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सेवक की आत्म-चौकसी
“अपनी और अपने उपदेश की चौकसी रख।” 1 तीमुथियुस 4:16
हर कारीगर जानता है कि अपने औज़ारों को अच्छी दशा में बनाए रखना कितना आवश्यक है, क्योंकि यदि कारीगर की कुल्हाड़ी की धार जाती रहे, तो वह जानता है कि उसकी शक्ति पर कहीं अधिक ज़ोर पड़ेगा, या उसका काम बुरी तरह होगा। ललित कलाओं के महान गुरु माइकल एंजेलो अपने औज़ारों के महत्व को इतनी अच्छी तरह समझते थे कि वे अपनी कूचियाँ सदा अपने ही हाथों से बनाते थे; और इसमें वे हमारे सामने अनुग्रह के परमेश्वर का एक दृष्टान्त प्रस्तुत करते हैं, जो सब सच्चे सेवकों को विशेष सावधानी से अपने लिए गढ़ता है।
यह सच है कि प्रभु अत्यन्त दोषपूर्ण साधनों से भी काम कर सकता है, जैसा वह तब करता है जब कभी-कभी बहुत ही मूर्खतापूर्ण प्रचार को भी मन-परिवर्तन में उपयोगी बना देता है; और वह बिना किसी माध्यम के भी काम कर सकता है, जैसा वह तब करता है जब वह किसी प्रचारक के बिना ही मनुष्यों का उद्धार करता है, और अपने पवित्र आत्मा के द्वारा वचन को सीधे उन पर लागू करता है। परन्तु हम परमेश्वर के पूर्णतः सार्वभौम कार्यों को अपने आचरण का नियम नहीं मान सकते। वह अपनी पूर्ण स्वतंत्रता में जो उसे सबसे अच्छा लगे, वह कर सकता है, परन्तु हमें उसी के अनुसार चलना है जो उसकी अधिक स्पष्ट व्यवस्थाएँ हमें सिखाती हैं; और जो बातें काफ़ी स्पष्ट हैं उनमें से एक यह है कि प्रभु साधारणतः साधनों को उद्देश्यों के अनुरूप ढालता है, जिससे सीधी शिक्षा यह मिलती है कि जब हम सबसे अच्छी आत्मिक दशा में होंगे, तभी हम सबसे अधिक पूरा कर पाने की सम्भावना रखेंगे; या दूसरे शब्दों में, जब हमारे वरदान और हमारे अनुग्रह के गुण अच्छी व्यवस्था में होंगे, तब हम प्रायः अपने प्रभु का काम सबसे अच्छा करेंगे, और जब वे सबसे अधिक बिगड़ी दशा में होंगे, तब सबसे बुरा करेंगे। यह हमारे मार्गदर्शन के लिए एक व्यावहारिक सत्य है। जब प्रभु अपवाद करता है, तो वे अपवाद इस नियम को ही सिद्ध करते हैं।
एक अर्थ में हम स्वयं ही अपने औज़ार हैं, और इसलिए हमें अपने आपको ठीक दशा में रखना चाहिए। यदि मैं सुसमाचार का प्रचार करना चाहता हूँ, तो मैं केवल अपनी ही आवाज़ का उपयोग कर सकता हूँ; इसलिए मुझे अपनी वाणी की शक्तियों को प्रशिक्षित करना चाहिए। मैं केवल अपने ही मस्तिष्क से सोच सकता हूँ, और अपने ही हृदय से अनुभव कर सकता हूँ, और इसलिए मुझे अपनी बौद्धिक और भावनात्मक शक्तियों को शिक्षित करना चाहिए। मैं प्राणों के लिए केवल अपने ही नए किए गए स्वभाव में रो सकता और तड़प सकता हूँ, इसलिए मुझे चौकसी के साथ उस कोमलता को बनाए रखना चाहिए जो मसीह यीशु में थी।
यदि मैं स्वयं अपनी उन्नति की उपेक्षा करूँ, तो अपने पुस्तकालय को पुस्तकों से भरना, या संस्थाएँ संगठित करना, या योजनाएँ बनाना मेरे लिए व्यर्थ होगा; क्योंकि पुस्तकें, और संस्थाएँ, और प्रणालियाँ मेरी पवित्र बुलाहट के केवल दूर के साधन हैं; मेरी अपनी आत्मा, प्राण और देह ही पवित्र सेवा के लिए मेरे सबसे निकट के यन्त्र हैं; मेरी आत्मिक शक्तियाँ और मेरा भीतरी जीवन ही मेरा युद्ध का फरसा और मेरे युद्ध के हथियार हैं।
मैकशेन ने अपने एक सेवक मित्र को, जो जर्मन भाषा में निपुण होने के उद्देश्य से यात्रा कर रहा था, लिखते हुए ठीक हमारे जैसे ही शब्दों का प्रयोग किया: “मैं जानता हूँ कि तुम जर्मन भाषा में कड़ा परिश्रम करोगे, परन्तु भीतरी मनुष्यत्व की—मेरा अर्थ है हृदय की—उन्नति को मत भूलना। घुड़सवार सेना का अफ़सर कितनी लगन से अपनी तलवार को साफ़ और तेज़ रखता है; हर दाग़ को वह बड़ी सावधानी से रगड़कर मिटा देता है। स्मरण रखो कि तुम परमेश्वर की तलवार हो, उसका औज़ार—उसका नाम उठाए फिरने के लिए उसका चुना हुआ पात्र। बहुत हद तक सफलता औज़ार की शुद्धता और सिद्धता के अनुसार ही होगी। परमेश्वर बड़ी प्रतिभाओं को उतनी आशीष नहीं देता जितनी यीशु की समानता को। एक पवित्र सेवक परमेश्वर के हाथ में एक भयानक हथियार है।”
सुसमाचार के दूत का स्वयं अपने व्यक्तित्व में आत्मिक रूप से बिगड़ी दशा में होना, उसके अपने लिए भी और उसके काम के लिए भी, अत्यन्त गम्भीर विपत्ति है; और फिर भी, मेरे भाइयो, ऐसी बुराई कितनी सहजता से उत्पन्न हो जाती है, और उससे बचने के लिए कितनी चौकसी रखनी पड़ती है!
एक दिन पर्थ से एडिनबरा तक तेज़ गाड़ी से यात्रा करते हुए, अचानक हम बिल्कुल रुक गए, क्योंकि इंजन का एक बहुत ही छोटा पेंच टूट गया था, और जब हम फिर चले तो हमें दो के बदले केवल एक पिस्टन-रॉड के सहारे रेंगते हुए चलना पड़ा। केवल एक छोटा सा पेंच ही गया था। यदि वह ठीक होता, तो गाड़ी अपनी लोहे की सड़क पर तेज़ी से दौड़ती चली जाती, परन्तु लोहे के उस नगण्य टुकड़े के न होने से सारा का सारा बिगड़ गया। कहा जाता है कि संयुक्त राज्य अमेरिका की एक रेलवे पर एक गाड़ी डिब्बों के पहियों के ग्रीस-बक्सों में पड़ी मक्खियों के कारण रुक गई थी।
यह उपमा बिल्कुल ठीक बैठती है; एक मनुष्य, जो और सब बातों में उपयोगी होने के योग्य है, किसी छोटे से दोष के कारण अत्यधिक रुकावट में पड़ सकता है, या पूरी तरह निकम्मा भी हो सकता है। ऐसा परिणाम और भी अधिक दुःखदायी है, क्योंकि यह सुसमाचार से जुड़ा हुआ है, जो सर्वोच्च अर्थ में सबसे महान परिणाम उत्पन्न करने के योग्य है। यह एक भयानक बात है जब चंगा करनेवाला मरहम उसे लगानेवाले अनाड़ी के कारण अपना प्रभाव खो देता है।
आप सब जानते हैं कि सीसे के नलों में से होकर बहने से पानी पर प्रायः कैसे हानिकारक प्रभाव पड़ते हैं; ठीक वैसे ही स्वयं सुसमाचार भी, जब वह आत्मिक रूप से अस्वस्थ मनुष्यों में से होकर बहता है, तो इतना बिगड़ सकता है कि वह उनके सुननेवालों के लिए हानिकारक हो जाए। यह डर है कि कैल्विनवादी सिद्धान्त तब अत्यन्त बुरी शिक्षा बन जाता है जब भक्तिहीन जीवन वाले मनुष्य उसे प्रस्तुत करते हैं, और उसे ऐसे दिखाते हैं मानो वह लम्पटता के लिए ओढ़ना हो; और दूसरी ओर आर्मिनियनवाद, दया के प्रस्ताव की अपनी विस्तृत पहुँच के साथ, मनुष्यों के प्राणों को अत्यन्त गम्भीर हानि पहुँचा सकता है, यदि प्रचारक का लापरवाह स्वर उसके सुननेवालों को यह विश्वास दिला दे कि वे जब चाहें तब पश्चाताप कर सकते हैं; और इसलिए सुसमाचार के सन्देश के साथ कोई तात्कालिकता जुड़ी हुई नहीं है।
इसके अतिरिक्त, जब कोई प्रचारक अनुग्रह में दरिद्र होता है, तो उसकी सेवकाई के परिणामस्वरूप जो भी स्थायी भलाई होती है, वह प्रायः दुर्बल होगी और जिसकी आशा की जा सकती थी, उसके अनुपात से बिल्कुल बाहर होगी। बहुत बोने के बाद थोड़ी ही कटनी होगी; तोड़ों पर मिलनेवाला ब्याज इतना कम होगा कि दिखाई भी न दे।
कहा जाता है कि हाल के अमेरिकी युद्ध में हारी गई दो-तीन लड़ाइयों का परिणाम उस घटिया बारूद के कारण था जो कुछ “नकली माल” देनेवाले ठेकेदारों ने सेना को दिया था, जिससे तोपों की गोलाबारी का उचित प्रभाव उत्पन्न नहीं हुआ। हमारे साथ भी ऐसा ही हो सकता है। हम अपने भीतर सच्ची जीवन-शक्ति न रखने के कारण, या उसे इतनी मात्रा में न रखने के कारण कि परमेश्वर अपने स्वभाव से संगत रहते हुए हमें आशीष दे सके, अपना निशाना चूक सकते हैं, अपना लक्ष्य और उद्देश्य खो सकते हैं, और अपना समय नष्ट कर सकते हैं। “नकली माल” जैसे प्रचारक बनने से सावधान रहिए!
