व्याख्यान 8 (13 में से) · पहली शृंखला · 1875

आवाज़ के विषय में

चार्ल्स एच. स्पर्जन · पास्टर्स कॉलेज, मेट्रोपॉलिटन टैबरनेकल

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    यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

    आवाज़ के विषय में

    आवाज़ के सम्बन्ध में हमारा पहला नियम यह होगा—इसके विषय में बहुत अधिक मत सोचिए, क्योंकि याद रखिए, सबसे मधुर आवाज़ भी, यदि कहने को कुछ न हो, तो कुछ भी नहीं है; और उसे चाहे कितनी भी अच्छी तरह साधा जाए, जब तक आप उसके द्वारा अपने लोगों तक महत्वपूर्ण और समयोचित सत्य नहीं पहुँचाते, तब तक वह उस गाड़ी के समान होगी जो बड़ी अच्छी तरह हाँकी जा रही है परन्तु जिसमें कुछ भी लदा नहीं है।

    डेमोस्थनीज़ ने अच्छी वक्तृता-शैली को पहला, दूसरा और तीसरा स्थान देकर निःसन्देह ठीक ही किया; परन्तु यदि मनुष्य के पास सुनाने को कुछ है ही नहीं, तो उसका क्या मूल्य होगा? जिस मनुष्य की आवाज़ अत्यन्त उत्तम हो, परन्तु जो सुशिक्षित मस्तिष्क और उत्साही हृदय से रहित हो, वह “जंगल में पुकारनेवाले का शब्द” ही होगा। ऐसा मनुष्य गायक-मण्डली में चमक सकता है, परन्तु मंच (पल्पिट) पर वह निकम्मा है। ह्वाइटफ़ील्ड की आवाज़, उसके हृदय की शक्ति के बिना, अपने श्रोताओं पर पगानिनी के वायलिन से अधिक स्थायी प्रभाव न छोड़ती।

    आप गायक नहीं, प्रचारक हैं: आपकी आवाज़ तो एक गौण विषय है; उसे लेकर छैला मत बनिए, जैसे बहुत से बन जाते हैं। तुरही का चाँदी की बनी होना आवश्यक नहीं, मेढ़े के सींग का नरसिंगा भी काम दे जाएगा; परन्तु उसमें कठोर बर्ताव सहने की क्षमता अवश्य होनी चाहिए, क्योंकि तुरहियाँ युद्ध के संघर्षों के लिए होती हैं, फ़ैशन के बैठकख़ानों के लिए नहीं।

    दूसरी ओर, अपनी आवाज़ को बहुत तुच्छ भी मत समझिए, क्योंकि उसकी उत्तमता उस परिणाम को उत्पन्न करने में बहुत सहायक हो सकती है जिसकी आप आशा रखते हैं। प्लेटो ने वाक्पटुता की शक्ति को स्वीकार करते हुए वक्ता के स्वर का उल्लेख किया है। वह कहता है, “वक्ता का भाषण और उसका स्वर मेरे कानों में इतनी प्रबलता से गूँजता रहता है कि तीसरे या चौथे दिन जाकर कहीं मैं सँभल पाता हूँ और समझ पाता हूँ कि मैं पृथ्वी पर कहाँ हूँ; और कुछ समय तक तो मैं यह मानने को तैयार रहता हूँ कि मैं धन्य लोगों के द्वीपों में रह रहा हूँ।”

    अत्यन्त बहुमूल्य सत्य भी एकसुरे स्वर में सुनाए जाने से बहुत बिगड़ सकते हैं। मैंने एक बार सुना कि एक अत्यन्त आदरणीय सेवक की, जो बुरी तरह बुदबुदाता था, तुलना “घड़े में बन्द भौंरे” से की गई—निःसन्देह एक भद्दा रूपक, परन्तु इतना सटीक वर्णन करनेवाला कि इस क्षण भी वह भिनभिनाती ध्वनि मुझे बिलकुल स्पष्ट याद आ जाती है, और मुझे ग्रे की ‘एलेजी’ की उस पैरोडी का स्मरण कराती है:

    “अब टिमटिमाता विषय दृष्टि से ओझल हो रहा है, और सारी हवा में एक उनींदी निस्तब्धता छाई है, सिवाय वहाँ के जहाँ पादरी अपनी भिनभिनाती उड़ान गुनगुनाता है, और ऊँघती टुनटुनाहटें सोती हुई भेड़शालाओं को लोरी सुनाती हैं।”

    कैसे दुःख की बात है कि जो मनुष्य अपने हृदय से निःसन्देह मूल्यवान सिद्धान्तों को अत्यन्त उपयुक्त भाषा में सुनाता था, वह एक ही तार छेड़ते रहकर सेवकाई की आत्महत्या कर बैठे, जबकि प्रभु ने उसे बजाने के लिए अनेक तारोंवाला बाजा दिया था! हाय! हाय! उस नीरस आवाज़ पर! वह पनचक्की के पहिये के समान एक ही बेसुरी धुन पर गुनगुनाती और गुनगुनाती रहती थी—चाहे उसका स्वामी स्वर्ग की बात करे या नरक की, अनन्त जीवन की या अनन्त क्रोध की। संयोग से, वाक्य की लम्बाई के अनुसार, वह कभी थोड़ी ऊँची या थोड़ी धीमी हो जाती, परन्तु उसका स्वर फिर भी वही रहता—ध्वनि का एक नीरस उजाड़, वाणी की एक सुनसान और गरजती हुई मरुभूमि, जिसमें कोई राहत सम्भव न थी, कोई विविधता नहीं, कोई संगीत नहीं, भयानक एकरूपता के सिवा कुछ नहीं।

    जब हवा ईओलियन वीणा में से होकर बहती है, तो वह उसके सब तारों में से गूँजती हुई उठती है; परन्तु स्वर्गीय पवन कुछ मनुष्यों में से होकर गुज़रते समय अपना सारा बल एक ही तार पर खर्च कर देती है, और वह भी अधिकतर पूरे बाजे का सबसे बेसुरा तार होता है। कुछ धर्मोपदेशकों की ढम—ढम—ढम के नीचे बैठकर श्रोता केवल अनुग्रह ही के सहारे उन्नति पा सकते हैं। मेरे विचार में, ऐसे बहुत से मामलों में, जहाँ प्रचारक से निकलनेवाली ध्वनि अपने बार-बार दोहराए गए सुर से लोरी देकर सुला देती है, एक निष्पक्ष जूरी “न्यायसंगत कारण से ऊँघने” का फ़ैसला सुनाएगी।

    डॉ. गथरी उदारता दिखाते हुए एक स्कॉटिश मण्डली की नींद का कारण सभा-भवन में हवा के ठीक आवागमन न होने को बताते हैं; इसका भी कुछ हाथ है, परन्तु प्रचारक के गले के वाल्वों की बुरी दशा इससे भी अधिक प्रबल कारण हो सकती है। भाइयो, जो कुछ भी पवित्र है उसके नाम पर, अपनी मीनार की सारी घण्टियाँ बजाइए, और एक बेचारी फटी हुई घण्टी की टन-टन से अपने लोगों के कान मत पकाइए।

    जब आप आवाज़ पर ध्यान दें, तो सावधान रहिए कि आज के समय के अभ्यस्त और आम बनावटीपन में न पड़ जाएँ। मंच पर बारह में से मुश्किल से एक मनुष्य मनुष्य की तरह बोलता है। यह बनावटीपन केवल प्रोटेस्टेंटों तक ही सीमित नहीं है, क्योंकि एक लेखक कहता है, “और सब जगह मनुष्य बोलते हैं: वे अदालत में और सभा-मंच (ट्रिब्यून) पर बोलते हैं; परन्तु पल्पिट पर वे अब बोलते नहीं, क्योंकि वहाँ हमें केवल एक गढ़ी हुई और कृत्रिम भाषा, और एक झूठा स्वर ही मिलता है। बोलने की यह शैली केवल कलीसिया में ही सहन की जाती है, क्योंकि दुर्भाग्य से वहाँ यह इतनी आम है; और कहीं यह सहन न की जाती। उस मनुष्य के विषय में क्या सोचा जाएगा जो किसी बैठक में इसी प्रकार बातचीत करे? वह निश्चय ही बहुतों को मुस्कुराने पर विवश कर देगा।

    कुछ समय पहले पैन्थियन में एक रखवाला था—अपने ढंग का एक भला आदमी—जो उस स्मारक की सुन्दरताओं का वर्णन करते हुए ठीक वही स्वर अपनाता था जो हमारे बहुत से प्रचारकों का होता है, और इसके द्वारा वह दर्शकों की हँसी जगाने से कभी नहीं चूकता था; वे उसकी बोलने की शैली से उतने ही आनन्दित होते थे जितने उन दर्शनीय वस्तुओं से जो वह उन्हें दिखाता था।

    जिस मनुष्य की प्रस्तुति स्वाभाविक और सच्ची नहीं है, उसे मंच पर खड़े होने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए; कम से कम वहाँ से तो हर झूठी बात तुरन्त निकाल बाहर की जानी चाहिए। अविश्वास के इन दिनों में हर झूठी बात को अलग कर देना चाहिए; और उपदेश देने के विषय में, इस सम्बन्ध में अपने आप को सुधारने का सबसे अच्छा उपाय यह है कि बार-बार कुछ एकसुरे और उग्र प्रचारकों को सुना जाए। हम ऐसी घृणा के साथ, और उनकी प्रस्तुति से ऐसी दहशत लेकर लौटेंगे कि उनकी नकल करने के बजाय हम अपने आप को मौन रहने का दण्ड देना अधिक पसन्द करेंगे। जिस क्षण आप स्वाभाविक और सच्चे को छोड़ देते हैं, उसी क्षण आप विश्वास किए जाने का अधिकार भी खो देते हैं, और सुने जाने का अधिकार भी।”

