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अल्प साधनों वाले कार्यकर्ताओं से
जिन सेवकों के पास साधन-सामग्री अल्प है, वे क्या करें? अल्प साधन-सामग्री से मेरा अभिप्राय यह है कि उनके पास पुस्तकें थोड़ी हैं, और अधिक पुस्तकें खरीदने के लिए उनके पास साधन बहुत कम हैं या बिलकुल नहीं हैं। यह ऐसी दशा है जो किसी भी हाल में नहीं होनी चाहिए; कलीसियाओं को ध्यान रखना चाहिए कि ऐसा होना असम्भव कर दिया जाए। उन्हें अपनी सामर्थ्य की ऊँची से ऊँची सीमा तक अपने सेवक को न केवल वह भोजन देना चाहिए जो उसके शरीर के जीवन को बनाए रखने के लिए आवश्यक है, वरन् मानसिक पोषण भी, ताकि उसका प्राण भूखा न रहे।
एक अच्छे पुस्तकालय को कलीसिया के साज-सामान का एक अनिवार्य अंग समझा जाना चाहिए; और डीकन, जिनका काम “खिलाने-पिलाने की सेवा” करना है, बुद्धिमानी करेंगे यदि वे प्रभु की मेज़ की, या कंगालों की मेज़ की उपेक्षा किए बिना, और सेवक की भोजन की मेज़ की सामग्री घटाए बिना, उसके अध्ययन की मेज़ पर भी दृष्टि रखें, और उसे नई कृतियों और प्रामाणिक पुस्तकों से भरपूर मात्रा में भरा रखें। यह भली भाँति लगाया गया धन होगा, और आशा से कहीं बढ़कर फल लाएगा। मंच (पल्पिट) की घटती हुई सामर्थ्य पर लच्छेदार भाषण देने के बजाय, कलीसिया के अगुवों को चाहिए कि वे प्रचारक को विचार के लिए भोजन देकर उसकी सामर्थ्य को बढ़ाने के उचित साधन काम में लाएँ। सब कुड़कुड़ाने वालों को मेरी सलाह यही है कि कोड़ा चरनी में डाल दो।
कुछ वर्ष पहले मैंने अपनी कलीसियाओं को इस बात के लिए प्रेरित करने का प्रयत्न किया कि वे स्वाभाविक रूप से सेवकों के लिए पुस्तकालय रखें, और कुछ थोड़े से विचारशील लोगों ने इस सुझाव का मूल्य समझा, और इसे कार्यरूप देना आरम्भ किया। बड़े आनन्द के साथ मैंने यहाँ-वहाँ अलमारियाँ बनी हुई और उन पर कुछ पुस्तकें रखी हुई देखी हैं। मेरी हार्दिक इच्छा है कि ऐसा आरम्भ हर जगह किया गया होता; परन्तु, हाय! मुझे डर है कि भूखे-अधमरे सेवकों की एक लम्बी पंक्ति ही कंजूसों को यह विश्वास दिला पाएगी कि सेवक के साथ कंजूसी करना झूठी मितव्ययिता है। जो कलीसियाएँ उदार वेतन देने की स्थिति में नहीं हैं, उन्हें अपनी व्यवस्था के एक स्थायी अंग के रूप में एक पुस्तकालय स्थापित करके कुछ क्षतिपूर्ति करनी चाहिए; और वर्ष-प्रति-वर्ष उसमें वृद्धि करते रहने से वह शीघ्र ही बहुत मूल्यवान बन जाएगा।
मेरे आदरणीय दादा के पास्टर-निवास में प्राचीन प्यूरिटन ग्रन्थों का एक बहुत मूल्यवान संग्रह था, जो एक सेवक से दूसरे सेवक को उत्तराधिकार में मिलता आया था: मुझे कुछ भारी-भरकम ग्रन्थ भली भाँति याद हैं, जिनमें मेरी मुख्य रुचि उनके पेचीदा आरम्भिक अक्षरों में थी, जो पेलिकन पक्षियों, ग्रिफिनों, खेलते हुए छोटे लड़कों, या काम करते हुए कुलपतियों के चित्रों से सजे थे। यह आपत्ति की जा सकती है कि उपयोग करने वालों के बदलते रहने से पुस्तकें खो जाएँगी, परन्तु मैं यह जोखिम उठाने को तैयार हूँ; और न्यासी, सूची पर थोड़ी सी सावधानी रखकर, पुस्तकालयों को उतनी ही सुरक्षा से रख सकते हैं जितनी सुरक्षा से वे बैठने की बेंचों और मंच को रखते हैं।
यदि यह योजना न अपनाई जाए, तो कोई दूसरी और सरल योजना आज़माई जाए; प्रचारक के भरण-पोषण के लिए चन्दा देने वाले सब लोग अपने चन्दे में दस प्रतिशत या उससे अधिक जोड़ दें, विशेष रूप से सेवक के मस्तिष्क के लिए भोजन जुटाने के लिए। जो कुछ उन्होंने दिया, वह उन्हें उन उत्तम उपदेशों में वापस मिल जाएगा जिन्हें वे सुनेंगे। यदि निर्धन सेवकों के लिए कुछ छोटी सी वार्षिक आय सुनिश्चित की जा सके, जो पवित्रता के साथ केवल पुस्तकों पर ही खर्च की जाए, तो यह उनके लिए परमेश्वर का भेजा हुआ वरदान होगा, और समाज के लिए एक अमूल्य आशीष। समझदार लोग यह आशा नहीं करते कि कोई बगीचा उन्हें वर्ष-प्रति-वर्ष साग-पात देता रहेगा जब तक वे उसकी मिट्टी को उपजाऊ न बनाएँ; वे यह आशा नहीं करते कि कोई रेल का इंजन बिना ईंधन के चलेगा, या कोई बैल या गधा भी बिना भोजन के परिश्रम करेगा; इसलिए उन्हें ऐसे मनुष्यों से शिक्षाप्रद उपदेश पाने की आशा छोड़ देनी चाहिए, जो पुस्तकें खरीदने में असमर्थ होने के कारण ज्ञान के भण्डार-घर से बाहर कर दिए गए हैं।
