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याकूब और एसाव पर सातवाँ उपदेश - उत्पत्ति 26:6-10
6 इसहाक गरार में रहने लगा।
7 जब उस स्थान के लोगों ने उसकी पत्नी के विषय में उससे पूछा, तो उसने कहा, "वह मेरी बहिन है;" क्योंकि वह यह कहने से डरा कि "वह मेरी पत्नी है;" उसने सोचा, "ऐसा न हो कि उस स्थान के लोग रिबका के कारण मुझे मार डालें, क्योंकि वह देखने में सुन्दर थी।"
8 जब उसे वहाँ रहते बहुत दिन बीत गए, तब पलिश्तियों के राजा अबीमेलेक ने खिड़की से झाँककर देखा, और क्या देखा कि इसहाक अपनी पत्नी रिबका के साथ क्रीड़ा कर रहा है।
9 तब अबीमेलेक ने इसहाक को बुलवाकर कहा, "निश्चय, देख, वह तेरी पत्नी है; फिर तूने क्यों कहा, 'वह मेरी बहिन है'?" इसहाक ने उससे कहा, "इसलिए कि मैंने सोचा, 'ऐसा न हो कि मैं उसके कारण मारा जाऊँ।'"
10 तब अबीमेलेक ने कहा, "तूने हमसे यह क्या किया है? प्रजा में से कोई तो तेरी पत्नी के साथ सहज में सो जाता, और तू हम पर पाप ले आता।"
हमने उस परीक्षा को देखा है जो इसहाक पर तब आई जब अकाल ने उसे इतना दबाया कि उसे अपने निवास-स्थान को छोड़ना पड़ा। क्योंकि कम से कम परमेश्वर को चाहिए था कि जिस देश को उसने उसे निज भाग ठहराया था, उसी में उसका पालन-पोषण करता और उसे खिलाता। परन्तु यदि वह अपनी प्रतिज्ञा उसके लिए पूरी नहीं करना चाहता था, तो क्या उसे उसका थोड़ा-सा स्वाद भी नहीं चखाना चाहिए था? किन्तु अब जब अकाल ने उसे वहाँ से खदेड़ दिया, तो ऐसा प्रतीत हुआ मानो परमेश्वर ने उसे वहाँ त्याग दिया हो, और मानो उसे उसकी कोई चिन्ता ही न रही हो। इसलिए इसहाक को यहाँ बड़ा संघर्ष सहना पड़ा, क्योंकि वह मानो परमेश्वर की उस कृपा से वंचित था जो सब पर समान रूप से होती है। क्योंकि यदि वह अपनी महिमा का तिरस्कार करनेवालों और संसार के दुष्टतम लोगों का भी पालन करता है, उन पर अपना सूर्य उदय करता और भूमि से उनके पोषण के लिए फल उपजवाता है, तो जिन्हें उसने अपनी रक्षा में ले लिया और अपने बच्चों के रूप में गोद ले लिया है, उनके लिए वह क्या न करेगा?
परन्तु एक और बड़ी परीक्षा देखो: इसहाक को मिस्र जाने से रोका गया था, और परमेश्वर ने उसे विश्राम का एक निश्चित स्थान दिखाया था, और चाहा था कि वह वहीं रहे जब तक कि वह लौट न सके और अकाल बीत न जाए। जब परमेश्वर उसे वहाँ ले आया, मानो यह कहकर कि "देख, विश्राम करने के लिए एक कोना है, जो मैं तुझे ठहराता हूँ," और वहाँ आगे उसे अपनी पत्नी के कारण मार डाले जाने का भय हुआ, और फिर वह पकड़ा गया और उसे डाँट पड़ी: तो उस पर परमेश्वर के क्रोध के इन चिह्नों पर ध्यान दो कि वह ऐसी भयंकर घबराहट में पड़े बिना रह ही नहीं सकता था।
अब यह बहुत सच है कि वह आश्चर्यजनक रूप से दुर्बल था, जैसा कि हम आगे देखेंगे; परन्तु जो भी हो, परिणाम दिखाता है कि परमेश्वर उसे भूला नहीं था। और यही पर्याप्त है। क्योंकि वह कुछ समय तक अपने आप को इस रीति से गुप्त रखेगा कि बेचारे विश्वासी मानो खो ही जाएँगे। परन्तु यही बहुत है कि उन्हें दीन करने के बाद, उनकी दुर्बलताओं को प्रकट करने के बाद, वह अपने आप को पूरी तरह दिखाता है, ताकि वे मानो अनुभव से जान लें कि इस सारे समय में, जब उन्हें लगता था कि वे उससे बिलकुल त्यागे गए हैं, तब भी वह दया की दृष्टि से उन्हें देखता रहा। अब देखो कि इसहाक के साथ यह कैसे हुआ।
अब पहली बात यह कही गई है कि रिबका को अपनी पत्नी स्वीकार करने के बदले उसने उसे अपनी बहिन कहा। ऐसा ही हमने अब्राहम में देखा था। परन्तु आश्चर्य यह है कि इसहाक ने वह पाठ नहीं सीखा था जो उसके पिता और माता के अनुभव से उसे दिया गया था, क्योंकि उन दोनों को उनके अत्यधिक भय के कारण ताड़ना मिली थी। और इसहाक इससे अनजान नहीं हो सकता था। इसमें सन्देह नहीं कि उसके पिता को अपने घराने को सिखाने की ऐसी चिन्ता थी, जैसा हम देख चुके हैं, कि उसने अपने पुत्र को इस विषय में शिक्षा दी होगी: "अपनी चौकसी रख, क्योंकि मैं जीवन भर इधर-उधर भटकता रहा हूँ; तेरे साथ भी ऐसा ही हो सकता है। क्योंकि परमेश्वर ने हमारे उस देश के अधिकार में प्रवेश करने से पहले अभी चार सौ वर्ष ठहराए हैं; इसलिए आवश्यक है कि तू एक ओर से दूसरी ओर भटके। पर मैंने अपने परमेश्वर की रक्षा पर अविश्वास किया, और उसका फल मैंने पाया। हाँ, मुझे एक अधर्मी राजा ने, जिसे परमेश्वर का कोई भय न था, उसके लिए ताड़ना दी। एक बेचारे अंधे प्राणी ने मुझे मेरे दोष के लिए डाँटा, और परमेश्वर ने मुझे और तेरी माता को दोनों को इस पर लज्जित किया जब हम वहाँ यों सुधारे गए। इसलिए अपने आप को दृढ़ कर।" इसमें सन्देह नहीं कि इसहाक ने ऐसी शिक्षा पाई थी। पर जब चोटें खाने का समय आया, तो उसने सब कुछ खो दिया और बुद्धि और विवेक दोनों से रहित हो गया, और इसमें सन्देह नहीं कि उसके भीतर कुछ अविश्वास था। क्योंकि विश्वास सदा हमें ऐसा अजेय धैर्य देता है कि हम वही करें जिसकी परमेश्वर आज्ञा देता है, उसके सिवा कुछ और न करें।
