अध्याय 10 · 1 पतरस 3:7 · मसीही जीवन

प्रार्थना में बाधाएँ

चार्ल्स एच. स्पर्जन · उपदेश 1192 · प्रभु के दिन की प्रातः, 13 सितम्बर 1874

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    यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

    जिस से तुम्हारी प्रार्थनाएँ रुक न जाएँ।

    मूल उपदेश: प्रार्थना में बाधाएँ, सं. 1192, मेट्रोपॉलिटन टैबरनेकल पुल्पिट, खण्ड 20। मेट्रोपॉलिटन टैबरनेकल, न्यूइंगटन में प्रचार किया गया। नीचे दिया गया पाठ स्पर्जन का सार्वजनिक-अधिकार (पब्लिक डोमेन) वाला मूल उपदेश-पाठ है, न कि 1993 का संक्षिप्त संकलन।

    बहुत-से लोगों के लिए इस प्रवचन का कोई विशेष सम्बन्ध न होगा, क्योंकि वे प्रार्थना करते ही नहीं। मुझे यह भी डर है कि कुछ और लोग ऐसे हैं जिनकी प्रार्थनाएँ इतनी निकम्मी हैं कि यदि वे रुक भी जाएँ तो कोई विशेष हानि न होगी। यह भी सम्भव है कि उन्हें छोड़ने पर विवश होना ही उन्हें अपनी स्व-धार्मिकता की सुस्ती से जगा दे। केवल औपचारिकता में घुटने टेक देना, लापरवाही से या आधे मन से भक्ति की कोई रीति पूरी कर देना, परमेश्वर की आराधना करना नहीं, बल्कि उसका उपहास करना है।

    यह सोचना एक भयानक विषय होगा कि प्रभु दिन-प्रतिदिन कितनी व्यर्थ दोहराई गई बातों और हृदयहीन रटी-रटाई प्रार्थनाओं से थक जाता है। फिर भी, जो लोग सचमुच प्रार्थना नहीं करते, उन्हें मैं अत्यन्त गम्भीरता से स्मरण दिलाना चाहता हूँ कि परमेश्वर का क्रोध उन पर बना रहता है। जो कभी दया की खोज नहीं करता, उसने निश्चय ही उसे कभी पाया भी नहीं। विवेक यह स्वीकार करता है कि परमेश्वर के लिए यह न्यायसंगत बात है कि जो माँगना ही नहीं चाहते, उन्हें वह न दे। हम से कम से कम इतनी आशा तो की ही जा सकती है कि जिन उपकारों की हमें आवश्यकता है, उन्हें हम नम्रता से माँगें; और यदि हम ऐसा करने से इन्कार करें, तो यह उचित ही है कि जब तक मनुष्य खटखटाने से इन्कार करते रहें, तब तक अनुग्रह का द्वार बन्द रहे।

    प्रार्थना कोई कठिन माँग नहीं है; यह सृष्टिकर्ता के प्रति सृष्टि का स्वाभाविक कर्तव्य है, वह सबसे सरल आदर है जो मनुष्य का अभाव ईश्वरीय उदारता को अर्पित कर सकता है; और जो इसे देने से इन्कार करते हैं, वे भली-भाँति आशा कर सकते हैं कि किसी दिन, जब वे घोर संकट में पड़कर अपनी मूर्खता पर विलाप करने लगेंगे, तब वे अपने अपमानित परमेश्वर की यह वाणी सुनेंगे: “मैं ने तो पुकारा परन्तु तुम ने इन्कार किया; मैं ने हाथ फैलाया, परन्तु किसी ने ध्यान न दिया; इसलिये मैं भी तुम्हारी विपत्ति पर हँसूँगा, और जब तुम पर भय आ पड़ेगा, तब ठट्ठा करूँगा।”

    एक पुरानी कथा बताती है कि एक रानी ने अपने एक प्रिय दरबारी को एक अँगूठी दी, जिसे वह उस समय उसके पास भेज सकता था जब वह उसकी अप्रसन्नता का पात्र बन जाए; और उसने प्रतिज्ञा की कि उस अँगूठी को देखते ही उसे फिर से कृपा प्राप्त हो जाएगी। वह अँगूठी, यद्यपि उसकी बहुत समय तक प्रतीक्षा की गई, कभी दिखाई नहीं गई; और इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं थी कि अपराधी को हठपूर्वक विद्रोही समझकर उसे मृत्युदण्ड दे दिया गया।

    यदि कोई पापी यीशु के उस नाम की दुहाई न दे जिसके साथ क्षमा की प्रतिज्ञा जुड़ी हुई है, यदि वह पश्चाताप भरी प्रार्थना में अपने घुटने न टेके और परमेश्वर के हाथ से क्षमा न माँगे, तो किसी को आश्चर्य न होगा कि वह अपनी मूर्खता के कारण नाश हो जाता है। जब प्रभु सब प्रार्थनाहीन प्राणों को सदा के लिए दूर कर देगा, तब कोई भी उस पर अत्यधिक कठोरता का दोष न लगा सकेगा। हे आप लोगो, जो कभी प्रार्थना नहीं करते, मैं आपके लिए काँपता हूँ! काश, परमेश्वर करे कि आप स्वयं अपने लिए काँपें, क्योंकि इसका पर्याप्त कारण है।

    जो प्रार्थना करते हैं, उनके लिए प्रार्थना एक अत्यन्त बहुमूल्य वस्तु है, क्योंकि यही वह नहर है जिसके द्वारा अनमोल आशीषें उन तक पहुँचती हैं, वह खिड़की है जिसके द्वारा एक अनुग्रहकारी परमेश्वर उनकी आवश्यकताएँ पूरी करता है। विश्वासियों के लिए प्रार्थना प्राण को धनी बनाने का महान साधन है—यह वह जहाज़ है जो स्वर्ग के साथ व्यापार करता है, और स्वर्गीय देश से ऐसे खज़ाने लादकर घर लौटता है जिनका मूल्य उस धन से कहीं अधिक है जो कभी कोई स्पेनी जहाज़ सोने के देश से लाया हो।

    वास्तव में, सच्चे विश्वासियों के लिए प्रार्थना इतनी अमूल्य है कि पतरस प्रार्थना में बाधा पड़ने के खतरे को इस बात का कारण बनाता है कि वे अपने वैवाहिक सम्बन्धों और घरेलू कार्यों में बड़ी बुद्धिमानी से व्यवहार करें। वह पति से कहता है कि वह अपनी पत्नी के साथ “बुद्धिमानी से” “जीवन निर्वाह करे,” और उसका प्रेमपूर्ण आदर करे, ऐसा न हो कि उनकी संयुक्त प्रार्थनाएँ रुक जाएँ। जो कुछ भी प्रार्थना में बाधा डालता है, वह अवश्य ही गलत है। यदि परिवार का कोई प्रबन्ध, या प्रबन्ध का अभाव, प्रार्थना में हमारी सामर्थ को हानि पहुँचा रहा है, तो उसमें परिवर्तन की तुरन्त आवश्यकता है। पति और पत्नी को, अनुग्रह के संगी वारिस होने के नाते, एक साथ प्रार्थना करनी चाहिए, और जो भी स्वभाव या आदत इसमें बाधा डालती है, वह बुरी है। यह पद मसीहियों को पारिवारिक प्रार्थना में परिश्रमी बनने के लिए उकसाने में अत्यन्त उपयुक्त रीति से प्रयोग किया जा सकता है; और यद्यपि इस अवसर पर मैं इसे उस प्रकार प्रयोग नहीं करूँगा, तौभी इसका कारण यह नहीं कि मैं उस व्यवस्था को कम महत्त्व देता हूँ, क्योंकि मैं उसे इतना ऊँचा मानता हूँ कि मेरी कोई भी भाषा उसके मूल्य के विषय में मेरी भावना को ठीक-ठीक व्यक्त नहीं कर सकती। जिस घर में पारिवारिक वेदी नहीं है, वह ईश्वरीय आशीष की आशा शायद ही कर सकता है। यदि प्रभु हमारे निवास को अपने पंखों से न ढाँपे, तो हमारा परिवार बिना छत के घर के समान है। यदि हम प्रभु का मार्गदर्शन न खोजें, तो हमारा घराना बिना मार्गदर्शक माँझी के जहाज़ के समान है। और यदि भक्ति उसकी रखवाली न करे, तो हमारा परिवार बिना बाड़े के खेत के समान होगा।

