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व्यक्तिगत रूप से लोगों से बातचीत करना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। कोई नहीं बता सकता कि सुसमाचार के प्रचार के बाद व्यक्तिगत कार्य द्वारा उसे आगे न बढ़ाने के कारण कितने लोग परमेश्वर के राज्य से खो गए हैं। यह कितने दुःख की बात है कि कलीसिया के कितने कम सदस्य खोजियों से बातचीत करने के योग्य हैं, जबकि यही तो वह काम है जिसमें उन्हें पादरी की सबसे कुशलता से सहायता करनी चाहिए। लोग प्रायः पादरी के प्रचार के समय ही परिवर्तित नहीं होते। पूछताछ-सभा में ही उनके मसीह के पास लाए जाने की सबसे अधिक सम्भावना होती है। शायद पादरी के प्रचार के द्वारा वे जागृत तो होते हैं, परन्तु परमेश्वर साधारणतः किसी एक व्यक्ति को काम में लाता है कि वह उद्धार का मार्ग दिखाए और चिन्तित लोगों को निर्णय तक पहुँचाए। कुछ लोग पूछताछ-सभाओं का कोई लाभ नहीं देख पाते, और सोचते हैं कि ये कोई नई चीज़ हैं और इनके लिए हमारे पास कोई अधिकार नहीं है। परन्तु ये कोई नई रीति नहीं हैं। सारी बाइबल में हम इनके विषय में पढ़ते हैं। जब यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला प्रचार कर रहा था, तो बीच में उससे प्रश्न पूछे गए। यह अच्छी बात होती यदि लोग कभी-कभी किसी दार्शनिक उपदेश के बीच में पादरी को टोककर पूछ लें कि उसका अर्थ क्या है। यह निश्चित करने का एकमात्र उपाय कि लोग समझ रहे हैं कि वह किस विषय में बोल रहा है, यही है कि उन्हें प्रश्न पूछने दिया जाए। मैं नहीं जानता कि कुछ लोग, जिन्होंने अपना पूरा प्रवचन लिख रखा है, क्या करेंगे यदि कोई खड़ा होकर पूछे: “उद्धार पाने के लिये मैं क्या करूँ?” फिर भी ऐसे प्रश्न आपके पास की किसी भी और बात से अधिक भलाई करेंगे। वे खोज की आत्मा को जगा देंगे। मसीह की कुछ सबसे मधुर शिक्षाएँ प्रश्नों के कारण ही दी गईं।
कलीसिया की तीन प्रकार की सभाएँ
सब कलीसियाओं में तीन प्रकार की सभाएँ होनी चाहिए: एक आराधना के लिए—स्तुति चढ़ाने और प्रार्थना में प्रभु की बाट जोहने के लिए; दूसरी शिक्षा के लिए; और इन सभाओं में अपरिवर्तित लोगों के लिए एक शब्द की भी आवश्यकता नहीं (यद्यपि कुछ लोग कोई भी सभा सुसमाचार प्रस्तुत किए बिना समाप्त नहीं करते), परन्तु ये कलीसिया के लोगों के लिए हों; और तीसरी सुसमाचार प्रचार के लिए। रविवार की सुबह शिक्षा के लिए सबसे अच्छा समय है, परन्तु कलीसिया की नियमित सभाओं में रविवार की रात पूरे सप्ताह की सबसे अच्छी रात है जब परमेश्वर के पुत्र का सरल सुसमाचार प्रचार किया जाए। जब आप उसका प्रचार कर चुके हों, और अदृश्य जगत की सामर्थ्य को अनुभव कर चुके हों, और कुछ प्राण दुविधा में काँप रहे हों, तब ऐसा न कहें, जैसा मैंने अच्छे-अच्छे पादरियों को कहते सुना है: “यदि इस स्थान में कोई ऐसे हैं जो अपने प्राणों के विषय में चिन्तित हैं—तनिक भी चिन्तित हैं—तो मैं शुक्रवार की रात पादरी के अध्ययन-कक्ष में रहूँगा, और उनसे मिलकर मुझे प्रसन्नता होगी।” तब तक सम्भावना यही है कि वह प्रभाव पूरी तरह मिट चुका होगा। उसी रात उनसे बातचीत करें, इससे पहले कि शैतान अच्छे बीज को छीन ले जाए। जहाँ कहीं सुसमाचार का प्रचार हो, वहाँ तुरन्त परिणाम की आशा होनी चाहिए, और यदि ऐसा होता तो मसीह की कलीसिया निरन्तर अनुग्रह की दशा में बनी रहती।
