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याकूब और एसाव पर दसवाँ उपदेश, उत्पत्ति 26:26 – उत्पत्ति 27:2 (भाग 2/3)
अतः जो भी आशीषें हमें मिल सकती हैं, वे सब कुछ भी नहीं हैं, और उनमें कोई अच्छा स्वाद भी नहीं हो सकता, जब तक हमें परमेश्वर के अनुग्रह का निश्चय न हो। परन्तु दूसरी ओर, जब परमेश्वर को यह भाता है कि वह हम पर प्रकट करे कि वह हमसे प्रेम रखता है, कि हम उसकी सुरक्षा में हैं, कि हम नष्ट नहीं हो सकते, कि वह हमारा हाथ थामे हुए है, और कि हम उसके द्वारा रखे और बचाए जाते हैं, तो यही वह बात है जिससे हमें सन्तुष्ट होना चाहिए, चाहे और सब कुछ हमसे छूट जाए। इसलिए यद्यपि परमेश्वर ने इसहाक को कोई चिह्न दिया था कि उसने उस पर दया की दृष्टि की है, तथापि वह उसकी तुलना में कुछ भी नहीं था जिसका वर्णन मूसा अब करता है, अर्थात् यह कि परमेश्वर उसे दिखाई दिया, ताकि उसके प्रति अपनी वाचा को जारी रखे और उसे और भी दृढ़ करे; और यह कि वह इस विषय में पूर्णतः निश्चित था, यहाँ तक कि वह उसके लिए ढाल ठहरा, जो सब परीक्षाओं को तोड़ डाले।
परन्तु यहाँ सबसे पहले हमें यह ध्यान देना है कि यह एक दर्शन था जो इसहाक को तैयार करने के लिए था, ताकि जो वचन उसे दिया जानेवाला था, वह अधिक श्रद्धा और अधिकार के साथ ग्रहण किया जाए।
अब यह दर्शन इस बात का एक चिह्न था कि परमेश्वर बोल रहा है; और यह सदा अत्यन्त आवश्यक रहा है। क्योंकि हम जानते हैं कि शैतान भ्रमों और व्यर्थ कल्पनाओं के द्वारा हमें बहकाने का कितना यत्न करता है। इसलिए जब पूर्वजों को शिक्षा दी गई, तो इसलिए कि उनके विश्वास की पूरी निश्चयता हो, परमेश्वर की महिमा उन पर प्रकट हुई, जिसकी उन पर कोई अचूक छाप थी। क्योंकि यदि केवल वचन ही उनके पास आता, तो वह बिना किसी स्थिरता के हवा में एक ध्वनि के समान होता। इसलिए जब मूसा कहता है कि परमेश्वर ने इसहाक पर अपने आप को दिखाया और प्रकट किया, तो यह कोई अनावश्यक बात नहीं है; क्योंकि आवश्यक था कि इसहाक जाने और भली-भाँति मान ले कि जो वचन उसने सुना वह स्वर्ग से आया है, और वह उसी में विश्राम करे कि यह निःसन्देह सत्य है, जिसमें वह धोखा नहीं खा सकता।
यह सच है कि परमेश्वर अदृश्य है और समझ से परे है; और हम उसे आँख से समझ लें, यह तो दूर की बात है, क्योंकि यदि हम अपनी सारी इन्द्रियाँ इसी में लगा दें, तो भी निश्चय है कि हम उसकी उच्च महिमा तक कभी न पहुँचेंगे। इसलिए परमेश्वर का सार, क्योंकि वह अनन्त है, मनुष्यों को दिखाई नहीं दे सकता; परन्तु इससे यह नहीं रुकता कि वह उतना अपने आप को दिखाए जितना हमारे लिए उचित है, और उस छोटी सी मात्रा के अनुसार जो हममें है।
इस प्रकार जब-जब हम पढ़ते हैं कि परमेश्वर प्राचीन पूर्वजों को दिखाई दिया, तो इसका अर्थ यह नहीं कि उन्होंने उसके पूरे सार और महिमा को समझ लिया; क्योंकि यह असम्भव बात थी। मनुष्य की बुद्धि बहुत अपरिपक्व है; परन्तु उसने अपने आप को ऐसा दिखाया जैसा वे सह सकते थे, अर्थात् उतना ही जितना उसने उनके लिए लाभदायक देखा। हाँ, और यदि परमेश्वर अपनी महिमा को हमारे सामने खोल दे, तो वह तुरन्त हमें दबा देगी; मैं कहता हूँ, यदि हमारी समझ आज की अपेक्षा कहीं अधिक होती, और हमारी बुद्धि जितना अब समझती है उससे सौ गुना अधिक समझ सकती, तो भी हम परमेश्वर की महिमा से इतने चकित हो जाते कि उसमें पूरी तरह घबरा जाते।
इसलिए आवश्यक है कि जब परमेश्वर हमें दर्शन देना चाहे, तो वह यह ध्यान रखे कि हम कितना सह सकते हैं। अतः आओ, हम देखें कि यहाँ मूसा के प्रयुक्त शब्द को कैसे समझना चाहिए, अर्थात् यह कि इसहाक, ताकि उसे उस प्रतिज्ञा का, जो उससे की गई थी, और अधिक निश्चय हो, और वह उसे प्रामाणिक प्रतिज्ञा के रूप में थामे रहे, और इसमें किसी भी रीति से सन्देह न करे कि जिसने उससे बात की वह परमेश्वर ही था, उसे कोई चिह्न और संकेत मिला, जिससे उसने अनुभव किया कि वह धोखा नहीं खा सकता, कि यह कोई मन की उड़ान या हल्की कल्पना नहीं है; बल्कि परमेश्वर उसे अवलम्ब के लिए एक पक्की पकड़ देगा, और ऐसा विश्राम देगा कि वह उस वचन की सामर्थ्य से, जो आगे जोड़ा जाएगा, उस हर बुराई से लड़ सके जो उस पर आए।
