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ध्यान दें!
हमारा विषय ऐसा है जिसकी चर्चा मैं प्रवचन-शास्त्र की किसी भी पुस्तक में शायद ही कभी पाता हूँ—यह एक बड़ी विचित्र बात है, क्योंकि यह अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय है और एक से अधिक अध्याय के योग्य है। मेरा अनुमान है कि प्रवचन-शास्त्र के पंडित यह समझते हैं कि उनके पूरे-के-पूरे ग्रन्थ इसी विषय से स्वादिष्ट बनाए गए हैं, और उन्हें इसे हमें डलियों के रूप में देने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि चाय में घुली चीनी की तरह यह पूरे को स्वाद देता है। वह उपेक्षित विषय यह है: अपने श्रोताओं का ध्यान कैसे पाएँ और कैसे बनाए रखें। उनका ध्यान पाना ही होगा, नहीं तो उनके साथ कुछ भी नहीं किया जा सकता; और उसे बनाए रखना ही होगा, नहीं तो हम शब्दों का ताना-बाना बुनते तो रह सकते हैं, पर उससे कोई भलाई नहीं निकलेगी।
हमारे अंग्रेज़ सैनिक अधिकारी सेना की घोषणाओं के ऊपर सदा बड़े-बड़े अक्षरों में “ध्यान दें!” शब्द लिखते हैं, और हमें भी अपने सब उपदेशों के ऊपर ऐसे ही किसी शब्द की आवश्यकता है। हमें मण्डली में उपस्थित सब लोगों का गम्भीर, निष्कपट, जागता हुआ और निरन्तर बना रहनेवाला ध्यान चाहिए। यदि लोगों के मन कहीं दूर भटक रहे हों तो वे सत्य को ग्रहण नहीं कर सकते, और यदि वे निष्क्रिय हों तो भी बात लगभग वैसी ही है। जैसे हव्वा को आदम की पसली से निकाला गया था, वैसे पाप को मनुष्यों में से उस समय नहीं निकाला जा सकता जब वे गहरी नींद में हों। उन्हें जागना होगा, जो हम कह रहे हैं उसे समझना होगा, और उसकी शक्ति को अनुभव करना होगा, नहीं तो हम भी सो जाएँ तो कोई अन्तर नहीं पड़ेगा।
ऐसे प्रचारक भी हैं जिन्हें इस बात की बहुत कम परवाह होती है कि कोई उनकी सुन रहा है या नहीं; जब तक वे निर्धारित समय पूरा कर पाते हैं, तब तक उनके लिए यह बहुत कम महत्व की बात है कि उनके लोग अनन्तकाल के लिए सुनते हैं या व्यर्थ सुनते हैं; ऐसे सेवक जितनी जल्दी कब्रिस्तान में जा सोएँ और अपनी कब्र के पत्थर पर खुदे पद के द्वारा प्रचार करें, उतना ही अच्छा। कुछ भाई रोशनदान की ओर ऊपर मुँह करके बोलते हैं, मानो वे स्वर्गदूतों का ध्यान चाहते हों; और कुछ अपनी पुस्तक पर नीचे ऐसे झुके रहते हैं मानो विचारों में डूबे हों, या मानो वे स्वयं ही अपने श्रोता हों और इससे अपने आप को बहुत सम्मानित अनुभव करते हों। ऐसे भाई किसी घास के मैदान में जाकर प्रचार क्यों नहीं करते और तारों की उन्नति क्यों नहीं करते? यदि उनके प्रचार का उनके श्रोताओं से कोई सम्बन्ध नहीं, तो वे निःसन्देह बड़े औचित्य के साथ ऐसा कर सकते हैं; यदि उपदेश एक स्वगत-भाषण ही है, तो बोलनेवाला जितना अकेला हो उतना ही अच्छा।
एक विवेकशील प्रचारक को (और सब विवेकशील नहीं होते) यह अनिवार्य लगना चाहिए कि वह अपने सब श्रोताओं की, सबसे बूढ़े से लेकर सबसे छोटे तक, रुचि जगाए। हमें बच्चों को भी अन्यमनस्क नहीं बनाना चाहिए। आप कहते हैं, “उन्हें अन्यमनस्क बनाना? ऐसा कौन करता है?” मैं कहता हूँ कि अधिकांश प्रचारक ऐसा करते हैं; और जब किसी सभा में बच्चे शान्त नहीं रहते, तो अक्सर उसमें जितना उनका दोष होता है उतना ही हमारा भी। क्या आप छोटों के लिए जानबूझकर कोई छोटी-सी कहानी या दृष्टान्त नहीं डाल सकते? क्या आप गैलरी में बैठे लड़के की और नीचे बैठी छोटी लड़की की, जो कसमसाने लगे हैं, आँख से आँख नहीं मिला सकते और मुस्कुराकर उन्हें व्यवस्थित नहीं कर सकते? मैं अक्सर अपने मंच (पल्पिट) के नीचे बैठे अनाथ लड़कों से अपनी आँखों से बातें करता हूँ। हम चाहते हैं कि सब आँखें हम पर टिकी हों और सब कान हमारे लिए खुले हों। मुझे तो यह भी खटकता है कि कोई अन्धा व्यक्ति भी अपना मुँह मेरी ओर न किए हो। यदि मैं किसी को इधर-उधर मुड़ते, कानाफूसी करते, ऊँघते या अपनी घड़ी देखते पाता हूँ, तो मैं समझ लेता हूँ कि मैं स्तर पर खरा नहीं उतर रहा, और मुझे किसी-न-किसी उपाय से इन मनों को जीतना है। मुझे बहुत कम ही शिकायत करनी पड़ती है, और जब करनी पड़ती है तो मेरा साधारण तरीका यह है कि मैं अपने आप से शिकायत करूँ, और मान लूँ कि जब तक मैं ध्यान को अधिकार के साथ पाना नहीं जानता, तब तक मुझे ध्यान पाने का कोई अधिकार नहीं।
अब, कुछ मण्डलियाँ ऐसी होती हैं जिनका ध्यान आप आसानी से नहीं पा सकते; उन्हें रुचि लेने की कोई परवाह नहीं होती। उन्हें डाँटना व्यर्थ है; यह तो ऐसा होगा जैसे किसी चिड़िया को पकड़ने के लिए उस पर झाड़ी फेंकना। सच तो यह है कि अधिकतर मामलों में कोई दूसरा व्यक्ति है जिसे आपको डाँटना चाहिए, और वह आप स्वयं हैं। ध्यान देना उनका कर्तव्य हो सकता है, परन्तु उनसे ध्यान दिलवाना उससे कहीं अधिक आपका कर्तव्य है। आपको मछलियों को अपने काँटे की ओर आकर्षित करना है, और यदि वे न आएँ तो दोष मछुए को देना चाहिए, मछलियों को नहीं। उन्हें विवश कीजिए कि वे थोड़ी देर ठहरकर सुनें कि परमेश्वर यहोवा उनके प्राणों से क्या कहता है।
जिस सेवक ने एक बूढ़ी स्त्री को ऊँघने से बचने के लिए नसवार सूँघने की सलाह दी थी, उसे उसके उत्तर ने बहुत उचित रूप से लज्जित किया—कि यदि वह स्वयं उपदेश में थोड़ी और नसवार डाल दे, तो वह पूरी तरह जागती रहेगी। हमें उपदेश में भरपूर नसवार डालनी चाहिए, या उससे भी अधिक जगानेवाली कोई चीज़। स्मरण रखिए कि हमारे कुछ लोगों के लिए ध्यान देना इतना आसान नहीं है; उनमें से बहुतों को इस विषय में कोई रुचि नहीं, और उन्होंने अपने हृदयों पर अनुग्रह का कोई ऐसा कार्य इतना अनुभव नहीं किया है कि वे मान लें कि सुसमाचार उनके लिए कोई विशेष मूल्य रखता है। जिस उद्धारकर्ता का आप प्रचार करते हैं, उसके विषय में आप उनसे कह सकते हैं,
“हे सब आने-जानेवालो, क्या यह तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं, क्या यह तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं कि यीशु मरे?”