    आप चारों ओर घूम लीजिए, गिरजे और चैपल दोनों में, और आप पाएँगे कि हमारे प्रचारकों में से कहीं अधिक बड़ी संख्या के पास रविवारों के लिए एक “पवित्र स्वर” होता है। बैठक और ड्राइंग-रूम के लिए उनकी एक आवाज़ होती है, और मंच के लिए बिलकुल दूसरा स्वर; इस प्रकार, यदि वे पापमय अर्थ में दोरंगी जीभवाले नहीं, तो शाब्दिक अर्थ में तो निश्चय ही हैं। कुछ मनुष्य जैसे ही मंच का दरवाज़ा बन्द करते हैं, अपना व्यक्तिगत पुरुषत्व पीछे छोड़ देते हैं, और पल्ली के बीडल (चोबदार) के समान सरकारी-से बन जाते हैं। वहाँ वे लगभग उस फरीसी के साथ घमण्ड कर सकते हैं कि वे और मनुष्यों के समान नहीं हैं, यद्यपि इसके लिए परमेश्वर का धन्यवाद करना परमेश्वर की निन्दा होगी। अब वे शारीरिक नहीं रहते और न मनुष्यों की रीति पर बोलते हैं, बल्कि एक रिरियाहट, एक टूटी-फूटी “हूँ-हाँ”, एक ore rotundo, या शोर मचाने का कोई और भद्दा ढंग अपना लिया जाता है, ताकि कोई सन्देह तक न कर सके कि वे स्वाभाविक हैं और मन की भरपूरी से बोल रहे हैं। जब सेवकाई का वह चोगा एक बार पहन लिया जाता है, तो कितनी बार वह मनुष्य के सच्चे स्वरूप का कफ़न, और पद-औपचारिकता का स्त्रैण चिह्न सिद्ध होता है!

    बोलने के दो-तीन ढंग हैं जिनके विषय में मैं कह सकता हूँ कि आप उन्हें पहचान लेंगे, क्योंकि आपने उन्हें बार-बार सुना है। वह गरिमामय, डॉक्टरी, फूला हुआ, आडम्बरपूर्ण ढंग, जिसे मैंने अभी ore rotundo कहा, अब उतना आम नहीं जितना पहले हुआ करता था, परन्तु कुछ लोग अब भी उसकी प्रशंसा करते हैं। जब एक बार एक रेवरेंड सज्जन इसी प्रकार भाप छोड़ रहे थे, तो गलियारे में खड़े एक आदमी ने कहा कि उसके विचार में प्रचारक ने “एक डम्पलिंग (आटे का गोला) निगल लिया है,” परन्तु दूसरे ने फुसफुसाकर कहा, “ना, जैक, उसने ऊ को निगला ना है; ऊ तो उसके मुँह में ही डगमगा रहा है।” मैं कल्पना कर सकता हूँ कि डॉ. जॉनसन बोल्ट कोर्ट में उसी ढंग से बात करते होंगे; और जिन मनुष्यों के लिए यह स्वाभाविक है, उनके मुँह से यह ओलिम्पियन भव्यता के साथ लुढ़कता है; परन्तु मंच पर इसकी हर नकल सदा के लिए दूर हो; यदि यह स्वाभाविक रूप से आता है, तो ठीक है, परन्तु इसकी नकल करना साधारण शालीनता से विश्वासघात है; वास्तव में, मंच पर हर प्रकार की नकल अक्षम्य पाप की निकट सम्बन्धी है।

    एक और शैली है, जिस पर मैं आपसे विनती करता हूँ कि आप हँसें नहीं। उच्चारण का यह ढंग बहुत “नज़ाकत भरा” कहा जाता है—इठलाता हुआ, कोमल, नौकरानी-सा, सुस्त, डंड्रियरी-सा; मैं नहीं जानता इसका और किस प्रकार वर्णन करूँ। हम में से अधिकांश को इनको, या बनावटी पतली आवाज़ों, ऊँची बैसाखियों और दिखावों की उस विस्तृत जाति के कुछ अन्य सदस्यों को, सुनने का सौभाग्य मिला है। मैंने अनेक भिन्न-भिन्न किस्में सुनी हैं, जॉनसनी शैली की भरपूरी से लेकर शिष्ट फुसफुसाहट के पतलेपन तक; बाशान के साँड़ों की गर्जन से लेकर चैफ़िंच चिड़िया की चिप, चिप, चिप तक।

    समझ लीजिए कि जहाँ ये भयानक ध्वनियाँ भी स्वाभाविक हैं, वहाँ मैं उनकी निन्दा नहीं करता—हर प्राणी अपनी ही बोली बोले; परन्तु सच्चाई यह है कि दस में से नौ बार ये पवित्र लहजे—जो, मैं आशा करता हूँ, शीघ्र ही मृत भाषाएँ बन जाएँगे—अस्वाभाविक और खिंचे हुए होते हैं। मुझे पूरा निश्चय है कि ये स्वर और अर्धस्वर और एकस्वर बाबुली हैं, वे यरूशलेम की बोली बिलकुल नहीं हैं; क्योंकि यरूशलेम की बोली का एक विशिष्ट चिह्न यह है कि वह मनुष्य का अपना बोलने का ढंग होती है, और मंच के बाहर भी वैसी ही होती है जैसी मंच पर।

    बनावटी ore rotundo सम्प्रदाय के हमारे मित्र को कभी मंच के बाहर उस प्रकार बात करते नहीं सुना गया जैसे वह मंच पर करता है, और न बैठक में उस स्वर में कुछ कहते सुना गया जिसका प्रयोग वह मंच पर करता है। यदि वह ऐसा करता तो अपने आप को हास्यास्पद बना लेता; परन्तु मंच को उसकी आवाज़ का वह मैल भेंट किया जाना है, जिसे बैठक सहन न करती।

    मेरा दृढ़ मत है कि मनुष्य की आवाज़ जो सबसे अच्छे सुर निकाल सकती है, वे सुसमाचार के प्रचार को दिए जाने चाहिए, और वे ऐसे सुर हैं जिनका प्रयोग करना प्रकृति उसे गम्भीर बातचीत में सिखाती है। यहेजकेल ने अपने स्वामी की सेवा अपनी सबसे संगीतमय और मधुर शक्तियों से की, यहाँ तक कि प्रभु ने कहा, “तू उनकी दृष्टि में प्रेम के मधुर गीत गानेवाले और अच्छे बजानेवाले का सा ठहरा है।” यद्यपि, हाय! इससे इस्राएल के कठोर हृदय को कोई लाभ न हुआ, जैसे परमेश्वर के आत्मा के सिवा किसी भी वस्तु से न होगा—तौभी भविष्यद्वक्ता के लिए यह उचित ही था कि वह प्रभु के वचन को आवाज़ और ढंग की सर्वोत्तम शैली में सुनाए।

    इसके बाद, यदि आपकी बोली में कुछ ऐसी विचित्रताएँ हैं जो कान को अप्रिय लगती हैं, तो यदि सम्भव हो तो उन्हें सुधारिए। यह माना जाता है कि शिक्षक के लिए इसका उपदेश देना आपके लिए इसका अभ्यास करने से कहीं अधिक सरल है। फिर भी अपनी सेवकाई के प्रभात में खड़े जवानों के लिए यह कठिनाई अजेय नहीं है। देहात से आए भाइयों के मुँह में उनके ग्रामीण भोजन का स्वाद रहता है, जो हमें बरबस एसेक्स के बछड़ों, बर्कशायर के सूअरों, या सफ़ोक के ठिगने मवेशियों की याद दिला देता है। यॉर्कशायर या समरसेटशायर की बोलियों को कौन नहीं पहचान लेगा, जो केवल प्रान्तीय उच्चारण ही नहीं, बल्कि विशेष स्वर भी हैं? इसका कारण ढूँढ़ना कठिन होगा, परन्तु तथ्य पर्याप्त स्पष्ट है कि इंग्लैंड की कुछ काउंटियों में मनुष्यों के गले बहुत दिनों तक प्रयोग की गई केतलियों के समान पपड़ी जमकर भर गए लगते हैं, और दूसरी काउंटियों में वे पीतल के बाजे के समान, एक दुष्ट धात्विक ध्वनि के साथ, झनझनाते हैं। प्रकृति की ये विविधताएँ अपने समय और स्थान पर सुन्दर हो सकती हैं, परन्तु मेरी रुचि कभी उनकी सराहना नहीं कर पाई।

    जंग लगी कैंची जैसी तीखी, बेसुरी चीं-चीं से हर हाल में छुटकारा पाना चाहिए; इसी प्रकार उस मोटी, अस्पष्ट बोली से भी जिसमें कोई शब्द पूरा नहीं होता, बल्कि संज्ञाएँ, विशेषण और क्रियाएँ मिलकर एक प्रकार की खिचड़ी बन जाती हैं। उतनी ही आपत्तिजनक वह भुतहा बोली है जिसमें मनुष्य होंठ हिलाए बिना बोलता है, अत्यन्त भयानक ढंग से पेट से बोलनेवाले की तरह; क़ब्र जैसे स्वर किसी मनुष्य को मुर्दे दफ़नानेवाला बनने के योग्य बना सकते हैं, परन्तु लाज़र खोखली कराहों से क़ब्र में से बाहर नहीं बुलाया जाता।

