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और जब अय्यूब ने अपने मित्रों के लिये प्रार्थना की, तब यहोवा ने अय्यूब की बंधुआई को लौटा दिया।
अय्यूब 42:10 KJV
मूल उपदेश: मध्यस्थता की प्रार्थना, सं. 404, मेट्रोपॉलिटन टैबरनेकल पुल्पिट, खण्ड 7। मेट्रोपॉलिटन टैबरनेकल, न्यूइंगटन में दिया गया। नीचे का पाठ स्पर्जन के सार्वजनिक (पब्लिक-डोमेन) पुल्पिट उपदेश का पाठ है, 1993 का संक्षिप्त संकलन नहीं।
“और जब अय्यूब ने अपने मित्रों के लिये प्रार्थना की, तब यहोवा ने अय्यूब की बंधुआई को लौटा दिया।” अय्यूब 42:10 “यहोवा ने अय्यूब की बंधुआई को लौटा दिया।” तो फिर, हमारे सबसे लम्बे दुःखों का भी अन्त होता है, और हमारी विपत्ति की सबसे अथाह गहराइयों का भी एक तल है। हमारे जाड़े सदा भौंहें नहीं ताने रहेंगे, ग्रीष्म शीघ्र ही मुस्कुराएगी। ज्वार सदा के लिये उतरता ही नहीं रहेगा, बाढ़ें फिर लौट आएँगी। रात अपना अन्धकार हमारे प्राणों पर सदा नहीं फैलाए रहेगी—सूर्य फिर भी अपनी किरणों में चंगाई लिए हुए उदय होगा—“यहोवा ने अय्यूब की बंधुआई को लौटा दिया।” जब परमेश्वर हमारे दुःखों में अपना उद्देश्य पूरा कर लेगा, तब हमारे दुःखों का अन्त हो जाएगा।
अय्यूब के विषय में वे उद्देश्य ये थे: कि शैतान पराजित हो, अपने ही हथियारों से मात खाए, और ठीक उस समय उसकी आशाएँ धूल में मिल जाएँ जब सब कुछ उसकी मनमानी के अनुसार चल रहा था। शैतान की चुनौती पर परमेश्वर ने अपना हाथ बढ़ाकर अय्यूब की हड्डियाँ और उसका मांस छू दिया था, फिर भी परीक्षा करनेवाला उस पर प्रबल न हो सका, वरन् उसे उन विजयी शब्दों में मुँह की खानी पड़ी, “चाहे वह मुझे घात करे, तौभी मैं उस पर भरोसा रखूँगा।”
जब शैतान पराजित हो जाता है, तब युद्ध थम जाता है। प्रभु का लक्ष्य अय्यूब के विश्वास को परखना भी था। इस खजूर के पेड़ पर बहुत से बोझ लटकाए गए, फिर भी वह सीधा ही बढ़ता रहा। आग पर्याप्त प्रचण्ड रही थी, पर सोना ज़रा भी घटा नहीं, केवल मैल ही भस्म हुआ। प्रभु का एक और उद्देश्य उसकी अपनी महिमा थी। और परमेश्वर की भरपूर महिमा हुई। अय्यूब ने अपने घूरे पर बैठे हुए परमेश्वर की महिमा की थी, अब वह फाटक में अपने राजसी आसन पर बैठकर फिर से अपने प्रभु की बड़ाई करे। परमेश्वर ने उस अनुग्रह के द्वारा अपने लिये अनन्त कीर्ति प्राप्त की, जिसके द्वारा उसने अपने दीन, दुःखी दास को उन सबसे भारी विपत्तियों में सम्भाले रखा जो कभी किसी मनुष्य के भाग में पड़ी थीं।
परमेश्वर का एक और उद्देश्य था, और वह भी पूरा हुआ। अय्यूब अपनी विपत्तियों के द्वारा पवित्र किया गया था। उसकी आत्मा कोमल हो गई थी। दूसरों के प्रति वह थोड़ी सी कड़वाहट, जो कदाचित् अय्यूब के स्वभाव में रही हो, अन्ततः दूर कर दी गई थी, और अपने आप को धर्मी ठहराने की जो भावना कभी भीतर छिपी रहती थी, वह पूरी तरह निकाल दी गई थी। अब जब परमेश्वर की अनुग्रहपूर्ण योजनाएँ पूरी हो गईं, तो वह अपने दास की पीठ पर से छड़ी हटा लेता है, और पिघली हुई चाँदी को दहकते अंगारों के बीच में से निकाल लेता है।
परमेश्वर मनुष्यों को अपने मन से न तो दबाता है और न व्यर्थ दुःख देता है, और वह इसे इस बात से प्रगट करता है कि वह उन्हें कभी उससे अधिक समय तक दुःख नहीं देता जितना आवश्यक है, और उन्हें भट्ठी में एक क्षण भी उससे अधिक नहीं रहने देता जितना उसकी बुद्धि और उसके प्रेम के उद्देश्यों को पूरा करने के लिये नितान्त आवश्यक है। “यहोवा ने अय्यूब की बंधुआई को लौटा दिया।” मसीह में प्रिय भाई, आप लम्बे समय से विपत्ति की बंधुआई में रहे हैं। परमेश्वर ने आपको आपके विरोधियों के हाथ बेच दिया है, और आप बाबुल की नदियों के किनारे बैठकर रोए हैं, और अपनी वीणा को मजनूँ वृक्षों पर टाँग दिया है।
निराश न होइए! जिसने अय्यूब की बंधुआई को लौटा दिया, वह आपको भी दक्खिन देश के नालों की नाईं लौटा सकता है। वह आपकी दाख की बारी को फिर से फूलने देगा और आपके खेत से फिर उसकी उपज दिलाएगा। आप फिर से आनन्द करनेवालों के साथ निकलेंगे, और एक बार फिर आपके होठों पर हर्ष का गीत होगा। निराशा को अपनी क्रूर बेड़ियाँ आपके प्राण के चारों ओर कसने न दीजिए। अब भी आशा रखिए, क्योंकि आशा है। अब भी भरोसा रखिए, क्योंकि भरोसे का आधार है। वह आपको आपकी बंधुआई के देश से फिर आनन्द करते हुए ले आएगा, और आप उसके विषय में कहेंगे, “उसने मेरे विलाप को नृत्य में बदल डाला।”
अय्यूब की पुनर्स्थापना के साथ जो परिस्थिति जुड़ी थी, उसी की ओर मैं आपका विशेष ध्यान दिलाना चाहता हूँ। “जब अय्यूब ने अपने मित्रों के लिये प्रार्थना की, तब यहोवा ने अय्यूब की बंधुआई को लौटा दिया।” मध्यस्थता की प्रार्थना उसकी लौटती हुई महानता का शुभ-संकेत थी। वह बादल में का धनुष था, जैतून की डाली लिए हुए कबूतरी थी, आनेवाली ग्रीष्म ऋतु की घोषणा करती पण्डुकी का शब्द था।
जब उसका प्राण अपने भटके हुए भाइयों के लिये पवित्र और प्रेमपूर्ण प्रार्थना में फैलने लगा, तब परमेश्वर का हृदय उस पर प्रगट हुआ—बाहर से उसकी समृद्धि लौटाकर और भीतर से उसके प्राण को ढाढ़स देकर। भाइयो, जब मैं ऐसे पाठ से आपको दूसरों के लिये प्रार्थना के विषय पर सम्बोधित करता हूँ, तो यह कोई खींच-तानकर लम्बा चक्कर लगाना नहीं है। आइए, हम आज अय्यूब के उदाहरण का अनुकरण करना सीखें, और अपने मित्रों के लिये प्रार्थना करें, और यदि हम संकट में रहे हैं, तो कदाचित् हमारी बंधुआई भी लौटा दी जाए।
आज प्रातः मैं चार बातों पर बोलना चाहता हूँ, और फिर भी वे एक ही बात हैं। मैं मध्यस्थता की प्रार्थना पर इस प्रकार बोलूँगा—पहला, इस अभ्यास की सराहना के रूप में। दूसरा, आपको इसमें सम्मिलित होने के लिये प्रोत्साहित करने के रूप में। तीसरा, सुझाव के रूप में, कि किन व्यक्तियों के लिये आपको विशेष रूप से प्रार्थना करनी चाहिए। और चौथा, सब विश्वासियों को यह उपदेश देने के रूप में कि वे दूसरों के लिये मध्यस्थता का अभ्यास आरम्भ करें और उसमें लगे रहें।
I. पहले, तो, इस अभ्यास की सराहना के रूप में, मैं आपको स्मरण दिलाऊँ कि मध्यस्थता की
