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सेवक की साधारण बातचीत
हमारा विषय सेवक की वह साधारण बातचीत है जो वह तब करता है जब वह आम लोगों के बीच घुलता-मिलता है, और माना जाता है कि वह पूरी तरह सहज है। वह अपने संगी मनुष्यों के बीच अपनी वाणी को किस प्रकार सँवारे?
सबसे पहले और सबसे बढ़कर, मैं यह कहूँ कि वह अपने ऊपर पादरीपन का कोई आडम्बर न ओढ़े, वरन् हर उस बात से बचे जो बनावटी, दफ़्तरी, झंझटी और दिखावटी हो। “मनुष्य का पुत्र” एक उत्तम उपाधि है; यह यहेजकेल को दी गई थी, और उससे भी बड़े एक को; इसलिए स्वर्ग का राजदूत मनुष्य के पुत्र के सिवा और कुछ न बने। वास्तव में, उसे यह स्मरण रखना चाहिए कि वह जितना अधिक सरल और निष्कपट होगा, उतना ही अधिक वह उस बालक-मनुष्य, अर्थात् पवित्र बालक यीशु के समान होगा।
सेवक बनने की अति करने, और मनुष्य बहुत कम रह जाने जैसी भी एक बात होती है; यद्यपि आप जितने अधिक सच्चे मनुष्य होंगे, उतने ही अधिक सच्चाई से आप वह होंगे जो प्रभु के एक दास को होना चाहिए। स्कूल के मास्टरों और सेवकों का साधारणतः एक ऐसा रूप-रंग होता है जो विशेष रूप से उन्हीं का होता है; गलत अर्थ में, वे “और मनुष्यों के समान नहीं हैं।” बहुत बार वे चित्तीदार पक्षी होते हैं, जो ऐसे दिखते हैं मानो देश के अन्य निवासियों के बीच वे अपने घर में न हों, वरन् बेढंगे और अनोखे हों। जब मैंने किसी राजहंस को गम्भीरता से अकड़कर चलते, किसी उल्लू को छाया में पलकें झपकाते, या किसी सारस को शान्त भाव से विचारों में खोए देखा है, तो मुझे अनायास ही शिक्षा और प्रचार करनेवाली बिरादरी के अपने कुछ प्रतिष्ठित भाइयों का स्मरण हो आया है, जो हर समय इतने अद्भुत रूप से मर्यादित रहते हैं कि वे थोड़े-से हास्यास्पद लगने लगते हैं। उनका अत्यन्त सम्मानजनक, बनावटी, गरिमामय, महत्त्वपूर्ण, आत्म-संयमी ढंग आसानी से सीखा जा सकता है; परन्तु क्या वह सीखने योग्य है?
एक बार थियोडोर हुक एक ऐसे सज्जन के पास गया जो बड़े ठाट-बाट से सड़क पर अकड़कर घूम रहा था, और उससे कहा, “महाशय, क्या आप कोई बड़े महत्त्वपूर्ण व्यक्ति नहीं हैं?” और मन कुछ-कुछ ऐसा करता है कि पादरी-वर्ग के कुछ भाइयों के साथ भी यही किया जाए। मैं ऐसे भाइयों को जानता हूँ जो सिर से पाँव तक, पहनावे, स्वर, ढंग, गले की टाई और जूतों में, इतने पूरी तरह पादरीनुमा हैं कि उनमें मनुष्यत्व का एक कण भी दिखाई नहीं देता। धर्मविद्या का एक नौसिखिया युवक चोगा पहनकर ही सड़कों पर निकलने का आग्रह करता है, और हाई चर्च वर्ग के एक और महाशय ने बड़े आत्म-सन्तोष के साथ समाचार-पत्रों में यह छपवाया कि उन्होंने स्विट्ज़रलैंड और इटली की यात्रा की और हर स्थान पर अपनी बिरेटा पहने रहे; बहुत कम लड़के मूर्ख की टोपी पर इतना गर्व करते।
हम में से कोई अपने पहनावे में इतनी दूर तक जाएगा, इसकी सम्भावना नहीं है; परन्तु हम अपने तौर-तरीकों के द्वारा वैसा ही कर सकते हैं। कुछ मनुष्यों को देखकर ऐसा लगता है मानो उनके प्राणों के चारों ओर एक सफ़ेद गुलूबन्द लपेट दिया गया हो; उनका मनुष्यत्व उस कलफ़ लगे चिथड़े से घुट गया है। कुछ भाई श्रेष्ठता का ऐसा भाव बनाए रखते हैं जिसे वे प्रभावशाली समझते हैं, परन्तु जो केवल अप्रिय है, और दीन यीशु के अनुयायी होने के उनके दावे के बिलकुल विपरीत है। घमण्डी ड्यूक ऑफ़ समरसेट अपने नौकरों को अपनी आज्ञाएँ संकेतों से बताता था, क्योंकि ऐसे नीच प्राणियों से बोलना वह अपनी शान के विरुद्ध समझता था; उसके बच्चे कभी उसकी उपस्थिति में नहीं बैठते थे, और जब वह दोपहर को सोता था तो उसकी गौरवपूर्ण नींद के समय उसकी एक-एक बेटी उसके दोनों ओर खड़ी रहती थी। जब घमण्डी समरसेट जैसे लोग सेवकाई में आ जाते हैं, तो वे दूसरे ऐसे ढंगों से गरिमा का दिखावा करते हैं जो लगभग उतने ही बेतुके होते हैं। “अलग रह, मैं तुझ से पवित्र हूँ,” यह उनके माथों पर लिखा रहता है।