    अपने आप को मार डालने के सबसे निश्चित उपायों में से एक है मुँह के बजाय गले से बोलना। प्रकृति के इस दुरुपयोग का बदला वह भयानक रीति से लेगी; अपराध से बचकर दण्ड से बच जाइए।

    यहाँ आपसे यह आग्रह करना उचित होगा कि जैसे ही आप पकड़ें कि आप अपने भाषण में बहुतायत से “हूँ-हाँ” डाल रहे हैं, तो इस चुपके से घर कर लेनेवाली परन्तु विनाशकारी आदत से तुरन्त अपने आप को शुद्ध कर लें। इसकी बिलकुल कोई आवश्यकता नहीं; और यद्यपि जो अब इसके शिकार हैं वे शायद कभी यह ज़ंजीर न तोड़ पाएँ—आप, जो वक्तृता में नौसिखिए हैं, इस कष्टदायक जूए को पहनने से घृणा करें।

    यह कहना भी आवश्यक है कि बोलते समय अपना मुँह खोलिए, क्योंकि बहुत-सी अस्पष्ट बुदबुदाहट मुँह को आधा बन्द रखने का परिणाम होती है। सुसमाचार-लेखकों ने व्यर्थ ही हमारे प्रभु के विषय में यह नहीं लिखा, “वह अपना मुँह खोलकर उन्हें उपदेश देने लगा।” जिन द्वारों से ऐसा उत्तम सत्य बाहर निकलकर आगे बढ़ना है, उन्हें पूरा खोल दीजिए।

    इसके अतिरिक्त, भाइयो, नाक को बोलने के अंग के रूप में प्रयोग करने से बचिए, क्योंकि सर्वोत्तम विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि वह सूँघने के लिए बनाई गई है। एक समय था जब नाक से निकलनेवाली नकियाहट ही ठीक चीज़ मानी जाती थी, परन्तु इस पतित युग में आपके लिए अच्छा यही है कि आप प्रकृति के स्पष्ट संकेत को मानें, और घ्राण-यन्त्र के हस्तक्षेप के बिना मुँह को अपना काम करने दें।

    यदि कोई अमेरिकी विद्यार्थी उपस्थित हो तो वह मुझे क्षमा करे कि मैं यह बात ज़ोर देकर उसके ध्यान में ला रहा हूँ। कुछ लोगों की उस आदत से घृणा कीजिए जो “र” अक्षर का उच्चारण करते ही नहीं; ऐसी आदत “बहुत खवाब औव बेतुकी, बहुत बुवी औव धिक्कावने योग्य” है।

    कभी-कभी किसी भाई को अत्यन्त मनमोहक और स्वादिष्ट तुतलाहट का सौभाग्य प्राप्त होता है। जहाँ वह भाई स्वयं छोटा और मनमोहक हो, वहाँ शायद यह बुराइयों में सबसे छोटी है, परन्तु जो कोई पुरुषत्व और बल को अपना लक्ष्य बनाता है, उसे यह नष्ट कर देगी। मैं शायद ही कल्पना कर सकता हूँ कि एलिय्याह अहाब से तुतलाकर बोले, या पौलुस मार्स की पहाड़ी पर अपने शब्दों को सुन्दरता से कतर-कतरकर बोले।

    कमज़ोर और डबडबाई आँख में, और लड़खड़ाती शैली में, एक विशेष करुणा हो सकती है; हम और आगे बढ़कर यह भी मान लेंगे कि जहाँ ये तीव्र भावावेग का परिणाम होती हैं, वहाँ ये उदात्त होती हैं। परन्तु कुछ लोगों में ये जन्म से होती हैं, और वे इनका कुछ अधिक ही खुलकर प्रयोग करते हैं—कम से कम इतना तो कहना होगा कि आपके लिए इनकी नकल करना अनावश्यक है। जैसे शिक्षित प्रकृति आपको सुझाए वैसे बोलिए, और आप अच्छा करेंगे; परन्तु वह प्रकृति शिक्षित हो, कच्ची, अनगढ़, असंस्कृत प्रकृति नहीं।

    जैसा आप जानते हैं, डेमोस्थनीज़ ने अपनी आवाज़ के लिए असीम परिश्रम किया, और सिसरो ने, जो स्वभाव से कमज़ोर था, अपने बोलने के ढंग को सुधारने के लिए यूनान की लम्बी यात्रा की। हमारे विषय तो कहीं अधिक महान हैं; आइए, हम उत्कृष्टता प्राप्त करने में उनसे कम महत्वाकांक्षी न हों। नाज़ियानज़ुस के ग्रेगरी कहते हैं, “मुझसे और सब कुछ छीन लो, परन्तु वाक्पटुता मेरे पास रहने दो, और मैं उन यात्राओं पर कभी पछतावा न करूँगा जो मैंने उसका अध्ययन करने के लिए कीं।”

    सदा ऐसा बोलिए कि आपको सुना जा सके। मैं एक मनुष्य को जानता हूँ जिसका वज़न सोलह स्टोन है, और जिसकी आवाज़ आधे मील तक सुनाई देनी चाहिए, परन्तु वह इतना भद्दे ढंग से आलसी है कि उसके छोटे-से आराधना-स्थल में गैलरी के अगले भाग में भी आप उसे मुश्किल से सुन पाते हैं। ऐसे प्रचारक का क्या लाभ जिसे लोग सुन ही न सकें? नम्रता को चाहिए कि वह बिना आवाज़ वाले मनुष्य को प्रेरित करे कि वह उन दूसरों के लिए स्थान छोड़ दे जो राजा के सन्देशों का प्रचार करने के काम के लिए अधिक योग्य हैं। कुछ मनुष्य पर्याप्त ऊँचा तो बोलते हैं, परन्तु स्पष्ट नहीं; उनके शब्द एक-दूसरे पर चढ़ जाते हैं, मेंढक-कूद खेलते हैं, या एक-दूसरे को अड़ंगी मारकर गिरा देते हैं।

    स्पष्ट उच्चारण फेफड़ों की हवा के बल से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। शब्द को उचित अवसर दीजिए; अपने आवेश में उसकी कमर मत तोड़िए, या अपनी जल्दबाज़ी में उसे इतना मत दौड़ाइए कि उसके पाँव जवाब दे दें। यह सुनना घृणित लगता है कि कोई हट्टा-कट्टा आदमी बुदबुदाए और फुसफुसाए, जबकि उसके फेफड़े ऊँचे से ऊँचे भाषण के लिए पूरी तरह सबल हैं; परन्तु साथ ही, कोई मनुष्य चाहे कितने ही ज़ोर से चिल्लाए, जब तक वह अपने शब्दों को उचित अन्तराल के साथ आगे बढ़ाना न सीखे, तब तक वह ठीक से सुना नहीं जाएगा।

    बहुत धीरे बोलना दयनीय काम है, और फुर्तीले मनवाले श्रोताओं को उस रोग का शिकार बना देता है जिसे “बेचैनी के दौरे” कहते हैं। जो मनुष्य एक मील प्रति घण्टे की गति से रेंगता है, उसे सुनना असम्भव है। एक शब्द आज और एक कल—यह एक प्रकार की धीमी आँच है जिसका आनन्द केवल शहीद ही ले सकते थे।

    अत्यधिक तेज़ बोलना, दौड़ते-भागते और बकते हुए निरे प्रलाप में बदल जाना, उतना ही अक्षम्य है; यह शक्तिशाली नहीं है, और कभी हो भी नहीं सकता, सिवाय मूर्खों के बीच, क्योंकि यह उसे, जिसे शब्दों की एक सेना होना चाहिए, एक भीड़ बना देता है, और अर्थ को ध्वनि की बाढ़ों में पूरी तरह डुबो देता है। कभी-कभी कोई अस्पष्ट उच्चारणवाला क्रोधोन्मत्त वक्ता सुनाई देता है, जिसका आवेग उसे ध्वनियों के ऐसे गड़बड़झाले में दौड़ा ले जाता है कि थोड़ी दूरी से सुनने पर ल्यूकन की ये पंक्तियाँ याद आ जाती हैं:

    “उसकी बड़बड़ाती जीभ एक बुदबुदाते स्वर को उलझा देती है, जो बेसुरा है और मानवीय ध्वनियों से भिन्न; वह कुत्तों का भौंकना, भेड़ियों का हुँआना, आधी रात के उल्लू की दुःखभरी चीख़ जान पड़ता था; साँपों की फुफकार, भूखे सिंह की दहाड़, तट पर थपेड़े मारती लहरों का उछाल; पत्तों भरे वन में हवाओं की कराह, और फटते बादल से फूटती गर्जन! यह सब था, यह सब एक साथ।”

