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याकूब और एसाव पर छठवाँ उपदेश - उत्पत्ति 26:1-5
1 उस देश में बड़ा अकाल पड़ा, उस पहले अकाल से कहीं अधिक भारी जो अब्राहम के दिनों में पड़ा था। इसलिये इसहाक पलिश्तियों के राजा अबीमेलेक के पास गरार को गया।
2 क्योंकि यहोवा ने उसे दर्शन देकर कहा था, "मिस्र में न उतर जा, परन्तु उसी देश में रह जो मैं तुझे बताऊँगा।"
3 "इस देश में परदेशी होकर रह, और मैं तेरे संग रहूँगा और तुझे आशीष दूँगा; क्योंकि तुझे और तेरे वंश को मैं ये सब देश दूँगा, ताकि मैं उस शपथ को पूरी करूँ जो मैंने तेरे पिता अब्राहम से खाई थी।"
4 "मैं तेरे वंश को आकाश के तारागण के समान अनगिनत करूँगा, और तेरे वंश को ये सब देश दूँगा; और पृथ्वी की सारी जातियाँ तेरे वंश के कारण अपने को धन्य मानेंगी।"
5 "इसलिये कि अब्राहम ने मेरी बात मानी, और मेरे आदेश, मेरी आज्ञाओं, मेरी विधियों और मेरे नियमों का पालन किया।"
कल हमने देखा कि याकूब ने अपना भोजन उस आत्मिक लाभ के लिये छोड़ दिया जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर ने उससे की थी; और इससे प्रकट होता है कि उसे अपने शरीर से अधिक अपने प्राण की चिन्ता थी। यहाँ हमारे सामने एक दृष्टान्त है, जो यद्यपि उसके पिता इसहाक में ठीक वैसा ही नहीं, तो भी उसके बहुत निकट पहुँचता है। क्योंकि हम देखते हैं कि इसहाक को इस नश्वर और क्षणभंगुर जीवन की सब बातों से अधिक आत्मिक उत्तराधिकार का ध्यान था। वह अकाल से पीड़ित था, और इसमें कोई सन्देह नहीं कि मिस्र को जाना उसके लिये कठिन न था। परन्तु जब उसे स्पष्ट आज्ञा देकर रोक दिया गया, तो यह इस बात का चिह्न था कि उसका मन उसी ओर झुका हुआ था, क्योंकि उसकी सुविधा भी उसी ओर खींच रही थी। परमेश्वर ने उसकी यात्रा रोक दी, और उसने आज्ञा मानी। अतः हम देखते हैं कि इसहाक ने केवल एक कटोरा दाल ही नहीं छोड़ी; वरन् यह जानते हुए भी कि वह एक वर्ष भर बहुत दुःख सह सकता है, उसने अपने को रोके रखा, और मिस्र में कोई शरण नहीं ढूँढ़ी, और गरार देश में ही रहा, जो विशेष रूप से दरिद्रता से सर्वथा बचा हुआ नहीं रह सकता था, क्योंकि वह भी उसी देश का एक भाग था। क्योंकि जब कहीं अकाल पड़ता है, तो यह हो ही नहीं सकता कि पड़ोस के और निकट के स्थान भी उसका अनुभव न करें। इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय मिस्र में अन्न का कोई टोटा न था। इसलिये इसहाक यहाँ हमें दिखाता है कि चाहे परीक्षाएँ कितनी ही बड़ी हों, और हमारे पास अपने निर्वाह की आवश्यक वस्तुएँ न हों, तो भी हमें सदा परमेश्वर की इच्छा पर टिके रहना चाहिए, और अपनी सब सुविधाओं को भूलकर धीरज से सब अभाव और आवश्यकता सहने को तैयार रहना चाहिए, इसकी अपेक्षा कि हम मानो परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध अपनी सुख-सुविधाएँ ढूँढ़ें। इस इतिहास में यही पहली बात है जिस पर हमें ध्यान देना है। अब कहा गया है:
"उस देश में बड़ा अकाल पड़ा, उस पहले अकाल से भारी जो अब्राहम के दिनों में पड़ा था।"
क्योंकि इससे पहले दो अकाल पड़ चुके थे जिनका वर्णन मूसा ने हमारे सामने किया है। अब्राहम कनान देश में पहुँचते ही वहाँ से निकल जाने को विवश हुआ, और यह उसके लिये बहुत कठिन संघर्ष था, क्योंकि परमेश्वर ने उसे वह देश दिखाया था, और उसे अत्यन्त आनन्द हुआ था कि वह उसका अधिकारी होगा; और अब थोड़े ही समय बाद उसे वहाँ से खदेड़ा जाना था, और मानो एक दीन भटकनेवाले की नाईं मिस्र में उतरना था, क्योंकि उसे और कहीं सहारा न मिला। दूसरी बार भी वह पलिश्तियों के देश में चला गया, जो उसी देश का भाग था जिसकी उससे प्रतिज्ञा की गई थी, और गरार के राजा के अधीन, जो वह नहीं था जिसका अब उल्लेख हुआ है; क्योंकि सब उसे अबीमेलेक कहते थे, जिसका अर्थ है "मेरा पिता राजा"; और यह न केवल सम्मान की उपाधि थी, वरन् इसका यह भी अर्थ था कि राजा अत्याचार से शासन नहीं करते थे, न अपनी प्रजा को निगल जाते थे, परन्तु उन लोगों की पिता के समान चिन्ता रखते थे जिन्हें परमेश्वर ने उनके सुपुर्द किया था। अतः जब कहा गया है कि यह अकाल उस दूसरे अकाल के समान आया, तो इसका अर्थ हमें यह दिखाना है कि जैसे परमेश्वर ने अब्राहम के विश्वास और उसकी दृढ़ता को परखा था, वैसे ही वह उसके पुत्र को भी वैसी ही परीक्षा में बुलाना चाहता था। क्योंकि जैसे इसहाक प्रतिज्ञा का उत्तराधिकारी था, वैसे ही अवश्य था कि वह अपने पिता के स्थान पर उस सब में उत्तराधिकारी हो जो परमेश्वर की सन्तानों से प्रतिज्ञा किया गया था; क्योंकि हमें कर्म से दिखाना चाहिए कि हम उन स्वर्गीय आशीषों को, जिनके लिये परमेश्वर ने हमें बुलाया है, ऐसा मूल्यवान जानते हैं कि हम इस संसार में से होकर निकल जाएँ, और चाहे हम नाना और विविध रीतियों से क्लेश पाएँ, तो भी हमारा पतन न हो।