“और जब सभा उठ गई तो यहूदियों और यहूदी मत में आए हुए भक्तों में से बहुत से पौलुस और बरनबास के पीछे हो लिए; और उन्होंने उन से बातें करके समझाया, कि परमेश्वर के अनुग्रह में बने रहो।” यदि पौलुस और बरनबास आशीर्वचन देकर इन लोगों को घर भेज देते, तो वे कितना काम कर पाते? यह रोने की बात है कि हमारे यहाँ कलीसिया के हज़ारों-हज़ार ऐसे सदस्य हैं जो परमेश्वर के राज्य को फैलाने के लिए किसी काम के नहीं। वे बाज़ार, मेले और सिलाई-मण्डलियाँ तो समझते हैं; परन्तु जब आप उनसे कहते हैं कि बैठकर किसी पुरुष या स्त्री को परमेश्वर के राज्य में प्रवेश का मार्ग दिखाएँ, तो वे कहते हैं: “ओह, मैं यह नहीं कर सकता। डीकन यह करें, या कोई और।” यह पूरी तरह गलत है। कलीसिया को ठीक इसी बात में शिक्षित किया जाना चाहिए। कलीसिया के बहुत से सदस्य ऐसे हैं जो बस बैसाखियों के सहारे लंगड़ाते फिरते हैं। वे बस इतना समझ पाते हैं कि उनका उद्धार हो गया है, और कल्पना करते हैं कि इस उन्नीसवीं शताब्दी में एक मसीही होने के लिए बस इतना ही चाहिए। जहाँ तक दूसरों की सहायता करने की बात है, वह तो उनके मन में कभी आती ही नहीं। वे सोचते हैं कि यदि वे स्वयं किसी प्रकार आगे बढ़ते रहें, तो वे आश्चर्यजनक रूप से अच्छा कर रहे हैं। उन्हें कोई अनुमान नहीं कि पवित्र आत्मा उनके द्वारा क्या करना चाहता है।
आप चाहे कितने ही निर्बल क्यों न हों, परमेश्वर आपको काम में ला सकता है; और आप नहीं कह सकते कि आप उद्धार की कैसी धारा को गति दे सकते हैं। यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला जब मरा तब वह जवान था; परन्तु वह अन्द्रियास को मसीह के पास ले गया, और अन्द्रियास पतरस को ले गया, और इस प्रकार वह नदी बहती चली गई।
इस पुस्तक के अन्तिम पृष्ठों में मैं दूसरों तक भलाई पहुँचाने, और इस प्रकार बाइबल के अपने ज्ञान से उन्हें लाभ पहुँचाने के विषय में कुछ संकेत देना चाहता हूँ। हर एक विश्वासी, चाहे वह पादरी हो या साधारण सदस्य, सुसमाचार फैलाने के लिए कर्तव्य से बँधा है। “तुम सारे जगत में जाकर सारी सृष्टि के लोगों को सुसमाचार प्रचार करो”—यह विदा होते हुए हमारे उद्धारकर्ता की अपने चेलों को दी गई व्यापक आज्ञा थी।
तौभी बाइबल के बहुत से विद्यार्थी ऐसे हैं जो इस आज्ञा की पूरी तरह उपेक्षा करते हैं। वे स्पंज के समान हैं, जो सदा जीवन का जल सोखते रहते हैं, परन्तु आस-पास के प्यासे प्राणों को उसमें से कभी कुछ नहीं देते।
एक पादरी शिकार खेलने जाया करता था, और जब उसके बिशप ने उसे डाँटा, तो उसने कहा कि जब वह कर्तव्य पर होता है तब कभी शिकार खेलने नहीं जाता।
बिशप ने पूछा, “एक पादरी कर्तव्य से छुट्टी पर कब होता है?”