    जो भाई पसीने को प्रेरणा समझ बैठता है, उसे सुनना एक ऐसी यातना है जिसे दोबारा सहा नहीं जा सकता—वह उस जंगली घोड़े के समान सरपट दौड़ता है जिसके कान में ततैया घुस गया हो, जब तक कि उसका दम न टूट जाए और उसे अपने फेफड़ों में फिर से हवा भरने के लिए रुकना ही न पड़े; एक उपदेश में इस अशोभनीयता का कई बार दोहराया जाना असामान्य नहीं, परन्तु अत्यन्त कष्टदायक है। उस “हाँफ, हाँफ” को रोकने के लिए समय रहते ही रुक जाइए, जो हाथ में लिए विषय के प्रति सहानुभूति के बजाय बेदम वक्ता के प्रति दया ही उत्पन्न करता है।

    आपके श्रोताओं को यह पता ही नहीं चलना चाहिए कि आप साँस भी लेते हैं—श्वसन की प्रक्रिया लहू के संचार के समान अनदेखी रहनी चाहिए। साँस लेने की निरी पशु-क्रिया के कारण अपने भाषण में कोई रिक्त अन्तराल आने देना अशोभनीय है।

    साधारण उपदेश में नियमतः अपनी आवाज़ पर पूरा ज़ोर मत लगाइए। यहाँ उपस्थित दो या तीन उत्साही जन अनावश्यक चिल्लाहट से अपने आप को टुकड़े-टुकड़े कर रहे हैं; उनके बेचारे फेफड़ों में जलन रहती है, और उनका स्वरयन्त्र उस उग्र चिल्लाने से सूज गया है जिससे वे अपने आप को रोक नहीं पाते। अब “गला खोलकर पुकार, कुछ न रख छोड़” तो बहुत ठीक है, परन्तु “अपने आप को कुछ हानि न पहुँचा” प्रेरितीय सलाह है। जब लोग आपकी आधी आवाज़ से ही सुन सकते हैं, तो अच्छा है कि अतिरिक्त बल को उस समय के लिए बचा रखें जब उसकी आवश्यकता पड़े। “बर्बाद न करोगे तो कमी न होगी”—यह कहावत यहाँ भी उतनी ही लागू होती है जितनी और कहीं। ध्वनि के उस विशाल परिमाण के साथ थोड़ी किफ़ायत कीजिए। जब आप अपने श्रोताओं को हृदय-वेदना देना चाहते हैं, तब उन्हें सिर-दर्द मत दीजिए। आपका लक्ष्य उन्हें उनकी बेंचों पर सोने से रोकना है, परन्तु याद रखिए कि उनके कानों के परदे फाड़ देना आवश्यक नहीं। “यहोवा आँधी में नहीं है।” गर्जन बिजली नहीं है। मनुष्य उत्पन्न किए गए शोर के अनुपात में नहीं सुनते; वास्तव में, बहुत अधिक शोर कान को सुन्न कर देता है, अनुगूँज और प्रतिध्वनियाँ उत्पन्न करता है, और आपके उपदेशों की शक्ति को भारी हानि पहुँचाता है।

    अपनी आवाज़ को अपने श्रोताओं के अनुसार ढालिए; जब आपके सामने बीस हज़ार लोग हों, तो बाजे के सारे स्टॉप खोल दीजिए और पूरा नाद गुँजाइए, परन्तु ऐसे कमरे में नहीं जिसमें केवल बीस-चालीस लोग समा सकें। जब कभी मैं उपदेश देने के लिए किसी स्थान में प्रवेश करता हूँ, तो अनजाने में ही हिसाब लगा लेता हूँ कि उसे भरने के लिए कितनी ध्वनि चाहिए, और कुछ वाक्यों के बाद मेरा सुर निश्चित हो जाता है। यदि आप चैपल के अन्तिम छोर पर बैठे मनुष्य को सुना सकें, यदि आप देख सकें कि वह आपके विचार को पकड़ रहा है, तो आप निश्चित हो सकते हैं कि जो पास हैं वे आपको सुन सकते हैं, और अधिक बल की आवश्यकता नहीं; शायद थोड़ा कम भी काम दे जाए—ध्यान से देखिए। ऐसा क्यों बोलें कि सड़क पर सुनाई दे, जबकि वहाँ आपको सुननेवाला कोई है ही नहीं? चाहे भीतर हों या बाहर, ध्यान रखिए कि सबसे दूर बैठे श्रोता आपकी बात समझ सकें, और इतना पर्याप्त होगा।

    प्रसंगवश, मैं यह भी कह दूँ कि भाइयों को निर्बलों पर दया करके, बीमारों के कमरों में, और उन मण्डलियों में जहाँ कुछ लोगों के बहुत अशक्त होने की बात ज्ञात हो, अपनी आवाज़ के बल पर सदा सावधानी से ध्यान देना चाहिए। किसी बीमार मनुष्य के बिस्तर के पास बैठकर चिल्लाना कि “यहोवा मेरा चरवाहा है!”—यह निर्दयता है। यदि आप इतनी लापरवाही से व्यवहार करेंगे, तो आपके सीढ़ियाँ उतरते ही वह बेचारा कहेगा, “उफ़! मेरा सिर कैसा दुख रहा है। मैरी, अच्छा हुआ कि वह भला आदमी चला गया; वह बहुत ही बहुमूल्य भजन है और कितना शान्त-सा, पर उसने तो उसे बादल की गरज और बिजली की कड़क की तरह पढ़ा, और मुझे लगभग सुन्न ही कर दिया!” याद रखिए, आप जवान और अविवाहित भाइयो, कि रोगी के लिए चिल्लाहटों से अधिक कोमल फुसफुसाहटें उपयुक्त होंगी।

    अपनी आवाज़ के बल में विविधता लाने के नियम का सावधानी से पालन कीजिए। पुराना नियम यह था कि बहुत धीमे आरम्भ करो, धीरे-धीरे ऊँचे उठो, और अपने सबसे ऊँचे सुर अन्त में निकालो। ऐसे सब नियमों को तोप के मुँह से उड़ाकर टुकड़े-टुकड़े कर दीजिए; वे बेतुके और भ्रामक हैं।

    उस क्षण की भावना जैसा सुझाए वैसे धीमे या ऊँचे बोलिए, और किसी कृत्रिम और काल्पनिक नियम का पालन मत कीजिए। कृत्रिम नियम सर्वथा घृणित हैं। जैसा किसी ने व्यंग्य से कहा है, “दसवें पन्ने के, दसवें अनुच्छेद के, तीसरे वाक्य के, पाँचवें शब्द तक भावावेश में आओ, गरजो, क्रोध करो, रोओ। यह कितना सरल होगा! सबसे बढ़कर, कितना स्वाभाविक!”

    एक लोकप्रिय प्रचारक की नकल में, जिसके लिए ऐसा करना विवशता थी, एक सेवक अपने उपदेश के आरम्भ में इतने धीमे सुर में बोलने का आदी था कि कोई भी उसे सुन न सके। हर कोई आगे की ओर झुक जाता, इस डर से कि कोई अच्छी बात हवा में खोई जा रही है, परन्तु उनका कान लगाना व्यर्थ था; एक पवित्र बुदबुदाहट के सिवा वे कुछ न पकड़ पाते। यदि वह भाई ऊँचा बोल ही न सकता, तो कोई उसे दोष न देता; परन्तु यह बड़ी बेतुकी बात थी कि वह ऐसा करे, जबकि थोड़ी ही देर में उसने गूँजते हुए वाक्यों से पूरी इमारत को भरकर अपने फेफड़ों की शक्ति का प्रमाण दे दिया। यदि उसके भाषण का पहला आधा भाग किसी महत्व का न था, तो उसे छोड़ क्यों न दिया? और यदि उसका कुछ भी मूल्य था, तो उसे स्पष्ट क्यों न सुनाया? सज्जनो, “प्रभाव”—यही वह बात थी जिस पर निशाना साधा गया था; वह जानता था कि उस ढंग से बोलनेवाले एक व्यक्ति ने बड़े प्रभाव उत्पन्न किए थे, और वह उसकी बराबरी करने की आशा रखता था।

    यदि आप में से कोई ऐसे घृणित उद्देश्य के लिए ऐसी मूर्खता करने का साहस करे, तो मैं हृदय से चाहूँगा कि आपने इस संस्था में कभी प्रवेश ही न किया होता। मैं आपसे पूरी गम्भीरता से कहता हूँ कि जिस वस्तु को “प्रभाव” कहा जाता है वह घृणित है, क्योंकि वह असत्य, कृत्रिम, चालबाज़ी भरी, और इसलिए तिरस्कार के योग्य है। प्रभाव के लिए कभी कुछ मत कीजिए, बल्कि उन छोटे मनवालों की चालों से घृणा कीजिए जो उपदेश के पारखियों की स्वीकृति के पीछे भागते हैं—ये पारखी एक सच्चे सेवक के लिए वैसी ही घृणित जाति हैं जैसे पूर्व देशों के माली के लिए टिड्डियाँ।

