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सेवकाई के लिए बुलाहट
हर वह मसीही, जिसमें ऐसा करने की योग्यता है, सुसमाचार फैलाने का अधिकार रखता है; और इससे भी बढ़कर, उसे केवल अधिकार ही नहीं है, वरन् जब तक वह जीवित है, ऐसा करना उसका कर्तव्य है। प्रकाशितवाक्य 22:17। सुसमाचार का प्रसार थोड़े-से लोगों पर नहीं, वरन् प्रभु यीशु मसीह के सब चेलों पर छोड़ा गया है। पवित्र आत्मा ने जिस परिमाण में अनुग्रह उसे सौंपा है, उसी के अनुसार हर व्यक्ति अपने दिनों में और अपनी पीढ़ी में, कलीसिया में भी और अविश्वासियों के बीच भी, सेवा करने के लिए बाध्य है। वास्तव में यह प्रश्न पुरुषों से आगे बढ़कर दूसरे लिंग, अर्थात् समस्त स्त्री-जाति को भी सम्मिलित करता है। विश्वासी चाहे पुरुष हों या स्त्री, जब ईश्वरीय अनुग्रह उन्हें समर्थ बनाए, तो वे सब के सब प्रभु यीशु मसीह के ज्ञान को फैलाने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगाने के लिए बाध्य हैं।
तौभी, यह आवश्यक नहीं कि हमारी सेवा प्रचार का ही विशेष रूप ले—निश्चय ही कुछ दशाओं में उसे यह रूप नहीं लेना चाहिए, जैसे उदाहरण के लिए स्त्रियों की दशा में, जिनका सार्वजनिक रूप से शिक्षा देना 1 तीमुथियुस 2:12 और 1 कुरिन्थियों 14:34 में स्पष्ट रूप से वर्जित है। परन्तु फिर भी यदि हममें प्रचार करने की योग्यता है, तो हम उसका उपयोग करने के लिए बाध्य हैं।
तौभी, इस व्याख्यान में मैं कभी-कभार किए जानेवाले प्रचार की, या सब पवित्र लोगों के लिए सामान्य सेवकाई के किसी अन्य रूप की चर्चा नहीं कर रहा, वरन् पास्टर के काम और पद की चर्चा कर रहा हूँ, जिसमें कलीसिया में शिक्षा देना और शासन करना, दोनों सम्मिलित हैं; जो यह माँग करता है कि मनुष्य अपना सम्पूर्ण जीवन आत्मिक कार्य के लिए समर्पित करे और हर सांसारिक व्यवसाय से अलग रहे, 2 तीमुथियुस 2:4; और जो उस मनुष्य को यह अधिकार देता है कि वह अपनी सांसारिक आवश्यकताओं के लिए अपने आप को परमेश्वर की कलीसिया पर डाल दे, क्योंकि वह अपना सारा समय, अपनी सारी शक्ति और अपने सारे प्रयत्न उन लोगों की भलाई के लिए दे देता है जिनकी वह अध्यक्षता करता है। 1 कुरिन्थियों 9:11; 1 तीमुथियुस 5:18। ऐसे ही मनुष्य को पतरस इन शब्दों में सम्बोधित करता है, “परमेश्वर के उस झुण्ड की, जो तुम्हारे बीच में है, रखवाली करो, और उसकी देख-रेख करो।” 1 पतरस 5:2।
अब, कलीसिया में सब के सब निगरानी या शासन नहीं कर सकते—कुछ ऐसे भी होने चाहिए जिनकी निगरानी की जाए और जिन पर शासन हो; और हम विश्वास करते हैं कि पवित्र आत्मा परमेश्वर की कलीसिया में कुछ लोगों को अध्यक्षों के रूप में कार्य करने के लिए नियुक्त करता है, जबकि दूसरों को इस बात के लिए इच्छुक बनाया जाता है कि उनकी भलाई के लिए उनकी देख-रेख की जाए। सब के सब वचन और शिक्षा में परिश्रम करने, या प्राचीन होने, या पास्टर के पद का निर्वाह करने के लिए नहीं बुलाए गए हैं; और न सब को ऐसे कामों की लालसा करनी चाहिए, क्योंकि इनके लिए आवश्यक वरदानों की प्रतिज्ञा सब से कहीं भी नहीं की गई है। परन्तु ऐसे महत्त्वपूर्ण कार्यों में वे ही अपने आप को लगाएँ जो प्रेरित के समान यह अनुभव करते हैं कि उन्हें “यह सेवकाई मिली” है। 2 कुरिन्थियों 4:1।
कोई भी मनुष्य अधीन चरवाहे के रूप में भेड़शाला में ज़बरदस्ती न घुसे; उसे प्रधान चरवाहे की ओर दृष्टि लगाए रखनी चाहिए और उसके संकेत और आज्ञा की बाट जोहनी चाहिए। परमेश्वर के राजदूत के रूप में आगे आने से पहले मनुष्य को ऊपर से आनेवाली बुलाहट की प्रतीक्षा करनी चाहिए; और यदि वह ऐसा नहीं करता, वरन् उस पवित्र पद में दौड़कर घुस जाता है, तो प्रभु उसके और उसके समान दूसरों के विषय में कहेगा, “मैं ने न तो उनको भेजा और न कुछ आज्ञा दी; इसलिये उनसे इन लोगों का कुछ भी लाभ न होगा, यहोवा की यही वाणी है।” यिर्मयाह 23:32।
पुराने नियम को देखने से आप पाएँगे कि पुराने प्रबन्ध के युग में परमेश्वर के सन्देशवाहक यहोवा की ओर से अधिकार-पत्र पाने का दावा करते थे। यशायाह हमें बताता है कि साराप में से एक ने वेदी पर से लिए हुए जलते अंगारे से उसके होंठों को छुआ, और प्रभु का यह शब्द सुनाई पड़ा, “मैं किस को भेजूँ, और हमारी ओर से कौन जाएगा?” यशायाह 6:8। तब भविष्यद्वक्ता ने कहा, “मैं यहाँ हूँ! मुझे भेज।” जब तक प्रभु ने इस प्रकार विशेष रूप से उसकी सुधि लेकर उसे उसके कार्य के योग्य न बना दिया, तब तक वह नहीं दौड़ा। “और यदि भेजे न जाएँ, तो क्योंकर प्रचार करें?”—ये शब्द उस समय तक कहे नहीं गए थे, परन्तु उनका गम्भीर अर्थ भली-भाँति समझा जाता था।
यिर्मयाह अपने पहले अध्याय में अपनी बुलाहट का विस्तार से वर्णन करता है: “यहोवा का यह वचन मेरे पास पहुँचा, ‘गर्भ में रचने से पहले ही मैं ने तुझ पर चित्त लगाया, और उत्पन्न होने से पहले ही मैं ने तुझे अलग किया; मैं ने तुझे जातियों का भविष्यद्वक्ता ठहराया।’
“हाय, प्रभु यहोवा!” मैं ने कहा, “देख, मैं तो बोलना ही नहीं जानता; मैं तो लड़का ही हूँ।”
परन्तु यहोवा ने मुझ से कहा, “मत कह कि ‘मैं लड़का हूँ।’ क्योंकि जिस किसी के पास मैं तुझे भेजूँ, वहाँ तू जाएगा, और जो कुछ मैं तुझे आज्ञा दूँ, वही तू कहेगा। तू उनसे मत डर, क्योंकि तुझे छुड़ाने के लिये मैं तेरे साथ हूँ,” यहोवा की यही वाणी है। तब यहोवा ने हाथ बढ़ाकर मेरे मुँह को छुआ, और मुझ से कहा, “देख, मैं ने अपने वचन तेरे मुँह में डाल दिये हैं। सुन, मैं ने आज के दिन तुझे जातियों और राज्यों के ऊपर अधिकारी ठहराया है, कि तू उन्हें उखाड़े और गिराए, नष्ट करे और ढा दे, बनाए और रोपे।” यिर्मयाह 1:4-10।
बाहरी रूप में भिन्न, परन्तु उसी उद्देश्य का, यहेजकेल को दिया गया अधिकार-पत्र था; उसके अपने शब्दों में वह इस प्रकार है: “उसने मुझ से कहा, ‘हे मनुष्य के सन्तान, अपने पाँवों के बल खड़ा हो, और मैं तुझ से बातें करूँगा।’
जब वह मुझ से बातें कर रहा था, तब आत्मा ने मुझ में समाकर मुझे पाँवों के बल खड़ा कर दिया; और जो मुझ से बातें करता था, उसकी मैं ने सुनी। उसने कहा, “हे मनुष्य के सन्तान, मैं तुझे इस्राएलियों के पास, अर्थात् बलवा करनेवाली जाति के पास भेजता हूँ, जिसने मेरे विरुद्ध बलवा किया है; वे और उनके पुरखा आज के दिन तक मेरा अपराध करते चले आए हैं। जिन लोगों के पास मैं तुझे भेजता हूँ, वे निर्लज्ज और हठीले हैं। तू उनसे कहना, ‘प्रभु यहोवा यों कहता है।’ और वे, चाहे सुनें या न सुनें—क्योंकि वे बलवा करनेवाले घराने के हैं—तौभी वे इतना जान लेंगे कि हमारे बीच एक भविष्यद्वक्ता प्रगट हुआ है। और हे मनुष्य के सन्तान, तू उनसे और उनकी बातों से न डरना। चाहे तेरे चारों ओर ऊँटकटारे और काँटे हों, और तू बिच्छुओं के बीच रहता हो, तौभी न डरना। यद्यपि वे बलवा करनेवाले घराने के हैं, तौभी न उनकी बातों से डरना और न उनसे भयभीत होना।” यहेजकेल 2:1-6
“फिर उसने मुझ से कहा, ‘हे मनुष्य के सन्तान, जो तुझे मिला है उसे खा ले; इस पुस्तक को खा, तब जाकर इस्राएल के घराने से बातें कर।’ इसलिये मैं ने मुँह खोला और उसने वह पुस्तक मुझे खिला दी। तब उसने मुझ से कहा, ‘हे मनुष्य के सन्तान, यह पुस्तक जो मैं तुझे देता हूँ, उसे खा ले, और अपना पेट इससे भर ले।’ अतः मैं ने उसे खा लिया; और मेरे मुँह में वह मधु के समान मीठी लगी। फिर उसने मुझ से कहा, ‘हे मनुष्य के सन्तान, तू अब इस्राएल के घराने के पास जाकर उनको मेरे वचन सुना।’” यहेजकेल 3:1-4।
दानिय्येल की भविष्यद्वाणी करने की बुलाहट, यद्यपि लिखी नहीं गई है, तौभी उसे दिए गए दर्शनों से, और उस अत्यधिक अनुग्रह से, जो अपने एकान्त मनन में और अपने सार्वजनिक कार्यों में, दोनों में उसे प्रभु के सामने प्राप्त था, भरपूरी से प्रमाणित होती है।
अन्य सब भविष्यद्वक्ताओं की एक-एक करके समीक्षा करना आवश्यक नहीं, क्योंकि वे सब “यहोवा यों कहता है” कहकर बोलने का दावा करते थे।
वर्तमान प्रबन्ध के युग में याजकपद सब पवित्र लोगों का साझा है; परन्तु भविष्यद्वाणी करना, या उसके समान कोई बात, अर्थात् पवित्र आत्मा की प्रेरणा से अपने आप को पूरी रीति से सुसमाचार के प्रचार के लिए सौंप देना, वास्तव में अपेक्षाकृत थोड़े ही लोगों का वरदान और बुलाहट है; और निश्चय ही इन लोगों को अपने पद की उचितता के विषय में उतना ही निश्चित होना आवश्यक है जितने भविष्यद्वक्ता थे; और फिर वे वैसी ही बुलाहट के बिना अपने पद को उचित कैसे ठहरा सकते हैं?