प्रार्थना परमेश्वर के सब श्रेष्ठ पवित्र लोगों ने की है। हो सकता है कि हर पवित्र जन के नाम के साथ इसके उदाहरण जुड़े हुए न मिलें, परन्तु निःसन्देह ऐसा कोई मनुष्य कभी नहीं हुआ जो व्यक्तिगत भक्ति में विख्यात रहा हो और साथ ही दूसरों की भलाई की अपनी व्याकुल लालसाओं में और उस उद्देश्य के लिये अपनी प्रार्थनाओं में सदा अग्रणी न रहा हो। विश्वासियों के पिता अब्राहम को ही लीजिए। उसने अपने पुत्र इश्माएल के लिये कितनी उत्सुकता से बिनती की! “इश्माएल तेरी दृष्टि में बना रहे!” मम्रे के बांजों के पास वह किस हठ के साथ प्रभु के पास आया, जब उसने सदोम के लिये उससे बार-बार मल्लयुद्ध किया। उसने कितनी बार संख्या घटाई, मानो, पुराने प्यूरिटन के शब्दों में, “वह बाज़ार में बोली लगा रहा हो और दाम घटवा रहा हो।” “कदाचित् उसमें पचास धर्मी हों; कदाचित् उन पचास में पाँच घट जाएँ; कदाचित् वहाँ बीस मिलें; कदाचित् वहाँ दस धर्मी मिलें; क्या तू दस के कारण उस नगर को न छोड़ेगा?” उसने भली-भाँति मल्लयुद्ध किया, और यद्यपि कभी-कभी हमारे मन में यह इच्छा उठ सकती है कि वह जहाँ रुका वहाँ न रुकता, तौभी हमें उसकी सराहना करनी चाहिए कि वह उस विनाश के लिये ठहराए गए और भ्रष्ट नगर के लिये इतनी देर तक बिनती करता रहा।
मूसा को स्मरण कीजिए, जो मनुष्यों में सबसे राजसी था, चाहे उसके सिर पर मुकुट रहा हो या न रहा हो। उसने कितनी बार मध्यस्थता की! आपको कितनी बार ऐसा वर्णन मिलता है—“मूसा और हारून परमेश्वर के सामने मुँह के बल गिरे!” पहाड़ की चोटी पर की उसकी वह पुकार स्मरण कीजिए, जब मध्यस्थता करना उसकी अपनी व्यक्तिगत हानि का कारण था, और फिर भी जब परमेश्वर ने कहा था, “अब मुझे मत रोक, मैं तुझ से एक बड़ी जाति उपजाऊँगा,” तौभी वह कैसे डटा रहा, कैसे वह न्याय की कुल्हाड़ी के मार्ग में आ खड़ा हुआ और पुकार उठा, “हे यहोवा, इन्हें छोड़ दे, और यदि नहीं,” (और यहाँ वह तड़पती हुई उत्कटता के ठीक शिखर पर पहुँच गया) “तो जीवन की पुस्तक में से मेरा नाम काट दे।” मूसा से अधिक सामर्थी भविष्यद्वक्ता कभी नहीं हुआ, और न कोई उससे अधिक तीव्र उत्कटता से मध्यस्थता करनेवाला। या, यदि आप चाहें, तो शमूएल के दिनों की ओर बढ़िए। उसके शब्द स्मरण कीजिए, “फिर यह मुझ से दूर हो कि मैं तुम्हारे लिये प्रार्थना करना छोड़कर यहोवा के विरुद्ध पापी ठहरूँ।” या सुलैमान का, और मन्दिर के उद्घाटन के समय उसकी उत्कट मध्यस्थता का विचार कीजिए, जब उसने हाथ फैलाकर इकट्ठे हुए लोगों के लिये प्रार्थना की। या यदि आप एक और राजसी उदाहरण चाहते हैं, तो हिजकिय्याह की ओर मुड़िए, जिसने सन्हेरीब की चिट्ठी प्रभु के सामने फैला दी, जब उसने उस संकट के समय केवल अपने लिये नहीं, वरन् परमेश्वर की प्रजा इस्राएल के लिये भी प्रार्थना की।
एलिय्याह का भी विचार कीजिए, जिसने इस्राएल के निमित्त मेंह बरसवाना चाहा ताकि देश नाश न हो। जहाँ तक उसकी अपनी बात थी, आश्चर्यकर्मों के द्वारा उसे रोटी और पानी मिलता था; उसने दूसरों के लिये ही प्रार्थना की, और अपने सेवक से कहा, “फिर सात बार जा।” यिर्मयाह को मत भूलिए, जिसके आँसू ही प्रार्थनाएँ थे—ऐसी प्रार्थनाएँ जो उसके हृदय से इतनी तीव्रता से निकलती थीं कि होठों के किसी भी शब्द में व्यक्त न हो पाती थीं। वह रोते-रोते घुल गया; उसका जीवन एक लम्बी झड़ी था, उसकी हर बूँद एक प्रार्थना, और सारा जल-प्रलय मध्यस्थता की एक बाढ़।
और यदि आप मसीह और उसके प्रेरितों के समय से कोई उदाहरण चाहते हैं, तो स्मरण कीजिए कि पतरस किस प्रकार घर की छत पर प्रार्थना करता है, और स्तिफनुस गिरते हुए पत्थरों के बीच। या यदि आप चाहें, तो पौलुस का विचार कीजिए, जिसके विषय में दूसरों से भी अधिक यह कहा जा सकता था कि वह अपनी प्रार्थनाओं में पवित्र लोगों को स्मरण करना कभी नहीं छोड़ता था—“अपनी प्रार्थनाओं में प्रतिदिन तुम्हारी चर्चा करता हूँ,”—और पत्री के ठीक बीच में रुककर कहता है, “इसी कारण मैं हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्वर और पिता के सामने घुटने टेकता हूँ।” जहाँ तक हमारे अपने समय के पवित्र गवाहों के बादल की बात है, मैं यह दावा करने का साहस करता हूँ कि परमेश्वर की एक भी ऐसी सन्तान नहीं है जो अपने बच्चों के लिये, अपने परिवार के लिये, सारी कलीसिया के लिये, और इस दीन, भक्तिहीन, नाश होते हुए संसार के लिये परमेश्वर से बिनती न करती हो। यदि कोई दूसरों के लिये प्रार्थना नहीं करता, तो मैं उसके पवित्र जन होने को ही अस्वीकार करता हूँ।
परन्तु इससे आगे, यद्यपि हम विख्यात पवित्र लोगों के जीवन से अनगिनत उदाहरण देकर इस कर्तव्य की सराहना कर सकते हैं, तौभी मसीह के चेले के लिये इतना कहना पर्याप्त है कि मसीह ने अपने पवित्र सुसमाचार में दूसरों के लिये मध्यस्थता करना आपका कर्तव्य और आपका विशेषाधिकार ठहराया है। जब उसने हमें प्रार्थना करना सिखाया, तो उसने कहा, “हे हमारे पिता,” और उसके बाद आनेवाले वाक्यांश एकवचन में नहीं, वरन् बहुवचन में हैं—“हमारी दिन भर की रोटी आज हमें दे।” “हमारे अपराधों को क्षमा कर,” “और हमें परीक्षा में न ला।”
स्पष्ट है कि उसका अभिप्राय यह दिखाना था कि हम में से कोई भी केवल अपने ही लिये प्रार्थना न करे; कि यद्यपि कभी-कभी हमारी प्रार्थनाएँ इतनी कड़वी हो सकती हैं कि उन्हें उद्धारकर्ता की अपनी प्रार्थना की नाईं व्यक्तिगत ही होना पड़े—“हे पिता, यदि हो सके, तो यह कटोरा मुझ से टल जाए,”—तौभी साधारणतः हमारी प्रार्थनाएँ सार्वजनिक प्रार्थनाएँ होनी चाहिए, चाहे वे एकान्त में ही क्यों न की जाएँ, और गुप्त में भी हमें जीवते परमेश्वर की कलीसिया को नहीं भूलना चाहिए।
पौलुस के मुख से पवित्र आत्मा कितनी बार हमें सेवकों के लिये प्रार्थना करने का उपदेश देता है! पौलुस कहता है, “हे भाइयो, हमारे लिये प्रार्थना करो,” और फिर मनुष्यों के सब वर्गों और सब दशाओं के लोगों के लिये प्रार्थनाएँ और बिनतियाँ करने का उपदेश देने के बाद वह जोड़ता है, “और हमारे लिये भी, कि जैसा हमें बोलना चाहिए, वैसा ही हियाव से बोलें।” और याकूब, जो सदा एक व्यावहारिक प्रेरित है, हमें एक दूसरे के लिये प्रार्थना करने की आज्ञा देता है। उसी पद में, जहाँ वह कहता है, “तुम आपस में एक दूसरे के सामने अपने-अपने पापों को मान लो,” वह कहता है, “और एक दूसरे के लिये प्रार्थना करो,” और यह विशेषाधिकार भी जोड़ता है, “जिससे चंगे हो जाओ,” मानो चंगाई केवल उस रोगी को ही नहीं मिलेगी जिसके लिये हम प्रार्थना करते हैं, वरन् हमें भी जो प्रार्थना करते हैं—जब जीवते परमेश्वर के लोगों के लिये हमारे हृदय बढ़ जाते हैं, तो हम भी कोई विशेष आशीष पाते हैं।
परन्तु भाइयो, मैं उन पदों को उद्धृत करने के लिये नहीं रुकूँगा जिनमें दूसरों के लिये प्रार्थना करने का कर्तव्य स्पष्ट रूप से ठहराया गया है। मुझे आपको आपके स्वामी के उच्च उदाहरण का स्मरण दिलाने दीजिए। वही आपका आदर्श है, आप उसी के पीछे चलिए। क्या कभी एक भी ऐसा हुआ जिसने उसके समान मध्यस्थता की हो? उसकी वह सुनहरी प्रार्थना स्मरण कीजिए, जिसमें उसने अपने लोगों के लिये पुकारा, “हे पिता, उन्हें सम्भाल, उन्हें बुराई से बचाए रख!” अहा, वह कैसी प्रार्थना थी!