परन्तु विषय यह है कि जिन मनुष्यों के पास कोई भण्डार नहीं, न कलीसिया का कोई पुस्तकालय है, और न पुस्तकें जुटाने के लिए उन्हें कोई भत्ता दिया जाता है, वे क्या करें? आइए, हम तुरन्त यह कह दें कि यदि ऐसे मनुष्य सफल होते हैं, तो उनका सम्मान उन लोगों से कहीं अधिक होना चाहिए जिनके पास बड़े-बड़े साधन हैं।
कहा जाता है कि क्वेंटिन मैटसिस के साथी कारीगरों ने उसके हथौड़े और रेती को छोड़ उसके सारे औज़ार उससे छीन लिए थे, और उसने उनके बिना ही कुएँ का अपना प्रसिद्ध ढक्कन बना डाला; इससे उसका सम्मान और भी बढ़ गया! परमेश्वर के उन कार्यकर्ताओं को बड़ा श्रेय मिलना चाहिए जिन्होंने सहायक औज़ारों के बिना बड़े-बड़े काम किए हैं। यदि उनके पास वे औज़ार होते तो उनका परिश्रम बहुत हल्का हो जाता; परन्तु जो कुछ उन्होंने किया है, वह और भी अधिक अद्भुत है।
केंसिंग्टन में हो रही वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी में मिस्टर बकमास्टर के पाक-कला विद्यालय की प्रशंसा मुख्यतः इसलिए होती है कि वह निकम्मी दिखने वाली सामग्री से ऐसे स्वादिष्ट व्यंजन तैयार करता है; मुट्ठी भर हड्डियों और थोड़ी सी मैकरोनी से वह राजसी पकवान परोस देता है। यदि उसके पास फ्रांसीसी पाक-कला में प्रयुक्त होने वाली सारी सामग्री होती, और वह उन सब का उपयोग करता, तो हर कोई कहता, “अरे, ऐसा तो कोई भी कर सकता है;” परन्तु जब वह आपको मांस के टुकड़े और हड्डियाँ दिखाता है, और बताता है कि उसने इन्हें कसाई की दुकान से कुछ पैसों में खरीदा है, और कि वह इनसे पाँच-छः लोगों के परिवार के लिए भोजन बना सकता है, तो सब अच्छी गृहिणियाँ आँखें फाड़कर देखती हैं, और अचरज करती हैं कि भला यह कैसे हो सकता है; और जब वह अपनी थाली घुमाता है, और वे चखकर देखती हैं कि वह कितना स्वादिष्ट है, तो वे प्रशंसा से भर जाती हैं। तो हे निर्धन भाई, परिश्रम करते रहिए, क्योंकि हो सकता है कि आप अभी अपनी सेवकाई में बड़े-बड़े काम करने में सफल हों, और आपका स्वागत करने वाला वचन, “धन्य हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास,” और भी अधिक ज़ोर से कहा जाएगा, क्योंकि आपने गम्भीर कठिनाइयों के बीच परिश्रम किया।
यदि कोई मनुष्य बहुत थोड़ी सी पुस्तकें ही खरीद सकता है, तो उसे मेरी पहली सलाह यह होगी कि वह सर्वोत्तम पुस्तकें ही खरीदे। यदि वह बहुत खर्च नहीं कर सकता, तो भली भाँति खर्च करे। सर्वोत्तम ही सदा सबसे सस्ता होगा। केवल पानी मिलाई और पतली की हुई चीज़ें उन लोगों के लिए छोड़ दीजिए जो ऐसी विलासिताओं का खर्च उठा सकते हैं। पानी मिला दूध मत खरीदिए, वरन् गाढ़ा किया हुआ दूध लीजिए, और उसमें जितना पानी चाहें स्वयं मिला लीजिए। यह युग शब्दों का जाल बुनने वालों से भरा है— पेशेवर पुस्तक-निर्माता, जो किसी विषय के एक दाने को पीटकर इतना पतला कर देते हैं कि वह पाँच एकड़ के कागज़ को ढक ले; इन लोगों का भी अपना उपयोग है, जैसे सोने के वर्क बनाने वालों का होता है, परन्तु वे आपके किसी काम के नहीं। हमारे समुद्र-तट के किसान पहले गाड़ियाँ भर-भरकर समुद्री घास ढोते और अपने खेतों में डालते थे; उसका सबसे भारी भाग पानी होता था: अब वे घास को सुखा लेते हैं, और ढेर सारा परिश्रम और खर्च बचा लेते हैं। पतला शोरबा मत खरीदिए; मांस का सत्त खरीदिए। थोड़े में बहुत पाइए।
ऐसी पुस्तकों को प्राथमिकता दीजिए जिनमें वह भरपूर हो जिसे जेम्स हैमिल्टन “बिब्लाइन” अर्थात् पुस्तकों का सत्त कहा करते थे। आपको सटीक, संक्षिप्त, विश्वसनीय, प्रामाणिक पुस्तकों की आवश्यकता है, और आपको निश्चित कर लेना चाहिए कि वे आपको मिल जाएँ। अपनी Horae Biblicae Quotidianae तैयार करते समय, जो बाइबल पर एक उत्कृष्ट टीका है, डॉ. चाल्मर्स ने केवल कॉनकॉर्डेन्स, पिक्टोरियल बाइबल, पूल के सिनॉप्सिस, मैथ्यू हेनरी की टीका, और रॉबिन्सन की ‘फ़िलिस्तीन में खोजें’ का ही उपयोग किया। उन्होंने अपने एक मित्र से कहा, “ये ही वे पुस्तकें हैं जिनका मैं उपयोग करता हूँ; जो कुछ बाइबल सम्बन्धी है, वह सब इनमें है; अपने बाइबल-अध्ययन में मुझे इनके अतिरिक्त और किसी से कोई काम नहीं।” इससे पता चलता है कि जिनके अधिकार में असीमित भण्डार हैं— वे भी कुछ प्रामाणिक पुस्तकों को पर्याप्त पाते हैं। यदि डॉ. चाल्मर्स आज जीवित होते, तो वे सम्भवतः रॉबिन्सन की ‘खोजों’ के स्थान पर थॉमसन की ‘देश और पुस्तक’ (The Land and the Book) लेते, और पिक्टोरियल बाइबल को छोड़कर किटो की ‘दैनिक बाइबल दृष्टान्त’ लेते; कम से कम मैं अधिकांश लोगों को यही परिवर्तन करने की सलाह दूँगा। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि कुछ अत्यन्त प्रसिद्ध प्रचारकों ने पाया है कि पवित्रशास्त्र का अध्ययन करते समय वे बहुत सी पुस्तकों की अपेक्षा थोड़ी पुस्तकों के साथ अधिक अच्छा काम कर सकते थे, और मेरी समझ में यही हमारा मुख्य काम है।