अब कहा गया है कि परमेश्वर ने उसे समझाया कि वह न डरे, और वह उसे इसका कारण देता है:
उसने कहा, “मैं तेरे साथ हूँ, हाँ मैं, तेरे पिता अब्राहम का परमेश्वर।”
जब वह कहता है, “मत डर,” तो हम इसे पहले भी समझा चुके हैं कि परमेश्वर का अर्थ यह नहीं कि जिनसे वह बोलता है उन्हें हर प्रकार के भय से मुक्त कर दे। क्योंकि यद्यपि पूर्वज उन सब चुनौतियों के विरुद्ध, जो उन पर आ सकती थीं, जयवन्त थे, तथापि वे संवेदनहीन नहीं थे। अब्राहम की परीक्षा हुई, परन्तु वह हारा नहीं। इसलिए हमें यह बात स्मरण रखनी चाहिए कि जो परमेश्वर के आत्मा की सामर्थ्य से जयवन्त हुए, वे तो भी लड़ते रहे।
भला जब तक इसका कुछ अनुभव न हो, तो कैसा संघर्ष या युद्ध हो सकता है? क्योंकि यदि अब्राहम ने अपने भीतर यह अनुभव न किया होता, “देख, मैं संकट में हूँ,” तो वह कभी परमेश्वर को न पुकारता, और कभी उसकी शरण न लेता; यदि वह उन दुःखों से, जो वह सह रहा था, दबा न होता, तो वह उनसे राहत और हलकापन पाने के लिए परमेश्वर से बिनती और शिकायत न करता। अतः हमें यह न सोचना चाहिए कि परमेश्वर चाहता है कि जिनसे उसने कहा है, “मत डर,” वे सब अनुभव से रहित हों; बल्कि यह इसलिए था कि उन्हें अपने साथ ऐसा दृढ़ थामे रखे कि वे हद से बाहर न डरें, जैसे हम डरने के आदी हैं, जब तक हमारा विश्राम परमेश्वर पर न हो। क्योंकि संसार में हवा का हल्का-सा झोंका भी हमें हिला देने और ऐसा बदहवास कर देने के लिए बहुत है कि हम नहीं जानते कि किधर मुड़ें; जैसा आहाज के विषय में कहा गया है कि वह डर गया और वृक्ष के पत्ते की नाईं काँपा; और यशायाह इस बुराई के उपचार के लिए कहता है: चुप रह, परमेश्वर के सामने शान्त रह। और यही पवित्र शास्त्र की सामान्य शैली है। अतः देखो कि जहाँ कहा गया है, “मत डर,” इस वचन का क्या अर्थ है: अर्थात् चाहे हमारे पास डरने और चकित होने का कारण हो, तो भी हम विरोध करें और धीरज से प्रतीक्षा करें जब तक परमेश्वर हमारी सहायता न करे; और यह भय हमें कुचल न दे और हमारा गला न घोंट दे; बल्कि हम अपने आप को सँभालने और सीधे मार्ग पर बने रहने का यत्न करें। और यद्यपि हम व्याकुल हों और इधर-उधर उछाले जाएँ, तो भी हम सदा अपने पाँवों पर दृढ़ खड़े रहें, क्योंकि हम परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर स्थापित हैं।
परन्तु स्पष्ट रूप से कहा गया है: “मैं तेरे साथ हूँ”; यह दिखाने के लिए कि जब परमेश्वर हमारे पक्ष में है, तो यही हमारे लिए पर्याप्त होना चाहिए, चाहे सारा संसार दुष्टता से हमारे नाश की युक्ति करे, जितने मनुष्य उतने शत्रु हों; हाँ, चाहे ऐसा प्रतीत हो कि सारी सृष्टि हमारे विरुद्ध षड्यन्त्र रच चुकी है, तो भी यदि परमेश्वर हमारा पक्ष ले, तो वह हमें सब भय पर जयवन्त करेगा। और वास्तव में हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता दाऊद ने इस शिक्षा का अभ्यास कैसे किया, और सन्त पौलुस भी इसका उदाहरण देता है: “जब परमेश्वर” (वह कहता है) “मेरे पक्ष में है, तो चाहे मैं एक लाख मनुष्यों से घिरा हुआ होऊँ, मैं न डरूँगा; जब मैं संसार की सब मृत्युएँ देखूँगा, तब भी मैं परमेश्वर की चरवाहे की लाठी पर भरोसा रखूँगा।” देखो वह तेईसवें भजन में कैसे कहता है, “हे प्रभु, तेरी लाठी,” अर्थात् वह डण्डा जो तू चरवाहे की नाईं उठाता है, (क्योंकि वह चरवाहे की उपमा लेता है, जो अपनी भेड़ों को चलाने के लिए अपना डण्डा या लाठी रखता है:) “प्रभु” (वह कहता है) “यदि मुझे कोई चिह्न मिल जाए जो मुझे निश्चय दिलाए कि तू मुझे अपने झुण्ड में गिनता है, तो मैं मृत्यु की छाया में होकर चलूँगा, और तब भी अपने आप को शान्ति दूँगा।”
क्योंकि जब तक मैं तेरे अनुग्रह पर स्थापित हूँ, मैं अपने आप को यथेष्ट शान्ति पाया हुआ गिनूँगा। और फिर दूसरे स्थान पर, क्योंकि परमेश्वर मेरे साथ है, मैं उन सब को ललकारता हूँ जो मुझ पर चढ़ाई करने आएँगे।