    विश्वास का अंगीकार करनेवाले माता-पिता की बहुत-सी सन्तानों का दुःखद आचरण मुख्यतः पारिवारिक आराधना की उपेक्षा या उसकी ठंडक के कारण है। और मुझे सन्देह नहीं कि बहुत-से घरानों पर न्याय इसलिए आ पड़ा है कि उनमें प्रभु का उचित आदर नहीं किया जाता। एली का पाप आज भी एक जलन रखनेवाले परमेश्वर के दण्ड को अपने साथ लाता है। यिर्मयाह का वह वचन प्रार्थनाहीन परिवारों पर भारी पड़ता है: “जो कुल तेरा नाम नहीं लेते, उन पर अपनी जलजलाहट उण्डेल।” उसकी दया हर उस घर में आती है जहाँ साँझ और भोर को मन्नतें पूरी की जाती हैं; परन्तु जहाँ इनकी उपेक्षा होती है, वहाँ पाप का दोष लगता है।

    पुराने अच्छे प्यूरिटन समय में कहा जाता था कि यदि आप चीपसाइड की सड़क से होकर जाते, तो सुबह और शाम के एक निश्चित समय पर हर घर से भजन का स्वर सुनते, क्योंकि उस समय मसीही कहलानेवाले लोगों का कोई भी घर पारिवारिक प्रार्थना से रहित न था। मेरा विश्वास है कि पोपवाद के विरुद्ध प्रोटेस्टेंटवाद का गढ़ पारिवारिक आराधना है। उसे हटा दीजिए और बच्चों को परमेश्वर के भय में शिक्षा देना छोड़ दीजिए, तो आप इस देश को फिर से इस सिद्धान्त के लिए खोल देते हैं कि प्रार्थना सबसे अधिक पल्ली के गिरजाघर में ही ग्रहणयोग्य होती है, और इस प्रकार आप स्थानों की पवित्रता के विचार में जा फँसते हैं। फिर परिवार के पिता से, जिसे अपने घर में याजक होना चाहिए, याजकपद छीनकर आप एक अन्धविश्वासी याजकवर्ग के लिए द्वार खोल देते हैं, और शिक्षा का काम इन ढोंगियों के हाथ में छोड़ देने से अनगिनत बुराइयाँ घुस आती हैं।

    यदि हमारी कलीसियाओं में पारिवारिक प्रार्थना की उपेक्षा आम हो जाए, तो वह इंग्लैंड के लिए एक अन्धकारमय दिन होगा। जो बच्चे देखते हैं कि उनके माता-पिता घर में व्यवहार में प्रार्थनाहीन हैं, वे धर्म के प्रति उदासीन होकर बड़े होंगे, और बहुत-से मामलों में वे पूरी तरह संसारी बन जाएँगे, यदि बिल्कुल नास्तिक न भी बनें। यह ऐसा विषय है जिसके बारे में कलीसिया कोई खोजबीन भरी पूछताछ नहीं कर सकती। इसे घरानों के मुखियाओं की अच्छी समझ और मसीही आत्मा पर छोड़ना पड़ेगा, और इसलिए मैं और भी ज़ोर देकर बोलता हूँ और आपसे विनती करता हूँ कि आप अपने घर की बातों को ऐसा व्यवस्थित करें कि पारिवारिक प्रार्थना में बाधा न पड़े।

    परन्तु इस समय मैं इस पद को एक दूसरे उद्देश्य के लिए प्रयोग करूँगा, और इसे उन बाधाओं पर लागू करूँगा जो व्यक्तिगत प्रार्थना को घेरे रहती हैं। हमारी प्रार्थनाओं में इस प्रकार बाधा पड़ सकती है—पहला, हम प्रार्थना करने से रोके जा सकते हैं। दूसरा, प्रार्थना करते समय हमें बाधा हो सकती है। और तीसरा, हमारी प्रार्थनाओं को परमेश्वर के पास सफल होने से रोका जा सकता है।

    I. पहले, प्रार्थना करने से रोका जाना भी एक वास्तविक बात है, और यह इस प्रकार हो सकता है कि हम

    परमेश्वर की बातों के सम्बन्ध में सामान्य रूप से एक ढीली, गुनगुनी दशा में पड़ जाएँ। जब कोई मनुष्य ठंडा, उदासीन और लापरवाह हो जाता है, तो सबसे पहले जिन बातों को हानि पहुँचती है उनमें से एक उसकी भक्ति होगी। जब कोई रोगी घुलता जा रहा होता है, तो उसके फेफड़े और उसकी आवाज़ प्रभावित होते हैं; और इसी प्रकार जब कोई मसीही आत्मिक रूप से घुलता जा रहा होता है, तो प्रार्थना की साँस प्रभावित होती है, और गिड़गिड़ाकर बिनती की पुकार निर्बल हो जाती है। प्रार्थना आत्मिक सामर्थ का सच्चा मापदण्ड है। प्रार्थना को रोक रखना खतरनाक है और उसका झुकाव घातक है। आप निश्चय जानिए कि, सब बातों को मिलाकर देखें तो, जो आप अपने घुटनों पर हैं, वही आप वास्तव में अपने परमेश्वर के सामने हैं।

    प्रार्थना में फरीसी और चुंगी लेने वाला जैसे थे, वही उनकी आत्मिक दशा की सच्ची कसौटी थी। आप मनुष्यों के बीच एक सम्मानजनक प्रतिष्ठा बनाए रख सकते हैं, परन्तु मनुष्यों के द्वारा परखा जाना एक छोटी बात है, क्योंकि मनुष्य केवल ऊपरी सतह देखते हैं, जबकि प्रभु की आँखें प्राण की गहराइयों में झाँकती हैं। यदि वह देखता है कि आप प्रार्थनाहीन हैं, तो वह धार्मिक सभाओं में आपकी उपस्थिति को, या मन-परिवर्तन के विषय में आपके ऊँचे दावों को बहुत कम महत्त्व देता है।

    यदि आप सच्चे मन से प्रार्थना करनेवाले व्यक्ति हैं, और विशेषकर यदि प्रार्थना की आत्मा आप में है, कि गिड़गिड़ाकर बिनती करने के निश्चित समयों के अतिरिक्त भी आपका हृदय आदतन परमेश्वर से बातें करता रहता है, तो आपके साथ सब कुछ ठीक है। परन्तु यदि ऐसा नहीं है और आपकी प्रार्थनाएँ “रुक” गई हैं, तो आपके आत्मिक तन्त्र में कुछ ऐसा है जिसे बाहर निकालने की आवश्यकता है, या कुछ ऐसी कमी है जिसे तुरन्त पूरा किया जाना चाहिए। “सब से अधिक अपने मन की रक्षा कर; क्योंकि जीवन का मूल स्रोत वही है,” और जीवित प्रार्थनाएँ भी उसी स्रोत से निकलनेवाली धाराओं में से हैं। इसके बाद, बहुत अधिक काम होने के कारण भी प्रार्थनाओं में बाधा पड़ सकती है। इस युग में यह बहुत आम बात है। हो सकता है हमारे पास अपने लिए बहुत अधिक कारोबार हो। हमारे सन्तुष्ट पूर्वजों के शान्त दिन बीत गए हैं, और मनुष्य अपने ऊपर निरन्तर बढ़ता हुआ कठोर परिश्रम लाद लेते हैं। अपने और अपने परिवारों के लिए जितना आवश्यक है उतना कमाने से सन्तुष्ट न होकर, उन्हें उससे कहीं अधिक चाहिए जितना वे अपने लिए कभी भोग सकते हैं, या दूसरों के लिए लाभदायक रीति से प्रयोग कर सकते हैं।

    बुद्धि मानो कहती है कि चलने के लिए मनुष्य को एक लाठी काफ़ी है, परन्तु महत्त्वाकांक्षा तब तक सन्तुष्ट नहीं होती जब तक वह अपनी पीठ पर लाठियों का गट्ठर न लादे। पुरानी कहावत कहती थी, “जितना पर्याप्त है, वह दावत के बराबर है,” परन्तु आजकल न पर्याप्त और न दावत मनुष्यों को सन्तुष्ट करती है। सन्तुष्ट होने से पहले उन्हें इतना इकट्ठा करना पड़ता है जिससे हज़ारों परिवारों की दावत हो सके—हाँ, तब भी वे सन्तुष्ट नहीं होते।

    बहुत-से व्यक्ति जो परमेश्वर की कलीसिया की बड़ी सेवा कर सकते थे, निकम्मे हो जाते हैं, क्योंकि उन्हें कारोबार में किसी नई दिशा में फैलना ही है, जो उनका सारा खाली समय ले लेता है। यह अनुभव करने के बदले कि उनकी पहली चिन्ता यह होनी चाहिए, “मैं परमेश्वर की सबसे अच्छी रीति से महिमा कैसे कर सकता हूँ?” उनका सब कुछ निगल जानेवाला लक्ष्य यह होता है कि “समुद्रों के समान अपनी भुजाएँ फैलाकर सारे तट को अपनी पकड़ में ले लें।” हज़ारों, लाखों, बल्कि दसियों लाख पाउंड भी उस लालची जोंक को चुप नहीं करा सकते जिसे मनुष्यों ने निगल लिया है, और जो निरन्तर पुकारती रहती है, “दे, दे।” बहुत-से लोग घर से घर और खेत से खेत मिलाते जाते हैं, मानो वे देश के बीच अकेले रह जाना चाहते हों। हाय, कि मसीही भी उसी ज्वर से ग्रस्त हो जाएँ!