1. हमारी पहली चिन्ता यह होनी चाहिए कि हम स्वयं उद्धार पाए हुए मनुष्य हों।
यह कि सुसमाचार का शिक्षक पहले स्वयं उसका सहभागी हो, एक सीधा-सादा सत्य है, परन्तु साथ ही यह अत्यन्त भारी महत्व का नियम भी है। हम उन लोगों में से नहीं हैं जो जवानों की प्रेरितीय उत्तराधिकारिता को केवल इसलिए स्वीकार कर लेते हैं कि वे उसका दावा करते हैं; यदि उनका कॉलेज का अनुभव आत्मिक होने के बजाय चुलबुला रहा हो, यदि उनके सम्मान मसीह के लिए किए गए परिश्रमों के बजाय खेलकूद के अभ्यासों से जुड़े रहे हों—तो हम उनसे उस प्रमाण से भिन्न प्रकार का प्रमाण माँगते हैं जो वे हमारे सामने प्रस्तुत कर पाते हैं। विद्वान आचार्यों को चुकाई गई कितनी भी फ़ीस, और बदले में पाई गई कितनी भी शास्त्रीय विद्या, हमें ऊपर से आई बुलाहट का प्रमाण नहीं जान पड़ती।
सच्ची और खरी भक्ति पहली और अनिवार्य योग्यता के रूप में आवश्यक है; कोई मनुष्य चाहे जो भी “बुलाहट” होने का दावा करे, यदि वह पवित्रता के लिए नहीं बुलाया गया है, तो वह निश्चय ही सेवकाई के लिए नहीं बुलाया गया है।
रब्बी कहते हैं, “पहले स्वयं को सँवारो, फिर अपने भाई को सजाओ।” ग्रेगरी कहते हैं, “जो हाथ दूसरे को साफ़ करना चाहता है, वह स्वयं मैला न हो।” यदि आपका नमक ही स्वादहीन हो, तो आप दूसरों को कैसे स्वादिष्ट बनाएँगे? मन-परिवर्तन सेवक के लिए एक अनिवार्य शर्त है। हमारे मंचों की अभिलाषा रखनेवालो, “तुम्हें नये सिरे से जन्म लेना अवश्य है।” और न ही किसी मनुष्य को इस पहली योग्यता के होने को यों ही मान लेना चाहिए, क्योंकि इस विषय में हमारे धोखा खाने की बहुत बड़ी सम्भावना है कि हमारा मन-परिवर्तन हुआ है या नहीं। मेरा विश्वास कीजिए, “अपने बुलाए जाने और चुन लिए जाने को सिद्ध करना” कोई बच्चों का खेल नहीं है।
संसार नकली चीज़ों से भरा पड़ा है, और शारीरिक आत्म-अभिमान को बढ़ावा देनेवाले चाटुकारों से भरा है, जो किसी सेवक के चारों ओर ऐसे इकट्ठे हो जाते हैं जैसे लोथ के चारों ओर गिद्ध। हमारे अपने हृदय धोखेबाज़ हैं, इसलिए सत्य सतह पर नहीं पड़ा रहता, बल्कि उसे सबसे गहरे कुएँ से खींचकर निकालना पड़ता है। हमें अपने आपको बड़ी चिन्ता के साथ और बहुत गहराई से जाँचना चाहिए, ऐसा न हो कि औरों को प्रचार करके हम आप ही किसी रीति से निकम्मे ठहरें।
सुसमाचार का प्रचारक होना और फिर भी स्वयं मन-परिवर्तन रहित होना कितना भयानक है! यहाँ उपस्थित हर मनुष्य अपने अन्तरतम प्राण से धीरे से कहे, “यदि मैं उस सत्य की सामर्थ से अनजान रहूँ जिसका प्रचार करने की मैं तैयारी कर रहा हूँ, तो यह मेरे लिए कितनी भयानक बात होगी!” मन-परिवर्तन रहित सेवकाई अत्यन्त अस्वाभाविक सम्बन्धों को जन्म देती है।
अनुग्रह से रहित पास्टर एक ऐसा अंधा मनुष्य है जो प्रकाश-विज्ञान का प्राध्यापक चुन लिया गया हो, जो प्रकाश और दृष्टि पर दार्शनिक विवेचन करता हो, और दूसरों के सामने प्रिज़्म के रंगों की जटिल छायाओं और कोमल मिश्रणों पर भाषण देता और उनका भेद बताता हो—जबकि वह स्वयं पूरी तरह अन्धकार में है! वह एक गूँगा मनुष्य है जिसे संगीत के आचार्य-पद पर बैठा दिया गया हो! वह एक बहरा मनुष्य है जो सिम्फ़नियों और स्वर-संगतियों पर धाराप्रवाह बोलता हो! वह एक छछूँदर है जो गरुड़ के बच्चों को शिक्षा देने का दावा करता हो! वह एक घोंघा है जिसे स्वर्गदूतों की अध्यक्षता के लिए चुन लिया गया हो।
ऐसे सम्बन्ध पर सबसे बेतुकी और विचित्र उपमाएँ लागू की जा सकती थीं, यदि विषय इतना गम्भीर न होता। किसी मनुष्य के लिए यह खड़े होने की एक भयानक स्थिति है, क्योंकि उसने एक ऐसा काम हाथ में ले लिया है जिसके लिए वह पूर्णतः, सम्पूर्णतः और सर्वथा अयोग्य है, परन्तु जिसकी ज़िम्मेदारियों से उसकी यह अयोग्यता उसे बचा न सकेगी, क्योंकि उसने जान-बूझकर उन्हें अपने ऊपर लिया है। उसके स्वाभाविक वरदान चाहे जो हों, उसकी मानसिक शक्तियाँ चाहे जैसी हों, यदि उसमें आत्मिक जीवन नहीं है तो वह आत्मिक काम के लिए पूरी तरह अयोग्य है; और उसका कर्तव्य है कि वह सेवक का पद तब तक छोड़ दे जब तक उसे उसके लिए यह पहली और सबसे सरल योग्यता प्राप्त न हो जाए।
मन-परिवर्तन रहित सेवकाई एक और दृष्टि से भी उतनी ही भयानक होगी। यदि उस मनुष्य के पास परमेश्वर की ओर से कोई नियुक्ति नहीं है, तो उसके लिए यह कितनी दुःखद स्थिति है! वह अपने लोगों के अनुभव में ऐसा क्या देख सकता है जिससे उसे सान्त्वना मिले? जब वह पश्चाताप करनेवालों की पुकार सुनता है, या उनके व्याकुल सन्देहों और गम्भीर भयों को सुनता है, तब उसे कैसा लगता होगा? उसे यह सोचकर आश्चर्य होता होगा कि उसके शब्दों को उस उद्देश्य के लिए स्वीकार किया गया!
मन-परिवर्तन रहित मनुष्य का वचन भी प्राणों के मन-परिवर्तन के लिए आशीषित हो सकता है, क्योंकि प्रभु, उस मनुष्य को अस्वीकार करते हुए भी, अपने सत्य का आदर करता रहेगा। फिर भी जब परिपक्व मसीही उससे अपनी कठिनाइयों के विषय में सलाह लेते होंगे, तो ऐसा मनुष्य कितना उलझन में पड़ता होगा! अनुभव के जिस मार्ग पर उसके अपने नया जन्म पाए हुए सुननेवाले चलाए जाते हैं, उसमें वह अपने आपको बिल्कुल असमंजस में पाता होगा। वह उनकी मृत्यु-शय्या के आनन्दों को कैसे सुन सकता है, या उनके प्रभु की मेज़ के चारों ओर होनेवाली उनकी आनन्द-विभोर संगति में कैसे सम्मिलित हो सकता है?
