अध्याय 3

याकूब और एसाव के विषय में दूसरा उपदेश — उत्पत्ति 25:20-22

Sermons Concerning Jacob and Esau · John Calvin

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याकूब और एसाव के विषय में दूसरा उपदेश — उत्पत्ति 25:20-22

दूसरा उपदेश, उत्पत्ति 25।

20 सो उसकी पत्नी रिबका गर्भवती हुई।

21 और जब बालक उसके गर्भ में आपस में लड़ने लगे, तब उसने कहा, यदि ऐसा ही है तो यह किसलिए है? और वह प्रभु से परामर्श लेने गई।

22 तब प्रभु ने उससे कहा: तेरे गर्भ में दो जातियाँ हैं, और तेरी कोख से उत्पन्न होकर दो राज्य अलग-अलग होंगे; उनमें से एक दूसरे से सामर्थी होगा, और बड़ा छोटे की सेवा करेगा।

कल हमने देखा कि परमेश्वर ने इसहाक को कोई सन्तान देने से पहले, अर्थात् बीस वर्ष तक, उसके विश्वास को किस प्रकार परखा। अब इसलिए कि हम जानें कि उसने परमेश्वर से व्यर्थ प्रार्थना नहीं की, क्योंकि परमेश्वर ने उसकी विनती सुनी, जिसका उद्देश्य यह था कि परमेश्वर उस वंश के द्वारा जिसकी प्रतिज्ञा उसने उससे की थी, जगत के उद्धारकर्ता को भेजे।

अब देखो, इसहाक के आनन्दित होने का कारण यह था, और वह भी साधारण रीति से नहीं। क्योंकि उसकी पत्नी बहुत समय तक बाँझ रही थी, और उसने देखा कि वह गर्भवती हुई है, और परमेश्वर ने प्रकट कर दिया कि वह अपनी प्रतिज्ञा को भूला नहीं है, और उसने जान लिया कि यह उसे इसीलिए दिया गया है कि उसने परमेश्वर की शरण ली थी।

परन्तु एक नई परीक्षा देखो, जो सहने में उससे कहीं अधिक कठिन और कष्टदायक थी, जितना कि यदि उसकी पत्नी बाँझ ही रहती। क्योंकि उसने दो बालकों को गर्भ में धारण किया, जो उसके पेट में आपस में हाथापाई और संघर्ष करते थे। यह बहुत ही भयानक बात थी, और मानो प्रकृति के विरुद्ध। और इसी कारण उसने यह भी कहा कि उसके लिए मर जाना ही अच्छा होता; और उसने ऐसा किसी अधीरता के कारण नहीं कहा, मानो भयंकर पीड़ाओं और दुःखों ने उसे इसके लिए विवश कर दिया हो; परन्तु उसकी दृष्टि और ऊपर उठी हुई थी।

क्योंकि वह अपने गर्भ में जगत के उद्धार की सारी आशा लिए हुए थी। परन्तु इसी बीच वह ऐसा संघर्ष देखती है कि लगता है मानो परमेश्वर सब कुछ उलट-पुलट कर रहा है, और मानो उसमें वह अपने क्रोध का चिह्न दिखाना चाहता है। संक्षेप में, यह बात अपने आप में घृणित है कि एक स्त्री के गर्भ में ऐसी लड़ाई और युद्ध हो; और यह स्वाभाविक रीति से नहीं हुआ, परन्तु परमेश्वर इसके द्वारा (जैसा कि हम देख चुके हैं) इसहाक और उसे यह दिखाना चाहता था कि जो कोई उनके वंश से शरीर के अनुसार उत्पन्न होंगे, वे सब इस कारण विश्वासियों की गिनती में नहीं गिने जाएँगे; वरन उनके बीच प्राणघातक युद्ध होगा।

अब जब उसने (अपने गर्भ में जगत का उद्धार पाने के स्थान पर) परमेश्वर के क्रोध का ऐसा चिह्न, और कलीसिया के प्राणघातक शत्रुओं का मानो शैतानी युद्ध देखा, तब वह सब कुछ समझ न सकी; परन्तु उसने जान लिया कि यदि उसने ऐसे संघर्ष के लिए गर्भ धारण किया है, तो यह ऐसा है मानो परमेश्वर उसके विरुद्ध हो, और बड़ी सेना लेकर आया हो, और कह रहा हो: तू मेरे लिए एक घृणित प्राणी है, और मैंने तुझे त्याग दिया और तुझे ठुकरा दिया है। जब वह इन सब बातों की कल्पना करती है, तब उसकी दशा कैसी होगी?

और इसलिए यदि ऐसी वेदना में उसने जीने की अपेक्षा मरना चुन लिया होता, तो इसे अनोखा नहीं समझना चाहिए, क्योंकि ऐसी राक्षसी बात देखना, जो प्रकृति के क्रम के सर्वथा विपरीत थी, उसके लिए असह्य था। तौभी कहा गया है कि इतने बड़े शोक में भी वह परमेश्वर की शरण लेने से पीछे नहीं हटी। और सचमुच उसे ढाढ़स देनेवाला उत्तर मिला: ऐसा नहीं कि उसमें कुछ दुःख मिला हुआ न था, परन्तु फिर भी परमेश्वर ने उस आवेग को, जो उसके लिए इतना भारी था, हलका किया, और कहा कि उसके गर्भ में दो जातियाँ हैं: मानो वह यह कह रहा हो कि यह केवल उन दो बालकों के कारण नहीं था जिन्हें वह उठाए हुए थी, वरन इसका आगे का एक उद्देश्य था; अर्थात् यह कि वे एक दूसरे से अलग किए जाएँगे।

और यद्यपि दोनों अब्राहम के पुत्र थे, और अब्राहम से कहा गया था कि उसके वंश में पृथ्वी की सारी जातियाँ आशीष पाएँगी, तौभी अवश्य था कि इसहाक से ऐसे लोग निकलें जिन्हें परमेश्वर अपनी कलीसिया से काट डालेगा, जो ठुकराए जाएँगे, और इस प्रकार परमेश्वर की कलीसिया के शत्रु ठहरेंगे। अब यह सच है कि इससे इसहाक और रिबका दोनों के हृदय में प्राणघातक शोक उत्पन्न हो सकता था; परन्तु साथ ही वे देखते हैं कि परमेश्वर की भलाई कदापि बुझी नहीं, और परमेश्वर ने जो एक बार कह दिया था उसमें वह विश्वासयोग्य ठहरा। क्योंकि उसने कहा था।

बड़ा छोटे की सेवा करेगा।

इससे रिबका ने जान लिया कि चाहे जैसे भी हो, उसी से वह धन्य वंश उत्पन्न होगा जिसकी प्रतिज्ञा की गई थी। यहाँ जो कुछ दोहराया गया है उसका सारांश यही है। परन्तु जब तक इसे विशेष रूप से स्पष्ट न किया जाए, सब कुछ अन्धकारमय रहेगा। इसलिए यहाँ यह ध्यान दें कि जो कलीसिया में बुलाए जाते हैं, वे सदा वहाँ बने नहीं रहते, जैसा कि हम इश्माएल में एक उल्लेखनीय उदाहरण देख चुके हैं: वह अब्राहम का ज्येष्ठ पुत्र था, तौभी उसे घराने से निकाल दिया गया, और कहा गया कि वह वारिस न होगा। और यह संसार के धन के कारण नहीं था, न उन सम्पत्तियों के कारण जो अब्राहम के पास थीं। क्योंकि वह पशुओं, सोने और चाँदी में धनी था: परन्तु उसके पास भूमि का एक पग भी न था। तो फिर इस विरासत का सम्बन्ध किससे था? आत्मिक प्रतिज्ञा से ही; अर्थात् परमेश्वर ने अब्राहम के वंश को चुन लिया था, जिसका अर्थ यह था कि यह एक ऐसी प्रजा होगी जो मेरी सेवा के लिए समर्पित होगी: और जो उनसे उत्पन्न होंगे, उन्हें मैं अपने बच्चों के रूप में ग्रहण और स्वीकार करूँगा, ताकि मैं उन्हें अनन्त जीवन में इकट्ठा करूँ। देखो, इश्माएल अपने ज्येष्ठाधिकार समेत जीवन की आशा से कैसे निकाल दिया गया; और वह केवल इसहाक के लिए रह गई। और यही बात एसाव और याकूब के विषय में भी है: क्योंकि ये दोनों अब्राहम की सन्तान थे, वरन जुड़वाँ थे, उनकी माता ने उन्हें एक ही गर्भ में रखा; तौभी एक ग्रहण किया गया और दूसरा ठुकराया गया: एक चुना गया और दूसरा अस्वीकार किया गया।

