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यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
इस छोटी-सी पुस्तक में मैंने हमारे आत्मिक जीवन के विविध पहलुओं पर कुछ मनन लिखे हैं, और उन कठिनाइयों पर विचार किया है जिनका सामना परमेश्वर के हर जन को अपने आत्मिक जीवन की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं से गुज़रते हुए अवश्य करना पड़ेगा।
सम्भव है कि जिन प्रश्नों पर विचार किया गया है, उनमें से कुछ पर सब लोग मेरे विचारों से सहमत न हों। यदि वे सहमत होते तो यह अजीब बात होती। क्योंकि जैसे कोई दो मनुष्य रूप और आकृति में ठीक एक जैसे नहीं होते, और जैसे सब की सुनने या देखने की शक्ति बराबर नहीं होती, वैसे ही हर मनुष्य की आत्मिक सत्य की समझ उसके स्वभाव, उसके अनुभव, और उसकी आत्मिक दृष्टि पर निर्भर होगी। मूलभूत सिद्धान्तों पर भिन्न विचार होने की सम्भावना नहीं, परन्तु अनावश्यक बातों पर बहुत सम्भव है कि होंगे। क्योंकि परमेश्वर अपनी इच्छा प्रकट करते समय हर मनुष्य की आत्मिक दशा और क्षमता का ध्यान रखता है। इसलिए जो बात एक को समय से आगे की लग सकती है, वही दूसरे को पुरानी और अनावश्यक लग सकती है।
इसके अतिरिक्त, बहुत-से लोग परमेश्वर द्वारा प्रकट किए गए उन तथ्यों का अर्थ समझने में असफल रहते हैं, जिन्हें परमेश्वर के साथ एकता में रहने वाले और उसके द्वारा प्रकाशित किसी मनुष्य ने लिखा है। स्वयं परमेश्वर के आनन्द का कोई बहुत निश्चित अनुभव पाए बिना, वे उसके विषय में अपने सिद्धान्तों के समर्थक बनकर निकल पड़ते हैं, और अनावश्यक बातों की भूसी पर ऐसे लड़ते हैं जैसे कुत्ते सूखी हड्डियों पर लड़ते हैं। परन्तु जिन्होंने परमेश्वर के साथ संगति और एकता का आनन्द लिया है और इन निष्फल झगड़ों से ऊपर उठा लिए गए हैं, वे अपने व्यक्तिगत अनुभव के भण्डार से “नई और पुरानी वस्तुएँ” निकालते हैं, जिनकी वे यह सोचे बिना गवाही देते हैं कि दूसरे सहमत होंगे या नहीं।
मैं रेवरेंड टी. ई. रिडल का हृदय से आभारी हूँ, जिन्होंने इस पुस्तक का उर्दू से अंग्रेज़ी में अनुवाद करने में फिर मेरी सहायता की है; और मिस ई. सैंडर्स का भी, प्रूफ़ पढ़ने और सुधारने में उनकी बड़ी सहायता के लिए।
सुन्दर सिंह।
सुबाथू, शिमला की पहाड़ियाँ।
अगस्त 1925।