ध्यान दो कि हम कैसे जान सकते हैं कि हम परमेश्वर में भली-भाँति जमे हुए हैं और उसकी प्रतिज्ञाओं पर टिके हुए हैं: अर्थात्, जब हम किसी संकट, किसी घबराहट और किसी जोखिम में हों, और उस मार्ग पर जिसकी परमेश्वर ने हमें आज्ञा दी है सदा चलते रहें और उससे न हटें, तो वह हमारे सब मार्गों में हमारी अगुवाई करेगा। यदि इस प्रकार हममें यह साहस हो कि केवल परमेश्वर पर विश्राम करें और आशा रखें कि वह हमारी सहायता करेगा, तो यह हमारे विश्वास की निःसन्देह परख और प्रमाण है। परन्तु यदि हम इधर या उधर भटक जाएँ, तो अत्यन्त निश्चित है कि हमारा अविश्वास अपने आप को प्रकट कर देता है, और हम दिखाते हैं (परीक्षाओं पर जय न पाते हुए) कि हम पर्याप्त रूप से स्थिर नहीं हैं और हमारे विचार (जैसा कहा जाता है) इधर-उधर भटकनेवाले हैं। क्योंकि हम देखते हैं कि इसहाक एक अत्यन्त अनुचित बात में पड़ गया जब उसने अपने प्राण बचाने के लिए सत्य को ढाँप दिया, जैसा हम देख चुके हैं।
इसलिए यह इस बात का चिह्न है कि उसका विश्वास सिद्ध नहीं था, वरन् उसमें कुछ अविश्वास मिला हुआ था। पर इस बात में वह निर्दोष नहीं ठहराया जा सकता; तो भी वह सारी पवित्रता का दर्पण था। इसलिए हम सब के पास अपनी आँखें नीची करने और यह जानने का पूरा कारण है कि जब हम कल्पना करते हैं कि हमने परमेश्वर की पाठशाला में बहुत उन्नति कर ली है, तब भी हम अपने लक्ष्य से बहुत दूर होते हैं। और सचमुच, जब हम सब लड़ाइयों से दूर होते हैं, तब संसार में सबसे अधिक शूरवीर बन जाना हमारे लिए बहुत सरल है; पर जब वे हमसे भिड़ने को निकट आती हैं, तब हम सब भयभीत हो जाते हैं। इसलिए हम जान लें कि कोई ऐसा नहीं जिसे प्रतिदिन यह प्रार्थना करने की आवश्यकता न हो कि परमेश्वर उसके विश्वास को बढ़ाए और उसके अविश्वास के बचे हुए अंश को सुधारे। इसे एक शिक्षा के रूप में स्मरण रखो।
अब इस पर हमारे लिए एक अच्छी चेतावनी है; वह यह कि जब हम पर कोई संकट आता है या जब हम किसी बुराई में पड़ने से डरते हैं, तो यह मानो एक बादल है जो हमारी आँखों को इस रीति से चौंधिया देता है कि हम नहीं जानते कि हमारा क्या होगा, हमारे पास कोई निश्चित सम्मति नहीं रहती, और बुद्धिमान से बुद्धिमान भी इसमें फँस जाते हैं। हम यह घमण्ड न करें कि हम चतुर और तीक्ष्ण हैं और हममें ऐसी फुर्ती है कि हम सदा सबल और समर्थ रहेंगे, हमारे मन हल्के रहेंगे, और जब कोई संकट हम पर आएगा तब हम अपनी बुद्धि में उपाय निकाल लेंगे। हम ऐसे अहंकार से अपने आप को बचाए रखें; वरन् यह स्वीकार करें कि बुद्धि और सम्मति की आत्मा परमेश्वर ही में है, और उसी की ओर दौड़ें। और जब हम मानो दबाए जाएँ और पहले ही पहल अपना मन न बना सकें, तो हम उनके समान न हों जो सदा नई-नई युक्तियाँ गढ़ते और ढालते रहते हैं; वरन् परमेश्वर के पास जाएँ और उससे प्रार्थना करें कि वह अन्धकार के बीच में हम पर प्रकाश चमकाए। हाँ, विशेष रूप से हम यह प्रतीक्षा करें कि हम बिलकुल कुचले न जाएँ; पर अपने भीतर की अज्ञानता को स्वीकार करें। और क्योंकि हममें उतनी स्थिरता नहीं जितनी चाहिए, इसलिए हम सुबह और शाम दोनों समय परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह हमारी अगुवाई करे और हमें दिखाए कि हमें क्या करना है। इसलिए जो हमें इसहाक के उदाहरण से सीखना है उस पर ध्यान दो।
पर यहाँ एक प्रश्न पूछा जा सकता है कि क्या उसने इतना बड़ा दोष किया, क्योंकि उसने झूठ तो नहीं बोला: क्योंकि हम पहले देख चुके हैं कि रिबका उसकी चचेरी बहिन थी। इसलिए वह कह सकता था कि वह मेरी बहिन है, क्योंकि उस भाषा में इस शब्द का अर्थ मेरे लहू या कुटुम्ब की सम्बन्धी भी है। यहाँ न तो पहली और न दूसरी श्रेणी का कोई प्रश्न है। इसलिए जब इसहाक ने रिबका को अपनी बहिन कहा तो उसने झूठ नहीं बोला। फिर भी इस सब के होते हुए उसने दोष किया; हाँ, क्योंकि परमेश्वर कुतर्की नहीं है और शब्द पर नहीं अटकता, जैसा हम पहले बता चुके हैं, परन्तु वह मनसा को देखता है।
इसलिए जब हम अपने शब्दों को अच्छी तरह रंग चुके हों, और मनुष्यों के सामने हमें निर्दोष ठहराने के लिए कोई सुन्दर रंग और भली दिखावट हो, तो यह सब कुछ नहीं है: क्योंकि परमेश्वर हृदय को जाँचता है। और यद्यपि मनुष्य हमारे बहानों के विरुद्ध कुछ नहीं कह पाते, तो भी इससे यह प्रमाणित नहीं होता कि परमेश्वर उनसे सन्तुष्ट है। और यहाँ जो कहा गया है वह बहुत अच्छी और लाभदायक चेतावनी है।
क्योंकि मनुष्य सामान्यतः परमेश्वर के साथ कैसे ठट्ठा करते हैं? यह सच है कि हम मान लेंगे कि हमारे गुप्त विचारों को जाँचना उसी का काम है और उससे कुछ छिपा नहीं; तो भी हम उसके साथ मनुष्यों की रीति से व्यवहार करते हैं; और इससे बुरा यह कि हम उसे पूरी तरह पार कर जाना चाहते हैं, और उसकी आँखों में धूल झोंकते हैं; और हम उसके साथ मनुष्यों की अपेक्षा अधिक निडरता से ठट्ठा करते हैं। क्योंकि यद्यपि हमारे पास बच निकलने के बहुत से छेद हैं जो हमें दोष से छुड़ा सकते हैं, तो भी इतना तो है कि हमें कुछ पछतावा होता है, यह जानकर कि दूसरे लोग इसका ऐसा न्याय नहीं करेंगे; यह मनुष्य पशु नहीं, वह मेरी चालाकी जान सकता है।
इसलिए जब हमने अपने शब्दों पर इस प्रकार परदा डाल दिया हो, तब भी हम सदा सन्देह में रहेंगे कि मनुष्य सन्तुष्ट हुए या नहीं। पर जब बात परमेश्वर की हो, तो हम मुँह बिचकाने के सिवा कुछ नहीं करते, या यों कहें कि परमेश्वर पर मुँह चिढ़ाते और नाक-भौं सिकोड़ते हैं; क्योंकि हम इस बात में निर्बुद्धि पशुओं के समान हैं, वरन् उनसे भी बुरे। परन्तु इतना ही अधिक हमें यह शिक्षा सीखनी चाहिए: अर्थात् यह कि परमेश्वर हमारे इन सब सुन्दर रंगों की कुछ परवाह नहीं करता; क्योंकि वे पत्तों के लंगोटों के सिवा और कुछ नहीं, और इससे हमारे पिता आदम का बहाना नहीं बना कि वह अपना हिसाब देने को सामने नहीं आया। तो फिर हमें क्या करना चाहिए? हमें सादगी से अपने दोषों को ऐसे स्वीकार करना चाहिए कि पहले हम स्वयं अपने न्यायी हों; और जब हम एक बार यह पा लें कि हमारे व्यवहार में कुछ टेढ़ापन और छल था, तो हमें मान लेना चाहिए कि इससे परमेश्वर अप्रसन्न हुआ।
