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याकूब और एसाव पर चौथा उपदेश, उत्पत्ति 25:24-28
24 जब उसके जनने के दिन पूरे हुए, तो देखो, उसके गर्भ में जुड़वाँ बच्चे थे।
25 पहिला जो निकला वह लाल था, और उसका सारा शरीर कम्बल के समान रोएँदार था; और उन्होंने उसका नाम एसाव रखा।
26 उसके बाद उसका भाई निकला, और उसका हाथ एसाव की एड़ी को पकड़े हुए था; इसलिए उसका नाम याकूब रखा गया। जब रिबका ने उन्हें जन्म दिया, तब इसहाक साठ वर्ष का था।
27 और वे लड़के बढ़ने लगे, और एसाव चतुर शिकारी हुआ, और परिश्रमी मनुष्य था; परन्तु याकूब सीधा मनुष्य था, और तम्बुओं में रहा करता था।
28 और इसहाक एसाव से प्रेम रखता था, क्योंकि उसके अहेर का मांस उसके भोजन में आता था, परन्तु रिबका याकूब से प्रेम रखती थी।
चूँकि परमेश्वर का चुनाव अपने आप में गुप्त है, इसलिए आवश्यक है कि वह समय के साथ प्रकट हो, जैसे परमेश्वर अपने कामों को सिद्धता तक पहुँचाता है। क्योंकि इतना ही पर्याप्त नहीं कि परमेश्वर ने एक बार हमें चुन लिया और हम पर अपनी छाप लगा दी, परन्तु यह भी अवश्य है कि वह इसे अन्त तक निभाता रहे, और यह प्रकट करे कि उसका चुनाव व्यर्थ नहीं है, वरन् हमें उद्धार तक पहुँचाने के लिए उसके पास अपना बल और सामर्थ्य है। अब वह यह कार्य भिन्न-भिन्न रीतियों से करता है; क्योंकि परमेश्वर सदा एक ही मार्ग पर चलने को बाध्य नहीं; उसके अपने उपाय हैं, जैसे उसे ठहराना भला लगे। कभी वह अपने चुनाव को बहुत शीघ्र प्रकट कर देता है; कभी उसे बहुत समय तक टाले रखता है; और जो यह समझते हैं कि जिन्हें परमेश्वर ने चुना है उन सब में कोई ऐसा बीज होता है जिससे मनुष्य उन्हें दूसरों से पहचान सकें, क्योंकि वे भलाई की ओर झुके रहते हैं और परमेश्वर की सेवा करने की कुछ लालसा रखते हैं, वे बुरी तरह भूल करते हैं, और अनुभव भी उन्हें झूठा ठहराता है।
यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला अपनी माता के गर्भ ही से पवित्र किया गया था; परन्तु बहुतों में बात इससे बिलकुल भिन्न होती है। क्योंकि परमेश्वर अपने चुने हुओं को कभी-कभी बिखरी हुई भेड़ों के समान रहने देता है, और वे ऐसे दिखाई देते हैं मानो सर्वथा खो गए हों; और यह इसलिए कि उसके अनुग्रह की महिमा और भी बढ़े। जैसे अब हम याकूब में कोई चिन्ह देखते हैं कि परमेश्वर ने उसे चुन लिया था और उसके भाई एसाव को ठुकरा दिया था। क्योंकि याकूब ने अपने भाई की एड़ी पकड़ी, मानो वह उससे लड़ा हो। और यह संयोग से नहीं हुआ, न स्वभाव से हुआ; परन्तु परमेश्वर ने मानो उँगली से दिखा दिया कि एसाव पहिलौठा तो है, तौभी पीछे कर दिया गया; और याकूब, जो जन्म में छोटा था, समय पाकर आगे बढ़ाया जाएगा। इसलिए इस स्थान से हमें जो सीखना है उसे ध्यान में रखो: अर्थात् यह कि परमेश्वर उसे प्रमाणित करेगा जो उसने कहा था, जैसा हमने कल देखा: कि बड़ा छोटे की सेवा करेगा।
और यह बात दो शिशुओं के जन्म में पहले ही दिखाई जा चुकी है। परन्तु इस उदाहरण से हमें सामान्य रीति से यह निष्कर्ष निकालना है कि जिन्हें परमेश्वर ने चुना है, उन्हें उसने पहले ही से सम्भाल रखा है; और इस प्रकार जब उसका कार्य प्रकट होता है तब वह अपनी युक्ति और आज्ञा को दृढ़ करता है। और यद्यपि हम इतनी दूर प्रवेश नहीं कर सकते कि जान लें कि जगत की उत्पत्ति से पहले चुने हुए कौन हैं, तौभी जितना आवश्यक होगा उतना हमारा चुनाव हमारे सामने प्रमाणित किया जाएगा। क्योंकि यदि परमेश्वर (जैसा कोई कहे) उसका मूल लेख अपने ही पास रखता है, तौभी इससे यह नहीं निकलता कि वह हमें उसकी ऐसी साक्षी नहीं देता कि हम निश्चय जानें कि वह हमारा पिता है और अन्त तक रहेगा; और हम इसी निश्चय के साथ उसको पुकारें। क्योंकि यहाँ यह नहीं कहा गया है कि (जैसा पवित्र शास्त्र कहता है) कोई बुलाहट हुई थी, अर्थात् उसने याकूब को बताया हो कि मैंने तुझे चुना है। यह समय पाकर होगा; परन्तु यहाँ केवल इतना कहा गया है कि परमेश्वर ने मानो आँखों के सामने दिखा दिया कि जो उत्तर उसने रिबका को दिया था वह व्यर्थ नहीं था। कैसे? परिणाम इसी में दिखाई दिया कि याकूब ने अपने भाई की एड़ी पकड़ी। परन्तु यहीं प्रसंगवश परमेश्वर इस चित्र के द्वारा यह दिखाना चाहता है कि उसके चुने हुए बिना बहुत संघर्षों के अपने अन्त तक नहीं पहुँचते। सच है कि याकूब नहीं जानता था कि इसका अर्थ क्या है, और उसकी अवस्था भी इसकी अनुमति नहीं देती थी; तौभी यह हमें सिखाने के काम आना चाहिए, और इसलिए रखा गया है कि हम पर प्रकट करे कि परमेश्वर चाहता है कि हम लड़ें, चाहे उसने हमें अपनी रखवाली में ले लिया हो, वरन् चाहे हम उसकी सुरक्षा और अगुवाई में हों; और वह चाहता है कि हम उसी से उद्धार की आशा रखें, और कि जो कुछ उसने आरम्भ किया है वह पूरा किया जाएगा।