इसलिए हम देखते हैं कि जिन्हें कुछ समय के लिए कलीसिया में स्थान मिलता है, और जो विश्वासियों और परमेश्वर की सन्तानों की उपाधि धारण करते हैं, वे मनुष्यों के सामने तो वैसे गिने जा सकते हैं, परन्तु जीवन की पुस्तक में उनके नाम नहीं लिखे हैं: परमेश्वर उन्हें नहीं जानता, और उन्हें अपना नहीं कहता। इससे हमें चेतावनी मिलती है कि जब परमेश्वर हम पर यह अनुग्रह करे कि हमें अपनी कलीसिया में ले आए, तब हम घमण्ड से अपनी बड़ाई न करें, और न मूर्खतापूर्ण अभिमान में मतवाले हो जाएँ: परन्तु पवित्रता में चलें, और अपने चुनाव को निश्चित करने का यत्न करें, और पवित्र आत्मा के द्वारा अपने हृदयों में उसकी गवाही पाएँ, और केवल उस बाहरी उपाधि और दिखावे पर भरोसा न करें जो हम संसार के सामने कर सकते हैं: देखो, यहाँ हमें क्या ध्यान में रखना है। और इसके अतिरिक्त हमें एक कहीं बड़ी बात सिखाई जाती है: और वह पहली बात यह है कि यद्यपि परमेश्वर ने अब्राहम के साथ अपनी वाचा बाँधी थी, तौभी वह यह प्रकट करना चाहता था कि अपना अनुग्रह प्रस्तावित कर देना ही सब कुछ नहीं था: परन्तु उचित था कि वह अपनी स्वतन्त्रता के अनुसार जिन्हें अच्छा समझे उन्हें चुने, और शेष अपनी शापित दशा में पड़े रहें। और इसीलिए सन्त पौलुस इस स्थान को परमेश्वर के गुप्त चुनाव पर लागू करने के लिए उद्धृत करता है, जिसके द्वारा उसने जगत की उत्पत्ति से पहले उन्हें चुना जो उसे अच्छे लगे। अब यह बहुत ऊँची और गहरी बात है, परन्तु जब इसे आगे और स्पष्ट किया जाएगा, तो हर एक इससे लाभ उठा सकेगा, यदि हम इस पर ध्यान दें। और शेष के विषय में, जो कुछ पवित्रशास्त्र हमें दिखाता है उसे संयम के साथ ग्रहण करें, और जितना उचित है उससे अधिक बुद्धिमान होने की इच्छा न करें: परन्तु जो कुछ परमेश्वर हमसे कहे उसी में सन्तोष करें, और इसके अतिरिक्त नम्र बनें, कि न उसके विरुद्ध उत्तर दें, और न अपनी कल्पनाएँ उसके सामने रखें, मानो हम परमेश्वर से वाद-विवाद करने चले हों: परन्तु यह स्वीकार करते हुए कि उसके न्याय अथाह हैं, उसमें उससे आगे खोज न करें जितना हमें अनुमति है। अब उचित है कि हम इन बातों को इस प्रकार सँभालें कि जो पहले दृष्टि में अन्धकारमय लगता है, वह हमारे लिए सरल हो जाए। हम पहले ही देख चुके हैं कि परमेश्वर ने अब्राहम के वंश को चुना है। अब यदि कोई पूछे कि उसे ऐसा करने के लिए किसने या किस बात ने प्रेरित किया, तो वह नहीं पाएगा कि अब्राहम दूसरों से किसी बात में अधिक योग्य था: जैसा कि हम इस विषय को पहले ही पर्याप्त विस्तार से सँभाल चुके हैं। देखो, यह एक विशेषाधिकार था जो एक विशेष घराने को दिया गया, जो किसी योग्यता से नहीं निकला, न इस कारण कि परमेश्वर ने उनके व्यक्तियों में कुछ पाया जिसके कारण उन्हें प्राथमिकता मिलनी चाहिए: क्योंकि वे दूसरों से न तो अच्छे थे और न अधिक श्रेष्ठ परन्तु उसे यही अच्छा लगा। अब यह सच है कि यदि हम अपना ही निर्णय बीच में लाएँ तो इसे पचाना हमारे लिए कठिन होगा, जैसा कि बहुत से कल्पनाशील सिर हैं जो इस सिद्धान्त को सह नहीं सकते: क्योंकि उन्हें परमेश्वर के विरुद्ध उत्तर देना अच्छा लगता है: परन्तु अन्त में इससे उन्हें क्या लाभ? हम कह चुके हैं कि इसमें हमें नम्रता साथ लानी चाहिए, कि जो हमसे छिपा है उसका आदर करें। और सचमुच सन्त पौलुस ने अपने उदाहरण से हमें यह भली-भाँति दिखा दिया है। क्योंकि वह इस विषय पर विवाद करने के स्थान पर पुकार उठता है: हे, परमेश्वर के न्याय कैसे अद्भुत हैं! देखो सन्त पौलुस, जो पूरी तरह चकित था, वह स्वयं विस्मित पाया गया, वही जो स्वर्गों से ऊपर उठा लिया गया था, जिसने परमेश्वर के वे भेद देखे थे जिन्हें मनुष्य को कहना उचित नहीं।

तो सन्त पौलुस, जो (जैसा कोई कहे) स्वर्गदूतों का सहभागी था, इस विषय में आश्चर्य करता और पूरी तरह घबराया हुआ पाया गया: और इन रसोई के चेलों का क्या होगा, जिन्होंने व्यवस्था और सुसमाचार के एक शब्द को भी मुश्किल से जीभ की नोक से चखा है, और फिर भी सन्त पौलुस से आगे बढ़ जाना चाहते हैं? और फिर भी लोग यह घमण्ड बहुतों में पाएँगे। परन्तु हम तो उसी की ओर लौटें जो यहाँ हमें दिखाया गया है। हे मनुष्य, तू कौन है। इसलिए जब हम परमेश्वर और अपने बीच तुलना करना चाहें: तो परमेश्वर कौन है? हम उसे किस घेरे में बन्द करेंगे? क्या हमारे मस्तिष्क के घेरे में? और हमारे पास आधा औंस भी बुद्धि मुश्किल से है, और इसी बीच परमेश्वर, जो अपनी मुट्ठी बन्द करके सारे संसार को धूल के कण के समान थामे है (जैसा कि यशायाह भविष्यद्वक्ता कहता है) और जो न स्वर्ग में समाता है न पृथ्वी में, जिसकी सामर्थ्य अनन्त है, जिसका न्याय और ज्ञान अनन्त है, और जिसकी योजनाएँ अगम्य हैं: तौभी इस सब के होते हुए हम उसे अपनी मूर्खतापूर्ण कल्पना के अधीन करने पर उतारू हैं। और इसका अन्त क्या होगा?