वह कहता है, “मान लो, परमेश्वर मेरा पक्ष ले, तो शरीर मेरा क्या कर सकता है?” वह वहाँ मनुष्यों की निर्बलता का उपहास करता है, यह दिखाते हुए कि परमेश्वर उन पर फूँक मारकर उन सब को गिरा सकता है और मिट्टी में मिला सकता है; और फिर भी यदि वह ऊपर से आई सामर्थ्य से सुसज्जित हो, तो वे सब धमकियाँ जो शैतान उसके विरुद्ध तान सके, कुछ भी न होंगी। और यही सन्त पौलुस हमें सिखाता है: यदि परमेश्वर हमारी ओर है, तो हमारा विरोधी कौन होगा? ऐसा नहीं कि हमारे विरुद्ध बहुत सी बातें न होंगी, चाहे परमेश्वर हमारे प्राण का रक्षक हो; परन्तु तो भी हम अपने सब शत्रुओं के विरुद्ध, और उस सब के विरुद्ध जो शैतान हमारे विरुद्ध रचेगा, घमण्ड कर सकते हैं, यदि परमेश्वर हम पर प्रसन्न हो।
इसलिए यह वचन व्यर्थ नहीं रखा गया कि सब भय दूर करे, जब वह कहता है: मैं तेरे साथ हूँ, अतः मत डर। अब जैसे हमें सिखाया जाता है कि हम परमेश्वर की केवल भलाई पर और उसके पितृतुल्य अनुग्रह पर विश्राम करें, वैसे ही इसके विपरीत हमें यह भी देखना है कि उसके बिना हम सदा उन लोगों के समान हैं जो मूर्छित हो रहे हों। और यही वह बात है जिसे हम अभी छू चुके हैं: अर्थात् यदि परमेश्वर हमें उस प्रेम की गवाही न दे जो वह हमसे रखता है, तो चाहे हम पृथ्वी के किसी स्वर्ग में हों, हम नरक में होंगे; और इसके विपरीत, चाहे हम किसी नरक में हों, अर्थात् किसी गहरे गड्ढे में, यदि हम यह अनुभव करें कि परमेश्वर हम पर दयालु है, और अन्त में वह हम पर तरस खाएगा, और हमें उसकी सहायता का निश्चय हो, तो नरक सदा स्वर्ग बन जाएगा। और यही बात हमें इस स्थान पर ध्यान में रखनी है: कि जब मनुष्य नहीं जानता कि परमेश्वर के सम्बन्ध में उसकी क्या दशा है, अर्थात् वह इस बात का निश्चय नहीं कर सकता कि परमेश्वर उस पर पितृ-स्नेह रखता है, तो उसे अवश्य काँपना होगा, और वह सदा चारों ओर से हिलाया जाएगा, और उसे सताने और पीड़ित करने के लिए बहुत सी चुभनें होंगी, बिना यह जाने कि क्यों; और बहुधा वह बड़ी उलझन में पड़ेगा। देखो, अविश्वासियों की यही दशा है: ऐसा नहीं कि वे परमेश्वर का तिरस्कार करने तक के लिए पर्याप्त साहसी नहीं हैं; क्योंकि उन्हें लगता है कि वे उसके हाथ से छूट गए हैं, और यदि वह स्वर्ग से गरजे, तो भी वह उन्हें छू नहीं सकता। अतः दुष्ट और परमेश्वर का तिरस्कार करनेवाले अपने घमण्ड में तो इतने साहसी होंगे; परन्तु तो भी परमेश्वर उनके भीतर चुभनें देता है, ऐसी कि उन पर, जैसा कहा जाता है, अन्धे आक्रमण होते हैं, जिनका उन्हें पता नहीं कि कहाँ से आते हैं; और फिर भी परमेश्वर ही है जो उनके अपने अविश्वास के द्वारा उनसे युद्ध करता है।
और यही उन सब का प्रतिफल है जो केवल परमेश्वर में विश्राम नहीं करते, और नहीं जानते कि हमारी सारी सुरक्षा, हमारा सारा आनन्द और सुख उसी की रखवाली में है। इसलिए वे सब जो अपनी ही शक्ति और गुणों का भरोसा करते हैं, वे सब जो अपना मन इन पार्थिव वस्तुओं में ऐसा लगाते हैं, अन्त में उन्हें अपनी मूर्खतापूर्ण धृष्टता का पूरा बदला भुगतना पड़ेगा, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर को वह आदर नहीं दिया जो उसका है; अर्थात् उन्हें अपने आप को बेचारे मूर्छित लोगों के समान पाना पड़ेगा। इसलिए हम सीखें कि यद्यपि परमेश्वर हमें हमारी इच्छाएँ और वे सब सुख दे जिनकी कामना की जा सकती है, तो भी हम उन पर ऐसा भरोसा न करें कि उससे मुँह फेर लें; बल्कि हम अपने आप को उसी अनुग्रह और गवाही में बनाए रखना सीखें जो हमें मिली है, कि जब उसने हमें अपनी सन्तान के रूप में गोद लिया है, तो वह सदा हमारे प्रति पिता के समान प्रकट होगा। जब हमें इस प्रकार पूरा निश्चय हो जाएगा, तो निश्चित है कि हम सब भय पर जयवन्त होंगे; परन्तु इसके विपरीत, जब हम परमेश्वर की सुरक्षा के बिना निश्चिन्त होने की कल्पना करेंगे, तो अवश्य है कि वह हमें हमारी मूर्खता और अहंकार दिखाए। और संक्षेप में यही वह है जो हमें इस स्थान से ले जाना है। अतः आओ, हम इन दो बातों को अविभाज्य और अलग न होनेवाली मानकर साथ जोड़ें: कि परमेश्वर हमारे साथ है, और कि हम हर बुराई के विरुद्ध भली-भाँति सुरक्षित हैं; क्योंकि यदि वह हमसे दूर है, तो हाय, हम अत्यन्त अभागे हैं, चाहे हम स्वर्ग में ही क्यों न हों, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ; परन्तु जब वह हमारे साथ है, तो चाहे हम मृत्यु की छाया और अन्धकार में चलें, और ऐसा लगे कि हमें घड़ी की हर घड़ी नष्ट होना है, तो भी हम अपने आप को शान्ति देना नहीं छोड़ते, भली-भाँति जानते हुए कि मृत्यु हमारे लिए