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यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
इसलिये मैं तुम से कहता हूं, कि जो कुछ तुम प्रार्थना करके मांगो, तो प्रतीति कर लो कि तुम्हें मिल गया, और तुम्हारे लिये हो जाएगा।
मरकुस 11:24 KJV
मूल उपदेश: सच्ची प्रार्थना—सच्ची सामर्थ!, सं. 328, न्यू पार्क स्ट्रीट पुल्पिट, खण्ड 6। एक्सेटर हॉल, स्ट्रैंड में प्रचार किया गया। नीचे का पाठ स्पर्जन का सार्वजनिक-अधिकार (पब्लिक डोमेन) वाला पुल्पिट-पाठ है, 1993 का संक्षिप्त संकलन नहीं।
इस पद का कुछ सम्बन्ध आश्चर्यकर्मों वाले विश्वास से अवश्य है, परन्तु मेरे विचार में इसका कहीं अधिक सम्बन्ध विश्वास के आश्चर्यकर्म से है। जो भी हो, आज प्रातः हम इसी दृष्टि से इस पर विचार करेंगे। मेरा विश्वास है कि यह पाठ केवल प्रेरितों की ही नहीं, वरन् उन सब की मीरास है जो प्रेरितों के विश्वास में चलते हैं और प्रभु यीशु मसीह की प्रतिज्ञाओं पर विश्वास करते हैं। जो सलाह मसीह ने उन बारहों को और अपने निकटतम अनुयायियों को दी थी, वही आज प्रातः परमेश्वर के वचन में हम से दोहराई जाती है। हमें ऐसा अनुग्रह मिले कि हम निरन्तर उसका पालन करें। “जो कुछ तुम प्रार्थना करके मांगो, तो प्रतीति कर लो कि तुम्हें मिल गया, और तुम्हारे लिये हो जाएगा।”
कितने ही लोग हैं जो शिकायत करते हैं कि उन्हें प्रार्थना में आनन्द नहीं आता। वे उसकी उपेक्षा नहीं करते, क्योंकि ऐसा करने का साहस उनमें नहीं है; परन्तु यदि साहस होता तो वे उसकी उपेक्षा कर देते, क्योंकि उसमें कोई सुख पाना तो उनसे कोसों दूर है। और क्या हमें भी इस बात पर विलाप नहीं करना पड़ता कि कभी-कभी रथों के पहिये निकल जाते हैं, और जब हम गिड़गिड़ाकर बिनती करते हैं तो हमारा चलना बड़ा कठिन हो जाता है? हम नियत समय तो बिता देते हैं, परन्तु घुटनों से ताज़गी पाए बिना उठ खड़े होते हैं, उस मनुष्य के समान जो अपने बिछौने पर लेटा तो रहा, पर ऐसी नींद नहीं सोया कि सचमुच उसका बल लौट आए।
जब फिर वह समय आता है तो विवेक हमें घुटनों पर ला खड़ा करता है, परन्तु परमेश्वर के साथ कोई मधुर संगति नहीं होती। इस दृढ़ निश्चय के साथ कि वह उन्हें पूरा करेगा, उसके सामने अपनी आवश्यकताएँ खोलकर कहना नहीं होता। कुछ रटे-रटाए अभ्यस्त वाक्यों का चक्कर फिर से पूरा कर लेने के बाद हम घुटनों से उठते हैं, और शायद पहले से भी अधिक विवेक में व्याकुल और मन में दुःखी होकर उठते हैं। मेरे विचार में बहुत से मसीही हैं जिन्हें इसी बात की शिकायत करनी पड़ती है—कि वे इसलिये प्रार्थना नहीं करते कि परमेश्वर के निकट आने की अनुमति मिलना एक धन्य बात है, बल्कि इसलिये करते हैं कि उन्हें करनी ही पड़ती है, क्योंकि यह उनका कर्तव्य है, क्योंकि उन्हें लगता है कि यदि वे न करें तो उनके मसीही होने के पक्के प्रमाणों में से एक प्रमाण खो जाएगा।
भाइयो, मैं आपको दोषी नहीं ठहराता; परन्तु साथ ही, यदि मैं आज प्रातः आपको अनुग्रह की ऐसी निचली दशा से उठाकर एक ऊँचे और अधिक स्वस्थ वातावरण में ले जाने का साधन बन सकूँ, तो मेरा प्राण अत्यन्त आनन्दित होगा। यदि मैं आपको एक और भी उत्तम मार्ग दिखा सकूँ, यदि इस समय से आगे आप प्रार्थना को अपना स्वाभाविक वातावरण, अपने जीवन के सबसे आनन्ददायक कामों में से एक समझने लगें, यदि आप उसे अपने आवश्यक भोजन से भी बढ़कर मानने लगें, और उसे स्वर्ग के सबसे उत्तम सुख-भोगों में से एक के समान मूल्यवान समझें, तो निश्चय ही मेरा एक बड़ा उद्देश्य पूरा हो जाएगा, और आपको एक बड़ी आशीष के लिये परमेश्वर का धन्यवाद करना पड़ेगा।
तो मुझे अपना ध्यान दीजिए, जब मैं आपसे बिनती करता हूँ कि पहले, पाठ को देखिए; दूसरे, अपने चारों ओर देखिए; और फिर, अपने ऊपर देखिए।
I. पहले, पाठ को देखिए
यदि आप इसे ध्यान से देखें, तो मैं समझता हूँ कि आप उन आवश्यक गुणों को पहचान लेंगे जो प्रार्थना में किसी भी बड़ी सफलता और प्रबलता के लिये अनिवार्य हैं। हमारे उद्धारकर्ता द्वारा प्रार्थना के वर्णन के अनुसार, सदा कुछ निश्चित वस्तुएँ होनी चाहिए जिनके लिये हम बिनती करें। वह वस्तुओं की बात करता है—“जो कुछ तुम प्रार्थना करके मांगो।” तो ऐसा प्रतीत होता है कि उसने यह बात इस रूप में नहीं रखी कि परमेश्वर की सन्तान उसके पास प्रार्थना करने तब जाएगी जब उनके पास माँगने को कुछ भी न हो।
प्रार्थना का दूसरा आवश्यक गुण सच्ची लालसा है, क्योंकि स्वामी यहाँ यह मानकर चलता है कि जब हम प्रार्थना करते हैं तो हमारे मन में लालसाएँ होती हैं। वास्तव में जब तक लालसाओं की भरपूरी और उमड़न न हो, वह प्रार्थना नहीं है; वह प्रार्थना जैसी कोई चीज़ हो सकती है, उसका बाहरी रूप या कोरा ढाँचा हो सकती है, परन्तु वह जीवित वस्तु नहीं है—वह सब पर प्रबल होनेवाली, सर्वसामर्थी वस्तु नहीं है जिसे प्रार्थना कहते हैं। यह भी ध्यान दीजिए कि विश्वास सफल प्रार्थना का एक अनिवार्य गुण है—“प्रतीति कर लो कि तुम्हें मिल गया।” आप ऐसी प्रार्थना नहीं कर सकते कि वह स्वर्ग में सुनी जाए और आपके प्राण की सन्तुष्टि तक उसका उत्तर मिले, जब तक आप यह विश्वास न करें कि परमेश्वर सचमुच आपकी सुनता है और आपको उत्तर देगा। एक और गुण यहाँ बिल्कुल ऊपर ही दिखाई देता है, अर्थात् दृढ़ विश्वास के साथ सदा एक ऐसी प्रत्याशा भी होनी चाहिए जो बात को सचमुच हुआ हुआ मान ले—“प्रतीति कर लो कि तुम्हें मिल गया।” केवल यह विश्वास नहीं कि “मिलेगा,” वरन् यह विश्वास कि “मिल गया”—उन्हें ऐसा गिनिए मानो वे मिल चुकी हों, ऐसा हिसाब लगाइए मानो वे आपके पास पहले से हों, और ऐसा व्यवहार कीजिए मानो वे आपके पास हों—ऐसा व्यवहार कीजिए मानो आपको निश्चय हो कि वे आपको मिलेंगी—“प्रतीति कर लो कि तुम्हें मिल गया, और तुम्हारे लिये हो जाएगा।” आइए, हम इन चारों गुणों पर एक-एक करके फिर से दृष्टि डालें।
प्रार्थना को किसी भी मूल्य का बनाने के लिये, निश्चित वस्तुएँ होनी चाहिए जिनके लिये बिनती की जाए। मेरे भाइयो, हम अक्सर अपनी प्रार्थनाओं में इस, उस और किसी तीसरी बात के पीछे भटकते फिरते हैं, और हमें कुछ नहीं मिलता, क्योंकि उनमें से किसी में भी हम सचमुच कुछ नहीं चाहते। हम बहुत से विषयों पर बकबक करते हैं, परन्तु प्राण किसी एक वस्तु पर अपने को केन्द्रित नहीं करता। क्या आप कभी-कभी पहले से यह सोचे बिना घुटनों पर नहीं गिर पड़ते कि आप परमेश्वर से क्या माँगना चाहते हैं? आप यह आदत के कारण करते हैं, बिना इसके कि आपके हृदय में कोई हलचल हो। आप उस मनुष्य के समान हैं जो किसी दुकान पर जाए और उसे पता ही न हो कि वह कौन-सी वस्तुएँ लेगा। हो सकता है वहाँ पहुँचकर वह संयोग से कोई अच्छी खरीदारी कर ले, परन्तु निश्चय ही यह अपनाने योग्य बुद्धिमानी की रीति नहीं है।
और इसी प्रकार प्रार्थना करनेवाला मसीही बाद में किसी सच्ची लालसा तक पहुँच सकता है और अपना उद्देश्य पा सकता है; परन्तु यदि वह विचार और आत्म-परीक्षा के द्वारा अपने प्राण को तैयार करके, किसी ऐसी वस्तु के लिये परमेश्वर के पास आता जिसे वह एक सच्ची बिनती के साथ लक्ष्य बनाने जा रहा हो, तो वह कितना अधिक सफल होता! यदि हम महारानी के दरबार में भेंट की अनुमति माँगते, तो हमसे इस प्रश्न का उत्तर देने की अपेक्षा की जाती, “आप उनसे किसलिये मिलना चाहते हैं?” हमसे यह अपेक्षा न की जाती कि हम राजसी उपस्थिति में चले जाएँ, और वहाँ पहुँचकर फिर कोई निवेदन सोचें।
परमेश्वर की सन्तान के साथ भी ऐसा ही है। उसे इस महान प्रश्न का उत्तर देने में समर्थ होना चाहिए, “तेरा क्या निवेदन है, और तू क्या माँगता है? वह पूरा किया जाएगा।” कल्पना कीजिए कि एक धनुर्धारी अपने धनुष से तीर चला रहा है, और उसे पता ही नहीं कि निशाना कहाँ है! क्या उसके सफल होने की सम्भावना होगी? सोचिए कि खोज-यात्रा पर एक जहाज़ समुद्र में निकल पड़ता है, और कप्तान को कुछ भी अनुमान नहीं कि वह किस वस्तु को खोज रहा है!