    दृष्टान्त के धनी मनुष्य के पास प्रार्थना के लिए समय न था, क्योंकि वह नई बखारियाँ बनाने की योजना में लगा था जिनमें वह अपनी सम्पत्ति रखे; परन्तु जब प्रभु ने कहा, “इसी रात तेरा प्राण तुझ से ले लिया जाएगा,” तब उसे मरने के लिए तो समय निकालना ही पड़ा। मैं आपसे विनती करता हूँ, “और और वस्तुओं के लोभ” से, धन के घुन से, उस कभी न मिटनेवाले लालच से सावधान रहिए जो मनुष्यों को शैतान के फन्दे में ढकेल देता है। क्योंकि यदि यह आपको और कोई हानि न भी पहुँचाए, तो यही हानि बहुत है कि आपकी प्रार्थनाएँ रुक जाएँ।

    हम परमेश्वर के घर में भी बहुत अधिक काम ले सकते हैं और इस प्रकार मार्था के समान, सेवा करते-करते घबराकर, अपनी प्रार्थनाओं में बाधा डाल सकते हैं। मैंने कभी किसी के विषय में नहीं सुना जो बहुत प्रार्थना करते-करते घबरा गया हो। हम जितना अधिक काम करें, उतनी ही अधिक प्रार्थना करनी चाहिए; और प्रार्थना को हमारी सेवा का सन्तुलन बनाना चाहिए, या यों कहें कि उसे हर कार्य का जीवन-रक्त होना चाहिए, और हमारे सारे जीवन को वैसे ही भिगो देना चाहिए जैसे स्वर्ग की ओस ने गिदोन के ऊन को भर दिया था।

    यदि प्रार्थना उसी अनुपात में हो, तो हम कभी बहुत अधिक परिश्रम नहीं कर सकते; परन्तु मुझे डर है कि हम में से कुछ लोग यदि कम काम हाथ में लें और उसके विषय में अधिक प्रार्थना करें, तो कहीं अधिक कर सकेंगे। मुझे यह भी डर है कि कुछ लोग सार्वजनिक धार्मिक कार्यक्रमों को परमेश्वर के साथ व्यक्तिगत संगति पर हावी होने देते हैं। वे बहुत अधिक उपदेशों, बहुत अधिक सम्मेलनों, बहुत अधिक बाइबल-पाठों, बहुत अधिक समितियों, हाँ, और बहुत अधिक प्रार्थना-सभाओं में जाते हैं—ये सब अपने-अपने स्थान पर अच्छे हैं, परन्तु जब ये हमारी गुप्त प्रार्थना को दबा देते हैं, तब सब हानिकारक हो जाते हैं।

    श्रीमती रो ने कहा था कि यदि परमेश्वर के साथ उसकी व्यक्तिगत संगति के समय स्वयं प्रेरित भी प्रचार कर रहे होते, तो भी वह उन्हें सुनने के लिए अपनी कोठरी न छोड़ती। पतरस या पौलुस के साथ होने से परमेश्वर के साथ होना निश्चय ही उत्तम है। प्रचार का लक्ष्य प्रार्थना है, और हाय उस मनुष्य पर जो साधन को लक्ष्य से अधिक मूल्यवान समझकर, सेवा के किसी और रूप को अपनी प्रार्थनाओं को एक कोने में धकेलने देता है।

    इसमें भी कोई सन्देह नहीं कि बहुत कम काम होने से भी प्रार्थना में बाधा पड़ती है। यदि आप चाहते हैं कि कोई काम अच्छी तरह हो, तो आपको उस व्यक्ति के पास जाना चाहिए जिसके पास बहुत काम है, क्योंकि वही आपके लिए उसे करनेवाला है। जिन लोगों के पास करने को कुछ नहीं होता, वे साधारणतः उस “कुछ नहीं” को बड़े हो-हल्ले के साथ करते हैं। सुबह से रात तक वे दूसरों का समय नष्ट करते हैं—वे ही बिन बुलाए मिलने आनेवाले, भेंटवार्ता लेनेवाले, और सार्वजनिक व्यक्तियों के विषय में चटपटे अनुच्छेद लिखनेवाले लोग हैं, जो बहुधा उनके अपने मूर्ख दिमाग़ों में गढ़े गए होते हैं। यही निन्दा फैलानेवाले हैं, जो केवल मनमौजीपन में भले लोगों के चरित्र पर थूकते हैं। करने को कुछ न होने के कारण शैतान उन्हें दूसरों को रोकने और हानि पहुँचाने के लिए भाड़े पर रख लेता है। यदि ऐसे लोग कभी प्रार्थना करते भी हैं, तो मुझे निश्चय है कि उनका आलस्य उनके लिए बहुत बाधा बनता होगा।

    जिस व्यक्ति को कंगाल बच्चों की पाठशाला (रैग्ड स्कूल) में पढ़ाना पड़ता है, वह पाता है कि उन जंगली युवा स्वभावों को वश में करने के लिए उसे सहायता की दुहाई देनी ही पड़ती है। जिस युवती के चारों ओर एक दर्जन लड़कियाँ हैं जिन्हें वह उद्धारकर्ता के पास लाने की लालसा रखती है, वह जेन और एलन के लिए प्रार्थना करना अपना अनिवार्य कर्तव्य समझती है, कि उनका मन फिरे और वे परमेश्वर की ओर आ जाएँ। वह पादरी, जिसके हाथ पवित्र परिश्रम से भरे हैं और जिसकी आँखें पवित्र चौकसी करते-करते धुँधली हो जाती हैं, पाता है कि वह अपने परमेश्वर के निकट आए बिना नहीं रह सकता। यदि यीशु के इन सेवकों के पास कम काम होता, तो वे कम प्रार्थना करते; परन्तु पवित्र परिश्रम भक्ति की धाय है। मैंने कहा था कि हम बहुत अधिक कर सकते हैं, और मैं उस सत्य को सन्तुलित नहीं कर सकता जब तक यह न जोड़ूँ कि मसीहियों का एक बहुत बड़ा भाग बहुत कम करता है। परमेश्वर ने उन्हें इतना धन दिया है कि वे कारोबार से अवकाश ले सकें। उनके पास समय ही समय है, और उन्हें उस समय को बिताने के उपाय तक गढ़ने पड़ते हैं; और फिर भी अज्ञानियों को शिक्षा की आवश्यकता है, रोगियों को देखभाल के लिए किसी के आने की आवश्यकता है, कंगालों को सहायता चाहिए—क्या उन्हें अपना भरपूर अवकाश परमेश्वर की सेवा में नहीं लगाना चाहिए? क्या तब वे प्रार्थना में सजीव न हो उठेंगे?

    मैं चाहता हूँ कि सब लोग प्रभु के एक संत के साथ कह सकें, “प्रार्थना मेरा काम है और स्तुति मेरा आनन्द,” परन्तु मुझे निश्चय है कि वे ऐसा तब तक कभी न कहेंगे जब तक प्रभु के घर की धुन उन्हें और भी पूरी तरह भस्म न कर दे। फिर, कुछ लोग व्यवस्था की कमी के कारण अपनी प्रार्थनाओं में बाधा डालते हैं। वे थोड़ा देर से उठते हैं, और दिन भर उन्हें अपने काम के पीछे भागना पड़ता है, और वे उसे कभी पकड़ नहीं पाते, बल्कि सदा हड़बड़ी में रहते हैं, एक कर्तव्य दूसरे की एड़ियों से टकराकर उसे गिराता रहता है। उनके पास एकान्त के लिए कोई नियत समय नहीं होता; परमेश्वर के साथ संगति के लिए बाड़ा बाँधकर अलग रखा गया स्थान इतना कम होता है। और परिणामस्वरूप, कुछ-न-कुछ हो जाता है और प्रार्थना भूल जाती है—नहीं, मैं आशा करता हूँ कि बिल्कुल भूल नहीं जाती, परन्तु इतनी जल्दबाज़ी और लापरवाही से निपटा दी जाती है कि उसका कुछ मोल नहीं रहता और उससे उन्हें कोई आशीष नहीं मिलती।