और न कोई यह कल्पना करे कि ऐसी बुलाहटें केवल भ्रम हैं, और इस युग में कोई भी कलीसिया को शिक्षा देने और उसकी देख-रेख करने के विशेष काम के लिए अलग नहीं किया जाता; क्योंकि नये नियम में सेवकों को दिए गए नाम ही इस बात का संकेत देते हैं कि उनके काम के लिए उन्हें पहले से बुलाहट मिली है। प्रेरित कहता है, “सो हम परमेश्वर के राजदूत हैं;” परन्तु क्या राजदूत के पद का प्राण ही उस नियुक्ति में नहीं है जो उस राजा के द्वारा की जाती है जिसका वह प्रतिनिधित्व करता है? बिना भेजा हुआ राजदूत तो हँसी का पात्र होगा। जो लोग अपने आप को मसीह के राजदूत घोषित करने का साहस करते हैं, उन्हें अत्यन्त गम्भीरता से यह अनुभव करना चाहिए कि प्रभु ने मेल-मिलाप का वचन उन्हें “सौंप दिया” है। 2 कुरिन्थियों 5:18, 19। यदि यह कहा जाए कि यह बात केवल प्रेरितों तक सीमित है, तो मेरा उत्तर यह है कि यह पत्री केवल पौलुस के नाम से नहीं, वरन् तीमुथियुस के नाम से भी लिखी गई है, और इसलिए इसमें प्रेरिताई के अतिरिक्त अन्य सेवकाई भी सम्मिलित है।
कुरिन्थियों को लिखी पहली पत्री में हम पढ़ते हैं, “मनुष्य हमें (यहाँ ‘हमें’ का अर्थ पौलुस और सोस्थिनेस है, 1 कुरिन्थियों 1:1) मसीह के सेवक और परमेश्वर के भेदों के भण्डारी समझे।” 1 कुरिन्थियों 4:1। निश्चय ही भण्डारी को अपना पद स्वामी से प्राप्त होना चाहिए। वह केवल इसलिए भण्डारी नहीं हो सकता कि वह ऐसा होना चाहता है, या दूसरे उसे ऐसा समझते हैं। यदि हममें से कोई अपने आप को वेस्टमिंस्टर के मार्क्विस का भण्डारी चुन ले, और उसकी सम्पत्ति का प्रबन्ध करने लगे, तो हमारी भूल बहुत शीघ्र और अत्यन्त कायल कर देनेवाले ढंग से हमें दिखा दी जाएगी। स्पष्ट है कि किसी मनुष्य के वैध रूप से पास्टर, अर्थात् “परमेश्वर का भण्डारी” बनने से पहले अधिकार का होना आवश्यक है। तीतुस 1:7।
प्रकाशितवाक्य में प्रयुक्त “दूत” की उपाधि (प्रकाशितवाक्य 2:1) का अर्थ है सन्देशवाहक; और मनुष्य मसीह के घोषणा करनेवाले कैसे हो सकते हैं, जब तक कि वह स्वयं उन्हें न चुने और न ठहराए? यदि “दूत” शब्द को सेवक पर लागू करने पर प्रश्न उठाया जाए, तो हमें प्रसन्नता होगी यदि कोई यह दिखा दे कि यह किसी और से सम्बन्ध रख सकता है। आत्मा कलीसिया में उसके प्रतिनिधि के रूप में और किसे लिखता, सिवाय किसी ऐसे व्यक्ति के जो अध्यक्षता करनेवाले प्राचीन के समान पद पर हो?
तीतुस को आज्ञा दी गई थी कि वह अपनी सेवकाई का पूरा प्रमाण दे—निश्चय ही कुछ था जिसे प्रमाणित करना था। कुछ लोग “आदर के पात्र, पवित्र ठहराए हुए, और स्वामी के काम आने योग्य, और हर भले काम के लिये तैयार” हैं। 2 तीमुथियुस 2:21। स्वामी से यह अधिकार नहीं छीना जा सकता कि वह जिन पात्रों को काम में लाता है, उन्हें स्वयं चुने; वह आज भी कुछ मनुष्यों के विषय में वैसा ही कहेगा जैसा उसने तरसुस के शाऊल के विषय में कहा था, “वह तो अन्यजातियों के सामने मेरा नाम प्रगट करने के लिये मेरा चुना हुआ पात्र है।” प्रेरितों के काम 9:15। जब हमारा प्रभु ऊँचे पर चढ़ा, तो उसने मनुष्यों को दान दिए, और यह ध्यान देने योग्य है कि ये दान ऐसे मनुष्य थे जो विभिन्न कार्यों के लिए अलग किए गए थे: “उसने कितनों को प्रेरित, और कितनों को भविष्यद्वक्ता, और कितनों को सुसमाचार सुनानेवाले, और कितनों को रखवाले और उपदेशक नियुक्त करके दे दिया” (इफिसियों 4:11)। इससे स्पष्ट है कि हमारे प्रभु के स्वर्गारोहण के परिणामस्वरूप कुछ व्यक्ति कलीसियाओं को पास्टरों के रूप में दिए गए हैं; वे परमेश्वर के दिए हुए हैं, और इसलिए उन्होंने स्वयं अपने आप को उस पद पर ऊँचा नहीं उठाया है।
भाइयो, मुझे भरोसा है कि आप एक दिन उस झुण्ड के विषय में बात कर सकेंगे जिस पर “पवित्र आत्मा ने आपको अध्यक्ष ठहराया है” (प्रेरितों के काम 20:28), और मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप में से हर एक अन्यजातियों के प्रेरित के साथ यह कह सके कि आपकी सेवकाई न मनुष्यों की ओर से है, न मनुष्य के द्वारा, वरन् आपने उसे प्रभु से पाया है। गलातियों 1:1।
आप में वह प्राचीन प्रतिज्ञा पूरी हो, “मैं उन्हें अपने मन के अनुकूल चरवाहे दूँगा।” यिर्मयाह 3:15। “मैं उनके लिये ऐसे चरवाहे ठहराऊँगा जो उन्हें चराएँगे।” यिर्मयाह 23:4।
प्रभु स्वयं आप में से हर एक के जीवन में अपनी यह घोषणा पूरी करे: “हे यरूशलेम, मैं ने तेरी शहरपनाह पर पहरुए बैठाए हैं; वे दिन-रात कभी चुप न रहेंगे।” आप अनमोल को निकम्मे में से अलग करें, और इस प्रकार परमेश्वर के मुख के समान हों। यिर्मयाह 15:19। प्रभु आपके द्वारा हर स्थान पर यीशु के ज्ञान की सुगन्ध प्रगट करे, और आपको “परमेश्वर के निकट उद्धार पानेवालों और नाश होनेवालों, दोनों के लिये मसीह की सुगन्ध” बनाए। 2 कुरिन्थियों 2:15।
मिट्टी के बरतनों में अनमोल धन रखे हुए, आप पर ईश्वरीय सामर्थ की असीम महिमा ठहरी रहे, और इस प्रकार आप परमेश्वर की महिमा भी करें और सब मनुष्यों के लहू से निर्दोष भी ठहरें। जैसे प्रभु यीशु पहाड़ पर चढ़ गया और जिन्हें वह चाहता था उन्हें अपने पास बुलाया, और फिर उन्हें प्रचार करने के लिए भेजा (मरकुस 3:13)—वैसे ही वह आपको भी चुने, अपने साथ संगति करने के लिए आपको ऊपर बुलाए, और अपने चुने हुए सेवकों के रूप में आपको भेजे, कि आप कलीसिया और संसार, दोनों के लिए आशीष का कारण बनें।
कोई युवक कैसे जाने कि वह बुलाया गया है या नहीं? यह एक गम्भीर प्रश्न है, और मैं इस पर अत्यन्त गम्भीरता से विचार करना चाहता हूँ। आह, ऐसा करने में मुझे ईश्वरीय मार्गदर्शन मिले! हमारे चारों ओर की निष्फल सेवकाइयों और क्षीण होती कलीसियाओं से यह दुःखद रूप से स्पष्ट है कि सैकड़ों लोग अपना मार्ग भूल गए हैं और ठोकर खाकर मंच (पल्पिट) पर जा चढ़े हैं। किसी मनुष्य के लिए अपनी बुलाहट को चूक जाना एक भयानक विपत्ति है; और जिस कलीसिया पर वह अपने आप को थोप देता है, उसके लिए उसकी भूल अत्यन्त दुःखदायी प्रकार का क्लेश बन जाती है। यह चिन्तन के लिए एक विचित्र और पीड़ादायक विषय होगा—कि बुद्धि रखनेवाले मनुष्य कितनी बार अपने अस्तित्व के उद्देश्य को गलत समझ लेते हैं, और ऐसी वस्तुओं के पीछे लगते हैं जिनके पीछे चलने के लिए वे कभी बनाए ही नहीं गए थे।
जब मैं उस लगभग असीम हानि के विषय में सोचता हूँ जो मसीही पास्टर-पद के लिए हमारी बुलाहट के विषय में भूल होने से उत्पन्न हो सकती है, तो मैं इस भय से अभिभूत हो जाता हूँ कि कहीं हममें से कोई अपने प्रमाण-पत्रों की जाँच करने में ढिलाई न करे। मैं यह अधिक पसन्द करूँगा कि हम बहुत अधिक सन्देह में रहें और बहुत बार जाँच करें, बजाय इसके कि हम भूमि को व्यर्थ रोके रहनेवाले बन जाएँ।
यदि कोई मनुष्य सच्चे मन से सेवकाई के लिए अपनी बुलाहट को परखना चाहे, तो ऐसी सटीक विधियों की कमी नहीं है जिनसे वह ऐसा कर सके। उसके लिए अनिवार्य है कि जब तक वह इस विषय में अपने आप की गम्भीर खोज और परख न कर ले, तब तक सेवकाई में प्रवेश न करे। उसका अपना व्यक्तिगत उद्धार सुनिश्चित हो जाने पर, उसे आगे के विषय की, अर्थात् पद के लिए अपनी बुलाहट की, छानबीन करनी चाहिए। पहली बात एक मसीही के रूप में उसके लिए अत्यावश्यक है, दूसरी एक पास्टर के रूप में उसके लिए उतनी ही अत्यावश्यक। बिना बुलाहट के पास्टर होना वैसा ही है जैसा बिना मन-परिवर्तन के मसीही होने का अंगीकार करनेवाला होना। दोनों दशाओं में केवल नाम है, और उससे अधिक कुछ नहीं।
1. स्वर्गीय बुलाहट का पहला चिह्न इस कार्य के लिए एक तीव्र, सब कुछ अपने में समा लेनेवाली लालसा है। सेवकाई की सच्ची बुलाहट के लिए यह आवश्यक है कि दूसरों को यह बताने की एक अदम्य, प्रबल ललक और धधकती प्यास हो कि परमेश्वर ने हमारे अपने प्राणों के लिए क्या किया है; यदि मैं इसे एक प्रकार की सहज-प्रवृत्ति कहूँ तो कैसा रहे, वैसी ही जैसी पक्षियों में ऋतु आने पर अपने बच्चों को पालने की होती है, जब माता-पक्षी अपना घोंसला छोड़ने के बजाय मर जाना पसन्द करती है।
एलीन के विषय में एक ऐसे व्यक्ति ने, जो उसे निकट से जानता था, कहा था कि “वह प्राणों के मन-परिवर्तन के लिए असीम और कभी तृप्त न होनेवाली लालसा से भरा था।” जब उसे अपने विश्वविद्यालय में फ़ेलोशिप मिल सकती थी, तब उसने पादरी (चैपलेन) का पद अधिक पसन्द किया, क्योंकि वह “प्रत्यक्ष सेवकाई के कार्य में लग जाने की अधीरता से प्रेरित” था।