बहुत से उदाहरणों में, जब जवानों को ऐसे व्यवसाय में लगा दिया जाता है जिसे वे सहन नहीं कर सकते, तो वे उस उबाऊ धन्धे में लगे रहने के बजाय भागकर समुद्र पर चले जाते हैं; परन्तु वह मनुष्य कहाँ भागे जो जीवन भर के लिए इस पवित्र बुलाहट में शागिर्द के रूप में बँध गया है, और फिर भी भक्ति की सामर्थ से पूरी तरह अनजान है? वह प्रतिदिन मनुष्यों से मसीह के पास आने को कैसे कह सकता है, जबकि वह स्वयं उसके मरते हुए प्रेम से अनजान है? हे सज्जनो, निश्चय ही यह तो निरन्तर दासता होगी। ऐसा मनुष्य मंच (पल्पिट) को देखने से ही उतनी घृणा करता होगा जितनी कोई गुलाम-नाविक अपने चप्पू से करता है!
और ऐसा मनुष्य कितना निकम्मा होगा! उसे यात्रियों को ऐसे मार्ग पर ले चलना है जिस पर वह स्वयं कभी नहीं चला। उसे एक जहाज़ को ऐसे तट के साथ-साथ चलाना है जिसके किसी भी पहचान-चिह्न को वह नहीं जानता! उसे दूसरों को शिक्षा देने के लिए बुलाया गया है, जबकि वह स्वयं मूर्ख है। वह निर्जल बादल, और केवल पत्तोंवाले पेड़ के सिवा और क्या हो सकता है? जैसे जब जंगल में कोई कारवाँ, प्यास से व्याकुल और तपते सूरज के नीचे मरने पर, बहुत दिनों से चाहे हुए कुएँ पर पहुँचता है, और—भयानकों में भी भयानक!—उसमें पानी की एक बूँद भी नहीं पाता। ठीक वैसे ही, जब परमेश्वर के प्यासे प्राण किसी अनुग्रह-रहित सेवकाई के पास आते हैं, तो वे नाश होने पर होते हैं, क्योंकि वहाँ जीवन का जल नहीं मिलता। मंचों को ऐसे मनुष्यों से भरने से तो अच्छा है कि मंचों को ही समाप्त कर दिया जाए, जिन्हें उस बात का अनुभवजन्य ज्ञान नहीं है जिसे वे सिखाते हैं।
हाय! नया जन्म न पाया हुआ पास्टर भयानक रूप से हानिकारक भी बन जाता है, क्योंकि अविश्वास उत्पन्न करनेवाले सब कारणों में भक्तिहीन सेवकों को सबसे पहले गिना जाना चाहिए। मैंने कुछ दिन पहले पढ़ा कि बुराई के किसी भी रूप में विनाश की इतनी अद्भुत शक्ति नहीं दिखाई देती जितनी किसी पल्ली के उस मन-परिवर्तन रहित सेवक में, जिसके पास एक महँगा ऑर्गन हो, भक्तिहीन गायकों का एक गायक-दल हो, और एक कुलीन मण्डली हो। लेखक का मत था कि नरक के बाहर लोगों को अनन्त दण्ड तक पहुँचाने का इससे बड़ा कोई साधन नहीं हो सकता।
लोग अपने आराधना-स्थान पर जाते हैं और आराम से बैठ जाते हैं, और सोचते हैं कि वे अवश्य मसीही होंगे, जबकि पूरे समय उनका सारा धर्म केवल इतने में है कि किसी वक्ता को सुनें, संगीत से अपने कानों को गुदगुदाएँ, और शायद सुन्दर हाव-भाव और फ़ैशनेबल तौर-तरीकों से अपनी आँखों का मनोरंजन करें; यह सब कुछ उससे अच्छा नहीं जो वे ऑपेरा में सुनते और देखते हैं—सौन्दर्य की दृष्टि से शायद उतना अच्छा भी नहीं, और रत्ती भर भी अधिक आत्मिक नहीं।
हज़ारों लोग अपने आपको बधाई दे रहे हैं, और परमेश्वर को धन्यवाद भी दे रहे हैं कि वे भक्त आराधक हैं, जबकि उसी समय वे नया जन्म न पाई हुई, मसीह-रहित दशा में जी रहे हैं, भक्ति का भेष तो धरे हुए हैं, पर उसकी शक्ति को नहीं मानते। जो व्यक्ति ऐसी व्यवस्था का अध्यक्ष है जिसका लक्ष्य औपचारिकता से ऊँचा कुछ नहीं, वह परमेश्वर का सेवक होने से कहीं अधिक शैतान का दास है!
एक औपचारिक प्रचारक तब भी हानिकारक होता है जब वह अपना बाहरी सन्तुलन बनाए रखता है, परन्तु क्योंकि उसके पास भक्ति का रक्षा करनेवाला सन्तुलन नहीं है, इसलिए देर-सबेर उसका अपने नैतिक चरित्र में ठोकर खाना लगभग निश्चित है, और तब वह कैसी स्थिति में होता है! तब परमेश्वर की कैसी निन्दा होती है, और सुसमाचार का कैसा अपमान होता है!
यह सोचना भयानक है कि ऐसे मनुष्य की कैसी मृत्यु प्रतीक्षा कर रही होगी! और उसके बाद उसकी दशा कैसी होगी! भविष्यद्वक्ता बाबुल के राजा का चित्र खींचता है कि वह नरक में उतर रहा है, और वे सब राजा और हाकिम जिन्हें उसने नाश किया था, और जिनकी राजधानियाँ उसने उजाड़ दी थीं, पैन्डिमोनियम में अपने-अपने स्थानों से उठ खड़े होते हैं, और उस गिरे हुए अत्याचारी का इस चुभते हुए व्यंग्य से अभिवादन करते हैं, “क्या तू भी हमारे समान बन गया है?” क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक मनुष्य जो सेवक रहा हो, परन्तु जिसने अपने हृदय में मसीह के बिना जीवन बिताया हो, नरक में उतर रहा है, और वे सब बन्दी आत्माएँ जो उसे सुना करती थीं, और उसकी पल्ली के सब भक्तिहीन लोग उठकर कड़वे स्वर में उससे कह रहे हैं, “क्या तू भी हमारे समान बन गया है? हे वैद्य, क्या तू ने अपने आपको चंगा नहीं किया? क्या तू, जो एक चमकती ज्योति होने का दावा करता था, सदा के लिए अन्धकार में डाल दिया गया है?”
ओह! यदि किसी को नाश होना ही है, तो इस रीति से न हो! मंच (पल्पिट) की छाया में नाश होना भयानक है, परन्तु स्वयं मंच पर से नाश होना इससे कितना अधिक भयानक है!
जॉन बनियन के “नरक से आहें” नामक ग्रन्थ में एक गम्भीर अंश है, जो बहुत बार मेरे कानों में गूँजता है: “अंधे याजक अपनी अज्ञानता के द्वारा कितने प्राणों के विनाश का कारण बने हैं? ऐसा प्रचार जो उनके प्राणों के लिए उससे अच्छा न था जितना देह के लिए चूहे मारने का विष। डर है कि उनमें से बहुतों को पूरे-पूरे नगरों का लेखा देना होगा। आह! मित्र, मैं तुमसे कहता हूँ, तुम जिन्होंने लोगों को प्रचार करने का काम हाथ में लिया है, हो सकता है तुमने ऐसा काम हाथ में ले लिया है जिसे तुम बता भी नहीं सकते। क्या तुम्हें यह देखकर दुःख न होगा कि तुम्हारी पूरी पल्ली तुम्हारे पीछे-पीछे चिल्लाती हुई नरक में आ रही है? यह पुकारती हुई, ‘इसके लिए हम तुम्हें धन्यवाद दें, तुम हमें हमारे पापों के विषय में बताने से डरते थे, कहीं ऐसा न हो कि हम तुम्हारे मुँह में जल्दी-जल्दी भोजन न डालें। हे शापित अभागे, जो अंधे अगुवे होकर, स्वयं गड्ढे में गिरने से ही सन्तुष्ट न हुए—बल्कि हमें भी अपने साथ वहाँ ले आए!”