क्योंकि इसहाक की मनसा पर ध्यान दो: वह अपने विवाह को छिपाना चाहता था। यह सच है कि जो शब्द उसने कहे वे ऐसे नहीं हैं कि उसे झूठा कहा जाए; तो भी उसमें कुछ झूठ तो था ही। और कैसे? क्योंकि वह अपने विवाह को स्वीकार करना नहीं चाहता था, वरन् चाहता था कि वह अज्ञात रहे, और कि लोग यह न समझें कि रिबका उसकी पत्नी है। सो संक्षेप में वह बात ध्यान में रखो जो हमें सीखनी है: अर्थात् यह कि हमारे मुँह में चाहे कोई भी शब्द हों, जब तक हमारा मन शुद्ध और सीधा न हो, और हम किन्हीं पगडण्डियों में इधर-उधर भटकते न फिरें, तब तक कोई बात हमें धर्मी नहीं ठहरा सकती। और जब सन्त पौलुस झूठ बोलने की निन्दा करता है, तो वह यह भी जोड़ता है कि हर एक अपने पड़ोसी से सच बोले।
जब हम इस विषय में यहाँ तक पहुँच जाएँ, तो देखो कि परमेश्वर के सामने हम कैसे सच्चे गिने और माने जाएँगे। परन्तु यदि कोई चालाकियाँ या कपट हों, और हम ऐसे बोलने का यत्न करें कि जो हम कहते हैं वह समझा न जा सके, और उसे ऐसा मरोड़ा और घुमाया जाए, मानो हमारी जीभ दो हो, तो इसमें हम पहले ही झूठे ठहरा दिए गए हैं। सो संक्षेप में यही वह है जो हमें इस बात पर सीखना है।
अब जब यह कहा गया है कि "इसहाक को डर था कि कहीं उसकी पत्नी के कारण वह मार डाला जाए," तो इसमें सन्देह नहीं कि उसे इससे भी कारण मिल सकता था, क्योंकि (जैसा उसके पिता अब्राहम ने कहा था) उस देश में परमेश्वर का भय नहीं था: इसलिए नहीं कि वहाँ ऐसी उग्र अधर्मता थी कि भले और बुरे का कोई ज्ञान ही न था। क्योंकि हम देखते हैं कि उस देश के राजा ने कैसे बात की; परन्तु क्योंकि वहाँ सच्चा धर्म राज्य नहीं करता था, और मूर्तिपूजा के सिवा वहाँ कुछ न था, इसलिए इसहाक को यही प्रतीत हुआ कि सब कुछ गड़बड़ है।
क्योंकि सचमुच, जब तक परमेश्वर की महिमा हमारे सामने उपस्थित न हो, और हम उसके द्वारा मानो लगाम से रोके न जाएँ, तब तक हमारे पास न्याय और धार्मिकता में चलने का कोई निश्चित नियम कभी न होगा। अब जब हम नहीं जानते कि परमेश्वर कौन है, और हमारे पास अस्पष्ट कल्पनाओं के सिवा कुछ नहीं है, तो चाहे हममें कुछ सज्जनता हो, और चाहे हम भले-बुरे में भेद कर सकते हों, और हम किसी को हानि पहुँचाने या अन्याय और हिंसा करने की ओर प्रवृत्त न हों, तो भी बात यह है कि हममें कोई स्थिरता नहीं।
क्योंकि (जैसा मैं कह चुका हूँ) एक दृढ़ और स्थिर भवन बनाने के लिए हम परमेश्वर के भय को पहले रखने के सिवा किसी और नींव पर नहीं बना सकते। इसलिए इसहाक के पास डरने और संकट को पहले से टालने का कुछ कारण हो सकता था; पर इस बीच उसे जान लेना चाहिए था कि परमेश्वर, जो उसकी रक्षा है, कितने बल का है, ऐसा ही जैसा पहले अनुभव से उस पर प्रकट किया गया था: क्योंकि यदि वह भली-भाँति सोचता, तो समझे बिना न रहता कि परमेश्वर ने अपना हाथ बढ़ा रखा है कि उसकी सहायता करे, और वह भी अदृश्य रीति से: क्योंकि उसने उससे कहा था: "मत डर, क्योंकि मैं तेरे साथ हूँ: मैं तेरा अत्यन्त बड़ा प्रतिफल हूँ।" यह सच है कि यह उससे स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया था, पर जो उसके पिता से कहा गया वह उससे भी कहा गया था। क्योंकि वह उस प्रतिज्ञा का वारिस था।
इसलिए क्योंकि उसने परमेश्वर की बाट न जोही, इस बात में उस पर अविश्वास का दोष लगाया गया है। यह सच है कि विश्वास हमें उन संकटों को समझने से नहीं रोकता जिनसे हम चारों ओर घिरे हैं: क्योंकि विश्वास हमें संवेदनहीन बनाने के लिए नहीं है। और यदि हम उत्तेजित न किए जाएँ तो परमेश्वर को पुकारना हमारे लिए कोई सद्गुण न होगा, क्योंकि हम उसकी सहायता के बिना संकट से बच नहीं सकते: परन्तु बड़ा अन्तर इस बात में है कि हमारा भय ऐसा हो जो हमें सीधे मार्ग से बाहर ले जाए, या ऐसा जो हमारे लिए एड़ के समान हो कि हमें परमेश्वर के पास जाने को उभारे।
यदि इसहाक अपने मन में यों सोचता, "मुझे अपने परमेश्वर की ओर लौटना चाहिए, क्योंकि उसकी सहायता की शरण में जाने के सिवा मेरे पास और कोई शरणस्थान नहीं; उसने मुझसे यह प्रतिज्ञा की है, हाँ, और मैंने अपनी आवश्यकता में इसका अनुभव भी कर लिया है। इसलिए आवश्यक है कि उसकी सच्चाई मेरे प्रति अब भी प्रकट और प्रदर्शित हो।" यदि इसहाक यहाँ तक पहुँचा होता, तो निश्चय है कि उसका विश्वास और भी अच्छी रीति से परखा जाता: और उसके भय से ऐसा प्रकट होता मानो वह अपने आप में निर्बल होकर परमेश्वर में बलवन्त किया गया हो: परन्तु जब वह भय से पराजित हो जाता है और आगे ऐसी सम्मति लेता है जिसकी परमेश्वर निन्दा करता है: तो इसमें वह अपने आप को एक विश्वासी जन के कर्तव्य के अनुसार नहीं ढालता।
जब इसहाक इस प्रकार चला, तो इसमें वह प्रकट करता है कि वह डरता था, क्योंकि वह परमेश्वर के वचन को पर्याप्त रूप से नहीं थामे हुए था, और उसका विश्वास भली-भाँति निश्चित न था: परन्तु इसमें कि वह डगमगाता और बदलता है, इससे वह दिखाता है कि जैसा चाहिए था वैसा वह परमेश्वर पर दृढ़ता से भरोसा नहीं रखता था।