एक सुप्रसिद्ध सेवक को एक बार एक महान् भाई ने किसी विलासिता में लिप्त होने के लिए डाँटा, और उसके खर्च को एक बड़ा तर्क बनाया गया। “अच्छा, अच्छा,” उसने उत्तर दिया, “इसमें कुछ बात हो सकती है; परन्तु स्मरण रखिए, मैं अपनी कमज़ोरी पर उसका आधा भी खर्च नहीं करता जितना आप कलफ़ पर करते हैं।” यही वह वस्तु है जिसकी मैं निन्दा कर रहा हूँ, वह भयानक पादरी-कलफ़। यदि आप उसमें लिप्त रहे हैं, तो मैं आपको गम्भीरता से सलाह दूँगा कि “जाकर यरदन में सात बार डुबकी मारो,” और उसे अपने में से निकाल डालो, उसका एक-एक कण।
मुझे निश्चय है कि हमारे मज़दूर वर्ग के लोग जो इतनी व्यापकता से सेवकों से दूर रहते हैं, उसका एक कारण यह है कि वे उनके बनावटी और पुरुषत्वहीन ढंगों से घृणा करते हैं। यदि वे हमें मंच (पल्पिट) पर और उसके बाहर भी सच्चे मनुष्यों के समान आचरण करते, और ईमानदार मनुष्यों के समान स्वाभाविक रूप से बोलते देखते, तो वे हमारे चारों ओर आ जुटते। बैक्सटर की यह टिप्पणी आज भी सही है: “हमारे अधिकांश प्रवचनों में घरेलू स्वर और अभिव्यक्ति का अभाव एक बड़ा दोष है, और वह ऐसा दोष है जिसे सुधारने में हमें बहुत सावधान रहना चाहिए।” सेवकाई का दुर्गुण यह है कि सेवक सुसमाचार को पादरीनुमा बना देने पर तुले रहते हैं। यदि हम जनसाधारण को जीतना चाहते हैं तो हमारे पास अपनी ईश्वरविद्या के साथ-साथ मानवता भी होनी चाहिए। दिखावे के आर-पार हर कोई देख सकता है, और लोग उनसे धोखा खानेवाले नहीं हैं। भाइयो, अपनी बैसाखियाँ फेंक दीजिए, और अपने पाँवों पर चलिए; अपना पादरीपन उतार फेंकिए, और सच्चाई को पहन लीजिए।
फिर भी, सेवक जहाँ कहीं भी हो, वह सेवक ही है, और उसे स्मरण रखना चाहिए कि वह ड्यूटी पर है। एक पुलिसवाला या एक सैनिक ड्यूटी से छुट्टी पर हो सकता है, परन्तु सेवक कभी नहीं। अपने मनोरंजन के समय में भी हमें अपने जीवन के महान् उद्देश्य का पीछा करते रहना चाहिए; क्योंकि हमें “समय और असमय” परिश्रमी रहने के लिए बुलाया गया है। ऐसी कोई स्थिति नहीं जिसमें हम रखे जाएँ और प्रभु यह प्रश्न लेकर न आ सके, “हे एलिय्याह, तेरा यहाँ क्या काम?” और हमें तुरन्त यह उत्तर देने योग्य होना चाहिए, “यहाँ भी मुझे तेरे लिए कुछ करना है, और मैं उसे करने का यत्न कर रहा हूँ।” निस्सन्देह धनुष की डोरी को समय-समय पर ढीला करना ही पड़ता है, नहीं तो वह अपना लचीलापन खो देगा; परन्तु डोरी काट डालने की कोई आवश्यकता नहीं।
इस समय मैं सेवक के विश्राम के समयों की बात कर रहा हूँ; और मैं कहता हूँ कि तब भी उसे परमेश्वर के राजदूत के समान आचरण करना चाहिए, और भलाई करने के अवसरों को पकड़ लेना चाहिए: इससे उसका विश्राम बिगड़ेगा नहीं, वरन् पवित्र होगा। सेवक को उस कमरे के समान होना चाहिए जिसे मैंने न्यू फ़ॉरेस्ट में ब्यूली में देखा था, जिसमें कभी कोई मकड़ी का जाला दिखाई नहीं देता। वह एक बड़ा कबाड़खाना है, और उसमें कभी झाड़ू नहीं लगाई जाती; फिर भी कोई मकड़ी उपेक्षा के चिह्नों से उसे कभी गन्दा नहीं करती। उसकी छत चेस्टनट की लकड़ी की है, और किसी कारण से, जिसे मैं नहीं जानता, मकड़ियाँ सालों-साल उस लकड़ी के पास नहीं आतीं। यही बात मुझे विंचेस्टर स्कूल के गलियारों में भी बताई गई थी: मुझसे कहा गया, “यहाँ कभी कोई मकड़ी नहीं आती।” हमारे मन भी आलसी आदतों से उसी प्रकार स्वच्छ रहने चाहिए।
लंदन नगर में कुलियों के लिए बने हमारे सार्वजनिक विश्राम-स्थलों पर आप ये शब्द पढ़ सकते हैं, “विश्राम कीजिए, परन्तु आवारागर्दी न कीजिए”; और उनमें ऐसी सलाह है जो हमारे ध्यान के योग्य है। कुछ न करने का एक मधुर ढंग भी होता है, जो थके-माँदे मन के लिए संसार की सबसे उत्तम औषधि है। जब मन थक जाता है और बिगड़ जाता है, तब उसे विश्राम देना उतना ही आलस्य नहीं है जितना सोना आलस्य नहीं है; और उचित समय तक सोने के कारण किसी मनुष्य को आलसी नहीं कहा जाता। आलस्य के साथ जागते रहने से परिश्रमपूर्वक सोना कहीं अच्छा है। अपने विश्राम के समयों में और अपने अवकाश की घड़ियों में भी भलाई करने को तैयार रहिए; और इस प्रकार सचमुच सेवक बनिए, तब आपको यह घोषणा करने की कोई आवश्यकता नहीं रहेगी कि आप सेवक हैं।