यद्यपि यह सब सच है, तौभी वह हमें आलसी नहीं देखना चाहता; वरन् वह चाहता है कि हम में से हर एक अन्त तक प्रयत्न करे, ताकि हम उस लक्ष्य तक पहुँचाए जाएँ जिसके लिए उसने हमें बुलाया है। इसलिए जो मूसा बताता है कि याकूब ने अपने भाई की एड़ी पकड़ी, उससे हमें जो सीखना है उसे ध्यान में रखो। अब वह आगे कहता है:
“और बड़े का नाम एसाव रखा गया, और दूसरे का याकूब।”
जहाँ तक दूसरे का सम्बन्ध है, यह ऐसा है मानो कोई उसे “एड़ी-पकड़नेवाला” कहे; परन्तु एसाव के विषय में कहा गया है कि वह अपनी माता के गर्भ से सर्वथा रोएँदार और बालों से ढका हुआ निकला, मानो वह पहले ही से पूरा मनुष्य हो। देखो, उसने अपना नाम कहाँ से पाया।
इस प्रकार हम इन दोनों में भेद देखते हैं; अर्थात् कोई कहता कि एसाव अपने भाई से कहीं ऊँचा उठने वाला है। क्योंकि हम उसे पूरी तरह गठा हुआ देखते हैं, वह बड़ा है और बड़ा बल दिखाता है; सारांश यह कि वह बालक के समान नहीं, मनुष्य के समान है। परन्तु याकूब के विषय में और कुछ नहीं, केवल वह हाथ है जिसने एड़ी को पकड़ा था, और वह असमय जन्मी हुई वस्तु के समान था; और जब वे बड़े हुए तब भी वह वैसा ही बना रहा। क्योंकि एसाव शिकारी था, परिश्रमी मनुष्य, (मानो कोई कहे) केवल बल ही बल। याकूब के विषय में यह बहुत सच है कि जो शब्द मूसा काम में लाता है वह भले अर्थ में लिया गया है और उसका अर्थ खरा या सिद्ध है; तौभी यह ऐसी सीधाई थी जो उस सब के विपरीत थी जो एसाव में अधिक प्रत्यक्ष थी; और सचमुच मूसा यह भी जोड़ता है कि वह घर में रहता था, मानो वह रसोइया हो जो सदा राख में बैठा रहता है। इसलिए एसाव और याकूब में जो बात हमें विचारनी है उसे ध्यान में रखो।
अब यह शिक्षा उसकी पुष्टि करती है जिस पर हम पहले विचार कर चुके हैं: अर्थात् यह कि परमेश्वर ने मनुष्यों को उनके बाहरी दिखावे के अनुसार नहीं चुना; वरन् इसके विपरीत, जो सबसे उत्कृष्ट गिना जाता है उसे वह त्याग देता और तुच्छ जानता है, और जो मनुष्यों की दृष्टि में ठुकराया हुआ है उसे वह ऊँचा उठाता है। हम इसे सदा देखते हैं; तौभी इसमें सन्देह नहीं कि पवित्र आत्मा ने हमारे पिता याकूब के व्यक्तित्व में इसे इसलिए प्रकट करना चाहा कि हम हर मूर्खतापूर्ण अहंकार को चूर करना सीखें, और अपने भीतर यह न खोजें कि परमेश्वर हमें क्यों चुनता है और क्यों हम पर अपना अनुग्रह बनाए रखता है; वरन् यह जानें कि वह हमारी तुच्छता में महिमा पाना चाहता है; और जब यह शिक्षा हमारे हृदयों में बैठ जाएगी तब हमने भली-भाँति लाभ उठाया होगा।
क्योंकि कोई बात हमें परमेश्वर से इतना दूर नहीं करती जितना यह कि हम कोई प्रशंसनीय गुण पाने की इच्छा करें; परन्तु हमें उससे पूरी तरह रिक्त किया जाना आवश्यक है, नहीं तो हम ऐसे फूल जाएँगे कि परमेश्वर का अनुग्रह हम में प्रवेश नहीं कर सकेगा। इसलिए हमें और भी अधिक चाहिए कि इस बात को दृढ़ता से थामें जो हमारे लिए इतनी आवश्यक है: अर्थात् जब परमेश्वर हमें चुनता है, तो यह (जैसा लोग कहते हैं) हमारी सुन्दर आँखों के कारण नहीं है। और अन्त में, यदि संसार हमें तुच्छ जाने, तो हम इसलिए हताश न हों: जैसा हमने दिखाया, हमारे सन्तोष के लिए इतना ही बहुत होना चाहिए कि परमेश्वर हमें ग्रहण करता है, चाहे संसार हमें तुच्छ जाने। क्योंकि हम देखते हैं कि याकूब में क्या था: वह घर में बैठा रहनेवाला था, मानो कोई कहे, निठल्ला या आलसी। सच है कि वह खरा था, परन्तु यह कहाँ से आया? यह सीधाई कहाँ से ली गई? क्या उसने कोई उल्लेखनीय काम किया था? क्या उसकी कोई प्रतिष्ठा थी? उसके पास कुछ भी न था। परन्तु एसाव को देखो, जो जन्म ही से मानो बादलों के ऊपर था, वह तभी से मनुष्य था, उसमें अपना बल था; और आगे जब वह बड़ा हुआ तो उसमें बड़ा उद्यम था, यहाँ तक कि ऐसा लगता था कि वह आश्चर्यकर्म करनेवाला है।
बहुत अच्छा; इसमें हमें सिखाया जाता है कि सब कुछ परमेश्वर की ओर से है। क्योंकि यदि हम चुनाव का कारण मनुष्यों में ढूँढ़ें, तो निश्चय है कि बिना सन्देह के हर एक अपना मत एसाव को देगा। परन्तु इस सब के होते हुए भी परमेश्वर याकूब को आगे करता है; और क्यों? यह हमारी कल्पना के बिलकुल विपरीत है। इसलिए हमें ध्यान देना चाहिए कि परमेश्वर ने अपना अनुग्रह इस रीति से बाँटा कि मनुष्य जानें कि याकूब से प्रेम करने के लिए उसे केवल उसकी अपनी भलाई ने प्रेरित किया। अब यह शिक्षा इस योग्य है कि हमारे जीवन के सब दिन इस पर मनन किया जाए; और यह (जैसा मैंने कहा) उस सारे घमण्ड को चूर करने के लिए है जो मनुष्य अपने में रखते हैं, ताकि इसमें परमेश्वर की निरी दया के सिवाय और कुछ न चमके; और साथ ही हम जानें कि कलीसिया अपने आरम्भ में सदा छोटी रही, वरन् परमेश्वर ने आगे चलकर उसे ऐसी रीति से बढ़ाया कि मनुष्यों की ओर से उनकी निर्बलता प्रकट होनी चाहिए, और वे उसे सदा मानें, ताकि मनुष्य ऐसी दशा के अधीन हों।
