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याकूब और एसाव पर दसवाँ उपदेश, उत्पत्ति 26:26 – उत्पत्ति 27:2 (भाग 1 / 3)
याकूब और एसाव पर आठवाँ और नौवाँ उपदेश - उत्पत्ति 26:11-21
याकूब और एसाव पर आठवाँ उपदेश, उत्पत्ति 26।
11 और अबीमेलेक ने अपनी सारी प्रजा को आज्ञा दी, “जो कोई इस मनुष्य को या इसकी पत्नी को छूए, वह निश्चय मार डाला जाएगा।”
12 तब इसहाक ने उस देश में बोया, और उसे प्रति वर्ष सौ गुना फल मिला; यहोवा ने उसे ऐसी ही आशीष दी।
13 इस प्रकार वह मनुष्य बढ़ता गया, और निरन्तर उन्नति करते-करते अन्त में बहुत धनवान हो गया।
14 क्योंकि उसके पास भेड़-बकरियों की बड़ी सम्पत्ति और गाय-बैलों की भी सम्पत्ति थी, और इतना बड़ा परिवार था कि पलिश्ती उससे डाह करने लगे।
15 और जितने कुएँ उसके पिता के सेवकों ने उसके पिता अब्राहम के दिनों में खोदे थे, उन सब को उन्होंने मिट्टी से भरकर बन्द कर दिया।
16 तब अबीमेलेक ने इसहाक से कहा, “हमारे बीच से चला जा, क्योंकि तू हम से बहुत बलवन्त हो गया है।”
17 इसलिए इसहाक वहाँ से चला गया, और गरार की तराई में डेरे डालकर वहीं बस गया।
18 (क्योंकि इसहाक ने जल के उन कुओं को फिर से खुदवाया था, जो उसके पिता अब्राहम के दिनों में खोदे गए थे, और जिन्हें अब्राहम की मृत्यु के बाद पलिश्तियों ने बन्द कर दिया था; और उसने उनके वे ही नाम रखे थे जो उसके पिता ने रखे थे।)
19 और इसहाक के सेवकों ने उसी तराई में खोदते-खोदते वहाँ जीवित जल का एक सोता पाया।
20 तब गरार के चरवाहों ने इसहाक के चरवाहों से झगड़कर कहा, “यह जल हमारा है।” इसलिए उसने उस कुएँ का नाम एसेक रखा, क्योंकि उन्होंने अपनी ही इच्छा से उनके साथ झगड़ा खड़ा किया था।
21 फिर जब उन्होंने एक और कुआँ खोदा, तो उसके लिए भी वे झगड़े। इसलिए उसने उसका नाम सित्नाह रखा।
हम देख चुके हैं कि परमेश्वर ने इसहाक पर कैसी दया की, यद्यपि वह अपनी आपत्ति के समय त्यागे जाने के योग्य था। क्योंकि यह एक अनुपम अनुग्रह था कि रिबका का सतीत्व बचाया गया; इसलिए कि इसहाक ने अपने प्राण की रक्षा के लिए उसे छोड़ दिया था, और जहाँ तक उसका वश था, उसे त्याग ही दिया था। देखो, यह ऐसा अविश्वास था जो कठोर ताड़ना के योग्य था; तौभी परमेश्वर ने उसे सँभाला और उसकी उस पत्नी का रक्षक बना, जो अन्यथा त्यागी हुई थी। अब यहाँ कहा गया है कि परमेश्वर ने अपनी दया को और आगे बढ़ाया; अर्थात् वह चाहता था कि इसहाक आगे को भी सुरक्षित रहे, और न कोई उसके निज प्राण के विषय में, न उसकी पत्नी के विषय में उसे सताए। और सचमुच यह प्रबन्ध उसे मुफ़्त में दिया गया था; क्योंकि उसके सामने यह बात रखी जा सकती थी कि उसे अपनी पत्नी के लज्जित और अपमानित किए जाने की कुछ अधिक चिन्ता नहीं थी। और इसका परिणाम यह होता कि उसे प्रतिदिन अनेक झगड़ों का सामना करना पड़ता। परन्तु इसी में परमेश्वर उसकी परीक्षा लेता है; और फिर भी वह उस देश के राजा को काम में लाता है, कि वह चैन से रहे, और कोई उस पर चढ़ाई करने न आए। इसलिए यह ठहराया गया कि प्राणदण्ड के भय से कोई उसे न छुए। यह विशेष अधिकार के रूप में किया गया था, जैसा कि हम भजन संहिता से पहले उद्धृत कर चुके हैं, कि परमेश्वर ने अब्राहम और इसहाक पर अपनी प्रीति के कारण राजाओं को भी ताड़ना दी और जातियों को डाँटा; फिर भी इतना तो हम समझ ही सकते हैं कि अबीमेलेक ने भय से ग्रस्त होकर एक बहुत ही न्यायसंगत आदेश निकाला। परन्तु यह व्यवस्था स्थायी क्यों न रही? इसलिए कि जिन मनुष्यों में परमेश्वर के भय की जीवित जड़ नहीं होती, वे बल और हिंसा के सिवाय कुछ नहीं करते; उनमें न कोई पकड़ होती है, न स्थिरता, जैसा कि हम प्रायः आगे देखेंगे। परन्तु जब अबीमेलेक ने जाना कि यदि इसहाक को ठेस पहुँचाई गई, या किसी ने उसके साथ अन्याय किया, तो यह बिना दण्ड के न रहेगा, और परमेश्वर उसका बदला लेगा, तब देखो, उसे इस प्रकार लगाम दी गई।
अब यह बात हमें सब से बढ़कर इसलिए सुनाई जाती है कि हम जानें कि परमेश्वर ने अपने जनों को कैसे बचाए रखा, यद्यपि वे दुष्ट और क्रूर लोगों के बीच, मानो जंगली पशुओं के बीच रहते थे; तौभी उसने अपनी सामर्थ्य से उन्हें थामे रखा; और यह इसलिए कि हम भी उस पर भरोसा रखें। क्योंकि परमेश्वर की जो भलाई हमारे प्राचीन पूर्वजों पर प्रकट हुई, वह हमें केवल इसलिए नहीं सुनाई जाती कि हम जानें कि वह उस समय उन पर दयालु था जो उस पर भरोसा रखते थे; परन्तु इसलिए भी कि हम सन्देह न करें कि आज भी वह हमें सताए जाने देगा, यदि हम उसकी शरण में आएँ; और जब हम जानते हैं कि वह हमारे पक्ष में होगा, तब हम इस बात का भी निश्चय रखें कि वह हमारे पक्ष का समर्थन करेगा, और हमारे विरुद्ध मनुष्य जो कुछ भी करने या रचने का यत्न करें, उसके सामने उसकी सुरक्षा हमारे लिए पर्याप्त होगी।
इसलिए जब हमें ऐसा भरोसा होगा, तब इसहाक का जो दृष्टान्त यहाँ हमें सुनाया गया है, वह हमारी शिक्षा के काम आना चाहिए, मानो परमेश्वर हमारी आवश्यकता में हमारी सहायता और सहारे के लिए अपना हाथ फैलाए हुए हमें दिखा रहा हो। और विशेषकर जब हमारे शत्रु बलवन्त और पराक्रमी हों, और पृथ्वी पर कोई बात उन्हें हम पर अत्याचार करने से रोक न सके, तब हम जान लें कि परमेश्वर अपना सहायक हाथ बढ़ाने से न चूकेगा। क्योंकि हम जानते हैं कि उसने अपने भविष्यद्वक्ता यशायाह के द्वारा अपनी कलीसिया के विषय में क्या कहा है, कि वह उसके निकट इस जगत के सब राज्यों और साम्राज्यों से अधिक मूल्यवान है।
अब मान लीजिए कि संसारी लोग हमें कितना ही तुच्छ जानें, यहाँ तक कि उनकी दृष्टि में हम (जैसा कहा जाता है) कुत्तों के आगे फेंक दिए जाने के भी योग्य न ठहरें; तौभी, चूँकि परमेश्वर एक बार घोषणा कर चुका है कि हम उसकी भेड़ें हैं और उसने हमें अपनी देखरेख में ले लिया है, इसलिए हम निश्चय रखें कि जब हम पर उनका आक्रमण होगा जो हमें सताते हैं, और जिन्हें लगता है कि परमेश्वर को उन्हें छूना नहीं चाहिए, तब वह हमें न छोड़ेगा। परन्तु इसके अतिरिक्त मूसा आगे कहता है:
“कि इसहाक ने बोया, और सौ गुना काटा।”
