अध्याय 11

याकूब और एसाव पर बारहवाँ उपदेश - उत्पत्ति 27:13-21

Sermons Concerning Jacob and Esau · John Calvin

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याकूब और एसाव पर बारहवाँ उपदेश - उत्पत्ति 27:13-21

13 परन्तु याकूब ने अपनी माता रिबका से कहा, “देख, मेरा भाई एसाव रोएँदार मनुष्य है, और मैं चिकनी त्वचा का हूँ।”

14 “कदाचित् मेरा पिता मुझे टटोले, और मैं उसकी दृष्टि में धोखा देनेवाला ठहरूँ; और इस प्रकार मैं अपने ऊपर आशीष नहीं, वरन् श्राप ले आऊँगा।”

15 उसकी माता ने उससे कहा, “हे मेरे पुत्र, तेरा श्राप मुझ पर पड़े। केवल मेरी बात मान, और जा, उन्हें मेरे पास ले आ।”

16 तब वह चला गया और उन्हें लेकर अपनी माता के पास आया; और उसकी माता ने वैसे ही स्वादिष्ट भोजन बनाए जैसे उसके पिता को प्रिय थे।

17 तब रिबका ने अपने ज्येष्ठ पुत्र एसाव के सबसे उत्तम वस्त्र, जो घर में उसके पास थे, लेकर अपने छोटे पुत्र याकूब को पहना दिए।

18 और उसके हाथों पर और उसकी चिकनी गर्दन पर बकरी के बच्चों की खालें लपेट दीं।

19 और जो स्वादिष्ट भोजन उसने बनाया था, वह रोटी समेत अपने पुत्र याकूब के हाथ में दे दिया।

20 तब वह अपने पिता के पास जाकर बोला, “हे मेरे पिता।” उसने कहा, “हाँ, मैं यहाँ हूँ; हे मेरे पुत्र, तू कौन है?”

21 याकूब ने अपने पिता से कहा, “मैं तेरा ज्येष्ठ पुत्र एसाव हूँ। जैसा तूने मुझे आज्ञा दी थी वैसा ही मैंने किया है; अब उठ, बैठ, और मेरे शिकार का मांस खा, कि तेरा प्राण मुझे आशीष दे,” इत्यादि।

यहाँ हमें उस विषय को आगे बढ़ाना है जो कल आरम्भ हुआ था: अर्थात् यह कि परमेश्वर ने इसहाक, रिबका और याकूब को ऐसी रीति से चलाया कि उनमें जो दोष थे, उनके होते हुए भी उसने याकूब को आशीष देने और एसाव को ठुकराने के विषय में जो ठहराया था उसे पूरा करने से हाथ नहीं खींचा। फिर भी इससे इसहाक अपनी ओर से निर्दोष नहीं ठहरता, मानो उसने घोर दोष न किया हो, और मानो वैसा ही दोष रिबका और याकूब में न पाया गया हो; परन्तु परमेश्वर ने उन्हें अनदेखा कर दिया। और इस प्रकार हम देखते हैं कि जब अपनी युक्ति को पूरा करने की बात होती है, तब परमेश्वर मनुष्यों की बाट नहीं जोहता, और न उन पर निर्भर रहता है। यह सच है कि वह उन्हें अपने काम में लगाता है; तो भी वह दिखाता है कि वह अकेला और अपने ही सामर्थ्य से कार्य करता है; और जब उसकी सृष्टि की वस्तुएँ उसके साधन बनकर उसकी सेवा करती हैं, तो वह उतनी ही दूर तक जितनी उसे भाती है, किसी आवश्यकता से बँधे होने के कारण नहीं; वरन् मनुष्यों की ओर से बातें चाहे बिलकुल उलटी चलती दिखाई दें, तो भी इससे प्रकट होता है कि उसकी शक्ति पर्याप्त है, यहाँ तक कि उसे दूसरों की किसी सहायता की आवश्यकता नहीं।

अब हमने कहा है कि याकूब के इस प्रसंग में देखा जा सकता है कि वह कैसे सन्देह में पड़ गया; और यह विश्वास के विपरीत था। इसलिए आवश्यक था कि परमेश्वर एक ओर से इस कमी को पूरा करे। जहाँ तक यह कहा गया है कि वह श्राप उठाएगा, वह इसलिए कि वह जानता था कि उसका पिता इसके लिए ठहराया गया है कि वह एक उत्तराधिकारी को नियुक्त करे, केवल सांसारिक और क्षणभंगुर लाभों के लिए नहीं, वरन् उस प्रतिज्ञा के लिए जो आत्मिक जीवन से सम्बन्ध रखती है। वह यह जानता था; और इसलिए उसने केवल एक नश्वर मनुष्य का नहीं, वरन् जीवते परमेश्वर का आदर किया। अब रिबका के विषय में, वह कहती है कि श्राप उस पर पड़े। हम देखते हैं कि वह (जैसा कल बताया गया) इस रीति से बह गई थी कि मानो अटकल से बोल रही थी; परन्तु इसमें सन्देह नहीं कि इस बीच वह यह नहीं जानती थी कि इससे कोई हानि नहीं हो सकती। यह सच है कि उसने अपने दोष पर ध्यान नहीं दिया। क्योंकि यद्यपि उसके पास परमेश्वर की आज्ञा मानने का, और इस प्रकार काम करने का कि उसका चुनाव पूरे बल से स्थिर रहे, अच्छा आधार था, तो भी उसे इस बीच ऐसी चतुराई को चलने नहीं देना चाहिए था जिसमें छल और झूठ के सिवा कुछ न था।

क्योंकि परमेश्वर (जैसा हम कह चुके हैं) अपना कार्य पूरा करने और अपनी युक्ति को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त समर्थ है; उसे हम से कुछ उधार लेने की आवश्यकता नहीं। इसलिए और भी अधिक कारण से यह उचित नहीं कि हम अपने झूठ से उसके सत्य को आगे बढ़ाने का यत्न करें। परन्तु रिबका ऐसा करती है; इसलिए इस विषय में उसे निर्दोष नहीं ठहराया जा सकता। परन्तु यह उदाहरण हमारे सामने इसलिए नहीं रखा गया कि हम भी वैसा ही कल्पित करें; क्योंकि ऐसा होता है कि हर प्रयास में हम अपनी कल्पनाएँ मिलाने को तैयार रहते हैं कि हमारे काम अच्छे से चलें; और यह वैसा ही है मानो हम समझते हों कि परमेश्वर यथेष्ट बुद्धिमान नहीं, अथवा यथेष्ट बलवन्त नहीं, या कार्य को भले अन्त तक पहुँचाने के साधन उसके अपने हाथ में नहीं। परन्तु ऐसा करके हम (जैसा कोई कहे) परमेश्वर पर अंकुश लगाते हैं; मानो कहते हैं, ठीक है, वह कार्य करे, पर किस रीति से? अपनी युक्ति और अपनी शक्ति और अपने असीम पराक्रम के अनुसार नहीं, वरन् किसी हल्की बात के अनुसार; और हम चाहते हैं कि पहले वही बात की जाए जिसे हमने अपने ही मस्तिष्क में सोचा और गढ़ा है। क्योंकि हम कहेंगे, मुझे यह अच्छा लगता है, यह बहुत अच्छा और आवश्यक उपाय होगा। परन्तु क्या हम इतने अति-बुद्धिमान हैं? कि हमें तुरन्त इस बात का बीड़ा उठाना है, और इस प्रकार हाथ डालना है?