इसलिये ध्यान दो कि मूसा इन दो अकालों की तुलना करके किस बात की ओर संकेत करता है: अर्थात् यह कि जब अब्राहम की परीक्षा हुई, तो वह केवल उसी के कारण नहीं हुई, वरन् उसके पुत्र को भी उसी के समान होना था। परन्तु प्रसंगवश हम अब्राहम और इसहाक की सन्तान कहलाते हैं; अतः आवश्यक है कि हमारे विश्वास की भी जाँच की जाए, जैसा परमेश्वर को भला लगे। यह सच है कि हम और अधिक घबरा जाएँगे, और इसका कारण यह है कि हमें इतनी बड़ी सामर्थ्य नहीं मिली। इसलिये देखो, परमेश्वर हमारी निर्बलता को किस कारण सँभाले रहता है; परन्तु यह इसलिये नहीं कि हमारा विश्वास निष्क्रिय पड़ा रहे। अतः परमेश्वर का आत्मा हमें यहाँ चेतावनी देता है कि इस संसार में रहते हुए हमें बहुत सी विपत्तियों के अधीन होना पड़ेगा, और हमें कोई पार्थिव स्वर्ग न मिलेगा कि हमारी सब अभिलाषाएँ पूरी हों, और हम ऐसे तृप्त रहें कि हमें किसी वस्तु की घटी न हो; वरन् बहुधा ऐसा प्रतीत होगा कि परमेश्वर ने हमें भुला दिया है, कि उसने हमारे हाथ से रोटी छीन ली है, और हम ऐसी दशा में होंगे मानो उसने हमें नष्ट होने का दण्ड दे दिया हो। जब ऐसा हो, तो हम इसे अनोखा न समझें, और न नौसिखियों के समान बनें; वरन् हम में से हर एक पहले से ही सोच रखे कि उस पर क्या आ सकता है, और सब कुछ धीरज से सहने को तैयार रहे। विश्वासियों से प्रतिज्ञा भली भाँति की गई है: यद्यपि सिंह बहुधा अपना शिकार ढूँढ़ते हैं और नहीं पाते, और भूख के मारे गरजते हैं, तो भी परमेश्वर की सन्तानों को किसी बात की घटी न होगी। इसलिये देखो कि चौंतीसवें भजन में उसने इस विषय में क्या कहा है।
और एक और स्थान में फिर: "जो परमेश्वर का भय मानते हैं वे सब भली वस्तुओं से तृप्त किए जाएँगे।" परन्तु यह इसलिये नहीं कहा गया कि मानो परमेश्वर अपने लोगों को मोटा-ताज़ा करेगा, और जो कुछ वे चाहें वह उन्हें देगा; वरन् वह उन्हें दूसरी रीति से पालता है। और जब वह उन्हें तृप्त करने की बात कहता है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह सदा उनका पेट उत्तम भोजनों से भरेगा; वरन् हमें भजन के एक और स्थान की ओर जाना चाहिए: "कि कलीसिया के दीन लोग पाले जाएँगे।" यहाँ एक प्रकार का विरोधाभास देखो, कि परमेश्वर कहता है कि वह अपनी कलीसिया के लोगों को रोटी से तृप्त करेगा, तो भी उन्हें दीन और दरिद्र कहता है। यदि वे दीन और दरिद्र हैं, तो यह प्रतिज्ञा कहाँ गई कि परमेश्वर उन्हें रोटी से और सब भली वस्तुओं से तृप्त करेगा? परन्तु जो बात विरोधी जान पड़ती है उसका मेल हमें इस रीति से बैठाना चाहिए कि हम सदा परमेश्वर के विधान पर निर्भर रहें, मानो उसी के हाथ से खिलाए जाते हों; और इसी बीच यदि वह हमें भूख और प्यास सहने दे, तो हम इस कारण यह आशा न छोड़ें कि वह हमारा भला पिता बनकर हमारा पालन-पोषण करेगा। और इसी कारण हम प्रतिदिन की रोटी के लिये प्रार्थना करते हैं।
अब यह उन सब प्रबन्धों के विरुद्ध है जिन पर संसार के लोग भरोसा रखते हैं; क्योंकि जब तक उनके खत्ते और तहखाने भरे न हों, तब तक वे स्थिर नहीं रहते, जैसा कि एक और भजन में कहा गया है। और इसके अतिरिक्त जब वे भली भाँति लदे होते हैं, तो परमेश्वर को तुच्छ जानते हैं, मानो जैसा वे समझते हैं, उन पर कोई जोखिम ही नहीं। परन्तु इसके विपरीत, चाहे विश्वासियों के पास अपना पेट पालने को कुछ हो भी, तो भी उन्हें प्रतिदिन अपना मुँह खोलना पड़ता है, मानो परमेश्वर उनके मुँह में रोटी कौर-कौर करके डाले; और जब उनके पास कुछ नहीं होता, तब भी वे सदा उसी पर और उसकी भलाई पर भरोसा रखते हैं, और आशा रखते हैं कि जब उसे भाए तो वह रोटी के एक टुकड़े से भी उन्हें सम्भाल सकता है; या यों कहें कि चाहे उन्हें कोई उपाय दिखाई न दे कि वह कैसे आएगा, तो भी परमेश्वर उनके निर्वाह का कोई मार्ग निकाल लेगा।
इसलिये जब कहा गया है कि इसहाक अकाल के कारण निकाला गया, तो मानो परमेश्वर हम पर यह प्रकट करता है कि जब हम दरिद्रता और अभाव में पड़ें, तो यह न समझें कि इस कारण उसने हमें त्याग दिया है, और न इसे इस बात का चिह्न मानें कि वह हम से बैर रखता है; अथवा यह भी कल्पना न करें कि अब वह हमारी कुछ चिन्ता नहीं करता; वरन् जैसे हमारे पिता इसहाक ने भूख और प्यास को धीरज से सहा, और अन्त में अनुभव किया कि परमेश्वर को सदा उसकी चिन्ता रही, वैसे ही हम भी उसी बात को पहचानें। इसे एक विशेष शिक्षा जानकर ध्यान में रखो। और यही बात पौलुस ने भी रोमियों के आठवें अध्याय में हमें दिखाई है जब वह कहता है: "क्या भूख हमें उस प्रेम से अलग कर सकेगी जो परमेश्वर हम से हमारे प्रभु मसीह यीशु में रखता है?" पौलुस वहाँ सब विश्वासियों की ओर से संघर्ष करता है, और दिखाता है कि यदि परमेश्वर हमारे निवाले काट भी दे, वरन् हमें सारे पोषण से वंचित भी कर दे, मानो वह हमें उन सब उपकारों से बाहर कर देना चाहता हो जो उसने जगत में सृजे हैं, मानो हम पृथ्वी पर रहने के योग्य ही न हों; तो भी हमें वहाँ इस परीक्षा पर जयवन्त होना है, और यह निष्कर्ष निकालना है, चाहे अकाल के बीच ही क्यों न हो, कि परमेश्वर हमारा पिता होगा, और हमें इसी से सन्तुष्ट रहना है, और अपने क्लेशों में आनन्दित होना है। परन्तु साथ ही इसहाक के उदाहरण से हमें यह भी उपदेश मिलता है कि हम अकाल से, या किसी और क्लेश से, चाहे वह किसी भी प्रकार का हो, इतने दुःखी और खिन्न न हों कि वह हमें परमेश्वर को छोड़ने पर, या उस मार्ग से जिसमें उसने हमें रखा है हटा देने पर विवश करे। क्योंकि जैसे हमने देखा कि याकूब ने उस आत्मिक उत्तराधिकार की अभिलाषा में, जिसकी उससे प्रतिज्ञा की गई थी, अपना भोजन छोड़ दिया, वैसे ही अब हम देखते हैं कि इसहाक ने उस लम्बे समय में जो कुछ उसे सहना पड़ सकता था, उसकी कुछ परवाह न की। उसने मिस्र को देखा जो एक अच्छा शरणस्थान था, तो भी वह उससे फेर दिया गया। और क्यों? क्योंकि परमेश्वर ने उसे वहाँ जाने से मना किया था। इसलिये जब हम देखते हैं कि इसहाक अकाल से परास्त न हुआ, कि