फिर हम हैं कौन? मनुष्य, (सन्त पौलुस कहता है।) इस शब्द से उसका अर्थ है कि हम कुछ भी नहीं हैं: मानो वह कह रहा हो, क्या तू इतना दुस्साहस करेगा कि परमेश्वर के अथाह भेदों की पूछताछ करे, जबकि तू मिट्टी और गोबर के सिवाय कुछ नहीं? और फिर, तेरी समझ क्या है? तू पाप और अधर्म से भरा है, तू एक बेचारा अन्धा है: और फिर भी तू चाहता है कि परमेश्वर तुझे लेखा दे: और क्या तू यह निष्कर्ष निकालेगा कि यदि तू उसके कामों को भला और उचित न पाए, तो तू उस पर दोष लगा सके, और उसे तेरे कटघरे में हाथ उठाना पड़े? अब सबसे पहले इस चेतावनी पर ध्यान दें, और जान लें कि हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें सिखाता है कि जो कुछ हमें जानना उसे अच्छा लगा उसे सुनने के लिए कान खोलना, उसकी पूछताछ और खोज करना हमारे लिए बुरा नहीं: परन्तु सावधान रहें कि उससे आगे न जाएँ: क्योंकि इससे बड़ा कोई उन्माद और उत्पात नहीं जितना यह कि हम उससे अधिक जानना चाहें जितना परमेश्वर हमें दिखाता है।

और इसके अतिरिक्त यदि हम अपनी सारी इन्द्रियाँ और सारा अध्ययन इसी में लगा दें तो हमने अच्छा ताना काता होगा: हम कहाँ पहुँचेंगे? यही कि हम और अधिक भूलभुलैया और चक्रव्यूह में उलझ जाएँगे, जब तक कि परमेश्वर का मार्गदर्शन हमें राह न दिखाए।

इसलिए हम यह मध्यम मार्ग रखें: अर्थात् जो कुछ परमेश्वर हमारे सामने रखता है उसे सुनें: और जैसे ही वह अपना मुँह बन्द करे, हम अपनी सारी बुद्धि को बन्द और बन्दी कर दें, और उससे अधिक जानने का साहस न करें जितना उसने हमें बताया है। अब देखो, अब्राहम का वंश शेष सारे संसार से पहले किस प्रकार चुना गया, क्योंकि परमेश्वर की यही इच्छा थी: परन्तु यह अभी पर्याप्त नहीं था: क्योंकि उचित है कि उसका स्वतन्त्र चुनाव हमारे लिए और भी अच्छी रीति से पक्का किया जाए।

और यही दो भाइयों के व्यक्तित्व में यहाँ हमें दिखाया गया है। क्योंकि देखो रिबका, जिसने याकूब और एसाव को जन्म दिया: क्या उनमें एक दूसरे से अच्छा था? सन्त पौलुस इस स्थान की व्याख्या करते हुए कहता है: और वे अभी जन्मे भी न थे। तो वे अपनी योग्यताओं के कारण परमेश्वर के सामने अनुग्रह और कृपा कैसे प्राप्त कर सकते थे? क्योंकि याकूब ने न भला किया था न बुरा, वैसे ही जैसे एसाव ने नहीं किया था। तो फिर परमेश्वर उसे क्यों बड़ा बनाता है? उचित नहीं कि हम इस विषय पर और गहरे विवाद में पड़ें, सिवाय इसके कि परमेश्वर की गुप्त योजना को, जिसके द्वारा जो उसे अच्छे लगे वे चुने गए और दूसरे ठुकराए गए, विस्मय के साथ दण्डवत् करें।

तो देखो, परमेश्वर ने किस प्रकार अपनी दया को और भी अधिक महिमा और शोभा देनी चाही, जब उसने एसाव के स्थान पर याकूब को चुन लिया। क्योंकि वह भली-भाँति याकूब को सबसे आगे रख सकता था, जब शिशु अपनी माताओं के गर्भ से बाहर आते। मनुष्य भली-भाँति समझ सकते हैं कि यह संयोग से नहीं हुआ: जैसा कि भजन में कहा गया है: तू ही ने मुझे माता के गर्भ से निकाला: और परमेश्वर तब विशेष सामर्थ्य प्रकट करता है जब बच्चे संसार में आते हैं। तो फिर उसने क्यों न होने दिया और न ठहराया कि याकूब को ज्येष्ठाधिकार का विशेषाधिकार मिले? क्योंकि यह उचित था, चूँकि वह एसाव को कलीसिया से निकालना चाहता था, और याकूब को वहाँ बनाए रखना चाहता था, कि वह अपने पिता इसहाक और अब्राहम के स्थान पर उत्तराधिकारी बने।

और फिर परमेश्वर उसे क्यों पीछे खींचता है, और प्रकृति की व्यवस्था के अनुसार उसे अपने भाई से छोटा बनाता है, और फिर उसे उससे ऊपर ठहराता है? इसमें हम देखते हैं कि परमेश्वर मनुष्य की सारी महिमा को बन्द कर देना चाहता था, चाहता था कि सारी ऊँचाई गिरा दी जाए, और मनुष्य अपनी ओर से कुछ न लाएँ: ताकि वे यह न कह सकें: मैंने यह या वह अच्छी वस्तु पाई है। इसे मैंने अपने ही परिश्रम से प्राप्त किया है।

तो हम वही देखते हैं जिसकी चर्चा मैं पहले कर चुका हूँ: अर्थात् यहाँ हमारे पास एक दर्पण है, जिसमें हम देख सकते हैं कि जितने कलीसिया के हैं, वे अपने ही गुण से उसमें नहीं पहुँचाए गए, और उन्होंने यह अनुग्रह अपनी योग्यताओं से प्राप्त नहीं किया: परन्तु परमेश्वर ने उन्हें उनके जन्म से पहले ही चुन लिया।

तो संक्षेप में देखो कि इस स्थान से हमें क्या थामे रहना है। परन्तु अब यहाँ कोई कह सकता है कि उसे कुछ शंका है: क्योंकि मूसा स्पष्ट कहता है कि यह दो जातियों पर लागू होता है, और यह संघर्ष और लड़ाई केवल याकूब और एसाव के व्यक्तियों के विषय में नहीं उठी थी: वरन उनके उत्तराधिकारियों और प्रत्येक की सन्तान के विषय में थी। अब बात यह है कि याकूब से उत्पन्न हुए बहुत से लोग फिर भी ठुकराए गए। क्योंकि वह यहाँ कही गई बात पर ठहरता है: अर्थात् याकूब का वंश और सन्तान चुनी गई और एसाव की ठुकराई गई: और फिर भी कोई देख सकता है कि याकूब से उत्पन्न होनेवालों में से अधिकांश परमेश्वर द्वारा अस्वीकार किए गए, और वह उन्हें दोगले बच्चे, वेश्या की सन्तान, और व्यभिचार से उत्पन्न ठहराता है, और कि वे उसके कुछ भी नहीं थे, और उनका उसके नाम पर घमण्ड या डींग मारना व्यर्थ था। अब ये दोनों बातें आपस में कैसे मेल खाती हैं?