और यही बात हर एक मसीही के विषय में है: वह कर्तव्य से छुट्टी पर कब होता है?
मरते हुए व्यक्ति के लिए कोई प्रतिज्ञा, शोकित और दुःखी के लिए आशा का कोई वचन, निराश के लिए प्रोत्साहन का, और चिन्तित के लिए सलाह का कोई शब्द तैयार रखना एक बड़ी योग्यता है। इन रीतियों से उपयोगी होने के अवसर बहुत हैं। केवल पूछताछ-सभाओं और कलीसिया के काम में ही नहीं, परन्तु दूसरों के साथ हमारे प्रतिदिन के सम्पर्क में भी अवसर निरन्तर मिलता रहता है। एक शब्द, एक दृष्टि, हाथ का एक स्नेहभरा दबाव, एक प्रार्थना—इनमें से कोई भी भलाई के लिए अनन्त प्रभाव डाल सकता है।
एक सज्जन ने एक डॉक्टर के बच्चे से पूछा, “क्या तुम्हारे पिता घर पर हैं?”
उसने कहा, “नहीं, वे बाहर गए हैं।”
“मैं उन्हें कहाँ पा सकता हूँ?”
उसने कहा, “देखिए, आपको उन्हें किसी ऐसी जगह ढूँढ़ना पड़ेगा जहाँ लोग बीमार हों या घायल हों, या कुछ ऐसा ही हो। मैं नहीं जानता कि वे कहाँ हैं, परन्तु वे कहीं न कहीं किसी की सहायता कर रहे हैं।”
यही आत्मा उसके हर एक अनुयायी को प्रेरित करनेवाली होनी चाहिए जो भलाई करता फिरा।
नियम निर्धारित करना
मैं मानता हूँ कि लोगों से उनकी धार्मिक दशा के विषय में बातचीत करने के लिए कोई पक्के नियम नहीं बनाए जा सकते। टीन के खिलौना सिपाही बिलकुल एक जैसे होते हैं, परन्तु मनुष्य ऐसे नहीं होते। मत्ती और पौलुस एक-दूसरे से बहुत भिन्न थे। जिन लोगों से हम बातचीत करते हैं वे एक-दूसरे से बहुत भिन्न हो सकते हैं। जो एक के लिए औषधि होगी, वह दूसरे के लिए घोर विष हो सकती है। लूका के 15वें अध्याय में बड़ा पुत्र और छोटा पुत्र बिलकुल एक-दूसरे के विपरीत थे। जो एक के लिए अच्छी सलाह होती, वह दूसरे के लिए विनाश हो सकती थी। परमेश्वर ने कभी दो व्यक्तियों को एक जैसा दिखनेवाला नहीं बनाया। यदि हमने मनुष्यों को बनाया होता, तो शायद हम उन सबको एक जैसा बना देते, चाहे उन्हें साँचे में ढालने के लिए हमें कुछ हड्डियाँ ही क्यों न तोड़नी पड़तीं। परन्तु परमेश्वर की रीति यह नहीं है। सृष्टि में असीम विविधता है। फिलिप्पी के दरोगा के साथ विशेष प्रकार का व्यवहार आवश्यक था। मसीह ने नीकुदेमुस के साथ एक प्रकार से व्यवहार किया, और कुएँ पर मिली स्त्री के साथ दूसरे प्रकार से।
आपका अपना अनुभव
खोजियों से बातचीत करते समय अपने परिवर्तन का अनुभव सुनाना एक बड़ी भूल है। अनुभव का अपना स्थान हो सकता है, परन्तु मैं नहीं समझता कि जब हम खोजियों से बातचीत कर रहे हों तब उसका कोई स्थान है; क्योंकि जिस व्यक्ति से आप बात कर रहे हैं, वह सबसे पहले आपके अनुभव की ही खोज करने लगेगा। उसे आपका अनुभव नहीं चाहिए। उसे अपना स्वयं का अनुभव चाहिए।
मान लीजिए बरतिमाई यरूशलेम में उस मनुष्य के पास गया होता जो जन्म का अन्धा था, और कहता:
“अब हमें ज़रा बताओ कि प्रभु ने तुम्हें कैसे चंगा किया।”
यरूशलेम का वह मनुष्य कह सकता था: “उसने बस भूमि पर थूका, और उस मिट्टी से मेरी आँखों पर लेप किया।”
बरतिमाई कहता है, “हो! मुझे विश्वास नहीं कि तुम्हें कभी दृष्टि मिली भी है। ऐसी रीति के विषय में किसने कभी सुना है? अरे, किसी मनुष्य की आँखों में मिट्टी भर देना तो उन्हें फोड़ देने के लिए काफ़ी है!”
