कि हमें अपने आप को "बुरा" अनुभव करने से आरम्भ करना चाहिए; और जब तक हम सचमुच अपने आप को "बुरा" अनुभव नहीं करते, तब तक हम सच्ची भलाई या उद्धार देनेवाले मसीही जीवन के विषय में कुछ नहीं जानते। धन्य है वह जिसने चुंगी लेनेवाले की प्रार्थना के साथ परमेश्वर के निकट आना सीख लिया है, "हे परमेश्वर, मुझ पापी पर दया कर।" (लूका 18:13।)

आओ, हम सब नम्रता की खोज करें। कोई अनुग्रह मनुष्य को इतना शोभा नहीं देता। हम हैं ही क्या कि घमण्ड करें? संसार में जन्मे सब प्राणियों में आदम की सन्तान जैसा परावलम्बी कोई नहीं। शारीरिक दृष्टि से देखें तो किस देह को ऐसी देखभाल और ध्यान चाहिए, और भोजन तथा वस्त्र के लिए जो आधी सृष्टि का प्रतिदिन ऋणी रहती है, मनुष्य की देह जैसी कौन है? मानसिक दृष्टि से देखें तो बुद्धिमान से बुद्धिमान लोग भी (और वे थोड़े ही हैं) कितना कम जानते हैं, और मनुष्यजाति का विशाल बहुमत कितना अज्ञानी है, और वे अपनी ही मूर्खता से कितना दुःख उत्पन्न करते हैं! अय्यूब की पुस्तक कहती है, "हम तो कल ही के हैं, और कुछ नहीं जानते।" (अय्यूब 8:9।) निश्चय ही पृथ्वी या स्वर्ग में कोई सृजा हुआ प्राणी ऐसा नहीं जिसे मनुष्य जितना नम्र होना चाहिए।

आओ, हम नम्रता की खोज करें। कोई अनुग्रह इंग्लैंड की कलीसिया के सदस्य को इतना शोभा नहीं देता। हमारी अनुपम प्रार्थना-पुस्तक आदि से अन्त तक उसका प्रयोग करनेवाले सब लोगों के मुँह में अत्यन्त नम्रता की भाषा रखती है। प्रातःकालीन और सान्ध्यकालीन प्रार्थना के आरम्भ के वाक्य, सामान्य पाप-स्वीकार, विनय-प्रार्थना, प्रभु-भोज की विधि—सब के सब दीन मन और आत्म-दीनता के वचनों से भरपूर हैं। सब एक ही स्वर में इंग्लैंड की कलीसिया के आराधकों को परमेश्वर की दृष्टि में हमारी उचित स्थिति के विषय में स्पष्ट शिक्षा देते हैं।

यदि हम आज नम्रता के विषय में कुछ भी जानते हैं, तो आओ, हम सब उसमें और बढ़ने की खोज करें। जितनी अधिक नम्रता हम में होगी, उतने ही हम मसीह के समान होंगे। हमारे धन्य स्वामी के विषय में लिखा है (यद्यपि उनमें कोई पाप न था) कि "वह परमेश्वर के स्वरूप में होकर भी परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा। परन्तु अपने आप को शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया। और मनुष्य के रूप में प्रगट होकर अपने आप को दीन किया, और यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु, हाँ, क्रूस की मृत्यु भी सह ली।" (फिलिप्पियों 2:6-8।) और उस खण्ड से पहले के वचनों को भी स्मरण रखें,—"वैसा ही स्वभाव रखो जैसा मसीह यीशु का भी था।" विश्वास रखिए, मनुष्य जितना स्वर्ग के निकट आते हैं, उतने ही नम्र होते जाते हैं। मृत्यु की घड़ी में, जब एक पाँव क़ब्र में होता है और स्वर्ग का कुछ प्रकाश उन पर पड़ता है, तब सैकड़ों बड़े सन्तों और कलीसिया के पदाधिकारियों—सेल्डन, बिशप बटलर, आर्चबिशप लॉन्गली जैसे लोगों—ने यह स्वीकारोक्ति लिख छोड़ी है कि उस घड़ी से पहले उन्होंने अपने पापों को कभी इतने स्पष्ट रूप से नहीं देखा, और न दया और अनुग्रह के प्रति अपने ऋण को इतनी गहराई से अनुभव किया। मेरा विचार है कि हमें कितना नम्र होना चाहिए, यह पूरी रीति से स्वर्ग ही सिखाएगा। तब ही, जब हम परदे के भीतर खड़े होंगे और जीवन के उस सारे मार्ग को पीछे मुड़कर देखेंगे जिससे होकर हम चलाए गए, तभी हम नम्रता की आवश्यकता और सुन्दरता को पूरी तरह समझेंगे। पौलुस जैसी कड़ी भाषा उस दिन हमें अधिक कड़ी नहीं लगेगी। नहीं, बिलकुल नहीं! हम अपने मुकुट सिंहासन के सामने डाल देंगे, और समझेंगे कि एक महान पण्डित का क्या अर्थ था जब उसने कहा, "स्वर्ग का गीत यही होगा: परमेश्वर ने क्या ही कर दिखाया है।"

II. दूसरी बात, आओ देखें कि पौलुस अपने सेवकाई के पद के विषय में क्या कहता है

इस विषय में प्रेरित के वचनों में एक भव्य सरलता है। वह कहता है, "मुझे यह अनुग्रह दिया गया कि मैं प्रचार करूँ।" वाक्य का अर्थ स्पष्ट है: "मुझे शुभ समाचार का दूत होने का विशेषाधिकार दिया गया है। मुझे आनन्द के समाचार का उद्घोषक होने का अधिकार दिया गया है।" निःसन्देह हम इसमें सन्देह नहीं कर सकते कि पौलुस की दृष्टि में सेवक के पद में संस्कारों का सम्पादन करना, और मसीह की देह की उन्नति के लिए आवश्यक अन्य सब कार्य करना भी सम्मिलित था। परन्तु यहाँ, जैसे अन्य स्थानों में, यह प्रगट है कि उसके मन में निरन्तर यही मुख्य विचार रहता था कि नए नियम के सेवक का प्रमुख कार्य प्रचारक, सुसमाचार सुनानेवाला, परमेश्वर का राजदूत, परमेश्वर का दूत, और पतित संसार को परमेश्वर का शुभ समाचार सुनानेवाला होना है। वह एक और स्थान पर कहता है, "मसीह ने मुझे बपतिस्मा देने को नहीं, परन्तु सुसमाचार सुनाने को भेजा है।" (1 कुरिन्थियों 1:17।)

मुझे यह नहीं दिखता कि पौलुस कभी उस प्रिय सिद्धान्त का समर्थन करता है कि मसीह की कलीसिया में बलिदान चढ़ानेवाली याजकीय सेवकाई, अर्थात् बलि चढ़ानेवाला याजकपद ठहराया गया था। प्रेरितों के काम में या कलीसियाओं को लिखी उसकी पत्रियों में ऐसी धारणा को उचित ठहरानेवाला एक शब्द भी नहीं है। कहीं नहीं लिखा, "परमेश्वर ने कलीसिया में कितनों को ठहराया है, पहले प्रेरित, फिर याजक।" (1 कुरिन्थियों 12:28।) तीमुथियुस और तीतुस को लिखी पासबानीय पत्रियों में, जहाँ यदि कहीं होता तो हम उसे पाने की आशा करते, इस धारणा की स्पष्ट अनुपस्थिति है। इसके विपरीत, इन्हीं पत्रियों में हम ऐसे वाक्य पढ़ते हैं, "परमेश्वर ने प्रचार के द्वारा अपने वचन को प्रकट किया।" "मैं प्रचारक ठहराया गया।" "मैं प्रचारक नियुक्त किया गया।" "ताकि मेरे द्वारा प्रचार पूरा हो जाए।" (1 तीमुथियुस 2:7; 2 तीमुथियुस 1:11; 2 तीमुथियुस 4:17; तीतुस 1:3।) और सबसे बढ़कर, अपने मित्र तीमुथियुस को, जब वह उसे एक संगठित कलीसिया का भार सौंपकर जाता है, उसकी अन्तिम आज्ञाओं में से एक यह सारगर्भित वाक्य है, "वचन का प्रचार कर।" (2 तीमुथियुस 4:2।) संक्षेप में, मेरा विश्वास है कि पौलुस हमें यह समझाना चाहेगा कि मसीही सेवक जिन अनेक कामों के लिए अलग किया जाता है, उनमें उसका पहला, सर्वोपरि और मुख्य काम परमेश्वर के वचन का प्रचारक और उद्घोषक होना है।

परन्तु जब हम यह मानने से इनकार करते हैं कि बलिदान चढ़ानेवाले याजकपद का पवित्रशास्त्र में कोई आधार है, तो आज के दिनों में हम सावधान रहें कि उस पद को, जो मसीह के सेवक का है, तुच्छ समझने की दूसरी अति में न जा पड़ें। इस दिशा में कुछ जोखिम है। मसीही सेवकाई के विषय में कुछ निश्चित सिद्धान्तों को दृढ़ता से थामे रहें, और याजकपद के प्रति हमारी अरुचि और रोमी मत के प्रति हमारा विरोध चाहे कितना ही प्रबल हो, कोई बात हमें इन सिद्धान्तों को हाथ से छूटने देने के लिए न फुसलाए। निश्चय ही एक ओर याजकवाद की गिरी हुई मूर्तिपूजा और दूसरी ओर उच्छृंखल अराजकता के बीच ठोस मध्य मार्ग है। इस कारण कि हम सेवकाई के इस विषय में पोप के अनुयायी नहीं होंगे, यह आवश्यक नहीं कि हम क्वेकर या प्लिमथ ब्रदरन* ही हो जाएँ। कम से कम पौलुस का मन यह नहीं था।

(क) एक तो, आइए हम अपने मन में दृढ़ता से यह बात बैठा लें कि सेवकाई का पद पवित्रशास्त्र के अनुसार स्थापित व्यवस्था है। इस बात को प्रमाणित करने के लिये मुझे आपको उद्धरणों से थकाने की आवश्यकता नहीं। मैं केवल इतना सुझाव दूँगा कि आप तीमुथियुस और तीतुस के नाम पत्रियाँ पढ़ें और स्वयं निर्णय करें। यदि ये पत्रियाँ सेवकाई को अधिकार नहीं देतीं, तो मेरे विचार में शब्दों का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता। जो पहले बारह बुद्धिमान, ईमानदार, निष्पक्ष और पूर्वाग्रह से रहित पुरुष मिलें, उन्हें एक नया नियम देकर अकेले बैठा दीजिए कि वे इस प्रश्न की जाँच करें: "क्या मसीही सेवकाई पवित्रशास्त्र के अनुसार है या नहीं?" मुझे कोई सन्देह नहीं कि उनका निर्णय क्या होगा।

(ख) दूसरे, आइए हम अपने मन में यह बात बैठा लें कि सेवकाई का पद परमेश्वर का अत्यन्त बुद्धिमानी और उपयोगिता से भरा प्रबन्ध है। यह मसीह की सब विधियों और अनुग्रह के साधनों के नियमित बने रहने को सुनिश्चित करता है। यह पापियों को जगाने और सन्तों की उन्नति करने के लिये एक कभी न थमनेवाला तंत्र उपलब्ध कराता है। सारा अनुभव प्रमाणित करता है कि सबका काम शीघ्र ही किसी का काम नहीं रह जाता; और जब यह अन्य बातों में सच है, तो धर्म के विषय में भी उतना ही सच है। हमारा परमेश्वर व्यवस्था का परमेश्वर है, और वह साधनों के द्वारा काम करता है; इसलिये हमें यह आशा रखने का कोई अधिकार नहीं कि उसका कार्य निरन्तर चमत्कारिक हस्तक्षेपों से चलता रहेगा जबकि उसके सेवक निठल्ले खड़े रहें। वचन के निरन्तर प्रचार और संस्कारों के संचालन के लिये इससे उत्तम कोई योजना नहीं बनाई जा सकती कि पुरुषों का एक नियमित वर्ग ठहराया जाए जो अपने आपको पूरी तरह मसीह के काम में लगा दे।

(ग) तीसरे, आइए हम अपने मन में दृढ़ता से यह बात बैठा लें कि सेवकाई का पद एक सम्माननीय सौभाग्य है। किसी राजा का राजदूत होना सम्मान की बात है: ऐसे राज्याधिकारी के व्यक्तित्व का आदर किया जाता है, और उसे विधिवत् पवित्र ठहराया जाता है। ट्राफलगर और वाटरलू जैसी विजय का समाचार पहुँचानेवाला होना सम्मान की बात है: तार की खोज से पहले यह अत्यन्त वांछित प्रतिष्ठा थी। परन्तु राजाओं के राजा का राजदूत होना, और कलवरी पर जीती गई विजय का शुभ समाचार सुनाना, कितना बड़ा सम्मान है! ऐसे स्वामी की सीधी सेवा करना, ऐसा सन्देश लेकर चलना, और यह जानना कि यदि परमेश्वर हमारे काम पर आशीष दे तो उसके परिणाम अनन्त हैं, यह सचमुच एक सौभाग्य है। और मजदूर नाशमान मुकुट के लिये परिश्रम करते हैं, परन्तु मसीह का सेवक अविनाशी मुकुट के लिये। किसी देश की दशा तब सबसे बुरी होती है जब धर्म के सेवकों ने अपने पद को उपहास और तिरस्कार का पात्र बना दिया हो। मलाकी में यह एक भयानक वचन है: "इसलिये मैं ने भी तुम को सब लोगों की दृष्टि में तुच्छ और नीच कर दिया है, क्योंकि तुम मेरे मार्गों पर नहीं चलते।" (मलाकी 2:9।) परन्तु चाहे लोग सुनें या न सुनें, विश्वासयोग्य राजदूत का पद सम्माननीय है। छियानवे वर्ष की आयु में मरनेवाले एक पुराने मिशनरी का, मृत्यु-शय्या पर कहा गया यह वचन बहुत सुन्दर था: "मनुष्य के लिये सबसे उत्तम काम सुसमाचार का प्रचार करना है।"

अपने विषय के इस भाग को मैं इस गम्भीर निवेदन के साथ छोड़ता हूँ कि जो कोई प्रार्थना करता है, वह मसीह के सेवकों के लिये बिनती, प्रार्थना और मध्यस्थता की प्रार्थना करना कभी न भूले, कि देश में भी और मिशन-क्षेत्र में भी उनकी उचित आपूर्ति कभी न घटे, कि वे विश्वास में खरे और जीवन में पवित्र बने रहें, और कि वे अपनी और अपने उपदेश की चौकसी रखें। (1 तीमुथियुस 4:16।)

ओह, स्मरण रखिए कि जहाँ हमारा पद सम्माननीय, उपयोगी और पवित्रशास्त्र के अनुसार है, वहाँ यह गहरी और कठिन ज़िम्मेदारी का भी पद है! हम आत्माओं की रखवाली "उन के समान" करते हैं "जिन्हें लेखा देना पड़ेगा", अर्थात् न्याय के दिन। (इब्रानियों 13:17।) यदि हमारी अविश्वासयोग्यता से आत्माएँ खो जाएँ, तो उनका लहू हमारे हाथ से माँगा जाएगा। यदि हमें केवल उपासना-विधियाँ पढ़नी, संस्कार करवाने, एक विशेष पोशाक पहननी और रीतियों, शारीरिक क्रियाओं, मुद्राओं और भाव-भंगिमाओं का एक चक्र निभाना होता, तो हमारी स्थिति अपेक्षाकृत हल्की होती। परन्तु बात इतनी ही नहीं है। हमें अपने स्वामी का सन्देश पहुँचाना है, कोई लाभदायक बात छिपाकर नहीं रखनी, परमेश्वर की सारी मनसा बता देनी है। यदि हम अपनी मण्डलियों को सत्य से कम या सत्य से अधिक बताएँ, तो हम अमर आत्माओं को सदा के लिये नाश कर सकते हैं। जीवन और मृत्यु प्रचारक की जीभ के वश में हैं। "यदि मैं सुसमाचार न सुनाऊँ तो मुझ पर हाय!" (1 कुरिन्थियों 9:16।)

मैं फिर कहता हूँ, हमारे लिये प्रार्थना कीजिए। कौन इन बातों के योग्य है? प्राचीन पिताओं की उस पुरानी कहावत को स्मरण रखिए: "सेवकों से अधिक आत्मिक संकट में कोई नहीं।" हमारी आलोचना करना और हममें दोष निकालना सहज है। हमारे पास यह धन मिट्टी के बरतनों में है। हम आप ही के समान दुर्बलताओंवाले मनुष्य हैं, अचूक नहीं। इन परखने, लुभाने और विवाद के दिनों में हमारे लिये प्रार्थना कीजिए कि हमारी कलीसिया में ऐसे अध्यक्षों, याजकों और डीकनों की कभी कमी न हो जो विश्वास में खरे, सिंह के समान साहसी, "सर्पों के समान बुद्धिमान और कबूतरों के समान भोले" हों। (मत्ती 10:16।) जिसने कहा, "मुझे अनुग्रह दिया गया है कि प्रचार करूँ," उसी मनुष्य ने दूसरे स्थान पर यह भी कहा, "हमारे लिये प्रार्थना किया करो कि प्रभु का वचन शीघ्रता से फैले, और महिमा पाए, और हम हठीले और दुष्ट मनुष्यों से बचे रहें; क्योंकि सब में विश्वास नहीं।" (2 थिस्सलुनीकियों 3:1, 2।)

III. अब अन्त में हम यह देखें कि पौलुस अपने प्रचार के महान विषय के बारे में क्या कहता है। वह उसे "मसीह के अगम्य धन" कहता है।

तरसुस के इस परिवर्तित मनुष्य का "मसीह" का प्रचार करना हमारी अपेक्षा से अधिक कुछ नहीं, उसके पिछले जीवन को देखते हुए। जब उसने स्वयं क्रूस के लहू के द्वारा शान्ति पाई थी, तो हम निश्चित हो सकते हैं कि वह क्रूस की कथा दूसरों को सदा सुनाता रहेगा। उसने कभी बहुमूल्य समय जड़हीन नीतिशास्त्र को बढ़ाने में, या "सच्चा," "उदात्त," "निष्ठावान," "सुन्दर," और "मानव स्वभाव में भलाई के बीज" जैसी अस्पष्ट धारणाओं और खोखली घिसी-पिटी बातों पर लम्बे भाषण देने में नष्ट नहीं किया। वह सदा बात की जड़ तक पहुँचता था, और मनुष्यों को उनका बड़ा पारिवारिक रोग, पापियों के रूप में उनकी भयंकर दशा, और पाप से रोगी जगत को जिस महान वैद्य की आवश्यकता है, उसे दिखाता था।

यह कि उसे "अन्यजातियों" के बीच मसीह का प्रचार करना था, यह भी उस बात के अनुरूप है जो हम सब स्थानों में और सब लोगों के बीच उसकी कार्य-पद्धति के विषय में जानते हैं। वह जहाँ कहीं गया और प्रचार करने खड़ा हुआ,—अन्ताकिया में, लुस्त्रा में, फिलिप्पी में, एथेन्स में, कुरिन्थ में, इफिसुस में, यूनानियों या रोमियों के बीच, विद्वानों या अनपढ़ों के बीच, स्तोइकियों और एपिकूरियों के बीच, धनवानों या निर्धनों के सामने, बर्बरों, सीथियाइयों, दासों या स्वतन्त्रों के सामने,—यीशु और उसकी प्रतिनिधि मृत्यु, यीशु और उसका पुनरुत्थान ही उसके उपदेशों का मूल स्वर था। अपने श्रोताओं के अनुसार अपने सम्बोधन की रीति बदलते हुए, जैसा कि वह बुद्धिमानी से करता था, उसके प्रचार का सार और हृदय क्रूस पर चढ़ाया हुआ मसीह था।

परन्तु जो पाठ हमारे सामने है, उसमें तुम देखोगे कि वह एक बहुत विलक्षण वाक्यांश का प्रयोग करता है, ऐसा वाक्यांश जो निःसन्देह उसके लेखों में अकेला है,—"मसीह के अगम्य धन"। यह उस व्यक्ति की प्रबल, उत्साहपूर्ण भाषा है जिसे मसीह की दया और अनुग्रह का ऋण सदा स्मरण रहा, और जो अपने शब्दों से यह दिखाना चाहता था कि वह उसे कितनी गहराई से अनुभव करता है। पौलुस आधे मन से कार्य करने या बोलनेवाला मनुष्य नहीं था। (Quicquid fecit valdè fecit.) वह दमिश्क के मार्ग को, सीधी नामक गली में यहूदा के घर को, भले हनन्याह की भेंट को, अपनी आँखों से छिलकों के गिरने को, और मृत्यु से जीवन में अपने अद्भुत प्रवेश को कभी नहीं भूला। ये बातें उसके मन में सदा हरी-भरी और ताज़ा रहती हैं; इसलिए वह केवल यह कहकर सन्तुष्ट नहीं होता, "मुझे यह अनुग्रह दिया गया कि मैं मसीह का प्रचार करूँ।" नहीं: वह अपने विषय को विस्तार देता है। वह उसे "मसीह के अगम्य धन" कहता है।

परन्तु जब प्रेरित ने "अगम्य धन" की बात कही तो उसका क्या अर्थ था? इसका उत्तर देना कठिन है। इसमें सन्देह नहीं कि उसने मसीह में मनुष्य की आत्मा की सब आवश्यकताओं के लिए ऐसा असीम प्रबन्ध देखा कि अपना अर्थ प्रकट करने के लिए उसे कोई और वाक्यांश नहीं सूझा। वह यीशु को जिस भी दृष्टिकोण से देखता, उसमें उसे उससे कहीं अधिक दिखाई देता जितना मन सोच सकता या जीभ कह सकती थी। उसका ठीक-ठीक क्या आशय था, यह अनिवार्य रूप से अनुमान का विषय है। परन्तु यह लाभदायक होगा कि हम उन बातों में से कुछ को विस्तार से लिख दें जो सम्भवतः उसके मन में थीं। यह लाभदायक हो सकता है, अवश्य होगा, होना भी चाहिए। क्योंकि अन्ततः स्मरण रखो कि मसीह के ये "धन" ऐसे धन हैं जिनकी आवश्यकता तुम्हें और मुझे इंग्लैंड में उतनी ही है जितनी पौलुस को थी; और सबसे उत्तम बात यह कि ये "धन" मसीह में तुम्हारे और मेरे लिए उतने ही संचित हैं जितने 1800 वर्ष पहले थे। वे अब भी वहाँ हैं। वे अब भी उन सब को सेंतमेंत दिए जाते हैं जो उन्हें लेने को तैयार हैं। वे अब भी हर उस व्यक्ति की सम्पत्ति हैं जो मन फिराता और विश्वास करता है। आओ, उनमें से कुछ पर संक्षेप में दृष्टि डालें।

(क) सबसे पहले अपने मन में यह बैठा लो कि मसीह के व्यक्तित्व में अगम्य धन हैं। हमारे प्रभु यीशु मसीह में पूर्ण मनुष्य और पूर्ण परमेश्वर का वह चमत्कारिक मेल निःसन्देह एक बड़ा भेद है, जिसकी गहराई नापने की डोरी हमारे पास नहीं है। यह ऊँची बात है; और हम उस तक नहीं पहुँच सकते। परन्तु वह मेल चाहे कितना ही रहस्यमय हो, जो उसे ठीक रीति से समझ सके उन सब के लिए वह सान्त्वना और शान्ति की खान है। असीम सामर्थ्य और असीम सहानुभूति हमारे उद्धारकर्ता में एक साथ मिली हुई हैं। यदि वह केवल मनुष्य होता तो हमें बचा न सकता। यदि वह केवल परमेश्वर होता (मैं आदर के साथ कहता हूँ) तो वह "हमारी निर्बलताओं में हमारे साथ दुःखी" न हो सकता, और न "परीक्षा की दशा में दुःख" उठा सकता। (इब्रा. 2:18; 4:15।) परमेश्वर के रूप में वह बचाने में सामर्थी है; और मनुष्य के रूप में वह हमारा शीश, प्रतिनिधि और मित्र होने के ठीक योग्य है। जो लोग कभी गहराई से नहीं सोचते वे चाहें तो हम पर ताना मारें कि हम धर्म-सिद्धान्तों और हठधर्मी धर्मविज्ञान के विषय में झगड़ते हैं। परन्तु विचारशील मसीही लोग देहधारण के उपेक्षित सिद्धान्त और हमारे उद्धारकर्ता में दो स्वभावों के मेल पर विश्वास करने और उसे दृढ़ता से थामे रहने में कभी लज्जित न हों। यह एक धनी और बहुमूल्य सत्य है कि हमारा प्रभु यीशु मसीह "परमेश्वर और मनुष्य" दोनों है।

(ख) फिर अपने मन में यह बैठा लो कि उस कार्य में अगम्य धन हैं जो मसीह ने हमारे लिए पूरा किया, जब वह पृथ्वी पर जीवित रहा, मरा और फिर जी उठा। सचमुच और निश्चय ही, "जो काम तूने मुझे करने को दिया था, उसे पूरा करके मैंने पृथ्वी पर तेरी महिमा की है" (यूहन्ना 17:4),—पाप के प्रायश्चित का कार्य, मेल-मिलाप का कार्य, छुटकारे का कार्य, सन्तुष्टि का कार्य, "अधर्मियों के लिए धर्मी" के रूप में प्रतिस्थापन का कार्य। मैं जानता हूँ कि कुछ लोगों को इन संक्षिप्त वाक्यांशों को "मनुष्य के गढ़े हुए धर्मशास्त्रीय शब्द, मानवीय सिद्धान्त" और ऐसा ही कुछ कहना अच्छा लगता है। परन्तु उन्हें यह सिद्ध करना कठिन होगा कि बहुत निन्दित किए गए इन वाक्यांशों में से प्रत्येक में पवित्रशास्त्र के सीधे-सादे पदों का सार ईमानदारी से नहीं है; जिन्हें सुविधा के लिए, त्रिएकता शब्द की भाँति, धर्मविज्ञानियों ने एक ही शब्द में बाँध दिया है। और प्रत्येक वाक्यांश बहुत धनी है।

(ग) फिर अपने मन में यह बैठा लो कि उन पदों में अगम्य धन हैं जिन्हें मसीह इस क्षण निभा रहा है, जब वह परमेश्वर के दाहिने हाथ पर हमारे लिए जीवित है। वह एक ही समय में हमारा मध्यस्थ, हमारा सहायक, हमारा महायाजक, हमारे लिए मध्यस्थता की प्रार्थना करनेवाला, हमारा चरवाहा, हमारा अध्यक्ष, हमारा वैद्य, हमारा सेनापति, हमारा राजा, हमारा स्वामी, हमारा शीश, हमारा अग्रदूत, हमारा बड़ा भाई और हमारी आत्माओं का दूल्हा है। निःसन्देह जो जीवित मसीही धर्म के विषय में कुछ नहीं जानते उनके लिए ये पद व्यर्थ हैं। परन्तु जो विश्वास का जीवन जीते हैं और पहले परमेश्वर के राज्य की खोज करते हैं, उनके लिए प्रत्येक पद सोने के समान बहुमूल्य है।

(घ) फिर अपने मन में यह बैठा लो कि उन नामों और उपाधियों में अगम्य धन हैं जो पवित्रशास्त्र में मसीह के लिए प्रयोग की गई हैं। प्रत्येक सावधान बाइबल-पाठक जानता है कि उनकी संख्या बहुत बड़ी है, और मैं निश्चय ही उनमें से कुछ को चुनने से अधिक का दावा नहीं कर सकता। क्षण भर इन उपाधियों पर विचार करो: परमेश्वर का मेम्ना,—जीवन की रोटी,—जीवित जल का सोता,—जगत की ज्योति,—द्वार,—मार्ग,—दाखलता,—चट्टान,—कोने का पत्थर,—मसीही का वस्त्र,—मसीही की वेदी। मैं कहता हूँ, इन सब नामों पर विचार करो और देखो कि उनमें कितना कुछ समाया है। लापरवाह, सांसारिक मनुष्य के लिए ये केवल "शब्द" हैं, और कुछ नहीं; परन्तु सच्चे मसीही के लिए प्रत्येक उपाधि, यदि उसे खोलकर विस्तार से देखा जाए, तो अपने भीतर धन्य सत्य का भण्डार लिए हुए पाई जाएगी।

(ङ) अन्त में, अपने मन में यह बात बैठा लो कि मनुष्य के प्रति मसीह के मन के विशिष्ट गुणों, स्वभावों, प्रवृत्तियों और अभिप्रायों में, जैसे वे नए नियम में प्रकट किए गए हैं, अगम्य धन भरा है। उसमें पापियों के प्रति दया, प्रेम और करुणा का धन है,—शुद्ध करने, क्षमा करने, पाप मिटाने और पूर्ण उद्धार देने की सामर्थ्य का धन है,—उन सब को ग्रहण करने की तत्परता का धन है जो पश्चाताप और विश्वास के साथ उसके पास आते हैं,—अपने आत्मा के द्वारा कठोर से कठोर हृदयों और बुरे से बुरे चरित्रों को बदल देने की योग्यता का धन है,—सबसे निर्बल विश्वासी को सहने की कोमल धीरज का धन है,—बाहर और भीतर के हर शत्रु के होते हुए भी

अपने लोगों को अन्त तक सहायता देने की शक्ति का धन है,—उन सब के प्रति सहानुभूति का धन है जो गिराए गए हैं और अपने दुःख उसके पास लाते हैं,—और अन्तिम पर कम नहीं, उस महिमा का धन है जो प्रतिफल देगी, जब वह फिर आकर मृतकों को जिलाएगा और अपने लोगों को अपने राज्य में अपने साथ रहने के लिये इकट्ठा करेगा। इस धन का मूल्य कौन आँक सकता है? इस संसार के लोग उसे उदासीनता से देख सकते हैं, या तिरस्कार से मुँह फेर सकते हैं; परन्तु जो अपनी आत्माओं का मूल्य जानते हैं वे इससे अच्छा जानते हैं। वे एक स्वर से कहेंगे, "ऐसा कोई धन नहीं जो उस धन के समान हो जो मसीह में उसके लोगों के लिये रखा गया है।"

क्योंकि सबसे उत्तम बात यह है कि यह धन अगम्य है। यह ऐसी खान है जिसे चाहे कितने ही समय तक खोदा जाए, वह कभी खाली नहीं होती। यह ऐसा सोता है जिससे चाहे कितने ही लोग जल भरें, वह कभी नहीं सूखता। हमारे ऊपर आकाश का सूर्य 6,000 वर्ष से चमक रहा है, और पृथ्वी की सारी सतह को प्रकाश, जीवन, गर्मी और उपजाऊपन दे रहा है। यूरोप, एशिया, अफ्रीका या अमेरिका में कोई वृक्ष या फूल ऐसा नहीं जो सूर्य का ऋणी न हो। और फिर भी सूर्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी और ऋतु-दर-ऋतु चमकता चला जा रहा है, अटूट नियम से उदय और अस्त होता हुआ, सब को देता हुआ, किसी से कुछ न लेता हुआ, और साधारण दृष्टि में प्रकाश और ताप में वैसा ही जैसा सृष्टि के दिन था, मनुष्य-जाति का महान् सर्वसाधारण उपकारी। यदि कोई उदाहरण वास्तविकता के निकट पहुँच सकता है, तो ठीक ऐसा ही मसीह के विषय में है। वह अब भी सारी मानव-जाति के लिये "धार्मिकता का सूर्य" है। (मलाकी 4:2।) बीते दिनों में लाखों ने उससे पाया है, और उसकी ओर देखकर आराम से जीए और आराम से मरे। इस समय असंख्य लोग प्रतिदिन उससे दया, अनुग्रह, शान्ति, बल और सहायता की आपूर्ति पा रहे हैं, और "सारी परिपूर्णता" उसमें बसी हुई पाते हैं। और फिर भी, मुझे सन्देह नहीं, कि मनुष्य-जाति के लिये उसमें जो धन रखा है उसका आधा भाग भी पूर्णतः अज्ञात है! निश्चय ही प्रेरित का यह वाक्यांश कहना उचित था, "मसीह का अगम्य धन।"

अब मैं इस लेख को व्यावहारिक उपयोग के तीन शब्दों के साथ समाप्त करता हूँ। सुविधा के लिये मैं उन्हें प्रश्नों के रूप में रखूँगा, और इस पुस्तक के हर पाठक को आमन्त्रित करता हूँ कि उन्हें शान्ति से जाँचे, और उनका उत्तर देने का प्रयत्न करे।

(1) पहले तो मैं तुम से पूछता हूँ कि तुम अपने विषय में क्या सोचते हो? पौलुस अपने विषय में क्या सोचता था, यह तुम देख और सुन चुके हो। अब तुम्हारे अपने विषय में क्या विचार हैं? क्या तुमने वह महान् आधारभूत सत्य पा लिया है कि तुम पापी हो, परमेश्वर की दृष्टि में दोषी पापी?