ध्यान दें कि परमेश्वर याकूब और रिबका की आँखों के सामने ऐसा दृश्य इसलिए रखता है कि उन्हें दिखाए कि कलीसिया की दशा और स्थिति कैसी होगी: क्योंकि परमेश्वर थोड़े शब्दों में उनके सामने गवाही देता है कि उसकी कलीसिया याकूब से निकलेगी: और ऐसा नहीं कि जितने वह शरीर के अनुसार उत्पन्न करेगा वे सब कलीसिया के होंगे: परन्तु यह पर्याप्त था कि वह वहाँ बना रहे, और परमेश्वर उसे सुरक्षित रखे: और एसाव समय पर निकाल दिया जाए, जैसा कि हम आगे देखेंगे। यह उस व्याख्या से और अच्छी रीति से समझा जाएगा जो सन्त पौलुस देता है: वह इस वाक्य को इस प्रकार लेता है: जो शरीर के अनुसार याकूब से हैं, वे सब इस कारण सच्चे इस्राएली नहीं: अर्थात् वे परमेश्वर की प्रजा में से नहीं हैं। क्योंकि उसके दो नाम थे, जैसा कि हम आगे देखेंगे, अर्थात् याकूब और इस्राएल। और कि यह ऐसा ही है, बच्चों के जन्म से पहले ही, देखो परमेश्वर, जो एक को दूसरे से अलग करता है, और दिखाता है कि यह एक देह नहीं, और वे आपस में मिले हुए नहीं थे: वरन एक सुरक्षित रखा गया, और दूसरा ठुकराया गया। इसलिए सन्त पौलुस ने भली-भाँति समझा कि जो याकूब से उत्पन्न होंगे वे सब परमेश्वर द्वारा चुने हुए नहीं थे: क्योंकि वह हमें आरम्भ की ओर भेजता है, और कहता है कि एक दूसरे से परमेश्वर की गुप्त योजना द्वारा अलग किया गया, और हम इसका कारण समझ और बता नहीं सकते: क्योंकि (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) वह अपनी स्वतन्त्रता को इस प्रकार बनाए रखता है कि यह पर्याप्त है कि कलीसिया उसके वंश से उत्पन्न हो, चाहे सब उसके न हों।

हम पहले बता चुके हैं कि अब्राहम के इस वंश में दोहरा अनुग्रह या कृपा थी: एक यह कि परमेश्वर ने सामान्य रूप से घोषित किया था कि वह उनका पिता होगा। खतना भी उन सब में समान था। अब खतना व्यर्थ नहीं था: वह पापों की क्षमा की और उस धार्मिकता की गवाही देता था जो सब विश्वासियों को हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा प्राप्त करनी है। देखो इश्माएल, जिसका खतना हुआ: जहाँ तक परमेश्वर की ओर से था, उसने वह संस्कार पाया जो उसे निश्चय दिला सकता था कि परमेश्वर उसे अपनी सन्तानों में गिनता है, कि वह यीशु मसीह का अंग है, कि वह शाप जो उसने आदम से खींचा था, मिटा दिया गया: हाँ, पर इससे उसे कुछ भी लाभ न हुआ। यही एसाव और उन जैसे सब के विषय में कहा जा सकता है: पर जो भी हो, हमें उस उपकार को तुच्छ नहीं जानना चाहिए जो उसने अब्राहम के सारे वंश पर दिखाया। जैसे आज जब हम उस अनमोल आशीष की चर्चा करते हैं जो परमेश्वर ने हम पर उण्डेली, जब उसका सुसमाचार प्रचार किया गया: यही सब से बिना भेद के कहा जाएगा। लोग कहेंगे कि परमेश्वर ने हम पर बहुत विशेष दया दिखाई है, क्योंकि उसने अपने वचन से हमें प्रकाश दिया कि हम उद्धार का मार्ग जानें। इसी बीच हम दूसरों को अन्धकार और घबराहट में भटकते देखते हैं, मानो परमेश्वर ने उन्हें भुला दिया हो और पूरी तरह त्याग दिया हो। देखो पोप-पन्थियों को, यद्यपि वे घमण्ड और विद्रोह से भरे हैं, फिर भी शैतान उन्हें इधर-उधर उछालता है: ऐसा कि वे न राह जानते हैं न पगडण्डी: और इसी बीच परमेश्वर हमें प्रतिदिन अपने पास बुलाता है, और उसकी वाचा की चर्चा होती है, ताकि हम जानें कि वह सदा हम पर दयालु है, और हम सच्चे निश्चय के साथ उसे पुकार सकें, इसमें सन्देह न करते हुए कि वह हमारा पिता होगा। देखो तो यह एक उपकार है, जिसे हमें हलके में नहीं लेना चाहिए: और फिर भी बहुत से हैं, जिनके लिए यह दण्ड के सिवाय किसी काम का नहीं: क्योंकि यदि वे परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोही हों, और उस पितृवत् कृपा को स्वीकार करने से घृणा करें जो उसने उन्हें दी, तो कृतघ्नता और भी अधिक है। तो देखो, ऐसी कृपा हम पर पहले ही दी जा चुकी है, जैसी अब्राहम के वंश पर दी गई थी: परन्तु एक दूसरा अनुग्रह भी था, जिसे इन सीमाओं में रोका जाना चाहिए: अर्थात् परमेश्वर ने इस वंश में से उन्हें चुना जो उसे अच्छे लगे, जैसे उसने इसहाक को अपने लिए ग्रहण किया, और इश्माएल का उसके घर में कोई स्थान न रहा: वह कुछ समय के लिए उसके घराने का अंग गिना जा सकता था: परन्तु अन्त में वह काट दिया गया। यही कतूरा की सन्तान के विषय में कहा जा सकता है: और देखो, यद्यपि एसाव पहलौठा था, तौभी परमेश्वर ने उसे बाहर कर दिया।

तो देखो यह दूसरा अनुग्रह जो अब्राहम के घराने में था: अर्थात् परमेश्वर ने उन्हें अपने लिए रखा जिन्हें उसने अच्छा समझा। क्योंकि याकूब उस वंश की जड़ के समान था जो आगे फूटा। और आगे ध्यान दें कि किस कारण सब चुने हुए लोग उसके व्यक्तित्व में चित्रित किए गए, और परमेश्वर हमारे सामने रखता है कि जो कुछ वह केवल अपनी भलाई से उन्हें देता है, वह उनके अपने पास से नहीं है, और वे डींग नहीं मार सकते कि यह उनकी अपनी प्रेरणा से हुआ कि वे उद्धार तक पहुँचे: परन्तु वे उसकी ओर खींचे गए, इस कारण कि वे जगत की सृष्टि से पहले, और इसलिए अपने जन्म से भी पहले चुने गए थे।

देखो, इसीलिए सन्त पौलुस, इस स्थान में जिसका हमने हवाला दिया, अधिक पूर्ण घोषणा के लिए मूसा की गवाही जोड़ता है: “मैं जिस पर दया करना चाहूँ उस पर दया करूँगा; और जिस पर तरस खाना चाहूँ उस पर तरस खाऊँगा।” ऐसा लग सकता है कि यह टूटी हुई और विषय से बाहर की बात है: परन्तु यह बहुत महत्त्व की है: क्योंकि यह वैसा ही है मानो परमेश्वर ने कहा हो, मैं जानता हूँ कि मैं किसे सुरक्षित रखूँगा, और इस विषय में किसी को मुझसे वाद-विवाद करने की आवश्यकता नहीं: क्योंकि यह मेरी स्वतन्त्रता में निहित है। जब हम अपनी साधारण बोली पर ध्यान देंगे, तो यह बिलकुल अन्धकारमय न रहेगा। क्योंकि यदि कोई कहे, “मैं यह करूँगा, मैं करूँगा”: अर्थात् मैं वही करूँगा जो मुझे करना अच्छा लगे, तो इससे वह दिखाता है कि वह किसी के अधीन न होगा: वह दिखाता है कि जो वह कर रहा है उसमें अपनी योजना और उद्देश्य खोलने के लिए वह न तो बँधा है न विवश। इसी प्रकार परमेश्वर कहता है, मैं उस पर दया करूँगा, जिस पर मैं दया करूँगा: मानो वह कह रहा हो: मेरी दया न इस पर निर्भर है न उस पर, न कारण किसी और में खोजा जाए, न मैं किसी व्यवस्था से बँधा हूँ: क्योंकि मैं जानता हूँ कि मुझे क्या करना चाहिए: और इसी बीच मेरी दया अपना स्थान पाएगी, और मैं जिस पर दया करूँगा उस पर दया करूँगा: अर्थात् मैं यह नहीं देखता कि कौन इसके योग्य है। क्योंकि एक भी नहीं है: तौभी मैं कुछ पर दया करना न छोड़ूँगा, अर्थात् उन पर जिन्हें मैंने चुन लिया होगा।