उनमें से बहुत से लोग सप्ताह भर कारोबार की चिन्ताओं के दबाव से दबे रहे हैं। उन्हें अपना बोझ प्रभु पर डाल देना चाहिए; परन्तु क्या आप सदा ऐसा करते हैं? क्या आपको चिन्ताओं से छूट निकलना सदा आसान लगता है? क्या आप घर पर बीमार पत्नी और अस्वस्थ बच्चों को भूल पाते हैं? इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि बहुत से लोग अपने दैनिक कामकाज के विचारों से भारी लदे हुए परमेश्वर के भवन में आते हैं। किसान को वे खेत याद आते हैं जिन्हें जोतना या बोना है; रविवार बरसात का दिन है, और वह गेहूँ के नये पौधों के पीलेपन के बारे में सोच रहा है। व्यापारी को वह अनादृत हुंडी अपनी आँखों के सामने फड़फड़ाती दिखाई देती है, और दुकानदार अपने डूबे हुए कर्ज़ों को गिन रहा होता है। मुझे आश्चर्य न होगा यदि स्त्रियों के रिबनों के रंग और पुरुषों के जूतों की चरमराहट बहुतों का ध्यान भंग करती हो।
आप जानते हैं, आसपास तंग करनेवाली मक्खियाँ होती हैं; मक्खियों का देवता बाल-जबूब इस बात का ध्यान रखता है कि जहाँ कहीं सुसमाचार का भोज हो, वहाँ मेहमानों को छोटी-छोटी खीझों से परेशान किया जाए। अक्सर जब आप किसी व्यक्ति को प्रचार कर रहे होते हैं, तब मन के मच्छर उसे डंक मारते हैं, और वह आपके प्रवचन से अधिक तुच्छ विघ्नों के बारे में सोच रहा होता है; क्या यह इतने आश्चर्य की बात है कि वह ऐसा करता है? आपको मच्छरों को भगाना होगा, और अपने लोगों के अविचलित विचारों को अपने अधिकार में लेना होगा, उन्हें उस धारा से मोड़कर जिसमें वे छः दिन से बहते रहे हैं, विश्रामदिन के उपयुक्त धारा में लाना होगा। आपके प्रवचन और उसके विषय में इतना उत्तोलक बल होना चाहिए कि वह उन्हें उस पृथ्वी से, जिससे वे चिपके हुए हैं, ठीक ऊपर उठा ले, और उन्हें स्वर्ग के थोड़ा और निकट पहुँचा दे।
अक्सर मण्डलियों के लिए ध्यान देना स्थान और वातावरण के कारण बहुत कठिन हो जाता है। उदाहरण के लिए, यदि स्थान इस समय के इस कमरे जैसा हो, जो शुद्ध हवा के लिए बन्द कर दिया गया है और जिसकी हर खिड़की बन्द है, तो उन्हें साँस लेने में ही पर्याप्त परिश्रम करना पड़ता है, और वे किसी और बात के विषय में सोच ही नहीं सकते: जब लोग उस हवा को बार-बार साँस में लेते हैं जो दूसरों के फेफड़ों में हो आई है, तो जीवन की सारी मशीनरी बिगड़ जाती है, और उनके टूटे हुए हृदय की अपेक्षा दुखते हुए सिर की अधिक सम्भावना होती है। किसी प्रचारक के लिए परमेश्वर के अनुग्रह के बाद सबसे अच्छी वस्तु ऑक्सीजन है। प्रार्थना कीजिए कि स्वर्ग के झरोखे खुलें, परन्तु आरम्भ अपने सभा-भवन की खिड़कियाँ खोलने से कीजिए। हमारे बहुत से ग्रामीण स्थानों को देखिए, और मुझे डर है कि हमारे नगरों के चैपलों को भी, तो आप पाएँगे कि उनकी खिड़कियाँ खुलने के लिए बनाई ही नहीं गईं। भवन-निर्माण की आधुनिक बर्बर शैली हमें खलिहान से अधिक ऊँची छत नहीं देती, और हवा के आने-जाने के लिए उतने ही छिद्र देती है जितने किसी पूर्वी देश की काल-कोठरी में होते हैं, जहाँ अत्याचारी यह आशा करता था कि उसका बन्दी तिल-तिल करके मरे। हम ऐसे घर के विषय में क्या सोचेंगे जिसकी खिड़कियाँ खोली न जा सकें? क्या आप में से कोई ऐसा मकान किराये पर लेगा? फिर भी गॉथिक वास्तुकला और मूर्खतापूर्ण घमण्ड के कारण बहुत से लोग स्वास्थ्यकर सरकने वाली खिड़की को छोड़कर छत में छोटे-छोटे छेद, या खिड़कियों में चिड़िया पकड़ने के फन्दे जैसे झरोखे अपना लेते हैं, और इस प्रकार स्थान उससे कहीं कम आरामदायक बना दिए जाते हैं जितनी नबूकदनेस्सर की भट्ठी शद्रक, मेशक और अबेदनगो के लिए थी।
यदि ऐसे सब चैपलों का उचित बीमा हो, तो मैं आग से उनके बचे रहने के लिए प्रार्थना नहीं कर सकता। जहाँ खिड़कियाँ खुल भी सकती हैं, वहाँ भी वे अक्सर महीनों तक बन्द रखी जाती हैं, और एक रविवार से दूसरे रविवार तक अशुद्ध वातावरण बदला नहीं जाता। इसे सहन नहीं किया जाना चाहिए। मैं जानता हूँ कि कुछ लोग ऐसी बातों पर ध्यान नहीं देते, और मैंने यह कहते सुना है कि लोमड़ियाँ अपनी माँदों की दुर्गन्ध से नहीं मरतीं; परन्तु मैं लोमड़ी नहीं हूँ, और दूषित हवा मुझे सुस्त कर देती है, और मेरे श्रोताओं को भी सुस्त कर देती है। भवन में से ताज़ी हवा का एक झोंका लोगों के लिए स्वयं सुसमाचार के बाद सबसे अच्छी वस्तु हो सकता है; कम-से-कम वह उन्हें सत्य ग्रहण करने के लिए मन की उचित अवस्था में तो ला ही देगा। दूषित हवा से उत्पन्न होनेवाली इस बाधा को दूर करने के लिए सप्ताह के दिनों में परिश्रम कीजिए।
पार्क स्ट्रीट के अपने पुराने चैपल में मैंने अपने डीकनों से कई बार अपनी यह राय कही कि लोहे के ढाँचेवाली खिड़कियों के ऊपरी शीशे निकाल देना अच्छा होगा, क्योंकि वे खिड़कियाँ खुलने के लिए बनाई ही नहीं गई थीं। मैंने यह बात कई बार कही, और उसका कुछ परिणाम न निकला; परन्तु ईश्वरीय विधान से ऐसा हुआ कि एक सोमवार को किसी ने उनमें से अधिकांश शीशे बड़ी कुशलता से निकाल दिए, लगभग इतनी अच्छी तरह मानो किसी काँच लगानेवाले कारीगर ने उन्हें निकाला हो। इससे काफ़ी खलबली मच गई, और इस बारे में बहुत अटकलें लगाई गईं कि यह अपराध किसने किया है, और मैंने प्रस्ताव रखा कि अपराधी का पता लगाने के लिए पाँच पाउंड का इनाम घोषित किया जाए, और पकड़े जाने पर वही राशि उसे उपहार के रूप में दी जाए। इनाम का दावा करने कोई नहीं आया, और इसलिए मैंने उस व्यक्ति के विरुद्ध सूचना देना अपना कर्तव्य नहीं समझा। मुझे भरोसा है कि आप में से कोई मुझ पर सन्देह नहीं करेगा, क्योंकि यदि आप करेंगे तो मुझे मानना पड़ेगा कि मैं वह छड़ी लेकर चला हूँ जिसने उस दमघोंटू इमारत में ऑक्सीजन को भीतर आने दिया।
कभी-कभी हमारे लोगों के तौर-तरीके ध्यान देने के विरोधी होते हैं; उन्हें ध्यान देने की आदत ही नहीं होती; वे चैपल में तो उपस्थित होते हैं, पर प्रचारक पर ध्यान नहीं देते। वे भीतर आनेवाले हर व्यक्ति को मुड़कर देखने के आदी होते हैं, और वे हर समय आते रहते हैं, कभी-कभी खूब पैर पटकते हुए, जूते चरमराते हुए और दरवाज़े धड़ाम से बन्द करते हुए। एक बार मैं ऐसे लोगों को प्रचार कर रहा था जो लगातार मुड़-मुड़कर देखते थे, और मैंने यह उपाय अपनाया कि कहा, “अब, मित्रो, चूँकि यह जानना आपके लिए इतना अधिक रोचक है कि कौन भीतर आ रहा है, और आपका मुड़कर देखना मुझे इतना अधिक विचलित करता है—तो यदि आप चाहें तो मैं हर आनेवाले का वर्णन कर दिया करूँगा, ताकि आप बैठे-बैठे मेरी ओर देख सकें, और कम-से-कम शिष्टता का दिखावा तो बनाए रख सकें।”
मैंने भीतर आनेवाले एक सज्जन का, जो संयोग से मेरे एक मित्र थे जिनका वर्णन मैं बिना बुरा लगे कर सकता था, इस प्रकार वर्णन किया, “एक बहुत प्रतिष्ठित सज्जन जिन्होंने अभी-अभी अपना हैट उतारा है,” इत्यादि; और उस एक प्रयास के बाद मैंने पाया कि और किसी का वर्णन करने की आवश्यकता नहीं रही, क्योंकि जो मैं कर रहा था उससे वे स्तब्ध हो गए, और मैंने उन्हें विश्वास दिलाया कि मैं इस बात से उनसे कहीं अधिक स्तब्ध था कि उन्होंने मेरे लिए उनके आचरण को ऐसी हास्यास्पद स्थिति तक पहुँचाना आवश्यक बना दिया। उस समय के लिए वे सुधर गए, और मुझे आशा है कि सदा के लिए, जिससे उनके पास्टर को बड़ा आनन्द हुआ।
अब हम मान लेते हैं कि यह सब ठीक कर दिया गया है। आपने स्थान से दूषित हवा निकाल दी है, और लोगों के तौर-तरीके सुधार दिए हैं। अब आगे क्या?