आजकल अधिक शिक्षा के लिये पुकार ऊँची और लगातार है। अज्ञान की सर्वत्र निन्दा की जाती है। परन्तु विश्वास रखो, अपने विषय के अज्ञान के समान साधारण और हानिकारक कोई अज्ञान नहीं। हाँ, मनुष्य सब कलाएँ, विज्ञान, भाषाएँ, अर्थशास्त्र और राजनीति-कौशल जान सकते हैं, और फिर भी अपने हृदयों और परमेश्वर के सामने अपनी दशा के विषय में अत्यन्त अज्ञानी हो सकते हैं।

निश्चय जानो कि आत्म-ज्ञान स्वर्ग की ओर पहला पग है। परमेश्वर की अवर्णनीय सिद्धता और अपनी अपार अपूर्णता को जानना,—अपनी अवर्णनीय कमी और भ्रष्टता को देखना, उद्धार देनेवाले धर्म की वर्णमाला है। जितना अधिक सच्चा भीतरी प्रकाश हमारे पास होगा, उतने ही हम दीन और नम्र मन के होंगे, और उतना ही अधिक हम उस तुच्छ समझी जानेवाली वस्तु, यीशु मसीह के सुसमाचार का मूल्य समझेंगे। जो अपने और अपने कामों के विषय में सबसे बुरा सोचता है, वही शायद परमेश्वर के सामने सबसे अच्छा मसीही है। बहुतों के लिये अच्छा होता यदि वे रात-दिन यह सरल प्रार्थना करते,—"हे प्रभु, मुझे मेरा अपना स्वरूप दिखा।"

(2) दूसरे, तुम मसीह के सेवकों के विषय में क्या सोचते हो? चाहे यह प्रश्न कितना ही अजीब लगे, मुझे सचमुच विश्वास है कि यदि मनुष्य ईमानदारी से बोले तो उसका इसका उत्तर प्रायः उसके हृदय की दशा की उचित परख होता है।

ध्यान दो, मैं यह नहीं पूछ रहा कि तुम किसी आलसी, सांसारिक, असंगत पादरी के विषय में क्या सोचते हो,—सोए हुए पहरेदार और विश्वासघाती चरवाहे के विषय में। नहीं! मैं पूछता हूँ कि मसीह के उस विश्वासयोग्य सेवक के विषय में तुम क्या सोचते हो जो ईमानदारी से पाप को प्रकट करता है और तुम्हारे विवेक को चुभाता है? सोचकर उत्तर देना। आजकल बहुत से केवल उन्हीं सेवकों को पसन्द करते हैं जो मीठी-मीठी बातों की भविष्यद्वाणी करते हैं और उनके पापों को अकेला छोड़ देते हैं, जो उनके घमण्ड की चापलूसी करते हैं और उनकी बौद्धिक रुचि को बहलाते हैं, परन्तु कभी चेतावनी का नाद नहीं करते, और कभी उन्हें आनेवाले क्रोध के विषय में नहीं बताते। जब अहाब ने एलिय्याह को देखा, तो कहा, "हे मेरे शत्रु, क्या तू ने मुझे पा लिया है?" (1 राजाओं 21:20।) जब मीकायाह का नाम अहाब के सामने लिया गया, तो वह बोला, "मैं उससे बैर रखता हूँ, क्योंकि वह मेरे विषय में कभी कल्याण की नहीं, केवल विपत्ति की भविष्यद्वाणी करता है।" (1 राजाओं 22:8।) हाय, उन्नीसवीं शताब्दी में अहाब जैसे बहुत हैं! उन्हें ऐसी सेवकाई भाती है जो उन्हें बेचैन न करे और उन्हें अशान्त मन से घर न भेजे। तुम्हारा क्या हाल है? ओह, मेरी बात मानो, सबसे अच्छा मित्र वही है जो तुम्हें सबसे अधिक सत्य बताता है! जब मसीह के साक्षियों को चुप कराया जाता है, या सताया जाता है, और मनुष्य डाँटनेवाले से बैर रखते हैं, तो यह कलीसिया में बुरा चिह्न है। (यशायाह 29:21।) भविष्यद्वक्ता ने अमस्याह से जो गम्भीर वचन कहा वह यह था: "अब मैं जान गया हूँ कि परमेश्वर ने तुझे नाश करने का निश्चय किया है, क्योंकि तू ने यह काम किया और मेरी सम्मति नहीं मानी।" (2 इतिहास 25:16।)

(3) अन्त में, तुम स्वयं मसीह के विषय में क्या सोचते हो? क्या तुम्हारी दृष्टि में वह बड़ा है या छोटा? क्या तुम्हारे आँकने में वह पहले आता है या दूसरे? क्या वह अपनी कलीसिया, अपने सेवकों, अपने संस्कारों और अपनी विधियों से आगे है या पीछे? तुम्हारे हृदय और तुम्हारे मन की आँख में वह कहाँ है?

आख़िरकार यही तो सब प्रश्नों का प्रश्न है! क्षमा, शान्ति, विवेक का विश्राम, मृत्यु में आशा, स्वयं स्वर्ग,—सब कुछ हमारे इसी उत्तर पर टिका है। मसीह को जानना अनन्त जीवन है। मसीह के बिना होना परमेश्वर के बिना होना है। "जिस के पास पुत्र है, उस के पास जीवन है; और जिस के पास परमेश्वर का पुत्र नहीं, उस के पास जीवन भी नहीं है।" (1 यूहन्ना 5:12।) केवल सांसारिक शिक्षा के मित्र, सुधार और उन्नति के उत्साही समर्थक, तर्क, बुद्धि, मन और विज्ञान के पुजारी चाहे जो कहें, और संसार को सुधारने के लिए जो कुछ कर सकें करें। परन्तु यदि वे मनुष्य के पतन का ध्यान नहीं रखते, यदि उनकी योजनाओं में मसीह के लिए कोई स्थान नहीं है, तो वे पाएँगे कि उनका परिश्रम व्यर्थ है। मनुष्य जाति के हृदय में एक घोर रोग है, जो उनके सब प्रयासों को विफल और उनकी सब योजनाओं को निष्फल कर देगा, और वह रोग पाप है। आह, कि लोग मानव स्वभाव की भ्रष्टता को देखें और पहचानें, और यह भी कि मनुष्य को सुधारने के वे सब प्रयास निरर्थक हैं जो सुसमाचार की उपचार-व्यवस्था पर आधारित नहीं हैं! हाँ: संसार में पाप की महामारी है, और कोई जल उस महामारी को कभी चंगा नहीं करेगा, सिवाय उसके जो सब पापों के लिए खुले सोते से बहता है,—क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह से।

परन्तु अन्त में, घमण्ड कहाँ रहा? जैसा एक महान धर्मशास्त्री ने अपनी मृत्यु-शय्या पर कहा था, "हम सब केवल आधे जागे हुए हैं।" हम में से सबसे उत्तम मसीही भी अपने महिमामय उद्धारकर्ता को बहुत थोड़ा जानता है, विश्वास करना सीख लेने के बाद भी। हम धुँधले शीशे में से देखते हैं। हम उस में छिपी "अगम्य धन-सम्पत्ति" को नहीं समझते। जब हम दूसरे संसार में उसके स्वरूप में जागेंगे, तो हम चकित होंगे कि हम उसे इतना अधूरा जानते थे, और उससे इतना कम प्रेम करते थे। आओ, हम अभी उसे और अच्छी तरह जानने का यत्न करें, और उसके साथ और निकट सहभागिता में जीवन बिताएँ। ऐसे जीवन बिताने पर हमें मनुष्य-याजकों और पार्थिव पापस्वीकार-कक्षों की कोई आवश्यकता न लगेगी। हम अनुभव करेंगे, "मेरे पास सब कुछ है, वरन बहुतायत से है: मुझे और कुछ नहीं चाहिए। मसीह क्रूस पर मेरे लिए मरा,—मसीह परमेश्वर के दाहिने हाथ पर सदा मेरे लिए मध्यस्थता की प्रार्थना करता है,—मसीह विश्वास के द्वारा मेरे हृदय में बसा है,—मसीह शीघ्र फिर आकर मुझे और अपने सब लोगों को इकट्ठा करेगा कि फिर कभी अलग न हों, मसीह मेरे लिए पर्याप्त है। मसीह को पाकर मेरे पास 'अगम्य धन-सम्पत्ति' है।"

"जो भलाई मेरे पास है वह उसी के भण्डार से मिली है,

और जो बुराई है वह केवल वही है जिसे वह सर्वोत्तम समझता है;

उसे मित्र पाकर मैं धनी हूँ, चाहे और कुछ न हो,

और उसके बिना कंगाल हूँ, चाहे सब कुछ मेरा हो:

परिवर्तन आएँ, मैं ग्रहण करूँ या त्याग दूँ,

सन्तुष्ट हूँ जब तक मैं उसका हूँ, और वह मेरा है।"

"यहाँ, हाय! मैं उसके प्रेम को केवल आधा ही जानता हूँ,

उसे केवल आधा पहचानता, और केवल आधी आराधना करता हूँ;

परन्तु जब ऊपर के लोक में उससे भेंट होगी,

तो आशा है कि उससे और अधिक प्रेम करूँगा, उसकी और अधिक स्तुति करूँगा,

और दिव्य गायक-मण्डली के बीच अनुभव करूँगा और कहूँगा,

कि मैं पूरी रीति से उसका हूँ, और वह मेरा है।"

19. वर्तमान समय की आवश्यकताएँ*

"ऐसे मनुष्य जो समयों को समझते थे।"—1 इतिहास 12:32

ये वचन इस्साकार के गोत्र के विषय में उन दिनों लिखे गए थे जब दाऊद ने पहले-पहल इस्राएल पर राज्य करना आरम्भ किया था। ऐसा प्रतीत होता है कि शाऊल की दुःखद मृत्यु के बाद इस्राएल के कुछ गोत्र अनिश्चित थे कि क्या करें। "किस राजा के अधीन?"—यह उन दिनों फ़िलिस्तीन में दिन का प्रश्न था। लोग सन्देह में थे कि शाऊल के घराने से चिपके रहें या दाऊद को अपना राजा स्वीकार करें। कुछ पीछे हटे रहे, और अपना पक्ष प्रकट नहीं किया; दूसरे साहस से आगे आए और दाऊद के पक्ष में घोषणा की। इन अन्तिम लोगों में इस्साकार के बहुत से वंशज थे; और पवित्र आत्मा उनके विषय में विशेष प्रशंसा का एक वचन कहता है। वह कहता है, "वे ऐसे मनुष्य थे जो समयों को समझते थे।"

मुझे इसमें कोई सन्देह नहीं कि यह वाक्य, पवित्रशास्त्र के हर वाक्य की नाईं, हमारी शिक्षा के लिए लिखा गया था। इस्साकार के ये लोग हमारे सामने अनुकरण के लिए नमूने और पीछे चलने के लिए उदाहरण के रूप में रखे गए हैं; क्योंकि जिन समयों में हम जी रहे हैं उन्हें समझना, और यह जानना कि वे समय क्या माँगते हैं, अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात है। अहशवेरोश के दरबार के बुद्धिमान पुरुष "समयों को जानते थे।" (एस्तेर 1:13।) हमारे प्रभु यीशु मसीह ने यहूदियों को इस कारण दोषी ठहराया कि वे "अपने प्रभु के आने का समय नहीं जानते थे," और "समयों के चिह्नों को नहीं पहचानते थे।" (मत्ती 16:3; लूका 19:44।) आओ, हम सावधान रहें कि कहीं उसी पाप में न पड़ें। जो मनुष्य अज्ञानता से अपनी ही अँगीठी के पास बैठा रहकर अपने निजी कामों में लिपटा रहता है, और कलीसिया तथा संसार में जो हो रहा है उस पर जिसकी कोई सार्वजनिक दृष्टि नहीं, वह एक दयनीय देशभक्त और एक निम्न कोटि का मसीही है। हमारी बाइबल और हमारे अपने हृदय के बाद हमारा प्रभु चाहता है कि हम अपने ही समयों का अध्ययन करें।

अब इस निबन्ध में मेरा प्रस्ताव है कि यह विचार करूँ कि हमारे समय हम से क्या माँगते हैं। सब युगों में प्रकट रूप से मसीही कहलानेवालों के लिए अपने-अपने विशेष खतरे होते हैं, और इसलिए सब युग विशेष कर्तव्यों की ओर विशेष ध्यान की माँग करते हैं। मैं अपने पाठकों से निवेदन करता हूँ कि कुछ मिनट मुझे अपना मन दें, जब मैं उन्हें दिखाने का यत्न करूँ कि समय अंग्रेज़ मसीहियों से, और विशेषकर अंग्रेज़ कलीसिया के सदस्यों से, क्या माँगते हैं। पाँच बातें हैं जिन्हें मैं आपके सामने रखना चाहता हूँ, और मैं उनके विषय में स्पष्ट रूप से और बिना किसी संकोच के बोलूँगा। "यदि तुरही का शब्द साफ़ न हो तो कौन लड़ाई के लिए तैयारी करेगा?" (1 कुरिन्थियों 14:8।)

1. सबसे पहले और सबसे बढ़कर, समय हम से मसीही धर्म के सम्पूर्ण सत्य और बाइबल के ईश्वरीय अधिकार को साहस और अटलता से थामे रहने की माँग करते हैं

हमारा भाग्य एक ऐसे युग में पड़ा है जिसमें अविश्वास, संशयवाद और, मुझे भय है कि यह भी जोड़ना होगा, नास्तिकता की बाढ़ है। शायद सेल्सस, पोर्फ़िरी और जूलियन के दिनों से कभी प्रकाशित धर्म के सत्य पर इतना खुला और निर्लज्ज आक्रमण नहीं हुआ, और कभी वह आक्रमण इतनी चतुराई और विश्वसनीयता से नहीं किया गया। बिशप बटलर ने 1736 में जो शब्द लिखे थे वे हमारे ही दिनों पर अद्भुत रीति से लागू होते हैं:—"बहुत से लोगों ने यह मान लिया है कि मसीही धर्म जाँच-पड़ताल का विषय भी नहीं है; बल्कि अब अन्ततः यह पता चल गया है कि वह मनगढ़न्त है। और तदनुसार वे उसके साथ ऐसा व्यवहार करते हैं मानो वर्तमान युग में सब समझदार लोगों के बीच यह एक तय की हुई बात थी, और अब केवल इतना शेष रहा कि उसे हँसी और उपहास का मुख्य विषय बना दिया जाए, मानो इसलिए बदला लेते हुए कि उसने इतने समय से संसार के सुखों में बाधा डाली थी।" ("बटलर की समानता," भूमिका।) मैं प्रायः सोचता हूँ कि यदि भला बिशप 1879 में जीवित होता तो अब क्या कहता।

समीक्षाओं, पत्रिकाओं, समाचार-पत्रों, व्याख्यानों, निबन्धों और कभी-कभी तो उपदेशों में भी, अनेक चतुर लेखक मसीही विश्वास की नींव ही के विरुद्ध निरन्तर युद्ध छेड़े हुए हैं। तर्क-बुद्धि, विज्ञान, भूविज्ञान, मानवविज्ञान, आधुनिक खोजें और स्वतंत्र चिन्तन, सब के बारे में निडर होकर यह दावा किया जाता है कि वे उन्हीं के पक्ष में हैं। आजकल हमें बार-बार बताया जाता है कि कोई भी शिक्षित व्यक्ति अलौकिक धर्म पर, या बाइबल की पूर्ण प्रेरणा पर, या चमत्कारों की सम्भावना पर सचमुच विश्वास नहीं कर सकता। त्रिएकता, मसीह की ईश्वरता, पवित्र आत्मा के व्यक्तित्व, प्रायश्चित, विश्रामदिन के दायित्व, प्रार्थना की आवश्यकता और प्रभावशीलता, शैतान के अस्तित्व और भावी दण्ड की वास्तविकता जैसे प्राचीन सिद्धान्तों को चुपचाप पुराने पंचांगों की तरह निकम्मा समझकर अलमारी में रख दिया जाता है, या कूड़ा-करकट मानकर तिरस्कारपूर्वक फेंक दिया जाता है! और यह सब ऐसी चतुराई से, निष्पक्षता और उदारता का ऐसा दिखावा करके, और मानव स्वभाव की क्षमता और उच्चता की ऐसी प्रशंसा के साथ किया जाता है कि अस्थिर मसीहियों की भीड़ की भीड़ मानो बाढ़ में बह जाती है, और यदि वे विश्वास का जहाज़ पूरी तरह नहीं डुबो बैठते, तो भी कुछ-कुछ डगमगा अवश्य जाते हैं।

अविश्वास की इस महामारी के होने से हमें क्षण भर के लिए भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए। यह तो नए वेश में पुराना शत्रु है, नए रूप में पुराना रोग है। जिस दिन आदम और हव्वा गिरे, उसी दिन से शैतान मनुष्यों को परमेश्वर पर विश्वास न करने के लिए बहकाता आया है, और सीधे या घुमाकर यही कहता आया है, "तुम निश्चय न मरोगे, चाहे तुम विश्वास न भी करो।" विशेषकर अन्तिम दिनों में अविश्वास की भरपूर फसल की आशा रखने के लिए हमारे पास पवित्रशास्त्र की साक्षी है:—"जब मनुष्य का पुत्र आएगा, तो क्या वह पृथ्वी पर विश्वास पाएगा?"—"दुष्ट और बहकानेवाले बिगड़ते चले जाएँगे।"—"अन्तिम दिनों में ठट्ठा करनेवाले आएँगे।" (लूका 18:8; 2 तीमुथियुस 3:13; 2 पतरस 3:3।) यहाँ इंग्लैंड में सन्देहवाद उसी अधूरे पोपवाद और अन्धविश्वास की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है, जिसकी बहुत से बुद्धिमान पुरुषों ने बहुत पहले से भविष्यवाणी की थी और जिसकी वे आशा रखते थे। यह ठीक वही झूलता हुआ लोलक है जिसकी प्रतीक्षा मानव स्वभाव के दूरदर्शी अध्येता कर रहे थे; और वह आ गया है।

परन्तु जैसे मैं तुमसे कहता हूँ कि इस समय के व्यापक सन्देहवाद से चकित न हो, वैसे ही मुझे तुमसे यह भी आग्रह करना है कि इससे अपने मन में विचलित न हो, और अपनी स्थिरता से न डिगो। चिन्ता का कोई वास्तविक कारण नहीं है। परमेश्वर का सन्दूक संकट में नहीं है, चाहे बैल उसे हिलाते हुए प्रतीत हों। मसीही विश्वास ह्यूम, हॉब्स और टिंडल के आक्रमणों से बचा रहा है,—कॉलिन्स, वूल्सटन, बोलिंगब्रोक और चब के आक्रमणों से,—वोल्टेयर, पेन और होलियोक के आक्रमणों से भी। इन लोगों ने अपने दिनों में बड़ा शोर मचाया, और दुर्बल लोगों को डराया, परन्तु उनका प्रभाव उन निठल्ले यात्रियों से अधिक न था जो मिस्र के विशाल पिरामिड पर अपने नाम खुरचकर छोड़ जाते हैं। निश्चय जानो, मसीही विश्वास इसी प्रकार इस समय के चतुर लेखकों के आक्रमणों से भी बचा रहेगा। प्रकाशन के विरुद्ध अनेक आधुनिक आपत्तियों की चौंकानेवाली नवीनता के कारण वे निस्सन्देह अपने वास्तविक भार से अधिक भारी प्रतीत होती हैं। परन्तु इससे यह नहीं निकलता कि कठिन गाँठें इसलिए नहीं खुल सकतीं कि हमारी उँगलियाँ उन्हें नहीं खोल सकतीं, या भारी कठिनाइयों की व्याख्या इसलिए नहीं हो सकती कि हमारी आँखें उनके आर-पार नहीं देख सकतीं या उन्हें समझा नहीं सकतीं। जब तुम किसी सन्देहवादी को उत्तर न दे सको, तो और प्रकाश की प्रतीक्षा करने में सन्तुष्ट रहो; परन्तु किसी महान सिद्धान्त को कभी न छोड़ो। फैराडे ने कहा था कि धर्म में, जैसे अनेक वैज्ञानिक प्रश्नों में, "सर्वोच्च दर्शन प्रायः निर्णय को विवेकपूर्वक स्थगित रखना होता है।" जो विश्वास करता है वह उतावली नहीं करेगा: वह प्रतीक्षा करने का सामर्थ्य रखता है।

जब सन्देहवादी और अविश्वासी जो कुछ कह सकते हैं कह चुके, तब भी हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि तीन बड़े और स्पष्ट तथ्य हैं जिन्हें वे कभी झुठला नहीं सके; और मुझे विश्वास है कि वे न कभी झुठला सकते हैं, न कभी झुठलाएँगे। मैं संक्षेप में बताता हूँ कि वे क्या हैं। ये बहुत सरल तथ्य हैं, और कोई भी साधारण मनुष्य उन्हें समझ सकता है।

(क) पहला तथ्य स्वयं यीशु मसीह हैं। यदि मसीही विश्वास केवल मनुष्य का गढ़ा हुआ है, और बाइबल परमेश्वर की ओर से नहीं है, तो अविश्वासी यीशु मसीह की व्याख्या कैसे करेंगे? इतिहास में उनके अस्तित्व को वे नकार नहीं सकते। यह कैसे हुआ कि बिना बल या घूस के, बिना शस्त्र या धन के, उन्होंने संसार पर इतनी गहरी छाप छोड़ी, जैसी उन्होंने निश्चय ही छोड़ी है? वे कौन थे? वे क्या थे? वे कहाँ से आए? ऐसा कैसे हुआ कि ऐतिहासिक काल के आरम्भ से लेकर आज तक न उनसे पहले और न उनके बाद कभी कोई उनके समान हुआ? वे इसकी व्याख्या नहीं कर सकते। प्रकट किए हुए धर्म के उस महान मूल सिद्धान्त को छोड़ और कुछ इसकी व्याख्या नहीं कर सकता कि यीशु मसीह परमेश्वर हैं, और उनका सुसमाचार पूरी तरह सत्य है।

(ख) दूसरा तथ्य स्वयं बाइबल है। यदि मसीही विश्वास केवल मनुष्य का आविष्कार है, और बाइबल का अधिकार किसी भी अन्य अप्रेरित पुस्तक से अधिक नहीं, तो यह पुस्तक ऐसी क्यों है जैसी वह है? यह कैसे हुआ कि एक ऐसी पुस्तक जो पृथ्वी के एक दूरवर्ती कोने में कुछ यहूदियों द्वारा लिखी गई,—जो दूर-दूर के समयों में लिखी गई, और लेखकों के बीच किसी मेल-जोल या साँठ-गाँठ के बिना,—जो उस जाति के लोगों ने लिखी जिसने यूनानियों और रोमियों की तुलना में साहित्य के लिए कुछ नहीं किया,—यह पुस्तक अकेली खड़ी है, और परमेश्वर के उच्च विचारों में, मनुष्य के सच्चे चित्रण में, विचारों की गम्भीरता में, सिद्धान्तों की भव्यता में और नैतिकता की पवित्रता में कोई भी चीज़ इसके निकट तक नहीं पहुँचती? इस पुस्तक के विषय में, जो इतनी गहरी, इतनी सरल, इतनी बुद्धिमत्तापूर्ण और दोषों से इतनी मुक्त है, अविश्वासी क्या स्पष्टीकरण दे सकता है? वह अपने सिद्धान्तों के आधार पर इसके अस्तित्व और स्वरूप की व्याख्या नहीं कर सकता। केवल हम ही यह कर सकते हैं जो मानते हैं कि यह पुस्तक अलौकिक है और परमेश्वर की ओर से है।

(ग) तीसरा तथ्य वह प्रभाव है जो मसीही धर्म ने संसार पर डाला है। यदि मसीही धर्म केवल मनुष्य की गढ़ी हुई बात है, कोई अलौकिक, ईश्वरीय प्रकाशन नहीं, तो फिर उसने मानव-जाति की दशा में ऐसा पूर्ण परिवर्तन कैसे कर दिया? कोई भी पढ़ा-लिखा मनुष्य जानता है कि मसीही धर्म के बोए जाने से पहले संसार की जो नैतिक दशा थी और उसके जड़ पकड़ लेने के बाद जो हुई, उन दोनों में उतना ही अन्तर है जितना रात और दिन में, स्वर्ग के राज्य और शैतान के राज्य में। इसी क्षण मैं किसी को भी चुनौती देता हूँ कि वह संसार के मानचित्र को देखे, और जिन देशों में लोग मसीही हैं उनकी तुलना उन देशों से करे जहाँ लोग मसीही नहीं हैं, और फिर यह कहने का साहस करे कि ये देश उजियाले और अंधियारे, श्वेत और श्याम की तरह भिन्न नहीं हैं। कोई भी नास्तिक अपने सिद्धान्तों के आधार पर इसकी व्याख्या कैसे कर सकता है? वह कर ही नहीं सकता। इसकी व्याख्या केवल हम कर सकते हैं, जो विश्वास करते हैं कि मसीही धर्म परमेश्वर की ओर से आया है और संसार में एकमात्र ईश्वरीय धर्म है।