और फिर, जो भी हो, हम जानें कि परमेश्वर अपने ही काम को कभी नहीं छोड़ेगा, वरन् उसे उसकी ठीक सिद्धता तक पहुँचाएगा, चाहे आरम्भ में मनुष्य उसे न जानें; क्योंकि न ऐसा होना चाहिए, न यह लाभदायक है। फिर, यदि परमेश्वर कोई चिन्ह दे कि उसने हमें अपने लिए चुन लिया है, और यह हमारे बचपन ही से प्रकट किया जाए, तो हमारे पास परमेश्वर की महिमा करने का और भी अधिक कारण है; क्योंकि उसका अनुग्रह जितना बढ़ता है उतनी ही अधिक स्तुति के योग्य होता है। परन्तु यदि हम कुछ समय तक ठुकराए हुए से रहें, और परमेश्वर यह भाव भी न दिखाए कि उसे हमारी कुछ चिन्ता है, वरन् हम मानो भुला दिए गए हों, और अन्त में वह हमें तब फिर बुला ले जब हम बहुत समय तक भटकते रहे हों: तो इसमें भी हमारे पास उसकी स्तुति करने का दोहरा अवसर होगा। संक्षेप में, वह हम में जैसे भी कार्य करे, उचित है कि हमारा मुँह उसकी भलाई और दया को मानने के लिए सदा खुला रहे। कुछ ऐसे हैं जो अपने बचपन ही से यह घोषित करेंगे कि परमेश्वर ने उन्हें सम्भाले रखा, मानो उसने उनका हाथ थामे रखा हो, और उन्हें आगे लाकर कहे: ये मेरे हैं; और सचमुच उन्हें बचपन से अच्छी शिक्षा मिलती है, और आगे भी वह उन में ऐसा फलेगी कि लोग कहेंगे: देखो, परमेश्वर का बीज।
अब ये लोग (जैसा मैंने कहा) इस बात को मानने के लिए गहराई से बँधे हैं कि परमेश्वर ने उन्हें यह विशेषाधिकार दिया। क्योंकि उनके पास दूसरों से अधिक क्या है? हम सब आदम में पूरी तरह भ्रष्ट हैं। इसलिए जब परमेश्वर उन्हें जन्म से लेकर बुढ़ापे तक मानो एक अटूट डोरी से चलाता है, तो वे उसके और भी अधिक ऋणी हैं। परन्तु दूसरे ऐसे हैं जो दीन और दुखी प्राणी हैं, जिनके विषय में लोग कहेंगे कि परमेश्वर ने उन्हें सर्वथा अपने से दूर फेंक दिया है; उनमें से कुछ तो अपनी जवानी में लम्पट और उच्छृंखल होते हैं, कुछ अभागे मूर्तिपूजक; और जो कुछ भक्ति उनमें होती है, वह भी उन्हें परमेश्वर से और अधिक दूर करने और उसके क्रोध को भड़काने ही का कारण बनती है; वरन् कभी-कभी वे सारे सत्य के शत्रु होते हैं: जैसा हम सन्त पौलुस के उदाहरण में देख सकते हैं, जो निर्दोष लहू बहानेवाला उन्मत्त पशु था, और फाड़नेवाले भेड़िये के समान सब कलीसियाओं को तितर-बितर करने से बढ़कर किसी बात के लिए यत्न नहीं करता था। फिर कुरिन्थियों को देखो, जो व्यभिचारी थे और सब प्रकार की दुष्टता में पड़े थे, जैसा सन्त पौलुस बताता है; और रोमियों के विषय में भी यही कहा गया है। वह कहता है, “तुम पहले व्यभिचारी और अहंकारी थे, और सब प्रकार के अत्याचार और छल में लगे थे, और अपने सब अंगों को बुराई और पाप की सेवा में सौंपे हुए थे।” और थोड़ा आगे चलकर वह इफिसियों से कहता है: “तुम पहले परमेश्वर से रहित थे, जीवन की कोई आशा तुम में न थी, तुम सर्वथा अन्धकार थे, तुम अनन्त मृत्यु में थे।”
अब जब हमारा प्रभु हमें नम्र करने के लिए हमें कुछ समय तक यों बिखरा रहने दे, और फिर अचानक हमें अपनी ओर बुला ले: तो हम मान लें और कहें, “हाय! हमें केवल इसलिए परमेश्वर की बड़ाई नहीं करनी चाहिए कि उसने हमें चुना है, जैसा हम उसका फल देखते हैं; वरन् इसलिए भी कि उसने हमें उस गड्ढे से निकाला जिसमें हम थे।” और इसलिए हमें और भी अधिक यत्न करना और बीते हुए समय को मोल लेना चाहिए, जैसा सन्त पौलुस उसके विषय में कहता है, उस वचन में जो हमने उद्धृत किया: वह कहता है, “तुम पहले अन्धकार थे, परन्तु अब प्रभु में ज्योति हो, इसलिए ज्योति की सन्तानों की नाईं चलो।” और हम बार-बार उसे स्मरण करें जो हमारा प्रभु यीशु मसीह कहता है: “मेरी और भी भेड़ें हैं जो इस भेड़शाला की नहीं हैं।” क्योंकि वह अन्यजातियों के विषय में बोल रहा था, जो उद्धार की सारी आशा से बाहर थे। वह उन्हें भेड़ें कहता है, अपने स्वभाव के कारण नहीं, क्योंकि वे तो जंगली पशु थे, परन्तु परमेश्वर के चुनाव के कारण; यद्यपि वे बिखरे हुए लोग थे, तौभी वह कहता है कि वह उन्हें इकट्ठा करेगा। इसलिए जब परमेश्वर को भाए कि हमें उस बिखराव से निकाले जिसमें हम रहे हैं, तो हम इस बड़े चरवाहे की वाणी पर कान लगाना सीखें: केवल यह दिखाकर नहीं कि हम बाहर से इसे मानते हैं, परन्तु ऐसे कि हम उसके पीछे चलें और सब बातों में उसकी आज्ञा मानें।
इसलिए ध्यान दो कि इस स्थान से हमें क्या सीखना है। और आगे, जब प्रभु अपने विश्वासियों को और अपनी सारी कलीसिया को मनुष्यों के बीच ऐसा सुन्दर रूप न दे कि वह प्रतिष्ठा पाए, तो हम लज्जित न हों: हम अपनी नीचता से लज्जित न हों, यदि वह महिमा पाए। जैसे अब ऐसा दिखता है कि कलीसिया पाँवों तले रौंदी जानी है; और हम यह भी देखते हैं कि अधर्मी लोग और इस संसार की सन्तान उन लोगों को कुछ भी नहीं गिनते जिन्हें परमेश्वर ने अपने लिए इकट्ठा किया है।
अब हम अपने पिता याकूब के उदाहरण पर चलते हुए इसे धीरज से सहें; और यदि संसार (किसी रीति से) हमारे मुँह पर थूके तो हमें व्याकुल न होना चाहिए, यदि हम परमेश्वर के सम्मुख ग्रहणयोग्य हों। इसलिए ध्यान दो कि हम में से हर एक को इस शिक्षा का अभ्यास अपने में और कलीसिया की सारी देह में भी करना है।
