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सेवक के मूर्च्छा के दौरे
जैसे यह लिखा है कि दाऊद युद्ध की गर्मी में थक गया, वैसे ही प्रभु के सब सेवकों के विषय में लिखा जा सकता है। उदासी के दौरे हम में से अधिकांश पर आते हैं। हम साधारणतः कितने ही प्रसन्नचित्त क्यों न हों, बीच-बीच में हमें अवश्य ही गिराया जाता है। बलवान सदा फुर्तीले नहीं रहते, बुद्धिमान सदा तत्पर नहीं रहते, वीर सदा साहसी नहीं रहते, और आनन्दित लोग सदा सुखी नहीं रहते। यहाँ-वहाँ कुछ लोहे जैसे मनुष्य हो सकते हैं, जिन पर घिसाव और टूट-फूट का कोई प्रत्यक्ष दुष्प्रभाव नहीं होता, परन्तु निश्चय ही जंग उन्हें भी खा जाता है; और रहे साधारण मनुष्य, सो प्रभु जानता है, और उन्हें भी जता देता है, कि वे केवल मिट्टी ही हैं। अत्यन्त पीड़ादायक अनुभव से यह जानते हुए कि आत्मा की गहरी उदासी क्या होती है, और यह भी कि वह मुझ पर बार-बार, और कुछ कम अवसरों पर नहीं, आती रही है, मैंने सोचा कि यदि मैं इस विषय पर अपने विचार प्रकट करूँ तो इससे मेरे कुछ भाइयों को सान्त्वना मिल सकती है; ताकि जवान लोग, जब कुछ समय के लिए विषाद उन पर छा जाए, यह न समझ बैठें कि उनके साथ कोई अनोखी बात हुई है; और ताकि अधिक उदास लोग यह जान सकें कि जिस पर सूर्य बड़े आनन्द से चमका है, वह भी सदा उजियाले में नहीं चला।
प्रसिद्ध सेवकों की जीवनियों से उद्धरण देकर यह सिद्ध करना आवश्यक नहीं कि भयानक पस्ती के दौर उन में से सब के नहीं तो अधिकांश के भाग्य में अवश्य आए हैं। लूथर का जीवन ही इसके हज़ार उदाहरण देने को पर्याप्त हो सकता है, और वह किसी भी प्रकार निर्बल प्रकृति का व्यक्ति नहीं था। उसकी महान आत्मा प्रायः उल्लास के सातवें आसमान पर होती थी, और उतनी ही बार निराशा की सीमा पर। उसकी मृत्यु-शय्या भी आँधियों से मुक्त न थी, और वह एक बड़े थके हुए बालक की नाईं सिसकते-सिसकते अपनी अन्तिम नींद में सो गया।
उदाहरणों की संख्या बढ़ाने के बजाय, आइए हम उन कारणों पर विचार करें कि ये बातें क्यों होने दी जाती हैं; ऐसा क्यों है कि ज्योति की सन्तान कभी-कभी घोर अन्धकार में चलती है; क्यों भोर के अग्रदूत कभी-कभी अपने आप को दस गुनी रात में पाते हैं।
क्या पहला कारण यह नहीं कि वे केवल मनुष्य ही हैं? मनुष्य होने के नाते वे निर्बलता से घिरे हुए हैं, और दुःख के वारिस हैं। अनुग्रह हमें इसके बहुत से भाग से बचाता है, परन्तु क्योंकि हमारे पास और अधिक अनुग्रह नहीं, इसलिए हम उन बुराइयों से भी दुःख उठाते हैं जिनसे बचा जा सकता था। छुटकारे के विधान के अधीन भी यह बिलकुल स्पष्ट है कि हमें निर्बलताएँ सहनी हैं, नहीं तो उन में हमारी सहायता करने के लिए प्रतिज्ञा किए हुए आत्मा की कोई आवश्यकता न होती। आवश्यक है कि हम कभी-कभी उदास हों। भले मनुष्यों से इस संसार में क्लेश की प्रतिज्ञा की गई है, और सेवक दूसरों से बड़े भाग की आशा रख सकते हैं, ताकि वे प्रभु के दुःख उठानेवाले लोगों के साथ सहानुभूति करना सीखें, और इस प्रकार एक रोगी झुण्ड के योग्य चरवाहे बन सकें।
देहरहित आत्माएँ वचन का प्रचार करने के लिए भेजी जा सकती थीं, परन्तु वे उन लोगों की भावनाओं में सहभागी नहीं हो सकती थीं जो इस डेरे में रहते हुए बोझ से दबे कराहते रहते हैं। स्वर्गदूत सुसमाचार-प्रचारक ठहराए जा सकते थे, परन्तु उनके स्वर्गीय गुण उन्हें अज्ञानियों पर तरस खाने के अयोग्य बना देते। संगमरमर के मनुष्य गढ़े जा सकते थे, परन्तु उनके भावहीन स्वभाव हमारी दुर्बलता पर एक व्यंग्य, और हमारी आवश्यकताओं का उपहास ठहरते। सर्वज्ञानी परमेश्वर ने मनुष्यों को, और ऐसे मनुष्यों को जो मानवीय भावनाओं के अधीन हैं, अपने अनुग्रह के पात्र होने के लिए चुना है—इसी कारण ये आँसू हैं, इसी कारण ये उलझनें और गिराए जाने के अनुभव हैं।
इसके अतिरिक्त, हम में से अधिकांश किसी न किसी रूप में शारीरिक रूप से अस्वस्थ हैं। यहाँ-वहाँ हमें कोई ऐसा बूढ़ा मनुष्य मिल जाता है जिसे याद नहीं कि वह कभी एक दिन के लिए भी बिस्तर पर पड़ा हो; परन्तु हम में से अधिकतर लोग शरीर में या मन में किसी न किसी प्रकार की निर्बलता के बोझ तले परिश्रम करते हैं। कुछ शारीरिक रोग, विशेषकर वे जो पाचन-अंगों, यकृत और तिल्ली से सम्बन्धित हैं, निराशा के उपजाऊ सोते हैं; और मनुष्य उनके प्रभाव के विरुद्ध कितना ही संघर्ष क्यों न करे, ऐसी घड़ियाँ और परिस्थितियाँ आएँगी जिन में वे कुछ समय के लिए उस पर प्रबल हो जाएँगे।