    परन्तु मैं विषय से भटक रहा हूँ: बिलकुल आरम्भ से ही साफ़ और स्पष्ट बोलिए। आपकी भूमिकाएँ इतनी अच्छी हैं कि उन्हें शून्य में फुसफुसाया न जाए। उन्हें साहस के साथ बोलिए, और अपने पुरुषोचित स्वर से बिलकुल आरम्भ में ही ध्यान आकर्षित कीजिए। नियमतः सबसे ऊँचे सुर से आरम्भ मत कीजिए, क्योंकि तब, जब आप काम में गरमाएँगे, तो और ऊपर नहीं उठ पाएँगे; परन्तु फिर भी आरम्भ से ही खुलकर बोलिए। जब उचित हो तो आवाज़ को फुसफुसाहट तक भी धीमा कीजिए; क्योंकि कोमल, सधे हुए, गम्भीर कथन न केवल कान को राहत देते हैं, बल्कि उनमें हृदय तक पहुँचने की बड़ी क्षमता होती है। धीमे सुरों से मत डरिए, क्योंकि यदि आप उनमें बल डालें तो वे चिल्लाहटों के समान ही अच्छी तरह सुने जाते हैं। अच्छी तरह सुने जाने के लिए आपको ऊँची आवाज़ में बोलने की आवश्यकता नहीं। मैकॉले विलियम पिट के विषय में कहते हैं, “उसकी आवाज़, फुसफुसाहट तक धीमी हो जाने पर भी, हाउस ऑफ़ कॉमन्स की सबसे दूर की बेंचों तक सुनाई देती थी।” ठीक ही कहा गया है कि सबसे अधिक शोर करनेवाली बन्दूक वह नहीं होती जो गोली को सबसे दूर तक ले जाती है: राइफ़ल की कड़क तो बिलकुल भी शोरगुल भरी नहीं होती। आपकी आवाज़ का ऊँचापन नहीं, बल्कि वह बल जो आप उसमें डालते हैं, प्रभावकारी होता है।

    मुझे निश्चय है कि मैं ऐसी फुसफुसाहट कर सकता हूँ कि हमारे विशाल टैबरनेकल के हर कोने में सुनी जाए, और उतना ही निश्चय है कि मैं ऐसा चिल्ला सकता हूँ कि कोई मुझे समझ न पाए। यह काम यहाँ करके दिखाया जा सकता है, परन्तु शायद उदाहरण अनावश्यक है, क्योंकि मुझे डर है कि आप में से कुछ यह काम उल्लेखनीय सफलता के साथ करते ही हैं। हवा की लहरें कान पर इतनी तेज़ी से एक के बाद एक टकरा सकती हैं कि वे श्रवण-तन्त्रिका पर कोई ऐसी छाप नहीं छोड़तीं जिसका अर्थ निकाला जा सके। लिखने के लिए स्याही आवश्यक है, परन्तु यदि आप कागज़ के पन्ने पर स्याही की दवात उलट दें, तो उससे आप कोई अर्थ नहीं पहुँचाते; ध्वनि के साथ भी ऐसा ही है। ध्वनि स्याही है, परन्तु कान पर समझ में आनेवाला लेख लिखने के लिए मात्रा नहीं, बल्कि कुशल प्रबन्ध चाहिए। यदि आपकी एकमात्र महत्वाकांक्षा यह हो कि आप उसकी बराबरी करें—

    “बलवान स्टेंटर, जिसे पीतल के फेफड़े मिले थे, जिसका कण्ठ पचास जीभों के बल से भी बढ़कर था,”

    तो जितनी जल्दी हो सके, चिल्ला-चिल्लाकर एलीसियम पहुँच जाइए। परन्तु यदि आप चाहते हैं कि आपकी बात समझी जाए, और इस प्रकार आप किसी काम के हों, तो “निर्बल और कोलाहलपूर्ण” होने के कलंक से बचिए।

    आप जानते हैं कि तीखी ध्वनियाँ सबसे दूर तक जाती हैं: ऑस्ट्रेलिया के बीहड़ों में यात्रियों द्वारा प्रयोग की जानेवाली वह अनोखी पुकार अपनी उल्लेखनीय शक्ति अपने तीखेपन से ही पाती है। घण्टी ढोल की अपेक्षा कहीं अधिक दूर से सुनाई देती है; और, बड़ी विचित्र बात है कि ध्वनि जितनी अधिक संगीतमय होती है, उतनी ही दूर जाती है। पियानो को ठोंकने की नहीं, बल्कि सर्वोत्तम कुंजियों को विवेक से बजाने की आवश्यकता है। इसलिए आप ऊँचेपन की दिशा में ज़ोर को बार-बार ढीला करने के लिए अपने आप को स्वतन्त्र समझेंगे, और इससे आप श्रोताओं के कानों को और अपने फेफड़ों को भी बहुत राहत देंगे।

    हथौड़े से लेकर रुई के फाहे तक सब तरीके आज़माइए। मन्द पवन के समान कोमल, और बवण्डर के समान प्रचण्ड बनिए। वास्तव में, ठीक वैसे ही बनिए जैसा हर सामान्य समझवाला मनुष्य अपनी बोली में होता है, जब वह स्वाभाविक रूप से बात करता है, उत्कटता से विनती करता है, भरोसे में लेकर फुसफुसाता है, करुण स्वर में निवेदन करता है, या स्पष्ट रूप से घोषणा करता है।

    फेफड़ों के बल के संयम के बाद मैं यह नियम रखूँगा: अपने स्वरों में उतार-चढ़ाव लाइए। सुर को बार-बार बदलिए और तान में निरन्तर विविधता लाइए। बेस, ट्रेबल और टेनर—नीचे, ऊँचे और बीच के स्वरों—को बारी-बारी से आने दीजिए। मैं आपसे विनती करता हूँ कि अपने ऊपर और अपने सुननेवालों पर दया करके ऐसा कीजिए। परमेश्वर हम पर दया करता है और सब वस्तुओं को इस प्रकार व्यवस्थित करता है कि विविधता की हमारी लालसा पूरी हो; आइए, हम भी अपने संगी प्राणियों पर दया करें, और उन्हें एकरूपता की ऊब से न सताएँ। किसी बेचारे संगी प्राणी के कान के परदे पर आधे घण्टे तक एक ही ध्वनि से छेदे और बरमाए जाने की पीड़ा डालना अत्यन्त बर्बर काम है। सुनने के अंग में किसी भृंग की निरन्तर भिनभिनाहट, या नीली मक्खी की भनभनाहट से बढ़कर मन को मूढ़ या पागल बना देने का और कौन-सा तेज़ उपाय सोचा जा सकता है? आपके पास कौन-सी ऐसी छूट है जिसके आधार पर उन असहाय शिकारों के प्रति, जो आपकी ढम-ढम सेवकाई के नीचे बैठते हैं, आपकी ऐसी क्रूरता सहन की जाए? दयालु प्रकृति अकसर उस भिनभिनानेवाले के अभागे शिकारों को मधुर विश्राम में डुबोकर उसकी यातनाओं के पूरे प्रभाव से बचा लेती है। परन्तु यह तो आप नहीं चाहते; तो फिर विविध स्वरों में बोलिए।

    कितने कम सेवक यह याद रखते हैं कि एकरसता नींद लाती है। मुझे डर है कि ‘इम्पीरियल रिव्यू’ के एक लेखक का लगाया हुआ आरोप मेरे बहुत-से भाइयों पर अक्षरशः सच है। “हम सब जानते हैं कि बहते पानी का शोर, या समुद्र की मर्मर-ध्वनि, या चीड़ के वृक्षों के बीच दक्षिणी हवा की सरसराहट, या वन-कबूतरों की कराह, कैसी मधुर स्वप्निल शिथिलता ले आती है। हम यह कदापि नहीं कहते कि किसी आधुनिक धर्मोपदेशक की आवाज़ इन मधुर ध्वनियों में से किसी से ज़रा भी मिलती है—फिर भी प्रभाव वही होता है, और स्वर में ज़रा-सा भी परिवर्तन या अभिव्यक्ति में बदलाव किए बिना सुनाए गए किसी लम्बे प्रबन्ध के ऊँघानेवाले प्रभावों का विरोध कुछ ही लोग कर पाते हैं।

    वास्तव में, ‘जगानेवाला प्रवचन’—इस वाक्यांश का अत्यन्त विरला प्रयोग, उन लोगों के द्वारा भी जो ऐसी बातों से सबसे अधिक परिचित हैं, यह संकेत देता है कि मंच से दिए जानेवाले अधिकांश भाषण निश्चित रूप से नींद लानेवाले होते हैं। यह बुरी दशा है जब प्रचारक

    अपने श्रोताओं को उलझन में छोड़ दे, कि दोनों में से किसकी मानें: पाठ कहता है, ‘जागते रहो और प्रार्थना करते रहो,’ उपदेश कहता है, ‘सो जाओ!’