रिचर्ड बैक्सटर अपनी पुस्तक “द रिफ़ॉर्म्ड पास्टर” में, और बहुत सी गम्भीर बातों के बीच, इस प्रकार लिखते हैं: “अपनी चौकसी करो, ऐसा न हो कि तुम परमेश्वर के उस उद्धार देनेवाले अनुग्रह से रहित रहो जिसे तुम दूसरों के सामने प्रस्तुत करते हो, और उस सुसमाचार के प्रभावशाली कार्य से अनजान रहो जिसका तुम प्रचार करते हो; और ऐसा न हो कि जब तुम संसार के सामने एक उद्धारकर्ता की आवश्यकता का प्रचार करते हो, तब तुम्हारे हृदय उसकी उपेक्षा करें, और तुम उसमें और उसके उद्धार देनेवाले लाभों में उद्धार देनेवाला भाग पाने से चूक जाओ। अपनी चौकसी करो, ऐसा न हो कि जब तुम दूसरों से नाश होने से सावधान रहने को कहते हो, तब तुम स्वयं नाश हो जाओ, और ऐसा न हो कि जब तुम उनका भोजन तैयार करते हो, तब तुम स्वयं भूखे मरो! यद्यपि जो बहुतों को धार्मिकता की ओर फेरते हैं उनके लिए तारों के समान चमकने की प्रतिज्ञा है (दानिय्येल 12:3), तौभी यह इसी मान्यता पर है कि वे पहले स्वयं उसकी ओर फिरे हों। बहुत से मनुष्यों ने दूसरों को चेतावनी दी है कि वे उस पीड़ा के स्थान में न आएँ, जिसकी ओर वे स्वयं ही शीघ्रता से चले गए; बहुत से प्रचारक अब नरक में हैं, जिन्होंने सौ-सौ बार अपने सुननेवालों से कहा था कि उससे बचने के लिए पूरी सावधानी और परिश्रम करें। क्या कोई समझदार मनुष्य यह कल्पना कर सकता है कि परमेश्वर मनुष्यों को इसलिए बचाएगा कि उन्होंने दूसरों के सामने उद्धार प्रस्तुत किया, जबकि उन्होंने स्वयं उसे अस्वीकार किया, और इसलिए कि उन्होंने दूसरों को वे सत्य बताए जिनकी उन्होंने स्वयं उपेक्षा और दुरुपयोग किया? बहुत से दर्ज़ी, जो दूसरों के लिए कीमती वस्त्र बनाते हैं, स्वयं चिथड़ों में घूमते हैं; और बहुत से रसोइये, जब वे दूसरों के लिए सबसे कीमती व्यंजन तैयार कर चुके होते हैं, तो मुश्किल से अपनी उँगलियाँ चाटते हैं। भाइयो, विश्वास करो, परमेश्वर ने कभी किसी मनुष्य को इसलिए नहीं बचाया कि वह प्रचारक था, और न इसलिए कि वह योग्य प्रचारक था; बल्कि इसलिए कि वह धर्मी ठहराया हुआ, पवित्र किया हुआ मनुष्य था, और फलस्वरूप अपने स्वामी के काम में विश्वासयोग्य था। इसलिए, पहले अपनी चौकसी करो, कि तुम वही हो जो बनने के लिए तुम दूसरों को मनाते हो, और उस पर विश्वास करो जिस पर विश्वास करने के लिए तुम प्रतिदिन उन्हें मनाते हो, और तुमने उस मसीह और आत्मा को हृदय से ग्रहण किया हो जिसे तुम दूसरों के सामने प्रस्तुत करते हो। जिसने तुम्हें अपने पड़ोसियों से अपने समान प्रेम रखने की आज्ञा दी, उसका आशय यह था कि तुम अपने आप से प्रेम रखो, और अपने आपको तथा उन्हें घृणा करके नाश न करो।”
मेरे भाइयो, इन भारी वचनों का आप पर उचित प्रभाव पड़ने दीजिए। निश्चय ही इसमें और कुछ जोड़ने की आवश्यकता नहीं; परन्तु मैं आपसे विनती करता हूँ कि अपने आपको जाँचिए, और इस प्रकार जो कुछ आपसे कहा गया है उसका अच्छा उपयोग कीजिए।
सच्चे धर्म की इस पहली बात के तय हो जाने पर, सेवक के लिए अगली महत्वपूर्ण बात यह है:
2. कि उसकी भक्ति सशक्त हो।
उसे सामान्य मसीहियों की पंक्ति के बराबर होने से सन्तुष्ट नहीं होना चाहिए, उसे एक परिपक्व और उन्नत विश्वासी होना चाहिए; क्योंकि मसीह की सेवकाई को सच ही कहा गया है, “उसके चुने हुओं में सबसे उत्तम, उसके चुनाव में से भी चुने हुए, कलीसिया में से छाँटी गई एक कलीसिया।” यदि उसे किसी साधारण पद और सामान्य काम के लिए बुलाया गया होता, तो शायद सामान्य अनुग्रह उसे सन्तुष्ट कर देता, यद्यपि तब भी वह एक आलसी सन्तोष ही होता; परन्तु असाधारण परिश्रमों के लिए चुना जाकर, और असामान्य जोखिम के स्थान पर बुलाया जाकर, उसे उस श्रेष्ठ सामर्थ को पाने के लिए उत्सुक रहना चाहिए जो अकेली ही उसके पद के योग्य है।
उसकी जीवित भक्ति की नाड़ी दृढ़ता से और नियमित रूप से धड़कनी चाहिए।
उसकी विश्वास की आँख उज्ज्वल होनी चाहिए। उसके संकल्प का पाँव दृढ़ होना चाहिए।
उसके कार्य का हाथ फुर्तीला होना चाहिए।
उसका सम्पूर्ण भीतरी मनुष्यत्व भक्ति की सर्वोच्च अवस्था में होना चाहिए।
मिस्रियों के विषय में कहा जाता है कि वे अपने याजकों को अपने दार्शनिकों में से सबसे विद्वानों में से चुनते थे, और फिर अपने याजकों का इतना अधिक आदर करते थे कि अपने राजाओं को उन्हीं में से चुनते थे।
हमें परमेश्वर के सेवकों के रूप में समस्त मसीही सेना में से चुने हुए सर्वोत्तम लोग चाहिए; सचमुच ऐसे मनुष्य कि यदि राष्ट्र को राजाओं की आवश्यकता हो, तो वह उन्हें सिंहासन पर बैठाने से अच्छा कुछ न कर सके।
हमारे सबसे कमज़ोर मन वाले, सबसे डरपोक, सबसे शारीरिक, और सबसे असन्तुलित मनुष्य मंच (पल्पिट) के लिए उपयुक्त उम्मीदवार नहीं हैं।
कुछ काम ऐसे हैं जो हमें रोगी या अपंग को कभी नहीं सौंपने चाहिए। हो सकता है कोई मनुष्य ऊँची इमारतों पर चढ़ने के योग्य न हो, उसका सिर बहुत कमज़ोर हो, और ऊँचाई का काम उसे बड़े ख़तरे में डाल दे; ऐसा हो तो वह अवश्य भूमि पर ही रहे, और ऐसा उपयोगी काम ढूँढ़े जहाँ स्थिर सिर का होना कम महत्व रखता हो। कुछ भाई ऐसे हैं जिनमें इसी प्रकार की आत्मिक कमियाँ हैं, उन्हें ऐसी सेवा के लिए नहीं बुलाया जा सकता जो प्रमुख और ऊँची हो, क्योंकि उनके सिर बहुत कमज़ोर हैं। यदि उन्हें थोड़ी सी भी सफलता मिल जाए, तो वे घमण्ड के नशे में चूर हो जाएँगे—यह एक ऐसा दुर्गुण है जो सेवकों में बहुत ही आम है, और जो उन्हें सब बातों से कम शोभा देता है, और जो उनके पतन को सबसे अधिक निश्चित कर देता है।
यदि एक राष्ट्र के रूप में हमें अपने घर-द्वार की रक्षा के लिए बुलाया जाए, तो हम शत्रु का सामना करने के लिए अपने लड़कों और लड़कियों को तलवारें और बन्दूकें देकर नहीं भेजेंगे; वैसे ही कलीसिया भी हर धाराप्रवाह बोलनेवाले नौसिखिए या अनुभवहीन उत्साही को विश्वास की पैरवी करने के लिए नहीं भेज सकती। प्रभु का भय उस जवान को बुद्धि सिखाए, नहीं तो वह पास्टर के पद से रोका जाए। परमेश्वर का अनुग्रह उसकी आत्मा को परिपक्व करे, नहीं तो उसके लिए यही अच्छा है कि वह तब तक ठहरा रहे जब तक उसे ऊपर से सामर्थ न मिले।
सर्वोच्च नैतिक चरित्र को पूरे परिश्रम से बनाए रखना चाहिए। बहुत से लोग जो साधारण सदस्यों के रूप में ठीक-ठाक हैं, कलीसिया में पद के लिए अयोग्य हैं। जो मसीही लोग घोर पाप में गिर गए हैं, उनके विषय में मेरे विचार बहुत कठोर हैं। मैं आनन्दित हूँ कि उनका सच्चा मन-परिवर्तन हो सकता है, और उन्हें आशा और सावधानी के मिले-जुले भाव के साथ कलीसिया में ग्रहण किया जा सकता है; परन्तु मुझे सन्देह है, गम्भीर सन्देह है, कि जिस मनुष्य ने घोर पाप किया है उसे बहुत आसानी से मंच (पल्पिट) पर लौटा देना चाहिए या नहीं।