जब कभी अविश्वास की बढ़ती देखकर तुम्हें घबराहट होने लगे, तो मेरे बताए इन तीन तथ्यों को देखो और अपने भय को दूर कर दो। इन तीन तथ्यों की प्राचीर के पीछे साहसपूर्वक अपना स्थान ले लो, और तुम आधुनिक संशयवादियों के बड़े से बड़े प्रयासों को निश्चिन्त होकर चुनौती दे सकते हो। वे तुमसे सैकड़ों प्रश्न पूछ सकते हैं जिनका उत्तर तुम्हारे पास न हो, और पाठ-भेदों, प्रेरणा, भू-विज्ञान, मनुष्य की उत्पत्ति या संसार की आयु के विषय में ऐसी चतुराई-भरी समस्याएँ उठा सकते हैं जिन्हें तुम सुलझा न सको। वे अपने उग्र अनुमानों और सिद्धान्तों से तुम्हें खिझा और सता सकते हैं, जिनकी भूल तुम उस समय प्रमाणित तो न कर सको, पर अनुभव अवश्य करो। परन्तु शान्त रहो और मत डरो। मेरे बताए तीनों बड़े तथ्यों को स्मरण रखो, और संशयवादियों को साहसपूर्वक चुनौती दो कि वे उनकी व्याख्या कर दिखाएँ। इसमें सन्देह नहीं कि मसीही धर्म की कठिनाइयाँ बड़ी हैं; परन्तु निश्चय जानो, अविश्वास की कठिनाइयों के आगे वे कुछ भी नहीं हैं।

II. दूसरी बात यह कि समय की माँग है कि हम मसीही सिद्धान्तों के विषय में स्पष्ट और निश्चित दृष्टिकोण रखें

मैं इस धारणा को दबा नहीं सकता कि उन्नीसवीं शताब्दी की मसीही कहलानेवाली कलीसिया को जितनी हानि बाहर के संशयवादियों और अविश्वासियों से पहुँच रही है, उतनी ही भीतर सिद्धान्तों के विषय में ढिलाई और अस्पष्टता से पहुँच रही है। आजकल असंख्य मसीही कहलानेवाले लोग उन बातों में भेद करने में बिलकुल असमर्थ दिखाई देते हैं जो एक-दूसरे से भिन्न हैं। रंग-अंधता से पीड़ित लोगों की तरह वे यह पहचानने में अक्षम हैं कि क्या सच है और क्या झूठ, क्या खरा है और क्या खोटा। यदि कोई धर्म-प्रचारक केवल चतुर, वाक्पटु और उत्साही हो, तो वे समझते प्रतीत होते हैं कि वह ठीक ही है, चाहे उसके उपदेश कितने ही विचित्र और बेमेल क्यों न हों। लगता है उनमें आत्मिक समझ है ही नहीं, और वे भ्रम को पहचान नहीं पाते। पोप-मत हो या प्रोटेस्टेंट मत, प्रायश्चित हो या कोई प्रायश्चित न हो, व्यक्तित्व रखनेवाला पवित्र आत्मा हो या कोई पवित्र आत्मा न हो, भविष्य का दण्ड हो या कोई दण्ड न हो, उच्च कलीसिया हो, निम्न कलीसिया हो या व्यापक कलीसिया, त्रिएकतावाद हो, एरियसवाद हो या एकेश्वरवाद, उन्हें कुछ भी अखरता नहीं; वे सब कुछ निगल सकते हैं, चाहे पचा न सकें! कल्पित उदारता और प्रेम में बहकर वे मानो सोचते हैं कि सब सही हैं और कोई गलत नहीं, हर पादरी खरा है और कोई खोटा नहीं, सबका उद्धार होगा और कोई नाश न होगा। उनका धर्म नकारात्मक बातों से बना है; और उनके विषय में केवल यही बात सकारात्मक है कि उन्हें स्पष्टता से अरुचि है, और वे समझते हैं कि सब उग्र, निश्चित और दृढ़ मत बहुत बुरे और बहुत गलत हैं!

ये लोग मानो किसी धुन्ध या कोहरे में जीते हैं। उन्हें कुछ भी साफ़ दिखाई नहीं देता, और वे नहीं जानते कि वे क्या विश्वास करते हैं। उन्होंने सुसमाचार की किसी भी बड़ी बात पर अपना मन स्थिर नहीं किया है, और सब विचार-सम्प्रदायों के सम्मानार्थ सदस्य बने रहकर सन्तुष्ट प्रतीत होते हैं। प्राण देकर भी वे यह नहीं बता सकते कि धर्मी ठहराया जाने, नया जन्म, पवित्रीकरण, प्रभु-भोज, बपतिस्मा, विश्वास, मन-परिवर्तन, प्रेरणा या भविष्य की दशा के विषय में सत्य क्या है, ऐसा वे सोचते हैं। उन्हें विवाद का रोग-जैसा भय खाए जाता है और दलबन्दी की भावना से अज्ञानभरी घृणा है; फिर भी वे वास्तव में यह परिभाषित नहीं कर सकते कि इन शब्दों से उनका अर्थ क्या है। तुम केवल इतना ही समझ पाओगे कि वे उत्साह, चतुराई और उदारता की प्रशंसा करते हैं, और मान नहीं सकते कि कोई चतुर, उत्साही, उदार मनुष्य कभी भूल में हो सकता है! इस प्रकार वे अनिश्चय में जीते हैं; और बहुधा अनिश्चय की अवस्था में ही कब्र की ओर बहते चले जाते हैं, अपने धर्म में कोई शान्ति पाए बिना, और मुझे भय है कि प्रायः बिना किसी आशा के।

आत्मा की इस हड्डी-रहित, नस-रहित, जेलीफ़िश-जैसी दशा का कारण ढूँढना कठिन नहीं है। पहली बात यह कि मनुष्य का हृदय स्वभाव से ही धर्म के विषय में अंधकार में है, उसे सत्य की कोई सहज समझ नहीं है, और उसे सचमुच शिक्षा और ज्योति की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त, अधिकांश मनुष्यों का स्वाभाविक हृदय धर्म में परिश्रम से घृणा करता है और धैर्यपूर्वक कष्ट उठाकर खोज करने को हार्दिक रूप से नापसन्द करता है। सबसे बढ़कर, स्वाभाविक हृदय प्रायः दूसरों की प्रशंसा चाहता है, टकराव से कतराता है, और उदार तथा दयालु समझे जाने को प्रिय मानता है। इसका सारा परिणाम यह है कि एक प्रकार की व्यापक धार्मिक "अज्ञेयवादिता" असंख्य लोगों को, और विशेषकर जवानों को, बिलकुल रास आती है। वे सारे विवादित प्रश्नों को कूड़ा समझकर एक ओर सरका देने में सन्तुष्ट रहते हैं, और यदि तुम उन पर अनिर्णय का दोष लगाओ तो वे कहेंगे, "मैं विवादों को समझने का दावा नहीं करता; मैं विवादित बातों की जाँच करने से इनकार करता हूँ। मेरा अनुमान है कि अन्त में सब एक ही बात है।" कौन नहीं जानता कि ऐसे लोग हर कहीं भरे पड़े हैं?

अब मैं इस लेख के सब पाठकों से विनती करता हूँ कि वे धर्म के विषय में इस अनिश्चित मनोदशा से सावधान रहें। यह वह महामारी है जो अंधकार में चलती है, और वह विनाश है जो दोपहर में मार डालता है। यह प्राण की एक आलसी और निठल्ली दशा है, जो निस्सन्देह मनुष्यों को सोचने और जाँच-पड़ताल करने के परिश्रम से बचा देती है; परन्तु प्राण की इस दशा के लिये न बाइबल में कोई आधार है, और न इंग्लैंड की कलीसिया के अनुच्छेदों या प्रार्थना-पुस्तक में। अपने ही प्राण के हित के लिये साहस करके यह निश्चय कीजिए कि आप क्या विश्वास करते हैं, और सत्य और भ्रम के विषय में स्पष्ट और निश्चित विचार रखने का साहस कीजिए। निर्णायक सैद्धान्तिक मत रखने से कभी, कभी न डरिए; और न मनुष्य का भय, न दलबन्दी करनेवाला, संकीर्ण या विवादी समझे जाने का कोई रोगग्रस्त डर, आपको रक्तहीन, अस्थिहीन, स्वादहीन, रंगहीन, गुनगुने, सिद्धान्त-रहित मसीही धर्म पर सन्तुष्ट होकर बैठे रहने दे।

मेरी बात पर ध्यान दीजिए। यदि आप इन दिनों में भलाई करना चाहते हैं, तो अनिश्चय को त्याग दीजिए, और स्पष्ट, तीखी रेखाओंवाला, सैद्धान्तिक धर्म अपना लीजिए। यदि आप थोड़ा ही विश्वास करेंगे, तो जिनकी भलाई करने का आप यत्न करते हैं वे कुछ भी विश्वास नहीं करेंगे। मसीही धर्म की विजयें, जहाँ-जहाँ भी प्राप्त हुई हैं, स्पष्ट सैद्धान्तिक धर्मविज्ञान से प्राप्त हुई हैं; मनुष्यों को मसीह की प्रतिनिधिक मृत्यु और बलिदान की बात खुलकर बताने से; उन्हें क्रूस पर मसीह का स्थानापन्न होना और उसका बहुमूल्य लहू दिखाने से; उन्हें विश्वास से धर्मी ठहराया जाना सिखाने और क्रूस पर चढ़ाए गए उद्धारकर्ता पर विश्वास करने को कहने से; पाप के द्वारा विनाश, मसीह के द्वारा छुटकारा, आत्मा के द्वारा नया जन्म का प्रचार करने से; पीतल के साँप को ऊँचे पर उठाने से; मनुष्यों से यह कहने से कि देखो और जीओ,—विश्वास करो, मन फिराओ और परिवर्तित हो जाओ। यही,—यही वह एकमात्र शिक्षा है जिसे परमेश्वर ने अठारह शताब्दियों से सफलता देकर आदर दिया है, और आज भी स्वदेश और विदेश दोनों में आदर दे रहा है। जो चतुर लोग व्यापक और सिद्धान्त-रहित धर्मविज्ञान के पक्षधर हैं,—जो गम्भीरता, सच्चाई और ठंडी नैतिकता के सुसमाचार के प्रचारक हैं,—वे, मैं कहता हूँ, आज हमें कोई ऐसा अंग्रेज़ गाँव, या धर्मक्षेत्र, या नगर, या कस्बा, या जिला दिखाएँ जिसमें उनके सिद्धान्तों के द्वारा "मत-सिद्धान्त" के बिना सुसमाचार का प्रचार हुआ हो। वे ऐसा नहीं कर सकते, और कभी न कर सकेंगे। स्पष्ट सिद्धान्त के बिना मसीही धर्म शक्तिहीन वस्तु है। कुछ मनों को वह सुन्दर लग सकता है, परन्तु वह निःसन्तान और बाँझ है। तथ्यों से बचकर निकलने का कोई मार्ग नहीं। पृथ्वी पर जो भलाई होती है वह तुलना में छोटी हो सकती है। बुराई बढ़ सकती है, और अज्ञानी अधीरता बुड़बुड़ा सकती है और चिल्ला सकती है कि मसीही धर्म विफल हो गया है। परन्तु निश्चय जानिए, यदि हम "भलाई" करना और संसार को हिला देना चाहते हैं, तो हमें प्राचीन प्रेरितीय शस्त्रों से लड़ना होगा, और "मत-सिद्धान्त" से चिपके रहना होगा। कोई मत-सिद्धान्त नहीं, तो कोई फल नहीं! कोई निश्चित इंजीली सिद्धान्त नहीं, तो कोई सुसमाचार-प्रचार नहीं!

एक बार फिर मेरी बात पर ध्यान दीजिए। जिन मनुष्यों ने इंग्लैंड की कलीसिया के लिये सबसे अधिक किया है, और अपने समय और पीढ़ी पर सबसे गहरी छाप छोड़ी है, वे सदा सबसे निर्णायक और स्पष्ट सैद्धान्तिक विचारोंवाले मनुष्य रहे हैं। यह साहसी, निर्णायक, खुलकर बोलनेवाला मनुष्य ही है, जैसे कैपल मोलिन्यूक्स, या हमारे महान प्राचीन प्रोटेस्टेंट योद्धा ह्यू मैकनील, जो गहरा प्रभाव डालता है, और लोगों को सोचने पर विवश करता है, और "संसार को उलट-पुलट कर देता है"। प्रेरितीय युगों में "मत-सिद्धान्त" ही था जिसने मूर्तिपूजकों के मन्दिर खाली कर दिए, और यूनान और रोम को हिला दिया। "मत-सिद्धान्त" ही था जिसने धर्म-सुधार के समय मसीही जगत को उसकी नींद से जगाया, और पोप से उसकी प्रजा का एक तिहाई भाग छीन लिया। "मत-सिद्धान्त" ही था जिसने 100 वर्ष पहले व्हिटफील्ड, वेस्ली, वेन और रोमेन के दिनों में इंग्लैंड की कलीसिया को पुनर्जीवित किया, और हमारे मरते हुए मसीही धर्म को धधकती ज्वाला बनाकर फूँक दिया। इसी क्षण भी वह "मत-सिद्धान्त" ही है जो हर सफल मिशन को सामर्थ्य देता है, चाहे स्वदेश में हो या विदेश में। वह सिद्धान्त है,—सिद्धान्त, स्पष्ट गूँजता हुआ सिद्धान्त,—जो यरीहो के मेढ़े के सींगों के समान शैतान और पाप के विरोध को गिरा देता है। आइए हम निर्णायक सैद्धान्तिक विचारों से चिपके रहें, चाहे इन दिनों में कुछ लोग कुछ भी कहना चाहें, और हम अपने लिये भला करेंगे, दूसरों के लिये भला करेंगे, इंग्लैंड की कलीसिया के लिये भला करेंगे, और संसार में मसीह के उद्देश्य के लिये भला करेंगे।

3. तीसरे स्थान पर, इन दिनों की माँग है कि हम रोमन कैथोलिक मत के पवित्रशास्त्र-विरोधी और प्राण-नाशक स्वरूप का अधिक जागृत और जीवित बोध रखें।

यह एक पीड़ादायक विषय है; परन्तु इसमें कुछ स्पष्ट बोलना अनिवार्य है।

इस मामले के तथ्य बहुत सरल हैं। कोई भी समझदार देखनेवाला यह देखे बिना नहीं रह सकता कि पिछले चालीस वर्षों में रोमन कैथोलिक मत के विषय में इंग्लैंड में जनभावना का स्वर बहुत बदल गया है। फादर ओकले, जो प्रसिद्ध धर्मत्यागी हैं और कार्डिनल न्यूमैन के साथी हैं, ने कॉन्टेम्परेरी रिव्यू के एक हाल के अंक में यह बात विजयोल्लास से कही है। और मुझे यह कहते हुए खेद होता है कि मेरे विचार में वे सच कहते हैं। अब पोप-मत के प्रति वह सामान्य अरुचि, भय और घृणा नहीं रही जो कभी इस राज्य में लगभग सर्वव्यापी थी। प्रोटेस्टेंट मत के विषय में पुरानी ब्रिटिश भावना की धार कुंद और मंद पड़ती दिखती है। कुछ लोग कहते हैं कि वे सब धार्मिक विवादों से थक चुके हैं, और शान्ति के लिये परमेश्वर के सत्य का बलिदान करने को तैयार हैं।—कुछ लोग रोमन कैथोलिक मत को केवल अंग्रेज़ों के अनेक धार्मिक रूपों में से एक मानते हैं, जो न दूसरों से बुरा है न अच्छा।—कुछ हमें समझाने का यत्न करते हैं कि रोमन कैथोलिक मत बदल गया है, और उतना बुरा नहीं रहा जितना पहले था।—कुछ लोग साहसपूर्वक प्रोटेस्टेंटों के दोषों की ओर संकेत करते हैं, और ऊँचे स्वर में कहते हैं कि रोमन कैथोलिक भी हमारे ही समान भले हैं।—कुछ लोग यह मानना श्रेष्ठ और उदार समझते हैं कि जो कोई अपने धर्म-विश्वास के विषय में गम्भीर है, उसे गलत समझने का हमें कोई अधिकार नहीं।—और फिर भी ये दो बड़े ऐतिहासिक तथ्य, (क) कि 400 वर्ष पहले पोप-मत के अधीन इंग्लैंड में अज्ञान, अनैतिकता और अन्धविश्वास का एकछत्र राज्य था, (ख) कि धर्म-सुधार वह सबसे बड़ा आशीर्वाद था जो परमेश्वर ने इस देश को कभी दिया,—ये दोनों ऐसे तथ्य हैं जिन पर पचास वर्ष पहले पोप-मत माननेवाले के सिवाय किसी ने विवाद करने का विचार तक नहीं किया था! आज के दिन हाय, इन्हें भुला देना सुविधाजनक और फैशन की बात हो गई है! संक्षेप में, जिस गति से हम जा रहे हैं, यदि शीघ्र ही यह प्रस्ताव आए कि उत्तराधिकार अधिनियम को रद्द कर दिया जाए, और इंग्लैंड का मुकुट किसी पोप-मत माननेवाले को पहनने दिया जाए, तो मुझे आश्चर्य न होगा।

भावना के इस शोकजनक परिवर्तन के कारणों को खोजना कठिन नहीं है।

(क) यह आंशिक रूप से रोमी कलीसिया के अपने अथक उत्साह से उत्पन्न होता है। उसके दूत कभी ऊंघते या सोते नहीं। वे एक जन को अपने मत में लाने के लिये जल और थल में फिरते हैं। वे मिस्र के मेंढकों की नाईं हर कहीं घुस आते हैं, और अपने पक्ष को बढ़ाने के लिये राजमहल हो या कंगालों का आश्रम, कोई कसर नहीं छोड़ते। (ख) इंग्लैंड की कलीसिया में रीतिवादी दल की कार्यवाहियों से इसे बहुत अधिक बढ़ावा मिला है। उस उद्यमी और सक्रिय दल ने बहुत वर्षों से धर्म-सुधार की निन्दा की है और प्रोटेस्टेंट मत की हँसी उड़ाई है, और उसे इसमें दुःख की हद तक सफलता मिली है। उसने लगातार झूठी बातें फैलाकर कलीसिया के बहुत से सदस्यों के मन को भ्रष्ट किया है, उन पर खमीर चढ़ाया है, उन्हें अन्धा किया है और उनमें विष घोल दिया है। उसने धीरे-धीरे लोगों को रोमी मत के हर विशेष सिद्धान्त और रीति से परिचित करा दिया है—प्रभु-भोज में वास्तविक उपस्थिति, मिस्सा, कान में पाप-स्वीकार और याजकीय पाप-क्षमा, सेवकाई का याजकीय स्वरूप, मठ-प्रणाली, और नाटकीय, इन्द्रिय-सुखद, दिखावटी सार्वजनिक आराधना;—और स्वाभाविक परिणाम यह है कि बहुत से सीधे-सादे लोग सच्चे और पूरे पोपवाद में कोई बड़ी हानि नहीं देखते! और अन्तिम बात, पर कम महत्त्व की नहीं, यह कि हमारे समय की झूठी उदारता रोम की ओर झुकाव को बढ़ावा देती है। अब यह कहना फैशन बन गया है कि सब सम्प्रदाय बराबर हों, राज्य का धर्म से कोई सम्बन्ध न हो, सब मतों को समान कृपा और आदर की दृष्टि से देखा जाए, और चाहे बौद्ध मत हो, इस्लाम हो या मसीही मत, सब प्रकार के धर्मों की तह में कुछ सामान्य सत्य है! इसका परिणाम यह है कि असंख्य अज्ञानी लोग सोचने लगते हैं कि पोप के अनुयायियों की शिक्षाओं में कोई विशेष खतरा नहीं, जैसे मेथोडिस्टों, इंडिपेंडेंटों, प्रेस्बिटेरियनों या बैपटिस्टों की शिक्षाओं में नहीं है—और हमें रोमी मत को छोड़ देना चाहिए और उसके पवित्रशास्त्र-विरुद्ध और मसीह का अनादर करनेवाले स्वरूप को कभी उजागर नहीं करना चाहिए।

मैं निडर होकर कहता हूँ कि भावना के इस बदले हुए स्वर के परिणाम अत्यन्त विनाशकारी और हानिकर होंगे, यदि इसे रोका न जा सके। पोपवाद को एक बार फिर इंग्लैंड की गर्दन पर पाँव रखने दो, तो हमारी सारी राष्ट्रीय महानता का अन्त हो जाएगा। परमेश्वर हमें त्याग देगा और हम पुर्तगाल और स्पेन के स्तर तक गिर जाएंगे। जब बाइबल पढ़ने को हतोत्साहित किया जाएगा,—निजी निर्णय को वर्जित किया जाएगा,—मसीह के क्रूस तक पहुँचने का मार्ग संकरा या बन्द कर दिया जाएगा,—याजक-छल फिर स्थापित हो जाएगा,—हर पल्ली में कान में पाप-स्वीकार चलेगा,—देश भर में मठ और ननों के आश्रम फैल जाएंगे,—स्त्रियाँ हर कहीं पादरियों के चरणों में दासों और सेवकों की नाईं घुटने टेकेंगी,—पुरुष सारा विश्वास त्यागकर सन्देहवादी बन जाएंगे,—स्कूल और कॉलेज येसुइटवाद के पाठशाला बन जाएंगे,—स्वतन्त्र विचार की निन्दा की जाएगी और उसे श्राप दिया जाएगा,—तो इन सब बातों के साथ ब्रिटिश चरित्र की विशिष्ट पुरुषार्थ और स्वतन्त्रता धीरे-धीरे घटेगी, मुरझाएगी, सूख जाएगी और नष्ट हो जाएगी; और इंग्लैंड बरबाद हो जाएगा। और ये सब बातें, मेरा दृढ़ विश्वास है, आकर रहेंगी, जब तक कि प्रोटेस्टेंट मत के मूल्य के विषय में पुरानी भावना फिर जगाई न जाए।

मैं इस लेख के सब पाठकों को चिताता हूँ, और विशेष रूप से अपने संगी कलीसिया-जनों को, कि समय की माँग है कि तुम जाग उठो और सचेत रहो। रोमी मत से सावधान रहो, और ऐसी किसी भी धार्मिक शिक्षा से सावधान रहो जो जान-बूझकर या अनजाने में उसका मार्ग तैयार करती है। मैं तुमसे विनती करता हूँ कि इस दुःखद तथ्य को समझो कि इस देश का प्रोटेस्टेंट मत धीरे-धीरे घटता जा रहा है, और मैं तुमसे, मसीही और देशभक्त होने के नाते, आग्रह करता हूँ कि अंग्रेज़ी धर्म-सुधार की आशीषों को भूलने की बढ़ती प्रवृत्ति का विरोध करो।

मसीह के लिये, इंग्लैंड की कलीसिया के लिये, हमारे देश के लिये, हमारे बच्चों के लिये, हम रोमी अज्ञान, अन्धविश्वास, याजक-छल और अनैतिकता में लौट न जाएं। हमारे पूर्वजों ने बहुत पहले, सदियों तक, पोपवाद को आज़माया था, और अन्त में घृणा और क्रोध के साथ उसे उतार फेंका। हम घड़ी की सुइयाँ पीछे न घुमाएं और मिस्र को न लौटें। जब तक रोम अपने भ्रम का त्याग न करे और मसीह से मेल न कर ले, तब तक रोम से हमारी कोई शान्ति न हो। जब तक रोम ऐसा न करे, तब तक पश्चिमी कलीसियाओं के जिस पुनर्मिलन की डींग कुछ लोग मारते हैं और हमारे सामने रखते हैं, वह मसीही मत का अपमान है।

अपनी बाइबल पढ़ो और अपने मन को पवित्रशास्त्र के तर्कों से भर लो। बाइबल पढ़नेवाले सामान्य जन भ्रम के विरुद्ध किसी राष्ट्र की सबसे पक्की रक्षा हैं। यदि अंग्रेज़ सामान्य जन केवल अपना कर्तव्य निभाएं, तो मुझे अंग्रेज़ी प्रोटेस्टेंट मत के विषय में कोई भय नहीं। अपने उनतालीस अनुच्छेद और "ज्वेल की क्षमा-याचना" पढ़ो, और देखो कि वे उपेक्षित दस्तावेज़ रोमी सिद्धान्तों के विषय में क्या कहते हैं। हम पादरियों का दोष, मुझे भय है, प्रायः बहुत बड़ा होता है। हम पहला नियम तोड़ते हैं, जो हमें आज्ञा देता है कि हर वर्ष चार बार पोप की सर्वोच्चता के विरुद्ध प्रचार करें! हम प्रायः ऐसा व्यवहार करते हैं मानो "दैत्य पोप" मर चुका है और गाड़ा जा चुका है, और उसका नाम तक नहीं लेते। प्रायः ठेस पहुँचाने के भय से हम अपने लोगों को पोपवाद का वास्तविक स्वरूप और उसकी बुराई दिखाने में चूक जाते हैं।

मैं अपने पाठकों से विनती करता हूँ कि बाइबल और अनुच्छेदों के अतिरिक्त इतिहास भी पढ़ें, और देखें कि बीते दिनों में रोम ने क्या किया। पढ़ो कि कैसे उसने तुम्हारे देश की स्वतन्त्रताओं को कुचला, तुम्हारे पूर्वजों की जेबें लूटीं, और सारे राष्ट्र को अज्ञानी, अन्धविश्वासी और अनैतिक बनाए रखा। पढ़ो कि कैसे आर्चबिशप लॉड ने कलीसिया और राज्य दोनों को बरबाद किया, और इंग्लैंड की कलीसिया को प्रोटेस्टेंट मत से अलग करने के अपने मूर्खतापूर्ण, हठीले और परमेश्वर को अप्रसन्न करनेवाले प्रयास से स्वयं को और राजा चार्ल्स को फाँसी के तख्ते तक पहुँचा दिया। पढ़ो कि कैसे इंग्लैंड के अन्तिम पोपवादी राजा, जेम्स द्वितीय, ने प्रोटेस्टेंट मत को दबाने और पोपवाद को फिर लाने के अपने दुस्साहसी प्रयास में अपना मुकुट खो दिया। और यह मत भूलो कि रोम कभी नहीं बदलता। यह उसका गर्व और महिमा है कि वह अचूक है, और सदा एक-सा रहता है।

यदि आप इतिहास नहीं पढ़ना चाहते, तो उन तथ्यों को पढ़ें जो इसी क्षण पृथ्वी के मुख पर प्रत्यक्ष खड़े हैं। इटली और सिसिली को, जैसे वे अभी हाल तक थे, वैसा किसने बनाया? पोप-मत ने।—दक्षिण अमेरिकी राज्यों को जैसे वे हैं वैसा किसने बनाया? पोप-मत ने।—स्पेन और पुर्तगाल को जैसे वे हैं वैसा किसने बनाया? पोप-मत ने।—आयरलैंड को मुन्स्टर, लीन्स्टर और कनॉट में जैसा वह है वैसा किसने बनाया? पोप-मत ने।—स्कॉटलैंड, संयुक्त राज्य और हमारे अपने प्यारे इंग्लैंड को वे सामर्थी और समृद्ध देश किसने बनाया जो वे हैं, और मैं परमेश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वे बहुत समय तक ऐसे ही बने रहें? मैं बिना किसी झिझक के उत्तर देता हूँ: प्रोटेस्टेंट मत ने,—स्वतंत्र बाइबल और धर्म-सुधार के सिद्धान्तों ने। ओह, धर्म-सुधार के सिद्धान्तों को त्यागने से पहले दो बार सोचिए! पोप-मत का पक्ष लेने और रोम की ओर लौट जाने की जो प्रबल प्रवृत्ति चल रही है, उसके आगे झुकने से पहले दो बार सोचिए!