    आपकी आवाज़ अपने आप में चाहे कितनी भी संगीतमय हो, यदि आप निरन्तर एक ही तार बजाते रहें, तो आपके श्रोता पाएँगे कि उसके सुर दूरी से ही अधिक मधुर बनते हैं। मानवता के नाम पर, यह सुर में पाठ करना बन्द कीजिए और विवेकपूर्ण बोलचाल अपनाइए। यदि यह तर्क आपको प्रभावित न करे, तो मैं इस बात पर इतना गम्भीर हूँ कि कहता हूँ—यदि आप अपने श्रोताओं पर दया करके मेरी सलाह न मानें, तो अपने आप पर दया करके ही मानिए; क्योंकि जैसे परमेश्वर ने अपनी अनन्त बुद्धि में यह भला जाना है कि अपनी प्राकृतिक और नैतिक दोनों व्यवस्थाओं के विरुद्ध हर पाप के साथ सदा एक दण्ड जोड़ दे, वैसे ही एकरसता की बुराई का बदला अकसर उस ख़तरनाक रोग के द्वारा लिया जाता है जिसे dysphonia clericorum, अर्थात् “पादरी के गले की ख़राश” कहते हैं। जब हमारे कुछ भाई अपने श्रोताओं के इतने प्रिय होते हैं कि वे कुछ महीनों के लिए उनसे छुटकारा पाने के लिए एक अच्छी-ख़ासी रक़म देने में भी आपत्ति नहीं करते, जब यरूशलेम की यात्रा की सलाह दी जाती है और उसका प्रबन्ध भी कर दिया जाता है, तब हल्के दर्जे का ब्रॉन्काइटिस इतनी उल्लेखनीय रीति से भलाई में बदल दिया जाता है कि मेरा वर्तमान तर्क उनकी शान्ति को भंग नहीं करेगा।

    परन्तु हमारा भाग ऐसा नहीं है; हमारे लिए ब्रॉन्काइटिस का अर्थ सच्चा दुःख है, और इसलिए, उससे बचने के लिए, हम कोई भी समझदारी भरा सुझाव मानने को तैयार हैं। यदि आप अपने गले बिगाड़ना चाहते हैं तो आप शीघ्र ही ऐसा कर सकते हैं, परन्तु यदि आप उन्हें सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो जो अब आपके सामने रखा जा रहा है उस पर ध्यान दीजिए।

    मैंने इस कमरे में बहुधा आवाज़ की तुलना ढोल से की है। यदि ढोल बजानेवाला सदा अपने ढोल के मुख पर एक ही स्थान पर चोट करे, तो चमड़ा शीघ्र ही घिसकर उसमें छेद हो जाएगा; परन्तु यदि उसने अपनी थापों में विविधता लाई होती और ढोल के पूरे मुख का उपयोग किया होता, तो वह कितने अधिक समय तक चलता! मनुष्य की आवाज़ के साथ भी ऐसा ही है। यदि वह सदा एक ही स्वर का प्रयोग करे, तो गले का वह भाग जो उस एकरसता को उत्पन्न करने में सबसे अधिक काम में आता है, घिसकर उसमें छेद हो जाएगा, और बहुत शीघ्र वह ब्रॉन्काइटिस से पीड़ित होगा।

    मैंने शल्य-चिकित्सकों को यह कहते सुना है कि डिसेंटरों का ब्रॉन्काइटिस चर्च ऑफ़ इंग्लैंड वाले माल से भिन्न होता है। राजकीय चर्च में एक धार्मिक नकियाहट है जिसकी बहुत प्रशंसा की जाती है—एक प्रकार की “गले-में-मीनार” वाली भव्यता, भाषा को एक कुलीन, धर्मविज्ञानी, पादरीनुमा, अलौकिक, मानवेतर ढंग से मुँह में घुमाना और शब्दों को लुढ़काना। अब, यदि इतना अस्वाभाविक बोलनेवाले मनुष्य को ब्रॉन्काइटिस या कोई और रोग न हो, तो मैं केवल यही कह सकता हूँ कि गले के रोग बड़ी प्रभुतापूर्ण रीति से बाँटे जाते होंगे। नॉनकन्फ़र्मिस्टों के बोलने की सनकों पर मैं पहले ही चोट कर चुका हूँ, और मेरा विश्वास है कि उन्हीं के कारण स्वरयन्त्र और फेफड़े नाज़ुक हो जाते हैं, और भले लोग मौन और क़ब्र के आगे हार जाते हैं। यदि आप उस चेतावनी के लिए, जो मैंने आपको दी है, मेरा प्रमाण चाहें, तो मैं आपको प्रसिद्ध त्रासदी-अभिनेता श्री मैक्रेडी का मत बताऊँगा, जो, चूँकि इस विषय को एक निष्पक्ष परन्तु अनुभवसिद्ध दृष्टिकोण से देखते हैं, आदरपूर्वक सुने जाने योग्य हैं। “गले की शिथिलता प्रायः अंग के प्रयोग से उतनी नहीं, जितनी प्रयोग के प्रकार से होती है; अर्थात् लम्बे या ऊँचे बोलने से उतनी नहीं, जितनी बनावटी आवाज़ में बोलने से। मुझे निश्चय नहीं कि इस कथन में मेरी बात समझी जाएगी, परन्तु दस हज़ार में एक व्यक्ति भी ऐसा नहीं जो लोगों के समूह को सम्बोधित करते समय अपनी स्वाभाविक आवाज़ में ऐसा करता हो; और यह आदत विशेषकर मंच पर देखी जाती है। मेरा विश्वास है कि गले की शिथिलता इन बनावटी स्वरों में किए गए प्रचण्ड प्रयासों से होती है, और इसका परिणाम तीव्र जलन, और प्रायः घाव होता है। गिरजे में पूरे दिन की सेवा का परिश्रम, परिश्रम की दृष्टि से, शेक्सपियर के किसी प्रमुख पात्र के अभिनय की तुलना में कुछ भी नहीं; और, मैं समझता हूँ, संसद के सदनों में हमारे प्रमुख राजनेताओं के बहुत बड़े-बड़े प्रदर्शनों की तुलना में भी नहीं; और मुझे पूरा निश्चय है कि जिस रोग को आप ‘पादरी के गले की ख़राश’ कहते हैं, उसका कारण सामान्यतः बोलने का ढंग है, न कि उसमें लगाया गया समय या प्रयास की उग्रता। मैंने रंगमंच पर अपने कई पूर्व समकालीनों को गले की ख़राश से पीड़ित होते देखा है, परन्तु मैं नहीं समझता कि अपनी कला में प्रसिद्ध लोगों के बीच इसे एक व्यापक रोग माना जा सकता था।”

    अभिनेताओं और बैरिस्टरों को अपनी स्वर-शक्ति पर ज़ोर डालने के बहुत अवसर मिलते हैं, फिर भी “वकील के गले की ख़राश” या “त्रासदी-अभिनेता का ब्रॉन्काइटिस” जैसी कोई चीज़ नहीं होती; केवल इसलिए कि ये लोग जनता की सेवा ऐसे ढीले-ढाले ढंग से करने का साहस नहीं करते जैसे कुछ प्रचारक अपने परमेश्वर की सेवा करते हैं। सैमुअल फ़ेनविक, एम.डी., ने “गले और फेफड़ों के रोग” विषय पर एक लोकप्रिय ग्रन्थ में बड़ी बुद्धिमानी से कहा है, “स्वर-रज्जुओं के शरीर-विज्ञान के विषय में जो कहा गया है, उससे यह स्पष्ट होगा कि एक ही स्वर में लगातार बोलना, आवाज़ के सुर में बार-बार परिवर्तन करने की अपेक्षा कहीं अधिक थकानेवाला है; क्योंकि पहले में केवल एक ही मांसपेशी या मांसपेशियों के एक ही समूह पर ज़ोर पड़ता है, जबकि दूसरे में भिन्न-भिन्न मांसपेशियाँ काम में लाई जाती हैं, और इस प्रकार वे एक-दूसरे को आराम देती हैं। इसी प्रकार, जो मनुष्य अपनी बाँह को शरीर से समकोण पर उठाता है, वह पाँच या दस मिनट में थक जाता है, क्योंकि केवल एक ही मांसपेशी-समूह को भार उठाना पड़ता है; परन्तु यही मांसपेशियाँ पूरे दिन काम कर सकती हैं यदि उनकी क्रिया दूसरों की क्रिया के साथ बारी-बारी से हो। इसलिए, जब कभी हम किसी पादरी को गिरजे की आराधना-विधि भिनभिनाते हुए पूरी करते, और उसी ढंग और उसी स्वर में पढ़ते, प्रार्थना करते और उपदेश देते सुनें, तो हम पूरी तरह निश्चित हो सकते हैं कि वह अपने स्वर-रज्जुओं से जितना परिश्रम सर्वथा आवश्यक है उससे दस गुना अधिक करा रहा है।”

    यह शायद उस मत को दोहराने का स्थान है जिसे मैंने इस जगह अकसर व्यक्त किया है, और जिसकी याद मुझे उस लेखक ने दिलाई है जिसका मैंने उद्धरण दिया है। यदि सेवक अधिक बार बोलें, तो उनके गलों और फेफड़ों को रोग लगने की सम्भावना कम होगी। इसके विषय में मुझे पूरा निश्चय है; यह व्यक्तिगत अनुभव और विस्तृत अवलोकन की बात है, और मुझे भरोसा है कि मैं ग़लत नहीं हूँ। सज्जनो, सप्ताह में दो बार उपदेश देना बहुत ख़तरनाक है, परन्तु मैंने पाँच या छः बार को स्वास्थ्यकर पाया है, और बारह या चौदह बार को भी अधिक नहीं।

    सप्ताह में एक दिन फूलगोभी और आलू की आवाज़ लगाने के लिए रखे गए फेरीवाले को यह प्रयास अत्यन्त श्रमसाध्य लगेगा, परन्तु जब वह लगातार छः दिन तक सड़कों और गलियों और तंग कूचों को अपने गूँजते शोर से भर देता है, तो कोई dysphonia pomariorum, अर्थात् “फेरीवाले के गले की ख़राश”, उसे उसके दीन परिश्रम से अलग नहीं कर देती। मुझे यह देखकर प्रसन्नता हुई कि मेरा यह मत, कि कभी-कभार उपदेश देना बहुत से रोगों की जड़ है, डॉ. फ़ेनविक ने इस प्रकार स्पष्ट घोषित किया है: “मेरा विश्वास है कि यहाँ दिए गए सब निर्देश आवाज़ के नियमित दैनिक अभ्यास के बिना निष्प्रभावी रहेंगे। इस रोग को उत्पन्न करने की ऐसी प्रवृत्ति किसी और बात में नहीं दिखती जैसी उस कभी-कभार के लम्बे बोलने में, जिसके बीच-बीच में विश्राम के लम्बे अन्तराल होते हैं, और पादरी विशेष रूप से इसी के अधीन रहते हैं। जो कोई इस विषय पर एक क्षण भी विचार करेगा, वह इसे सहज ही समझ लेगा।