क्या आप आशा करेंगे कि वह विज्ञान की खोजों से या सोने के खज़ानों से लदा हुआ लौटेगा? बाकी हर बात में आपकी एक योजना होती है। आप यह जाने बिना काम पर नहीं जाते कि कोई वस्तु है जिसे बनाने का आपने इरादा किया है; तो यह कैसे है कि आप यह जाने बिना परमेश्वर के पास जाते हैं कि आप क्या पाने का इरादा रखते हैं? यदि आपके सामने कोई लक्ष्य होता, तो आपको प्रार्थना कभी नीरस और भारी काम न लगती; मुझे निश्चय है कि आप उसके लिये तरसते। आप कहते, “मुझे कुछ चाहिए। भला होता कि मैं अपने परमेश्वर के निकट जा सकता और उससे वह माँग सकता! मुझे एक आवश्यकता है, मैं चाहता हूँ कि वह पूरी हो, और मैं तब तक तरसता हूँ जब तक अकेला न हो जाऊँ, ताकि उसके सामने अपना मन उण्डेल दूँ और उससे यह बड़ी वस्तु माँगूँ जिसके लिये मेरा प्राण इतनी व्याकुलता से हाँफता है।”
यदि आपके सामने कुछ लक्ष्य हों जिन पर आप निशाना साधें, तो आप इसे अपनी प्रार्थनाओं के लिये अधिक सहायक पाएँगे; और मेरे विचार में यदि कुछ व्यक्ति भी हों जिनका आप नाम लेंगे। केवल सामान्य रूप से पापियों के लिये परमेश्वर से बिनती न कीजिए, वरन् सदा विशेष रूप से कुछ का नाम लीजिए। यदि आप संडे स्कूल के शिक्षक हैं, तो केवल यह न माँगिए कि आपकी कक्षा को आशीष मिले, वरन् परमप्रधान के सामने अपने बच्चों के लिये निश्चित रूप से उनके नाम लेकर प्रार्थना कीजिए। और यदि आपके घराने में कोई दया है जिसकी आप लालसा करते हैं, तो घुमा-फिराकर न जाइए, वरन् परमेश्वर से अपनी बिनतियों में सीधे और सरल रहिए।
जब आप उससे प्रार्थना करें, तो उसे बताइए कि आपको क्या चाहिए। यदि आपके पास पर्याप्त धन नहीं है, यदि आप दरिद्रता में हैं, यदि आप तंगी में हैं, तो अपनी दशा साफ़-साफ़ कह दीजिए। परमेश्वर के साथ कोई बनावटी शालीनता न बरतिए। सीधे मुद्दे पर आइए, उससे सच्चाई से बात कीजिए। उसे किसी सुन्दर घुमावदार भाषा की आवश्यकता नहीं, जैसी मनुष्य तब निरन्तर बरतते हैं जब वे अपनी बात खुलकर कहना पसन्द नहीं करते। यदि आपको कोई सांसारिक या आत्मिक दया चाहिए, तो वैसा ही कहिए। उसे व्यक्त करने के लिये शब्द ढूँढ़ने को पूरी बाइबल को उलट-पुलट न कीजिए। अपनी आवश्यकताओं को उन शब्दों में व्यक्त कीजिए जो स्वाभाविक रूप से आपके मन में आते हैं। विश्वास कीजिए, वे ही सबसे अच्छे शब्द होंगे।
अब्राहम के शब्द अब्राहम के लिये सबसे अच्छे थे, और आपके शब्द आपके लिये सबसे अच्छे होंगे। याकूब और एलिय्याह के समान उन्हीं के वाक्यों का प्रयोग करते हुए प्रार्थना करने के लिये आपको पवित्रशास्त्र के सारे पदों का अध्ययन करने की आवश्यकता नहीं। यदि आप ऐसा करेंगे तो आप उनका अनुकरण नहीं करेंगे। आप शब्दशः और दासवत् उनकी नकल कर सकते हैं, परन्तु आपमें वह प्राण नहीं होगा जिसने उनके शब्दों को जन्म दिया और उनमें जान डाली। अपने शब्दों में प्रार्थना कीजिए। परमेश्वर से साफ़-साफ़ बात कीजिए, जो आपको चाहिए वह तुरन्त माँगिए।
व्यक्तियों के नाम लीजिए, वस्तुओं के नाम लीजिए, और अपनी बिनतियों के लक्ष्य पर सीधा निशाना साधिए; और मुझे निश्चय है कि आप शीघ्र ही पाएँगे कि वह थकान और नीरसता जिसकी शिकायत आप अक्सर अपनी मध्यस्थता की प्रार्थनाओं में करते हैं, फिर आप पर नहीं आएगी, या कम से कम इतनी आदतन नहीं आएगी जितनी अब तक आती रही है। “परन्तु,” कोई कहता है, “मुझे नहीं लगता कि मेरे पास प्रार्थना के लिये कोई विशेष विषय हैं।” आह! मेरे प्रिय भाई, मैं नहीं जानता कि आप कौन हैं, या कहाँ रहते हैं कि आपके पास प्रार्थना के लिये कोई विशेष विषय ही न हों; क्योंकि मैं तो यह पाता हूँ कि हर दिन या तो अपनी आवश्यकता लाता है या अपना संकट, और मेरे पास हर दिन अपने परमेश्वर को बताने के लिये कुछ न कुछ होता है।
परन्तु मेरे प्रिय भाइयो, यदि हम पर कोई संकट न भी होता, यदि हम अनुग्रह में इतनी ऊँचाई तक पहुँच गए होते कि हमारे पास माँगने को कुछ न होता, तो क्या हम मसीह से इतना प्रेम करते हैं कि हमें यह प्रार्थना करने की आवश्यकता ही नहीं कि हम उससे और अधिक प्रेम करें? क्या हममें इतना विश्वास है कि हमने यह पुकारना छोड़ दिया है, “प्रभु, इसे बढ़ा”? मुझे निश्चय है कि थोड़ी-सी आत्म-परीक्षा से आप सदा शीघ्र ही जान लेंगे कि कोई न कोई उचित विषय है जिसके लिये आप दया के द्वार पर खटखटा सकते हैं और पुकार सकते हैं, “हे प्रभु, मेरे मन की अभिलाषा मुझे दे।”
और यदि आपके मन में कोई लालसा नहीं है, तो आपको बस इतना करना है कि जो पहला परखा हुआ मसीही आपको मिले उससे पूछ लीजिए, और वह आपको एक बता देगा। “ओह,” वह आपको उत्तर देगा, “यदि आपके पास अपने लिये माँगने को कुछ नहीं है, तो मेरे लिये प्रार्थना कीजिए। माँगिए कि एक बीमार पत्नी चंगी हो जाए। प्रार्थना कीजिए कि प्रभु एक निराश हृदय पर अपने मुख का प्रकाश चमकाए; माँगिए कि प्रभु किसी ऐसे सेवक की सहायता भेजे जो व्यर्थ परिश्रम करता रहा है, और व्यर्थ ही अपना बल खोता रहा है।”
जब आप अपने लिये माँग चुकें, तो दूसरों के लिये बिनती कीजिए; और यदि आपको कोई ऐसा न मिले जो कोई विषय सुझा सके, तो इस विशाल सदोम पर दृष्टि कीजिए, इस नगर पर जो आपके सामने एक दूसरे अमोरा के समान पड़ा है; उसे निरन्तर अपनी प्रार्थनाओं में परमेश्वर के सामने ले जाइए और पुकारिए, “आह, कि लंदन तेरे सम्मुख जीवित रहे, कि उसका पाप रोका जाए, कि उसकी धार्मिकता ऊँची की जाए, कि पृथ्वी का परमेश्वर इस नगर में से अपने लिये बहुत से लोग प्राप्त करे।”
प्रार्थना के लिये निश्चित विषय होने के समान ही यह भी आवश्यक है कि उसे पाने की सच्ची लालसा हो। एक पुराने धर्मविज्ञानी का कहना है, “ठंडी प्रार्थनाएँ इनकार माँगती हैं।” जब हम प्रभु से उत्साह के साथ नहीं, वरन् ठंडेपन से माँगते हैं, तो मानो हम उसका हाथ रोक देते हैं और उसे वही आशीष देने से रोकते हैं जिसे खोजने का हम दिखावा करते हैं। जब आपका लक्ष्य आपकी आँखों के सामने हो, तो आपका प्राण उस वस्तु के मूल्य से, उसके लिये अपनी अत्यधिक आवश्यकता से, और उस खतरे से जिसमें आप तब तक रहेंगे जब तक वह वस्तु न दी जाए, इस प्रकार भर जाना चाहिए कि आप उसके लिये ऐसे बिनती करने को विवश हो जाएँ जैसे कोई मनुष्य अपने प्राण के लिये बिनती करता है।