धर्म-सुधार ने अंग्रेज़ों को अज्ञान में डूबा पाया और ज्ञान के अधिकारी बनाकर छोड़ा,—उन्हें बिना बाइबल के पाया और हर पल्ली में एक बाइबल रख दी,—उन्हें अन्धकार में पाया और अपेक्षाकृत प्रकाश में छोड़ा,—उन्हें याजकों के बोझ तले दबा पाया और उस स्वतंत्रता का आनन्द लेते छोड़ा जो मसीह देता है,—उन्हें प्रायश्चित के लहू, विश्वास, अनुग्रह और सच्ची पवित्रता से अपरिचित पाया और इन बातों की कुंजी उनके हाथ में देकर छोड़ा,—उन्हें अन्धा पाया और देखता हुआ छोड़ा,—उन्हें दास पाया और स्वतंत्र छोड़ा। हम धर्म-सुधार के लिए परमेश्वर का धन्यवाद सदा करते रहें! उसने एक दीपक जलाया, जिसे हमें कभी बुझने या मद्धिम पड़ने नहीं देना चाहिए। निश्चय ही मुझे यह कहने का अधिकार है कि इन दिनों हमसे यह माँग है कि हम रोमी मत की बुराइयों और प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधार के अपार मूल्य का नए सिरे से बोध करें!

IV. चौथे स्थान पर, इन दिनों हमसे व्यक्तिगत पवित्रता के ऊँचे स्तर की और दैनिक जीवन में व्यावहारिक धर्म पर अधिक ध्यान देने की माँग है

मुझे अपना यह दृढ़ विश्वास खरेपन से कहना ही होगा कि धर्म-सुधार के दिनों से लेकर आज तक कभी इतना धर्म का दिखावा, पर आचरण इतना कम; परमेश्वर की इतनी चर्चा, पर उसके साथ चलना इतना कम; परमेश्वर के वचन इतने सुने जाना, पर उनका पालन इतना कम नहीं हुआ, जितना इंग्लैंड में आज के समय में है। कभी इतने खाली पीपे और झनझनाती झाँझें न थीं! कभी इतनी औपचारिकता और इतनी कम वास्तविकता न थी। व्यावहारिक मसीही जीवन क्या है, इस विषय में मनुष्यों के मन का सारा स्वर नीचा पड़ गया प्रतीत होता है। एक मसीही पुरुष या स्त्री के जिस आचरण को शोभा देना चाहिए, उसका वह पुराना सोने जैसा मापदण्ड गिरा हुआ और बिगड़ा हुआ दिखाई देता है। आप ऐसे अनेक धार्मिक कहलानेवाले लोगों को निरन्तर वे काम करते देख सकते हैं जो बीते दिनों में सजीव धर्म के सर्वथा विपरीत समझे जाते। उन्हें ताश खेलने, नाटकघर जाने, नाचने, लगातार उपन्यास पढ़ने और रविवार को यात्रा करने जैसी बातों में कोई हानि नहीं दिखती, और जब आप इनका विरोध करते हैं तो वे बिलकुल समझ नहीं पाते कि आपका तात्पर्य क्या है! ऐसी बातों के विषय में विवेक की पुरानी कोमलता डोडो पक्षी की भाँति मिटती और लुप्त होती दिखाई देती है; और जब आप इनमें लिप्त युवा सहभागियों को समझाने का साहस करते हैं, तो वे आपको पुराने ढंग का, संकीर्ण मन का, जीवाश्म बना व्यक्ति समझकर केवल घूरते हैं, और कहते हैं, “इसमें हानि कहाँ है?” संक्षेप में, युवकों में विचारों की ढिलाई, और युवतियों में “चंचलता” तथा हल्कापन, उभरती पीढ़ी के मसीही कहलानेवालों के अत्यन्त सामान्य लक्षण हैं।

अब यह सब कहते हुए मैं गलत न समझा जाऊँ। मैं किसी भी रूप में संन्यासी धर्म की सिफारिश करने की अंशमात्र इच्छा से इनकार करता हूँ। मठ, ननों के आश्रम, संसार से पूर्ण अलगाव, और उसमें अपना कर्तव्य निभाने से इनकार—इन सबको मैं पवित्रशास्त्र-विरुद्ध और हानिकारक नुस्खे मानता हूँ। न ही मुझे कभी यह उचित दिखता है कि मैं लोगों पर सिद्धता का ऐसा आदर्श स्तर थोपूँ जिसका कोई प्रमाण मुझे परमेश्वर के वचन में नहीं मिलता, ऐसा स्तर जो इस जीवन में पाया नहीं जा सकता और जो समाज के कामकाज को शैतान और दुष्टों के हाथ सौंप देता है। नहीं:

मैं सदा एक सौम्य, प्रसन्न, पौरुषपूर्ण धर्म को बढ़ावा देना चाहता हूँ, ऐसा धर्म जिसे लोग हर जगह साथ ले जा सकें और फिर भी मसीह की महिमा करें।

पवित्रता के ऊँचे स्तर की ओर जिस मार्ग की मैं अपने पाठकों को सिफारिश करता हूँ, वह बहुत सरल है, इतना सरल कि मैं कल्पना कर सकता हूँ कि बहुत से उस पर तिरस्कार से मुस्कुराएँगे। परन्तु सरल होते हुए भी यह मार्ग शोचनीय रूप से उपेक्षित और झाड़-झंखाड़ से ढका हुआ है, और अब समय आ गया है कि लोगों को उसमें चलने का निर्देश दिया जाए। तब हमें अपने पुराने अच्छे मित्रों, दस आज्ञाओं की और निकटता से जाँच करने की आवश्यकता है। जैसे बिशप एंड्रयूज़ और प्यूरिटनों ने उन्हें खोलकर और उचित रीति से विकसित किया, वैसे परमेश्वर की व्यवस्था की दोनों पट्टियाँ व्यावहारिक धर्म की पूरी खान हैं। मैं इसे आज के दिनों का बुरा चिह्न समझता हूँ कि बहुत से पादरी अपने नए या पुनर्निर्मित गिरजाघरों में आज्ञाओं को लगवाना छोड़ देते हैं, और ठंडे मन से कह देते हैं कि “अब उनकी आवश्यकता नहीं है!” मेरा विश्वास है कि उनकी इतनी आवश्यकता कभी न थी!—हमें अपने प्रभु यीशु मसीह की शिक्षा के ऐसे अंशों की, जैसे पहाड़ी उपदेश, और निकटता से जाँच करनी चाहिए। वह अद्भुत प्रवचन विचार के लिए भोजन से कितना भरपूर है! वह वाक्य कितना चौंकानेवाला है, “यदि तुम्हारी धार्मिकता शास्त्रियों और फरीसियों की धार्मिकता से बढ़कर न हो, तो तुम स्वर्ग के राज्य में कभी प्रवेश करने न पाओगे।” (मत्ती 5:20।) हाय, इस पद का प्रयोग बहुत कम होता है!—अन्त में, पर कम महत्त्व की नहीं, हमें कलीसियाओं को लिखी गई प्रायः सब पौलुस की पत्रियों के पिछले भाग का और निकटता से अध्ययन करना चाहिए। उन्हें बहुत अधिक टाल दिया और उपेक्षित छोड़ दिया जाता है। मुझे डर है कि बाइबल पढ़नेवाले अनेक लोग रोमियों की पत्री के पहले ग्यारह अध्यायों से तो भली-भाँति परिचित हैं, पर अन्तिम पाँच अध्यायों को अपेक्षाकृत बहुत कम जानते हैं। जब टॉमस स्कॉट ने पुराने लॉक चैपल में इफिसियों की पत्री की व्याख्या की, तो उसने कहा कि जब वह उस धन्य पुस्तक के व्यावहारिक भाग पर पहुँचा तो सभाएँ बहुत छोटी हो गईं! मैं फिर कहता हूँ कि आपको मेरे सुझाव बहुत सरल लग सकते हैं। मैं बेझिझक कहता हूँ कि उन पर ध्यान देना, परमेश्वर की आशीष से, मसीह के कार्य के लिए अत्यन्त लाभदायक होगा। मेरा विश्वास है कि यह घर के धर्म, संसार से अलगाव, सम्बन्धों के कर्तव्यों को निभाने में परिश्रम, निःस्वार्थता, अच्छे स्वभाव और सामान्य आत्मिक-मनस्कता जैसी बातों के विषय में अंग्रेज़ी मसीही जीवन के स्तर को उस ऊँचाई तक उठाएगा जहाँ वह अब कम ही पहुँचता है।

आजकल यह शिकायत आम है कि आधुनिक मसीही धर्म में सामर्थ्य की कमी है, और मसीह की सच्ची कलीसिया — वह देह जिसका सिर वह स्वयं है — उन्नीसवीं शताब्दी में संसार को उस तरह नहीं हिलाती जैसे पहले के वर्षों में हिलाया करती थी। क्या मैं सीधे शब्दों में बताऊँ कि इसका कारण क्या है? इसका कारण जीवन का वह निम्न स्तर है जो अपने को विश्वासी कहनेवालों में बहुत दुखद रूप से फैला हुआ है। हमें ऐसे और अधिक स्त्री-पुरुष चाहिए जो हनोक और अब्राहम के समान परमेश्वर के साथ और परमेश्वर के सम्मुख चलें। यद्यपि इस समय हमारी संख्या हमारे इंजीलवादी पूर्वजों से कहीं अधिक है, फिर भी मेरा विश्वास है कि मसीही आचरण के स्तर में हम उनसे बहुत पीछे हैं। वह आत्म-त्याग कहाँ है, वह समय का सदुपयोग कहाँ है, विलासिता और भोग-विलास का अभाव कहाँ है, सांसारिक वस्तुओं से वह स्पष्ट अलगाव कहाँ है, वह प्रत्यक्ष भाव कहाँ है कि हम सदा अपने स्वामी के काम में लगे हैं, वह एकाग्र दृष्टि कहाँ है, घरेलू जीवन की वह सादगी कहाँ है, समाज में बातचीत का वह ऊँचा स्तर कहाँ है, वह धीरज, वह नम्रता, वह सर्वव्यापी शिष्टता कहाँ है, जो सत्तर-अस्सी वर्ष पहले हमारे अनेक अग्रजों की पहचान थी? हाँ, वह सचमुच कहाँ है? हमें उनके सिद्धान्त विरासत में मिले हैं और हम उनके कवच पहनते हैं, परन्तु मुझे डर है कि उनका आचरण हमें विरासत में नहीं मिला। पवित्र आत्मा यह देखता है और शोकित होता है; और संसार यह देखता है और हमें तुच्छ जानता है। संसार यह देखता है और हमारी गवाही की बहुत परवाह नहीं करता। विश्वास रखो, संसार को जो प्रभावित करता है वह जीवन है, जीवन है — स्वर्गीय, भक्तिमय, मसीह के समान जीवन। आओ, परमेश्वर की आशीष से हम इस कलंक को दूर करने का निश्चय करें। आओ, हम जागें और स्पष्ट रूप से देखें कि इस विषय में समय हमसे क्या माँगता है। आओ, हम आचरण के कहीं ऊँचे स्तर का लक्ष्य रखें। बीता हुआ समय बहुत हुआ, जिसमें हम आधी-अधूरी पवित्रता से सन्तुष्ट रहे। आगे के लिए हम परमेश्वर के साथ चलने का यत्न करें, अपने दैनिक जीवन में "पूर्ण" और निःसन्देह बनें, और यदि उपहास करनेवाले संसार को मन फिराने के लिए न मना सकें तो कम से कम उसका मुँह बन्द कर दें।

V. पाँचवें और अन्तिम स्थान पर, समय हमसे यह माँगता है कि अपने प्राणों की भलाई पाने के पुराने मार्गों में हम और अधिक नियमित तथा दृढ़ता से लगे रहें

मेरा विचार है कि कोई भी समझदार अंग्रेज़ यह देखे बिना नहीं रह सकता कि पिछले वर्षों में देश में उस चीज़ की बहुत वृद्धि हुई है जिसे, कोई बेहतर शब्द न होने के कारण, मुझे सार्वजनिक धर्म कहना पड़ता है। हर प्रकार की सभाएँ अद्भुत रूप से बढ़ गई हैं। प्रार्थना, प्रचार और प्रभु-भोज के संचालन के लिए आराधना-स्थल पचास वर्ष पहले की तुलना में कम से कम दस गुना अधिक खोले जाते हैं। बड़े गिरजाघरों के मध्य भाग में सभाएँ, एग्रीकल्चरल हॉल और मिल्डमे कॉन्फ़्रेंस बिल्डिंग जैसे बड़े सार्वजनिक भवनों में बैठकें, दिन-प्रतिदिन और संध्या-प्रतिसंध्या चलनेवाली मिशन सभाएँ — ये सब आम और परिचित बातें बन गई हैं। वास्तव में वे आज की स्थापित संस्थाएँ हैं, और उनमें उपस्थित होनेवाली भीड़ इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि वे लोकप्रिय हैं। संक्षेप में, हम इस निर्विवाद तथ्य के सामने खड़े हैं कि उन्नीसवीं शताब्दी की अन्तिम चौथाई सार्वजनिक धर्म की अत्यधिक मात्रा का युग है।

अब मैं इसमें दोष निकालने नहीं जा रहा हूँ। कोई क्षण भर के लिए भी ऐसा न समझे। इसके विपरीत, मैं परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ कि धर्म में "आक्रामकता" की प्रेरितों वाली पुरानी योजना फिर से जीवित हुई है, और "किसी न किसी रीति से कुछ का उद्धार कराने" (1 कुरिन्थियों 9:22) की इच्छा स्पष्ट रूप से फैल रही है। मैं परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ कि सभाएँ छोटी की गई हैं, घरेलू मिशन हैं, और मूडी तथा सैंकी जैसे सुसमाचार-प्रचार के आन्दोलन हैं। जड़ता, उदासीनता और निष्क्रियता से तो कुछ भी अच्छा है। "मसीह की कथा प्रचार की जाती है, और मैं इससे आनन्दित हूँ, और आनन्दित रहूँगा भी।" (फिलिप्पियों 1:18)। इंग्लैंड के भविष्यद्वक्ता और धर्मी जन कभी इन बातों को देखना चाहते थे, पर उन्होंने इन्हें नहीं देखा। यदि व्हिटफ़ील्ड और वेस्ली को उनके समय में बताया जाता कि एक समय आएगा जब अंग्रेज़ी आर्चबिशप और बिशप न केवल मिशन सभाओं को स्वीकृति देंगे, बल्कि उनमें सक्रिय भाग भी लेंगे, तो मैं नहीं सोचता कि वे इस पर विश्वास करते। बल्कि मुझे सन्देह है कि वे एलीशा के समय के उस सामरी सरदार की तरह कहने को प्रलोभित होते, "यदि यहोवा आकाश में खिड़कियाँ भी खोल दे, तो भी क्या यह बात हो सकती है?" (2 राजाओं 7:2)।

परन्तु सार्वजनिक धर्म की वृद्धि के लिए धन्यवादी होते हुए भी हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि यदि उसके साथ निजी धर्म न हो तो उसका कोई वास्तविक ठोस मूल्य नहीं, और उससे अत्यन्त हानिकारक परिणाम भी निकल सकते हैं। सनसनीखेज़ प्रचारकों के पीछे निरन्तर दौड़ना, गर्म और भीड़ भरी सभाओं में, जो देर रात तक खिंचती हैं, निरन्तर उपस्थित होना, नई उत्तेजना और मंच की तीखे मसालेदार नवीनताओं की निरन्तर लालसा रखना — इस प्रकार की सब बातें मसीही जीवन का एक बहुत अस्वस्थ रूप उत्पन्न करती हैं; और मुझे डर है कि अनेक मामलों में अन्त आत्मा का पूर्ण विनाश होता है। क्योंकि दुर्भाग्य से जो लोग सार्वजनिक धर्म को ही सब कुछ बना लेते हैं, वे अक्सर कलीसियाई वक्तृत्व के किसी भव्य प्रदर्शन के बाद क्षणिक भावनाओं में बहकर अपनी वास्तविक अनुभूति से कहीं अधिक का दावा करने लगते हैं। इसके बाद, जिस स्तर तक पहुँच जाने की वे कल्पना करते हैं, उस पर उन्हें केवल धार्मिक उत्तेजनाओं की लगातार शृंखला ही टिकाए रख सकती है। धीरे-धीरे, अफ़ीमचियों और शराबियों की तरह, एक समय आता है जब उनकी खुराक का असर खो जाता है, और थकावट तथा असन्तोष की भावना उनके मन पर छाने लगती है। मुझे डर है कि अक्सर पूरी बात का निष्कर्ष पूर्ण निर्जीवता और अविश्वास में गिर पड़ना और संसार में पूरी तरह लौट जाना होता है। और यह सब केवल सार्वजनिक धर्म रखने का परिणाम है! काश, लोग याद रखते कि एलिय्याह को परमेश्वर की उपस्थिति न आँधी ने दिखाई, न आग ने, न भूकम्प ने, परन्तु "एक भीनी-सी सुनाई देनेवाली आवाज़" ने। (1 राजाओं 19:12)।

अब मैं इस विषय पर एक चेतावनी की आवाज़ उठाना चाहता हूँ। स्मरण रखें, मैं सार्वजनिक धर्म में किसी कमी को नहीं देखना चाहता; परन्तु मैं उस धर्म की वृद्धि अवश्य चाहता हूँ जो निजी है,—जो हर मनुष्य और उसके परमेश्वर के बीच का निजी सम्बन्ध है। पौधे या वृक्ष की जड़ भूमि के ऊपर कुछ दिखावा नहीं करती। यदि तुम खोदकर उसके पास पहुँचो और उसे देखो, तो वह एक दीन, मैली और खुरदरी सी वस्तु है, और फल, पत्ते या फूल की भाँति आँखों को सुन्दर नहीं लगती। फिर भी वही तुच्छ समझी जानेवाली जड़ उस सारे जीवन, स्वास्थ्य, बल और उपजाऊपन का सच्चा स्रोत है जिसे तुम्हारी आँखें देखती हैं, और उसके बिना वह पौधा या वृक्ष शीघ्र ही मर जाएगा। ठीक वैसे ही निजी धर्म सारे जीवित मसीही जीवन की जड़ है। उसके बिना हम सभा में या मंच पर बड़ा दिखावा कर सकते हैं, ऊँचे स्वर से गा सकते हैं, बहुत आँसू बहा सकते हैं, और जीवित होने का नाम और मनुष्यों की प्रशंसा पा सकते हैं। परन्तु उसके बिना हमारे पास ब्याह का वस्त्र नहीं, और हम "परमेश्वर के सामने मरे हुए" हैं। मैं अपने पाठकों से साफ़ कहता हूँ कि आज का समय हम सब से अपने निजी धर्म पर अधिक ध्यान देने की माँग करता है।

(क) आओ, हम निजी रूप में अधिक मन लगाकर प्रार्थना करें, और अपने सारे प्राण को अपनी प्रार्थनाओं में लगा दें। जीवित प्रार्थनाएँ भी होती हैं और मरी हुई प्रार्थनाएँ भी,—ऐसी प्रार्थनाएँ जिनमें हमारा कुछ खर्च नहीं होता, और ऐसी प्रार्थनाएँ जिनमें प्रायः हमें ऊँचे स्वर से पुकारना और आँसू बहाना पड़ता है। तुम्हारी प्रार्थनाएँ कैसी हैं? जब बड़े-बड़े अगुवे सबके सामने पीछे हट जाते हैं, और कलीसिया चकित और स्तब्ध रह जाती है, तो सत्य यह है कि वे बहुत पहले ही घुटनों के बल पीछे हट चुके थे। उन्होंने अनुग्रह के सिंहासन की उपेक्षा की थी।

(ख) आओ, हम निजी रूप में अपनी बाइबल अधिक पढ़ें, और अधिक परिश्रम और लगन के साथ पढ़ें। पवित्रशास्त्र की अज्ञानता सब भ्रम की जड़ है, और मनुष्य को शैतान के हाथ में निस्सहाय कर देती है। मुझे सन्देह है कि पचास वर्ष पहले की तुलना में अब निजी बाइबल-पठन कम है। मैं कभी विश्वास नहीं कर सकता कि इतने अंग्रेज़ स्त्री-पुरुष "हर प्रकार की शिक्षा के झोंके से उछाले और इधर-उधर घुमाए" जाते, कोई सन्देहवाद में गिरते, कोई अति उग्र और संकीर्ण कट्टरता में दौड़ पड़ते, और कोई रोम की ओर चले जाते, यदि परमेश्वर के वचन को आलस्य, ऊपरी ढंग, लापरवाही और औपचारिकता से पढ़ने की आदत न पनपी होती। "तुम पवित्रशास्त्र को नहीं जानते, इस कारण भूल में पड़े हो।" (मत्ती 22:29।) मंच पर की बाइबल घर की बाइबल का स्थान कभी न ले।

(ग) आओ, हम मसीह के साथ अधिक निजी मनन और सहभागिता रखने की आदत डालें। हम दृढ़ता से समय निकालें कि कभी-कभी अकेले हों, दाऊद के समान अपनी ही आत्मा से बातें करें, और परमेश्वर के दाहिने हाथ पर विराजमान अपने महान महायाजक, सहायक और पाप-स्वीकार सुननेवाले के सामने अपना हृदय उँडेलें। हमें अधिक कान में पाप-स्वीकार की आवश्यकता है: परन्तु मनुष्य के आगे नहीं। हमें जिस पाप-स्वीकार स्थान की आवश्यकता है वह वेदी-कक्ष की कोई पेटी नहीं, परन्तु अनुग्रह का सिंहासन है। मैं देखता हूँ कि कुछ मसीही कहलानेवाले लोग सदा आत्मिक भोजन की खोज में इधर-उधर भागते रहते हैं, सदा सबके सामने, सदा हाँफते और जल्दी में, और कभी अपने को इतना अवकाश नहीं देते कि चुपचाप बैठकर उसे पचाएँ और अपनी आत्मिक दशा का लेखा-जोखा लें। यदि ऐसे मसीहियों का धर्म बौना और अवरुद्ध हो, और वे बढ़ें नहीं, और फ़िरौन की दुबली गायों की तरह अपनी सार्वजनिक धार्मिक दावतों से अच्छे दिखने के बदले और बुरे दिखें, तो मुझे आश्चर्य नहीं होता। आत्मिक उन्नति बहुत अधिक हमारे निजी धर्म पर निर्भर है, और निजी धर्म तब तक फल-फूल नहीं सकता जब तक हम यह ठान न लें कि परमेश्वर की सहायता से, चाहे कितना ही कष्ट उठाना पड़े, हम विचार के लिए, प्रार्थना के लिए, बाइबल के लिए और मसीह के साथ निजी सहभागिता के लिए समय निकालेंगे। हाय! हमारे स्वामी का वह वचन कितना अनदेखा किया जाता है: "अपनी कोठरी में जा, और द्वार बन्द कर।" (मत्ती 6:6।)

हमारे सुसमाचारवादी पूर्वजों के पास हमारी तुलना में कहीं कम साधन और अवसर थे। पूरी धार्मिक सभाएँ और भीड़ें, सिवाय कभी-कभी किसी कलीसिया में या खेत में, जब व्हिटफ़ील्ड, वेस्ली या रोलैंड्स जैसे लोग प्रचार करते थे, ऐसी बातें थीं जिनके विषय में वे कुछ नहीं जानते थे। उनके कार्य न तो फ़ैशन के अनुसार थे और न लोकप्रिय, और प्रायः उन पर प्रशंसा की अपेक्षा अधिक सताव और निन्दा आती थी। परन्तु जो थोड़े हथियार उन्होंने काम में लिए, उन्हें उन्होंने भली-भाँति चलाया। मनुष्य की ओर से कम शोर और तालियों के साथ भी, मेरा विश्वास है, उन्होंने अपनी पीढ़ी पर परमेश्वर के लिए हमसे कहीं गहरी छाप छोड़ी, जबकि हमारे पास अपने सब सम्मेलन, सभाएँ, मिशन-कक्ष, भवन और बढ़ते हुए धार्मिक साधन हैं। मुझे सन्देह है कि उनके नए विश्वासी पुराने ढंग के कपड़ों और सन के वस्त्रों की भाँति अधिक टिकाऊ थे, अधिक चले, कम फीके पड़े, रंग बनाए रखा, और आज के बहुत से नवजात शिशुओं से कहीं अधिक स्थिर, जड़ पकड़े हुए और नींव पर खड़े थे। और इस सबका कारण क्या था? मेरा विश्वास है, केवल यह कि वे निजी धर्म पर उससे अधिक ध्यान देते थे जितना हम सामान्यतः देते हैं। वे परमेश्वर के साथ निकटता से चले और निजी रूप में उसका आदर किया, और इसलिए उसने सबके सामने उनका आदर किया। ओह, आओ, हम उनके पीछे चलें जैसे वे मसीह के पीछे चले! आओ, हम भी वैसा ही करें।

अब मैं इस लेख को व्यावहारिक प्रयोग के कुछ शब्दों के साथ समाप्त करता हूँ।

(1) सबसे पहले, क्या आप समझना चाहते हैं कि अपनी आत्मा के विषय में समय आपसे क्या माँगता है? सुनिए, मैं आपको बताता हूँ। आप विशेष आत्मिक संकट के समय में जी रहे हैं। स्वर्ग के मार्ग में शायद कभी इतने फन्दे और गड्ढे नहीं थे; और निश्चय ही वे फन्दे कभी इतनी चतुराई से चारा लगाकर नहीं बिछाए गए, और वे गड्ढे कभी इतनी कुशलता से नहीं खोदे गए। सावधान रहिए कि आप क्या कर रहे हैं। अपनी चाल पर भली-भाँति ध्यान दीजिए। अपने पाँवों के मार्ग पर विचार कीजिए। चौकस रहिए कि कहीं आप अनन्त शोक में न पड़ जाएँ और अपनी ही आत्मा को नष्ट न कर बैठें। स्वतंत्र विचार के लुभावने नाम की आड़ में छिपे व्यावहारिक अविश्वास से सावधान रहिए। पक्षपात न करने के मनभावन विचार के बहाने, और तथाकथित उदारता और प्रेम के घातक प्रभाव में, सिद्धान्त सम्बन्धी सत्य के विषय में असहाय अनिश्चय की दशा से सावधान रहिए। निर्णय के दिन की इच्छा करने, उसका इरादा बाँधने और उसकी आशा रखने में जीवन को व्यर्थ गँवा देने से सावधान रहिए, ऐसा न हो कि द्वार बन्द हो जाए, और आप मरे हुए विवेक के हवाले कर दिए जाएँ और बिना आशा के मर जाएँ। अपने संकट के बोध में जाग उठिए। उठिए, और चाहे और सब कुछ अनिश्चित छोड़ दें, अपने बुलाए जाने और चुने जाने को निश्चित करने का यत्न कीजिए। परमेश्वर का राज्य बहुत निकट है। मसीह, सर्वशक्तिमान उद्धारकर्ता, पापी का मित्र मसीह, और अनन्त जीवन आपके लिए तैयार हैं, यदि आप केवल मसीह के पास आएँ। उठिए और बहाने त्याग दीजिए; आज ही मसीह आपको बुला रहा है। यदि साथी न मिले तो साथी की प्रतीक्षा न कीजिए; किसी की प्रतीक्षा मत कीजिए। मैं फिर कहता हूँ, ये समय अत्यन्त संकटपूर्ण हैं। यदि जीवन के सकरे मार्ग में केवल थोड़े ही लोग हैं, तो दृढ़ निश्चय कीजिए कि परमेश्वर की सहायता से आप कम से कम उन थोड़े लोगों में अवश्य होंगे।

(2) फिर, क्या आप समझना चाहते हैं कि दूसरों की आत्माओं के विषय में समय सब मसीहियों से क्या माँगता है? सुनिए, मैं आपको बताता हूँ। आप बड़ी स्वतंत्रता और भलाई करने के भरपूर अवसरों के समय में जी रहे हैं। उपयोगी होने के इतने खुले द्वार और कटनी के लिए इतने पके खेत पहले कभी नहीं थे। ध्यान रखिए कि आप उन खुले द्वारों का उपयोग करें और उन खेतों को काटने का यत्न करें। मरने से पहले थोड़ी सी भलाई करने का यत्न कीजिए। उपयोगी होने का प्रयास कीजिए। दृढ़ निश्चय कीजिए कि परमेश्वर की सहायता से आप अपने गाड़े जाने के दिन इस संसार को उससे बेहतर संसार छोड़कर जाएँगे जैसा वह आपके जन्म के दिन था। अपने सम्बन्धियों, मित्रों और साथियों की आत्माओं को स्मरण रखिए; स्मरण रखिए कि परमेश्वर अकसर निर्बल साधनों से काम करता है, और पवित्र चतुराई से उन्हें मसीह तक पहुँचाने का यत्न कीजिए। समय थोड़ा है; इस पुराने संसार की घड़ी से रेत गिरती जा रही है; इसलिए समय को बहुमूल्य जानिए, और यत्न कीजिए कि अकेले स्वर्ग न जाएँ। निस्सन्देह आप सफलता को अपने वश में नहीं कर सकते। यह निश्चित नहीं है कि भलाई करने के आपके प्रयास सदा दूसरों का भला करेंगे; परन्तु यह पूर्णतः निश्चित है कि वे सदा आपका अपना भला करेंगे। शरीर और आत्मा दोनों के स्वास्थ्य का एक बड़ा भेद अभ्यास, अभ्यास ही है। "जो औरों को सींचता है, वह आप भी सींचा जाता है।" (नीतिवचन 11:25)। यह हमारे प्रभु की एक गहरी और सोने के समान बहुमूल्य उक्ति है, परन्तु इसका पूरा अर्थ कम ही समझा जाता है, "लेने से देना धन्य है।" (प्रेरितों के काम 20:35)।