दोनों मनुष्य अन्धे थे, परन्तु दोनों एक ही रीति से चंगे नहीं किए गए। बहुत से लोग परमेश्वर के राज्य से बाहर इसलिए रह जाते हैं क्योंकि वे किसी और के अनुभव की खोज में रहते हैं—वह अनुभव जो उनकी दादी-नानी को, उनकी मौसी-बुआ को, या परिवार में किसी और को हुआ था।
एक समय में एक खोजी
फिर यह बहुत महत्त्वपूर्ण है कि एक समय में एक ही व्यक्ति से बातचीत की जाए। डॉक्टर सब रोगों के लिए कॉड-लिवर तेल नहीं देता। वह कहता है, “नहीं, मुझे यह पता लगाना है कि हर एक को क्या चाहिए।” वह जीभ देखता है, और लक्षणों के विषय में पूछताछ करता है। एक को जाड़ा-बुखार हो सकता है, दूसरे को टाइफ़ॉइड ज्वर, और किसी और को क्षयरोग। मनुष्य को आवश्यकता इस बात की है कि वह अपनी बाइबल को पढ़ सके, और मानव-स्वभाव को भी पढ़ सके।
वे सबसे अच्छा करते हैं जो पूछताछ-सभा में एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के पास दौड़ते हुए हर जगह प्रोत्साहन के शब्द नहीं देते फिरते। वे एक दोपहर या एक शाम में केवल एक या दो लोगों के पास जाएँ तो अधिक अच्छा करेंगे। हम अनन्तकाल के लिए निर्माण कर रहे हैं, और समय ले सकते हैं। तब काम ऊपरी नहीं होगा।
पहले उस व्यक्ति का भरोसा जीतने का प्रयत्न करें, तब आपके शब्दों का अधिक प्रभाव होगा। विषय को छेड़ने में बड़ी चतुराई से काम लें।
यह बहुत सहायक होगा कि जहाँ तक सम्भव हो लोगों को श्रेणियों में बाँटें, और इन श्रेणियों पर पवित्रशास्त्र के कुछ विशेष खण्ड लागू करें। तौभी जो पद आपने पुस्तकों में देखे हैं, उन्हें तब तक काम में लाना बुद्धिमानी नहीं जब तक आप अपने मन में उनके अर्थ और प्रयोग के विषय में पूरी तरह स्पष्ट न हो जाएँ। बाहरी स्रोतों से मिले सुझावों का हर प्रकार से लाभ उठाएँ, परन्तु जैसे दाऊद शाऊल के हथियार पहनकर नहीं लड़ सका, वैसे ही सम्भव है कि आप उन पदों और खण्डों का अच्छा उपयोग न कर सकें जो किसी और के हाथों में सामर्थी सिद्ध हुए हैं। सबसे अच्छा उपाय यह है कि आप अपना स्वयं का वर्गीकरण बनाएँ, और उपयुक्त पद चुनें, जिन्हें अनुभव के अनुसार आप परिस्थितियों को देखते हुए अपनाएँगे या बदलेंगे। बहुत से पदों का धुँधला और अधूरा ज्ञान रखने के बजाय कुछ ही खण्डों से भली-भाँति परिचित हो जाएँ।
निम्नलिखित वर्गीकरण सहायक सिद्ध हो सकता है:— 1. वे विश्वासी जिनमें उद्धार का निश्चय नहीं है; जो पाप करने के कारण अन्धकार में हैं; जो प्रार्थना, बाइबल अध्ययन और अनुग्रह के अन्य साधनों की उपेक्षा करते हैं; जो क्षमा न करनेवाली आत्मा के कारण अन्धकार में हैं; जो मसीह को खुलेआम मान लेने में डरते या लजाते हैं; जो स्वामी के लिए किसी सक्रिय काम में लगे नहीं हैं; जिनमें परीक्षा का सामना करने और संकट के समय दृढ़ खड़े रहने का बल नहीं है; जो अनुग्रह में बढ़ नहीं रहे हैं।