अर्थात् जितना बोया था उसका सौ गुना। यहाँ यह प्रश्न उठ सकता है कि जब इसहाक के पास भूमि का एक पग भी न था, तो वह बोता कैसे था। परन्तु कुछ लोग कल्पना करते हैं कि उसने वहाँ कुछ भूमि मोल ली थी; पर यह सब युक्ति के विरुद्ध है। क्योंकि अवश्य है कि पितर उस प्रतिज्ञा से सन्तुष्ट रहें जो उन्हें दी गई थी, और प्रतिज्ञा की भूमि में परदेशियों की नाईं रहें। और वास्तव में कुछ ही आगे कहा गया है कि इसहाक ने अपने डेरे खड़े किए, यह बताने के लिए कि उसका कोई निश्चित घर या भवन न था। इसलिए हम देखते हैं कि वह अपने पिता अब्राहम की नाईं पृथ्वी पर घुमन्तू था; परन्तु वह बोने के लिए कुछ भूमि भाड़े पर ले सकता था; क्योंकि उसका परिवार बड़ा था, जैसा कि हम ने देखा कि अब्राहम का भी था, जिसने अपने घर से चार सौ से अधिक चुने हुए पुरुष युद्ध करने के लिए निकाले। इसहाक ने उसे बहुत घटाया नहीं था, जैसा हम देखते हैं; और यह भी अवश्य है कि परदेश में रहते हुए वह बहुत बढ़ा भी न सका होगा; उसने कोई खेत भाड़े पर लिया होगा या कुछ भूमि ले ली होगी जिसमें वह बोए; क्योंकि हम जानते हैं कि प्राचीन पितरों को यद्यपि परमेश्वर ने धनी बनाया था, तौभी वे और उनके घराने के लोग परिश्रम करना न छोड़ते थे। क्योंकि यद्यपि उनके पास धन और सुख-सामग्री दोनों थीं, तौभी उन्होंने परमेश्वर के उन उदार वरदानों का दुरुपयोग नहीं किया कि ठाठ-बाट या आलस्य में पड़कर राजा बन बैठें, परन्तु सदा अपने को साधारण दशा में बनाए रखा। तो संक्षेप में देखो कि हमें क्या सीखना है, जब इसहाक ने कुछ भूमि भाड़े पर लेकर उसमें बोया। और मूसा इसे इसलिए बताता है कि वह आगे कहता है कि परमेश्वर ने उसमें उसे आशीष दी, और उसे ऐसा सफल किया कि उसने सौ गुना काटा। परन्तु यहूदिया और सीरिया और उनके आसपास के देशों की तुलना में यह देश तो भूखा और मानो बंजर था, इसलिए इसे सुनकर हमें आश्चर्य होगा; विशेषकर जब वह सौ गुने की बात करता है, क्योंकि यह हमें अविश्वसनीय लग सकता है; इसलिए कि हम जो कुछ हमसे कहा जाता है उसे अपने देखे हुए के अनुसार आँकते हैं।
परन्तु यह निरर्थक नहीं कि हमारा प्रभु यीशु मसीह यह बात हमें बोए जानेवाले बीज के दृष्टान्त के द्वारा बताता है; यद्यपि उसने दूसरे प्रयोजन से कहा; तौभी वह कहता है कि जब मनुष्य बोएँगे, तो कुछ भाग मार्ग के किनारे गिरता है और आकाश के पक्षी उसे चुग जाते हैं; दूसरा पथरीली भूमि पर गिरेगा और जड़ न पकड़ेगा, क्योंकि उसे पोषण नहीं मिलता; दूसरा भाग झाड़ियों और काँटों में दब जाएगा; परन्तु जो अच्छी भूमि पर गिरता है (वह कहता है) वह फल लाएगा, कोई तीस गुना, कोई साठ गुना, और कोई सौ गुना।
जब हम यहाँ तक पहुँचते हैं (जैसा मैंने कहा), तब जब तक परमेश्वर के पुत्र ने यह न कहा होता, हम इस पर विश्वास न कर पाते। परन्तु प्राचीन पितर जिन्होंने कसदियों के देश के विषय में लिखा है, और विशेषकर जो उसी स्थान में रहे हैं और उसे भली-भाँति जानते हैं, कहते हैं कि वहाँ सामान्य उपज अस्सी और सौ गुनी होती थी। परन्तु यहाँ चूँकि वह पलिश्तियों के देश की बात कर रहा था, जो उपजाऊ तो था पर कसदिया के समान नहीं, इसलिए मूसा इसे एक अनुपम दान के रूप में बताता है जो परमेश्वर ने इसहाक को दिया, कि उसने सौ गुना काटा। देखो, यह इसहाक पर परमेश्वर की आशीष का चिह्न है, और वह भी उस विषय में जो इस क्षणभंगुर जीवन से सम्बन्ध रखता है। क्योंकि यद्यपि प्राचीन पितर सदा स्वर्गीय मीरास पर दृष्टि रखते थे और अपनी सारी भावनाएँ उसी ओर लगाते थे, तौभी नश्वर मनुष्य होने के कारण उन्हें आवश्यकता थी कि परमेश्वर इस संसार में उन्हें अपनी भलाई का कुछ स्वाद चखाए। क्योंकि जो कुछ पौलुस कहता है, वह यहाँ सदा लागू होता है, कि परमेश्वर के भय में न केवल अनन्त जीवन की, वरन् इस वर्तमान जीवन की भी प्रतिज्ञाएँ हैं। जब तक हम इस जीवन में हैं, परमेश्वर हमें उन आशीषों की पूर्णता नहीं देगा जिनकी वह हम से प्रतिज्ञा करता है; क्योंकि सचमुच हम तो अपना स्वर्ग यहीं चाहेंगे, और अपनी आँखें और आगे न उठाएँगे, वरन् हमारी सारी इन्द्रियाँ पूरी तरह तृप्त हो जाएँगी, यदि परमेश्वर हमें सब बातों में उतनी बहुतायत दे जितनी हम माँगते हैं; इसलिए वह हमें अपनी भलाई का केवल थोड़ा-सा स्वाद देता है, कि हमें आगे खींचे। परन्तु क्या हुआ? तौभी हम केवल अंश में ही मान सकते हैं कि परमेश्वर हमारा पिता है, न केवल उस गवाही से जो हमें उसके मुख से मिलती है, परन्तु उन आशीषों से भी जो वह हम पर उदारता से बरसाता है। और यहाँ मूसा की लिखी इस कथा में हम ये दोनों बातें देखते हैं: अर्थात् परमेश्वर अपनों को इस रीति से आशीष देता है कि उनके पास उस में आनन्दित होने का कारण रहे; और फिर उनके निवाले इस माप से बाँटता है कि जब तक वे इस संसार में हैं, वे सदा शोक में रहें, और इसी से उन्हें आगे दृष्टि उठाने का अवसर मिले। क्योंकि हमारे पिता इसहाक को देखो, वह फलता-फूलता है, बढ़ता है, और बलवन्त हो जाता है, ऐसा मूसा कहता है; और वह केवल यही नहीं कहता कि परमेश्वर ने उसे एक बार आशीष दी; परन्तु यह कि उसने उसे ऐसा बढ़ाया कि वह सदा बढ़ता और अधिक से अधिक धनवान होता गया। परन्तु दूसरी ओर वह यह भी जोड़ता है:
“कि पलिश्ती उससे डाह करने लगे।”
हम देखते हैं कि इसहाक के पास उस समृद्धि के कारण, जो उसे दी गई थी, परमेश्वर में आनन्दित होने का ऐसा कारण था, तौभी परमेश्वर ने उसे जगाए रखा, और उसके मीठे भोजन में कुछ खट्टी चटनी मिला दी। जब परमेश्वर ने उसे ऐसा प्रत्यक्ष बढ़ाया, तो यह उसके लिए बड़े आनन्द का कारण था। यह सब पलिश्तियों के लिए मानो एक दर्पण था, जिसमें वे देखें कि परमेश्वर की सेवा करना क्या है; तौभी यही उसके कष्ट का कारण बन गया और इसी से उसे सताया गया।
इसलिए हम देखते हैं कि परमेश्वर अपनी सन्तान पर जो वरदान उदारता से बरसाता है (मैं उन सांसारिक वरदानों की बात कहता हूँ जो इस जीवन से सम्बन्ध रखते हैं), उन्हें वह कैसे सन्तुलित करता है, कि वे कभी उन्हीं में जमकर चैन न पा बैठें। परन्तु यहाँ एक और प्रश्न उठ सकता है कि परमेश्वर ने इसहाक को ऐसा क्यों फलवन्त किया कि देश के निवासी उसके विरुद्ध उठ खड़े हुए। क्या उसके लिए यह कहीं अच्छा न होता कि वह साधारण दशा में बना रहता और अपने तम्बू में चैन से रहता, बजाय इसके कि इतना धनी हो जाए कि सब उसके विरुद्ध लड़ें, और उसे सह न सकें, इस भय से कि कहीं वह उनका स्वामी बनकर उन्हें पाँव तले न रौंद डाले?
