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यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
किसी भी बात की चिन्ता मत करो: परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और बिनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ।
मूल उपदेश: प्रार्थना, चिन्ता का उपचार, सं. 2351, मेट्रोपॉलिटन टैबरनेकल पुल्पिट, खण्ड 40। मेट्रोपॉलिटन टैबरनेकल, न्यूइंगटन में प्रचार किया गया। नीचे दिया गया पाठ स्पर्जन का सार्वजनिक (पब्लिक डोमेन) पुल्पिट-पाठ है, न कि 1993 का संक्षिप्त संकलन।
परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और बिनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ। तब परमेश्वर की शान्ति, जो समझ से बिलकुल परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी। फिलिप्पियों 4:6-7 हमें आगे की सोचने की क्षमता मिली है, परन्तु हमारी अन्य सब क्षमताओं की तरह यह भी बिगड़ गई है, और प्रायः इसका दुरुपयोग होता है। मनुष्य के लिए यह अच्छा है कि वह पवित्र सावधानी रखे और अपने जीवन की हर एक बात पर उचित ध्यान दे; परन्तु हाय! इसे अपवित्र चिन्ता बना देना, और परमेश्वर के हाथ से प्रबन्ध (विधान) का वह कार्य छीनने का प्रयत्न करना जो उसी का है, हमारा नहीं, बहुत ही सहज है।
लूथर पक्षियों के विषय में, और परमेश्वर जिस रीति से उनकी देखभाल करता है उसके विषय में बात करना कितना पसन्द करता था! जब वह अपनी चिन्ताओं से भरा होता था, तो वह पक्षियों से लगातार ईर्ष्या किया करता था, क्योंकि वे ऐसा स्वतन्त्र और आनन्दमय जीवन बिताते थे। वह डॉक्टर गौरैया, और डॉक्टर थ्रश (एक गानेवाली चिड़िया) और दूसरों की चर्चा करता है, जो आकर डॉक्टर लूथर से बातें करते थे और उसे बहुत-सी अच्छी बातें बताते थे। भाइयो, आप जानते हैं कि वहाँ खुले में रहनेवाले पक्षी, जिनकी देखभाल परमेश्वर करता है, उन पक्षियों से कहीं अच्छी दशा में रहते हैं जिनकी देखभाल मनुष्य करता है। लंदन की एक छोटी लड़की, जो गाँव में गई थी, एक बार बोली, “माँ, उस बेचारी छोटी चिड़िया को देखो। उसके पास कोई पिंजरा ही नहीं है!” मुझे तो यह पक्षी की कोई हानि न लगती; और यदि आपसे और मुझसे हमारा पिंजरा, और दाने का डिब्बा, और पानी का प्याला ले लिया जाए, और हम परमेश्वर पर दीनता से निर्भर रहने के जीवन की महिमामय स्वतन्त्रता में छोड़ दिए जाएँ, तो यह कोई बड़ी हानि न होगी।
शारीरिक भरोसे का वही पिंजरा, और दाने का वही डिब्बा जिसे भरने के लिए हम सदा परिश्रम करते रहते हैं, इस नश्वर जीवन की चिन्ता का कारण बनता है। परन्तु जिसे यह अनुग्रह मिला है कि वह अपने पंख फैलाकर ऊँचा उड़ जाए, और ईश्वरीय भरोसे के खुले मैदान में पहुँच जाए, वह दिन भर गा सकता है और उसकी धुन सदा यही रहेगी, “हे नश्वर मनुष्य, परिश्रम और शोक से रुक जा; परमेश्वर कल का प्रबन्ध करता है।”
तो पाठ की शिक्षा यह है, “किसी भी बात की चिन्ता मत करो।” अंग्रेज़ी बाइबल में यहाँ प्रयुक्त शब्द “careful” का अर्थ अब ठीक वैसा नहीं है जैसा उस समय था जब बाइबल का अनुवाद हुआ था। कम से कम मेरे लिए उसका अर्थ वैसा नहीं है जैसा अनुवादकों के लिए था। मैं तो कहूँगा कि हमें “सावधान” रहना चाहिए। “सावधान रहो”—यह लड़कों और युवाओं के लिए, जब वे जीवन आरम्भ कर रहे हों, एक अच्छा पाठ है; परन्तु जिस अर्थ में अनुवादकों के समय “care-full” शब्द समझा जाता था, उस अर्थ में हमें “careful” नहीं होना चाहिए, अर्थात् चिन्ता से भरे हुए नहीं होना चाहिए।
पाठ का अर्थ यह है: व्याकुल मत हो, इस नश्वर जीवन की आवश्यकताओं के विषय में निरन्तर सोचते मत रहो। मैं इसे फिर से पढ़ूँगा, शब्द को थोड़ा खींचकर, और तब आप उसका अर्थ समझ जाएँगे: “किसी भी बात के लिए चिन्ता-से-भरे मत रहो।” काश, परमेश्वर हमें सिखाए कि हम उस बुराई से कैसे बचें जिसका यहाँ निषेध किया गया है, और उस पवित्र निश्चिन्तता के साथ कैसे जीएँ जो मसीही जीवन की सुन्दरता ही है, जब हमारी सारी चिन्ता परमेश्वर पर डाल दी जाती है, और हम उसकी उस विधान-भरी देखभाल में जो वह हमारी करता है, आनन्दित और मगन हो सकते हैं! “आह,” कोई कहता है, “मैं चिन्ता किए बिना रह ही नहीं सकता।” अच्छा, आज रात का विषय इसी में आपकी सहायता करने के लिए है कि आप चिन्ता करना या कुढ़ना छोड़ दें। और पहले, यहाँ चिन्ता के स्थान पर रखी जानेवाली वस्तु पर विचार कीजिए। किसी बात की चिन्ता मत करो, परन्तु हर बात के लिए प्रार्थना करते रहो—यही चिन्ता का स्थानापन्न है, “प्रार्थना और बिनती।” दूसरे, इस प्रार्थना के विशेष स्वरूप पर ध्यान दीजिए, जिसे व्याकुलता का स्थान लेना है, “हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और बिनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ।” और फिर मुझे आशा है कि हमारे पास कुछ मिनट बचेंगे जिनमें हम इस प्रार्थना के मधुर परिणाम पर विचार करेंगे, “तब परमेश्वर की शान्ति, जो समझ से बिलकुल परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी।”
I. तो आरम्भ में, पहले यह है, चिन्ता का स्थानापन्न
मैं समझता हूँ कि हम में से बहुतों के विषय में यह सच है कि हमारी चिन्ताएँ अनेक हैं। यदि आप एक बार चिन्ताग्रस्त, व्याकुल, कुढ़नेवाले बन जाएँ, तो आप अपनी चिन्ताओं को कभी गिन न सकेंगे, चाहे आप अपने सिर के बाल गिन लें। और जो लोग चिन्ता से भरे रहते हैं उनकी चिन्ताएँ बढ़ती ही जाती हैं; और जब आप उतने चिन्ता से भर जाएँ जितना आप समझते हैं कि भर सकते हैं, तब भी निश्चय ही आपके चारों ओर चिन्ताओं की एक और फ़सल उग आएगी। व्याकुलता की इस बुरी आदत में लिप्त रहने से वह जीवन पर प्रभुता करने लगती है, यहाँ तक कि जीवन के विषय में हमारी चिन्ता के कारण जीवन जीने योग्य ही नहीं रहता।
चिन्ताएँ अनेक हैं, इसलिए अपनी प्रार्थनाएँ भी उतनी ही अनेक होने दीजिए। हर उस बात को जो चिन्ता है, प्रार्थना में बदल दीजिए। अपनी चिन्ताओं को अपनी प्रार्थनाओं का कच्चा माल बनने दीजिए; और जैसे कीमियागर आशा करते थे कि वे मैल को सोने में बदल देंगे, वैसे ही आप एक पवित्र कीमिया के द्वारा उस बात को, जो स्वभाव से चिन्ता बन जाती, सचमुच प्रार्थना के रूप में आत्मिक धन में बदल दीजिए। हर एक व्याकुलता को पिता, और पुत्र, और पवित्र आत्मा के नाम में बपतिस्मा दीजिए, और इस प्रकार उसे आशीष बना दीजिए।
क्या आपको कुछ पाने की चिन्ता है? सावधान रहिए कि वह आपको न पा ले। क्या आप लाभ कमाना चाहते हैं? ध्यान रखिए कि अपने लाभों के कारण आप जितना कमाएँ उससे अधिक न खो दें। मैं आपसे विनती करता हूँ, कमाने की उससे अधिक चिन्ता न कीजिए जितनी को आप प्रार्थना में बदलने का साहस कर सकें। उस वस्तु की इच्छा न कीजिए जिसे परमेश्वर से माँगने का आप साहस नहीं कर सकते। अपनी इच्छाओं को आत्मिक मापदण्ड से नापिए, और इस प्रकार आप लोभ जैसी किसी भी बात से बचे रहेंगे। बहुतों पर चिन्ताएँ उनकी हानियों के कारण आती हैं। जो कुछ उन्होंने कमाया था, वे उसे खो देते हैं।
खैर, यह ऐसा संसार है जिसमें खोने की प्रवृत्ति है। ज्वार के बाद भाटा आता है, और जाड़ा ग्रीष्म के फूलों को कुचल डालता है। यदि दूसरे लोगों के समान आप भी कुछ खो दें तो अचम्भा न कीजिए, परन्तु अपनी हानियों के विषय में प्रार्थना कीजिए। उन्हें लेकर परमेश्वर के पास जाइए, और कुढ़ने के बदले उन्हें प्रभु की बाट जोहने का अवसर बनाइए और कहिए, “यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है। मुझे बता दे कि तू किस कारण मुझसे मुकद्दमा लड़ता है, और मैं तुझसे विनती करता हूँ, अपने दास को इससे बचाए रख कि वह कभी तेरी शिकायत करे, चाहे तू मुझे कुछ भी खोने दे!”