2. वे विश्वासी जो पीछे हट गए हैं।
3. वे लोग जो पाप के विषय में गहराई से कायल हो गए हैं, और उद्धार की खोज में हैं।
4. वे लोग जिन्हें अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ हैं। बहुत से लोग मानते हैं कि वे इतने पापी हैं कि परमेश्वर उन्हें ग्रहण नहीं करेगा, कि उन्होंने पाप करते-करते अपने अवसर गँवा दिए हैं और अब बहुत देर हो चुकी है, कि सुसमाचार कभी उनके लिए था ही नहीं। दूसरे लोग मसीह के ईश्वरत्व और बाइबल की प्रामाणिकता के विषय में सच्चे सन्देहों के कारण रुके रहते हैं। फिर कुछ और लोग बाइबल के भेदों, चुनाव के सिद्धान्त, तुरन्त परिवर्तन आदि से परेशान रहते हैं, या वे कहते हैं कि उन्होंने मसीह को व्यर्थ ढूँढ़ा है, कि उन्होंने प्रयत्न किया और असफल रहे, कि उन्हें डर है कि वे अन्त तक टिक नहीं सकेंगे। एक बड़ा वर्ग भावनाओं के विषय में बड़ी परेशानी में रहता है।
5. वे लोग जो बहाने बनाते हैं। उस व्यक्ति में जिसके पास कोई कारण है और उस व्यक्ति में जिसके पास प्रस्तुत करने के लिए कोई बहाना था, बड़ा अन्तर है।
सबसे साधारण बहाने ये हैं कि बहुत से असंगत चालचलनवाले मसीही हैं, कलीसिया में कपटी लोग हैं; कि मसीही बनने की कीमत बहुत अधिक होगी, कि वे अपने वर्तमान व्यवसाय में बने नहीं रह सकेंगे, आदि; कि वे किसी दिन मसीही बनने की आशा रखते हैं; कि उनके साथी उन्हें रोकते हैं, या यदि वे परिवर्तित हो जाएँ तो वे उन्हें त्याग देंगे।
6. वे लोग जो पाप के विषय में कायल नहीं हुए हैं। कुछ लोग जान-बूझकर पाप में लगे रहते हैं; वे “जीवन का मज़ा लेना,” “जवानी की मनमानी करना” चाहते हैं; दूसरे लापरवाह हैं; फिर कुछ और लोग यीशु मसीह और उसके काम से बस अनजान हैं। बहुत से लोग उद्धारकर्ता की अपनी आवश्यकता का अनुभव नहीं करते क्योंकि वे अपने आप को धर्मी समझते हैं, और अपनी नैतिकता और भले कामों पर भरोसा रखते हैं।
7. वे लोग जो विरोधी मतों को मानते हैं, जिनमें सम्प्रदायवादी, सनकी लोग, यहूदी, प्रेतवादी, अविश्वासी, नास्तिक, अज्ञेयवादी आदि सम्मिलित हैं।
व्यक्तिगत बातचीत में सदा अपनी बाइबल का उपयोग करें। स्मरण-शक्ति पर भरोसा न करें, परन्तु उस व्यक्ति से स्वयं वह पद पढ़वाएँ। छपी हुई पर्चियाँ या पुस्तकें काम में न लाएँ। इसलिए, यदि सुविधाजनक हो, तो सदा एक बाइबल या नया नियम अपने साथ रखें।