जीवन में बदल जाएगी, और सब कुछ हमारे उद्धार के लिए ठहरेगा। फिर हमें यह भी देखना है कि वह कहता है कि वह अब्राहम का परमेश्वर है; क्योंकि इस वचन के द्वारा वह इसहाक को वे सब प्रतिज्ञाएँ स्मरण कराता है जो उसने अपने पिता से सीखी थीं। यदि वह शिक्षित न किया गया होता, और अब्राहम ने अपना कर्तव्य निभाकर उससे न कहा होता: “हे मेरे पुत्र, परमेश्वर ने मुझे सब मनुष्यों से बढ़कर यह विशेषाधिकार दिया है कि उसने मुझ पर प्रकट किया और मुझसे कहा है कि मेरा वंश उसकी निज भाग के समान होगा, और वह हमें आशीष देगा, और हम संसार के शेष सब लोगों से अलग और पवित्र किए जाएँगे: परन्तु फिर भी देख कि हमें उसकी आराधना कैसे करनी चाहिए, देख हमें उसे कैसे पुकारना चाहिए, देख हमें उसकी सेवा कैसे करनी चाहिए।”
इसलिए यदि अब्राहम ने अपने पुत्र इसहाक को विश्वासयोग्यता से न सिखाया होता, तो यह वचन: “मैं अब्राहम का परमेश्वर हूँ,” किसी काम का न होता, और वास्तव में अन्धविश्वास के सिवा और कुछ न जताता। अतः हम भली-भाँति ध्यान दें कि इस वचन के द्वारा परमेश्वर इसहाक को उस बात की पुष्टि देना चाहता था जो उसने पहले अपने पिता से सीखी थी। पोप-भक्त इसे ढाल बनाते हैं जब वे अपनी गन्दगियों और भूलों से चिपके रहना चाहते हैं; क्योंकि जिसका वे अनुसरण करते हैं वह उन्हें अन्य पूर्वजों और पुरखों से मिला है, उन्होंने उसे आज नहीं गढ़ा; इसलिए उन्हें लगता है कि यह बहुत है कि परमेश्वर ने स्वयं अपने वचन में जो कुछ दिखाया है उसे भी वे ठुकरा दें, यदि वे अपने पूर्वजों और बड़ों का अनुसरण करते हैं। अच्छा, परन्तु जब परमेश्वर अब्राहम का परमेश्वर कहलाता है, तो वह यह एक बात पहले से मानकर चलता है, अर्थात् यह कि अब्राहम का विश्वास उस शिक्षा से नियन्त्रित था जो उसे सिखाई गई थी। और वह अपने आप को नाहोर का परमेश्वर क्यों नहीं कहता? और अपने को तेरह का परमेश्वर क्यों नहीं कहता?
क्योंकि यह कुछ अधिक होता। पोप-भक्त यह न कहेंगे, “जिसे हम अपने बीच परमेश्वर की सेवा कहते हैं, उसे मनुष्यों के बीच प्रचलित हुए सौ वर्ष हुए हैं”; परन्तु वे कहेंगे: “क्या? एक हज़ार वर्ष हो गए, जब से संसार इसी प्रकार शासित होता आया है।” देखो, तब वे अपने आप को परमेश्वर का तिरस्कार करने के अधिकार में समझते हैं, जैसा उन्हें प्रतीत होता है, जब वे एक हज़ार वर्ष का हवाला देते हैं।
अब यदि प्रश्न केवल प्राचीनता का होता, तो उसे कहना चाहिए था, “मैं तेरह और नाहोर का तेरा परमेश्वर हूँ,” या बल्कि उसे और आगे जाना चाहिए था, उन तक जो उनसे पहले हुए। परन्तु इस प्रकार बोलने का कोई प्रश्न नहीं है। परमेश्वर ने अब्राहम को बुलाया था, और अब्राहम को मरे हुए थोड़ा ही समय हुआ था, और दूसरे कहीं अधिक प्राचीन थे: यहाँ हम क्या भेद करें? हमें इसे अपनी बुद्धि से नहीं गढ़ना चाहिए: परन्तु हमें उस लक्ष्य को देखना चाहिए जिसकी ओर परमेश्वर इसहाक को निर्देशित करना चाहता था। इसमें सन्देह नहीं कि यह इसलिए था कि अब्राहम को (जैसा हम पहले कह चुके हैं) विश्वास की पूरी निश्चयता थी, कि उसकी केवल एक राय नहीं थी जैसी शेष संसार की होती है, कि “मैं ऐसा सोचता हूँ, मैं ऐसा मानता हूँ,” परन्तु उसे पूरा निश्चय था कि परमेश्वर ने उससे बात की है। देखो तब किस दृष्टि से और किस कारण अब कहा जाता है, “मैं तेरे पिता अब्राहम का परमेश्वर हूँ।” अतः आओ, हम भली-भाँति ध्यान दें कि हमें किन पूर्वजों का अनुसरण करना चाहिए, ताकि हम इसमें धोखा न खाएँ। क्योंकि यदि हमारे पूर्वज भली-भाँति सिखाए गए होते, और परमेश्वर के सत्य के अनुसार ढाले गए होते, तो वह अब हमारे विश्वास के लिए अच्छी सहायता होती: क्योंकि जब हमारे पास मार्ग दिखानेवाले होते हैं, तो यह हमारे बड़े लाभ की बात है, और हमें इसे तुच्छ न जानना चाहिए: परन्तु यदि हमारे ऐसे पूर्वज रहे हों जो परमेश्वर की सन्तान न थे, (जिस पर सारी पितृता और वंश-परम्परा निर्भर है, जैसा सन्त पौलुस कहता है) तो हमें अपनी आँखें बन्द कर लेनी चाहिए।