जैसा जॉन एंजेल जेम्स कहते हैं, “जब धार्मिकता का कोई प्रचारक पापियों के मार्ग में खड़ा हो चुका हो, तो उसे बड़ी सभा में फिर कभी अपना मुँह नहीं खोलना चाहिए, जब तक उसका पश्चाताप उतना ही प्रसिद्ध न हो जाए जितना उसका पाप।”
जिनकी दाढ़ियाँ अम्मोनियों ने मूँड़ दी हों, वे जब तक उनकी दाढ़ियाँ बढ़ न जाएँ तब तक यरीहो में ठहरे रहें; यह बात प्रायः बिना दाढ़ी वाले लड़कों पर ताने के रूप में कही गई है, जिन पर यह स्पष्ट रूप से लागू नहीं होती; परन्तु अपमानित और चरित्रहीन मनुष्यों के लिए, उनकी आयु चाहे जो हो, यह काफ़ी सटीक उपमा है।
हाय! प्रतिष्ठा की दाढ़ी एक बार मूँड़ दी जाए, तो उसका फिर से बढ़ना कठिन है। खुला अनैतिक आचरण, अधिकांश मामलों में, पश्चाताप चाहे कितना भी गहरा हो, इस बात का घातक चिह्न है कि सेवक के योग्य अनुग्रह के गुण उस मनुष्य के चरित्र में कभी थे ही नहीं। अतीत में सेवकीय असंगति के विषय में कोई बुरी अफ़वाहें नहीं होनी चाहिए, नहीं तो उपयोगिता की आशा बहुत क्षीण होगी। ऐसे गिरे हुए लोगों को पश्चाताप करनेवालों के रूप में कलीसिया में ग्रहण किया जाना चाहिए, और यदि परमेश्वर उन्हें सेवकाई में रखे, तो उन्हें सेवकाई में भी ग्रहण किया जा सकता है; मेरा सन्देह इस विषय में नहीं, बल्कि इस विषय में है कि क्या परमेश्वर ने उन्हें कभी वहाँ रखा भी था; और मेरा विश्वास है कि हमें ऐसे मनुष्यों को मंच (पल्पिट) पर लौटाने में सहायता करने में बहुत धीमे रहना चाहिए, जिन्होंने एक बार परखे जाने पर यह प्रमाणित कर दिया कि उनमें सेवकीय जीवन की निर्णायक परीक्षा में खड़े रहने के लिए बहुत कम अनुग्रह है।
कुछ कामों के लिए हम केवल बलवानों को ही चुनते हैं; और जब परमेश्वर हमें सेवकाई के परिश्रम के लिए बुलाता है, तो हमें अनुग्रह पाने का प्रयत्न करना चाहिए ताकि हम अपने पद के योग्य बनने के लिए दृढ़ किए जाएँ, और केवल ऐसे नौसिखिए न हों जो शैतान की परीक्षाओं में बहकर कलीसिया की हानि और अपना विनाश कर बैठें। हमें परमेश्वर के सारे हथियार बाँधकर खड़े रहना है, ऐसे वीरतापूर्ण कार्यों के लिए तैयार, जिनकी दूसरों से आशा नहीं की जाती। हमारे लिए आत्म-त्याग, आत्म-विस्मृति, धीरज, दृढ़ता, सहनशीलता प्रतिदिन के सद्गुण होने चाहिए; और इन बातों के योग्य कौन है? यदि हम अपनी बुलाहट में अपने आपको खरा प्रमाणित करना चाहते हैं, तो हमें परमेश्वर के बहुत निकट रहने की आवश्यकता है।
सेवकों के रूप में यह स्मरण रखिए कि आपका सम्पूर्ण जीवन, विशेषकर आपका सम्पूर्ण पास्टरीय जीवन, आपकी भक्ति की सशक्तता से प्रभावित होगा। यदि आपका उत्साह मन्द पड़ जाए, तो आप मंच पर अच्छी प्रार्थना नहीं करेंगे; परिवार में और भी बुरी प्रार्थना करेंगे, और अपने अध्ययन-कक्ष में अकेले में सबसे बुरी। जब आपका प्राण दुबला हो जाता है, तो आपके सुननेवाले, बिना यह जाने कि कैसे या क्यों, पाएँगे कि सार्वजनिक रूप से की गई आपकी प्रार्थनाओं में उनके लिए बहुत कम स्वाद है; वे आपके सूखेपन को शायद आपके स्वयं उसे पहचानने से पहले ही अनुभव कर लेंगे।
इसके बाद आपके प्रवचन आपके पतन को प्रगट कर देंगे। आप पहले की ही तरह भली-भाँति चुने हुए शब्द और उचित रूप से गढ़े हुए वाक्य बोल सकते हैं; परन्तु आत्मिक शक्ति में स्पष्ट दिखाई देनेवाली कमी होगी। आप पहले की नाईं अपने आपको झटकेंगे, ठीक जैसे शिमशोन ने किया था, परन्तु आप पाएँगे कि आपका बड़ा बल जाता रहा है।
अपने लोगों के साथ आपकी प्रतिदिन की संगति में, वे आपके अनुग्रह के गुणों की सर्वव्यापी गिरावट को पहचानने में देर नहीं करेंगे। पैनी आँखें आपके देखने से बहुत पहले ही यहाँ-वहाँ पके हुए बालों को देख लेंगी।
किसी मनुष्य को हृदय का रोग हो जाए, तो सब बुराइयाँ उसी एक में लिपटी रहती हैं—पेट, फेफड़े, अँतड़ियाँ, मांसपेशियाँ और नसें, सब पीड़ित होंगे। ठीक वैसे ही, यदि किसी मनुष्य का हृदय आत्मिक बातों में दुर्बल हो जाए, तो बहुत शीघ्र उसका सम्पूर्ण जीवन उस मुरझानेवाले प्रभाव को अनुभव करेगा। इसके अतिरिक्त, आपके अपने पतन के परिणामस्वरूप आपका हर एक सुननेवाला कम या अधिक हानि उठाएगा; उनमें से जो सशक्त हैं वे इस निराश करनेवाली प्रवृत्ति पर जय पा लेंगे, परन्तु निर्बल प्रकार के लोग गम्भीर रूप से हानि उठाएँगे।
हमारा और हमारे सुननेवालों का हाल वैसा ही है जैसा घड़ियों और सार्वजनिक घड़ी का; यदि हमारी घड़ी ग़लत हो, तो उससे हमारे सिवा बहुत कम लोग भटकेंगे। परन्तु यदि ग्रीनविच वेधशाला ग़लत हो जाए, तो आधा लंदन अपना हिसाब खो बैठेगा। सेवक के साथ भी ऐसा ही है; वह पल्ली की घड़ी है, बहुत से लोग उससे अपना समय मिलाते हैं, और यदि वह ग़लत हो, तो वे सब कम या अधिक ग़लत चलते हैं, और जितना पाप वह उत्पन्न करता है, उस सब के लिए बहुत हद तक वह उत्तरदायी है। मेरे भाइयो, इस बात के विचार को हम सहन नहीं कर सकते। इस पर एक क्षण के लिए भी निश्चिन्त होकर विचार नहीं किया जा सकता, और फिर भी इसे देखना ही होगा ताकि हम इससे बचे रहें।
आपको यह भी स्मरण रखना चाहिए कि हमें बहुत सशक्त भक्ति की आवश्यकता है, क्योंकि हमारा ख़तरा दूसरों के ख़तरे से कहीं अधिक बड़ा है। कुल मिलाकर, सेवकाई जितना कोई भी स्थान परीक्षाओं से घिरा हुआ नहीं है। इस लोकप्रिय धारणा के बावजूद कि हमारा पद परीक्षा से बचने का एक सुरक्षित आश्रय है, यह बात उतनी ही सच है कि हमारे ख़तरे सामान्य मसीहियों के ख़तरों से अधिक संख्या में और अधिक छिपे हुए हैं। हमारा स्थान ऊँचाई के कारण लाभ का स्थान हो सकता है, परन्तु वह ऊँचाई ख़तरनाक है, और बहुतों के लिए सेवकाई एक खड़ी चट्टान सिद्ध हुई है जिससे बहुत से लोग गिर पड़ते हैं।
यदि आप पूछें कि ये परीक्षाएँ क्या हैं, तो उनका विस्तार से वर्णन करने के लिए शायद हमारे पास समय कम पड़ जाए; परन्तु उनमें मोटी भी हैं और अधिक सूक्ष्म भी। मोटी परीक्षाएँ ऐसी हैं जैसे भोजन की मेज़ पर आत्म-भोग, जिसके प्रलोभन अतिथि-सत्कार करनेवाले लोगों के बीच बहुतायत से मिलते हैं; और शरीर की परीक्षाएँ, जो उन जवान अविवाहित पुरुषों पर निरन्तर आती हैं जो प्रशंसा करनेवाली जवान स्त्रियों की भीड़ के बीच ऊँचे स्थान पर बैठाए गए हैं। परन्तु इस विषय में इतना ही बहुत है; आपका अपना अवलोकन शीघ्र ही आपके सामने हज़ारों फन्दे प्रगट कर देगा, यदि सचमुच आपकी आँखें अंधी न कर दी गई हों।