मानसिक रोगों के विषय में, क्या कोई मनुष्य पूरी तरह स्वस्थ-चित्त है? क्या हम सब थोड़े-बहुत सन्तुलन से बाहर नहीं हैं? कुछ मनों में एक उदास रंगत दिखाई देती है जो उनके व्यक्तित्व का अभिन्न अंग है; उनके विषय में कहा जा सकता है, “विषाद ने उन्हें अपना ही ठहरा लिया;” फिर भी वे उत्तम मन हैं, और श्रेष्ठतम सिद्धान्तों से संचालित होते हैं, परन्तु तौभी बादल की रुपहली किनार को भूल जाने, और केवल बादल को ही स्मरण रखने की ओर अत्यन्त झुके रहते हैं। ऐसे लोग उस पुराने कवि के साथ गा सकते हैं:
“हमारे हृदय टूट गए हैं, हमारी वीणाओं के तार उतर गए हैं, हमारा एकमात्र संगीत आहें और कराहें हैं, हमारे गीत lachrymae की धुन पर हैं, हम घिस-घिसकर केवल हड्डी और चमड़ी रह गए हैं।” थॉमस वॉशबर्न।
ये निर्बलताएँ किसी मनुष्य के विशेष उपयोगिता के जीवन-मार्ग के लिए कोई हानि नहीं भी हो सकतीं; सम्भव है कि ईश्वरीय बुद्धि ने उन्हें उस पर उसकी विशेष प्रकार की सेवा के लिए आवश्यक योग्यताओं के रूप में ही रखा हो।
कुछ पौधे अपने औषधीय गुणों के लिए उस दलदल के ऋणी हैं जिसमें वे उगते हैं; और कुछ उस छाया के जिसमें ही वे फलते-फूलते हैं। कुछ बहुमूल्य फल ऐसे हैं जो सूर्य के द्वारा ही नहीं, चन्द्रमा के द्वारा भी उपजते हैं। नावों को पाल के साथ-साथ स्थिर रखने के लिए भार (बलास्ट) की भी आवश्यकता होती है; जब सड़क ढलान की ओर जाती है तो गाड़ी के पहिये पर लगा रोक-भार कोई बाधा नहीं होता। सम्भवतः कुछ दशाओं में पीड़ा ने प्रतिभा को विकसित किया है—उस आत्मा को ढूँढ़ निकाला है जो अन्यथा अपनी माँद में सिंह के समान सोई पड़ी रहती। यदि टूटा हुआ पंख न होता तो कुछ लोग बादलों में खो गए होते, यहाँ तक कि उन चुने हुए कबूतरों में से भी कुछ, जो अब अपनी चोंच में जैतून की डाली लिए जहाज़ का मार्ग दिखाते हैं।
परन्तु जहाँ शरीर और मन में मन की पस्ती की ओर प्रवृत्त करनेवाले कारण मौजूद हों, वहाँ यदि अन्धकार के क्षणों में हृदय उनके आगे हार जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं; बहुत सी दशाओं में आश्चर्य तो यह है—और यदि भीतरी जीवन लिखे जा सकते तो लोग इसे ऐसा ही देखते—कि कुछ सेवक अपने काम में लगे ही कैसे रहते हैं, और फिर भी अपने चेहरों पर मुस्कान बनाए रखते हैं। अनुग्रह की विजयें अब भी होती हैं, और धीरज के भी अपने शहीद हैं; ऐसे शहीद जो इस कारण कम आदर के योग्य नहीं कि ज्वालाएँ उनके शरीरों के बजाय उनकी आत्माओं के चारों ओर सुलगती हैं, और उनका जलना मनुष्य की आँखों से छिपा रहता है।
यिर्मयाहों की सेवकाई भी यशायाहों की सेवकाई जितनी ही ग्रहणयोग्य है, और उदास-मुख योना भी प्रभु का सच्चा भविष्यद्वक्ता है, जैसा कि नीनवे ने भली-भाँति अनुभव किया। लंगड़ों को तुच्छ न जानिए, क्योंकि लिखा है कि वे लूट ले लेंगे; वरन् उनका आदर कीजिए जो थके-माँदे होने पर भी पीछा करते जाते हैं। धुँधली आँखोंवाली लिआ: सुन्दर राहेल से अधिक फलवन्त थी, और हन्ना के दुःख पनिन्ना की डींगों से अधिक ईश्वरीय थे। उस दुःखी पुरुष ने कहा, “धन्य हैं वे, जो शोक करते हैं,” और जब उनके आँसुओं में अनुग्रह का नमक मिला हो, तो कोई उन्हें और कुछ न समझे। सुसमाचार का धन हमारे पास मिट्टी के बरतनों में रखा है, और यदि यहाँ-वहाँ बरतन में कोई दरार हो, तो कोई आश्चर्य न करे।
हमारा काम, जब सच्चे मन से उठाया जाता है, हमें उदासी की दिशा से होनेवाले आक्रमणों के लिए खुला छोड़ देता है। कौन है जो आत्माओं का बोझ उठाए और कभी-कभी धूल तक न धँस जाए? मनुष्यों के मन-परिवर्तन के लिए तीव्र लालसाएँ, यदि पूरी तरह तृप्त न हों (और वे कब होती हैं?), तो आत्मा को चिन्ता और निराशा से खा जाती हैं। आशाजनक लोगों को मार्ग से हटते, भक्तों को ठण्डे पड़ते, अंगीकार करनेवालों को अपने विशेषाधिकारों का दुरुपयोग करते, और पापियों को पाप में और अधिक ढीठ होते देखना—क्या ये दृश्य हमें धरती पर कुचल देने के लिए पर्याप्त नहीं? राज्य वैसे नहीं आता जैसे हम चाहते हैं, वह आदरणीय नाम वैसे पवित्र नहीं माना जाता जैसे हम चाहते हैं, और इसके लिए हमें अवश्य रोना पड़ता है। जब मनुष्य हमारे समाचार का विश्वास नहीं करते, और ईश्वरीय भुजबल प्रगट नहीं होता, तब हम शोकित हुए बिना कैसे रह सकते हैं?