“यदि आप सेवकाई में प्रवेश करने से बच सकते हैं, तो उसमें प्रवेश न कीजिए,” यह एक धर्मज्ञानी की अत्यन्त बुद्धिमानी भरी सलाह थी, जो उसने उस व्यक्ति को दी जो उसकी राय जानना चाहता था। यदि इस कमरे में कोई भी विद्यार्थी समाचार-पत्र का सम्पादक, या पंसारी, या किसान, या डॉक्टर, या वकील, या सांसद, या राजा बनकर सन्तुष्ट रह सकता है, तो स्वर्ग और पृथ्वी के नाम से, वह अपनी राह जाए—वह ऐसा मनुष्य नहीं है जिसमें परमेश्वर का आत्मा अपनी परिपूर्णता में वास करता है; क्योंकि जो मनुष्य परमेश्वर से ऐसा भरा हुआ हो, वह उस एक कार्य को छोड़, जिसके लिए उसका अन्तरतम प्राण हाँफता है, हर दूसरे कार्य से पूरी तरह ऊब जाएगा।
दूसरी ओर, यदि आप कह सकते हैं कि दोनों इंडीज़ की सारी दौलत के बदले भी आप कोई ऐसा दूसरा व्यवसाय न अपना सकते हैं और न अपनाने का साहस कर सकते हैं जिससे आप यीशु मसीह के सुसमाचार के प्रचार से अलग कर दिए जाएँ, तो निश्चय जानिए कि, यदि दूसरी बातें भी उतनी ही सन्तोषजनक हों, तो आपमें इस प्रेरिताई के चिह्न हैं। हमें यह अनुभव करना चाहिए कि यदि हम सुसमाचार न सुनाएँ तो हम पर हाय! परमेश्वर का वचन हमारी हड्डियों में आग के समान होना चाहिए; अन्यथा यदि हम सेवकाई का कार्य उठा लें, तो हम उसमें दुःखी रहेंगे, उसके साथ जुड़े आत्म-त्याग सह न सकेंगे, और जिनके बीच हम सेवा करते हैं उनके लिए बहुत कम उपयोगी होंगे। मैं आत्म-त्याग की बात करता हूँ, और ठीक ही करता हूँ; क्योंकि सच्चे पास्टर का काम उनसे भरा हुआ है, और अपनी बुलाहट से प्रेम के बिना वह शीघ्र ही हार मान लेगा, और या तो इस कठोर परिश्रम को छोड़ देगा, या असन्तोष में आगे घिसटता रहेगा, एक ऐसी नीरस एकरसता के बोझ से दबा हुआ जो चक्की में जुते अन्धे घोड़े की एकरसता जितनी थका देनेवाली होती है।
“प्रेम की शक्ति में एक सान्त्वना है; वह ऐसी बात को भी सहने योग्य बना देगी जो अन्यथा हृदय को तोड़ डालती।”
उस प्रेम से कमर कसे हुए आप निडर रहेंगे; अदम्य बुलाहट के उस कमरबन्द से, जो जादू से भी बढ़कर है, वंचित होकर आप दुर्दशा में घुल-घुलकर क्षीण हो जाएँगे।
यह लालसा सोच-विचारकर की गई होनी चाहिए। यह कोई ऐसा अचानक आवेग न हो जिसके साथ चिन्तापूर्ण विचार न किया गया हो। यह हमारे हृदय के सर्वोत्तम क्षणों की उपज होनी चाहिए, हमारी श्रद्धापूर्ण आकांक्षाओं का लक्ष्य, और हमारी अत्यन्त उत्कट प्रार्थनाओं का विषय। यह तब भी हमारे साथ बनी रहनी चाहिए जब धन और सुख-सुविधा के लुभावने प्रस्ताव इससे टकराएँ, और हर बात का उसके ठीक मूल्य पर आकलन कर लेने और लागत को पूरी तरह जोड़ लेने के बाद भी एक शान्त, स्पष्ट-विचारित संकल्प के रूप में बनी रहनी चाहिए।
जब मैं बचपन में देहात में अपने दादा के यहाँ रहता था, तो मैंने लाल कोट पहने शिकारियों की एक टोली को एक लोमड़ी के पीछे उनके खेतों में से घोड़े दौड़ाते हुए देखा। मैं आनन्द से भर गया! मेरा छोटा-सा हृदय उत्तेजित हो उठा; मैं झाड़ियों और खाइयों को लाँघते हुए शिकारी कुत्तों के पीछे जाने को तैयार था। उस प्रकार के काम के लिए मुझमें सदा से एक स्वाभाविक रुचि रही है, और बचपन में जब मुझसे पूछा जाता कि मैं क्या बनूँगा, तो मैं प्रायः कहता था कि मैं शिकारी बनूँगा। सचमुच, क्या बढ़िया पेशा है!
बहुत से युवकों का पादरी बनने के विषय में वैसा ही विचार होता है जैसा मेरा शिकारी बनने के विषय में था—एक निरा बचकाना विचार कि उन्हें वह कोट और वह बिगुल बजाना अच्छा लगेगा; वह सम्मान, वह आदर, वह आराम; और सम्भवतः वे इतने मूर्ख भी होते हैं कि सेवकाई के धन के विषय में भी सोचते हैं। (यदि वे बैपटिस्ट सेवकाई के सम्बन्ध में धन की आशा रखते हैं, तो वे निश्चय ही अज्ञानी प्राणी होंगे।) दुर्बल मनवालों के लिए प्रचारक के पद का आकर्षण बहुत बड़ा होता है, और इसलिए मैं सब युवकों को गम्भीरता से चेतावनी देता हूँ कि वे मन की तरंग को ईश्वरीय प्रेरणा, और बचकानी पसन्द को पवित्र आत्मा की बुलाहट न समझ बैठें।
भली-भाँति ध्यान दीजिए कि जिस लालसा की मैंने चर्चा की है, वह पूरी तरह निःस्वार्थ होनी चाहिए। यदि कोई मनुष्य अत्यन्त गम्भीर आत्म-परीक्षा के बाद अपने पास्टर-पद की खोज में परमेश्वर की महिमा और प्राणों की भलाई के अतिरिक्त कोई और उद्देश्य पाए, तो उसके लिए यही भला है कि वह तुरन्त उससे मुड़ जाए; क्योंकि प्रभु अपने मन्दिर में खरीदनेवालों और बेचनेवालों के लाए जाने से घृणा करेगा। किसी भी प्रकार की भाड़े की भावना का प्रवेश, चाहे वह तनिक-सा ही क्यों न हो, गंधी के तेल के पात्र में पड़ी मक्खी के समान होगा, और सब कुछ बिगाड़ देगा।
यह लालसा ऐसी हो जो हमारे साथ बनी रहे, एक ऐसी तीव्र भावना जो परीक्षा की कसौटी पर खरी उतरे, एक ऐसी अभिलाषा जिससे बच निकलना हमारे लिए बिल्कुल असम्भव हो, चाहे हमने ऐसा करने का प्रयत्न भी किया हो; वास्तव में, एक ऐसी लालसा जो वर्षों के बीतने के साथ और अधिक तीव्र होती जाए, यहाँ तक कि वचन का प्रचार करने के लिए एक तड़प, एक व्याकुलता, एक भूख बन जाए। यह तीव्र लालसा इतनी उत्तम और सुन्दर वस्तु है कि जब भी मैं इसे किसी युवक के हृदय में धधकते देखता हूँ, तो मैं उसे निरुत्साहित करने में सदा धीमा रहता हूँ, चाहे उसकी योग्यताओं के विषय में मुझे सन्देह ही क्यों न हो। उन कारणों से, जो आगे आपको बताए जाएँगे, उस ज्वाला को दबाना आवश्यक हो सकता है, परन्तु यह सदा अनिच्छा से और बुद्धिमानी से किया जाना चाहिए। मेरे मन में इस “हड्डियों में आग” के प्रति इतना गहरा आदर है कि यदि मैं स्वयं इसे अनुभव न करता, तो मुझे तुरन्त सेवकाई छोड़ देनी पड़ती। यदि आप वह पवित्र की हुई ज्वाला अनुभव नहीं करते, तो मैं आपसे विनती करता हूँ कि अपने घरों को लौट जाइए और अपने उचित क्षेत्रों में परमेश्वर की सेवा कीजिए; परन्तु यदि निश्चय ही झाऊ के अंगारे आपके भीतर धधक रहे हैं, तो उन्हें बुझाइए मत, जब तक कि वास्तव में बड़े महत्त्व की अन्य बातें आप पर यह प्रमाणित न कर दें कि वह लालसा स्वर्गीय मूल की आग नहीं है।
2. दूसरे स्थान पर, पास्टर बनने की उत्कट लालसा के साथ-साथ, सिखाने की योग्यता और सार्वजनिक शिक्षक के पद के लिए आवश्यक अन्य गुणों का भी कुछ परिमाण होना चाहिए। अपनी बुलाहट को प्रमाणित करने के लिए मनुष्य को इन बातों की सफल परख करनी चाहिए। मैं यह दावा नहीं करता कि जब कोई मनुष्य पहली बार बोलने के लिए खड़ा हो, तो उसे उतना अच्छा प्रचार करना चाहिए जितना रॉबर्ट हॉल अपने बाद के दिनों में करते थे। यदि वह उस महान व्यक्ति के आरम्भिक प्रचार से बुरा प्रचार नहीं करता, तो उसे दोषी नहीं ठहराना चाहिए। आप जानते हैं कि रॉबर्ट हॉल तीन बार पूरी तरह अटककर रह गए थे, और पुकार उठे थे, “यदि इससे मैं दीन नहीं होता, तो किसी भी बात से नहीं होऊँगा!”
कुछ सबसे श्रेष्ठ वक्ता अपने आरम्भिक दिनों में सबसे अधिक धाराप्रवाह बोलनेवाले नहीं थे। यहाँ तक कि सिसरो भी आरम्भ में दुर्बल आवाज़ और बोलने की कठिनाई से पीड़ित था। फिर भी, किसी मनुष्य को तब तक यह नहीं मानना चाहिए कि वह प्रचार करने के लिए बुलाया गया है, जब तक वह यह प्रमाणित न कर दे कि वह बोल सकता है। परमेश्वर ने निश्चय ही बहेमोत को उड़ने के लिए नहीं बनाया; और यदि लिव्यातान के मन में चंडूल पक्षी के साथ ऊपर उड़ने की प्रबल लालसा हो, तो स्पष्ट है कि यह एक मूर्खतापूर्ण आकांक्षा होगी, क्योंकि उसे पंख नहीं दिए गए हैं। यदि कोई मनुष्य प्रचार करने के लिए बुलाया गया है, तो उसे बोलने की कुछ मात्रा में योग्यता दी जाएगी, जिसे वह विकसित करेगा और बढ़ाएगा। यदि बोलने का वरदान आरम्भ में कुछ मात्रा में भी न हो, तो इसकी सम्भावना नहीं कि वह कभी विकसित होगा।
मैंने एक सज्जन के विषय में सुना है जिसमें प्रचार करने की अत्यन्त तीव्र लालसा थी, और वह अपने पास्टर से अपनी विनती का आग्रह करता रहा, यहाँ तक कि बहुत बार ठुकराए जाने के बाद उसे एक परख-उपदेश देने की अनुमति मिल गई। वह अवसर उसके हठ का अन्त सिद्ध हुआ, क्योंकि अपना मूल-पाठ घोषित करते ही उसने पाया कि एक विचार को छोड़ उसके सब विचार उससे छिन गए हैं; उस एक को उसने भावपूर्ण ढंग से कह सुनाया, और फिर मंच से नीचे उतर आया। “मेरे भाइयो,” उसने कहा, “यदि आप में से कोई प्रचार करना सरल बात समझता है, तो मेरी सलाह है कि वह यहाँ ऊपर आए और अपना सारा घमण्ड निकलवा ले!”