ऐसा लगता है कि उसने उनकी सब घटियों, उनकी सब आवश्यकताओं, उनकी सब निर्बलताओं का विचार किया, और मध्यस्थता की एक लम्बी धारा में वह अपने पिता के सिंहासन के सामने अपना हृदय उण्डेल देता है। विचार कीजिए कि किस प्रकार क्रूस पर चढ़ाए जाने की पीड़ाओं में भी वह यह नहीं भूला कि वह अब भी मनुष्य के लिये मध्यस्थ है। “हे पिता, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये नहीं जानते कि क्या कर रहे हैं।” अहा, भाइयो, स्मरण रखिए, आज आपके लिये यह आपके उद्धारकर्ता का उदाहरण है, क्योंकि वहाँ सिंहासन के सामने, हाथ फैलाए हुए, वह अपने लिये प्रार्थना नहीं करता, क्योंकि वह अपनी महिमा को प्राप्त कर चुका है—अपने लिये नहीं, क्योंकि वह अपने परिश्रम से विश्राम करता है, और अपना अनन्त प्रतिफल पा चुका है—वरन् आपके लिये, अपने लहू से मोल लिए हुओं के लिये, उन सब के लिये जो उसके अनुग्रह से बुलाए गए हैं, हाँ, और उनके लिये भी जो हमारे वचन के द्वारा उस पर विश्वास करेंगे— “जो कोई उसके द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं, उन सब के लिये वह उद्धार माँगता है; अपने हृदय के घावों की ओर संकेत करता है, और अपने लहूलुहान हाथ फैला देता है।”
आइए, भाइयो, ऐसे उदाहरण के रहते यदि हम दूसरों के लिये बिनती करना भूल जाएँ तो हम सचमुच दोषी हैं। परन्तु मैं थोड़ा और आगे बढ़ूँगा। यदि बाइबल में मध्यस्थता की बिनती का कोई उदाहरण न होता, यदि मसीह ने यह लिखवाकर न छोड़ा होता कि उसकी इच्छा है कि हम दूसरों के लिये प्रार्थना करें, और यदि हम यह भी न जानते कि मध्यस्थता करना मसीह की रीति थी, तौभी हमारे पवित्र धर्म की आत्मा ही हमें दूसरों के लिये बिनती करने को विवश करती।
क्या आप अपनी कोठरी में जाकर परमेश्वर के सम्मुख और उसकी उपस्थिति में अपने सिवा किसी और का विचार ही नहीं करते? निश्चय ही मसीह का प्रेम आप में नहीं हो सकता, क्योंकि मसीह का आत्मा स्वार्थी नहीं है। जब किसी मनुष्य में एक बार मसीह का प्रेम आ जाता है, तो वह अपने लिये नहीं जीता। मैं जानता हूँ कि कुछ लोग ऐसे हैं जिनकी भक्ति उनके अपने स्वार्थी हितों की सीमाओं के भीतर आराम से खूँटे से बँधी रहती है। उनके लिये इतना ही पर्याप्त है कि वे वचन सुन लें, कि उनका उद्धार हो जाए, कि वे स्वर्ग पहुँच जाएँ। आह, अभागे मन, तू वहाँ नहीं पहुँचेगा! तेरे लिये तो कोई दूसरा स्वर्ग चाहिए, क्योंकि मसीह का स्वर्ग निःस्वार्थ लोगों का स्वर्ग है, उदार हृदयवालों का मन्दिर है, प्रेम करनेवाली आत्माओं का परम आनन्द है, उन लोगों का स्वर्ग है जो मसीह के समान इसलिये कंगाल बनने को तैयार हैं कि दूसरे धनी हो जाएँ।
मैं विश्वास नहीं कर सकता—यदि मैं कभी यह विश्वास कर सकूँ कि जिस मनुष्य की प्रार्थनाएँ स्वार्थी हैं उसके भीतर मसीह का कुछ भी आत्मा है, तो यह मसीह के क्रूस की निन्दा होगी, यह उस शिक्षा पर कलंक होगा जो उसने दी। भाइयो, मैं मध्यस्थता की प्रार्थना की सराहना करता हूँ, क्योंकि वह मनुष्य के प्राण को खोल देती है, उसकी सहानुभूतियों को स्वस्थ रूप से काम करने देती है, उसे यह अनुभव करने को विवश करती है कि वह सब कुछ नहीं है, और कि यह विशाल संसार और यह महान विश्व आख़िरकार इसलिये नहीं बनाया गया कि वह उसका छोटा सा स्वामी बने, कि सब कुछ उसकी इच्छा के आगे झुके, और सब प्राणी उसके पाँवों पर दुबके पड़े रहें।
मैं कहता हूँ, उसके लिये यह भला है कि वह जान ले कि क्रूस केवल उसी के लिये नहीं उठाया गया था, क्योंकि उसकी दूर-दूर तक फैली भुजाओं का अभिप्राय यह था कि वे मानवजाति के लाखों लोगों पर आशीषें बरसाएँ। हे स्वयं के दुबले और भूखे उपासक, यह ऐसा अभ्यास है जो तुझे दूसरा ही मनुष्य बना देगा—ऐसा मनुष्य जो मनुष्य के पुत्र के अधिक समान हो, और नाबाल जैसे कठोर मनुष्य के कम समान। परन्तु फिर, मैं मध्यस्थता के इस धन्य विशेषाधिकार की सराहना इसके मधुर भाईचारे के स्वभाव के कारण करता हूँ।
आप और मैं स्वभाव से कठोर, रूखे और अप्रिय मनवाले हो सकते हैं, परन्तु दूसरों के लिये बहुत प्रार्थना करना हमें स्मरण दिलाएगा कि सचमुच पवित्र लोगों से हमारा एक नाता है, कि उनके हित हमारे हित हैं, कि अनुग्रह के सब विशेषाधिकारों में हम उनके साथ सहभागी हैं। मैं ऐसी किसी और बात को नहीं जानता जो परमेश्वर के अनुग्रह से हमें एक दूसरे के साथ जोड़ने का इससे उत्तम साधन हो सके, जितना एक दूसरे के लिये निरन्तर प्रार्थना। जब आप अपने भाई के लिये प्रार्थना करना सीख लेते हैं, तो उसके बाद आप अपने प्राण में उसके विरुद्ध बैर नहीं पाल सकते। यदि उसने आपकी कोई बुराई की है, तो जब आप उस बुराई को प्रायश्चित के ढकने के पास ले गए और उस पर प्रार्थना की, तो आपको क्षमा करना ही होगा। निश्चय ही आप ऐसे कपटी नहीं हो सकते कि परमेश्वर के सामने उसके सिर पर आशीषें माँगें और फिर बाहर आकर अपने मन में उसे शाप दें।
जब एक भाई दूसरे भाई के विरुद्ध शिकायतें लेकर आता है, तो साधारणतः सबसे अच्छा यही होता है कि कहा जाए, “इस विषय में प्रवेश करने से पहले आइए हम प्रार्थना करें।” जहाँ कहीं पास्टर को किसी मामले का निर्णय करना हो, उसे झगड़नेवाले भाइयों से सदा यही कहना चाहिए, “आइए पहले प्रार्थना करें,” और प्रायः ऐसा होगा कि प्रार्थना के द्वारा मतभेद शीघ्र ही भुला दिए जाएँगे। वे इतने छोटे, इतने तुच्छ हो जाएँगे कि जब भाई अपने घुटनों पर से उठेंगे तो कहेंगे, “वे जाते रहे; परमेश्वर के सिंहासन के सामने एक मन होने के बाद अब हम झगड़ नहीं सकते।”