उसने परमेश्वर की आज्ञा मानी और उसके हाथ की अगुवाई को न छोड़ा; तो इससे हमें भी यह सीखना है कि जब हमारा प्रभु हमें दरिद्रता और अभाव से ताड़ना दे, तो हम अपनी आवश्यकता दूर करने के लिये अनुचित उपायों की ओर न ताकें। और सबसे बढ़कर, यदि शैतान हमें फँसाने के लिये हमारे सामने अपना चारा डाले, तो हम (यदि आवश्यकता हो तो) भूख से मर जाना ही चुन लें, परन्तु परमेश्वर की अगुवाई से अपने को अलग न करें: क्योंकि हम उसकी आशीषों के बिना पोषित नहीं हो सकते। क्योंकि जब संसार की सारी रोटी और भोजन हमारे पास हों, तब भी निश्चय है कि हमारे पोषण के लिये हवा भी हमें उतना ही लाभ देगी जितना वे; और हम समझेंगे कि हम बढ़ रहे हैं, तो भी इसी बीच हम वास्तव में तृप्त न होंगे; क्योंकि (जैसा मूसा में कहा गया है) मनुष्य को पोषण देनेवाली रोटी नहीं, परन्तु हर एक वचन है जो परमेश्वर के मुँह से निकलता है।
अब इस वचन से वह उद्धार की शिक्षा नहीं समझता, वरन् वही सामर्थ्य जो परमेश्वर ने अपनी सब सृष्टि पर फैलाई है। इसलिये देखो कि हमारा पोषण करनेवाली वस्तु क्या है: मैं केवल प्राण के विषय में नहीं, वरन् इस क्षणभंगुर जीवन के विषय में भी कहता हूँ। जब ऐसा ही है, तो हम चौकस रहें कि जब हम अभाव में हों तब हम उस वस्तु से न पाले जाएँ जो शैतान हमारे सामने रखे: "क्या तू यह कर सकता है, और क्या तू वहाँ से निकल सकता है, और क्या तेरे पास ऐसी कोई सहायता है?" हाँ, यदि यह परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध हो, तो हम सदा दृढ़ बने रहें, और प्रतीक्षा करें कि परमेश्वर हम पर दयावन्त होकर प्रकट हो: क्योंकि वही उपायों को भली भाँति जानता है, चाहे वे हमें अज्ञात हों। यह सच है कि हमें वैसे प्रकाशन न मिलेंगे जैसे हमारे पिता इसहाक को मिले; परमेश्वर स्वर्ग से हमें दर्शन न देगा: परन्तु हमारे लिये यह पर्याप्त होना चाहिए कि आज के दिन परमेश्वर की इच्छा हमारे लिये निश्चित है: क्योंकि परमेश्वर ने उस घटी को पूरा किया है जो हमारे पुरखाओं में थी जब वह उन्हें दर्शन देता था: आज हमारे पास व्यवस्था है, जो हमारे लिये अचूक नियम है: हमारे पास भविष्यद्वक्ता हैं जो उसके व्याख्याकार हैं, ताकि उसकी संक्षिप्तता हमारे लिये अस्पष्ट न रहे: और इसके अतिरिक्त हमारे पास सुसमाचार में सिद्धता है।
इसलिये जब परमेश्वर ने हमें वह प्रकट कर दिया है जो हमारे जानने के लिये लाभदायक है, तो आज के दिन हमें दर्शनों की अभिलाषा नहीं करनी चाहिए, वरन् जब कभी हम किसी उलझन या सन्देह में पड़ें, तब पवित्र शास्त्र की ओर लौटें: और जब हम उपायों पर विचार करें, तो देखें कि क्या वे हमें अनुमत हैं, और क्या परमेश्वर उनको मानता है। और जब हम पाएँ कि जो उपाय हमारे मन में आते हैं वे परमेश्वर की इच्छा के अनुसार नहीं हैं, जैसी वह व्यवस्था और सुसमाचार में प्रकट है, तो हम सब कुछ त्याग दें। देखो, हमें अपने पिता इसहाक के पीछे कैसे चलना है, वरन् इस परीक्षा पर जयवन्त होना है जो बहुत भारी और कष्टदायक है: अर्थात् जब हमारे पास पेट भरने और पोषण पाने के लिये एक बहुत थोड़ी सी पूँजी के सिवाय कुछ न हो। क्योंकि बहुधा अविश्वासियों के पास उनकी आवश्यकता से तीस गुना अधिक पाया जाता है; इसी प्रकार उड़ाऊ और लम्पट लोग भी मिलेंगे जो परमेश्वर की सब देनों को उड़ा देंगे और खर्च कर डालेंगे: वरन् उन्हें तहस-नहस कर देंगे। परन्तु दीन विश्वासियों का क्या? जीवन निर्वाह के लिये परिश्रम कर चुकने पर भी अन्त में उन्हें मुश्किल से पता चलता है कि अपनी रोटी कहाँ से जुटाएँ।
इसलिये जब हम देखें कि परमेश्वर बहुधा अपने लोगों को इस प्रकार परखता है, तो हर एक उसके लिये अपने को तैयार करे, और हम लज्जित न हों, चाहे हमारा प्रभु हमारे साथ ऐसी कठोरता और कड़ाई से व्यवहार करे। तो भी यह इसलिये नहीं कि वह हमें उस से वंचित करे जिसकी उसने हमसे प्रतिज्ञा की है, या हमें अपनी सन्तान न गिने: और हम मानें कि हमें खिलाने और पालने का काम उसी का है, और वह उसे करेगा, चाहे हमारी इच्छाओं और कल्पनाओं के अनुसार न करे। और इसके अतिरिक्त, जब हम देखें कि परमेश्वर हम पर ऐसा दबाव नहीं डालता कि भूख हमें, जैसा कहते हैं, द्वार-द्वार भटकाए, तो जान लें कि वह हमारी निर्बलता के कारण हमारे साथ इतनी सहनशीलता दिखाता है। इसहाक के उदाहरण से हमें जो कुछ सीखना है उसका सार यही है। परन्तु यहाँ एक प्रश्न उठ सकता है। परमेश्वर ने हमारे पिता अब्राहम को मिस्र जाने क्यों दिया, और उसके पुत्र इसहाक को क्यों रोक दिया? परन्तु इस विषय में हमें यह ध्यान रखना है कि परमेश्वर जानता है कि हम कौन हैं, और हमारा बल कितना है, और इसी के अनुसार वह हमें हमारी सामर्थ्य से बाहर परखे जाने नहीं देता (जैसा पौलुस ने कहा है), और इस बात में उसे विश्वासयोग्य कहता है। अतः परमेश्वर जानता है कि उसने हम में क्या रखा है, क्योंकि जो कुछ हम में स्वभाव से है वह सदा हमें गिराने ही का काम करेगा: परन्तु जब उसने हमें अपने पवित्र आत्मा की कोई सामर्थ्य दी है, तो वह जानता है कि वह थोड़ी है या बहुत, और इसी के अनुसार हमारे विश्वास और धीरज को परखता है; और जब वह देखता है कि हम निर्बल हैं, तो हमें इतनी कड़ी परीक्षा में पड़ने नहीं देता। इसलिये देखो कि यह कैसे हुआ: और अब्राहम और इसहाक के बीच जो यह भेद यहाँ रखा गया है, वह इस बात को दिखाने के लिये है कि विश्वासियों के साथ परमेश्वर सदा एक सा व्यवहार नहीं करता, उसी कारण से जो मैंने बताया। इसहाक अब्राहम का उत्तराधिकारी था, उसके पास प्रतिज्ञा थी: और इसमें कि वह नाना क्लेशों से परखा और जाँचा गया, स्पष्ट दिखाई देता है कि परमेश्वर ने उसे उसी एक मार्ग से चलाया: परन्तु तो भी (जैसा मैं कह चुका हूँ) इससे यह नहीं निकलता कि उस पर सब बातों में एक ही और वैसा ही नियम लागू हुआ। क्योंकि हमारा प्रभु जिसे चाहता है उसे थामे रहता है, और जब वह मनुष्यों के साथ अधिक कठोर व्यवहार होने देता है, तो तुरन्त उन्हें दृढ़ और सशक्त भी करता है।