यदि आवश्यक योग्यता आपमें नहीं है, तो आपकी शक्तियों की परख आपकी कमी को आप पर प्रगट करने में बहुत सहायक होगी। मैं इससे अच्छी कोई विधि नहीं जानता। इस विषय में हमें अपने आप को उचित परख का अवसर देना चाहिए, नहीं तो हम निश्चित रूप से नहीं जान सकते कि परमेश्वर ने हमें बुलाया है या नहीं; और परख के इस समय में हमें प्रायः अपने आप से पूछना चाहिए कि, कुल मिलाकर, क्या हम ऐसे उपदेशों से दूसरों की उन्नति की आशा कर सकते हैं।
परन्तु हमें इसे केवल अपने विवेक और अपनी समझ के सामने रखने से कहीं अधिक करना चाहिए, क्योंकि हम अपने आप के बहुत कमज़ोर न्यायी हैं। भाइयों के एक विशेष वर्ग में यह पता लगा लेने की बड़ी क्षमता होती है कि अपने भाषणों में उन्हें बहुत ही अद्भुत और ईश्वरीय रीति से सहायता मिली है; यदि इसका कोई आधार होता, तो मैं उनकी इस महिमामय स्वतन्त्रता और आत्म-प्रसन्नता से ईर्ष्या करता; क्योंकि हाय! मुझे तो एक वक्ता के रूप में अपनी असफलता और अपनी कमियों पर बहुत बार विलाप और शोक करना पड़ता है।
हमारी अपनी राय पर अधिक भरोसा नहीं किया जा सकता, परन्तु विवेकी, आत्मिक मनवाले लोगों से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। यह किसी भी प्रकार ऐसा नियम नहीं है जो सब लोगों पर बाध्यकारी हो, फिर भी हमारी बहुत-सी देहाती कलीसियाओं में यह एक अच्छी पुरानी प्रथा है कि जो युवक सेवकाई की आकांक्षा रखता है, वह कलीसिया के सामने प्रचार करे। युवा आकांक्षी के लिए यह शायद ही कभी बहुत सुखद परीक्षा हो सकती है, और बहुत-सी दशाओं में लोगों के लिए भी यह शायद ही बहुत उन्नतिदायक अभ्यास होगा; परन्तु फिर भी यह अत्यन्त लाभदायक अनुशासन सिद्ध हो सकता है, और उद्दण्ड अज्ञानता के सार्वजनिक प्रदर्शन से बचा सकता है। आर्न्सबी की कलीसिया-पुस्तिका में निम्नलिखित प्रविष्टि है:
आर्न्सबी की कलीसिया द्वारा रॉबर्ट हॉल, जूनियर को सेवकाई के कार्य के लिए बुलाए जाने का संक्षिप्त विवरण, 13 अगस्त, 1780।
“उक्त रॉबर्ट हॉल का जन्म 2 मई, 1764 को आर्न्सबी में हुआ था; और वह बचपन से ही, स्पष्ट बोल पाने से पहले ही, न केवल गम्भीर और गुप्त प्रार्थना में लगा रहनेवाला था, वरन् सदा पूरी तरह से सेवकाई के कार्य की ओर झुका हुआ था। पूरे सात वर्ष का होने से पहले ही उसने भजन रचना आरम्भ कर दिया था, और उनमें भक्ति, गहन विचार और प्रतिभा के चिह्न प्रगट किए। आठ और नौ वर्ष की आयु के बीच उसने कई भजन लिखे, जिनकी बहुतों ने बड़ी प्रशंसा की, और उनमें से एक उसी समय के आस-पास ‘गॉस्पेल मैगज़ीन’ में छपा था। उसने विभिन्न धार्मिक विषयों पर और पवित्रशास्त्र के चुने हुए अंशों पर अपने विचार लिखे। उसी प्रकार उसमें विद्या के प्रति तीव्र रुचि थी, और उसने ऐसी उन्नति की कि जिस देहाती शिक्षक के अधीन वह था, वह उसे और आगे नहीं पढ़ा सका। तब उसे रेवरेंड जॉन राइलैंड की देख-रेख में नॉर्थैम्पटन के आवासीय विद्यालय में भेजा गया, जहाँ वह लगभग डेढ़ वर्ष रहा, और लैटिन तथा यूनानी में बड़ी उन्नति की। अक्टूबर, 1778 में वह रेवरेंड मि. इवान्स की देख-रेख में ब्रिस्टल की अकादमी में गया; और 13 अगस्त, 1780 को, जब वह सोलह वर्ष तीन महीने का था, इस कलीसिया द्वारा सेवकाई के लिए भेजा गया। जिस रीति से कलीसिया को उस महान कार्य के लिए उसकी योग्यताओं के विषय में सन्तोष प्राप्त हुआ, वह यह थी कि वह सम्मेलन-सभाओं में अपनी बारी आने पर पवित्रशास्त्र के विभिन्न अंशों पर बोलता था; जिनमें, और प्रार्थना में, वह इससे पहले चार वर्ष से अधिक समय से भाग लेता आ रहा था; और घर पर रहते हुए, उनके अनुरोध पर, उसने बार-बार प्रभु के दिन की सुबह प्रचार किया था, जिससे उन्हें बड़ा सन्तोष हुआ था। इसलिए उन्होंने सच्चे मन से और एकमत होकर अनुरोध किया कि उसे गम्भीर रीति से सार्वजनिक सेवकाई के लिए अलग किया जाए। तदनुसार, उपर्युक्त दिन, उसके पिता ने कलीसिया के सामने सेवकाई के सम्बन्ध में उसकी रुचि, उसके उद्देश्यों और उसके लक्ष्य के विषय में उसकी जाँच की, और उससे यह भी कहा गया कि वह अपने धार्मिक विचारों की घोषणा करे। यह सब कुछ कलीसिया के पूर्ण सन्तोष के अनुसार हो जाने पर, उन्होंने अपने दाहिने हाथ उठाकर और गम्भीर प्रार्थना के द्वारा उसे अलग किया। तब उसके पिता ने उसे 2 तीमुथियुस 2:1 से उपदेश दिया, ‘इसलिये हे मेरे पुत्र, तू उस अनुग्रह से जो मसीह यीशु में है, बलवन्त हो जा।’ इस प्रकार भेजे जाने पर, उसने दोपहर बाद 2 थिस्सलुनीकियों 1:7, 8 से प्रचार किया। ‘प्रभु उसे आशीष दे, और उसे बड़ी सफलता प्रदान करे!’”
जो पुरुष और स्त्रियाँ परमेश्वर के निकट रहते हैं, उनके निर्णय को बहुत महत्त्व दिया जाना चाहिए, और अधिकांश दशाओं में उनका निर्णय गलत नहीं होगा। फिर भी यह अपील न तो अन्तिम है और न अचूक, और इसका मूल्य केवल उन लोगों की समझ और भक्ति के अनुपात में आँका जाना चाहिए जिनसे परामर्श लिया गया हो। मुझे भली-भाँति याद है कि एक ऐसी भक्त मसीही महिला ने, जिससे बढ़कर भक्त कोई कभी साँस लेनेवाला न हुआ होगा, मुझे प्रचार करने से रोकने के लिए कितनी गम्भीरता से समझाया था; मैंने निष्पक्षता और धीरज के साथ उसकी राय का मूल्य आँकने का प्रयत्न किया—परन्तु अधिक व्यापक अनुभववाले लोगों का निर्णय उस पर भारी पड़ा। सन्देह में पड़े युवकों के लिए यह अच्छा होगा कि अगली बार जब वे देहात के चैपल या गाँव के सभा-कक्ष में वचन सुनाने का प्रयत्न करने जाएँ, तो अपने सबसे बुद्धिमान मित्रों को साथ ले जाएँ।
मैंने ध्यान दिया है—और हमारे आदरणीय मित्र श्री रॉजर्स ने भी यही देखा है—कि आप सज्जन, विद्यार्थीगण, एक समूह के रूप में एक-दूसरे के विषय में अपने निर्णय में शायद ही कभी, यदि कभी, गलत होते हैं। पूरे कॉलेज को देखते हुए, शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि किसी भाई के विषय में सारे कॉलेज की सामान्य राय गलत निकली हो। मनुष्य एक-दूसरे के विषय में राय बनाने में उतने असमर्थ नहीं हैं जितना कभी-कभी उन्हें समझा जाता है। कक्षा में, प्रार्थना-सभा में, बातचीत में, और विभिन्न धार्मिक कार्यों में जैसे आप मिलते रहते हैं, वैसे आप एक-दूसरे को परख लेते हैं; और बुद्धिमान मनुष्य पूरे कॉलेज के निर्णय को एक ओर रख देने में धीमा होगा।
मैं इस बिन्दु को पूरा नहीं करूँगा यदि यह न जोड़ूँ कि केवल उन्नति करने की योग्यता और सिखाने की क्षमता पर्याप्त नहीं है; पास्टर के चरित्र को पूर्ण करने के लिए अन्य गुण भी होने चाहिए। सही विवेक और ठोस अनुभव आपको शिक्षा दें। नम्र व्यवहार और प्रेमपूर्ण भावनाएँ आपको संचालित करें। दृढ़ता और साहस प्रगट होने चाहिए; और कोमलता और सहानुभूति की कमी नहीं होनी चाहिए। अच्छी रीति से शासन करने में प्रशासन के वरदान उतने ही आवश्यक होंगे जितने अच्छी रीति से सिखाने में शिक्षा के वरदान। आपको अगुवाई करने के योग्य, सहने के लिए तैयार, और धीरज से लगे रहने में समर्थ होना चाहिए। अनुग्रह में आपको बाकी लोगों से सिर और कन्धों भर ऊँचा होना चाहिए, कि आप उनके पिता और सलाहकार बन सकें। 1 तीमुथियुस 3:2-7 और तीतुस 1:6-9 में दी गई पास्टर की योग्यताओं को ध्यान से पढ़िए। यदि ऐसे वरदान और अनुग्रह के गुण आपमें न हों और बहुतायत से न बढ़ें, तो सम्भव है कि आप एक सुसमाचार-प्रचारक के रूप में सफल हो जाएँ, परन्तु पास्टर के रूप में आप किसी गिनती में न होंगे।
3. किसी मनुष्य की बुलाहट को और आगे प्रमाणित करने के लिए, अपने वरदानों के कुछ अभ्यास के बाद, जैसा कि मैं पहले कह चुका हूँ, उसे अपने प्रयत्नों के द्वारा कुछ मात्रा में मन-परिवर्तन का कार्य होते हुए देखना चाहिए, नहीं तो वह यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि उससे भूल हुई है, और इसलिए जितनी अच्छी रीति से हो सके, वापस लौट सकता है। यह आशा नहीं की जानी चाहिए कि सार्वजनिक रूप से पहले या बीसवें प्रयत्न में भी हमें सफलता का समाचार मिलेगा; और यदि कोई मनुष्य ऐसा करने के लिए बुलाया गया अनुभव करे, तो वह जीवन भर प्रचार की परख भी कर सकता है; परन्तु मुझे ऐसा लगता है कि सेवकाई के लिए अलग किए जानेवाले मनुष्य के रूप में, उसका अधिकार-पत्र तब तक बिना मुहरों के है जब तक उसके माध्यम से प्राण जीतकर यीशु के ज्ञान तक न लाए जाएँ। एक कार्यकर्ता के रूप में उसे काम करते रहना है, चाहे वह सफल हो या न हो; परन्तु एक सेवक के रूप में वह अपनी बुलाहट के विषय में तब तक निश्चित नहीं हो सकता जब तक परिणाम प्रगट न हों।
जब मैंने अपने प्रचार से मन फिरानेवाले पहले व्यक्ति का समाचार सुना, तो मेरा हृदय आनन्द से कैसा उछल पड़ा! भरी हुई मण्डली और मित्रों के कृपालु शब्दों से मैं कभी सन्तुष्ट नहीं हो सकता था। मैं यह सुनने के लिए तरसता था कि हृदय टूटे हैं, कि पश्चाताप करनेवालों की आँखों से आँसू बहते देखे गए हैं। जैसे कोई बड़ी लूट पाकर आनन्द करता है, वैसे ही मैं एक गरीब मज़दूर की पत्नी पर कैसा आनन्दित हुआ था, जिसने मान लिया कि उसने पाप का दोष अनुभव किया है, और रविवार की दोपहर मेरे उपदेश के द्वारा उद्धारकर्ता को पा लिया है। जिस कुटिया में वह रहती थी, वह अब भी मेरी आँखों के सामने है; मेरा विश्वास कीजिए, वह मुझे सदा मनोरम दिखाई देती है। मुझे भली-भाँति याद है उसका कलीसिया में ग्रहण किया जाना, और उसकी मृत्यु, और उसका स्वर्ग में अपने घर जाना। वह मेरी सेवकाई की पहली मुहर थी, और मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ, सचमुच बहुत ही अनमोल मुहर। कोई भी माता अपने पहलौठे पुत्र को देखकर कभी इससे अधिक आनन्द से नहीं भरी होगी। तब मैं कुँवारी मरियम का गीत गा सकता था, क्योंकि मेरा प्राण प्रभु की बड़ाई कर रहा था कि उसने मेरी दीन दशा को स्मरण किया, और मुझे ऐसा काम करने का बड़ा सम्मान दिया जिसके कारण सब पीढ़ियाँ मुझे धन्य कहेंगी—क्योंकि एक प्राण के मन-परिवर्तन को मैं ऐसा ही समझता था।
इससे पहले कि आप यह विश्वास कर सकें कि प्रचार करना ही आपके जीवन का कार्य होगा, आपके मसीही परिश्रम में कुछ मात्रा में मन-परिवर्तन का कार्य होना चाहिए। भविष्यद्वक्ता यिर्मयाह के द्वारा कहे गए प्रभु के शब्दों को स्मरण कीजिए; वे बिल्कुल विषय के अनुकूल हैं, और उन्हें सब निष्फल प्रचारकों को चौंका देना चाहिए। “ये भविष्यद्वक्ता बिना मेरे भेजे दौड़ जाते, और बिना मेरे कुछ कहे भविष्यद्वाणी करने लगते हैं। यदि ये मेरी सभा में खड़े होते, तो मेरी प्रजा के लोगों को मेरे वचन सुनाते; और वे अपनी बुरी चाल और अपने बुरे कामों से फिर जाते।” यिर्मयाह 23:21, 22।
मेरे लिए यह आश्चर्य की बात है कि लोग वर्ष पर वर्ष बिना किसी मन-परिवर्तन के कैसे चैन से प्रचार करते रहते हैं। क्या उन्हें दूसरों पर कोई तरस नहीं आता? क्या उन्हें अपने ऊपर किसी उत्तरदायित्व का बोध नहीं? क्या वे ईश्वरीय सम्प्रभुता की व्यर्थ गलत व्याख्या करके अपने स्वामी पर दोष डालने का साहस करते हैं? या क्या उनका यह विश्वास है कि पौलुस लगाता है और अपुल्लोस सींचता है, और परमेश्वर कोई बढ़ती नहीं देता? साथ-साथ होनेवाले चिह्नों के बिना उनकी प्रतिभा, उनका दर्शनशास्त्र, उनकी वाक्पटुता, और यहाँ तक कि उनकी सिद्धान्त-शुद्धता भी व्यर्थ है। जो लोग किसी मनुष्य को परमेश्वर के पास नहीं लाते, वे परमेश्वर के भेजे हुए कैसे हैं? ऐसे भविष्यद्वक्ता जिनके वचन शक्तिहीन हैं, ऐसे बोनेवाले जिनका सारा बीज मुरझा जाता है, ऐसे मछुए जो कोई मछली नहीं पकड़ते, ऐसे सैनिक जो कोई घाव नहीं करते—क्या ये परमेश्वर के जन हैं? निश्चय ही एक बिल्कुल बाँझ वृक्ष के समान सेवकाई में खड़े रहने से तो कीचड़ बटोरनेवाला या चिमनी साफ़ करनेवाला होना कहीं अच्छा होता!