क्योंकि जब परमेश्वर को पिता होने का अपना सर्वोच्च अधिकार न मिले, और सब कुछ उसी की ओर न ठहराया जाए, तब उन सब वंश-परम्पराओं और बन्धनों पर हाय जो इस संसार में हमारे होंगे: क्योंकि वे शैतान के उतने ही जाल हैं। अतः हम भली-भाँति ध्यान दें कि जैसे इस स्थान पर कहा गया है कि परमेश्वर इसहाक के पिता अब्राहम का परमेश्वर है, वैसे ही इसके विपरीत भविष्यद्वक्ता यहेजकेल के द्वारा कहा गया है: “अपने पूर्वजों की धार्मिकता पर न चलो।”
और ऐसा क्यों? इन पूर्वजों ने अब्राहम के पदचिह्नों का अनुसरण नहीं किया, बल्कि उनसे हट गए; इसलिए वे पितर कहलाने के ऐसे आदरणीय पद के योग्य न रहे, क्योंकि वे (एक ही बात में) परमेश्वर की सन्तान न थे। अतः हम डरें, ऐसा न हो कि हमसे वह कहा जाए (जो सन्त स्तिफनुस ने कहा), “हे हठीले और मन के खतनारहित लोगो, तुम सदा परमेश्वर और उसके पवित्र आत्मा का विरोध करते रहे हो, जैसा तुम्हारे पूर्वज भी करते थे।” परन्तु यदि हमारे पूर्वजों में कोई अज्ञान या विद्रोह रहा हो, तो हम उसे छोड़ दें, ताकि पूरी तरह अपने आप को अपने स्वर्गीय पिता के हाथ सौंप दें; और फिर भी, जबकि पोप-भक्त चिल्लाते हैं, “पूर्वज, पूर्वज,” हम परखना सीखें, और उनके समान पशु न बनें कि अपने पूर्वजों को किसी वेश्यालय से ले लें; जैसे वे उन सब को अपना पूर्वज मानते हैं जिन्होंने व्यवस्था और सुसमाचार दोनों की सरलता को बिगाड़ा और भ्रष्ट किया है; अर्थात् ये सठियाए हुए लोग और भिक्षुओं और साधुओं की टोली, जो पवित्र शास्त्र के मिलावट करनेवाले रहे हैं। इसलिए ताकि हम इस प्रकार अपनी बुद्धि से वंचित और लुटे न जाएँ, हम जानें कि हमारे पूर्वज परमेश्वर की सन्तान होने चाहिए, जिस पर सारी वंश-परम्परा निर्भर है, जैसा हमने सन्त पौलुस से उद्धृत किया है। देखो तब संक्षेप में हमें इस स्थान से क्या सीखना है: अर्थात् यह कि इसहाक को चेतावनी दी गई कि जो कुछ उसने पहले सीखा था उसे पहचाने और स्मरण करे, और यह उसके विश्वास की पुष्टि के लिए था, जब परमेश्वर ने कहा कि उसने अपने आप को उसके पिता अब्राहम पर प्रकट किया था। और अब आज हमें इस शिक्षा को व्यवहार में लाना है: जब-जब हमें अपने आप को निश्चय दिलाना हो, या बल्कि जब हमारी आत्मा व्याकुल हो, और हम किसी डगमगाहट और अनिश्चितता में हिचकोले खा रहे हों, तब हमें वहीं शरण लेनी चाहिए: अर्थात् अपने पिता अब्राहम का अनुसरण करना, उस नियम के अनुसार अपने आप को ढालना जो उसने हमें दिखाया है। और ऐसा क्यों? क्योंकि हम निश्चित हैं कि परमेश्वर उस पर प्रकट हुआ था।
देखो तब एक अच्छा मार्गदर्शन, जो हमें हमारे उद्धार के मार्ग से न भटकाएगा: जब हम अपने पिता अब्राहम के अनुरूप और उसी के साँचे में ढल जाएँगे, जिसे परमेश्वर ने गोद लिया, और जिसने हमारे उद्धार की बयाना पाई: अर्थात् ये सब प्रतिज्ञाएँ जिन पर हमें आज स्थापित होना चाहिए। और ऐसा ही विचार हमें सब शेष विश्वासियों के विषय में करना चाहिए। क्योंकि यद्यपि वे शरीर के सम्बन्ध में हमसे कुछ भी नाता नहीं रखते, तो भी हम उनकी सन्तान होने से नहीं रुकते। और इसलिए प्रेरित का इब्रानियों के ग्यारहवें अध्याय में गवाहों का यह घना बादल हमारे सामने रखना व्यर्थ नहीं है, जब वह हमें दिखाना चाहता है कि हम बहुत कृतघ्न हैं यदि हम उनका अनुसरण न करें जिन्हें परमेश्वर ने हमारे सामने उदाहरण के रूप में रखा है। देखो (वह कहता है) गवाहों का एक बड़ा और घना बादल जो हमें परमेश्वर की ओर बुलाता है, जो ऐसा प्रतीत होगा (मानो कोई कहे) कि हमारी आँखें बन्द करने के लिए है। जब कोई हमें बहकाता है तो हम उस पर क्रोधित होंगे, और यह कहकर अपने आप को निर्दोष ठहराने की कल्पना करेंगे, “अरे, उसने भी इसमें उतना ही किया जितना मैंने”; हमें परमेश्वर के भय और उसकी आज्ञाकारिता से हटाने के लिए एक छोटी सी मक्खी ही काफ़ी है; और फिर भी परमेश्वर हमारे सामने हमारे विश्वास को प्रमाणित करने के लिए इतने गवाह रखता है कि हमें इससे सन्तुष्ट होना चाहिए, तो भी हम उसके पास नहीं आते। और यदि इससे हमें कुछ लाभ नहीं होता, और हम इससे दृढ़ नहीं होते, तो इसका कारण हमारी अपनी कृतघ्नता के सिवा क्या है? इसलिए जब-जब हमारा विश्वास निर्बल हो, और हम पर अज्ञान की आँधियों के समान बादल घिरें, तो हम सोचें, “क्या? क्या परमेश्वर ने कल और आज ही बोलना आरम्भ किया है? क्या उसने अब्राहम से बात नहीं की? और क्या उसी समय से उसका सत्य निश्चित नहीं था? और इसके अतिरिक्त, जितने विश्वासी बाद में आए, सब पवित्र राजा और भविष्यद्वक्ता, और अन्य, क्या वे उतने ही गवाह नहीं हैं जिन्हें परमेश्वर ने हमें दिखाया है? तो आओ, हम उन्हें अब इस पवित्र सभा से जोड़ें।”