सब मानसिक काम थकाने और मन को गिराने की प्रवृत्ति रखता है, क्योंकि बहुत पढ़ना देह को थका देता है; परन्तु हमारा काम मानसिक काम से बढ़कर है—यह हृदय का काम है, हमारी अन्तरतम आत्मा का परिश्रम है। प्रभु के दिन की सन्ध्याओं को हम कितनी बार ऐसा अनुभव करते हैं मानो जीवन हम में से पूरी तरह धुलकर निकल गया हो! अपनी मण्डलियों पर अपने प्राण उण्डेल देने के बाद हम अपने आप को मिट्टी के ऐसे खाली घड़ों के समान अनुभव करते हैं जिन्हें एक बालक भी तोड़ सकता है। सम्भवतः यदि हम पौलुस के समान अधिक होते, और आत्माओं के लिए और भी ऊँचे स्तर पर जागते रहते, तो हम और अधिक जानते कि प्रभु के घर की धुन से खाए जाना क्या होता है। यीशु के लिए अपने जीवन को खपा देना हमारा कर्तव्य और हमारा सौभाग्य है। हमें अच्छी तरह सुरक्षित रखे गए मनुष्यों के जीवित नमूने नहीं बनना है, परन्तु जीवित बलिदान बनना है, जिनका भाग ही भस्म हो जाना है; हमें खर्च करना और खर्च हो जाना है, न कि अपने आप को लैवेंडर में सहेजकर रख देना और अपनी देह का लाड़-प्यार करना। एक विश्वासयोग्य सेवक जैसी आत्मिक प्रसव-पीड़ा समय-समय पर थकावट के ऐसे दौर ले आएगी, जब हृदय और देह दोनों हार जाएँगे। मध्यस्थता करते-करते मूसा के हाथ भारी हो गए, और पौलुस पुकार उठा, “इन बातों के योग्य कौन है?” यहाँ तक कि यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले के विषय में भी समझा जाता है कि उस पर मूर्च्छा के दौरे आए थे, और प्रेरित भी एक बार चकित हुए, और बहुत डर गए थे।
कलीसिया में हमारा पद भी इसमें सहायक होता है। अपने काम के लिए पूरी तरह सुसज्जित सेवक साधारणतः एक अलग ही आत्मा होगा, दूसरों से ऊपर, उनसे परे, और उनसे अलग। उसके लोगों में से सबसे प्रेमी भी उसके विशेष विचारों, चिन्ताओं और परीक्षाओं में सहभागी नहीं हो सकते। पंक्तियों में मनुष्य बहुत से साथियों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर चलते हैं, परन्तु जैसे-जैसे अफ़सर पद में ऊपर उठता है, उसके स्तर के लोग संख्या में घटते जाते हैं। सिपाही बहुत होते हैं, कप्तान थोड़े, कर्नल और भी थोड़े, परन्तु प्रधान सेनापति केवल एक।
इसी प्रकार हमारी कलीसियाओं में, जिस मनुष्य को प्रभु अगुवे के रूप में उठाता है, वह जितना श्रेष्ठ मनुष्य होता है, उतना ही एकाकी मनुष्य हो जाता है। पर्वत-शिखर गम्भीरता से अलग खड़े रहते हैं, और केवल परमेश्वर से बातें करते हैं जब वह उनके गम्भीर एकान्त में उनसे भेंट करता है। परमेश्वर के वे जन जो स्वर्गीय बातों के साथ निकटतर संगति में अपने साथियों से ऊपर उठ जाते हैं, अपने निर्बल क्षणों में मानवीय सहानुभूति की कमी अनुभव करते हैं। गतसमनी में अपने प्रभु के समान, वे अपने चारों ओर सोए हुए चेलों से व्यर्थ ही सान्त्वना की बाट जोहते हैं; वे अपने भाइयों की छोटी सी मण्डली की उदासीनता पर स्तब्ध रह जाते हैं, और अपनी गुप्त वेदना में और भी भारी बोझ से दबे हुए लौटते हैं, क्योंकि उन्होंने अपने प्रियतम साथियों को ऊँघते हुए पाया है।
सर्वशक्तिमान प्रभु के लिए उत्साह में अपने साथियों से आगे निकल गई आत्मा के एकान्त को कोई नहीं जानता, केवल वही जानता है जिसने उसे सहा है। वह अपने आप को प्रगट करने का साहस नहीं करती, कहीं लोग उसे पागल न समझें; वह अपने आप को छिपा भी नहीं सकती, क्योंकि उसकी हड्डियों में आग धधकती है: केवल प्रभु के सामने ही उसे विश्राम मिलता है। हमारे प्रभु का अपने चेलों को दो-दो करके भेजना इस बात को प्रगट करता है कि वह जानता था कि मनुष्य में क्या है; परन्तु पौलुस जैसे मनुष्य के लिए, मुझे ऐसा लगता है कि कोई योग्य सहायक नहीं मिला; बरनबास, या सीलास, या लूका, ऐसी पहाड़ियाँ थीं जो अन्यजातियों के प्रेरित जैसे हिमालयी शिखर के साथ ऊँची बातचीत करने के लिए बहुत नीची थीं। यह अकेलापन, जिसे, यदि मैं भूल नहीं करता, मेरे बहुत से भाई अनुभव करते हैं, उदासी का एक उपजाऊ स्रोत है; और हमारे सेवकों की भाईचारे की सभाएँ, और समान मनवालों के साथ पवित्र संगति का पोषण, परमेश्वर की आशीष से, इस फन्दे से बचने में हमारी बड़ी सहायता करेंगे।
इसमें बहुत कम सन्देह हो सकता है कि बैठे रहने की आदतें कुछ शारीरिक बनावटों में निराशा उत्पन्न करने की प्रवृत्ति रखती हैं। बर्टन ने अपनी पुस्तक “एनाटॉमी ऑफ़ मेलनकली” (विषाद की शरीर-रचना) में उदासी के इस कारण पर एक अध्याय लिखा है; और उन असंख्य लेखकों में से एक का उद्धरण देते हुए, जिनसे वह सामग्री लेता है, वह कहता है, “विद्यार्थी अपने शरीरों की उपेक्षा करते हैं। दूसरे लोग अपने औज़ारों का ध्यान रखते हैं; चित्रकार अपनी कूचियाँ धोएगा; लोहार अपने हथौड़े, निहाई और भट्ठी का ध्यान रखेगा; माली अपने हल के लोहे सुधारेगा, और यदि उसकी कुल्हाड़ी भोथरी हो तो उस पर सान चढ़ाएगा; बाज़ पालनेवाला या शिकारी अपने बाज़ों, शिकारी कुत्तों, घोड़ों, कुत्तों आदि की विशेष देखभाल करेगा; संगीतकार अपनी वीणा के तार चढ़ाएगा और उतारेगा; केवल विद्वान ही उस यन्त्र की उपेक्षा करते हैं (मेरा अभिप्राय उनके मस्तिष्क और आत्माओं से है) जिसका वे प्रतिदिन उपयोग करते हैं। ल्यूकन ठीक कहता है, ‘ध्यान रखो कि रस्सी को इतना कसकर न ऐंठो कि वह टूट जाए।’”