अब्राहम ने मिस्र में रह चुकने के बाद कनान देश को लौट आना नहीं छोड़ा: परन्तु परमेश्वर ने भी उसे मिस्र से निकाल लिया, मानो उसका हाथ पकड़े हुए हो। क्योंकि वह वहाँ बहुत समय तक रह सकता था, क्योंकि वह अपने को वहाँ धनी देखता था: परन्तु वहाँ के निवासियों से उसे बैर हो सकता था: इसलिये परमेश्वर उसे वहाँ से निकाल लाता है। वह इसहाक के साथ भी ऐसा ही कर सकता था, परन्तु हमें उसके लिये कोई नियम नहीं बाँधना चाहिए। यदि कोई यहाँ यह उत्तर दे, क्या परमेश्वर इसहाक को भी ऐसी अजेय दृढ़ता नहीं दे सकता था कि वह वहाँ सोता ही नहीं, और क्या वह उसे भी लौटा नहीं ला सकता था? हाँ, भली भाँति: परन्तु क्या हम उसे इसके लिये बाँध सकते हैं? उचित है कि वह हम पर अपनी अनन्त बुद्धि के अनुसार शासन करे, न कि हमारे मूर्खतापूर्ण स्वप्नों और कल्पनाओं के अनुसार। इसलिये हम भली भाँति ध्यान रखें कि जब विश्वासियों की परीक्षाओं में ऐसा भेद होता है, तो इसका कारण यह है कि परमेश्वर जानता है कि हर एक क्या सह सकेगा। और हम सदा पौलुस के इस वचन की ओर लौटें: कि हम उसी पर आशा रखें; यदि वह हमें परखता है, यदि हमें युद्ध में रखता है, यदि हमें अनेक दुःखों से जाँचता है, तो भी वह इसका प्रबन्ध करेगा कि हम सर्वथा पराजित या परास्त न हों। देखो कि इसहाक को मिस्र जाने से क्यों रोका गया। अब उससे कहा गया है।
कि वह कनान देश में रहे, और परमेश्वर सदा उसके संग रहेगा, और वह उस शपथ को पूरी करेगा जो उसने उसके पिता अब्राहम से खाई थी। अर्थात् यह कि वह उसके वंश को आकाश के तारागण के समान बढ़ाएगा, और उसके वंश में पृथ्वी की सारी जातियाँ आशीष पाएँगी। यहाँ हम देखते हैं कि परमेश्वर ने इसहाक को मिस्र क्यों जाने नहीं दिया: अर्थात् इसलिये कि वह उस प्रतिज्ञा को न भूले जो उसे कनान देश के विषय में दी गई थी, और वह उसी में सन्तुष्ट रहे और पूर्णतया वहीं विश्राम करे। अब यदि इसहाक, जो विश्वास में ऐसा उत्तम था जैसा हम उसके सारे जीवन से देखते हैं, और जिसके विषय में पवित्र आत्मा ने ऐसी साक्षी दी है, उसे भी इस प्रकार लगाम में रखे जाने की ऐसी आवश्यकता थी, तो हमारा क्या होगा? इसलिये यदि हमारा प्रभु बहुधा हमें मानो जंजीर में जकड़े रखता है, और हमें इधर-उधर भटकने की छूट नहीं देता, तो हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए: क्योंकि वह जानता है कि इसमें हमारा पूरा विनाश होगा। क्योंकि हमारी स्मृति ऐसी फिसलनेवाली है, और हमें भटकाने के लिये कुछ भी आवश्यक नहीं, यहाँ तक कि हम फिर नहीं जानते कि हमारा सही मार्ग कौन सा है: इसी कारण हमारा प्रभु हमें उतनी बड़ी स्वतन्त्रता नहीं देता जितनी हम चाहते हैं। और जब कभी हम अपनी कल्पना की इच्छा से तंग सीमाओं में रखे जाएँ, तो जान लें कि यदि हमारे पिता इसहाक को इसकी ऐसी आवश्यकता थी, तो हमें, जो उसकी इस उत्तम सद्गुणता के निकट भी नहीं पहुँचे, और भी अधिक आवश्यकता है। अब इसी बीच हम इसहाक में वही देखते हैं जो अभी अब्राहम में बताया गया था। परमेश्वर उससे कहता है कि मैं तुझे वे सब देश दूँगा जो तू देखता है, और जिनमें से होकर तू चला है: हाँ, पर तो भी वह उससे कहता है: तू वहाँ परदेशी होकर रहेगा। दो बातों पर ध्यान दो, जो फिर भी विरोधी जान पड़ती हैं। क्योंकि यदि परमेश्वर उसे वह देश अधिकार में देगा, तो वह शीघ्रता क्यों नहीं करता? वह उसे ऐसे क्यों तरसने देता है?
परन्तु बीती हुई बात का प्रश्न नहीं, वरन् उसका है जो होनेवाला था। तू वहाँ रहेगा: हाँ, और जो शब्द मूसा काम में लाता है, उसका अर्थ परदेश में मानो बसना है, ऐसे व्यक्ति के समान जो सदा आगे चलनेवाला हो। देखो, इसहाक जिसका पृथ्वी पर अधिकार था: तो भी उसका एक पाँव भर भी भूमि पर न था, वरन् उसे वहाँ आज्ञा लेकर रहना था, और उन बहुत से कष्टों और परीक्षाओं के अधीन होना था जो उस पर टूटनेवाली थीं: और तो भी उसके पास एक पाँव भर भूमि न थी, सिवाय उस कब्रस्थान के जिसका उल्लेख पहले हो चुका है। संक्षेप में, हमें यहाँ से यह समझना है कि परमेश्वर चाहता था कि इसहाक पूर्णतया उसके वचन पर टिका रहे: जैसे वही वह नींव है जिस पर हमें अपने जीवन भर के सब दिन, वरन् मृत्यु में भी, निर्माण करना है। क्योंकि यदि हमारी सब इच्छाएँ पूरी हो जाएँ, तो हमें और विश्वास या आशा की क्या आवश्यकता रहेगी? इसलिये उचित है कि जिन आशीषों की हम परमेश्वर से बाट जोहते हैं वे हम से छिपी रहें, और तो भी हम उन्हें केवल विश्वास से देखें, और परमेश्वर का यह आदर करें कि जो कुछ उसने कहा है उस सब में उसे सच्चा गिनें: चाहे वह हमें अपनी प्रतिज्ञाओं का फल और सत्य न दिखाए, जिन्हें हम अपनी बुद्धि और शारीरिक अनुभूति के अनुसार नहीं समझ पाते: तो भी हमें कहना चाहिए, हमारे लिये यही बहुत है कि उसने यह कहा है, वह इसे पूरा करेगा। इसलिये जब हम अपना सारा सन्तोष केवल परमेश्वर के वचन से ही पा सकें, तब हम निश्चय जानें कि हमारे सब अंगीकार की, कि हम उस पर विश्वास करते हैं, यह सच्ची परख है: परन्तु यदि हम सदा कोई गिरवी और अपनी सब इच्छित वस्तुएँ चाहेंगे, तो निश्चय है कि परमेश्वर का वचन हमारी दृष्टि में मूल्यवान न रहेगा, और हम इस मनन में अपने को पर्याप्त रीति से नहीं लगा सकते।