तो देखो परमेश्वर कितनी यथार्थता से बोलता है: और यह इसलिए कि जो कुछ मनुष्य कह सकते हैं उसे गिरा दे, सब जिज्ञासा के विरुद्ध द्वार बन्द कर दे, और सब अहंकार के सामने रोक लगा दे: और हम सीधे-सादे रूप से उसका आदर करें, और जो उसने अपने लिए रख छोड़ा है वह उसी पर छोड़ दें: अर्थात् जब वह बचाता है, तो अपनी स्वतन्त्र भलाई से बचाता है: और जब वह दोषी ठहराता है, तो हम परमेश्वर के विरुद्ध भौंकने का साहस न करें, परन्तु अपना मुँह बन्द रखें: सिवाय उसकी महिमा करने के।

अब ध्यान दें कि यह मूसा द्वारा तब कहा गया जब लोग पहले ही बढ़ चुके थे, और परमेश्वर उन्हें मिस्र से निकाल लाया था। देखो, याकूब के वंश से उतरी एक कलीसिया? क्योंकि उसी बाँझ और मानो उजाड़ घराने से परमेश्वर ने इतनी बड़ी भीड़ निकाल ली थी, कि यह एक प्रसिद्ध चमत्कार जान पड़ता था, और यह प्रतिज्ञा पूरी हुई: कि अब्राहम का वंश आकाश के तारों के समान होगा। क्या मनुष्यों की दृष्टि में यह एक सुन्दर दृश्य न था? परमेश्वर इस भीड़ के विषय में यहाँ कहता है, मैं जितनों को अच्छा समझूँगा उतनों को रखूँगा: मैं जिस पर दया करूँगा उस पर दया करूँगा, और कोई उसका कारण न पूछे। यह सच है कि परमेश्वर के पास कारण है, परन्तु इससे यह नहीं निकलता कि हम उसे समझ सकते हैं, या अपनी सीमा से बाहर निकलकर उसके भेदों में घुस सकते हैं। इसलिए हमें जानना चाहिए कि हमारे लिए कोई कारण नहीं है: परन्तु परमेश्वर की योजना को हमारे लिए सब बातों में धार्मिकता, बुद्धि और न्याय का मापदण्ड होना चाहिए।

तो देखो, सन्त पौलुस की व्याख्या उससे बहुत अच्छी रीति से मेल खाती है जो यहाँ कहा गया है: अर्थात् रिबका के गर्भ में दो जातियाँ थीं, और उसकी अंतड़ियों से दो राज्य अलग किए जाने थे: और यह वैसा ही था मानो परमेश्वर ने गवाही दी हो कि ऐसा विच्छेद होगा, तौभी याकूब का वंश धन्य बना रहेगा: पूर्णतः बिना अपवाद के नहीं, परन्तु उन्हें जिन्हें परमेश्वर अपने लिए रखना चाहे, जैसा उसने उन्हें जगत की सृष्टि से पहले चुन लिया था। तो देखो जो यहाँ निहित है उसका सार यही है।

परन्तु आगे बढ़ने से पहले, जो कहा गया है उसे भली-भाँति ध्यान में रखें: अर्थात् मुख्य बात जो हमें देखनी है यह है कि परमेश्वर चाहता है कि हमारे उद्धार की सारी स्तुति उसी को दी जाए। क्योंकि कलीसिया की जड़ और आरम्भ क्या है? उसका चुनाव। देखो, मूसा हमें किस ओर बुलाता है, और वह भी सन्त पौलुस की व्याख्या के अनुसार: और पाठ भी इसमें अत्यन्त स्पष्ट है। क्योंकि यहाँ (जैसा मैंने कहा) किसी पार्थिव या क्षणिक विरासत का कोई प्रश्न नहीं: यह उस अनन्त जीवन का है जिसकी अब्राहम ने आशा की थी, उसके अनुसार जो उसने प्रतिज्ञा के द्वारा पाया था। अब देखो याकूब वारिस है: और क्यों? क्या इस कारण कि उसने अपने आपको परमेश्वर की कृपा में स्थापित किया, या इस कारण कि उसने अपने लाए हुए किसी वस्तु से कृपा खरीदी? ऐसा नहीं था। तो मूसा का पाठ बिना किसी टीका के देखो, जो पर्याप्त दिखाता है कि कलीसिया परमेश्वर के शुद्ध अनुग्रह से फूटती है: और इसलिए हमारे उद्धार की सारी स्तुति पूर्ण रूप से उसी के लिए सुरक्षित रखी जानी चाहिए।

अब इस सब के होते हुए, जो इस सिद्धान्त को उलटना और अन्धकारमय करना चाहते हैं, वे कहते हैं, यद्यपि परमेश्वर ने याकूब में कोई योग्यता नहीं जानी: तौभी उसने भली-भाँति पहले से देख लिया था कि वह ऐसा होगा। देखो, वे कहते हैं कि इसी कारण वह चुना गया और एसाव ठुकराया गया। संक्षेप में, चूँकि उन कुत्तों में से बहुत से परमेश्वर के चुनाव का खुलेआम और सीधे इनकार करने का साहस नहीं करते, वे चाहते हैं कि कोई ऊपर का कारण हो, अर्थात् उसका पूर्वज्ञान। और वह पूर्वज्ञान क्या है? यह कि परमेश्वर पहले से देखता है कि हर एक कैसा होगा: और वह (वे कहते हैं) उन्हें चुनता है जिन्हें उसने अच्छे स्वभाव और भाव का होते देखा: और यदि वह उन्हें औरों से पहले ग्रहण करे तो कोई आश्चर्य नहीं: क्योंकि वह उस भलाई को जानता है जो अभी प्रकट नहीं हुई, पर आनेवाली है।

परन्तु ऐसे लोगों में परमेश्वर के भय की एक बूँद भी नहीं। क्योंकि वे प्रत्यक्ष रूप से उस पवित्र आत्मा की निन्दा करते हैं जिसने सन्त पौलुस के मुख से कहा है, और वे उसका उपहास करते हैं जो सन्त पौलुस ने कहा है, मानो वह कोई कहानी हो। क्योंकि यदि कोई उनका समाधान स्वीकार करे, तो सन्त पौलुस ने अज्ञानी और अविचारी मनुष्य के समान कहा है: क्योंकि वह यह कारण लेता है कि उसने न इसहाक में, न एसाव में, न याकूब में, न भला न बुरा पाया। तौभी परमेश्वर ने एक को चुना और दूसरे को ठुकराया। परन्तु इन कल्पनाशील लोगों की राय में उत्तर आसान होगा। और कैसे? यह सच है कि न भला था न बुरा: परन्तु या भला या बुरा अवश्य होना था, और परमेश्वर ने उसे वैसा ही पहले से देखा।