बहुत देर तक एक ही मुद्रा में बैठे रहना, किसी पुस्तक में डूबे रहना, या कलम चलाते रहना, अपने आप में प्रकृति पर भारी पड़ता है; परन्तु इसमें जोड़ दीजिए एक ऐसा कमरा जिसमें हवा का आना-जाना ठीक न हो, एक ऐसी देह जिसने बहुत समय से मांसपेशियों का व्यायाम नहीं किया, और अनेक चिन्ताओं से दबा हुआ एक हृदय, तो हमारे पास निराशा का खौलता हुआ कड़ाह तैयार करने की सारी सामग्री हो जाती है, विशेषकर कोहरे के धुँधले महीनों में,
“जब एक कम्बल दिन को लपेट लेता है, जब सड़ता हुआ वन टपकता है, और पत्ता कीचड़ में रौंद दिया जाता है।”
कोई मनुष्य स्वभाव से चाहे पक्षी जैसा प्रफुल्ल क्यों न हो, वह वर्ष-प्रति-वर्ष ऐसी आत्मघाती प्रक्रिया के विरुद्ध कठिनाई से ही टिक पाएगा; वह अपने अध्ययन-कक्ष को एक कारागार और अपनी पुस्तकों को बन्दीगृह के पहरेदार बना लेगा, जबकि प्रकृति उसकी खिड़की के बाहर पड़ी उसे स्वास्थ्य की ओर बुलाती और आनन्द की ओर इशारा करती रहती है। जो मनुष्य झाड़ियों (हीदर) के बीच मधुमक्खियों की गुनगुनाहट, वन में जंगली कबूतरों की गुटरगूँ, जंगलों में पक्षियों का गीत, सरकण्डों के बीच नालों की कलकल, और चीड़ के पेड़ों के बीच हवा की सरसराहट को भूल जाता है, उसे आश्चर्य नहीं करना चाहिए यदि उसका हृदय गाना भूल जाए और उसकी आत्मा भारी हो जाए। पहाड़ियों पर एक दिन ताज़ी हवा में साँस लेना, या वनों की घनी छाया की शान्ति में कुछ घण्टे घूमना, हमारे परिश्रमी सेवकों में से बीसियों के मस्तिष्क से मकड़ी के जाले झाड़ देगा, जो अब केवल आधे जीवित हैं। समुद्री हवा का एक घूँट, या हवा के सामने तेज़ी से चलना आत्मा को अनुग्रह तो नहीं देगा, परन्तु देह को ऑक्सीजन अवश्य देगा, जो उसके बाद सबसे अच्छी बात है।
“भारी वायु में हृदय सबसे भारी होता है,
उठनेवाली हर हवा निराशा को उड़ा ले जाती है।”
फ़र्न और खरगोश, नदियाँ और ट्राउट मछलियाँ, देवदार के वृक्ष और गिलहरियाँ, प्रिमरोज़ और बनफ़शा के फूल, खेत-खलिहान का आँगन, नई कटी हुई घास, और सुगन्धित हॉप की बेलें—ये वहम के रोगियों के लिए सबसे अच्छी औषधि हैं, क्षीण होते लोगों के लिए सबसे निश्चित बलवर्धक हैं, और थके हुओं के लिए सबसे उत्तम ताज़गी हैं। अवसर या रुचि के अभाव में इन महान उपचारों की उपेक्षा की जाती है, और विद्यार्थी स्वयं अपनी बलि चढ़ानेवाला पीड़ित बन जाता है।
उदासी के दौरों के लिए सबसे अनुकूल समय, जहाँ तक मैंने अनुभव किया है, एक छोटी सी सूची में समेटे जा सकते हैं। उन में सबसे पहले मुझे बड़ी सफलता की घड़ी का उल्लेख करना होगा। जब अन्त में कोई बहुत समय से संजोई हुई अभिलाषा पूरी होती है, जब हमारे द्वारा परमेश्वर की बड़ी महिमा हुई है, और कोई बड़ी विजय प्राप्त हुई है, तब हम मूर्च्छित होने की ओर प्रवृत्त होते हैं।
कोई सोच सकता है कि विशेष कृपाओं के बीच हमारी आत्मा परमानन्द की ऊँचाइयों तक उड़ान भरेगी, और ऐसे आनन्द से आनन्दित होगी जो वर्णन से बाहर है, परन्तु साधारणतः इसका उलटा होता है। प्रभु अपने योद्धाओं को विजय पर उल्लसित होने के संकटों में कदाचित ही डालता है; वह जानता है कि उन में से थोड़े ही ऐसी परीक्षा को सह सकते हैं, और इसलिए वह उनके कटोरे में कड़वाहट मिला देता है। स्वर्ग से आग गिरने के बाद, बाल के याजकों के घात किए जाने और बंजर भूमि पर वर्षा की बाढ़ आने के बाद एलिय्याह को देखिए! उसके लिए आत्म-सन्तुष्टि के संगीत के कोई स्वर नहीं, विजय के वस्त्र पहने किसी विजेता की नाईं अकड़कर चलना नहीं; वह ईज़ेबेल के सामने से भागता है, और अपनी तीव्र उत्तेजना की प्रतिक्रिया अनुभव करते हुए प्रार्थना करता है कि वह मर जाए। वह, जिसे कभी मृत्यु नहीं देखनी थी, कब्र के विश्राम के लिए तरसता है, ठीक वैसे ही जैसे संसार का सम्राट कैसर अपनी पीड़ा के क्षणों में एक बीमार लड़की के समान रोया था।
बेचारा मानव स्वभाव उन तनावों को नहीं सह सकता जो स्वर्गीय विजयें उस पर लाती हैं; प्रतिक्रिया का आना अवश्य है। आनन्द या उत्तेजना की अधिकता का मूल्य बाद में आनेवाली उदासियों से चुकाना पड़ता है। जब तक परीक्षा चलती रहती है, तब तक बल संकट के बराबर बना रहता है; परन्तु जब वह समाप्त हो जाती है, तो स्वाभाविक निर्बलता अपने आप को प्रगट करने का अधिकार जताती है। गुप्त रूप से सम्भाला जाकर याकूब सारी रात मल्लयुद्ध कर सकता है, परन्तु जब संघर्ष समाप्त हो जाए, तो भोर को उसे लँगड़ाकर चलना ही होगा, कहीं ऐसा न हो कि वह अपने आप पर बहुत अधिक घमण्ड करे। पौलुस तीसरे स्वर्ग तक उठा लिया जा सकता है, और ऐसी बातें सुन सकता है जो कहने की नहीं, परन्तु शरीर में एक काँटा, अर्थात् उसे घूँसे मारने के लिए शैतान का एक दूत, उसका अनिवार्य परिणाम होना ही है। मनुष्य बिना मिलावट का सुख नहीं सह सकते; भले मनुष्य भी अभी इस योग्य नहीं कि “उनके माथे जयपत्र और मेंहदी (मर्टल) से बँधे हों,” जब तक वे अपने उचित स्थान पर बने रहने के लिए गुप्त दीनता न सहें। किसी जागृति के द्वारा अपने पाँवों से उखाड़कर घुमा दिए जाने पर, लोकप्रियता के द्वारा ऊँचे उठा लिए जाने पर, आत्माओं को जीतने में सफलता के द्वारा बड़ाई पाने पर—हम उस भूसी के समान होते जिसे पवन उड़ा ले जाता है, यदि दया का अनुग्रहपूर्ण अनुशासन हमारी व्यर्थ बड़ाई के जहाज़ों को तेज़ पुरवाई से तोड़ न डालता, और हमें टूटे जहाज़ के यात्रियों के समान, नंगे और निराश्रय, युगों की चट्टान पर न फेंक देता!