ध्यान पाने के लिए पहला स्वर्णिम नियम यह है: सदा कुछ ऐसा कहिए जो सुनने योग्य हो। अधिकांश लोगों में एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है जो उन्हें कोई अच्छी बात सुनने की इच्छा की ओर ले जाती है। उनमें एक और मिलती-जुलती प्रवृत्ति भी होती है, जिस पर आप ध्यान दें तो अच्छा होगा, अर्थात् वह प्रवृत्ति जो उन्हें केवल शब्दों को ध्यान से सुनने में कोई भलाई नहीं देखने देती। यह कोई कठोर आलोचना नहीं है कि ऐसे सेवक हैं जिनके शब्द उनके विचारों की तुलना में बहुत बड़े अनुपात में होते हैं। वास्तव में, उनके शब्द उनके विचारों को छिपा देते हैं, यदि उनके पास कोई विचार हों तो। वे भूसे के ढेर-के-ढेर उँडेल देते हैं, और शायद कहीं-न-कहीं जई का एक-आध दाना हो भी, पर यह बताना कठिन होगा कि कहाँ।
मण्डलियाँ बहुत समय तक शब्दों, शब्दों, शब्दों, शब्दों, और केवल शब्दों पर ध्यान नहीं देंगी। आज्ञाओं में मुझे ऐसी कोई आज्ञा ज्ञात नहीं जो इस प्रकार हो: “तू बकवादी न होना,” परन्तु यह इस आज्ञा के अन्तर्गत आ सकती है, “तू चोरी न करना;” क्योंकि अपने श्रोताओं को आत्मिक भोजन के बदले शब्द देना उनके साथ धोखा है। “जहाँ बहुत बातें होती हैं, वहाँ अपराध भी होता है,” सबसे अच्छे प्रचारक में भी। अपने श्रोताओं को कुछ ऐसा दीजिए जिसे वे सँजोकर रख सकें और याद रख सकें; कुछ ऐसा जो उनके लिए उपयोगी होने की सम्भावना रखता हो, सबसे अच्छे स्थान से सबसे अच्छी सामग्री, ईश्वरीय वचन से ठोस सिद्धान्त। उन्हें आकाश से ताज़ा उतरा मन्ना दीजिए; वही चीज़ बार-बार, उसी रूप में ad nauseam नहीं, जैसे मोहताजख़ाने की रोटी जो साल भर एक ही आकार में काटी जाती है। उन्हें कुछ प्रभावशाली दीजिए, कुछ ऐसा जिसे सुनने के लिए मनुष्य आधी रात को भी उठ जाए, और जिसे सुनने के लिए पचास मील पैदल चलना भी सार्थक हो। आप ऐसा करने में पूरी तरह समर्थ हैं। ऐसा कीजिए, भाइयो। निरन्तर ऐसा कीजिए, और आपको उतना सारा ध्यान मिलेगा जितना आप चाह सकते हैं।
जो अच्छी सामग्री आप उन्हें देते हैं, वह बहुत स्पष्ट रूप से व्यवस्थित हो। इसमें बहुत कुछ निहित है। अच्छी वस्तुओं का एक विशाल ढेर पूरी तरह गड्डमड्ड करके लगाया जा सकता है। उस दिन से, जब मुझे एक टोकरी लेकर दुकान भेजा गया था, और मैंने एक पाउंड चाय, पाव पाउंड सरसों और तीन पाउंड चावल ख़रीदे, और घर लौटते समय शिकारी कुत्तों का एक झुण्ड देखा और मुझे बाड़ों और खाइयों के पार उनके पीछे जाना आवश्यक लगा (जैसा मैं लड़कपन में सदा करता था), और घर पहुँचकर पाया कि सारा सामान—चाय, सरसों और चावल—आपस में मिलकर एक भयानक घालमेल बन गया था, तब से मैं अपने विषयों को अच्छी मज़बूत पोटलियों में बाँधने की आवश्यकता समझ गया हूँ, जो मेरे प्रवचन के धागे से चारों ओर से बँधी हों; और यही कारण है कि मैं पहला, दूसरा और तीसरा वाली पद्धति पर टिका रहता हूँ, चाहे अब वह पद्धति कितनी भी पुराने ढंग की क्यों न मानी जाए।
लोग आपकी सरसों-मिली चाय नहीं पिएँगे, और न ही वे ऐसे गड्डमड्ड उपदेशों का आनन्द लेंगे जिनमें आप सिर और पूँछ में अन्तर नहीं कर सकते, क्योंकि उनमें दोनों में से कुछ भी नहीं होता, बल्कि वे मि. ब्राइट के स्काई टेरियर जैसे होते हैं, जिसका सिर और पूँछ दोनों एक जैसे थे। सत्य को लोगों के सामने तर्कसंगत, क्रमबद्ध ढंग से रखिए, ताकि वे उसे आसानी से याद रख सकें, और वे उसे और भी सहजता से ग्रहण करेंगे।
इसके अतिरिक्त, सरलता से बोलने का अवश्य ध्यान रखिए; क्योंकि आपकी सामग्री चाहे कितनी भी उत्तम हो, यदि कोई मनुष्य उसे समझता नहीं, तो वह उसके किसी काम की नहीं हो सकती; यदि आप ऐसे वाक्यांशों का प्रयोग करते हैं जो उसकी पहुँच से बिलकुल बाहर हैं, और अभिव्यक्ति के ऐसे ढंगों का जो उसके मन के अनुकूल नहीं, तो आपने उससे अपनी भाषा में बात की या कमचटका की भाषा में, कोई अन्तर नहीं। यदि वह निर्धन मनुष्य है तो ऊपर चढ़कर उसके स्तर तक जाइए; यदि वह शिक्षित व्यक्ति है तो नीचे उतरकर उसकी समझ तक जाइए। आप मुझे इस प्रकार शब्दों को उलटते-पलटते देखकर मुस्कुराते हैं, परन्तु मैं सोचता हूँ कि अनपढ़ के लिए सरल होने में, शिष्ट लोगों के लिए परिष्कृत होने की अपेक्षा अधिक ऊपर चढ़ना है। कुछ भी हो, दोनों में से यह अधिक कठिन है, और उद्धारकर्ता के बोलने के ढंग से सबसे अधिक मिलता-जुलता है। बुद्धिमानी इसी में है कि आप ऐसे मार्ग पर चलें जिस पर आपके श्रोता आपके साथ चल सकें, न कि ऊँचे घोड़े पर चढ़कर उनके सिरों के ऊपर से सवारी करते हुए निकल जाएँ।
हमारा प्रभु और स्वामी प्रचारकों का राजा था, फिर भी वह कभी किसी की समझ से ऊपर नहीं था, सिवाय वहाँ तक जहाँ तक उसके विषय की भव्यता और महिमा का सम्बन्ध था; उसके शब्द और वचन ऐसे थे कि वह “पवित्र बालक यीशु” के समान बोलता था। आपका हृदय एक सुन्दर विषय से उमड़े, जो स्पष्ट रूप से व्यवस्थित और सरलता से प्रस्तुत किया गया हो, तो आप लगभग निश्चित रूप से कान को, और इस प्रकार हृदय को, जीत लेंगे।