परन्तु सन्त पौलुस यह सच मानकर चलता है, अर्थात् कि हम सब दोषी ठहरे हैं, और जब तक परमेश्वर ने हमें न चुना, तब तक अवश्य था कि हम विष से भरे सर्पों के समान बने रहते, और हममें परमेश्वर के क्रोध और बदले की सामग्री के सिवाय कुछ न था, और हम पूरी तरह घबराए हुए और विष और अधर्म से भरे हैं।

देखो, याकूब का मामला भी वैसा ही है जैसा एसाव का। क्योंकि आदम के वंश में हम सब भ्रष्टता के सिवाय क्या पाएँगे? इसलिए हम परमेश्वर के सामने दूषित हैं: और चूँकि जड़ शापित, दोषपूर्ण और पूरी तरह सड़ी हुई है, अवश्य है कि फल भी उसी प्रकार के हों। इसलिए जब परमेश्वर हमें वैसा ही छोड़ दे जैसे हम हैं, तो अवश्य है कि हम सब नष्ट हों, और एक भी न बचे, परन्तु हम सब खो जाएँ और भस्म हो जाएँ।

संक्षेप में, यह सिद्धान्त पवित्रशास्त्र में पर्याप्त सामान्य है कि हम सब क्रोध की सन्तान हैं। इससे निकलता है कि एसाव और याकूब में कोई भेद न था, और परमेश्वर ने एक को दूसरे से इस कारण अलग नहीं किया कि उसने एक या दूसरे में कोई भलाई पाई या पहले से देखी। क्योंकि वह आदम के उस भ्रष्ट पिण्ड के सिवाय और क्या पहले से देख सकता था, जो शाप के सिवाय कोई फल नहीं लाता? तो देखो, उसने एक और दूसरे में समान रूप से यही पहले से देखा। इससे निकलता है कि उसने याकूब में वह डाला जो उसमें पाया जाता है, और एसाव को वैसा ही छोड़ दिया जैसा उसका जन्म उसे लाया था।

इसीलिए एक और स्थान में भी कहा गया है, “कि उसने हमें चुना, ताकि हम उसके सामने पवित्र और निर्दोष हों।” वह यह नहीं कहता कि परमेश्वर ने पहले से देखा कि हम पवित्र होंगे, इसलिए उसने हमें चुना: वरन इसके विपरीत वह हमारी सारी पवित्रता और धार्मिकता, और सारी भलाई जो हममें पाई जाएगी, उसे इसी जड़ से निकालता है: अर्थात् परमेश्वर के चुनाव से, ताकि हम उसके भय में चलें, हममें कुछ खरापन हो, हममें भला करने के लिए कुछ उत्साह और लगन हो। यदि यह ऐसा है, तो इससे निकलता है कि परमेश्वर ने हममें कुछ भी पहले से नहीं देखा। क्योंकि चुनाव को हटा दें, तो क्या बचेगा? जैसा हमने बताया, हम पूरी तरह खोए हुए और शापित रह जाते हैं। और बिना कारण नहीं: क्योंकि परमेश्वर ने हममें भ्रष्टता के सिवाय कुछ न देखा: और अवश्य है कि वह हमें अस्वीकार करे और त्याग दे, जैसा कहा गया है कि उसे पछतावा हुआ कि उसने मनुष्य को बनाया।

तो देखो हम अपनी ओर से क्या कह सकते हैं। इसलिए यह कहना बहुत ही तुच्छ मूर्खता है कि परमेश्वर ने अपनों को उसके अनुसार चुना जैसा उसने पहले से देखा कि वे आगे चलकर होंगे: क्योंकि अवश्य है कि वह उनमें वह डाले जो भला है, और उसे वहाँ रखे, क्योंकि उसने उन्हें चुन लिया है। तो पहला कदम देखो जिससे हमें आरम्भ करना है: अर्थात् हम एक दूसरे से कुछ भिन्न नहीं हैं, सिवाय इसके कि परमेश्वर ने हमें भिन्न ठहराया।

यह भी देखो कि सन्त पौलुस किस कारण वह सारी महिमा रद्द करता है जिसे मनुष्य हड़प सकते हैं: “कौन है (वह कहता है) जो तुझे भिन्न ठहराता है?” वह केवल यही शब्द वहाँ रखता है कि सारे अहंकार को गिरा दे और रद्द कर दे। और क्यों? क्योंकि क्या तेरे पास कुछ है (वह कहता है) जो तेरा अपना हो? इससे वह दिखाता है कि मनुष्य अपना स्थान आप नहीं चुन सकते, कि कहें, मैं अपने आपको भला करने के लिए तैयार करूँगा, और परमेश्वर मुझ पर दया करेगा, और मैं उसके अनुग्रह तक पहुँचूँगा, मुझमें भली प्रेरणा होगी, मैं यह तैयारी करूँगा। अब सन्त पौलुस यह सब बाहर करता है, यह कहकर कि हम सब खोए हुए हैं, कि हम सब एक के साथ एक गिरा दिए जाने और नरक के गड्ढे में जाने के योग्य हैं, जब तक कि परमेश्वर को हमें भिन्न ठहराना अच्छा न लगे।

देखो, हमारी सारी प्रतिष्ठा और उत्कृष्टता कहाँ से आती है: अर्थात् इससे कि परमेश्वर को हमें अपना हाथ देना अच्छा लगा। फिर इस सिद्धान्त को दृढ़ता से थामे रहें, और इस सारे उपदेश को जो हमने दोहराया है इसी उद्देश्य पर लगाएँ, कि परमेश्वर ने याकूब और एसाव में हमारे सामने देखने के लिए एक दर्पण रखा है। वैसे ही हम सन्तुष्ट रहें कि ये दो व्यक्ति हमारे लिए दो जीवित चित्रों के समान हों, यह दिखाने के लिए कि संसार अपने आप में एक ही दशा का है: परन्तु एक वर्ग बुलाया जाता है और दूसरा नहीं, क्योंकि परमेश्वर को यही अच्छा लगा। और विशेषकर (जैसा मैंने कहा) याकूब छोटा था, और प्रकृति के क्रम के अनुसार अधिक उचित था कि वह अपने भाई के अधीन हो: तौभी ध्यान दो कि वह पहलौठे के पद पर रखा गया और एसाव केवल उसके नीचे ही नहीं किया गया, वरन पूरी तरह ठुकरा दिया गया: क्योंकि अन्त में कलीसिया में उसका न कोई भाग था न हिस्सा। यह बात हमें बहुत अच्छी रीति से दिखाती है कि परमेश्वर हमें सदा दोषी ठहराए रखना चाहता है, कि अपनी ओर से परमेश्वर के सामने कुछ लाने, और वहाँ अपने आपको घुसेड़ने का कोई प्रश्न नहीं, मानो हममें कोई मूल्य और योग्यता हो: क्योंकि परमेश्वर अपने विरुद्ध नहीं है: तौभी वह यहाँ एक प्रकार की असंगति और विपरीतता दिखाना चाहता है। उसी ने ठहराया कि घर का पहलौठा मुखिया हो। अब उसने यह व्यवस्था रखी: और फिर भी इसी बीच वह उसे उलट देता है: परन्तु (जैसा मैंने कहा) यह सब बहुत अच्छी रीति से मेल खाता है: क्योंकि परमेश्वर अपनी साधारण व्यवस्था से ऊपर है, और फिर भी वह उसे बदलना चाहता है जो सामान्य नियम से चला आता था: और वह यह इसलिए करता है कि हम जानें कि यह (जैसा सन्त पौलुस ने भी कहा है) न तो इच्छा करनेवाले की, न दौड़नेवाले की, परन्तु केवल दया करनेवाले की ओर से है। अब जब सन्त पौलुस कहता है कि यह न इच्छा करनेवाले की, न दौड़नेवाले की है: तो उसका अर्थ यह नहीं कि हममें अपनी ओर से कोई अच्छी इच्छा हो सकती है: जैसा उसने दूसरे स्थान में बताया है: “क्योंकि परमेश्वर ही है जो उसे देता है:” और वह यह भी नहीं कहता कि हम अपने आपको विवश कर सकते हैं, परन्तु वह दिखाता है कि मनुष्य के पास कुछ नहीं; और इसलिए वे परमेश्वर के पास कुछ नहीं ला सकते।