और इसलिये जब कभी हम देखें कि परमेश्वर ने अपने दासों से बातें कीं, और उन्हें अपने वचन की पूर्ति और सिद्धि न दिखाई, तो जान लें कि यह हमें इसलिये सुनाया गया है कि हम सीखें कि जब वह हमें संशय में छोड़ दे, वरन् हम मूर्छित हो जाएँ, और जो वस्तु हमारे हाथ में होनी चाहिए थी उससे वंचित हो जाएँ, तब हम परमेश्वर को पुकारना सीखें: कि हम कहना सीखें: हे प्रभु, जब हमारे पास तेरी प्रतिज्ञा है, तो उसकी बाट जोहने में हम निराश न होंगे। जब परमेश्वर इसहाक से प्रतिज्ञा करता है कि वह उसके संग रहेगा, और वह उसे शेष सब कुछ देगा, तो यह भी हमें दिखाता है कि जितनी आशीषें हम चाह सकते हैं उनमें सबसे प्रधान यही है कि परमेश्वर हमारी चिन्ता करे, और हमारी आवश्यकताओं को स्मरण रखे, और जब हम उसे पुकारें तो हम उसे निकट पाएँ। क्योंकि जब तक वह हम पर दयालु न हो, तब तक चाहे वह हमारी माँगी हुई सब वस्तुएँ पूरी भरपूरी और बहुतायत से दे दे, तो भी वह कुछ नहीं होगा: परन्तु हमें इसी बिन्दु से आरम्भ करना चाहिए: अर्थात् हमें भली भाँति निश्चय होना चाहिए कि परमेश्वर हम से प्रेम रखता है, और हम पर कृपालु है। जब हम इस बात पर पहुँच जाएँ—कि हम अपने मन में ठान लें कि परमेश्वर सदा हम पर दयालु रहेगा, और आवश्यकता पड़ने पर सहायता करने को तत्पर रहेगा, और हमें कभी न त्यागेगा—तब हम शेष के लिये सहज ही प्रतीक्षा कर सकेंगे: परन्तु यदि हम यह न जानें कि वह हमारे संग है: अर्थात् वह हमें अपनी उपस्थिति का अनुभव कराएगा, और उसका अनुभव कराते हुए हमें उन संकटों से निकालेगा जिनमें हम हैं, और निकालते हुए जब हम गिर पड़ें तो हमें उठाएगा, हमें वहाँ ले चलेगा जहाँ कोई मार्ग नहीं है, और वहाँ हमें निकलने का द्वार और बचने का मार्ग देगा, जहाँ घबराहट के सिवाय कुछ नहीं है: यदि हम (मैं कहता हूँ) यहाँ तक नहीं पहुँचे, तो कोई सच्ची नींव नहीं है: परन्तु यदि हमने एक बार इसे पा लिया, तो हमें उसी पर ठहरना और शेष के लिये आशा रखनी चाहिए। क्योंकि यदि परमेश्वर हम से प्रेम रखता है, तो निश्चय है कि उसके पास हमारी सहायता करने और सब में और सब के द्वारा हमें सँभालने का सामर्थ्य है, और वह करेगा भी। और इसी कारण मूसा इसी बिन्दु से आरम्भ करता है।
"मैं तेरे संग रहूँगा।"
और उसके पश्चात् वह कहता है: कि वह उसके वंश को बढ़ाएगा, कि वह हमें आशीष देगा, और उसका वंश आकाश के तारागण के समान होगा। यह सच है कि जो उपकार परमेश्वर हम पर करेगा वे सदा हमारी इच्छाओं के अनुसार नहीं निकलेंगे, जैसा हमने बताया है। क्योंकि बहुधा हमें उनकी घटी होगी, ताकि हम प्रार्थना में और भी तत्पर हों: और वह हमें परखेगा भी, और दिखाएगा कि हमें उस पर वैसा भरोसा नहीं जैसा होना चाहिए: और हमारी कृतघ्नता बहुधा हमें उस से वंचित कर देती है जो परमेश्वर हमें और किसी प्रकार देने को तैयार था: क्योंकि हम सदा उसे ग्रहण करने के योग्य नहीं होते जो वह हमें देता है। उसका हाथ खुला है, परन्तु हमारा मुँह बन्द है: अर्थात् हम अविश्वास और अविश्वसनीयता में बन्द हैं। और इसलिये देखो कि हमें इतनी बार क्यों प्रतीक्षा करनी पड़ती है: परन्तु इतना अवश्य है कि यदि हम इस बात में दृढ़ निश्चय रखें कि वह हमारे संग है, और हम उस से उस वस्तु में आशीष पाते हैं जिसे वह जानता है कि हमारे लिये हितकर है, तो हमें किसी बात की घटी न होगी।
इस प्रतिज्ञा के विषय में: कि पृथ्वी की सारी जातियाँ इसहाक के वंश में आशीष पाएँगी, यह उसके लिये विशेष थी, जैसे अब्राहम के लिये थी: और यह हमारे प्रभु यीशु मसीह से सम्बन्ध रखती है, जैसा समझाया जा चुका है। क्योंकि अवश्य था कि यीशु मसीह इस आशीष का सोता हो, जो अब्राहम के सारे वंश पर बह निकले। यह सच है कि उसके वंशज विश्वासी आशीषित और इस प्रतिज्ञा के भागी थे: परन्तु यह हमारे प्रभु यीशु मसीह की सामर्थ्य से था। इसलिये यदि वह अब्राहम के वंश से अलग कर दिया जाता, तो निश्चय है कि वह बाँझ और सूखा रह जाता, और उसमें आशीष की एक बूँद भी न होती। परन्तु आज, क्योंकि परमेश्वर ने अपनी अनन्त भलाई से यह चाहा कि उसका एकलौता पुत्र हमारा हो, हम अब्राहम की सच्ची स्वाभाविक सन्तान के साथ जोड़े गए: और यद्यपि हम पृथ्वी की उन जातियों में से थे जो तब परमेश्वर की कलीसिया से भटक गई थीं और उससे सर्वथा दूर जा चुकी थीं, तो भी आज हम उनके समान ही आशीषित हैं। क्योंकि यदि उससे केवल यह कहा गया होता कि मैं तेरे वंश को आशीष दूँगा, और परमेश्वर ने कुछ और न जोड़ा होता, तो यह आज हमारे लिये बहुत थोड़ी सान्त्वना होती: परन्तु जब वह कहता है: कि पृथ्वी की सारी जातियाँ अब्राहम के वंश में आशीष पाएँगी, तो हम उस गिनती में हैं।