किसी बड़ी उपलब्धि से पहले भी उसी उदासी का कुछ अंश होना बहुत साधारण बात है। अपने सामने की कठिनाइयों का सर्वेक्षण करते हुए हमारे हृदय हमारे भीतर बैठ जाते हैं। अनाक के वंशज हमारे सामने डग भरते हुए चलते हैं, और उनके सामने हम अपनी ही दृष्टि में टिड्डों के समान होते हैं। कनान के नगरों की शहरपनाहें आकाश तक ऊँची हैं, और हम कौन हैं कि उन्हें जीतने की आशा करें? हम अपने हथियार फेंककर भाग खड़े होने को तैयार हो जाते हैं। नीनवे एक बड़ा नगर है, और उसकी कोलाहलपूर्ण भीड़ का सामना करने से तो हम तर्शीश को भाग जाना अधिक पसन्द करेंगे। हम पहले से ही किसी ऐसे जहाज़ की खोज में हैं जो हमें उस भयानक दृश्य से चुपचाप दूर ले जाए, और केवल आँधी का भय ही हमारे कायर कदमों को रोकता है।
ऐसा ही मेरा अनुभव था जब मैं पहले-पहल लंदन में पास्टर बना। मेरी सफलता ने मुझे भयभीत कर दिया; और उस जीवन-मार्ग का विचार जो उससे खुलता हुआ प्रतीत होता था, मुझे उल्लसित करने के बजाय, मुझे सबसे निचली गहराई में डाल गया, जिसमें से मैंने अपना miserere उच्चारित किया और gloria in excelsis के लिए कोई स्थान न पाया। मैं कौन था कि इतनी बड़ी भीड़ की अगुवाई करता रहूँ? मैं अपने गाँव की गुमनामी में लौट जाऊँ, या अमेरिका चला जाऊँ, और घने जंगलों में कोई एकान्त घोंसला ढूँढ़ लूँ, जहाँ मैं उन बातों के योग्य हो सकूँ जो मुझसे माँगी जाएँगी। ठीक उसी समय मेरे जीवन-कार्य पर से परदा उठ रहा था, और मैं डरता था कि वह क्या प्रगट करेगा। मैं आशा करता हूँ कि मैं अविश्वासी न था, परन्तु मैं डरपोक था और अपनी अयोग्यता के बोध से भरा हुआ था। मैं उस काम से डरता था जो एक अनुग्रहपूर्ण विधाता ने मेरे लिए तैयार किया था। मैं अपने आप को निरा बालक अनुभव करता था, और उस आवाज़ को सुनकर काँप उठता था जिसने कहा, “उठ, और पहाड़ों को दाँय, और उन्हें भूसे के समान कर दे!”
यह उदासी मुझ पर तब-तब आती है जब-जब प्रभु मेरी सेवकाई के लिए कोई बड़ी आशीष तैयार कर रहा होता है; बादल फटने से पहले काला होता है, और अपनी दया की बाढ़ बरसाने से पहले छा जाता है। उदासी अब मेरे लिए खुरदरे वस्त्र पहने एक भविष्यद्वक्ता के समान, एक यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले के समान हो गई है, जो मेरे प्रभु की और भी समृद्ध आशीष के निकट आने की घोषणा करती है। मुझसे कहीं अधिक उत्तम मनुष्यों ने भी इसे ऐसा ही पाया है। बरतन को माँजने ने ही उसे स्वामी के काम के योग्य बनाया है। पवित्र आत्मा के बपतिस्मे से पहले दुःख में डुबोया जाना आया है। उपवास भोज के लिए भूख जगाता है। प्रभु जंगल की परली ओर प्रगट होता है, जब उसका दास भेड़ें चराता है और एकान्त श्रद्धा-भय में बाट जोहता है। जंगल कनान का मार्ग है। नीची तराई ऊँचे पर्वत तक ले जाती है। पराजय विजय के लिए तैयार करती है। कबूतरी से पहले कौआ भेजा जाता है। रात का सबसे अँधेरा पहर भोर से पहले आता है। नाविक गहराइयों में उतरते हैं, परन्तु अगली लहर उन्हें आकाश तक चढ़ा देती है; क्लेश के मारे उनके जी में जी नहीं रहता, उससे पहले कि वह उन्हें उनके मनचाहे बन्दरगाह में पहुँचा दे।
लगातार अटूट परिश्रम के लम्बे दौर के बीच भी इसी क्लेश की आशा की जा सकती है। धनुष को सदा चढ़ाए नहीं रखा जा सकता, नहीं तो उसके टूटने का भय है। मन के लिए विश्राम उतना ही आवश्यक है जितनी देह के लिए नींद। हमारे विश्रामदिन हमारे परिश्रम के दिन हैं, और यदि हम किसी दूसरे दिन विश्राम न करें तो हम टूट जाएँगे। पृथ्वी को भी परती पड़ी रहना और अपने विश्रामकाल मनाना पड़ता है, और हमें भी। इसी से हमारे प्रभु की बुद्धि और करुणा प्रगट होती है, जब उसने अपने चेलों से कहा, “आओ, हम जंगल में चलकर थोड़ा विश्राम करें।” क्या! जब लोग मूर्च्छित हो रहे हैं? जब भीड़ पहाड़ों पर बिना चरवाहे की भेड़ों के समान है? क्या यीशु विश्राम की बात करता है? जब शास्त्री और फरीसी फाड़नेवाले भेड़ियों के समान झुण्ड को चीर-फाड़ रहे हैं, तब क्या वह अपने अनुयायियों को किसी शान्त विश्राम-स्थल की सैर पर ले जाता है? क्या कोई अति-उत्साही कट्टर जन वर्तमान और दबाव डालती माँगों की ऐसी घोर भूल की निन्दा करता है? वह अपनी मूर्खता में बड़बड़ाता रहे। स्वामी इससे कहीं अच्छी तरह जानता है कि अपने सेवकों को थकाकर चूर कर देना और इस्राएल के दीपक को बुझा देना उचित नहीं।
विश्राम का समय व्यर्थ समय नहीं है। नया बल बटोरना बचत ही है। गर्मियों के दिन में उस घास काटनेवाले को देखिए, जिसे सूर्य अस्त होने से पहले इतना कुछ काटना है। वह अपने परिश्रम में रुकता है—क्या वह आलसी है? वह अपना पत्थर ढूँढ़ता है, और उसे अपने हँसिये (दराँती) पर ऊपर-नीचे घिसने लगता है, “रिंक-अ-टिंक—रिंक-अ-टिंक—रिंक-अ-टिंक” की ध्वनि के साथ। क्या वह व्यर्थ संगीत है—क्या वह बहुमूल्य क्षण गँवा रहा है? जितनी देर वह अपने हँसिये पर ये स्वर बजाता रहा, उतनी देर में वह कितना कुछ काट सकता था! परन्तु वह अपने औज़ार की धार तेज़ कर रहा है, और जब वह फिर से अपना बल उन लम्बे वारों में लगाएगा जो घास को उसके सामने पंक्तियों में बिछा देते हैं, तो वह कहीं अधिक काम करेगा।