परन्तु अब जब हम इसहाक का दोष देख चुके हैं, तो हमें और भी अधिक चेतावनी लेनी चाहिए (जैसा हम पहले कह चुके हैं) कि जितनी भी बातें हमें डराने के लिए हमारे सामने आएँ, उन सब में हम सदा परमेश्वर को यह आदर दें कि उसमें इसका उपाय करने के लिए पर्याप्त है, कि यदि हम उसे पुकारें, और उसके बाद उन साधनों का प्रयोग करें जो उसने हमारे लिए छोड़े हैं और जिन्हें वह स्वीकार करता है, तो हम दाहिने या बाएँ हाथ अपनी सीमाओं को न लाँघें।
इसलिए इसहाक ने उस देश के लोगों का कुछ भी अहित नहीं किया, पर परमेश्वर का किया, जो इससे कहीं बढ़कर है। और फिर वह पूरी तरह निर्दोष भी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि उसने अपने ही सिर से ऐसा निर्णय ठान लिया: क्योंकि यद्यपि उस स्थान में परमेश्वर का भय और उस देश में सच्चा धर्म न था, तो भी बात यह है कि सच्चा प्रेम सन्देह नहीं करता। किसी ने अब तक उसे कोई हानि या चोट नहीं पहुँचाई थी, तो क्या उसे पहली ही झलक में उन्हें दोषी ठहरा देना चाहिए था? इसी कारण परमेश्वर ने यह बुराई उस पर आने दी: और फिर भी उस पर अनोखी दया दिखाता है: क्योंकि उसकी पत्नी का अपहरण हो सकता था, जैसा उसके पिता के साथ भी हो सकता था।
देखो, एक राजा जो गरार देश का है, और फिर भी परमेश्वर उसे इसहाक की कोई हानि करने से रोकता है, हाँ, यह भली-भाँति जानते हुए कि उसमें अपने पिता अब्राहम के समान कोई ऐसा सद्गुण न था, जैसा हम पहले दिखा चुके हैं। और यह भी ध्यान दो कि परमेश्वर उसे क्यों रोकता है: जब उसने मिस्र जाने की ठान ली थी, तो वह उसे मानो बलपूर्वक पीछे खींच लेता है और उस देश से बाहर जाने से मना करता है जिसकी उसने उससे प्रतिज्ञा की थी। हम पहले दिखा चुके हैं कि परमेश्वर उस माप के अनुसार जो उसने हमें दिया है हमें परखता भी है। इसलिए वह सब मनुष्यों में मानो अनेक कारखानों में और ऐसे साधनों के द्वारा कार्य करता है जो एक ही सामर्थ्य के नहीं होते।
सो इसहाक को देखो, जो इस बार बचा लिया गया: पर हम यह भी देखते हैं कि प्रभु उस पर कितना दयालु और कृपालु था, जब उसने राजा अबीमेलेक को लगाम ढीली न दी कि वह उसके साथ वैसा करे जैसा उसके पिता अब्राहम के साथ किया गया था। क्योंकि यदि हम पूछें कि यह एक समय क्यों हुआ और दूसरे समय क्यों नहीं, तो निश्चय है कि परमेश्वर ने इसे अपनी अद्भुत युक्ति से चलाया: क्योंकि जब वह एक बार मनुष्यों को लगाम ढीली दे देता है, तो निश्चय है कि वे अपनी सीमाएँ लाँघ जाते हैं। और स्पष्ट कहा गया है कि वह राजाओं के हाथों को अपने हाथ में रखता है, और उन्हें जैसा उचित समझता है इधर-उधर फेरता है।
इसलिए हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि गरार के राजा का हृदय ऐसा थामा गया था कि उसने रिबका की लालसा नहीं की: नहीं तो वह उस अभिलाषा के वश में आ जाता, और बेचारा इसहाक उससे चरम सीमा तक सताया जाता और भयंकर संकटों में निगल लिया जाता। परन्तु (जैसा हमने कहा) परमेश्वर, जो विश्वासयोग्य है, अपने लोगों को बचाए रखता है, या उनकी सामर्थ्य के अनुसार, जो वह उनमें जानता है, उन्हें और अधिक तीव्रता से परखता है।
इसके अतिरिक्त, जब हम इतने डरपोक और इतने निर्बल हों कि बड़ी कठिनाई से हम (जैसा कहा जाता है) एक चुटकी भी सह न सकें: तो भी हम भरोसा रखें कि जब परमेश्वर को भाएगा कि हमें अधिक कठिन परीक्षा में निकाले, तब वह हमें बल देगा। पर इससे हमें निश्चिन्त नहीं हो जाना चाहिए। यदि मैं अपने आप को निर्बल अनुभव करूँ, और कहूँ, "अरे, परमेश्वर मुझे बचाएगा, क्योंकि वह जानता है कि मैं कुछ भी सह नहीं सकता," तो निश्चय है कि मुझे मेरी कृतघ्नता का दण्ड मिलेगा। और क्यों? जितने हम निर्बल हैं, उतना ही हमें उसकी ओर दौड़ना चाहिए जिसके पास हमारी घटियों को पूरा करने की सारी सामर्थ्य है।
और इसलिए आओ हम सीखें कि जब कहा जाता है कि परमेश्वर हमारी सहायता करेगा, और हमारे विरुद्ध खड़ी की जानेवाली सब लड़ाइयों को सहने का बल देगा, तो यह इसलिए है कि हम दिन-प्रतिदिन प्रार्थना में अभ्यास करना सीखें। और इसलिए हम आलसी न हों, क्योंकि कहा गया है कि परमेश्वर अपने लोगों को बल देता है, ठीक जैसा उसे भाए कि उन्हें परीक्षा में खींचे: वरन् यह हमें सदा अपने ऊपर और ध्यान से दृष्टि रखने के लिए प्रेरित करे: और अपनी दुर्दशा जान लेने के बाद हम उपाय ढूँढ़ें, और उससे प्रार्थना करें कि वह कृपा करके हमें किसी भी रीति से कभी गिरने न दे, वरन् हमें थामे रखे, या जब वह चाहे कि हम और साहस से लड़ें, तो हमें वह सामर्थ्य दे जिससे हम ऊपर से सुसज्जित हों, क्योंकि वह सदा भली-भाँति जानता है कि उन पर भरोसा रखनेवालों को जो उसी की पताका तले लड़ते हैं विजय कैसे दे।
सो अब्राहम और इसहाक के बीच जो भिन्नता हम पढ़ते हैं उस पर ध्यान दो। अब कहा गया है:
"कि राजा ने इसहाक को अपनी पत्नी रिबका के साथ क्रीड़ा करते देखा, और तब उसे बुलाकर कहा: सचमुच, वह तेरी पत्नी है।"