क्योंकि चाहे सुसमाचार हमें कितनी ही बार सुनाया गया हो (जैसा प्रेरित ने विचार किया है), उसका उद्देश्य केवल हमें उन सब विश्वासियों के साथ इकट्ठा करना नहीं जो आज जीवित हैं, बल्कि उन सब पवित्र आत्माओं की संगति और मण्डली में भी जिन्हें परमेश्वर ने इस संसार से उठा लिया है। इसलिए जब-जब परमेश्वर हमसे बोलता है, हम आज सब पवित्र कुलपतियों और भविष्यद्वक्ताओं के साथ संगति में जुड़े हैं। परन्तु हम और भी अधिक निरुत्तर होंगे क्योंकि हम इस सब से अपना लाभ उठाना नहीं जानते: जबकि परमेश्वर ने इसे हम पर और भी स्पष्ट रीति से और अधिक परिचित ढंग से अपने इकलौते पुत्र के व्यक्तित्व में प्रकट किया है। क्योंकि वह आज केवल अब्राहम का परमेश्वर ही नहीं, बल्कि हमारे प्रभु यीशु मसीह का पिता भी कहलाता है। इसलिए जबकि हमारे पास उस सब की, जो हमारे उद्धार के लिए लाभदायक है, पूर्ण और सिद्ध प्रकाशना उस जीवित प्रतिमा में है जिसमें परमेश्वर प्रकट किया गया है, तो निश्चित है कि हमारे पास कोई बहाना नहीं जो हम बता सकें कि क्यों हमारे पास विश्वास की ऐसी निश्चयता न हो कि हम कभी इधर-उधर न भटकें; और जब संसार एक लाख बार अपने आप को बदले, तो भी हम उस पर, जो हमने परमेश्वर से पाया है, दृढ़ बने रहें, यह जानते हुए कि उसका सत्य अपरिवर्तनीय है। इसलिए संक्षेप में यही वह है जो हमें इस पाठ से ले जाना है।
और आगे, हम प्रभु यीशु मसीह के उस वचन पर भी ध्यान दें, जब वह कहता है: “मैं अपने परमेश्वर और तुम्हारे परमेश्वर, अपने पिता और तुम्हारे पिता के पास जाता हूँ।” देखो, परमेश्वर का पुत्र, जो सनातन परमेश्वर है, तो भी हमें अपने पास इकट्ठा करने के लिए, और हमें वहाँ ऐसे सुरक्षित रखने के लिए कि हम उस नींव से, जो उसने अपने सत्य की हमें दी है, कभी बहकाए न जाएँ, कहता है कि हमारा उसके साथ एक ही परमेश्वर है, क्योंकि वह मनुष्य है, और इसलिए कि वह हमारा भाई है: कि हमारा वही परमेश्वर है जो उसका परमेश्वर है, और वही पिता है जो उसका पिता है। जब हम ये बातें सुनते हैं, तो क्या हमारे लिए सन्देह करने या हिलाए जाने का कोई और कारण है? जैसे आज बहुत से लोग कहेंगे: “अरे, मैं नहीं जानता कि क्या थामूँ: इतने भिन्न-भिन्न मत हैं कि मैं घबरा गया हूँ: और मैं कुछ भी विश्वास नहीं कर सकता, मैं नहीं जानता किसका अनुसरण करूँ।” परन्तु ऐसा होना अनिवार्य है कि ऐसे लोगों पर शैतान का वश है, जब वे परमेश्वर के सत्य को पाँव तले रौंदते हैं, जो हमें मार्ग दिखाने और उद्धार का रास्ता बताने के लिए सर्वथा निःसन्देह ज्योति के समान है। अतः जबकि परमेश्वर ने अब्राहम और नूह के समय से अपने आप को दिखाया, और मूसा को अपनी कलीसिया का अगुवा ठहराया, और जब अन्त में उसने अपने इकलौते पुत्र को भेजा, जिसके व्यक्तित्व में उसने हम सब को अपने साथ मिला लिया है, तो हम उस विश्वास की एकता में अपने आप को बनाए रखना सीखें जो उसने हमें दी है, और सन्देह न करें, बल्कि यह कि वह सदा हमें अपनी सन्तान स्वीकार करेगा। अब हमें यह देखना है जो परमेश्वर कहता है, “कि वह इसहाक को आशीष देगा और उसके वंश को बढ़ाएगा।” क्योंकि यह दिखाने के लिए है कि जिन्हें परमेश्वर ने अपने पास बुलाया है, उन पर उसका अनुग्रह व्यर्थ और निष्क्रिय नहीं होता: बल्कि समय पर अपना फल और प्रभाव लाता है। इसलिए यह अत्यन्त निश्चित है कि जब परमेश्वर हम पर दयालु होगा, तो वह हमें उतनी भली वस्तुएँ देगा जितनी वह हमारे लिए भली जानता है; यह सच है कि यह हमारी इच्छा के अनुसार न होगा, परन्तु जैसे भी हो, समृद्धि सदा परमेश्वर के अनुग्रह और प्रेम के साथ जुड़ी रहेगी। अब हम जानते हैं कि सब कुछ उसके हाथ में है, और वह कंजूस नहीं कि अपनी सन्तान को वह सब न दे जो वह जानता है कि उनके योग्य है। इसलिए हम अपने परमेश्वर की सब समृद्धि और स्वतन्त्र अनुग्रह की प्रतीक्षा करना सीखें, जब वह हमें यह गवाही देना चाहे कि वह हमसे प्रेम रखता है, और कि वह हमारे साथ है (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ:) और इस बीच, फिर भी, यद्यपि हम पर बहुत सी विपत्तियाँ आती हैं जो हमें व्याकुल और तंग करती हैं, और वे हमारे लिए कठोर और कड़वी हैं, तो भी हम उसकी प्रतिज्ञा को दृढ़ थामे रहना कभी न छोड़ें। और जब हम परमेश्वर के हाथ से कोई अनुग्रह पाएँ, तो हम उसे सदा अपने विश्वास को दृढ़ करने में लगाएँ, और यह निःसन्देह निश्चय रखें कि हम इसे सच पाएँगे जो यहाँ कहा गया है: “मैं तेरे साथ रहूँगा, और तुझे आशीष दूँगा।” और निश्चित है कि यदि हम परमेश्वर के उन उपकारों पर, जो हम प्रतिदिन उससे पाते हैं, भली-भाँति विचार करें, और हम उनका वैसा मूल्य समझें जैसा चाहिए, तो हमारे पास सदा उसका आदर करने और उसमें आनन्दित होने का अच्छा कारण होगा: परन्तु हाय, हम उन उपकारों को, जो वह हम पर करता है, निगल जाते हैं: और इस बीच हम उन पर मुँह बनाते हैं और उनके विषय में कभी नहीं सोचते। और हम देख सकते हैं कि यही कारण है कि हम बड़बड़ाने, कुढ़ने और असन्तुष्ट रहने में लगे रहते हैं। और ऐसा क्यों? क्योंकि परमेश्वर के उपकारों को हमें उसमें सन्तुष्ट करने के लिए पर्याप्त होना चाहिए: परन्तु (जैसा मैंने कहा) हम उन्हें तुच्छ जानते हैं और हल्का समझते हैं। और इसलिए हम इसका स्वाद चखने के योग्य नहीं कि इस प्रतिज्ञा का क्या मूल्य है: “मैं तेरे साथ हूँ, और तुझे आशीष दूँगा।” अब थोड़ा आगे कहा गया है:
कि इसहाक ने एक वेदी बनाई, और उस स्थान पर प्रभु के नाम से प्रार्थना की।
हम पहले ही देख चुके हैं कि पवित्र पूर्वजों ने वेदियाँ क्यों और किस उद्देश्य से बनाईं; परन्तु फिर भी स्थान की माँग के अनुसार यहाँ हमें इसके विषय में कुछ कहना है। जो वेदी इसहाक ने बनाई, वह इस उद्देश्य से थी कि वह अपने विश्वास का अंगीकार करे। पहली बात के विषय में इतना ही। क्योंकि यदि हम परमेश्वर से प्रार्थना करें, तो हमें उसके लिए वेदी बनाने की आवश्यकता नहीं: परमेश्वर की सेवा स्वयं में आत्मिक है। इसलिए इसहाक ने वेदी इसलिए नहीं बनाई कि केवल परमेश्वर के नाम को पुकारे, या उससे प्रार्थनाएँ और बिनतियाँ करे: बल्कि इसलिए कि उसका विश्वास जाना जाए, और परमेश्वर की महिमा मनुष्यों के सामने हो। क्योंकि यद्यपि हमें परमेश्वर की सेवा आत्मा में और भीतर हृदय से करनी चाहिए, तो भी इससे यह नहीं रुकता कि हमें उसे वह स्तुति भी देनी है जिसका वह अधिकारी है, मनुष्यों के सामने, और कि हम यथाशक्ति यह घोषणा करें कि हम सम्पूर्णतः उसी के हैं, देह और प्राण दोनों से।
इस प्रकार यहाँ हमें सिखाया जाता है कि विश्वासी जन परमेश्वर पर भरोसा रखने के बाद, और उसे पुकारने के बाद, और उसे उसके सब उपकारों की स्तुति देने के बाद, फिर भी मनुष्यों के सामने अपने विश्वास का अंगीकार करें, ताकि वे अपने आप को पूरी तरह (जैसा कि सब कुछ उसी का है) उसे समर्पित करें। एक दूसरा कारण भी है: और वह यह कि हमारे आलस्य और ढीलेपन के कारण, हमें हर प्रकार से उभारे जाने की आवश्यकता है, ताकि हम परमेश्वर की सेवा में उत्साह से आगे बढ़ने को जागृत हों। कैसे? यह सच है कि जब हम परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं, तो वह किसी रीति-रिवाज में नहीं उलझता: तो भी हम घुटने टेकते हैं, हम अपने हाथ स्वर्ग की ओर उठाते हैं, और अपना सिर खोलते हैं। और ऐसा क्यों? सबसे पहले, मनुष्यों के विचार से। क्योंकि (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) आवश्यक है कि हम परमेश्वर की अधीनता अपने शरीरों से करें, जिन्हें उसने सिरजा है, और जिन्हें उसने अपनी महिमा और अमरता के मुकुट के लिए ठहराया है। परन्तु जैसे भी हो, क्योंकि हम ढीले हैं, हमारे लिए आवश्यक है कि ये साधन हमारे काम आएँ, ताकि हम परमेश्वर से प्रार्थना करने के लिए और अधिक उत्कट उत्साह और अधिक हार्दिक लगन से प्रेरित हों। देखो तब, हमारे लिए क्यों उचित है कि हम हाथ जोड़कर उठाएँ, घुटनों के बल झुकें, और सिर खुला रखें: क्योंकि यह दिखाने के लिए है कि हम अपने आप को परमेश्वर के सामने ऐसे प्रस्तुत करते हैं मानो कहते हों: “और तू बेचारा, तू कौन है? जिसने तुझे सिरजा और गढ़ा, और जिसे तुझे अपने सारे जीवन का लेखा देना है, उसके सामने तुझे कितनी दीनता से आना चाहिए?”