मैंने एक मनुष्य के विषय में सुना है जिसने अपने पादरी के विरुद्ध शिकायतें की थीं, और उसके पादरी ने बुद्धिमानी से उससे कहा, “अच्छा, मुझसे सड़क पर बात मत कीजिए, मेरे घर आइए, और हम सारी बात सुनें।” वह गया, और पादरी ने कहा, “मेरे भाई, मैं आशा करता हूँ कि जो कुछ आपको मुझसे कहना है वह मेरे लिये बड़ी आशीष का कारण हो। निःसन्देह किसी भी दूसरे मनुष्य की तरह मुझमें भी कमियाँ हैं, और मैं आशा करता हूँ कि मैं कभी अपने आप को इतना ऊँचा न समझूँ कि कोई मुझे उनके विषय में न बता सके; परन्तु इसलिये कि जो कुछ आप मुझसे कहनेवाले हैं वह मेरे लिये आशीष का कारण हो, आइए हम घुटने टेककर साथ-साथ प्रार्थना करें।”
तो हमारे उस झगड़ालू मित्र ने पहले प्रार्थना की और फिर पादरी ने, दोनों ने संक्षेप में। जब वे घुटनों पर से उठे, तो पादरी ने कहा, “अब, मेरे भाई, मैं समझता हूँ कि हम दोनों की मनोदशा अच्छी है। मुझे बताइए, आपको किस बात में दोष निकालना है।” वह मनुष्य लज्जित हो गया, और हकलाने और अटकने लगा, और बोला कि उसे तो कोई बात दिखाई नहीं देती, सिवाय उसके अपने भीतर के दोष के। उसने कहा, “श्रीमान, मैं आपके लिये प्रार्थना करना भूल गया हूँ, और निश्चय ही जब मैं अनुग्रह के सिंहासन पर आपका नाम लेने से चूकता हूँ, तो मैं यह आशा नहीं कर सकता कि परमेश्वर आपके द्वारा मेरे प्राण को भोजन देगा।”
अच्छा तो, भाइयो, यदि आप अपने भाइयों के लिये बिनती करने में अपने आप को बहुत लगाएँगे, तो आप उनके चिड़चिड़ेपन को क्षमा करेंगे, उनकी उतावली को अनदेखा करेंगे, उनके कठोर शब्दों का विचार नहीं करेंगे, वरन् यह जानते हुए कि आपकी भी परीक्षा हो सकती है, और आप भी उनके समान स्वभाव के मनुष्य हैं, आप उनके दोषों को ढाँप देंगे और उनकी दुर्बलताओं को सह लेंगे। क्या मध्यस्थता की प्रार्थना की सराहना में मुझे इससे अधिक कुछ कहने की आवश्यकता है, सिवाय इसके कि मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि जब परमेश्वर किसी मनुष्य को बहुत अनुग्रह देता है, तो इसी अभिप्राय से देता होगा कि वह उसे परिवार के शेष लोगों के लिये काम में लाए। आप में से जो परमेश्वर के साथ निकट संगति रखते हैं, उनकी तुलना मैं राजा के महल के दरबारियों से करूँगा।
दरबारी क्या करते हैं? क्या वे दरबार में अपने प्रभाव का लाभ उठाकर अपने मित्रों की अर्जियाँ लेकर उन्हें वहाँ प्रस्तुत नहीं करते जहाँ वे सुनी जा सकें? इसी को हम संरक्षण या सिफ़ारिश कहते हैं—एक ऐसी बात जिसमें बहुत से लोग दोष निकालते हैं जब इसे राजनीतिक उद्देश्यों के लिये काम में लाया जाता है; परन्तु एक प्रकार की स्वर्गीय सिफ़ारिश भी है जिसे आपको बड़े परिश्रम से काम में लाना चाहिए। मैं आपसे विनती करता हूँ कि आप इसे मेरे पक्ष में काम में लाएँ। जब आपका भला हो, तब मेरा स्मरण कीजिए। मैं आपसे बिनती करता हूँ कि इसे कंगालों, रोगियों, दुःखियों, परीक्षा में पड़े हुओं, परखे जा रहे लोगों, हताश और निराश लोगों के पक्ष में काम में लाइए—जब राजा आपकी बात पर कान लगाए, तो हमारे लिये उससे बात कीजिए।
जब आपको उसके सिंहासन के बहुत निकट आने की अनुमति मिले, और वह आपसे कहे, “माँग, और जो कुछ तू चाहे मैं तुझे दूँगा,” जब आपका विश्वास दृढ़ हो, आपकी दृष्टि निर्मल हो, आपकी पहुँच निकट हो, आपका अधिकार निश्चित हो, और परमेश्वर का प्रेम आपके हृदय में मधुरता से उण्डेला गया हो—तब अपने उन दीन भाइयों की अर्जियाँ ले जाइए जो बाहर फाटक पर खड़े हैं, और कहिए, “हे मेरे प्रभु, मेरा एक दीन भाई है, तेरी एक दीन सन्तान, जिसने मुझसे चाहा है कि मैं तुझसे यह कृपा माँगूँ। इसे मुझे प्रदान कर, यह मुझ पर ही की गई कृपा होगी। इसे उसे प्रदान कर, क्योंकि वह तेरा ही है। यीशु के निमित्त ऐसा कर!”
वरन्, सराहना के इस विषय को समाप्त करने के लिये कहूँ, तो यह सर्वथा असम्भव है कि आपके पास बड़ी मात्रा में अनुग्रह हो और वह आपको दूसरों के लिये अपने प्रभाव को काम में लाने की प्रेरणा न दे। हे प्राणी, यदि तुझमें अनुग्रह है ही, और तू एक सामर्थी मध्यस्थ नहीं है, तो वह अनुग्रह राई के दाने के समान ही होगा—एक सिकुड़ी हुई, कुरूप, नन्ही सी वस्तु। तुझमें इतना ही अनुग्रह है कि तेरा प्राण दलदली रेत से बचकर तैरता रहे, पर तुझमें अनुग्रह की गहरी बाढ़ें नहीं हैं, नहीं तो तू अपनी आनन्दित नाव में दूसरों की आवश्यकताओं का भरपूर माल लादकर परमेश्वर के सिंहासन तक ले जाता, और उनके लिये वे भरपूर आशीषें लौटा लाता जो तेरे बिना कदाचित् उन्हें प्राप्त न होतीं।
यदि आप उस स्वर्गदूत के समान हैं जिसका पाँव स्वर्ग तक पहुँचनेवाली सुनहरी सीढ़ी पर है, यदि आप चढ़ते और उतरते हैं, तो जान लीजिए कि आप दूसरों की प्रार्थनाएँ लेकर चढ़ेंगे और दूसरों की आशीषें लेकर उतरेंगे, क्योंकि किसी पूर्ण विकसित पवित्र जन के लिये यह असम्भव है कि वह केवल अपने लिये जीए या केवल अपने लिये प्रार्थना करे। सराहना के विषय में इतना ही। II. अब हम अपनी दूसरी बात की ओर मुड़ते हैं, और प्रोत्साहन के रूप में कुछ कहने का प्रयत्न करते हैं, ताकि आप आनन्द से मध्यस्थता की बिनतियाँ कर सकें।
पहले, स्मरण रखिए कि मध्यस्थता की प्रार्थना वह सबसे मधुर प्रार्थना है जिसे परमेश्वर कभी सुनता है। इस पर सन्देह न कीजिए, क्योंकि मसीह की प्रार्थना इसी प्रकार की है। जो धूप हमारा महान महायाजक अब धूपदान में डालता है, उसमें एक भी कण ऐसा नहीं जो उसके अपने लिये हो। उसका काम पूरा हो चुका है, उसका प्रतिफल प्राप्त हो चुका है। अब आपको इसमें सन्देह नहीं कि मसीह की प्रार्थना सब बिनतियों में सबसे अधिक ग्रहणयोग्य है।
बहुत अच्छा, मेरे भाइयो, आपकी प्रार्थना जितनी अधिक मसीह की प्रार्थना के समान होगी, उतनी ही अधिक मधुर होगी; और यद्यपि आपके अपने लिये की गई बिनतियाँ भी ग्रहण की जाएँगी, तौभी दूसरों के लिये आपकी बिनतियाँ, जिनमें आत्मा के फल अधिक होते हैं, अधिक प्रेम, कदाचित् अधिक विश्वास, और निश्चय ही अधिक भाईचारे की प्रीति होती है, वे सबसे मधुर भेंट होंगी जो आप परमेश्वर को चढ़ा सकते हैं, आपके बलिदान की ठीक चर्बी। फिर स्मरण रखिए कि मध्यस्थता की प्रार्थना अत्यन्त प्रबल होती है। इसने कैसे-कैसे आश्चर्यकर्म किए हैं!