अपने बोलने के ढंग पर भी ध्यान दीजिए; उसमें भी ध्यान को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखिए। और यहाँ मुझे कहना चाहिए कि साधारणतः अपने उपदेश पढ़कर मत सुनाइए। कुछ ऐसे पढ़नेवाले हुए हैं जिन्होंने बड़ा प्रभाव डाला है, जैसे, उदाहरण के लिए, डॉ. चाल्मर्स, जिनके श्रोता इससे अधिक ध्यान से नहीं सुन सकते थे, यदि वह बिना लिखे बोल रहे होते; परन्तु मैं नहीं समझता कि हम डॉ. चाल्मर्स की बराबरी के हैं; ऐसी प्रतिष्ठा के लोग चाहें तो पढ़ सकते हैं, परन्तु हमारे लिए “सब से उत्तम मार्ग” है।
पढ़कर सुनाने का जो सबसे अच्छा नमूना मैंने कभी सुना है, उसमें भी काग़ज़ का स्वाद आया है, और वह मेरे गले में अटक गया है। मुझे वह अच्छा नहीं लगा, क्योंकि मेरा हाज़मा इतना अच्छा नहीं कि फुलस्केप काग़ज़ को पचा सके। पाण्डुलिपि के बिना काम चलाना अच्छा है, चाहे आपको कण्ठस्थ करके सुनाना ही क्यों न पड़े। सबसे अच्छा तो यह है कि आपको न कण्ठस्थ सुनाने की आवश्यकता हो और न पढ़ने की। यदि आपको पढ़ना ही है, तो ध्यान रखिए कि आप उसे पूर्णता के साथ करें। सबसे उत्तम पढ़नेवाले बनिए, और यदि आप ध्यान पाना चाहते हैं तो आपको ऐसा बनना ही होगा।
यहाँ मैं यह कहूँ कि यदि आप चाहते हैं कि लोग आपकी सुनें, तो उस ज़ोरदार अर्थ में बिना तैयारी के मत बोलिए, क्योंकि वह भी पढ़ने के बराबर ही बुरा है, या शायद उससे भी बुरा, जब तक कि पाण्डुलिपि ही बिना तैयारी के न लिखी गई हो; मेरा अर्थ है, पहले से अध्ययन किए बिना। मंच पर जाकर जो पहली बात हाथ लगे उसे मत कह दीजिए, क्योंकि अधिकांश लोगों में जो बात सबसे ऊपर होती है वह केवल झाग होती है। आपके लोगों को ऐसे प्रवचनों की आवश्यकता है जिन पर प्रार्थना की गई हो और जिन्हें परिश्रम से तैयार किया गया हो। लोग कच्चा भोजन नहीं चाहते; उसे पकाकर उनके लिए तैयार करना होगा। हमें अपने प्राण की गहराई से, उन शब्दों में जो स्वाभाविक रूप से सूझते हैं, वह सामग्री देनी चाहिए जो हमने उतनी ही पूरी तरह तैयार की हो जितनी कोई उपदेश-लेखक कर सकता था; वरन्, यदि हमें अच्छा बोलना है, तो वह उससे भी अच्छी तरह तैयार होनी चाहिए। मेरी समझ में सबसे अच्छी पद्धति वह है जिसमें मनुष्य सामग्री को बिना तैयारी के नहीं गढ़ता, परन्तु शब्दों को उसी क्षण गढ़ता है; भाषा उसे उसी क्षण सूझती है, परन्तु विषय पर भली-भाँति विचार किया जा चुका होता है, और इस्राएल के गुरु के समान वह उसके विषय में कहता है जो वह जानता है, और जो उसने देखा है उसकी गवाही देता है।
ध्यान पाने के लिए अपने ढंग को जितना हो सके उतना मनभावना बनाइए। उदाहरण के लिए, एक ही सुर में बोलते मत रहिए। अपनी आवाज़ को निरन्तर बदलते रहिए। अपनी गति भी बदलिए—कभी बिजली की कौंध के समान तेज़ी से दौड़िए, और फिर कभी शान्त गरिमा के साथ आगे बढ़िए। अपना स्वराघात बदलिए, अपना बलाघात खिसकाइए, और गाने जैसी लय से बचिए। स्वर बदलिए; कभी-कभी भारी स्वर का प्रयोग कीजिए, और भीतर गर्जन गूँजने दीजिए; अन्य समयों पर वैसे बोलिए जैसे आपको साधारणतः बोलना चाहिए—होंठों से, और अपनी बोली को बातचीत जैसा रहने दीजिए। बदलाव के लिए कुछ भी। मानव-स्वभाव विविधता के लिए लालायित रहता है, और परमेश्वर प्रकृति, विधान और अनुग्रह में उसे विविधता देता है; आइए, उपदेशों में भी हम उसे रखें। फिर भी, मैं इस पर अधिक नहीं ठहरूँगा, क्योंकि ऐसे प्रचारक देखे गए हैं जिन्होंने केवल अपनी सामग्री के बल पर ध्यान जगाया और बनाए रखा, जबकि उनके बोलने का ढंग बहुत अपूर्ण था। यदि प्यूरिटन रिचर्ड सिब्स आज दोपहर यहाँ होते, तो मैं इस बात की गारन्टी देता कि वह जो कुछ भी कहते उस पर पूरा ध्यान दिया जाता, और फिर भी वह बुरी तरह हकलाते थे। उनके एक समकालीन का कहना है कि वह “Sibilated” करते थे, इतना अधिक वह तुतलाते और सी-सी की आवाज़ करते थे।
आधुनिक मंचों में उदाहरणों के लिए हमें दूर देखने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि उनमें ऐसे बहुत अधिक हैं; परन्तु हम स्मरण कर सकते हैं कि मूसा बोलने में धीमा था, और फिर भी हर कान उसके वचनों पर लगा रहता था। सम्भवतः पौलुस भी इसी प्रकार की किसी दुर्बलता से ग्रस्त था, क्योंकि उसके बोलने को हल्का कहा गया था; परन्तु इसके विषय में हम निश्चित नहीं हैं, क्योंकि यह केवल उसके शत्रुओं की आलोचना थी। कलीसियाओं में पौलुस का प्रभाव बहुत बड़ा था, फिर भी जब उसका उपदेश लम्बा होता था तो वह सदा ध्यान बनाए नहीं रख पाता था, क्योंकि कम-से-कम एक श्रोता उसके उपदेश के बीच सो गया था, जिसका परिणाम गम्भीर हुआ।
ढंग ही सब कुछ नहीं है। फिर भी, यदि आपने अच्छी सामग्री इकट्ठी की है, तो उसे भद्दे ढंग से पहुँचाना खेद की बात है। राजा को कूड़ा-गाड़ी में सवारी नहीं करनी चाहिए; अनुग्रह के महिमामय सिद्धान्त लापरवाही से प्रस्तुत नहीं किए जाने चाहिए। सचमुच राजसी सत्यों को सोने के रथ में सवारी करनी चाहिए। अपने दूध-से-सफ़ेद घोड़ों में से सबसे उत्तम को निकालिए, और जब सत्य गलियों में से होकर सवारी करे, तो चाँदी की तुरहियों से मधुर संगीत बजने दीजिए। यदि लोग ध्यान नहीं देते, तो उन्हें हमारे दोषपूर्ण उच्चारण में बहाने न मिलने दें। परन्तु यदि हम इस विषय में सुधार नहीं कर सकते, तो आइए, अपनी सामग्री की समृद्धि के द्वारा उसकी भरपाई करने में और भी अधिक परिश्रमी बनें, और हर अवसर पर अपना सर्वोत्तम करें।