यदि परमेश्वर ऐसा मध्यम मार्ग रखता, तो लगता है कि इसहाक के लिए अधिक लाभदायक होता। तब वह उसे बढ़ाता क्यों है, और इसी के कारण उसका पीछा क्यों किया जाता है, यहाँ तक कि उसके पास न अपने लिए, न अपने परिवार के लिए, न अपने पशुओं के लिए जल रहता है? परन्तु परमेश्वर सब बातों के प्रबन्ध में ऐसा बुद्धिमान है कि यदि वह अपने सेवकों को फलवन्त करता है, तो उन्हें दिखाता है कि उन्हें उसी से लगे रहना चाहिए, और कि उनके पास उसे धन्य कहने का कारण है। और फिर भी, जब वह उन्हें कष्टों और सतावों के सामने खुला छोड़ता है, तो इसे भी उनकी भलाई के लिए ही बदल देता है।
इसलिए हमें इसे एक नियम के रूप में स्मरण रखना है कि जितने अनुग्रह हमें इस संसार में परमेश्वर के हाथ से मिलते हैं, वे सब कुछ दुःखों से जुड़े रहते हैं, और हमारा मधु कभी शुद्ध नहीं होता, वरन् उसमें सदा कुछ सिरका मिला रहता है। यदि परमेश्वर को भाता तो वह कोई और मार्ग भी ले सकता था; परन्तु हमें उसके अधीन रहना और उसके किए से सन्तुष्ट रहना है, चाहे हमारी इन्द्रियाँ और हमारे शरीर की अभिलाषाएँ उसका विरोध करें। और यह सच है कि जो मनुष्य भली-भाँति समझदार हो, वह कभी धनी या सम्पन्न होना न चाहेगा; वरन् इतना ही चाहेगा कि उसके पास खाने, पीने और पहनने के लिए पर्याप्त हो; वह किसी और दशा या स्थिति को न खोजेगा।
तौभी परमेश्वर को यही भाता है कि एक वर्ग को वह निर्धनता से परखे, और दूसरों पर उदारता करे; और निर्धन और धनी दोनों विश्वासी, और दोनों परमेश्वर की सन्तान हो सकते हैं। मैं सब के विषय में सामान्य रूप से नहीं कहता; परन्तु हम देखते हैं कि कुछ परमेश्वर का भय माननेवाले हैं, जो सब एक-सी दशा और स्थिति में नहीं हैं: उनमें से कुछ के पास अपने निर्वाह के लिए पर्याप्त धन है, वरन् इतना कि वे मनुष्यों के बीच कुछ मान-प्रतिष्ठा के साथ रह सकें; दूसरों के पास खाने के लिए रोटी का एक टुकड़ा भी मुश्किल से है।
अब यदि इस बात का प्रबन्ध करना हमारे हाथ में होता, तो हम चाहते कि परमेश्वर एक समान और एक-सा माप रखे; परन्तु वह जानता है कि वह ऐसी विभिन्नता को क्यों पसन्द करता है। इसलिए (जैसा मैंने कहा) हमारा काम है कि हम उसकी इच्छा से सन्तुष्ट रहें। और जब वह अपने सेवकों को इस रीति से फलवन्त करना चाहता है कि हम निश्चय जान लें कि उसकी आशीष उनके ऊपर ठहरी है, तो यह उसकी भलाई की गवाही है; और उन्हें इससे लाभ उठाना चाहिए। परन्तु जब इसमें कुछ कड़वाहट मिली हो, तब उन्हें सोचना चाहिए कि परमेश्वर नहीं चाहता कि मैं यहाँ सो जाऊँ, और इन सांसारिक वरदानों पर ऐसा चैन करूँ कि वे मुझे अनन्त जीवन भुला दें।
इसलिए अवश्य है कि विश्वासियों में यह बुद्धि और विचार हो कि परमेश्वर जो वरदान उन्हें देता है, उनसे वे सदा लाभ उठाना जानें; और इस बीच उस अनुग्रह को न भूलें जो उसने उन पर दिखाया है, चाहे उन्हें मनुष्यों के हाथ से अनेक चिन्ताएँ, दुःख, क्लेश और अन्याय सहने पड़ें। और यहाँ विशेषकर धनी और निर्धन दोनों को उनका कर्त्तव्य सिखाया गया है।
जब कोई मनुष्य निर्धनता और अभाव से पीड़ित हो, तौभी परमेश्वर इस बीच उसे ऐसा दीन-हीन और त्यागा हुआ न होने देगा कि उसके पास सदा कुछ थोड़ा-सा भाग न रहे, जिससे वह अनुभव करे कि परमेश्वर को उसकी चिन्ता है। इसलिए जब विश्वासियों के पास वह सब न हो जो वे चाहते हैं, और परमेश्वर उन्हें मानो त्यागकर वैसे ही छोड़ दे, तब वे उस पर बुड़बुड़ाएँ नहीं, और न यह सोचें कि उसने उन्हें निकाल फेंका है; परन्तु जितना भी थोड़ा उसने उन्हें दिया हो (चाहे कितना ही थोड़ा क्यों न हो), उससे वे परमेश्वर की भलाई का स्वाद चखें, कि उसे अपना पिता कहकर पुकार सकें, उस पर भरोसा रख सकें, और अपनी उस दशा को धीरज से सह सकें, जो अन्यथा उनके लिए कठिन और दुःखद होती।
और धनियों के विषय में, जब उनके पास आवश्यकता से अधिक धन हो, और यदि इससे उन्हें कोई चिन्ता उत्पन्न हो, और कुछ दुःख आए, जैसा कि यह प्रचलित कहावत है: जिसके पास भूमि है, उसके पास युद्ध भी निकट है। यदि किसी मनुष्य के पास एक एकड़ भूमि ही हो, तो या तो वह मुकद्दमे में घसीटा जाएगा, या उसके विषय में उसे और कोई कष्ट होगा। धनियों के विषय में (मैं कहता हूँ), जब वे ये बातें देखें कि वे अपनी सम्पत्ति को शान्ति और चैन से नहीं रख सकते, वरन् सब में उन्हें सदा कुछ न कुछ कष्ट और बेचैनी रहेगी, तो वे जान लें कि इस सब के होते हुए भी उन्हें खिन्न नहीं होना चाहिए, और कि परमेश्वर की आशीष उन्हें सदा उस पर भरोसा रखने का साहस देती है; और वे कृतघ्नता और विस्मरण की ओर न बहें, वरन् सदा उसके नाम को धन्य कहें।
और यही है जो हमें इस स्थान से ध्यान में रखना है, जहाँ कहा गया है कि परमेश्वर ने इसहाक को फलवन्त किया, और यही बात देश के निवासियों को उससे डाह करने के लिए उभारने का कारण बनी, जिन्होंने इसलिए उसे अपने बीच से निकाल दिया। अब स्पष्ट रूप से कहा गया है:
कि गरार के राजा ने उसके पास कहला भेजा, हम तुझे अपने बीच नहीं रहने दे सकते, क्योंकि तू हम से बलवन्त हो गया है।
यहाँ हम उस बात को और स्पष्टता से देखते हैं जिसे मैंने पहले छुआ था: अर्थात् जो परमेश्वर के भय में भली-भाँति जड़ पकड़े हुए नहीं हैं, वे सद्गुण के काम तो कर सकते हैं, परन्तु वह मानो आँधी के झोंकों की नाईं होता है और टिकता नहीं; उनमें दृढ़ता नहीं होती, केवल उन्हीं में होती है जिन्हें परमेश्वर चलाता है, और जिन्हें उसने अपने पवित्र आत्मा से ऐसा सुधारा है कि वे अपने मार्ग पर लक्ष्य तक चलते जाते हैं। तौभी स्वयं विश्वासी भी भलाई करने में ऐसे स्थिर नहीं हैं, वरन् बहुधा वे टेढ़े पाँव पड़ते और मार्ग से भटक जाते हैं; परन्तु परमेश्वर उन्हें सुधारता है, और जब वे इधर-उधर भटक जाते हैं, तब वह उन्हें फिर भले मार्ग पर ले आता है।