मध्यस्थता की प्रार्थना ने विपत्तियों को रोका है। इसने उस अन्धकार को दूर किया जो मिस्र पर छाया हुआ था; इसने उन मेंढकों को भगा दिया जो देश भर में उछलते फिरते थे; इसने उन कुटकियों और टिड्डियों को तितर-बितर कर दिया जो सोअन के निवासियों को सताती थीं; इसने मरी को, और गर्जन को, और बिजली को दूर किया; इसने उन सब विनाशों को रोक दिया जो परमेश्वर के पलटा लेनेवाले हाथ ने फ़िरौन और उसकी प्रजा पर किए। मध्यस्थता की प्रार्थना ने रोगों को चंगा किया है—हम जानते हैं कि आरम्भिक कलीसिया में इसने ऐसा किया। पुराने मूसा के समय में भी हमारे पास इसका प्रमाण है। जब मरियम को कोढ़ हो गया, तो मूसा ने प्रार्थना की, और कोढ़ जाता रहा। इसने सूखे हुए अंगों को फिर से ठीक किया है। जब राजा का हाथ सूख गया, तो उसने भविष्यद्वक्ता से कहा, “मेरे लिये प्रार्थना कर,” और उसका हाथ फिर जैसा पहले था वैसा ही हो गया।
मध्यस्थता की प्रार्थना ने मुर्दे को जिलाया है, क्योंकि एलिय्याह सात बार बालक पर पसर गया, और बालक ने छींका, और बालक का प्राण लौट आया। मध्यस्थता की प्रार्थना ने साधन बनकर कितने प्राणों का उद्धार कराया है, यह तो, हे लेखा रखनेवाले स्वर्गदूत, तू ही बता सकता है! हे अनन्तकाल, तू ही इसे प्रगट करेगा! ऐसा कुछ भी नहीं जो मध्यस्थता की प्रार्थना न कर सके। अहा! हे विश्वासी, तेरे हाथ में एक सामर्थी यन्त्र है, इसका भली-भाँति उपयोग कर, निरन्तर उपयोग कर, अभी विश्वास के साथ उपयोग कर, और तू निश्चय ही प्रबल होगा।
परन्तु कदाचित् आपको किसी ऐसे व्यक्ति के लिये मध्यस्थता करने के विषय में सन्देह है जो पाप में बहुत दूर गिर गया है। भाइयो, क्या आपने कभी ऐसे मनुष्यों के विषय में सुना है जिन्हें जीवित रहते हुए भी मरा हुआ समझ लिया गया? क्या आपने कभी किसान के अलाव के पास बैठकर किसी ऐसे व्यक्ति की पुराने ढंग की कहानी सुनी है, जिसे नहलाकर लिटा दिया गया, और ताबूत में रखने के लिये कफ़न में लपेट दिया गया, और फिर भी वह केवल मूर्च्छा में था, मरा नहीं था? और क्या आपने उन पुरुषों और स्त्रियों की पुरानी किंवदन्तियाँ नहीं सुनीं जिन्हें जीवित ही गाड़ दिया गया?
मैं उन कहानियों की सच्चाई की ज़मानत नहीं दे सकता, परन्तु मैं आपको बता सकता हूँ कि आत्मिक रूप से बहुत से ऐसे मनुष्य हुए हैं जिन्हें मरा हुआ समझकर छोड़ दिया गया, जबकि वे अब भी अनुग्रह की पहुँच के भीतर थे। बहुत से ऐसे प्राण हुए हैं जिन्हें मसीही लोगों ने भी कफ़न में लपेट दिया, जिन्हें मसीह के सेवकों ने भी दण्ड के लिये छोड़ दिया, जिन्हें उनके अपने कुटुम्बियों ने भी विनाश के हवाले कर दिया। फिर भी वे विनाश में नहीं पहुँचे, वरन् परमेश्वर ने उन्हें ढूँढ लिया, और उन्हें भयानक गड़हे में से और दलदल की कीच में से निकाला, और उनके जीवित पाँवों को अपनी जीवित चट्टान पर खड़ा किया।
अहा! किसी को भी त्याग न दीजिए—प्रार्थना करते रहिए; जब तक कोई शारीरिक रूप से मरा हुआ न लिटा दिया जाए, तब तक किसी को आत्मिक रूप से मरा हुआ समझकर न लिटाइए। परन्तु कदाचित् आप कहते हैं, “मैं दूसरों के लिये प्रार्थना नहीं कर सकता, क्योंकि मैं बहुत निर्बल, बहुत असमर्थ हूँ।” मेरे भाइयो, प्रयत्न करने से आपको बल मिलेगा। इसके अतिरिक्त, प्रार्थना की प्रबलता प्रार्थना करनेवाले मनुष्य के बल पर निर्भर नहीं करती, वरन् उस तर्क की सामर्थ पर निर्भर करती है जिसे वह प्रस्तुत करता है।
भाइयो, यदि आप बीज बोते हैं, तो आप बहुत निर्बल हो सकते हैं, परन्तु भूमि में बीज डालनेवाला आपका हाथ फ़सल उत्पन्न नहीं करता—बीज में का जीवन ही उसे उत्पन्न करता है। और यही बात विश्वास की प्रार्थना में है। जब आप किसी प्रतिज्ञा को लेकर बिनती कर सकते हैं और उस प्रार्थना को आशा के साथ भूमि में डाल सकते हैं, तो आपकी निर्बलता उसे निष्फल नहीं होने देगी—वह फिर भी परमेश्वर के सामने प्रबल होगी और ऊपर से आशीषें उतार लाएगी।
हे अय्यूब! तू अपने घूरे पर से मध्यस्थता करने आता है, तो मैं भी अपनी निर्बलता की खाट पर से आ सकता हूँ— तू अपनी दरिद्रता और अपने त्यागे जाने की दशा में से दूसरों के लिये मध्यस्थता करने आता है, तो हम भी आ सकते हैं। एलिय्याह भी हमारे समान दुःख-सुख भोगी मनुष्य था—मधुर वचन!—समान स्वभाव का, समान दुर्बलताओं का, पाप की ओर समान झुकावों का, परन्तु वह प्रबल हुआ, और आप भी होंगे। केवल इस बात का ध्यान रखिए कि आप इन अभ्यासों में ढीले न हों, वरन् दूसरों के लिये बहुत प्रार्थना करें, जैसे अय्यूब ने अपने मित्रों के लिये प्रार्थना की।
अब जबकि हवा बहुत गर्म है, और वातावरण भारी और थमा हुआ है, हमारे मित्रों को सुनना कठिन लग रहा है, उससे भी अधिक कठिन जितना प्रचारक को उपदेश देना कठिन लगता है। अब, इसलिये कि एक बार फिर मुझे आपका ध्यान मिल सके—और स्थिति बदलने से आप सब का भला भी होगा—क्या आप खड़े होकर एक मध्यस्थता की प्रार्थना करके इस पाठ को व्यवहार में लाएँगे, और फिर मैं आगे बोलूँगा। वह प्रार्थना यह होगी।
“हे हमारे परमेश्वर, जातियों पर दया कर, पृथ्वी को अपने पास आने के लिये विवश कर; अपने विजयी वचन को दूर-दूर तक भेज, और परदेशियों को घर ले आ!”