मनुष्य से की गई सच्ची प्रार्थना का एक सुन्दर उदाहरण दो कुलीन महिलाओं के आचरण में मिलता है, जिनके पतियों को मृत्युदण्ड सुनाया गया था और जिन्हें फाँसी दी जानेवाली थी, जब वे राजा जॉर्ज के सामने आईं और उनकी क्षमा के लिये गिड़गिड़ाकर बिनती की। राजा ने रूखेपन और क्रूरता से उन्हें ठुकरा दिया। जॉर्ज प्रथम! यह तो उसके स्वभाव के बिल्कुल अनुरूप था। और जब उन्होंने फिर, और फिर, और फिर बिनती की, तो वे घुटनों से उठाई न जा सकीं; उन्हें सचमुच घसीटकर दरबार से बाहर ले जाना पड़ा, क्योंकि वे तब तक हटने को तैयार न थीं जब तक राजा उन पर मुस्कुराकर उनसे यह न कह दे कि उनके पति जीवित रहेंगे। हाय! वे असफल रहीं, परन्तु अपने पतियों के प्राणों के लिये इस प्रकार बिनती करते रहने की अपनी दृढ़ता के कारण वे महान स्त्रियाँ थीं।
परमेश्वर से प्रार्थना करने की हमारी रीति यही है। जो वस्तु हमें चाहिए उसके लिये हममें ऐसी लालसा होनी चाहिए कि जब तक वह हमें न मिल जाए हम उठें ही नहीं—तौभी उसकी ईश्वरीय इच्छा के अधीन रहकर। यह अनुभव करते हुए कि जो वस्तु हम माँगते हैं वह अनुचित नहीं हो सकती, और उसने स्वयं उसकी प्रतिज्ञा की है, हमने ठान लिया है कि वह अवश्य दी जाए; और यदि न दी जाए, तो हम उस प्रतिज्ञा को लेकर फिर, और फिर बिनती करेंगे, यहाँ तक कि हमारी बिनतियों के रुकने से पहले स्वर्ग के फाटक हिल उठें।
कोई आश्चर्य नहीं कि इन दिनों परमेश्वर ने हमें अधिक आशीष नहीं दी, क्योंकि हम प्रार्थना में वैसे उत्साही नहीं हैं जैसे हमें होना चाहिए। आह, वे ठंडे मन की प्रार्थनाएँ जो होठों पर ही मर जाती हैं—वे जमी हुई बिनतियाँ; वे मनुष्यों के हृदय को नहीं हिलातीं, तो परमेश्वर के हृदय को कैसे हिलाएँगी? वे हमारे अपने प्राणों से नहीं निकलतीं, वे हमारे अन्तरतम हृदय के गहरे गुप्त सोतों से नहीं उमड़तीं, और इसलिये वे उस तक ऊपर नहीं उठ सकतीं जो केवल प्राण की पुकार सुनता है, जिसके सामने कपट कोई परदा नहीं बुन सकता और औपचारिकता कोई छल-वेश नहीं धर सकती। हमें सच्चे मन से लगा रहना चाहिए, अन्यथा हमें यह आशा करने का कोई अधिकार नहीं कि प्रभु हमारी प्रार्थना सुनेगा।
और निश्चय ही, मेरे भाइयो, यदि हम उस परमेश्वर की महानता को समझ लेते जिसके सामने हम बिनती करते हैं, तो यह सारे हल्केपन को रोकने और निरन्तर गम्भीर लगन के लिये हमें विवश करने को पर्याप्त होता। हे मेरे परमेश्वर, क्या मैं तेरी उपस्थिति में आकर ठंडे मन के शब्दों से तेरा ठट्ठा करूँ? क्या स्वर्गदूत तेरे सामने अपने मुँह ढाँपते हैं, और क्या मैं बिना प्राण और बिना हृदय के किसी रीति को बड़बड़ाकर पूरा कर लेने से सन्तुष्ट रहूँ? आह, मेरे भाइयो! हम बहुत कम जानते हैं कि हमारी कितनी प्रार्थनाएँ प्रभु के लिये घृणित हैं। यदि मनुष्य सड़कों पर हमसे इस प्रकार माँगें मानो जो वे माँगते हैं वह उन्हें चाहिए ही नहीं, तो यह आपके और मेरे लिये घृणित होगा। परन्तु क्या हमने परमेश्वर के साथ वैसा ही नहीं किया है? क्या वह वस्तु, जो मनुष्य के लिये स्वर्ग का सबसे बड़ा वरदान है, हमारे लिये एक सूखा, मरा हुआ कर्तव्य नहीं बन गई? जॉन ब्रैडफ़र्ड के विषय में कहा जाता था कि प्रार्थना में उसकी एक विशेष कला थी, और जब उससे उसका भेद पूछा गया, तो उसने कहा, “जब मैं जानता हूँ कि मुझे क्या चाहिए, तो मैं सदा उसी प्रार्थना पर ठहरा रहता हूँ, जब तक मुझे यह अनुभव न हो जाए कि मैंने परमेश्वर से उसके लिये बिनती कर ली है, और जब तक परमेश्वर और मेरे बीच उस विषय में लेन-देन न हो जाए। जब तक मैं पहली बिनती पूरी न कर लूँ, तब तक मैं कभी दूसरी बिनती की ओर नहीं बढ़ता।”
हाय उन मनुष्यों पर जो आरम्भ करते हैं, “हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है; तेरा नाम पवित्र माना जाए,” और इससे पहले कि आराधना का वह विचार—“तेरा नाम पवित्र माना जाए”—उनके मन में सचमुच उतरे, वे अगले शब्द दोहराने लगते हैं, “तेरा राज्य आए”; तब शायद कोई बात उनके मन में कौंधती है, “क्या मैं सचमुच चाहता हूँ कि उसका राज्य आए? यदि वह अभी आ जाए, तो मैं कहाँ होऊँगा?” और जब वे यह सोच ही रहे होते हैं, उनकी आवाज़ आगे बढ़ती जाती है, “तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो”; इस प्रकार वे अपनी प्रार्थनाओं को गड्डमड्ड कर देते हैं और वाक्यों को एक-दूसरे में मिला देते हैं।
आह! हर एक बिनती पर तब तक ठहरिए जब तक आपने सचमुच उसे प्रार्थना में न कह लिया हो। एक साथ डोरी पर दो तीर चढ़ाने का प्रयत्न न कीजिए, दोनों चूक जाएँगे। जो अपनी बन्दूक में दो बार बारूद भरना चाहे, वह सफलता की आशा नहीं कर सकता। पहले एक गोली चलाइए, और फिर दोबारा भरिए। एक बार परमेश्वर से बिनती कीजिए और प्रबल होइए, और फिर दोबारा बिनती कीजिए। पहली दया प्राप्त कीजिए, और फिर दूसरी के लिये दोबारा जाइए। अपनी प्रार्थनाओं के रंगों को एक-दूसरे में इस प्रकार बहने देने से सन्तुष्ट न होइए कि देखने को कोई चित्र ही न बचे, केवल एक बड़ा धब्बा, बुरी तरह पोते गए रंगों का एक लेप।
स्वयं प्रभु की प्रार्थना को देखिए। उसमें कैसी स्पष्ट, तीखी रेखाएँ हैं। उसमें कुछ निश्चित दयाएँ हैं, और वे एक-दूसरे में नहीं बहतीं। वह वहाँ खड़ी है, और जब आप उसे सम्पूर्ण रूप में देखते हैं तो वह एक भव्य चित्र है—गड़बड़ी नहीं, वरन् सुन्दर व्यवस्था। आपकी प्रार्थनाएँ भी ऐसी ही हों। एक पर तब तक ठहरे रहिए जब तक आप उसमें प्रबल न हो जाएँ, और फिर अगली पर बढ़िए। जब निश्चित विषय और उत्कट लालसाएँ एक साथ मिल जाती हैं, तब इस आशा का प्रभात होता है कि तुम परमेश्वर के साथ प्रबल होगे।
परन्तु फिर, ये दो बातें किसी काम की न होतीं यदि इनके साथ एक और भी अधिक आवश्यक और ईश्वरीय गुण न मिला होता, अर्थात् परमेश्वर में दृढ़ विश्वास। भाइयो, क्या आप प्रार्थना पर विश्वास करते हैं? मैं जानता हूँ कि आप प्रार्थना करते हैं क्योंकि आप परमेश्वर के लोग हैं; परन्तु क्या आप प्रार्थना की सामर्थ पर विश्वास करते हैं? बहुत से मसीही हैं जो नहीं करते; वे समझते हैं कि यह एक अच्छी बात है, और वे मानते हैं कि कभी-कभी यह अद्भुत काम कर देती है, परन्तु वे यह नहीं सोचते कि प्रार्थना, सच्ची प्रार्थना, सदा सफल होती है। वे समझते हैं कि उसका प्रभाव बहुत सी दूसरी बातों पर निर्भर करता है, परन्तु उसमें अपने आप में कोई मूल गुण या सामर्थ नहीं है।