परन्तु जिन्हें उसने अभी नया जन्म नहीं दिया, और जो अपने स्वाभाविक झुकाव पर बने रहते हैं, यद्यपि बहुधा ऐसा लगता है कि वे आश्चर्यकर्म करेंगे, तौभी देखो, पलक झपकते वे बदल जाते हैं। यह हम गरार के राजा में देखते हैं; अभी कुछ ही समय पहले वह स्वर्गदूत के समान था; क्योंकि जब उसने पराई पत्नी के साथ दुराचार की बात कही, तो कहा कि यह सारे देश को दूषित करना, और क्या छोटे क्या बड़े सब पर परमेश्वर का प्रतिशोध ले आना है। देखो, यह ईश्वरीय वचन है; लगता है कि परमेश्वर ने उसके मुख से बोला; और निःसन्देह यह अंगीकार उससे निकलवाया गया था, उसके अपने विरुद्ध भी, और उन सब के विरुद्ध भी जो इसे (जैसा कहा जाता है) क्षम्य पाप समझते थे।
तो देखो अबीमेलेक, जो दिखाता है कि परमेश्वर ने उसे विवश किया था और ऐसी धुन से भड़काया था कि उसे इस दोष से बड़ी घृणा थी, क्योंकि वह जानता था कि यह परमेश्वर को अप्रिय है। और इस पर उसने अपनी घोषणा करवाई कि कोई मनुष्य प्राणदण्ड के भय से इसहाक को या उसकी पत्नी को न छुए। यह भी प्रशंसा की एक और बात है। इसलिए ऐसा लगता है कि अबीमेलेक पूरी तरह परमेश्वर का भय माननेवाला बन गया था; परन्तु तुरन्त ही वह इसहाक से कहता है, चला जा, यहाँ से निकल जा। वह इसहाक को निकाल देता है; वह जानता है कि इसहाक परमेश्वर की सुरक्षा में है; और जब वह उसके विरुद्ध कुछ भी यत्न करता है, तो क्या यह मानो परमेश्वर को तुच्छ जानना और उस रक्षा को तोड़ना नहीं है जो उसने अपने सेवक पर रखी है?
इसलिए आओ हम सीखें कि जब ऐसा है, तो उन लोगों के बीच, जिनमें परमेश्वर का भय नहीं है, हम ऐसे रहें कि यदि वे कुछ समय हमारे प्रति नम्र और शिष्ट रहें और फिर बदल जाएँ, तो हम इसे धीरज से सहें, और हम पर उपकार करने के बाद उनसे अन्याय सहने को तैयार रहें। इसके अतिरिक्त हम जान लें कि जब तक परमेश्वर ने अपना भय हम में न बैठाया हो, और उसकी जीवित जड़ हम में न दी हो, तब तक हम में कभी कोई दृढ़ता या स्थिरता न होगी। आओ हम उससे प्रार्थना करें कि वह हमें कर्म के द्वारा दिखाने की कृपा करे कि उसने सचमुच हमें अपने पवित्र आत्मा से नया किया है; और हमारा उत्साह भूसे की आग के समान न हो जो शीघ्र बुझ जाती है, परन्तु हम सदा उसकी आज्ञाकारिता में आगे बढ़ने और उसी में बने रहने की इच्छा रखें; और यद्यपि हम कभी-कभी उससे फिसल जाते हैं, क्योंकि हम बहुत निर्बल हैं, तौभी हम पूरी तरह भटककर उससे दूर न बहा लिए जाएँ, वरन् अन्त तक अपने मार्ग पर चलते रहें। और इसलिए हमें दिन-प्रतिदिन उससे बिनती करनी है कि वह हम में अपने पवित्र आत्मा के अनुग्रह बढ़ाए; क्योंकि हमारी इच्छा चाहे कितनी ही अच्छी हो, यह निश्चित है कि हम शीघ्र ठण्डे पड़ जाएँगे; और हमारा स्वभाव चंचल होने के कारण हम आज से कल तक बदल जाएँगे, यदि परमेश्वर हमें चलाता न रहे। सारांश में हमें यही ध्यान में रखना है।
अब अबीमेलेक ने यहाँ जो कारण दिया है, वह सामान्य अनुभव से लिया गया है: क्योंकि हम जानते हैं कि धनवान निर्धनों को तुच्छ जानते हैं, और जिसके पास बहुत है, वह सोचता है कि दूसरे उसके बराबर नहीं हैं; इस पर वह तुरन्त घमण्ड और ढिठाई से फूल उठता है, और क्रूरता पीछे-पीछे आती है; जैसा कहा गया है, मनुष्य घोड़ों के समान हैं, जब वे भली-भाँति खिलाए जाते हैं, तो चंचल और बेकाबू हो जाते हैं, वे लात मारते और काटते हैं; सारांश यह कि वे सवारी नहीं करने देते। और अधिकतर मनुष्यों का यही हाल होता है। इसलिए जब कोई मनुष्य बड़ी सम्पत्ति और धन का स्वामी हो जाता है, तो निश्चित है कि स्वभाव से वह अपने को बढ़ाने की ओर झुकेगा, और उसमें घमण्ड का राज्य होगा। और सदोम के विषय में स्पष्ट कहा गया है कि जब उनके पास धन की बड़ी बहुतायत हुई, तो वे घमण्डी हो गए, और फिर क्रूरता आई, यहाँ तक कि वे अपने निर्धन पड़ोसियों पर दया करके उनकी सहायता न करते थे। और यह मानो प्रायः एक सामान्य बात है।
इसलिए जब अबीमेलेक इसहाक से कहता है: तू हम से बलवन्त है; इसलिए यहाँ से चला जा। इसका कारण यह है कि मनुष्य परमेश्वर के अनुग्रहों का दुरुपयोग करते हैं, और जब परमेश्वर हमें उन्नत करता है, तब संयम और विनम्रता से सन्तुष्ट नहीं रह सकते।
अब इससे हम जानते हैं कि हम कैसे टेढ़े हैं: क्योंकि जब परमेश्वर हम पर उदार होता है, तो निश्चित है कि वह हमारे निकट आता है और हमें अपने निकट खींचता है; और इससे हमें और भी अधिक दीन होने का अवसर मिलना चाहिए। क्योंकि हमें व्यवस्था में लाने और अपना कर्त्तव्य करने के लिए इससे बढ़कर कुछ नहीं होना चाहिए कि परमेश्वर इस रीति से हम पर प्रकट हो, और हम मानो उसकी दृष्टि में चलें। परन्तु यदि हम उसके अनुग्रहों का दुरुपयोग करें, और (जैसा मैं पहले कह चुका) यदि धन हम में घमण्ड और अहंकार, और इससे अपने से छोटों के प्रति तिरस्कार, और फिर क्रूरता उत्पन्न करे, यहाँ तक कि हम एक को सताएँ और दूसरे को तंग करें; हम इसे यहाँ और उसे वहाँ निगल जाएँ, तो क्या यह उजियाले को अन्धकार में बदलना नहीं है? इसलिए हमें उस टेढ़ेपन को जानना है जो हम में है, और जिसकी ओर हम न केवल झुके हुए, वरन् सौंपे हुए हैं, जब तक कि परमेश्वर हमें उससे न खींचे। अब जब परमेश्वर अपनी सन्तान के साथ भलाई करता है, तो निश्चित है कि वह उन में इस दोष को सुधारता है कि उन्हें अपने को बढ़ाने, सींग निकालने, अपनी रंगरलियाँ दिखाने, और जो उनके बराबर नहीं हैं उन्हें पाँव तले रौंदने की लालसा नहीं रहती; और हम पहले ही बता चुके हैं कि उसमें सदा कुछ ठण्डक मिलाई जाती है, ताकि वे अपनी सुख-समृद्धि में बहुत घमण्ड और आत्म-प्रशंसा न करें। जो भी हो, अवश्य है कि वह इसमें अपने पवित्र आत्मा के द्वारा कार्य करे, क्योंकि जब भी हमें अपने को बढ़ाने का कोई अवसर मिले, तब हम में कभी कोई विनम्रता न होगी: प्याज़ का छिलका (जैसा प्रचलित कहावत कहती है) हमें यह भुला देने के लिए बहुत है कि हम कहाँ से आए हैं, और हमें अहंकार में मतवाला करके सब दूसरों को तुच्छ जानने के लिए प्रेरित करने को पर्याप्त है।