इनसे भी अधिक गुप्त फन्दे हैं, जिनसे बचना और भी कठिन है; और इनमें सबसे बुरा है सेवकवाद (मिनिस्टीरियलिज़्म) की परीक्षा—यह प्रवृत्ति कि हम अपनी बाइबल सेवकों के रूप में पढ़ें, सेवकों के रूप में प्रार्थना करें, और अपने सम्पूर्ण धर्म को ऐसे निभाने लगें मानो हम व्यक्तिगत रूप से नहीं—बल्कि केवल सम्बन्ध के नाते उससे जुड़े हों। व्यक्तिगत पश्चाताप और विश्वास को खो देना सचमुच बड़ी हानि है। जॉन ओवेन कहते हैं, “कोई भी मनुष्य दूसरों को अपना उपदेश अच्छी तरह नहीं सुनाता यदि वह पहले उसे अपने ही हृदय को नहीं सुनाता।” भाइयो, इस पर टिके रहना अत्यन्त कठिन है। हमारा पद, जैसा कुछ लोग दावा करते हैं, हमारी भक्ति में सहायक होने के बजाय, हमारे स्वभाव की बुराई के कारण उसकी सबसे गम्भीर बाधाओं में से एक बन जाता है; कम से कम मैं तो ऐसा ही पाता हूँ। मनुष्य पदाधिकारीपन के विरुद्ध कैसे लातें मारता और संघर्ष करता है, और फिर भी वह कितनी आसानी से हमें घेर लेता है, उस लम्बे वस्त्र की तरह जो दौड़नेवाले के पैरों में लिपटकर उसकी दौड़ में बाधा डालता है! प्रिय भाइयो, इससे और अपनी बुलाहट के अन्य सब प्रलोभनों से सावधान रहिए; और यदि आपने अब तक ऐसा किया है, तो जीवन की अन्तिम घड़ी तक चौकसी करते रहिए।
हमने ख़तरों में से केवल एक पर ध्यान दिया है, परन्तु सचमुच वे सेना के समान अनगिनत हैं। प्राणों का महान शत्रु प्रचारक के विनाश के लिए कोई कसर नहीं छोड़ता। बैक्सटर कहते हैं, “अपनी चौकसी करो, क्योंकि परीक्षा करनेवाला अपना पहला और सबसे तीखा आक्रमण तुम पर करेगा। यदि तुम उसके विरुद्ध अगुवे बनोगे, तो वह तुम्हें उससे अधिक नहीं छोड़ेगा जितना परमेश्वर उसे रोकता है। जो लोग उसकी सबसे बड़ी हानि करने में लगे हैं, उनसे वह सबसे अधिक बैर रखता है। जैसे वह मसीह से हम में से किसी से भी अधिक घृणा करता है, क्योंकि वह रणभूमि का सेनापति और ‘हमारे उद्धार का कर्ता’ है, और अन्धकार के राज्य के विरुद्ध सारे संसार से बढ़कर काम करता है; वैसे ही वह इसी कारण, अपने-अपने अनुपात में, उसके अधीन अगुवों पर साधारण सैनिकों से अधिक ध्यान रखता है। वह जानता है कि यदि अगुवे बाकी लोगों की आँखों के सामने गिर पड़ें, तो वह उनमें कैसी भगदड़ मचा सकता है। उसने बहुत समय से लड़ने की वह रीति आज़माई है, कि तुलनात्मक रूप से ‘न तो छोटे से लड़ो और न बड़े से,’ केवल इन्हीं से; और ‘चरवाहों को मारने की, ताकि वह झुण्ड को तितर-बितर कर दे।’ इस रीति में उसे इतनी बड़ी सफलता मिली है कि जहाँ तक उससे हो सकेगा, वह इसी पर चलता रहेगा। इसलिए, भाइयो, सावधान रहो, क्योंकि शत्रु की तुम पर विशेष दृष्टि है। तुम्हें उसके सबसे चालाक संकेतों, और निरन्तर उकसाहटों, और प्रचण्ड आक्रमणों का सामना करना पड़ेगा। तुम चाहे जितने बुद्धिमान और विद्वान हो, अपनी चौकसी करो, ऐसा न हो कि वह चतुराई में तुमसे बाज़ी मार ले। शैतान तुमसे बड़ा विद्वान है, और अधिक फुर्तीला वाद-विवाद करनेवाला है; वह धोखा देने के लिए ‘ज्योतिर्मय स्वर्गदूत का रूप धारण’ कर सकता है। वह तुम्हारे भीतर घुस जाएगा और तुम्हारे जाने बिना ही तुम्हारी टाँग अड़ाकर तुम्हें गिरा देगा। वह बिना पहचाने तुम्हारे साथ बाज़ीगरी करेगा, और तुम्हें तुम्हारे विश्वास या तुम्हारी निर्दोषता से ठग लेगा, और तुम जान भी न पाओगे कि तुमने उसे खो दिया है; वरन् जब वह खो गया होगा, तब भी वह तुम्हें यह विश्वास दिला देगा कि वह कई गुना बढ़ गया है। जब वह तुम्हें अपना चारा दे रहा होगा, तब तुम्हें न काँटा दिखाई देगा न डोरी, और उस चालाक मछुए का तो कहना ही क्या! और उसके चारे तुम्हारे स्वभाव और प्रवृत्ति के ऐसे अनुकूल होंगे कि वह तुम्हारे भीतर ही लाभ के अवसर अवश्य पा लेगा, और तुम्हारे अपने सिद्धान्तों और झुकावों से ही तुम्हें धोखा दिलवाएगा; और जब कभी वह तुम्हारा विनाश करेगा, तो तुम्हें ही तुम्हारे अपने विनाश का साधन बनाएगा। ओह, यदि वह किसी सेवक को आलसी और विश्वासघाती बना सके; यदि वह किसी सेवक को लोभ या कलंक में फँसा सके, तो वह समझेगा कि उसने कैसी विजय पा ली है! वह कलीसिया के विरुद्ध घमण्ड करेगा, और कहेगा, ‘ये हैं तुम्हारे पवित्र प्रचारक—तुम देखते हो कि उनकी यह कठोर नियम-निष्ठा क्या है, और यह उन्हें कहाँ ले जाएगी।’ वह स्वयं यीशु मसीह के विरुद्ध घमण्ड करेगा, और कहेगा, ‘ये हैं तेरे योद्धा! मैं तेरे प्रमुख सेवकों से तेरा अपमान करवा सकता हूँ। मैं तेरे घर के भण्डारियों को विश्वासघाती बना सकता हूँ।’ यदि उसने एक झूठे अनुमान पर परमेश्वर का इस प्रकार अपमान किया, और उससे कहा कि वह अय्यूब से उसके मुँह पर उसकी निन्दा करवा सकता है (अय्यूब 1:2), तो यदि वह सचमुच हम पर प्रबल हो जाए तो क्या कुछ न करेगा? और अन्त में वह तुम पर भी उतना ही ठट्ठा करेगा कि वह तुम्हें अपनी महान धरोहर के प्रति विश्वासघाती बनने, और अपने पवित्र अंगीकार पर कलंक लगाने, और उसकी, जो तुम्हारा शत्रु था, इतनी सेवा करने के लिए खींच सका। ओह, शैतान को इतना सन्तुष्ट मत करो; उसे इतना तमाशा मत दो। उसे अपना वैसा उपयोग मत करने दो जैसा पलिश्तियों ने शिमशोन का किया था—पहले तुम्हारा बल छीन ले, और फिर तुम्हारी आँखें निकाल ले, और इस प्रकार तुम्हें अपनी विजय और उपहास का विषय बना ले।”
एक बात और। हमें भक्ति की सर्वोच्च अवस्था को विकसित करना चाहिए, क्योंकि हमारा काम अनिवार्य रूप से इसकी माँग करता है। मसीही सेवकाई का परिश्रम ठीक उसी अनुपात में अच्छी तरह पूरा होता है जिस अनुपात में हमारा नया किया गया स्वभाव सशक्त होता है। हमारा काम तभी अच्छी तरह होता है जब हमारे साथ सब कुछ अच्छा हो। जैसा कारीगर, वैसा ही काम होगा। सत्य के शत्रुओं का सामना करना, विश्वास के गढ़ों की रक्षा करना, परमेश्वर के घर में अच्छी तरह प्रबन्ध करना, सब शोक करनेवालों को शान्ति देना, पवित्र लोगों की उन्नति करना, उलझन में पड़े हुओं का मार्गदर्शन करना, टेढ़े स्वभाव वालों को सहना, प्राणों को जीतना और उनका पालन-पोषण करना—ये सब और इनके अतिरिक्त हज़ारों अन्य काम किसी ‘दुर्बल-मन’ या ‘लँगड़ाने-को-तैयार’ के लिए नहीं हैं, बल्कि ‘महा-हृदय’ के लिए सुरक्षित रखे गए हैं, जिसे प्रभु ने अपने लिए बलवन्त किया है। इसलिए बलवान से बल, बुद्धिमान से बुद्धि, वास्तव में सबके परमेश्वर से सब कुछ माँगिए।