सबसे तुच्छ व्यवसाय भी मानवजाति को कुछ लाभ पहुँचाता है, परन्तु वह अभागा मनुष्य जो मंच पर तो अधिकार जमाए रहता है परन्तु मन-परिवर्तनों के द्वारा कभी अपने परमेश्वर की महिमा नहीं करता, वह एक शून्य है, एक धब्बा है, आँखों का काँटा है, एक हानि है। वह उस नमक के योग्य भी नहीं जो वह खाता है, रोटी की तो बात ही क्या; और यदि वह अपने थोड़े वेतन की शिकायत करने के लिए समाचार-पत्रों को लिखता है, तो उसका विवेक, यदि उसके पास कुछ हो, भली-भाँति उत्तर दे सकता है, “और जो तुम्हें मिलता है, वह भी तुम्हारी योग्यता से अधिक है!”
सूखे के समय आ सकते हैं; हाँ, और दुबलेपन के वर्ष उपयोगिता के पिछले वर्षों को निगल सकते हैं, परन्तु फिर भी कुल मिलाकर फल होगा, और परमेश्वर की महिमा के लिए फल होगा; और इस बीच, यह क्षणिक बाँझपन प्राण को अकथनीय वेदना से भर देगा। भाइयो, यदि प्रभु आपको प्राणों के लिए कोई उत्साह नहीं देता, तो मोची के पत्थर या राजमिस्त्री की करनी से लगे रहिए; परन्तु यदि आपको अपने हृदय की शान्ति और अपना भावी उद्धार प्रिय है, तो मंच से दूर रहिए।
4. तौभी, हमारी इस खोज में इन सब से एक कदम आगे बढ़ना आवश्यक है। पास्टरों के विषय में प्रभु की इच्छा उसकी कलीसिया के प्रार्थनापूर्ण निर्णय के द्वारा प्रगट की जाती है। आपकी बुलाहट के प्रमाण के रूप में यह आवश्यक है कि आपका प्रचार परमेश्वर के लोगों को ग्रहणयोग्य लगे। जिन्हें परमेश्वर अपने नाम का प्रचार करने के लिए बुलाता है, उनके लिए वह प्रायः बोलने के द्वार खोलता है। अधीरता द्वार को धक्का देकर खोलना या तोड़ डालना चाहेगी, परन्तु विश्वास प्रभु की बाट जोहता है, और उचित समय पर उसे उसका अवसर दिया जाता है। जब अवसर आता है, तब हमारी परख आती है। प्रचार करने के लिए खड़े होने पर सभा हमारी आत्मा को परखेगी, और यदि वह दोषी ठहरे, या यदि सामान्यतः कलीसिया की उन्नति न हो, तो इस निष्कर्ष पर विवाद नहीं किया जा सकता कि हम परमेश्वर के भेजे हुए नहीं हैं।
सच्चे पास्टर के चिह्न और लक्षण कलीसिया के मार्गदर्शन के लिए वचन में बताए गए हैं; और यदि उस मार्गदर्शन का पालन करते हुए भाई हममें वे योग्यताएँ नहीं देखते, और हमें पद के लिए नहीं चुनते, तो यह बिल्कुल स्पष्ट है कि हम चाहे कितना भी अच्छा सुसमाचार-प्रचार करें, पास्टर का पद हमारे लिए नहीं है।
कलीसियाएँ सब की सब बुद्धिमान नहीं होतीं, और न वे सब पवित्र आत्मा की सामर्थ में न्याय करती हैं, वरन् उनमें से बहुत-सी शरीर के अनुसार न्याय करती हैं; तौभी अपने वरदानों और अनुग्रहों जैसे व्यक्तिगत विषय पर मैं अपनी राय की अपेक्षा प्रभु के लोगों के एक समूह की राय को स्वीकार करना अधिक पसन्द करूँगा। कुछ भी हो, चाहे आप कलीसिया के निर्णय को महत्त्व दें या न दें, एक बात निश्चित है, कि आप में से कोई भी झुण्ड की प्रेमपूर्ण सहमति के बिना पास्टर नहीं हो सकता; और इसलिए, यदि यह सही संकेतक न भी हो, तो भी आपके लिए यह एक व्यावहारिक संकेतक अवश्य होगा। यदि प्रभु की ओर से आपकी बुलाहट सच्ची है, तो आप अधिक समय तक चुप नहीं रहेंगे। जैसे निश्चय ही मनुष्य को अपनी घड़ी की आवश्यकता होती है, वैसे ही निश्चय ही घड़ी को अपने मनुष्य की आवश्यकता होती है।
परमेश्वर की कलीसिया को सदा जीवित सेवकों की अत्यन्त आवश्यकता रहती है; उसके लिए एक मनुष्य ओपीर के सोने से भी सदा अधिक अनमोल होता है। औपचारिक पदाधिकारियों को तो घटी होती है और वे भूखे रह जाते हैं, परन्तु प्रभु के अभिषिक्त जनों को कभी बिना कार्यभार के रहने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि ऐसे चौकन्ने कान हैं जो उनकी बोली से उन्हें पहचान लेंगे, और ऐसे तत्पर हृदय हैं जो उनके ठहराए हुए स्थान पर उनका स्वागत करेंगे। अपने कार्य के योग्य बनिए, और आप कभी उससे बाहर नहीं रहेंगे। यहाँ-वहाँ प्रचार करने के लिए स्वयं अपने आप को निमन्त्रण देते हुए इधर-उधर मत दौड़िए; अपने अवसर की अपेक्षा अपनी योग्यता के विषय में अधिक चिन्तित रहिए, और इन दोनों की अपेक्षा परमेश्वर के साथ अपनी चाल के विषय में अधिक गम्भीर रहिए। भेड़ें परमेश्वर के भेजे हुए चरवाहे को पहचान लेंगी; भेड़शाला का द्वारपाल आपके लिए द्वार खोल देगा, और झुण्ड आपकी आवाज़ पहचान लेगा।
जब मैंने पहली बार यह व्याख्यान दिया था, तब तक मैंने इस विषय पर अपने एक मित्र को लिखा जॉन न्यूटन का उत्कृष्ट पत्र नहीं पढ़ा था; वह मेरे अपने विचारों से इतना अधिक मेल खाता है कि नकलची समझे जाने का जोखिम उठाकर भी—जो मैं इस मामले में निश्चय ही नहीं हूँ—मैं वह पत्र आपको पढ़कर सुनाऊँगा:
“आपकी दशा मुझे अपनी दशा की याद दिलाती है; सेवकाई की ओर मेरी पहली अभिलाषाओं के साथ बड़ी अनिश्चितताएँ और कठिनाइयाँ जुड़ी हुई थीं, और मेरे मित्रों के विभिन्न और परस्पर विरोधी निर्णयों से मेरे मन की उलझन और बढ़ गई थी। जो सलाह मैं आपको देना चाहता हूँ, वह पीड़ादायक अनुभव और मानसिक संघर्ष का परिणाम है, और शायद इसी कारण आपको अस्वीकार्य न लगे। मैं अपने अनुग्रहकारी प्रभु से प्रार्थना करता हूँ कि वह इसे उपयोगी बनाए।
“आपकी ही तरह मैं भी बहुत समय तक इस बात को लेकर व्याकुल रहा कि सेवकाई के लिए उचित बुलाहट क्या है और क्या नहीं। अब यह मुझे सुलझाने में सरल बात लगती है; परन्तु सम्भवतः आपको यह तब तक सरल न लगे जब तक प्रभु आपके अपने मामले में इसे आप पर स्पष्ट न कर दे। जितना मैं कह सकता हूँ, उतना कहने के लिए मेरे पास स्थान नहीं है। संक्षेप में, मैं समझता हूँ कि इसमें मुख्य रूप से तीन बातें सम्मिलित हैं:
“1. इस सेवा में लगाए जाने की एक उत्कट और सच्ची अभिलाषा। मेरी समझ में जो मनुष्य एक बार परमेश्वर के आत्मा के द्वारा इस कार्य के लिए प्रेरित हो गया है, वह, यदि यह प्राप्त हो सके, तो इसे हज़ारों सोने-चाँदी के सिक्कों से भी बढ़कर चाहेगा; इसलिए यद्यपि वह अपनी बड़ी अयोग्यता की तुलना में इसके महत्त्व और कठिनाई के बोध से कभी-कभी भयभीत हो जाता है (क्योंकि यह माना जा सकता है कि इस प्रकार की बुलाहट, यदि वास्तव में परमेश्वर की ओर से है, तो उसके साथ दीनता और आत्म-हीनता भी होगी)—तौभी वह इसे छोड़ नहीं सकता। मैं इस विषय में यह जाँचना एक अच्छा नियम मानता हूँ कि क्या प्रचार करने की अभिलाषा हमारी सबसे सजीव और आत्मिक मनोदशाओं में, और जब हम प्रभु के सामने सबसे अधिक धूल में पड़े होते हैं, तब सबसे अधिक उत्कट होती है। यदि ऐसा है, तो यह एक अच्छा चिह्न है। परन्तु यदि, जैसा कभी-कभी होता है, कोई व्यक्ति दूसरों के लिए प्रचारक बनने को बहुत उत्सुक है, जबकि वह अपने प्राण में अनुग्रह के लिए बहुत थोड़ी भूख और प्यास पाता है, तो यह भय है कि उसका उत्साह परमेश्वर के आत्मा से नहीं, वरन् किसी स्वार्थी सिद्धान्त से उत्पन्न होता है।
“2. प्रचार करने की इस स्नेहपूर्ण अभिलाषा और तत्परता के अतिरिक्त, उचित समय पर वरदानों, ज्ञान और बोलने की क्षमता के विषय में कुछ पर्याप्त योग्यता भी प्रगट होनी चाहिए। निश्चय ही, यदि प्रभु किसी मनुष्य को दूसरों को सिखाने के लिए भेजता है, तो वह उसे साधन भी प्रदान करेगा। मैं विश्वास करता हूँ कि बहुतों ने प्रचारक बनने में भली नीयत रखी, परन्तु ऐसा करने में वे अपनी बुलाहट से आगे बढ़ गए या उससे पहले ही चल पड़े। एक सेवक और एक साधारण मसीही के बीच मुख्य अन्तर उन सेवकाई-सम्बन्धी वरदानों में प्रतीत होता है जो उसे उसके अपने लिए नहीं, वरन् दूसरों की उन्नति के लिए दिए जाते हैं। परन्तु मैं फिर कहता हूँ कि ये उचित समय पर प्रगट होने चाहिए; इनकी आशा तुरन्त नहीं, वरन् उचित साधनों के उपयोग से धीरे-धीरे की जानी चाहिए। ये सेवकाई के निर्वाह के लिए आवश्यक हैं, परन्तु उसके प्रति हमारी अभिलाषाओं को उचित ठहराने के लिए पूर्व-शर्त के रूप में आवश्यक नहीं। आपके मामले में, आप युवा हैं, और आपके सामने समय है; इसलिए मैं समझता हूँ कि अभी आपको यह पूछ-पूछकर अपने आप को उलझन में डालने की आवश्यकता नहीं कि क्या ये वरदान आपमें पहले से हैं। इतना पर्याप्त है कि आपकी अभिलाषा दृढ़ हो, और आप प्रार्थना और परिश्रम के मार्ग पर चलते हुए इनके लिए प्रभु की बाट जोहने को तैयार हों; अभी तो आपको इनकी आवश्यकता नहीं है।