इसलिये ध्यान दो कि हमें विशेष रूप से किस बात में आनन्दित होना चाहिए, यह जानकर कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के हम पर प्रकट होने के बाद, यह प्रतिज्ञा हम पर लागू होनी है। यह सच है कि पवित्र शास्त्र में बहुधा कहा गया है कि मनुष्य मनुष्यों के द्वारा आशीष पाएँगे, जैसे उदाहरणार्थ, जब वे किसी को अपने सामने नमूने और आदर्श के रूप में रखेंगे: और मनुष्य आशीष पाने की इच्छा से कहेंगे, "हे परमेश्वर, तू मेरे साथ वैसा ही कर जैसा तूने इस मनुष्य के साथ, या उस मनुष्य के साथ किया है": परन्तु पौलुस की व्याख्या हमें दिखाती है कि जो बात अब्राहम से और इसहाक से भी कही गई, वह केवल इसी अर्थ में समझने की नहीं थी: परन्तु और स्थान में कहा गया है कि विश्वासी परमेश्वर में आशीष पाएँगे। अब यह कहा जाता है कि वे अब्राहम के वंश में आशीष पाएँगे। परन्तु हमें अपनी सारी भलाई और उद्धार को उसी एक में खोजना है जो उसका सोता है, जैसा छत्तीसवें भजन में कहा गया है। परन्तु क्योंकि इतनी बड़ी दूरी है, और हम इतनी ऊँचाई तक उड़ नहीं सकते, हमारे उद्धारकर्ता मसीह ने हमारे निकट आकर अपने को पहुँचाया, और हमारे पास उसमें जीवन का जल है: कुछ घटी नहीं, केवल इतना कि हम आकर पीएँ, जैसा वह कहता है: "मेरे पास आओ: और जो कोई प्यासा हो वह मेरे पास आए। क्योंकि मेरे पास जीवन का जल है, और जो कोई उसे पीएगा, उसकी प्यास ही नहीं बुझेगी, वरन् जीवन के जल की नदियाँ उसके पेट में से बह निकलेंगी, हाँ, जीवन के जल के सोते, कि वह उसमें से औरों को भी दे सके।"
इसलिये जब हम देखते हैं कि परमेश्वर अपनी सब आशीषें अपने एकलौते पुत्र के व्यक्तित्व में हमारे साथ सहज रीति से बाँटना चाहता है, तो यदि हम इस आशीष का भाग लेने न आएँ जो हमारे सामने रखी गई है, तो हमारे लिये उतना ही कम बहाना रह जाता है। इसके अतिरिक्त, यह नहीं कहा गया कि पृथ्वी की सारी जातियाँ आशीष पाएँगी, वरन् यह कहा गया है कि वे आशीषित हैं: इसलिये नहीं कि हम स्वयं, या अपनी सामर्थ्य और परिश्रम से इस आशीष को पा सकते हैं; परन्तु उचित है कि हर एक विश्वास के द्वारा यीशु मसीह में आशीष पाए। क्योंकि जैसे वह हमारे सामने सुसमाचार के द्वारा प्रस्तुत किया गया है, वैसे ही हमें उसे ग्रहण करना है: और यदि हम अविश्वासी बने रहते हैं, तो इसलिये कि हम उसकी सब कृपाओं के विरुद्ध मानो द्वार बन्द कर देते हैं। जब यही बात है कि परमेश्वर ने हमारे उद्धार से सम्बन्ध रखनेवाली सब बातें इतने पहले से तैयार कर रखी हैं, और समय की पूर्णता में (जैसा पौलुस कहता है) यीशु मसीह प्रकट हुआ, और उसने भली भाँति साक्षी दी कि वही वह आशीषित वंश है जिसमें हमें सब उपकार ढूँढ़ने हैं: तो हम भी वैसी ही विश्वास की तत्परता से और ऐसी उत्सुकता से आएँ कि हम अपनी ही दुष्टता और अविश्वास के कारण बाहर न रह जाएँ, ताकि परमेश्वर हम में वह पूरा न करे जो यहाँ कहा गया है, कि हम उसकी प्रतिज्ञा की पुष्टि पाने के लिये उसके पास न जाएँ: हम (मैं कहता हूँ) चौकस रहें कि कोई अपने ही दोष और पाप के कारण अपने लिये बाधा न बने। अन्त में कहा गया है:
"कि परमेश्वर इसहाक के साथ अपनी शपथ को पूरी करेगा, क्योंकि अब्राहम ने परमेश्वर की बात मानी थी, और उसके आदेशों, आज्ञाओं, विधियों और नियमों का पालन किया था।"
यहाँ शपथ फिर दोहराई गई है, हम सब की और भी बड़ी और निश्चित पुष्टि के लिये: क्योंकि हम परमेश्वर पर विश्वास कर ही नहीं सकते जब तक हम अविश्वास से, जिसकी ओर हम स्वभाव से झुके हैं, दृढ़ता से न लड़ें: और क्योंकि हम अब भी इतने चंचल हैं कि दया आती है। इसी कारण परमेश्वर हमें निश्चय दिलाने के लिये और भी शपथ खाता है। परन्तु यह सच है (जैसा पहले बताया जा चुका है) कि हमारे लिये यह बड़ी निन्दा की बात है कि हम परमेश्वर को शपथ खाने पर विवश करें। क्योंकि यदि हम किसी नश्वर मनुष्य के कहे हुए सीधे वचन से सन्तुष्ट न हों, यदि हम उसे सच्चा मनुष्य न गिनें, और इस बात से सन्तुष्ट न हों कि उसने हम से प्रतिज्ञा की है, तो हम उसका आदर नहीं करते: परन्तु जब हम कहते हैं, "मैं चाहता हूँ कि तू इस विषय में मेरे सामने शपथ खा।" देखो, यह बड़े अविश्वास का चिह्न है, और मनुष्यों के बीच भली भाँति सहा न जाएगा। परन्तु यदि हम फिर भी परमेश्वर का ऐसा अनादर करें कि उसके वचन के सिवाय उससे शपथ भी माँगें, तो क्या अवश्य नहीं कि हम बहुत ही नीच हैं? परन्तु यदि फिर भी परमेश्वर इस विषय में हम पर तरस खाए, यद्यपि यह असह्य दोष है कि हम चाहें कि वह उससे आगे शपथ खाए जो उसने कहा है: तो भी इसमें वह अपने को हमारे अनुकूल बना लेता है। और हम इससे अधिक क्या माँग सकते हैं?
और अब क्या बहाना रहेगा, जब हम फिर भी चाहते हैं कि उसकी प्रतिज्ञाएँ हमें शपथ से निश्चित की जाएँ? इसलिये शपथ का यह शब्द हमारे हृदय को बेधना चाहिए, जब कभी वह हमारे सामने आए, वरन् तब भी जब परमेश्वर की सद्भावना, और उस विशेष प्रेम का जो वह हम से रखता है, हमें निश्चय दिलाने का प्रश्न हो। परन्तु आओ, हम उस बिन्दु पर आएँ जहाँ वह कहता है:
"कि यह इसलिये हुआ कि अब्राहम ने परमेश्वर की बात मानी।"
यहाँ ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर ने अपनी प्रतिज्ञाओं की पूर्ति को अब्राहम के सद्गुण और उसकी योग्यताओं का ठहराया: परन्तु हम पहले ही बता चुके हैं कि ऐसा नहीं हो सकता था, और न ऐसा समझना चाहिए, मानो वह आज्ञाकारिता जो अब्राहम ने परमेश्वर की की, इस बात का कारण हुई कि परमेश्वर उसके प्रति बाध्य होकर वह पूरा करे जो उसने कहा था: क्योंकि हम पहले ही दिखा चुके हैं कि यह परमेश्वर में सर्वथा स्वतन्त्र था। जब अब्राहम उस मूर्तिपूजा से निकाला गया जिसमें वह था (जैसा यहोशू में बताया गया है:) तो उसे ऐसा करने को किस बात ने प्रेरित किया?