अब, मेरे अपने प्राण का दृढ़ निश्चय यह है कि प्रार्थना सम्पूर्ण विश्व की सबसे महान शक्ति है; कि उसमें बिजली, आकर्षण, गुरुत्वाकर्षण, या उन अन्य गुप्त शक्तियों में से किसी से भी अधिक सर्वसामर्थी बल है, जिन्हें मनुष्यों ने नाम तो दे दिए हैं, परन्तु जिन्हें वे समझते नहीं। प्रार्थना का सम्पूर्ण विश्व पर उतना ही प्रत्यक्ष, उतना ही सच्चा, उतना ही निश्चित, उतना ही अटल प्रभाव है जितना पदार्थ के किसी भी नियम का। जब कोई मनुष्य सचमुच प्रार्थना करता है, तो यह प्रश्न ही नहीं रहता कि परमेश्वर उसकी सुनेगा या नहीं; उसे उसकी सुननी ही होगी—इसलिये नहीं कि प्रार्थना में कोई विवशता है, वरन् इसलिये कि प्रतिज्ञा में एक मधुर और धन्य विवशता है। परमेश्वर ने प्रार्थना सुनने की प्रतिज्ञा की है और वह अपनी प्रतिज्ञा पूरी करेगा। क्योंकि वह परमप्रधान और सच्चा परमेश्वर है, वह आप अपना इन्कार नहीं कर सकता।
आह! इस बात को सोचना, कि आप, एक तुच्छ मनुष्य, यहाँ खड़े होकर परमेश्वर से बात कर सकते हैं, और परमेश्वर के द्वारा सारे लोकों को हिला सकते हैं। तौभी जब आपकी प्रार्थना सुनी जाएगी, तो सृष्टि में कोई गड़बड़ी नहीं होगी; चाहे सबसे महान उद्देश्य पूरे हों, तौभी परमेश्वर का विधान एक क्षण के लिये भी अव्यवस्थित नहीं होगा। न कोई पत्ता पेड़ से समय से पहले गिरेगा, न कोई तारा अपने मार्ग से भटकेगा, न जल की एक बूँद अपने सोते से धीरे टपकेगी; सब कुछ वैसे ही चलता रहेगा, और तौभी आपकी प्रार्थना ने सब कुछ सिद्ध कर दिया होगा।
वह परमेश्वर की आज्ञप्तियों और उद्देश्यों से, जब वे प्रतिदिन पूरे हो रहे होते हैं, बात करेगी, और वे सब आपकी प्रार्थना से ऊँचे स्वर में कहेंगे और पुकारेंगे, “तू हमारा भाई है; हम आज्ञप्तियाँ हैं और तू एक प्रार्थना, परन्तु तू स्वयं भी एक आज्ञप्ति है, उतनी ही पुरानी, उतनी ही निश्चित, उतनी ही प्राचीन जितनी हम हैं।” हमारी प्रार्थनाएँ दूसरे रूप में परमेश्वर की आज्ञप्तियाँ ही हैं। परमेश्वर के लोगों की प्रार्थनाएँ जीवित हृदयों से साँस के साथ निकली हुई परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ ही हैं, और वे प्रतिज्ञाएँ वे आज्ञप्तियाँ ही हैं, केवल दूसरे रूप और ढंग में ढाली हुई।
यह न कहिए, “मेरी प्रार्थनाएँ आज्ञप्तियों पर कैसे प्रभाव डाल सकती हैं?” वे नहीं डाल सकतीं, सिवाय इसके कि आपकी प्रार्थनाएँ स्वयं आज्ञप्तियाँ हैं; और जैसे-जैसे वे निकलती हैं, हर वह प्रार्थना जो पवित्र आत्मा के द्वारा आपके प्राण में प्रेरित की गई है, उतनी ही सर्वसामर्थी और उतनी ही अनन्त है जितनी वह आज्ञप्ति जिसने कहा, “उजियाला हो: तो उजियाला हो गया,” या वह आज्ञप्ति जिसने उसके लोगों को चुना, और मसीह के बहुमूल्य लहू के द्वारा उनका छुटकारा ठहराया।
प्रार्थना में आपके पास सामर्थ है, और आज आप परमेश्वर द्वारा बनाए गए इस विश्व के सबसे शक्तिशाली सेवकों में खड़े हैं। आपके पास स्वर्गदूतों पर अधिकार है, वे आपकी इच्छा पर उड़ेंगे। आपके पास आग पर, और जल पर, और पृथ्वी के तत्वों पर अधिकार है। आपके पास यह सामर्थ है कि अपनी आवाज़ तारों के पार सुनवाएँ; जहाँ गर्जन मौन में विलीन हो जाते हैं, वहाँ आपकी आवाज़ अनन्तकाल की प्रतिध्वनियों को जगा देगी। स्वयं परमेश्वर का कान सुनेगा, और परमेश्वर का हाथ आपकी इच्छा के आगे झुक जाएगा। वह आपसे पुकारने को कहता है, “तेरी इच्छा पूरी हो,” और आपकी इच्छा पूरी होगी। जब आप उसकी प्रतिज्ञा लेकर बिनती कर सकते हैं, तब आपकी इच्छा उसकी इच्छा होती है।
मेरे प्रिय मित्रो, क्या यह एक भययोग्य बात नहीं लगती कि किसी के हाथ में ऐसी सामर्थ हो कि वह प्रार्थना कर सके? आपने कभी-कभी ऐसे मनुष्यों के विषय में सुना है जो यह दावा करते थे कि उनके पास एक विचित्र और रहस्यमय शक्ति है, जिसके द्वारा वे विशाल गहराई से आत्माओं को बुला सकते थे, जिसके द्वारा वे वर्षा की झड़ी ला सकते थे या सूर्य को रोक सकते थे। यह सब कल्पना की उपज थी; परन्तु यदि यह सच भी होता, तो मसीही उनसे भी बड़ा जादूगर है।
यदि उसे परमेश्वर में केवल विश्वास हो, तो उसके लिये कुछ भी असम्भव नहीं। वह सबसे गहरे जल से छुड़ाया जाएगा—वह सबसे कठिन संकटों से बचाया जाएगा—अकाल में उसे भोजन मिलेगा—महामारी में वह अछूता निकल जाएगा—विपत्ति के बीच वह दृढ़ और बलवन्त होकर चलेगा—युद्ध में वह सदा ढाल से सुरक्षित रहेगा—और लड़ाई के दिन वह अपना सिर ऊँचा करेगा, यदि वह केवल प्रतिज्ञा पर विश्वास कर सके और उसे परमेश्वर की आँखों के सामने थामे रखे और अटल भरोसे के मन्त्र-बल से उसे लेकर बिनती करे।
मैं फिर कहता हूँ, कुछ भी नहीं—कोई बल इतना प्रचण्ड नहीं, कोई ऊर्जा इतनी अद्भुत नहीं, जितनी वह ऊर्जा जो परमेश्वर ने हर उस मनुष्य को दी है जो याकूब के समान मल्लयुद्ध कर सकता है, और इस्राएल के समान प्रार्थना में उसके साथ प्रबल हो सकता है। परन्तु हमें इस पर विश्वास होना चाहिए; हमें प्रार्थना को वही मानना चाहिए जो वह है, अन्यथा वह वैसी नहीं होगी जैसी उसे होना चाहिए। जब तक मैं यह विश्वास न करूँ कि मेरी प्रार्थना प्रभावशाली है, वह प्रभावशाली नहीं होगी, क्योंकि वह बहुत हद तक मेरे विश्वास पर निर्भर करेगी। जब मुझमें विश्वास न हो, तब भी परमेश्वर मुझे वह दया दे सकता है—वह उसका अपना प्रभुतापूर्ण अनुग्रह होगा—परन्तु उसने ऐसा करने की प्रतिज्ञा नहीं की है।
परन्तु जब मुझमें विश्वास हो और मैं सच्ची लालसा के साथ प्रतिज्ञा लेकर बिनती कर सकूँ, तब यह केवल सम्भावना की बात नहीं रह जाती कि मुझे आशीष मिलेगी या नहीं, या मेरी इच्छा पूरी होगी या नहीं। जब तक सनातन परमेश्वर अपने वचन से न हट जाए, जब तक उसकी दी हुई शपथ रद्द न कर दी जाए, और वह स्वयं वह होना न छोड़ दे जो वह है, तब तक “हम यह भी जानते हैं, कि जो कुछ हम ने उस से मांगा, वह पाया है।”
और अब एक सीढ़ी और ऊपर चढ़ें: निश्चित विषयों, उत्कट लालसाओं, और प्रार्थना की प्रभावशीलता में दृढ़ विश्वास के साथ-साथ—और आह, ईश्वरीय अनुग्रह हमारे साथ ऐसा ही करे!—एक ऐसी प्रत्याशा भी मिली होनी चाहिए जो बात को सचमुच हुआ हुआ मान ले। हमें दयाओं को मिलने से पहले ही गिनने में समर्थ होना चाहिए, यह विश्वास करते हुए कि वे मार्ग में हैं। कुछ दिन पहले मैं एक प्यारी-सी छोटी पुस्तक पढ़ रहा था, जिसकी ओर मैं आप सब का ध्यान दिलाना चाहूँगा; वह एक अमेरिकी लेखक की लिखी है जो प्रार्थना की सामर्थ को भली-भाँति जानता प्रतीत होता है, और जिसका मैं बहुत सी अच्छी बातों के लिये ऋणी हूँ—एक छोटी पुस्तक जिसका नाम ‘द स्टिल आवर’ (शान्त घड़ी) है। उसमें मुझे दानिय्येल की पुस्तक के एक अंश का उल्लेख मिला—मेरे विचार में दसवें अध्याय का—जहाँ, जैसा वह कहता है, प्रार्थना की सारी कार्य-प्रणाली मानो खोलकर रख दी गई है।