और फिर, यद्यपि संसार हमें आदर की दृष्टि से नहीं देखता, और थोड़े ही हमें स्वीकार करते और हम पर तालियाँ बजाते हैं, तौभी परमेश्वर ऐसा कार्य करता है कि जो संसार में और उसके बाहरी रूप में सबसे तुच्छ है, वह परमेश्वर के सम्मुख उससे अधिक आदरणीय ठहरता है जिसका मनुष्यों के आगे बड़ा दिखावा और सजावट है। और इसी में वह पूरा होता है जो सन्त लूका में कहा गया है: जो यहाँ नीचे ऊँचा और उत्कृष्ट है, वह इसलिए परमेश्वर की दृष्टि में आदरणीय नहीं, वरन् कभी-कभी उसके लिए घृणित है: जैसा निश्चित है कि यदि मनुष्य न्यायी होते तो एसाव के गुणों की प्रशंसा सदा होती रहती; परन्तु परमेश्वर और उसके स्वर्गदूतों के सम्मुख याकूब की सीधाई का मूल्य अधिक है।
इसलिए हम वैसे ही आगे बढ़ें जैसी हमारे प्रभु यीशु ने हमें आज्ञा दी है; और यदि आरम्भ ही में हम में वे दान दिखाई न दें जो परमेश्वर ने हम में रखे हैं, तो यह हमें खेदित न करे। उदाहरण के लिए, बहुत से ऐसे हैं जो परमेश्वर की दृष्टि में कुछ भी मूल्य नहीं रखते, तौभी उनका सुन्दर दिखावा होता है, और उसका कारण भी होता है। लोग बड़े-बड़े व्यक्ति पाएँगे, ऊँचे पद और प्रतिष्ठा के, जिनमें बड़ा पराक्रम होगा और जो बड़े अधिकार में होंगे: जो मान और बड़ाई में होंगे; और आगे उनमें कोई घोर लोभ भी न होगा: सारांश यह कि उनमें ऐसी खराई दिखाई देगी कि तुम उन्हें स्वर्गदूत समझोगे, और सब लोग सब जगह उनकी बड़ाई करेंगे: और इसी बीच दीन कारीगर, किसान, और बेचारे अनपढ़ होंगे, जिन्हें अपने आप को दिखाने का कोई अवसर नहीं: क्योंकि वे अपनी दुकान और छोटी गृहस्थी में लगे रहेंगे, अपने दीन बच्चों का पेट पालने के लिए उन्हें परिश्रम करना है। उनकी कोई बड़ी कीर्ति सुनने में नहीं आएगी, वे ऐसे वक्ता नहीं कि कोई बड़ी बुद्धि प्रकट करें: और जब कोई उन्हें बोलते सुनेगा तो लोक-मत के अनुसार केवल मूर्खता ही देखेगा: और फिर भी परमेश्वर ने उन्हें चुना और अपना ठहराया है। जो कुछ निकम्मा दिखता है उसे वह स्वीकार करता है: क्योंकि यद्यपि ये तुच्छ बातें लगती हैं, कि कोई सिलाई करे या और कोई काम करे, और परिश्रम उठाए, तौभी यह ऐसी सेवा है जिसे परमेश्वर हमारी कल्पना से कहीं अधिक मूल्यवान समझता है।
इसलिए जब हम जानें कि बाहरी दिखावे में हम कुछ नहीं हैं, तो इस कारण अपनी दशा और स्थिति को बुरा न समझें, (और जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) अपनी निर्बलता से लज्जित न हों; और इसी बीच अपनी आँखें ऊपर उठाएँ, और यद्यपि हम राख में पड़े हों, फिर भी जानें कि हमारे पिता याकूब के साथ भी पहले ऐसा ही हुआ, जो परमेश्वर के सब चुने हुओं और उसकी सन्तानों का प्रतिरूप था। अब आगे यह है।
कि याकूब से उसकी माता प्रेम रखती थी, और एसाव से उसका पिता। और इससे भली-भाँति प्रकट होता है कि इसहाक में वह सिद्धता नहीं थी जो होनी चाहिए थी: क्योंकि वह उस बात से अनजान न था जो कही गई थी: कि बड़ा छोटे की सेवा करेगा: वह भली-भाँति जानता था कि परमेश्वर की यही इच्छा है कि बड़ा एसाव अपना स्थान और आदर का पद अपने भाई को दे दे; तौभी वह एसाव से प्रेम रखता था: इसमें ऐसा दिखता है मानो वह परमेश्वर की युक्ति का विरोध करना चाहता था। और इसमें उसका क्या अभिप्राय है? जब वह अपना सारा प्रेम एसाव की ओर ढालना चाहता है: तौभी अन्त में परमेश्वर ही राज्य करेगा और उसका चुनाव दृढ़ रहेगा, चाहे सारा संसार उसके विरोध में यत्न करे।
देखो, इसहाक, जो बहुत मन्द-बुद्धि है; और इतना ही नहीं, क्योंकि ऐसा दिखता है कि उसे पशु-सा लगाव चला रहा है। क्योंकि वह एसाव से प्रेम क्यों रखता था? इसलिए कि वह उसके लिए अहेर का मांस लाता था। इसलिए वह उससे अपने दाँत के स्वाद के कारण प्रेम रखता था। देखो एक बूढ़ा मनुष्य: जिसे अपनी आयु के कारण स्थिर और जमा हुआ होना चाहिए था: उसे अब अपने मूर्ख और चंचल मनोभावों से नहीं चलना चाहिए था कि अपने दाँत के स्वाद और चटोरेपन के लिए वह उसे भूल जाए जो परमेश्वर ने कहा था, वरन् अटल आज्ञा से ठहराया था: कि याकूब को शासन करना है और वही प्रतिज्ञा का वारिस होगा: और फिर भी इसहाक उसकी कुछ गिनती नहीं करता। परन्तु यहाँ हम देखते हैं कि यहूदी बहुत ही अन्धे हैं, अपने पुरखों पर इतराते हैं, मानो जो प्रतिष्ठा उन्हें कभी मिली वह मनुष्यों की पवित्रता और गुणों से आई थी। क्योंकि निश्चय है कि इसहाक ने, जहाँ तक उसका वश चला, परमेश्वर के चुनाव को उलट दिया: इसलिए नहीं कि उसकी ऐसा करने की इच्छा थी। क्योंकि यदि कोई उससे पूछता, क्यों भाई? क्या तू परमेश्वर का विरोध करेगा? क्या तू बाधा डालेगा कि जो उसने कहा है उसे वह पूरा न करे? क्या तू उसे बदल देगा जो उसने अपने मुँह से कहा है? तो वह कहता, नहीं: और उसका अभिप्राय ऐसा न था। परन्तु जो भी हो, वह उसी ओर धकेला और खींचा जाता है।