“3. वह बात जो अन्ततः किसी उचित बुलाहट को प्रमाणित करती है, विधाता की व्यवस्था में उसके अनुरूप द्वार का खुलना है, जो परिस्थितियों की एक क्रमिक शृंखला के द्वारा इस काम में वास्तव में प्रवेश करने के साधन, समय और स्थान की ओर संकेत करता है। और जब तक यह मेल न बैठ जाए, तब तक आपको यह आशा नहीं करनी चाहिए कि आपका मन सदा दुविधा से मुक्त रहेगा। इस विषय में मुख्य सावधानी यह है कि पहली झलक देखते ही उसे पकड़ लेने में बहुत उतावली न की जाए। यदि प्रभु की इच्छा आपको अपनी सेवकाई में लाने की है, तो उसने आपका स्थान और आपकी सेवा पहले से ही ठहरा दी है, और यद्यपि आप अभी उसे नहीं जानते, तौभी उचित समय पर जान लेंगे। यदि आपमें किसी स्वर्गदूत की सी प्रतिभाएँ भी होतीं, तौभी जब तक उसका समय न आ जाए, और जब तक वह आपको उन लोगों के पास न ले जाए जिन्हें उसने आपके द्वारा आशीष देने का निश्चय किया है, तब तक आप उनसे कोई भलाई नहीं कर सकते थे। जब हमारा उत्साह प्रबल होता है, तब यहाँ अपने आप को विवेक की सीमाओं के भीतर रोके रखना बहुत कठिन होता है। हमारे हृदयों पर मसीह के प्रेम का बोध, और बेचारे पापियों के प्रति कोमल करुणा, हमें समय से पहले ही निकल पड़ने को उकसाने के लिए तत्पर रहती है; परन्तु जो विश्वास रखे वह उतावली न करेगा।
मैं लगभग पाँच वर्ष तक इस दबाव में रहा; कभी-कभी मुझे लगता था कि मुझे प्रचार करना ही है, चाहे सड़कों पर ही क्यों न हो। जो कुछ भी विश्वसनीय जान पड़ता था, उस सब पर मैंने कान दिया, और बहुत सी ऐसी बातों पर भी जो ऐसी नहीं थीं। परन्तु प्रभु ने अनुग्रह करके, और मानो बिना मेरे जाने, मेरे मार्ग को काँटों से घेर दिया; नहीं तो, यदि मैं अपनी ही आत्मा के भरोसे छोड़ दिया जाता, तो मैं अपने आप को उपयोगिता के उस क्षेत्र में लाए जाने के बिलकुल अयोग्य बना लेता, जिसमें उसे अपने उत्तम समय पर मुझे ले चलना भाया है। और अब मैं स्पष्ट देख सकता हूँ कि जिस समय मैं पहले-पहल निकल पड़ना चाहता था, यद्यपि मेरी मनसा, मैं आशा करता हूँ, मुख्य रूप से अच्छी थी—तौभी मैंने अपने आप को बढ़ाकर आँका था, और मुझमें वह आत्मिक विवेक और अनुभव नहीं था जो इतनी बड़ी सेवा के लिए आवश्यक है।”
इतना पर्याप्त हो सकता है, परन्तु यही विषय आपके सामने फिर आएगा यदि मैं सेवकाई के अभिलाषियों के साथ व्यवहार करने के अपने अनुभव का थोड़ा सा वर्णन करूँ। मुझे निरन्तर यह राय बनानी पड़ती है कि कुछ पुरुषों को पास्टर बनने के उनके प्रयासों में सहायता देना उचित है या नहीं। यह अत्यन्त उत्तरदायित्व का काम है, और ऐसा है जिसमें असाधारण सावधानी की आवश्यकता होती है। निस्सन्देह, मैं इस बात का न्यायी बनकर नहीं बैठता कि कोई व्यक्ति सेवकाई में प्रवेश करे या न करे, परन्तु मेरी जाँच का उद्देश्य केवल इस प्रश्न का उत्तर देना है कि यह संस्था उसकी सहायता करे, या उसे उसके अपने साधनों पर छोड़ दे।
हमारे कुछ उदार पड़ोसी हम पर यह दोष लगाते हैं कि हमने यहाँ “पादरी बनाने का कारखाना” खोल रखा है, परन्तु यह आरोप बिलकुल सच नहीं है। हमने कभी किसी को सेवक बनाने का प्रयत्न नहीं किया, और यदि करते तो असफल होते; हम कॉलेज में केवल उन्हीं को लेते हैं जो यह दावा करते हैं कि वे पहले से ही सेवक हैं। यदि वे मुझे “पादरियों का संहारक” कहते तो यह सत्य के अधिक निकट होता, क्योंकि बहुत से नौसिखियों का काम मेरे हाथों तमाम हुआ है; और जो कुछ मैंने इस प्रकार किया है उस पर विचार करते हुए मेरा विवेक पूरी तरह निश्चिन्त है।
किसी होनहार युवा भाई को, जिसने पास्टर्स कॉलेज में प्रवेश के लिए आवेदन किया हो, निरुत्साहित करना मेरे लिए सदा एक कठिन काम रहा है। मेरा हृदय सदा अधिक से अधिक कोमलता की ओर झुका रहा है, परन्तु कलीसियाओं के प्रति कर्तव्य ने मुझे कठोर परख के साथ न्याय करने को विवश किया है। उम्मीदवार को जो कुछ कहना था उसे सुन लेने के बाद, उसके प्रशंसा-पत्र पढ़ लेने और प्रश्नों के उसके उत्तर देख लेने के बाद, जब मुझे निश्चय हो गया कि प्रभु ने उसे नहीं बुलाया है, तो मुझे उसे यह बता देना पड़ा है। कुछ मामले ऐसे हैं जो सब मामलों के नमूने हैं।
ऐसे युवा भाई आवेदन करते हैं जो सेवकाई में प्रवेश करने की उत्कट इच्छा रखते हैं, परन्तु यह दुखद रूप से स्पष्ट होता है कि उनका मुख्य प्रयोजन मनुष्यों के बीच चमकने की महत्वाकांक्षा है। साधारण दृष्टि से ऐसे लोग ऊँचा उठने की आकांक्षा के लिए प्रशंसा के योग्य हैं, परन्तु मंच (पल्पिट) कभी भी वह सीढ़ी न बने जिसके सहारे महत्वाकांक्षा ऊपर चढ़े। यदि ऐसे लोग सेना में भर्ती हुए होते तो जब तक वे अगली पंक्ति तक न पहुँच जाते तब तक कभी सन्तुष्ट न होते, क्योंकि वे धक्का देकर ऊपर पहुँचने पर तुले हुए हैं—यहाँ तक तो सब कुछ बहुत प्रशंसनीय और बहुत उचित है; परन्तु उन्होंने यह धारणा बना ली है कि यदि वे सेवकाई में प्रवेश करें तो वे बहुत प्रतिष्ठित हो जाएँगे। उन्होंने अपने भीतर प्रतिभा के अंकुर फूटते अनुभव किए हैं, और अपने आप को साधारण लोगों से बड़ा समझा है, और इसलिए उन्होंने सेवकाई को एक ऐसा मंच समझा है जिस पर वे अपनी तथाकथित योग्यताओं का प्रदर्शन कर सकें।
जब कभी यह बात दिखाई दी है, मैंने उस व्यक्ति को अस्वीकार करना अपना कर्तव्य समझा है; क्योंकि मेरा विश्वास है कि ऐसी आत्माएँ यदि प्रभु की सेवा में प्रवेश करती हैं तो सदा निष्फल ही होती हैं। हम पाते हैं कि हमारे पास घमण्ड करने की कोई बात नहीं है, और यदि होती भी, तो उसे टाँगकर दिखाने के लिए सबसे बुरा स्थान मंच (पल्पिट) ही होता; क्योंकि वहाँ प्रतिदिन हमें अपनी तुच्छता और शून्यता का अनुभव कराया जाता है।
ऐसे लोग जिन्होंने मन फिराने के बाद से मन की बड़ी दुर्बलता प्रकट की है और जो सहज ही अनोखी शिक्षाओं को अपना लेने, या बुरी संगति और घोर पाप में पड़ जाने को बहक जाते हैं—उन्हें सेवकाई में प्रवेश करने के लिए प्रोत्साहित करने को मेरा मन कभी राज़ी नहीं होता, उनके दावे चाहे कुछ भी क्यों न हों। यदि वे सचमुच पश्चातापी हैं, तो वे पिछली पंक्तियों में ही रहें। जल की नाईं उबलनेवाले होने के कारण वे श्रेष्ठ न ठहरेंगे।
इसी प्रकार, जो लोग कठिनाई सह नहीं सकते, वरन् मुलायम दस्ताने पहननेवाली श्रेणी के हैं, उन्हें मैं कहीं और भेज देता हूँ। हमें सैनिक चाहिए, छैल-छबीले नहीं। हमें उत्साही परिश्रमी चाहिए, सभ्य-शिष्ट आलसी नहीं। जिन लोगों ने कॉलेज में आवेदन करने के समय तक कुछ भी नहीं किया है, उनसे कहा जाता है कि सार्वजनिक रूप से नाइट की उपाधि दिए जाने से पहले वे अपने घुड़सवारी के काँटे (स्पर्स) कमाएँ। आत्माओं से उत्कट प्रेम रखनेवाले प्रशिक्षित होने तक प्रतीक्षा नहीं करते—वे तुरन्त अपने प्रभु की सेवा करने लगते हैं।
कुछ भले लोग मुझसे अनुरोध करते हैं जो प्रचण्ड आवेग और उत्साह के लिए, और बुद्धि के स्पष्ट अभाव के लिए विख्यात हैं; ऐसे भाई जो कुछ भी न होने के विषय पर युगानुयुग बोलते ही रहें—जो पाँव पटकें और बाइबल पर घूँसे मारें, और उस सब में से कुछ भी न निकालें; उत्साही, भयंकर रूप से उत्साही, सबसे पीड़ादायक प्रसव-पीड़ा में पड़े पहाड़; परन्तु उस सब से निकलता कुछ नहीं। बाहर ऐसे जोशीले लोग घूम रहे हैं जो पाँच क्रमबद्ध विचारों की कल्पना करने या उन्हें व्यक्त करने के योग्य नहीं हैं, जिनकी क्षमता अत्यन्त संकीर्ण और जिनका अहंकार अत्यन्त विशाल है, और ये हथौड़ा चला सकते हैं, चिल्ला सकते हैं, बड़बड़ा सकते हैं, नोच-खसोट कर सकते हैं और क्रोध से भड़क सकते हैं, परन्तु सारा शोर ढोल के खोखलेपन से ही उठता है। मेरी समझ में ये भाई शिक्षा के बिना भी उतना ही अच्छा करेंगे जितना शिक्षा के साथ, और इसलिए मैंने प्रायः उनके आवेदन अस्वीकार कर दिए हैं।