परन्तु ध्यान दो, परमेश्वर ने अपने वचन में ऐसा नहीं ठहराया। देखो, यह कैसा असह्य दुस्साहस है। फिर भी यह बहुत सामान्य है, और हर एक अपने भीतर इस दोष का बीज पाएगा। परन्तु इस कारण हमें और भी अधिक सीखना चाहिए कि अपनी ओर से कुछ न जोड़ें, क्योंकि हमारे भीतर सदा यह बिगड़ा हुआ मिश्रण रहता है जिसे हमें किसी न किसी रीति से अपने सिरों से निकाल फेंकना है। और जब हम इस प्रकार अपने ही ढंग और रीति से काम करेंगे, तो बिगाड़ने और सब कुछ उलट देने के सिवा कुछ न करेंगे। परन्तु यदि परमेश्वर हम पर ऐसे दोष नहीं लगाता और तो भी अपना कार्य पूरा करता है, तो इसलिए नहीं कि हम उस पर घमण्ड करें; जैसा प्रायः वे लोग कह सकते हैं जिन्होंने अति चतुराई की है, अरे, यह तो भली भाँति निभ गया; हाँ, परन्तु इसका कारण यह है कि परमेश्वर ने इस मूर्खता को क्षमा किया, और फिर भी वह हमें थामे रखने से नहीं चूकता, यद्यपि हम इसके योग्य न थे। इसलिए हम यह सीखें कि जब परमेश्वर उस बात को सफल करे जिसका प्रयास हमने बुरी और दुष्ट रीति से किया था, तब किसी भी प्रकार अपने दुस्साहस का बचाव न करें; वरन् इतना ही अधिक उसकी दया की बड़ाई करें, जब हम देखें कि यद्यपि हम उसके विरुद्ध लड़े, और जहाँ तक हमारे वश में था उसके कार्य में विलम्ब कराने का यत्न किया, तो भी उसने उसे अपनी गति देने से हाथ नहीं खींचा। इस स्थान के विषय में हमें संक्षेप में यही सीखकर ले जाना है।

अब आगे यह है कि याकूब दो बकरी के बच्चे लाने गया, जिन्हें वह अपनी माता के पास लाया कि वह स्वादिष्ट मांस पकाए, जैसा वह जानती थी कि इसहाक को प्रिय है। और उसके बाद उसने याकूब को एसाव के वस्त्र पहनाए, और खालें उस पर इस प्रकार डालीं कि वह रोएँदार और खुरदुरा मनुष्य प्रतीत हो।

परन्तु यहाँ मनुष्य यह निर्णय कर सकते हैं कि यह बहुत बचकाना काम और निरा खिलौना था, क्योंकि वह नकली भोजन था, क्योंकि उसने शिकार के मांस के स्थान पर बकरी के बच्चे का मांस लिया; और जब पिता ने खा लिया और भली भाँति तृप्त हो गया, तब उसने पुत्र को आशीष दी, और यह मानो उसके भोजन का प्रतिफल था; और फिर याकूब भेस बदलकर आया, मानो रंगमंच पर अपने भाई एसाव का स्वांग भर रहा हो, उसके वस्त्रों के बहाने, और उसके पास उसके जैसी गर्दन और हाथ थे; और इस सब में हँसी की बात के सिवा कुछ न दिखाई दिया। परन्तु इसलिए कि हम श्रद्धा में बने रहें और इस इतिहास से लाभ उठाएँ, आओ हम परमेश्वर के उस चुनाव की ओर देखना सीखें जिसका उल्लेख पहले हो चुका है। क्योंकि यदि हमारे पास यह नींव न हो, तो निश्चय है कि जो कुछ मूसा वर्णन करता है उस सब में हमें कोई ऐसी बात न मिलेगी जो हमें उभारे, या हमें यह प्रतीति दिलाए कि यह सब ऊपर से चलाया और संचालित किया गया था।

परन्तु जब हम इस बात के विषय में निश्चित हो जाएँ कि परमेश्वर ने याकूब के जन्म से पहले ही उसे जेठांश दे दिया था; तो भी इन बातों को अविवेकी उत्साह वाले मनुष्यों के द्वारा ऐसी मूर्खता से सम्पन्न होते देखकर हमें यह ध्यान देना है कि इस कारण हम यह कहना नहीं छोड़ते: देखो, परमेश्वर जो सदा अपरिवर्तनशील है; यद्यपि मनुष्य अपने हठीले साहस और मूर्खतापूर्ण धृष्टता से सब कुछ उलट-पलट और अस्त-व्यस्त कर देते हैं, तो भी उसकी युक्ति पूर्ण और सिद्ध बनी रहनी अवश्य है। इसलिए यही बात हमें ध्यान में रखनी है कि हम इस इतिहास से लाभ उठा सकें। फिर, जब यह कहा गया है: कि याकूब अपने पिता के पास आया और उससे कहा: मैं तेरा पुत्र एसाव हूँ, खा और पी। इससे हम देख सकते हैं कि जब मनुष्य एक बार अविवेकी उत्साह से कुछ करने का यत्न करते हैं तो कैसे अपने आप को कठोर कर लेते हैं, और कैसे अधिकाधिक निडर होते जाते हैं। आरम्भ में याकूब ने सन्देह किया: यदि मैं (वह कहता है) अपने पिता के सामने ठट्ठा करनेवाला ठहरूँ, तो वह मुझे श्राप देगा; परन्तु थोड़ी ही देर में उसे किसी बात की चिन्ता नहीं रहती, वह ऐसी निडरता और खुलेपन से बोलता है मानो उसे निश्चय हो कि वह एसाव के स्थान पर है। परन्तु इससे हमें यह ध्यान रखना है कि कुछ भी आरम्भ करने से पहले सोचें कि क्या हमें परमेश्वर की अनुमति है, और क्या वह हमारी अगुवाई करेगा: और यह देखें कि हमारे सारे काम और उद्यम में निरी आज्ञाकारिता के सिवा कुछ न हो। क्योंकि यदि हम एक बार (जैसा कहते हैं) अपनी सीमाएँ तोड़ने लगें, और यह-वह करने की कल्पना करें, तो चाहे आरम्भ में हमें कुछ झिझक रही हो और हमने उसमें बड़ी कठिनाई मानी हो, अन्त में हम आँखें मूँदकर आगे बढ़ जाएँगे; और जब संसार की सारी आपत्तियाँ हमारी आँखों के सामने आएँगी, तब भी हम हठी बन जाएँगे।