परन्तु इसहाक ऐसा घमण्ड और अहंकार करनेवाला न था; और अबीमेलेक उसके साथ अन्याय करता है। परन्तु (जैसा मैंने कहा) उसने उसे सामान्य गज़ से नापा, क्योंकि मनुष्यों की रीति सदा यही है कि जब बन सके तब छोटे को दबाएँ, और अपनी हानि पहुँचाने की सामर्थ्य के अनुसार ले लें या छोड़ दें।
और इसी कारण अबीमेलेक कहता है: तू हम से अधिक बलवन्त है। और इस पर हमें यह ध्यान देना है कि परमेश्वर इस सामान्य उदाहरण के द्वारा हमें चेताता है कि जब हमें अपना कुछ मूल्य समझने का अवसर मिले, तब हम शान्ति और विनम्रता से चलें; उसे एक ओर रख दें, और अपनी श्रेणी में, वरन् सबसे नीची में, बने रहने के लिए और भी चौकस रहें; और इस बीच यदि वह हमें नीचा करना और एक दीन और तुच्छ दशा में रखना चाहे, तो हम जान लें कि वह हमारी भलाई के लिए ऐसा करता है, और यह मानो एक रक्षक औषधि है; और हम जान लें कि यदि हम किसी ऊँचे पद या सम्मान पर चढ़ाए जाते, तो वह हमें पूरी तरह अन्धा कर देता।
और यही है जो हमें इस स्थान से अपने साथ ले जाना है। अब इसके बाद कहा गया है:
कि इसहाक गरार की तराई में आया। वह देश से बिलकुल बाहर नहीं गया; परन्तु अलग हो गया, ताकि फिर उनकी दृष्टि में न रहे, और गरार के सब निवासियों से द्वेष का सारा कारण दूर कर दे; क्योंकि हम जानते हैं कि पलिश्ती किस प्रकार के लोग थे। यहाँ हम पहले तो इसहाक का धीरज देखते हैं: जिसने न केवल उत्तर नहीं दिया, वरन् शान्ति और चैन मोल लेने के लिए अपना सामान बाँध लिया और अपनी राह ली, कि कहीं और डेरा डाले; और इसमें उसने अपनी दीनता प्रकट की। यह सच है कि वह देश से बिलकुल बाहर नहीं गया; तौभी वह कुछ विरोध कर सकता था, उस स्थान में रहने के लिए जहाँ उसने मानो एक खेत ले रखा था। हम देख चुके हैं कि उसके पिता अब्राहम ने अपने घर में मानो एक छोटी-सी सेना तैयार कर रखी थी; इसलिए वह भी वैसा ही कर सकता था, और इस प्रकार अपने साथ किए गए अन्याय का सामना कर सकता था। परन्तु वह इससे इतना दूर है कि वह मानो मेमना है; और मूसा यह नहीं कहता कि उसने कोई बड़ा झगड़ा उठाया, या कोई छोटी-मोटी झड़प की, यद्यपि वह उनके बीच से, और वह भी अन्याय से, खदेड़ा गया, जबकि उन्होंने उसे ग्रहण किया था और उसे शिष्टता के कुछ चिह्न दिखाए थे; परन्तु वह सब कुछ छोड़ देता है। इसलिए हमें यह सिखाया जाता है कि जब हम पर अत्याचार हो, तो अपने साथ हुए अन्याय को धीरज से सहें, और जब हमें मनुष्यों के सामने अपना न्यायसंगत कारण दिखाई दे, तब भी बदला लेने के लिए तलवार हाथ में न लें। क्योंकि हम जानते हैं कि हमें क्या आज्ञा दी गई है: अर्थात् क्रोध को अवसर देना; यानी परमेश्वर को हमारे लिए बदला लेने देना; और इस प्रकार हम अपने पिता इसहाक का अनुकरण करें, जिसने उस देश से दुष्टतापूर्वक निकाले जाना सह लिया, जहाँ उसने अपना ऐसा आचरण रखा था कि उसे तो सब का प्रिय होना चाहिए था। क्योंकि उन्होंने ऐसा क्या कारण पाया था कि उसमें कुछ बुराई का सन्देह करें? तौभी वे उसे निकाल देते हैं, और कहते हैं कि वह बहुत बलवन्त है, मानो उसने अपनी महानता का दुरुपयोग किया हो। इसलिए इसहाक के इस पीछे हटने के विषय में यह एक शिक्षा है, जहाँ कहा गया है कि वह गरार की तराई में आया।
अब इससे हम जानते हैं कि हम कैसे टेढ़े हैं: क्योंकि जब परमेश्वर हम पर उदार होता है, तो निश्चित है कि वह हमारे निकट आता है और हमें अपने निकट खींचता है; और इससे हमें और भी अधिक दीन होने का अवसर मिलना चाहिए। क्योंकि हमें व्यवस्था में लाने और अपना कर्त्तव्य करने के लिए इससे बढ़कर कुछ नहीं होना चाहिए कि परमेश्वर इस रीति से हम पर प्रकट हो, और हम मानो उसकी दृष्टि में चलें। परन्तु यदि हम उसके अनुग्रहों का दुरुपयोग करें, और (जैसा मैं पहले कह चुका) यदि धन हम में घमण्ड और अहंकार, और इससे अपने से छोटों के प्रति तिरस्कार, और फिर क्रूरता उत्पन्न करे, यहाँ तक कि हम एक को सताएँ और दूसरे को तंग करें; हम इसे यहाँ और उसे वहाँ निगल जाएँ, तो क्या यह उजियाले को अन्धकार में बदलना नहीं है? इसलिए हमें उस टेढ़ेपन को जानना है जो हम में है, और जिसकी ओर हम न केवल झुके हुए, वरन् सौंपे हुए हैं, जब तक कि परमेश्वर हमें उससे न खींचे।
अब जब परमेश्वर अपनी सन्तान के साथ भलाई करता है, तो निश्चित है कि वह उन में इस दोष को सुधारता है कि उन्हें अपने को बढ़ाने, सींग निकालने, अपनी रंगरलियाँ दिखाने, और जो उनके बराबर नहीं हैं उन्हें पाँव तले रौंदने की लालसा नहीं रहती; और हम पहले ही बता चुके हैं कि उसमें सदा कुछ ठण्डक मिलाई जाती है, ताकि वे अपनी सुख-समृद्धि में बहुत घमण्ड और आत्म-प्रशंसा न करें। जो भी हो, अवश्य है कि वह इसमें अपने पवित्र आत्मा के द्वारा कार्य करे, क्योंकि जब भी हमें अपने को बढ़ाने का कोई अवसर मिले, तब हम में कभी कोई विनम्रता न होगी: प्याज़ का छिलका (जैसा प्रचलित कहावत कहती है) हमें यह भुला देने के लिए बहुत है कि हम कहाँ से आए हैं, और हमें अहंकार में मतवाला करके सब दूसरों को तुच्छ जानने के लिए प्रेरित करने को पर्याप्त है।
परन्तु इसहाक ऐसा घमण्ड और अहंकार करनेवाला न था; और अबीमेलेक उसके साथ अन्याय करता है। परन्तु (जैसा मैंने कहा) उसने उसे सामान्य गज़ से नापा, क्योंकि मनुष्यों की रीति सदा यही है कि जब बन सके तब छोटे को दबाएँ, और अपनी हानि पहुँचाने की सामर्थ्य के अनुसार ले लें या छोड़ दें।