मंच के बाहर मसीही सेवक को मिलनसार मनुष्य होना चाहिए। वह संसार में संन्यासी या मठवासी बनने के लिए नहीं भेजा गया है। उसकी बुलाहट यह नहीं है कि वह प्राचीनकाल के उस सनकी शिमोन स्टाइलाइटीज़ की तरह, अपने संगी मनुष्यों से ऊपर, दिन भर एक खम्भे पर खड़ा रहे। आपको किसी अदृश्य बुलबुल के समान पेड़ की चोटी से गीत नहीं गाना है; वरन् मनुष्यों के बीच एक मनुष्य बनकर रहना है, और उनसे कहना है, “जो कुछ मनुष्य से सम्बन्ध रखता है, उस सब में मैं भी तुम्हारे ही समान हूँ।” नमक डिब्बे में पड़ा रहे तो किसी काम का नहीं; उसे मांस में मला जाना चाहिए; और हमारा व्यक्तिगत प्रभाव समाज में प्रवेश करके उसे स्वादिष्ट बनाना चाहिए।
दूसरों से अलग रहिए, तो आप उनका भला कैसे कर सकते हैं? हमारा स्वामी एक विवाह में गया, और चुंगी लेनेवालों और पापियों के साथ रोटी खाई, और फिर भी वह उन पाखण्डी फरीसियों से कहीं अधिक पवित्र था, जिनकी महिमा यह थी कि वे अपने संगी मनुष्यों से अलग थे। कुछ सेवकों को यह बताने की आवश्यकता है कि वे भी उसी जाति के हैं जिसके उनके सुननेवाले हैं। यह एक उल्लेखनीय तथ्य है, परन्तु हम इसे कह ही दें, कि बिशप, कैनन, आर्चडीकन, प्रीबेंडरी, ग्रामीण डीन, रेक्टर, विकार और यहाँ तक कि आर्चबिशप भी आखिरकार केवल मनुष्य ही हैं; और परमेश्वर ने पृथ्वी का कोई पवित्र कोना घेरकर अलग नहीं कर दिया है कि वह उनके लिए चांसल का काम दे, और वे उसमें अकेले रहें।
यदि गिरजे के आँगन और सभा-भवन के आँगन में पवित्र बातचीत का फिर से जागरण हो सके तो यह बुरा न होगा। मुझे अपने प्राचीन गिरजाघरों के बाहर बड़े-बड़े यू के पेड़ देखना अच्छा लगता है जिनके चारों ओर बैठने के आसन बने हों। वे मानो कहते हैं: “पड़ोसी, यहाँ बैठ जाओ, और उपदेश पर बात करो; देखो, पास्टर आ रहे हैं; वे हमारे साथ आ मिलेंगे, और हम एक सुहावनी, पवित्र बातचीत करेंगे।” हर प्रचारक ऐसा नहीं होता जिससे हम बात करना चाहें; परन्तु कुछ ऐसे होते हैं जिनसे एक घण्टा बातचीत करने के लिए मनुष्य अपनी सारी सम्पत्ति दे दे। मुझे ऐसा सेवक प्रिय है जिसका चेहरा मुझे उसे अपना मित्र बनाने का निमन्त्रण देता है—ऐसा मनुष्य जिसकी दहलीज़ पर आप “स्वागत है” पढ़ते हैं; और अनुभव करते हैं कि वहाँ पोम्पेई की उस चेतावनी, “कुत्ते से सावधान,” की कोई आवश्यकता नहीं।
मुझे वह मनुष्य दीजिए जिसके चारों ओर बच्चे ऐसे आ जुटते हैं जैसे शहद के बर्तन के चारों ओर मक्खियाँ: बच्चे भले मनुष्य के प्रथम श्रेणी के पारखी होते हैं। जब शेबा की रानी ने सुलैमान की बुद्धि की परीक्षा ली, तो रब्बी हमें बताते हैं कि वह अपने साथ कुछ नकली फूल लाई थी, जो बड़ी सुन्दरता से बनाए गए थे और जिनमें हल्की-सी सुगन्ध डाली गई थी, ताकि वे असली फूलों की हूबहू नकल लगें। उसने सुलैमान से कहा कि वह पता लगाए कि कौन-से नकली हैं और कौन-से असली। उस बुद्धिमान ने अपने सेवकों को खिड़की खोलने की आज्ञा दी, और जब मधुमक्खियाँ भीतर आईं तो वे तुरन्त असली फूलों पर जा बैठीं, और नकली फूलों की कुछ परवाह न की। इसी प्रकार आप पाएँगे कि बच्चों की अपनी सहज-बुद्धि होती है, और वे बहुत जल्दी पहचान लेते हैं कि उनका मित्र कौन है, और निश्चय जानिए कि बच्चों का मित्र ऐसा व्यक्ति होगा जिसे जानना सार्थक होगा। परिवार के हर एक सदस्य से कहने के लिए आपके पास कोई अच्छी बात हो—बड़े लड़कों से, और युवतियों से, और छोटी लड़कियों से, और सब से। कोई नहीं जानता कि एक मुस्कान और एक हार्दिक वाक्य क्या कुछ कर सकता है।