    मैं चाहता हूँ कि आप में से हर एक अगले सप्ताह इस बात की एक डायरी रखे कि आप कैसे प्रार्थना करते हैं, और देखे कि चौबीस घंटों में से आप परमेश्वर के साथ कितना—या यों कहें कितना कम—समय बिताते हैं। बहुत-सा समय भोजन की मेज़ पर जाता है; प्रायश्चित के ढकने के पास कितना? बहुत-से घंटे मनुष्यों के साथ बीतते हैं; अपने सृजनहार के साथ कितने? आप पृथ्वी पर अपने मित्रों के साथ कुछ समय रहते हैं; स्वर्ग में अपने मित्र के साथ आप कितने मिनट रहते हैं? आप मन-बहलाव के लिए अपने को समय देते हैं; उन अभ्यासों के लिए आप क्या अलग रखते हैं जो सचमुच प्राण को नए सिरे से रचते और ताज़ा करते हैं? “हर वस्तु के लिए एक स्थान, और हर वस्तु अपने स्थान पर,” पाठशालाओं और कारोबारी घरानों के लिए एक अच्छा नियम है, और यह आत्मिक बातों में भी उतना ही उपयोगी होगा। दूसरे कर्तव्य पूरे किए जाने चाहिए, परन्तु प्रार्थना अधूरी न छोड़ी जाए; उसका अपना स्थान होना चाहिए, और वह भी पर्याप्त। ध्यान रखना चाहिए कि हमारी “प्रार्थनाएँ रुक न जाएँ,” कि हम उन्हें छोड़ दें या छोटा कर दें। परन्तु समय मुझे विवश करता है कि मैं इस विस्तृत विषय को छोड़कर आगे बढ़ूँ।

    II. दूसरे, हमें चौकस रहना चाहिए कि प्रार्थना करते समय हमें बाधा न हो, जब हम सचमुच लगे हों

    उस पवित्र कार्य में। यहाँ मैं फिर उसी भूमि पर चल सकता हूँ और कह सकता हूँ कि कुछ लोग ढीले और गुनगुने होने के कारण प्रार्थना करते समय बाधित होते हैं—यह एक बड़ी बाधा है। कुछ दूसरे बहुत अधिक या बहुत कम काम होने के कारण, और एक और वर्ग हृदय की उस हड़बड़ी भरी दशा के कारण जो व्यवस्था की कमी से उत्पन्न होती है। परन्तु जब आप इतनी उत्सुकता से मेरे शब्दों को पी रहे हैं, तो मुझे अपने आप को दोहराने की आवश्यकता नहीं।

    आइए ध्यान दें कि कुछ लोग अनुपयुक्त समय और स्थान चुनने के कारण प्रार्थना में बाधित होते हैं। कुछ समय ऐसे होते हैं जब आप अपने द्वार पर किसी की दस्तक की आशा कर सकते हैं; ठीक उसी समय परमेश्वर का द्वार न खटखटाइए। कुछ घड़ियाँ ऐसी होती हैं जब आपकी चिट्ठियाँ आती हैं, जब ग्राहक आते हैं, जब व्यापारियों पर ध्यान देना पड़ता है, जब कारीगरों को आदेश चाहिए; ठीक उसी समय अपनी कोठरी में जाना मूर्खता होगी। यदि आप दूसरों के यहाँ नौकरी करते हैं, तो आपको वे घंटे परमेश्वर को अर्पित नहीं करने चाहिए जो आपके मालिक के हैं। अपने काम-धन्धे में परिश्रम करके आप प्रभु का अधिक आदर करेंगे। कुछ समय ऐसे होते हैं जिनकी माँग घर की आवश्यकताएँ और आपका वैध काम-धन्धा करते हैं। ये दूसरी रीति से पहले ही प्रभु के हैं; इन्हें उन्हीं के उद्देश्य के लिए प्रयोग होने दीजिए। एक कर्तव्य को दूसरे कर्तव्य के लहू से कभी अशुद्ध न कीजिए।

    परमेश्वर और प्रार्थना को वे उपयुक्त समय दीजिए जिनमें आप उचित रूप से अकेले रहने की आशा कर सकते हैं। निःसन्देह आप अपने काम पर भी सहज भाव से और मौन कराहों के साथ प्रार्थना कर सकते हैं, और आपको दिन भर गिड़गिड़ाकर बिनती करने की आत्मा में रहना चाहिए; परन्तु मैं अभी उन समयों की बात कर रहा हूँ जो विशेष रूप से बिनती के लिए अलग किए गए हैं, और मैं कहता हूँ कि ऐसा समय और स्थान चुनिए जहाँ आप विघ्न से मुक्त रह सकें।

    एक भक्त लड़का, जिसके पास घर में प्रार्थना करने का कोई स्थान न था, अस्तबल में गया और घास रखने की अटारी पर चढ़ गया। परन्तु बहुत जल्द कोई सीढ़ी से ऊपर आया और उसे विघ्न पहुँचाया। अगली बार उसने ध्यान रखा कि अपने पीछे सीढ़ी को ऊपर खींच ले—यह हमारे लिए एक बहुत उपयोगी संकेत है। सचमुच अच्छा होता यदि हम सीढ़ी को इतनी पूरी तरह ऊपर खींच सकते कि न शैतान और न संसार हमारे पवित्र एकान्त में घुस सके। “परन्तु जब तू प्रार्थना करे, तो अपनी कोठरी में जा; और द्वार बन्द करके अपने पिता से जो गुप्त में है प्रार्थना कर; और तब तेरा पिता जो गुप्त में देखता है, तुझे प्रगट में प्रतिफल देगा।” तो फिर, सबसे उपयुक्त समय और स्थान चुनिए, कि आपकी प्रार्थनाएँ रुक न जाएँ। सांसारिक चिन्ताएँ प्रार्थना की बार-बार आनेवाली और अत्यन्त हानिकारक बाधाएँ हैं। एक मसीही मनुष्य को संसार में सबसे अधिक सावधान मनुष्य होना चाहिए, और फिर भी चिन्ता से रहित। क्या आप इस विरोधाभास को समझते हैं? उसे पाप न करने में सावधान रहना चाहिए, परन्तु दूसरी बातों के विषय में उसे अपनी चिन्ता “उस पर” डाल देनी चाहिए “जिसे उसका ध्यान है।” सब कुछ परमेश्वर के हाथों से लेना, और सब कुछ परमेश्वर के हाथों में सौंप देना, जीने का एक आनन्दमय तरीका है और प्रार्थना के लिए बहुत सहायक है।

    क्या आपके स्वामी ने आपको कौओं और सोसनों के विषय में नहीं बताया? आपका स्वर्गीय पिता उन्हें खिलाता और पहिनाता है; तो क्या वह आपको न पहिनाएगा? “पहले तुम परमेश्वर के राज्य और उसके धर्म की खोज करो।” विश्वास शान्ति देता है, और शान्ति प्राण को प्रार्थना के लिए निर्मल और मुक्त छोड़ देती है। परन्तु जब चिन्ता भीतर आती है, तो वह मन को उलझा देती है और हृदय को विनती करने से दूर कर देती है। चिन्ता से बोझिल हृदय उस मनुष्य के समान है जो भारी कपड़े पहने हुए तैरने का प्रयत्न कर रहा हो; यदि वह तैरकर किनारे तक पहुँचने की आशा रखता है, तो उसे उन्हें उतारना ही होगा। बहुत-से नाविकों ने अपने कपड़े काटकर टुकड़े-टुकड़े कर दिए हैं, क्योंकि उन्होंने अनुभव किया कि यदि वे उनसे छुटकारा न पाएँ तो डूब जाएँगे।

    मैं चाहता हूँ कि बहुत-से मसीही अपने आप को अपनी अत्यधिक सांसारिक व्यस्तताओं से छुड़ा लें, क्योंकि उन पर चिन्ता का इतना बड़ा ढेर है कि वे मुश्किल से अपना सिर पानी के ऊपर रख पाते हैं। ओह, अधिक अनुग्रह और कम चिन्ता! अधिक प्रार्थना और कम जमाखोरी! अधिक मध्यस्थता और कम सट्टेबाज़ी! जैसी स्थिति अभी है, उसमें प्रार्थनाएँ दुःखद रूप से रुकी हुई हैं। सांसारिक सुख-विलास, विशेषकर सन्दिग्ध प्रकार के, सबसे बुरी बाधाएँ हैं। विश्वास का अंगीकार करनेवाले कुछ लोग ऐसे मनोरंजनों में लिप्त रहते हैं जो, मुझे निश्चय है, प्रार्थना से मेल नहीं खाते। वे उन मक्खियों के समान हैं जो शहद में कूद पड़ती हैं, यहाँ तक कि मिठास उनके पंखों और टाँगों से चिपक जाती है और वे उड़ नहीं पातीं। मुझे याद है, मैंने एक बार पढ़ा था: “नाट्यशाला से घर लौटने के बाद एक मसीही मनुष्य के द्वारा कही जानेवाली प्रार्थना,” “घुड़दौड़ से लौटने पर एक संत के लिए निर्धारित प्रार्थना,” और “नृत्य-समारोह से लौटने पर एक मसीही महिला के लिए प्रार्थना।” निःसन्देह वे व्यंग्य में लिखी गई थीं और सचमुच एक खुला प्रहसन थीं।