और इसी कारण अबीमेलेक कहता है: तू हम से अधिक बलवन्त है। और इस पर हमें यह ध्यान देना है कि परमेश्वर इस सामान्य उदाहरण के द्वारा हमें चेताता है कि जब हमें अपना कुछ मूल्य समझने का अवसर मिले, तब हम शान्ति और विनम्रता से चलें; उसे एक ओर रख दें, और अपनी श्रेणी में, वरन् सबसे नीची में, बने रहने के लिए और भी चौकस रहें; और इस बीच यदि वह हमें नीचा करना और एक दीन और तुच्छ दशा में रखना चाहे, तो हम जान लें कि वह हमारी भलाई के लिए ऐसा करता है, और यह मानो एक रक्षक औषधि है; और हम जान लें कि यदि हम किसी ऊँचे पद या सम्मान पर चढ़ाए जाते, तो वह हमें पूरी तरह अन्धा कर देता।
और यही है जो हमें इस स्थान से अपने साथ ले जाना है। अब इसके बाद कहा गया है:
कि इसहाक गरार की तराई में आया।
वह देश से बिलकुल बाहर नहीं गया; परन्तु अलग हो गया, ताकि फिर उनकी दृष्टि में न रहे, और गरार के सब निवासियों से द्वेष का सारा कारण दूर कर दे; क्योंकि हम जानते हैं कि पलिश्ती किस प्रकार के लोग थे। यहाँ हम पहले तो इसहाक का धीरज देखते हैं: जिसने न केवल उत्तर नहीं दिया, वरन् शान्ति और चैन मोल लेने के लिए अपना सामान बाँध लिया और अपनी राह ली, कि कहीं और डेरा डाले; और इसमें उसने अपनी दीनता प्रकट की। यह सच है कि वह देश से बिलकुल बाहर नहीं गया; तौभी वह कुछ विरोध कर सकता था, उस स्थान में रहने के लिए जहाँ उसने मानो एक खेत ले रखा था। हम देख चुके हैं कि उसके पिता अब्राहम ने अपने घर में मानो एक छोटी-सी सेना तैयार कर रखी थी; इसलिए वह भी वैसा ही कर सकता था, और इस प्रकार अपने साथ किए गए अन्याय का सामना कर सकता था। परन्तु वह इससे इतना दूर है कि वह मानो मेमना है; और मूसा यह नहीं कहता कि उसने कोई बड़ा झगड़ा उठाया, या कोई छोटी-मोटी झड़प की, यद्यपि वह उनके बीच से, और वह भी अन्याय से, खदेड़ा गया, जबकि उन्होंने उसे ग्रहण किया था और उसे शिष्टता के कुछ चिह्न दिखाए थे; परन्तु वह सब कुछ छोड़ देता है। इसलिए हमें यह सिखाया जाता है कि जब हम पर अत्याचार हो, तो अपने साथ हुए अन्याय को धीरज से सहें, और जब हमें मनुष्यों के सामने अपना न्यायसंगत कारण दिखाई दे, तब भी बदला लेने के लिए तलवार हाथ में न लें। क्योंकि हम जानते हैं कि हमें क्या आज्ञा दी गई है: अर्थात् क्रोध को अवसर देना; यानी परमेश्वर को हमारे लिए बदला लेने देना; और इस प्रकार हम अपने पिता इसहाक का अनुकरण करें, जिसने उस देश से दुष्टतापूर्वक निकाले जाना सह लिया, जहाँ उसने अपना ऐसा आचरण रखा था कि उसे तो सब का प्रिय होना चाहिए था। क्योंकि उन्होंने ऐसा क्या कारण पाया था कि उसमें कुछ बुराई का सन्देह करें? तौभी वे उसे निकाल देते हैं, और कहते हैं कि वह बहुत बलवन्त है, मानो उसने अपनी महानता का दुरुपयोग किया हो। इसलिए इसहाक के इस पीछे हटने के विषय में यह एक शिक्षा है, जहाँ कहा गया है कि वह गरार की तराई में आया।
इसके अतिरिक्त यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि इसहाक ने कुओं के नाम बनाए रखे, जैसा हम बेर्शेबा के विषय में देख चुके हैं, जो शपथ का कुआँ था, क्योंकि अबीमेलेक ने वहाँ अब्राहम के साथ शपथ खाई थी। अब यह अधिकार बनाए रखने के लिए था: क्योंकि यह एक सार्वजनिक दस्तावेज़ या अनुबन्ध के बराबर था, वरन् उससे भी बढ़कर। अबीमेलेक ने वहाँ अब्राहम के साथ वाचा बाँधी थी: देखो, एक प्रतिज्ञा जो गम्भीर विधि के साथ की गई; अब्राहम ने कुओं के विषय में उसकी अधीनता मानी थी; नाम भी यही गवाही देता है। इसलिए इसहाक यह जताता है कि निवासी जानते थे कि यह उस मीरास का एक भाग है जो उसके पिता ने उसके लिए मोल ली थी, और इसलिए यह विधि के अनुसार उसका अपना था। परन्तु इस सब से कुछ नहीं बनता; उसका अधिकार जितना भी न्यायसंगत हो, तौभी वे उससे झगड़ना नहीं छोड़ते। इस प्रकार हम देखते हैं कि यद्यपि परमेश्वर की सन्तान और कुछ नहीं चाहती, केवल उसका भोग करना जो उनका अपना है और जिसे प्रयोग करना उनके लिए उचित है, तौभी वे उससे निकाल दी जाएँगी। क्योंकि परमेश्वर को तुच्छ जाननेवाले ढीठ होते हैं; और मनुष्य उनसे चाहे जो कहें, न युक्ति न न्याय उन पर प्रभाव डालता है, न उसे कुछ गिना जाता है। जब हम आज ऐसा ही देखें, तो इसे कोई नई और अनोखी बात न समझें। उस समय अधिक सरलता थी, तौभी हम देखते हैं कि इसहाक को उस सब से निकाला जाना पड़ा जिसे वह जितना न्यायपूर्वक सम्भव था अपना बताता था।
अब इस पर कहा गया है कि उसने उन दो कुओं के नाम रखे जो उससे छीन लिए गए, अर्थात् जिनके लिए उसे विधि के सामने घसीटा गया: अर्थात् जिनसे वह निकाल दिया गया; क्योंकि आज की नाईं मुकद्दमा लड़ना उसके काम न आया, परन्तु बलपूर्वक वह अधिकार से निकाल दिया गया। अब इसमें कोई सन्देह नहीं कि जब उसने ये झगड़े, तकरार या विवाद के नाम रखे, तो यह इस प्रकार किया गया मानो वह परमेश्वर के सामने अपनी शिकायत कर रहा हो, जब उसने देखा कि मनुष्यों के कान बहरे हैं और सब युक्तियाँ ठुकरा दी गई हैं; उसके पास और कोई उपाय नहीं, केवल यही कि एक स्मारक खड़ा करे, कि परमेश्वर उस पर दया करे। इसलिए अब हम सीखें कि जब हम अपने अधिकार और स्वत्व दिखाकर अपना जो है और जो हमें दिया गया है उसे बनाए रखने में कुछ न पा सकें, तौभी हम इस भरोसे को न छोड़ें कि अन्त में परमेश्वर हम पर दया करेगा।
तो देखो हमें क्या करना है: अर्थात् जहाँ तक हमारा वश है, यत्न करें कि मनुष्य हमें शान्ति से रहने दें, और हमें निगल जाने को न आएँ। परमेश्वर की सन्तान के लिए यह सदा उचित रहेगा: क्योंकि यद्यपि हमें आज्ञा है कि भेड़ियों के बीच भेड़ों के समान रहें, तौभी परमेश्वर ने हमें शान्तिपूर्ण बचाव की अनुमति दी है, क्योंकि उसने हमें अपने हाथों में ले लिया है।