(3) अन्त में, क्या आप समझना चाहते हैं कि इंग्लैंड की कलीसिया के विषय में समय आपसे क्या माँगता है? मेरी सुनिए, मैं आपको बताता हूँ। निस्सन्देह आप ऐसे दिनों में जी रहे हैं जब हमारी चिरकाल से सम्मानित कलीसिया अत्यन्त संकटपूर्ण, कष्टदायक और नाज़ुक स्थिति में है। उसके खेवनहारों ने उसे उथल-पुथल भरे पानी में पहुँचा दिया है। बाहर से पोप के अनुयायियों, अविश्वासियों और कलीसिया को राज्य से अलग करने के समर्थकों के कारण उसका अस्तित्व ही संकट में है। भीतर से विश्वासघातियों, झूठे मित्रों और डरपोक अधिकारियों के व्यवहार से उसका जीवन-रक्त बहता जा रहा है। फिर भी, जब तक इंग्लैंड की कलीसिया बाइबल, अनुच्छेदों और प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधार के सिद्धान्तों पर दृढ़ता से टिकी रहे, तब तक मैं आपको दृढ़ता से सलाह देता हूँ कि आप कलीसिया से जुड़े रहें। जब अनुच्छेद जहाज़ से बाहर फेंक दिए जाएँ और पुराना झंडा उतार लिया जाए, तभी, और उससे पहले नहीं, आपके और मेरे लिए नावें उतारने और टूटे जहाज़ को छोड़ने का समय होगा। इस समय तो आइए हम पुराने जहाज़ से चिपके रहें।

हम अब कायरों की तरह उसे क्यों छोड़ें, इसलिए कि वह कठिनाइयों में है और उसकी सीमा के भीतर सत्य को बिना झंझट के थामे नहीं रखा जा सकता? हम अपनी दशा कैसे सुधार सकते हैं? हम किसके पास जाएँ? हमें इससे अच्छी प्रार्थनाएँ कहाँ मिलेंगी? किस सहभागिता में इतनी अधिक बुराई के होते हुए भी इतना भला होता दिखाई देगा? निस्सन्देह बहुत कुछ हमें उदास करता है; परन्तु आज पृथ्वी पर एक भी दृश्य कलीसिया इससे बेहतर नहीं कर रही। एक भी सहभागिता ऐसी नहीं जिसमें बादल न हों और सब कुछ शान्त हो। "बुरे लोग सब कहीं भलों के साथ मिले हुए हैं"; गेहूँ कभी बिना जंगली दानों के नहीं उगता। फिर भी बहुत कुछ ऐसा है जो हमें आनन्दित करता है: देश में पहले कभी इतना सुसमाचारीय प्रचार नहीं हुआ, और घर तथा विदेश दोनों में पहले से कहीं अधिक काम हुआ है। यदि पिछली शताब्दी में लन्दन में लगभग आधे दर्जन अन्य लोगों के साथ अकेले खड़े रहनेवाले सेंट ऐनी, ब्लैकफ्रायर्स के बूढ़े विलियम रोमेन उसे देखने के लिए जीवित रहते जो हमारी आँखें देखती हैं, तो वे हमारे ढीले हौसले और कृतघ्नता को कड़ी फटकार लगाते। नहीं! अर्द्ध-पोपवाद और संशयवाद के होते हुए भी, बाहर के ईर्ष्यालु दर्शक और भीतर के उदास बड़बड़ानेवाले चाहे जो कहना चाहें, इंग्लैंड की सुधारवादी कलीसिया की लड़ाई अभी हारी नहीं गई। जैसा नेपोलियन ने मारेंगो के रणक्षेत्र में चार बजे कहा था, "विजय पाने के लिए अभी समय है।" यदि कलीसिया के सच्चे राजभक्त सदस्य साहस के साथ उसके साथ खड़े रहें, और एक दूसरे को ठण्डी दृष्टि से न देखें, और एक ही अग्निशमन यंत्र चलाने या एक ही जीवन-नौका सम्भालने से इनकार न करें, यदि वे आपस में झगड़ें नहीं और "मार्ग में एक दूसरे से न बिगड़ें", तो इंग्लैंड की कलीसिया जीवित रहेगी, मरेगी नहीं, और हमारे बच्चों के बच्चों के लिए आशीष ठहरेगी। तो आइए हम अपने पाँव दृढ़ता से जमाकर अपनी स्थिति पर अटल खड़े रहें। कुछ छेदों के कारण जहाज़ छोड़ने की जल्दी न करें; इसके बजाय पम्पों पर डटें और अच्छे जहाज़ को तैरता रखने का यत्न करें। आइए हम काम करते रहें, लड़ते रहें, प्रार्थना करते रहें, और इंग्लैंड की

कलीसिया से जुड़े रहें। जो कलीसियावासी इन्हीं रेखाओं पर चलता है, मेरा विश्वास है, वही कलीसियावासी है जो "समय को समझता है।"

20. "मसीह ही सब कुछ है"

"मसीह ही सब कुछ है।"—कुलुस्सियों 3:11

इस पृष्ठ के शीर्ष पर दिए गए पद के शब्द थोड़े, छोटे और शीघ्र बोले जानेवाले हैं; परन्तु उनमें बड़ी-बड़ी बातें समाई हैं। उन स्वर्णिम वचनों के समान, "मेरे लिये जीवित रहना मसीह है,"—"मैं जीवित हूँ, तौभी मैं नहीं, परन्तु मसीह मुझ में जीवित है,"—ये भी अद्भुत रूप से समृद्ध और विचारोत्तेजक हैं। (फिलिप्पियों 1:21; गलातियों 2:20।)

ये तीन शब्द मसीही विश्वास का सार और तत्त्व हैं। यदि हमारे हृदय सचमुच इनके साथ चल सकें, तो हमारी आत्माओं के लिये सब कुशल है। यदि नहीं, तो हम निश्चित जान लें कि हमें अभी बहुत कुछ सीखना है।

मैं अपने पाठकों के सामने यह रखने का प्रयत्न करूँगा कि किस अर्थ में "मसीह ही सब कुछ है;" और उनसे कहूँगा कि पढ़ते हुए वे अपने आप को ईमानदारी से परखें, ताकि अन्तिम दिन के न्याय में उनका विश्वास रूपी जहाज़ टूट न जाए।

मैं जान-बूझकर इस पुस्तक का अन्त इस उल्लेखनीय पद पर लिखे गए एक निबन्ध से कर रहा हूँ। मसीह ही सैद्धान्तिक और व्यावहारिक, दोनों प्रकार के मसीही जीवन का मुख्य आधार है। मसीह का सही ज्ञान पवित्रीकरण के सही ज्ञान के साथ-साथ धर्मी ठहराए जाने के सही ज्ञान के लिये भी अनिवार्य है। जो पवित्रता का अनुसरण करता है, वह तब तक कोई उन्नति नहीं करेगा जब तक वह मसीह को उसका उचित स्थान न दे। मैंने इस पुस्तक का आरम्भ पाप के विषय में एक सीधे-सादे वर्णन से किया था। मैं इसका अन्त मसीह के विषय में उतने ही सीधे-सादे वर्णन से करूँ।

I. सबसे पहले हम यह समझ लें कि मनुष्य के विषय में परमेश्वर की सब योजनाओं में मसीह ही सब कुछ है

(क) एक समय था जब इस पृथ्वी का कोई अस्तित्व नहीं था। पहाड़ चाहे कितने ही ठोस दिखें, समुद्र चाहे कितना ही असीम लगे, और तारे चाहे स्वर्ग में कितने ही ऊँचे दिखाई दें,—वे कभी थे ही नहीं। और मनुष्य, जो अब अपने विषय में इतने ऊँचे विचार रखता है, एक अज्ञात प्राणी था।

और तब मसीह कहाँ था?

तब भी मसीह "परमेश्वर के साथ" था,—और "परमेश्वर था,"—और "परमेश्वर के तुल्य" था। (यूहन्ना 1:1; फिलिप्पियों 2:6।) तब भी वह पिता का प्रिय पुत्र था: वह कहता है, "तू ने जगत की उत्पत्ति से पहले मुझ से प्रेम रखा।"—"उस महिमा से जो जगत के होने से पहले मेरी तेरे साथ थी।"—"मैं अनादिकाल से, वरन् आदि से, पृथ्वी की सृष्टि से पहले ही से ठहराया गया।" (यूहन्ना 17:5, 24; नीतिवचन 8:23।) तब भी वह "जगत की उत्पत्ति से पहले" ठहराया हुआ उद्धारकर्ता था (1 पतरस 1:20), और विश्वासी "उसमें चुने गए" थे। (इफिसियों 1:4।)

(ख) एक समय आया जब यह पृथ्वी अपनी वर्तमान व्यवस्था में रची गई। सूर्य, चन्द्रमा और तारे,—समुद्र, भूमि और उनके सब निवासी, अस्तव्यस्तता और उथल-पुथल में से अस्तित्व में लाए गए। और सबसे अन्त में मनुष्य भूमि की मिट्टी से रचा गया।

और तब मसीह कहाँ था?

सुनिए पवित्रशास्त्र क्या कहता है: "सब कुछ उसी के द्वारा उत्पन्न हुआ और जो कुछ उत्पन्न हुआ है, उस में से कोई भी वस्तु उसके बिना उत्पन्न न हुई।" (यूहन्ना 1:3।) "क्योंकि उसी में सारी वस्तुओं की सृष्टि हुई, स्वर्ग की हों अथवा पृथ्वी की।" (कुलुस्सियों 1:16।) "हे प्रभु, आदि में तू ही ने पृथ्वी की नेव डाली, और स्वर्ग तेरे हाथों की कारीगरी हैं।" (इब्रानियों 1:10।) "जब उसने आकाश को स्थिर किया, तब मैं वहाँ था; जब उसने गहरे जल के ऊपर चक्र बाँधा; जब उसने आकाशमण्डल को ऊपर से स्थिर किया, और गहरे सोतों को सामर्थी बनाया; जब उसने समुद्र की सीमा ठहराई, कि जल उसकी आज्ञा का उल्लंघन न कर सके, और जब उसने पृथ्वी की नेव की डोरी लगाई, तब मैं कारीगर के समान उसके पास था।" (नीतिवचन 8:27–30।) तो क्या आश्चर्य कि प्रभु यीशु अपने प्रचार में सृष्टि की पुस्तक से निरन्तर शिक्षाएँ लेता था? जब वह भेड़ों, मछलियों, कौओं, अनाज, सोसनों, अंजीर के पेड़ और दाखलता की बात करता था,—तब वह उन वस्तुओं की बात करता था जिन्हें उसने स्वयं रचा था।

(ग) एक दिन आया जब पाप ने संसार में प्रवेश किया।—आदम और हव्वा ने वर्जित फल खाया, और गिर गए। उन्होंने वह पवित्र स्वभाव खो दिया जिसमें वे पहले रचे गए थे। उन्होंने परमेश्वर की मित्रता और कृपा गँवा दी, और दोषी, भ्रष्ट, असहाय और निराश पापी बन गए। पाप उनके और स्वर्ग में उनके पवित्र पिता के बीच दीवार बनकर आ खड़ा हुआ। यदि वह उनके साथ उनके कर्मों के अनुसार व्यवहार करता, तो उनके आगे मृत्यु, नरक और अनन्त विनाश के सिवा कुछ न था।

और तब मसीह कहाँ था?

उसी दिन वह हमारे काँपते हुए माता-पिता पर उद्धार की एकमात्र आशा के रूप में प्रकट किया गया। जिस दिन वे गिरे, उसी दिन उनसे कहा गया कि "स्त्री का वंश सर्प के सिर को कुचल डालेगा,"—कि स्त्री से जन्मा एक उद्धारकर्ता शैतान पर जयवन्त होगा, और पापी मनुष्य के लिये अनन्त जीवन में प्रवेश जीत लाएगा। (उत्पत्ति 3:15।) मसीह उसी दिन, पतन के दिन ही, जगत की सच्ची ज्योति के रूप में प्रस्तुत किया गया; और उस दिन से आज तक उसके सिवा कोई ऐसा नाम प्रकट नहीं किया गया जिसके द्वारा आत्माओं का उद्धार हो सके। आदम से लेकर आज तक सब उद्धार पाए हुए लोग उसी के द्वारा स्वर्ग में पहुँचे हैं; और उसके बिना कोई भी नरक से नहीं बचा।

(घ) एक समय आया जब संसार परमेश्वर के विषय में अज्ञानता में डूबा और दबा हुआ दिखाई देने लगा। 4,000 वर्ष के बाद पृथ्वी की जातियाँ अपने बनानेवाले परमेश्वर को बिलकुल भूल गई प्रतीत होती थीं। मिस्री, अश्शूरी, फारसी, यूनानी और रोमी साम्राज्यों ने अन्धविश्वास और मूर्तिपूजा फैलाने के सिवा कुछ न किया था। कवियों, इतिहासकारों और दार्शनिकों ने यह सिद्ध कर दिया था कि अपनी सारी बौद्धिक शक्ति के होते हुए भी उन्हें परमेश्वर का सही ज्ञान नहीं था; और मनुष्य, यदि अपने ही भरोसे छोड़ दिया जाए, तो पूरी तरह भ्रष्ट है। "संसार ने अपनी बुद्धि से परमेश्वर को न जाना।" (1 कुरिन्थियों 1:21।) पृथ्वी के एक कोने में रहनेवाले कुछ तिरस्कृत यहूदियों को छोड़कर सारा संसार अज्ञानता और पाप में मरा हुआ था।

और तब मसीह ने क्या किया?

उसने उस महिमा को छोड़ दिया जो उसे अनादिकाल से पिता के साथ प्राप्त थी, और उद्धार का प्रबन्ध करने के लिये संसार में उतर आया। उसने हमारा स्वभाव धारण किया, और मनुष्य होकर जन्म लिया। मनुष्य के रूप में उसने परमेश्वर की इच्छा को पूर्णता से पूरा किया, जिसे हम सब ने अधूरा छोड़ दिया था; मनुष्य के रूप में उसने क्रूस पर परमेश्वर के उस क्रोध को सहा जो हमें सहना चाहिए था। उसने हमारे लिये अनन्त धार्मिकता प्रस्तुत की। उसने हमें टूटी हुई व्यवस्था के श्राप से छुड़ाया। उसने सब पाप और अशुद्धता के लिये एक सोता खोल दिया। वह हमारे पापों के लिये मरा। वह हमारे धर्मी ठहराए जाने के लिये जी उठा। वह परमेश्वर के दाहिने हाथ पर चढ़ गया, और वहाँ तब तक बैठ गया जब तक उसके शत्रु उसके पाँवों की चौकी न बना दिए जाएँ। और अब वह वहीं बैठा है, उन सब को उद्धार की भेंट देता हुआ जो उसके पास आएँगे, उन सब के लिये मध्यस्थता की प्रार्थना करता हुआ जो उस पर विश्वास करते हैं, और परमेश्वर की ठहराई हुई व्यवस्था के अनुसार आत्माओं के उद्धार से सम्बन्धित सब बातों का संचालन करता हुआ।

(इ) एक समय आनेवाला है जब पाप इस संसार से निकाल दिया जाएगा। — दुष्टता सदा बिना दण्ड पाए फलती-फूलती न रहेगी, — शैतान सदा राज्य न करेगा, — सृष्टि सदा बोझ से दबी हुई कराहती न रहेगी। सब बातों की पुनःस्थापना का एक समय आएगा। एक नया आकाश और नई पृथ्वी होगी, जिनमें धार्मिकता का वास होगा, और पृथ्वी प्रभु के ज्ञान से ऐसी भर जाएगी जैसे समुद्र जल से भरा होता है। (रोमियों 8:22; प्रेरितों के काम 3:21; 2 पतरस 3:13; यशायाह 11:9।)

और तब मसीह कहाँ होगा? और वह क्या करेगा?

मसीह स्वयं राजा होगा। वह इस पृथ्वी पर लौटेगा, और सब कुछ नया कर देगा। वह सामर्थ्य और बड़ी महिमा के साथ आकाश के बादलों पर आएगा, और जगत के राज्य उसके हो जाएँगे। अन्यजातियाँ उसे मीरास में दी जाएँगी, और पृथ्वी की छोर तक उसकी निज सम्पत्ति होगी। उसके आगे हर एक घुटना टिकेगा, और हर एक जीभ अंगीकार करेगी कि वही प्रभु है। उसका प्रभुत्व सदा का प्रभुत्व होगा, जो टलेगा नहीं, और उसका राज्य ऐसा होगा जो कभी नष्ट न होगा। (मत्ती 24:30; प्रकाशितवाक्य 11:15; भजन संहिता 2:8; फिलिप्पियों 2:10, 11; दानिय्येल 7:14।)

(ई) एक दिन आनेवाला है जब सब मनुष्यों का न्याय किया जाएगा। समुद्र अपने भीतर के मरे हुओं को दे देगा, और मृत्यु और अधोलोक अपने भीतर के मरे हुओं को सौंप देंगे। जो कब्र में सोए हैं वे सब जाग उठेंगे और बाहर निकल आएँगे, और सब का न्याय उनके कर्मों के अनुसार किया जाएगा। (प्रकाशितवाक्य 20:13; दानिय्येल 12:2।)

और तब मसीह कहाँ होगा?

मसीह स्वयं न्यायी होगा। "पिता ने सारा न्याय पुत्र को सौंप दिया है।" — "जब मनुष्य का पुत्र अपनी महिमा में आएगा, तब वह अपनी महिमा के सिंहासन पर बैठेगा; — और सब जातियाँ उसके सामने इकट्ठी की जाएँगी: और जैसे चरवाहा भेड़ों को बकरियों से अलग करता है, वैसे ही वह उन्हें एक दूसरे से अलग करेगा।" — "हम सब को मसीह के न्याय आसन के सामने खड़ा होना अवश्य है, ताकि हर एक व्यक्ति अपने शरीर के द्वारा किए हुए भले या बुरे कामों का फल पाए।" (यूहन्ना 5:22; मत्ती 25:32; 2 कुरिन्थियों 5:10।)

अब यदि इस लेख का कोई पाठक मसीह को तुच्छ समझता है, तो वह आज ही जान ले कि वह परमेश्वर से बहुत भिन्न है! तुम्हारा एक मन है, और परमेश्वर का दूसरा। तुम्हारा एक विचार है, और परमेश्वर का दूसरा। तुम समझते हो कि मसीह को थोड़ा सम्मान, थोड़ी श्रद्धा, थोड़ा आदर देना ही काफी है। परन्तु परमेश्वर पिता की सब अनन्त योजनाओं में — सृष्टि में, छुटकारे में, पुनःस्थापना में और न्याय में — इन सब में मसीह "सब कुछ" है।

निश्चय ही इन बातों पर विचार करना हमारे लिए भला होगा। यह व्यर्थ नहीं लिखा है, "जो पुत्र का आदर नहीं करता, वह पिता का, जिसने उसे भेजा है, आदर नहीं करता।" (यूहन्ना 5:23।)

II. दूसरे, यह समझ लें कि बाइबल की परमेश्वर-प्रेरित पुस्तकों में "मसीह ही सब कुछ है"

दोनों नियमों के हर भाग में मसीह पाया जाता है — आरम्भ में धुँधला और अस्पष्ट, — मध्य में अधिक स्पष्ट और साफ, — अन्त में पूर्ण और सम्पूर्ण, — परन्तु सब कहीं वास्तविक और ठोस रूप में।

पापियों के लिए मसीह का बलिदान और मृत्यु, और मसीह का राज्य और भावी महिमा — यही वह ज्योति है जो हमें पवित्रशास्त्र की किसी भी पुस्तक को पढ़ते समय उस पर डालनी चाहिए। मसीह का क्रूस और मसीह का मुकुट वह सूत्र है जिसे हमें दृढ़ता से थामे रखना चाहिए, यदि हम पवित्रशास्त्र की कठिनाइयों में से अपना मार्ग निकालना चाहते हैं। मसीह ही वह एकमात्र कुंजी है जो परमेश्वर के वचन के अनेक अंधकारमय स्थानों को खोलेगी। कुछ लोग शिकायत करते हैं कि वे बाइबल को नहीं समझते। और इसका कारण बहुत सरल है। वे कुंजी का उपयोग नहीं करते। उनके लिए बाइबल मिस्र के चित्रलिपि-अक्षरों के समान है। वह एक रहस्य है, केवल इसलिए कि वे कुंजी को नहीं जानते और काम में नहीं लाते।

(अ) पुराने नियम की हर बलि में क्रूस पर चढ़ाया गया मसीह ही प्रकट किया गया था। वेदी पर घात किया और चढ़ाया गया हर पशु इस बात का व्यावहारिक अंगीकार था कि एक उद्धारकर्ता की प्रतीक्षा है जो पापियों के लिए मरेगा, — एक उद्धारकर्ता जो मनुष्य के पाप को दूर करेगा, उसके स्थान पर उसका प्रतिनिधि और पाप-वाहक बनकर दुःख उठाकर। (1 पतरस 3:18।) यह मान लेना बेतुका है कि निर्दोष पशुओं का बिना किसी स्पष्ट उद्देश्य का अर्थहीन वध अनन्त परमेश्वर को प्रसन्न कर सकता था!

(आ) हाबिल ने जब कैन से उत्तम बलिदान चढ़ाया, तब उसकी दृष्टि मसीह पर थी। न केवल हाबिल का मन अपने भाई से उत्तम था, परन्तु उसने प्रतिनिधि-बलिदान का ज्ञान और प्रायश्चित में अपना विश्वास प्रकट किया। उसने अपने झुण्ड के पहिलौठे लहू समेत चढ़ाए, और ऐसा करके यह विश्वास प्रकट किया कि बिना लहू बहाए क्षमा नहीं होती। (इब्रानियों 11:4।)

(इ) जलप्रलय से पहले की बढ़ती हुई दुष्टता के दिनों में हनोक ने मसीह ही के विषय में भविष्यद्वाणी की थी। — उसने कहा, "देखो, प्रभु अपने लाखों पवित्रों के साथ आया, कि सब का न्याय करे।" (यहूदा 14, 15।)

(ई) जब अब्राहम प्रतिज्ञा के देश में तम्बुओं में रहता था, तब उसकी दृष्टि मसीह पर थी। उसने विश्वास किया कि उसके वंश में — उसके घराने में जन्मे एक जन में — पृथ्वी की सारी जातियाँ आशीष पाएँगी। विश्वास से उसने मसीह का दिन देखा और आनन्द किया। (यूहन्ना 8:56।)

(उ) याकूब ने मरते समय अपने पुत्रों से जो बात कही, वह मसीह ही के विषय में थी। उसने उस गोत्र को चिन्हित किया जिसमें से वह जन्म लेगा, और उस "इकट्ठे होने" की भविष्यद्वाणी की जो उसकी ओर होना है और जो अब तक पूरा नहीं हुआ। "यहूदा से राजदण्ड न छूटेगा, और न उसके वंश से व्यवस्था देनेवाला अलग होगा, जब तक शीलो न आए; और राज्य-राज्य के लोग उसके अधीन हो जाएँगे।" (उत्पत्ति 49:10।)

(ऊ) परमेश्वर ने मूसा के हाथ से इस्राएल को जो विधि-व्यवस्था दी, उसका सार मसीह ही था। सुबह-शाम की बलि, — लहू का निरन्तर बहाया जाना, — वेदी, — दयासन, — महायाजक, — फसह, — प्रायश्चित का दिन, — जंगल में छोड़ा जानेवाला बकरा: — ये सब मसीह और उसके कार्य के अनेक चित्र, प्रतिरूप और चिन्ह थे। परमेश्वर ने अपने लोगों की निर्बलता पर तरस खाया। उसने उन्हें "मसीह" की शिक्षा पंक्ति-पर-पंक्ति दी, और जैसे हम छोटे बच्चों को सिखाते हैं, वैसे ही दृष्टान्तों के द्वारा। विशेष रूप से इसी अर्थ में "व्यवस्था यहूदियों को मसीह के पास ले जाने के लिए हमारी शिक्षक थी।" (गलातियों 3:24।)

(ग) यह मसीह ही थे जिनकी ओर परमेश्वर ने इस्राएल का ध्यान उन सब दैनिक चमत्कारों के द्वारा खींचा जो जंगल में उनकी आँखों के सामने किए गए। बादल और आग का वह खम्भा जो उनका मार्गदर्शन करता था,—स्वर्ग से मिलनेवाला वह मन्ना जो हर सुबह उन्हें खिलाता था,—चट्टान के फोड़े जाने से निकला वह जल जो उनके साथ-साथ चलता रहा,—ये सब और इनमें से हर एक मसीह की छाया थे। पीतल का साँप, उस अविस्मरणीय अवसर पर जब उन पर जलानेवाले साँपों की विपत्ति भेजी गई थी, मसीह का प्रतीक था। (1 कुरिन्थियों 10:4; यूहन्ना 3:14।)

(घ) सब न्यायी मसीह ही के प्रतिरूप थे। यहोशू, और दाऊद, और गिदोन, और यिप्तह, और शिमशोन, और वे सब जिन्हें परमेश्वर ने इस्राएल को बन्धुआई से छुड़ाने के लिए उठाया,—सब मसीह के प्रतीक थे। चाहे उनमें से कुछ कितने ही निर्बल, अस्थिर और दोषपूर्ण थे, फिर भी वे दूर भविष्य की उत्तम बातों के उदाहरण ठहराए गए थे। इन सबका उद्देश्य यही था कि गोत्रों को उस कहीं अधिक महान छुड़ानेवाले की स्मृति दिलाएँ जो अभी आनेवाला था।

(ङ) राजा दाऊद मसीह का प्रतिरूप था। जब थोड़े ही लोग उसका आदर करते थे तब वह अभिषिक्त और चुना गया,—शाऊल और इस्राएल के सब गोत्रों ने उसे तुच्छ जाना और ठुकराया,—उसे सताया गया और प्राण बचाने के लिए भागना पड़ा,—वह जीवन भर दुःखी पुरुष रहा, फिर भी अन्त में विजयी हुआ;—इन सब बातों में दाऊद मसीह का प्रतिनिधित्व करता था।

(च) यशायाह से लेकर मलाकी तक सब भविष्यद्वक्ताओं ने मसीह ही के विषय में कहा। उन्होंने धुँधले दर्पण में देखा। वे कभी उसके दुःखों पर ठहरते थे, और कभी उस महिमा पर जो उसके बाद आनेवाली थी। (1 पतरस 1:11।) उन्होंने सदा हमारे लिए मसीह के पहले आगमन और दूसरे आगमन का भेद स्पष्ट नहीं किया। एक सीध में एक के पीछे एक रखी दो मोमबत्तियों के समान, वे कभी दोनों आगमनों को एक साथ देखते और एक ही साँस में उनकी चर्चा कर देते थे। कभी पवित्र आत्मा की प्रेरणा से उन्होंने क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह के समय के विषय में लिखा, और कभी अन्तिम दिनों में मसीह के राज्य के विषय में। परन्तु मरते हुए यीशु या राज्य करते हुए यीशु का विचार ही आप उनके मन में सदा सर्वोपरि पाएँगे।

(छ) मुझे कहने की आवश्यकता नहीं कि सारा नया नियम मसीह ही से भरा है। सुसमाचार की पुस्तकों में "मसीह" मनुष्यों के बीच जीते, बोलते और चलते-फिरते दिखाई देते हैं। प्रेरितों के काम में "मसीह" का प्रचार, प्रकाशन और घोषणा की गई है। पत्रियों में "मसीह" के विषय में लिखा गया, उसकी व्याख्या की गई और उसे ऊँचा उठाया गया है। परन्तु आदि से अन्त तक एक नाम हर नाम से ऊपर है, और वह मसीह का नाम है।

मैं इस लेख के हर पाठक से आग्रह करता हूँ कि वह बार-बार अपने आप से पूछे कि उसके लिए बाइबल क्या है। क्या यह ऐसी बाइबल है जिसमें आपने भले नैतिक उपदेशों और खरी सलाह से अधिक कुछ नहीं पाया? या ऐसी बाइबल है जिसमें आपने मसीह को पाया है? क्या यह ऐसी बाइबल है जिसमें "मसीह ही सब कुछ है"? यदि नहीं, तो मैं आपसे साफ़ कहता हूँ कि अब तक आपने अपनी बाइबल का बहुत ही थोड़ा लाभ उठाया है। आप उस मनुष्य के समान हैं जो सौर-मण्डल का अध्ययन करता है और अपने अध्ययन में उस सूर्य को छोड़ देता है जो सबका केन्द्र है। यदि आपको अपनी बाइबल नीरस पुस्तक लगे तो कोई आश्चर्य नहीं!