शायद आप कहते हैं कि आपकी चिन्ता न तो कमाने के विषय में है, न खोने के विषय में, परन्तु आपकी प्रतिदिन की रोटी के विषय में है। आह, अच्छा, आप जानते हैं, उसके लिए तो आपके पास प्रतिज्ञाएँ हैं! प्रभु ने कहा है, “तू देश में बसा रहेगा, और निश्चय तेरा पालन-पोषण होगा।” वह आपको मधुर प्रोत्साहन देता है जब वह कहता है कि वह मैदान की घास को ऐसा वस्त्र पहनाता है, तो हे अल्पविश्वासियो, क्या वह तुम्हें इससे बढ़कर न पहनाएगा? और प्रभु यीशु आपसे कहता है कि आकाश के पक्षियों को देखो; वे न बोते हैं, न खत्तों में बटोरते हैं; तौभी तुम्हारा स्वर्गीय पिता उन्हें खिलाता है।
तो अपनी सारी चिन्ताओं को लेकर अपने परमेश्वर के पास जाइए। यदि आपका परिवार बड़ा है, आमदनी थोड़ी है, और गुज़ारा चलाने में, और सब मनुष्यों की दृष्टि में भली बातों का प्रबन्ध करने में बड़ी कठिनाई होती है, तो आपके पास परमेश्वर का द्वार खटखटाने के उतने ही अधिक बहाने हैं, अनुग्रह के सिंहासन के पास बार-बार पाए जाने के उतने ही अधिक कारण हैं। मैं आपसे विनती करता हूँ, उनका भला उपयोग कीजिए। जब मुझे सचमुच किसी मित्र से कुछ काम होता है तो मैं उसके पास जाने में संकोच नहीं करता, और जब आवश्यकताएँ आप पर दबाव डालें तो आप भी हियाव से परमेश्वर को पुकार सकते हैं। किसी भी बात की व्याकुल चिन्ता करने के बदले, उसे तुरन्त फिर से प्रार्थनाशील होने का कारण बना लीजिए। “आह,” कोई कहता है, “पर मैं उलझन में हूँ। मैं नहीं जानता कि क्या करूँ।” अच्छा, तो प्रिय मित्र, जब आप यह न बता सकें कि दाहिनी ओर का मार्ग ठीक है, या बाईं ओर का, या सीधा आगे जाना, या आपको पीछे लौट जाना चाहिए, तब तो आपको निश्चय ही प्रार्थना करनी चाहिए। सचमुच, जब आप ऐसे कोहरे में हों कि अगला लैम्प भी न देख सकें, तभी वह समय है जब आपको प्रार्थना करनी ही चाहिए। मार्ग आपके सामने अचानक साफ़ हो जाएगा। मुझे स्वयं बहुत बार यह उपाय आज़माना पड़ा है, और मैं गवाही देता हूँ कि जब मैंने अपने ऊपर भरोसा किया, तब मैं एक भारी मूर्ख सिद्ध हुआ।
परन्तु जब मैंने परमेश्वर पर भरोसा किया, तब उसने मुझे सीधे ठीक मार्ग पर चलाया, और उसमें कोई भूल न हुई। मैं विश्वास करता हूँ कि परमेश्वर की सन्तान प्रायः कठिन बातों की अपेक्षा साधारण बातों में अधिक बड़ी भूलें करती हैं। आप जानते हैं कि इस्राएल के साथ क्या हुआ था, जब वे गिबोनी अपने पुराने जूते और कपड़े पहने हुए आए, और फफूँदी लगी हुई वह रोटी दिखाई जिसके विषय में उन्होंने कहा कि उसे हमने अपने तन्दूरों से ताज़ा निकाला था। इस्राएलियों ने सोचा, “यह तो स्पष्ट मामला है। ये लोग परदेशी हैं, ये दूर देश से आए हैं, और हम इनसे वाचा बाँध सकते हैं।” उन्हें पूरा निश्चय था कि उनकी आँखों का प्रमाण सिद्ध करता है कि ये कनानी नहीं हैं, इसलिए उन्होंने परमेश्वर से सलाह न ली। सारा मामला इतना सीधा लगा कि उन्होंने गिबोनियों से वाचा बाँध ली, जो उसके बाद सदा उनके लिए संकट बनी रही। यदि हम हर बात में प्रार्थना के द्वारा परमेश्वर के पास जाएँ, तो हमारी उलझनें हमें उतनी भूलों में भी न डालेंगी जितनी हमारी सरल बातें डालती हैं, और सरल तथा कठिन दोनों प्रकार की बातों में परमप्रधान हमारी अगुवाई करेगा।
शायद कोई और मित्र कहता है, “पर मैं भविष्य के विषय में सोच रहा हूँ।” क्या सचमुच? अच्छा, पहले तो मैं आपसे यह पूछना चाहता हूँ कि भविष्य से आपका क्या सम्बन्ध है? क्या आप जानते हैं कि दिन भर में क्या होगा? आप सोचते रहे हैं कि जब आप बूढ़े होंगे तब आपका क्या होगा; परन्तु क्या आपको निश्चय है कि आप कभी बूढ़े होंगे भी? मैं एक मसीही स्त्री को जानता था जो इस बात की चिन्ता में घुलती रहती थी कि उसे दफ़नाया कैसे जाएगा। उस प्रश्न ने मुझे कभी परेशान नहीं किया, और ऐसी बहुत-सी और बातें हैं जिनके विषय में हमें अपने आप को चिन्तित करने की आवश्यकता नहीं।
कुत्ते को पीटने के लिए आप सदा कोई न कोई डंडा ढूँढ़ ही लेते हैं, और यदि आप चिन्ता चाहते हैं, तो अपने ही प्राणों को पीटने के लिए प्रायः कोई न कोई चिन्ता ढूँढ़ लेते हैं। परन्तु यह आप में से किसी के लिए भी एक घटिया काम है। ऐसा करने के बदले, हर उस बात को जो चिन्ता का विषय बन सकती है, प्रार्थना का विषय बना दीजिए। चिन्ता का कोई विषय आने में देर न लगेगी, इसलिए प्रार्थना के विषय के बिना भी आप देर तक न रहेंगे। “चिन्ता” शब्द को काट दीजिए और उसके स्थान पर यह शब्द “प्रार्थना” लिख दीजिए; तब चाहे आपकी चिन्ताएँ अनेक हों, आपकी प्रार्थनाएँ भी अनेक होंगी।
प्रिय मित्रो, आगे यह ध्यान दीजिए कि अनुचित चिन्ता परमेश्वर के अधिकार-क्षेत्र में घुसपैठ है। यह सन्तान बने रहने के बदले अपने आप को घर का पिता बना लेना है। यह उस दास के बदले, जिसके लिए स्वामी राशन का प्रबन्ध करता है, अपने आप को स्वामी बना लेना है। अब यदि ऐसा करने के बदले आप चिन्ता को प्रार्थना में बदल दें, तो कोई घुसपैठ न होगी, क्योंकि आप ढिठाई का दोष लगे बिना प्रार्थना में परमेश्वर के पास आ सकते हैं। वह आपको प्रार्थना करने का निमन्त्रण देता है। नहीं, यहाँ वह अपने दास के द्वारा आपको आज्ञा देता है, “हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और बिनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ।”