    यदि किसी मनुष्य, या किसी अन्य प्राणी को, किसी असाधारण शारीरिक परिश्रम के लिए तैयार करना हो, तो उसे दिन-प्रतिदिन नियमित रूप से उसका अभ्यास कराया जाता है, और इस प्रकार वह परिश्रम सरल हो जाता है जिसे अन्यथा करना लगभग असम्भव होता। परन्तु पादरी-वर्ग के अधिकांश लोग बोलने के रूप में बड़ा शारीरिक परिश्रम सप्ताह में केवल एक ही दिन करते हैं, जबकि शेष छः दिनों में वे शायद ही कभी अपनी आवाज़ सामान्य सुर से ऊँची करते हैं। यदि कोई लोहार या बढ़ई इसी प्रकार कभी-कभार ही अपने धन्धे के अभ्यास से जुड़ी थकान सहे, तो वह न केवल उसके लिए बिलकुल अयोग्य हो जाएगा, बल्कि जो कौशल उसने प्राप्त किया था उसे भी खो बैठेगा। संसार ने जो सबसे प्रसिद्ध वक्ता देखे हैं, उनका उदाहरण बोलने के नियमित और निरन्तर अभ्यास के लाभ सिद्ध करता है। इस कारण मैं उन सब लोगों को, जिन्हें यह शिकायत रहती है, बड़े ज़ोर से यह सलाह दूँगा कि वे दिन में एक या दो बार ऊँचे स्वर में पढ़ें, उसी सुर का प्रयोग करते हुए जैसा मंच पर करते हैं, और छाती और गले की स्थिति पर, तथा शब्दों के साफ़ और उचित उच्चारण पर विशेष ध्यान देते हुए।”

    श्री बीचर का भी यही मत है, क्योंकि वे कहते हैं, “अख़बार बेचनेवाले लड़के दिखाते हैं कि खुली हवा में अभ्यास मनुष्य के फेफड़ों के लिए क्या कर सकता है। वह पीला और कमज़ोर आवाज़वाला सेवक, जो अपनी आवाज़ मुश्किल से दो सौ श्रोताओं तक पहुँचा पाता है, यदि उसे अख़बार बेचने पर लगा दिया जाए तो वह क्या करेगा? न्यूयॉर्क के वे अख़बारवाले लड़के किसी गली के सिरे पर खड़े होकर अपनी आवाज़ उसमें नीचे तक ऐसे भेज देते हैं जैसे कोई खिलाड़ी बॉलिंग की पट्टी पर गेंद लुढ़का दे। हम बोलने के पेशों के लिए प्रशिक्षण पा रहे लोगों को सलाह देते हैं कि वे थोड़े समय तक सड़कों पर फेरी लगाकर सामान बेचें। जवान सेवक कुछ समय के लिए अख़बारवाले लड़कों के साझेदार बन सकते हैं, जब तक कि उनके मुँह खुल न जाएँ और उनका स्वरयन्त्र सशक्त और मज़बूत न हो जाए।”

    सज्जनो, एक आवश्यक नियम यह है—अपनी आवाज़ को सदा अपने विषय के अनुकूल रखिए। किसी शोकपूर्ण विषय पर उल्लसित मत होइए; और दूसरी ओर, जहाँ स्वरों को प्रसन्नता से थिरकते हुए चलना चाहिए, मानो वे स्वर्ग में स्वर्गदूतों की धुन पर नाच रहे हों, वहाँ भारी होकर घिसटिए मत। इस नियम पर मैं विस्तार नहीं करूँगा, परन्तु निश्चित जानिए कि यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है, और यदि आज्ञाकारिता से इसका पालन किया जाए, तो यह सदा ध्यान आकर्षित करेगा, बशर्ते आपका विषय उसके योग्य हो।

    अपनी आवाज़ को सदा अपने विषय के अनुकूल रखिए, और सबसे बढ़कर, हर बात में स्वाभाविक रहिए। नियमों और आदर्श-नमूनों के प्रति दासों जैसी निष्ठा सदा के लिए दूर हो। दूसरों की आवाज़ों की नकल मत कीजिए; या, यदि किसी अजेय प्रवृत्ति के कारण आपको उनका अनुसरण करना ही पड़े, तो हर वक्ता की ख़ूबियों का अनुकरण कीजिए, और बुराई कम हो जाएगी। मैं स्वयं एक प्रकार के अप्रतिरोध्य प्रभाव से नकल करने की ओर खिंच जाता हूँ, यहाँ तक कि स्कॉटलैंड या वेल्स की यात्रा एक-दो सप्ताह तक मेरे उच्चारण और स्वर को काफ़ी प्रभावित कर देती है। मैं इसके विरुद्ध संघर्ष तो करता हूँ, परन्तु यह बनी रहती है, और इसका एकमात्र इलाज जो मैं जानता हूँ, वह यह है कि इस शरारत को अपनी स्वाभाविक मौत मरने दिया जाए।

    सज्जनो, मैं अपने नियम पर लौटता हूँ—अपनी स्वाभाविक आवाज़ों का प्रयोग कीजिए। बन्दर मत बनिए, मनुष्य बनिए; तोते नहीं, बल्कि हर बात में मौलिकता वाले मनुष्य। कहा जाता है कि मनुष्य के लिए अपनी दाढ़ी रखने का सबसे शोभायमान ढंग वही है जिसमें वह उगती है, क्योंकि रंग और आकार दोनों में वह उसके चेहरे के अनुकूल होगी।

    आपके अपने बोलने के ढंग आपकी सोचने की रीतियों और आपके अपने व्यक्तित्व के साथ सबसे अधिक मेल खाएँगे। नकलची नाटकघर के लिए है; अपने पवित्र किए गए व्यक्तित्व में सुसंस्कृत मनुष्य पवित्रस्थान के लिए है। यदि मुझे लगता कि आप इस नियम को भूल जाएँगे, तो मैं इसे तब तक दोहराता रहता जब तक आप ऊब न जाते; स्वाभाविक रहिए, स्वाभाविक रहिए, सदा स्वाभाविक रहिए। आवाज़ का बनावटीपन, या प्रसिद्ध धर्मोपदेशक डॉ. मधुरवाणी के ढंग की नकल, या किसी अति प्रिय शिक्षक या प्रधानाचार्य के ढंग की भी नकल, आपको अनिवार्य रूप से नष्ट कर देगी। मैं आपको आज्ञा देता हूँ कि नकल की दासता को फेंक दीजिए और मौलिकता के पुरुषत्व तक उठिए।

    हमें यह भी जोड़ना ही होगा—अपनी आवाज़ को शिक्षित करने का प्रयत्न कीजिए। इसे प्राप्त करने में कोई कष्ट या परिश्रम करने से मत हिचकिए, क्योंकि जैसा ठीक ही कहा गया है, “प्रकृति अपने चुने हुओं को चाहे कितने ही अद्भुत वरदान दे, वे केवल परिश्रम और अध्ययन के द्वारा ही विकसित होकर अपनी चरम पूर्णता तक पहुँचाए जा सकते हैं।” माइकल एंजेलो के विषय में सोचिए जो एक सप्ताह तक बिना कपड़े उतारे काम करता रहा, और हैंडल के विषय में जिसने निरन्तर अभ्यास से अपने हार्पसीकॉर्ड की हर कुंजी को चम्मच के समान खोखला कर दिया। सज्जनो, इसके बाद कभी कठिनाई या थकान की बात मत कीजिए। मुँह में पत्थर रखकर बोलने की डेमोस्थनीज़ की रीति की उपयोगिता समझना लगभग असम्भव है, परन्तु कोई भी देख सकता है कि गरजती लहरों के सामने भाषण देने में उसका क्या लाभ था, ताकि वह जान सके कि अपने देशवासियों की कोलाहलपूर्ण सभाओं के बीच अपनी बात कैसे सुनवाए; और पहाड़ी पर दौड़कर चढ़ते हुए बोलने में, ताकि कठिन परिश्रम से उसके फेफड़े बल पाएँ, इसका कारण उतना ही स्पष्ट है जितना यह आत्म-त्याग सराहनीय है।