III. तीसरी बात, आइए हम समझें कि पृथ्वी पर सब सच्चे मसीहियों के धर्म में "मसीह ही सब कुछ है"

यह कहते हुए मैं चाहता हूँ कि मुझे गलत न समझा जाए। मैं पिता परमेश्वर के चुनाव और पवित्र आत्मा परमेश्वर के पवित्रीकरण को हर उद्धार पानेवाले के उद्धार के लिए नितान्त आवश्यक मानता हूँ। मेरा मानना है कि किसी भी मनुष्य को महिमा तक पहुँचाने में त्रिएकता के तीनों व्यक्तियों की क्रिया में पूर्ण सामंजस्य और एकता है, और तीनों मिलकर उसे पाप और नरक से छुड़ाने का एक संयुक्त कार्य करते हैं। जैसा पिता है, वैसा ही पुत्र है, और वैसा ही पवित्र आत्मा है। पिता दयालु है, पुत्र दयालु है, पवित्र आत्मा दयालु है। जिन तीनों ने आरम्भ में कहा, "हम बनाएँ," उन्हीं ने यह भी कहा, "हम छुड़ाएँ और बचाएँ।" मेरा मानना है कि जो कोई स्वर्ग पहुँचेगा वह अपने उद्धार की सारी महिमा पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा को देगा, जो एक परमेश्वर में तीन व्यक्ति हैं।

परन्तु साथ ही, मैं पवित्रशास्त्र में इसका स्पष्ट प्रमाण देखता हूँ कि धन्य त्रिएकता की यह इच्छा है कि प्राणों के उद्धार के विषय में मसीह को प्रमुखता से और स्पष्ट रूप से ऊँचा उठाया जाए। मसीह को "वचन" के रूप में प्रकट किया गया है, जिसके द्वारा पापियों के प्रति परमेश्वर का प्रेम प्रकट होता है। मसीह का देहधारण और क्रूस पर उसकी प्रायश्चित्तकारी मृत्यु वह बड़ी कोने की आधारशिला है जिस पर उद्धार की सारी योजना टिकी है। मसीह वह मार्ग और द्वार है जिसके द्वारा ही परमेश्वर के निकट पहुँचा जा सकता है। मसीह वह जड़ है जिसमें सब चुने हुए पापियों को कलम लगाया जाना है। मसीह ही परमेश्वर और मनुष्य के बीच, स्वर्ग और पृथ्वी के बीच, पवित्र त्रिएकता और आदम के दीन पापी सन्तान के बीच एकमात्र मिलन-स्थल है। पिता परमेश्वर ने मसीह ही पर "छाप" लगाई और उसे नियुक्त किया कि मरे हुए संसार को जीवन पहुँचाए। (यूहन्ना 6:27।) मसीह ही को पिता ने एक प्रजा दी है जिसे महिमा तक पहुँचाना है। मसीह ही के विषय में आत्मा गवाही देता है, और क्षमा और शान्ति के लिए सदा किसी प्राण को उसी के पास ले जाता है। संक्षेप में, "पिता को यह अच्छा लगा कि सारी परिपूर्णता मसीह में वास करे।" (कुलुस्सियों 1:19।) जो स्थान स्वर्ग के आकाश में सूर्य का है, वही सच्चे मसीही धर्म में मसीह का है।

ये बातें मैं स्पष्टीकरण के रूप में कहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि मेरे पाठक साफ़ समझ लें कि जब मैं कहता हूँ "मसीह ही सब कुछ है," तो मेरा अर्थ पिता और आत्मा के कार्य को बाहर कर देना नहीं है। अब मैं बताता हूँ कि मेरा अर्थ क्या है।

(क) परमेश्वर के सम्मुख पापी के धर्मी ठहराए जाने में मसीह ही सब कुछ है।

केवल उसी के द्वारा हम पवित्र परमेश्वर के साथ मेल पा सकते हैं। केवल उसी के द्वारा हमें परमप्रधान की उपस्थिति में प्रवेश मिल सकता है और हम वहाँ निडर खड़े रह सकते हैं। "हमें उस पर विश्वास करने से हियाव और भरोसे के साथ पहुँचने का अधिकार है।" केवल उसी में परमेश्वर धर्मी रहकर अभक्त को धर्मी ठहरा सकता है। (इफिसियों 3:12; रोमियों 3:26।)

कोई भी नश्वर मनुष्य किस साधन से परमेश्वर के सम्मुख आ सकता है? उस महिमामय सत्ता के सामने, जिसकी दृष्टि में स्वर्ग भी निर्मल नहीं, छूट पाने के लिए हम कौन-सी दलील ला सकते हैं?

क्या हम कहेंगे कि हमने परमेश्वर के प्रति अपना कर्तव्य पूरा किया है? क्या हम कहेंगे कि हमने अपने पड़ोसी के प्रति अपना कर्तव्य पूरा किया है? क्या हम अपनी प्रार्थनाएँ सामने रखेंगे?—अपनी नियमितता?—अपनी नैतिकता?—अपने सुधार?—अपना कलीसिया जाना? क्या हम इनमें से किसी के कारण ग्रहण किए जाने की माँग करेंगे?

इन बातों में से कौन परमेश्वर की भेदी दृष्टि की जाँच को सह सकेगी? इनमें से कौन सी बात सचमुच हमें धर्मी ठहराएगी? कौन सी हमें न्याय के बीच से पार निकालकर महिमा में सुरक्षित पहुँचाएगी?

कोई नहीं, कोई नहीं, कोई नहीं! दस आज्ञाओं में से कोई भी आज्ञा ले लें, और आइए हम उसी से अपने आप को जाँचें। हमने उसे बार-बार तोड़ा है। हम परमेश्वर को हज़ार में से एक बात का भी उत्तर नहीं दे सकते।—हम में से किसी को भी ले लें, और उसके चाल-चलन को ध्यान से देखें,—तो हम पापियों के सिवा कुछ नहीं हैं। फैसला एक ही है: हम सब दोषी हैं,—सब नरक के योग्य हैं,—सब को मरना ही चाहिए। फिर हम किस के सहारे परमेश्वर के सामने आएँ?

हमें यीशु के नाम से आना होगा,—किसी और आधार पर खड़े हुए बिना,—इसके सिवा कोई और विनती किए बिना, कि "मसीह भक्तिहीनों के लिये क्रूस पर मरा, और मैं उस पर भरोसा रखता हूँ। मसीह मेरे लिये मरा, और मैं उस पर विश्वास करता हूँ।"

हमारे ज्येष्ठ भाई का वस्त्र,—मसीह की धार्मिकता,—यही एकमात्र चोगा है जो हमें ढाँप सकता है, और हमें स्वर्ग के प्रकाश में बिना लज्जा के खड़े होने के योग्य बना सकता है।

यीशु का नाम ही वह एकमात्र नाम है जिसके द्वारा हमें अनन्त महिमा के फाटक से प्रवेश मिलेगा। यदि हम उस फाटक पर अपने नाम से आएँ, तो हम खोए गए हैं, हमें भीतर नहीं आने दिया जाएगा, हम व्यर्थ ही खटखटाएँगे। यदि हम यीशु के नाम से आएँ, तो यह एक अनुमति-पत्र और शिब्बोलेत है, और हम भीतर जाकर जीवित रहेंगे।

मसीह के लहू का चिह्न ही वह एकमात्र चिह्न है जो हमें विनाश से बचा सकता है। जब अन्तिम दिन स्वर्गदूत आदम की सन्तानों को अलग-अलग करेंगे, तब यदि हम उस प्रायश्चित्त करनेवाले लहू से चिह्नित न पाए गए, तो हमारे लिये अच्छा होता कि हम कभी जन्मे ही न होते।

ओह, हम यह कभी न भूलें कि जो आत्मा धर्मी ठहराया जाना चाहती है उसके लिये मसीह को "सब कुछ" होना चाहिए!—हमें भिखारियों के रूप में स्वर्ग जाने पर सन्तुष्ट होना होगा,—केवल यीशु पर विश्वास करनेवालों के रूप में, मुफ़्त अनुग्रह से उद्धार पाकर,—नहीं तो हमारा उद्धार कभी होगा ही नहीं।

क्या इस पुस्तक के पाठकों में कोई असावधान, संसारी आत्मा है? क्या कोई है जो यह सोचता है कि अन्त में मसीह के बिना जल्दी से यह कह देने से, "हे प्रभु, मुझ पर दया कर," वह स्वर्ग पहुँच जाएगा? मित्र, तू अपने लिये दुःख बो रहा है, और यदि तू न बदला, तो अनन्त विपत्ति में जाग उठेगा।

क्या इस पुस्तक के पाठकों में कोई घमण्डी, दिखावटी आत्मा है? क्या कोई यह सोच रहा है कि अपने ही कामों से अपने आप को स्वर्ग के योग्य बना लेगा, और इतना भला बन जाएगा कि जाँच में उत्तीर्ण हो जाए?—भाई, तू बाबुल का गुम्मट बना रहा है, और अपनी वर्तमान दशा में तू कभी स्वर्ग नहीं पहुँचेगा।

परन्तु क्या इस पुस्तक के पाठकों में कोई परिश्रम करनेवाला, बोझ से दबा हुआ जन है? क्या कोई है जो उद्धार पाना चाहता है, और अपने आप को घिनौना पापी अनुभव करता है? मैं ऐसे जन से कहता हूँ, "मसीह के पास आ, और वह तुझे बचाएगा। मसीह के पास आ, और अपनी आत्मा का बोझ उस पर डाल दे। मत डर: केवल विश्वास कर।"

क्या तू क्रोध से डरता है? मसीह तुझे आनेवाले क्रोध से छुड़ा सकता है।—क्या तू टूटी हुई व्यवस्था का श्राप अनुभव करता है? मसीह तुझे व्यवस्था के श्राप से छुड़ा सकता है।—क्या तू दूर होने का अनुभव करता है? मसीह ने दुःख उठाया, ताकि तुझे परमेश्वर के निकट ले आए।—क्या तू अशुद्ध अनुभव करता है? मसीह का लहू सब पाप को धो सकता है।—क्या तू अपने आप को अधूरा अनुभव करता है? तू मसीह में सिद्ध ठहरेगा।—क्या तुझे लगता है कि तू कुछ भी नहीं है? मसीह तेरी आत्मा के लिये "सब में सब" होगा।—कभी कोई सन्त किसी और बात के साथ स्वर्ग नहीं पहुँचा, सिवाय इसके, "मैं मेम्ने के लहू में धोया गया और श्वेत किया गया।" (प्रकाशितवाक्य 7:14।)

(ख) परन्तु फिर, मसीह केवल सच्चे मसीही के धर्मी ठहराए जाने में ही सब कुछ नहीं है, वरन् उसके पवित्रीकरण में भी सब कुछ है।

मैं नहीं चाहता कि कोई मुझे गलत समझे। मेरा तनिक भी यह अर्थ नहीं कि मैं पवित्र आत्मा के कार्य को कम आँकूँ। परन्तु मैं यह कहता हूँ कि कोई मनुष्य तब तक कभी पवित्र नहीं होता जब तक वह मसीह के पास आकर उससे एक नहीं हो जाता। तब तक उसके काम मृत काम हैं, और उसमें कोई पवित्रता है ही नहीं।—पहले तुझे मसीह से जुड़ना होगा, और तब तू पवित्र होगा। "उसके बिना,—उससे अलग होकर,—तू कुछ भी नहीं कर सकता।" (यूहन्ना 15:5।)

और कोई मनुष्य पवित्रता में तब तक नहीं बढ़ सकता जब तक वह मसीह में बना न रहे। मसीह वह बड़ी जड़ है जिससे हर विश्वासी को आगे बढ़ने का बल खींचना है। पवित्र आत्मा उसका विशेष दान है, अपने लोगों के लिये उसका मोल लिया हुआ दान। विश्वासी को केवल "मसीह यीशु को प्रभु करके ग्रहण" ही नहीं करना है, वरन् "उसी में चलते रहना, और उसी में जड़ पकड़ते और उसी में उन्नति करते जाना" है। (कुलुस्सियों 2:6, 7।)

क्या तू पवित्र होना चाहता है? तो मसीह वह मन्ना है जो तुझे प्रतिदिन खाना है, जैसे प्राचीनकाल में इस्राएल जंगल में खाता था। क्या तू पवित्र होना चाहता है? तो मसीह वह चट्टान है जिससे तुझे प्रतिदिन जीवन का जल पीना है। क्या तू पवित्र होना चाहता है? तो तुझे निरन्तर यीशु की ओर ताकते रहना होगा,—उसके क्रूस को देखते हुए, और परमेश्वर के साथ और निकटता से चलने के नए कारण सीखते हुए,—उसके आदर्श को देखते हुए, और उसे अपना नमूना बनाते हुए। उसे ताकते-ताकते तू उसके समान बन जाएगा। उसे ताकते-ताकते तेरे मुख पर तेरे जाने बिना ही तेज चमकेगा। अपने आप को कम और मसीह को अधिक देख, तो तू पाएगा कि उलझानेवाले पाप तुझसे झड़कर छूट रहे हैं, और तेरी आँखें प्रतिदिन अधिकाधिक प्रकाशित होती जा रही हैं। (इब्रानियों 12:2; 2 कुरिन्थियों 3:18।)

जंगल से ऊपर आने का सच्चा भेद यह है कि "अपने प्रिय के सहारे" टेक लगाए हुए ऊपर आया जाए। (श्रेष्ठगीत 8:5।) बलवन्त होने का सच्चा मार्ग यह है कि हम अपनी निर्बलता को पहचानें, और यह अनुभव करें कि मसीह को ही सब कुछ होना चाहिए। अनुग्रह में बढ़ने का सच्चा मार्ग यह है कि हम हर क्षण की आवश्यकताओं के लिये मसीह को एक सोते के समान काम में लाएँ। हमें उसे वैसे ही काम में लाना चाहिए जैसे भविष्यद्वक्ता की विधवा ने तेल को लिया,—केवल अपने ऋण चुकाने के लिये ही नहीं, वरन् उसी पर निर्वाह करने के लिये भी। हमें यह कहने के योग्य होने का यत्न करना चाहिए, "मैं शरीर में अब जो जीवित हूँ तो केवल उस विश्वास से जीवित हूँ जो परमेश्वर के पुत्र पर है, जिसने मुझ से प्रेम किया और मेरे लिये अपने आप को दे दिया।" (2 राजाओं 4:7; गलतियों 2:20।)

जो मसीह के बिना पवित्र होने का यत्न करते हैं, उन पर मुझे तरस आता है! तेरा सारा परिश्रम व्यर्थ है। तू छेदवाली थैली में धन डाल रहा है। तू छलनी में पानी उँडेल रहा है। तू एक विशाल गोल पत्थर को पहाड़ी पर ऊपर लुढ़का रहा है। तू बिना मिलाए गारे से दीवार खड़ी कर रहा है। मेरा विश्वास कर, तू गलत सिरे से आरम्भ कर रहा है। तुझे पहले मसीह के पास आना होगा, और वह तुझे अपना पवित्र करनेवाला आत्मा देगा। तुझे पौलुस के साथ यह कहना सीखना होगा, "जो मुझे सामर्थ्य देता है उसमें मैं सब कुछ कर सकता हूँ।" (फिलिप्पियों 4:13।)

(ग) परन्तु फिर, मसीह केवल सच्चे मसीही के पवित्रीकरण में ही सब कुछ नहीं है, वरन् वर्तमान समय में उसकी शान्ति में भी सब कुछ है।

उद्धार पाए हुए प्राण को बहुत से दुःख सहने पड़ते हैं। उसका शरीर और मनुष्यों के समान है,—निर्बल और नाशमान। उसका हृदय और मनुष्यों के समान है,—और प्रायः अधिक कोमल भी। उसे और लोगों की तरह परीक्षाएँ और हानियाँ सहनी पड़ती हैं,—और प्रायः उनसे अधिक। उसके हिस्से में भी प्रियजनों का वियोग, मृत्यु, निराशाएँ और क्रूस आते हैं। उसे संसार का विरोध सहना है,—जीवन में अपना स्थान निर्दोष रीति से निभाना है,—अपरिवर्तित सम्बन्धियों को धीरज से सहना है,—सताव झेलना है,—और एक दिन मृत्यु का सामना करना है।

और इन बातों के योग्य कौन है? एक विश्वासी को यह सब सहने की सामर्थ्य कौन देगा? केवल "मसीह में जो शान्ति है" वही। (फिलिप्पियों 2:1।)

यीशु सचमुच विपत्ति के दिन के लिए जन्मा हुआ भाई है। वह ऐसा मित्र है जो भाई से भी अधिक निकट रहता है, और केवल वही अपने लोगों को शान्ति दे सकता है। वह उनकी निर्बलताओं में उनके साथ दुःखी हो सकता है, क्योंकि उसने स्वयं दुःख उठाया। (इब्रानियों 4:15।) वह जानता है कि शोक क्या है, क्योंकि वह दुःखी पुरुष था। वह जानता है कि पीड़ित शरीर क्या है, क्योंकि उसका शरीर पीड़ा से तड़पाया गया। उसने पुकारा, "मेरी सब हड्डियाँ उखड़ गई हैं।" (भजन संहिता 22:14।) वह जानता है कि दरिद्रता और थकावट क्या है, क्योंकि वह प्रायः थका हुआ रहा और उसके पास सिर धरने की भी जगह न थी। वह जानता है कि अपने ही परिवार की निर्दयता क्या है, क्योंकि उसके भाइयों ने भी उस पर विश्वास न किया। अपने ही घर में उसका आदर न हुआ।

और यीशु ठीक-ठीक जानता है कि अपने पीड़ित लोगों को कैसे शान्ति दे। वह जानता है कि आत्मा के घावों में तेल और दाखरस कैसे उँडेले,—खाली हृदयों के अभाव को कैसे भरे,—थके हुए से समय पर उचित बात कैसे कहे,—टूटे हृदय को कैसे चंगा करे,—बीमारी में हमारा पूरा बिछौना कैसे बिछाए,—जब हम मूर्छित हों तब कैसे निकट आए और कहे, "मत डर: मैं तेरा उद्धार हूँ।" (विलापगीत 3:57।)

हम सहानुभूति के सुखद होने की बात करते हैं। मसीह की सहानुभूति के समान कोई सहानुभूति नहीं। हमारे सब क्लेशों में वह भी क्लेश उठाता है। वह हमारे दुःखों को जानता है। हमारी सारी पीड़ा में वह पीड़ित होता है, और भले वैद्य की नाईं वह हमारे लिए दुःख की एक बूँद भी आवश्यकता से अधिक नहीं नापेगा। दाऊद ने एक बार कहा, "जब मेरे मन में बहुत सी चिन्ताएँ होती हैं, तब तेरी दी हुई शान्ति से मेरा प्राण सुखी होता है।" (भजन संहिता 94:19।) मुझे निश्चय है कि बहुत से विश्वासी इतना ही कह सकते हैं। "यदि प्रभु स्वयं मेरे साथ न होता, तो गहरे जल मेरे प्राण पर चढ़ गए होते।" (भजन संहिता 124:5।)

एक विश्वासी अपनी सब विपत्तियों में से कैसे निकल आता है, यह आश्चर्य की बात है। वह जिस आग और जल में से होकर जाता है, उनमें से कैसे पार लगाया जाता है, यह समझ से परे लगता है। परन्तु इसका सच्चा कारण यही है,—कि मसीह केवल धर्मी ठहराया जाना और पवित्रीकरण ही नहीं, वरन शान्ति भी है।

हे तुम जो अटल शान्ति चाहते हो, मैं तुम्हें मसीह के पास जाने की सलाह देता हूँ! केवल उसी में कोई चूक नहीं है। धनवान अपने धन से निराश होते हैं। विद्वान अपनी पुस्तकों से निराश होते हैं। पति अपनी पत्नियों से निराश होते हैं। पत्नियाँ अपने पतियों से निराश होती हैं। माता-पिता अपनी सन्तानों से निराश होते हैं। राजनेता बहुत संघर्ष के बाद पद और सत्ता पा लेते हैं तो निराश होते हैं। वे अपनी हानि से जान लेते हैं कि उसमें सुख से अधिक पीड़ा है,—कि वह निराशा, खीझ, लगातार कष्ट, चिन्ता, व्यर्थता और आत्मा का दुःख है। परन्तु मसीह में कोई मनुष्य कभी निराश नहीं हुआ।

(घ) परन्तु जैसे मसीह एक सच्चे मसीही की वर्तमान शान्ति में सब कुछ है, वैसे ही आने वाले समय की उसकी आशाओं में भी मसीह ही सब कुछ है।

मेरा अनुमान है कि ऐसे स्त्री-पुरुष बहुत कम मिलेंगे जो अपनी आत्मा के विषय में किसी न किसी प्रकार की आशा न रखते हों। परन्तु अधिकांश लोगों की आशाएँ केवल व्यर्थ कल्पनाएँ हैं। वे किसी ठोस नींव पर नहीं टिकीं। परमेश्वर की सच्ची सन्तान,—सच्चे और पूरे मन वाले मसीही,—के सिवा कोई भी जीवित मनुष्य अपनी आशा का तर्कसंगत कारण नहीं बता सकता। जो आशा पवित्रशास्त्र के अनुसार नहीं, वह तर्कसंगत नहीं।

सच्चे मसीही के पास आगे देखने पर एक भली आशा है: संसारी मनुष्य के पास कोई नहीं। सच्चा मसीही दूर में प्रकाश देखता है: संसारी मनुष्य अन्धकार के सिवा कुछ नहीं देखता। और सच्चे मसीही की आशा क्या है? यही,—कि यीशु मसीह फिर आने वाला है, पाप से अलग होकर आने वाला है,—अपने सब लोगों के साथ आने वाला है,—हर आँसू पोंछने आने वाला है,—अपने सोए हुए सन्तों को कब्र से जिलाने आने वाला है,—अपने सारे परिवार को इकट्ठा करने आने वाला है, कि वे सदा उसके साथ रहें।

विश्वासी धीरजवन्त क्यों है? क्योंकि वह प्रभु के आने की बाट जोहता है। वह कठिन बातों को बिना कुड़कुड़ाए सह सकता है। वह जानता है कि समय थोड़ा है। वह चुपचाप राजा की प्रतीक्षा करता है।

वह सब बातों में संयमी क्यों है? क्योंकि वह आशा रखता है कि उसका प्रभु शीघ्र लौटेगा। उसका धन स्वर्ग में है, उसकी उत्तम वस्तुएँ अभी आने वाली हैं। संसार उसका विश्रामस्थान नहीं, वरन एक सराय है; और सराय घर नहीं होती। वह जानता है कि "जो आनेवाला है, वह आएगा, और देर न करेगा।" मसीह आने वाला है, और यही काफ़ी है। (इब्रानियों 10:37।)

यह सचमुच "धन्य आशा" है! (तीतुस 2:13।) अब पाठशाला का समय है,—फिर अनन्त अवकाश है। अब झंझट भरे संसार की लहरों में डगमगाना है,—फिर शान्त बन्दरगाह है। अब बिखरना है,—फिर इकट्ठा होना है। अब बोने का समय है,—फिर कटनी है। अब काम का समय है,—फिर मजदूरी है। अब क्रूस है,—फिर मुकुट है।

लोग इस संसार से अपनी "अपेक्षाओं" और आशाओं की बात करते हैं। किसी की अपेक्षाएँ उद्धार पाए हुए प्राण की अपेक्षाओं के समान ठोस नहीं। वह कह सकता है, "हे मेरे प्राण, तू केवल परमेश्वर ही की ओर मन लगाकर चुपचाप रह, क्योंकि मेरी आशा उसी से है।" (भजन संहिता 62:5।)

सब सच्चे उद्धार देने वाले धर्म में मसीह ही सब कुछ है: धर्मी ठहराए जाने में सब कुछ,—पवित्रीकरण में सब कुछ,—शान्ति में सब कुछ,—आशा में सब कुछ। धन्य है उस माता की सन्तान जो यह जानती है, और उससे भी कहीं अधिक धन्य वह जो इसे अनुभव भी करती है। ओह, कि मनुष्य अपने आप को परखें, और देखें कि अपनी आत्मा के लिए वे इसके विषय में क्या जानते हैं!

IV. एक बात और मैं जोड़ूँगा, और फिर मैं समाप्त करूँगा। आइए हम समझें कि स्वर्ग में भी मसीह ही सब कुछ होगा।

मैं इस बात पर अधिक देर नहीं ठहर सकता। यदि स्थान और अवसर भी होता, तो भी मुझमें सामर्थ्य नहीं। अनदेखी बातों और अनजाने संसार का वर्णन मैं कठिनाई से ही कर सकता हूँ। परन्तु इतना मैं जानता हूँ कि जो भी स्त्री-पुरुष स्वर्ग पहुँचेंगे, वे पाएँगे कि वहाँ भी "मसीह ही सब कुछ है।"

सुलैमान के मन्दिर की वेदी के समान, क्रूस पर चढ़ाया गया मसीह स्वर्ग में सबसे महान वस्तु होगा। उस वेदी पर मन्दिर के फाटकों में प्रवेश करनेवाले प्रत्येक जन की दृष्टि पड़ती थी। वह पीतल की एक बड़ी वेदी थी, बीस हाथ चौड़ी—मन्दिर के सामने के भाग के बराबर चौड़ी। (2 इतिहास 3:4; 4:1।) ठीक इसी प्रकार यीशु महिमा में प्रवेश करनेवाले सब लोगों की आँखों को भर देगा। सिंहासन के बीच में, आराधना करते हुए स्वर्गदूतों और पवित्र लोगों से घिरा हुआ, "वध किया हुआ मेम्ना" होगा। और "मेम्ना" उस स्थान की "ज्योति" होगा। (प्रकाशितवाक्य 5:6; 21:23।)

प्रभु यीशु की स्तुति स्वर्ग के सब निवासियों का अनन्त गीत होगी। वे ऊँचे शब्द से कहेंगे, "वध किया हुआ मेम्ना ही योग्य है। जो सिंहासन पर बैठा है, उसका और मेम्ने का धन्यवाद, और आदर, और महिमा, और राज्य युगानुयुग रहे।" (प्रकाशितवाक्य 5:12, 13।)

प्रभु यीशु की सेवा स्वर्ग के सब निवासियों का एक अनन्त काम होगा। हम "उसके मन्दिर में दिन रात उसकी सेवा करेंगे।" (प्रकाशितवाक्य 7:13।) यह विचार धन्य है कि हम अन्त में बिना किसी विघ्न के उसकी सेवा में उपस्थित रहेंगे, और बिना थके उसके लिए काम करेंगे।

स्वयं मसीह की उपस्थिति स्वर्ग के निवासियों का एक चिरस्थायी आनन्द होगी। हम "उसका मुँह देखेंगे," और उसका शब्द सुनेंगे, और जैसे मित्र मित्र से बातें करता है वैसे ही उससे बातें करेंगे। (प्रकाशितवाक्य 22:4।) यह विचार मधुर है कि ब्याह के भोज में चाहे और कोई न हो, स्वयं स्वामी वहाँ अवश्य होगा। उसकी उपस्थिति हमारी सब आवश्यकताओं को पूरा करेगी। (भजन संहिता 17:15।)

जिन्होंने सच्चाई से प्रभु यीशु मसीह से प्रेम किया है, उनके लिए स्वर्ग कैसा मधुर और महिमामय घर होगा! यहाँ हम उस पर विश्वास करके जीवित रहते हैं, और उसे न देखते हुए भी शान्ति पाते हैं। वहाँ हम उसे आमने-सामने देखेंगे, और पाएँगे कि वह सर्वांग सुन्दर है। सचमुच "आँखों से देख लेना मन की चंचलता से उत्तम है!" (सभोपदेशक 6:9।)

परन्तु हाय, कितने ही लोग जो मरने पर "स्वर्ग जाने" की बातें करते हैं, स्वर्ग के लिए कितने अयोग्य हैं, जबकि उनमें स्पष्टतः न तो उद्धार देनेवाला विश्वास है, और न मसीह से कोई सच्ची जान-पहचान। तुम यहाँ मसीह को कोई आदर नहीं देते। तुम्हारी उसके साथ कोई सहभागिता नहीं। तुम उससे प्रेम नहीं रखते। हाय! तुम स्वर्ग में क्या करोगे? वह तुम्हारे लिए कोई स्थान न होगा। उसके आनन्द तुम्हारे लिए आनन्द न होंगे। उसका सुख ऐसा सुख होगा जिसमें तुम प्रवेश नहीं कर सकते। उसके काम तुम्हारे हृदय के लिए थकावट और बोझ होंगे। ओह, अति देर होने से पहले मन फिराओ और बदल जाओ!