जिस मनुष्य को मनुष्यों के साथ बहुत कुछ करना है, उसे उनसे प्रेम करना चाहिए, और उनके बीच अपनापन अनुभव करना चाहिए। जिस व्यक्ति में कोई आत्मीयता नहीं, उसके लिए अच्छा होगा कि वह कफ़न-दफ़न का काम करनेवाला बन जाए, और मुर्दों को गाड़े, क्योंकि वह जीवितों को प्रभावित करने में कभी सफल नहीं होगा।
मैंने कहीं यह कथन पढ़ा है कि लोकप्रिय प्रचारक बनने के लिए मनुष्य में स्नेह होना चाहिए। इसमें सच्चाई है। यदि कोई मनुष्य बड़ी मण्डली चाहता है तो उसके पास बड़ा हृदय होना चाहिए। उसका हृदय हमारे तट के उन शानदार बन्दरगाहों के समान विशाल होना चाहिए, जिनमें पूरे बेड़े के लिए जगह होती है। जब किसी मनुष्य का हृदय बड़ा और प्रेम से भरा होता है, तो लोग उसके पास ऐसे जाते हैं जैसे जहाज़ बन्दरगाह को जाते हैं, और जब वे उसकी मित्रता की आड़ में लंगर डाल देते हैं तो शान्ति अनुभव करते हैं। ऐसा मनुष्य सार्वजनिक रूप से ही नहीं, निजी जीवन में भी हार्दिक होता है; उसका लहू मछली के समान ठण्डा नहीं होता, वरन् वह आपके अपने घर की अँगीठी के समान गर्म होता है। जब आप उसके पास जाते हैं तो कोई घमण्ड और स्वार्थ आपको ठिठुराता नहीं; आपका स्वागत करने के लिए उसके सब द्वार खुले रहते हैं, और आप तुरन्त उसके साथ अपने घर जैसा अनुभव करते हैं। मैं आपको, आप में से हर एक को, ऐसा ही मनुष्य बनने के लिए मनाना चाहूँगा।
मसीही सेवक को बहुत प्रसन्नचित्त भी होना चाहिए। मैं कुछ ऐसे मठवासियों की तरह घूमने में विश्वास नहीं करता जिन्हें मैंने रोम में देखा, जो कब्र जैसे स्वरों में एक-दूसरे का अभिवादन करते हैं, और यह सुखद सूचना देते हैं, “भाई, हमें मरना है!” और इस जीवन्त अभिवादन के उत्तर में उस पन्थ का हर जीवन्त भाई कहता है, “हाँ, भाई, हमें मरना है!” मुझे इतने प्रामाणिक स्रोत से यह आश्वासन पाकर प्रसन्नता हुई कि ये सब आलसी लोग मरनेवाले हैं; कुल मिलाकर, यही लगभग सबसे अच्छी बात है जो वे कर सकते हैं; परन्तु जब तक वह घटना घटित न हो, तब तक वे अभिवादन का कोई अधिक सुखदायक रूप अपना सकते हैं।
निस्सन्देह कुछ लोग ऐसे होते हैं जो सेवकों के अत्यन्त गम्भीर रूप से प्रभावित होते हैं। मैंने एक ऐसे व्यक्ति के विषय में सुना है जिसे किसी पादरी का अत्यन्त भूखा और मुरझाया हुआ रूप देखकर यह निश्चय हो गया कि रोमन कैथोलिक धर्म में अवश्य कुछ बात होगी। “देखो,” उसने कहा, “यह मनुष्य अपने प्रतिदिन के उपवासों और रात-रात भर के जागरणों से कैसे घुलकर कंकाल बन गया है! वह अपने शरीर को कैसे मारता होगा!” अब, सम्भावना यह है कि वह दुबला-पतला पुरोहित किसी भीतरी रोग से पीड़ित था, जिससे छुटकारा पाकर वह हृदय से प्रसन्न होता, और उसे इतना क्षीण करनेवाली वस्तु भूख पर विजय नहीं, वरन् पाचन की विफलता थी; या कदाचित् कोई व्याकुल विवेक, जिसने उसे इतना कुढ़ाया कि वह हल्के वज़न तक घट गया। निश्चय ही, मुझे कोई ऐसा पद कभी नहीं मिला जो हड्डियों के उभार को अनुग्रह का प्रमाण बताता हो। यदि ऐसा होता, तो “जीवित कंकाल” को केवल एक प्राकृतिक अजूबे के रूप में ही नहीं, वरन् सद्गुण के मानदण्ड के रूप में प्रदर्शित किया जाना चाहिए था। संसार के कुछ सबसे बड़े धूर्त रूप में ऐसे मरे-मरे-से रहे हैं मानो वे टिड्डियों और वन मधु पर जीते रहे हों। यह मानना एक बहुत भद्दी भूल है कि उदास चेहरा अनुग्रह से भरे हृदय का सूचक है।
जो आत्माओं को जीतना चाहते हैं, उन सब से मैं प्रसन्नचित्तता की अनुशंसा करता हूँ; छिछोरेपन और ओछेपन की नहीं, वरन् एक आत्मीय और आनन्दित आत्मा की। सिरके की अपेक्षा शहद से अधिक मक्खियाँ पकड़ी जाती हैं, और जो मनुष्य अपने चेहरे पर स्वर्ग लिए फिरता है, उसके द्वारा उस मनुष्य की अपेक्षा अधिक प्राण स्वर्ग की ओर ले जाए जाएँगे जिसकी सूरत पर पाताल छाया रहता है।