इसलिए हम यह नहीं कह सकते कि इसहाक परमेश्वर के चुनाव की सहायता करने या उसे आगे बढ़ाने चला था: वरन् इसके विपरीत उसने उसमें रुकावट डाली। अब इससे हम देखते हैं कि सब के मुँह बन्द होने चाहिए, और मनुष्य यह दिखावा न करें कि उनकी अपनी व्यक्तियों में कुछ था जिसके कारण परमेश्वर उन्हें वे आशीषें पक्की करे जो वह उन्हें पहले दे चुका है। सारांश यह कि इससे हम देखते हैं कि जैसे परमेश्वर का चुनाव अपने पहले आरम्भ और नींव में और अपनी पूरी शक्ति में स्वतन्त्र और बिना कमाया हुआ है, वैसे ही उचित है कि परमेश्वर अन्त तक यह दिखाए कि उसकी केवल दया ही है, और मनुष्य की ओर से जो कुछ कहा जाता है वह सब रुक जाए और मिट जाए, और यह (जैसा सन्त पौलुस कहता है) न तो चाहनेवाले की और न दौड़नेवाले की ओर से है, रोमियों 9। इसलिए ध्यान दो कि हमें क्या सीखना है। अब इसी बीच हम परमेश्वर की इस युक्ति में वह दृढ़ता भी देखते हैं जिसके द्वारा वह जिन्हें भला जानता है उन्हें चुनता है। इसलिए हमें अपने मन में ठान लेना है कि चाहे सारा संसार हमारे उद्धार को उलटने का यत्न करे, तौभी वह पक्का बना रहेगा, कि हमारी शरण सदा उसी में हो जो हमें पहले दिखाया गया है: अर्थात् यह कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने वह सब अपनी रखवाली में ले लिया है जो पिता ने उसे दिया है, क्योंकि वह उसका अपना है: और उसमें से कुछ नष्ट न होगा, क्योंकि परमेश्वर मनुष्यों से अधिक बलवन्त है: क्योंकि वह हमें उसी की ओर ले चलता है: “मेरा पिता, जिसने तुम्हें मुझे दिया है, सब से बड़ा है।”
इसलिए हम परमेश्वर की अजेय सामर्थ्य पर पूरी तरह टिकना सीखें, जब इस बात का निश्चय करना हो कि उसे पुकारने में हमारी सुनी जाएगी, और हम सन्देह न करें कि जैसे उसने हमें भले मार्ग में लाया है वैसे ही हमें स्थिर बने रहने का वरदान भी देगा: और यद्यपि हम निर्बल और भंगुर हैं, तौभी वह हमें गिरने न देगा: परन्तु हमें सदा ऐसे चलाया जाएगा कि वह हम में अपनी सामर्थ्य को और अधिक बढ़ाएगा। इसलिए हमें यहाँ तक आना है, अर्थात् याकूब के केवल वे ही शत्रु न थे जिन में परमेश्वर का भय न था और जो अधर्मी थे, वरन् उसका अपना पिता इसहाक भी, जो उस समय कलीसिया में मुख्य था: परमेश्वर ने मानो उसे अपनी वाचा सौंपी थी कि वह उसका भण्डारी बने और उसे बाँटे: और तौभी वह (जैसा दिखता है) याकूब के चुनाव का शत्रु था। इसलिए यदि हम बहुत से विरोध देखें, और ऐसा लगे कि हमारा उद्धार बहुत रीतियों से उलट दिया जाएगा, और हमें कोई निकास न दिखाई दे, तो जान लें कि अन्त में परमेश्वर ही विजयी होगा: और हम में जो भी निर्बलता पाई जाए, तौभी वह आगे बढ़ने से न रुकेगा, और यद्यपि यहाँ नीचे विरोध और खण्डन हो, तौभी वह सब पर जय पाएगा और उसे भली-भाँति पूरा करेगा।
परन्तु प्रसंगवश, इसहाक के उदाहरण से हमें चेताया जाता है कि हम अपने आप को लगाम के नीचे रखें। क्योंकि यदि इसहाक जैसे मनुष्य के साथ, जो ऐसा उत्कृष्ट और स्वर्गदूत की सी पवित्रता का था, यह हुआ कि उसने परमेश्वर का विरोध किया, तो हमारी तुलना में क्या होगा? निश्चय है कि हम प्रतिदिन सैकड़ों बार किसी व्यर्थ कल्पना में पड़ेंगे, और परमेश्वर से टकराएँगे, चाहे हमारा ऐसा कोई अभिप्राय न हो। इसलिए हमें अपनी ही समझ पर अविश्वास करने की और परमेश्वर को पुकारने की बड़ी आवश्यकता है कि वह अपने पवित्र आत्मा से हमें चलाए: नहीं तो (जैसा मैंने कहा) हम अभागे भटके हुए हैं, और यहाँ-वहाँ संयोग पर भटकते फिरेंगे। और जब हम समझेंगे कि हम बड़े बुद्धिमान हैं, तब हम में मूर्खता ही होगी, वरन् विद्रोह, चाहे वह हमारी इच्छा और जानकारी से न हो। इसे एक शिक्षा के रूप में ध्यान में रखो।
परन्तु हमें यहाँ वह कारण ध्यान देना चाहिए जो मूसा ने यह कहते हुए बताया कि इसहाक एसाव से प्रेम रखता था: और वह उससे प्रेम क्यों रखता था? क्योंकि अहेर का मांस उसका भोजन था। इसलिए यदि हम परमेश्वर के प्रति अपनी पंक्ति में बने रहना चाहें तो चौकस रहें कि हम अपनी शारीरिक और सांसारिक लालसाओं से न चलाए जाएँ। सच है कि खाने-पीने की निन्दा नहीं की गई। क्योंकि परमेश्वर ने हमें इस जगत में इसी शर्त पर रखा है कि हम उसकी सृष्टि की वस्तुओं का भोग करें: और जब उसने हमें खाने-पीने का ठहराव किया है, तो निश्चय है कि जब हम अपनी आवश्यकताओं के लिए पाने की इच्छा करते हैं, और उन भलाइयों के उपयोग को भी खोजते हैं जो उसने हमारे लिए तैयार की हैं, तब हम उसे अप्रसन्न नहीं करते। क्योंकि यह बिना कारण नहीं कहा गया कि हमें सब कुछ उसके नाम से करना चाहिए, खाने में भी और पीने में भी: परन्तु हम भ्रष्ट हैं, इसलिए ऐसा होना अनिवार्य है कि हमारी लालसाओं में सदा अति रहेगी, और यह अति हमें परमेश्वर के प्रति अपने कर्तव्यों को भुला देती है: ऐसे कि हम चारों ओर से पूरी तरह खिंच जाते हैं: और जब हम समझते हैं कि अपना कर्तव्य निभा रहे हैं तब हम उससे बहुत दूर होते