मुझे आशा है कि मैंने अब दिखा दिया है कि "मसीह ही सब कुछ है" इस छोटे से कथन की नींव कितनी गहरी है।

यदि स्थान होता, तो मैं जो कुछ कह चुका हूँ उसमें सरलता से और जोड़ सकता था। यह विषय समाप्त नहीं हुआ है। मैं तो इसकी सतह पर ही चला हूँ। इससे जुड़े हुए बहुमूल्य सत्य की खानें हैं, जिन्हें मैंने बिना खोले छोड़ दिया है।

मैं दिखा सकता था कि दृश्य कलीसिया में मसीह को कैसे सब कुछ होना चाहिए। भव्य धार्मिक भवन, अनेक धार्मिक सेवाएँ, शानदार रीतियाँ, नियुक्त जनों के दल—ये सब परमेश्वर की दृष्टि में कुछ भी नहीं हैं, यदि प्रभु यीशु का अपने सब पदों में आदर, बड़ाई और ऊँचा किया जाना न हो। वह कलीसिया केवल एक मृत शव है जिसमें मसीह "सब कुछ" नहीं है।

मैं दिखा सकता था कि सेवकाई में मसीह को कैसे सब कुछ होना चाहिए। नियुक्त जनों का जो महान काम ठहराया गया है, वह मसीह को ऊँचा उठाना है। हमें उस खम्भे के समान होना है जिस पर पीतल का साँप टाँगा गया था। जब तक हम विश्वास के उस महान विषय को ऊँचा उठाते हैं तब तक हम उपयोगी हैं, इससे आगे नहीं। हमें राजा के पुत्र के विषय में विद्रोही संसार को समाचार पहुँचानेवाले राजदूत होना है, और यदि हम लोगों को अपने और अपने पद के विषय में उसकी अपेक्षा अधिक सोचना सिखाते हैं, तो हम अपने स्थान के योग्य नहीं हैं। आत्मा उस सेवक का कभी आदर नहीं करेगा जो मसीह की गवाही नहीं देता—जो मसीह को "सब कुछ" नहीं बनाता।

मैं दिखा सकता था कि मसीह के विभिन्न पदों का वर्णन करने में बाइबल में भाषा मानो चुक जाती है। मैं बता सकता था कि मसीह की परिपूर्णता को प्रकट करने में जो उपमाएँ प्रयोग की गई हैं वे मानो अनगिनत हैं। महायाजक, मध्यस्थ, छुड़ानेवाला, उद्धारकर्ता, सहायक, चरवाहा, वैद्य, दूल्हा, सिर, जीवन की रोटी, जगत की ज्योति, मार्ग, द्वार, दाखलता, चट्टान, सोता, धार्मिकता का सूर्य, अग्रदूत, जमानत देनेवाला, सेनापति, जीवन का राजकुमार, आमीन, सर्वशक्तिमान, विश्वास का कर्ता और सिद्ध करनेवाला, परमेश्वर का मेम्ना, पवित्र लोगों का राजा, अद्भुत, पराक्रमी परमेश्वर, मंत्री, आत्माओं का अध्यक्ष—ये सब और इनके अतिरिक्त और बहुत से नाम पवित्रशास्त्र में मसीह को दिए गए हैं। इनमें से प्रत्येक उस हर एक जन के लिए शिक्षा और सांत्वना का सोता है जो उसमें से पीना चाहता है। प्रत्येक लाभदायक मनन के लिए सामग्री देता है।

परन्तु मुझे आशा है कि जिस बात को मैं इस लेख के सब पाठकों के मन पर अंकित करना चाहता हूँ, उस पर प्रकाश डालने के लिए मैंने पर्याप्त कह दिया है। मुझे आशा है कि मैंने उन व्यावहारिक निष्कर्षों का अत्यधिक महत्त्व दिखाने के लिए पर्याप्त कहा है जिनके साथ मैं अब इस विषय को समाप्त करना चाहता हूँ।

(1) क्या मसीह ही सब कुछ है? तो आओ हम मसीह-रहित धर्म की सम्पूर्ण निरर्थकता को सीखें।

ऐसे बपतिस्मा पाए हुए स्त्री-पुरुष बहुत ही हैं जो व्यावहारिक रूप से मसीह के विषय में कुछ भी नहीं जानते। उनका धर्म कुछ अस्पष्ट धारणाओं और खोखले वाक्यांशों में सिमटा है। "उन्हें भरोसा है कि वे दूसरों से बुरे नहीं हैं। वे अपनी कलीसिया से जुड़े रहते हैं। वे अपना कर्तव्य निभाने का यत्न करते हैं। वे किसी की हानि नहीं करते। उन्हें आशा है कि परमेश्वर उन पर दया करेगा। उन्हें भरोसा है कि सर्वशक्तिमान उनके पाप क्षमा करेगा, और मरने पर उन्हें स्वर्ग ले जाएगा।" उनका सारा धर्म लगभग यही है!

परन्तु ये लोग व्यावहारिक रूप से मसीह के विषय में क्या जानते हैं? कुछ नहीं: कुछ भी नहीं! उसके पदों और कार्य, उसके लहू, उसकी धार्मिकता, उसकी मध्यस्थता, उसके याजकपद, उसकी मध्यस्थता की प्रार्थना से उन्हें अनुभव द्वारा क्या जान-पहचान है? कोई नहीं: बिलकुल नहीं! उनसे उद्धार देनेवाले विश्वास के विषय में पूछो—आत्मा से नया जन्म लेने के विषय में पूछो—मसीह यीशु में पवित्र किए जाने के विषय में पूछो। तुम्हें क्या उत्तर मिलेगा? तुम उनके लिए अजनबी हो। तुमने उनसे बाइबल के सरल प्रश्न पूछे हैं। परन्तु वे अनुभव से इनके विषय में उतना ही जानते हैं जितना कोई बौद्ध या तुर्क। और फिर भी सारे संसार में सैकड़ों और हज़ारों लोगों का, जो मसीही कहलाते हैं, यही धर्म है!

यदि इस लेख का कोई पाठक इस प्रकार का मनुष्य है, तो मैं उसे स्पष्ट चेतावनी देता हूँ कि ऐसी मसीही रीति उसे कभी स्वर्ग में नहीं पहुँचाएगी। मनुष्य की दृष्टि में तो यह भली प्रतीत हो सकती है। वेस्ट्री की सभा में, व्यापार के स्थान में, हाउस ऑफ़ कॉमन्स में या गलियों में यह भली-भाँति चल भी सकती है। परन्तु यह तुम्हें कभी शान्ति न देगी। यह तुम्हारे विवेक को कभी सन्तुष्ट न करेगी। यह तुम्हारी आत्मा को कभी न बचाएगी।

मैं तुम्हें स्पष्ट चेतावनी देता हूँ कि मसीह के बिना और मसीह के द्वारा छोड़ किसी और रीति से परमेश्वर के दयालु होने की सारी धारणाएँ और सिद्धान्त निराधार भ्रम और खोखली कल्पनाएँ हैं। ऐसे सिद्धान्त उतने ही विशुद्ध रूप से मनुष्य की गढ़ी हुई मूर्ति हैं जितनी जगन्नाथ की मूर्ति। वे सब पृथ्वी की हैं, पार्थिव हैं। वे कभी स्वर्ग से नहीं उतरीं। स्वर्ग के परमेश्वर ने मसीह ही को एकमात्र उद्धारकर्ता और जीवन का मार्ग ठहराकर उस पर मुहर लगाई है, और जो कोई उद्धार पाना चाहे उसे उसी के द्वारा उद्धार पाने में सन्तुष्ट होना होगा, नहीं तो वह कभी उद्धार न पाएगा।

प्रत्येक पाठक ध्यान दे। मैं आज तुम्हें उचित चेतावनी देता हूँ। मसीह के बिना कोई धर्म तुम्हारी आत्मा को कभी न बचाएगा।

(2) मैं एक और बात कहता हूँ। क्या मसीह ही सब कुछ है? तो फिर सीखो कि उद्धार के विषय में मसीह के साथ किसी और बात को जोड़ना कितनी भारी मूर्खता है।

बपतिस्मा पाए हुए स्त्री-पुरुषों की एक बड़ी भीड़ है जो मसीह का आदर करने का दावा करती है, परन्तु वास्तव में उसका बड़ा अनादर करती है। वे अपने धर्म की व्यवस्था में मसीह को एक स्थान तो देते हैं, परन्तु वह स्थान नहीं जो परमेश्वर ने उसके लिए ठहराया था। उनके प्राणों के लिए अकेला मसीह "सब कुछ और सब में" नहीं है।—नहीं! वह या तो मसीह और कलीसिया है,—या मसीह और संस्कार,—या मसीह और उसके नियुक्त किए हुए सेवक,—या मसीह और उनका अपना मन फिराव,—या मसीह और उनकी अपनी भलाई,—या मसीह और उनकी अपनी प्रार्थनाएँ,—या मसीह और उनकी अपनी निष्कपटता और दान-पुण्य, जिन पर वे व्यवहार में अपनी आत्मा को टिकाते हैं।

यदि इस लेख का कोई पाठक ऐसा मसीही है, तो मैं उसे भी स्पष्ट चेतावनी देता हूँ कि उसका धर्म परमेश्वर की दृष्टि में अपराध है। तुम परमेश्वर की उद्धार की योजना को बदलकर अपनी गढ़ी हुई योजना बना रहे हो। जो महिमा मसीह की है उसे किसी और को देकर तुम वास्तव में मसीह को उसके सिंहासन से उतार रहे हो।

मुझे इसकी चिन्ता नहीं कि ऐसा धर्म कौन सिखाता है, और तुम किसके कहने पर अपना भरोसा बाँधते हो। चाहे वह पोप हो या कार्डिनल, आर्कबिशप हो या अध्यक्ष, डीन हो या आर्कडीकन, प्रेस्बिटर हो या डीकन, एपिस्कोपेलियन हो या प्रेस्बिटेरियन, बैप्टिस्ट हो या स्वतंत्र मण्डलीवाला, वेस्लियन हो या प्लिमथ ब्रदर, जो कोई मसीह के साथ कुछ भी जोड़ता है, वह तुम्हें गलत सिखाता है।

मुझे इसकी चिन्ता नहीं कि तुम मसीह के साथ क्या जोड़ते हो। चाहे वह रोम की कलीसिया में सम्मिलित होने की आवश्यकता हो, या एपिस्कोपेलियन होने की, या स्वतंत्र कलीसिया का सदस्य बनने की, या प्रार्थना-पुस्तक को त्यागने की, या डुबकी दिए जाने की,—उद्धार के विषय में तुम व्यवहार में मसीह के साथ जो कुछ भी जोड़ो, उससे तुम मसीह की हानि करते हो।

सावधान रहो कि तुम क्या कर रहे हो। मसीह के सेवकों को वह आदर देने से सावधान रहो जो मसीह को छोड़ किसी का नहीं है। प्रभु की विधियों को वह आदर देने से सावधान रहो जो प्रभु ही का है। अपनी आत्मा का बोझ मसीह को छोड़ किसी और पर, केवल मसीह पर ही छोड़ने से सावधान रहो।

(3) मैं एक और बात कहता हूँ। क्या मसीह ही सब कुछ है? तो फिर जो कोई उद्धार पाना चाहता है, वह सीधे मसीह के पास आए।

बहुत से लोग हैं जो मसीह के विषय में कानों से सुनते हैं, और उसके बारे में जो कुछ बताया जाता है उस सब पर विश्वास करते हैं। वे मानते हैं कि मसीह को छोड़ किसी और में उद्धार नहीं है। वे स्वीकार करते हैं कि केवल यीशु ही उन्हें नरक से छुड़ा सकता है और उन्हें परमेश्वर के सामने निर्दोष ठहराकर प्रस्तुत कर सकता है।

परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि वे इस सामान्य स्वीकृति से कभी आगे नहीं बढ़ते। वे अपनी आत्मा के लिए मसीह को सचमुच कभी नहीं थामते। वे चाहने, इच्छा करने, अनुभव करने और ठानने की अवस्था में ही अटके रहते हैं, और कभी आगे नहीं बढ़ते। वे समझते हैं कि हमारा आशय क्या है: वे जानते हैं कि यह सब सच है। वे आशा रखते हैं कि किसी दिन इसका पूरा लाभ पाएँगे: परन्तु इस समय उन्हें कुछ भी लाभ नहीं मिलता। संसार उनका "सब कुछ" है। राजनीति उनका "सब कुछ" है। सुख-विलास उनका "सब कुछ" है। व्यापार उनका "सब कुछ" है। परन्तु मसीह उनका सब कुछ नहीं है।

यदि इस लेख का कोई पाठक ऐसा मनुष्य है, तो मैं उसे भी स्पष्ट चेतावनी देता हूँ कि उसकी आत्मा की दशा बुरी है। तुम अपनी वर्तमान दशा में उतने ही सचमुच नरक के मार्ग पर हो जितने यहूदा इस्करियोती, या अहाब, या कैन थे। मेरा विश्वास करो, मसीह में सच्चा विश्वास अवश्य होना चाहिए, नहीं तो जहाँ तक तुम्हारा सम्बन्ध है, मसीह का मरना व्यर्थ हुआ। भूखे मनुष्य का पेट रोटी को देखने से नहीं भरता, परन्तु उसे सचमुच खाने से भरता है। जहाज़ डूबने पर बचनेवाले नाविक को जीवन-नौका को ताकने से नहीं, परन्तु उसमें सचमुच चढ़ जाने से बचाव मिलता है। यह जानना और मानना कि मसीह उद्धारकर्ता है जो तुम्हारी आत्मा को बचा सकता है, तब तक कुछ काम का नहीं जब तक तुम्हारे और मसीह के बीच सचमुच लेन-देन न हो। तुम्हें यह कह सकना चाहिए, "मसीह मेरा उद्धारकर्ता है, क्योंकि मैं विश्वास के द्वारा उसके पास आया हूँ और उसे अपना कर लिया है।"—लूथर ने कहा था, "धर्म का बहुत कुछ इस पर निर्भर है कि मनुष्य अधिकार-सूचक सर्वनामों का प्रयोग कर सके। मुझसे 'मेरा' शब्द ले लो, तो तुम मुझसे परमेश्वर को ही ले लेते हो!"

जो सलाह मैं आज तुम्हें देता हूँ उसे सुनो और तुरन्त उस पर चलो। उन काल्पनिक मनोदशाओं और अनुभवों की प्रतीक्षा में, जो कभी नहीं आएँगे, अब और खड़े न रहो। इस विचार में अब और मत हिचको कि पहले तुम्हें आत्मा प्राप्त करना चाहिए, फिर मसीह के पास आना चाहिए। उठो और जैसे हो वैसे ही मसीह के पास आ जाओ। वह तुम्हारी बाट जोहता है, और जितना सामर्थी है उतना ही बचाने को तैयार भी है। वह पाप से रोगी आत्माओं के लिए ठहराया हुआ वैद्य है। उसके साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा तुम अपने शरीर के रोग के उपचार के लिए अपने चिकित्सक के साथ करते हो। सीधे उससे विनती करो और अपनी सब आवश्यकताएँ उसे बताओ। आज अपने साथ शब्द लेकर आओ, और जैसे क्रूस पर उस चोर ने किया था वैसे ही प्रभु यीशु से क्षमा और शान्ति के लिए ज़ोर से पुकारो। उस मनुष्य की नाईं पुकारो: "हे प्रभु, मुझे स्मरण कर।" (लूका 23:42।) उससे कहो कि तुमने सुना है कि वह पापियों को ग्रहण करता है, और तुम ऐसे ही हो। उससे कहो कि तुम उद्धार पाना चाहते हो, और उससे बिनती करो कि वह तुम्हें बचाए। जब तक तुम स्वयं यह न चख लो कि प्रभु भला है, तब तक विश्राम न करो। ऐसा करो, तो यदि तुम सचमुच गम्भीर हो, तो देर-सवेर तुम पाओगे कि "मसीह ही सब कुछ है।"

(4) एक बात और मैं जोड़ता हूँ। क्या मसीह ही सब कुछ है? तो फिर उसके सब परिवर्तित लोग उसके साथ ऐसा व्यवहार करें मानो वे सचमुच इस पर विश्वास करते हैं। वे अब तक की अपेक्षा कहीं अधिक उस पर टेक लगाएँ और उस पर भरोसा रखें।

हाय, प्रभु के कितने ही लोग अपने विशेषाधिकारों से बहुत नीचे जीवन बिताते हैं! कितने ही सच्चे मसीही प्राण अपनी ही शान्ति को अपने हाथों खो देते हैं और अपने ही दया-दानों को त्याग देते हैं। कितने ही अनजाने में अपने ही विश्वास को, या अपने हृदय में आत्मा के कार्य को, मसीह के साथ जोड़ बैठते हैं, और इस प्रकार सुसमाचार की शान्ति की परिपूर्णता से चूक जाते हैं। कितने ही हैं जो पवित्रता की खोज में बहुत कम आगे बढ़ते हैं, और बहुत मन्द ज्योति से चमकते हैं। और यह सब क्यों? केवल इसलिए कि उन्नीस में से उन्नीस मामलों में लोग मसीह को अपना सर्वस्व नहीं बनाते।

अब मैं इस लेख के हर पाठक को, जो विश्वासी है, पुकारता हूँ; मैं उससे उसी के भले के लिए विनती करता हूँ कि वह निश्चित कर ले कि मसीह सचमुच और पूरी रीति से उसका सर्वस्व है। सावधान रहो कि तुम अपनी किसी बात को मसीह के साथ मिलाने न दो।

क्या तुम्हारे पास विश्वास है? यह एक अमूल्य आशीष है। वे सचमुच धन्य हैं जो यीशु पर भरोसा करने को तैयार और इच्छुक हैं। परन्तु चौकस रहो कि तुम अपने विश्वास को ही मसीह न बना लो। अपने विश्वास पर नहीं, परन्तु मसीह पर भरोसा रखो।

क्या तुम्हारे प्राण में आत्मा का कार्य है? इसके लिए परमेश्वर का धन्यवाद करो। यह ऐसा कार्य है जो कभी नष्ट न होगा। परन्तु ओह, सावधान रहो कि कहीं तुम अनजाने में आत्मा के कार्य को ही मसीह न बना बैठो! आत्मा के कार्य पर नहीं, परन्तु मसीह पर भरोसा रखो।

क्या तुम्हारे भीतर धर्म की कुछ अनुभूतियाँ और अनुग्रह का कुछ अनुभव है? इसके लिए परमेश्वर का धन्यवाद करो। हज़ारों में तो बिल्ली या कुत्ते से अधिक कोई धार्मिक अनुभूति नहीं होती। परन्तु ओह, सावधान रहो कि तुम अपनी भावनाओं और संवेदनाओं को ही मसीह न बना लो! वे तो दीन और अनिश्चित वस्तुएँ हैं, जो दुःख की बात है कि हमारे शरीर और बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर रहती हैं। अपनी भावनाओं पर राई भर भी भार मत डालो। केवल मसीह पर भरोसा रखो।

मैं तुमसे विनती करता हूँ कि विश्वास के उस महान विषय, यीशु मसीह, की ओर अधिकाधिक दृष्टि लगाना सीखो, और अपने मन को उसी में लगाए रखो। ऐसा करने से तुम पाओगे कि विश्वास, और अन्य सब अनुग्रह, बढ़ते हैं, चाहे उस समय वह बढ़ना तुम्हें स्वयं दिखाई न दे। जो कुशल धनुर्धर प्रमाणित होना चाहता है, उसे तीर को नहीं, निशाने को देखना चाहिए।

हाय, मुझे भय है कि बहुत से विश्वासियों के हृदय में अब भी घमण्ड और अविश्वास का एक बड़ा अंश चिपका हुआ है! थोड़े ही लोग समझते हैं कि उन्हें उद्धारकर्ता की कितनी आवश्यकता है। थोड़े ही समझते हैं कि वे पूरी रीति से उसके कितने ऋणी हैं। थोड़े ही समझ पाते हैं कि उन्हें प्रतिदिन उसकी कितनी आवश्यकता है। थोड़े ही अनुभव करते हैं कि उन्हें कितनी सरलता से, बालक के समान, अपने प्राणों को उस पर टिका देना चाहिए। थोड़े ही जानते हैं कि वह अपने दीन, निर्बल लोगों से कितने प्रेम से भरा है, और उनकी सहायता को कितना तत्पर है! और इसलिए थोड़े ही उस शान्ति, आनन्द, बल और भक्तिपूर्ण जीवन जीने की उस सामर्थ्य को जानते हैं जो मसीह में पाई जाती है।

पाठक, यदि तुम्हारा विवेक तुम्हें दोषी ठहराता है, तो अपनी रीति बदलो; अपनी रीति बदलो और मसीह पर और अधिक भरोसा करना सीखो। वैद्य को अपने पास परामर्श के लिए आते रोगियों को देखना अच्छा लगता है: रोगियों को ग्रहण करना और यदि हो सके तो उन्हें चंगा करना उसका काम है। वकील को काम मिलना अच्छा लगता है: यह उसका पेशा है। पति को अच्छा लगता है कि उसकी पत्नी उस पर भरोसा रखे और उसका सहारा ले: उसे सँजोना और उसके सुख को बढ़ाना उसका आनन्द है। और मसीह को भी अच्छा लगता है कि उसके लोग उस पर टेक लगाएँ, उसमें विश्राम पाएँ, उसे पुकारें, और उसमें बने रहें।

आओ, हम सब अधिकाधिक ऐसा करना सीखें और इसका यत्न करें। आओ, हम मसीह पर निर्भर होकर जिएँ। हम मसीह में जिएँ। हम मसीह के साथ जिएँ। हम मसीह के लिए जिएँ। ऐसा करने से हम प्रमाणित करेंगे कि हम पूरी रीति से समझते हैं कि "मसीह ही सब कुछ है।" ऐसा करने से हम बड़ी शान्ति का अनुभव करेंगे, और उस "पवित्रता को, जिसके बिना कोई प्रभु को न देखेगा," अधिक प्राप्त करेंगे। (इब्रानियों 12:14।)

XXI. प्राचीन लेखकों के अंश

पवित्रता के विषय में ट्रेल और ब्रुक्स से जो अंश मैं यहाँ जोड़ रहा हूँ, वे मुझे इतने मूल्यवान लगते हैं कि उन्हें प्रस्तुत करने के लिए मैं कोई क्षमा-याचना नहीं करता।

वे ऐसे युग की उपज हैं जिसमें, मुझे कहना पड़ता है, अनुभवमूलक धर्म का अध्ययन अब की अपेक्षा कहीं अधिक गहराई से किया जाता था और उसे कहीं अधिक अच्छी रीति से समझा जाता था।

(I.) रेवरेण्ड रॉबर्ट ट्रेल, कुछ समय तक केंट के क्रेनब्रुक के सेवक। 1696

"पवित्रीकरण के विषय में तीन बातें हैं जिनके बारे में मैं कहना चाहता हूँ।"

"I. पवित्रीकरण क्या है।"

"II. यह धर्मी ठहराए जाने से किस बात में मिलता है।"

"III. यह धर्मी ठहराए जाने से किस बात में भिन्न है।"

"I. पवित्रीकरण क्या है? इसे व्यक्त करने की अपेक्षा इसका अनुभव करना कहीं अच्छा है।"

"पवित्रीकरण वही है जो नया जन्म है; वही जो सम्पूर्ण मनुष्य का नवीकरण है। पवित्रीकरण नई सृष्टि का रचा जाना और गढ़ा जाना है; यह दीन प्राण पर मसीह के स्वरूप का रोपा और खोदा जाना है। यही वह है जिसके लिए प्रेरित ने लालसा की,—'कि मसीह उनमें रूप पकड़े' (गलातियों 4:19); कि वे 'स्वर्गीय का स्वरूप धारण करें।' (1 कुरिन्थियों 15:49।)"

"संसार में केवल दो ही मनुष्य हैं जिनके समान सब लोग हैं; और उनकी दशा इस पर निर्भर है कि वे इनमें से किसके समान हैं: पहला आदम, या दूसरा आदम। हर मनुष्य स्वभाव से पहले आदम के और शैतान के समान है: क्योंकि शैतान और पतित पहला आदम एक दूसरे के समान थे। हमारे प्रभु कहते हैं, 'तुम अपने पिता शैतान से हो' (यूहन्ना 8:44), और वह 'आरम्भ से हत्यारा' था। पहले आदम की सब सन्तान शैतान की सन्तान हैं, इसमें कोई भेद नहीं। और दूसरी श्रेणी की सब सन्तान यीशु मसीह के, अर्थात् दूसरे आदम के समान हैं; और जब उसका स्वरूप उनमें सिद्ध हो जाएगा, तब वे पूर्ण रूप से सुखी होंगे। 'और जैसे हम ने उसका रूप जो मिट्टी का था धारण किया, वैसे ही उस स्वर्गीय का भी रूप धारण करेंगे।' (1 कुरिन्थियों 15:49।) ध्यान दीजिए; हम पाप और दुःख में जन्म लेकर मिट्टी के रूप को धारण करते हैं; पाप और दुःख में जीवन बिताकर हम मिट्टी के रूप को धारण करते हैं; पाप और दुःख में मरकर हम मिट्टी के रूप को धारण करते हैं; और कब्र की सड़न में हम मिट्टी के रूप को धारण करते हैं; और जब उसका आत्मा हमें पवित्र करता है तब हम स्वर्गीय आदम का रूप धारण करते हैं। यह स्वरूप हम में हमारे पवित्रीकरण की बढ़ती के अनुसार बढ़ता जाता है: और हम स्वर्गीय आदम का स्वरूप पूर्ण रूप से तब धारण करते हैं जब हम आत्मा और देह दोनों में उस मनुष्य मसीह के ठीक समान हो जाते हैं, पूर्ण रूप से सुखी और पूर्ण रूप से पवित्र; जब हम उसके अनुग्रह से मृत्यु पर जय पा चुके होते हैं, जैसे उसने उस पर अपने ही बल से जय पाई। यह कभी न जाना जाएगा कि विश्वासी यीशु मसीह के कितने समान हैं, जब तक वे जी न उठें: जब वे अपनी कब्रों से अनेक छोटे सूर्यों के समान महिमा और तेज में चमकते हुए उठेंगे। ओह, तब वे यीशु मसीह के कैसे समान होंगे! यद्यपि उसकी निजी सर्वोपरि महिमा अनन्तकाल तक उसी की सम्पत्ति और विशेषाधिकार रहेगी।"

"II. धर्मी ठहराया जाना और पवित्रीकरण किन बातों में एक समान हैं? मैं उत्तर देता हूँ, अनेक बातों में"

"पहली बात। वे इसलिए एक दूसरे के समान हैं कि उनका कर्ता एक ही है; परमेश्वर ही धर्मी ठहराता है, और परमेश्वर ही पवित्र करता है। 'परमेश्वर के चुने हुओं पर दोष कौन लगाएगा? परमेश्वर वही है जो उन्हें धर्मी ठहरानेवाला है।' (रोमियों 8:33।) 'मैं यहोवा तुम्हारा पवित्र करनेवाला हूँ,' यह पुराने नियम में बार-बार आनेवाला वचन है। (निर्गमन 31:13; लैव्यव्यवस्था 20:8।)"

"दूसरी बात। वे अपने उद्गम में भी एक समान हैं, क्योंकि दोनों सेंतमेंत अनुग्रह से हैं; धर्मी ठहराया जाना सेंतमेंत अनुग्रह का कार्य है, और पवित्रीकरण भी वैसा ही है। 'उसने हमारा उद्धार किया, और यह धार्मिकता के कामों से नहीं, जो हम ने आप किए, पर अपनी दया के अनुसार, नए जन्म के स्नान और पवित्र आत्मा के हमें नया बनाने के द्वारा।' (तीतुस 3:5।) दोनों अनुग्रह से हैं।"

"तीसरी बात। वे इस बात में एक समान हैं कि दोनों एक ही जनों के लिए हैं। कोई मनुष्य धर्मी ठहराया नहीं जाता जब तक वह पवित्र भी न किया जाए; और कोई मनुष्य पवित्र नहीं किया जाता जब तक वह धर्मी भी न ठहराया जाए; परमेश्वर के सब चुने हुओं, सब छुड़ाए हुओं पर ये दोनों आशीषें आती हैं।"