तो फिर, बिना किसी खेद के उन बहुत सी पुस्तकों को छोड़ दीजिए, जो बेचारे हॉज के प्रसिद्ध उस्तरों के समान “बिकने के लिए बनाई गई हैं,” और स्वयं तो बिकती ही हैं, अपने खरीदने वालों को भी ठग लेती हैं। मैथ्यू हेनरी की टीका का उल्लेख हो चुका है, इसलिए मैं यह कहने का साहस करता हूँ कि कोई भी सेवक उस अद्वितीय व्याख्या से बढ़कर कोई निवेश नहीं कर सकता। उसे प्राप्त कीजिए, चाहे उसे खरीदने के लिए आपको अपना कोट ही क्यों न बेचना पड़े।
अगला नियम जो मैं ठहराऊँगा वह यह है: जो पुस्तकें आपके पास हैं, उन पर पूरी तरह अधिकार कर लीजिए। उन्हें पूरी रीति से पढ़िए। उनमें तब तक स्नान कीजिए जब तक वे आप में रच-बस न जाएँ। उन्हें पढ़िए और बार-बार पढ़िए, उन्हें चबाइए, और उन्हें पचाइए। उन्हें अपने अन्तरतम में उतर जाने दीजिए। किसी अच्छी पुस्तक को कई बार ध्यान से पढ़िए, और उस पर टिप्पणियाँ और विश्लेषण लिखिए। विद्यार्थी पाएगा कि उसकी मानसिक बनावट पर उन बीस पुस्तकों की अपेक्षा, जिन्हें उसने केवल ऊपर-ऊपर से सरसरी नज़र से देखा है— उन्हें केवल चाटा है, जैसा कि वह प्राचीन कहावत कहती है, “जैसे कुत्ते नील नदी का पानी पीते हैं”— उस एक पुस्तक का अधिक प्रभाव पड़ता है जिस पर उसने पूरी तरह अधिकार कर लिया है। जल्दबाज़ी से पढ़ने का परिणाम होता है थोड़ी विद्या और बहुत घमण्ड। मस्तिष्क पर पुस्तकों का ढेर इतना लगाया जा सकता है कि वह काम ही न कर सके। कुछ लोग बहुत पढ़ने के लिए मनन को अलग कर देते हैं, और इस कारण सोचने के योग्य ही नहीं रहते। वे पुस्तकों की सामग्री से अपना पेट ठूँस लेते हैं, और मानसिक अपच के रोगी हो जाते हैं।
मस्तिष्क पर लदी पुस्तकें रोग उत्पन्न करती हैं। पुस्तक को मस्तिष्क के भीतर ले जाइए, तो आप बढ़ेंगे। डिज़रायली की ‘साहित्य की विचित्रताएँ’ (Curiosities of Literature) में लूसियन की एक तीखी फटकार है, जो उन लोगों पर है जो बड़े-बड़े पुस्तकालय रखने का घमण्ड करते हैं, जिन्हें वे या तो कभी पढ़ते नहीं या उनसे कभी लाभ नहीं उठाते। वह ऐसे व्यक्ति की तुलना एक ऐसे माँझी से करके आरम्भ करता है जिसने जहाज़ चलाने की कला कभी नहीं सीखी, या एक ऐसे लंगड़े से जो कढ़ाईदार जूतियाँ तो पहनता है पर उनमें सीधा खड़ा नहीं हो सकता। फिर वह पुकार उठता है, “तुम इतनी पुस्तकें क्यों खरीदते हो? तुम्हारे सिर पर बाल नहीं, और तुम कंघी खरीदते हो; तुम अन्धे हो, और तुम्हें एक बढ़िया दर्पण खरीदना ही है; तुम बहरे हो, और तुम सबसे अच्छा वाद्य-यन्त्र लोगे!” यह उन लोगों के लिए बिलकुल उचित डाँट है जो सोचते हैं कि पुस्तकें रख लेने से उन्हें विद्या प्राप्त हो जाएगी। इस परीक्षा का कुछ अंश तो हम सब पर आ पड़ता है; क्योंकि क्या पुस्तक-विक्रेता की दुकान में एक-दो घण्टे बिताने के बाद हम अपने आप को अधिक बुद्धिमान अनुभव नहीं करते? इस तरह तो कोई मनुष्य बैंक ऑफ़ इंग्लैंड के तहख़ानों का निरीक्षण करके अपने आप को अधिक धनी भी समझ सकता है।
पुस्तकें पढ़ने में आपका आदर्श-वाक्य यह हो, “बहुत पढ़ो, बहुत सी नहीं।” पढ़ने के साथ-साथ सोचिए भी, और सोचने को सदा पढ़ने के अनुपात में रखिए, तो आपका छोटा सा पुस्तकालय कोई बड़ा दुर्भाग्य नहीं होगा।
बहुत वर्ष पहले ‘क्वार्टरली रिव्यू’ के एक लेखक की इस टिप्पणी में बहुत गहरी समझ है: “हमें तो वह एक प्यारी पुस्तक दीजिए, जो दुपहर के भोजन के दाम पर सड़क किनारे की दुकान से सस्ते में उठा ली गई हो, अँगूठों से घिसी और पन्ने मुड़ी हुई, पीठ से चटकी और कोने से टूटी हुई, मुखपृष्ठ के कोरे पन्ने पर टिप्पणियों और हाशिये पर घसीटी हुई लिखावट से भरी, मैली और झुलसी हुई, फटी और घिसी हुई, जेब में रहकर चिकनी और चूल्हे के पास रहकर काली पड़ी हुई, घास पर पड़ी रहकर नम हुई और राख के बीच धूल से भरी हुई, जिस पर आपने कुंज में बैठकर स्वप्न देखे हैं और अंगारों के सामने ऊँघे हैं, परन्तु जिसे आपने आरम्भ से अन्त तक फिर, फिर, और फिर पढ़ा है। इसी एक पुस्तक के द्वारा, और उसके बाद आने वाली तीन-चार अकेली पुस्तकों के द्वारा, उन असंख्य पुस्तकों से कहीं अधिक सच्चा संस्कार प्राप्त हुआ है जो बोडलियन पुस्तकालय की मील भर लम्बी, उभरी हुई, झुकती हुई अलमारियों को अपने बोझ से दबाती हैं।”