तो उसकी दया के सिवाय कुछ नहीं। क्योंकि यदि मनुष्यों के पास उसके विरुद्ध रखने को कुछ होता, तो दाँव का बँटवारा होना पड़ता, और यह जानना पड़ता कि क्या परमेश्वर की ओर से है और क्या मनुष्यों की ओर से। और तब यह कहा जा सकता था कि हमारे पास सब कुछ केवल परमेश्वर की दया से नहीं है: वरन उसमें हमारी अच्छी इच्छा, हमारी अच्छी दौड़ और हमारा अच्छा उत्साह भी है। मनुष्य ऐसा कह सकते थे: परन्तु सन्त पौलुस यहाँ उसे निष्फल करना चाहता है जो कुछ मनुष्य अपनी ओर से ला सकें, और दिखाना चाहता है कि इसमें कुछ भी प्रभुत्व नहीं रखता, केवल परमेश्वर की दया। यह बहुत सच है कि बहुत से लोग अपने आपको विवश करेंगे, वरन यहूदियों का उदाहरण देंगे, जो शैतानी प्रकार के घमण्ड से मेंढकों के समान फूले हुए थे, यह सोचकर कि परमेश्वर मानो उनसे बँधा है, और जो अपने कामों के अनुसार धर्मी गिने जाना चाहते थे: परन्तु इसमें वे अपने आपको धोखा देते हैं, और आगे बढ़ने के स्थान पर पीछे ही जाएँगे। जब मनुष्य अपने विषय में ऐसा अहंकार करते हैं, तो निश्चय है कि वे परमेश्वर का सम्मान लूटते हैं। तो देखो इन ईशनिन्दक लोगों को जो चोरों से भी बुरे हैं, और इसके अतिरिक्त जब तक परमेश्वर हमें नया न करे, हमारा दिखावा चाहे जितना सुन्दर हो, निश्चय है कि हममें दुर्गन्ध के सिवाय कुछ नहीं, और हम परमेश्वर के सामने तुच्छ कीड़ों के समान होंगे।

इसलिए हम यह दिखावा न करें कि हम इच्छा कर सकते हैं या दौड़ सकते हैं: परन्तु उचित है कि परमेश्वर हमें खोया हुआ पाए, और हमें उस अथाह गड्ढे से उबारे, और हमें उनसे अलग करे जिनके साथ हम खो गए थे, और जिनके समान हम थे। क्योंकि (जैसा मैंने कहा) मनुष्य जाति की दशा एक ही है। यह सच है कि एक वर्ग क्रोध की सन्तान है, और दूसरे को परमेश्वर आशीष देता है। परन्तु यह अलगाव और यह विच्छेद कहाँ से आता है? दया से। और हमें इससे आगे पूछने नहीं जाना चाहिए, परन्तु सब कारण के स्थान पर केवल इसी वचन से सन्तुष्ट रहना चाहिए।

तो देखो किस कारण, अर्थात् पहलौठा अपने स्थान से निकाल दिया गया: और इसी बीच याकूब, जो छोटा था, उसके स्थान पर रखा गया, वरन अकेला वारिस बनकर रहने के लिए। जब मलाकी भविष्यद्वक्ता इसकी चर्चा करता है, तो वह यहूदियों को उनकी कृतघ्नता का उलाहना देता है। यह सच है कि यह एक बाहरी चिह्न था कि परमेश्वर ने एसाव के स्थान पर याकूब को चुना, क्योंकि उसने कनान देश उसे विरासत में दिया, और एसाव पहाड़ों के बीच दूर भेज दिया गया: परन्तु यह वह वाक्य नहीं जिस पर भविष्यद्वक्ता ठहरता है: वह कहीं ऊँची बात की ओर देखता है।

सन्त पौलुस भी जब उसकी इस गवाही का उपयोग करता है, यह देखकर कि परमेश्वर ने याकूब के वंश को अपने लिए ले लिया, तो यह सब वह उसकी केवल दया को ठहराता है: परन्तु भविष्यद्वक्ता कहता है। “और क्या एसाव याकूब का भाई न था?” मानो वह कह रहा हो, “तुम घमण्ड और हठ से भरे हो, वरन तुम उसमें फटे जाते हो, और यह कहना तुम्हें कुछ नहीं लगता, ‘हे, हम अब्राहम के पवित्र और पावन वंश के हैं: हम कलीसिया हैं, हम वह प्रजा हैं जिसे परमेश्वर ने आशीष दी और पवित्र किया:’ हाँ, और यह तुम्हें कहाँ से मिला (वह कहता है?) क्योंकि क्या एसाव याकूब का भाई न था?”

तुम एदोमियों को देखते हो, जो तुम्हारे भाई हैं: और क्या वे परमेश्वर की प्रजा हैं? तुम कहते हो कि वे कलीसिया से परदेशी हैं: और यद्यपि उनमें खतना है, तौभी परमेश्वर ने उन्हें काट डाला है। और यह कहाँ से आया (वह कहता है?) किसने उन्हें इस प्रकार अलग किया? यदि तुम पीढ़ी-पीढ़ी पीछे जाओ: बहुत अच्छा, तुम पाओगे कि तुम याकूब की सन्तान कैसे हो। और एसाव, वह किसका पुत्र था, मैं तुमसे पूछता हूँ? क्या वह तुम्हारे समान अब्राहम और इसहाक से नहीं उतरा? परन्तु यहाँ वह केवल कनान देश की बात नहीं करता: वरन आगे जाता है, और कहता है कि उसने याकूब से प्रेम किया, और एसाव से बैर। और यह प्रेम जो उसने याकूब से रखा, कहाँ से निकला? निश्चय है कि याकूब उसके द्वारा (जैसा हमने कहा) अपने आप में देखा जाकर ग्रहण नहीं किया जा सकता था। क्योंकि देखो वह क्रोध की सन्तान, और अपनी माता के गर्भ से इस भयानक शाप के सिवाय कुछ न लाता हुआ, जो सारी मनुष्य जाति पर डाला गया: तौभी परमेश्वर ने उससे प्रेम किया। अब परमेश्वर अधर्म से प्रेम नहीं करता, वह पाप से बैर रखता है, जैसा हम जानते हैं। तो उसने याकूब से कैसे प्रेम किया? इसलिए कि उसने उसे उस विनाश से खींच लिया जिसमें वह था। और उसने एसाव से बैर क्यों किया? अब यह बहुत सच है कि परमेश्वर के सारी मनुष्य जाति से बैर करने का उचित कारण है: क्योंकि जैसा हमने कहा, हममें दोष और अधर्म के सिवाय कुछ नहीं: परन्तु जब हम और आगे जाएँ, और पूछें कि परमेश्वर ने जगत की सृष्टि से पहले, और आदम के पतन से पहले, यह क्यों चाहा कि बैर करे या प्रेम करे? यहाँ हमें चुप और शान्त रहना चाहिए: यहाँ हमें अपने सींग ऊँचे नहीं करने चाहिए। क्योंकि जब हम परमेश्वर से वाद-विवाद और प्रश्न करने बैठें तो हमें क्या मिलेगा? निश्चय है कि हम अपने ही सिर पर पत्थर फेंकेंगे, और वे न यहाँ गिरेंगे न वहाँ, वे परमेश्वर की महिमा तक नहीं पहुँच सकते: परन्तु वे हमारे ही सिरों पर लौट आएँगे, और अवश्य है कि हम उनसे कुचले और घायल हों।