युवा सेवकों को, और वास्तव में अन्य सब को भी, जब वे संगति में हों तो इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि सारी बातचीत पर वे ही अधिकार न जमा लें। निस्सन्देह वे ऐसा करने के पूरे योग्य हैं; मेरा अभिप्राय है सिखाने की उनकी क्षमता और बोलने की उनकी तत्परता के कारण; परन्तु उन्हें स्मरण रखना चाहिए कि लोग निरन्तर सिखाए जाना पसन्द नहीं करते; वे स्वयं भी बातचीत में अपनी बारी लेना पसन्द करते हैं। कुछ लोगों को इससे बढ़कर और कुछ प्रसन्न नहीं करता कि उन्हें बोलने दिया जाए, और उन्हें प्रसन्न होने देना उन्हीं की भलाई के लिए हो सकता है। एक शाम मैंने एक व्यक्ति के साथ एक घण्टा बिताया, जिसने मुझे यह कहकर सम्मानित किया कि उसने मुझे बहुत मनोहर साथी और बातचीत में अत्यन्त शिक्षाप्रद पाया—फिर भी यह मान लेने में मुझे कोई संकोच नहीं कि मैंने लगभग कुछ भी नहीं कहा, वरन् सारी बातचीत उसी को करने दी। धीरज रखकर मैंने उसकी अच्छी राय प्राप्त की, और दूसरे अवसरों पर उससे बात करने का अवसर भी। भोजन की मेज़ पर किसी मनुष्य को सब कुछ बोलने का उतना ही अधिकार नहीं है जितना सब कुछ खा जाने का। हमें अपने आपको ‘सर ओरेकल’ नहीं समझना चाहिए, जिसके सामने किसी कुत्ते को मुँह खोलने की अनुमति न हो। नहीं; संगति में उपस्थित सब लोगों को अपने-अपने भण्डार में से योगदान करने दीजिए, और तब वे उन भक्तिपूर्ण बातों को और भी अधिक सराहेंगे जिनसे आप चर्चा को स्वादिष्ट बनाने का यत्न करते हैं।
कुछ ऐसी सभाएँ होंगी जिनमें आप जाएँगे, विशेषकर जब आप पहली बार कहीं स्थापित होते हैं, जहाँ हर कोई आपकी उपस्थिति की महिमा से अभिभूत होगा, और लोगों को इसलिए बुलाया जाएगा कि नए सेवक वहाँ आनेवाले हैं। ऐसी स्थिति मुझे वैटिकन की सबसे उत्तम मूर्तिकला की याद दिलाती है। एक छोटा-सा कमरा परदे से अलग किया गया है, परदा हटाया जाता है, और देखो! आपके सामने महान् अपोलो खड़ा है! यदि उस छोटी-सी मण्डली का अपोलो बनना आपका कठिन भाग हो, तो इस मूर्खता का अन्त कर दीजिए। यदि मैं वह अपोलो होता, तो मैं चाहता कि सीधे चबूतरे से नीचे उतरकर सब से हाथ मिलाऊँ, और अच्छा होगा कि आप भी ऐसा ही करें; क्योंकि देर-सबेर वे आपके विषय में जो धूमधाम करते हैं उसका अन्त हो ही जाएगा, और सबसे बुद्धिमानी की बात यह है कि आप स्वयं उसका अन्त कर दें।
नायक-पूजा एक प्रकार की मूर्तिपूजा है, और उसे प्रोत्साहन नहीं दिया जाना चाहिए। नायक तब भला करते हैं जब वे, लुस्त्रा में प्रेरितों के समान, अपने प्रति किए गए सम्मान से भयभीत हो जाते हैं, और लोगों के बीच दौड़कर पुकारते हैं, “हे लोगो, तुम क्या करते हो? हम भी तो तुम्हारे समान दुःख-सुख भोगी मनुष्य हैं।” सेवकों को यह बहुत समय तक नहीं करना पड़ेगा; क्योंकि उनके मूर्ख प्रशंसक बहुत जल्दी उनके विरुद्ध पलट जाते हैं, और यदि वे उन्हें पत्थरवाह करके अधमरा नहीं कर देते, तो भी निर्दयता और तिरस्कार में जहाँ तक उनका साहस हो वहाँ तक चले जाते हैं।
यद्यपि मैं कहता हूँ, “सारी बातें आप ही न कीजिए, और ऐसा महत्त्व न ओढ़िए जो निरा ढोंग हो;” फिर भी, गूँगे पुतले मत बनिए। लोग आपके और आपकी सेवकाई के विषय में अपना अनुमान उससे भी बनाएँगे जो वे आपको निजी जीवन में देखते हैं, और आपके सार्वजनिक प्रवचनों से भी। बहुत से युवकों ने बैठक में असावधान रहकर मंच पर अपने आपको बरबाद कर लिया है, और संगति में अपनी मूर्खता या ओछेपन के कारण भलाई करने की सारी आशा खो दी है। निर्जीव लकड़ी का लट्ठा मत बनिए। एंटवर्प के मेले में, बड़े-बड़े चित्रों और बड़े-बड़े ढोलों के द्वारा विज्ञापित अनेक अजूबों के बीच, मैंने एक तम्बू देखा जिसमें “एक बड़ा आश्चर्य” था, जिसे प्रति व्यक्ति एक पेनी देकर देखा जा सकता था; वह एक पत्थर बना हुआ मनुष्य था। मैंने प्रवेश के लिए आवश्यक राशि खर्च नहीं की, क्योंकि मैं मंच पर और उसके बाहर भी, इतने सारे पत्थर बने मनुष्य मुफ़्त में देख चुका था—निर्जीव, लापरवाह, साधारण समझ से रहित, और पूरी तरह निष्क्रिय, यद्यपि वे उस सबसे भारी काम में लगे हुए थे जिसे मनुष्य हाथ में ले सकता है।