परन्तु यदि आपको लगता है कि आपके पास और अधिक पुस्तकें होनी ही चाहिए, तो मैं आपको थोड़ी सी विवेकपूर्ण उधारी की सलाह देता हूँ। सम्भवतः आपके कुछ मित्र होंगे जिनके पास पुस्तकें हैं, और जो कृपा करके आपको कुछ समय तक उनका उपयोग करने देंगे; और मैं आपको विशेष रूप से यह सलाह देता हूँ कि फिर से उधार पाने के लिए, जो कुछ भी आपको उधार दिया जाए, उसे तुरन्त और अच्छी दशा में लौटा दीजिए। मुझे आशा है कि पुस्तकें लौटाने के विषय में बहुत कुछ कहने की अब उतनी आवश्यकता नहीं है जितनी कुछ महीने पहले होती, क्योंकि हाल ही में मैंने एक पादरी का एक कथन पढ़ा है, जिसने मानव-स्वभाव के विषय में मेरी राय को बहुत ऊँचा कर दिया है; क्योंकि वह घोषणा करता है कि उसकी तीन ऐसे सज्जनों से व्यक्तिगत जान-पहचान है जिन्होंने सचमुच उधार लिए हुए छाते लौटा दिए हैं! मुझे यह कहते हुए खेद है कि वह मुझसे अधिक सौभाग्यशाली मण्डल में उठता-बैठता है, क्योंकि मेरी तो कई ऐसे जवानों से व्यक्तिगत जान-पहचान है जिन्होंने पुस्तकें उधार लीं और कभी नहीं लौटाईं।
कुछ दिन पहले, एक सेवक ने, जिसने मुझे पाँच पुस्तकें उधार दी थीं, जिनका उपयोग मैं दो वर्ष या उससे अधिक समय से कर रहा था, मुझे एक पत्र लिखकर उनमें से तीन पुस्तकें लौटाने का अनुरोध किया। उसे आश्चर्य हुआ कि अगली ही “पार्सल डिलीवरी” से उसे वे तीनों वापस मिल गईं, और साथ में वे दो और भी जिन्हें वह भूल गया था। मैंने उधार ली हुई पुस्तकों की एक सूची सावधानी से रखी थी, और इसलिए मैं स्वामी को पूरी की पूरी पुस्तकें लौटा सका। मुझे निश्चय है कि उसे उनके इतनी शीघ्र पहुँचने की आशा न थी, क्योंकि उसने मुझे आश्चर्य और कृतज्ञता से मिला-जुला एक पत्र लिखा, और जब मैं फिर उसके अध्ययन-कक्ष में जाऊँगा, तो मुझे पूरा भरोसा है कि वह मुझे प्रसन्नता से एक और पुस्तक उधार देगा। आप वह तुकबन्दी जानते हैं जो बहुत से लोगों की पुस्तकों में लिखी रहती है—
“यदि कोई मित्र तुझे उधार ले जाए, तो उसका हार्दिक स्वागत है— पढ़ने के लिए, अध्ययन करने के लिए, आगे उधार देने के लिए नहीं, परन्तु मुझे लौटाने के लिए।
यह नहीं कि बाँटा हुआ ज्ञान विद्या के भण्डार को घटा देता है, परन्तु पुस्तकें, मैंने पाया है, एक बार उधार दी गईं, तो फिर कभी मेरे पास लौटकर नहीं आतीं।”
सर वॉल्टर स्कॉट कहा करते थे कि उनके मित्र हिसाब-किताब रखने में चाहे बहुत कच्चे हों, परन्तु उन्हें निश्चय था कि वे पक्के “बुक-कीपर” (पुस्तकें रख लेने वाले) थे। कुछ लोगों को तो उस विद्वान की सीमा तक भी जाना पड़ा है, जिससे जब एक पुस्तक उधार माँगी गई, तो उसने नौकर के हाथ कहला भेजा कि वह पुस्तक को अपने कमरे से बाहर नहीं जाने देगा, परन्तु जो सज्जन उधार माँग रहे हैं, वे आकर वहाँ बैठें और जितनी देर चाहें पढ़ें। इसका उत्तर अप्रत्याशित परन्तु पूरा था, जब उसकी आग धीरे जलने के कारण उसने उसी व्यक्ति के पास धौंकनी उधार माँगने को भेजा, और उसे उत्तर मिला कि स्वामी धौंकनी को अपने कमरे से बाहर उधार नहीं देगा, परन्तु वे सज्जन आकर वहाँ जितनी देर चाहें फूँक सकते हैं। विवेकपूर्ण उधारी आपको पढ़ने के लिए बहुत कुछ दे सकती है, परन्तु पवित्रशास्त्र में उस मनुष्य की कुल्हाड़ी के फल को स्मरण रखिए, और जो कुछ उधार लें उसकी सावधानी रखिए। “दुष्ट ऋण लेता है, और भरता नहीं।”
यदि देश में पुस्तकों का अकाल भारी हो, तो एक पुस्तक है जो आप सब के पास है, और वह है आपकी बाइबल; और अपनी बाइबल के साथ एक सेवक अपने गोफन और पत्थर के साथ दाऊद के समान है, युद्ध के लिए पूरी तरह सुसज्जित। जब तक पवित्रशास्त्र पहुँच के भीतर है, कोई मनुष्य यह नहीं कह सकता कि उसके पास पानी भरने के लिए कोई कुआँ नहीं। बाइबल में हमारे पास एक सम्पूर्ण पुस्तकालय है, और जो उसका पूरी रीति से अध्ययन करता है, वह उससे अच्छा विद्वान होगा जिसने सिकन्दरिया का पूरा पुस्तकालय निगल लिया हो। बाइबल को समझना हमारी महत्त्वाकांक्षा होनी चाहिए; हमें उससे परिचित होना चाहिए, उतना ही परिचित जितनी गृहिणी अपनी सुई से, व्यापारी अपनी बही से, और नाविक अपने जहाज़ से होता है। हमें उसके सामान्य प्रवाह को, उसकी प्रत्येक पुस्तक की विषय-वस्तु को, उसके इतिहासों के ब्योरों को, उसके सिद्धान्तों को, उसकी आज्ञाओं को, और उसके विषय में सब कुछ जानना चाहिए।