    आप ओछेपन और पाप से घर आकर फिर यीशु के मुख की ओर कैसे देख सकते हैं? संसार की रीतियों के पीछे चलते हुए परमेश्वर के साथ संगति कैसे बनाए रखी जा सकती है? आप कीचड़ में लोटकर फिर स्वच्छ वस्त्रों के साथ प्रायश्चित के ढकने के पास नहीं आ सकते। जब आप अभी-अभी परमप्रधान के नाम का अनादर करके आए हैं, तब आप अपनी बिनतियाँ लेकर परमेश्वर के सिंहासन के सामने कैसे आ सकते हैं? हे मसीहियो! हर उस बात से अपने आप को बचाए रखिए जिसके उचित होने के विषय में, या उसके लाभकारी होने के विषय में भी, आपको कोई सन्देह हो, क्योंकि जो कुछ विश्वास से नहीं, वह पाप है, और वह आपकी प्रार्थनाओं में बाधा डालेगा।

    इसके अतिरिक्त, सांसारिक शोक से भी प्रार्थनाओं में उतनी ही बाधा पड़ सकती है। कुछ लोग शोक के आगे इतना अधिक झुक जाते हैं कि प्रार्थना ही नहीं कर पाते। विद्रोही कुड़कुड़ाहट के आँसू प्रार्थना के बारूद को गीला कर देते हैं, जिससे मसीही मनुष्य अपनी अभिलाषाओं को जैसे भेजना चाहिए वैसे स्वर्ग की ओर नहीं भेज पाता। वह शोक जो मनुष्य को प्रार्थना करने से रोकता है, परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध खुला विद्रोह है। हमारा प्रभु “बहुत उदास था, यहाँ तक कि उसके प्राण निकला चाहते थे,” परन्तु तब भी उसने प्रार्थना की; नहीं, बल्कि “इसी कारण उसने प्रार्थना की।”

    शोकित होना उचित है, क्योंकि परमेश्वर चाहता है कि क्लेश दुःखदायी हो, आनन्ददायक नहीं। परन्तु जब शोक उचित होता है, तो वह हमें प्रार्थना की ओर ले जाएगा, प्रार्थना से दूर नहीं। और जब हम पाते हैं कि किसी प्रिय बच्चे के खो जाने पर, या अपनी सम्पत्ति के घट जाने पर हमारा दुःख हमारी प्रार्थनाओं में बाधा डालता है, तो मैं सोचता हूँ कि हमें अपने आप से कहना चाहिए, “अब मुझे प्रार्थना करनी ही है, क्योंकि यह निश्चय ही गलत है कि मैं अपने पिता के विरुद्ध इतना विद्रोही बनूँ कि उसके हाथ से कुछ भी माँगने से इन्कार कर दूँ।”

    यदि आपका बच्चा केवल इसलिए कि उसकी मनमानी नहीं चल सकी, आपसे कुछ भी माँगने से इन्कार कर दे और आप पर मुँह फुलाए घर में घूमता रहे, तो आप समझेंगे कि वह बड़े रूठे हुए मिज़ाज में है। फिर भी बहुत-से शोक करनेवाले इसी प्रकार व्यवहार करते हैं। हम उनके शोक में गहरी सहानुभूति रखेंगे, परन्तु उनकी कुड़कुड़ाहट को उचित नहीं ठहरा सकते, क्योंकि “संसार का शोक मृत्यु उत्पन्न करता है” और वह परमेश्वर की सन्तान के लिए अनुचित है। अपने सारे दुःख के साथ, क्लेश के कारण धूल तक झुके हुए होकर भी, अपने प्रभु और स्वामी के समान पुकारिए, “तौभी जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो,” और तब आपकी प्रार्थनाओं को सहायता मिलेगी, बाधा नहीं।

    कुछ स्थितियाँ ऐसी हैं जिनमें बुरे स्वभाव के कारण प्रार्थना में बहुत बड़ी बाधा पड़ती है। मैं नहीं जानता कि यह बात कहाँ लागू होती है, परन्तु जहाँ कहीं भी लागू हो, मुझे भरोसा है कि यह हृदय तक पहुँचेगी। आप नौकरों और बच्चों से आदतन कड़वा नहीं बोल सकते, आप बात-बात पर रूठ नहीं सकते, आप किसी बड़े झगड़े या छोटी-मोटी तकरारों में सम्मिलित नहीं हो सकते, और फिर जाकर सामर्थ के साथ प्रार्थना नहीं कर सकते। यदि मैं अपने हृदय में क्रोध अनुभव करता हूँ तो मैं प्रार्थना में सफल नहीं हो सकता, और मैं नहीं मानता कि आप हो सकते हैं। उठिए, जाइए और परमेश्वर से बात करने का प्रयत्न करने से पहले मामला सुलझा लीजिए, क्योंकि क्रोधी मनुष्यों की प्रार्थना परमेश्वर को क्रोधित करती है। जब तक आप शैतान के वश में हैं, आप स्वर्गदूत के साथ मल्लयुद्ध नहीं कर सकते। मैं आपके अपने विवेक से पूछता हूँ—आप स्वयं ही न्याय कीजिए—क्या ऐसा नहीं है? हमारे प्रभु की वह सलाह अच्छी थी: “अपनी भेंट वहीं वेदी के सामने छोड़ दे, और जाकर पहले अपने भाई से मेल मिलाप कर।” यदि यह न किया जाए, तो बलिदान ग्रहण नहीं किया जा सकता, और न ही मैं समझ पाता हूँ कि आप उसे चढ़ाने का साहस कैसे कर सकते हैं।

    मैंने दो भले मनुष्यों के विषय में सुना है जिनके बीच कारोबार में तीखा मतभेद हो गया। मैं नहीं जानता कि दोष किसका था—शायद किसी का भी नहीं। हो सकता है उन्होंने एक-दूसरे को गलत समझ लिया हो; और उनमें से एक, जब वह बहुत खिन्न होकर घर लौट रहा था, तो उसने सूर्य को अस्त होते देखा और उसे यह वचन स्मरण हो आया, “सूर्य अस्त होने तक तुम्हारा क्रोध न रहे।” उसने सोचा, “मैं वापस जाकर क्षमा माँगूँगा, क्योंकि मुझे लगता है कि मैं बहुत कठोरता से बोल गया।” वह अपने मित्र के दफ़्तर की ओर लौटा, और आधे रास्ते में उसे वह दूसरा व्यक्ति मिला, जो उसी काम से उसके पास आ रहा था। कितने धन्य थे वे मसीही, जो दोनों पवित्र आत्मा की शिक्षा का इतना ध्यान रखनेवाले और प्रभु यीशु के इतने समान थे!

    ठोकरों का लगना तो अवश्य है, परन्तु धन्य हैं वे जो उन्हें दूर करने में सबसे आगे रहते हैं। हाय, एक विशेष साँचे के मनुष्य ऐसा नहीं कर सकते, बल्कि वे अपने मन में बैर को तब तक पाले रखेंगे जब तक वह सड़ न जाए और उनके सारे स्वभाव को अपनी घिनौनी दुर्गन्ध से भर न दे। निश्चय ही वे यह आशा नहीं कर सकते कि जब उनकी बिना गाड़ी हुई शत्रुताएँ उनके प्राणों को अशुद्ध कर रही हैं, तब प्रार्थना में उनकी सुनी जाएगी। प्रिय मसीही मित्रो, जहाँ तक हो सके प्रयत्न कीजिए कि जब कभी आप क्रोधित हों, तो पाप न करें। यह सम्भव है, क्योंकि लिखा है, “क्रोध तो करो, पर पाप मत करो।”

    जिस मनुष्य में कोई क्रोध नहीं, वह मुश्किल से मनुष्य है, और निश्चय ही भला मनुष्य नहीं, क्योंकि जो पाप पर क्रोधित नहीं होता, उसे सद्गुण से प्रेम नहीं। कुछ लोगों के विषय में कहा जाता है कि वे पुराने जूते के समान ढीले और आरामदेह हैं, और साधारणतः उनका मोल भी उस वस्तु से अधिक नहीं होता। अन्याय के विरुद्ध क्रोध उचित है, परन्तु किसी व्यक्ति के विरुद्ध वह क्रोध जो बिगड़कर उसकी हानि की कामना बन जाए, पापपूर्ण है, और प्रार्थना की आग को पूरी तरह बुझा देता है।