बातचीत को लाभदायक उपयोग में मोड़ने का यत्न कीजिए। मिलनसार और प्रसन्नचित्त रहिए और वह सब कुछ, परन्तु कुछ पूरा करने के लिए परिश्रम कीजिए। आप वायु क्यों बोएँ, या चट्टान पर हल क्यों चलाएँ? आखिरकार, अपने आपको उस बातचीत के लिए बहुत कुछ उत्तरदायी समझिए जो आपकी उपस्थिति में चलती है; क्योंकि साधारणतः आपका इतना आदर किया जाएगा कि बातचीत की पतवार आपके ही हाथ में होगी। इसलिए उसे किसी अच्छी धारा में ले चलिए। यह बिना रूखेपन या ज़बरदस्ती के कीजिए। रेल-पथ के काँटों को ठीक दशा में रखिए, और गाड़ी बिना किसी झटके के आपकी पटरियों पर आ जाएगी। चतुराई से अवसरों को पकड़ने के लिए तैयार रहिए, और बिना किसी को पता चले वांछित मार्ग पर आगे ले चलिए। यदि आपका हृदय उसमें लगा है और आपकी बुद्धि जागी हुई है, तो यह काफ़ी आसान होगा, विशेषकर यदि आप मार्गदर्शन के लिए एक छोटी-सी प्रार्थना कर लें।
मैं उस ढंग को कभी नहीं भूलूँगा जिससे एक प्यासे व्यक्ति ने एक बार क्लैपहम कॉमन पर मुझसे भीख माँगी थी। मैंने उसे एक बहुत बड़ी हाथगाड़ी के साथ देखा, जिसमें वह एक अत्यन्त छोटा-सा पार्सल ले जा रहा था, और मुझे आश्चर्य हुआ कि उसने पार्सल को अपनी जेब में क्यों नहीं रख लिया, और उस यन्त्र को घर पर क्यों नहीं छोड़ दिया। मैंने कहा, “इतने छोटे बोझ के लिए इतनी बड़ी गाड़ी देखना अजीब लगता है।” वह रुक गया, और गम्भीरता से मेरे चेहरे की ओर देखते हुए बोला, “हाँ, महाशय, यह बड़ी अजीब बात है; परन्तु, क्या आप जानते हैं, आज ही मुझे इससे भी अजीब बात मिली है। इस पूरे धन्य दिन मैं इधर-उधर काम करता और पसीना बहाता रहा हूँ, और अब तक मुझे एक भी ऐसा सज्जन नहीं मिला जो ऐसा दिखता हो कि वह मुझे एक पाइंट बियर दिलाएगा, जब तक कि मैंने आपको नहीं देखा।” मैंने समझा कि बातचीत का वह मोड़ बड़ी सफ़ाई से साधा गया था, और हमें, जिनके मन में इससे कहीं उत्तम विषय है, उस विषय को छेड़ने में उतना ही सक्षम होना चाहिए जिस पर हमारा हृदय लगा है। उस मनुष्य के ढंग में एक ऐसी सहजता थी जिससे मुझे ईर्ष्या हुई, क्योंकि मुझे अपना विषय उसके ध्यान में लाना उतना सरल काम नहीं लगा; फिर भी यदि मैं इस विषय में उतना ही सोच रहा होता कि मैं उसकी भलाई कैसे करूँ, जितना वह यह सोच रहा था कि पीने को कैसे मिले, तो मुझे निश्चय है कि मैं अपनी बात तक पहुँचने में सफल हो जाता।
यदि हमें किसी न किसी रीति से कई एक का उद्धार कराना है, तो हमें अपने प्रभु के समान भोजन की मेज़ पर अच्छे उद्देश्य से बात करनी चाहिए—हाँ, और कुएँ के किनारे, और मार्ग में, और समुद्र-तट पर, और घर में, और खेत में भी। यीशु के लिए एक पवित्र बातचीत करनेवाला होना लगभग उतना ही फलदायक पद हो सकता है जितना एक विश्वासयोग्य प्रचारक होना। दोनों अभ्यासों में उत्कृष्टता का लक्ष्य रखिए, और यदि पवित्र आत्मा की सहायता माँगी जाए, तो आपकी अभिलाषा पूरी होगी।
यहाँ, कदाचित्, मैं एक नियम जोड़ दूँ, यद्यपि उन सम्माननीय भाइयों में से हर एक के सम्बन्ध में, जिन्हें मैं अभी सम्बोधित कर रहा हूँ, मैं इसे बिलकुल अनावश्यक समझता हूँ। धनवानों की कृपा पाने के लिए उनकी मेज़ों पर बार-बार मत जाइए, और चाय-पार्टियों और दावतों में अपने आपको कभी एक प्रकार का सामान्य पिछलग्गू मत बनाइए। आप कौन हैं कि इस धनवान और उस धनवान की हाज़िरी बजाते फिरें, जबकि प्रभु के कंगाल, उसके बीमार लोग, और उसकी भटकी हुई भेड़ें आपकी राह देख रही हैं? अध्ययन-कक्ष को बैठक के लिए बलिदान करना अपराध है। अपनी कलीसिया के लिए दलाल बनना, और लोगों को अपनी बेंचें भरने के लिए खींच लाने को उनके घरों पर घात लगाना, ऐसी अधोगति है जिसके आगे किसी मनुष्य को झुकना नहीं चाहिए। विभिन्न सम्प्रदायों के सेवकों को किसी धनवान के चारों ओर ऐसे मँडराते देखना, जैसे मरे हुए ऊँट के चारों ओर गिद्ध, जी मिचलानेवाला है।