[यहाँ मण्डली ने खड़े होकर यह पद गाया।]
III. तीसरा शीर्षक है उन व्यक्तियों के विषय में एक सुझाव जिनके लिये हमें विशेष रूप से प्रार्थना करनी चाहिए
यह केवल एक सुझाव होगा, और फिर मैं अपनी अन्तिम बात की ओर मुड़ूँगा। अय्यूब के विषय में, उसने अपने अपराधी मित्रों के लिये प्रार्थना की। उन्होंने उसके विषय में अत्यन्त कठोरता से बातें की थीं। उन्होंने उसके सारे पिछले जीवन का गलत अर्थ लगाया था, और यद्यपि उसके चरित्र का कोई भी भाग कभी निन्दा के योग्य नहीं रहा था—क्योंकि प्रभु ने स्वयं उसके विषय में गवाही दी थी कि वह खरा और सीधा मनुष्य था—तौभी उन्होंने उस पर कपट का दोष लगाया, और यह समझा कि जो कुछ उसने किया वह सब लाभ के लिये था।
अब, कदाचित् किसी सीधे और पवित्र मनुष्य को इससे बड़ी ठेस नहीं पहुँचाई जा सकती कि उसके मुँह पर ही उसके अभिप्रायों पर सन्देह किया जाए, और उस पर स्वार्थ साधने का दोष लगाया जाए। और फिर भी, सब कुछ झाड़कर, जैसे सूर्य उस अन्धकार को भूल जाता है जिसने उसकी महिमा को छिपा रखा था और अपनी ही किरणों से उसे तितर-बितर कर देता है, अय्यूब प्रायश्चित के ढकने के पास आता है और बिनती करता है। वह स्वयं ग्रहण किया जाता है, और वह विनती करता है कि उसके मित्र भी ग्रहण किए जाएँ। जिन्होंने आपको ठेस पहुँचाई है उन्हें परमेश्वर के सिंहासन के पास ले जाइए; यह आपकी क्षमा की सच्चाई को प्रमाणित करने का एक धन्य उपाय होगा। तौभी, ऐसा धमकी के ढंग से मत कीजिए। मुझे स्मरण है कि मुझे एक कपटी के साथ खराई से व्यवहार करना पड़ा था, जिसने मुझे धमकी के रूप में कहा कि वह मेरे लिये प्रार्थना करेगा। यह एक भयानक धमकी थी, क्योंकि कौन चाहेगा कि उसका नाम ऐसी प्रार्थना से जुड़े जो प्रभु की दृष्टि में घृणित हो। इसे उस अर्थ में मत कीजिए, मानो आप किसी घमण्डी कपटी की नाईं अपनी प्रार्थना को ही अपने अहंकार की आड़ बना लेना चाहते हों।
वरन् इसे तब कीजिए जब आप परमेश्वर के सामने अकेले हों, और गुप्त में। इसलिये नहीं कि उस कहानी को फिर से सुनाकर आप अपने बदले की भावना को तृप्त करें, क्योंकि यह तो सचमुच घृणित होगा, वरन् इसलिये कि प्रभु से अपने भटके हुए भाई को क्षमा करने की विनती करके आप उसके वस्त्रों पर लगे किसी भी पाप के दाग़ को दूर करें। फिर, अपने विवाद करनेवाले मित्रों को वहाँ ले जाना न भूलिए। ये भाई अय्यूब से वाद-विवाद करते रहे थे, और वह विवाद अपनी थकाऊ लम्बाई तक घिसटता चला गया। भाइयो, वाद-विवाद करने से प्रार्थना करना उत्तम है।
कभी-कभी आप सोचते हैं कि किसी सिद्धान्त पर सार्वजनिक वाद-विवाद होना अच्छी बात होगी। उस पर प्रार्थना करना उससे भी अच्छी बात होगी। आप कहते हैं, “अलग-अलग पक्षों के दो भले मनुष्य मिलें और मामले को लड़कर निपटा लें।” मैं कहता हूँ, “नहीं! दो भले मनुष्य मिलें और मामले को प्रार्थना करके निपटा लें।” जो अपने सिद्धान्त को प्रायश्चित के ढकने की कसौटी पर परखे जाने के लिये सौंपना नहीं चाहता, उसके विषय में मुझे सन्देह होगा कि वह गलत है।
मैं कह सकता हूँ कि मुझे यह प्रार्थना करने में कोई भय नहीं कि मेरे जो भाई “विश्वासियों के बपतिस्मे” को नहीं देख पाते, वे उसे देखने लगें। यदि वे सोचते हैं कि यह गलत है, तो मैं चाहता हूँ कि वे परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह हमें ठीक करे, परन्तु मैंने उन्हें ऐसा करते कभी नहीं सुना। मैंने उन्हें प्रभु से यह प्रार्थना करते कभी नहीं सुना कि वह हमें शिशुओं पर जल छिड़कने की सच्चाई का निश्चय कराए—मैं चाहता हूँ कि वे ऐसा करें, यदि वे उसे पवित्रशास्त्र के अनुसार मानते हैं।
और मैं इसे उस पुरानी कसौटी पर रखने के लिये पूरी तरह तैयार हूँ: जो परमेश्वर आग के द्वारा उत्तर दे, वही परमेश्वर ठहरे; और जब प्रार्थना ही अन्तिम निर्णायक होगी, तब जो भी प्रबल हो, वही स्थिर रहे। अपने उन प्रिय मित्रों को, जो आचरण में गलत हैं, वाद-विवाद के कक्ष में या बहस-सभा में नहीं, वरन् परमेश्वर के सामने ले जाइए, और आपकी पुकार यह हो, “अहा! हे तू जो हमें हमारे लाभ के लिये शिक्षा देता है, यदि मैं गलत हूँ तो मुझे सिखा, और मेरे मित्र को सिखा कि वह किस बात में भूल करता है, और उसे ठीक कर।”
यही हमें अपने घमण्डी मित्रों के साथ भी करना चाहिए। एलीपज और बिल्दद बहुत ऊँचे और घमण्डी थे—अहा! वे बेचारे अय्यूब को कैसी तुच्छ दृष्टि से देखते थे! वे सोचते थे कि वह बहुत बड़ा पापी, बहुत घोर कपटी है। वे उसके साथ रहे तो, परन्तु निःसन्देह वे इसे बहुत बड़ी कृपा समझते थे। अब, कभी-कभी आप मसीहियों को दूसरे लोगों के घमण्डी होने की शिकायत करते सुनते हैं। आपके उस पर कुड़कुड़ाने से वे नम्र नहीं हो जाएँगे।
क्या हुआ यदि कोई श्रीमती फलाँ-फलाँ हैं जो बहुत सरसराती हुई पोशाक पहनती हैं, और आपकी ओर कभी ध्यान नहीं देतीं क्योंकि आप भी सरसरा नहीं सकते! क्या हुआ यदि कोई भाई है जो चरमराते जूते पहनने की सामर्थ रखता है, और सड़क पर आपकी ओर ध्यान नहीं देता क्योंकि आप संयोग से गरीब हैं! अपने पिता को इसके विषय में बताइए, यही सबसे अच्छा मार्ग है। अरे, मैं समझता हूँ कि आप किसी मनुष्य पर इसलिये क्रोध नहीं करेंगे कि उसे गठिया है, या उसका जिगर सुस्त है, या उसकी आँख में मोतियाबिन्द है—आप उस पर तरस खाएँगे। तो फिर अपने भाई पर उसके घमण्डी होने के कारण क्यों क्रोध करें? यह एक रोग है, एक बहुत बुरा रोग, घमण्ड का वह लाल ज्वर। जाइए और प्रभु से प्रार्थना कीजिए कि वह उसे चंगा करे; आपका क्रोध ऐसा नहीं कर सकेगा। वह उसे और फुला सकता है और उसे पहले से भी बुरा बना सकता है, परन्तु उसे ठीक नहीं करेगा।
भाई, प्रार्थना करके उसे नीचे उतारिए, प्रार्थना करके उसे नीचे उतारिए। उसके साथ द्वन्द्व-युद्ध कीजिए, और हथियार चुनने का अधिकार अपने पास रखिए, और वह हथियार हर प्रकार की प्रार्थना का हो। और यदि वह घमण्डी है, तो मैं यह जानता हूँ कि यदि आप परमेश्वर के सामने प्रबल होंगे, तो परमेश्वर शीघ्र ही अपनी सन्तान में से घमण्ड निकाल देगा और उसे वैसा नम्र बना देगा जैसा उसे होना चाहिए। परन्तु विशेष रूप से मैं आपसे यह विनती करूँ कि आप सबसे अधिक उनके लिये प्रार्थना करें जो अपने लिये प्रार्थना करने में असमर्थ कर दिए गए हैं।
अय्यूब के तीनों मित्र अपने लिये प्रार्थना नहीं कर सकते थे, क्योंकि प्रभु ने कहा था कि यदि वे करें तो भी वह उन्हें ग्रहण न करेगा। उसने कहा कि वह उनसे क्रोधित है, परन्तु अय्यूब के विषय में उसने कहा, “उसी को मैं ग्रहण करूँगा।” जब मैं यह कहूँ तो आपकी भावनाओं को ठेस न लगे कि कुछ लोग, परमेश्वर के लोगों में से भी, कुछ समयों में ग्रहणयोग्य रीति से प्रार्थना करने के योग्य नहीं होते।
जब किसी मनुष्य ने अभी-अभी पाप किया हो, तो उसका पहला काम पश्चाताप है, प्रार्थना नहीं। दूसरों के लिये मध्यस्थता करने जाने से पहले उसे परमेश्वर और अपने प्राण के बीच की बातें ठीक करनी होंगी। और बहुत से दीन मसीही हैं जो प्रार्थना नहीं कर सकते—सन्देह भीतर आ गया है, पाप ने उनका भरोसा छीन लिया है, और वे अपनी अर्जियाँ लिए हुए फाटक के बाहर खड़े हैं। वे परदे के भीतर प्रवेश करने का साहस नहीं करते। बहुत से परखे गए विश्वासी भी हैं जो इतने हताश हैं कि वे विश्वास के साथ प्रार्थना नहीं कर सकते, और इसलिये वे प्रबल नहीं हो सकते।
अब, मेरे प्रिय भाइयो, यदि आप प्रार्थना कर सकते हैं, तो उनके मुकद्दमे अपने साथ दरबार में ले जाइए, और जब आपकी अपनी सुनवाई हो चुके, तब कहिए, “परन्तु हे मेरे प्रभु, जबकि तू ने मेरा आदर किया है, और मुझे अपनी रोटी में से खिलाया और अपने कटोरे में से पिलाया है, तो अपने उन दीन लोगों के लिये मेरी सुन, जिनसे इस समय तेरे मुख का प्रकाश छिपा हुआ है।” इसके अतिरिक्त, लाखों दीन पापी हैं जो पाप में मरे हुए हैं, और वे प्रार्थना नहीं कर सकते—उनके लिये प्रार्थना कीजिए।