सो जब मनुष्य अपनी मूर्खतापूर्ण और उतावली युक्तियों में इतने कठोर हो जाते हैं, और हम अपने पिता याकूब में इसका ऐसा प्रसिद्ध उदाहरण देखते हैं, तो और भी अधिक (जैसा मैं कह चुका हूँ) हमें सावधान रहना चाहिए कि जब तक हम न जान लें कि परमेश्वर हमारे किए को स्वीकार करेगा, और हमने उसके वचन से सम्मति न ले ली हो, तब तक उँगली भर भी न हिलें। क्योंकि तब हम अत्यधिक निडर नहीं हो सकते जब हम उसके अधीन रहेंगे, और हम में अपनी कल्पना के पीछे चलने का कोई मूर्खतापूर्ण अहंकार न होगा। परन्तु हम अपने आप से कोई भी काम, चाहे कितना ही छोटा हो, नहीं कर सकते, जो अति न हो। इसलिए (जैसा मैंने कहा है) हम भली रीति से आरम्भ करना सीखें, कि ऐसा अन्त हो जैसा हमें चाहिए। परन्तु जो बात यहाँ मूसा में लिखी है, उसमें हमें एक उपयुक्त प्रतिरूप मिल सकता है: और वह यह है कि यद्यपि इसहाक धोखा खा गया, कि एसाव वहाँ नहीं था, और याकूब ने अपनी चालाकियों से आशीष पाई, तो भी इस सब के होते हुए हमारे यहाँ उस आशीष का चित्र है जो परमेश्वर की ओर से हमें दी जाती है: क्योंकि इफिसियों के पहले अध्याय में कहा गया है कि हम सब स्वर्गीय अनुग्रहों और आत्मिक वरदानों से आशीषित हैं। और किस रीति से? पौलुस जोड़ता है, यीशु मसीह में: क्योंकि यदि परमेश्वर हमारे व्यक्तित्वों को देखे, तो हम अवश्य उसके बैरी होंगे, और उसे पाप के कारण हम से घृणा करनी ही होगी। इसलिए जब ऐसा है, तो हमारा अपने से बाहर आशीषित होना आवश्यक है: अर्थात् अपने सिर के व्यक्तित्व में।

और फिर, हमें अपने प्रभु यीशु मसीह का वस्त्र पहनना होगा। क्योंकि हम क्या ला सकते हैं, सिवाय पूरी मलिनता और अशुद्धता के? हम सर्वथा अधर्म में रचे गए हैं: इसलिए हम परमेश्वर के सामने दुर्गन्ध के समान होंगे: परन्तु जब हम उसके एकलौते पुत्र की आज्ञाकारिता से ढके होते हैं, तब, देखो, वह सुगन्ध बन जाती है जिसमें हम उसे ग्रहणयोग्य ठहरते हैं। इसलिए यद्यपि (जैसा मैं कह चुका हूँ) मनुष्यों की दृष्टि में सब गड़बड़ के सिवा कुछ न था, और (जैसा कहते हैं) सब कुछ घालमेल हो गया था, तो भी हम इसे अपने लाभ के लिए लगा सकते हैं। याकूब सारी कलीसिया का दर्पण था: और फिर भी हम उसके व्यक्तित्व में आशीषित हुए, जैसे वह अपने बड़े भाई के व्यक्तित्व में आशीषित हुआ। क्योंकि यहाँ प्रश्न हर बात में पूरी समानता ढूँढ़ने का नहीं है। यदि कोई कहे कि एसाव यीशु मसीह के समान न था: तो यह बिलकुल सच है: परन्तु तुलना में यह आवश्यक नहीं कि हर अंग और अंश आपस में मेल खाए: इतना पर्याप्त है कि हम कुछ अंश में कोई मेल और समानता देखें: जैसा कहा गया है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह का आना रात में चोर के समान होगा। और क्या? क्या वह चोरी करेगा? ऐसा सोचना मूर्खता होगी: परन्तु इतना पर्याप्त है कि हम देखें कि जो संसार में सो रहे हैं वे अचानक पकड़े जाएँगे। इसलिए अब जब वह एसाव के जेठांश की बात करता है, और यह कि इसहाक परमेश्वर के व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करता था, और याकूब अपने भाई के वस्त्र और रूप के अधीन आशीषित हुआ: तो इसमें हम देखते हैं कि वह बात पूरी हुई जिसका हमने अभी उल्लेख किया: अर्थात् यह कि यदि हम अपने ही नाम से और अपने ही व्यक्तित्व में परमेश्वर के सामने अनुग्रह पाने आएँ तो हम ठुकराए जाएँगे: परन्तु जब हम हमारे प्रभु यीशु मसीह की छाया में वहाँ आएँगे, जो परमेश्वर की सब सन्तानों में पहलौठा है। देखो, हम किस प्रकार ग्रहण किए जाते हैं। तो भी कहा गया है:

कि इसहाक ने पूछा, हे मेरे पुत्र, तू कौन है? मैं तेरा पुत्र एसाव हूँ?

परन्तु इसमें वह अपने आप पर भरोसा नहीं करता, और यद्यपि ऐसा प्रतीत हो सकता है कि कुछ छल था: क्योंकि वह उससे कहता है:

पास आ, कि मैं तुझे टटोलूँ, कि तू मेरा पुत्र एसाव है या नहीं। हम यहाँ देखते हैं कि इसहाक ने सन्देह किया, और तो भी परमेश्वर की दृष्टि में आशीष का अपना प्रभाव और सामर्थ्य बना रहा: जैसा यह भी कहा गया है कि उसने उसे परमेश्वर के सामने आशीष दी। परन्तु यह बिलकुल सच है कि यदि हमारी आँखें इसहाक पर लगी रहें, तो हम कहेंगे कि यह कार्य बुरी रीति से चलाया गया, और वह किसी प्रकार की सिद्धता में गिने जाने के योग्य न था: परन्तु परमेश्वर ने इसे सम्पन्न किया (जैसा मैं कह चुका हूँ), और केवल तब नहीं जब निम्न साधन विफल हुए, वरन् तब जब वे विपरीत थे, और ऐसा प्रतीत हुआ कि यह जो ठहराया गया था उसे सर्वथा मिटा देना था। परन्तु और भी अधिक हमें भली भाँति ध्यान देना चाहिए कि चाहे परमेश्वर अपने कार्य में मनुष्यों को काम में लाए, और उन्हें यह आदर दे कि वे उसमें साधन बनकर सेवा करें, तो भी उनकी ओर से कुछ नहीं है: और हम कह सकते हैं: न तो लगानेवाला कुछ है, और न सींचनेवाला। परन्तु यहाँ इसहाक ने लगाने और सींचने के स्थान पर परमेश्वर की आशीष को उखाड़ा और काट डाला, कि वह बंजर और निष्फल हो जाए। परन्तु जो भी हो, इसमें परमेश्वर की सेवा हुई। क्योंकि चाहे उसने लगाया या सींचा हो, उसने वह केवल अंश में किया: उसने वह पूरी तरह और जैसा चाहिए था वैसा नहीं किया: और तो भी इस बीच (जैसा मैं कह चुका हूँ) परमेश्वर की भलाई उन सब बातों पर प्रबल रही जो उसकी सृष्टि में दोषपूर्ण और बुरी थीं।