पुरुषों का एक और अत्यन्त बड़ा वर्ग मंच (पल्पिट) की खोज में रहता है, और वे नहीं जानते कि क्यों। वे सिखा नहीं सकते और सीखेंगे नहीं, तौभी उन्हें सेवक बनना ही है। उस मनुष्य के समान जो पारनासस पर्वत पर सो गया था, और उसके बाद सदा अपने आप को कवि समझता रहा, उनमें एक बार किसी श्रोतामण्डली पर एक उपदेश थोप देने की पर्याप्त धृष्टता रही है, और अब उन्हें प्रचार के सिवा और कुछ नहीं सुहाता। वे वस्त्र सिलना छोड़ने को इतने उतावले हैं कि अपनी योजना पूरी करने के लिए वे उस कलीसिया में भी फूट डाल देंगे जिसके वे सदस्य हैं। दुकान का काउंटर उन्हें अरुचिकर लगता है, और मंच की गद्दी का लालच होता है; तराज़ू और बाटों से वे ऊब चुके हैं, और उन्हें पवित्रस्थान के तराज़ू पर हाथ आज़माना ही है। ऐसे लोग, समुद्र के प्रचण्ड हिलकोरों के समान, प्रायः अपनी ही लज्जा का फेन उछालते हैं, और जब हम उन्हें विदा करते हैं तो हमें प्रसन्नता होती है।
शारीरिक दुर्बलताएँ कुछ उत्तम पुरुषों की बुलाहट के विषय में प्रश्न खड़ा करती हैं। मैं मनुष्यों का न्याय उनके नैन-नक्श से नहीं करूँगा, परन्तु उनकी सामान्य शारीरिक बनावट कोई छोटी कसौटी नहीं है। वह संकरी छाती ऐसे मनुष्य का संकेत नहीं देती जो सार्वजनिक भाषण के लिए रचा गया हो। आपको यह विचित्र लग सकता है, तौभी मुझे पूरा निश्चय है कि जब किसी मनुष्य की छाती सिकुड़ी हुई हो, और उसके कन्धों के बीच कोई दूरी न हो, तो सर्वज्ञानी सृष्टिकर्ता का यह अभिप्राय नहीं था कि वह नियमित रूप से प्रचार करे। यदि उसका अभिप्राय यह होता कि वह बोले, तो वह उसे कुछ हद तक छाती की चौड़ाई देता, जो फेफड़ों की उचित मात्रा में शक्ति देने के लिए पर्याप्त होती। जब प्रभु किसी प्राणी को दौड़ने के लिए ठहराता है, तो वह उसे फुर्तीली टाँगें देता है; और यदि वह किसी दूसरे प्राणी को प्रचार करने के लिए ठहराता है, तो वह उसे उपयुक्त फेफड़े देगा। जिस भाई को वाक्य के बीच में रुककर अपना वायु-पम्प चलाना पड़ता है, उसे अपने आप से पूछना चाहिए कि क्या कोई और व्यवसाय नहीं है जिसके लिए वह अधिक उपयुक्त हो। जो मनुष्य बिना कष्ट के एक वाक्य भी मुश्किल से पूरा कर पाता है, उसे कदाचित् ही “गला खोलकर पुकार, कुछ न रख छोड़!” के लिए बुलाया गया कहा जा सकता है। अपवाद हो सकते हैं, परन्तु क्या सामान्य नियम में कुछ वज़न नहीं है? दोषपूर्ण मुँह और अपूर्ण उच्चारण वाले भाई प्रायः सुसमाचार प्रचार करने के लिए नहीं बुलाए जाते। यही बात उन भाइयों पर भी लागू होती है जिनका तालु नहीं है, या अपूर्ण है।
थोड़े समय पहले एक युवक का आवेदन आया जिसके जबड़े में एक प्रकार की घूमनेवाली गति थी, जो देखनेवाले के लिए अत्यन्त कष्टदायक थी। उसके पास्टर ने उसकी प्रशंसा एक बहुत पवित्र युवक के रूप में की, जिसके द्वारा कुछ लोग मसीह के पास लाए गए थे, और उसने आशा प्रकट की कि मैं उसे ग्रहण कर लूँगा, परन्तु मुझे इसका औचित्य दिखाई न दिया। यदि तर्शीश का सारा सोना भी मेरा पुरस्कार होता, तौभी मैं उसे प्रचार करते हुए बिना हँसे देख न पाता; और पूरी सम्भावना है कि उसके दस श्रोताओं में से नौ मुझसे अधिक संवेदनशील होते। एक मनुष्य जिसकी बड़ी जीभ उसके मुँह को भर देती थी और बोली को अस्पष्ट कर देती थी, दूसरा जिसके दाँत नहीं थे, तीसरा जो हकलाता था, चौथा जो वर्णमाला के सब अक्षरों का उच्चारण नहीं कर सकता था—इन सबको मुझे इस आधार पर अस्वीकार करने का दुःख उठाना पड़ा है कि परमेश्वर ने उन्हें वे शारीरिक साधन नहीं दिए, जो, जैसा कि प्रार्थना-पुस्तक कहती, “सामान्यतः आवश्यक” हैं।
एक भाई से मेरी भेंट हुई है—क्या मैंने एक कहा? मैं दस, बीस, सौ ऐसे भाइयों से मिल चुका हूँ, जिन्होंने यह दलील दी कि उन्हें निश्चय था, पूरा निश्चय था कि वे सेवकाई के लिए बुलाए गए हैं—वे इस विषय में बिलकुल निश्चित थे, क्योंकि वे और हर काम में असफल हो चुके थे। यह एक प्रकार की आदर्श कहानी है: “महोदय, मुझे एक वकील के दफ़्तर में रखा गया, परन्तु मैं वहाँ का बन्धन कभी सह न सका, और कानून पढ़ने में मेरा मन कभी न लगा। विधाता ने स्पष्ट रूप से मेरा मार्ग बन्द कर दिया, क्योंकि मेरी नौकरी चली गई।”
“और फिर आपने क्या किया?”
“जी महोदय, मुझे किराने की दुकान खोलने के लिए प्रेरित किया गया।”
“और क्या आप फले-फूले?”
“देखिए महोदय, मुझे नहीं लगता कि मैं कभी व्यापार के लिए बना था, और प्रभु ने वहाँ भी मेरा मार्ग पूरी तरह बन्द कर दिया जान पड़ता है, क्योंकि मेरा दिवाला निकल गया और मैं बड़ी कठिनाइयों में पड़ गया। तब से मैंने जीवन-बीमा एजेंसी में थोड़ा सा काम किया है, और चाय बेचने के अतिरिक्त एक पाठशाला खोलने का भी प्रयत्न किया है; परन्तु मेरा मार्ग घिर गया है, और मेरे भीतर कोई बात मुझे यह अनुभव कराती है कि मुझे सेवक होना चाहिए।”
मेरा उत्तर प्रायः यह होता है, “हाँ, मैं समझ गया; आप और हर काम में असफल हो चुके हैं, और इसलिए आप सोचते हैं कि प्रभु ने आपको अपनी सेवा के लिए विशेष रूप से वरदान दिए हैं। परन्तु मुझे डर है कि आप यह भूल गए हैं कि सेवकाई को सबसे उत्तम पुरुषों की आवश्यकता है, न कि उनकी जो और कुछ नहीं कर सकते।”
जो मनुष्य प्रचारक के रूप में सफल होगा, वह सम्भवतः किराने की दुकान चलाने में, या वकील के रूप में, या किसी और काम में भी बहुत अच्छा करेगा। सचमुच मूल्यवान सेवक किसी भी काम में श्रेष्ठ ठहरता। जो मनुष्य वर्षों तक एक मण्डली को एक साथ बनाए रख सकता है, और लगातार सैकड़ों सब्तों तक उसकी उन्नति का साधन बन सकता है, उसके लिए कदाचित् ही कुछ असम्भव हो; उसमें कुछ योग्यताएँ अवश्य होंगी, और वह किसी भी रीति से मूर्ख या निकम्मा नहीं होगा। यीशु मसीह इस योग्य है कि उसके क्रूस का प्रचार करने के लिए सबसे उत्तम पुरुष मिलें, न कि खाली दिमाग़ और निकम्मे लोग।
एक युवा सज्जन, जिनकी उपस्थिति से एक बार मुझे सम्मानित होने का अवसर मिला, मेरे मन पर अपने अत्यन्त उत्कृष्ट व्यक्तित्व का चित्र छोड़ गए हैं। उनका वह चेहरा अहंकार और छल के एक पूरे ग्रन्थ के मुखपृष्ठ जैसा दिखता था। एक सब्त की सुबह उन्होंने मेरे वस्त्र-कक्ष (वेस्ट्री) में सन्देश भेजा कि उन्हें मुझसे तुरन्त मिलना है। उनकी धृष्टता ने उन्हें भीतर पहुँचा दिया; और जब वह मेरे सामने आए तो बोले, “महोदय, मैं आपके कॉलेज में प्रवेश लेना चाहता हूँ, और तुरन्त लेना चाहूँगा।”
“अच्छा, महोदय,” मैंने कहा, “मुझे डर है कि इस समय हमारे पास आपके लिए स्थान नहीं है, परन्तु आपके मामले पर विचार किया जाएगा।”
“परन्तु मेरा मामला बहुत असाधारण है, महोदय; सम्भवतः आपको मेरे जैसा आवेदन पहले कभी नहीं मिला होगा।”
“बहुत अच्छा, हम उस पर विचार करेंगे; सचिव आपको आवेदन-पत्रों में से एक दे देगा, और आप सोमवार को मुझसे मिल सकते हैं।”
वह सोमवार को आए और अपने साथ प्रश्नों के वे उत्तर लाए जो अत्यन्त विलक्षण ढंग से दिए गए थे। पुस्तकों के विषय में उन्होंने दावा किया कि उन्होंने समस्त प्राचीन और आधुनिक साहित्य पढ़ लिया है, और एक बहुत लम्बी सूची देने के बाद उन्होंने जोड़ा, “यह तो केवल एक चयन है; मैंने सब विभागों में अत्यन्त व्यापक अध्ययन किया है।”
अपने प्रचार के विषय में उन्होंने कहा कि वह उच्चतम प्रशंसा-पत्र प्रस्तुत कर सकते हैं, परन्तु उन्हें शायद ही लगता था कि उनकी आवश्यकता पड़ेगी, क्योंकि एक व्यक्तिगत भेंट ही मुझे तुरन्त उनकी योग्यता का विश्वास दिला देगी। उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब मैंने कहा, “महोदय, मुझे विवश होकर आपसे कहना पड़ता है कि मैं आपको ग्रहण नहीं कर सकता।”
“क्यों नहीं, महोदय?”
“मैं आपको साफ़-साफ़ बताता हूँ। आप इतने भयंकर रूप से चतुर हैं कि मैं आपको अपने कॉलेज में लेकर आपका अपमान नहीं कर सकता, जहाँ हमारे पास बिलकुल साधारण पुरुषों के सिवा और कोई नहीं है। अध्यक्ष, शिक्षक और विद्यार्थी, सब के सब मामूली योग्यताओं वाले पुरुष हैं, और हमारे बीच आने में आपको बहुत अधिक नीचे झुकना पड़ेगा।”
उन्होंने मेरी ओर बहुत कड़ी दृष्टि से देखा, और गरिमा के साथ कहा, “क्या आपके कहने का अर्थ यह है कि क्योंकि मुझमें असाधारण प्रतिभा है, और मैंने अपने भीतर एक ऐसा विशाल मस्तिष्क विकसित कर लिया है जैसा विरले ही देखने में आता है, इसलिए मुझे आपके कॉलेज में प्रवेश देने से इनकार किया जा रहा है?”