    हम हर सम्भव साधन का प्रयोग करने के लिए बाध्य हैं ताकि उस आवाज़ को सिद्ध करें जिसके द्वारा हमें परमधन्य परमेश्वर की महिमा का सुसमाचार सुनाना है। व्यंजनों का बड़ा ध्यान रखिए, उनमें से हर एक का साफ़ उच्चारण कीजिए; वे शब्दों के नैन-नक्श और भाव हैं। तब तक अथक अभ्यास कीजिए जब तक आप हर व्यंजन को उसका उचित हक़ न दे दें; स्वरों की अपनी आवाज़ होती है, और इसलिए वे अपने लिए आप बोल सकते हैं। अन्य सब बातों में तब तक कठोर अनुशासन का पालन कीजिए जब तक आप अपनी आवाज़ पर स्वामित्व न पा लें, और उसे एक सुप्रशिक्षित घोड़े के समान अपने वश में न कर लें। सँकरी छाती वाले सज्जनों को सलाह दी जाती है कि वे हर सुबह वज़न उठाएँ, या उससे भी अच्छा, वे व्यायाम के मुगदर घुमाएँ जो कॉलेज ने आपके लिए उपलब्ध कराए हैं। आपको चौड़ी छातियों की आवश्यकता है, और उन्हें पाने के लिए आपको अपना भरसक प्रयत्न करना चाहिए। अपने हाथ वास्कट की जेबों में डालकर मत बोलिए जिससे आपके फेफड़े सिकुड़ जाएँ, बल्कि कन्धों को पीछे की ओर कीजिए, जैसे सार्वजनिक गायक करते हैं। बोलते समय किसी डेस्क पर झुकिए मत, और उपदेश देते समय सिर को कभी छाती पर झुकाकर मत रखिए। शरीर नीचे की ओर नहीं, बल्कि ऊपर की ओर झुके। सब कसे हुए गुलूबन्द और गले तक बटनवाली वास्कटें उतार फेंकिए; धौंकनी और नलियों के पूरे खेल के लिए जगह छोड़िए।

    रोमी या यूनानी वक्ताओं की मूर्तियों को ध्यान से देखिए, राफ़ेल के बनाए पौलुस के चित्र को देखिए—और बिना किसी बनावट के, स्वाभाविक रूप से उन सुन्दर और उपयुक्त मुद्राओं को अपनाइए जो वहाँ चित्रित हैं, क्योंकि आवाज़ के लिए वही सबसे अच्छी हैं। किसी मित्र से कहिए कि वह आपको आपके दोष बताए, या उससे भी अच्छा, किसी ऐसे शत्रु का स्वागत कीजिए जो आप पर पैनी दृष्टि रखे और आपको निर्दयता से डंक मारे। ऐसा चिढ़ानेवाला आलोचक बुद्धिमान मनुष्य के लिए कैसी आशीष, और मूर्ख के लिए कैसी असहनीय विपत्ति होगा! परिश्रम से और बार-बार अपने आप को सुधारिए, नहीं तो आप अनजाने में ग़लतियों में पड़ जाएँगे, झूठे स्वर पनप जाएँगे, और ढीली-ढाली आदतें चुपके से बन जाएँगी; इसलिए निरन्तर सावधानी से अपनी आलोचना कीजिए। जिस किसी बात के द्वारा आप थोड़े-से भी अधिक उपयोगी हो सकें, उसे छोटी मत समझिए।

    परन्तु, सज्जनो, इस विषय में कभी गिरकर ऐसे मंच के छैले मत बन जाइए जो हाव-भाव और आवाज़ को ही सब कुछ समझते हैं। जब मैं सुनता हूँ कि लोग एक उपदेश तैयार करने में पूरा सप्ताह लगा देते हैं, और उस तैयारी का बड़ा भाग अपनी बहुमूल्य रचनाओं को आईने के सामने दोहराने में जाता है, तो मेरा हृदय खिन्न हो जाता है! हाय इस युग पर, यदि अनुग्रहहीन हृदयों को सुरुचिपूर्ण तौर-तरीक़ों के कारण क्षमा किया जाए! हमें स्त्रैण कुलीनता की सुगन्धित सजावटों के बजाय सबसे बीहड़ वन-प्रदेश के घुमन्तू प्रचारक का सारा गँवारूपन दे दीजिए। मैं आपको अपनी आवाज़ों के विषय में नख़रेबाज़ होने की सलाह उतनी ही कम दूँगा जितनी रोलैंड हिल के मिस्टर टैपलैश की नकल करने की, उसकी हीरे की अँगूठी, उसके ख़ूब सुगन्धित जेबी रूमाल, और उसकी ऐनक के साथ।

    शायद यहाँ यह कहना उचित हो कि अच्छा होता यदि सब माता-पिता अपने बच्चों के दाँतों पर अधिक ध्यान देते, क्योंकि दोषपूर्ण दाँत वक्ता को गम्भीर हानि पहुँचा सकते हैं। ऐसे मनुष्य हैं जिनका उच्चारण दोषपूर्ण है, जिन्हें तुरन्त दन्त-चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए (मेरा अभिप्राय, निःसन्देह, पूरी तरह वैज्ञानिक और अनुभवी दन्त-चिकित्सक से है); क्योंकि कुछ नकली दाँत या कोई और सरल व्यवस्था उनके लिए स्थायी आशीष होगी। मेरे अपने दन्त-चिकित्सक अपने परिपत्र में बड़ी समझदारी से कहते हैं, “जब दाँतों का कुछ भाग या सब दाँत खो जाते हैं, तो चेहरे और गले की मांसपेशियों में सिकुड़न आ जाती है, आवाज़ के अन्य अंग जो दाँतों के अभ्यस्त हो चुके थे, क्षीण हो जाते हैं और अपनी सामान्य क्रिया से हट जाते हैं, जिससे टूटन, शिथिलता, या दबाव उत्पन्न होता है, जैसे किसी ऐसे बाजे में जिसमें कोई सुर कम हो। आवाज़ के अंगों में कमियाँ हों तो पूर्ण समरसता की, और आवाज़ की कुंजी, स्वर और सुर पर आनुपातिक और सुसंगत बलाघात की आशा करना व्यर्थ है, और निःसन्देह उच्चारण दोषपूर्ण हो जाता है; ऐसा दोष, कम से कम इतना तो कहना ही होगा, बोलने के परिश्रम को बहुत बढ़ा देता है, और अधिकांश मामलों में तुतलाहट, बहुत जल्दबाज़ या अचानक गिरावट, या क्षीण प्रस्तुति इसका परिणाम होती है; अधिक गम्भीर कमियों से तो बुदबुदाहट और खड़खड़ाहट का आना लगभग निश्चित है।”

    जहाँ यही हानि का कारण हो, और इलाज पहुँच के भीतर हो, वहाँ अपने काम के लिए हम उसका लाभ उठाने को बाध्य हैं। दाँत महत्वहीन लग सकते हैं, परन्तु यह याद रहे कि हमारी जैसी महान बुलाहट में कोई भी बात छोटी नहीं। आगे की टिप्पणियों में मैं इनसे भी छोटी बातों का उल्लेख करूँगा, परन्तु इस गहरी धारणा के साथ कि तुच्छ बातों के विषय में दिए गए संकेत आपको गम्भीर लापरवाहियों या भारी भूलों से बचाने में अनजाने मूल्य के हो सकते हैं।

    अन्त में, मैं आपके गलों के विषय में कहूँगा—उनकी देखभाल कीजिए। जब आप बोलने ही वाले हों तब उन्हें अच्छी तरह साफ़ करने का सदा ध्यान रखिए, परन्तु उपदेश देते समय बार-बार गला साफ़ मत करते रहिए। मेरे परिचित एक बहुत आदरणीय भाई सदा इस प्रकार बोलते हैं: “मेरे प्रिय मित्रो—खँ—खँ—यह एक अत्यन्त—खँ—महत्वपूर्ण विषय है जिसे अब मुझे—खँ—खँ—आपके सामने रखना है, और—खँ— खँ—मुझे आपसे कहना है कि आप मुझे—खँ—खँ—अपना सबसे गम्भीर—खँ—ध्यान दें।”

    इससे पूरी लगन के साथ बचिए। दूसरे लोग, गला साफ़ न करने के कारण, ऐसे बोलते हैं मानो उनका गला रुँधा हुआ हो और वे बस थूकने ही वाले हों; बार-बार की अप्रिय ध्वनियों से श्रोता का जी मिचलाने की अपेक्षा कहीं अच्छा होगा कि वे तुरन्त ऐसा कर लें। जब मनुष्य को ज़ुकाम हो तब नाक सुड़कना और सूँ-सूँ करना काफ़ी क्षम्य है, परन्तु ये अत्यन्त अप्रिय हैं, और जब ये आदत बन जाएँ, तो इन पर “उपद्रव अधिनियम” के अन्तर्गत मुक़दमा चलाया जाना चाहिए। कृपया मुझे क्षमा करें, ऐसी बातों का उल्लेख करना भद्दा लग सकता है, परन्तु इस व्याख्यान-कक्ष में की गई सीधी और खुली टिप्पणियों पर आपका ध्यान देना आगे चलकर आपके ऊपर की जानेवाली बहुत-सी टिप्पणियों से आपको बचा सकता है।

    मेरा विश्वास है कि हमारे आरम्भिक दिनों में आवाज़ से सम्बन्धित आधी कठिनाइयाँ, जैसे-जैसे हम आयु में बढ़ते हैं और अभ्यास में दूसरी प्रकृति पा लेते हैं, लुप्त हो जाएँगी। मैं सच्चे मन से लगे हुए लोगों को धीरज से डटे रहने के लिए प्रोत्साहित करूँगा; यदि वे प्रभु के वचन को अपनी हड्डियों में आग के समान अनुभव करते हैं, तो हकलाहट पर भी जय पाई जा सकती है, और भय, अपने सारे पंगु कर देनेवाले परिणामों के साथ, दूर भगाया जा सकता है। हियाव बाँधिए, जवान भाई, डटे रहिए, और परमेश्वर, और प्रकृति, और अभ्यास आपकी सहायता करेंगे।

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