इससे हम देख सकते हैं कि उस समय आज की अपेक्षा बहुत अधिक खराई थी, और व्यभिचार और उच्छृंखल जीवन इतने सामान्य न थे। क्योंकि कुछ लोग तो पहली ही झलक में इसहाक के विरुद्ध बुरा निर्णय खड़ा कर देते। इसलिए अवश्य ही उस समय के मनुष्यों में हमारे समय से अधिक सज्जनता थी। और इसमें सन्देह नहीं कि इसहाक ने सब के बीच यह सुनाम पाया था कि वह न दुष्ट था और न व्यभिचारी, कि उसे बहिन कहने के बहाने अपने पीछे किसी वेश्या को लिए फिरे। इसमें सन्देह नहीं (मैं कहता हूँ) कि जब वह और उसका जीवन-व्यवहार जाना गया, तो सब को विश्वास हो गया कि वह एक पवित्र पुरुष है और परमेश्वर का भय माननेवाला है, और ऐसे दोषों और घिनौने कामों की ओर उसकी प्रवृत्ति नहीं।
और यह ऐसी बात है जिस पर हमें भली-भाँति ध्यान देना चाहिए: क्योंकि कोई ऐसा नहीं जो भला मनुष्य गिना जाना न चाहे: और ज्यों ही मनुष्य हमारे विषय में कोई बुराई सोचते हैं, तो हम समझते हैं कि वे हमारे साथ बड़ा अन्याय करते हैं: और फिर भी इस बीच हम उन उपायों को काम में लाने की चिन्ता नहीं करते जिनसे हमारे विषय में बुरा न सोचा जाए, और जिनसे यह हो कि मनुष्य हम पर दोष और अपराध न लगाएँ। उपाय यही था कि हम अपने आप को ऐसा चलाएँ और ढालें कि सब के मुँह बन्द हो जाएँ: कि पहले तो हममें परमेश्वर का भय राज्य करे, और फिर मनुष्यों के साथ हमारा चाल-चलन प्रेम और सीधाई में हो, जैसा परमेश्वर ने हमें आज्ञा दी है। यदि हममें यह हो, तो निश्चय है कि हम बहुत से दुष्टों के मुँह बन्द कर देंगे।
पर यह बहुत सच है कि अत्यन्त पवित्र और भक्त जन भी कई बार दुष्टों को अपनी बुराई करने से रोक नहीं सकते: क्योंकि क्या परमेश्वर का पुत्र स्वयं निन्दा और अपमान के अधीन न हुआ? क्या उस पर यह दोष नहीं लगाया गया कि उसने अपने पिता परमेश्वर की निन्दा की? परन्तु इस सब के होते हुए भी पवित्रशास्त्र बिना कारण नहीं कहता कि तब हम दुष्टों के मुँह बन्द करते हैं जब हम सब ठोकरों से बचते हैं, और जब हम केवल बुराई से ही नहीं, वरन् बुराई के हर रूप से भी दूर रहने का परिश्रम करते हैं।
इसलिए जिन्हें अपनी साख और प्रतिष्ठा की इतनी चिन्ता है कि वे किसी भी बात में नीचा दिखाया जाना सहन नहीं कर सकते, वे साधनों पर ध्यान दें: अर्थात् वे यह रोकें कि उन पर उचित रीति से दोष न लगे, और इसमें वे इसहाक का उदाहरण मानें। क्योंकि हम देखते हैं कि वह एक असभ्य देश में परदेशी था, जहाँ मूर्तिपूजा के सिवा कुछ न था: तो भी वह परमेश्वर का भय माननेवाला मनुष्य गिना जाता था, और वे उसके विषय में बुरा निर्णय खड़ा न कर सके। और क्यों? क्योंकि उसके अच्छे जीवन और खराई से उन्हें विपरीत का निश्चय हो गया था: हम भी ऐसा ही करें, तो निश्चय है कि हम बहुत सी निन्दाओं और बहुत सी झिड़कियों को रोक देंगे।
परन्तु हमें आगे यह भी ध्यान देना है कि तब मनुष्यों में ऐसी खराई थी कि यदि कोई अपनी पत्नी से घनिष्ठता से क्रीड़ा करता था, तो वह विवाह के भीतर ही होती थी। पर आजकल सब कुछ ऐसा बह निकला है कि संसार की बड़ी से बड़ी नीचताओं के सामने मनुष्य को आँखें मूँद लेनी पड़ती हैं। कोई दरबारों में जाए, अरे, निश्चय है कि वहाँ दुष्टताएँ इतनी उद्दण्ड हैं कि इससे अधिक कुछ देखा नहीं जा सकता। और विशेष रूप से यदि कोई पति अपनी पत्नी को किसी दूसरे पुरुष की आँख से फुसलाई जाती देखे, और कुछ लोग इस कारण उसके साथ ऐसे दुर्व्यवहार करें मानो वह कोई वेश्या हो, तो उसे इस पर अच्छा मुँह बनाए रखना पड़ता है: क्योंकि यदि वह कोई संकेत दे कि वह इससे दुखी है और इस पर हँसता नहीं जैसा दूसरे हँसते हैं, तो अरे, वे कहते हैं, वह तो जलनेवाला मूर्ख और बुद्धू है। देखो इस बात में कैसा हाल है: क्योंकि मनुष्य अधर्म के ढेर तक पहुँच गए हैं, यहाँ तक कि उन्होंने सारी लज्जा खो दी है, क्योंकि वे ऐसी पशुवत् स्वच्छन्दता में पड़े हैं कि उनमें कोई खराई रही ही नहीं।
और मैं चाहता कि यह बुराई इन दरबारों के सिवा और कहीं न होती: परन्तु यह तो मानो बाढ़ या जल-प्रलय है, जो सब श्रेणियों में, हाँ छोटे से छोटे में भी, मनुष्य को दिखाई देता है, ऐसी असंयम और उच्छृंखल कामुकता की चेष्टाएँ कि देखना दया का काम है। पर आओ हम ध्यान दें कि हम इन लोगों से कितनी दूर हैं जो मानो बेचारे अंधे थे, जिन्हें परमेश्वर का कोई ज्ञान न था, जिनके पास कोई लिखित व्यवस्था न थी, और न कोई प्रकाशन ही: और फिर भी उनमें यह खराई थी कि कोई दूसरे की पत्नी के साथ अति घनिष्ठता से न छेड़छाड़ करता था, न उसकी कोई ऐसी चेष्टा थी जिससे कोई बुराई सन्देह में आए, जैसा हम यहाँ देखते हैं। क्योंकि सचमुच (वह कहता है), यह तेरी पत्नी है। और वह इसका निष्कर्ष किस पर से निकालता है? इस पर कि वहाँ वह दुर्गुण प्रचलित न था: और मनुष्यों में वह ऐसे चलन या अधिकार में नहीं आया था कि वे विवाह और व्यभिचार के बीच सहज ही भेद न कर सकें।
अब यह हमें सिखाता है कि हम एक-दूसरे के प्रति ऐसा व्यवहार करें कि कोई अशुद्ध दृष्टि न हो, कोई बुरी चेष्टा न हो: वरन् हम सब बुराई से ऐसे शुद्ध रहें कि मनुष्यों के सामने भी हम अपने विषय में बुरा कहने या बुरा सोचने का कोई कारण न दें। यह सच है कि वह यहाँ किसी ऐसी चेष्टा की बात करता है जो किसी परदेशी पुरुष के लिए अति घनिष्ठ थी: क्योंकि यह आवश्यक नहीं कि हम इतने कठोर हों कि बुराई का कारण दिए बिना साथ-साथ रह ही न सकें: और फिर भी इस बीच घनिष्ठता से जीवन बिताएँ, हाँ, सब खराई के साथ हँसें-खेलें, यह दिखाते हुए कि हमारे हृदय पवित्र हैं, आँखें पवित्र हैं, और हमारी सब इन्द्रियाँ पवित्र हैं।