एक बार फिर, चिन्ताएँ हमारे किसी काम की नहीं, और वे हमें बड़ी हानि पहुँचाती हैं। यदि आप जितनी देर चाहें चिन्ता करते रहें, तौभी आप अपने आप को एक इंच भी लम्बा नहीं कर सकते, न अपने सिर पर एक और बाल उगा सकते हैं, न एक बाल को सफ़ेद या काला कर सकते हैं। उद्धारकर्ता हमें यही बताता है, और वह पूछता है कि यदि चिन्ता ऐसी छोटी बातों में असफल रहती है, तो परमेश्वर के विधान की बड़ी बातों में चिन्ता क्या कर सकती है? वह कुछ भी नहीं कर सकती।
एक किसान अपने खेतों में खड़ा होकर कहने लगा, “मैं नहीं जानता कि हम सब का क्या होगा। यदि यह वर्षा ऐसी ही होती रही तो गेहूँ नष्ट हो जाएगा। जब तक कुछ अच्छा मौसम न हो, हमारी कोई फ़सल ही न होगी।” वह हाथ मलता हुआ, कुढ़ता हुआ, और अपने सारे घराने को बेचैन करता हुआ इधर-उधर टहलता रहा; परन्तु अपनी सारी चिन्ता से वह धूप की एक किरण भी उत्पन्न न कर सका, अपनी सारी चिड़चिड़ी बातों से वह बादलों में से एक को भी फूँक मारकर उड़ा न सका, और न अपने सारे कुड़कुड़ाने से वर्षा की एक बूँद भी रोक सका।
तो जब इससे आपको कुछ भी नहीं मिलता, तब अपने ही हृदय को कुतरते रहने से क्या लाभ? इसके अतिरिक्त, यह हमारी अपनी सहायता करने की शक्ति को, और विशेषकर परमेश्वर की महिमा करने की हमारी शक्ति को, निर्बल कर देती है। चिन्ता से भरा हृदय बहुत-सी बातों में हमें ठीक-ठीक परखने से रोकता है। मैंने अक्सर यह दृष्टान्त दिया है (इससे अच्छा मैं नहीं जानता) कि हम एक दूरबीन लें, उस पर अपनी व्याकुलता की गरम साँस छोड़ें, उसे अपनी आँख से लगाएँ, और फिर कहें कि हमें बादलों के सिवाय कुछ दिखाई नहीं देता। निश्चय ही हमें कुछ दिखाई नहीं देगा, और जब तक हम उस पर साँस छोड़ते रहेंगे, हमें कभी कुछ दिखाई न देगा। यदि हम केवल शान्त, स्थिर, आत्म-संयमी, और परमेश्वर के वश में होते, तो हम ठीक काम ही करते।
कठिनाई के समय, जैसा हम कहते हैं, हम “पूरी तरह सचेत” रहते। जिस मनुष्य के पास परमेश्वर की उपस्थिति है, वह सूझ-बूझ की उपस्थिति की भी आशा रख सकता है। यदि हम प्रार्थना करना भूल जाएँ, तो क्या आपको आश्चर्य होता है कि हम सब बेचैनी और चिन्ता में पड़ जाते हैं, और जो बात पहले सूझती है वही कर डालते हैं, जो प्रायः सबसे बुरी बात होती है, बजाय इसके कि हम तब तक ठहरें जब तक यह न देख लें कि क्या करना चाहिए, और फिर भरोसे और विश्वास के साथ उसे ऐसे करें मानो परमेश्वर की दृष्टि में कर रहे हों? चिन्ता हानिकारक है, परन्तु यदि आप इस चिन्ता को प्रार्थना में बदल दें, तो हर एक चिन्ता आपके लिए लाभदायक होगी।
आत्मिक भवन को बनाने के लिए प्रार्थना अद्भुत सामग्री है। प्रार्थना के द्वारा हमारी अपनी उन्नति होती है। प्रार्थना के द्वारा हम अनुग्रह में बढ़ते हैं, और यदि हम हर क्षण निवेदनों के साथ परमेश्वर के पास आएँ, तो हम तेज़ी से बढ़नेवाले मसीही होंगे। आज सुबह मैंने एक बहन से कहा, “मेरे लिए प्रार्थना कीजिए, यह आवश्यकता का समय है,” और उसने उत्तर दिया, “जब से मैं जागी हूँ, मैंने और कुछ किया ही नहीं।” मैंने कई और लोगों से भी यही निवेदन किया, और उन्होंने कहा कि वे मेरे लिए प्रार्थना करते रहे हैं। मैं बहुत आनन्दित हुआ, न केवल अपने लिए, क्योंकि मुझे उनकी प्रार्थनाओं से लाभ मिला था, परन्तु उनके लिए भी, क्योंकि इससे वे निश्चय ही बढ़ेंगे। जब छोटे पक्षी अपने पंख फड़फड़ाते रहते हैं, तो वे उड़ना सीख रहे होते हैं। उनकी नसें और मज़बूत हो जाएँगी, और पक्षी जल्द ही घोंसला छोड़ देंगे। उनके पंखों का वही फड़फड़ाना एक शिक्षा है; और प्रार्थना करने का प्रयत्न, प्रार्थनाशील आत्मा का कराहना, आहें भरना, पुकारना, अपने आप में एक आशीष है। तो चिन्ता की इस हानिकारक आदत को छोड़ दीजिए और प्रार्थना की इस धनी बनानेवाली आदत को अपना लीजिए। देखिए, इस प्रकार आप कैसे दोहरा लाभ पाएँगे: पहला, एक हानि से बचकर, और दूसरा, वह पाकर जो सचमुच आपको और दूसरों को भी लाभ पहुँचाएगा।
फिर, चिन्ताएँ इस बात को भूल जाने का परिणाम हैं कि मसीह हमारे कितने निकट है। क्या आपने ध्यान दिया कि प्रसंग किस प्रकार चलता है? “प्रभु निकट है। किसी भी बात की चिन्ता मत करो।” प्रभु यीशु मसीह ने फिर आने की प्रतिज्ञा की है, और हो सकता है कि वह आज रात ही आ जाए। किसी भी क्षण वह प्रगट हो सकता है। इसलिए पौलुस लिखता है, “प्रभु निकट है। किसी भी बात की चिन्ता मत करो: परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और बिनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ।”
आह, काश हम इस पृथ्वी पर ऐसे खड़े रहें मानो केवल एक छाया पर खड़े हों, और उन लोगों के समान जीएँ जो इस बेचारे क्षणभंगुर जीवन से जल्द ही छुटकारा पानेवाले हैं। यदि हम हर एक सांसारिक वस्तु को बहुत ढीले हाथ से पकड़ें, तो हम चिन्ता, व्याकुलता और कुढ़न में न पड़ें, परन्तु प्रार्थना में लग जाएँ; क्योंकि इस प्रकार हम वास्तविक और ठोस वस्तु को थाम लेंगे, और अपने पाँव उस अदृश्य पर जमाएँगे जो, आख़िरकार, अनन्त है!
आह, प्रिय मित्रो, यह पाठ, जिसे मैंने आपको बार-बार पढ़कर सुनाया है, अब आपके हृदयों में ऐसे उतर जाए जैसे कोई कंकड़ किसी पहाड़ी झील में गिरता है, और जैसे-जैसे वह भीतर जाए, वह आपके प्राण की सतह पर ही शान्ति के वलय बनाता जाए! II. अब हम दूसरे स्थान पर इस पाठ को थोड़ा और निकट से देखना चाहते हैं, ताकि इस प्रार्थना के विशेष स्वरूप को देखें। वह कैसी प्रार्थना है जो हमें चिन्ता से छुटकारा देगी?