हैं। परन्तु इसहाक को सदा यह अपनी आँखों के सामने रखना चाहिए था, वरन् इसे अपने हृदय में खुदा हुआ रखना चाहिए था, यह वाणी उसके कानों में गूँजती रहनी चाहिए थी, अर्थात् कि बड़ा छोटे की सेवा करेगा: उसे बिना अन्त और बिना रुके यह सोचते रहना चाहिए था: अच्छा, क्योंकि परमेश्वर चाहता है कि उसका चुनाव याकूब में बना रहे, इसलिए उचित है कि मैं इस पर सहमत होऊँ। परन्तु इसी बीच उसका भोजन उसे मोड़ देता है और बिलकुल उलटी ओर खींच ले जाता है। इसलिए हम भी (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) अपनी ओर से भली-भाँति सावधान रहें कि अपनी लालसाओं को दबाएँ, चाहे वे स्वाभाविक हों और अपने आप में अनुचित न हों। परन्तु इसलिए कि न अति हो और न असंयम: हम सावधान रहें (मैं कहता हूँ) कि उन्हें रोकें और वश में करें, ऐसे कि वे हमें कभी परमेश्वर की इच्छा के अनुसार अपने आप को चलाने से न हटाएँ और न रोकें। इसलिए संक्षेप में ध्यान दो कि हमें यहाँ क्या सीखना है।
परन्तु यहाँ हम यह भी देखते हैं कि रिबका का लगाव अपने पति से अधिक ठीक दिशा में था। यह बहुत सच है कि लोग सदा (या अधिकतर) देखेंगे कि यदि पिता अपने बच्चों में से एक से प्रेम रखे, तो माता अपना प्रेम बिलकुल उलटी ओर लगाएगी: ऐसे झगड़े अधिकतर घरों में देखे जा सकते हैं। यह भी हो सकता है कि रिबका के मन में किसी प्रकार की डाह उत्पन्न हुई हो: क्योंकि उसने एसाव को ऊँचा किया जाता देखा: और इसलिए वह याकूब से और अधिक प्रेम करने लगी, इस कारण कि वह अपने पिता को उतना भाता न था, और उसका ऐसा अनुग्रह उस पर न था: परन्तु इस कारण से (जैसा हम आगे देखेंगे) कि उसकी दृष्टि परमेश्वर के चुनाव पर थी, और उसने सदा उसे थामे रखा जो कहा गया था कि याकूब को आगे किया जाना है: हमें यहाँ यह निर्णय करना चाहिए कि वह भावुक और झुकाव वाली न थी, जैसी स्त्रियाँ जो सहज ही अपने पतियों के विरोध में खड़ी हो जाती हैं, जब वे देखती हैं कि उनके कुछ बच्चों का उतना आदर न होगा, तो वे उन पर अपना स्नेह और अधिक लगाती हैं। परन्तु हम रिबका के विषय में ऐसा निर्णय नहीं कर सकते: और क्यों? क्योंकि हम देखते हैं (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) कि वह सदा अपने आप को परमेश्वर के सुपुर्द करती थी, और जो उसने कहा था उसका पालन करना चाहती थी। वह निःसन्देह चाहती थी कि दोनों बच्चे कलीसिया में बचे रहते: परन्तु जब उसने देखा कि एक बाहर हो गया और परमेश्वर केवल छोटे और निचले को स्वीकार करता है, तो उसने इसे मान लिया। अब यहाँ हम देखते हैं कि हमारा प्रभु कभी-कभी उन्हें भी गिरने देता है जिनमें पवित्र आत्मा के गुण और बड़े दान अधिक हैं: और जो अभी इतने आगे नहीं बढ़े थे वे उनसे आगे निकल जाते हैं, मेरा अर्थ किसी एक बात में है। क्योंकि यदि हम इसहाक की रिबका से तुलना करें, तो निश्चय है कि वह अपने पिता के घर में पला था और जवानी में इतनी बड़ी शिक्षा पाई थी, इसलिए सामान्यतः उसका विश्वास रिबका से बड़ा था। परन्तु देखो, एक विशेष कार्य है जिसमें वह चूक गया और जिसमें उसका दोष प्रकट हुआ। और तौभी रिबका, जो अभी-अभी मूर्तिपूजा की माँद से रेंगकर निकली थी: क्योंकि हम जानते हैं कि उसके पिता के घर में अन्धविश्वासों के सिवाय कुछ न था, देश सर्वथा भ्रष्ट था: यह बेचारी स्त्री, यद्यपि अपनी जवानी में परमेश्वर को नहीं जानती थी: तौभी पवित्र आत्मा से ऐसी भली-भाँति सिखाई और शिक्षित की गई थी कि वह अपने पति से आगे निकल गई। अब इसी कारण, जिन्हें परमेश्वर ने समय रहते हाथ बढ़ाया और जिन्हें उसने ऊँचा उठाया कि वे दूसरों के लिए दर्पण हों: वे सदा अधिक सावधानी से चलना सीखें। और क्यों? क्योंकि उन्हें गिराने के लिए केवल एक टेढ़ा पग काफी है, ऐसा कि हर कोई उन पर लज्जित होगा।
और इसलिए हम सीखें कि यद्यपि हमारे प्रभु ने सामान्यतः अपने पवित्र आत्मा से हमें ऐसा गढ़ा और बनाया हो कि हर कोई हमारी प्रशंसा करे, तौभी विशेष बातों में हम चूक सकते हैं। इसलिए हम सदा चौकसी पर रहें। इसके अतिरिक्त, जो सबसे उत्कृष्ट हैं, जब वे किसी बात में चूक जाएँ, तो वे यह कहकर ढाल न बनाएँ कि उन्होंने इतने भले और प्रशंसनीय काम किए हैं: वे अपने पराक्रम के कामों को (जैसा कहते हैं) न गिनाएँ, परन्तु अपने आप को वैसा ही मानें जैसे वे हैं, और कहें: अच्छा, मैं देखता हूँ कि परमेश्वर चाहता है कि मैं मानूँ कि मैं निर्बल मनुष्य हूँ: और आगे यह भी सामान्य रीति से मानूँ कि अपने आप को सम्भाले रखना मनुष्यों के हाथ में नहीं: क्योंकि हमें कलीसिया से काट डाले जाने के लिए केवल एक ही दोष काफी है। और जब परमेश्वर हमें त्याग दे तो हमारा क्या होगा? इसलिए हम ये सब बातें अपने पिता इसहाक के उदाहरण में सीखें, जब हम देखते हैं कि वह ऐसा अन्धा हो गया, और उसे कभी स्मरण न आया कि वह परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोही के समान है, जब वह उसे आदर देता है जिसे परमेश्वर ने ठुकराया, और अपने छोटे पुत्र को तुच्छ जानता है: जिसके विषय में परमेश्वर ने यह साक्षी दी थी: कि वह उसके घर पर शासन करेगा।