ठीक इसी प्रकार थोड़ा सा ठहराव मन को भले काम में और बड़ी सेवा के लिए तैयार करता है। मछुओं को अपने जाल सुधारने पड़ते हैं, और हमें भी समय-समय पर अपनी मानसिक क्षति की मरम्मत करनी और भावी सेवा के लिए अपनी मशीनरी को व्यवस्थित करना पड़ता है। किसी ऐसे गुलाम-खेवैया की नाईं, जो कोई छुट्टी नहीं जानता, दिन-प्रतिदिन चप्पू खींचते रहना नश्वर मनुष्यों को शोभा नहीं देता। पनचक्की की धाराएँ सदा-सर्वदा बहती चली जाती हैं, परन्तु हमें अपने ठहराव और अपने अन्तराल चाहिए। जब दौड़ बिना रुके जारी रहे तो कौन हाँफे बिना रह सकता है? बोझ ढोनेवाले पशुओं को भी कभी-कभी चरने के लिए खुला छोड़ देना पड़ता है; स्वयं समुद्र भी भाटे और ज्वार पर ठहरता है; पृथ्वी शीत ऋतु के महीनों का विश्रामकाल मानती है; और मनुष्य, चाहे वह परमेश्वर का राजदूत बनाकर ऊँचा ही क्यों न किया गया हो, उसे विश्राम करना ही होगा नहीं तो वह मूर्च्छित हो जाएगा; उसे अपना दीया ठीक करना ही होगा नहीं तो वह मन्द जलेगा; उसे अपनी शक्ति फिर से जुटानी ही होगी नहीं तो वह समय से पहले बूढ़ा हो जाएगा।
कभी-कभी छुट्टी लेना बुद्धिमानी है। अन्ततः, कभी-कभी कम करके हम अधिक कर पाएँगे। बिना मनोरंजन के आगे, आगे, सदा आगे चलते रहना उन आत्माओं को शोभा दे सकता है जो इस “भारी मिट्टी” से मुक्त हो चुकी हैं, परन्तु जब तक हम इस डेरे में हैं, हमें समय-समय पर “ठहरो!” पुकारना होगा, और पवित्र निष्क्रियता और समर्पित अवकाश के द्वारा प्रभु की सेवा करनी होगी। कोई भी कोमल विवेकवाला व्यक्ति कुछ समय के लिए जुए से बाहर आने के उचित होने पर सन्देह न करे, परन्तु दूसरों के अनुभव से समय पर विश्राम लेने की आवश्यकता और कर्तव्य को सीखे।
कभी-कभी एक ही कुचल देनेवाले आघात ने सेवक को बहुत नीचे गिरा दिया है। जिस भाई पर सबसे अधिक भरोसा किया गया था, वही विश्वासघाती बन जाता है। यहूदा उस मनुष्य पर लात उठाता है जिसने उस पर भरोसा किया था, और उस क्षण प्रचारक का हृदय उसका साथ छोड़ देता है। हम सब मानवीय भुजबल की ओर ताकने के लिए बहुत ही प्रवृत्त रहते हैं, और उसी झुकाव से हमारे बहुत से दुःख उत्पन्न होते हैं। उतना ही भारी आघात तब होता है जब कोई आदरणीय और प्रिय सदस्य परीक्षा के आगे झुक जाता है, और उस पवित्र नाम का अपमान करता है जिससे वह कहलाता था। इससे तो कुछ भी अच्छा है। यह प्रचारक के मन में किसी विशाल जंगल में एक कुटिया की लालसा उत्पन्न करता है, जहाँ वह अपना सिर सदा के लिए छिपा ले, और भक्तिहीनों के निन्दापूर्ण ठट्ठे फिर कभी न सुने। दस वर्षों का परिश्रम हम में से उतना जीवन नहीं निकालता जितना हम विश्वासघाती अहीतोपेल या धर्मत्यागी देमास के कारण कुछ ही घण्टों में खो देते हैं।
कलह, और फूट, और निन्दा, और मूर्खतापूर्ण आलोचनाओं ने भी प्रायः पवित्र जनों को पछाड़कर गिरा दिया है, और उन्हें ऐसे चलने पर विवश किया है “मानो उनकी हड्डियों में कटार चुभी हो।” कठोर शब्द कुछ कोमल मनों को बहुत तीखा घाव देते हैं। बहुत से सर्वोत्तम सेवक अपने चरित्र की आत्मिकता के ही कारण अत्यन्त संवेदनशील होते हैं—इस जैसे संसार के लिए कुछ अधिक ही संवेदनशील। “जो लात किसी घोड़े को मुश्किल से हिला पाती, वह एक भले-चंगे धर्मज्ञ को मार डालती।” अनुभव के द्वारा आत्मा उन कठोर चोटों के प्रति कठोर हो जाती है जो हमारे युद्ध में अनिवार्य हैं; परन्तु आरम्भ में ये बातें हमें पूरी तरह लड़खड़ा देती हैं, और हमें बड़े अन्धकार के भय में लिपटे हुए हमारे घरों को भेज देती हैं।
एक सच्चे सेवक की परीक्षाएँ थोड़ी नहीं होतीं, और वे परीक्षाएँ जो कृतघ्न अंगीकार करनेवालों के कारण आती हैं, खुले शत्रुओं के सबसे भद्दे आक्रमणों से भी अधिक कठिनाई से सही जाती हैं। जो मनुष्य मन की निश्चिन्तता चाहता है और जीवन की शान्ति खोजता है, वह सेवकाई में प्रवेश न करे; यदि वह ऐसा करेगा तो घृणा से भरकर उससे भाग खड़ा होगा।
थोड़े ही लोगों के भाग्य में ऐसे बड़े अन्धकार के भय से होकर गुज़रना लिखा होता है, जैसा सरी म्यूज़िक हॉल की उस दुःखद दुर्घटना के बाद मुझ पर पड़ा था। मैं दुःख के भारी बोझ से असीम और हद से बाहर दबाया गया। वह कोलाहल, वह भगदड़, वे मौतें, दिन-रात मेरे सामने रहती थीं, और उन्होंने जीवन को एक बोझ बना दिया। तब मैंने अपने शोक में गाया:
“मेरे विचारों का कोलाहल केवल मेरे दुःख को बढ़ाता है, मेरी आत्मा मुरझाती है, मेरा हृदय उजाड़ और दीन है।”
उस भयानक स्वप्न से मैं एक ही क्षण में जाग उठा, जब अनुग्रहपूर्वक यह वचन मेरी आत्मा पर लागू किया गया, “उसी को परमेश्वर पिता ने सर्वोच्च किया है।” यह तथ्य कि यीशु अब भी महान है, उसके सेवक चाहे कितना ही दुःख क्यों न उठाएँ, मुझे फिर से शान्त विवेक और शान्ति की ओर ले आया। यदि ऐसी भयानक विपत्ति मेरे किसी भाई पर आ पड़े, तो वे धीरज से आशा रखें और चुपचाप परमेश्वर के उद्धार की बाट जोहें।
जब संकट बढ़ते जाते हैं, और निरुत्साहित करनेवाली बातें अय्यूब के सन्देशवाहकों के समान एक के बाद एक लम्बी कतार में आती हैं, तब भी, बुरे समाचारों के कारण आत्मा की व्याकुलता के बीच, निराशा हृदय की सारी शान्ति लूट लेती है। निरन्तर टपकता पानी पत्थरों को घिस देता है, और सबसे वीर मन भी बार-बार आनेवाले क्लेशों की रगड़ अनुभव करते हैं। यदि खाली-सा भण्डार पत्नी की बीमारी या बच्चे की मृत्यु से और भी कठोर परीक्षा बन जाए, और यदि सुननेवालों की अनुदार टिप्पणियों के बाद डीकनों का विरोध और सदस्यों की ठण्डक आ जाए—तो याकूब के समान हम यह पुकार उठने को प्रवृत्त होते हैं, “ये सब विपत्तियाँ मेरे ऊपर आ पड़ी हैं!”