यह एक धन्य बात है—वह प्रतिनिधि रूप पश्चाताप और प्रतिनिधि रूप विश्वास, जो एक पवित्र जन पापियों के लिये प्रगट कर सकता है। “हे प्रभु, वह पापी कुछ अनुभव नहीं करता। मेरी सहायता कर कि मैं उसके लिये अनुभव करूँ, क्योंकि वह अनुभव नहीं करना चाहता। हे प्रभु, वह पापी मसीह पर विश्वास नहीं करना चाहता, वह नहीं सोचता कि मसीह उसका उद्धार कर सकता है, परन्तु मैं जानता हूँ कि वह कर सकता है, और मैं उस पापी के लिये विश्वास के साथ प्रार्थना करूँगा, और मैं उसके लिये पश्चाताप करूँगा; और यद्यपि मेरा पश्चाताप और मेरा विश्वास उसके व्यक्तिगत पश्चाताप और विश्वास के बिना उसके किसी काम के नहीं, तौभी हो सकता है कि मेरे द्वारा वह पश्चाताप तक पहुँचाया जाए और प्रार्थना की ओर ले जाया जाए।”
IV. अब, कहीं ऐसा न हो कि मैं आपको थका दूँ, इसलिये मैं अपने प्रवचन के अन्तिम भाग पर आता हूँ। और हे परमेश्वर, अभी हमें अपना बल दे, कि यह कर्तव्य बलपूर्वक हमारे विवेक तक पहुँचे और हम तुरन्त इस अभ्यास में लग जाएँ! भाइयो, मुझे आपको दूसरों के लिये प्रार्थना करने का उपदेश देना है। ऐसा करने से पहले मैं आपसे एक व्यक्तिगत प्रश्न पूछूँगा। क्या आप सदा दूसरों के लिये प्रार्थना करते हैं? यहाँ आप दोषी हैं या निर्दोष? क्या आप सोचते हैं कि आपने अपने बच्चों, अपनी कलीसिया, अपने पड़ोस और भक्तिहीन संसार का मामला परमेश्वर के सामने वैसे ही रखा है जैसा आपको रखना चाहिए था? यदि आपने रखा है, तो मैंने नहीं रखा। क्योंकि मैं यहाँ स्वामी के सामने इस पाप का अंगीकार करने के लिये मुख्य अपराधी के रूप में खड़ा हूँ। और जबकि मैं आपको उस बात का अभ्यास करने का उपदेश दूँगा जो निःसन्देह एक श्रेष्ठ विशेषाधिकार है, मैं सबसे बढ़कर अपने आप को उपदेश दे रहा होऊँगा।
मैं यह कहकर आरम्भ करता हूँ, भाइयो, कि जब तक हम दूसरों के लिये प्रार्थना न करें, तब तक आप और मैं कलीसिया के प्रति अपने ऋण को कैसे चुका सकते हैं? आपका मन-परिवर्तन कैसे हुआ? इसलिये कि किसी और ने आपके लिये प्रार्थना की थी। जब मैं अपने मन-परिवर्तन का सूत्र पीछे की ओर खोजता हूँ, तो परमेश्वर के आत्मा के द्वारा मैं इसका श्रेय अपनी माता की प्रार्थनाओं को दिए बिना नहीं रह सकता। मैं विश्वास करता हूँ कि प्रभु ने उसकी उत्कट पुकारें तब सुनीं, जब मैं जानता भी न था कि उसका प्राण मेरे लिये व्याकुल रहता था।
आप में से बहुत से ऐसे हैं जिनके लिये तब प्रार्थना की गई जब आप अचेत शिशुओं के रूप में अपने पालनों में सोए हुए थे। आपकी माताओं की आँसुओं से भरी प्रार्थनाएँ आपके नन्हे माथों पर गर्म-गर्म गिरीं, और जब आप अभी छोटे ही थे तभी उन्होंने आपको एक सच्चा नामकरण-संस्कार दे दिया। यहाँ ऐसे पति हैं जो अपने मन-परिवर्तन के लिये अपनी पत्नियों की प्रार्थनाओं के ऋणी हैं, ऐसे भाई हैं जिन्हें स्वीकार करना पड़ेगा कि यह एक बहन की बिनती का फल था, ऐसे बच्चे हैं जिन्हें मानना पड़ेगा कि उनके सब्त-स्कूल के शिक्षक उनके लिये प्रार्थना किया करते थे। अब, यदि दूसरों की प्रार्थनाओं के द्वारा आप और मैं मसीह के पास लाए गए, तो दूसरों के लिये बिनती करने के सिवा हम इस मसीही कृपा का बदला कैसे चुका सकते हैं? जिसके लिये प्रार्थना करनेवाला एक भी मनुष्य न हो, वह अपने आप को एक आशाहीन व्यक्ति लिख सकता है।
अमेरिका की एक जागृति के समय एक युवक पादरी से मिलने जा रहा था, परन्तु मिल न सका, क्योंकि पादरी ने बड़ी रुखाई से उससे मिलना टाल दिया था। पादरी से उसके इस व्यवहार के विषय में कुछ कहा गया, और उसने उत्तर दिया, “हाँ, मैं उससे मिलना नहीं चाहता था। मैं जानता था कि वह केवल ठट्ठा और उपहास करने आया था—मैं उससे क्यों मिलता? आप उसे उतनी अच्छी तरह नहीं जानते जितना मैं जानता हूँ, नहीं तो आप भी ऐसा ही करते।”
एक-दो दिन बाद एक सार्वजनिक सभा हुई, जहाँ इस आशा से वचन का प्रचार होना था कि जागृति जारी रहे। एक युवक, जिसका मन-परिवर्तन हाल ही में एक दूसरे युवक की प्रार्थनाओं के द्वारा हुआ था, घोड़े पर सवार होकर आराधना में जा रहा था, और जब वह जा रहा था, तो हमारा वह युवा मित्र, जिसे पादरी इतना भक्तिहीन समझता था, उसके पास आ पहुँचा।
उसने उससे कहा, “विलियम, आज तुम कहाँ जा रहे हो?” “अच्छा, मैं सभा में जा रहा हूँ, और मैंने सुना है कि तुम्हारा मन-परिवर्तन हो गया है।” उसने उत्तर दिया, “मैं परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ कि मुझे सत्य का ज्ञान मिला है।” दूसरे ने कहा, “अहा! मेरा तो कभी न होगा; काश, हो पाता।” उसका मित्र, जिसे पादरी इतना कठोर समझता था, उसके मुँह से यह सुनकर चकित हुआ, और उसने कहा, “परन्तु तुम्हारा मन-परिवर्तन क्यों नहीं हो सकता?” दूसरे ने कहा, “क्यों? तुम जानते हो कि तुम्हारा मन-परिवर्तन श्री क__ की प्रार्थनाओं के द्वारा हुआ।” “हाँ, ऐसा ही हुआ।” दूसरे ने कहा, “आह, मेरे लिये प्रार्थना करनेवाला कोई नहीं है। उन्होंने बहुत पहले ही मुझे त्याग दिया है।” उसके मित्र ने कहा, “अरे, यह तो बड़ी विचित्र बात है, परन्तु श्री क__, जिन्होंने मेरे लिये प्रार्थना की, तुम्हारे लिये भी प्रार्थना करते रहे हैं। कल रात हम साथ थे, और मैंने उन्हें ऐसा करते सुना।”
दूसरा अपनी काठी पर पीछे की ओर झुक गया और ऐसा लगा मानो वह आश्चर्य के मारे घोड़े पर से गिर पड़ेगा। उसने कहा, “क्या यह सच है?” “हाँ, सच है।” “तो परमेश्वर धन्य हो, अब मेरे लिये आशा है, और यदि उन्होंने मेरे लिये प्रार्थना की है, तो इससे मुझे यह कारण मिलता है कि अब मैं भी विश्वास के साथ अपने लिये प्रार्थना करूँ।” और उसने ऐसा ही किया, और उस सभा ने उसे मसीह पर अपने विश्वास का अंगीकार करते देखा।
अब, आपकी जान-पहचान का कोई भी मनुष्य यह न कहे कि उसके लिये प्रार्थना करनेवाला कोई नहीं है; वरन् जैसे आपके लिये बिनती करनेवाला कोई था, वैसे ही आपकी जान-पहचान के दीन प्राण आप में ऐसा व्यक्ति पाएँ जो उनके लिये बिनती करे। फिर, मुझे यह कहने दीजिए कि यदि आप मनुष्यों के लिये प्रार्थना करने से इनकार करते हैं, तो आप मसीह के प्रति या उसकी कलीसिया के प्रति अपना प्रेम कैसे प्रमाणित करेंगे? “हम जानते हैं कि हम मृत्यु से पार होकर जीवन में पहुँचे हैं, क्योंकि हम भाइयों से प्रेम रखते हैं।” यदि हम भाइयों से प्रेम नहीं रखते, तो हम अब भी मरे हुए हैं।
मैं दृढ़ता से कहूँगा कि जो मनुष्य भाइयों के लिये प्रार्थना नहीं करता, वह उनसे प्रेम नहीं रखता? क्या! यह तो सबसे छोटा काम है जो आप कर सकते हैं, और यदि आप सबसे छोटा काम भी नहीं करते, तो निश्चय ही बड़े काम में भी चूक जाएँगे। जब तक आप भाइयों के लिये प्रार्थना नहीं करते, तब तक आप उनसे प्रेम नहीं रखते, और तब इसका परिणाम यह निकलता है कि आप अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुए हैं। मैं आपसे फिर पूछूँ, यदि आप दूसरों के लिये कभी बिनती नहीं करते, तो आप अपनी प्रार्थनाओं के उत्तर पाने की आशा कैसे करते हैं? क्या प्रभु यह न कहेगा, “हे स्वार्थी अभागे, तू सदा मेरे द्वार पर खटखटाता रहता है, परन्तु सदा अपने ही कल्याण के लिये पुकारने को, किसी दूसरे के लिये कभी नहीं। जबकि तू ने मेरे इन छोटे से छोटे भाइयों में से किसी एक के लिये भी कभी आशीष नहीं माँगी, तो मैं भी तुझे आशीष न दूँगा। तू पवित्र लोगों से प्रेम नहीं रखता, तू अपने संगी मनुष्यों से प्रेम नहीं रखता, तो तू मुझसे, जिसे तू ने नहीं देखा, कैसे प्रेम रख सकता है, और मैं तुझसे कैसे प्रेम रखूँ और तुझे वह आशीष कैसे दूँ जो तू मेरे हाथों से माँगता है?”