इसलिए जहाँ तक हमारा वश है, हमें यत्न करना है कि हमारे साथ की गई सब हिंसा, अन्याय, अत्याचार और उपद्रव, और हमारे विरुद्ध रची जा सकनेवाली सब सतावट को दूर रखें। क्या हम ऐसा कर चुके? यदि कुछ न बने, और मनुष्य बुराई पर ऐसे हठ से अड़े हों, और विशेषकर यदि उन पर ऐसा उन्माद सवार हो कि उनके बीच सारी युक्ति पाँव तले रौंद दी गई हो, तो हम परमेश्वर की शरण लें और उससे प्रार्थना करें कि वह हमारा मुकद्दमा अपने हाथ में ले ले; और हम सन्देह न करें, जब मनुष्य ऐसे अशिष्ट हो जाएँ कि हम जो कुछ भी कहें उसका वे उपहास करें, कि अन्त में परमेश्वर उनसे निपट लेगा। तो देखो, इसहाक के उदाहरण से हमें यह लेना है, जब उसने कुओं के नाम झगड़ा, विवाद और तकरार रखे। क्योंकि यह क्रोध या चिड़चिड़ाहट से नहीं था, जैसे बहुत से लोग हैं जो अपना बदला लेंगे और कोई अपमानजनक बात उगल देंगे; परन्तु इसहाक ने अपना मुकद्दमा परमेश्वर को सौंप दिया; जैसे हमें सन्त पतरस भी उपदेश देता है कि यदि मनुष्य हम से डाह करें और उनके हाथों कोई उपाय न मिले, तो हम प्रतीक्षा करें कि परमेश्वर कब अपना हाथ बढ़ाएगा, जैसा वह निश्चय करेगा।
अब अन्त में कहा गया है कि इसहाक ने एक कुआँ खोदा जिसके लिए उस पर आक्रमण नहीं हुआ, और उसका नाम रहोबोत रखा, मानो कहता हो, उदारताएँ; और विशेषकर वह उसे बहुवचन में रखता है: और यह कहकर सन्तुष्ट नहीं होता कि देखो, एक उदारता; परन्तु कहता है, देखो वे उदारताएँ जो परमेश्वर ने हम पर की हैं। जो मैंने पहले छुआ था, उसे हम और स्पष्टता से देखते हैं: अर्थात् जब इसहाक ऐसे बड़े संकट में था कि उसके पास पीने को जल न था, कि मनुष्य उसके प्रति ऐसे क्रूर थे कि वह उस जल को न पी सका जो उसने अपने श्रम से और अपने घराने के हाथों खोदा था, तब उसने यह मामला परमेश्वर को सौंप दिया, जो धर्मी न्यायी है।
परन्तु इसके विपरीत, जब परमेश्वर ने उस पर तरस खाया, और मनुष्य उसे और सताने न आए, और उसके पास अपने और अपने सारे दल के लिए पीने को जल था: तब वह कहता है, वाह! यह परमेश्वर है जिसने मुझे यह दिया है। वह यह नहीं कहता: आह, अन्त में तो मेरा मनोरथ पूरा हुआ; इन दुष्टों ने अन्ततः मुझे छोड़ दिया; अब हम चैन करें। वह किसी अधर्मी मनुष्य की नाईं ऐसा सीधा-सादा नहीं बोलता, परन्तु वह चाहता है कि परमेश्वर के प्रति धन्यवाद का एक स्मारक हो, जैसे उसने अपनी शिकायत के स्मारक खड़े किए थे कि प्रभु को अपने ऊपर दया करने के लिए प्रेरित करे।
इसी प्रकार उसका मन है कि अब परमेश्वर का यह उपकार मानो वहाँ खोदकर लिख दिया जाए, और मनुष्य उसकी चर्चा करें, न केवल तीन दिन, वरन् उसकी मृत्यु के बाद भी: और उस कुएँ को परमेश्वर के उस अनुग्रह का चिह्न मानें जो उसने उस पर दिखाया था। और हम इस परिस्थिति पर ध्यान दें: क्योंकि वह बहुत समय तक पीड़ित रहने पर भी शान्त मन से परमेश्वर का धन्यवाद करना नहीं छोड़ता। जब हम ऐसे ही कष्ट बहुत समय तक सह चुके होते हैं, तो परमेश्वर के अनुग्रह हमारी बुराई की उस अनुभूति से धुँधले पड़ जाते हैं; और यदि परमेश्वर हमें कुछ समय तक कुम्हलाने दे, तो चाहे बाद में वह हमारी ओर हाथ बढ़ाए, तौभी हम सोचते हैं कि यह उसकी ओर से नहीं है; परन्तु इसे भाग्य के सिर मढ़ते हैं।
परन्तु इसहाक ने ऐसा नहीं किया; वरन् यद्यपि वह निकाला गया था और बहुत समय तक यह सहता रहा, तौभी जैसे ही परमेश्वर ने उसे छुटकारा दिया, वह उसके नाम को धन्य कहता है, और कहता है, परमेश्वर ने मुझे विस्तार दिया है। देखो (वह कहता है) परमेश्वर की उदारताएँ या दान, जो मैं इस कुएँ में देखता हूँ। परन्तु अब अन्त में हमें इसहाक का धीरज देखना है; जब हम आज धीरज का प्रचार करते हैं, तो हम से यह बात मुश्किल से निभती है कि यदि हमें थोड़ा-सा भी सहना पड़े, तो हम तुरन्त गर्म और क्रोधित न हों; और जब हम बहुत धीरजवन्त दिखाई देते हैं, तब भी कुछ न कुछ कुड़कुड़ाहट सदा रहेगी, जब तक परमेश्वर पहले ही धक्के में हमें सान्त्वना न दे; और इस बीच हम सहते ही क्या हैं? निश्चय, कुछ भी नहीं के बराबर। यदि हम केवल एक चुटकी सहें, तो आह, यह इतना कठिन है कि इससे कठिन कुछ हो नहीं सकता; और यदि मनुष्य हमारे साथ अन्याय करते ही चले जाएँ, तो आह, हम बहुत सह रहे हैं। परन्तु हम उस नम्रता और कोमलता से बहुत दूर हैं जो यहाँ हमारे पिता इसहाक में दिखाई गई है। हम कहेंगे, मुझ से यह सहा नहीं जाता। यदि कोई हमारे साथ अन्याय करे, चाहे तीन अधन्नियों के मूल्य का, या हमारी सम्पत्ति के किसी छोटे-से अंश का: आह, मैं इसे सह नहीं सकता; यह तो बहुत है। परन्तु इसहाक जल के लिए झगड़ा (मैं कहता हूँ झगड़ा), उसने लड़ने के लिए तलवार नहीं उठाई; परन्तु अन्याय सहा; यद्यपि उसने कुएँ खोदे थे, और उसके पिता ने उन्हें अपने ही धन से मोल लिया था, और राजा ने उसे अनुदान दिया था, और उसने उन्हें फिर से खोदा था, और पीने को जल पाने के लिए बहुत परिश्रम उठाया था; तौभी इस सब के होते हुए हम उसका धीरज देखते हैं। और इसलिए जब परमेश्वर हमें पीड़ित करे, और दुष्टों की लगाम ढीली छोड़ दे, कि हम उनसे लूट और मूँड लिए जाएँ, तो हम फिर भी जान लें कि हम उस चरम सीमा तक नहीं पहुँचे हैं कि एक बूँद जल भी न रहे, और वे तत्व हम से छीन लिए जाएँ जिन्हें परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच साझा रखना चाहा है। क्योंकि प्रत्येक मनुष्य अनाज, दाखरस, मांस और ऐसी वस्तुओं में, और चल और अचल सम्पत्ति में अपना भाग अलग चाहता है; प्रत्येक अपना निज चाहता है; परन्तु जल तो एक तत्व है जिसे परमेश्वर ने सब मनुष्यों के लिए ठहराया है।