    जब तक हम दूसरों के उन अपराधों को, जो उन्होंने हमारे विरुद्ध किए हैं, क्षमा न करें, तब तक हम क्षमा के लिए प्रार्थना नहीं कर सकते। प्रार्थना में तीन प्रकार से बाधा पड़ सकती है—बहुत भयानक बाधा। यदि हम उस पिता का अनादर करें जिससे हम प्रार्थना करते हैं, या उस पुत्र का जिसके द्वारा हम प्रार्थना करते हैं, या उस पवित्र आत्मा का जिसकी सहायता से हम प्रार्थना करते हैं। मैं कहता हूँ, हम पिता का अनादर कर सकते हैं। यह असंगत जीवन के द्वारा किया जा सकता है। यदि परमेश्वर की सन्तान पिता की इच्छा के आज्ञाकारी न हों, तो उन्हें आश्चर्य नहीं करना चाहिए यदि उन्हें प्रार्थना करना कठिन लगे। उनके गले में कुछ ऐसा उठेगा जो उनकी विनती का गला घोंट देगा। जब तक आप अपने स्वर्गीय पिता पर विश्वास न करें, आप ग्रहणयोग्य रीति से अपना हृदय उण्डेल नहीं सकते। यदि आप परमेश्वर के विषय में कठोर विचार रखते हैं, यदि आपका हृदय उसके प्रति ठंडा है, और उसके नाम के प्रति श्रद्धा की कमी है, यदि आप उस महान, तत्पर हृदय पर विश्वास नहीं करते जो आपको आशीष देने की प्रतीक्षा कर रहा है, तो आपके प्रेम, विश्वास और श्रद्धा की कमी आपकी प्रार्थनाओं का गला घोंट देगी।

    ओह! जब कोई मनुष्य महान पिता के साथ पूरी तरह एक होता है, जब “हे अब्बा, हे पिता” ही उसके प्राण की आत्मा होती है, जब वह परमेश्वर से ऐसे व्यक्ति के समान बात करता है जिस पर वह पूर्ण भरोसा रखता है, जिसकी इच्छा के आगे वह अपने आप को पूरी तरह सौंप देता है, और जिसकी महिमा उसके प्राण का आनन्द है—तब वह प्रार्थना में लाभ की ऊँची भूमि पर खड़ा होता है, वह परमेश्वर से जो चाहता है वह पा लेगा। यदि परमेश्वर के साथ उसकी ऐसी स्थिति न हो, तो उसकी प्रार्थनाएँ बड़ी पीड़ा से लँगड़ाती चलेंगी।

    इसी प्रकार, भाइयो, यदि यीशु के साथ, जिसके द्वारा हम प्रार्थना करते हैं, हमारा सम्बन्ध ठीक न हो, यदि हम किसी भी मात्रा में स्व-धर्मी हों, यदि हम अपने आप में मगन रहें और अपने प्रियतम को भूल जाएँ, यदि हम समझें कि हम उद्धारकर्ता के बिना भी काम चला सकते हैं, और इसलिए यदि हम आत्म-सन्तुष्ट फरीसियों के समान प्रार्थना करें, तो हमारी प्रार्थनाएँ रुक जाएँगी। यदि हम उद्धारकर्ता के समान नहीं हैं, यदि हम उसे अपना आदर्श नहीं बनाते, यदि हम में उसकी प्रेमपूर्ण आत्मा का कुछ भी अंश नहीं है, और सबसे बढ़कर, यदि हम उसे फिर से क्रूस पर चढ़ाते हैं और प्रगट में उस पर कलंक लगाते हैं, और यदि हम उन वरदानों के लिए कृतघ्न हैं जो हमें पहले ही मिल चुके हैं, तो हमारी प्रार्थनाएँ रुक जाएँगी। यदि आपने अपने सहायक (वकील) से ही झगड़ा कर लिया है, तो आप अदालत में अपनी पैरवी नहीं कर सकते। यदि महान मध्यस्थ आपकी प्रार्थना को अपने हाथ में न ले और आपकी ओर से उसे चढ़ाए, तो उस पवित्र अभ्यास के लिए आपके मन में कोई उत्साह न रहेगा।

    पवित्र आत्मा के विषय में भी ऐसा ही है। ऐसी कोई प्रार्थना नहीं जिसे परमेश्वर ग्रहण करता हो और जिसे आत्मा ने पहले हमारे हृदयों में न लिखा हो। सच्ची प्रार्थना इतनी हमारी बिनती नहीं, जितनी हम में परमेश्वर के आत्मा की मध्यस्थता है। अब, यदि हम आत्मा को शोकित करें, तो वह प्रार्थना करने में हमारी सहायता नहीं करेगा। और यदि हम किसी ऐसी वस्तु के लिए प्रार्थना करने का प्रयत्न करें जो आत्मा के पवित्र, अनुग्रहकारी, प्रेमपूर्ण स्वभाव के विपरीत है, तो हम यह आशा नहीं कर सकते कि वह हमें परमेश्वर के मन के विरोध में प्रार्थना करने की सामर्थ देगा।

    सावधान रहिए कि आप किसी भी रीति से परमेश्वर के आत्मा को खेदित न करें, विशेषकर उसकी कोमल चेतावनियों, उसकी प्रेमभरी पुकारों, उसकी हार्दिक विनतियों और उसकी कोमल समझाइशों के प्रति अपने कान बन्द करके; क्योंकि यदि आप ईश्वरीय सहायक के प्रति बहरे हैं, तो वह आपके प्रति मौन रहेगा। यदि आप दूसरी बातों में उसके अधीन न होंगे, तो वह प्रार्थना करने में आपकी सहायता नहीं करेगा। तो फिर, प्रिय मित्रो, मैंने जल्दी में आपके सामने कुछ ऐसे तरीके रखे हैं जिनसे प्रार्थना में बाधा पड़ सकती है। परमेश्वर करे कि हम में से कोई भी उनसे पराजित न हो, परन्तु हम हर उस बात से छुड़ाए जाएँ जो हमारी बिनतियों को बिगाड़ सकती है!

    III. अब मैं सबसे महत्त्वपूर्ण भाग पर आपका पूरा ध्यान चाहूँगा, जिस पर मैं संक्षिप्त रहने का प्रयत्न करूँगा। हमारी प्रार्थनाओं के सफल होने में बाधा पड़ सकती है। हम प्रार्थना तो कर सकते हैं, परन्तु फिर भी हो सकता है कि वह प्रार्थना सुनी न जाए। और यहाँ मैं बीच में एक बात कह दूँ। प्रभु हर उस मनुष्य की प्रार्थना सुनेगा जो प्रभु यीशु की मध्यस्थता के द्वारा दया माँगता है। वह टूटे मनवालों की पुकार को कभी तुच्छ नहीं जानता; वह ऐसा परमेश्वर है जो मेल-मिलाप चाहनेवाले सब लोगों की सुनने को तैयार है। परन्तु दूसरी बातों के विषय में यह सच है कि परमेश्वर पापियों की नहीं सुनता—अर्थात् जब तक वे पापी बने रहते हैं, वह उनकी इच्छाएँ पूरी नहीं करेगा—वास्तव में ऐसा करना उन्हें उनके पापों में प्रोत्साहित करना होगा। यदि वे पश्चाताप करें और यीशु मसीह के द्वारा दया के लिए पुकारें, तो वह उनकी पुकार सुनेगा और उनका उद्धार करेगा; परन्तु यदि पहले उनका उसके साथ मेल न हो, तो उनकी प्रार्थनाएँ खोखली हवा हैं।

    मनुष्य अपने बच्चे का अनुरोध पूरा करता है, परन्तु परदेशियों की बात नहीं सुनता। वह अपने मित्रों की सुनेगा, परन्तु शत्रुओं की नहीं। यह उचित नहीं कि स्वर्ग के खज़ानों की मंजूषाएँ खोलनेवाली सोने की कुंजी किसी विद्रोही के कमरबन्द में लटकाई जाए। इससे भी बढ़कर, परमेश्वर अपनी सब सन्तानों की एक समान नहीं सुनता, न ही हर समय एक समान सुनता है। हर विश्वासी प्रार्थना में सामर्थी नहीं होता। छियानबेवाँ भजन पढ़िए, और यदि मुझे ठीक स्मरण है, तो आपको ऐसे शब्द मिलेंगे, “उसके याजकों में मूसा और हारून, और उसके प्रार्थना करनेवालों में शमूएल था; वे यहोवा को पुकारते थे, और वह उनकी सुन लेता था…वे उसकी चितौनियों और उसकी दी हुई विधियों पर चलते थे।” हाँ, उसने उनकी सुनी—मूसा, हारून, शमूएल की—उसने उनकी सुनी, क्योंकि वे उसकी चितौनियों पर चलते थे। जब परमेश्वर की सन्तान पाती है कि उनकी प्रार्थनाएँ सफल नहीं होतीं, तो उन्हें खोज करनी चाहिए, और वे शीघ्र ही वह कारण ढूँढ़ लेंगे जिससे उनकी प्रार्थनाएँ रुकी हुई हैं।