वह प्रसिद्ध पत्र बड़ा ही मज़ेदार व्यंग्य था जो “एक वृद्ध और प्रिय सेवक की ओर से उसके प्रिय पुत्र को” उसके सेवकाई में प्रवेश के अवसर पर लिखा गया था, जिसका निम्नलिखित अंश हमारी वर्तमान बात पर ठीक चोट करता है। कहा जाता है कि इसे स्मेलफ़ंगस गैज़ेट से नकल किया गया था, परन्तु मुझे सन्देह है कि हमारे मित्र पैक्सटन हुड इसके लेखक के विषय में सब कुछ जानते हैं: “सब सम्भावनापूर्ण लोगों पर भी चौकस दृष्टि रखना, विशेषकर धनी या प्रभावशाली लोगों पर, जो तुम्हारे नगर में आएँ; उनसे मिलने जाना, और बैठक-खाने की भक्ति के द्वारा उन्हें अपने पक्ष में जीतने का यत्न करना। इस प्रकार तुम स्वामी के हितों की सबसे प्रभावशाली ढंग से सेवा कर सकते हो। लोगों की देखभाल करनी पड़ती है, और लम्बे अनुभव का परिणाम मेरे उस दृढ़ विश्वास को पुष्ट करता है, जिसे मैंने बहुत समय से सँजोए रखा है, कि बैठक की शक्ति की तुलना में मंच की शक्ति नगण्य है। हमें परमेश्वर के वचन और प्रार्थना के द्वारा जेसुइटों के तौर-तरीकों का अनुकरण करना और उन्हें पवित्र करना चाहिए। वे मंच के द्वारा उतना सफल नहीं हुए जितना बैठक के द्वारा। बैठक में तुम फुसफुसा सकते हो—तुम लोगों से उनके सब छोटे-छोटे व्यक्तिगत निजी विचारों पर मिल सकते हो। मंच एक बहुत अप्रिय स्थान है; निस्सन्देह वह परमेश्वर की महान् सामर्थ्य है, इत्यादि, परन्तु असली गिनती बैठक की ही है, और यदि सेवक अच्छा प्रचारक हो तो उसकी सफलता की उतनी सम्भावना नहीं जितनी उस दशा में है जब वह एक पूर्ण सज्जन हो; और न ही सुसंस्कृत समाज में किसी मनुष्य की सफलता की कोई उचित आशा है यदि वह, चाहे वह और कुछ भी हो, सज्जन न हो। मैंने लॉर्ड शैफ़्ट्सबरी की ‘कैरेक्टरिस्टिक्स’ में दिए गए संत पौलुस के चरित्र-चित्रण की सदा प्रशंसा की है—कि वह एक उत्तम सज्जन था। और मैं तुमसे कहूँगा, सज्जन बनो। ऐसा नहीं कि मुझे यह कहने की आवश्यकता है, परन्तु मुझे निश्चय है कि केवल इसी रीति से हम अपने बढ़ते हुए धनी मध्यम वर्गों के मन-परिवर्तन की आशा कर सकते हैं। हमें यह दिखाना चाहिए कि हमारा धर्म सद्बुद्धि और सुरुचि का धर्म है; कि हम तीव्र उत्तेजनाओं और तीव्र उद्दीपकों को नापसन्द करते हैं; और ओह, मेरे प्रिय बेटे, यदि तुम उपयोगी होना चाहते हो, तो अपनी कोठरी में इसे बार-बार गम्भीर प्रार्थना का विषय बनाओ कि तुम शिष्ट-मर्यादित बने रहो। यदि मुझसे पूछा जाए कि तुम्हारा पहला कर्तव्य क्या है, तो शिष्ट-मर्यादित रहो; और तुम्हारा दूसरा, शिष्ट-मर्यादित रहो; और तुम्हारा तीसरा, शिष्ट-मर्यादित रहो।”
जिन्हें प्रचारकों का वह वर्ग याद है जो पचास वर्ष पहले फल-फूल रहा था, वे इस अंश के व्यंग्य की तीक्ष्णता को देखेंगे। अब यह बुराई बहुत कम हो गई है; वास्तव में, मुझे डर है कि कहीं हम दूसरी अति की ओर न बह रहे हों।
पूरी सम्भावना है कि समझदारी भरी बातचीत कभी-कभी विवाद की ओर बह जाएगी, और यहाँ बहुत से भले मनुष्य किसी छिपी चट्टान से टकरा जाते हैं। समझदार सेवक तर्क-वितर्क में विशेष रूप से कोमल रहेगा। उसे, सब मनुष्यों से बढ़कर, यह भूल नहीं करनी चाहिए कि क्रोध में कोई बल है, और गुस्से से बोलने में कोई सामर्थ्य है। कलकत्ता में भीड़ में खड़े एक अन्यजाति व्यक्ति ने, जो एक मिशनरी को एक ब्राह्मण से वाद-विवाद करते सुन रहा था, कहा कि यद्यपि वह भाषा नहीं समझता था, फिर भी वह जानता था कि कौन सही है—वह जानता था कि गलत वही है जिसने पहले अपना आपा खोया। अधिकांशतः, यह परखने का एक बहुत सटीक तरीका है। लोगों से बहस करने से बचने का यत्न कीजिए। अपनी राय बता दीजिए और उन्हें अपनी राय बताने दीजिए। यदि आप देखते हैं कि कोई छड़ी टेढ़ी है, और आप चाहते हैं कि लोग देखें कि वह कितनी टेढ़ी है, तो उसके पास एक सीधी छड़ रख दीजिए; वही काफ़ी होगा। परन्तु यदि आप विवाद में खिंच ही जाएँ, तो बहुत ठोस तर्क और बहुत कोमल शब्द काम में लाइए।