जब किसी राजमार्ग पर नदियाँ, कुएँ और सोते हों: तो वे उन से क्यों छीने जाएँ जो परमेश्वर के प्राणी हैं? परन्तु जो भी हो, ऐसा ही हुआ कि हमारे पितर ऐसी चरम सीमा तक पहुँचाए गए। और यह (जैसा मैं पहले छू चुका) इस प्रयोजन से है कि हम धीरज धरना सीखें, न केवल कोई एक छोटा-सा अन्याय, या दो या तीन सहने में, परन्तु सब बातों में ऐसे नम्र और कोमल स्वभाव के हों कि यदि बात जीवन और मृत्यु की भी हो (जैसा वे कहते हैं), तो हम परमेश्वर पर आशा रखें कि वह हम पर दया दिखाएगा। और इसलिए आओ हम अपनी बुराई को दुगुना न करें, जब दुष्ट और अधर्मी हमें अन्याय से सताएँ, तो एक के दो भूत न बनाएँ; परन्तु उनके मन को कोमल करने और उनके उस वैर को शान्त करने का यत्न करें जो वे हमारे विरुद्ध रखते हैं। यदि हम ऐसा करें, तो निश्चित है कि यद्यपि हम कुछ समय के लिए घोर पीड़ा में रहें, तौभी अन्त में परमेश्वर हमें ऐसा विस्तार देगा कि हमारे पास भरे मुँह से उसके पवित्र नाम को धन्य कहने का अच्छा कारण होगा।
उनका निवास ऐसा होना है कि वे भटकते रहें और उनका कोई विश्रामस्थान न हो, जब तक कि मानो दिन-प्रतिदिन परमेश्वर के हाथ से उन्हें ठिकाना न मिले; और इस बीच वे अपने पितरों के उदाहरण पर इधर-उधर भटकने और स्थान-स्थान जाने को तैयार रहें, जिन्होंने अनुभव से सीखा कि अपनी मीरास यहाँ नीचे पृथ्वी पर न रखें, और अपने को परदेशी और यात्री मान लिया, जैसा हम आगे देखेंगे कि याकूब ने फ़िरौन को उत्तर दिया। इस बीच हम वहाँ के सब निकट पड़ोसियों का वैर भी देख सकते हैं: क्योंकि विशेषकर वे कुएँ जो अब्राहम ने मोल लिए थे, उसकी मृत्यु के बाद उससे छीन लिए गए, ताकि उसके उत्तराधिकारी और सन्तान उनका उपयोग न कर सकें। परन्तु कहा गया है कि इसहाक ने वहाँ फिर भी एक कुआँ खोदा: क्योंकि वह जल के बिना नहीं रह सकता था, अपने बड़े परिवार के लिए भी और अपने पशुओं के लिए भी; परन्तु वह जल खोजने बहुत दूर गया, जब तक कि परमेश्वर ने उसे वह न लौटा दिया जो उससे अन्याय से छीना गया था। इसलिए वह कुछ समय तक बेर्शेबा में बिना जल के रहा, जब तक वह उधार या मोल न ले; परन्तु बाद में वह अपना कुआँ फिर पा लेता है, और इस प्रकार पहले से कुछ अधिक चैन में आ जाता है; और परमेश्वर उन्हें, जो मानो उन्हें प्यास से मार डालना चाहते थे, अपना वैर निभाने और अपना मनोरथ पूरा करने नहीं देता। परन्तु जो भी हो, परमेश्वर ने पहले ही धक्के में उसकी न सुनी। इसलिए हमें यहाँ वह सीखना है जो कल छुआ गया था: अर्थात् हम अभाव सहना सीखें, वरन् जल के अभाव में भी, और जो कुछ हमारे पितरों ने परखा उसे अनोखा न समझें। क्योंकि कोई कारण नहीं कि हम उनसे अधिक विशेषाधिकार पाएँ। और यदि परमेश्वर हमें बचाए, तो हम इस बात में उसकी भलाई को मानें; और यदि वह हमें किसी और रीति से पीड़ित करे, तो हम और भी अधिक धीरज के लिए ढाले जाएँ। परन्तु फिर भी कहा गया है:
“कि जिस रात वह बेर्शेबा गया, उसी पहली रात परमेश्वर ने उसे दर्शन दिया।”
यहाँ हमें वह बात ध्यान में रखनी है जो हम पहले अब्राहम के जीवन में कह चुके हैं: अर्थात् परमेश्वर ने उसे दर्शन दिया, क्योंकि उसे उन बड़े शोकों और क्लेशों के कारण, जो वह पहले सह चुका था, सहायता और सान्त्वना की आवश्यकता थी। इसलिए यह परिस्थिति ध्यान देने योग्य है: कि परमेश्वर ने अपने सेवक को चरम सीमा तक पीड़ित देखकर उसे कुछ चैन देना चाहा; जैसे आज, यद्यपि हमारे पास ऐसे दर्शन नहीं हैं, तौभी परमेश्वर हमें अपने आप को दिखाना नहीं छोड़ता, जब वह देखता है कि हम और सह नहीं सकते, और जब तक वह अपना सहायक हाथ बढ़ाकर हमें न सँभाले, हम गिरने ही वाले थे।
जब कभी हम संकट में होते हैं, तो सोचते हैं कि परमेश्वर हम से अलग हो गया है, और कल्पना करते हैं कि उसने हमें बिलकुल भुला दिया है। परन्तु इसके विपरीत, जब वह हमें अपने अनुग्रह का स्वाद, चाहे जिस रीति से हो, चखाता है, या यूँ कहें कि जब वह हमें दृढ़ करता है, और हम सब परीक्षाओं के विरुद्ध वीरता से लड़ते हैं, या जब वह हमें हमारे साथ किए गए अन्यायों और सतावों से छुड़ाता है, या मानो किसी प्रत्यक्ष रीति से हमारी सहायता करता है: तब देखो, उसकी उपस्थिति, और तब हम देखते हैं कि उसे हमारी चिन्ता है।
इसलिए आओ हम ध्यान दें कि जब परमेश्वर ने इसहाक को दर्शन दिया, तो अवश्य है कि वह किसी बड़ी आवश्यकता में रहा होगा: क्योंकि ऐसा प्रतिदिन नहीं होता था; और इस पर हम सीखें कि जब परमेश्वर हमें सताए जाने, बेचैन किए जाने, घबराए जाने और तंग किए जाने देने के बाद अन्त में अपने को हमारा पिता प्रकट करे, तो हम सन्तुष्ट रहें। और यदि यह इतनी शीघ्र न हो, तो हम उसकी बाट जोहें, जैसा हम इसहाक को करते देखते हैं, जिसके पास सदा इस बात का निश्चित चिह्न न था कि परमेश्वर उसकी सहायता करेगा; वरन् इसके विपरीत वह तब अपने को सब सहारों से बिलकुल रहित देखता है, और वह भी बहुत समय तक; और एक विपत्ति आने के बाद, देखो, दूसरी उतनी ही घनी चली आती है; तौभी वह हिम्मत नहीं हारता।
और इसलिए आओ हम उसी मार्ग पर चलें। और इस बीच यह भी ध्यान दें कि केवल एक वचन, जो परमेश्वर हमारे प्रति अपने प्रेम की गवाही देने के लिए हम से कहे, हमारे लिए उन सब सम्पत्तियों से अधिक मूल्यवान होगा जो हमारे पास हो सकती हैं; हाँ, चाहे हमारे पास भर पेट खाने-पीने को हो, और वह भी सब स्वादिष्ट पदार्थों में, चाहे हमें कोई सतानेवाला न हो, चाहे हम चारों ओर से चैन में हों। सारांश यह कि चाहे हमारे पास मन की सब इच्छाएँ हों: यदि संसार हमारे साथ ऐसा चलता, तो निश्चित है कि हमें उसे उतना बड़ा न मानना चाहिए जितना इस गवाही को कि परमेश्वर हम पर दयालु है।
क्योंकि मान लें कि कोई मनुष्य सब सुखों में तैरता हो, और उसके पास संसार भर का चैन हो और उसे किसी वस्तु की घटी न हो: तौभी यदि वह नहीं जानता कि उसके और परमेश्वर के बीच क्या सम्बन्ध है, यदि उसके पास कोई शिक्षा नहीं, कोई प्रतिज्ञा नहीं, तो वह सदा मानो इस सन्देह में रहेगा कि उसका चैन टिकेगा या नहीं; और यदि वह इससे ऐसा मतवाला हो जाए कि सोचे कि उसकी समृद्धि अब भी उसके साथ बनी रहेगी, तो इस रीति से इस संसार में अपनी सारी सुख-समृद्धि पाना भी क्या है? यह जीवन कितनी देर टिकता है?