जो भी हो, हम भली भाँति कह सकते हैं कि इसहाक सन्देह करके इस योग्य ठहरा कि उस पद और कार्यभार से वंचित किया जाए जो उसे दिया गया था, अर्थात् यह कि उसने परमेश्वर का वह अनुग्रह खो दिया था जिसमें सारे जगत का उद्धार समाया हुआ था। देखो, वह निधि जो उसे सौंपी गई थी: परन्तु वह अपने अविश्वास के कारण उससे छीन लिए जाने के योग्य ठहरा। परन्तु परमेश्वर ने ऐसा नहीं चाहा। और इसका श्रेय हम किसे दें? अवश्य ही यहाँ उसकी दया की बड़ाई होनी चाहिए, क्योंकि मनुष्य में न केवल इसके लिए कोई सहायता थी, न कोई ऐसी बात जो इसके अनुरूप हो, वरन् सब कुछ इसके बिलकुल विरुद्ध था। और फिर भी यह ध्यान दें कि उससे अधिक किसी को परमेश्वर ने जड़ बुद्धि न किया था। यह सच है कि हमने पहले देखा कि उसकी आँखें धुँधली थीं, और वह बुढ़ापे से ऐसा दुर्बल था कि आधा मरा हुआ-सा मनुष्य था: परन्तु यह स्वाभाविक रीति से नहीं हुआ कि याकूब का शब्द सुनकर वह इतनी बुरी रीति से धोखा खाए कि उसने एक बार भी न सोचा, “इस बात में कोई छल है।” वह इसमें सन्देह करता है, और तो भी आगे बढ़ता है, और चाहे अपनी इच्छा के विरुद्ध ही सही, उसने एसाव के स्थान पर याकूब को आशीष दी। इसलिए अवश्य परमेश्वर ने उसे जड़ बुद्धि किया था, यहाँ तक कि वह केवल बुढ़ापे के कारण न था। और यही वह बात है जो मैंने कही है, कि परमेश्वर ने अपना कार्य इस रीति से चलाया कि यद्यपि मनुष्य उसे रोकें और बाधा डालें और ऐसा प्रतीत हो कि वे बिलकुल उलटी दिशा में खींचेंगे, तो भी अन्त और परिणाम ऐसा हुआ कि प्रकट होता है कि परमेश्वर ने वही पूरा किया जो उसने घोषित किया था, अपने उस गुप्त चुनाव के अनुसार जो जगत की सृष्टि से पहले किया गया था। और इसलिए हम जानते हैं कि इसहाक ने जो कुछ किया उस सब में एक प्रकार की जड़ता के सिवा कुछ न था, कि वह इतना मन्दबुद्धि था: उसमें समझ न थी, उसने कुछ न पहचाना, न उसे कोई विवेक था, और तो भी परमेश्वर इसे प्रबल करता है। किस रीति से? वह उस रोटी को जो हम खाते हैं हमें पोषण देने की सामर्थ्य वाली कैसे बनाता है? जब हम भली भाँति खा-पी चुकें और ताज़ा और तृप्त हो जाएँ, यहाँ तक कि जो अपनी बाँह या अपनी टाँगें न मोड़ सकता था, उसे यात्रा करने के लिए नया बल मिल जाए। क्या हम कहें कि यह इसलिए है कि रोटी में कोई शक्ति, कोई जीवन, या कोई गति है? परन्तु जब हम देखते हैं कि रोटी हमें वह देती है जो उसके पास नहीं, और अन्न और दाखमधु और अन्य भोजन भी: तो यह हमें दिखाने के लिए है कि परमेश्वर अपनी सृष्टि की वस्तुओं को किसी कार्य में इस प्रकार काम में नहीं लाता कि हम उसी में उलझे रहें जो हमें आँख से दिखाई देता है: वरन् हम सदा इसी ओर झुके रहें, कि जैसे वह प्रकृति का क्रम ठहराता है, और वैसे ही हमें चलाता और संचालित करता है, हाँ, और प्रकृति के विरुद्ध भी: कि बहुत बार वह उसके बिलकुल विपरीत कार्य करेगा जो हमारा अभ्यस्त है, यहाँ तक कि हम चकित रह जाएँगे: और विशेषकर तब जब हमारे उद्धार का प्रश्न हो। और फिर भी हमें यह कल्पना नहीं करनी चाहिए कि हम अपनी ओर से कुछ वहाँ लाते हैं: वरन् परमेश्वर ही को सब कुछ पूरा करना है, जिसने आरम्भ किया और पूरा करेगा। और फिर यदि वह किसी अनोखी और अनहोनी रीति से कार्य करे, और केवल बाहरी रूप में मूर्खता ही दिखाई दे: तो हम जान लें (जैसा पौलुस कहता है) कि परमेश्वर की मूर्खता संसार की सारी बुद्धि से अधिक बुद्धिमानी है।

अब वह इसे परमेश्वर की मूर्खता कहता है, हमारी धारणा के अनुसार: क्योंकि वह तुच्छ रीति से कार्य करता है, कि हम उसमें चकित होकर सोचें, “परमेश्वर क्या कहना चाहता है? ऐसा लगता है कि वह हँसी-ठट्ठा करता है।” हम इससे ठीक यही निष्कर्ष निकालेंगे। और इसी कारण पौलुस कहता है कि यह मूर्खता है, क्योंकि मनुष्य अपनी बाहरी इन्द्रियों पर टिके रहते हैं। परन्तु जो भी हो, यह संसार की सारी बुद्धि से बढ़कर है। देखो, हमें क्या सीखकर ले जाना है। और जब हम इस पाठ को भली भाँति स्मरण रखेंगे, तब हम उन बहुत से चंचल मस्तिष्क वालों के समान न होंगे, जो इन सब घटनाओं को यों ही मान लेते हैं और इस पर अपने आप को ठट्ठे में उड़ाते हैं, मानो जो कुछ मूसा ने यहाँ वर्णन किया है वह (जैसा कोई कहे) बस मूर्खतापूर्ण बकवास के सिवा कुछ नहीं।