तो पहले, यह ऐसी प्रार्थना है जो हर बात से सम्बन्ध रखती है। “हर एक बात में” “तुम्हारे निवेदन ... परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ।” आप छोटी से छोटी बात के विषय में और बड़ी से बड़ी बात के विषय में प्रार्थना कर सकते हैं; आप न केवल पवित्र आत्मा के लिए प्रार्थना कर सकते हैं, परन्तु जूतों की एक नई जोड़ी के लिए भी प्रार्थना कर सकते हैं। आप जो रोटी खाते हैं, जो पानी पीते हैं, जो वस्त्र पहनते हैं, उनके विषय में परमेश्वर के पास जा सकते हैं, और हर बात के विषय में उससे प्रार्थना कर सकते हैं। कोई रेखा मत खींचिए और यह मत कहिए, “बस यहाँ तक का भाग परमेश्वर की देखभाल में रहेगा।”
अरे, तो फिर आप जीवन के बाक़ी भाग का क्या करेंगे? क्या वह एक प्रकार की नास्तिकता की मुरझा देनेवाली झुलस के नीचे जीया जाएगा? परमेश्वर न करे! आह, काश हम अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ परमेश्वर में जीएँ, क्योंकि हमारा अस्तित्व ऐसा है कि हम उसे बाँट नहीं सकते! हमारी देह, प्राण और आत्मा एक हैं; और जब तक परमेश्वर हमें इस संसार में रखता है, और हमारी ऐसी आवश्यकताएँ हैं जो हमारी देह की दशा से उत्पन्न होती हैं, तब तक हमें अपनी शारीरिक आवश्यकताओं को प्रार्थना में परमेश्वर के सामने लाना ही चाहिए।
और आप पाएँगे कि महान परमेश्वर इन बातों में आपकी सुनेगा। यह मत कहिए कि वे इतनी छोटी हैं कि वह उन पर ध्यान न दे—उसकी तुलना में तो सब कुछ छोटा है। जब मैं सोचता हूँ कि वह कैसा महान परमेश्वर है, तो मुझे ऐसा लगता है कि हमारा यह बेचारा छोटा-सा संसार ब्रह्माण्ड के समुद्र-तट पर बालू का एक तुच्छ कण मात्र है, और किसी ध्यान के योग्य ही नहीं। सारी पृथ्वी प्रकृति के विशाल जगत में केवल एक बिन्दु है; और यदि परमेश्वर उस पर ध्यान देने के लिए झुकता है, तो वह थोड़ा और नीचे झुककर हम पर भी ध्यान दे सकता है। और वह ऐसा करता भी है, क्योंकि वह कहता है, “तुम्हारे सिर के बाल भी सब गिने हुए हैं।” इसलिए हर एक बात में तुम्हारे निवेदन परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ।
जो प्रार्थना हमें चिन्ता से बचाती है, वह ऐसी प्रार्थना है जो बार-बार की जाती है, “हर एक बात में ... प्रार्थना और बिनती के द्वारा।” परमेश्वर से प्रार्थना कीजिए और फिर प्रार्थना कीजिए, “प्रार्थना और बिनती के द्वारा।” यदि प्रभु पहली बार आपको उत्तर न दे, तो बहुत धन्यवादी होइए कि आपके पास फिर से प्रार्थना करने का एक अच्छा कारण है। यदि वह दूसरी बार भी आपका निवेदन पूरा न करे, तो विश्वास कीजिए कि वह आपसे इतना प्रेम करता है कि वह आपका स्वर फिर से सुनना चाहता है।
और यदि वह आपको तब तक प्रतीक्षा कराए जब तक आप सात बार उसके पास न जा चुकें, तो अपने आप से कहिए, “अब मैं जानता हूँ कि मैं एलिय्याह के परमेश्वर की आराधना करता हूँ, क्योंकि एलिय्याह के परमेश्वर ने आशीष देने से पहले उसे सात बार फिर जाने दिया था।” स्वर्गदूत से मल्लयुद्ध करने की अनुमति मिलना सम्मान की बात समझिए। परमेश्वर इसी रीति से अपने राजकुमार बनाता है। यदि याकूब को पहली ही बार माँगने पर स्वर्गदूत से आशीष मिल जाती, तो वह कभी इस्राएल न बनता; परन्तु जब उसे तब तक मल्लयुद्ध करते रहना पड़ा जब तक वह प्रबल न हुआ, तब वह परमेश्वर के साथ एक राजकुमार बन गया। जो प्रार्थना चिन्ता को मार डालती है, वह निरन्तर और दृढ़ता से की जानेवाली प्रार्थना है। आगे, यह समझ-बूझ के साथ की जानेवाली प्रार्थना है, “तुम्हारे निवेदन परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ।” मैंने एक मुसलमान के विषय में सुना जो, मेरे विचार से, प्रतिदिन छः घण्टे प्रार्थना में बिताता था; और कहीं जहाज़ पर रहते हुए वह सो न जाए, इसलिए वह सीधा खड़ा रहता था, और उसके आगे केवल एक रस्सी तनी रहती थी कि वह उसके सहारे टिक सके। और यदि वह सो जाता, तो गिर पड़ता। उसका उद्देश्य यह था कि जिसे वह प्रार्थना कहता था उसे छः घण्टे तक करता रहे। “अच्छा,” मैंने एक व्यक्ति से कहा जो उसे जानता था, और जिसने उसे नील नदी पर उसकी नाव में देखा था, “वह कैसी प्रार्थना थी?” “क्यों,” मेरे मित्र ने उत्तर दिया, “वह बस यही दोहराता रहता था, ‘परमेश्वर के सिवाय कोई परमेश्वर नहीं, और मुहम्मद परमेश्वर का नबी है,’ वही बात बार-बार, बार-बार, बार-बार।” मैंने कहा, “क्या उसने कुछ माँगा?” “अरे, नहीं!” “क्या वह परमेश्वर से कुछ देने के लिए विनती कर रहा था?” “नहीं, वह बस कुछ निश्चित शब्दों को लगातार दोहराता रहता था, जैसे कोई जादूगरनी कोई मन्त्र दोहराती है।”
क्या आप सोचते हैं कि प्रार्थना की उस शैली में कुछ सार है? यदि आप घुटने टेककर केवल कोई निश्चित सूत्र दोहराते रहें, तो वह केवल मुँह भर शब्द ही होंगे। उस प्रकार की प्रार्थना की परमेश्वर को क्या परवाह? “तुम्हारे निवेदन परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ।” यही सच्ची प्रार्थना है। परमेश्वर जानता है कि आपके निवेदन क्या हैं, परन्तु आपको उससे ऐसे प्रार्थना करनी है मानो वह न जानता हो। आपको अपने निवेदन प्रगट करने हैं, इसलिए नहीं कि प्रभु नहीं जानता, परन्तु शायद इसलिए कि आप नहीं जानते।
और जब आप अपने निवेदन उसके सामने प्रगट कर चुकेंगे, जैसा पाठ आपसे कहता है, तो आप उन्हें अपने आप पर भी और अधिक स्पष्ट रूप से प्रगट कर चुके होंगे। जब आपने समझ-बूझ के साथ माँगा है, यह जानते हुए कि आपने क्या माँगा है, और यह जानते हुए कि आपने उसे क्यों माँगा है, तो शायद आप रुककर अपने आप से कहेंगे, “नहीं, आख़िरकार मुझे वह निवेदन नहीं करना चाहिए।” कभी-कभी, जब आप किसी ऐसी वस्तु के लिए प्रार्थना करते रहे हैं जो परमेश्वर आपको नहीं देता, तो हो सकता है कि आपके मन में चुपके से यह निश्चय आ जाए कि आप ठीक मार्ग पर नहीं हैं; और आपकी प्रार्थना का वह परिणाम अपने आप में आपका भला करेगा, और आपके लिए आशीष होगा।