दानिय्येल घुटनों के बल प्रार्थना कर रहा है, और प्रधान स्वर्गदूत मीकाएल उसके पास आता है। वह उससे बातें करता है और उसे बताता है कि जैसे ही दानिय्येल ने समझने के लिये अपना मन लगाया और परमेश्वर के सामने अपने को दीन किया, वैसे ही उसके वचन सुने गए, और प्रभु ने स्वर्गदूत को भेज दिया था। फिर वह संसार के सबसे व्यावहारिक ढंग से उससे कहता है, “मुझे पहले ही यहाँ पहुँच जाना चाहिए था, परन्तु फारस के राज्य का प्रधान मेरा सामना करता रहा; तौभी तेरी जाति के प्रधान ने मेरी सहायता की, और मैं तुझे शान्ति देने और समझाने आया हूँ।”
अब देखिए, परमेश्वर हमारे हृदयों में लालसा फूँकता है, और जैसे ही लालसा वहाँ होती है, हमारे पुकारने से पहले ही वह उत्तर देने लगता है। इससे पहले कि शब्द स्वर्ग तक आधे मार्ग भी पहुँचें, जब वे अभी हमारे होठों पर काँप ही रहे होते हैं—उन शब्दों को जानते हुए जो हम कहना चाहते हैं—वह उनका उत्तर देने लगता है, स्वर्गदूत को भेजता है, स्वर्गदूत आता है और आवश्यक आशीष नीचे ले आता है। अरे, यदि आप इसे अपनी आँखों से देख सकते तो यह बात एक प्रकाशन ही होती।
कुछ लोग सोचते हैं कि आत्मिक बातें स्वप्न हैं, और हम कल्पनाओं की बातें कर रहे हैं। नहीं, मैं सचमुच विश्वास करता हूँ कि मसीही की प्रार्थना में उतनी ही वास्तविकता है जितनी बिजली की कौंध में; और मसीही की प्रार्थना की उपयोगिता और उत्तमता उतनी ही प्रत्यक्ष रूप से जानी जा सकती है जितनी बिजली की कौंध की शक्ति, जब वह पेड़ को चीर डालती है, उसकी डालियाँ तोड़ देती है, और उसे ठीक जड़ तक फाड़ देती है।
प्रार्थना कोई कल्पना या कहानी नहीं है; वह एक सच्ची, वास्तविक वस्तु है, जो विश्व को विवश करती है, स्वयं परमेश्वर के नियमों को बेड़ियों में बाँध देती है, और उस महान और पवित्र परमेश्वर को विवश करती है कि वह अपने दीन किन्तु कृपापात्र प्राणी—मनुष्य—की इच्छा सुने। परन्तु हमें सदा इस पर विश्वास करने की आवश्यकता है। हमें प्रार्थना में ऐसे निश्चय की आवश्यकता है जो बात को सचमुच हुआ हुआ मान ले। दयाओं को उनके आने से पहले ही गिन लेना! निश्चित होना कि वे आ रही हैं! ऐसा व्यवहार करना मानो वे हमारे पास हों!
जब आप अपनी दिन भर की रोटी माँग चुके हों, तो फिर चिन्ता से व्याकुल न होना, वरन् विश्वास करना कि परमेश्वर ने आपकी सुन ली है और वह उसे आपको देगा। जब आप अपने बीमार बच्चे का मामला परमेश्वर के सामने ले जा चुके हों, तो विश्वास करना कि बच्चा चंगा हो जाएगा; या यदि न हो, तो वह आपके लिये एक बड़ी आशीष और परमेश्वर के लिये अधिक महिमा का कारण होगा; और इस प्रकार उसे उस पर छोड़ देना। यह कह सकना, “मैं जानता हूँ कि उसने अब मेरी सुन ली है; मैं अपने पहरे पर खड़ा रहूँगा, मैं अपने परमेश्वर की बाट जोहूँगा और सुनूँगा कि वह मेरे प्राण से क्या कहेगा।”
हे मसीही, जब आपने विश्वास से प्रार्थना की और उत्तर की आशा रखी, तो क्या आप कभी निराश हुए? आज प्रातः मैं यहाँ अपनी गवाही देता हूँ कि मैंने कभी उस पर भरोसा नहीं किया कि उसे अपने प्रति विफल पाया हो। मैंने मनुष्य पर भरोसा किया है और धोखा खाया है, परन्तु जब भी मैंने अपनी बिनती के साथ उसकी सुनने की तत्परता पर विश्वास और उसकी प्रतिज्ञा का निश्चय जोड़ा है, तब मेरे परमेश्वर ने मेरी की हुई बिनती को एक बार भी अस्वीकार नहीं किया।
परन्तु मैं किसी को कहते सुनता हूँ, “क्या हम सांसारिक बातों के लिये प्रार्थना कर सकते हैं?” हाँ, अवश्य कर सकते हैं। हर एक बात में अपनी आवश्यकताएँ परमेश्वर को बताइए। यह केवल आत्मिक बातों के लिये नहीं, वरन् दिन-प्रतिदिन के कामों के लिये भी है। अपनी सबसे छोटी परीक्षाएँ भी उसके सामने ले जाइए। वह प्रार्थना का सुननेवाला परमेश्वर है; वह पवित्रस्थान का परमेश्वर होने के साथ-साथ आपके घर का परमेश्वर भी है। जो कुछ आपके पास है, सब कुछ सदा परमेश्वर के सामने ले जाते रहिए। जैसे एक भले मनुष्य ने, जो शीघ्र ही इस कलीसिया में सम्मिलित होनेवाला है, अपनी स्वर्गवासी पत्नी के विषय में मुझसे कहा, “ओह,” उसने कहा, “वह ऐसी स्त्री थी कि जब तक वह किसी बात को प्रार्थना का विषय न बना लेती, मैं उससे कोई काम नहीं करवा पाता था। बात चाहे जो भी हो, वह कहा करती थी, ‘मुझे इसे प्रार्थना का विषय बनाना है।’” आह, हर बात को प्रभु के सामने फैला देने की इस मधुर आदत की और अधिक आवश्यकता है—ठीक वैसे ही जैसे हिजकिय्याह ने रबशाके की चिट्ठी के साथ किया—और उसे वहीं छोड़ देना, यह कहते हुए, “तेरी इच्छा पूरी हो, मैं इसे तुझे सौंपता हूँ”! लोग कहते हैं कि श्रीमान
ब्रिस्टल के मूलर उन्मादी हैं, क्योंकि वे सात सौ बच्चों को इकट्ठा करते हैं और विश्वास करते हैं कि परमेश्वर उनका प्रबन्ध करेगा; यद्यपि अक्सर थैली में कुछ भी नहीं होता, तौभी वे विश्वास करते हैं कि वह आ जाएगा। मेरे प्रिय भाइयो, वे उन्मादी नहीं हैं; वे केवल वही कर रहे हैं जो हर मसीही का साधारण, रोज़मर्रा का आचरण होना चाहिए। वे एक ऐसे नियम पर चल रहे हैं जिसका संसारी मनुष्य सदा ठट्ठा करेगा ही, क्योंकि वह उसे समझता नहीं—एक ऐसी रीति जो इन्द्रियों की दुर्बल बुद्धि को सदा हवाई और कल्पना-लोक की लगेगी, परन्तु जो परमेश्वर की सन्तान को कभी ऐसी नहीं लगेगी। वे साधारण समझ पर नहीं, वरन् साधारण समझ से भी ऊँची किसी वस्तु पर—असाधारण विश्वास पर—चलते हैं। आह, भला होता कि परमेश्वर को उसके वचन पर मान लेने के लिये हममें भी वह असाधारण विश्वास होता! वह उस मनुष्य को जो उस पर भरोसा रखता है, लज्जित या व्याकुल न होने देगा, और न होने दे सकता है।
इस प्रकार अब तक मैंने, जितना अच्छा मुझसे बन पड़ा, आपके सामने वे चार बातें रखी हैं जिन्हें मैं प्रबल प्रार्थना के लिये अनिवार्य समझता हूँ—“जो कुछ तुम प्रार्थना करके मांगो, तो प्रतीति कर लो कि तुम्हें मिल गया, और तुम्हारे लिये हो जाएगा।”
II. आपसे पाठ को देखने के लिये कहने के बाद, अब मैं चाहता हूँ कि आप अपने चारों ओर देखें