परन्तु जब हम वह सीख लेंगे जो पौलुस के द्वारा हमें यहाँ दिखाया गया है, तो निश्चय है कि हम में एक और ही प्रकार की संयमशीलता होगी, और हम परमेश्वर के रहस्य की आराधना करना न छोड़ेंगे, चाहे पहली दृष्टि में वह अपनी महिमा प्रकट न करे: वरन् हम सदा आदि और अन्त की ओर देखेंगे, और उन साधनों की ओर नहीं जो हमें ठोकर का कारण दें और हम में ठोकर उत्पन्न करें, या जो हमें निगल जाएँ। संक्षेप में, हम देखते हैं कि परमेश्वर ने इसहाक को इस रीति से चलाया कि वह सर्वथा अन्धा था: इसलिए हम यह न कहेंगे कि परमेश्वर ने यहाँ इसहाक को कोई दृष्टि दी कि वह वह कर सके जो उसके पद का कार्य था, कारण भली भाँति जानते हुए और बात की सारी कार्यवाही को जानते हुए: वरन् वह अन्धा किया गया था, और फिर भी परमेश्वर ने उसे मानो हाथ से थामे रखा, और उसे ऐसे अन्धे की नाईं चलाया जो कुछ नहीं देखता।

और सचमुच हम कलीसिया में इसके अनुरूप, या इसके बहुत निकट की, कोई बात देखते हैं: क्योंकि (जैसा कल कहा गया) सुसमाचार का प्रचार हर एक विश्वास करनेवाले के लिए उद्धार के निमित्त परमेश्वर की सामर्थ्य है। इसलिए जब हम परमेश्वर के उस अनुग्रह का प्रचार करते हैं जिससे हमारा मेल-मिलाप हुआ, क्योंकि हमारे अपराध हमारे प्रभु यीशु मसीह में क्षमा किए गए, और वह लहू जो उसने हमारे लिए बहाया, उनकी सच्ची शुद्धि है, कि हमें शुद्ध करे: तो देखो, परमेश्वर ही है जो स्वर्ग खोलता और हमें अपने पास बुलाता है, यद्यपि वचन एक मनुष्य के मुँह से निकलता है।

परन्तु इस बीच मैं नहीं जानता कि इससे किसे लाभ होगा: क्योंकि हर एक अपने विश्वास का साक्षी होगा: और जब मैं बोलूँ और उसमें मेरा अपना भाग न हो, तो मुझ पर हाय: और मैं अन्धे से भी बढ़कर होऊँगा: जैसे वे भी रहे हैं जिन्होंने सुसमाचार का प्रचार किया, और परमेश्वर के अनुग्रह के साक्षी हुए, और बेचारे पापियों को उद्धार की ओर खींचा, तो भी उनके लिए दण्ड के सिवा कुछ न बचा। और ऐसा क्यों? क्योंकि वे नाटक के पात्रों के समान हैं जिनमें न लगन है न उत्साह। इसलिए परमेश्वर प्रायः ऐसे लोगों से अपनी सेवा करवाता है जो किसी काम के नहीं, जो कुत्तों के समान हैं, और निपट कचरा हैं: और तो भी वे उसकी सामर्थ्य के सेवक हैं कि उन्हें उद्धार की ओर खींचें जो विनाश के मार्ग पर हैं।

फिर ऐसे भाड़े के लोग भी हैं जो अपने पेट के लिए प्रचार करते हैं, और अपने सिवा उन्हें किसी का ध्यान नहीं, अथवा अपने आप को बहुत आदरणीय बनवाना चाहते हैं: और तो भी वे सब विश्वास करनेवालों के उद्धार के लिए परमेश्वर के साधन हैं। और प्रायः जो सर्वोत्तम हैं, मेरा आशय उनसे है जो अपना कर्तव्य सबसे विश्वासयोग्यता से निभाते हैं, कि बेचारे पापियों को उद्धार के लिए बुलाएँ, और सब दूसरों के लिए मार्गदर्शक और आदर्श बनें: उन्हें भी यह पता नहीं चलेगा कि परमेश्वर क्या करेगा। और ऐसा क्यों? वे बीज बोते हैं और नहीं जानते कि परमेश्वर उसे कैसे फलदायी बनाएगा: और प्रायः वे आशीष देने की आशा रखते हैं, और श्राप देते हैं। और किस कारण? क्योंकि अवश्य है कि परमेश्वर का बदला सब तुच्छ जाननेवालों के लिए तैयार रहे। सुसमाचार इसलिए प्रचारित किया जाता है कि हम सब परमेश्वर को अपने प्रति दयालु पाएँ: परन्तु बहुत से ऐसे हैं जो अपनी अवज्ञा और कृतघ्नता से अपने ऊपर अपना ही दण्ड का ढेर लगा लेते हैं: क्योंकि सुसमाचार उनके लिए, जैसा पौलुस कहता है, मृत्यु की ओर ले जानेवाली मृत्यु की गन्ध होगा: अर्थात् प्राणघातक गन्ध, कि केवल उसकी साँस ही उन्हें निगल जाने को बहुत है: जैसा हम आज भी देखते हैं, कि परमेश्वर अपने वचन के सेवकों के द्वारा कार्य करता है, कि कुछ पूरी तरह अन्धे हैं, कुछ अंश में अन्धे हैं: क्योंकि जिन भाड़े के लोगों की हमने बात की, वे सर्वथा जड़ हैं और कुछ नहीं जानते: परन्तु भले और विश्वासयोग्य सेवक, यद्यपि ऐसा हो कि वे जानते हैं कि उनकी आँखें धुँधली हैं, तो भी वे नहीं जानते कि परमेश्वर उनके परिश्रम को किस रीति से या कैसे फलदायी बनाएगा: और प्रायः उनका उद्देश्य बिलकुल उलट जाता है।

इसलिए हमें यही सीखना है। और इस बीच, क्योंकि परमेश्वर ने हम पर प्रकट कर दिया है कि उसका वचन स्वर्गीय जीवन का खुला मार्ग है, और वह उस सब की पुष्टि करेगा जो मनुष्यों के द्वारा यहाँ उसके नाम से सुनाया जाएगा: तो हम उसी पर टिके रहें और सन्देह न करें (चाहे हम में कोई भी कमी हो, बोलनेवाले के विषय में भी और सुननेवाले के विषय में भी): कि फिर भी जब हम इस वचन को विश्वास से ग्रहण करेंगे, और वह हमारे सामने विश्वासयोग्यता और सच्चाई से बाँटा जाएगा, तो हम इस आशीष के भागी होंगे।