परन्तु आपको अपने निवेदन परमेश्वर के सम्मुख प्रगट करते हुए प्रार्थना करनी है। अर्थात्, सीधी-सादी भाषा में, जो आप चाहते हैं वह कहिए, क्योंकि यही सच्ची प्रार्थना है। अकेले में जाइए और प्रभु को बताइए कि आप क्या चाहते हैं; अपना मन उसके सामने उंडेल दीजिए। यह मत सोचिए कि परमेश्वर को किसी सुन्दर भाषा की आवश्यकता है। नहीं, आपको अपनी प्रार्थना-पुस्तक के लिए ऊपर दौड़कर जाने, और कोई प्रार्थना निकालने की आवश्यकता नहीं; यदि आप सचमुच प्रार्थना कर रहे हैं, तो आपको बहुत समय लगेगा तब कहीं कोई ऐसी लिखी हुई प्रार्थना मिलेगी जो आप पर ठीक बैठे। जो आप चाहते हैं उसके लिए ठीक वैसे ही प्रार्थना कीजिए जैसे आप अपनी माँ को या अपने सबसे प्रिय मित्र को अपनी आवश्यकता बता रहे हों। उसी रीति से परमेश्वर के पास जाइए, क्योंकि वही सच्ची प्रार्थना है, और वही प्रार्थना है जो आपकी चिन्ता को भगा देगी।
तो प्रिय मित्रो, फिर से, जो प्रार्थना चिन्ता से स्वतन्त्रता लाती है, वह परमेश्वर के साथ संगति है। यदि आपने परमेश्वर से बात नहीं की, तो आपने सचमुच प्रार्थना नहीं की। एक छोटे बच्चे के विषय में यह जाना गया है (मैं कह सकता हूँ कि आपके बच्चों ने भी ऐसा किया होगा) कि वह जाकर एक चिट्ठी नाली की जाली में डाल आया; और निश्चय ही, इस प्रकार डाली गई चिट्ठी का कभी कोई उत्तर न आया। यदि चिट्ठी डाकपेटी में न डाली जाए, ताकि वह उस व्यक्ति तक पहुँचे जिसे वह भेजी गई है, तो उसका क्या लाभ? इसी प्रकार, प्रार्थना परमेश्वर के साथ वास्तविक सम्पर्क है।
आपको यह अनुभव करना चाहिए कि वह है, और अपने खोजनेवालों को प्रतिफल देता है, नहीं तो आप प्रार्थना नहीं कर सकते। वह आपके लिए एक वास्तविकता, एक जीवित वास्तविकता होना चाहिए; और आपको विश्वास करना चाहिए कि वह प्रार्थना सुनता है, और फिर आपको उससे बात करनी चाहिए और विश्वास करना चाहिए कि जो निवेदन आप उससे करते हैं वह आपको मिल गया है, और तब वह आपको मिलेगा। उसने विश्वास से की गई प्रार्थना का आदर करने में आज तक कभी चूक नहीं की। वह आपको कुछ समय तक प्रतीक्षा करा सकता है, परन्तु देरी इनकार नहीं होती; और उसने बहुत बार ऐसी प्रार्थना का, जिसमें चाँदी माँगी गई थी, सोना देकर उत्तर दिया है। हो सकता है कि उसने सांसारिक धन देने से इनकार किया हो, परन्तु उसने उससे दस हज़ार गुना अधिक मूल्य का स्वर्गीय धन दिया है, और विनती करनेवाला उस अदला-बदली से बहुत अधिक सन्तुष्ट हुआ है। “तुम्हारे निवेदन परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ।”
मैं जानता हूँ कि जब आप संकट में होते हैं तब आप क्या करते हैं: आप अपने पड़ोसी के पास जाते हैं, परन्तु आपका पड़ोसी ऐसे काम के लिए आपको इतनी बार देखना नहीं चाहता। शायद आप अपने भाई के पास जाते हैं, परन्तु एक वचन है जो आपको चेतावनी देता है कि अपनी विपत्ति के दिन अपने भाई के घर न जाना। जब आप तंगी में हों, तो आप किसी मित्र के पास बहुत बार जा सकते हैं; वह आपको देखकर बहुत प्रसन्न हो सकता है, जब तक वह यह न सुन ले कि आप किस काम से आए हैं। परन्तु यदि आप अपने परमेश्वर के पास जाएँ, तो वह कभी आपसे मुँह न फेरेगा। वह कभी न कहेगा कि आप बहुत बार आते हैं। इसके विपरीत, वह तो आपको इसलिए डाँटेगा कि आप उसके पास पर्याप्त बार नहीं आते।
एक शब्द है जिसे मैंने अभी छोड़ दिया था, क्योंकि मैं उसे इस विषय पर अपनी अन्तिम टिप्पणी के लिए रखना चाहता था, “प्रार्थना और बिनती के द्वारा धन्यवाद के साथ तुम्हारे निवेदन परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ।” अब इसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ यह है कि जो प्रार्थना चिन्ता को मार डालती है, वह ऐसी प्रार्थना है जो प्रसन्नता से, आनन्द से, धन्यवाद के साथ माँगती है। “हे प्रभु, मैं कंगाल हूँ। मुझे अपनी कंगाली के लिए तुझे धन्य कहने दे, और फिर, हे प्रभु, क्या तू मेरी सब घटियाँ पूरी न करेगा?” प्रार्थना करने की यही रीति है। “हे प्रभु, मैं बीमार हूँ। मैं इस क्लेश के लिए तुझे धन्य कहता हूँ, क्योंकि मुझे निश्चय है कि इसमें मेरे लिए कोई भली बात छिपी है।
अब कृपा करके मुझे चंगा कर, मैं तुझसे विनती करता हूँ!” “हे प्रभु, मैं बड़े संकट में हूँ, परन्तु मैं इस संकट के लिए तेरी स्तुति करता हूँ, क्योंकि मैं जानता हूँ कि इसमें एक आशीष है, चाहे उसका लिफ़ाफ़ा काली किनारी वाला हो; और फिर, हे प्रभु, मेरे संकट से पार होने में मेरी सहायता कर!” यही वह प्रार्थना है जो चिन्ता को मार डालती है, “धन्यवाद के साथ बिनती।” इन दोनों वस्तुओं को अच्छी तरह मिलाइए। एक ड्राम—नहीं, दो ड्राम प्रार्थना, प्रार्थना और बिनती, फिर एक ड्राम धन्यवाद। इन्हें अच्छी तरह घोटकर मिलाइए, और ये चिन्ता का एक धन्य उपचार बन जाएँगे। प्रभु हमें औषधि बनानेवाले की इस पवित्र कला का अभ्यास करना सिखाए!
III. मैं इस तीसरी बात के साथ समाप्त करता हूँ, इस प्रार्थना का मधुर परिणाम, “तब परमेश्वर की शान्ति,
जो समझ से बिलकुल परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी।” यदि आप बुरी व्याकुलता में पड़े रहने के बदले इस रीति से प्रार्थना कर सकें, तो परिणाम यह होगा कि एक असाधारण शान्ति चुपके से आपके हृदय और मन पर छा जाएगी। असाधारण, क्योंकि वह “परमेश्वर की शान्ति” होगी। परमेश्वर की शान्ति क्या है? अनन्त आनन्दमय परमेश्वर की अविचलित प्रशान्ति, पूर्ण रूप से सन्तुष्ट परमेश्वर की अनन्त स्थिरता। यही आपके हृदय और मन पर अधिकार करेगी।
ध्यान दीजिए कि पौलुस इसका वर्णन कैसे करता है, “परमेश्वर की शान्ति, जो समझ से बिलकुल परे है।” दूसरे लोग इसे नहीं समझेंगे। वे यह समझ न पाएँगे कि आप इतने शान्त कैसे रह सकते हैं। इससे भी बढ़कर, आप उन्हें बता भी न सकेंगे, क्योंकि यदि वह सारी समझ से परे है, तो निश्चय ही वह सारे वर्णन से भी परे है। और इससे भी अधिक अद्भुत बात यह है कि आप स्वयं भी इसे न समझ सकेंगे। वह ऐसी शान्ति होगी कि आपके लिए अथाह और अपरिमित होगी। जब शहीदों में से एक मसीह के लिए जलाया जानेवाला था, तो उसने उस न्यायाधीश से, जो चिता में आग लगाने की आज्ञा दे रहा था, कहा, “क्या आप आकर मेरे हृदय पर अपना हाथ रखेंगे?” न्यायाधीश ने ऐसा ही किया। “क्या यह तेज़ धड़क रहा है?” शहीद ने पूछा। “क्या मुझमें भय का कोई चिह्न दिखाई देता है?” “नहीं,” न्यायाधीश ने कहा। “अब अपना हाथ अपने ही हृदय पर रखिए और देखिए कि क्या आप मुझसे अधिक उत्तेजित नहीं हैं।” परमेश्वर के उस जन के विषय में सोचिए, जो उस सुबह, जब उसे जलाया जाना था, ऐसी गहरी नींद में सो रहा था कि उसे जगाने के लिए उन्हें उसे झकझोरना पड़ा; उसे जलाए जाने के लिए उठना पड़ा।