और फिर, यह भी इसलिए है कि हम अपने आप को उन सब व्यर्थ कल्पनाओं से मुक्त करें जो हमें इधर-उधर भटकाती हैं: और हम पूरी तरह उसी पर विश्राम करें। अतः जो वेदी इसहाक ने बनाई, वह इसी काम आई: अर्थात् इस साधन से वह और अधिक प्रेरित हो, और उसका हृदय परमेश्वर की सेवा के लिए और अधिक प्रज्वलित हो। और दूसरी ओर, उसने मनुष्यों के सामने अंगीकार किया, कि अपने घराने को उदाहरण दे, और गवाही दे कि वह अन्यजातियों के अन्धविश्वासों में नहीं मिला: बल्कि उसका धर्म शुद्ध और निष्कलंक था, क्योंकि वह परमेश्वर के वचन से शासित था। और वेदी के विषय में इतना ही। और इस बीच, हमें यह बात भी यहाँ सीखनी है जो पहले कही जा चुकी है, कि पवित्र पूर्वजों की प्रार्थनाएँ, और उनके विश्वास का अंगीकार, जो बलिदानों के साथ जुड़ा था, इसके सिवा किसी और उद्देश्य से नहीं था कि उन्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह की ओर ले जाए: क्योंकि उन्हें निरन्तर सिखाया जाता था कि परमेश्वर तक उनकी कोई पहुँच नहीं हो सकती, केवल एक मध्यस्थ के अनुग्रह से, जो अभी संसार में भेजा नहीं गया था: तो भी ऐसा था कि वे वहीं विश्राम करते थे।
परन्तु अब जबकि हमारा प्रभु यीशु मसीह उतर आया है, और उसने हमारा स्वभाव धारण किया है, और हमसे कहा है कि वह जगत की ज्योति है, कि वह मार्ग, सत्य और जीवन है, कि वह परमेश्वर अपने पिता के पास हमारा सहायक है, और कि उसी के द्वारा हमें स्वर्ग में प्रवेश मिलना है: तो जबकि हमारे पास यह सब है, क्या हमें और भी अधिक निश्चित न होना चाहिए, जब उसे पुकारने का कोई प्रश्न हो, कि हम जानें कि हमारी बिनतियाँ उसके द्वारा सुनी जाएँगी, और हमारे लिए द्वार खुला होगा, और हम उसे सदा हमारी सहायता और बचाव के लिए तत्पर और अनुकूल पाएँगे? अब जैसे भी हो, हम ध्यान दें कि प्राचीन काल में, और विशेष रूप से व्यवस्था के समय में, वेदियाँ सदा इसी उद्देश्य से बनाई जाती थीं कि विश्वासी जानें कि वे परमेश्वर से प्रार्थना करने, या अपने ही नाम से उसे पुकारने के योग्य नहीं: बल्कि सदा उन्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा, और उस बलिदान की सामर्थ्य से जो उसे जगत के मेल-मिलाप के लिए अपने पिता के सामने चढ़ाना था, उसके पास आना चाहिए। और वास्तव में हमें यह न सोचना चाहिए कि अब्राहम और इसहाक ने वेदियाँ अपनी कल्पनाओं के अनुसार गढ़ी थीं: क्योंकि उनके बलिदान विश्वास के बिना कभी ग्रहणयोग्य न थे, जैसा प्रेरित दिखाता है। अब वे विश्वास में कभी स्थापित न हो सकते थे, जब तक परमेश्वर का वचन उन्हें प्रकाशित करने को पहले न चला होता। अतः हम जानें कि इसहाक ने बलिदान यों ही नहीं चढ़ाया, मानो सोचा हो, “अरे, यह अच्छा ठहरेगा”: बल्कि उसे सिखाया गया था कि वह एक अभागा पापी होकर परमेश्वर का नाम पुकारने की धृष्टता न करे, जब तक कि वह अपना पूरा भरोसा उस पर न रखे जिसे जगत के पापों का प्रायश्चित्त करने और उन्हें शुद्ध करने को भेजा जाना था। अन्यजातियों की भी वेदियाँ थीं, और वे पवित्र पूर्वजों के समान बलिदान चढ़ाते थे: परन्तु उनमें मुख्य बात की कमी थी। वे पूरी तरह उस रीति में लगे थे, जो अपने आप में निरर्थक थी: क्योंकि वे उस स्वर्गीय नमूने की ओर दृष्टि नहीं करते थे, जिसका उल्लेख लैव्यव्यवस्था में है।
इसलिए हमें सीखना है कि जब हमारा पिता इसहाक परमेश्वर के नाम को पुकारना चाहता था, तो उसके पास गवाही के लिए एक वेदी थी कि वह हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम और अनुग्रह के सिवा ग्रहण नहीं किया जा सकता। और इसलिए आज, जब-जब हम परमेश्वर से प्रार्थना करना चाहें, हम अपनी प्रार्थनाओं को हमारे प्रभु यीशु मसीह के लहू से धोना सीखें: क्योंकि अन्यथा वे अपवित्र और अशुद्ध ही रहेंगी: परन्तु जब हमारे प्रभु यीशु मसीह का लहू उन पर लगाया जाएगा, तो निश्चय ही हमारी प्रार्थनाएँ शुद्ध होंगी, वे ऐसी पवित्र की जाएँगी कि परमेश्वर उन्हें ग्रहण करेगा। और जब हम परमेश्वर को पुकारें, प्रत्येक अपने हृदय के एकान्त में, तो हम अपने पड़ोसियों को भी उसमें खींचने का यत्न करें, ताकि हमारे बीच एक मन से उसकी महिमा हो। और जैसे हमें एक ही विश्वास में बँधे होना चाहिए, वैसे ही हमारा भी एक ही मुँह हो यह घोषणा करने के लिए कि हम उसे अपना पिता और उद्धारकर्ता मानते हैं, और कि हम पूरी तरह उसी के हैं।
अब हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने अपराधों के अंगीकार में गिरें, और प्रार्थना करें कि उसे भाए कि वह हमें उन्हें ऐसा अनुभव कराए कि हम उनके कारण अपने आप से अप्रसन्न हों, और उसके न्याय-आसन के सामने विलाप करें, ताकि हम उसकी दया से क्षमा पाएँ: क्योंकि उसके न्याय से हम उचित रीति से दोषी ठहराए जाएँगे। और कि वह हमें ऐसा दृढ़ करे कि हम इस संसार में जो भी दुःख सहें उनमें हियाव न हारें: बल्कि उसके वचन पर ऐसा मनन करें कि केवल वही प्रतिज्ञा जो उसने हमें दी है कि वह हमें अपनी सन्तान गिनेगा, हमें सन्तुष्ट करे, और हम उससे सुसज्जित हों कि उसकी इच्छा के आगे शान्ति से झुकें और हर क्लेश को, जो वह हम पर भेजे, सहें: और हम अपने हृदयों में भी बिना किसी बनावट या कपट के उसकी महिमा करें: और हम मनुष्यों के सामने अपने विश्वास के फल दिखाने का भी यत्न करें, और इस प्रकार छोटे-बड़े सब उसका आदर करें। और कि वह केवल हम पर ही नहीं, पर पृथ्वी की सब जातियों और राष्ट्रों पर भी यह अनुग्रह करे, इत्यादि।