“हाँ,” मैंने उत्तर दिया, उतनी शान्ति से जितनी मैं रख सका, उस अभिभूत कर देनेवाले भय को देखते हुए जो उनकी प्रतिभा ने मुझमें उत्पन्न किया था, “ठीक इसी कारण।”
“तो, महोदय, आपको मुझे मेरी प्रचार-योग्यता की परीक्षा का अवसर देना चाहिए; आप जो भी पाठ चाहें मेरे लिए चुन दीजिए, या जो भी विषय आपको भाए सुझा दीजिए, और यहीं इसी कमरे में मैं बिना सोच-विचार किए उस पर बोलूँगा, या उस पर प्रचार करूँगा, और आप चकित रह जाएँगे।”
“नहीं, धन्यवाद, मैं आपको सुनने का कष्ट न उठाना ही पसन्द करूँगा।”
“कष्ट, महोदय! मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि यह वह सबसे बड़ा आनन्द होता जो आपको कभी मिल सकता है।”
मैंने कहा कि ऐसा हो सकता है, परन्तु मैं अपने आप को उस सौभाग्य के अयोग्य समझता हूँ, और इस प्रकार मैंने उन्हें सदा के लिए विदा कर दिया। उस समय वह सज्जन मेरे लिए अपरिचित थे, परन्तु तब से वह पुलिस अदालत में जा पहुँचे हैं।
हमें कभी-कभी ऐसे आवेदन मिले हैं जिन पर शायद आप चकित होंगे, ऐसे पुरुषों से जो स्पष्टतः काफ़ी धाराप्रवाह बोलनेवाले हैं, और जो हमारे सब प्रश्नों के उत्तर बहुत अच्छी तरह देते हैं, सिवाय उन प्रश्नों के जो उनके सैद्धान्तिक विचारों के विषय में हैं, जिनका हमें बार-बार यह उत्तर मिला है: “श्रीमान अमुक-अमुक कॉलेज के सिद्धान्तों को, वे चाहे जो भी हों, ग्रहण करने को तैयार हैं!”
ऐसे सब मामलों में हम एक क्षण भी विचार नहीं करते; तुरन्त इनकार कर दिया जाता है। मैं इसका उल्लेख इसलिए करता हूँ क्योंकि यह हमारे इस दृढ़ विश्वास को स्पष्ट करता है कि जिन लोगों के पास न कोई ज्ञान है और न कोई निश्चित विश्वास, वे सेवकाई के लिए बुलाए नहीं गए हैं। जब युवक कहते हैं कि उन्होंने धर्मविज्ञान के विषय में अपना मन निश्चित नहीं किया है, तो उन्हें तब तक वापस सण्डे-स्कूल में जाना चाहिए जब तक वे ऐसा न कर लें। किसी मनुष्य का बहानेबाज़ी करते हुए कॉलेज में घुस आना, यह दिखाते हुए कि वह अपने मन को सिद्धान्त के किसी भी रूप के लिए खुला रखता है, और वह अत्यन्त ग्रहणशील है, परन्तु उसने अपने मन में ऐसी बातें निश्चित नहीं की हैं कि क्या परमेश्वर का अनुग्रह से चुनाव होता है, या क्या वह अपने लोगों से अन्त तक प्रेम रखता है—यह मुझे पूरी तरह एक विकृत अनहोनी प्रतीत होती है।
प्रेरित कहता है, “नया चेला न हो;” तौभी जिस मनुष्य ने ऐसी बातों पर अपना मन निश्चित नहीं किया है, वह प्रत्यक्ष रूप से और घोर रूप से “नया चेला” है, और जब तक वह सुसमाचार के प्रारम्भिक सत्य न सीख ले, तब तक उसे प्रश्नोत्तरी (कैटेकिज़्म) की कक्षा में भेज दिया जाना चाहिए।
आख़िरकार, सज्जनो, हमें आगे के जीवन में अपनी सेवकाई के व्यावहारिक प्रमाण के द्वारा अपनी बुलाहट को सिद्ध करना होगा, और यह हमारे लिए दुःख की बात होगी यदि हम उचित जाँच के बिना अपनी दौड़ आरम्भ कर दें, क्योंकि ऐसा हुआ तो हमें लज्जित होकर उसे छोड़ना पड़ सकता है।
कुल मिलाकर, अनुभव ही हमारी सबसे निश्चित कसौटी है, और यदि परमेश्वर वर्ष प्रति वर्ष हमें सम्भाले रखता है, और हमें अपनी आशीष देता है, तो हमें अपनी बुलाहट की और कोई परीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। हमारी नैतिक और आत्मिक योग्यताएँ हमारी सेवकाई के परिश्रम के द्वारा परखी जाएँगी, और यह सब कसौटियों में सबसे विश्वसनीय है।
किसी न किसी से बातचीत में मैंने उस तरीके के विषय में सुना जिसे मैथ्यू विल्क्स ने एक ऐसे युवक की जाँच के लिए अपनाया था जो मिशनरी बनना चाहता था; उस परीक्षा का आशय, यदि उसका विवरण नहीं, मेरे विवेक को तो उचित लगता है, यद्यपि मेरी रुचि को नहीं।
वह युवक लंदन मिशनरी सोसाइटी के सम्बन्ध में मिशनरी होकर भारत जाना चाहता था। श्रीमान विल्क्स को ऐसे पद के लिए उसकी योग्यता पर विचार करने के लिए नियुक्त किया गया। उन्होंने युवक को पत्र लिखा, और उससे कहा कि वह अगली सुबह छः बजे उनसे मिलने आए। वह भाई कई मील दूर रहता था, परन्तु वह ठीक छः बजे उनके घर पहुँच गया। परन्तु श्रीमान विल्क्स कई घण्टों बाद कमरे में आए। वह भाई अचम्भे में, परन्तु धीरज के साथ प्रतीक्षा करता रहा। अन्त में, श्रीमान विल्क्स आए, और अपने सामान्य नाक से निकलनेवाले स्वर में उम्मीदवार को इस प्रकार सम्बोधित किया, “अच्छा, नौजवान, तो तुम मिशनरी बनना चाहते हो?”
“जी हाँ, महोदय।”
“क्या तुम प्रभु यीशु मसीह से प्रेम रखते हो?”
“जी हाँ, महोदय, मैं आशा करता हूँ कि रखता हूँ।”
“और क्या तुमने कुछ शिक्षा पाई है?”
“जी हाँ, महोदय, थोड़ी सी।”
“अच्छा, अब हम तुम्हारी परीक्षा करेंगे; क्या तुम ‘cat’ की वर्तनी बता सकते हो?” युवक उलझन में दिखाई दिया, और उसे समझ में न आया कि ऐसे बेतुके प्रश्न का उत्तर कैसे दे। स्पष्ट था कि उसका मन क्रोध और अधीनता के बीच डगमगा रहा था, परन्तु एक क्षण में उसने दृढ़ता से उत्तर दिया, “C, A, T, cat।”
“बहुत अच्छा,” श्रीमान विल्क्स ने कहा; “अब क्या तुम ‘dog’ की वर्तनी बता सकते हो?”
हमारा युवा शहीद हिचकिचाया, परन्तु श्रीमान विल्क्स ने अपनी सबसे ठण्डी रीति से कहा, “अरे, कोई बात नहीं; संकोच मत करो; तुमने दूसरे शब्द की वर्तनी इतनी अच्छी तरह बताई कि मैं सोचता हूँ कि तुम इसकी भी बता सकोगे: यह उपलब्धि चाहे जितनी ऊँची हो, इतनी ऊँची नहीं कि तुम उसे बिना लजाए न कर सको।”
उस युवा अय्यूब ने उत्तर दिया, “D, O, G, dog।”
“अच्छा, यह ठीक है; मैं देखता हूँ कि वर्तनी में तुम ठीक रहोगे, और अब तुम्हारे अंकगणित की बारी; दो दूनी कितने होते हैं?” आश्चर्य की बात है कि श्रीमान विल्क्स को “बलिष्ठ मसीहियत” की रीति से “दो दूनी” नहीं मिले, परन्तु उस धीरजवन्त युवक ने सही उत्तर दिया और उसे विदा कर दिया गया। समिति की बैठक में मैथ्यू विल्क्स ने कहा, “मैं उस युवक की हार्दिक संस्तुति करता हूँ; मैंने उसके प्रशंसा-पत्रों और चरित्र की विधिवत जाँच की है, और इसके अतिरिक्त, मैंने उसकी एक ऐसी दुर्लभ व्यक्तिगत परीक्षा ली है जिसे थोड़े ही सह सकते हैं। मैंने उसके आत्म-त्याग को परखा, वह सुबह तड़के उठ गया था। मैंने उसके स्वभाव को परखा, और मैंने उसकी दीनता को परखा। वह ‘cat’ और ‘dog’ की वर्तनी बता सकता है, और बता सकता है कि ‘दो दूनी चार होते हैं,’ और वह मिशनरी के रूप में बहुत ही अच्छा रहेगा।”
अब, जो कुछ उस वृद्ध सज्जन के विषय में कहा जाता है कि उन्होंने अत्यन्त बुरी रुचि के साथ किया, वही हम बड़े औचित्य के साथ अपने आप पर कर सकते हैं। हमें परखना चाहिए कि क्या हम धौंस, थकावट, निन्दा, ठट्ठा और कठिनाई सह सकते हैं; और क्या हमारे साथ मसीह के लिए जगत के कूड़े के समान व्यवहार किया जा सकता है। यदि हम ये सब सह सकते हैं, तो हममें वे कुछ बातें हैं जो उन दुर्लभ गुणों के होने का संकेत देती हैं जो प्रभु यीशु मसीह के एक सच्चे सेवक में मिलने चाहिए।
मुझे गम्भीर सन्देह है कि क्या हममें से कुछ लोग, जब समुद्र में बहुत दूर निकल जाएँगे, तब अपने जहाज़ों को उतना समुद्र-योग्य पाएँगे जितना हम उन्हें समझते हैं। हे मेरे भाइयो, जब तक आप अभी इस एकान्त स्थान में हैं, इस बात को पक्का कर लीजिए—और अपनी उच्च बुलाहट के लिए अपने आप को योग्य बनाने में परिश्रम से लगे रहिए। आप पर परीक्षाएँ बहुत आएँगी, और हाय आप पर यदि आप परखे हुए कवच से सिर से पाँव तक सुसज्जित होकर न निकलें। आपको घोड़ों के संग दौड़ना होगा; अपनी प्रारम्भिक पढ़ाई के समय प्यादे आपको थका न दें। शैतान बाहर घूम रहा है, और उसके साथ बहुत से हैं। अपने आप को परखिए, और प्रभु आपको उस कुठाली और भट्ठी के लिए तैयार करे जो निश्चय ही आपकी प्रतीक्षा कर रही हैं। सम्भव है कि आपका क्लेश सब बातों में पौलुस और उसके साथियों के क्लेश जितना कठोर न हो, तौभी आपको वैसी ही अग्नि-परीक्षा के लिए तैयार रहना चाहिए।
मैं आपको उसके स्मरणीय वचन पढ़कर सुनाता हूँ, और आपसे विनती करता हूँ कि जब आप उन्हें सुनें तब प्रार्थना करें कि पवित्र आत्मा आपके सामने जो कुछ है उस सब के लिए आपको सामर्थ दे। “हम किसी बात में ठोकर खाने का कोई भी अवसर नहीं देते, कि हमारी सेवा पर कोई दोष न आए। परन्तु हर बात से परमेश्वर के सेवकों की नाईं अपने सद्गुणों को प्रगट करते हैं, बड़े धैर्य से, क्लेशों से, दरिद्रता से, संकटों से, कोड़े खाने से, कैद होने से, हुल्लड़ों से, परिश्रम से, जागते रहने से, उपवास करने से। पवित्रता से, ज्ञान से, धीरज से, कृपालुता से, पवित्र आत्मा से, सच्चे प्रेम से, सत्य के वचन से, परमेश्वर की सामर्थ से, धार्मिकता के हथियारों से जो दहिने, बाएँ हैं, आदर और निरादर से, दुरनाम और सुनाम से। यद्यपि भरमानेवालों के ऐसे मालूम होते हैं तौभी सच्चे हैं; अनजानों के सदृश हैं, तौभी प्रसिद्ध हैं; मरते हुओं के ऐसे हैं और देखो जीवित हैं; मार खानेवालों के सदृश हैं परन्तु प्राण से मारे नहीं जाते; शोक करनेवालों के समान हैं—परन्तु सर्वदा आनन्द करते हैं; कंगालों के ऐसे हैं—परन्तु बहुतेरों को धनवान बना देते हैं; ऐसे हैं जैसे हमारे पास कुछ नहीं तौभी सब कुछ रखते हैं।”