फिर जब परमेश्वर ने अब्राहम को अन्त तक सँभाले रखा, तो यह इसलिये नहीं था कि उसने उसकी आज्ञा मानी: क्योंकि इसके विपरीत, उसने बहुत पहले उससे कह दिया था, "मैं तुझे आशीष दूँगा, मैं तेरे संग रहूँगा, मैं तेरा बहुत बड़ा प्रतिफल हूँ: तेरा वंश आकाश के तारागण के समान बढ़ेगा, और उसमें पृथ्वी की सारी जातियाँ आशीष पाएँगी।" यह सब अब्राहम से इसहाक के जन्म से पहले कहा गया: और जब अब्राहम अपने पुत्र इसहाक की बलि चढ़ाने पर था, तब उससे कहा गया: "इस कारण कि तूने अपने एकलौते पुत्र को भी नहीं रख छोड़ा, वरन् मेरे प्रेम के लिये उसकी बलि चढ़ाने को तैयार था, देख, मैं तुझे आशीष दूँगा," और यह उससे बहुत पहले कहा जा चुका था। इसलिये हम देखते हैं कि जो परमेश्वर में स्वतन्त्र है, और जो वह हमें अपनी केवल उदारता से देता है, उसे वह उस सेवा का फल ठहराता है जो हम उसकी करते हैं: इसलिये नहीं कि हमें घमण्ड का कोई कारण मिले, परन्तु केवल इसलिये कि हमें और भी प्रेरित और उभारे कि हम आनन्द और साहस के साथ उसकी सेवा करें। इसलिये परमेश्वर का उद्देश्य देखो: वह इसलिये नहीं कि वह अपने को उस स्तुति से वंचित करे जो उसी की है, कि मनुष्य उसे हड़प लें: परन्तु इसलिये कि वह जानता है कि उन्हें एड़ की आवश्यकता है, और उसकी सेवा करने के लिये उन्हें सहारे और सहायताएँ चाहिए, क्योंकि नहीं तो हम ठण्डे और मन्द रहेंगे। इसलिये जो यहाँ योग्यताएँ ढूँढ़ते हैं, और परमेश्वर की भलाई की केवल स्तुति को धुँधला करके मनुष्यों को ऊँचा उठाना चाहते हैं, मानो वे अपने उद्धार के आप कारण हों, निश्चय है कि वे सब कुछ उलट देंगे, वरन् अपने बस भर परमेश्वर के उद्देश्य को पलट देंगे।
इसी प्रकार हम सीखें कि जब कहा गया है कि परमेश्वर इसहाक के साथ अपनी वाचा स्थिर करेगा क्योंकि अब्राहम ने उसकी बात मानी थी, तो यह कारण बताने के लिये नहीं था: वरन् केवल यह दिखाने के लिये था कि अब्राहम ने जो सेवा उसकी की वह उसे ग्रहण योग्य थी, ताकि इसहाक उसका अनुसरण करे और अपने को उसके अनुरूप बनाए। इसलिये इससे हमें अपने को उभारना चाहिए, जब कभी हम अपने में कोई मन्दता अनुभव करें, और जब हम परमेश्वर की आज्ञाकारिता में अपने को पूरी रीति से लगाने के लिये उतने तत्पर न हों जितना उचित है: और हम सोचें, "क्या? कहा गया है कि जब हम उसकी आज्ञा मानेंगे, तो वह इसे सुखद सुगन्धवाले बलिदान के रूप में ग्रहण करेगा: और तो भी जो कुछ हम करते हैं वह कुछ नहीं, हम में कोई सामर्थ्य नहीं: तो भी यदि परमेश्वर हमारी किसी योग्यता के बिना हमें ऐसा आदर देना चाहे, तो क्या हम आलसी बने रहें, और अपनी सारी शक्ति उसकी सेवा में पूरी रीति से न लगाएँ, विशेषकर उस अनुग्रह के अनुसार जो उसने हमें दिया है, और अपने बल के अनुसार? और वह भी उसके साथ किसी प्रकार की शर्त या अनुबन्ध किए बिना?
इसलिये देखो कि विश्वासियों को कैसे उभारा जाना चाहिए: और यह भी हमें सिखाने के लिये है कि हम सदा भय और सावधानी से चलते रहें, जब हमारा प्रभु हमें दिखाता है कि जिन्हें उसने बुलाया है वे बहुधा अपने को अपने बुलाए जाने के अयोग्य ठहराते और दिखाते हैं। इसलिये कि हम उसकी परीक्षा न करें, और उसकी सिखाई हुई बात ग्रहण करने को तैयार रहें, देखो कि यह क्यों कहा गया है कि वह हमारी सेवाओं का प्रतिफल देता है: इसलिये नहीं कि हम किसी प्रतिफल के योग्य हैं। क्योंकि (जैसा मैं कह चुका हूँ) हमें यहाँ इस पर तर्क नहीं करना चाहिए कि हम क्या कर सकते हैं: क्योंकि हम कुछ भी नहीं कर सकते: और विशेष करके जो हमने परमेश्वर के अनुग्रह से किया है वह किसी प्रतिफल के योग्य नहीं: क्योंकि परमेश्वर उसे उचित रीति से दोषी ठहरा सकता है। परन्तु बात यह है कि परमेश्वर जो हम करते हैं उसे अपनी केवल उदारता से ग्रहण करता है, ताकि हमें और साहसी बनाए। और हर एक को इसे अपने लाभ के लिये काम में लाना चाहिए, जब हम अनुभव करें कि हम अपनी लापरवाही और आलस्य के कारण भला करने में धीमे हैं। देखो, संक्षेप में हमें यहाँ यह सीखना है।
अब जब कहा गया है कि अब्राहम ने परमेश्वर की बात मानी: तो यह हमें भली भाँति जीने का सच्चा नियम दिखाने के लिये है, ताकि हर एक अपने लिये अलग-अलग भक्ति न गढ़े, जैसा हम करने के आदी हैं: क्योंकि जब मनुष्य परमेश्वर की सेवा करना चाहते हैं, तो क्या करते हैं? वे अपनी ही युक्ति के अनुसार जीने की स्वतन्त्रता ले लेते हैं, और जो कुछ परमेश्वर आज्ञा देता है उसे तुच्छ जानते हैं। पोपतन्त्र में मनुष्य जिसे परमेश्वर की सेवा कहते हैं वह क्या है? वही जो मनुष्यों ने अपने मूर्ख मस्तिष्क से गढ़ लिया है। क्योंकि जब मनुष्यों ने अपनी सारी बाज़ीगरियाँ, जो वे वहाँ खेलते हैं, परिश्रम से इकट्ठी कर ली हों, तब यदि कहा जाए कि परमेश्वर की भली भाँति सेवा और महिमा हुई, और तो भी जो कुछ परमेश्वर ने आज्ञा दी है उसमें से वे कुछ नहीं करते, और उसे तुच्छ जानते हैं: तो वही होता है जिसका वह स्वयं शोक करता है: अर्थात् यह कि मनुष्य अपनी रीतियों के लिये उसे ठुकरा देते हैं जो उनके लिये ठहराया गया था।
इसलिये जब ऐसा है कि हम अपनी ही मूर्खतापूर्ण कल्पनाओं को आगे बढ़ाने की ओर इतने झुके हुए हैं, तो हम सीखें कि जब पवित्र शास्त्र हम से भली भाँति और पवित्रता से जीने की बात करता है, जब वह उस सिद्धता की बात करता है जिसे परमेश्वर मानता है, तो वह यह है कि उसकी बात मानी जाए: जैसा वह अपने भविष्यद्वक्ता के द्वारा भी हमें दिखाता है, "क्या मैंने तुम से कोई बलिदान चढ़ाने को कहा?"