जब दाऊद सिकलग लौटा और उसने नगर को जला हुआ, सामान लुटा हुआ, पत्नियों को बन्दी बनाकर ले जाया गया, और अपने सैनिकों को उस पर पथराव करने के लिए तैयार पाया, तब हम पढ़ते हैं, “उसने अपने परमेश्वर में हियाव बाँधा”; और उसके लिए भला ही हुआ कि वह ऐसा कर सका, क्योंकि यदि उसे विश्वास न होता कि वह जीवितों की पृथ्वी पर प्रभु की भलाई को देखेगा, तो वह उस समय मूर्च्छित हो जाता।
इकट्ठे हुए संकट एक-दूसरे का भार बढ़ाते हैं; वे एक-दूसरे के हाथ मज़बूत करते हैं, और डाकुओं के दलों के समान निर्दयता से हमारे सुख-चैन को नष्ट कर देते हैं। लहर पर लहर सबसे बलवान तैराक के लिए भी कठिन काम है। जहाँ दो समुद्र मिलते हैं, वह स्थान सबसे अधिक समुद्र-योग्य जहाज़ के पेंदे पर भी ज़ोर डालता है। यदि विपत्ति के थपेड़ों के बीच एक नियमित विराम होता, तो आत्मा तैयार खड़ी रहती; परन्तु जब वे बड़े-बड़े ओलों की मार के समान अचानक और भारी होकर आते हैं, तो यात्री का विस्मित होना स्वाभाविक है। अन्तिम तोला ऊँट की कमर तोड़ देता है, और जब वह अन्तिम तोला हम पर लादा जाता है, तो क्या आश्चर्य यदि हम कुछ समय के लिए प्राण छोड़ देने को तैयार हो जाएँ!
यह विपत्ति हम पर बिना जाने कारण के भी आएगी, और तब उसे दूर भगाना और भी कठिन होता है। अकारण उदासी से तर्क नहीं किया जा सकता, न ही दाऊद की वीणा अपने मधुर स्वरों से उसे मोहकर दूर कर सकती है। इस आकारहीन, अवर्णनीय—फिर भी सब कुछ पर बादल की तरह छा जानेवाली निराशा से लड़ना कोहरे से लड़ने के समान है। इस दशा में मनुष्य अपने ऊपर तरस भी नहीं खाता, क्योंकि बिना किसी प्रत्यक्ष कारण के व्याकुल होना इतना अनुचित, यहाँ तक कि पापपूर्ण भी, प्रतीत होता है; तौभी वह मनुष्य व्याकुल है, और अपनी आत्मा की ठीक गहराइयों तक व्याकुल है। यदि वे लोग जो ऐसे विषाद पर हँसते हैं, केवल एक घण्टे के लिए भी उसका दुःख अनुभव करते, तो उनकी हँसी गम्भीर होकर करुणा में बदल जाती। दृढ़ संकल्प शायद उसे झटककर दूर कर सके, परन्तु जब सारे मनुष्य के तार ढीले पड़ गए हों तो हम वह संकल्प कहाँ से लाएँ? ऐसी दशाओं में वैद्य और धर्मज्ञ अपनी निपुणता मिला सकते हैं, और दोनों के हाथ भरे रहते हैं, और भरे से भी अधिक। लोहे का वह बेंड़ा, जो इतने रहस्यमय ढंग से आशा के द्वार को बन्द कर देता है और हमारी आत्माओं को उदास बन्दीगृह में रखता है, उसे पीछे हटाने के लिए एक स्वर्गीय हाथ की आवश्यकता है; और जब वह हाथ दिखाई देता है तो हम प्रेरित के साथ पुकार उठते हैं, “हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्वर, और पिता का धन्यवाद हो, जो दया का पिता, और सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर है। वह हमारे सब क्लेशों में शान्ति देता है; ताकि हम उस शान्ति के कारण जो परमेश्वर हमें देता है, उन्हें भी शान्ति दे सकें, जो किसी प्रकार के क्लेश में हों” 2 कुरिन्थियों 1:3, 4। सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर ही है जो:
“मधुर विस्मृति-कारक औषधि से हमारे बेचारे वक्षों को उस घातक पदार्थ से शुद्ध कर सकता है जो हृदय पर बोझ बनकर पड़ा रहता है।”
शमौन डूबने लगता है—जब तक यीशु उसका हाथ नहीं पकड़ लेता। भीतर का दुष्टात्मा उस बेचारे बालक को मरोड़ता और फाड़ता है—जब तक अधिकार का वचन उसे उसमें से निकल आने की आज्ञा नहीं देता। जब हम भयानक डरों से सताए जाते हैं, और एक असहनीय दुःस्वप्न के बोझ तले दबे होते हैं, तब हमें केवल इतनी आवश्यकता है कि धार्मिकता का सूर्य उदय हो, और हमारे अन्धकार से उत्पन्न बुराइयाँ भगा दी जाती हैं; परन्तु इससे कम कोई बात आत्मा के इस दुःस्वप्न को दूर नहीं कर सकती। विषाद पर एक ग्रन्थ के लेखक टिमोथी रॉजर्स, और कुछ अत्यन्त मधुर भजनों के रचयिता साइमन ब्राउन ने अपने-अपने अनुभव में यह प्रमाणित किया कि यदि प्रभु आत्मा से अपनी ज्योति हटा ले तो मनुष्य की सहायता कितनी निष्फल होती है।
यदि यह पूछा जाए कि राजा यीशु के सेवकों को इतनी बार मृत्यु की छाया की तराई से होकर क्यों गुज़रना पड़ता है, तो उत्तर ढूँढ़ना कठिन नहीं। यह सब प्रभु के कार्य करने की रीति को आगे बढ़ाता है, जो इन शब्दों में समेटी गई है: “न तो बल से, और न शक्ति से, परन्तु मेरे आत्मा के द्वारा होगा, यहोवा का यही वचन है।” साधनों का उपयोग किया जाएगा, परन्तु उनकी भीतरी निर्बलता स्पष्ट रूप से प्रगट की जाएगी; महिमा का कोई बँटवारा नहीं होगा, महान कार्यकर्ता को मिलनेवाले आदर में कोई कमी नहीं होगी। मनुष्य को स्वयं से खाली किया जाएगा, और तब पवित्र आत्मा से भरा जाएगा। अपनी ही समझ में वह आँधी से उड़ाए गए सूखे पत्ते के समान होगा, और फिर सत्य के शत्रुओं के विरुद्ध पीतल की शहरपनाह के समान दृढ़ किया जाएगा। कार्यकर्ता से घमण्ड को छिपाना, यही बड़ी कठिनाई है। निरन्तर सफलता और उसमें कभी न मुरझानेवाला आनन्द हमारे निर्बल सिरों के सहने से बाहर होता। हमारे दाखमधु में पानी मिलाना ही पड़ता है, कहीं ऐसा न हो कि वह हमारा सिर फिरा दे।