इरास्मस जेरोम के विषय में कहते हुए पूछता है, “उसके सिवा और किसने कभी सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र कण्ठस्थ किया? या उसकी नाईं उसे आत्मसात किया, या उस पर मनन किया?” ‘वाचाएँ’ (The Covenants) नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ के लेखक, विद्वान डच व्यक्ति विट्सियस के विषय में कहा जाता है कि वह भी न केवल मूल भाषाओं में पवित्रशास्त्र का एक-एक शब्द दोहरा सकता था, वरन् उसका सन्दर्भ और सर्वश्रेष्ठ लेखकों की समीक्षाएँ भी बता सकता था; और मैंने लंकाशायर के एक बूढ़े सेवक के विषय में सुना है कि वह “चलता-फिरता कॉनकॉर्डेन्स” था, और उद्धृत किए गए किसी भी खण्ड का अध्याय और पद बता सकता था, या इसके विपरीत, स्थान बताए जाने पर उसके शब्द ठीक-ठीक बता सकता था। यह स्मरण-शक्ति का एक करतब रहा होगा, परन्तु उसके लिए आवश्यक अध्ययन अवश्य ही बहुत लाभदायक रहा होगा। मैं यह नहीं कहता कि आपको उसकी अभिलाषा करनी ही चाहिए; परन्तु यदि आप ऐसा कर सकें, तो वह प्राप्त करने योग्य होगा।
उस अनोखी प्रतिभा वाले व्यक्ति, विलियम हंटिंगटन (जिसकी मैं अभी न तो निन्दा करूँगा और न प्रशंसा) की विशेषताओं में से एक यह थी कि प्रचार करते समय वह निरन्तर पवित्रशास्त्र के उद्धरण देता था, और जब भी वह ऐसा करता, तो अध्याय और पद भी बताने का उसका अभ्यास था; और यह दिखाने के लिए कि वह छपी हुई पुस्तक पर निर्भर नहीं है, उसकी यह भद्दी आदत थी कि वह मंच के सामने से बाइबल हटा देता था।
जिस मनुष्य ने न केवल बाइबल का अक्षर, वरन् उसकी भीतरी आत्मा भी सीख ली है, वह कोई तुच्छ मनुष्य नहीं होगा, चाहे उसमें कितनी ही कमियाँ क्यों न हों। आप वह पुरानी कहावत जानते हैं, “एक पुस्तक वाले मनुष्य से सावधान रहो।” वह एक भयानक प्रतिद्वन्द्वी होता है। जिस मनुष्य की बाइबल उसकी उँगलियों के सिरों पर और उसके हृदय की गहराई में है, वह हमारे इस्राएल में एक योद्धा है; आप उसका मुकाबला नहीं कर सकते: आपके पास हथियारों का पूरा शस्त्रागार हो सकता है, परन्तु उसका पवित्रशास्त्र-ज्ञान आप पर प्रबल होगा; क्योंकि वह गोलियत की उस तलवार के समान है, जिसके विषय में दाऊद ने कहा, “उसके तुल्य कोई नहीं।”
मेरा विश्वास है कि अनुग्रह से भरपूर विलियम रोमेन ने अपने जीवन के अन्तिम भाग में अपनी सब पुस्तकें अलग रख दीं और अपनी बाइबल के सिवा और कुछ नहीं पढ़ा। वह एक विद्वान मनुष्य था— फिर भी वह उस एक पुस्तक में पूरी तरह लीन हो गया, और उसके द्वारा सामर्थी बनाया गया। यदि विवशता के कारण हमें भी ऐसा ही करना पड़े, तो हम स्मरण रखें कि कुछ लोगों ने ऐसा स्वेच्छा से किया है, और हम अपने भाग पर विलाप न करें, क्योंकि पवित्रशास्त्र हमारे स्वाद में मधु से भी मीठा लगेगा, और हमें “पुरनियों से भी अधिक समझदार” बनाएगा।
यदि हम निरन्तर उस ईश्वर-प्रेरित ग्रन्थ का अध्ययन करते रहें तो पवित्र सामग्री की हमें कभी कमी न होगी; वरन् वहाँ हमें केवल सामग्री ही नहीं, दृष्टान्त भी मिलेंगे; क्योंकि बाइबल अपनी सबसे अच्छी व्याख्याकार आप ही है। यदि आपको कोई घटना, उपमा, रूपक, या दृष्टान्त चाहिए, तो पवित्र पन्नों की ओर मुड़िए। पवित्रशास्त्र का सत्य कभी इतना मनोहर नहीं दिखता जितना तब, जब वह अपने ही भण्डार के रत्नों से सुसज्जित होता है।
हाल ही में मैं राजाओं और इतिहास की पुस्तकें पढ़ता रहा हूँ, और मैं उन पर मोहित हो गया हूँ; यदि खुली आँखों से पढ़ी जाएँ, तो वे भजन संहिता या भविष्यद्वक्ताओं की पुस्तकों के समान ही ईश्वरीय शिक्षा से भरपूर हैं। मेरा विचार है कि एम्ब्रोस ही कहा करते थे, “मैं पवित्रशास्त्र की असीमता की आराधना करता हूँ!” परमेश्वर की पुस्तक के विषय में मैं वही आवाज़ सुनता हूँ जो ऑगस्टीन के कानों में गूँजी थी, “Tolle, lege”— उठा, पढ़।
हो सकता है कि आप किसी गाँव में एकान्त में रहें, जहाँ आपको बातचीत करने के लिए ऐसा कोई न मिले जो आपके अपने स्तर से ऊपर हो, और जहाँ आपको पढ़ने योग्य बहुत कम पुस्तकें मिलें; तब प्रभु की व्यवस्था को रात-दिन पढ़िए और उस पर ध्यान कीजिए, और आप “उस वृक्ष के समान” होंगे “जो बहती नालियों के किनारे लगाया गया है।” बाइबल को अपना दाहिना हाथ, अपने हर घण्टे का साथी बनाइए, तो आपको घटिया वस्तुओं में अपने अल्प साधनों पर विलाप करने का बहुत कम कारण रहेगा।