और फिर भी, यह जानते हुए कि ऐसा ही होनेवाला है, उसे परमेश्वर पर ऐसा भरोसा था कि वह चैन से सोया। यही है “परमेश्वर की शान्ति, जो समझ से बिलकुल परे है।” डायोक्लीशियन के उन पुराने सतावों में, जब शहीद अखाड़े में जंगली पशुओं द्वारा फाड़े जाने के लिए लाए जाते थे, जब एक को लाल-तप्त लोहे की कुर्सी पर बैठाया जाता था, दूसरे पर शहद पोत दिया जाता था कि ततैये और मधुमक्खियाँ उसे डंक मार-मारकर मार डालें, तब भी वे कभी पीछे न हटे।
उस वीर पुरुष के विषय में सोचिए जिसे भूनकर मार डालने के लिए लोहे की जाली पर रखा गया था, और जिसने अपने सतानेवालों से कहा, “एक ओर से तो तुमने मुझे पका दिया। अब मुझे दूसरी ओर पलट दो।” ऐसी परिस्थितियों में यह शान्ति क्यों? यह थी “परमेश्वर की शान्ति, जो समझ से बिलकुल परे है।” आजकल हमें वैसा दुःख नहीं उठाना पड़ता, परन्तु यदि कभी वैसी कोई बात आ पड़े, तो यह अद्भुत है कि एक मसीही कैसी शान्ति का आनन्द लेता है।
जब एक बड़ी आँधी आई थी, तब स्वामी ने नाव के अगले भाग में खड़े होकर हवाओं से कहा, “थम जा,” और, जैसा हम पढ़ते हैं, “बड़ा चैन हो गया।” क्या आपने कभी इसका अनुभव किया है? यदि आपने हर बात में अपने निवेदन परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित करने की यह पवित्र कला सीख ली है, तो आज रात आप इसका अनुभव कर रहे हैं, और परमेश्वर की शान्ति, जो समझ से बिलकुल परे है, आपके हृदयों और विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रख रही है।
यह धन्य शान्ति हमारे हृदयों और विचारों की रखवाली करती है—यह पहरा देनेवाली शान्ति है। यूनानी शब्द से एक गढ़ की सेना (छावनी) का भाव निकलता है। क्या यह विचित्र बात नहीं कि यहाँ एक सैनिक शब्द का प्रयोग किया गया है, और यह शान्ति ही है जो हृदय और मन के लिए पहरेदार का काम करती है? यह परमेश्वर की शान्ति है जो परमेश्वर की सन्तान की रक्षा करनेवाली है—विचित्र, परन्तु सुन्दर उपमा! मैंने सुना है कि भय मसीही का गृह-प्रबन्धक है। अच्छा, भय कुत्तों को बाहर रखने के लिए एक अच्छा पहरेदार हो सकता है, परन्तु उसकी अलमारी भरी हुई नहीं होती। परन्तु शान्ति, यद्यपि वह निर्बलता-सी दिखती है, बल का सार है; और वह पहरा देने के साथ-साथ हमें खिलाती भी है और हमारी सब आवश्यकताएँ पूरी करती है।
यह ऐसी शान्ति भी है जो हमें यीशु से जोड़ती है, “परमेश्वर की शान्ति, जो समझ से बिलकुल परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को सुरक्षित रखेगी।” अर्थात्, आपके स्नेह और आपके विचार, आपकी इच्छाएँ और आपकी बुद्धि; आपका हृदय, कि वह भय न करे; आपका मन, कि वह किसी प्रकार की उलझन न जाने, “परमेश्वर की शान्ति तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी।” यह सब “मसीह यीशु में” है, और इसलिए यह हमारे लिए दुगुना मधुर और बहुमूल्य है।
हे मेरे प्रिय श्रोताओ, आप में से कुछ लोग गुरुवार की रातों को यहाँ आते हैं और परमेश्वर की इस शान्ति के विषय में कुछ भी नहीं जानते; और शायद आप अचम्भा करते हैं कि हम मसीही लोग अपने धर्म को लेकर इतना हो-हल्ला क्यों करते हैं। आह, यदि आप जानते, तो शायद आप हमसे भी अधिक उसे लेकर उत्साह दिखाते; क्योंकि यदि परलोक न भी होता—और हम जानते हैं कि परलोक है—तौभी प्रार्थना में परमेश्वर के पास जाने और अपनी सारी चिन्ता उस पर डाल देने की धन्य आदत हमें इस जीवन में भी अत्यन्त आनन्द से जीने में सहायता देती है।
हम धर्मनिरपेक्ष भौतिकवाद (सेक्युलरिज़्म) में विश्वास नहीं करते, परन्तु यदि करते भी, तो सांसारिक जीवन के लिए परमेश्वर के लिए जीने और परमेश्वर में जीने जैसी कोई तैयारी न होती। यदि आपका कोई नकली ईश्वर है, और आप केवल गिरजाघर या चैपल जाते हैं, और अपनी प्रार्थना-पुस्तक या अपनी भजन-पुस्तक साथ ले जाते हैं, और इसलिए समझते हैं कि आप मसीही हैं, तो आप अपने आप को धोखा दे रहे हैं। परन्तु यदि आपका एक जीवित परमेश्वर है, और उसके साथ आपकी सच्ची संगति है, और आप निरन्तर, एक आदत के रूप में, सर्वशक्तिमान के पंखों की छाया तले रहते हैं, तो आप ऐसी शान्ति का आनन्द लेंगे जो दूसरों को चकित करेगी और आपको स्वयं भी अचम्भित करेगी, अर्थात् “परमेश्वर की शान्ति, जो समझ से बिलकुल परे है।”
मेरे प्रिय श्रोताओ, मसीह के निमित्त परमेश्वर यह आपको प्रदान करे! आमीन।
सी. एच. स्पर्जन द्वारा व्याख्या
फिलिप्पियों 4 पद 1. इसलिए हे मेरे प्रिय भाइयो, जिनमें मेरा जी लगा रहता है, जो मेरे आनन्द और मुकुट हो, हे प्रिय भाइयो, प्रभु में इसी प्रकार स्थिर रहो। आप जानते हैं कि फिलिप्पी की कलीसिया प्रेरित के हृदय को बहुत प्रिय थी। वह उस समय को कभी न भूल सकता था जब उसने और सीलास ने नदी के किनारे उन स्त्रियों के साथ प्रार्थना की थी, और बाद में बन्दीगृह में प्रार्थना की और परमेश्वर के भजन गाए, जब बन्धुए उनकी सुन रहे थे। लुदिया और उसका घराना, और फिलिप्पी का दारोगा, फिलिप्पी में पौलुस के काम के पहले फलों में से थे; और उसके तथा उस स्थान की कलीसिया के सदस्यों के बीच सदा बहुत घनिष्ठ प्रेम बना रहा। वे उसकी चिन्ता करते थे और वह उनकी चिन्ता करता था।
इसी एक पद में वह दो बार उन्हें अपने “प्रिय” कहता है। वह कहता है कि उसका जी उनमें लगा रहता था, वह आकर उन्हें आमने-सामने देखने को तरसता था, वह तरसता था कि वे प्रभु में सबसे ऊँचे दर्जे तक आनन्दित रहें। इसलिए वह कहता है, “हे मेरे प्रिय भाइयो, जिनमें मेरा जी लगा रहता है, जो मेरे आनन्द।” उन्हें अपनी आत्मिक सन्तान के रूप में सोचना भी उसके लिए ऐसा आनन्द था, और विशेषकर यह देखना कि वे कैसी भक्ति और उदारता के साथ चलते थे। हाँ, और वह उन्हें अपना “मुकुट” कहता है—एक माला जो उसने आत्मिक मल्लयुद्ध में जीती थी। मसीही के द्वारा मन फिरानेवाले लोग यहाँ उसका आनन्द हैं, और महिमा में वे सदा के लिए उसका मुकुट होंगे। पौलुस ने इन फिलिप्पियों से कहा, “प्रभु में स्थिर रहो।” स्थिर रहना बहुत सरल बात दिखती है, परन्तु जो ऐसा करने का प्रयत्न करते हैं वे जानते हैं कि यह कितना कठिन काम है। 2. मैं यूओदिया को भी समझाता हूँ, और सुन्तुखे को भी, कि वे प्रभु में एक मन रहें।