साधारणतः भूमिका को बहुत लम्बा मत बनाइए। छोटे-से घर के लिए बड़ा ड्योढ़ी-द्वार बनाना सदा खेद की बात है। एक उत्तम मसीही स्त्री ने एक बार जॉन हाउ को सुना, और चूँकि उन्होंने अपनी प्रस्तावना में एक घण्टा लगा दिया, उसने कहा कि वह प्रिय भले आदमी मेज़पोश बिछाने में इतनी देर लगाते रहे कि उसकी भूख ही मर गई: उसे लगा कि आख़िर में भोजन होगा ही नहीं। अपनी मेज़ जल्दी सजाइए, और छुरी-काँटों और थालियों की खड़खड़ाहट बन्द कीजिए।
आपने डॉड्रिज की पुस्तक “आत्मा में धर्म का उदय और विकास” का एक विशेष संस्करण देखा होगा, जिसमें जॉन फ़ॉस्टर का एक परिचयात्मक निबन्ध है। वह निबन्ध पुस्तक से बड़ा भी है और बेहतर भी, और डॉड्रिज से पढ़े जाने का अवसर छीन लेता है। क्या यह बेतुकी बात नहीं? अपनी रचनाओं में इस भूल से बचिए। मैं अपने उपदेश की भूमिका को बहुत कुछ नगर के ढिंढोरची की घोषणा जैसा बनाना पसन्द करता हूँ, जो अपनी घण्टी बजाकर पुकारता है, “सुनो! सुनो! सबको सूचित किया जाता है!” केवल इसलिए कि लोग जान लें कि उसके पास उनके लिए कोई समाचार है, और वह चाहता है कि वे सुनें। ऐसा करने के लिए भूमिका में कुछ प्रभावशाली बात होनी चाहिए। युद्ध के लिए जहाज़ के डेक खाली करने के संकेत के रूप में एक चौंका देनेवाली तोप दागना अच्छा है। अपने मन के पूरे चढ़ाव और तनाव के साथ आरम्भ मत कीजिए, परन्तु फिर भी इस प्रकार कीजिए कि सब यह आशा करने लगें कि अच्छा समय आनेवाला है। अपनी प्रस्तावना को शून्य की ओर ले जानेवाली आडम्बरपूर्ण भूमिका मत बनाइए, बल्कि उससे भी अच्छी किसी बात की ओर एक सीढ़ी बनाइए। बिलकुल आरम्भ से ही जीवन्त रहिए।
प्रचार करते समय अपनी बातें मत दोहराइए। मैं एक धर्मशिक्षक को सुना करता था जिनकी यह आदत थी कि लगभग एक दर्जन वाक्य बोलने के बाद वह कहते, “जैसा मैं पहले ही कह चुका हूँ,” या, “जो मैंने पहले कहा था उसे मैं दोहराता हूँ।” ख़ैर, वह भला आदमी, चूँकि उसकी कही बात में कुछ विशेष नहीं था, इसलिए दोहराने से केवल देश की दुर्दशा और भी स्पष्ट रूप से प्रकट होती थी। यदि बात बहुत अच्छी थी, और आपने उसे ज़ोर देकर कहा था, तो उसे फिर से क्यों दोहराएँ? और यदि वह कमज़ोर बात थी, तो उसे दूसरी बार क्यों प्रदर्शित करें? निःसन्देह, कभी-कभी कुछ वाक्यों को दोहराना बहुत प्रभावशाली हो सकता है; कोई भी बात कभी-कभार अच्छी हो सकती है, और फिर भी आदत के रूप में बहुत बुरी हो सकती है। कौन आश्चर्य करेगा कि लोग पहली बार नहीं सुनते, जब वे जानते हैं कि सब कुछ फिर से दोहराया जानेवाला है?
इसके अतिरिक्त, एक ही विचार को दूसरे शब्दों में बार-बार मत दोहराइए। हर वाक्य में कुछ नया हो। सदा एक ही कील पर हथौड़ा मत चलाते रहिए; आपकी बाइबल तो बड़ी है; लोगों को उसकी लम्बाई और चौड़ाई का आनन्द लेने दीजिए।
भाइयो, यह मत सोचिए कि हर बार प्रचार करते समय धर्मविज्ञान का पूरा सार, या सिद्धान्तों का औपचारिक संक्षेप, डॉ. गिल की रीति पर देना आवश्यक या महत्वपूर्ण है—ऐसा नहीं कि मैं डॉ. गिल को बदनाम करना या उनके विरुद्ध एक शब्द भी कहना चाहता हूँ—उनकी पद्धति धर्मविज्ञान के किसी ग्रन्थ या टीका के लिए प्रशंसनीय है, परन्तु प्रचार के लिए उपयुक्त नहीं। मैं एक धर्मशिक्षक को जानता हूँ जिनके उपदेश जब भी छपते हैं तो धर्मवैज्ञानिक सारांशों जैसे पढ़े जाते हैं, जो मंच की अपेक्षा कक्षा के लिए अधिक उपयुक्त हैं—वे जनता के कानों पर कोई प्रभाव नहीं छोड़ते। हमारे श्रोता तकनीकी परिभाषा की सूखी हड्डियाँ नहीं चाहते, बल्कि मांस और स्वाद चाहते हैं। परिभाषाएँ और भेद अपनी जगह ठीक हैं; परन्तु जब वे किसी उपदेश की मुख्य सामग्री बन जाते हैं, तो वे हमें उस युवक की याद दिलाते हैं जिसका प्रवचन विभिन्न महत्वपूर्ण भेदों से बना था। उसके इस प्रदर्शन पर एक बूढ़े डीकन ने टिप्पणी की कि एक भेद ऐसा था जिसे वह छोड़ गया था, अर्थात् मांस और हड्डियों के बीच का भेद। यदि प्रचारक यह भेद नहीं करते, तो उनके अन्य सब भेद उन्हें कोई विशेष प्रतिष्ठा नहीं दिलाएँगे।
ध्यान बनाए रखने के लिए बहुत लम्बा बोलने से बचिए। एक बूढ़ा प्रचारक एक युवक से, जो एक घण्टा प्रचार करता था, कहा करता था, “मेरे प्रिय मित्र, मुझे इसकी परवाह नहीं कि आप और किस विषय पर प्रचार करते हैं, परन्तु मैं चाहता हूँ कि आप सदा लगभग चालीस मिनट प्रचार करें।” हमें शायद ही कभी उससे बहुत आगे जाना चाहिए—चालीस मिनट, या, मान लीजिए, पौन घण्टा। यदि कोई व्यक्ति उस समय में वह सब नहीं कह सकता जो उसे कहना है, तो वह उसे कब कहेगा? परन्तु किसी ने कहा कि उसे “अपने विषय के साथ न्याय करना” अच्छा लगता है। ठीक है, परन्तु क्या उसे अपने लोगों के साथ न्याय नहीं करना चाहिए—या कम-से-कम उन पर थोड़ी दया करके उन्हें बहुत देर तक न रोकना चाहिए? विषय आपकी शिकायत नहीं करेगा, परन्तु लोग करेंगे।
कुछ ग्रामीण स्थानों में, विशेषकर दोपहर बाद, किसानों को अपनी गायें दुहनी होती हैं, और एक किसान ने एक युवक के विषय में—मेरे विचार में इसी कॉलेज के—मुझसे बड़ी कड़वाहट से शिकायत की, “महोदय, उसे चार बजे बन्द कर देना चाहिए था, परन्तु वह साढ़े चार बजे तक बोलता रहा, और मेरी सारी गायें दुहे जाने की प्रतीक्षा कर रही थीं! यदि वह गाय होता तो उसे कैसा लगता?” उस प्रश्न में बड़ी समझदारी थी। पशु-क्रूरता निवारण सोसाइटी को उस युवक पर मुक़दमा चलाना चाहिए था। जब किसानों के दिमाग़ में गायें ही गायें हों, तो वे लाभ के साथ कैसे सुन सकते हैं?