परन्तु जब इसहाक अपनी पत्नी के साथ यों खेला, तो उसने अपनी पत्नी के प्रति पति का कुछ चिह्न दिखाया: इसलिए यह निर्णय किया जा सकता था कि या तो यह पुरुष व्यभिचारी है, या फिर अवश्य ही उसका पति है। अब उसे व्यभिचारी समझना उनके लिए सम्भव न था, क्योंकि वह परमेश्वर के भय में और गरार देश में सब की सद्भावना के साथ खराई से रहा था: इसलिए उसे उसका पति ही समझा जाना था। पर इस पर इसहाक अपना दोष मान लेता है: परन्तु वह यह कहकर इसे मानता है कि उसे डर था कि कहीं वह मार न डाला जाए। यहाँ बातें उससे अधिक संक्षेप में दोहराई गई हैं जैसा हम पहले देख चुके हैं। क्योंकि अब्राहम को अधिक कड़ाई से डाँटा गया था: और इसी प्रकार उसने इसके लिए अधिक लम्बा बहाना भी बनाया। मैं जानता था (वह कहता है) कि इस देश में परमेश्वर का भय नहीं है। केवल इसहाक कहता है, मुझे डर था कि वे मुझे मार डालेंगे।
अब वह यहाँ दिखाता है कि यद्यपि रिबका उसकी बहिन थी, तो भी क्योंकि उसका उद्देश्य सत्य को ढाँपना था, वह निन्दनीय ठहरा। इसी प्रकार जब हम कुछ समय के लिए बहुत चतुराई करें, तो हम ऐसे हठी न हों कि जो कुछ हमने कहा और किया है उस सब का पूरी तरह समर्थन करें (चाहे हममें कोई दोष हो): वरन् हम उसे खुले मन से स्वीकार करें। क्योंकि इसहाक कह सकता था, हाँ, वह मेरी बहिन है। परन्तु जो कुछ उसने कहा था उसके होते हुए भी वह जोड़ता है कि वह दोषी था, जैसा अबीमेलेक ने भी कहा: क्योंकि उसने इसहाक को दोषी ठहराने का उचित कारण देखा, और इसलिए उससे कहता है,
"तूने यह क्या किया है?" अब हमें एक ओर वह बात ध्यान में रखनी है जो पहले कही गई थी: अर्थात् यह कि परमेश्वर ने अपने दासों के कारण राजाओं को डाँटा और ताड़ना दी, यद्यपि वे गिनती में थोड़े ही थे, यद्यपि वे कनान देश में मानो भटकते हुए दीन लोग थे। और क्योंकि परमेश्वर ने उनका पक्ष लिया, और उन पर किए जा सकनेवाले सब हिंसा और बुराई के विरुद्ध खड़ा हुआ: इससे वह उस अनोखी कृपा को प्रकट करता है जो वह उन पर रखता था। और भविष्यद्वक्ता भी जोड़ता है कि इसी कारण वह कहता है:
"मेरे अभिषिक्तों को मत छूओ, और मेरे नबियों की कुछ हानि मत करो।"
यह सच है कि अब्राहम और इसहाक में उत्तम सद्गुण और पवित्रता थी: परन्तु जो भी हो, बात यह है कि आज हम भी परमेश्वर की रखवाली में रहने के लिए अभिषिक्त किए गए हैं, और उन सब प्रतिज्ञाओं में जो उन्हें दी गई थीं हम उत्तराधिकारी हुए हैं। इसलिए चाहे हम कितनी ही छोटी संख्या और तुच्छ ठहराए गए दीन लोग हों, भेड़ियों के गले में भेड़ों के समान, तो भी हम सन्देह न करें, वरन् जानें कि परमेश्वर के पास हमारी रक्षा करने के लिए पर्याप्त साधन हैं, और वह जितना आवश्यक होगा उतना अपनी सामर्थ्य प्रकट करेगा, हाँ, संसार के सबसे प्रतापी राजाओं के विरुद्ध भी। क्योंकि कभी-कभी परमेश्वर ने यह होने भी दिया है कि साधारण और निम्न श्रेणी के लोग उसके दासों को सताएँ और तंग करें, जैसा हम आगे देखेंगे, और वह भी बहुत शीघ्र। जो भी हो, जब उसने प्रकट कर दिया है कि वह युद्ध को पहले से देखता है, और राजाओं के विरुद्ध अपने आप को सजाता है: तो इससे उसने दिखाया है कि उसके दासों का जीवन उसकी दृष्टि में प्रिय और अनमोल है। इसलिए हम भी ऐसी ही आशा रखें, और हम धोखा न खाएँगे। और जब हम संसार के सबसे प्रबलों को अपना शत्रु देखें, और प्रतिदिन बहुत से उपद्रवों और हलचलों की अफवाहें सुनें: तो हम सन्देह न करें, वरन् हमारा प्रभु सब का उपाय करेगा, और सदा हमारी ढाल बना रहेगा कि हमारे सब प्रहारों को लौटा दे, तब भी जब बहुत सम्भव हो कि वे हमारे सिरों पर आ पड़ें।
देखो, इसहाक के उदाहरण से हमें क्या व्यवहार में लाना है। और यद्यपि यहाँ परमेश्वर ने अबीमेलेक को वैसा दुख नहीं दिया जैसा पहले दिया था, और न उसे वैसा डाँटा जैसा मिस्र के राजा को डाँटा था: तो भी वह उसे लगाम में रखता है, और उसे मानो भय में थामे रखता है: ऐसा कि यद्यपि रिबका सुन्दर थी, तो भी ऐसा हुआ कि उस देश के राजा ने उसकी लालसा न की, चाहे उसने यह मान ही क्यों न लिया हो कि उसे पत्नी बना लेना उसके लिए उचित है। इसलिए एक ओर देखो कि हमें क्या ध्यान देना है: दूसरी ओर यह कि फिर भी परमेश्वर ने इसहाक को दीन किया और उसके अविश्वास को पूरी तरह बिना दण्ड के रहने नहीं दिया: तो भी दण्ड बहुत कोमल है। पर जो भी हो, वह सुधारा गया।
अब यदि इसहाक पर कुछ न बीतता, और यह पता न चलता कि रिबका उसकी पत्नी है, तो वह इससे न लौटता, और न उसे कभी अपना वह दोष स्मरण आता जो उसने किया था: और विशेषकर वह इस बात से अपने आप में प्रसन्न होता, क्योंकि परिणाम अच्छा था और जैसा वह चाहता, और इसलिए वह सोचता कि परमेश्वर ने इसे स्वीकार किया है। क्योंकि जब मनुष्यों को उनके दोष नहीं दिखाए जाते, तो वे उनमें अपने आप को बहलाते और कठोर होते जाते हैं।
परन्तु परमेश्वर हमारी भलाई और उद्धार का काम तब करता है जब वह हमें हमारे पापों का बोध कराता है, और हमें ऐसी रीति से सुधारता है कि हम उन पर विचार करने को विवश हो जाते हैं।