"चौथी बात। वे समय के विषय में भी एक समान हैं। जब हम परमेश्वर के कार्यों की चर्चा करते हैं तब समय के विषय में बोलना या सोचना हमारे लिए कठिन है: उसके ये उद्धारकारी कार्य सदा एक ही समय में होते हैं; मनुष्य पवित्र किए जाने से पहले धर्मी नहीं ठहराया जाता, यद्यपि स्वभाव के क्रम में ऐसा माना जा सकता है, तो भी उसी समय एक ही अनुग्रह दोनों को करता है। प्रेरित कहता है, 'तुम में से कितने ऐसे ही थे, परन्तु तुम प्रभु यीशु मसीह के नाम से और हमारे परमेश्वर के आत्मा से धोए गए, और पवित्र हुए और धर्मी ठहरे।' (1 कुरिन्थियों 6:11।)"

"पाँचवीं बात। वे अपने कार्य करने के साधन में भी एक समान हैं, अर्थात् परमेश्वर के वचन के द्वारा: हम वचन के द्वारा धर्मी ठहराए जाते हैं, जो प्रतिज्ञा के द्वारा हमें अनन्त जीवन की आज्ञा सुनाता है; और हम उसी वचन की सामर्थ्य से पवित्र भी किए जाते हैं। हमारे प्रभु कहते हैं, 'तुम तो उस वचन के कारण जो मैं ने तुम से कहा है, शुद्ध हो।' (यूहन्ना 15:3।) प्रेरित कहता है, 'ताकि उसको वचन के द्वारा जल के स्नान से शुद्ध करके पवित्र बनाए।' (इफिसियों 5:26।)"

"छठी और अन्तिम बात। वे अनन्त जीवन के लिए अपनी समान आवश्यकता में एक समान हैं। मैं यह नहीं कहता कि क्रम में समान हैं, परन्तु आवश्यकता में समान हैं: अर्थात् जैसे यह ठहराया गया है कि जो मनुष्य धर्मी नहीं ठहराया गया उसका उद्धार नहीं होगा, वैसे ही यह भी ठहराया गया है कि जो मनुष्य पवित्र नहीं किया गया उसका उद्धार नहीं होगा: न धर्मी न ठहराया हुआ मनुष्य उद्धार पा सकता है, और न अपवित्र मनुष्य उद्धार पा सकता है। अनन्त जीवन को पाने के लिए दोनों समान रूप से आवश्यक हैं।"

"III. धर्मी ठहराया जाना और पवित्रीकरण किन बातों में भिन्न हैं? लोगों के व्यवहार और दैनिक अभ्यास के लिए यह बहुत महत्त्व का विषय है कि वे किन बातों में भिन्न हैं। वे अनेक बातों में सहमत हैं, जैसा अभी बताया गया, परन्तु वे बहुत अधिक भिन्न भी हैं"

"पहली बात। धर्मी ठहराया जाना मनुष्य की दशा के विषय में परमेश्वर का एक कार्य है; परन्तु पवित्रीकरण मनुष्य के स्वभाव के विषय में परमेश्वर का कार्य है: और ये दोनों बहुत भिन्न हैं, जिसे मैं एक उदाहरण से समझाता हूँ। धर्मी ठहराया जाना न्यायी के रूप में परमेश्वर का एक अपराधी के विषय में कार्य है, जो उसे मृत्युदण्ड की आज्ञा से छुड़ाता है; परन्तु पवित्रीकरण वैद्य के रूप में हमारे विषय में परमेश्वर का कार्य है, जो हमें प्राणघातक रोग से चंगा करता है। एक अपराधी कटघरे में आता है, और राजद्रोह के लिए उस पर अभियोग लगाया जाता है; उसी अपराधी को एक प्राणघातक रोग भी है, जिससे वह मर सकता है, चाहे न्यायासन पर कोई न्यायी उसके अपराध के कारण उसे मृत्युदण्ड न भी सुनाता। यह अनुग्रह का कार्य है जो उस मनुष्य को व्यवस्था की आज्ञा से छुड़ाता है, कि उसे अपने राजद्रोह के कारण मृत्यु न सहनी पड़े,— यही उसका प्राण बचाता है। परन्तु इतने पर भी, यदि उसका रोग चंगा न हो, तो न्यायी के क्षमादान के होते हुए भी वह शीघ्र मर सकता है। इसलिए मैं कहता हूँ, धर्मी ठहराया जाना कृपालु न्यायी के रूप में परमेश्वर का कार्य है, पवित्रीकरण दयालु वैद्य के रूप में परमेश्वर का कार्य है; दाऊद इन दोनों को साथ जोड़ता है। (भजन संहिता 103:3।) 'वह तेरे सब अधर्म को क्षमा करता है, और तेरे सब रोगों को चंगा करता है।' प्रतिज्ञा की गई है कि अधर्म तुम्हारे विनाश का कारण न होगा (यहेजकेल 18:30), अपने दोष के रूप में; यह धर्मी ठहराया जाना है: और वह अपनी शक्ति के रूप में भी तुम्हारे विनाश का कारण न होगा; यहीं पवित्रीकरण आता है।"

"दूसरा, धर्मी ठहराया जाना किसी और की धार्मिकता के कारण परमेश्वर के अनुग्रह का एक कार्य है, परन्तु पवित्रीकरण परमेश्वर का वह कार्य है जिसके द्वारा वह हमारे भीतर धार्मिकता उंडेलता है। अब इन दोनों में बड़ा भेद है: क्योंकि एक तो आरोपण से होता है और दूसरा उंडेले जाने से।"

"धर्मी ठहराए जाने में परमेश्वर का निर्णय इस प्रकार चलता है: जो धार्मिकता मसीह ने अपने जीवन और मृत्यु से सिद्ध की, और जो आज्ञाकारिता उसने परमेश्वर की व्यवस्था के प्रति निभाई, वह दोषी पापी के क्षमादान के लिए उसके खाते में गिनी जाती है; ताकि जब कोई पापी परमेश्वर के न्यायालय में खड़ा हो और यह प्रश्न पूछा जाए, क्या इस मनुष्य ने परमेश्वर की व्यवस्था को नहीं तोड़ा? तो परमेश्वर कहता है, हाँ; उस दीन पापी का विवेक भी कहता है, हाँ, मैंने इसे अनगिनत रीतियों से तोड़ा है। और क्या व्यवस्था तुझे तेरे अपराध के कारण मृत्यु का दण्ड नहीं ठहराती? वह मनुष्य कहता है, हाँ; परमेश्वर की व्यवस्था भी कहती है, हाँ, व्यवस्था इससे अधिक कुछ नहीं जानती; 'जो प्राणी पाप करे वही मरेगा।' तो फिर क्या इस दशा में कोई आशा नहीं? है, और सुसमाचार का अनुग्रह यह आशा प्रकट करता है। एक है जिसने पाप को अपने ऊपर ले लिया और हमारे पापों के लिए मरा, और उसकी धार्मिकता उस दीन पापी के धर्मी ठहराए जाने के लिए गिनी जाती है; और इस प्रकार हम क्षमा पाते हैं। धर्मी ठहराए जाने में हम इस रीति से क्षमा पाते हैं कि परमेश्वर वह सब जो मसीह ने हमारे लिए किया और सहा, हमारे खाते में, हमारी ओर से और हमारे लाभ के लिए गिनता है।"

"पवित्रीकरण में परमेश्वर का आत्मा आत्मा में पवित्रता उंडेलता है। मैं यह नहीं कहता कि वह धार्मिकता उंडेलता है; क्योंकि मैं चाहता हूँ कि धार्मिकता और पवित्रता इन दो शब्दों में उससे अच्छा भेद किया जाए जैसा साधारणतः किया जाता है। इस विषय में धार्मिकता और पवित्रता को एक-दूसरे से बहुत दूर रखना चाहिए। हमारी धार्मिकता हमसे बाहर है; हमारी पवित्रता हमारे भीतर है, वह हमारी अपनी है; प्रेरित ने स्पष्ट रूप से यही भेद किया है: 'अपनी वह धार्मिकता नहीं।' (फिलिप्पियों 3:9।) वह हमारी अपनी है, मूल रूप से नहीं, पर अन्तर्निहित रूप से; इस अर्थ में हमारी अपनी नहीं कि वह हमारे ही कार्य से बनी हो, पर इस कारण हमारी अपनी कि वह हमारे भीतर बसती है। परन्तु हमारी धार्मिकता न मूल रूप से हमारी अपनी है और न अन्तर्निहित रूप से; वह न हमारे द्वारा सिद्ध की गई और न हमारे भीतर बसती है; वरन् वह यीशु मसीह के द्वारा सिद्ध की गई और सदा उसी में बसती है, और एक दीन प्राणी को उसे केवल विश्वास के द्वारा प्रस्तुत करना है। परन्तु हमारी पवित्रता यद्यपि मूल रूप से हमारी अपनी नहीं, तो भी अन्तर्निहित रूप से हमारी अपनी है, वह हमारे भीतर बसती है: प्रेरित यही भेद करता है। 'और उसमें पाया जाऊँ; पर अपनी वह धार्मिकता नहीं जो व्यवस्था से है, परन्तु वह जो मसीह पर विश्वास करने से होती है, अर्थात् वह धार्मिकता जो परमेश्वर की ओर से विश्वास करने पर मिलती है।' (फिलिप्पियों 3:9।)"

"तीसरा, धर्मी ठहराया जाना सिद्ध है, परन्तु पवित्रीकरण अपूर्ण है; और यहीं इन दोनों में बड़ा भेद है। मैं कहता हूँ कि धर्मी ठहराया जाना सिद्ध है, उसमें कोई श्रेणी नहीं होती, कोई घटी नहीं होती, कोई विराम नहीं होता, और कोई बाधा भी नहीं; परन्तु पवित्रीकरण में ये सब होते हैं। जब मैं कहता हूँ कि धर्मी ठहराया जाना सिद्ध है, तो मेरा अर्थ यह है कि प्रत्येक धर्मी ठहराया गया मनुष्य समान रूप से और पूर्ण रूप से धर्मी ठहराया गया है। आज संसार में जो सबसे दीन विश्वासी है, वह उतना ही धर्मी ठहराया गया है जितना प्रेरित पौलुस था; और प्रत्येक सच्चा विश्वासी अब उतना ही धर्मी ठहराया गया है जितना वह एक हज़ार वर्ष बाद होगा। धर्मी ठहराया जाना उन सब में जो उसके भागी हैं सिद्ध है, और अनन्तकाल तक रहता है; उसमें कोई श्रेणी नहीं होती। और इसका स्पष्ट कारण यह है कि उसका आधार यीशु मसीह की सिद्ध धार्मिकता है, और हमें उसका अधिकारी ठहराना अनुग्रहकारी न्यायी परमेश्वर का एक कार्य है, और वह कार्य सदा बना रहता है; और यदि परमेश्वर धर्मी ठहराता है तो कौन दोषी ठहराएगा? (रोमियों 8:33।) परन्तु पवित्रीकरण एक अपूर्ण, अधूरी और बदलनेवाली बात है। एक विश्वासी दूसरे से अधिक पवित्र किया गया होता है। मुझे विश्वास है कि प्रेरित पौलुस अपने मन फिराव के पहले ही घण्टे में आज संसार के किसी भी मनुष्य से अधिक पवित्र किया गया था।"

"पवित्रीकरण उन व्यक्तियों के विषय में जो उसके भागी हैं बहुत भिन्न होता है; और एक ही मनुष्य के विषय में भी बहुत भिन्न होता है; क्योंकि एक सच्चा विश्वासी, एक सचमुच पवित्र किया हुआ मनुष्य, किसी समय दूसरे समय से अधिक पवित्र हो सकता है। हम से यह कार्य अपेक्षित है कि परमेश्वर के भय में पवित्रता को सिद्ध करते जाएँ (2 कुरिन्थियों 7:1)। परन्तु हम से कहीं यह अपेक्षा नहीं की गई कि परमेश्वर की दृष्टि में धार्मिकता को सिद्ध करते जाएँ; क्योंकि परमेश्वर ने एक सिद्ध धार्मिकता प्रदान की है जिसमें हम खड़े हैं; परन्तु हमें चौकस रहना है और परमेश्वर के भय में पवित्रता को सिद्ध करने में परिश्रम करना है। महिमा में एक सन्त पहले से कहीं अधिक पवित्र किया हुआ है, क्योंकि वह सिद्ध रूप से पवित्र है; पर वह पहले से अधिक धर्मी ठहराया गया नहीं है। वरन् स्वर्ग में एक सन्त पृथ्वी पर के विश्वासी से अधिक धर्मी ठहराया गया नहीं है: बस वे इसे अधिक अच्छी रीति से जानते हैं, और जिस ज्योति की महिमा में वे इसे देखते हैं वह इसे उन पर अधिक उज्ज्वल और अधिक स्पष्ट रूप से प्रकट करती है।"

ट्रेल के उपदेशों से, 1 पतरस 1:1–3 पर, खण्ड 4, पृ. 71।

ट्रेल की रचनाओं का एडिनबरा संस्करण। 1810।

(2.) रेवरेण्ड थॉमस ब्रुक्स, सेंट मार्गरेट, फ़िश स्ट्रीट हिल, लंदन के रेक्टर। 1662

"पवित्रता की आवश्यकता पर विचार करो। यह असम्भव है कि तुम कभी सुखी हो सको, जब तक तुम पवित्र न हो। यहाँ पवित्रता नहीं तो आगे सुख नहीं। पवित्रशास्त्र स्वर्ग के तीन देहधारी निवासियों की चर्चा करता है, —व्यवस्था से पहले हनोक; व्यवस्था के अधीन एलिय्याह; और सुसमाचार के अधीन यीशु मसीह: तीनों पवित्रता में अग्रणी थे, ताकि हमें सिखाएँ कि साधारण रीति से भी पवित्रता के बिना स्वर्ग जाना नहीं होता। इस समय स्वर्ग में हज़ारों-हज़ार हैं, परन्तु उन सब में एक भी अपवित्र नहीं; उन सब सन्तों में एक भी पापी नहीं; उन सब भेड़ों में एक भी बकरा नहीं; उन सब फूलों में एक भी खरपतवार नहीं; उन सब गुलाबों में एक भी काँटा या शूल नहीं; उन सब चमकते हीरों में एक भी कंकड़ नहीं। उन सब हाबिलों में एक भी कैन नहीं; उन सब इसहाकों में एक भी इश्माएल नहीं; और स्वर्ग में उन सब याकूबों में एक भी एसाव नहीं। सब कुलपतियों में एक भी हाम नहीं; सब भविष्यद्वक्ताओं में एक भी शाऊल नहीं; सब प्रेरितों में एक भी यहूदा नहीं; सब प्रचारकों में एक भी देमास नहीं; और सब अंगीकार करनेवालों में एक भी शमौन जादूगर नहीं।"

"स्वर्ग केवल पवित्र जन के लिये है, और पवित्र जन केवल स्वर्ग के लिये है: स्वर्ग महिमा का एक वस्त्र है, जो केवल उसी के योग्य है जो पवित्र है। परमेश्वर ने, जो स्वयं सत्य है और झूठ नहीं बोल सकता, यह कहा है कि पवित्रता बिना कोई प्रभु को न देखेगा। 'कोई' इस शब्द पर ध्यान दो। पवित्रता बिना धनी प्रभु को न देखेगा; पवित्रता बिना निर्धन प्रभु को न देखेगा; पवित्रता बिना कुलीन प्रभु को न देखेगा; पवित्रता बिना साधारण जन प्रभु को न देखेगा; पवित्रता बिना राजकुमार प्रभु को न देखेगा; पवित्रता बिना किसान प्रभु को न देखेगा; पवित्रता बिना शासक प्रभु को न देखेगा; पवित्रता बिना प्रजा प्रभु को न देखेगी; पवित्रता बिना विद्वान प्रभु को न देखेगा; पवित्रता बिना अनपढ़ प्रभु को न देखेगा; पवित्रता बिना पति प्रभु को न देखेगा; पवित्रता बिना पत्नी प्रभु को न देखेगी; पवित्रता बिना पिता प्रभु को न देखेगा; पवित्रता बिना बालक प्रभु को न देखेगा; पवित्रता बिना स्वामी प्रभु को न देखेगा; पवित्रता बिना सेवक प्रभु को न देखेगा। 'क्योंकि सेनाओं का यहोवा, जिसने यह कहा है, वह सच्चा और सामर्थी है।' (यहोशू 23:14।)"

"इन दिनों कोई एक रीति को बढ़ाता है, कोई दूसरी को; कोई एक कलीसिया-व्यवस्था की प्रशंसा करता है, कोई दूसरी की; कोई एक मार्ग का गुणगान करता है, कोई दूसरे का; परन्तु निश्चय ही पवित्रता का मार्ग ही वह पुराना भला मार्ग है (यिर्मयाह 6:16); यही राजाओं के राजा की राजपथ है जो स्वर्ग और सुख की ओर ले जाता है: 'वहां एक सड़क अर्थात् राजमार्ग होगा, उसका नाम पवित्र मार्ग होगा; कोई अशुद्ध जन उस पर से न चलने पाएगा; वह तो उन्हीं के लिये होगा: चाहे कोई बावला भी हो तौभी वह उस में भूल न करेगा।' (यशायाह 35:8।) कुछ लोग कहते हैं, देखो, मार्ग यहां है; दूसरे कहते हैं, देखो, मार्ग वहां है; परन्तु निश्चय ही पवित्रता का मार्ग सुख की ओर सबसे निश्चित, सबसे सुरक्षित, सबसे सरल, सबसे उत्तम और सबसे छोटा मार्ग है।"

"अन्यजातियों में कोई मनुष्य सम्मान के मन्दिर में तब तक प्रवेश नहीं कर सकता था जब तक वह पहले सद्गुण के मन्दिर में प्रवेश न कर ले। सुख के मन्दिर में प्रवेश तब तक नहीं हो सकता जब तक तुम पवित्रता के मन्दिर में प्रवेश न करो। इससे पहले कि तुम परमेश्वर के पवित्र पर्वत में प्रवेश कर सको, पवित्रता को तुम में प्रवेश करना होगा। जैसे शिमशोन ने पुकारा, 'मुझे जल दो, नहीं तो मैं मर जाऊंगा;' या जैसे राहेल ने पुकारा, 'मुझे सन्तान दे, नहीं तो मैं मर जाऊंगी;' वैसे ही सब अपवित्र आत्माएं भली रीति से पुकार सकती हैं, हे प्रभु, मुझे पवित्रता दे, नहीं तो मैं मरता हूं: मुझे पवित्रता दे, नहीं तो मैं सदा के लिये नाश होता हूं। यदि स्वर्गदूत, जो महिमा के राजकुमार हैं, एक बार अपनी पवित्रता से गिर जाएं, तो वे सदा के लिये अनन्त सुख और धन्यता से बहिष्कृत हो जाएंगे। यदि आदम स्वर्गलोक में अपनी निर्मलता से गिर जाए, तो वह शीघ्र ही ईश्वरीय महिमा की उपस्थिति से निकाल दिया जाएगा। ऑगस्टीन सारे संसार के लिये भी एक घण्टे के लिये दुष्ट, अपवित्र मनुष्य होना नहीं चाहता था, क्योंकि वह नहीं जानता था कि कहीं वह उसी घण्टे मर न जाए: और यदि वह अपवित्र दशा में मर जाता, तो वह जानता था कि वह प्रभु की उपस्थिति और उसकी सामर्थ्य की महिमा से सदा के लिये अलग हो जाएगा।"

"अहा, सज्जनो, अपने ही प्राणों को धोखा न दो; पवित्रता नितान्त आवश्यक है; इसके बिना तुम प्रभु को कभी न देखोगे। (2 थिस्सलुनीकियों 1:8–10।) यह नितान्त आवश्यक नहीं कि तुम संसार में बड़े या धनी हो; परन्तु यह नितान्त आवश्यक है कि तुम पवित्र हो: यह नितान्त आवश्यक नहीं कि तुम स्वास्थ्य, बल, मित्र, स्वतन्त्रता और जीवन का आनन्द उठाओ; परन्तु यह नितान्त आवश्यक है कि तुम पवित्र हो। मनुष्य सांसारिक समृद्धि के बिना प्रभु को देख सकता है, परन्तु यदि वह पवित्र न हो तो कभी प्रभु को नहीं देख सकता। मनुष्य सम्मान या सांसारिक महिमा के बिना स्वर्ग में, सुख में पहुंच सकता है, परन्तु पवित्रता के बिना वह कभी स्वर्ग में, सुख में नहीं पहुंच सकता। यहां पवित्रता नहीं, तो आगे स्वर्ग नहीं। 'और उस में कोई अपवित्र वस्तु किसी रीति से प्रवेश न करेगी।' (प्रकाशित वाक्य 21:27।) परमेश्वर अन्त में महिमा के फाटक हर उस जन के लिये बन्द कर देगा जो हृदय की शुद्धता से रहित है।"

"अहा, सज्जनो, पवित्रता वह फूल है जो स्वभाव की वाटिका में नहीं उगता। मनुष्य हृदय में पवित्रता लेकर उत्पन्न नहीं होते, जैसे वे मुंह में जीभ लेकर उत्पन्न होते हैं: पवित्रता ईश्वरीय सन्तान है: यह बहुमूल्य मोती है, जो नये किये हुए स्वभाव को छोड़ किसी स्वभाव में, पवित्र किये हुए हृदय को छोड़ किसी हृदय में नहीं मिलता। संसार के किसी भी स्वाभाविक मनुष्य में पवित्रता की तनिक भी किरण या चिनगारी नहीं है। 'उसके मन के विचार में जो कुछ उत्पन्न होता है वह निरन्तर बुरा ही होता है।' (उत्पत्ति 6:5।) 'फिर स्त्री से उत्पन्न होकर मनुष्य क्योंकर निर्मल हो सकता है?' (अय्यूब 25:4।) यह प्रश्न अपने में एक दृढ़ नकार लिये हुए है, 'मनुष्य क्योंकर निर्मल हो सकता है?' अर्थात् स्त्री से उत्पन्न मनुष्य निर्मल नहीं हो सकता: जो मनुष्य स्त्री से उत्पन्न होता है वह पाप में उत्पन्न होता है, और क्रोध तथा श्राप दोनों के अधीन उत्पन्न होता है। 'अशुद्ध वस्तु से शुद्ध वस्तु को कौन निकाल सकता है?' 'हम तो सब के सब अशुद्ध मनुष्य के समान हैं, और हमारे धर्म के काम सब के सब मैले चिथड़ों के समान हैं।' (अय्यूब 14:4; यशायाह 64:6।) 'कोई धर्मी नहीं, एक भी नहीं; कोई समझदार नहीं; कोई परमेश्वर का खोजनेवाला नहीं।' (रोमियों 3:10, 11।) हर मनुष्य स्वभाव से पवित्रता का अजनबी है, वरन् बैरी है। (रोमियों 8:7।) जो मनुष्य इस संसार में आता है, वह पाप और नरक की ओर मुंह किये और परमेश्वर तथा पवित्रता की ओर पीठ किये हुए आता है।"

"हमारे स्वभाव की भ्रष्टता ऐसी है कि इसके सामने कोई भी ईश्वरीय भलाई रखी जाए, तो उसे ऐसे ग्रहण किया जाता है जैसे आग को पानी या गीली लकड़ी फुफकार के साथ ग्रहण करती है। कोई बुराई सामने रखी जाए, तो वह भूसे में आग के समान है; वह उस मूर्ख वनदेवता के समान है जो आग को चूमने के लिये दौड़ पड़ा; वह उस चिकने पदार्थ के समान है जो, जैसा प्रकृतिवादी कहते हैं, आग को अपनी ओर खींच और झपट लेता है, और उसी से भस्म हो जाता है। सब मनुष्य पापी जन्मते हैं, और केवल अनन्त सामर्थ्य ही उन्हें पवित्र जन बना सकती है। सब मनुष्य सुखी होना चाहते हैं, फिर भी स्वभाव से पवित्र होने से घृणा करते हैं। इन सब बातों से तुम भली भाँति देख सकते हो कि जैसे स्वाभाविक जीवन की रक्षा के लिये भोजन आवश्यक है, वैसे ही आत्मा की रक्षा और उद्धार के लिये पवित्रता आवश्यक है। यदि किसी मनुष्य में सुलैमान की बुद्धि, शिमशोन का बल, यहोशू का साहस, अहीतोपेल की चतुराई, हामान की प्रतिष्ठा, क्षयर्ष की सामर्थ्य और अपुल्लोस की वाक्पटुता हो, तौभी पवित्रता के बिना ये सब मिलकर उसे कभी नहीं बचा सकेंगे। जिन दिनों और समयों में हम जी रहे हैं, वे ऊँचे स्वर से पवित्रता की पुकार रहे हैं। यदि तुम उन्हें अनुग्रह के दिन और समय समझते हो, तो पवित्रता के लिये इससे बड़े और ऊँचे दायित्व किसी जाति पर कब डाले गए जैसे परमेश्वर ने हम पर डाले हैं, जो हमें पवित्र बनाने के लिये इतने मार्ग, साधन और सहायताएँ पाते हैं? अहा, हमें पवित्र बनाने के लिये परमेश्वर ने कितना परिश्रम, कितनी चिन्ता, कितना व्यय और कितना भार उठाया है, और प्रतिदिन उठाता है! क्या उसने अपने दूत नहीं भेजे, और क्या अब भी नहीं भेजता, जो भोर को जल्दी उठते और रात को देर से सोते हैं, और सब इसलिये कि तुम्हें पवित्र होने के लिये उभारें? क्या उनमें से बहुतों ने अपना समय, अपना बल, अपनी आत्मा, और अपने प्राण तक तुम्हें पवित्र बनाने में नहीं लगा दिए? हे सज्जनो, पवित्र विधियाँ पवित्र हृदयों और पवित्र जीवन के सिवाय और क्या माँगती हैं? ज्योति के दिन ज्योति में चलने और अन्धकार के कामों को उतार फेंकने के सिवाय और क्या माँगते हैं? अनुग्रह के सब साधनों की वाणी इसके सिवाय और क्या है कि अहा, अनुग्रहशील होने का यत्न करो? और पवित्र आत्मा की वाणी इसके सिवाय और क्या है कि अहा, पवित्र होने का यत्न करो? और उन सब दया के आश्चर्यकर्मों की वाणी, जो परमेश्वर ने तुम्हारे बीच किए हैं, इसके सिवाय और क्या है कि 'पवित्र बनो, पवित्र बनो'? हे सज्जनो, ऐसा क्या बचा है जो प्रभु ने तुम्हें पवित्र बनाने के लिये नहीं किया? क्या उसने पवित्र सहायताओं के कारण तुम्हें स्वर्ग तक ऊँचा नहीं उठाया? क्या वह आज के दिन तक पवित्र प्रस्तावों, पवित्र विनतियों, पवित्र सम्मतियों और पवित्र प्रोत्साहनों के साथ तुम्हारे पीछे नहीं लगा रहा, और सब इसलिये कि तुम्हें पवित्र बनाए? और क्या तुम अब भी ढीले ही रहोगे, अब भी घमण्डी, अब भी संसारी, अब भी द्वेषी, अब भी डाही, अब भी झगड़ालू, और अब भी अपवित्र ही? अहा, यह प्रभु को इसके सिवाय और क्या उकसाना है कि वह स्वर्ग की सारी ज्योतियाँ बुझा दे, तुम्हारे उपदेशकों को कोनों में खदेड़ दे, तुम्हारी दीवटें हटा दे, और अपना सनातन सुसमाचार, जो बहुत समय से पंजों के बल खड़ा है, ऐसे लोगों के बीच भेज दे जो उसका तुम्हारी अपेक्षा, जैसा तुमने आज तक किया है, अधिक आदर करें, अधिक प्रेम करें, अधिक दृढ़ता से उसकी रक्षा करें और अधिक विवेक से उसका पालन करें? (प्रकाशित वाक्य 2:4, 5; यशायाह 42:25।) मैं समझता हूँ कि इससे अधिक स्पष्ट कुछ नहीं कि जिन समयों और अवसरों में हम जी रहे हैं, वे हर एक को पुकार-पुकारकर कहते हैं कि पवित्रता की खोज करो और पवित्रता के लिये परिश्रम करो। समयों की शिकायत कभी मत करो, पर बुराई करना छोड़ो और भलाई करने का यत्न करो, तो सब कुछ भला होगा; केवल अच्छे हृदय और अच्छा जीवन पाओ, तो तुम शीघ्र ही अच्छे समय देखोगे। (यशायाह 1:16–19।)"

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