    पहले, यदि किसी विश्वासी की प्रार्थनाओं को परमेश्वर के पास बड़ी सफलता पानी है, तो उसमें पवित्र जीवन होना चाहिए। सुनिए, “धर्मी जन की प्रभावशाली और उत्कट प्रार्थना से बहुत कुछ हो सकता है।” उस बात पर ध्यान दीजिए—धर्मी जन की। हमारे उद्धारकर्ता की सुनिए (यूहन्ना 15:7), “यदि तुम मुझ में बने रहो, और मेरी बातें तुम में बनी रहें, तो जो चाहो माँगो और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा।” वहाँ एक ‘यदि’ है। यदि आप मसीह की इच्छा पूरी नहीं करते, तो वह आपकी इच्छा पूरी नहीं करेगा।

    यह व्यवस्थावादी बात नहीं है, इसका व्यवस्था से कोई सम्बन्ध नहीं, बल्कि यह मसीह के घर का सुसमाचारीय नियम है कि आज्ञाकारिता का प्रतिफल प्रार्थना में सामर्थ हो। ठीक वैसे ही जैसे आप अपने बच्चों के साथ करते हैं। आप उन पर अनुशासन रखते हैं; वे गलती करें तो आप उन्हें घर से बाहर नहीं निकाल देते या सिपाही के हवाले नहीं कर देते, परन्तु हठीले को ताड़ना देने और आज्ञाकारी को पुरस्कार देने के आपके अपने तरीके होते हैं। आप उस चिड़चिड़े लड़के के अनुरोध पूरे करने में कोई जल्दी नहीं करते; वास्तव में आप उसकी माँग ठुकरा देते हैं। परन्तु उस दूसरे प्यारे, कोमल, प्रेमी बच्चे को केवल माँगना होता है और वह पा लेता है।

    यह उचित अनुशासन है, और ऐसा ही परमेश्वर हमारे बीच करता है। वह अपनी सन्तानों को पाप के कारण त्याग नहीं देता और उन्हें पूरी तरह अस्वीकार नहीं करता, परन्तु वह प्रेम में उनकी ताड़ना करता है, और उसकी ताड़नाओं में से एक यह है कि वह उनकी प्रार्थनाओं को बाहर रोक देता है। यदि हम प्रार्थना की तुलना धनुष से तीर चलाने से करें, तो आपके हाथ स्वच्छ होने चाहिए, नहीं तो आप तीर नहीं चला सकते, क्योंकि यह धनुष उन हाथों में झुकने से इन्कार करता है जो बिना पश्चाताप किए पाप से अशुद्ध हैं। यदि कोई पापी यीशु के निमित्त दया के लिए प्रार्थना करे, तो उसकी सुनी जाएगी; परन्तु सामान्य आशीषों के विषय में लिखा है, “धर्मियों की लालसा पूरी होती है,” परन्तु दुष्टों की लालसा नहीं। पहले प्रायश्चित करनेवाले अनुग्रह के सोते में धोए जाइए और पवित्र आत्मा के द्वारा अपना हृदय शुद्ध कराइए, अन्यथा आप प्रार्थना में सफल नहीं हो सकते।

    यदि कोई मुझे किसी ऐसे मनुष्य के विषय में बताए जिसकी प्रार्थनाओं का उत्तर परमेश्वर ने बड़े पैमाने पर दिया, और फिर मुझे यह सूचना दे कि वह घोर पाप में जीवन बिताता था, तो मैं इस पर विश्वास न करूँगा। यह असम्भव है कि परमेश्वर धर्म का अंगीकार करनेवाले एक दोषी व्यक्ति को प्रार्थना में सफलता देकर उसका पक्ष ले। जिस अन्धे मनुष्य को यीशु ने चंगा किया, उसने बिल्कुल सच कहा था, “यदि कोई उसकी इच्छा पर चलता है, तो वह उसकी सुनता है।”

    आज्ञाकारिता के अतिरिक्त विश्वास भी होना चाहिए। “परमेश्वर के पास आनेवाले को विश्वास करना चाहिए कि वह है, और अपने यत्न से खोजनेवालों को प्रतिफल देता है।” “पर विश्वास से माँगे, और कुछ सन्देह न करे; क्योंकि सन्देह करनेवाला समुद्र की लहर के समान है जो हवा से बहती और उछलती है: ऐसा मनुष्य यह न समझे कि मुझे प्रभु से कुछ मिलेगा।” विश्वास “प्रतिज्ञाएँ प्राप्त करता है, अविश्वास खाली हाथ लौटता है।”

    प्रभु किसी सन्देह करनेवाले को भी आशीष दे सकता है, परन्तु वह प्रतिज्ञा से बढ़कर है, और उसे इसकी आशा करने का कोई अधिकार नहीं। जो प्रार्थना परमेश्वर के पास सबसे अधिक प्रभावशाली होती है, वह उस व्यक्ति की प्रार्थना है जो विश्वास करता है कि परमेश्वर उसकी सुनेगा, और इसलिए भरोसे के साथ माँगता है। एक शब्द में, विश्वास प्रार्थना का धनुष है। आपको धनुष को थामना ही होगा, नहीं तो आप तीर नहीं चला सकते; और वह धनुष जितना मज़बूत होगा, आप तीर को उतनी ही दूर भेज सकेंगे, और उससे उतना ही अधिक काम कर सकेंगे। विश्वास के बिना प्रार्थना में या किसी और बात में परमेश्वर को प्रसन्न करना अनहोना है; यह मध्यस्थता की रीढ़, नस और मांसपेशी है।

    तीसरे, पवित्र अभिलाषाएँ होनी चाहिए, नहीं तो प्रार्थना विफल होगी; और वे अभिलाषाएँ किसी प्रतिज्ञा पर आधारित होनी चाहिए। यदि आप नहीं पाते कि परमेश्वर ने किसी आशीष की प्रतिज्ञा की है, तो आपको उसे माँगने का कोई अधिकार नहीं, और उसकी आशा करने का कोई कारण नहीं। बिना चेक के किसी बैंकवाले से धन माँगना व्यर्थ है। काउंटर पर वे आपको नहीं जानते; वे भुगतान की प्रतिज्ञा को जानते हैं, और यदि आप उसे प्रस्तुत करें तो आपको रकम मिल जाएगी, अन्यथा नहीं। आपको परमेश्वर की अपनी प्रतिज्ञाएँ प्रायश्चित के ढकने के पास लानी होंगी, जो ईश्वरीय कोषागार का काउंटर है, और आप वह प्राप्त करेंगे जिसकी आपको आवश्यकता है—परन्तु केवल उसी रीति से।

    तो फिर ध्यान दीजिए कि विश्वास धनुष है, और प्रबल अभिलाषा डोरी पर वह तीर चढ़ाती है जिसे ऊपर भेजा जाना है। स्वर्ग की ओर कोई तीर नहीं चलाया जा सकता, सिवाय उसके जो स्वर्ग से नीचे आया हो। मसीही अपने तीर परमेश्वर के तरकश से लेते हैं, और जब वे उन्हें चलाते हैं तो उनके होंठों पर ये शब्द होते हैं, “जैसा तू ने कहा है, वैसा ही कर। जो वचन तू ने अपने दास को दिया है, उसे स्मरण कर, क्योंकि तू ने मुझे आशा दी है।”

    इस प्रकार सफल प्रार्थना एक पवित्र हृदय की वह अभिलाषा है जिस पर प्रतिज्ञा की स्वीकृति की मुहर लगी हो। सच्ची प्रार्थनाएँ उन सन्देशवाहक कबूतरों के समान हैं जो अपना मार्ग इतनी अच्छी तरह पहचानते हैं; वे स्वर्ग तक पहुँचने से चूक नहीं सकतीं, क्योंकि वे स्वर्ग से ही आई हैं, वे केवल घर लौट रही हैं। इसके अतिरिक्त, यदि प्रार्थना को सफल होना है, तो उसमें उत्कटता और हठ (लगातार विनती) होनी चाहिए। लिखा है, “धर्मी जन की प्रभावशाली और उत्कट प्रार्थना से बहुत कुछ हो सकता है।” केवल नाम के अंगीकार करनेवाले की अधमरी प्रार्थना नहीं—न उस व्यक्ति की प्रार्थना जिसे इस बात की परवाह नहीं कि उसे उत्तर मिले या न मिले। उसमें उत्सुकता, तीव्रता, परमेश्वर के सामने हृदय का उण्डेला जाना होना चाहिए। तीर को धनुष की डोरी पर चढ़ाना होगा, और धनुष को अपनी पूरी शक्ति से खींचना होगा।