मैं आपके मन पर यह सत्य गम्भीरता से अंकित करना चाहता हूँ कि जिस मनुष्य के पास साधन-सामग्री कम है, वह बहुत सोच-विचार के द्वारा उसकी पूर्ति कर सकता है। सोचना पुस्तकें रखने से उत्तम है। सोचना प्राण का एक ऐसा व्यायाम है जो उसकी शक्तियों को विकसित भी करता है और उन्हें शिक्षित भी करता है। एक बार एक छोटी लड़की से पूछा गया कि क्या वह जानती है कि उसकी आत्मा क्या है, और सब को आश्चर्य हुआ जब उसने कहा, “श्रीमान, मेरी आत्मा मेरा ‘सोच’ है।” यदि यह ठीक है, तो कुछ लोगों में आत्मा बहुत ही कम है। बिना सोचे पढ़ना मन को लाभ नहीं पहुँचा सकता, परन्तु वह मनुष्य को इस भ्रम में डाल सकता है कि वह बुद्धिमान होता जा रहा है।
कुछ लोगों के लिए पुस्तकें एक प्रकार की मूर्ति हैं। जैसे रोमन कैथोलिक के लिए मूर्ति का उद्देश्य यह है कि वह उसे मसीह का स्मरण कराए, पर वास्तव में वह उसे मसीह से दूर रखती है, वैसे ही पुस्तकों का उद्देश्य मनुष्यों को सोचने के लिए प्रेरित करना है, परन्तु वे प्रायः विचार में बाधा बन जाती हैं।
जब जॉर्ज फॉक्स ने एक तेज़ चाकू लेकर अपने लिए चमड़े का एक पायजामा काट लिया, और समाज के फ़ैशनों से नाता तोड़कर, महीनों लगातार सोचने के लिए एक खोखले पेड़ में जा छिपा, तब वह विचार का ऐसा मनुष्य बनता जा रहा था जिसके सामने पुस्तकों वाले लोग शीघ्र ही पीछे हट गए। उसने न केवल अपने समय के पोपतंत्रों, धर्माध्यक्ष-तंत्रों और प्रेस्बिटेरी-तंत्रों के बीच, वरन् असहमत (डिसेंटिंग) कलीसियाओं की सुपठित मर्यादाओं के बीच भी कैसी खलबली मचा दी! उसने आकाश से अनगिनत मकड़ी के जाले झाड़ दिए, और किताबी कीड़ों की नाक में दम कर दिया।
विचार अध्ययन की रीढ़ है, और यदि अधिक सेवक सोचें, तो वह कैसी आशीष होगी! केवल इतना है कि हमें ऐसे मनुष्य चाहिए जो परमेश्वर के प्रकट किए हुए सत्य पर सोचें, न कि ऐसे स्वप्नदर्शी जो अपनी कल्पनाओं से धर्म गढ़ लेते हैं। आजकल हम ऐसे लोगों के एक दल से परेशान हैं जिन्हें अपने सिर के बल खड़े होकर पाँवों से सोचना ही है। मनगढ़न्त कहानियाँ बुनना ही उनकी दृष्टि में मनन है। प्रकट किए हुए सत्य पर विचार करने के बजाय, वे अपनी ही एक खिचड़ी पका लेते हैं, जिसमें भूल, बकवास और अहंकार लगभग बराबर मात्रा में दिखाई देते हैं; और वे इस शोरबे को “आधुनिक विचार” कहते हैं। हमें ऐसे मनुष्य चाहिए जो सीधा सोचने का प्रयत्न करें, और फिर भी गहराई से सोचें, क्योंकि वे परमेश्वर के विचार सोचते हैं। मुझसे यह दूर रहे कि मैं आपसे इस युग के उन डींग मारने वाले विचारकों का अनुकरण करने का आग्रह करूँ, जो अपने आराधनालयों को खाली कर देते हैं, और फिर इस बात पर घमण्ड करते हैं कि वे सुसंस्कृत और बुद्धिजीवी लोगों को प्रचार करते हैं। यह दयनीय पाखण्डपूर्ण बकवास है। जिन बातों पर हमारे बीच दृढ़ विश्वास किया जाता है, उन पर गम्भीरता से विचार करना बिलकुल दूसरी बात है, और उसी के लिए मैं आपसे आग्रह करता हूँ।
व्यक्तिगत रूप से मैं उन बहुत से घण्टों, वरन् दिनों का भी बहुत ऋणी हूँ, जो मैंने मेडवे नदी के किनारे एक पुराने बलूत के पेड़ के नीचे अकेले बिताए। जिस समय मैं स्कूल छोड़ रहा था, उस समय कुछ अस्वस्थ होने के कारण मुझे काफ़ी अवकाश मिला, और एक उत्तम मछली पकड़ने की बंसी से सुसज्जित होकर मैंने कुछ छोटी मछलियाँ पकड़ीं, और बहुत से दिवास्वप्नों का आनन्द लिया, जिनके बीच-बीच में हृदय की जाँच होती रहती थी, और प्राप्त किए हुए ज्ञान की बहुत जुगाली भी। यदि लड़के सोचें, तो अच्छा होगा कि उन्हें कक्षा का काम कम और सोचने का अवसर अधिक दिया जाए। केवल ठूँसना और पचाना कुछ नहीं— इससे ऐसा मांस बनता है जिसमें पेशियाँ नहीं होतीं, और यह शारीरिक रूप से जितना शोचनीय है, मानसिक रूप से उससे भी अधिक शोचनीय है। यदि आपके लोग इतने अधिक नहीं हैं कि आपको पुस्तकालय दे सकें, तो वे आपके समय की माँग भी कम करेंगे, और मनन के लिए समय पाकर आप अपने उन भाइयों से भी अच्छी दशा में होंगे जिनके पास बहुत सी पुस्तकें हैं और शान्त चिन्तन के लिए बहुत कम अवकाश।