तो देखो जब हम परमेश्वर के विरुद्ध निन्दाएँ उगलने के लिए अपना गला खोलते हैं तो हमें क्या मिलता है: क्योंकि हम अपने तीर और पत्थर केवल हवा में फेंकेंगे: परन्तु वे उस तक नहीं पहुँचेंगे, वरन हम ही उनसे छिदेंगे और घायल होंगे, और अपनी उस उतावली और अहंकार में घबराए हुए रह जाएँगे। इसलिए जो परमेश्वर ने कहा है उसी में सन्तुष्ट रहें, अर्थात्: कि उसने एसाव से बैर और याकूब से प्रेम किया है। अब इससे याकूब की सन्तान को भी निश्चय हो गया कि उनके पास अपने आप में घमण्ड करने को कुछ नहीं, और कुछ न बचा, सिवाय इसके कि वे परमेश्वर के सामने उस उदार और दानशील भलाई को स्वीकार करें जो उसने उन पर दिखाई, और जिसका कोई कारण कोई न पा सके, सिवाय इसके कि उसे यही अच्छा लगा। परन्तु फिर भी वे परमेश्वर के विरुद्ध अभक्ति से भरे थे, और इस विशेषाधिकार को पकड़े रखना चाहते थे: परन्तु परमेश्वर उन्हें दिखाता है कि यह उनका नहीं है, और यदि वे उसे अपना पिता मानते हैं तो उन्हें उसकी सन्तान होना चाहिए। परन्तु इससे हमें चेतावनी मिलती है कि यद्यपि हमारा उद्धार केवल परमेश्वर के अनुग्रह से आता है, और अन्त तक उसी में निहित है: तौभी इससे यह नहीं निकलता कि इसकी आड़ में हम अपने आपको बुराई के लिए खुला छोड़ दें, और उसमें लग जाएँ। परन्तु दुष्ट लोग और कुत्ते हैं जो परमेश्वर के विरुद्ध भौंकते हैं, और सूअर भी हैं, जो अपने ढीले और लम्पट जीवन से चुनाव के सिद्धान्त को उलटते हैं। क्योंकि इस सिद्धान्त के शत्रु दो प्रकार के लोग हैं। एक कुत्तों के समान हैं, और दूसरे सूअरों के समान। एक कौन हैं? वे जो अपने दाँत दिखाने आते हैं, और अपने दुष्ट प्रश्नों से परमेश्वर का अपमान करते हैं: जैसा हम आज देखते हैं उन दुष्टों में जो सारे पवित्रशास्त्र को चीर-फाड़ने, सब कुछ बिगाड़ने, उलटने, मिलावट और झूठा बनाने में संकोच नहीं करते, ताकि परमेश्वर के चुनाव को अन्धकारमय कर दें, अर्थात् उसे कुछ भी न बना दें। और देखो इसका उद्देश्य क्या है, इस सिद्धान्त को घृणित बनाना। क्योंकि वे कहेंगे कि जो ऐसा कहते हैं, वे भले और बुरे में कोई भेद नहीं रखते, और इस रीति से परमेश्वर अधर्मी ठहरेगा, यदि वह एक और दूसरे में भेद करे, और उसमें पक्षपात हो। तो देखो वे कुत्ते जो इस सिद्धान्त के विरुद्ध भौंकते और दाँत पैने करते हैं। अब सूअर भी हैं जो इसके विरुद्ध इस प्रकार तिरस्कार नहीं करेंगे, परन्तु कहेंगे, बहुत अच्छा। यदि मैं चुना हुआ हूँ तो जितनी चाहूँ बुराई कर सकता हूँ: क्योंकि परमेश्वर मुझे सुरक्षित रखना भली-भाँति जानता है, और मैं कभी नष्ट नहीं हो सकता: और इसके विपरीत यदि मैं ठुकराया हुआ हूँ तो भला करने के लिए अपने आपको इतना कष्ट क्यों दूँ, जब मैं कभी बच नहीं सकता। तो ये (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) अपने विरोध उगलने और परमेश्वर की सच्चाई को उलटने नहीं आते: परन्तु वे वहीं लोटते हैं, और पशुओं के समान अपने पापों में पड़े रहते हैं। परन्तु हमें दोनों से सावधान रहना चाहिए, एक से भी और दूसरे से भी। और इसी कारण (जैसा मैंने कहा) मलाकी भविष्यद्वक्ता लोगों को दिखाते हुए कि जो कुछ उसने उनके लिए किया वह परमेश्वर की केवल और स्वतन्त्र उदारता से आया, उन्हें जीवन की पवित्रता का उपदेश देता है। और इसलिए जब हमें कहा जाता है कि परमेश्वर हमारे उद्धार का कर्ता है, और हम उसमें सेवा के लिए कुछ नहीं ला सकते, और फिर भी हमें सदा उसकी रक्षा में रखा जाना चाहिए, और जो उसने आरम्भ किया है उसे वह पूरा और सिद्ध करे, तो यह इसलिए न हो कि हम अपने दोषों की लगाम ढीली छोड़ दें: परन्तु वरन हमें अपने भय में बनाए रखे।

और सचमुच जब सन्त पौलुस कहता है कि ये गुप्त अक्षर हैं, और कि यह जानना कि परमेश्वर की सन्तान कौन हैं एक अगम्य भेद है, तो वह जोड़ता है: “जो कोई परमेश्वर का नाम लेता है, वह अधर्म से अलग रहे।” तो ध्यान दें कि परमेश्वर हमें बुराई करने का कोई अवसर नहीं देना चाहता था जब उसने हमारी योग्यताओं का कोई विचार किए बिना हमें चुना, और वह अपनी केवल भलाई से हमें थामे भी रखता है: परन्तु यह इसलिए है कि हम उसका आदर करें, और और भी अधिक सावधानी से चलें। और इसलिए हम उस पर लौट आएँ जिसका हमने स्पर्श किया: अर्थात् उसने हमें इसलिए चुना कि हम उसके सामने पवित्र और निर्दोष हों। यह सच है कि उसने हमें इसलिए नहीं चुना कि उसने हमें ऐसा पाया: परन्तु जब उसने हमें चुना, तो वह इसलिए था कि हम ऐसे बनें। इसलिए उचित है कि हम उसी ओर बढ़ें, और अपने जीवन के सब दिन यही हमारा लक्ष्य हो।

अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने गिरें, अपने दोषों को स्वीकार करते हुए, उससे प्रार्थना करते हुए कि वह हमें उन्हें इस रीति से अनुभव कराए कि वह हमें दीन करे, और सच्चे पश्चात्ताप की ओर खींचे, ताकि हम अपनी सब शारीरिक अभिलाषाओं और भावनाओं को त्याग दें: और इस प्रकार अपने आप में गिराए जाकर हम उसकी पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से प्रकाशित हों, कि अपने जीवन के सारे समय उसकी सेवा और आदर करें: और इस रीति से हम और भी अधिक उभारे जाएँ कि अपने आपको पूरी तरह उसे दे दें, यह जानते हुए कि हम सब कुछ उसकी केवल भलाई से पाते हैं: और यह उसके पवित्र नाम की महिमा के लिए हो, केवल मुख से नहीं वरन हमारे सारे जीवन से। कि न केवल, आदि।

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