बहुधा आप किसी मनुष्य की बुद्धि को खींचतान करके उसे कायल नहीं कर सकते, परन्तु उसके स्नेह को जीतकर उसे मना सकते हैं। कुछ दिन पहले मुझे नए जूतों की एक जोड़ी की आवश्यकता का दुःख झेलना पड़ा, और यद्यपि मैंने उस कारीगर से कहा था कि उन्हें डोंगियों जितना बड़ा बनाए, फिर भी उन्हें पहनने के लिए मुझे भयंकर परिश्रम करना पड़ा। जूता खींचने के काँटों की एक जोड़ी से मैंने उन लोगों की तरह कड़ा परिश्रम किया जो योना के साथ जहाज़ पर थे, परन्तु सब व्यर्थ। ठीक तभी मेरे मित्र ने मुझे थोड़ा-सा फ्रेंच चॉक दिया, और काम पल भर में हो गया। वह फ्रेंच चॉक अद्भुत रूप से मनानेवाला था। सज्जनो, समाज में जाते समय सदा थोड़ा-सा फ्रेंच चॉक अपने साथ रखिए, मसीही मनाने की कला का एक साफ़-सुथरा पैकेट, और आपको शीघ्र ही उसके गुणों का पता चल जाएगा।
और अन्त में, अपनी सारी मिलनसारी के साथ, सेवक को अपने सिद्धान्तों पर दृढ़ रहना चाहिए, और हर प्रकार की संगति में उन्हें खुलकर मानने और उनका बचाव करने में निडर होना चाहिए। जब कोई उचित अवसर आए, या उसने कोई अवसर बना लिया हो, तो वह उसका उपयोग करने में ढीला न हो। अपने सिद्धान्तों में दृढ़, अपने स्वर में उत्साही, और हृदय में स्नेही होकर, वह मनुष्य के समान खुलकर बोले और इस विशेषाधिकार के लिए परमेश्वर का धन्यवाद करे। किसी संकोच की आवश्यकता नहीं—कोई संकोच होना ही नहीं चाहिए। प्रेतात्मवादियों की सबसे पागलपन भरी कल्पित कहानियाँ, काल्पनिक आदर्श-लोक के सुधारकों के सबसे अनोखे सपने, नगर की सबसे मूर्खतापूर्ण गपशप, और ओछे संसार की सबसे व्यर्थ बकवास सुने जाने की माँग करती हैं और सुनी भी जाती हैं। और क्या मसीह की बात न सुनी जाए? क्या उसका प्रेम का सन्देश इस डर से अनकहा रह जाए कि कहीं हम पर दखल देने का आरोप न लगे या हमें पाखण्डी बातें करनेवाला न कहा जाए? क्या धर्म को वर्जित कर दिया जाए—सब विषयों में सबसे उत्तम और सबसे महान् विषय निषिद्ध कर दिया जाए? यदि किसी समाज का यही नियम है, तो हम उसका पालन नहीं करेंगे। यदि हम उसे तोड़ न सकें, तो हम उस समाज को उसके हाल पर छोड़ देंगे, जैसे मनुष्य कोढ़ से ग्रस्त घर को छोड़ देते हैं। हम अपना मुँह बन्द किए जाने के लिए सहमत नहीं हो सकते। ऐसा कोई कारण नहीं कि हमारा मुँह बन्द किया जाए। हम किसी ऐसे स्थान पर नहीं जाएँगे जहाँ हम अपने स्वामी को अपने साथ न ले जा सकें। जब दूसरे लोग पाप करने की स्वतन्त्रता लेते हैं, तो हम उन्हें डाँटने और चेतावनी देने की अपनी स्वतन्त्रता नहीं छोड़ेंगे।
बुद्धिमानी से उपयोग की जाए तो हमारी साधारण बातचीत भलाई का एक प्रबल साधन हो सकती है। एक ही वाक्य से विचारों का ऐसा सिलसिला आरम्भ हो सकता है जो उन लोगों के मन-परिवर्तन तक पहुँचा दे जिन तक हमारे उपदेश कभी नहीं पहुँचे। लोगों को व्यक्तिगत रूप से पकड़कर बात करने, या सत्य को एक-एक व्यक्ति के सामने रखने की पद्धति बहुत सफल रही है: यह एक अलग विषय है, और मुश्किल से ही साधारण बातचीत के शीर्षक के अन्तर्गत आ सकता है; परन्तु हम यह कहकर समाप्त करेंगे कि आशा की जाती है कि न तो मंच पर और न ही अपनी साधारण बातचीत में हम कभी ऐसे भले-से लोग न समझे जाएँगे जिनका काम सब ओर बातों को सुखद बनाए रखना है, और जो किसी भी दशा में किसी को बेचैन नहीं करते, चाहे उनका जीवन कितना ही भक्तिहीन क्यों न हो। ऐसे लोग अपने सुननेवालों के परिवारों में आते-जाते रहते हैं, और उनके साथ आनन्द मनाते हैं, जबकि उन्हें उन पर विलाप करना चाहिए। वे उनकी मेज़ों पर बैठकर आराम से भोज उड़ाते हैं, जबकि उन्हें उन्हें आनेवाले क्रोध से भागने की चेतावनी देनी चाहिए। वे उस अमेरिकी अलार्म घड़ी के समान हैं जिसके विषय में मैंने सुना है, जिसकी यह गारन्टी दी जाती थी कि यदि आप न चाहें तो वह आपको नहीं जगाएगी।
हमारा काम यह हो कि हम केवल भली और उत्तम भूमि पर ही नहीं, वरन् चट्टान पर और राजमार्ग पर भी बोएँ, और उस अन्तिम महान् दिन में आनन्द की कटनी काटें। जो रोटी हम बेमौके समयों और अनोखे अवसरों पर जल के ऊपर डालते हैं, वह बहुत दिनों के बाद फिर मिल जाए।