पुस्तकों के बिना भी मनुष्य अपनी आँखें खुली रखकर बहुत कुछ सीख सकता है। वर्तमान इतिहास, उसकी अपनी नाक के नीचे घटने वाली घटनाएँ, समाचार-पत्र में लिखी घटनाएँ, आम बातचीत के विषय— वह इन सब से सीख सकता है। आँखें होने और आँखें न होने का अन्तर अद्भुत है। यदि आपके पास आँखें गड़ाने के लिए पुस्तकें नहीं हैं, तो जहाँ कहीं जाएँ, उन्हें खुली रखिए, और आपको देखने योग्य कुछ न कुछ मिल जाएगा। क्या आप प्रकृति से नहीं सीख सकते? हर फूल आपको सिखाने की बाट जोह रहा है। “सोसनों पर ध्यान करो,” और गुलाबों से सीखो। आप केवल चींटी के पास ही नहीं जा सकते, वरन् हर जीवित प्राणी आपको शिक्षा देने के लिए अपने आप को प्रस्तुत करता है। हर आँधी में एक आवाज़ है, और उसके उड़ाए हुए धूल के हर कण में एक पाठ है। भोर को घास की हर पत्ती पर उपदेश चमकते हैं, और जब पेड़ों से सूखे पत्ते गिरते हैं तो प्रवचन आपके पास से उड़ते हुए निकल जाते हैं। वन एक पुस्तकालय है, अनाज का खेत दर्शनशास्त्र का एक ग्रन्थ है, चट्टान एक इतिहास है, और उसकी तलहटी में बहती नदी एक कविता। हे आप जिनकी आँखें खुल गई हैं, जाइए, और ऊपर स्वर्ग में, नीचे पृथ्वी पर, और पृथ्वी के नीचे के जल में, सर्वत्र बुद्धि के पाठ ढूँढ़िए। इनकी तुलना में पुस्तकें तुच्छ वस्तुएँ हैं।
इसके अतिरिक्त, आपके पुस्तकालय कितने ही छोटे क्यों न हों, आप अपना अध्ययन स्वयं कर सकते हैं। यह एक रहस्यमय ग्रन्थ है, जिसका अधिकांश भाग आपने नहीं पढ़ा है। यदि कोई मनुष्य सोचता है कि वह अपने आप को पूरी तरह जानता है, तो वह अपने आप को धोखा देता है; क्योंकि सबसे कठिन पुस्तक जो आप कभी पढ़ेंगे, वह आपका अपना हृदय है। कुछ दिन पहले मैंने एक सन्देह करने वाले से, जो किसी भूलभुलैया में भटकता हुआ सा प्रतीत होता था, कहा, “सच कहूँ तो मैं आपको समझ नहीं पाता; परन्तु मैं झुँझलाता नहीं, क्योंकि मैं अपने आप को भी कभी नहीं समझ सका;” और मेरा आशय निश्चय ही वही था जो मैंने कहा।
अपने मन के मोड़ों, घुमावों और विचित्रताओं को, और अपने अनुभव की अनोखी बातों को ध्यान से देखिए; अपने हृदय की भ्रष्टता को, और ईश्वरीय अनुग्रह के कार्य को; पाप की ओर अपने झुकाव को, और पवित्रता के लिए अपनी क्षमता को; आप किस प्रकार एक शैतान के सगे हैं, और फिर भी स्वयं परमेश्वर से कैसे जुड़े हुए हैं! ध्यान दीजिए कि जब परमेश्वर आपको सिखाता है तब आप कितनी बुद्धिमानी से काम कर सकते हैं, और जब आप अपने ऊपर छोड़ दिए जाते हैं तब कितनी मूर्खता से व्यवहार करते हैं। आप पाएँगे कि दूसरों के प्राणों के रखवाले के रूप में आपके लिए अपने हृदय का अध्ययन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। मनुष्य का अपना अनुभव उसके लिए वह प्रयोगशाला होना चाहिए जिसमें वह उन औषधियों को परखता है जो वह दूसरों के लिए लिखता है। यदि आप अपने दोषों और विफलताओं को भी प्रभु के पास ले आएँ, तो वे भी आपको शिक्षा देंगे। पूर्णतः निष्पाप मनुष्य अपूर्ण पुरुषों और स्त्रियों के साथ सहानुभूति रखने में असमर्थ होते। अपने प्राणों के साथ प्रभु के व्यवहार का अध्ययन कीजिए, तो आप दूसरों के साथ उसके मार्गों के विषय में अधिक जान पाएँगे।
दूसरे मनुष्यों को पढ़िए; वे पुस्तकों के समान ही शिक्षाप्रद हैं। मान लीजिए कि हमारे किसी बड़े अस्पताल में एक ऐसा जवान विद्यार्थी आए जो इतना निर्धन हो कि शल्य-चिकित्सा की पुस्तकें न खरीद सके; निश्चय ही यह उसके लिए बड़ी हानि की बात होगी; परन्तु यदि उसे अस्पताल में आने-जाने की पूरी छूट हो, यदि वह ऑपरेशन होते हुए देखे, और दिन-प्रतिदिन रोगियों की दशा पर ध्यान रखे, तो मुझे आश्चर्य न होगा यदि वह अपने अधिक सुविधा-सम्पन्न साथियों के समान ही कुशल शल्य-चिकित्सक निकले। उसका अवलोकन उसे वह दिखाएगा जो केवल पुस्तकें नहीं दिखा सकतीं; और जब वह पास खड़ा होकर किसी अंग का काटा जाना, किसी घाव की मरहम-पट्टी, या किसी धमनी का बाँधा जाना देखे, तो कम से कम वह इतनी व्यावहारिक शल्य-चिकित्सा तो सीख ही सकता है जो उसके लिए अत्यन्त उपयोगी हो।
अब, एक सेवक को जो कुछ जानना आवश्यक है, उसका बहुत सा भाग उसे प्रत्यक्ष अवलोकन के द्वारा ही सीखना होगा। सब बुद्धिमान पास्टरों ने आत्मिक रूप से अस्पतालों में प्रशिक्षण लिया है, और पूछताछ करने वालों, कपटियों, पीछे हटने वालों, निराश लोगों और ढिठाई करने वालों से निपटे हैं। जिस मनुष्य को स्वयं परमेश्वर की बातों का ठोस व्यावहारिक अनुभव है, और जिसने अपने संगी मनुष्यों के हृदयों को ध्यान से देखा है, वह, अन्य बातें समान होने पर, उस मनुष्य से कहीं अधिक उपयोगी होगा जो केवल वही जानता है जो उसने पढ़ा है। यह बड़े दुःख की बात है कि कोई मनुष्य कॉलेज का ऐसा छैला हो, जो कक्षा से ऐसे निकलता है मानो किसी सजे-सजाए डिब्बे में से निकला हो, और एक ऐसे संसार में आता है जिसे उसने पहले कभी नहीं देखा, ऐसे मनुष्यों से निपटने के लिए जिन्हें उसने कभी ध्यान से नहीं देखा, और ऐसी वास्तविकताओं को सम्भालने के लिए जिनके व्यक्तिगत सम्पर्क में वह कभी नहीं आया। प्रेरित कहता है, “नया चेला न हो;” और यह सम्भव है कि कोई नौसिखिया हो और फिर भी एक बहुत निपुण विद्वान, प्राचीन साहित्य का ज्ञाता, गणितज्ञ, और सैद्धान्तिक धर्मविज्ञानी हो। हमें मनुष्यों के प्राणों से व्यावहारिक परिचय होना चाहिए; और यदि यह हमारे पास बहुत हो, तो हमारी पुस्तकों की कमी एक हल्का सा क्लेश होगी।