हमारी प्रार्थना-सभाओं पर अपने चारों ओर दृष्टि डालिए, और अपनी व्यक्तिगत मध्यस्थता की प्रार्थनाओं पर भी अपने चारों ओर दृष्टि डालिए, और दोनों को इस पाठ के आशय से परखिए। पहले, प्रार्थना-सभाओं पर अपने चारों ओर दृष्टि डालिए। इस विषय में मैं बहुत चुभती हुई बात नहीं कह सकता, क्योंकि मैं सच्चे मन से विश्वास करता हूँ कि जो प्रार्थना-सभाएँ साधारणतः हमारे बीच होती हैं, उनमें उन दोषों में से, जिनकी ओर मैं संकेत करने जा रहा हूँ, उन सब सभाओं की अपेक्षा कहीं कम दोष हैं जिनमें मैं कभी सम्मिलित हुआ हूँ। तौभी उनमें कुछ दोष हैं, और मैं आशा करता हूँ कि जो कुछ हम कहेंगे, उसे हर वह भाई व्यक्तिगत रूप से अपने मन में ले जाएगा जो प्रार्थना-सभाओं में सबके सामने गिड़गिड़ाकर बिनती करने का अभ्यस्त है।
क्या यह सच नहीं है कि सभा में प्रवेश करते ही आपको लगता है कि यदि आपको प्रार्थना करने के लिये बुलाया गया, तो आपको कोई वरदान दिखाना पड़ेगा? और वह वरदान, प्रार्थना करनेवाले बहुत से लोगों के विषय में (शायद कठोरता से, परन्तु मेरे विचार में सच्चाई से कहूँ तो), इसमें है कि अच्छी स्मरण-शक्ति हो ताकि बहुत से ऐसे पद याद रहें जो हमारे परदादा के दादा के दिनों से सदा दोहराए जाते रहे हैं, और उन्हें अच्छे, नियमित क्रम में दोहरा सकें। कुछ कलीसियाओं में, विशेषकर गाँव की कलीसियाओं में, यह वरदान इसमें भी है कि फेफड़े मज़बूत हों, ताकि जब आप संक्षेप में बोल रहे हों तो बिना साँस लिये पच्चीस मिनट तक टिके रह सकें, और जब कुछ लम्बे खिंच जाएँ तो पौन घण्टे तक।
यह वरदान इसमें भी है कि किसी विशेष वस्तु के लिये न माँगकर हर बात के पूरे दायरे से होकर गुज़र जाएँ; प्रार्थना को नोक वाला तीर नहीं, वरन् किसी ऐसी बेढंगी मशीन के समान बना दें जिसकी कोई नोक ही न हो, और तौभी जो पूरी की पूरी नोक होने के लिये बनी हो—जिसका निशाना हर वस्तु पर हो, और परिणामस्वरूप जो किसी पर भी न लगे। अक्सर इन्हीं भाइयों से सबसे अधिक बार प्रार्थना करने को कहा जाता है जिनके पास ये विचित्र और शायद उत्तम वरदान होते हैं; यद्यपि मुझे निश्चय ही कहना पड़ेगा कि ऐसे वरदानों की बड़ी धुन में रहने के विषय में मैं प्रेरित की आज्ञा का पालन नहीं कर सकता।
अब, यदि इसके बदले किसी ऐसे मनुष्य से प्रार्थना करने को कहा जाए जिसने पहले कभी सबके सामने प्रार्थना नहीं की, मान लीजिए वह उठकर कहता है, “हे प्रभु, मैं अपने को ऐसा पापी अनुभव करता हूँ कि तुझसे बोल भी नहीं पाता। प्रभु, प्रार्थना करने में मेरी सहायता कर! हे प्रभु, मेरे बेचारे प्राण का उद्धार कर! आह, कि तू मेरे पुराने साथियों का उद्धार करे! प्रभु, हमारे पास्टर को आशीष दे! हमें जागृति देने की कृपा कर। हे प्रभु, मैं और कुछ नहीं कह सकता; यीशु के निमित्त मेरी सुन! आमीन।” तो किसी प्रकार आपको ऐसा लगता है मानो आप स्वयं प्रार्थना करने लगे हों। आपको उस मनुष्य में रुचि होने लगती है, कुछ तो इस डर से कि कहीं वह रुक न जाए, और इसलिये भी कि आपको निश्चय है कि उसने जो कुछ कहा, सच्चे मन से कहा।
और यदि उसके बाद कोई दूसरा उठे और उसी आत्मा में प्रार्थना करे, तो आप बाहर जाकर कहते हैं, “यह सच्ची प्रार्थना है।” मैं दूसरी प्रकार की तीस मिनट की प्रार्थना की अपेक्षा ऐसी तीन मिनट की प्रार्थना अधिक पसन्द करूँगा, क्योंकि एक प्रार्थना करना है, और दूसरा प्रचार करना। मुझे अनुमति दीजिए कि मैं वह बात उद्धृत करूँ जो एक पुराने प्रचारक ने प्रार्थना के विषय पर कही थी, और उसे आपको सलाह के एक छोटे-से वचन के रूप में दूँ—“स्मरण रखो, प्रभु तुम्हारी प्रार्थनाओं के अंकगणित के कारण तुम्हारी नहीं सुनेगा; वह उनकी गिनती नहीं करता। वह तुम्हारी प्रार्थनाओं के अलंकार-शास्त्र के कारण तुम्हारी नहीं सुनेगा; उसे उस वाक्पटु भाषा की परवाह नहीं जिसमें वे कही जाती हैं। वह तुम्हारी प्रार्थनाओं की ज्यामिति के कारण तुम्हारी नहीं सुनेगा; वह उन्हें उनकी लम्बाई या चौड़ाई से नहीं नापता। वह तुम्हारी प्रार्थनाओं के संगीत के कारण तुम पर ध्यान नहीं देगा; उसे मधुर स्वरों या सुरीले वाक्यों की परवाह नहीं। न ही वह तुम्हारी प्रार्थनाओं के तर्कशास्त्र के कारण तुम्हारी ओर देखेगा—इसलिये कि वे भली-भाँति क्रमबद्ध और उत्तम रीति से खानों में बँटी हुई हैं। परन्तु वह तुम्हारी सुनेगा, और जो आशीष वह तुम्हें देगा उसकी मात्रा तुम्हारी प्रार्थनाओं की ईश्वरीयता के अनुसार नापेगा। यदि तुम मसीह के व्यक्तित्व को लेकर बिनती कर सको, और यदि पवित्र आत्मा तुम्हें उत्साह और लगन से प्रेरित करे, तो जो आशीषें तुम माँगोगे वे निश्चय ही तुम्हें मिलेंगी।”
भाइयो, मेरा मन करता है कि पुरानी प्रार्थनाओं का वह सारा भण्डार जला दूँ जिसे हम इन पचास वर्षों से इस्तेमाल करते आ रहे हैं। वह “तेल जो एक बरतन से दूसरे बरतन में उण्डेला जाता है”—वह “घोड़ा जो लड़ाई में वेग से दौड़ता है”—वह गलत उद्धृत, तोड़ा-मरोड़ा हुआ पद, “जहाँ दो या तीन इकट्ठे होते हैं, वहाँ तू उनके बीच में होगा, और वह भी उन्हें आशीष देने के लिये”—और वे सब दूसरे उद्धरण जिन्हें हम गढ़ते, उनकी जगह से उखाड़ते, और एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य तक नकल करते आए हैं।
भला होता कि हम बस अपने ही हृदय से परमेश्वर से बात करने आते। यह हमारी प्रार्थना-सभाओं के लिये एक बड़ी बात होती; उनमें अधिक लोग आते, और मुझे निश्चय है कि वे अधिक फलदायी होतीं, यदि हर मनुष्य औपचारिकता की उस आदत को झाड़ फेंके और परमेश्वर से वैसे बात करे जैसे एक बालक अपने पिता से बात करता है—जो हमें चाहिए वह उससे माँगे, और फिर बैठ जाए और बात समाप्त करे।
मैं यह पूरी मसीही लगन से कहता हूँ। अक्सर, क्योंकि मैंने किसी प्रचलित रूप में प्रार्थना करना नहीं चुना, लोगों ने कहा है, “यह मनुष्य श्रद्धालु नहीं है!” मेरे प्रिय महोदय, आप मेरी श्रद्धा के न्यायी नहीं हैं। मेरा स्थिर रहना या गिर जाना मेरे अपने स्वामी ही से सम्बन्ध रखता है। मैं नहीं समझता कि अय्यूब ने किसी को उद्धृत किया। मैं नहीं समझता कि याकूब ने स्वर्ग के उस पुराने संत—अपने पिता अब्राहम—को उद्धृत किया। मुझे नहीं मिलता कि यीशु मसीह ने प्रार्थना में पवित्रशास्त्र को उद्धृत किया हो। उन्होंने दूसरे लोगों के शब्दों में प्रार्थना नहीं की, वरन् अपने ही शब्दों में प्रार्थना की।
परमेश्वर नहीं चाहता कि आप पुराने पवित्रस्थान के उन उत्तम, परन्तु बहुत बासी हो चुके सुगन्ध-द्रव्यों को बटोरते फिरें। वह नया तेल चाहता है, जो आपके अपने प्राण के ताज़े जैतून से अभी-अभी निकाला गया हो। वह सुगन्ध-द्रव्य और लोबान चाहता है—उन पुराने सन्दूकों के नहीं, जिनमें वे पड़े-पड़े अपनी सुगन्ध खो बैठे हैं—वरन् वह ताज़ा धूप और ताज़ा गन्धरस चाहता है, जो आपके अपने प्राण के अनुभव के ओपीर से लाया गया हो। भली-भाँति ध्यान रखिए कि आप सचमुच प्रार्थना करें; प्रार्थना की भाषा मत सीखिए, वरन् प्रार्थना की आत्मा खोजिए; और सर्वशक्तिमान परमेश्वर आपको आशीष दे और आपको आपकी बिनतियों में और अधिक सामर्थी बनाए।