अब इसी बीच, यद्यपि रिबका का लगाव भली रीति से चलाया गया था, और उसने परमेश्वर की आज्ञा मानने का यत्न किया था: तौभी यह हो नहीं सकता था कि उनके बीच कुछ झगड़ा न हो: जैसा प्रायः होता है। और यही वह बात है जो मूसा कहता है। कि इसहाक एसाव से प्रेम रखता था, और रिबका याकूब से: और जब वह ऐसा कहता है तो मानो वह दिखाना चाहता है कि घर में कुछ कलह थी, और वे आपस में सहमत न हो सकते थे, अर्थात् पति और पत्नी को अपने बच्चों से समान प्रेम रखना चाहिए था, जैसा स्वभाव से वे उसकी ओर झुके हुए होते हैं: या यह कि वे जानते थे कि परमेश्वर की इच्छा थी कि वे छोटे से प्रेम रखें। अब इस विषय में हमें चेतावनी दी जाती है कि यद्यपि हमारे लगाव भली नींव पर हों और भले अन्त की ओर जाते हों, तौभी सदा ऐसे विरोध होंगे जो दोष के योग्य हैं।
उदाहरण के लिए: मैं परमेश्वर के पीछे चलना और पूरी रीति से उसकी इच्छा के अनुसार अपने को ढालना चाहता हूँ: परन्तु विरोध होते हैं, और अनिवार्य है कि यदि मैं अपना कर्तव्य निभाऊँ तो एक की अप्रसन्नता मोल लूँ और दूसरे से शत्रुता कमाऊँ। वैसे ही यह सच है कि आरम्भ भला होगा, जब मैं भला करना चाहूँगा और केवल परमेश्वर की ओर देखूँगा: परन्तु शीघ्र ही हम पर ऐसा होगा कि अपनी भली धुन में हम बहुत अति कर जाएँगे, और हम में शारीरिक वासनाएँ होंगी: सारांश यह कि जो सबसे अच्छी रीति से चलाए गए हैं और जिनमें सबसे अधिक सिद्धता है, निश्चय है कि वे इस स्थान में भी मर्यादा से बाहर जाएँगे, और अपने आप को मनुष्य दिखाएँगे: और इसलिए हमें अपनी वासनाओं पर और भी अधिक सन्देह करना चाहिए, और यद्यपि हम देखें कि अन्त भला नहीं, तौभी हम उसमें गिरने से न रुकेंगे। फिर, सब विरोधों को छोड़ देने की भी हमें अच्छी चेतावनी मिली है: क्योंकि शास्त्र बिना कारण हमें इस एकता के लिए बार-बार नहीं उभारता कि एक मन और एक मुँह हों। और क्यों? क्योंकि जब हम ऐसे सहमत होते हैं, तो हर कोई अपने पड़ोसी को जगाता है और उसे परमेश्वर तक पहुँचाने में सहायता करता है। परन्तु इसके विपरीत, जब हम झगड़ा और विवाद करते हैं, तो न केवल एक दूसरे को रोकता और बाधा डालता है (जैसा प्रायः कहा जाता है कि पूरी गाड़ी को रोकने के लिए एक अड़ियल घोड़ा ही काफी है:) परन्तु इससे भी बुरी बात है: अर्थात् जब हम परमेश्वर की सेवा के लिए संघर्ष करते हैं, तब भी हम कुछ बातों में अपने आप को भूलना नहीं छोड़ते, और बहुत सी बातें हमसे छूट जाती हैं जिन्हें हम न छोड़ते यदि झगड़े और विवाद से बाहर होते। इसलिए यह वह बात है जो हमें सीखनी है। और ये उदाहरण प्रतिदिन कलीसिया में हमारे बीच देखे जाते हैं। क्योंकि परमेश्वर के सबसे अच्छे सेवक और जो सबसे उत्कृष्ट अनुग्रह से सम्पन्न हैं, वरन् जो सत्य के लिए यत्न करते हैं, तौभी वे सदा अपने आप को ऐसा लगाम में नहीं रख सकते कि झगड़े न करें और अपने आप को मनुष्य न दिखाएँ, और तौभी परमेश्वर उनकी धुन को और जो वे करते हैं उसे स्वीकार करता है। और क्यों? क्योंकि उनका आरम्भ अच्छा है और उनका उद्देश्य सही है: परन्तु जैसा मैंने कहा, उसमें सदा निर्बलता मिली रहती है। इसलिए हम (मैं कहता हूँ) इसहाक और रिबका के इस उदाहरण में इसे सदा ध्यान में रखें। फिर, हमें यह भी ध्यान देना है कि यदि कभी हम वैसे सहमत न हों जैसा हमें होना चाहिए और जैसा उचित और योग्य हो, और जैसा हमें अपने आप को झुकाना और बलपूर्वक लगाना चाहिए, तौभी हमें आपस में तलाक नहीं करना है, न बिलकुल अलग होना है। क्योंकि यद्यपि यह बड़ा दोष था कि इसहाक और रिबका उस प्रेम में, जो वे अपने बच्चों से रखते थे, इस प्रकार बँटे हुए थे, तौभी वे परमेश्वर की सेवा करते रहे: और इसहाक ने कभी इस आकाशवाणी को रद्द करने का दिखावा न किया: अर्थात् उसी उत्तर को जो परमेश्वर ने दिया था कि याकूब को शासन करना है।
अब इसलिए हम यहाँ देखते हैं कि पति और पत्नी कैसे झगड़ते हैं, और वह भी ऐसी महत्त्वपूर्ण बात में जिस पर संसार का उद्धार निर्भर था। क्योंकि यहाँ प्रश्न परमेश्वर के अनन्त चुनाव का है, प्रश्न हमारे प्रभु यीशु मसीह की सारी कलीसिया का है, जो उसका सिर है: और देखो, इसहाक और उसकी पत्नी के बीच कुछ टेढ़े विवाद हैं। तौभी इसका यह अर्थ नहीं कि इसहाक सब कुछ उलट देना चाहता था: परन्तु वह इसे समझा नहीं, और अपने ही में घबरा गया था। इसलिए वैसे ही, जब अज्ञान और भूल के कारण कभी ऐसा हो जाए कि हम संकट में पड़ें, और शैतान अपना पाँव घुसेड़ दे, और हम एक ही मुँह से बोल न सकें: तौभी हमें मुख्य बात को सदा थामे रहना है: अर्थात् हमें सदा इस पर सहमत रहना है कि हम परमेश्वर को अपना पिता मानते हैं: और जानते हैं कि यीशु मसीह के सिवाय कोई सच्ची पवित्र एकता नहीं: कि हम, मैं कहता हूँ, अपने विश्वास के मूल सिद्धान्तों को थामे रहें: और यदि हम सब बातों को उतनी स्पष्टता से न समझ सकें जितनी चाही जाती है, तो अज्ञानी और निर्बल दीन हों, और हताश न हों।