आपके उपदेश के उन अतिरिक्त दस मिनटों में माँ को नैतिक रूप से पूरा निश्चय हो जाता है कि बच्चा रो रहा है, या आग बुझ गई है, और वह आपकी सेवकाई पर अपना मन नहीं लगा सकती और न लगाएगी। आप उसे उसके अनुमान से दस मिनट अधिक रोके रख रहे हैं, और वह इसे आपकी ओर से एक प्रकार का अन्याय मानती है।
आपके और आपकी मण्डली के बीच एक प्रकार का नैतिक अनुबन्ध होता है कि आप उन्हें डेढ़ घण्टे से अधिक नहीं थकाएँगे, और यदि आप उन्हें उससे अधिक रोकते हैं, तो यह एक सन्धि का उल्लंघन और एक प्रकार की व्यावहारिक बेईमानी है, जिसके दोषी आपको नहीं होना चाहिए। संक्षिप्तता एक ऐसा गुण है जो हम सब की पहुँच में है; आइए, उससे मिलनेवाली प्रशंसा पाने का अवसर न खोएँ।
यदि आप मुझसे पूछें कि आप अपने उपदेश कैसे छोटे कर सकते हैं, तो मैं कहूँगा, उनका और अच्छी तरह अध्ययन कीजिए। अध्ययन-कक्ष में अधिक समय लगाइए, ताकि मंच पर आपको कम समय की आवश्यकता पड़े। जब हमारे पास कहने को सबसे कम होता है, तब हम साधारणतः सबसे लम्बा बोलते हैं। जिस व्यक्ति के पास भली-भाँति तैयार की गई बहुत-सी सामग्री होती है, वह सम्भवतः चालीस मिनट से अधिक नहीं बोलेगा; जब उसके पास कहने को कम होगा तो वह पचास मिनट तक बोलता रहेगा, और जब उसके पास बिलकुल कुछ नहीं होगा तो उसे कहने में एक घण्टा लगेगा। इन छोटी बातों पर ध्यान दीजिए, और ये ध्यान बनाए रखने में सहायक होंगी।
यदि आप अपने लोगों का ध्यान पाना चाहते हैं—उसे पूरी तरह और सदा पाना चाहते हैं—तो यह केवल इसी प्रकार हो सकता है कि परमेश्वर का आत्मा उन्हें मन की एक ऊँची और भक्तिपूर्ण अवस्था में ले आए। यदि आपके लोग सीखने को तत्पर, प्रार्थनाशील, सक्रिय, उत्साही और भक्त हैं, तो वे आशीष पाने के उद्देश्य से ही परमेश्वर के भवन में आएँगे। वे प्रार्थनापूर्वक अपने स्थान ग्रहण करेंगे, परमेश्वर से माँगते हुए कि वह आपके द्वारा उनसे बात करे; वे हर शब्द के लिए सजग रहेंगे, और थकेंगे नहीं। उनमें सुसमाचार के लिए भूख होगी, क्योंकि वे स्वर्गीय मन्ना की मिठास जानते हैं, और वे अपना नियत भाग बटोरने के लिए उत्सुक होंगे। इस विषय में किसी भी व्यक्ति को कभी ऐसी मण्डली प्रचार करने को नहीं मिलेगी जो मेरी मण्डली से बढ़कर हो। वास्तव में, जिन लोगों के बीच प्रचारक सबसे अधिक अपनापन अनुभव करता है, वे ही साधारणतः उसके लिए सबसे अच्छे श्रोता होते हैं। मेरे लिए टैबरनेकल में प्रचार करना अपेक्षाकृत आसान है; मेरे लोग जानबूझकर कुछ सुनने के लिए आते हैं, और उनकी अपेक्षा स्वयं अपने पूरे होने में सहायता करती है। यदि वे किसी दूसरे प्रचारक को भी उसी अपेक्षा के साथ सुनें, तो मेरा विश्वास है कि वे साधारणतः सन्तुष्ट होंगे; यद्यपि इसके अपवाद भी हैं।
जब प्रचारक पहली बार किसी स्थान पर बसता है, तो वह यह आशा नहीं कर सकता कि उसकी मण्डली उसे वह गम्भीर, हार्दिक ध्यान देगी जो उन्हें मिलता है जो अपने ही बच्चों के बीच पिताओं के समान खड़े होते हैं, जो हज़ारों स्मृतियों के द्वारा अपने लोगों के प्रिय बन चुके हैं, और आयु और अनुभव के कारण सम्मानित हैं। हमारा सारा जीवन ऐसा होना चाहिए जो हमारे शब्दों को वज़न दे, ताकि आनेवाले वर्षों में हम लम्बे समय तक बनाए रखे गए चरित्र की अजेय वाक्पटुता का प्रयोग कर सकें, और अपने झुण्ड का केवल ध्यान ही नहीं, बल्कि स्नेहपूर्ण श्रद्धा भी प्राप्त कर सकें। यदि हमारी प्रार्थनाओं और आँसुओं और परिश्रम के द्वारा हमारे लोग आत्मिक रूप से स्वस्थ हो जाएँ, तो हमें यह डर रखने की आवश्यकता नहीं कि हम उनका ध्यान खो देंगे। धार्मिकता के भूखे लोग, और उनके प्राणों को खिलाने के लिए उत्सुक सेवक, जब उनका साझा विषय प्रभु का वचन हो, तब एक-दूसरे के साथ अत्यन्त मधुर सामंजस्य में कार्य करेंगे।
यदि ध्यान जीतने के लिए आपको एक और निर्देश चाहिए, तो मैं कहूँगा, स्वयं रुचि लीजिए, और आप दूसरों में रुचि जगाएँगे। इन शब्दों में जितना दिखाई देता है उससे अधिक है, और इसलिए मैं उस रीति का पालन करूँगा जिसकी मैंने अभी-अभी निन्दा की थी, और वाक्य को दोहराऊँगा—स्वयं रुचि लीजिए, और आप दूसरे लोगों में रुचि जगाएँगे। आपका विषय आपके अपने मन पर इतना भारी होना चाहिए कि आप उसके विषय में अपने प्राण का भार उतारने में अपनी सारी क्षमताओं को उनकी सर्वोत्तम अवस्था में लगा दें; और तब जब आपके श्रोता देखेंगे कि उस विषय ने आपको पूरी तरह अपने में लीन कर लिया है, तो वह धीरे-धीरे उन्हें भी अपने में लीन कर लेगा।
क्या आपको आश्चर्य होता है कि लोग ऐसे मनुष्य पर ध्यान नहीं देते जो स्वयं यह अनुभव नहीं करता कि उसके पास कहने को कुछ महत्वपूर्ण है? क्या आपको आश्चर्य होता है कि जब कोई मनुष्य अपने पूरे मन से नहीं बोलता, तो वे अपने पूरे कानों से नहीं सुनते? क्या आप अचम्भा करते हैं कि उनके विचार उन विषयों की ओर भटक जाते हैं जो उनके लिए वास्तविक हैं, जब वे पाते हैं कि प्रचारक ऐसी बातों पर समय नष्ट कर रहा है जिन्हें वह ऐसे बरतता है मानो वे कल्पित कहानी हों? रोमेन कहा करते थे कि प्रचार की कला को समझना अच्छा है, परन्तु प्रचार के हृदय को जानना असीम रूप से बेहतर है; और उस कथन में कम वज़न नहीं है। प्रचार का हृदय, उसमें अपना प्राण झोंक देना, वह उत्साह जो मानो स्वयं जीवन के लिए विनती करता है—ध्यान पाने के विषय में यही आधी लड़ाई है।
साथ ही, यदि आपके पास कहने को कुछ नहीं है, तो केवल उत्साह के बल पर आप लोगों के मनों को मुग्ध ध्यान में नहीं बाँधे रख सकते। लोग किसी व्यक्ति को ढोल पीटते सुनने के लिए सदा अपने दरवाज़ों पर खड़े नहीं रहेंगे; वे यह देखने के लिए बाहर आएँगे कि वह क्या कर रहा है, परन्तु जब वे पाएँगे कि यह तो बेकार का शोर-शराबा है, तो वे दरवाज़ा धड़ाम से बन्द करके फिर भीतर चले जाएँगे, मानो कह रहे हों, “तुमने हमें धोखा दिया है और यह हमें अच्छा नहीं लगा।” कहने को कुछ रखिए, और उसे उत्साह से कहिए, तो मण्डली आपके चरणों में होगी।