केवल दो स्त्रियाँ जिनकी आपस में अनबन हो गई थी, परन्तु प्रेरित पूर्ण एकता के लिए इतना उत्सुक है कि वह उनमें से हर एक के लिए अलग से “समझाता हूँ” लिखता है। वह यह नहीं कहता कि कौन सही थी और कौन गलत, परन्तु वह चाहता है कि वे “प्रभु में एक मन रहें।” छोटे-छोटे मतभेद, चाहे कलीसिया के अप्रसिद्ध सदस्यों के बीच ही क्यों न हों, परमेश्वर के आत्मा के काम में बाधा डाल सकते हैं। पवित्र आत्मा कबूतर के समान है, और कबूतरों को शान्त स्थान प्रिय होते हैं; वे वहाँ नहीं आते जहाँ शोर और झगड़ा होता है।
आह, आइए हम एक दूसरे के प्रति प्रेम बढ़ाएँ; और यदि किसी समय किसी बात में हमारे बीच असहमति हुई हो, तो आइए हम सोचें कि हम आज रात पौलुस को यह कहते सुन रहे हैं, “मैं यूओदिया को भी समझाता हूँ, और सुन्तुखे को भी, कि वे प्रभु में एक मन रहें।” मेरी बहनो, मेल कर लो। मेरे भाइयो, मेल कर लो। झगड़ा चाहे जो भी हो, उसे समाप्त करो और “प्रभु में एक मन रहो।” एक ही बहुमूल्य लहू से मोल लिए गए, एक ही सिद्ध धार्मिकता का वस्त्र पहने हुए, एक ही स्वर्ग के मार्ग पर चलते हुए, “प्रभु में एक मन रहो।”
3. और हे सच्चे सहकर्मी, मैं तुझसे भी विनती करता हूँ कि तू उन स्त्रियों की सहायता कर, क्योंकि उन्होंने मेरे साथ सुसमाचार फैलाने में, क्लेमेंस और मेरे उन और सहकर्मियों समेत परिश्रम किया, जिनके नाम जीवन की पुस्तक में लिखे हुए हैं। हम नहीं जानते कि यह “सच्चा सहकर्मी” (एक ही जूए का साथी) कौन था। बहुत सम्भव है कि वह इपफ्रुदीतुस था, जो यह पत्री फिलिप्पी ले गया। वह जो भी रहा हो, वह कोई ऐसा व्यक्ति था जिसने पौलुस के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया था। यदि दो बैल एक ही जूआ उठाएँ और फिर भी उनमें मेल न हो, तो वे एक दूसरे के लिए बड़ी असुविधा पैदा करते हैं।
यदि एक लेटना चाहे और दूसरा खड़ा होना चाहे, या यदि एक दूसरे से तेज़ चले, तो जूआ दुगुना कष्टदायक हो जाता है। पौलुस यहाँ किसी के विषय में कहता है कि वह उसका “सच्चा सहकर्मी” रहा है, और वह उससे कहता है, “उन स्त्रियों की सहायता कर, क्योंकि उन्होंने मेरे साथ सुसमाचार फैलाने में परिश्रम किया।” प्रभु यीशु मसीह की सेवा में स्त्रियों ने सदा कैसा प्रमुख स्थान पाया है, और यहाँ पौलुस उनके विषय में कहता है कि उन्होंने सुसमाचार में उसके साथ परिश्रम किया! निश्चय ही लुदिया इनमें से एक रही होगी। “क्लेमेंस और मेरे उन और सहकर्मियों समेत, जिनके नाम जीवन की पुस्तक में लिखे हुए हैं।”
कुछ विद्वान टीकाकारों के अनुसार, किसी मनुष्य का नाम कुछ समय के लिए जीवन की पुस्तक में हो सकता है, परन्तु वह मिटाया भी जा सकता है। यदि उनकी शिक्षा सच हो, तो वह पुस्तक बहुत कटी-पिटी और धब्बों से भरी होगी। मैं परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ कि मैं ऐसी किसी पुस्तक में विश्वास नहीं करता। यदि प्रभु यीशु मसीह ने मेरा नाम जीवन की पुस्तक में, छुड़ाए हुए लोगों के महान पारिवारिक रजिस्टर में, लिख दिया है, तो मैं नरक के सब शैतानों को चुनौती देता हूँ कि वे उसे कभी मिटवा दें। 4. प्रभु में सदा आनन्दित रहो; मैं फिर कहता हूँ, आनन्दित रहो।
यदि आप कभी भी प्रभु में आनन्दित होते हैं, तो आप सदा प्रभु में आनन्दित रह सकते हैं, क्योंकि वह सदा एक-सा है, और सदा अनुग्रहकारी है। परमेश्वर में आनन्दित होने का जितना कारण एक समय है उतना ही दूसरे समय भी है, क्योंकि वह कभी नहीं बदलता। 5. तुम्हारी कोमलता सब मनुष्यों पर प्रगट हो। अंग्रेज़ी बाइबल में यहाँ प्रयुक्त शब्द “moderation” (संयम) यूनानी में एक ऐसा शब्द है जिसका अंग्रेज़ी में अनुवाद करना बहुत कठिन है। इसका अर्थ वह “संयम” नहीं है जिस अर्थ में कुछ लोग इस शब्द का प्रयोग करते हैं, क्योंकि वे, जैसा मैं सोचता हूँ, उसे लगभग एक शापित शब्द बना देते हैं। “तुम्हारा संयम”—तुम्हारी कोमलता, तुम्हारी तत्परता, तुम्हारी सहनशीलता—“सब मनुष्यों पर प्रगट हो।” इसका यही अर्थ है।
अपने अधिकारों को बहुत दूर तक मत खींचिए; जो आप उचित रूप से माँग सकते हैं उससे कुछ पहले ही रुक जाइए; और जब किसी समय आपको लगे कि आपका स्वभाव थोड़ा उग्र हो रहा है, तो अपने आप को रोकिए, अपने आप को थामे रखिए, सहिए और सहते रहिए। अपने अधिकारों की रक्षा करने में उतनी दूर मत जाइए जितनी दूर आप जा सकते हैं, और न उतनी दूर जितनी दूर कुछ लोग सोचते हैं कि आपको जाना चाहिए। अपनी कोमलता, अपनी झुक जाने की तत्परता, सब मनुष्यों पर प्रगट होने दीजिए। 5. प्रभु निकट है।
मसीह आ रहा है; आप क्यों व्याकुल होते हैं? प्रभु आपकी सहायता करने के लिए आपके निकट है; आप इतने अधिक चिन्तित क्यों हैं? आप वर्तमान की इस अस्थायी परीक्षा से इतने बह क्यों जाते हैं? “प्रभु निकट है।” 6. किसी भी बात की चिन्ता मत करो; किसी भी बात की व्याकुल चिन्ता मत करो। फ़ेबर के साथ गाइए, “हे धन्य प्रभु, मुझे कोई चिन्ता नहीं, क्योंकि मेरी सब चिन्ताएँ तेरी हैं।”
6-8. परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और बिनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ। तब परमेश्वर की शान्ति, जो समझ से बिलकुल परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी। निदान, हे भाइयो, जो-जो बातें सत्य हैं, और जो-जो बातें आदरणीय हैं, और जो-जो बातें उचित हैं, और जो-जो बातें पवित्र हैं, और जो-जो बातें सुहावनी हैं, और जो-जो बातें मनभावनी हैं; निदान, जो-जो सद्गुण और प्रशंसा की बातें हैं, उन्हीं पर ध्यान लगाया करो।
इस प्रकार की हर बात से आपका सम्बन्ध है, इसलिए जहाँ तक हो सके उसकी सहायता कीजिए। हर उस कार्य के पक्ष में रहिए जिसका वर्णन इस प्रकार किया जा सके। यदि वह सत्य, सीधाई, श्रद्धा, धर्म, शुद्धता, पवित्रता का समर्थन करता है, तो आप उसी पक्ष में रहिए। यदि कोई बात इसके विपरीत है, तो उससे कोई सम्बन्ध मत रखिए; परन्तु यदि संसार में कोई भी ऐसा आन्दोलन है जो उन बातों को आगे बढ़ाने में सहायता करे जो सत्य, आदरणीय, उचित, पवित्र, सुहावनी और मनभावनी हैं, तो “उन्हीं पर ध्यान लगाया करो,” और उन पर ऐसा ध्यान लगाइए कि मनुष्यों के बेटे-बेटियों के बीच उनका प्रभाव बढ़े।