    सबसे अच्छा धनुष भी तब तक किसी काम का नहीं जब तक आप उसे खींचें नहीं; और यदि आप विश्वास का धनुष खींचकर ऊपर स्वर्ग में स्थित निशाने पर तीर चलाएँ, तो आप जो चाहेंगे वह पाएँगे; केवल आपको उसे पाने का दृढ़ निश्चय करना होगा, बस इस एक सीमा के साथ—“प्रभु की इच्छा पूरी हो,”—और आप सफल होंगे। इसके बाद, परमेश्वर की महिमा की अभिलाषा होनी चाहिए—क्योंकि वही निशाने का केन्द्र है—और यदि हम उसकी ओर तीर न चलाएँ, तो तीर का कोई लाभ न होगा। हम जो माँगते हैं उसकी हमें सच्चे मन से अभिलाषा करनी चाहिए, क्योंकि हम विश्वास करते हैं कि उसे हमें देने से परमेश्वर की महिमा होगी। यदि हम पूरी तरह परमेश्वर के लिए जी रहे हैं, तो हमारी प्रार्थनाएँ उसके उद्देश्यों के साथ-साथ चलेंगी, और उनमें से कोई भी भूमि पर व्यर्थ न गिरेगी। “यहोवा को अपने सुख का मूल जान, और वह तेरे मनोरथों को पूरा करेगा।”

    हमें पवित्र आशा से बाट भी जोहनी चाहिए, नहीं तो हम प्रार्थना में बाधा डालेंगे। जो मनुष्य तीर चलाता है, उसे देखना चाहिए कि उसका तीर कहाँ जाता है। हमें अपनी प्रार्थना परमेश्वर की ओर लगानी चाहिए और ऊपर ताकना चाहिए। सब बातों में प्रभु यीशु पर दृष्टि लगाए हुए, हमें छुड़ानेवाले की योग्यता के द्वारा सफलता की आशा रखनी चाहिए। “यदि हम विश्वास करते हैं कि वह हमारी सुनता है, तो हम जानते हैं कि जो कुछ हम ने उससे माँगा, वह पाया है।”

    प्रार्थना में ढिठाई आत्म-विश्वास के धनुष से तीर चलाती है, परमेश्वर की महिमा के लिए नहीं, बल्कि अपनी ही तृप्ति के लिए, और इसलिए वह विफल होती है। कुछ लोगों का विचार है कि वे परमेश्वर से जो चाहें माँगें, वह उन्हें अवश्य मिलेगा। परन्तु मैं उनसे पूछूँगा, पहले, “आप कौन हैं?” दूसरे, “आप क्या माँगने जा रहे हैं?” और तीसरे, “आपको उसकी आशा करने का क्या अधिकार है?” इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर दिया जाना चाहिए, अन्यथा प्रार्थना परमेश्वर का अपमान बन सकती है। मैं चाहता हूँ कि जो कुछ मसीही सांसारिक बातों के विषय में प्रार्थना करते हैं, वे इस बात में थोड़ा सावधान रहें कि वे कैसे आचरण करते हैं। जब वे फ़िज़ूलख़र्ची के कारण झंझटों और उलझनों में फँस जाते हैं, तो क्या वे आशा करते हैं कि परमेश्वर उन्हें उनसे निकाल लेगा?

    मुझे ब्रिस्टल के भले श्री मुलर की एक टिप्पणी के विषय में सुनना स्मरण है। एक प्रार्थना-सभा में उन्होंने एक भाई का पत्र पढ़ा, जिसने उन्हें लगभग बीस पाउंड की भेंट के लिए धन्यवाद दिया था, जो बड़े ही ईश्वरीय प्रबन्ध से ठीक समय पर पहुँची थी, क्योंकि उस पर आधे वर्ष का किराया बकाया था। श्री मुलर ने कहा, “हाँ, हमारे भाई को बहुत धन्यवादी होना चाहिए, परन्तु मैं उसे लिखकर बताना चाहता हूँ कि उसे चुकाने की तैयारी किए बिना आधे वर्ष का किराया बकाया नहीं रखना चाहिए। और उस माँग को पूरा करने के लिए कुछ बचाकर न रखना उसकी ओर से मूर्खता और अन्याय है। जब मैंने एक घर लिया, तो मैंने कहा, ‘यह किसी दूसरे व्यक्ति का घर है। उसका किराया चुकाना मेरा दायित्व है,’ और इसलिए सप्ताह-दर-सप्ताह, जैसे-जैसे मैं घर का प्रयोग करता था, मैं जो देय था उसे चुकाने के लिए एक भाग अलग रख देता था। मैंने वह धन खर्च नहीं कर दिया और तिमाही के अन्त में यह आशा नहीं की कि स्वर्गीय पिता मुझे और भेजेगा।”

    यह खरी नैतिकता और सामान्य समझ की बात थी, और मैं आपसे विनती करता हूँ कि इस पर ध्यान दीजिए। हर प्रकार से प्रार्थना कीजिए, परन्तु “किसी के कर्ज़दार न हो।” दैनिक रोटी के लिए प्रार्थना की जानी चाहिए, परन्तु ऐसी सट्टेबाज़ियों का, जो आपको बर्बाद कर सकती हैं या मालामाल कर सकती हैं, उल्लेख भी नहीं करना चाहिए। यदि आप जुआ खेलने लगें, तो प्रार्थना करना छोड़ ही दीजिए। सीधे-सच्चे लेन-देन के विषय में आप प्रार्थना कर सकते हैं, परन्तु प्रभु को अपने धन-सम्बन्धी दाँव-पेचों में मत घसीटिए।

    मुझसे एक ऐसे युवक के लिए प्रार्थना करने का अनुरोध किया गया है जिसने गबन के कारण अपनी नौकरी खो दी, कि उसे दूसरी जगह मिल जाए; परन्तु ऐसा करने के बदले मैंने सुझाव दिया है कि वह स्वयं प्रार्थना करे कि वह ईमानदार बना दिया जाए। एक और व्यक्ति, जो भारी कर्ज़ में डूबा है, चाहता है कि मैं प्रार्थना करूँ कि उसे सहायता मिले; परन्तु मैं सुझाव देता हूँ कि जब तक कुछ बचा है, वह अपने लेनदारों को उनका अंश दे दे। जो बात मैं मनुष्य से न माँगूँगा, वह मैं अपने परमेश्वर से भी न माँगूँगा।

    प्रायश्चित के ढकने के पास पहुँचना पवित्र भूमि है; उसके साथ खिलवाड़ नहीं किया जाना चाहिए, न उसे पाप की सेवा में लगाया जाना चाहिए। “तुम माँगते हो और पाते नहीं, इसलिये कि बुरी इच्छा से माँगते हो, ताकि अपने भोग विलास में उड़ा दो।” यदि हम प्रभु के विरुद्ध चलें, तो वह भी हमारे विरुद्ध चलेगा। और यहाँ उपस्थित हर उस मनुष्य से, जो संकट में है और मसीही है, मैं कहता हूँ: उससे निकलने का सीधा मार्ग अपनाइए, और उचित काम कीजिए; और यदि उससे आप पर संकट आए तो उसे मर्द की तरह सहिए, और फिर परमेश्वर के पास जाकर कहिए, “हे प्रभु, मैंने तेरे अनुग्रह से एक सीधा, ईमानदार मार्ग चुना है, अब मेरी सहायता कर,” और वह करेगा।

    परमेश्वर हमें मसीहियों के रूप में यह अनुग्रह दे कि हम उसके आत्मा की सामर्थ में परमेश्वर के साथ चलें, और केवल यीशु पर भरोसा रखें; और वह हम में से हर एक को प्रार्थना में सामर्थी बनाए। जिस मनुष्य को परमेश्वर ने सामर्थ के साथ प्रार्थना करना सिखाया है, वह परमेश्वर के मन के साथ एक होता है, और मनुष्यों के बीच चलता-फिरता परमेश्वर का हाथ होता है; जब वह कार्य करता है, तो परमेश्वर उसमें कार्य करता है। परन्तु उसे सावधान और चौकस रहना चाहिए, क्योंकि प्रभु जलन रखनेवाला परमेश्वर है, और जहाँ वह सबसे अधिक प्रेम करता है, वहाँ सबसे अधिक जलन रखता है। भाइयो, परमेश्वर आपको यह अनुग्रह दे कि आप नम्रता से परमेश्वर के साथ चलें, और उसके निकट रहें, “जिस से तुम्हारी प्रार्थनाएँ रुक न जाएँ।” आमीन।

    उपदेश से पहले पढ़ा गया पवित्रशास्त्र का भाग—मलाकी 3

    “अवर ओन हिम बुक” से भजन—84 (गीत 3), 1001, 994

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