मैंने कहा है, “अपने चारों ओर देखिए।” मैं चाहता हूँ कि आप यह काम जारी रखें और अपनी-अपनी कोठरियों पर चारों ओर दृष्टि डालें। आह! भाइयो और बहनो, हममें से कुछ के लिये ऐसा कोई स्थान नहीं जिसे देखकर हमें इतनी लज्जा आनी चाहिए जितनी अपनी कोठरी के द्वार को देखकर। मैं यह नहीं कह सकता कि उसके कब्ज़ों में जंग लगा है; वे अपने नियत समयों पर खुलते और बन्द होते हैं। मैं यह नहीं कह सकता कि द्वार पर ताला लगा है और मकड़ी के जाले लगे हैं। हम स्वयं प्रार्थना की उपेक्षा नहीं करते; परन्तु वे दीवारें, दीवार में से निकलती वे कड़ियाँ—वे क्या-क्या कथा सुना सकती हैं! “आह!” दीवार पुकार उठ सकती है, “मैंने तुम्हें तब सुना है जब तुम इतनी बड़ी जल्दी में थे कि अपने परमेश्वर के साथ मुश्किल से दो मिनट बिता सकते थे; और मैंने तुम्हें तब भी सुना है जब तुम न सोए थे न जागे थे, और जब तुम्हें पता ही नहीं था कि तुम क्या कह रहे हो।”
फिर एक कड़ी पुकार उठ सकती है, “मैंने तुम्हें आते और दस मिनट बिताते सुना है, और कुछ न माँगते—कम से कम तुम्हारे हृदय ने तो कुछ नहीं माँगा। होंठ हिलते रहे, परन्तु हृदय मौन था।” और दूसरी कड़ी कैसे पुकार उठ सकती है— “आह! मैंने तुम्हें अपना प्राण कराह-कराहकर उण्डेलते सुना है, परन्तु मैंने तुम्हें अविश्वास के साथ जाते देखा है—यह विश्वास किए बिना कि तुम्हारी प्रार्थना सुनी गई, प्रतिज्ञा को दोहराते हुए परन्तु यह सोचे बिना कि परमेश्वर उसे पूरा करेगा।”
निश्चय ही कोठरी की चारों दीवारें अपने क्रोध में एक साथ आकर हम पर गिर पड़ सकती हैं, क्योंकि हमने इतनी बार अपने अविश्वास से, और अपनी जल्दबाज़ी से, और हर प्रकार के पापों से परमेश्वर का अपमान किया है। हमने उसके प्रायश्चित के ढकने के पास भी—उसी स्थान पर जहाँ उसकी दीनतापूर्ण कृपा सबसे पूर्ण रूप से प्रगट होती है—उसका अपमान किया है। क्या आपके साथ ऐसा ही नहीं है? क्या हम में से हर एक को अपनी-अपनी बारी में इसे मान नहीं लेना चाहिए? तो हे मसीही भाइयो, ध्यान रखिए कि सुधार किया जाए; और परमेश्वर आपको आपकी प्रार्थनाओं में पहले से अधिक सामर्थी और अधिक सफल बनाए।
III. परन्तु आपको रोके न रखूँ, अन्तिम बात यह है: ऊपर की ओर देखिए, ऊपर देखिए
हे मसीही भाइयो और बहनो, ऊपर देखिए, और आइए हम रोएँ। हे परमेश्वर, तूने हमें एक सामर्थी हथियार दिया है, और हमने उसे जंग खाने दिया है। तूने हमें वह दिया है जो तेरे समान सामर्थी है, और हमने उस सामर्थ को सोया पड़ा रहने दिया है। क्या यह एक घृणित अपराध न होगा यदि किसी मनुष्य को आँख दी गई हो जिसे वह खोलता न हो, या हाथ जिसे वह उठाता न हो, या पाँव जो इसलिये अकड़ गया हो कि वह उसका उपयोग नहीं करता? और हम अपने विषय में क्या कहें, जब परमेश्वर ने हमें प्रार्थना में सामर्थ दी है—अनुपम सामर्थ, जो हमारे लिये धन्यता से भरपूर है और दूसरों के लिये अनगिनत दयाओं से भरपूर है—और तौभी वह सामर्थ निश्चल पड़ी है।
आह, यदि विश्व भी हमारी तरह निश्चल होता, तो हम कहाँ होते? हे परमेश्वर, तू सूर्य को प्रकाश देता है, और वह उससे चमकता है। तू तारों को भी प्रकाश देता है और वे टिमटिमाते हैं। पवनों को तू बल देता है और वे बहती हैं। और वायु को तू जीवन देता है और वह चलती है, और मनुष्य उसमें साँस लेते हैं। परन्तु अपने लोगों को तूने एक ऐसा वरदान दिया है जो बल, और जीवन, और प्रकाश से भी उत्तम है, और तौभी वे उसे निश्चल पड़ा रहने देते हैं। वे लगभग भूल जाते हैं कि यह सामर्थ उनके हाथ में है, वे उसका बहुत कम प्रयोग करते हैं, यद्यपि वह अनगिनत लाखों के लिये आशीष का कारण होती। हे मसीही मनुष्य, रो।
रोम के सम्राट कॉन्स्टेन्टाइन ने देखा कि दूसरे सम्राटों के सिक्कों पर उनकी छवियाँ सीधी खड़ी मुद्रा में थीं—विजय मनाती हुई। इसके बदले उसने आज्ञा दी कि उसकी छवि घुटने टेके हुए ढाली जाए, क्योंकि उसने कहा— “मैंने इसी प्रकार विजय पाई है।” जब तक हमारी छवि घुटने टेके हुए न ढाली जाए, हम कभी विजय नहीं पाएँगे। हमारे पराजित होने का, और हमारे झण्डों के धूल में घसिटने का कारण यही है कि हमने प्रार्थना नहीं की।
जाइए—दुःख के साथ अपने परमेश्वर के पास लौट जाइए; हे एप्रैम की सन्तानो, उसके सामने मान लीजिए कि आप शस्त्रधारी और धनुर्धारी होने पर भी युद्ध के दिन पीठ दिखा गए। अपने परमेश्वर के पास जाइए और उससे कहिए कि यदि प्राणों का उद्धार नहीं होता, तो इसलिये नहीं कि उसमें उद्धार करने की सामर्थ नहीं, वरन् इसलिये कि आपने नाश होते हुए पापियों के लिये मानो प्रसव की पीड़ा कभी नहीं सही। आपके अन्तर ने कीर्हेरेस के लिये वीणा का सा क्रन्दन नहीं किया, न ही रूबेन के गोत्र की रक्षा-पंक्तियों के कारण आपकी आत्मा व्याकुल हुई।
जागिए, जागिए, हे इस्राएल के लोगो; विस्मित हो जाइए, हे निश्चिन्त लोगो, आप जिन्होंने प्रार्थना की उपेक्षा की है, हे पापियो जो स्वयं सिय्योन के हैं, और जो सुख-चैन से पड़े रहे हैं। अपने आप को जगाइए, अपने परमेश्वर से मल्लयुद्ध कीजिए और संघर्ष कीजिए, और तब आशीष आएगी—उसकी दया की पहली और पिछली वर्षा—और पृथ्वी बहुतायत से उपज देगी, और सारी जातियाँ उसको धन्य कहेंगी। तो ऊपर देखिए, और रोइए।
एक बार फिर ऊपर देखिए और आनन्द कीजिए। यद्यपि आपने उसके विरुद्ध पाप किया है, तौभी वह अब भी आपसे प्रेम करता है। आपने उससे प्रार्थना नहीं की, न उसके दर्शन के खोजी हुए; परन्तु देखिए, वह अब भी आपको पुकारता है—“मेरे दर्शन के खोजी हो,” और वह यह नहीं कहता, “मुझे व्यर्थ में ढूँढ़ो।” हो सकता है आप सोते के पास न गए हों, परन्तु वह पहले के समान ही सेंतमेंत बहता है। आपने उस सूर्य की ओर से अपनी आँख बन्द कर ली है, परन्तु वह अब भी अपनी सारी चमक के साथ आप पर चमकता है। आप परमेश्वर के निकट नहीं आए, परन्तु वह अब भी अनुग्रह करने की बाट जोहता है, और आपकी सारी बिनतियाँ सुनने को तैयार है। देखिए, वह आपसे कहता है, “आनेवाली बातों के विषय मुझ से पूछो, और मेरे बेटे-बेटियों के विषय मुझे आज्ञा दो।” यह कैसी धन्य बात है कि स्वर्ग में स्वामी सदा सुनने को तैयार है!