मेरी गवाही यह है कि जो लोग सबके सामने अपने प्रभु से आदर पाते हैं, उन्हें प्रायः गुप्त ताड़ना सहनी पड़ती है, या कोई विशेष क्रूस उठाना पड़ता है, कहीं ऐसा न हो कि वे किसी रीति से अपने आप को बड़ा ठहराएँ, और शैतान के फन्दे में फँस जाएँ। प्रभु यहेजकेल को कितनी निरन्तरता से “हे मनुष्य के सन्तान” कहकर पुकारता है! जब वह सर्वोच्च वैभवों में ऊँची उड़ानें भर रहा होता है, ठीक उसी समय जब निर्मल आँखों के साथ उसे उस उत्तम महिमा को निहारने का बल दिया जाता है, तब “मनुष्य के सन्तान” शब्द उसके कानों में पड़ता है, और उस हृदय को संयमित कर देता है जो अन्यथा उसे दिए गए आदर से मतवाला हो जाता। ऐसे ही दीन करनेवाले परन्तु हितकारी सन्देश हमारी उदासियाँ हमारे कानों में फुसफुसाती हैं; वे हमें ऐसी रीति से, जिसमें कोई भूल नहीं हो सकती, बताती हैं कि हम केवल मनुष्य हैं, दुर्बल, निर्बल, और मूर्च्छित होने को प्रवृत्त।
अपने सेवकों के सब गिराए जाने के द्वारा परमेश्वर की महिमा होती है, क्योंकि जब वह उन्हें उनके पाँवों पर खड़ा करता है तो वे उसकी बड़ाई करने को प्रेरित होते हैं, और धूल में पड़े रहते हुए भी उनका विश्वास उसकी स्तुति करता है। वे उसकी विश्वासयोग्यता के विषय में और भी मधुरता से बोलते हैं, और उसके प्रेम में और भी दृढ़ता से स्थिर किए जाते हैं। कुछ वृद्ध प्रचारक जैसे परिपक्व मनुष्य हैं, वैसे मनुष्य कदाचित ही उत्पन्न हो सकते थे, यदि वे एक बरतन से दूसरे बरतन में उण्डेले न गए होते, और उन्हें अपना खालीपन और अपने चारों ओर की सब वस्तुओं की व्यर्थता देखने के लिए विवश न किया गया होता। भट्ठी, हथौड़े और रेती के लिए परमेश्वर की महिमा हो। स्वर्ग आनन्द से और भी भरपूर होगा क्योंकि यहाँ नीचे हम वेदना से भरे गए हैं, और पृथ्वी और भी अच्छी तरह जोती जाएगी क्योंकि हमने विपत्ति की पाठशाला में प्रशिक्षण पाया है।
बुद्धि का पाठ यह है: आत्मा के संकट से घबराइए नहीं। इसे कोई अनोखी बात न समझिए, परन्तु साधारण सेवकीय अनुभव का एक अंग समझिए। यदि उदासी का बल साधारण से अधिक हो, तो यह न सोचिए कि आपकी उपयोगिता का सब कुछ समाप्त हो गया है। अपना हियाव न छोड़िए, क्योंकि उसका प्रतिफल बड़ा है। चाहे शत्रु का पाँव आपकी गर्दन पर ही क्यों न हो, उठने और उसे पछाड़ देने की आशा रखिए। वर्तमान का बोझ, अतीत के पाप और भविष्य के भय के साथ, प्रभु पर डाल दीजिए, जो अपने भक्तों को नहीं तजता। दिन-दिन करके जीइए—हाँ, घड़ी-घड़ी करके। मनोदशाओं और भावनाओं पर कोई भरोसा न रखिए। एक टन उत्तेजना से अधिक एक दाना भर विश्वास की चिन्ता कीजिए। केवल परमेश्वर पर भरोसा रखिए, और मानवीय सहायता के सरकण्डों पर टेक न लगाइए। जब मित्र आपका साथ छोड़ दें तो चकित न होइए—यह एक साथ छोड़नेवाला संसार है। मनुष्य में कभी अपरिवर्तनशीलता की आशा न रखिए—अस्थिरता पर आप बिना निराश होने के भय के भरोसा कर सकते हैं। यीशु के चेलों ने उसे छोड़ दिया; यदि आपके अनुयायी भटककर दूसरे शिक्षकों के पास चले जाएँ तो विस्मित न होइए: जैसे जब वे आपके साथ थे तब वे आपका सब कुछ नहीं थे, वैसे ही उनके चले जाने से आपका सब कुछ नहीं चला गया। जब तक मोमबत्ती जल रही है, अपनी पूरी शक्ति से परमेश्वर की सेवा कीजिए, और तब जब वह कुछ समय के लिए बुझ जाए, तो आपको पछताने के लिए कम ही रहेगा।
कुछ भी न होने में सन्तुष्ट रहिए, क्योंकि आप वही हैं। जब आपका अपना खालीपन पीड़ादायक रीति से आपकी चेतना पर थोपा जाए, तो अपने आप को डाँटिए कि आपने कभी प्रभु के सिवाय और किसी रीति से भरपूर होने का स्वप्न भी देखा। वर्तमान प्रतिफलों को अधिक महत्त्व न दीजिए; मार्ग में मिलनेवाली अग्रिम निशानियों के लिए कृतज्ञ रहिए, परन्तु प्रतिफल देनेवाले आनन्द की बाट आगे चलकर जोहिए। जब कोई दृश्य परिणाम आपके सामने न हो, तब भी दुगने उत्साह से अपने प्रभु की सेवा करते रहिए। कोई भी भोला-भाला मनुष्य उजियाले में सँकरे मार्ग पर चल सकता है: विश्वास की दुर्लभ बुद्धि हमें अन्धकार में भी अचूक सटीकता के साथ आगे बढ़ने में समर्थ करती है, क्योंकि वह अपना हाथ अपने महान मार्गदर्शक के हाथ में रख देती है।
यहाँ से स्वर्ग तक अभी और भी कठोर मौसम आ सकता है, परन्तु हमारे वाचा के सिर ने उस सब का प्रबन्ध कर रखा है। किसी भी बात में हम उस मार्ग से न हटें जिस पर चलने के लिए ईश्वरीय बुलाहट ने हमें प्रेरित किया है। चाहे अच्छा समय आए या बुरा, मंच (पल्पिट) हमारा पहरे का गुम्मट है, और सेवकाई हमारा युद्ध है; जब हम अपने परमेश्वर का मुख न देख सकें, तब हमारा काम यह हो कि हम उसके पंखों की छाया तले भरोसा रखें।