किसी व्यक्ति को घुटनों पर ले आना (यदि सुविधाजनक हो) अच्छी बात है, परन्तु उसके तैयार होने से पहले उसे वहाँ न ले आएँ। सम्भव है कि उसे वहाँ तक पहुँचाने से पहले आपको उससे दो घण्टे बात करनी पड़े। परन्तु जब आपको लगे कि वह लगभग तैयार है, तो कहें, “क्या हम परमेश्वर से न माँगें कि वह इस बात पर हमें प्रकाश दे?” कभी-कभी प्रार्थना के कुछ मिनटों ने किसी मनुष्य के लिए दो घण्टे की बातचीत से अधिक काम किया है। जब परमेश्वर का आत्मा उसे इतनी दूर तक ले आया है कि वह चाहता है कि आप उसके साथ प्रार्थना करें, तो वह राज्य से बहुत दूर नहीं है। उससे कहें कि वह अपने लिए स्वयं प्रार्थना करे। यदि वह प्रार्थना नहीं करना चाहता, तो उसे बाइबल की कोई प्रार्थना काम में लाने दें; उससे उसे दोहरवाएँ; उदाहरण के लिए: “हे प्रभु, मेरी सहायता कर!” उस मनुष्य से कहें: “यदि प्रभु ने उस बेचारी स्त्री की सहायता की, तो यदि आप भी वही प्रार्थना करें तो वह आपकी भी सहायता करेगा। यदि आप हृदय से प्रार्थना करें तो वह आपको नया हृदय देगा।” किसी मनुष्य को प्रार्थना करने के लिए घर न भेजें। निःसन्देह उसे घर पर प्रार्थना करनी चाहिए, परन्तु मैं तो चाहूँगा कि उसके होंठ तुरन्त खुल जाएँ। किसी मनुष्य के लिए प्रार्थना में अपनी ही आवाज़ सुनना अच्छी बात है। उसके लिए यह पुकारना अच्छी बात है: “हे परमेश्वर, मुझ पापी पर दया कर!”
तुरन्त निर्णय के लिए आग्रह करें, परन्तु किसी मनुष्य से कभी न कहें कि वह परिवर्तित हो गया है। उससे कभी न कहें कि उसका उद्धार हो गया है। पवित्र आत्मा को यह बात उस पर प्रकट करने दें। आप किसी मनुष्य को गोली मारकर देख सकते हैं कि वह मर गया है, परन्तु आप यह नहीं देख सकते कि कब कोई मनुष्य अनन्त जीवन पाता है। इस महान प्रश्न के विषय में किसी को धोखा देना आपको शोभा नहीं देता। परन्तु आप उसके विश्वास और भरोसे में सहायता कर सकते हैं, और उसे ठीक मार्ग पर ले जा सकते हैं।
व्यक्तिगत कार्य करने के लिए सदा तैयार रहें। जब फ्रांस और जर्मनी के बीच युद्ध की घोषणा हुई, तो जर्मन सेनापति काउंट फ़ॉन मोल्टके उसके लिए तैयार था। देर रात, जब वह सोने चला गया था, उसे यह समाचार पहुँचाया गया। उसने सन्देशवाहक से कहा, “बहुत अच्छा, बाईं ओर का तीसरा फ़ाइल-बस्ता”; और वह फिर सो गया।
यह काम साहस के साथ करें। जीवन में अपने से ऊँचे पद पर रहनेवालों को न चुनें, परन्तु साधारणतः अपने ही स्तर के लोगों को चुनें। यदि किसी और प्रकार से प्रबन्ध हो सके, तो विपरीत लिंग के व्यक्ति से बातचीत न करें। अपने सारे प्रयत्न इसी में लगा दें कि बेचारे, संघर्ष करते हुए प्राणों को उस प्रश्न का उत्तर दें जो उनके लिए सबसे अधिक महत्त्व का है: “उद्धार पाने के लिये मैं क्या करूँ?”