शायद यह कहना अनावश्यक हो कि हमारे अधिकांश लोगों के लिए यह अच्छा है कि हमारे प्रवचनों में अच्छी संख्या में उदाहरण हों। इसके लिए हमारे सामने हमारे प्रभु का आदर्श है: और अधिकांश महानतम प्रचारकों के प्रवचन उपमाओं, रूपकों, रूपक-कथाओं और दृष्टान्त-कथाओं से भरपूर रहे हैं। परन्तु इस काम को हद से ज़्यादा करने से सावधान रहिए। मैंने अभी उस दिन एक जर्मन महिला की डायरी पढ़ी जो लूथरन मत छोड़कर हमारे विश्वास में आई है, और वह उस गाँव के विषय में, जहाँ वह रहती है, कहती है: “यहाँ एक मिशन-केन्द्र है, और युवक हमें प्रचार करने आते हैं। मैं इन युवा सज्जनों में दोष नहीं निकालना चाहती, परन्तु वे हमें बहुत-सी बड़ी सुन्दर छोटी-छोटी कहानियाँ सुनाते हैं, और मुझे नहीं लगता कि उनकी बातों में इसके अलावा कुछ ख़ास होता है। फिर, उनकी कुछ छोटी-छोटी कहानियाँ मैंने पहले भी सुनी हैं, इसलिए वे मुझमें उतनी रुचि नहीं जगातीं, जितनी जगातीं यदि वे हमें पवित्रशास्त्र में से कोई अच्छा सिद्धान्त बताते।”
निःसन्देह यही बात बहुत से अन्य लोगों के मन में भी आई है। “सुन्दर कहानियाँ” अपनी जगह ठीक हैं, परन्तु उन पर उपदेश के बड़े आकर्षण के रूप में निर्भर रहना कदापि ठीक नहीं होगा। इसके अतिरिक्त, इन “सुन्दर छोटी-छोटी कहानियों” में से कुछ के विषय में सावधान हो जाइए, क्योंकि उनका समय बीत चुका है; वे बेचारी घिस-घिसकर तार-तार हो गई हैं और उन्हें चिथड़ों के थैले में चले जाना चाहिए। उनमें से कुछ को मैंने इतनी बार सुना है कि मैं उन्हें स्वयं सुना सकता हूँ, परन्तु इसकी कोई आवश्यकता नहीं। घिसी-पिटी दृष्टान्त-कथाओं से हम और हमारे श्रोता दोनों दया करके छुड़ाए जाएँ। पुराने चुटकुले तब हमें उबा देते हैं जब छिछली बुद्धिवाले उन्हें अपने विचारों के रूप में फुटकर बेचते हैं, और जिन दृष्टान्त-कथाओं को हमारे परदादाओं ने सुना था, उनका मन पर लगभग वैसा ही प्रभाव होता है। उदाहरणों के उन अत्यन्त लोकप्रिय संकलनों से सावधान रहिए जो हर संडे-स्कूल शिक्षक के हाथ में होते हैं, क्योंकि जो बात हर कोई पहले से कण्ठस्थ जानता है, उसे दोहराने के लिए कोई आपको धन्यवाद नहीं देगा। यदि आप दृष्टान्त-कथाएँ सुनाएँ, तो उनमें कुछ ताज़गी और मौलिकता हो; अपनी आँखें खुली रखिए, और बगीचे और खेत से अपने हाथों से फूल चुनिए; वे दूसरों के गुलदस्तों से उधार लिए गए मुरझाए नमूनों से कहीं अधिक स्वीकार्य होंगे, चाहे वे कभी कितने ही सुन्दर क्यों न रहे हों।
भरपूर और उपयुक्त उदाहरण दीजिए, परन्तु विदेशी स्रोतों से आयात किए गए दृष्टान्तों से उतना नहीं जितना स्वयं विषय में से उपजी उपयुक्त उपमाओं से। फिर भी, उदाहरण को ही सब कुछ मत समझिए; वह खिड़की है, परन्तु उस प्रकाश का क्या उपयोग जिसे वह भीतर आने देती है, यदि आपके पास प्रकाश के द्वारा प्रकट करने के लिए कुछ है ही नहीं? अपने व्यंजनों को सजाइए, परन्तु स्मरण रखिए कि ध्यान देने की मुख्य बात मांस है, सजावट नहीं। सच्ची शिक्षा दी जानी चाहिए और ठोस सिद्धान्त सिखाया जाना चाहिए, नहीं तो आप पाएँगे कि आपकी चित्रात्मक भाषा आपके श्रोताओं को फीकी लगने लगी है, और वे आत्मिक भोजन के लिए तरसेंगे।
अपने उपदेशों में उस गुण को विकसित कीजिए जिसे मि. टेलर “चौंकाने की शक्ति” कहते हैं। ध्यान जीतने के लिए उसमें बड़ा बल है। वह मत कहिए जिसकी हर किसी को आपसे आशा थी। अपने वाक्यों को घिसी-पिटी लीकों से बाहर रखिए। यदि आपने कहा है, “उद्धार पूरी तरह अनुग्रह से है,” तो सदा यह मत जोड़िए, “और मानवीय योग्यता से नहीं,” बल्कि उसमें बदलाव लाइए और कहिए, “उद्धार पूरी तरह अनुग्रह से है; आत्म-धार्मिकता के पास अपना सिर छिपाने को एक कोना भी नहीं।” मुझे डर है कि मैं मि. टेलर का कोई वाक्य इस प्रकार याद नहीं कर सकता कि उसके साथ न्याय हो सके, परन्तु वह कुछ इस प्रकार था: “आप में से कुछ लोग ईश्वरीय जीवन में कोई प्रगति नहीं करते, क्योंकि आप थोड़ी दूर आगे बढ़ते हैं और फिर बहकर वापस लौट आते हैं: ठीक ज्वार-भाटेवाली नदी में उस जहाज़ की तरह जो धारा के साथ नीचे बस उतनी ही दूर जाता है कि लौटते ज्वार के साथ फिर वापस ले आया जाए। इसी प्रकार आप कुछ समय तक अच्छी प्रगति करते हैं, और फिर अचानक”—उन्होंने क्या कहा? “आप किसी कीचड़-भरी खाड़ी में अटक जाते हैं।” क्या उन्होंने हमें इस आशय की एक बात भी नहीं सुनाई थी, “उन्हें निश्चय था कि यदि वे परिवर्तित हो गए हैं तो वे सीधाई से चलेंगे और अपने बैलों को अपने पड़ोसी के अनाज से दूर रखेंगे।”
कभी-कभी चौंकाने की इस पद्धति का सहारा लेने से श्रोतागण उचित प्रत्याशा की अवस्था में बने रहेंगे। पिछले वर्ष लगभग इसी समय मैं भूमध्य सागर के किनारे मेन्टोन के समुद्र-तट पर बैठा था। लहरें बहुत धीरे-धीरे उठ और गिर रही थीं, क्योंकि वहाँ ज्वार-भाटा बहुत कम या बिलकुल नहीं होता, और हवा थमी हुई थी। लहरें एक के बाद एक सुस्ती से रेंगती हुई ऊपर आती थीं, और मैंने उन पर बहुत कम ध्यान दिया, यद्यपि वे ठीक मेरे पैरों तक आ रही थीं। अचानक, मानो किसी नये आवेश से भरकर, समुद्र ने एक दूर तक पहुँचनेवाली लहर ऊपर भेजी, जिसने मुझे पूरी तरह भिगो दिया। मैं पहले चाहे कितना भी शान्त बैठा था, आप आसानी से कल्पना कर सकते हैं कि मैं कितनी जल्दी अपने पैरों पर खड़ा हो गया, और मेरा दिवास्वप्न कितनी शीघ्रता से समाप्त हो गया। मैंने अपने पास बैठे एक सेवक भाई से कहा, “इससे हमें पता चलता है कि कैसे प्रचार करना चाहिए; लोगों को जगाने के लिए हमें उन्हें किसी ऐसी बात से चकित करना होगा जिसकी वे आशा नहीं कर रहे थे।”
भाइयो, उन्हें अनजाने में पकड़िए। अपने वज्र को निर्मल आकाश से गिरने दीजिए। जब सब कुछ शान्त और उजला हो, तब आँधी को उमड़ पड़ने दीजिए, और विरोधाभास के द्वारा उसके भय को और भी बढ़ा दीजिए। परन्तु स्मरण रखिए कि यदि प्रचार करते समय आप स्वयं सो जाएँ तो कुछ भी काम नहीं आएगा। क्या यह सम्भव है? अरे, सम्भव! यह हर रविवार होता है। बहुत से सेवक पूरे उपदेश के दौरान आधे से अधिक सोए रहते हैं; वास्तव में, वे कभी किसी समय जागे ही नहीं थे, और सम्भवतः कभी जागेंगे भी नहीं, जब तक कि उनके कान के पास तोप न दागी जाए: फीके वाक्यांश, घिसे-पिटे मुहावरे और नीरस एकस्वरता उनके प्रवचनों की मुख्य सामग्री होते हैं, और वे आश्चर्य करते हैं कि लोग इतने ऊँघते क्यों हैं। मैं मानता हूँ कि मुझे आश्चर्य नहीं होता।