भाइयो, मैं फिर कहता हूँ, मैं आपसे उत्कटता से आग्रह करता हूँ कि आप दूसरों के लिये मध्यस्थता करें, क्योंकि यदि आप नहीं करते, तो आप मसीही कैसे हो सकते हैं? मसीही याजक हैं, परन्तु यदि वे कोई बलिदान नहीं चढ़ाते तो याजक कैसे? मसीही ज्योतियाँ हैं, परन्तु जब तक वे दूसरों के लिये न चमकें, तब तक ज्योतियाँ कैसे हो सकते हैं? मसीही संसार में भेजे गए हैं, जैसे मसीह संसार में भेजा गया था, परन्तु यदि वे प्रार्थना करने के लिये न भेजे गए हों, तो भेजे गए कैसे?
मसीहियों का अभिप्राय केवल यह नहीं कि वे स्वयं आशीष पाएँ, वरन् यह कि उनमें पृथ्वी की सारी जातियाँ आशीष पाएँ; परन्तु यदि आप प्रार्थना करने से इनकार करते हैं तो यह कैसे होगा? अपना अंगीकार छोड़ दीजिए; मैं आपसे बिनती करता हूँ, यदि आप धूप नहीं जलाएँगे तो याजक का एपोद उतार फेंकिए। यदि आप अपनी मसीहियत को व्यवहार में नहीं लाएँगे तो उसे त्याग दीजिए; गम्भीर बातों का ठट्ठा और खिलवाड़ मत कीजिए। और यदि आप स्वार्थवश अब भी सिंहासन के सामने अपनी बिनती में अपने मित्रों को भाग और हिस्सा देने से इनकार करते हैं, तो आप यही कर रहे हैं।
हे भाइयो, आइए हम एक मन और एक प्राण होकर इस पड़ोस के लिये परमेश्वर से बिनती करें! आइए हम अपनी छाती पर “लंदन” लिखा हुआ लिए फिरें, जैसे प्राचीनकाल का महायाजक गोत्रों के नाम धारण करता था। माताओ, अपने बच्चों को परमेश्वर के सामने ले जाइए! पिताओ, अपने बेटों और बेटियों को ले जाइए! हे भाइयो, आइए हम इस दुष्ट संसार को और उसके अन्धेरे स्थानों को, जो अत्याचार के घरों से भरपूर हैं, परमेश्वर के सामने ले जाएँ! आइए हम गला खोलकर पुकारें और चुप न रहें, और जब तक प्रभु अपनी कलीसिया को स्थिर करके पृथ्वी पर उसकी प्रशंसा न फैला दे, तब तक उसे भी चैन न लेने दें।
हे सिय्योन की शहरपनाह पर के पहरुओ, जागो और अपनी ललकार फिर से उठाओ! हे स्वर्ग के प्रिय लोगो, जागो और अपनी प्रार्थनाएँ फिर से आरम्भ करो! बादल आपके ऊपर लटका हुआ है; यह आपका काम है कि उत्कट प्रार्थनाओं के द्वारा उसकी पवित्र बाढ़ों को सुखद वर्षा के रूप में नीचे उतार लाएँ। परमेश्वर ने अपनी प्रतिज्ञा के पहाड़ों में ऊँचे पर प्रेम के सोते रखे हैं; यह आपका काम है कि अपनी तीव्र बिनतियों की ईश्वरीय नाली के द्वारा उन्हें नीचे ले आएँ। मैं आपसे बिनती करता हूँ, ऐसा कीजिए, कहीं ऐसा न हो कि, जबकि आपने अपनी करुणा का द्वार बन्द कर लिया है और दूसरों के मन-परिवर्तन के लिये परमेश्वर से बिनती करने से इनकार किया है, वह अपने क्रोध में कहे, “ये मेरी सन्तान नहीं हैं।
इनमें मेरा आत्मा नहीं है। ये मेरे प्रेम के भागी नहीं हैं, और न ये मेरे विश्राम में प्रवेश करने पाएँगे।” अरे, मुझे भय है कि आप में से कुछ ऐसे हैं जिन्होंने महीनों से दूसरों के लिये प्रार्थना नहीं की, सिवाय प्रार्थना-सभा के। आप जानते हैं कि आपकी रात की प्रार्थनाएँ क्या होती हैं। वह यह होती है, “हे प्रभु, मेरे परिवार की देखभाल कर।” आप जानते हैं कि कुछ किसान कैसे प्रार्थना करते हैं, “हे प्रभु, देश के इस भाग में अच्छा मौसम भेज। हे प्रभु, इस पड़ोस के चारों ओर खेत के बहुमूल्य फलों को सुरक्षित रख। और कहीं उनके बिगड़ जाने की चिन्ता मत कर, क्योंकि उससे बाज़ार के भाव चढ़ जाएँगे।”
और इसी प्रकार कुछ लोग हैं जो अपने आप को ही बिनती का विशेष विषय बना लेते हैं, और नाश होती हुई भीड़ की उन्हें क्या चिन्ता! कुछ लोगों की इच्छाओं का आशय यही है, “हे प्रभु, कलीसिया को आशीष दे, परन्तु हमारे पड़ोस में कोई दूसरा सेवक मत भेज, कहीं ऐसा न हो कि वह हमारी मण्डलियों को हमसे छीन ले। हे प्रभु, दाख की बारी में मज़दूर भेज, परन्तु उन्हें हमारे कोने में मत भेज, कहीं ऐसा न हो कि वे हमारी महिमा में से कुछ ले लें।” ऐसी होती है वह बिनती। आइए, हम ऐसी बिनतियों को छोड़ दें।
आइए हम मसीही बनें—आइए हमारे प्राण और मन ऐसे विशाल हों जो दूसरों के लिये अनुभव कर सकें। आइए हम रोनेवालों के साथ रोएँ, और आनन्द करनेवालों के साथ आनन्द करें; और एक कलीसिया के रूप में और व्यक्तिगत रूप में भी, हम पाएँगे कि जब हम अपने मित्रों के लिये प्रार्थना करेंगे, तब प्रभु हमारी बंधुआई को लौटा देगा। परमेश्वर हमें दूसरों के लिये बिनती करने में सहायता दे! और आप जिन्होंने कभी अपने लिये प्रार्थना नहीं की, परमेश्वर आपको प्रभु यीशु पर विश्वास करने में सहायता दे! आमीन।