और इसमें हम पोपतन्त्र के उन सब झूठे अभागों की पशुता देख सकते हैं: क्योंकि देखो, उन्होंने उस मूर्ति की नींव किस बात पर रखी है जो उनके पास है, कि रोटी के एक टुकड़े को ईश्वर बना लें: वे कहते हैं कि यदि पुरोहित का अभिप्राय पवित्र करने का न हो तो कुछ नहीं होता, और रोटी जो ईश्वर में बदल जाती है, वह पवित्र करनेवाले के अभिप्राय से होती है, इसलिए यदि वे यह शर्त न रखें तो अपने सब मिस्साओं में (मैं उन्हीं की शिक्षा की बात कहता हूँ) उन्हें मूर्तिपूजक होना पड़ेगा। क्योंकि हम क्या जानें (वे कहते हैं) कि पवित्र करनेवाला पुरोहित अपना काम जैसा चाहिए वैसा करता है या नहीं, और उसका मन अपनी रसोई या दासी पर तो नहीं: क्योंकि ऐसा करने से रोटी रोटी ही रहती है: कोई ईश्वर नहीं: और ऐसा क्यों? क्योंकि वे कहते हैं, यदि उसका अभिप्राय वहाँ न हो तो कुछ नहीं। परन्तु यह बिलकुल सच है कि वे भली भाँति दिखाते हैं कि एक भूल दूसरी को कैसे खींच लाती है: क्योंकि उन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि रोटी का हमारे प्रभु यीशु मसीह के तत्त्व में परिवर्तन हो जाता है, जिसके लिए उन्होंने वही मन्त्र गढ़ा है: वे तुरन्त अभिप्राय जोड़ देते हैं: परन्तु तो भी हम देखते हैं कि वे संस्कारों के स्वभाव के विषय में कुछ नहीं जानते। अब मैं उस परिवर्तन की बात छोड़ता हूँ जो वे कल्पना करते और तत्त्वान्तरण कहते हैं: परन्तु यदि संस्कार का करानेवाला, जिसके पास यह कार्यभार और बुलाहट है, लोगों को अपने अभिप्राय से बाँधे रखे: तो यह कैसा होगा? कोई दुष्ट मनुष्य जो बपतिस्मा दे, वह परमेश्वर का उपहास कर सकता है, और इस रीति से संस्कार को सर्वथा निष्फल कर सकता है, और फिर जब वह प्रभु-भोज का संस्कार कराएगा, तब बेचारे लोग उसमें उपहास का पात्र बनेंगे, जो वहाँ अपने उद्धार का प्रतिभू-चिह्न खोजने आते हैं: वह उसमें प्रत्यक्ष रूप से परमेश्वर को तुच्छ जानता है। संक्षेप में, उन्हें परमेश्वर की सामर्थ्य को (जिसे वह संस्कारों में सबसे उत्तम रीति से प्रकट करता है) अपनी मुट्ठी में बन्द रखना होगा। और यह कैसी निन्दा है, और कितनी घृणित? परन्तु देखो, वे कहाँ तक आ पहुँचे हैं। क्योंकि निश्चय है कि मिस्सा में यदि उनके पास कोई स्वर्गदूत भी होता, तो भी वह कभी शैतानी बात होने से न रुकता: परन्तु इसके विपरीत यदि जो प्रभु-भोज कराया जाता है उसमें शैतान भी होता, तो भी वह परमेश्वर को अपना कार्य पूरा करने से रोक नहीं सकता। हमें प्रभु-भोज में रोटी या दाखमधु देनेवाले की योग्यता को नहीं देखना चाहिए: परन्तु परमेश्वर ने हमें इसमें ऐसी शिक्षा दी है कि उसने दृश्य चिह्न को सामर्थ्य दी है: वही अपने पवित्र आत्मा के द्वारा कार्य करता है, कि हम जब वहाँ आएँ तो धोखा न खाएँ, वरन् सचमुच उससे मिलाए और जोड़े जाएँ। देखो, इस स्थान पर हमें यह सीखकर ले जाना है, कि इससे लाभ उठाएँ। अब आओ उस आशीष पर आएँ जो इसहाक ने दी। अपने पुत्र को चूमने के बाद वह कहता है:

“देख, मेरे पुत्र की गन्ध उस खेत की गन्ध के समान है जिसे परमेश्वर ने आशीष दी है।”

यद्यपि हम देखते हैं कि वह धोखा खा गया, तो भी इस उधार के वस्त्र की गन्ध के अधीन वह अपने पुत्र याकूब को ऐसे स्वीकार करता है मानो वह उसका पहलौठा हो। देखो, वह गन्ध जिससे हम परमेश्वर के ग्रहणयोग्य ठहरते हैं, उसी से आती है जो घर में पहलौठा है, अर्थात् हमारे प्रभु यीशु मसीह से। फिर वह जोड़ता है:

“प्रभु तुझे आकाश की ओस और भूमि की उत्तम उपज, बहुतायत से अन्न और दाखमधु दे।”

यहाँ, पहली दृष्टि में, कोई यह समझेगा कि इस आशीष का अर्थ इसके सिवा कुछ नहीं कि याकूब मोटा-ताज़ा और भली भाँति पोषित हो: क्योंकि इसहाक यहाँ किसी आत्मिक वरदान का उल्लेख नहीं करता, जैसा हमने पहले दिखाया है कि याकूब को सांसारिक सुख-सुविधाओं, धन, लाभ या सुखों के लिए आशीषित होना नहीं था: तो इन बातों का मेल कैसे बैठे? परन्तु हमें वह नियम थामे रखना है जो पवित्र शास्त्र में हमें दिया गया है: अर्थात् यह कि परमेश्वर का अनुग्रह सदा मानो किन्हीं प्रतीकों में लिपटा रहा, जब तक हमारा प्रभु यीशु मसीह न आया। क्योंकि जब पुरखे अपने पापों की क्षमा पाना चाहते थे, तो वे किसी पशु का वध करते और लहू बहाया जाता: कभी चर्बी जलाई जाती, और लहू छिड़का जाता। और क्या, मैं तुम से विनती करता हूँ, एक पशु हमारे उन पापों को मिटा सकता है जिनके हम दोषी हुए हैं? इसलिए यह एक चिह्न और प्रतीक था जो परमेश्वर ने उन्हें दिया, कि उन्हें जताए कि उनके अशुद्धता से शुद्ध होने का और कोई उपाय नहीं, सिवाय परमेश्वर के एकलौते पुत्र के लहू के, और उस बलिदान के जो वह पूरा करेगा। इसलिए जो आशीष इसहाक ने याकूब पर सुनाई, वह केवल उल्लिखित सांसारिक आशीषों के लिए न थी, वरन् उसका एक गहरा आत्मिक अर्थ था। वह उन आशीषों का पूर्वचित्रण था जो यीशु मसीह के द्वारा आनेवाली थीं, जो सब आशीषों का, सांसारिक और आत्मिक दोनों का, परम स्रोत है।