ध्यान पाने में एक बहुत उपयोगी सहायता है—ठहराव। बीच-बीच में अचानक रुक जाइए, और आपकी घोड़ागाड़ी के यात्री जाग उठेंगे। जब चक्की के पहिये घूमते रहते हैं तो चक्कीवाला सो जाता है; परन्तु यदि किसी-न-किसी कारण से पिसाई रुक जाए, तो वह भला आदमी चौंककर पुकारता है, “अब क्या हुआ?” गर्मियों के किसी उमस-भरे दिन, यदि कोई भी चीज़ उनींदेपन को दूर न रख सके, तो बहुत संक्षिप्त रहिए, सामान्य से अधिक गीत गाइए, या किसी एक-दो भाइयों को प्रार्थना करने के लिए कहिए। एक सेवक ने, जिसने देखा कि लोग सोए बिना नहीं मानेंगे, बैठकर कहा, “मैंने देखा कि आप सब विश्राम कर रहे हैं, तो मैंने सोचा कि मैं भी विश्राम कर लूँ।”
एंड्रयू फ़ुलर ने अभी उपदेश आरम्भ ही किया था कि उन्होंने लोगों को सोते हुए देखा। उन्होंने कहा, “मित्रो, मित्रो, मित्रो, यह नहीं चलेगा। कभी-कभी जब आप सो जाते थे तो मैंने सोचा कि यह मेरा दोष है, परन्तु अब तो आप मेरे आरम्भ करने से पहले ही सो गए हैं, इसलिए यह अवश्य आपका दोष होगा। कृपया जाग जाइए और मुझे आपका कुछ भला करने का अवसर दीजिए।”
रुकना जानिए। जगानेवाले मौन के कोष्ठक बीच में डालने का विशेष ध्यान रखिए। जब श्रोता ध्यान न दे रहे हों, तब बोलना चाँदी है, परन्तु चुप रहना सोना है। साधारण सामग्री और एक-सी आवाज़ के साथ बोलते रहिए, बोलते रहिए, बोलते रहिए, बोलते रहिए, बोलते रहिए, तो आप पालना झुला रहे हैं, और उसका परिणाम और भी गहरी नींद होगी; पालने को एक झटका दीजिए, और नींद भाग जाएगी।
मैं फिर से सुझाव देता हूँ कि पूरे प्रवचन के दौरान ध्यान पाने के लिए हमें लोगों को यह अनुभव कराना होगा कि जो हम उनसे कह रहे हैं उसमें उनका अपना हित है। वास्तव में यह एक अत्यन्त आवश्यक बात है, क्योंकि जब तक किसी को अपने लाभ की कोई बात सुनने की आशा हो, तब तक कोई नहीं सोता। मैंने कुछ बड़ी विचित्र बातें सुनी हैं, परन्तु मैंने कभी किसी ऐसे व्यक्ति के विषय में नहीं सुना जो उस समय सो गया हो जब कोई वसीयत पढ़ी जा रही थी जिसमें उसे विरासत मिलने की आशा थी, और न ही मैंने किसी ऐसे बन्दी के विषय में सुना जो उस समय सो गया हो जब न्यायाधीश मुक़दमे का सार प्रस्तुत कर रहा था और उसका जीवन संकट में लटका था।
अपना हित ध्यान को तीव्र करता है। व्यावहारिक विषयों पर—दबाव डालनेवाली, वर्तमान, व्यक्तिगत बातों पर—प्रचार कीजिए, और आपको उत्सुकता से सुना जाएगा।
अच्छा होगा कि परिचारकों को गैस या मोमबत्तियों को छेड़ने, या चन्दे की थालियाँ बाँटने, या खिड़कियाँ खोलने के लिए गलियारों में इधर-उधर आने-जाने से रोका जाए। स्थान में इधर-उधर दौड़ते फिरते डीकन और गिरजा-सेवक एक ऐसी यातना हैं जिसे कभी धीरज से सहा नहीं जा सकता, और उनसे नम्रता से, परन्तु दृढ़ता से, अपनी चहलक़दमी रोक देने का अनुरोध किया जाना चाहिए।
देर से आने का भी उपचार आवश्यक है, और हमें अपने सबसे कोमल तर्कों और समझाने-बुझाने को उस पर लागू करना चाहिए। मुझे निश्चय है कि मण्डली में होनेवाली बहुत-सी गड़बड़ियों में, जो हमारी नसों को झकझोर देती हैं और हमारे विचारों को भटका देती हैं, शैतान का हाथ होता है। बेंच के दरवाज़े का धड़ाम से बन्द होना, फ़र्श पर छड़ी का खटाक से गिरना, या किसी बच्चे का रोना—ये सब उस दुष्ट के हाथ में हमें हमारे काम में बाधा डालने के सुविधाजनक साधन हैं; इसलिए हम पूरी तरह उचित रूप से अपने लोगों से विनती कर सकते हैं कि वे इस प्रकार के आक्रमणों से हमारी उपयोगिता की रक्षा करें।
आरम्भ में मैंने आपको ध्यान पाने के लिए एक स्वर्णिम नियम दिया था, अर्थात्, सदा कुछ ऐसा कहिए जो सुनने योग्य हो। अब मैं आपको एक हीरे का नियम देकर समाप्त करूँगा। आप स्वयं परमेश्वर के आत्मा से वस्त्र पहने हुए हों, और तब ध्यान देने या न देने का कोई प्रश्न ही नहीं उठेगा। अपनी कोठरी से और परमेश्वर के साथ संगति से ताज़ा होकर आइए, और परमेश्वर की ओर से अपने सारे हृदय और प्राण से मनुष्यों से बात कीजिए, तो आपका उन पर अधिकार होगा ही। आपके मुँह में सोने की ज़ंजीरें होंगी जो उन्हें कसकर बाँधे रखेंगी। जब परमेश्वर बोलता है तो मनुष्यों को सुनना ही पड़ता है; और यद्यपि वह उन्हीं के समान किसी दीन, दुर्बल मनुष्य के द्वारा बोले, फिर भी सत्य की महिमा उन्हें उसकी आवाज़ पर ध्यान देने के लिए विवश करेगी।
अलौकिक सामर्थ्य ही आपका भरोसा होनी चाहिए। हम आपसे कहते हैं, वक्तृत्व-कला में स्वयं को सिद्ध कीजिए, ज्ञान के सब क्षेत्रों में परिश्रम कीजिए, अपने उपदेश को मानसिक और वाक्पटुता की दृष्टि से वह सब बनाइए जो उसे होना चाहिए (ऐसी सेवा में आपको इससे कम नहीं करना चाहिए), परन्तु साथ ही स्मरण रखिए कि मनुष्यों का नया जन्म या पवित्रीकरण “न तो बल से, और न शक्ति से” होता है, परन्तु “मेरे आत्मा के द्वारा, यहोवा का यही वचन है।”
क्या आपको कभी-कभी यह अनुभव नहीं होता कि आपने उत्साह को चोगे की तरह ओढ़ लिया है, और आप परमेश्वर के आत्मा से लबालब भर गए हैं? ऐसे समयों पर आपको सुननेवाले लोग मिले हैं, और शीघ्र ही विश्वास करनेवाले लोग भी; परन्तु यदि आप इस प्रकार ऊपर से सामर्थ्य से सम्पन्न नहीं हैं, तो आप उनके लिए उस संगीतकार से बढ़कर कुछ नहीं जो किसी सुन्दर वाद्य को बजाता है, या स्पष्ट स्वर में कोई मधुर गीत गाता है, जो कान तक तो पहुँचता है परन्तु हृदय तक नहीं। यदि आप हृदय को नहीं छूते, तो आप शीघ्र ही कान को थका देंगे। इसलिए परमेश्वर के आत्मा की सामर्थ्य को वस्त्र की तरह पहन लीजिए, और मनुष्यों को ऐसे लोगों की तरह प्रचार कीजिए जिन्हें शीघ्र ही लेखा देना है, और जो चाहते हैं कि उनका लेखा उनके लोगों के लिए दुःखदायी और उनके अपने लिए शोकजनक न हो, बल्कि परमेश्वर की महिमा के लिए हो।
भाइयो, जब आप उसके नाम में निकलकर पुकारें, “जिसके सुनने के कान हों, वह सुन ले,” तब प्रभु आपके साथ रहे।