सो ध्यान दो कि इसमें इसहाक के साथ कैसे हुआ। यह बहुत सच है कि परमेश्वर ने उसे बहुत सहा, जब उसने उसकी पत्नी के विरुद्ध कुछ भी करने न दिया, और देश के राजा ने भी उसे इतनी कोमलता से बुलवाया, और अपने बराबरी के साथी के समान उससे शिकायत की। देखो, कैसा अद्भुत सहारा: और इससे हम देखते हैं कि परमेश्वर अपने लोगों पर तरस खाता है, और उन्हें उनकी सामर्थ्य से अधिक नहीं परखता। पर जो भी हो, बात यह है कि इसहाक अपना पाप स्वीकार करने लगता है। और इसका न्यायी कौन है? एक बेचारा अन्यजाति का मनुष्य, मूर्तिपूजक। परमेश्वर स्वर्ग से कोई स्वर्गदूत भेज सकता था, या उसे कोई प्रकाशन दे सकता था कि वह उससे कहे, तू क्या करता है? पर वह उसे वहीं छोड़ देता है: क्योंकि वह इतने आदर के साथ सिखाए जाने के योग्य न था, वरन् अंधों को उसकी बुराई प्रकट करनी और उसे दोषी ठहराना था।
सो देखो, उसके साथ जो लज्जा की बात हुई, ताकि वह इससे और अधिक दीन हो, और ताकि वह सदा के लिए परमेश्वर पर और अच्छी रीति से भरोसा रखना सीखे, और फिर कभी उस दोष में न पड़े। यही हमें ध्यान में रखना है। और साथ ही हम अपने ऊपर भली-भाँति चौकसी रखें, और इसकी चिन्ता न करें कि मनुष्य हमें डाँटते हैं: वरन् जितनी भी ताड़नाएँ परमेश्वर अपने वचन के द्वारा हमारे पास भेजता है उन सब को अच्छे भाव से ग्रहण करें। क्योंकि जब वह हमें अपने पास आने के लिए उभारता है, और शिक्षा के साथ उपदेश भी जोड़ता है, तो वह हमारा कितना आदर करता है? और फिर जब वह देखता है कि हम बहुत धीमे हैं, और इसके अतिरिक्त मानो सुधार के योग्य ही नहीं हैं, तो वह और तीखी झिड़कियाँ काम में लाता है। पर जो भी हो, यह सब उसी के नाम से किया जाता है, ताकि जब हम पवित्रशास्त्र में पढ़ें, और उपदेश सुनने आएँ, और वहाँ वह हमें बुलाए, तो वह सदा हमारा न्यायी रहता है।
और देखो, इसी कारण हमारा प्रभु यीशु मसीह, सुसमाचार के प्रचार के विषय में कहता है: "जब पवित्र आत्मा आएगा, तो वह संसार को दोषी ठहराएगा।" इसलिए परमेश्वर की आत्मा हम पर अपना अधिकार चलाता है: और किसलिए? इसलिए कि जब हम दोषी ठहराए जाएँ, तो हम सहर्ष दोषी ठहराव को स्वीकार करें, और सीखने के योग्य हों, और क्षमा माँगें, और वह देने को तैयार है। सो जब परमेश्वर ने हमारा यह आदर किया है कि हमें मानो अपने घर में और अकेले-अकेले में हमारा न्याय करता है: तो जब वह हमें हमारे दोष दिखाता है, क्या हम अत्यन्त कठोर नहीं ठहरते यदि हम अपनी गर्दन न झुकाएँ, और सीखने के योग्य न हों, और उसके द्वारा सुधारे जाने को तैयार न हों? क्योंकि यदि हम उसके विरुद्ध ऐसे विद्रोह करें, तो परमेश्वर यह होने देगा कि हम दूसरी पाठशाला में आएँ, और दुष्ट और अविश्वासी लोग ही हमें दोषी ठहराएँ। हम इसी विषय में बहुतों को पाएँगे जो झुँझलाते और दाँत पीसते हैं, यदि उपदेश में आने पर कोई उनके खुजलीवाले घावों को खुजाए और उनके पित्त पर रगड़े। क्योंकि उनके उत्तर देखो: क्या पवित्रशास्त्र इसलिए बना कि बेचारे लोगों को इस प्रकार कोंचे? और क्या सिखाने की यही रीति है कि इस प्रकार चिल्लाया जाए? ऐसा लगता है कि वह हम पर बिजली गिराना चाहता है। पर अन्त में परमेश्वर उन्हें दूसरी रीति से सिखाता है: अर्थात् यह कि उसकी तुरही बजेगी, और उनकी लज्जा हर जगह प्रकाशित की जाएगी, और अन्त में उन्हें फाँसी के तख्ते की पाठशाला में जाना पड़ेगा। और इसके अतिरिक्त जब हम उन ताड़नाओं से कोई लाभ नहीं उठाते जो प्रतिदिन हमारे सामने रखी जाती हैं, तो अवश्य है कि हम सौ कोस दूर तक दोषी ठहराए जाएँ, और वह भी उचित रीति से। पर यदि इसमें हम अकेले ही दुख पाते, तो कोई जोखिम न था: बुरा यह है कि हमारी दुष्टता के कारण परमेश्वर के नाम की निन्दा होती है।
इसलिए इस उदाहरण से हम सीखें कि इतने नम्र और सीखने तथा ढलने योग्य बनें कि जब परमेश्वर हमें डाँटे, तो हम सहर्ष उसके द्वारा दोषी ठहराए जाना स्वीकार करें, और अपने आप से लज्जित हों: ताकि हमारी लज्जा और कलंक सारे संसार के सामने प्रकट और खुले न किए जाएँ। सो देखो, इस स्थान से हमें और क्या सीखना है। परन्तु कहा गया है कि अबीमेलेक ने इसहाक से शिकायत करते हुए यह भी कहा,
"प्रजा में से कोई तो तेरी पत्नी के साथ सहज में सो जाता: और तूने हम पर बड़ी बुराई आने दी।"
पहली बात के विषय में, यहाँ इसहाक अपनी अविचारिता और मूर्खता के लिए डाँटा जाता है। क्योंकि जहाँ तक उससे हो सका, उसने अपनी पत्नी को अशुद्ध किए जाने के लिए खुला छोड़ दिया। और कैसे? हम पहले देख चुके हैं कि पति को अपनी पत्नी के लिए परदे या ओढ़नी के समान होना चाहिए। जब कोई स्त्री ब्याही जाती है, और उसका पति अपना कर्तव्य निभाते हुए उसके साथ रहता है, तो यह इसलिए कि वह मानो वहाँ सुरक्षित रहे, और कोई उसे धोखा देने या अशुद्ध करने न आए। अब इसलिए इसहाक को अपना कर्तव्य निभाने के लिए अपनी पत्नी के लिए परदे या ओढ़नी के समान होना चाहिए था: अर्थात् पति और विवाह के नाम के नीचे: उसे यह रोकना चाहिए था कि कोई उसे अपने पास खींचने का प्रयत्न करे, चाहे पत्नी बनाने के लिए, चाहे किसी और रीति से: क्योंकि विवाह मानो एक सुरक्षा है, (जैसा हमने कहा) और परमेश्वर चाहता है कि सब युगों में उसका आदर हो। और यद्यपि व्यभिचारी उसे सूअरों और गधों के समान त्याग दें: तो भी उन्हें उसमें सदा पछतावा हुआ है: और सदा अन्यजातियों में भी व्यभिचारी बिना दण्ड के नहीं छूटे। यह जाना हुआ है कि यदि संसार में कभी किसी बात को विशेषाधिकार मिला तो वह विवाह था: हाँ, चोरियाँ और अन्य अपराध ऐसे घोर कामों की अपेक्षा कहीं अधिक सहे जाने के योग्य हैं: अर्थात् जब वह वाचा और संगति टूटती है जिसे परमेश्वर ने अपने नाम में समर्पित किया है, कि वह पवित्र हो, मानो अपवित्रता से अलग किए हुए।