और इस दृष्टि से कनान देश उनके लिए मानो बयाना और गिरवी था, कि परमेश्वर ने उनके लिए इस संसार से उत्तम एक मीरास ठहराई है। क्योंकि वे उस देश को लौट सकते थे जहाँ वे जन्मे थे, जो यहूदिया के इस देश से अधिक उपजाऊ था, जैसा प्रतीत होता है। देखो, अब्राहम और इसहाक अकाल से पीड़ित हुए, और यदि वे केवल यही देखते कि यहाँ पृथ्वी पर पोषण पाएँ, तो वे उस प्रतिज्ञा के देश को छोड़ देते। परन्तु वे वहीं टिके रहे। और किसलिए? क्या अपनी मृत्यु के बाद उसका उपभोग करने के लिए? अवश्य ही उन्हें इस दृश्य पृथ्वी से कहीं ऊँची बात सोचनी पड़ी, और उसे किसी और दृष्टि से लेना पड़ा, यह कहने के लिए कि हमारे पास यहाँ वह सब है जो हम चाह सकते हैं। परन्तु उन्होंने कनान देश को उस बयाने के रूप में लिया जो परमेश्वर ने उन्हें दिया था, जब तक वे उस स्वर्गीय जीवन के अधिकार में न पहुँचें।

इसलिए जब हम याकूब की इस आशीष में देखते हैं कि वह आकाश की ओस, भूमि की उत्तम उपज, और बहुतायत के अन्न और दाखमधु की बात करता है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि इसहाक केवल इसी के लिए प्रार्थना करना चाहता था कि उसका पुत्र बाड़े के सूअर की नाईं पाला जाए, और यहाँ नीचे मोटा और तृप्त हो: वरन् उसने वह क्रम माना जो परमेश्वर ने उस समय ठहराया था: अर्थात् यह कि वह उन्हें कहीं उत्तम वस्तु के बयाने देता था। और यह कि ऐसा ही है, इसहाक थोड़ी देर बाद जोड़ता है:

“कि उसका पुत्र अपने शत्रुओं पर प्रभुता करे, और सब जातियाँ उसके सामने घुटने टेकें।”

और वह उसे यह किस अधिकार से देता है? देखो, इसहाक एक दीन परदेशी है जिसे वह भूमि किराये पर लेनी पड़ती है जहाँ वह अपना तम्बू गाड़ता है, और मानो दूसरे की कृपा से जीना पड़ता है: और तो भी वह अपने पुत्र को यहाँ राजाओं का राजा बना देता है, और सारा संसार आकर उसे दण्डवत् करे, और वह सारी पृथ्वी को अपने अधीन कर ले। इसलिए हम भली भाँति देखते हैं कि वह सांसारिक बातों से अपने को व्याकुल नहीं करता: परन्तु वह दोनों को जोड़ता है, अर्थात् वह सांसारिक आशीषों को बयाने के रूप में लेता है, कि अपने पुत्र को आगे ले चले: और इस बीच उसका मार्ग सीधा है जो उसे स्वर्ग के राज्य तक ले जाए, जैसी उससे प्रतिज्ञा हुई थी। अब हम जानते हैं कि हमारे प्रभु यीशु मसीह में हमें ऐसी वस्तुएँ दी जाती हैं जो हमें संसार के सब सम्मान, और सब ऊँचाइयाँ, पद और कुलीनताएँ भुला दें। इसलिए इस स्थान पर हमें यही ध्यान देना है। यह सच है कि आज भी अवश्य है कि वे सांसारिक आशीषें जो हम परमेश्वर के हाथ से पाते हैं, हमारे लिए मानो उसकी भलाई के बयाने हों: परन्तु वे कभी अधिक, कभी कम होती हैं। क्योंकि प्राचीन पुरखों को वैसा प्रकाश न मिला था जैसा हमें मिला है, और वे छायाओं और प्रतीकों में थे: इसी कारण परमेश्वर ने उन पर अपनी कृपा उतनी भली भाँति प्रमाणित नहीं की जितनी आज हम पर की है। क्योंकि सुसमाचार में हमारे पास हमारा प्रभु यीशु मसीह है: & कहा गया है कि हमें उसके स्वरूप के अनुसार ढलना है।

अब हम जानते हैं कि उसके पास इस संसार में सब प्रकार के कष्टों और अशान्ति के सिवा कुछ न था: क्योंकि हम देखते हैं कि वह कैसे क्रूस पर चढ़ाया गया, यहाँ तक कि ऐसा प्रतीत हुआ मानो वह अपने पिता परमेश्वर से सर्वथा त्याग दिया गया था: वह अत्यन्त संकटों और पीड़ाओं में था। इसलिए हमें उसके अनुरूप किसी और ही रीति से ढलना है, उनसे भिन्न जो प्रतीकों के द्वारा इस प्रकार चलाए गए थे। इसके अतिरिक्त, जब हम याकूब की एसाव से तुलना करेंगे, तो हम और भी भली भाँति जानेंगे (जैसा हम आगे पाएँगे) कि जब इसहाक ने एसाव को आशीष दी, तो वह आशीष जो वह देगा, उस आशीष से कहीं अधिक विस्तृत और समृद्ध होगी जो उसने यहाँ अपने पुत्र याकूब को दी: और तो भी यह उसे उस स्वर्गीय जीवन के लिए आशीष देना न था: परन्तु वह उससे कहता है: “मेरे मित्र, दो आशीषें नहीं होतीं, जब वह मुझ से ले ली गई, तो वही स्थिर रहनी है, और परमेश्वर ने उसे आशीष दी है जिसे मैंने आशीष दी, क्योंकि उसने मुझे उसका सेवक ठहराया है, अवश्य है कि वह वैसी ही बनी रहे जैसी की गई है, इसमें मेरा और कोई अधिकार नहीं: मुझे इसी में सन्तुष्ट रहना है कि मैंने एक बार आशीष दी: और तो भी इसके बाद वह एसाव को आशीष देता है। और कैसे? क्या कोई विरोधाभास है? नहीं, ऐसा नहीं: परन्तु यह हमें दिखाने के लिए है कि कोई और स्वर्गीय आशीष न थी, अर्थात् यह कि वह जिसे उसने आशीष दी वही कलीसिया का सिर होगा, और यीशु मसीह उसके वंश से आएगा: यह अब इसहाक के हाथ में न रहा, जैसा वह स्वीकार करता है। परन्तु इस संसार के लाभों के विषय में, और जो सृष्टि की वस्तुओं को तृप्त कर सके, उसने उसे याकूब से अधिक बहुतायत से दिया। अब हम सहज ही देख सकते हैं कि इसहाक जब यहाँ आकाश की ओस, भूमि की उत्तम उपज, और अन्न और दाखमधु की बड़ी मात्रा की बात करता है, तो उसका आशय यह नहीं कि उसका पुत्र उसी में अपने को उलझाए: परन्तु वह केवल ये प्रतीक उसके सामने रखता है, जो (जैसा मैंने कहा है) उसे आगे खींच ले चलने के लिए बयाने थे: इसलिए यही बात हमें ध्यान में रखनी है। और साथ ही यह भी ध्यान दें कि जब कहा गया कि इसहाक ने घोषणा की थी:

शब्द तो मेरे पुत्र याकूब का है: परन्तु हाथ एसाव के हाथ के समान है। कि परमेश्वर ने फिर भी यह उसके लिए पा लिया था। यह सच है कि यह सब भूल से हुआ: परन्तु इस भूल के सिवा भी उसे कुछ निश्चित ज्ञान था: और प्रभु ने उसे इस रीति से चेताया, कि दिखाए कि आशीष याकूब की थी: जैसे सचमुच वह उसी के लिए बचाई जानी थी, चाहे यह न हुआ होता: अर्थात् यद्यपि रिबका ने यह बुरा छल न किया होता, तो भी परमेश्वर भली भाँति जानता था कि इसहाक का मुँह कैसे बन्द रखे, जैसे उसने बिलाम का मुँह बन्द रखा।

देखो बिलाम को, जो झूठा था, जो भाड़े पर आया था, और परमेश्वर के लोगों को श्राप देने भी आया था, यदि उसके लिए सम्भव होता, कि बालाक से भेंटें पाए। परन्तु तो भी परमेश्वर ने उसकी जीभ को ऐसा फेर दिया कि जब उसने श्राप देना चाहा, तो (उसके न चाहते हुए भी) उसने उन्हें आशीष दी। परन्तु इसहाक बिलाम के समान न था: क्योंकि उसका उद्देश्य परमेश्वर का विरोध करना, या उसके चुनाव को मिटाना न था: वरन् वह अपने पुत्र के प्रति अपने मूर्खतापूर्ण प्रेम से अन्धा हो गया था (जैसा हमने कहा है): और हमारा प्रभु जब चाहता तो उसकी जीभ को भली भाँति चला सकता था, कि वह याकूब को आशीष दे: परन्तु अब जब वह अपने पुत्र एसाव को आशीष देने की कल्पना कर रहा था, तो भी परमेश्वर उसके मुँह से यह निकलवाता है, “शब्द तो मेरे पुत्र याकूब का है।”

अब आशीष में मुख्य और प्रधान बात यही थी, अर्थात् शब्द: क्योंकि इसहाक ने अपनी ओर से कुछ नहीं दिया: वरन् वह परमेश्वर की कृपा का साक्षी था, और मानो उसे प्रकाशित करने वाला दूत। इसलिए, क्योंकि उसने एसाव में केवल वस्त्र और स्पर्श ही पाया, इसलिए उसे उन्हीं पर टिकना नहीं चाहिए था, क्योंकि उसने शब्द याकूब में पाया। इससे हम देख सकते हैं कि परमेश्वर तो अभी से उसे स्वीकार करता था, यद्यपि इसहाक नहीं जानता था कि वह क्या कर रहा है, तो भी आशीष का याकूब की ओर मुड़ना अवश्य था। इस शब्द के विषय में इतना ही।

फिर, समाप्ति के लिए भली भाँति ध्यान दें कि जब कहा गया है कि सब लोग याकूब के अधीन होंगे: तो यह इसलिए नहीं कि उसे, या उसके वंश को, इस संसार में कोई सांसारिक साम्राज्य या प्रभुत्व मिले। यह सच है कि उन्होंने कनान देश में राज्य किया: परन्तु जो भी हो, उन्होंने सब जातियों को अपने अधीन न किया। सुलैमान के समय में यह सच है कि परमेश्वर ने अपनी प्रजा को दूर-दूर तक ऊँचा किया: परन्तु यह एक प्रतीक में था: क्योंकि इसे हमारे प्रभु यीशु मसीह तक आना था, जो मनुष्यों और स्वर्गदूतों दोनों का सिर है। इसलिए जो सर्वोच्च प्रभुत्व की बात मूसा यहाँ वर्णन करता है, निश्चय है कि वह न याकूब पर, न उसकी सन्तान पर, न उनके सारे वंशजों पर ठीक बैठ सकती है, जब तक हम अपने प्रभु यीशु मसीह तक न पहुँचें।

और इसी कारण स्पष्ट कहा गया है कि वह अपने भाइयों का स्वामी होगा, और उसकी माता के पुत्र उसके सामने दण्डवत् करेंगे। यह याकूब के व्यक्तित्व के विषय में न था: उसका केवल एक ही भाई था, जिसने उसके सामने दण्डवत् न की: वरन् उसे डराया, जैसा हम आगे देखेंगे: परन्तु हम सब की पूर्ति अपने प्रभु यीशु मसीह में देखते हैं: और यह उसके अपने लिए न था, वरन् हमारी भलाई और हमारे उद्धार के लिए था, कि उसने अपने पिता परमेश्वर से सारा अधिकार पाया, कि हर एक घुटना उसके सामने झुके: उसी में भी हम सर्वथा एक याजकीय राज्य हैं, यहाँ तक कि हम उसे अपना राजा और अपना सिर मानकर उसकी आराधना करते हैं।

परन्तु अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने गिर पड़ें, अपने दोषों को मानते हुए, और प्रार्थना करते हुए कि वह हमें उनका ऐसा बोध कराए कि वह हमें उसके सामने दीन करे। वह हमें उससे क्षमा माँगने की ओर ले जाए, और अपने आप से घृणा करने, और अपने दोषों से अप्रसन्न होने की ओर भी। हम प्रार्थना करें कि वह हमें इस रीति से सुधारने की कृपा करे कि हम सारी पवित्रता और उसकी धार्मिकता की आज्ञाकारिता में अधिकाधिक बढ़ते जाएँ। और वह हमारी दुर्बलताओं में हमें सम्भाले, ताकि वह उन प्रतिज्ञाओं को पूरा करने से न चूके जो उसने हम से की हैं, चाहे हमारी ओर से हम न केवल उनकी उपेक्षा करें वरन् उन्हें सर्वथा दूर धकेलते भी प्रतीत हों। तो भी वह हमारी ओर अपना सामर्थी हाथ बढ़ाने से न रुकेगा जब तक हम उस लक्ष्य तक न पहुँचें जो उसने हमारे सामने रखा है: अर्थात् जब तक हम उस महिमा के भागी न हो जाएँ जो उसने हमारे लिए अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा मोल ली है। और वह यह अनुग्रह न केवल हम पर, वरन् पृथ्वी की सब जातियों और राष्ट्रों पर दिखाए, इत्यादि।

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