वैसे ही जो अधिक हठीले हैं वे निर्बलों को सह लें, यह प्रतीक्षा करते हुए कि परमेश्वर कब उन्हें फेरेगा और उनसे वे विचार दूर करेगा जिनमें वे इतने व्याकुल हैं। यही वह है जो सन्त पौलुस फिलिप्पियों से कहता है: क्योंकि वह दिखाता है कि हमें कैसे एक साथ जुड़ना चाहिए, और हमारे मेल और भाईचारे की गाँठ क्या है। यह दिखाकर वह यह निष्कर्ष निकालता है कि इसलिए हमारे बीच विचारों में भिन्नता न हो, और हमारी बातें भी भिन्न न हों। परन्तु फिर भी (वह कहता है) यदि तुम ऐसी सिद्धता तक न पहुँच सको, और कुछ लोग मानो लँगड़ाते चलें, और उन दूसरों को न पकड़ सकें जो सब बातों को समझने में इतने फुर्तीले नहीं हैं: तो प्रतीक्षा करो (वह कहता है) जब तक परमेश्वर तुम पर यह प्रकट न करे।
इसलिए ध्यान दो कि पहली बात जो हमें करनी है, वह है परमेश्वर के शुद्ध और सीधे सत्य में सहमत होना। परन्तु क्योंकि सब को पहले ही झटके में धर्म की सब बातों का निश्चित ज्ञान नहीं दिया जाता: अच्छा, यदि कोई अज्ञान हो तो वे उन्हें हाथ बढ़ाएँ जो ऐसे मन्द हैं, वरन् वे चौकस रहें कि अपनी ओर से हठी न हों। क्योंकि कभी-कभी, वरन् प्रायः मनुष्य देखता है कि जो सबसे अन्धे हैं वे ही सबसे निडर और उतावले हैं: और आगे ऐसा हठ होगा कि उनसे कुछ भी प्राप्त नहीं हो सकता। परन्तु सन्त पौलुस इस बुराई के उपचार के लिए कहता है: प्रतीक्षा करो जब तक परमेश्वर तुम पर प्रकट न करे। यही वह है जो हमें सीखना है: परन्तु हम उसे भी स्मरण रखें जो वह ठहराता है: अर्थात् जब हम अपने प्रभु यीशु मसीह में सहमत हों, और उसकी महिमा के सिवाय किसी बात का विचार न करें, तो हम सदा अपना मार्ग थामे रखें, और यदि कुछ छोटा झगड़ा हो, तो वह हमें एक दूसरे से अलग न करे। क्योंकि जब हमारे पास यह कुंजी हो तो बहुत है, चाहे बहुत सी और बातों में हम उतने निश्चित न हों जितना आवश्यक है: तौभी यदि हम अपने प्रभु यीशु मसीह से पूरी तरह हटाए और फेरे न गए हों, तो यही बहुत है। इसके अतिरिक्त जब हम उसकी महिमा की ओर बढ़ेंगे, तो हर एक जानेगा, वरन् सबसे आगे बढ़े हुए भी, कि वे अभी बहुत दूर हैं। क्या कारण है कि जो शास्त्र में ज्ञानी और अभ्यस्त हैं, वे अपने भाइयों को अज्ञानी देखकर उन्हें तुच्छ जानते हैं? इसलिए कि उन्हें लगता है कि उन में कुछ घटी नहीं: परन्तु यदि हम जानें कि अपने प्रभु यीशु मसीह की ओर बढ़ना और उसके जी उठने की महिमा तक पहुँचना क्या है, तो हम सदा सन्त पौलुस के साथ कहेंगे कि हम उसे पा नहीं चुके। इसलिए जब हर कोई जान लेगा कि उसमें अभी कुछ घटी है, तो इससे हमारी कुछ हानि न होगी, और हम अपने भाइयों को बुलाना अनोखा न समझेंगे, चाहे वे बहुत दूर हों। चलो, हम आगे बढ़ें। सच है कि उनमें जिन्हें शास्त्र की व्याख्या का वरदान है और जो दीन और सीधे अनपढ़ हैं, बड़ा अन्तर है: वे भली-भाँति जानेंगे कि एक परमेश्वर है, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा उनका पिता है, परन्तु पवित्र शास्त्र का कोई स्थल समझा नहीं सकते: तौभी वे एक ही मार्ग में चलते रहना नहीं छोड़ते: और जो सबसे आगे हैं, यद्यपि वे लक्ष्य पर पहले पहुँचते हैं, तौभी उन्हें दूसरों की प्रतीक्षा सदा करनी चाहिए। इसलिए ध्यान दो कि हमें कैसे करना है, जैसा हमें दिखाया गया है, और कैसे हम इस उदाहरण से जो यहाँ दिया गया है उसे सीख सकते हैं।
परन्तु अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सम्मुख गिरें, अपने दोषों को मानते हुए, उससे प्रार्थना करते हुए कि वह हमें उनका ऐसा अनुभव कराए कि हम उनसे अप्रसन्न हों, और हम अपनी उस दशा पर जो ऐसी दयनीय है सदा दृष्टि रखें, ताकि हमारी शरण उसकी दया में हो: और वह हमें दया से ग्रहण करे, और अपने पवित्र आत्मा से हमें ऐसे चलाए कि हम सब सांसारिक वासनाओं से छूट जाएँ। और क्योंकि हम में इतने दोष छिपे हैं, इसलिए हम अपने आप को जाँचने में और अधिक परिश्रम करें, ताकि सदा उसी के पास लौटें जो हमें शुद्ध कर सकता है: और हम हर उस वस्तु से जो हमें अपने आप को पूरी रीति से उसकी सेवा में समर्पित करने से रोकती है, ऐसा संघर्ष करें कि इसी बीच हम जानें कि हमारे संघर्ष इस योग्य होने से बहुत दूर हैं कि उसके द्वारा स्वीकार किए जाएँ, परन्तु उसी सीमा तक जहाँ तक वह हमारी निर्बलता को सहता है। और यह भी कि हम उसकी सामर्थ्य की शरण लें, यह जानते हुए कि हमें उससे सहायता पाने की कितनी आवश्यकता है: और इस रीति से हम केवल उसी में आनन्दित होना सीखें, और सन्देह न करें कि जैसे उसने एक बार हमारी ओर हाथ बढ़ाया है, वैसे ही वह हमें और अधिक दृढ़ करता रहेगा, जब तक हम शैतान और उन सब आक्रमणों पर जय न पा लें जिनसे वह हम पर चढ़ाई कर सकता है। कि केवल नहीं, इत्यादि।