“परन्तु,” एक जिज्ञासु भाई कहता है, “आप किसी मनुष्य को कैसे पढ़ सकते हैं?” मैंने एक सज्जन के विषय में सुना है जिसके बारे में कहा जाता था कि आप उसके साथ किसी मेहराब के नीचे पाँच मिनट भी नहीं ठहर सकते थे कि वह आपको कुछ न कुछ सिखा न दे। वह एक बुद्धिमान मनुष्य था; परन्तु उससे भी अधिक बुद्धिमान वह मनुष्य होगा जो किसी मेहराब के नीचे पाँच मिनट भी दूसरे लोगों से कुछ न कुछ सीखे बिना न ठहरे। बुद्धिमान लोग एक मूर्ख से भी उतना ही सीख सकते हैं जितना एक दार्शनिक से। मूर्ख पढ़ने के लिए एक शानदार पुस्तक है, क्योंकि उसका हर पन्ना आपके सामने खुला रहता है; उसकी शैली में हास्य का पुट होता है, जो आपको आगे पढ़ते रहने के लिए लुभाता है, और यदि आप और कुछ न भी पाएँ, तो इतनी चेतावनी तो मिल ही जाती है कि आप अपनी मूर्खता का ढिंढोरा न पीटें।
अनुभवी पवित्र लोगों से सीखिए। उनमें से कुछ हम जवानों को कैसी गहरी बातें सिखा सकते हैं! परमेश्वर के दीन लोग अपने लिए प्रभु के विधाता-रूप में प्रकट होने के कैसे-कैसे उदाहरण सुना सकते हैं; वे उसके सम्भालने वाले अनुग्रह और उसकी वाचा के प्रति उसकी सच्चाई पर कैसे घमण्ड करते हैं! वे प्रायः प्रतिज्ञाओं पर कैसा नया प्रकाश डालते हैं, ऐसे अर्थ प्रकट करते हुए जो शारीरिक बुद्धिमानों से छिपे हैं, परन्तु सीधे-सादे हृदयों पर स्पष्ट किए गए हैं! बहुत सी प्रतिज्ञाएँ अदृश्य स्याही से लिखी हैं, और जब तक उन्हें क्लेश की आग के सामने न रखा जाए, तब तक उनके अक्षर दिखाई नहीं देते? परखे हुए मन सेवकों के लिए महान शिक्षक हैं।
और पूछताछ करने वाले से तो कितना कुछ सीखा जा सकता है! खोजने वाले प्राणों से बातचीत करते समय मैंने अपनी मूर्खता का बहुत कुछ देखा है। एक निर्धन लड़के को उद्धारकर्ता के पास लाने का प्रयत्न करते हुए मैं उससे चकरा गया हूँ; मैंने सोचा कि मैंने उसे कसकर पकड़ लिया है, परन्तु अविश्वास की टेढ़ी चतुराई से वह बार-बार मेरे हाथ से निकल गया। कभी-कभी जो पूछताछ करने वाले सचमुच व्याकुल होते हैं, वे आशा के विरुद्ध लड़ने में अपनी अनोखी निपुणता से मुझे चकित कर देते हैं; उनके तर्कों का अन्त नहीं होता और उनकी कठिनाइयाँ अनगिनत होती हैं। वे बार-बार हमें निरुत्तर (non plus) कर देते हैं। अन्त में परमेश्वर का अनुग्रह हमें उन्हें ज्योति में लाने के योग्य बनाता है, परन्तु तब तक नहीं जब तक हम अपनी अयोग्यता देख न लें। अविश्वास की अनोखी टेढ़ी बातों में, और उन विचित्र अर्थों और अनर्थों में जो निराश लोग अपनी भावनाओं और पवित्रशास्त्र के कथनों पर लगाते हैं— आप प्रायः शिक्षा का एक संसार पाएँगे। जहाँ तक पास्टर के पद के लिए व्यावहारिक प्रशिक्षण का सम्बन्ध है, मैं किसी जवान को हमारी सबसे अच्छी कक्षाओं में एक सप्ताह देने के बजाय पूछताछ करने वालों और मानसिक रूप से उदास लोगों के साथ एक घण्टा देना अधिक पसन्द करूँगा।
एक बात और, मृत्यु-शय्याओं के पास बहुत रहिए; वे प्रकाशमान पुस्तकें हैं। वहाँ आप हमारे धर्म की सच्ची कविता पढ़ेंगे, और उसके भेद सीखेंगे। यरदन की लहरें कैसे शानदार रत्न किनारे पर बहा लाती हैं! उसके तटों पर कैसे सुन्दर फूल उगते हैं! महिमा के देश के अनन्त सोते अपनी फुहारें ऊपर उछालते हैं, और ओस की बूँदें इस सँकरी धारा के इस पार गिरती हैं! मैंने दीन पुरुषों और स्त्रियों को, उनके प्रस्थान की घड़ियों में, ऐसे बोलते सुना है मानो वे ईश्वर-प्रेरित हों, वे स्वर्गीय महिमा से दमकते हुए विचित्र शब्द बोलते थे। ये शब्द उन्होंने चन्द्रमा के नीचे किसी होंठों से नहीं सीखे थे; अवश्य ही उन्होंने इन्हें नये यरूशलेम के उपनगरों में बैठे हुए सुना होगा। परमेश्वर उनकी पीड़ा और निर्बलता के बीच उनके कानों में ये बातें फुसफुसाता है; और तब वे हमें थोड़ा सा बताते हैं कि आत्मा ने क्या प्रकट किया है। यदि मैं प्रभु के एलिय्याहों को अपने अग्निमय रथों पर चढ़ते देख सकूँ, तो मैं अपनी सब पुस्तकें त्याग दूँगा।