अब यह बहुत निश्चित है कि परमेश्वर ने उसे माँगा था? तो फिर यिर्मयाह ऐसा क्यों कहता है? यह हमें दिखाने के लिये है कि परमेश्वर वहीं नहीं ठहरता। तो कहाँ? वह कहता है कि हम उसकी बात मानें। इसलिये प्रधान बात देखो, और जहाँ से हमें आरम्भ करना है, और जो अन्त भी है जिसके लिये हमें यत्न और परिश्रम करना है: अर्थात् यह कि परमेश्वर को हम पर शासन करने का अधिकार है, और हम उसकी प्रजा हैं। परन्तु तो भी यह हमें अनोखा जान पड़ेगा कि यहाँ कहा गया है कि अब्राहम ने यहोवा की आज्ञाओं, विधियों, आदेशों और नियमों का पालन किया। और तो भी उसके पास सारी व्यवस्था में से लिखित एक शब्द भी न था। क्योंकि हम जानते हैं कि अब्राहम के बुलाए जाने और व्यवस्था के बीच कितना समय था: अर्थात् चार सौ तीस वर्ष। तो फिर अब परमेश्वर क्यों कहता है कि अब्राहम ने उसकी आज्ञाओं, विधियों, आदेशों और नियमों का पालन किया? यह वही है जो हमने पहले अठारहवें अध्याय में देखा: क्योंकि यद्यपि उसके पास अभी कुछ लिखित न था, तो भी अब्राहम उससे अनजान न था जो परमेश्वर आगे चलकर अपने लोगों को सिखानेवाला था। क्योंकि अपने लोगों पर शासन करने के उसके दो प्रकार थे: परन्तु यह इस कारण नहीं था कि वह अपने स्वयं के विषय में परिवर्तनशील है। इसलिये परमेश्वर के पास विश्वासियों को सिखाने का सदा एक ही और वैसा ही मार्ग न था: परन्तु जैसा भी हो, नियम तो एक ही था, चाहे वह लिखित हो, या उन पर प्रेरित किया गया हो जिन्हें उसने अपने लिये रख छोड़ा था।
इसलिये, यद्यपि अब्राहम के पास अभी लिखित व्यवस्था न थी, तो भी उसे इतनी शिक्षा मिली थी कि वह जान सके कि उसे परमेश्वर की सेवा कैसे करनी चाहिए। इसलिये इस स्थान से हमें यही सीखना चाहिए।
परन्तु जैसा भी हो, परमेश्वर इसी बीच दिखाता है कि यदि हम उसकी आज्ञा मानने और उसके अधीन होने को तैयार हों, तो उसकी ओर से वह हमें कभी न छोड़ेगा कि हमें वह मार्ग दिखाए जिसमें हमें चलना चाहिए, और उसमें चलते हुए हम धोखा न खाएँगे। परन्तु यदि पहले, जब कोई लिखित शास्त्र न था, तब भी अब्राहम के पास विधियाँ, आज्ञाएँ, नियम और आदेश थे: तो आज और भी दृढ़ कारण से, जब परमेश्वर ने मूसा के द्वारा अपने को इतने सहज रूप से प्रकट किया है, और उसके साथ भविष्यद्वक्ताओं को भी जोड़ा है, ताकि वहाँ व्यवस्था की और सहज समझ हो, और जब उसने सुसमाचार में इतना स्पष्ट बोला है, तो क्या हम सन्देह करें कि वह भले गुरु का कर्तव्य नहीं निभाता, कि हमें वह सब दिखाए जो भला, उचित और न्यायसंगत है? परन्तु क्या कहें? संसार की कृतघ्नता ऐसी है कि वह उसके अधीन न होगा, न उसके अधीन व्यवस्था में लाया जाएगा: और यह तो ऐसा है मानो मनुष्य उस से अधिक बुद्धिमान होना चाहते हों जितना उन्हें अनुमत है, और अपनी ही एक बुद्धि चाहते हों, मानो कभी कहा ही न गया हो: "उस अद्वैत बुद्धिमान परमेश्वर की महिमा और आदर हो।" जब पौलुस कहता है कि परमेश्वर ही अकेला बुद्धिमान है, तो यह केवल उसके लिये नहीं, वरन् इसलिये था कि हम सारी बुद्धि उसी में ढूँढ़ें। क्योंकि जब हम उसे उस एकमात्र नियम के रूप में ग्रहण नहीं करते जो उसने हमें दिया है, तो यह ऐसा है मानो हम कहें कि परमेश्वर वह सब नहीं जानता था जो हमारे लिये आवश्यक था, अवश्य है कि हम अपने मस्तिष्क से कुछ और गढ़ें: और कहें कि यह अच्छा होगा। और यह कैसी निन्दा है! हाय, जब हम इस रीति से परमेश्वर की सेवा करते हैं, तो यह ऐसा है जैसा कोई कहे कि परमेश्वर के मुँह पर थूकना। इसलिये ध्यान दें कि जब मूसा परमेश्वर की वाणी की बात कहने के बाद उसकी आज्ञाएँ, उसकी विधियाँ, और उसके आदेश जोड़ता है, तो यह दिखाने के लिये है कि परमेश्वर किसी बात में उन सब को निराश न करेगा जो उसके शिष्य होंगे, और उसके द्वारा व्यवस्था में आकर उसकी वाणी सुनेंगे। और वास्तव में यह केवल इसी स्थान में नहीं, न ही उसमें जिसे हम अब उद्धृत करने जा रहे हैं: परन्तु मानो सर्वत्र, जहाँ हमारा प्रभु अपनी व्यवस्था हमें सुझाता है, और दिखाता है कि उसमें वह सब है जो मनुष्यों को उद्धार का मार्ग ठीक-ठीक दिखाने के लिये आवश्यक है। और इस स्थान में छुए गए शब्दों के विषय में इतना ही। इसलिये जब हम वैसे चलना चाहें जैसा हमें उचित है, तो ध्यान दें कि केवल एक ही न्यायी है, जिसे हमें लेखा देना है। परन्तु यह न्यायी क्या माँगता है? यह नहीं कि हर एक अपनी ही कल्पना से चलाया जाए, या हमारी भली भक्तियाँ उसके वचन के स्थान पर रखी जाएँ: परन्तु यह कि हम अपने परमेश्वर की वाणी सुनें, और फिर सीखने को तत्पर हों, ताकि अपने को उसके अधीन व्यवस्था में लाएँ: और जैसे मनुष्य कल्पना करते हैं कि उन्होंने अपने सद्गुणों और योग्यताओं से परमेश्वर को अपना ऋणी बनाकर अद्भुत कार्य कर दिए हैं, उसकी जगह हम इसी से सन्तुष्ट रहें कि उसके और उसके स्वर्गदूतों के सामने ग्रहणयोग्य ठहरें, चाहे संसार इससे सन्तुष्ट न हो।
परन्तु अब आओ, हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने गिर पड़ें, अपने दोषों को मानते हुए, उससे प्रार्थना करते हुए कि वह हमें मर्म तक छुए, कि हम और भी अधिक मन फिराव और दीनता में लाए जाएँ, कि हम सदा उसके सामने विलाप करें, और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें हमारे सब पापों से शुद्ध करे, और हमें ऐसी खराई से चलाए कि हमारा जीवन पूरी रीति से उसकी धार्मिकता के अनुरूप ढल जाए, और इस प्रकार उसके नाम की महिमा हो: जब सारा शासन उसी का होगा, और हम वैसे चलेंगे जैसा उसने अपने वचन से हमें सिखाया है, बिना अपनी ओर से उसमें कुछ जोड़े: और वह हमारी निर्बलताओं में हमें ऐसा सँभाले कि हम उसके पवित्र बुलावे में सदा बने रहना न छोड़ें, चाहे हम उतनी तेज़ी से न चलें, और जितने उत्साह और उमंग से दौड़ना चाहिए उतना न दौड़ें: और इसी बीच (जैसा भी हो) हम उसके सामर्थ्य से सुसज्जित हों कि सब परीक्षाओं से लड़ें, और भले मार्ग से कभी न हटें, चाहे हमारे पास इसके बहुत से कारण हों। और वह यह कृपा न केवल हम पर, वरन् पृथ्वी के सब लोगों और जातियों पर भी करे, इत्यादि।