इसलिए जब यह टूटा, तो अन्यजाति जानते थे कि यह ऐसी घृणित बात है कि किसी रीति से इसे सहा नहीं जाना चाहिए। अब इसलिए, बीच में ही, अबीमेलेक इसहाक में इस बात का दोष निकालता है कि उसने अपनी पत्नी को जहाँ तक उससे हो सका इस प्रकार बेच दिया। और इस शिक्षा से हमें यह सिखाया जाता है कि संकटों का सामना पहले से करें, और अपनी उतावली और मूर्खता से परमेश्वर की परीक्षा न करें। इसलिए हम भली-भाँति चौकसी रखें कि हम बुराई को कैसे ढाँपते हैं, और (जैसा कहा जाता है) परमेश्वर के विरुद्ध द्वार बन्द कर लेते हैं: ऐसा कि हमारी उतावली और अविवेक से परमेश्वर अप्रसन्न हो। सो देखो, वह बुद्धि जो हममें होनी चाहिए: और क्योंकि वह हममें नहीं है, इसलिए हमें उसे परमेश्वर से माँगना चाहिए।
पर अब दूसरी बात के लिए अबीमेलेक कहता है:
"तूने हम पर बड़ी बुराई ला दी होती।"
और कैसे? जब प्रजा में से किसी ने व्यभिचार किया होता, और उसने इस प्रकार अपराध किया होता, तो चाहे वह कितना ही बड़ा दुख क्यों न होता, केवल उसी को दण्ड पाने के योग्य ठहरना चाहिए था: तो क्या एक पूरे देश को इसका उत्तर देना चाहिए? अब हम यहाँ देखते हैं कि एक अभागा अन्यजाति, अविश्वासी, और एक बेचारा अंधा जन भी जानता था कि देश व्यभिचारी से अशुद्ध होता है: और कि यदि यह बिना दण्ड के रहे, तो भी परमेश्वर के सामने, देखो, एक पूरी जाति इसमें दोषी है, अस्थायी दण्ड के विषय में। यह सच है कि परमेश्वर जानता है कि जो ताड़नाएँ वह निर्दोषों पर भेजता है उन्हें उनके लाभ के लिए कैसे बदल दे: क्योंकि यदि वे दुख पाते हैं जिन्होंने उस बुराई में सम्मति नहीं दी, तो यह ठीक वैसा न होगा मानो वे दोषी थे: परन्तु परमेश्वर इसे उनके उद्धार के लिए बदल देता है। इस बीच बात यह है कि वह उन्हें बिना कारण कभी ताड़ना नहीं देता: यदि हम इसे अभी अपनी आँख से न देखें, तो भी जब वे सब बहियाँ खोली जाएँगी, तब हम पाएँगे कि परमेश्वर (जैसा लोग कहते हैं) टेढ़ी चाल नहीं चला। और जब वह एक पूरी जाति पर सामान्य दण्ड भेजता है, जैसा प्रतीत होता है कि एक ही विशेष दोष के कारण, तो भी वह भली-भाँति जानता है कि सब उसमें निर्दोष नहीं हैं, जैसा यहाँ स्पष्ट कहा गया है, और जैसा अबीमेलेक ने भी समझा। क्योंकि जब व्यभिचार होते हैं और दण्ड नहीं पाते, तो देखो, एक छूत है जो सारे देश में रेंगती है: पर क्या हम तब भी कहेंगे कि मनुष्य उसमें निर्दोष है, जब हम अपनी आँखें मूँद लेते हैं, और यह सब बह निकलने देते हैं? यद्यपि मनुष्य न्यायी नहीं, एक निजी व्यक्ति है, तो भी उसे जहाँ तक उससे हो सके अपने आप को उसके विरुद्ध खड़ा करना चाहिए।
अब दूसरी ओर कोई ऐसा नहीं, पर वह बुराई को रोकने के बदले पाल चढ़ाता है: यदि हममें परमेश्वर का साहस और धुन होती, तो हम यत्न करते कि उसकी सेवा और आदर वैसा हो जैसा वह योग्य है। पर हम ऐसा नहीं करते: सब में एक प्रकार की शिथिलता और आलस्य है। संक्षेप में, दुर्गुणों ने किसी देश में कभी राज्य और प्रभुत्व न किया, पर छोटे-बड़े सब अपने अत्यधिक धीरज, या ढोंग, या ठण्डेपन के कारण उसमें भागी हुए। सो ध्यान दो कि परमेश्वर पापों को बिना कारण दण्ड नहीं देता।
परन्तु इसके अतिरिक्त, व्यभिचार के विषय में हम देखते हैं कि एक अभागे अन्यजाति ने क्या कहा। इसलिए जब ऐसी बड़ी बुराई हमारे बीच में राज्य करे तो हम लज्जित हों: और जान लें कि हमें दोषी ठहराने के लिए किसी और न्यायी की आवश्यकता न होगी, हमें (मैं कहता हूँ) जिन्होंने हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम में बपतिस्मा लिया है, जब हम ऐसी गन्दगियों और छूतों को बनाए रखें, क्योंकि एक बेचारा अभागा अंधा अन्यजाति भली-भाँति जानता था कि ऐसे दुर्गुण में कितनी घोर नीचता है। सो देखो, हमें क्या सीखना है, ताकि हम इस स्थान से लाभ उठाएँ। और आगे, हम विवाह का आदर करना सीखें, क्योंकि परमेश्वर ने उसे समर्पित किया है, और वह एक ऐसी वाचा है जिसे उसने अपने नाम में पवित्र ठहराया है: कि वह भी उसके आदर और मर्यादा में बनाए रखा जाए, और पति और पत्नियाँ दोनों एक-दूसरे के साथ ऐसी खराई से रहें कि हर एक अपने घर को शान्ति और चैन से चलाए, और हमारे बीच कोई ढिलाई न हो: वरन् हम जानें कि हमने परमेश्वर की पाठशाला में उससे अधिक उन्नति की है जितनी हमारे पिता इसहाक ने इस बात में की थी, क्योंकि वह इसमें भटक गया।
परन्तु अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की ऊँची महिमा के सामने दण्डवत् करें, अपने अपराधों को स्वीकार करते हुए, उससे प्रार्थना करें कि वह कृपा करके हमें हममें की दुर्बलताओं और दुर्गुणों का बोध कराए, ताकि हम उनसे ऐसे अप्रसन्न हों कि उनसे लड़ें, और उनमें अपने आप को कोई छूट न दें: और जब हम अपराध करें, तो ऐसे पश्चाताप से छुए जाएँ कि उसकी ओर लौट आएँ, और उन पर तब तक विलाप करें जब तक वह अपनी पवित्र आत्मा से हमें सुधार न दे, और जब हम भटक गए हों तो हमें भले मार्ग में न ले आए। और साथ ही इस बीच वह हमारी दुर्बलता में हमें ऐसा थामे रखे कि हम उसकी सन्तान होना कभी न छोड़ें, चाहे हम उसे अपने पिता के रूप में वैसा आदर न दें जैसा उचित है। और कि वह यह अनुग्रह केवल हम पर ही नहीं, वरन् पृथ्वी के सब जातियों और राष्ट्रों पर भी करे, इत्यादि।