3. सेवक ध्यान रखे कि उसका व्यक्तिगत चरित्र सब बातों में उसकी सेवकाई से मेल खाए।
हम सबने उस मनुष्य की कहानी सुनी है जो प्रचार तो इतना अच्छा करता था और जीवन इतना बुरा जीता था, कि जब वह मंच पर होता था तो सब कहते थे कि उसे वहाँ से कभी नीचे नहीं उतरना चाहिए; और जब वह उससे बाहर होता था तो सब यह घोषणा करते थे कि उसे उस पर फिर कभी नहीं चढ़ना चाहिए। प्रभु हमें ऐसे जानूस के अनुकरण से बचाए। ऐसा कभी न हो कि हम वेदी पर तो परमेश्वर के याजक हों, और तम्बू के द्वार के बाहर बलियाल के पुत्र। हम उन लोगों पर भरोसा नहीं करते जिनके दो मुँह हों, और न ही लोग उन पर विश्वास करेंगे जिनकी वचन की गवाही और व्यवहार की गवाही एक-दूसरे के विरोध में हों। जैसे कहावत के अनुसार कर्म शब्दों से अधिक ऊँचे स्वर में बोलते हैं, वैसे ही एक अपवित्र जीवन सबसे वाक्पटु सेवकाई की आवाज़ को भी प्रभावी रूप से दबा देगा। आख़िरकार, हमारा सबसे सच्चा निर्माण-कार्य हमारे हाथों से ही होना चाहिए; हमारे चरित्र हमारी वाणी से अधिक प्रभावशाली होने चाहिए।
यहाँ मैं आपको केवल करने के पापों के विषय में ही नहीं, बल्कि न करने के पापों के विषय में भी चेतावनी देना चाहता हूँ। बहुत से प्रचारक, जब वे मंच से बाहर होते हैं, तो परमेश्वर की सेवा करना भूल जाते हैं; उनके जीवन नकारात्मक रूप से असंगत होते हैं। प्रिय भाइयो, घड़ी की मशीन जैसे सेवक होने के विचार से भी घृणा कीजिए, जो भीतर बने रहनेवाले अनुग्रह से जीवित नहीं हैं, बल्कि अस्थायी प्रभावों से चाबी भरकर चलाए जाते हैं; ऐसे मनुष्य जो केवल उस समय के लिए, सेवा की घड़ी के दबाव में, सेवक होते हैं, परन्तु मंच की सीढ़ियों से उतरते ही सेवक नहीं रहते।
सच्चे सेवक सदा सेवक होते हैं। बहुत से प्रचारक उन रेत के खिलौनों के समान हैं जो हम अपने बच्चों के लिए ख़रीदते हैं; आप डिब्बे को उलट देते हैं, और छोटा नट घूमता और घूमता रहता है जब तक सारी रेत नीचे न बह जाए, और फिर वह निश्चल लटका रह जाता है; वैसे ही कुछ लोग हैं जो सत्य की सेवा में तब तक लगे रहते हैं जब तक उनके काम की कोई पदीय आवश्यकता होती है, परन्तु उसके बाद—वेतन नहीं तो प्रदर्शन नहीं; तनख़्वाह नहीं तो उपदेश नहीं।
असंगत सेवक होना एक भयानक बात है। कहा गया है कि हमारा प्रभु मूसा के समान इस कारण था कि वह “काम और वचन में सामर्थी भविष्यद्वक्ता” था। परमेश्वर के जन को इस बात में अपने स्वामी का अनुकरण करना चाहिए; उसे अपनी शिक्षा के वचन में और अपने उदाहरण के काम में, दोनों में सामर्थी होना चाहिए—और यदि सम्भव हो, तो दूसरे में सबसे अधिक सामर्थी। यह उल्लेखनीय है कि हमारे पास जो एकमात्र कलीसियाई इतिहास है, वह है “प्रेरितों के काम।” पवित्र आत्मा ने उनके उपदेशों को सुरक्षित नहीं रखा। वे बहुत अच्छे उपदेश थे, उनसे अच्छे जो हम कभी प्रचार करेंगे, परन्तु फिर भी पवित्र आत्मा ने केवल उनके “कामों” को लिखे जाने की ही चिन्ता की है। हमारे पास प्रेरितों के प्रस्तावों की कोई पुस्तकें नहीं हैं।
जब हम अपनी कलीसिया की सभाएँ करते हैं, तो हम अपनी कार्यवाही और प्रस्ताव लिखते हैं, परन्तु पवित्र आत्मा केवल “कामों” को ही लिखता है। हमारे काम ऐसे होने चाहिए कि वे लिखे जाने योग्य हों, क्योंकि वे लिखे अवश्य जाएँगे। हमें ऐसे जीना चाहिए मानो हम परमेश्वर की अधिक प्रत्यक्ष दृष्टि के नीचे हैं, और मानो उस महान, सब कुछ प्रगट करनेवाले दिन के प्रकाश में हैं।
सेवक में पवित्रता एक साथ उसकी मुख्य आवश्यकता और उसका सबसे सुन्दर आभूषण है। केवल नैतिक उत्कृष्टता पर्याप्त नहीं, उच्चतर सद्गुण होना चाहिए; संगत चरित्र अवश्य होना चाहिए, परन्तु उसका पवित्र अभिषेक करनेवाले तेल से अभिषेक होना चाहिए, नहीं तो वह वस्तु जो हमें परमेश्वर और मनुष्य के लिए सबसे अधिक सुगन्धित बनाती है, हममें न होगी।
पुराने जॉन स्टॉटन अपने “प्रचारक की गरिमा और कर्तव्य” नामक ग्रन्थ में सेवक की पवित्रता पर भारी अर्थ से भरे वाक्यों में ज़ोर देते हैं। “यदि उज्जा को केवल परमेश्वर के सन्दूक को छूने के कारण, और वह भी उसे थामने के लिए जब वह गिरने पर था, मरना पड़ा; यदि बेतशेमेश के लोगों को उसके भीतर झाँकने के कारण; यदि उन पशुओं तक को भी, जो केवल पवित्र पर्वत के निकट आते थे, धमकी दी गई—तो उन्हें कैसे लोग होना चाहिए जिन्हें परमेश्वर से निकटता से बात करने, स्वर्गदूतों के समान ‘उसके सामने खड़े रहने,’ और ‘निरन्तर उसका मुख देखने;’ ‘सन्दूक को अपने कन्धों पर उठाने,’ ‘अन्यजातियों के सामने उसका नाम ले जाने;’ एक शब्द में, उसके राजदूत होने के लिए प्रवेश दिया जाएगा? ‘हे यहोवा, तेरे भवन को पवित्रता ही शोभा देती है;’ और क्या यह कल्पना करना हास्यास्पद न होगा कि पात्र पवित्र हों, वस्त्र पवित्र हों, सब कुछ पवित्र हो, परन्तु केवल वही, जिसके वस्त्रों पर ही ‘यहोवा के लिए पवित्र’ लिखा होना चाहिए, अपवित्र रह सकता हो; कि जकर्याह में घोड़ों की घण्टियों पर भी पवित्रता का लेख हो, और संतों की घण्टियाँ, हारून की घण्टियाँ, अपवित्र हों? नहीं, उन्हें ‘जलते और चमकते हुए दीपक’ होना चाहिए, नहीं तो उनका प्रभाव कोई घातक गुण छोड़ेगा। उन्हें ‘पागुर करनेवाले और चिरे खुर वाले’ होना चाहिए, नहीं तो वे अशुद्ध हैं। उन्हें ‘वचन को ठीक रीति से बाँटना’ चाहिए, और अपने जीवन में सीधाई से चलना चाहिए, और इस प्रकार जीवन को विद्या से जोड़ना चाहिए। यदि पवित्रता की कमी हो, तो राजदूत उस देश का, जहाँ से वे आते हैं, और उस राजकुमार का, जिसकी ओर से वे आते हैं, अनादर करते हैं; और यह मरा हुआ अमासा, यह मरा हुआ सिद्धान्त जो अच्छे जीवन से जीवित नहीं किया गया, मार्ग में पड़ा हुआ, प्रभु के लोगों को रोक देता है, जिससे वे अपने आत्मिक युद्ध में आनन्द से आगे नहीं बढ़ सकते।”
प्रचारक का जीवन एक चुम्बक होना चाहिए जो मनुष्यों को मसीह की ओर खींचे, और यह सचमुच दुःख की बात है जब वह उन्हें उससे दूर रखता है। सेवकों में पवित्रता पापियों के लिए पश्चाताप करने की ऊँची पुकार है, और जब वह पवित्र प्रसन्नता के साथ जुड़ जाती है, तो वह अद्भुत रूप से आकर्षक बन जाती है।
यदि हाथ एसाव के हाथ हों, तो याकूब की आवाज़ से बहुत कम भलाई होगी। व्यवस्था में, कोई भी व्यक्ति जिसमें कोई दोष हो, प्रभु की भेंटें चढ़ाने न पाता था (लैव्यव्यवस्था 21:17-20); इसके द्वारा प्रभु हमें सिखाता है कि उसके सेवकों में कौन-कौन से अनुग्रह के गुण होने चाहिए। याजक के वस्त्रों में घण्टियाँ और अनार होने थे; एक खरे सिद्धान्त का प्रतीक, और दूसरा फलदायक जीवन का। निर्गमन 28:33, 34। प्रभु उन सब में पवित्र ठहरेगा जो उसके निकट आते हैं (यशायाह 52:11); क्योंकि याजकों के पाप लोगों को प्रभु की भेंट से घृणा करवाते हैं (1 शमूएल 2:17); उनके दुष्ट जीवन उनके सिद्धान्त को लज्जित करते हैं। अपने सिद्धान्त से वे बनाते हैं, और अपने जीवन से ढा देते हैं।