9. जो बातें तुमने मुझसे सीखीं, और ग्रहण कीं, और सुनीं, और मुझमें देखीं, उन्हीं का पालन किया करो: यह अच्छी बात है जब कोई प्रचारक इस प्रकार बोल सके, जब उसे यह न कहना पड़े, “जैसा मैं कहता हूँ वैसा करो, जैसा मैं करता हूँ वैसा नहीं,” परन्तु जब वह प्रेरित के समान कह सके, “जो बातें तुमने मुझसे सीखीं, और ग्रहण कीं, और सुनीं, और मुझमें देखीं, उन्हीं का पालन किया करो।” 9. तब परमेश्वर जो शान्ति का सोता है तुम्हारे साथ रहेगा।
शान्ति का परमेश्वर सदा उनके साथ रहता है जो उसके प्रिय पुत्र को ग्रहण करते हैं और जो उसके सुसमाचार की सहायता करते हैं। यह सच्चे विश्वासियों के विशेषाधिकारों में से एक है कि शान्ति का परमेश्वर निरन्तर उनके साथ रहेगा। 10. मैं प्रभु में बहुत आनन्दित हूँ कि अब इतने दिनों के बाद तुम्हारा विचार मेरे विषय में फिर जागृत हुआ है; निश्चय तुम्हें आरम्भ में भी इसका विचार था, पर तुम्हें अवसर न मिला। पौलुस रोम में बन्दी था, और इन फिलिप्पियों ने एक चन्दा इकट्ठा किया था। और उन्होंने प्रेरित की कंगाली में उसकी सहायता के लिए इपफ्रुदीतुस के हाथ उसे भेजा था; इसलिए उसने उनसे कहा, “तुमने पहले भी मेरी चिन्ता की थी; परन्तु कुछ समय तक तुम्हें मेरी सहायता करने का अवसर न मिला, और अब तुमने फिर से मेरे विषय में सोचा है; इसलिए मैं प्रभु में बहुत आनन्दित हूँ।” 11. यह नहीं कि मैं अपनी घटी के कारण यह कहता हूँ; क्योंकि मैंने यह सीखा है कि जिस दशा में हूँ, उसी में सन्तोष करूँ।
क्या यह विद्या का एक उत्तम नमूना नहीं है? पौलुस एक विद्वान पुरुष था, और यदि आपने यह पाठ सीख लिया है तो आप भी विद्वान हैं। हो सकता है कि आप अपने नाम के आगे D.D. या LL.D. न लगा सकें, परन्तु यदि आप कह सकते हैं, “मैंने यह सीखा है कि जिस दशा में हूँ, उसी में सन्तोष करूँ,” तो आप एक विद्वान पुरुष हैं। 12. मैं दीन होना भी जानता हूँ और बढ़ना भी जानता हूँ: ये सीखने की दो महान बातें हैं। कुछ लोग ऐसे हैं जो पहली बात जानते हैं, परन्तु दूसरी नहीं जानते। मैं परमेश्वर की कई सन्तानों को जानता हूँ जो जब दीन दशा में थे तब भक्ति में बड़े प्रमुख दिखाई देते थे, परन्तु धनी हो जाने के बाद वे किसी काम के न रहे। वे बढ़ना नहीं जानते थे; वे घमण्डी हो गए और अपने स्थान के लिए बहुत बड़े बन बैठे। प्रेरित के साथ ऐसा नहीं था, क्योंकि वह सच्चाई से कह सकता था, “मैं दीन होना भी जानता हूँ और बढ़ना भी जानता हूँ।” 12. हर एक बात और सब दशाओं में मैंने तृप्त होना, भूखा रहना, और बढ़ना-घटना सीखा है।
क्या वह कलाओं का सच्चा स्वामी (मास्टर ऑफ़ आर्ट्स) न था? उसने बिना कुड़कुड़ाए भूखा रहने की कला में, बिना घमण्ड किए तृप्त रहने की कला में, बिना अधीरता के घटी सहने की कला में, और सांसारिक वस्तुओं पर मन लगाए बिना बहुतायत में रहने की कला में निपुणता पाई थी। वह सचमुच सबसे ऊँचे दर्जे का मास्टर ऑफ़ आर्ट्स था। 13. मैं सब कुछ कर सकता हूँ— यह डींग मारने जैसा लगता है, है न? वाक्य पूरा कीजिए। 14. मसीह के द्वारा, जो मुझे सामर्थ देता है।
यहाँ कोई अनुचित घमण्ड नहीं है, क्योंकि पौलुस मसीह की महान सामर्थ के द्वारा सब कुछ कर सकता था। किसी ने ठीक ही कहा है कि स्वर्गदूत बल में श्रेष्ठ हैं, परन्तु पवित्र लोग अपनी निर्बलता में श्रेष्ठ हैं। जब हम सबसे अधिक निर्बल होते हैं, और मसीह हमें सामर्थ देता है, तभी सबसे उत्तम सद्गुण उत्पन्न होते हैं। 14-17. तौभी तुमने भला किया कि मेरे क्लेश में मेरे सहभागी हुए। और हे फिलिप्पियो, तुम आप भी जानते हो कि सुसमाचार प्रचार के आरम्भ में, जब मैंने मकिदुनिया से कूच किया, तब तुम्हें छोड़ और किसी कलीसिया ने लेने-देने के विषय में मेरी सहायता नहीं की। इसी प्रकार जब मैं थिस्सलुनीके में था, तब भी तुमने मेरी घटी पूरी करने के लिए एक बार क्या, वरन् दो बार कुछ भेजा था। यह नहीं कि मैं दान चाहता हूँ, परन्तु मैं ऐसा फल चाहता हूँ जो तुम्हारे लाभ के लिए बढ़ता जाए।
उनकी उदारता परमेश्वर की पुस्तक में उनके खाते में लिख दी गई। 18-19. मेरे पास सब कुछ है, वरन् बहुतायत से भी है: जो वस्तुएँ तुमने इपफ्रुदीतुस के हाथ से भेजी थीं, उन्हें पाकर मैं तृप्त हो गया हूँ; वह तो सुगन्ध और ग्रहण करने के योग्य बलिदान है, जो परमेश्वर को भाता है। और मेरा परमेश्वर भी अपने उस धन के अनुसार जो महिमा सहित मसीह यीशु में है, तुम्हारी हर एक घटी को पूरी करेगा। पौलुस का परमेश्वर ही था जिसने फिलिप्पियों की देखभाल की, और पौलुस का परमेश्वर ही है जो आपकी और मेरी देखभाल करेगा। पौलुस कहता है, “मेरा परमेश्वर तुम्हारी हर एक घटी को पूरी करेगा—इस प्रकार नहीं जैसे तुमने अपनी कंगाली में से मेरी घटी पूरी की, परन्तु अपने उस धन के अनुसार जो महिमा सहित मसीह यीशु में है।” क्या आप में से कोई इस अथाह पाठ का माप जानता है, “अपने उस धन के अनुसार जो महिमा सहित मसीह यीशु में है”? यह मत सोचिए कि आप कभी परमेश्वर के महिमामय धन को समाप्त कर देंगे, या सर्वपर्याप्तता के राजकोष को खाली कर देंगे; ऐसा हो ही नहीं सकता।
20. हमारे परमेश्वर और पिता की महिमा युगानुयुग होती रहे। आमीन। वह हमें आशीष देता है, आइए हम उसे धन्य कहें। वह अपने महिमामय धन के अनुसार हमारी हर एक घटी पूरी करता है; आइए हम युगानुयुग उसकी महिमा का गुणगान करें। 21. हर एक पवित्र जन को जो मसीह यीशु में है नमस्कार कहो। उससे हाथ मिलाइए। कहिए, “मेरे भाई, आप कैसे हैं? मैं आपकी भलाई चाहता हूँ।” ऐसे हार्दिक नमस्कार हर एक मसीही सभा में साधारण बात होने चाहिए। मैं सदा उस अद्भुत प्रतिष्ठा-प्रेम की निन्दा करता हूँ जो कुछ आराधना-स्थलों में पाया जाता है, जहाँ कोई किसी को नहीं जानता। वे इतने प्रतिष्ठित हैं कि अपने भाइयों से परिचय नहीं करते। यदि आप मसीह यीशु में हैं, तो एक दूसरे को जानिए। “हर एक पवित्र जन को जो मसीह यीशु में है नमस्कार कहो।” 21-22. जो भाई मेरे साथ हैं, तुम्हें नमस्कार कहते हैं। सब पवित्र लोग, विशेष करके जो कैसर के घराने के हैं, तुमको नमस्कार कहते हैं।
मैं समझता हूँ कि इनमें से अधिकांश सम्राट के घराने में केवल दास थे। शायद उनमें एक या दो ऊँचे वर्ग के भी रहे हों, परन्तु सब सम्भावना यही है कि सुसमाचार पहले रोमी महल के दासों तक पहुँचा—उस दुराचार के नरक-धाम में, जहाँ वासना और क्रूरता भरी पड़ी थी। वहाँ भी पवित्र लोग थे; और परमेश्वर के कुछ रत्न अब भी घूरों पर पड़े हुए हैं। 23. हमारे प्रभु यीशु मसीह का अनुग्रह तुम सब के साथ रहे। आमीन।