ऑगस्टीन का उस मनुष्य के दृष्टान्त पर एक बहुत सुन्दर विचार है, जिसने आधी रात को अपने मित्र का द्वार खटखटाकर कहा, “हे मित्र, मुझे तीन रोटियाँ दे।” उसकी व्याख्या कुछ इस प्रकार है—मैं दया के द्वार पर खटखटाता हूँ, और घोर आधी रात है। “क्या घर के सेवकों में से कोई आकर मुझे उत्तर न देगा?” नहीं, मैं खटखटाता हूँ, परन्तु वे सो रहे हैं। हे परमेश्वर के प्रेरितो—हे महिमा पाए हुए शहीदो, तुम सो रहे हो, तुम अपने बिछौनों पर विश्राम कर रहे हो, तुम मेरी प्रार्थना नहीं सुन सकते। परन्तु क्या सन्तान उत्तर न देगी? क्या ऐसी सन्तान नहीं जो आकर अपने भाई के लिये द्वार खोलने को तैयार हो? नहीं, वे सो रहे हैं। मेरे भाइयो जो चले गए—जिनके साथ मैं मीठी-मीठी सम्मति करता था, और जो मेरे हृदय के साथी थे—तुम मुझे उत्तर नहीं दे सकते, क्योंकि तुम यीशु में विश्राम करते हो; तुम्हारे कार्य तुम्हारे साथ हो लेते हैं, परन्तु तुम मेरे लिये काम नहीं कर सकते। परन्तु जब सेवक सो रहे हैं, और जब सन्तान उत्तर नहीं दे सकती, तब स्वामी जाग रहा है—आधी रात को भी जाग रहा है। मेरे प्राण के लिये आधी रात हो सकती है, परन्तु वह मेरी सुनता है; और जब मैं कह रहा होता हूँ, “मुझे तीन रोटियाँ दे,” तो वह द्वार पर आता है और मुझे जितनी आवश्यकता है उतना दे देता है।
हे मसीही, तो ऊपर देखिए और आनन्द कीजिए। यदि आपका मुँह खुला है, तो सदा एक खुला कान है। यदि आपका हृदय तैयार है, तो सदा एक तैयार हाथ है। आपको बस पुकारना है और प्रभु सुनता है; वरन् आपके पुकारने से पहले ही वह उत्तर देगा, और आपके बोलते ही वह सुन लेगा। आह! तो प्रार्थना में पीछे न रहिए। जब आप घर पहुँचें तो उसके पास जाइए; वरन् मार्ग में ही चुपचाप अपना हृदय उठाइए; और आपका निवेदन या आपकी बिनती चाहे जो भी हो, उसे यीशु के नाम में माँगिए, और वह आपके लिये पूरी की जाएगी।
फिर, प्रिय मसीही भाइयो, ऊपर देखिए और इस समय से अपनी प्रार्थनाओं को सुधारिए। अब प्रार्थना को कोई कल्पना-लोक की कहानी या कठिन कर्तव्य न समझिए; उसे एक वास्तविक सामर्थ, एक वास्तविक आनन्द के रूप में देखिए। जब दार्शनिक किसी छिपी हुई शक्ति का पता लगाते हैं, तो उन्हें उसे काम में लाने में आनन्द आता प्रतीत होता है। मेरा विश्वास है कि बहुत से महान इंजीनियर हुए हैं जिन्होंने मनुष्यों के कुछ सबसे अद्भुत कामों की रूपरेखा बनाई और उन्हें खड़ा किया—इसलिये नहीं कि वे लाभदायक होते, वरन् केवल अद्भुत काम कर दिखाने की अपनी सामर्थ को प्रदर्शित करने के प्रेम के कारण। संसार को यह दिखाने के लिये कि कौशल क्या कर सकता है और मनुष्य क्या सिद्ध कर सकता है, उन्होंने कम्पनियों को ऐसे सौदों में उतरने को ललचाया है जो, जहाँ तक मैं देख सकता था, प्रत्यक्ष रूप से कभी लाभ नहीं दे सकते थे—केवल इसलिये कि उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिले।
हे मसीही लोगो, क्या एक महान इंजीनियर बड़े-बड़े कामों का प्रयत्न करे और अपनी सामर्थ दिखाए, और क्या आप, जिनके पास ऐसी सामर्थ है जो किसी भी मनुष्य ने अपने परमेश्वर से अलग होकर कभी काम में नहीं लाई उससे भी बढ़कर है—क्या आप उसे निश्चल पड़ा रहने देंगे? नहीं, किसी बड़े लक्ष्य के विषय में सोचिए, उसके लिये अपनी बिनती की नस-नस तान दीजिए। अपने हृदय की हर नस को लालसा के गाढ़े लहू से लबालब भर जाने दीजिए, और उसके लिये परमेश्वर से संघर्ष कीजिए, और मल्लयुद्ध कीजिए, और खींचतान कीजिए, और जूझिए—प्रतिज्ञाओं का प्रयोग करते हुए और उसके गुणों को लेकर बिनती करते हुए—और देखिए कि क्या परमेश्वर आपके मन की अभिलाषा आपको नहीं देता।
आज मैं आपको चुनौती देता हूँ कि प्रार्थना में मेरे स्वामी की उदारता से बढ़ जाइए। मैं आपके सामने ललकार फेंकता हूँ। उसे जितना वह है उससे अधिक मानकर विश्वास कीजिए; अपना मुँह इतना पसारिए कि वह उसे भर न सके; प्रतिज्ञा जितना अधिकार देती है उससे अधिक विश्वास के लिये अभी उसके पास जाइए; साहस कीजिए, जोखिम उठाइए, यदि सम्भव हो तो सनातन परमेश्वर से बढ़ जाइए—प्रयत्न तो कीजिए। या, जैसा मैं इसे कहना अधिक पसन्द करूँगा: अपने निवेदन और अपनी आवश्यकताएँ लेकर जाइए और देखिए कि क्या वह आपका आदर नहीं करता। परखकर देखिए कि यदि आप उस पर विश्वास करें, तो क्या वह प्रतिज्ञा पूरी नहीं करता, और अपने आत्मा के अभिषेक के तेल से आपको भरपूर आशीष नहीं देता, जिसके द्वारा आप प्रार्थना में बलवन्त होंगे।
आपके जाते समय मैं ये थोड़े-से शब्द जोड़े बिना नहीं रह सकता। मैं जानता हूँ कि आप में से कुछ ऐसे हैं जिन्होंने अपने जीवन में कभी प्रार्थना नहीं की। शायद आपने बहुत वर्षों तक प्रार्थना का एक रूप तो बोला है, परन्तु एक बार भी प्रार्थना नहीं की। आह! बेचारे प्राणी, आपको नये सिरे से जन्म लेना अवश्य है; और जब तक आप नये सिरे से जन्म न लें, आप वैसी प्रार्थना नहीं कर सकते जैसी प्रार्थना करने का निर्देश मैं मसीही को देता रहा हूँ। परन्तु मैं आपसे इतना कहूँ। क्या आपका हृदय उद्धार के लिये तरसता है? क्या आत्मा ने आपके कान में धीरे से कहा है, “हे पापी, यीशु के पास आ, वह तेरी सुनेगा?”
उस धीमे स्वर पर विश्वास कीजिए, क्योंकि वह आपकी सुनेगा। जागे हुए पापी की प्रार्थना परमेश्वर को ग्रहणयोग्य है। वह टूटे मनवालों की सुनता है और उन्हें चंगा भी करता है। अपने कराहने और अपनी आहें परमेश्वर के पास ले जाइए, और वह आपको उत्तर देगा। “आह,” परन्तु कोई कहता है, “मेरे पास बिनती करने का कोई आधार नहीं।” अच्छा, तो दाऊद के समान बिनती कीजिए, “मेरे अधर्म को जो बहुत है क्षमा कर।” आपके पास वह आधार है—आपका अधर्म बहुत बड़ा है। फिर उस बहुमूल्य लहू को लेकर बिनती कीजिए—वह सब पर प्रबल होनेवाला आधार—कहिए, “उस प्रिय के निमित्त जिसने अपना लहू बहाया,” और हे पापी, आप प्रबल होंगे।
परन्तु अपना पाप हाथ में लिये परमेश्वर के पास जाकर दया न माँगिए। आप उस विद्रोही के विषय में क्या सोचेंगे जो अपने राजा के सामने उपस्थित हो और अपनी कमरबन्द में कटार खोंसे हुए, और अपनी छाती पर अपने विद्रोह की घोषणा लगाए हुए क्षमा माँगे? क्या वह क्षमा पाने के योग्य होगा? वह किसी भी दशा में उसके योग्य नहीं हो सकता था; और निश्चय ही, दया खोजने का दिखावा करते हुए इस प्रकार अपने स्वामी का ठट्ठा करने के कारण वह दुगने दण्ड के योग्य होगा।
यदि किसी पत्नी ने अपने पति को छोड़ दिया हो, तो क्या आप सोचते हैं कि उसमें ऐसी ढिठाई होगी कि वह बेशर्म माथे के साथ अपने जार की बाँह का सहारा लिये लौट आए और अपने पति से क्षमा माँगे? नहीं, उसमें ऐसी ढिठाई नहीं हो सकती; और तौभी आपके साथ ऐसा ही है—शायद दया माँगते हुए और पाप में चलते हुए—परमेश्वर से मेल कराए जाने के लिये प्रार्थना करते हुए, और तौभी अपनी वासना को मन में पालते और उसमें लिप्त रहते हुए। जागिए! जागिए! और अपने परमेश्वर को पुकारिए, हे सोनेवाले। नाव चट्टान के निकट पहुँच रही है; शायद कल वह टकराकर चूर-चूर हो जाए, और आप अनन्त विपत्ति की अथाह गहराइयों में डाल दिए जाएँ।
मैं कहता हूँ, अपने परमेश्वर को पुकारिए; और जब आप उसे पुकारें, तो अपना पाप दूर फेंक दीजिए, नहीं तो वह आपकी नहीं सुन सकता। यदि आप अपने अपवित्र हाथ ऐसे उठाएँ कि आपके दाहिने हाथ में झूठ हो, तो आपके होठों पर प्रार्थना निकम्मी है। आह, उसके पास आइए, उससे कहिए, “सब अधर्म दूर कर, अनुग्रह से हम को ग्रहण कर, सेंतमेंत हम से प्रेम कर,” और वह आपकी सुनेगा; और आप अभी भी प्रबल होनेवाले राजकुमारों के समान प्रार्थना करेंगे, और एक दिन उसके तारों-जड़े सिंहासन के सामने जयवन्त से भी बढ़कर खड़े होंगे, जो सदा राज्य करता है—सब के ऊपर परमेश्वर, युगानुयुग धन्य।