“तुम्हारे काम तुम्हारे सिद्धान्त को लज्जित न करें, ऐसा न हो कि जो लोग कलीसिया में तुम्हें सुनते हैं, वे मन ही मन उत्तर दें, जो तुम दूसरों को सिखाते हो, वह स्वयं क्यों नहीं करते? वह बड़ा ही नाज़ुक शिक्षक है जो भरे पेट से दूसरों को उपवास करने के लिए मनाता है। एक डाकू भी लोभ पर दोष लगा सकता है। मसीह के सेवक की जीभ, उसका हृदय और उसका हाथ आपस में मेल खाने चाहिए।”
“बहुत से ऐसे हैं जो अच्छा सिखाते हैं और बुरा करते हैं। स्वर्ग उनकी जीभ की नोक पर रहता है—फिर भी पृथ्वी उनकी उँगलियों की पोरों पर रहती है। वे अपने हाथों से झूठी धर्मविद्या बोलते हैं; ऐसे लोग जो अपने प्रचार के अनुसार नहीं जीते। परन्तु जो स्वर्ग में विराजमान है, वह उन पर हँसेगा और उन्हें ठट्ठों में उड़ाएगा, और यदि वे अपना अभिनय न सुधारें, तो उन्हें सीटी बजाकर मंच से उतार देगा।”
छोटी-छोटी बातों में भी सेवक को ध्यान रखना चाहिए कि उसका जीवन उसकी सेवकाई से मेल खाए। उसे विशेष रूप से सावधान रहना चाहिए कि वह कभी अपने वचन से पीछे न हटे। इसमें अति-सावधानी की सीमा तक जाना चाहिए; हम कभी अधिक सावधान नहीं हो सकते; सत्य केवल हमारे भीतर ही न हो, बल्कि हममें से चमके भी।
लंदन के एक प्रसिद्ध धर्मविज्ञान के डॉक्टर ने, जो अब स्वर्ग में हैं, एक रविवार को घोषणा की कि वे अपने सब लोगों से भेंट करने का इरादा रखते हैं, और कहा कि वर्ष में एक बार सब के यहाँ पहुँच पाने और उनसे और उनके परिवारों से मिलने के लिए, वे सब आसन-धारकों (सीट-होल्डरों) के पास क्रम से जाएँगे। मेरा एक भली-भाँति परिचित व्यक्ति, जो उस समय एक निर्धन मनुष्य था, इस विचार से बहुत प्रसन्न हुआ कि सेवक उससे मिलने उसके घर आनेवाले हैं; और जब उसके अनुमान से उसकी बारी आने में लगभग एक-दो सप्ताह रह गए, तो उसकी पत्नी बड़ी सावधानी से चूल्हे के आसपास झाड़ू लगाती और घर को साफ़-सुथरा रखती, और वह मनुष्य हर रात यह आशा करते हुए कि सेवक को वहाँ पाएगा, काम से जल्दी घर दौड़ आता। यह काफ़ी समय तक चलता रहा। वे या तो अपनी प्रतिज्ञा भूल गए, या उसे पूरा करते-करते थक गए, या किसी और कारण से वे इस निर्धन मनुष्य के घर कभी नहीं गए। परिणाम यह हुआ कि उस मनुष्य का सब प्रचारकों पर से भरोसा उठ गया, और उसने कहा, “उन्हें धनवानों की चिन्ता है, परन्तु हम निर्धनों की उन्हें चिन्ता नहीं।” वह मनुष्य बहुत वर्षों तक किसी एक आराधना-स्थान पर स्थिर नहीं हुआ, जब तक कि अन्त में वह एक्सेटर हॉल में नहीं आ पहुँचा, और वर्षों तक मेरा श्रोता बना रहा, जब तक कि परमेश्वर के विधान ने उसे उठा न लिया। उसे यह विश्वास दिलाना कोई छोटा काम न था कि कोई सेवक भी ईमानदार मनुष्य हो सकता है, और धनवान और निर्धन दोनों से निष्पक्ष होकर प्रेम कर सकता है। आइए, हम अपने वचन के विषय में बहुत सावधान रहकर ऐसी हानि करने से बचें।
हमें स्मरण रखना चाहिए कि हम पर बहुत अधिक दृष्टि लगी रहती है। लोगों में अपने साथियों की खुली आँखों के सामने व्यवस्था तोड़ने का दुस्साहस कठिनाई से ही होता है—फिर भी हम तो जनता की आँखों के सामने ही जीते और चलते-फिरते हैं। हज़ारों गरुड़ जैसी आँखें हम पर नज़र रखती हैं! आइए, हम ऐसा आचरण करें कि यदि सारा स्वर्ग, और पृथ्वी, और नरक भी दर्शकों की सूची में जुड़ जाएँ, तो भी हमें कभी चिन्ता करने की आवश्यकता न हो। यदि हम अपने जीवन में आत्मा के फल प्रगट करने के योग्य बनाए जाएँ, तो हमारा सार्वजनिक पद एक बड़ा लाभ है; भाइयो, सावधान रहिए कि आप इस लाभ को फेंक न दें।
मेरे प्रिय भाइयो, जब हम आपसे कहते हैं कि अपने जीवन का ध्यान रखिए, तो हमारा अर्थ यह है कि अपने चरित्र की छोटी से छोटी बातों के विषय में भी सावधान रहिए। छोटे-छोटे कर्ज़ों, समय की पाबन्दी न रखने, गपशप, दूसरों को चिढ़ानेवाले नाम रखने, छोटे-मोटे झगड़ों, और उन अन्य सब छोटे दुर्गुणों से बचिए जो सुगन्धित तेल को मक्खियों से भर देते हैं। जिन आत्म-भोगों ने बहुतों की प्रतिष्ठा को गिरा दिया है, उन्हें हमें सहन नहीं करना चाहिए। जिन घनिष्ठताओं ने दूसरों को सन्देह के घेरे में डाल दिया है, उनसे हमें शुद्धता के साथ बचना चाहिए। जिस रूखेपन ने कुछ लोगों को घृणित बना दिया है, और जिन बनावटी शौक़ीनियों ने दूसरों को तुच्छ बना दिया है, उन्हें हमें दूर कर देना चाहिए। हम छोटी बातों के कारण बड़े जोखिम उठाने का साहस नहीं कर सकते। हमारी चिन्ता इस नियम पर चलने की होनी चाहिए, “हम किसी बात में ठोकर खाने का कोई भी अवसर नहीं देते, कि हमारी सेवा पर कोई दोष न आए।”
इसका अर्थ यह नहीं है कि हम अपने आपको उस समाज की हर सनक या फ़ैशन से बँधा हुआ मानें जिसमें हम उठते-बैठते हैं। सामान्य नियम के रूप में, मैं समाज के फ़ैशनों से घृणा करता हूँ, और रूढ़ियों से चिढ़ता हूँ, और यदि मैं शिष्टाचार के किसी नियम को पाँव तले तोड़ देना सबसे अच्छा समझूँ, तो ऐसा करने में मुझे प्रसन्नता होगी। नहीं, हम मनुष्य हैं, दास नहीं; और हमें अपनी पुरुषोचित स्वतंत्रता को छोड़कर उन लोगों के चाकर नहीं बनना है जो भद्रता का दिखावा करते हैं या परिष्कार का घमण्ड करते हैं। फिर भी, भाइयो, जो कुछ भी उस अशिष्टता के निकट पहुँचता है जो पाप से सम्बन्धित है, उससे हमें वैसे ही दूर रहना चाहिए जैसे हम साँप से दूर रहते हैं। चेस्टरफ़ील्ड के नियम हमारे लिए हास्यास्पद हैं, परन्तु मसीह का उदाहरण नहीं; और वह कभी भी अशिष्ट, नीच, असभ्य या अभद्र नहीं था।
अपने मनोरंजन में भी स्मरण रखिए कि आप सेवक हैं। जब आप परेड से बाहर होते हैं, तब भी आप मसीह की सेना के अधिकारी हैं, और इसलिए उसी के अनुसार आचरण कीजिए।
परन्तु यदि छोटी बातों पर ध्यान देना आवश्यक है, तो नैतिकता, ईमानदारी और खराई की बड़ी बातों में आपको कितना सावधान रहना चाहिए! यहाँ सेवक को चूकना नहीं चाहिए। उसका निजी जीवन सदा उसकी सेवकाई के साथ अच्छे सुर में रहना चाहिए, नहीं तो उसका दिन शीघ्र ही ढल जाएगा, और वह जितनी जल्दी पद छोड़ दे उतना अच्छा, क्योंकि उसका अपने पद पर बने रहना केवल परमेश्वर के काम का अनादर करेगा और स्वयं उसका विनाश करेगा।
